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== वर्तमान न्यायतंत्र की विकृतियाँ और भारतीय न्यायदृष्टि के सूत्र ==
 
== वर्तमान न्यायतंत्र की विकृतियाँ और भारतीय न्यायदृष्टि के सूत्र ==
न्यायतंत्र का उद्देश्य है प्रस्तुत परिस्थितियों का विचार करते हुए सत्य को खोजना। सत्य की प्रतिष्ठापना करना। इस दृष्टि से पाश्चात्य न्यायदृष्टि के अनुसार सत्य की व्याख्या बनती है "प्रस्तुत जानकारी, साक्षी और प्रमाणों के आधारपर विश्लेषण, संश्लेषण, तर्क अनुमान के आधारपर जो सिद्ध होगा वही सत्य है।" अर्थात् वास्तविक सत्य नहीं कानूनी सत्य। पाश्चात्य न्यायतंत्र का एक सूत्र यह कहता है की न्यायदेवता अंधी होती है। यह कथन भी अत्यंत विचित्र है। वास्तव में तो न्यायदेवता सूक्ष्म से सूक्ष्म बात जान सके ऐसी होनी चाहिये। किन्तु पाश्चात्य न्यायतंत्र के अनुसार न्यायाधीश ने प्रस्थापित कानून के आधार पर, प्रस्तुत की गई जानकारी, साक्ष और प्रमाणों को छोडकर अन्य किसी भी बात का विचार नहीं करना है। लेकिन ऐसा करने से न्यायाधीश सत्य को पूरी तरह कैसे जान सकता है? यहाँ पाश्चात्य जीवनदृष्टि का टुकड़ों में जानने का सूत्र लागू होता है। जितने टुकडों की जानकारी मिलेगी उन के आधारपर सत्य का निर्धारण करना। यदि पूरे की जानकारी नहीं होगी तो पूरा सत्य कैसे सामने आएगा? लेकिन पूरे सत्य की चिंता पाश्चात्य न्यायतंत्र को नहीं है। सत्य की भारतीय व्याख्या महाभारत में दी गई है। यह व्याख्या भारतीय जीवनदृष्टि के“ सर्वे भवन्तु सुखिन:" इस सूत्र के अनुसार ही है। व्याख्या है{{Citation needed}}:<blockquote>यद् भूत हितं अत्यंत एतत् सत्यं मतं मम। </blockquote><blockquote>भावार्थ : जो बात चराचर के हित में है, वही सत्य है। सत्य की यह सर्वश्रेष्ठ व्याख्या है। </blockquote><blockquote>सच्चिदानन्द याने सत्-चित्-आनन्द स्वरूप परमात्मा का एक प्रमुख लक्षण “सत्” भी है। सत् याने जो अटल है। जो अपरिवर्तनीय है। चिरन्तन है। इसलिए सत्य की खोज वास्तव में परमात्मा की खोज ही होती है।</blockquote>न्याय दर्शन के पहले आन्हिक के पहले ही सूत्र में कहा है: <blockquote>प्रमाण प्रमेय संशय प्रयोजन दृष्टान्त सिद्धान्तावयव तर्क निर्णय वाद जल्प वितण्डा हेत्वाभासच्छल जाति निग्रहस्था-नानांतत्त्वज्ञानान्नि:श्रेयसाधिगम: ।।१।।</blockquote><blockquote>अर्थ : प्रमाण, प्रमेय, संशय, प्रयोजन, दृष्टान्त, सिद्धांत, अवयव, तर्क, निर्णय, वाद, जल्प, वितण्डा, हेत्वाभास, छल, जाति, निग्रहस्थानानाम् आदि सोलह के माध्यम से संसार के पदार्थों के तत्त्वज्ञान के द्वारा नि:श्रेयस की प्राप्ति होती है। मोक्ष की प्राप्ति होती है।</blockquote>प्रस्तावना में हमने देखा है कि इस न्यायतंत्र का ५० प्रतिशत वकील नामक वर्ग यह असत्य की विजय के लिये अपनी शक्ति लगाता है । अर्थात् अनैतिक धंधा करता है । उसे दुराचार करना ही पडता है।  
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न्यायतंत्र का उद्देश्य है प्रस्तुत परिस्थितियों का विचार करते हुए सत्य को खोजना। सत्य की प्रतिष्ठापना करना। इस दृष्टि से पाश्चात्य न्यायदृष्टि के अनुसार सत्य की व्याख्या बनती है "प्रस्तुत जानकारी, साक्षी और प्रमाणों के आधारपर विश्लेषण, संश्लेषण, तर्क अनुमान के आधारपर जो सिद्ध होगा वही सत्य है।" अर्थात् वास्तविक सत्य नहीं कानूनी सत्य। पाश्चात्य न्यायतंत्र का एक सूत्र यह कहता है की न्यायदेवता अंधी होती है। यह कथन भी अत्यंत विचित्र है। वास्तव में तो न्यायदेवता सूक्ष्म से सूक्ष्म बात जान सके ऐसी होनी चाहिये। किन्तु पाश्चात्य न्यायतंत्र के अनुसार न्यायाधीश ने प्रस्थापित कानून के आधार पर, प्रस्तुत की गई जानकारी, साक्ष और प्रमाणों को छोडकर अन्य किसी भी बात का विचार नहीं करना है। लेकिन ऐसा करने से न्यायाधीश सत्य को पूरी तरह कैसे जान सकता है? यहाँ पाश्चात्य जीवनदृष्टि का टुकड़ों में जानने का सूत्र लागू होता है। जितने टुकडों की जानकारी मिलेगी उन के आधारपर सत्य का निर्धारण करना। यदि पूरे की जानकारी नहीं होगी तो पूरा सत्य कैसे सामने आएगा? लेकिन पूरे सत्य की चिंता पाश्चात्य न्यायतंत्र को नहीं है। सत्य की भारतीय व्याख्या महाभारत में दी गई है। यह व्याख्या भारतीय जीवनदृष्टि के“ सर्वे भवन्तु सुखिन:" इस सूत्र के अनुसार ही है। व्याख्या है{{Citation needed}}:<blockquote>यद् भूत हितं अत्यंत एतत् सत्यं मतं मम। </blockquote><blockquote>भावार्थ : जो बात चराचर के हित में है, वही सत्य है। सत्य की यह सर्वश्रेष्ठ व्याख्या है। </blockquote><blockquote>सच्चिदानन्द याने सत्-चित्-आनन्द स्वरूप परमात्मा का एक प्रमुख लक्षण “सत्” भी है। सत् याने जो अटल है। जो अपरिवर्तनीय है। चिरन्तन है। इसलिए सत्य की खोज वास्तव में परमात्मा की खोज ही होती है।</blockquote>न्याय दर्शन के पहले आन्हिक के पहले ही सूत्र में कहा है<ref>न्याय दर्शन , प्रथम सूत्र</ref>: <blockquote>प्रमाण प्रमेय संशय प्रयोजन दृष्टान्त सिद्धान्तावयव तर्क निर्णय वाद जल्प वितण्डा हेत्वाभासच्छल जाति निग्रहस्था-नानांतत्त्वज्ञानान्नि:श्रेयसाधिगम: ।।१।।</blockquote><blockquote>अर्थ : प्रमाण, प्रमेय, संशय, प्रयोजन, दृष्टान्त, सिद्धांत, अवयव, तर्क, निर्णय, वाद, जल्प, वितण्डा, हेत्वाभास, छल, जाति, निग्रहस्थानानाम् आदि सोलह के माध्यम से संसार के पदार्थों के तत्त्वज्ञान के द्वारा नि:श्रेयस की प्राप्ति होती है। मोक्ष की प्राप्ति होती है।</blockquote>प्रस्तावना में हमने देखा है कि इस न्यायतंत्र का ५० प्रतिशत वकील नामक वर्ग यह असत्य की विजय के लिये अपनी शक्ति लगाता है । अर्थात् अनैतिक धंधा करता है । उसे दुराचार करना ही पडता है।  
 
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भारतीय व्यवस्था धर्म का सूत्र यह कहता है की जिस व्यवस्था में किसी को सदाचार से जीना संभव नहीं हो, वह व्यवस्था त्याज्य है । व्यवस्था धर्म का यह सूत्र न्यायव्यवस्था को भी पूर्ण रूप से लागू है/भारतीय न्यायतंत्र में दुराचार के लिये स्थान नहीं है ।
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३. पाश्चात्य न्यायतंत्र का एक सूत्र है – १०० अपराधी भले छूट जाएं, एक निरपराध को दण्ड नहीं होना चाहिये। जब भी कोई अपराध होता है तो उस प्रसंग में वह किसी निरपराध के विरोध में ही होता है। किसी निरपराध को हानी पहुंचाने के कारण ही होता है । इसलिये हर छूटनेवाले अपराधी के पीछे न्यूनतम एक निरपराध की हानी होती ही है । अर्थात् जब सौ अपराधी छूट जाते है तो १०० निरपराधों को हानी पहुंचती है । अर्थात् १०० अपराधियों के दोषमुक्त होने से न्यूनतम १०० निरपराधियों को दण्ड हो जाता है । इसलिये इस न्यायसूत्र का अर्थ इस प्रकार बनता है - न्यूनतम १०० निरपराधों को भले ही दण्ड भोगमा पडे १ निरपराध को दण्डित नहीं  करना चाहिये । वास्तव में १०० निरपराधों को दण्डित कर एक निरपराध को दण्ड से बचाने का आग्रह करनेवाला यह सूत्र अन्यायतंत्र का ही सूत्र है यह सामान्य मनुष्य भी समझ सकता है । यह न्यायतंत्र का सूत्र ही नहीं होना चाहिये। 
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भारतीय न्यायतंत्र में अपराधी के छूट जाने के लिये कोई गुंजाईश नहीं है । वास्तव में तो भारतीय न्यायतंत्र तो बहुत बाद में काम करता है । पहले तो भारतीय राज्यतंत्र का काम यह होता है की अपराध होना ही नहीं चाहिये । जिस राज्य में अपराध होते है, वह शासक अपराधी माना जाता है । भारतीय मान्यता यह है की प्रजा ने किये पुण्यों का फल जैसे राजा को अनायास ही मिलता है, उसी प्रकार से प्रजा ने किये पापों का फल भी शासक को भुगतना पडता है । इस में एक भी अपराधी छूटने का प्रश्न नहीं आता । रामराज्य की यही विशेषता थी । पहले तो अपराध होने से पहले ही रोकने की शासन व्यवस्था हो और फिर कोई भी अपराधी छूटे नहीं ऐसी शासन व्यवस्था और न्यायव्यवस्था हो । यह थी भारतीय मान्यता और व्यवस्था। हम सब को इस त्रुटिपूर्ण न्यायतंत्र में रहने की आदत हो गई है इसलिये वर्तमान में लोगों को यह असंभव लगेगी। अंग्रेजी न्यायव्यवस्था की भारत में प्रतिष्ठापना होने से पूर्वतक ऐसी न्यायप्रणालि भारतीय न्यायतंत्र का वास्तव था । 
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४. पाश्चात्य न्यायतंत्र में न्यायाधीश की अर्हता उस का एक सफल वकील होना यह है । अर्थात्त् जो सत्य को सहजता से असत्य सिद्ध कर दे और जो असत्य को सहजता से सत्य सिद्ध कर दे ऐसी जिस की बुद्धि  और कुशलता है वह न्यायाधीश बनने के योग्य माना जाता है ।
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भारतीय व्यवस्था धर्म का सूत्र यह कहता है कि जिस व्यवस्था में किसी को सदाचार से जीना संभव नहीं हो, वह व्यवस्था त्याज्य है । व्यवस्था धर्म का यह सूत्र न्यायव्यवस्था को भी पूर्ण रूप से लागू है। 
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# पाश्चात्य न्यायतंत्र का एक सूत्र है – १०० अपराधी भले छूट जाएं, एक निरपराध को दण्ड नहीं होना चाहिये। जब भी कोई अपराध होता है तो उस प्रसंग में वह किसी निरपराध के विरोध में ही होता है। किसी निरपराध को हानि पहुंचाने के कारण ही होता है। इसलिये हर छूटने वाले अपराधी के पीछे न्यूनतम एक निरपराध की हानि होती ही है। अर्थात् जब सौ अपराधी छूट जाते है तो १०० निरपराधों को हानि पहुंचती है। अर्थात् १०० अपराधियों के दोषमुक्त होने से न्यूनतम १०० निरपराधियों को दण्ड हो जाता है। इसलिये इस न्यायसूत्र का अर्थ इस प्रकार बनता है - न्यूनतम १०० निरपराधों को भले ही दण्ड भोगना पड़े, १ निरपराध को दण्डित नहीं करना चाहिये। वास्तव में १०० निरपराधों को दण्डित कर एक निरपराध को दण्ड से बचाने का आग्रह करनेवाला यह सूत्र अन्यायतंत्र का ही सूत्र है, यह सामान्य मनुष्य भी समझ सकता है। यह न्यायतंत्र का सूत्र ही नहीं होना चाहिये। 
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# भारतीय न्यायतंत्र में अपराधी के छूट जाने के लिये कोई गुंजाईश नहीं है। वास्तव में तो भारतीय न्यायतंत्र तो बहुत बाद में काम करता है। पहले तो भारतीय राज्यतंत्र का काम यह होता है कि अपराध होना ही नहीं चाहिये। जिस राज्य में अपराध होते है, वह शासक अपराधी माना जाता है। भारतीय मान्यता यह है कि प्रजा द्वारा किये पुण्यों का फल जैसे राजा को अनायास ही मिलता है, उसी प्रकार से प्रजा द्वारा किये पापों का फल भी शासक को भुगतना पडता है। इस में एक भी अपराधी छूटने का प्रश्न नहीं आता। रामराज्य की यही विशेषता थी। पहले तो अपराध होने से पहले ही रोकने की शासन व्यवस्था हो और फिर कोई भी अपराधी छूटे नहीं ऐसी शासन व्यवस्था और न्यायव्यवस्था हो । यह थी भारतीय मान्यता और व्यवस्था। हम सब को इस त्रुटिपूर्ण न्यायतंत्र में रहने की आदत हो गई है इसलिये वर्तमान में लोगों को यह असंभव लगेगी। अंग्रेजी न्यायव्यवस्था की भारत में प्रतिष्ठापना होने से पूर्वतक ऐसी न्यायप्रणालि भारतीय न्यायतंत्र का वास्तव था ।  ४. पाश्चात्य न्यायतंत्र में न्यायाधीश की अर्हता उस का एक सफल वकील होना यह है । अर्थात्त् जो सत्य को सहजता से असत्य सिद्ध कर दे और जो असत्य को सहजता से सत्य सिद्ध कर दे ऐसी जिस की बुद्धि  और कुशलता है वह न्यायाधीश बनने के योग्य माना जाता है । 
 
भारतीय न्यायदृष्टि के अनुसार न्यायाधीश बनने की अर्हता अत्यंत युक्तिसंगत और सामान्य मनुष्य को भी सहज समझ में आए ऐसी है । उपर हम देख आये है की सत्य की भारतीय व्याख्या है - यद् भूत हितं अत्यंत एतत् सत्यं मतं मम । इसलिये न्यायाधीश बनने के लिये सत्यनिष्ठा, निर्भयता, नि:स्वार्थी भावना और संवेदनशील मन के साथ में ही हर प्रसंग में, हर विषय में, हर मुकदमे में ' चराचर के हित में क्या है ' यह समझने की कुशाग्र बुद्धि का होना अनिवार्य माना गया है। सत्य के प्रति निष्ठावान होना आनिवार्य बात मानी गई थी। न्यायाधीश सात्विक वृत्ती का, आवश्यकताएं न्यूनतम हों ऐसा होता था। इन्द्रियोंपर संयम रखनेवाला होता था। ये बातें न्यायाधीश की अर्हता के अनिवार्य बिन्दू होते थे। याज्ञवल्क्य स्मृति में मीमांसा शास्त्र का जानकार, वेदाभ्यास सम्पन्न, धर्मशास्त्र का जानकार, सत्यवादी, शत्रुमित्र समान माननेवाले हो ऐसी न्यायाधीश की अर्हता बताई है। कात्यायन इसमें संयमी, उच्च कुलोत्पन्न, अपक्ष, शांत, परमात्मा से डरनेवाला याने कर्मसिद्धान्त पर श्रद्धा रखनेवाला, लांगुलचालन से प्रभावित न होनेवाला और अक्रोधी ऐसे और लक्षण जोड़ता है।
 
भारतीय न्यायदृष्टि के अनुसार न्यायाधीश बनने की अर्हता अत्यंत युक्तिसंगत और सामान्य मनुष्य को भी सहज समझ में आए ऐसी है । उपर हम देख आये है की सत्य की भारतीय व्याख्या है - यद् भूत हितं अत्यंत एतत् सत्यं मतं मम । इसलिये न्यायाधीश बनने के लिये सत्यनिष्ठा, निर्भयता, नि:स्वार्थी भावना और संवेदनशील मन के साथ में ही हर प्रसंग में, हर विषय में, हर मुकदमे में ' चराचर के हित में क्या है ' यह समझने की कुशाग्र बुद्धि का होना अनिवार्य माना गया है। सत्य के प्रति निष्ठावान होना आनिवार्य बात मानी गई थी। न्यायाधीश सात्विक वृत्ती का, आवश्यकताएं न्यूनतम हों ऐसा होता था। इन्द्रियोंपर संयम रखनेवाला होता था। ये बातें न्यायाधीश की अर्हता के अनिवार्य बिन्दू होते थे। याज्ञवल्क्य स्मृति में मीमांसा शास्त्र का जानकार, वेदाभ्यास सम्पन्न, धर्मशास्त्र का जानकार, सत्यवादी, शत्रुमित्र समान माननेवाले हो ऐसी न्यायाधीश की अर्हता बताई है। कात्यायन इसमें संयमी, उच्च कुलोत्पन्न, अपक्ष, शांत, परमात्मा से डरनेवाला याने कर्मसिद्धान्त पर श्रद्धा रखनेवाला, लांगुलचालन से प्रभावित न होनेवाला और अक्रोधी ऐसे और लक्षण जोड़ता है।
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भारतीय न्यायव्यवस्था में गाँव के पंचों का निर्णय अंतिम माना जाता था । अपवाद स्वरूप ही कोई मुकदमा राजा के स्तरपर आगे जाता था । न्याय मिलने की सम्भावनाएँ गाँव के पंचों के न्याय में जितनी अधिक होंगी उतनी अन्य किसी भी स्तरपर नहीं हो सकती थीं । क्यों की गाँव के पंच गाँव के हर व्यक्ति को अंदर बाहर से जाननेवाले होते है । उन के हाथों अन्याय होने की सम्भावनाएँ सामान्यत: हैं ही नहीं और हुई तो अपवाद स्वरूप ही हो सकती है। यह सामान्य ज्ञान की बात है ।   
 
भारतीय न्यायव्यवस्था में गाँव के पंचों का निर्णय अंतिम माना जाता था । अपवाद स्वरूप ही कोई मुकदमा राजा के स्तरपर आगे जाता था । न्याय मिलने की सम्भावनाएँ गाँव के पंचों के न्याय में जितनी अधिक होंगी उतनी अन्य किसी भी स्तरपर नहीं हो सकती थीं । क्यों की गाँव के पंच गाँव के हर व्यक्ति को अंदर बाहर से जाननेवाले होते है । उन के हाथों अन्याय होने की सम्भावनाएँ सामान्यत: हैं ही नहीं और हुई तो अपवाद स्वरूप ही हो सकती है। यह सामान्य ज्ञान की बात है ।   
 
११. पाश्चात्य कानून के अनुसार अपराध और दण्ड का समीकरण है । इस में मनुष्य की वृत्तियो को, स्वभाव को कोई स्थान नहीं है । अर्थात् अंग्रेजी न्यायतंत्र में न्याय को ऑब्जेक्टिव्ह याने व्यक्तिनिरपेक्ष माना जाता है । सब्जेक्टिव्ह अर्थात् व्यक्तिसापेक्ष नहीं माना जाता । एक विशिष्ट अपराध के लिये कानूनद्वारा निर्धारित दण्ड सबके लिये समान होगा। व्यक्ति सदाचारी है और अनजाने में उस से अपराध हो गया है, इस से न्यायतंत्र को कोई लेनादेना नहीं होता। वर्तमान समाज में बढते अपराधीकरण का यह भी एक प्रमुख कारण है।   
 
११. पाश्चात्य कानून के अनुसार अपराध और दण्ड का समीकरण है । इस में मनुष्य की वृत्तियो को, स्वभाव को कोई स्थान नहीं है । अर्थात् अंग्रेजी न्यायतंत्र में न्याय को ऑब्जेक्टिव्ह याने व्यक्तिनिरपेक्ष माना जाता है । सब्जेक्टिव्ह अर्थात् व्यक्तिसापेक्ष नहीं माना जाता । एक विशिष्ट अपराध के लिये कानूनद्वारा निर्धारित दण्ड सबके लिये समान होगा। व्यक्ति सदाचारी है और अनजाने में उस से अपराध हो गया है, इस से न्यायतंत्र को कोई लेनादेना नहीं होता। वर्तमान समाज में बढते अपराधीकरण का यह भी एक प्रमुख कारण है।   
सम्राट विक्रम के दरबार की एक न्यायकथा का वर्णन चीनी प्रवासी ने किया है । यह कथा भारतीय न्यायदृष्टि के इस व्यक्तिसापेक्षता के महत्व को अधोरेखित करनेवाली है । कथा ऐसी है - विक्रम के दरबार में एक मुकदमा आया । चार अपराधी थे । अपराध सिद्ध हो गया था । अपराध सब ने मान्य कर लिया था । चारों की पार्श्वभूमि विक्रम के गुप्तचरों ने पहले ही एकत्रित की थी । विक्रम ने न्याय दिया । एक को तो केवल इतना कहा की तुम जिस कुटुम्ब के हो उसे यह शोभा नहीं  देता। उसे बस इतना ही कहकर छोड दिया गया । दूसरे को थोडी अधिक कठोरता से उलाहना देकर छोड दिया गया । तीसरे को हंटर से पाँचबार मारकर छोड दिया गया । चौथे की गधेपर बिठाकर शहर में अशोभायात्रा निकालने की आज्ञा दी गई । चीनी प्रवासी आश्चर्य में पड गया की यह कैसा न्याय है ? उसने विक्रम से इस का कारण जानना चाहा । विक्रम ने उसे कहा । मेरे साथ चलो। दोनों वेश बदलकर निकल पडे । पहले अपराधी के घर गये । देखा ! वहाँ मातम मनाया जा रहा है । जिस युवक ने अपराध किया था उसने गले में फाँस लगाकर आत्महत्या कर ली है । दूसरे के घर गये तो जानकारी मिली की वह युवक शर्म के मारे घर छोडकर चला गया है । तीसरे के घर गये तो पता चला की वह युवक आया है तब से उसने अपने को एक कमरे में बन्द कर लिया है । किसी को मूंह नहीं दिखा रहा है । चौथे को देखने गये तो पता चला की उसकी अशोभा-यात्रा जब शहर में उस युवक के घर के सामने से निकली तब उसने चिल्लाकर अपनी माँ से कहा ' अभी थोडी देर में मैं घर आ रहा हूं। बहुत भूख लगी होगी । जरा कुछ अच्छा सा खाना बनाना ' ।  
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सम्राट विक्रम के दरबार की एक न्यायकथा का वर्णन चीनी प्रवासी ने किया है । यह कथा भारतीय न्यायदृष्टि के इस व्यक्तिसापेक्षता के महत्व को अधोरेखित करनेवाली है । कथा ऐसी है - विक्रम के दरबार में एक मुकदमा आया । चार अपराधी थे । अपराध सिद्ध हो गया था । अपराध सब ने मान्य कर लिया था । चारों की पार्श्वभूमि विक्रम के गुप्तचरों ने पहले ही एकत्रित की थी । विक्रम ने न्याय दिया । एक को तो केवल इतना कहा की तुम जिस कुटुम्ब के हो उसे यह शोभा नहीं  देता। उसे बस इतना ही कहकर छोड दिया गया । दूसरे को थोडी अधिक कठोरता से उलाहना देकर छोड दिया गया । तीसरे को हंटर से पाँचबार मारकर छोड दिया गया । चौथे की गधेपर बिठाकर शहर में अशोभायात्रा निकालने की आज्ञा दी गई । चीनी प्रवासी आश्चर्य में पड गया की यह कैसा न्याय है ? उसने विक्रम से इस का कारण जानना चाहा । विक्रम ने उसे कहा । मेरे साथ चलो। दोनों वेश बदलकर निकल पड़े । पहले अपराधी के घर गये । देखा ! वहाँ मातम मनाया जा रहा है । जिस युवक ने अपराध किया था उसने गले में फाँस लगाकर आत्महत्या कर ली है । दूसरे के घर गये तो जानकारी मिली की वह युवक शर्म के मारे घर छोडकर चला गया है । तीसरे के घर गये तो पता चला की वह युवक आया है तब से उसने अपने को एक कमरे में बन्द कर लिया है । किसी को मूंह नहीं दिखा रहा है । चौथे को देखने गये तो पता चला की उसकी अशोभा-यात्रा जब शहर में उस युवक के घर के सामने से निकली तब उसने चिल्लाकर अपनी माँ से कहा ' अभी थोडी देर में मैं घर आ रहा हूं। बहुत भूख लगी होगी । जरा कुछ अच्छा सा खाना बनाना ' ।  
 
यह एक ऐतिहासिक सत्यकथा है । इस से भारतीय न्यायदृष्टि का व्यक्ति-सापेक्षता का सिद्धात समझ में आता है ।
 
यह एक ऐतिहासिक सत्यकथा है । इस से भारतीय न्यायदृष्टि का व्यक्ति-सापेक्षता का सिद्धात समझ में आता है ।
 
१२. पाश्चात्य कानून व्यवस्था में शासन सर्वोपरि होने से सर्वोच्च अधिकार संसद को होते है। संसद के सदस्य बनने के लिये कानून का विशेषज्ञ होना आवश्यक नहीं है । पाश्चात्य व्यवस्था में कानून से अनभिज्ञ लोग न्याय क्या है और अन्याय क्या है यह तय करते है । लोकतंत्र में तो यह स्थिति और भी बिगड जाती है । संसद के निर्णय बहुमत से होते है । विद्वानों का समाज में कभी भी बहुमत नहीं होता । जब सामान्य लोग जिन्हें न्याय और न्यायतंत्र की ठीक से जानकारी नहीं हैं, न्यायतंत्र को नियंत्रित करने लगेंगे तो न्याय नहीं होगा यह छोटा बच्चा भी बता सकता है । लोकतंत्र व्यवस्था में न्यायतंत्र में भी मतपेटी की राजनीति चलती है । इस राजनीति के चलते समाज का बलशाली गुट दुर्बल गुटपर हावी हो जाता है । कानून बलशाली गुट के हित में झुक जाता है । सरकारी नौकरियों में आरक्षण के विषय में यही हो रहा है । जिनका उपद्रवमूल्य अधिक है उन के हित में कानून झुक जाता है ।
 
१२. पाश्चात्य कानून व्यवस्था में शासन सर्वोपरि होने से सर्वोच्च अधिकार संसद को होते है। संसद के सदस्य बनने के लिये कानून का विशेषज्ञ होना आवश्यक नहीं है । पाश्चात्य व्यवस्था में कानून से अनभिज्ञ लोग न्याय क्या है और अन्याय क्या है यह तय करते है । लोकतंत्र में तो यह स्थिति और भी बिगड जाती है । संसद के निर्णय बहुमत से होते है । विद्वानों का समाज में कभी भी बहुमत नहीं होता । जब सामान्य लोग जिन्हें न्याय और न्यायतंत्र की ठीक से जानकारी नहीं हैं, न्यायतंत्र को नियंत्रित करने लगेंगे तो न्याय नहीं होगा यह छोटा बच्चा भी बता सकता है । लोकतंत्र व्यवस्था में न्यायतंत्र में भी मतपेटी की राजनीति चलती है । इस राजनीति के चलते समाज का बलशाली गुट दुर्बल गुटपर हावी हो जाता है । कानून बलशाली गुट के हित में झुक जाता है । सरकारी नौकरियों में आरक्षण के विषय में यही हो रहा है । जिनका उपद्रवमूल्य अधिक है उन के हित में कानून झुक जाता है ।
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