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== प्रस्तावना ==
 
== प्रस्तावना ==
वर्तमान न्याय व्यवस्था के विषय में बडे पैमाने पर लोगों के मन में असंतोष व्याप्त है । न्यायालय में न्याय मिलेगा इस बात की आश्वस्ति स्वयं सर्वोच्च न्यायालय का मुख्य न्यायाधीश भी नहीं दे सकता। वह भी कहता है कि 'उपलब्ध गवाहों और प्रमाणों के आधार पर' न्याय दिया जा रहा है ।
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वर्तमान न्याय व्यवस्था के विषय में बडे पैमाने पर लोगोंं के मन में असंतोष व्याप्त है । न्यायालय में न्याय मिलेगा इस बात की आश्वस्ति स्वयं सर्वोच्च न्यायालय का मुख्य न्यायाधीश भी नहीं दे सकता। वह भी कहता है कि 'उपलब्ध गवाहों और प्रमाणों के आधार पर' न्याय दिया जा रहा है ।
    
वर्तमान न्याय व्यवस्था के तीन प्रमुख अंग है। एक न्यायाधीश, दूसरा वकील और तीसरा पक्षकार। पक्षकार के मुकदमे वकील न्यायालय में लड़ते हैं। सामान्यत: इन मुकदमों में केवल एक ही पक्ष न्याय का होता है। स्वाभाविक रूप से दूसरा पक्ष अन्याय का ही होता है। और हमारे लगभग ५० प्रतिशत वकील इस अन्याय के पक्ष के लिये मुकदमे लड़ते हैं। अपनी पूरी बुद्धिमत्ता अन्यायवाले पक्ष को जिताने के लिये लगा देते है । इसे व्यावसायिक आवश्यकता या मजबूरी कहा जाता है। किन्तु  वास्तविक देखा जाये तो क्या यह 'अनैतिक धंधा' नहीं है? किन्तु इसे वकीलों की मान्यता है। न्यायालय की मान्यता है। कानून की मान्यता है। और संविधान की भी मान्यता है। यह कैसा अंधेर है ? ऐसा न्याय के क्षेत्र में काम करनेवाले विद्वानों को लगता है या नहीं ? केवल इतना ही नहीं, वर्तमान न्यायतंत्र में न्यायाधीश शासक का हित देखनेवाला है या नहीं यह भी महत्वपूर्ण होता है ।  
 
वर्तमान न्याय व्यवस्था के तीन प्रमुख अंग है। एक न्यायाधीश, दूसरा वकील और तीसरा पक्षकार। पक्षकार के मुकदमे वकील न्यायालय में लड़ते हैं। सामान्यत: इन मुकदमों में केवल एक ही पक्ष न्याय का होता है। स्वाभाविक रूप से दूसरा पक्ष अन्याय का ही होता है। और हमारे लगभग ५० प्रतिशत वकील इस अन्याय के पक्ष के लिये मुकदमे लड़ते हैं। अपनी पूरी बुद्धिमत्ता अन्यायवाले पक्ष को जिताने के लिये लगा देते है । इसे व्यावसायिक आवश्यकता या मजबूरी कहा जाता है। किन्तु  वास्तविक देखा जाये तो क्या यह 'अनैतिक धंधा' नहीं है? किन्तु इसे वकीलों की मान्यता है। न्यायालय की मान्यता है। कानून की मान्यता है। और संविधान की भी मान्यता है। यह कैसा अंधेर है ? ऐसा न्याय के क्षेत्र में काम करनेवाले विद्वानों को लगता है या नहीं ? केवल इतना ही नहीं, वर्तमान न्यायतंत्र में न्यायाधीश शासक का हित देखनेवाला है या नहीं यह भी महत्वपूर्ण होता है ।  
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धार्मिक व्यवस्था धर्म का सूत्र यह कहता है कि जिस व्यवस्था में किसी को सदाचार से जीना संभव नहीं हो, वह व्यवस्था त्याज्य है । व्यवस्था धर्म का यह सूत्र न्यायव्यवस्था को भी पूर्ण रूप से लागू है।   
 
धार्मिक व्यवस्था धर्म का सूत्र यह कहता है कि जिस व्यवस्था में किसी को सदाचार से जीना संभव नहीं हो, वह व्यवस्था त्याज्य है । व्यवस्था धर्म का यह सूत्र न्यायव्यवस्था को भी पूर्ण रूप से लागू है।   
 
# पाश्चात्य न्यायतंत्र का एक सूत्र है – १०० अपराधी भले छूट जाएं, एक निरपराध को दण्ड नहीं होना चाहिये। जब भी कोई अपराध होता है तो उस प्रसंग में वह किसी निरपराध के विरोध में ही होता है। किसी निरपराध को हानि पहुंचाने के कारण ही होता है। इसलिये हर छूटने वाले अपराधी के पीछे न्यूनतम एक निरपराध की हानि होती ही है। अर्थात् जब सौ अपराधी छूट जाते है तो १०० निरपराधों को हानि पहुंचती है। अर्थात् १०० अपराधियों के दोषमुक्त होने से न्यूनतम १०० निरपराधियों को दण्ड हो जाता है। इसलिये इस न्यायसूत्र का अर्थ इस प्रकार बनता है - न्यूनतम १०० निरपराधों को भले ही दण्ड भोगना पड़े, १ निरपराध को दण्डित नहीं करना चाहिये। वास्तव में १०० निरपराधों को दण्डित कर एक निरपराध को दण्ड से बचाने का आग्रह करनेवाला यह सूत्र अन्यायतंत्र का ही सूत्र है, यह सामान्य मनुष्य भी समझ सकता है। यह न्यायतंत्र का सूत्र ही नहीं होना चाहिये।   
 
# पाश्चात्य न्यायतंत्र का एक सूत्र है – १०० अपराधी भले छूट जाएं, एक निरपराध को दण्ड नहीं होना चाहिये। जब भी कोई अपराध होता है तो उस प्रसंग में वह किसी निरपराध के विरोध में ही होता है। किसी निरपराध को हानि पहुंचाने के कारण ही होता है। इसलिये हर छूटने वाले अपराधी के पीछे न्यूनतम एक निरपराध की हानि होती ही है। अर्थात् जब सौ अपराधी छूट जाते है तो १०० निरपराधों को हानि पहुंचती है। अर्थात् १०० अपराधियों के दोषमुक्त होने से न्यूनतम १०० निरपराधियों को दण्ड हो जाता है। इसलिये इस न्यायसूत्र का अर्थ इस प्रकार बनता है - न्यूनतम १०० निरपराधों को भले ही दण्ड भोगना पड़े, १ निरपराध को दण्डित नहीं करना चाहिये। वास्तव में १०० निरपराधों को दण्डित कर एक निरपराध को दण्ड से बचाने का आग्रह करनेवाला यह सूत्र अन्यायतंत्र का ही सूत्र है, यह सामान्य मनुष्य भी समझ सकता है। यह न्यायतंत्र का सूत्र ही नहीं होना चाहिये।   
# धार्मिक न्यायतंत्र में अपराधी के छूट जाने के लिये कोई गुंजाईश नहीं है। वास्तव में तो धार्मिक (धार्मिक) न्यायतंत्र तो बहुत बाद में काम करता है। पहले तो धार्मिक (धार्मिक) राज्यतंत्र का काम यह होता है कि अपराध होना ही नहीं चाहिये। जिस राज्य में अपराध होते है, वह शासक अपराधी माना जाता है। धार्मिक (धार्मिक) मान्यता यह है कि प्रजा द्वारा किये पुण्यों का फल जैसे राजा को अनायास ही मिलता है, उसी प्रकार से प्रजा द्वारा किये पापों का फल भी शासक को भुगतना पडता है। इस में एक भी अपराधी छूटने का प्रश्न नहीं आता। [[Rama-Rajya (राम राज्य)|रामराज्य]] की यही विशेषता थी। पहले तो अपराध होने से पहले ही रोकने की शासन व्यवस्था हो और फिर कोई भी अपराधी छूटे नहीं ऐसी शासन व्यवस्था और न्यायव्यवस्था हो । यह थी धार्मिक (धार्मिक) मान्यता और व्यवस्था। हम सब को इस त्रुटिपूर्ण न्यायतंत्र में रहने की आदत हो गई है इसलिये वर्तमान में लोगों को यह असंभव लगेगी। अंग्रेजी न्यायव्यवस्था की भारत में प्रतिष्ठापना होने से पूर्व तक ऐसी न्यायप्रणाली धार्मिक (धार्मिक) न्यायतंत्र का वास्तव था।   
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# धार्मिक न्यायतंत्र में अपराधी के छूट जाने के लिये कोई गुंजाईश नहीं है। वास्तव में तो धार्मिक (धार्मिक) न्यायतंत्र तो बहुत बाद में काम करता है। पहले तो धार्मिक (धार्मिक) राज्यतंत्र का काम यह होता है कि अपराध होना ही नहीं चाहिये। जिस राज्य में अपराध होते है, वह शासक अपराधी माना जाता है। धार्मिक (धार्मिक) मान्यता यह है कि प्रजा द्वारा किये पुण्यों का फल जैसे राजा को अनायास ही मिलता है, उसी प्रकार से प्रजा द्वारा किये पापों का फल भी शासक को भुगतना पडता है। इस में एक भी अपराधी छूटने का प्रश्न नहीं आता। [[Rama-Rajya (राम राज्य)|रामराज्य]] की यही विशेषता थी। पहले तो अपराध होने से पहले ही रोकने की शासन व्यवस्था हो और फिर कोई भी अपराधी छूटे नहीं ऐसी शासन व्यवस्था और न्यायव्यवस्था हो । यह थी धार्मिक (धार्मिक) मान्यता और व्यवस्था। हम सब को इस त्रुटिपूर्ण न्यायतंत्र में रहने की आदत हो गई है इसलिये वर्तमान में लोगोंं को यह असंभव लगेगी। अंग्रेजी न्यायव्यवस्था की भारत में प्रतिष्ठापना होने से पूर्व तक ऐसी न्यायप्रणाली धार्मिक (धार्मिक) न्यायतंत्र का वास्तव था।   
 
# पाश्चात्य न्यायतंत्र में न्यायाधीश की अर्हता है, उस का एक सफल वकील होना। अर्थात जो सत्य को सहजता से असत्य सिद्ध कर दे और जो असत्य को सहजता से सत्य सिद्ध कर दे ऐसी जिस की बुद्धि और कुशलता है वह न्यायाधीश बनने के योग्य माना जाता है । धार्मिक (धार्मिक) न्यायदृष्टि के अनुसार न्यायाधीश बनने की अर्हता अत्यंत युक्तिसंगत और सामान्य मनुष्य को भी सहज समझ में आए ऐसी है। ऊपर हम देख आये है कि सत्य की धार्मिक (धार्मिक) व्याख्या है: यद् भूत हितं अत्यंत एतत् सत्यं मतं मम । इसलिये न्यायाधीश बनने के लिये सत्यनिष्ठा, निर्भयता, नि:स्वार्थी भावना और संवेदनशील मन के साथ में ही हर प्रसंग में, हर विषय में, हर मुकदमे में 'चराचर के हित में क्या है' यह समझने की कुशाग्र बुद्धि का होना अनिवार्य माना गया है। सत्य के प्रति निष्ठावान होना अनिवार्य बात मानी गई थी। न्यायाधीश सात्विक वृत्ति का, आवश्यकताएं न्यूनतम हों ऐसा होता था। इन्द्रियों पर संयम रखनेवाला होता था। ये बातें न्यायाधीश की अर्हता के अनिवार्य बिन्दू होते थे। याज्ञवल्क्य स्मृति में मीमांसा शास्त्र का जानकार, वेदाभ्यास सम्पन्न, धर्मशास्त्र का जानकार, सत्यवादी, शत्रुमित्र समान मानने वाले हो ऐसी न्यायाधीश की अर्हता बताई है। कात्यायन इसमें संयमी, उच्च कुलोत्पन्न, अपक्ष, शांत, परमात्मा से डरने वाला याने कर्मसिद्धान्त पर श्रद्धा रखने वाला, लांगुलचालन से प्रभावित न होनेवाला और अक्रोधी ऐसे और लक्षण जोड़ता है। धार्मिक (धार्मिक) प्रणाली में गाँव में न्यायदान का काम गाँव के पंच करते थे । पंच कौन बनेगा यह शासन तय नहीं करता था। गाँव के सभी लोग सर्वसहमति से पंच को मनोनीत करते थे। पंचों का चुनाव नहीं होता था । बहुमत से पंच तय नहीं होते थे । सर्वमत से होते थे । गाँव के समदर्शी, ज्ञानी, सदाचारी, निर्व्यसनी, नि:स्वार्थी, कुशल, निर्भय और स्वच्छ चारित्र्यवाले व्यक्ति को गाँव के लोग अनुरोध करते थे की वह पंच की जिम्मेदारी स्वीकार करे। वह व्यक्ति भी यह मेरी सामाजिक जिम्मेदारी है ऐसी पवित्र भावना से न्यायदान का काम करता था।   
 
# पाश्चात्य न्यायतंत्र में न्यायाधीश की अर्हता है, उस का एक सफल वकील होना। अर्थात जो सत्य को सहजता से असत्य सिद्ध कर दे और जो असत्य को सहजता से सत्य सिद्ध कर दे ऐसी जिस की बुद्धि और कुशलता है वह न्यायाधीश बनने के योग्य माना जाता है । धार्मिक (धार्मिक) न्यायदृष्टि के अनुसार न्यायाधीश बनने की अर्हता अत्यंत युक्तिसंगत और सामान्य मनुष्य को भी सहज समझ में आए ऐसी है। ऊपर हम देख आये है कि सत्य की धार्मिक (धार्मिक) व्याख्या है: यद् भूत हितं अत्यंत एतत् सत्यं मतं मम । इसलिये न्यायाधीश बनने के लिये सत्यनिष्ठा, निर्भयता, नि:स्वार्थी भावना और संवेदनशील मन के साथ में ही हर प्रसंग में, हर विषय में, हर मुकदमे में 'चराचर के हित में क्या है' यह समझने की कुशाग्र बुद्धि का होना अनिवार्य माना गया है। सत्य के प्रति निष्ठावान होना अनिवार्य बात मानी गई थी। न्यायाधीश सात्विक वृत्ति का, आवश्यकताएं न्यूनतम हों ऐसा होता था। इन्द्रियों पर संयम रखनेवाला होता था। ये बातें न्यायाधीश की अर्हता के अनिवार्य बिन्दू होते थे। याज्ञवल्क्य स्मृति में मीमांसा शास्त्र का जानकार, वेदाभ्यास सम्पन्न, धर्मशास्त्र का जानकार, सत्यवादी, शत्रुमित्र समान मानने वाले हो ऐसी न्यायाधीश की अर्हता बताई है। कात्यायन इसमें संयमी, उच्च कुलोत्पन्न, अपक्ष, शांत, परमात्मा से डरने वाला याने कर्मसिद्धान्त पर श्रद्धा रखने वाला, लांगुलचालन से प्रभावित न होनेवाला और अक्रोधी ऐसे और लक्षण जोड़ता है। धार्मिक (धार्मिक) प्रणाली में गाँव में न्यायदान का काम गाँव के पंच करते थे । पंच कौन बनेगा यह शासन तय नहीं करता था। गाँव के सभी लोग सर्वसहमति से पंच को मनोनीत करते थे। पंचों का चुनाव नहीं होता था । बहुमत से पंच तय नहीं होते थे । सर्वमत से होते थे । गाँव के समदर्शी, ज्ञानी, सदाचारी, निर्व्यसनी, नि:स्वार्थी, कुशल, निर्भय और स्वच्छ चारित्र्यवाले व्यक्ति को गाँव के लोग अनुरोध करते थे की वह पंच की जिम्मेदारी स्वीकार करे। वह व्यक्ति भी यह मेरी सामाजिक जिम्मेदारी है ऐसी पवित्र भावना से न्यायदान का काम करता था।   
# इस पाश्चात्य कानून व्यवस्था में एक ही देश के भिन्न लोगों के लिये भिन्न कानून है। मुसलमानों के लिये अलग कानून है। उन का पारंपरिक कानून शरीयत कहलाता है। उसे धार्मिक (धार्मिक) न्यायतंत्र की मान्यता है। किन्तु यह शरीयत का कानून भी वर्तमान मुस्लिम समाज के लोगों को जो लगता है उस के अनुसार झुकने वाला कानून है। शाहबानो के मुकदमे में अन्याय हुआ था। शाहबानो एक मुस्लिम तलाक पीड़ित महिला थी। उस के पति ने उसे तलाक देकर बेसहारा कर दिया। आजीविका का उस के पास कोई साधन नहीं रहा। तब धार्मिक (धार्मिक) कानून के अनुसार उसने न्याय माँगा। न्यायाधीश ने उस के पति को मुआवजा देने का निर्णय दिया। किन्तु उसके पति को यह रास नहीं आया। उस के पीछे केवल पुरूषों का हित देखने वाला मुस्लिम समाज खडा हो गया। शासन झुका और संसद में कानून बनाकर मुस्लिम तलाक पीड़ित स्त्रियों को मुआवजा देने की जिम्मेदारी पति से निकालकर वक्फ बोर्ड पर डाल दी गई। यहाँ भी हम देखते है की इस न्यायतंत्र का स्वभाव ही है बलवानों के हित का रक्षण करना  धार्मिक (धार्मिक) न्यायतंत्र के आगे सभी देशवासी समान माने जाते है। न्याय सत्य के आधारपर दिया जाता है । बल के आधार पर नहीं। केवल बलवान है इसलिये उसके पक्ष को सत्य नहीं माना जाता ।   
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# इस पाश्चात्य कानून व्यवस्था में एक ही देश के भिन्न लोगोंं के लिये भिन्न कानून है। मुसलमानों के लिये अलग कानून है। उन का पारंपरिक कानून शरीयत कहलाता है। उसे धार्मिक (धार्मिक) न्यायतंत्र की मान्यता है। किन्तु यह शरीयत का कानून भी वर्तमान मुस्लिम समाज के लोगोंं को जो लगता है उस के अनुसार झुकने वाला कानून है। शाहबानो के मुकदमे में अन्याय हुआ था। शाहबानो एक मुस्लिम तलाक पीड़ित महिला थी। उस के पति ने उसे तलाक देकर बेसहारा कर दिया। आजीविका का उस के पास कोई साधन नहीं रहा। तब धार्मिक (धार्मिक) कानून के अनुसार उसने न्याय माँगा। न्यायाधीश ने उस के पति को मुआवजा देने का निर्णय दिया। किन्तु उसके पति को यह रास नहीं आया। उस के पीछे केवल पुरूषों का हित देखने वाला मुस्लिम समाज खडा हो गया। शासन झुका और संसद में कानून बनाकर मुस्लिम तलाक पीड़ित स्त्रियों को मुआवजा देने की जिम्मेदारी पति से निकालकर वक्फ बोर्ड पर डाल दी गई। यहाँ भी हम देखते है की इस न्यायतंत्र का स्वभाव ही है बलवानों के हित का रक्षण करना  धार्मिक (धार्मिक) न्यायतंत्र के आगे सभी देशवासी समान माने जाते है। न्याय सत्य के आधारपर दिया जाता है । बल के आधार पर नहीं। केवल बलवान है इसलिये उसके पक्ष को सत्य नहीं माना जाता ।   
# पाश्चात्य न्यायतंत्र के कारण अपराधीकरण को बढावा मिलता है। जीवन में कोई पहली बार अपराध करता है। कानून के अनुसार न्यायाधीश उसे सजा सुनाता है। कारागृह में भेज देता है। कारगृह में रहकर, बन चुके अपराधियों की संगत में रहकर वह भोलाभाला पापभीरु व्यक्ति पक्का अपराधी बनकर ही बाहर निकलता है ।धार्मिक न्यायतंत्र में प्रायश्चित्त और पश्चात्ताप का बहुत महत्वपूर्ण स्थान है। अपराधी के अपने कृत्य पर पश्चात्ताप करने से अपराध कम होते है। अपराधी को दण्डित करने से नहीं। केवल पश्चात्ताप नहीं तो साथ में अपराधी प्रायश्चित्त भी लेता था। एक बार जब अपराधी को पश्चात्ताप हुआ और उस ने प्रायश्चित्त कर लिया तो वह निष्कलंक माना जाता था। अन्य सामान्य लोगों जैसा ही सम्मान उसे समाज में प्राप्त होता था। दण्ड तो अन्तिम विकल्प के रूप में ही किया जाता था। जैसे जैसे पाश्चात्य शिक्षा का प्रसार और प्रभाव बढता जा रहा है यह पश्चात्ताप की भावना और उस का न्यायदान में उपयोग करने की सम्भावनाएँ भी कम होती जा रहीं है।   
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# पाश्चात्य न्यायतंत्र के कारण अपराधीकरण को बढावा मिलता है। जीवन में कोई पहली बार अपराध करता है। कानून के अनुसार न्यायाधीश उसे सजा सुनाता है। कारागृह में भेज देता है। कारगृह में रहकर, बन चुके अपराधियों की संगत में रहकर वह भोलाभाला पापभीरु व्यक्ति पक्का अपराधी बनकर ही बाहर निकलता है ।धार्मिक न्यायतंत्र में प्रायश्चित्त और पश्चात्ताप का बहुत महत्वपूर्ण स्थान है। अपराधी के अपने कृत्य पर पश्चात्ताप करने से अपराध कम होते है। अपराधी को दण्डित करने से नहीं। केवल पश्चात्ताप नहीं तो साथ में अपराधी प्रायश्चित्त भी लेता था। एक बार जब अपराधी को पश्चात्ताप हुआ और उस ने प्रायश्चित्त कर लिया तो वह निष्कलंक माना जाता था। अन्य सामान्य लोगोंं जैसा ही सम्मान उसे समाज में प्राप्त होता था। दण्ड तो अन्तिम विकल्प के रूप में ही किया जाता था। जैसे जैसे पाश्चात्य शिक्षा का प्रसार और प्रभाव बढता जा रहा है यह पश्चात्ताप की भावना और उस का न्यायदान में उपयोग करने की सम्भावनाएँ भी कम होती जा रहीं है।   
 
# अंग्रेजी भाषा में एक कहावत है - जस्टिस डिलेड इज जस्टिस डिनाईड अर्थात् न्याय देने में देरी करने का अर्थ है अन्याय करना । लेकिन पाश्चात्य न्यायव्यवस्था का इस कहावत से दूर दूर तक कोई संबंध नहीं है। न्याय व्यवस्था ही ऐसी बनाई गई है कि विलंब इस का स्थायी भाव है। अभी कुछ महीने पहले वर्तमान पत्रों में एक खबर छपी थी। बंगाल के न्यायालय के एक मुकदमे की जानकारी उस में दी गई थी। यह स्थावर संपत्ति का मुकदमा था। यह १७६ वर्षों से चल रहा था। इस मुकदमे के चलते दोनों पक्षों की कितनी ही पीढियाँ पैदा हुई और मर गई किन्तु न्याय नहीं हुआ। क्या इसे न्याय कहा जा सकता है? वर्तमान में इस पाश्चात्य न्यायतंत्र में सत्र न्यायालय से लेकर सर्वोच्च न्यायालय तक विशाल संख्या में (लगभग ३ करोड़) मुकदमे लंबित हैं। इस में वकील नाम का जो घटक है वह भी इस न्यायतंत्र को प्रलंबित बनाता है। प्रलंबित मुकदमों में उस का निहित स्वार्थ होता है। धार्मिक (धार्मिक) न्याय व्यवस्था में वकील इस घटक का कोई स्थान नहीं था। न्यायाधीश ही तहकीकात करते थे और न्याय देते थे। मुकदमे का निर्णय शीघ्र हो जाता था।   
 
# अंग्रेजी भाषा में एक कहावत है - जस्टिस डिलेड इज जस्टिस डिनाईड अर्थात् न्याय देने में देरी करने का अर्थ है अन्याय करना । लेकिन पाश्चात्य न्यायव्यवस्था का इस कहावत से दूर दूर तक कोई संबंध नहीं है। न्याय व्यवस्था ही ऐसी बनाई गई है कि विलंब इस का स्थायी भाव है। अभी कुछ महीने पहले वर्तमान पत्रों में एक खबर छपी थी। बंगाल के न्यायालय के एक मुकदमे की जानकारी उस में दी गई थी। यह स्थावर संपत्ति का मुकदमा था। यह १७६ वर्षों से चल रहा था। इस मुकदमे के चलते दोनों पक्षों की कितनी ही पीढियाँ पैदा हुई और मर गई किन्तु न्याय नहीं हुआ। क्या इसे न्याय कहा जा सकता है? वर्तमान में इस पाश्चात्य न्यायतंत्र में सत्र न्यायालय से लेकर सर्वोच्च न्यायालय तक विशाल संख्या में (लगभग ३ करोड़) मुकदमे लंबित हैं। इस में वकील नाम का जो घटक है वह भी इस न्यायतंत्र को प्रलंबित बनाता है। प्रलंबित मुकदमों में उस का निहित स्वार्थ होता है। धार्मिक (धार्मिक) न्याय व्यवस्था में वकील इस घटक का कोई स्थान नहीं था। न्यायाधीश ही तहकीकात करते थे और न्याय देते थे। मुकदमे का निर्णय शीघ्र हो जाता था।   
 
# अविश्वास पाश्चात्य जीवन, शासन व्यवस्था और न्याय व्यवस्था का आधारबिन्दू है। निरर्थकता भी इसमें समाहित है। पुलिस कहती है - हमारी दृष्टि में हर व्यक्ति अपराधी हो सकता है, कोई अपराधी है या नहीं यह देखना हमारा काम नहीं है। यह बात न्यायालय तय करेगा। और न्यायालय में इससे उलट कहा जाता है। न्यायालय में वैसे तो यह कहा जाता है कि हर मनुष्य जब तक कि उस का अपराध सिद्ध नहीं हो जाता वह निरपराध ही माना जाना चाहिये। किन्तु व्यवहार भिन्न है। हर व्यक्ति को कटघरे में खडे होने पर पहले अपने सच बोलने की भगवान की सौगंध लेकर दुहाई देनी पडती है। यह उस व्यक्ति पर अविश्वास बताने जैसा ही है। वास्तव में जिनका भगवान पर विश्वास है वे झूठ नहीं बोलते। बोल ही नहीं सकते। उन के लिये भगवान की सौगंध लेना निरर्थक है। जिनका भगवान पर विश्वास नहीं है वे कितनी भी भगवान की सौगंध खाए उन्हे झूठ बोलने से कोई रोक नहीं सकता। अर्थात उन के लिये भी भगवान की सौगंध खाना निरर्थक बात ही होती है। धार्मिक (धार्मिक) न्याय व्यवस्था में ऐसे अविश्वास के लिये या निरर्थक बातों के लिये कोई स्थान नहीं है। मनुष्य झूठ बोलने वाला है या नहीं यह जानने की शक्ति न्यायाधीश में होनी चाहिये। वह झूठ बोल रहा है यह निरीक्षण, परिक्षण और तहकीकात के आधारपर प्रस्थापित करने की कुशलता न्यायाधीश में होनी चाहिये । यह धार्मिक (धार्मिक) न्यायतंत्र में वांछित है।   
 
# अविश्वास पाश्चात्य जीवन, शासन व्यवस्था और न्याय व्यवस्था का आधारबिन्दू है। निरर्थकता भी इसमें समाहित है। पुलिस कहती है - हमारी दृष्टि में हर व्यक्ति अपराधी हो सकता है, कोई अपराधी है या नहीं यह देखना हमारा काम नहीं है। यह बात न्यायालय तय करेगा। और न्यायालय में इससे उलट कहा जाता है। न्यायालय में वैसे तो यह कहा जाता है कि हर मनुष्य जब तक कि उस का अपराध सिद्ध नहीं हो जाता वह निरपराध ही माना जाना चाहिये। किन्तु व्यवहार भिन्न है। हर व्यक्ति को कटघरे में खडे होने पर पहले अपने सच बोलने की भगवान की सौगंध लेकर दुहाई देनी पडती है। यह उस व्यक्ति पर अविश्वास बताने जैसा ही है। वास्तव में जिनका भगवान पर विश्वास है वे झूठ नहीं बोलते। बोल ही नहीं सकते। उन के लिये भगवान की सौगंध लेना निरर्थक है। जिनका भगवान पर विश्वास नहीं है वे कितनी भी भगवान की सौगंध खाए उन्हे झूठ बोलने से कोई रोक नहीं सकता। अर्थात उन के लिये भी भगवान की सौगंध खाना निरर्थक बात ही होती है। धार्मिक (धार्मिक) न्याय व्यवस्था में ऐसे अविश्वास के लिये या निरर्थक बातों के लिये कोई स्थान नहीं है। मनुष्य झूठ बोलने वाला है या नहीं यह जानने की शक्ति न्यायाधीश में होनी चाहिये। वह झूठ बोल रहा है यह निरीक्षण, परिक्षण और तहकीकात के आधारपर प्रस्थापित करने की कुशलता न्यायाधीश में होनी चाहिये । यह धार्मिक (धार्मिक) न्यायतंत्र में वांछित है।   

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