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गणित
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उद्देश्य १. एक मात्र मनुष्य को ही बुद्धि का वरदान मिला है। जीवन-व्यवहार में बुद्धि का
 
उद्देश्य १. एक मात्र मनुष्य को ही बुद्धि का वरदान मिला है। जीवन-व्यवहार में बुद्धि का
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भाषा के समान गणित में भी जैसा पढ़ते हैं वैसा ही लिखते हैं। यदि वाचन अच्छी तरह आता हो तो लिखना जल्दी आ जाता है। लेखन के क्रम में प्रथम खड़ी, तिरछी रेखा, अर्धवृत्त, संपूर्ण वृत इत्यादि जो हम उद्योग में सीखे थे, वह बहुत ही उपयोगी बनता है। इसलिए उद्योग में जब तक रेखा एवं वृत्त बनाना पूरा न हो जाए तब तक भाषा एवं गणित में स्वाभाविक रूप से ही लेखन शुरू नहीं हो पाएगा। लिखने के क्रम में प्रथम १ से ९ एवं ०, बस इतना ही मौलिक लेखन है। शेष सब कुछ इन दस अंकों की विविध प्रकार की व्यवस्था ही है। इसलिए गणित का लेखन बहुत कठिन नहीं है। परंतु आड़ा एवं खड़ा, सीधी रेखा में लिखना आवश्यकता है। दो अंकों की संख्या लिखी हो तो उसमें इकाई के स्थान पर इकाई एवं दहाई के स्थान पर दहाई ही आए यह आवश्यक है। जोड़घटाव के चिहन भी सवाल की सीध में ही आने चाहिए। इसके अतिरिक्त वाचन के समान ही लेखन भी दो प्रकार का होता है - अंकों में एवं शब्दों में। अंकों में लिखना आसान है। शब्दों में लिखते समय सावधानी रखना चाहिए। इसलिए अंकों में लिखना अच्छी तरह आने के बाद ही शब्दों में लिखना सिखाना चाहिए। इस तरह समझ जाने के बाद उसे पक्का करने के लिए गणित के गीत, खेल, कहानियाँ, चित्र इत्यादि का विपुल मात्रा में उपयोग करना चाहिए। उदाहरण के तौर पर 'अंक खोज' नामक खेल अंक परिचय को समझाने के लिए खेलाना चाहिए। 'चूहे की पूंछ, तोते की चोंच कितनी' गीतका उपयोग १ से १० तक की गिनती सिखाने के लिए किया जाता है। गणित विषयक गीत, तुकबंदी, खेल, कहानियाँ, चित्र इत्यादि स्वतंत्र पुस्तिका में दिए गए हैं। शिक्षक स्वयं भी मौलिक रूप से रचना कर सकते हैं। इस प्रकार पहली एवं दूसरी कक्षा में गणित का पाठ्यक्रम बहुत ही कम है। परंतु मूल समझ बनने के लिए बहुत प्रयास की जरूरत है।
 
भाषा के समान गणित में भी जैसा पढ़ते हैं वैसा ही लिखते हैं। यदि वाचन अच्छी तरह आता हो तो लिखना जल्दी आ जाता है। लेखन के क्रम में प्रथम खड़ी, तिरछी रेखा, अर्धवृत्त, संपूर्ण वृत इत्यादि जो हम उद्योग में सीखे थे, वह बहुत ही उपयोगी बनता है। इसलिए उद्योग में जब तक रेखा एवं वृत्त बनाना पूरा न हो जाए तब तक भाषा एवं गणित में स्वाभाविक रूप से ही लेखन शुरू नहीं हो पाएगा। लिखने के क्रम में प्रथम १ से ९ एवं ०, बस इतना ही मौलिक लेखन है। शेष सब कुछ इन दस अंकों की विविध प्रकार की व्यवस्था ही है। इसलिए गणित का लेखन बहुत कठिन नहीं है। परंतु आड़ा एवं खड़ा, सीधी रेखा में लिखना आवश्यकता है। दो अंकों की संख्या लिखी हो तो उसमें इकाई के स्थान पर इकाई एवं दहाई के स्थान पर दहाई ही आए यह आवश्यक है। जोड़घटाव के चिहन भी सवाल की सीध में ही आने चाहिए। इसके अतिरिक्त वाचन के समान ही लेखन भी दो प्रकार का होता है - अंकों में एवं शब्दों में। अंकों में लिखना आसान है। शब्दों में लिखते समय सावधानी रखना चाहिए। इसलिए अंकों में लिखना अच्छी तरह आने के बाद ही शब्दों में लिखना सिखाना चाहिए। इस तरह समझ जाने के बाद उसे पक्का करने के लिए गणित के गीत, खेल, कहानियाँ, चित्र इत्यादि का विपुल मात्रा में उपयोग करना चाहिए। उदाहरण के तौर पर 'अंक खोज' नामक खेल अंक परिचय को समझाने के लिए खेलाना चाहिए। 'चूहे की पूंछ, तोते की चोंच कितनी' गीतका उपयोग १ से १० तक की गिनती सिखाने के लिए किया जाता है। गणित विषयक गीत, तुकबंदी, खेल, कहानियाँ, चित्र इत्यादि स्वतंत्र पुस्तिका में दिए गए हैं। शिक्षक स्वयं भी मौलिक रूप से रचना कर सकते हैं। इस प्रकार पहली एवं दूसरी कक्षा में गणित का पाठ्यक्रम बहुत ही कम है। परंतु मूल समझ बनने के लिए बहुत प्रयास की जरूरत है।
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==References==
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[[Category:आचार्य अभिभावक निर्देशिका]]

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