Changes

Jump to navigation Jump to search
m
Text replacement - "फिर भी" to "तथापि"
Line 2: Line 2:  
धर्म के बारे में में बडे बडे विद्वानों ने बहुत भ्रम निर्माण कर रखा है। कई लोग कहते हैं कि धर्म के कारण विश्व में जितने नरसंहार हुए अन्य किसी कारण से नही हुए। धर्म एक अफीम की गोली है। ऐसा कहकर धर्म को बदनाम करने के प्रयास किये गए हैं। आज भी किये जा रहे हैं। वास्तव में ऐसा जिन विद्वानों ने कहा है उन्हे धर्म का अर्थ ही समझ मे नहीं आया था और नहीं आया है। रिलीजन, मजहब के स्थान पर धर्म शब्द का और धर्म के स्थान पर रिलीजन, मजहब इन शब्दों का प्रयोग अज्ञानवश लोग करते रहते हैं। इसलिये '''धर्म''' और रिलीजन, मजहब और संप्रदाय इन तीनो शब्दों के अर्थ समझना भी आवश्यक है। यह अंतर हम  "[[Differences between Dharma and Religion (धर्म एवं पंथ (सम्प्रदाय) में अंतर)|धर्म एवं पंथ (सम्प्रदाय) में अंतर]]"  में अध्ययन करेंगे।
 
धर्म के बारे में में बडे बडे विद्वानों ने बहुत भ्रम निर्माण कर रखा है। कई लोग कहते हैं कि धर्म के कारण विश्व में जितने नरसंहार हुए अन्य किसी कारण से नही हुए। धर्म एक अफीम की गोली है। ऐसा कहकर धर्म को बदनाम करने के प्रयास किये गए हैं। आज भी किये जा रहे हैं। वास्तव में ऐसा जिन विद्वानों ने कहा है उन्हे धर्म का अर्थ ही समझ मे नहीं आया था और नहीं आया है। रिलीजन, मजहब के स्थान पर धर्म शब्द का और धर्म के स्थान पर रिलीजन, मजहब इन शब्दों का प्रयोग अज्ञानवश लोग करते रहते हैं। इसलिये '''धर्म''' और रिलीजन, मजहब और संप्रदाय इन तीनो शब्दों के अर्थ समझना भी आवश्यक है। यह अंतर हम  "[[Differences between Dharma and Religion (धर्म एवं पंथ (सम्प्रदाय) में अंतर)|धर्म एवं पंथ (सम्प्रदाय) में अंतर]]"  में अध्ययन करेंगे।
   −
धार्मिक (धार्मिक) परंपरा में पग पग पर और क्षण क्षण पर धर्म के पालन का आग्रह है। हमारी कोई कृति धर्म विरोधी ना हो ऐसा उपदेश दिया गया है। तैत्तिरीय उपनिषद् में ‘संमावर्तन’ संस्कार के समय जो गुरू द्वारा दिए गए आदेश और उपदेश हैं और जो  शिष्यों द्वारा किये गए संकल्प हैं उनमें एक है ‘धर्मं चर’ अर्थात सदा धर्मयुक्त आचरण करो। इसलिये धर्म के अर्थ को समझना आवश्यक है।<ref>जीवन का धार्मिक प्रतिमान-खंड १, अध्याय ३, लेखक - दिलीप केलकर</ref>  
+
धार्मिक परंपरा में पग पग पर और क्षण क्षण पर धर्म के पालन का आग्रह है। हमारी कोई कृति धर्म विरोधी ना हो ऐसा उपदेश दिया गया है। तैत्तिरीय उपनिषद् में ‘संमावर्तन’ संस्कार के समय जो गुरू द्वारा दिए गए आदेश और उपदेश हैं और जो  शिष्यों द्वारा किये गए संकल्प हैं उनमें एक है ‘धर्मं चर’ अर्थात सदा धर्मयुक्त आचरण करो। इसलिये धर्म के अर्थ को समझना आवश्यक है।<ref>जीवन का धार्मिक प्रतिमान-खंड १, अध्याय ३, लेखक - दिलीप केलकर</ref>  
    
== धर्म की व्याख्या ==
 
== धर्म की व्याख्या ==
Line 38: Line 38:  
'''क्षमा''' का अर्थ है कि यदि किसी ने अपने साथ कोई अपराध किया तो उसे माफ करना। क्षमा करना यह बडप्पन का लक्षण है। किन्तु क्षमा अनधिकार नही होनी चाहिये। उदाहरण, सहकारी संस्था के एक कर्मचारी ने संस्था के पैसों का अपहार किया। संस्था संचालक ने उसे माफ कर दिया। तब यह संस्था के संचालक की अनधिकार चेष्टा हुई। संस्था के सदस्य उस संस्था के मालिक है। उन की अनुमति के सिवा उस कर्मचारी को माफ करना संचालक के लिये अनधिकार कृत्य ही है। और एक उदाहरण लें। पृथ्वीराज चौहान ने घोरी को कई बार युद्ध में हराया। और हर बार क्षमा कर दिया। एक राजा के तौर पर ऐसी क्षमा करने के परिणाम क्या हो सकते है ? उन परिणामों को निरस्त करने के लिये कार्यवाही किये बगैर ही ऐसी क्षमा करने का अर्थ है कि पृथ्वीराज ने, जनता ने उसे जो अधिकार दिये थे (प्रजा के संरक्षण के), उन का उल्लंघन किया था। अतएव पृथ्वीराज का घोरी को पहली बार क्षमा करना एक बार क्षम्य माना जा सकता है। दूसरी बार क्षमा करना तो तब ही क्षम्य माना जा सकता है जब घोरी द्वारा पुन: आक्रमण की सभी संभावनाएं नष्ट कर दी गयी हों। और बार बार क्षमा करना तो पृथ्वीराज की मूर्खता का ही लक्षण और राजधर्म का उल्लंघन ही माना जाएगा। इस संबंध में भी घोरी को क्षमा के कारण केवल पृथ्वीराज को केवल व्यक्तिगत हानि होने वाली होती तो भी पृथ्वीराज का क्षमाशीलता के लिये आश्चर्य किया जा सकता है। किंतु जब हर बार होनेवाले आक्रमण में हजारों सैनिक मारे जाते थे और पराभव के बाद तो कत्लेआम ही हुआ। इन सबका अपश्रेय पृथ्वीराज को और उसने क्षमा के जो गलत अर्थ लगाये, उनको जाता है।  
 
'''क्षमा''' का अर्थ है कि यदि किसी ने अपने साथ कोई अपराध किया तो उसे माफ करना। क्षमा करना यह बडप्पन का लक्षण है। किन्तु क्षमा अनधिकार नही होनी चाहिये। उदाहरण, सहकारी संस्था के एक कर्मचारी ने संस्था के पैसों का अपहार किया। संस्था संचालक ने उसे माफ कर दिया। तब यह संस्था के संचालक की अनधिकार चेष्टा हुई। संस्था के सदस्य उस संस्था के मालिक है। उन की अनुमति के सिवा उस कर्मचारी को माफ करना संचालक के लिये अनधिकार कृत्य ही है। और एक उदाहरण लें। पृथ्वीराज चौहान ने घोरी को कई बार युद्ध में हराया। और हर बार क्षमा कर दिया। एक राजा के तौर पर ऐसी क्षमा करने के परिणाम क्या हो सकते है ? उन परिणामों को निरस्त करने के लिये कार्यवाही किये बगैर ही ऐसी क्षमा करने का अर्थ है कि पृथ्वीराज ने, जनता ने उसे जो अधिकार दिये थे (प्रजा के संरक्षण के), उन का उल्लंघन किया था। अतएव पृथ्वीराज का घोरी को पहली बार क्षमा करना एक बार क्षम्य माना जा सकता है। दूसरी बार क्षमा करना तो तब ही क्षम्य माना जा सकता है जब घोरी द्वारा पुन: आक्रमण की सभी संभावनाएं नष्ट कर दी गयी हों। और बार बार क्षमा करना तो पृथ्वीराज की मूर्खता का ही लक्षण और राजधर्म का उल्लंघन ही माना जाएगा। इस संबंध में भी घोरी को क्षमा के कारण केवल पृथ्वीराज को केवल व्यक्तिगत हानि होने वाली होती तो भी पृथ्वीराज का क्षमाशीलता के लिये आश्चर्य किया जा सकता है। किंतु जब हर बार होनेवाले आक्रमण में हजारों सैनिक मारे जाते थे और पराभव के बाद तो कत्लेआम ही हुआ। इन सबका अपश्रेय पृथ्वीराज को और उसने क्षमा के जो गलत अर्थ लगाये, उनको जाता है।  
   −
'''दम''' का अर्थ है तप। सातत्य से एक बात की आस लेकर प्रयत्नों की पराकाष्ठा करते हुए भी उसे प्राप्त करने को दम कहते है। '''अस्तेय''' का अर्थ है अचौर्य। चोरी नही करना। किसी की अनुमति के बिना उस की वस्तू लेना या उस का उपयोग करना चोरी कहा जाता है। अर्थात् जो मेरे परिश्रम की कमाई का नही है और मै उस का उपभोग करता हूं तो मैं चोरी करता हूं। '''शौच''' का अर्थ है शरीर (बाहर की), मन, बुध्दि और चित्त इन सब की अर्थात् (अंत:करण की) ऐसी अंतर्बाह्य स्वच्छता। '''धी''' का अर्थ है विवेक। योग्य अयोग्य, सत्य असत्य, करणीय अकरणीय, सर्वहितकारी क्या है और क्या नही है और क्या कितना सर्वहितकारी है यह समझना, इनमे अंतर समझने की क्षमता को और उस के अनुरूप जो योग्य है, सत्य के पक्ष में है, सर्वहितकारी है उस के अनुसार व्यवहार करने को धी कहते है।  
+
'''दम''' का अर्थ है तप। सातत्य से एक बात की आस लेकर प्रयत्नों की पराकाष्ठा करते हुए भी उसे प्राप्त करने को दम कहते है। '''अस्तेय''' का अर्थ है अचौर्य। चोरी नही करना। किसी की अनुमति के बिना उस की वस्तू लेना या उस का उपयोग करना चोरी कहा जाता है। अर्थात् जो मेरे परिश्रम की कमाई का नही है और मै उस का उपभोग करता हूं तो मैं चोरी करता हूं। '''शौच''' का अर्थ है शरीर (बाहर की), मन, बुद्धि और चित्त इन सब की अर्थात् (अंत:करण की) ऐसी अंतर्बाह्य स्वच्छता। '''धी''' का अर्थ है विवेक। योग्य अयोग्य, सत्य असत्य, करणीय अकरणीय, सर्वहितकारी क्या है और क्या नही है और क्या कितना सर्वहितकारी है यह समझना, इनमे अंतर समझने की क्षमता को और उस के अनुरूप जो योग्य है, सत्य के पक्ष में है, सर्वहितकारी है उस के अनुसार व्यवहार करने को धी कहते है।  
    
'''ज्ञान''' अर्थात् योग्य जानकारी प्राप्त करना और उस का सर्वहितकारी पध्दति से उपयोग करने की कला को विद्या कहते है। यह विद्या ही है जो मनुष्य को मोक्ष मार्गपर आगे बढाती है। इसीलिये कहा गया है<ref>विष्णुपुराण 1-19-41</ref>: <blockquote>सा विद्या या विमुक्तये।</blockquote>'''सत्य''' का अर्थ है मनसा, वाचा और कर्मणा सत्य व्यवहार करना। मन में भी असत्य का साथ देने की इच्छा नही जगना। वाणी से असत्य भाषण नही करना और कृति से असत्य का साथ ना देना इन सब का मिलाकर अर्थ है सत्य धर्म का पालन करना। सत्य की कसौटी तो तब ही लगती है जब सत्य व्यवहार के कारण मेरा नुकसान होगा यह निश्चित होते हुए भी मै सत्य का व्यवहार करूं।
 
'''ज्ञान''' अर्थात् योग्य जानकारी प्राप्त करना और उस का सर्वहितकारी पध्दति से उपयोग करने की कला को विद्या कहते है। यह विद्या ही है जो मनुष्य को मोक्ष मार्गपर आगे बढाती है। इसीलिये कहा गया है<ref>विष्णुपुराण 1-19-41</ref>: <blockquote>सा विद्या या विमुक्तये।</blockquote>'''सत्य''' का अर्थ है मनसा, वाचा और कर्मणा सत्य व्यवहार करना। मन में भी असत्य का साथ देने की इच्छा नही जगना। वाणी से असत्य भाषण नही करना और कृति से असत्य का साथ ना देना इन सब का मिलाकर अर्थ है सत्य धर्म का पालन करना। सत्य की कसौटी तो तब ही लगती है जब सत्य व्यवहार के कारण मेरा नुकसान होगा यह निश्चित होते हुए भी मै सत्य का व्यवहार करूं।
Line 67: Line 67:     
== धर्मनिरपेक्षता शब्द अज्ञान या विकृति का लक्षण ==
 
== धर्मनिरपेक्षता शब्द अज्ञान या विकृति का लक्षण ==
धर्म शब्द का उपयोग केवल धार्मिक (धार्मिक) भाषाओं में ही होता है। धार्मिक (धार्मिक) भाषाओं में सामान्यत: उपर्युक्त अर्थों से ही धर्म  शब्द का प्रयोग होता है। इन में से किसी भी अर्थ के साथ निरपेक्ष शब्द जोडने से अनर्थ ही होता है। क्या किसी बेटे ने अपने पुत्रधर्म से निरपेक्ष व्यवहार करना ठीक है? क्या कोई पदार्थ अपने गुणधर्मों से निरपेक्ष हो सकता है? क्या कोई इकाई अपना अस्तित्व टिकाने, बलवान बनने, निरोग रहने, लचीला बनने, दमदार बनने की अधिकारी नही है? क्या इन बातों से निरपेक्ष रहने या बनने से उस का अर्थात् मनुष्य का, व्यापारी का, पडोसी का, सैनिक का, राजा का व्यवहार ठीक माना जाएगा? ऐसा करने से अनर्थ निर्माण नही होगा? फिर भी हमारे देश में धर्मनिरपेक्षता जैसा अर्थहीन शब्द संविधान में डाला गया है। यह पाश्चात्य शब्द सेक्युलॅरिझम् का भौंडा अनुवाद मात्र है। जिन्हें ना तो यूरोप का इतिहास ठीक से पता है और ना ही जिन्हे भारत का इतिहास ठीक से पता है ऐसे अज्ञानी और गुलामी की मानसिकता रखनेवाले नेताओं की यह करनी जितनी शीघ्र निरस्त हो सके उतना ही देश के लिये अच्छा है। पूरे देश की जनता इस का विरोध करने की जगह मौन है। यह भी अभी जनता के मन पर गुलामी का कितना प्रभाव शेष है इसी बात का लक्षण है।  
+
धर्म शब्द का उपयोग केवल धार्मिक भाषाओं में ही होता है। धार्मिक भाषाओं में सामान्यत: उपर्युक्त अर्थों से ही धर्म  शब्द का प्रयोग होता है। इन में से किसी भी अर्थ के साथ निरपेक्ष शब्द जोडने से अनर्थ ही होता है। क्या किसी बेटे ने अपने पुत्रधर्म से निरपेक्ष व्यवहार करना ठीक है? क्या कोई पदार्थ अपने गुणधर्मों से निरपेक्ष हो सकता है? क्या कोई इकाई अपना अस्तित्व टिकाने, बलवान बनने, निरोग रहने, लचीला बनने, दमदार बनने की अधिकारी नही है? क्या इन बातों से निरपेक्ष रहने या बनने से उस का अर्थात् मनुष्य का, व्यापारी का, पडोसी का, सैनिक का, राजा का व्यवहार ठीक माना जाएगा? ऐसा करने से अनर्थ निर्माण नही होगा? तथापि हमारे देश में धर्मनिरपेक्षता जैसा अर्थहीन शब्द संविधान में डाला गया है। यह पाश्चात्य शब्द सेक्युलॅरिझम् का भौंडा अनुवाद मात्र है। जिन्हें ना तो यूरोप का इतिहास ठीक से पता है और ना ही जिन्हे भारत का इतिहास ठीक से पता है ऐसे अज्ञानी और गुलामी की मानसिकता रखनेवाले नेताओं की यह करनी जितनी शीघ्र निरस्त हो सके उतना ही देश के लिये अच्छा है। पूरे देश की जनता इस का विरोध करने की जगह मौन है। यह भी अभी जनता के मन पर गुलामी का कितना प्रभाव शेष है इसी बात का लक्षण है।  
   −
यूरोप के इतिहास में सेक्युलरीझम शब्द का प्रयोग चर्च के मजहबी प्रभाव से मुक्ति के लिए किया गया था। ईसाईयत से पहले यूरोप के राजा सर्वसत्ताधीश थे। और अतः अन्याय, अत्याचार यह सार्वत्रिक बातें थीं। ईसाईयत के उदय के बाद सभी राजा अब चर्च के निर्देश में राज चलाने लग गए। फिर भी वे सर्वसत्ताधीश ही रहे। अतः अब अत्याचार में चर्च का भी समर्थन मिलने से और अधिक अत्याचारी और अन्यायी हो गए। अंग्रेजी कहावत है – पॉवर करप्ट्स एण्ड अब्सोल्यूट पॉवर करप्ट्स अब्सोल्यूटली। अर्थ है सता मनुष्य को बिगाड़ती है और अमर्याद सत्ताधीश के बिगड़ने की कोई सीमा नहीं होती।  
+
यूरोप के इतिहास में सेक्युलरीझम शब्द का प्रयोग चर्च के मजहबी प्रभाव से मुक्ति के लिए किया गया था। ईसाईयत से पहले यूरोप के राजा सर्वसत्ताधीश थे। और अतः अन्याय, अत्याचार यह सार्वत्रिक बातें थीं। ईसाईयत के उदय के बाद सभी राजा अब चर्च के निर्देश में राज चलाने लग गए। तथापि वे सर्वसत्ताधीश ही रहे। अतः अब अत्याचार में चर्च का भी समर्थन मिलने से और अधिक अत्याचारी और अन्यायी हो गए। अंग्रेजी कहावत है – पॉवर करप्ट्स एण्ड अब्सोल्यूट पॉवर करप्ट्स अब्सोल्यूटली। अर्थ है सता मनुष्य को बिगाड़ती है और अमर्याद सत्ताधीश के बिगड़ने की कोई सीमा नहीं होती।  
   −
यही हो रहा था यूरोप में। जब फ्रांस में जनता का शासन आया तब उसने चर्च की तानाशाही और नियंत्रण से मुक्ति का याने सेक्युलरिझम का नारा लगाया। वह योग्य ही था। यह है सेक्युलरिझम शब्द की यूरोपीय पार्श्वभूमि। भारत में तो चर्च की तानाशाही नहीं थी। अतः यहाँ इस शब्द का प्रयोग जनता को बेवकूफ बनाने के लिए ही था। हमारे यहाँ धर्म सर्वोपरि रहा है। सम्प्रदाय नहीं। सम्राट अशोक यह ऐसा राजा था जिसने बौद्ध मत को राजाश्रय दिया। अन्यथा दूसरा कोई उदाहरण हमें धार्मिक (धार्मिक) इतिहास में नहीं मिलता। भारत में तो सभी राजा धर्म द्वारा नियमित होते थे, चाहे वे किसी भी सम्प्रदाय को मानते हों। भारत का पतन भी जब से राजाओं के सर से धर्म का अंकुश कमजोर हुआ या दूर हो गया, तब से हुआ है।
+
यही हो रहा था यूरोप में। जब फ्रांस में जनता का शासन आया तब उसने चर्च की तानाशाही और नियंत्रण से मुक्ति का याने सेक्युलरिझम का नारा लगाया। वह योग्य ही था। यह है सेक्युलरिझम शब्द की यूरोपीय पार्श्वभूमि। भारत में तो चर्च की तानाशाही नहीं थी। अतः यहाँ इस शब्द का प्रयोग जनता को बेवकूफ बनाने के लिए ही था। हमारे यहाँ धर्म सर्वोपरि रहा है। सम्प्रदाय नहीं। सम्राट अशोक यह ऐसा राजा था जिसने बौद्ध मत को राजाश्रय दिया। अन्यथा दूसरा कोई उदाहरण हमें धार्मिक इतिहास में नहीं मिलता। भारत में तो सभी राजा धर्म द्वारा नियमित होते थे, चाहे वे किसी भी सम्प्रदाय को मानते हों। भारत का पतन भी जब से राजाओं के सर से धर्म का अंकुश कमजोर हुआ या दूर हो गया, तब से हुआ है।
    
इसलिये यह आवश्यक है कि संविधान में से तो बाद में धर्मनिरपेक्षता का शब्द जब जाएगा तब जाए उस से पहले हमें उसे हमारे शिक्षा के उद्दिष्टों में से हटाना चाहिये ।
 
इसलिये यह आवश्यक है कि संविधान में से तो बाद में धर्मनिरपेक्षता का शब्द जब जाएगा तब जाए उस से पहले हमें उसे हमारे शिक्षा के उद्दिष्टों में से हटाना चाहिये ।
Line 80: Line 80:  
धर्म मोक्ष प्राप्ति का साधन है। पुरूषार्थ चतुष्ट्य में से त्रिवर्ग अनुपालन उसका मार्ग है। पुरूषार्थ चार हैं: '''धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष''' । इनमें प्रारम्भ तो काम पुरूषार्थ से ही होता है । काम का अर्थ है इच्छा करना। मनुष्य यदि इच्छा करना ही छोड़ दे तो मानव जाति का जीवन थम जाएगा। जीवन चलाने का प्रारम्भ ही काम से होता है अतः काम को पुरूषार्थ माना गया है। इसी तरह इच्छाएँ अनेकों हों लेकिन उन्हें पूरी करने के लिए प्रयास नहीं किया गया तो भी जीवन थम जायेगा। अतः इच्छाओं को पूरी करने के प्रयासों, इस के लिए उपयोग में लाए गए धन, साधन और संसाधनों को मिलाकर ‘अर्थ’ पुरूषार्थ होता है ऐसी मान्यता है। इन को धर्म की सीमा में रखने से मोक्ष की प्राप्ति होती है।   
 
धर्म मोक्ष प्राप्ति का साधन है। पुरूषार्थ चतुष्ट्य में से त्रिवर्ग अनुपालन उसका मार्ग है। पुरूषार्थ चार हैं: '''धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष''' । इनमें प्रारम्भ तो काम पुरूषार्थ से ही होता है । काम का अर्थ है इच्छा करना। मनुष्य यदि इच्छा करना ही छोड़ दे तो मानव जाति का जीवन थम जाएगा। जीवन चलाने का प्रारम्भ ही काम से होता है अतः काम को पुरूषार्थ माना गया है। इसी तरह इच्छाएँ अनेकों हों लेकिन उन्हें पूरी करने के लिए प्रयास नहीं किया गया तो भी जीवन थम जायेगा। अतः इच्छाओं को पूरी करने के प्रयासों, इस के लिए उपयोग में लाए गए धन, साधन और संसाधनों को मिलाकर ‘अर्थ’ पुरूषार्थ होता है ऐसी मान्यता है। इन को धर्म की सीमा में रखने से मोक्ष की प्राप्ति होती है।   
   −
धर्म के अर्थ हमने पूर्व में ही जाने हैं। इच्छाएँ अमर्याद होती है। सर्वाव्यापी होती हैं। अतः अर्थ पुरूषार्थ का दायरा भी जीवन और जगत के सभी अन्गों तक होता है। इन दोनों पुरुषार्थों को यदि धर्म की सीमा में रखना हो तो धर्म का दायरा भी जीवन और जगत के सभी अंगों तक होना स्वाभाविक है। अतः धर्म का दायरा सर्वव्यापी है। वैसे भी विश्व व्यवस्था के नियमों को ही धर्म कहते हैं। धर्म की व्याप्ति समूचे ब्रह्माण्ड तक होती है। इसीलिये धार्मिक (धार्मिक) मान्यता है कि धर्म सर्वोपरि है। धर्म से ऊपर कुछ नहीं है। सबकुछ धर्म के नियंत्रण, निर्देशन और नियमन में रहे।   
+
धर्म के अर्थ हमने पूर्व में ही जाने हैं। इच्छाएँ अमर्याद होती है। सर्वाव्यापी होती हैं। अतः अर्थ पुरूषार्थ का दायरा भी जीवन और जगत के सभी अन्गों तक होता है। इन दोनों पुरुषार्थों को यदि धर्म की सीमा में रखना हो तो धर्म का दायरा भी जीवन और जगत के सभी अंगों तक होना स्वाभाविक है। अतः धर्म का दायरा सर्वव्यापी है। वैसे भी विश्व व्यवस्था के नियमों को ही धर्म कहते हैं। धर्म की व्याप्ति समूचे ब्रह्माण्ड तक होती है। इसीलिये धार्मिक मान्यता है कि धर्म सर्वोपरि है। धर्म से ऊपर कुछ नहीं है। सबकुछ धर्म के नियंत्रण, निर्देशन और नियमन में रहे।   
   −
धर्म के बारे में जानते समय एक और बात भी जानना आवश्यक है। वह है – शरीरमाद्यं खलु धर्म साधनम् । धर्म के अनुसार जीने का सबसे प्रमुख साधन शरीर है। धार्मिक (धार्मिक) विचार में शरीर की उपेक्षा नहीं की गयी है और ना ही यह माना है कि शरीर केवल उपभोग के लिए होता है। शरीर को धर्म के अनुसार व्यवहार करने के लिए मिला साधन ही माना गया है। शरीर को स्वस्थ रखने से धर्म का पालन अधिक अच्छा हो सकेगा इस विचार से शरीर को स्वस्थ रखाना भी धर्म ही है।  
+
धर्म के बारे में जानते समय एक और बात भी जानना आवश्यक है। वह है – शरीरमाद्यं खलु धर्म साधनम् । धर्म के अनुसार जीने का सबसे प्रमुख साधन शरीर है। धार्मिक विचार में शरीर की उपेक्षा नहीं की गयी है और ना ही यह माना है कि शरीर केवल उपभोग के लिए होता है। शरीर को धर्म के अनुसार व्यवहार करने के लिए मिला साधन ही माना गया है। शरीर को स्वस्थ रखने से धर्म का पालन अधिक अच्छा हो सकेगा इस विचार से शरीर को स्वस्थ रखाना भी धर्म ही है।  
    
== धर्माचरण की शिक्षा और शासन की भूमिका ==
 
== धर्माचरण की शिक्षा और शासन की भूमिका ==
Line 96: Line 96:  
१. वैशेषिक दर्शन, दर्शनकार कणाद ऋषि
 
१. वैशेषिक दर्शन, दर्शनकार कणाद ऋषि
   −
२. चिरंतन हिन्दू जीवन दृष्टि, प्रकाशक धार्मिक (धार्मिक) विचार साधना
+
२. चिरंतन हिन्दू जीवन दृष्टि, प्रकाशक धार्मिक विचार साधना
    
३. धर्म तथा समाजवाद, लेखक गुरुदत्त, प्रकाशक हिन्दी साहित्य सदन, दिल्ली
 
३. धर्म तथा समाजवाद, लेखक गुरुदत्त, प्रकाशक हिन्दी साहित्य सदन, दिल्ली
Line 102: Line 102:  
[[Category:Dharmik Jeevan Pratiman (धार्मिक जीवन प्रतिमान - भाग १)]]
 
[[Category:Dharmik Jeevan Pratiman (धार्मिक जीवन प्रतिमान - भाग १)]]
 
[[Category:Dharmik Jeevan Pratiman (धार्मिक जीवन प्रतिमान)]]
 
[[Category:Dharmik Jeevan Pratiman (धार्मिक जीवन प्रतिमान)]]
 +
[[Category:Dharmik Jeevan Pratimaan Paathykram]]

Navigation menu