वैश्विक समस्याओं का स्त्रोत

From Dharmawiki
Jump to: navigation, search
ToBeEdited.png
This article needs editing.

Add and improvise the content from reliable sources.

अध्याय ३०

राकेश मिश्र

आधुनिकता की समीक्षा आवश्यक

वैश्विक संकट का क्या स्रोत है, उसका क्या स्वरूप है और उसका क्या समाधान है ? वस्तुतः यह प्रश्न भारत से नहीं उठ रहा है कि विश्व संकटग्रस्त है । स्वयं पश्चिम में यह प्रश्न उठ रहा है । और यह प्रश्न जब पश्चिम में उठ रहा है तो इसलिए उठ रहा है, क्योंकि वे अब इस निष्कर्ष पर पहँचे हैं कि पिछले ढाई सौ वर्षों की उनकी जो कमाई, जिसको एक शब्द में कहें तो आधुनिकता (Modernity) ही संदेहास्पद है। इसलिए आज इस आधुनिकता की जो पुनः समीक्षा हो रही है उसका प्रारम्भ अठारहवीं शताब्दी से हुआ। आधुनिक काल में और अभी तक जिस को हम enlightenment कहते रहे, ज्ञान कहते रहे, प्रबोधन कहते रहे, प्रगति कहते रहे, विकास कहते रहे उस _enlightenment project के बारे में आज यूरोप के ही विद्वान कह रहे हैं कि enlightenment is totallitairalism, ये जो प्रबोधन है ये वस्तुतः सर्वाधिकारवादी है। या ये जो enlightenmen है इसके लिए वो एक phrase इस्तेमाल करते हैं it is darkness ___in the moon' यह ऐसी स्थिति है जैसे कि दोपहर में अन्धकार छा जाय । तो यह प्रश्न उनका है, लेकिन दिक्कत यह है कि जब रूस में साम्यवाद का पतन हआ तब इसी पश्चिमी जगत के लोगों ने कहा कि अब इतिहास का अन्त हो गया, या विचारधारा का अन्त हो गया। जिससे उनका आशय यह था कि बस अब सब रास्ता साफ हो गया, जो रास्ते के काँटे थे वो दर हो गये। अब विकास और कल्याणकी एक अनन्त धारा बहेगी। और उस चीज को उन्होंने वैश्विकरण (ग्लोबलाइजेशन) कहा । लेकिन उनकी आशा कैसे दुराशा सिद्ध हुई यह रोष प्रकट हो रहा है।

राजनीति में विश्वसनीयता का संकट

राजनीति शक्ति की प्राप्ति तथा उसके संवर्धन और दुरुपयोग तक सीमित रह गई है। न केवल विश्व के सन्दर्भ में यह सिद्धान्त लागू होता है बल्कि राज्य के, पंचायत के, प्रदेश के स्तर पर भी लागू होता है । इस राजनीतिने हमारा राजनीति और राजनीतिज्ञों पर से विश्वास ही समाप्त कर दिया है। उसे ही आजकल हम crisis of credibility, विश्वसनीयता का संकट कहते है। अर्थात् जो हमारे कर्णधार हैं उन पर विश्वास ही नहीं रह गया है। परन्तु यह संकट एक दिन में पैदा नहीं हुआ। अर्थ व्यवस्था का जो केन्द्र है वह लाभ और लोभ है। profit का जो लोभ है उसका कोई अन्त नहीं । उससे जो विद्रपताएँ और विषमताएँ पैदा हो रहीं हैं चाहे वह बेरोजगारी हो, मुद्रास्फिति हो, गरीबी का बढ़ना हो सब उसके ही दुष्परिणाम हैं। समाज से संस्कार लुप्त हो रहे हैं और संस्कारों के लुप्त होने के कारण परिवार टूट रहे हैं, समाज टूट रहा है । जिन शिक्षा संस्थाओं को प्रकाश बिखेरना चाहिए वे स्वयं अंधकारग्रस्त हैं। संक्षेप में इस सम्पूर्ण संकट को चित्रित किया जाय तो वह चतुर्दिक है ऐसा लगता है।

आधुनिक सभ्यता का संकट

राजनीति, अर्थव्यवस्था, समाजव्यवस्था, साहित्य, दर्शन, शिक्षा सभी दिग्भ्रमित हैं। यानि जो सभ्यता का संकट है। यह कोई एक जगह का संकट नहीं है, पूरी सभ्यता ही संकटग्रस्त है । जिसको modern civilization, आधुनिक सभ्यता कहते हैं और जिसे यूरोप में बड़ी उपलब्धि माना जाता था, हमारे यहाँ अभी भी लोग इसको बहुत बड़ी चीज मानते हैं। इस आधुनिकता, जिसे गाँधीजीने शैतानी सभ्यता कहा है, वह धीरे धीरे प्रकट हो रही है। गाँधीजी ने तो यह बात बीसवीं शताब्दी के प्रारम्भ में ही कह दी थी जब यह सभ्यता अपने चरम वैभव पर थीं। उन्होंने यह भी कहा था कि यह जो शैतानी सभ्यता है वह चार दिन की चाँदनी है । उन्होंने एक शब्द प्रयोग किया था 'इट इज ए नाइन डेज वंडर'। यह बात गाँधीजी ने बीसवीं शताब्दी के प्रारम्भ में हिन्द स्वराज पुस्तक में जब खुलकर कह दी थी तब तो यह सभ्यता अपने वैभव पर थीं लेकिन अब इसके अंधकारमय पक्ष धीरे-धीरे उजागर हो रहे हैं। इसलिए जो वैश्विक संकट हैं, वह सभ्यता का संकट है। उसका एकाध पक्ष संकटग्रस्त हैं, विकारग्रस्त है ऐसा नहीं है, बल्कि ऐसा लगता है जैसे इस सभ्यता का पूरा शरीर ही सड़ रहा है। इस वैश्विक संकट का यह स्वरूप This is the nature of civilization crisis

बुद्धि की विकृति का संकट

अब दूसरा सवाल यह पैदा होता है कि ये पैदा कैसे हुआ। और इसका जवाब भी हमें नहीं देना है, उसका जवाब वहाँ के एक बड़े विद्वानने ही दिया है। रेनेगेनों के नाम से एक बहुत बड़े ऋषितुल्य विद्वान ने उन्नीसवीं शताब्दी के अन्त में और बीसवीं शताब्दी के प्रारम्भ में अपनी पुस्तक 'ध क्राईसिस ऑफ मॉडर्न सिविलाईझेशन' में कहा कि क्या यह प्रवृत्ति का विचलन (perversion of will) है कि क्रिया की विकृति (perversion of act) है जिससे यह संकट पैदा हुआ है। उन्होंने कहा कि वृत्ति और क्रिया बुद्धि के अधीन होती हैं । जब बुद्धि में विकार पैदा होता है, दोष पैदा होता है तो वृत्ति भी दूषित होती है और क्रिया भी दूषित होती है, तब व्यक्ति और समाज दोनों संकटग्रस्त हो जाते हैं। इसलिए उन्होंने कहा कि ये बुद्धि की विकृति का संकट है और यह बात सही है । हमारे यहाँ बुद्धि के और ज्ञान के सात धरातल माने गये हैं। हमारी परम्परा में सप्तज्ञान भूमियाँ भी कही गई हैं और सप्तअज्ञान भूमियाँ भी कही गई हैं। और उस दृष्टि से देखें तो या तो हम आखिरी अज्ञान की भूमि पर खडे हैं या ज्ञान की प्रथम भूमि पर खड़े हैं । और प्रथम ज्ञान की भूमि क्या होती है ? देहात्मक, देह ही आत्मा है, देह ही साध्य है, संसार ही साध्य है, हम केवल शरीर हैं। यह देहात्मवाद की दृष्टि का प्रारम्भ यूरोप की आधुनिकता के साथ हुआ। लेकिन जैसे-जैसे उनका राजनैतिक साम्राज्य बढ़ा और साथसाथ विचारों का साम्राज्य भी बढ़ता गया तब वह हमारे यहाँ भी आ गया । हमारी शिक्षा प्रणाली भी उसी तरह की हुई। लोगों ने भी यही मानना शुरु कर दिया कि देह ही आत्मा है, शरीर का सुख ही साध्य है, शरीर का कल्याण ही कल्याण है और भौतिक उपलब्धि ही प्रगति और विकास है। इसलिए यह बुद्धि की विकृति, perversion of intellect, के कारण ही तमाम विचारधारायें पैदा हुई हैं।

संविधान में पाश्चात्य उदारवादी जीवनदृष्टि

आधुनिक काल की उदारवाद, लिब्रलिजम, सोशियालिजम, फासिजम इत्यादि जितनी भी विचारधारायें हैं वे सब इसी के इर्द-गीर्द रहती हैं। और इन्हीं में से अपने कल्याण का कोई विकल्प वे चुनती हैं। किसी ने समाजवाद का विकल्प चुना तो किसी ने उदारवाद का, तो किसी ने फासीवाद का विकल्प चुना । किसी ने समाजवाद का एक संस्करण अपनाया तो किसी ने समाजवाद का दूसरा संस्करण लेकिन है तो वह समाजवाद ही। ये वैश्विकरण क्या है ? नव उदारवाद (Neoliberalism) है, उदारवाद का नया संस्करण है। आज भारत जिस मार्ग पर चल रहा है वह भारतीय मार्ग नहीं है । वह नवउदारवादी मार्ग है। हमारा संविधान भी इन्हीं विचारधाराओं पर ही आधारित है। उसमें बहुत सारे पक्ष हैं जो उदारवादी दर्शन के पक्ष में हैं और उसमें थोड़ी-बहुत बातें समाजवादी पक्ष से भी डाल दी गई है। तो भारतीय संविधान का यह स्वरूप है। भारतीय संविधान, जो हमारा, नवीन भारत का, आदि ग्रन्थ है, वही जब इस प्रकार की दृष्टि पर आधारित होगा तो फिर भारत की रचना उसी प्रकार की होना स्वाभाविक ही है। फिर भारत की प्रगति भी उसी दिशा में होगी । संविधान में जो प्रस्तावना दी गई है उसमें जो जीवनदृष्टि प्रतिपादित की गई है वह पाश्चात्य उदारवादी जीवनदृष्टि, western liberal world view, है । सारे प्रावधान सारी धारायें उसी पर आधारित हैं। हमारी इतनी विराट दृष्टि थी, परन्तु जब हमारी दृष्टि का क्षय हुआ, और क्षय इसलिए हुआ कि हमारी बुद्धि का संकोचन हुआ, हम प्रज्ञा के धरातल से गिरकर बुद्धि के धरातल पर आ गये। intellect से Decline हुआ और Reason पर आ कर ठहरे और reason के हिसाब से जिसे Rationalism कहा जाता है उस Rationalism द्वारा सब बीमारियों के इलाज ढूंढने लगे, जब कि बीमारियों का इलाज Intellectual से ढूंढा जाता है reason से नहीं। हमारी बुद्धि का विपर्यय हुआ, विकृति हुई क्योंकि जिन विचारों __ के, जिन देशों के प्रभाव में हम थे, आजादी के समय या गुलामी के समय, उनका प्रभाव हमारे ऊपर बराबर बना रहा। उनके जाने के बाद भी, वो जब चले गये तब भी उनकी दृष्टि से ही हम कार्य करते रहे । सारे भारत का नवनिर्माण उन्हीं की दृष्टि से हआ। इसीलिए तो गाँधीजी ने कहा, यह कैसी आजादी है ? इस आजादी की तो हमने कल्पना ही नहीं की थी। ये तो स्वराज्य नहीं था। जो हमने mixed economy model अपनाया वह model क्या था ? थोडा उदारवाद, थोड़ा समाजवाद । इन से मिलकर कोई रास्ता निकलेगा ऐसा सोचना कोई भारतीय मार्ग तो नहीं था। इसलिए बुद्धि का जब विपर्यय हआ तब - हमारी वह समग्र दृष्टि नहीं रही, वह विराट दृष्टि नहीं रही और दृष्टि का विखण्डन हो गया । और जब दृष्टि विखण्डित __ होगी तो प्रवृत्ति भी विखण्डित होगी और क्रिया भी विखण्डित होगी और इन सबके परिणाम स्वरूप रचना नहीं होगी,विखण्डन ही होगा। Fragmentation होगा, निर्माण नहीं होगा। होमियोपैथी का एक सिद्धान्त है Like produce like, एक जैसी चीज के एक जैसे परिणाम होते हैं । विखण्डित बुद्धि से अखण्ड भारत की रचना नहीं हो सकती थी। और विखण्डित बुद्धि से भारत का नवनिर्माण नहीं हो सकता था । एक यह पक्ष रहा ।

नैतिकता का अभाव

अब इसका परिणाम यह हुआ कि ईश्वर और मनुष्य का, ज्ञान और क्रिया का, भौतिक और पराभौतिक का, विचार और आचार का जो अन्तरंग सम्बन्ध है जो उनकी अन्योन्याश्रितता है, जो उनकी interdependence है वह समाप्त हो गई, ओझल हो गई। world view की जो integrity थी, विश्वदृष्टि की जो समग्रता थी, जिसे आज कल हम लोग holistic कहते हैं, वह समाप्त हो गई। अब दृष्टि रह गई partial, आधी-अधूरी fragmented | हमने टुकडों टुकड़ों में चीजों को देखना शुरु किया। और हमने संकट को कभी राजनीतिक मानकर उसके राजनीतिक उपाय करके समाधान करना चाहा, कभी आर्थिक मानकर उसके आर्थिक उपाय करके समाधान करना चाहा तो कभी उसको सामाजिक मानकर सामाजिक उपाय अपनाने शुरु किये। लेकिन संकट तो नैतिक था, the crisis was moral and spiritual' बीमारी कुछ और उपचार कुछ ऐसा होने से रोग बढ़ता ही गया । जो राजनीतिक जीवन के संकट हैं, जो आर्थिक जगत के भी संकट हैं, जो परिवार के संकट है उसको हम ध्यान से देखें तो जान सकेंगे कि हमारा मूल संकट है आत्मिक-नैतिक (spiritual - moral) जिसकी इन अलग-अलग क्षेत्रों में अलग-अलग अभिव्यक्तियाँ हैं । भ्रष्टाचार से हम सब लोग ग्रस्त हैं, वो कोई राजनीतिक प्रश्न है, प्रशासनिक प्रश्न है क्या ? यह तो नैतिक प्रश्न है। नवउदारवाद में अगर मनाफाखोरी है, बेरजोगारी है तो क्यों हैं ? क्योंकि जिनके पास धन है उनकी दृष्टि दूषित है, उनकी दृष्टि अनैतिक है। तो इस प्रकार की ही अर्थव्यवस्था बनेगी जो शोषण पर आधारित होगी, अन्याय पर आधारित होगी। इसलिए जो मूल बात है, उस की ओर ध्यान ही नहीं गया । जो पहला काम था देश के निर्माण का, मनुष्य निर्माण का वह होना चाहिए था। मनुष्य पर अच्छे संस्कार होने चाहिए थे, मनुष्य को सम्यक् दृष्टि मिलनी चाहिए थीं वो तो मिली नहीं । हमने अपना आर्थिक निर्माण किया, राजनैतिक निर्माण किया । दूसरे तरह-तरह के निर्माण किये लेकिन जो मूल दायित्व था उसकी कतई उपेक्षा की। परिणाम क्या हआ ? परिणाम यह हुआ कि शुरु में जब तक पुराना चरित्र बल था, ५० व ६० के दशक तक जो चरित्र बल था, वह कायम रहा तब तक संस्थायें फिर भी ठीक-ठाक चलती रहीं। लेकिन पिछली तीन-चार पीढियों में जब से यह नई सोच नया चरित्र आया है तो अब कुछ भी ठीक-ठाक नहीं चल सकता है क्यों कि अपवाद अगर छोड़ दीजिए तो चरित्र अब कोई बड़ी सम्पत्ति नहीं रहा । हमारा चरित्र अब कोई primary consideration नहीं रहा। यह केवल कहने की बात रह गई कि 'when character is lost everything is lost' | किसी को भी इसकी चिन्ता है नहीं । इसलिए जब मूल प्रश्न की उपेक्षा हई तो गाँधीजी ने हिन्द स्वराज में कहा कि मेरी शिकायत अंग्रेजों से नहीं है, मेरी लड़ाई अंगेजों से नहीं है, अंग्रेजियत से है, इस पश्चिमी सभ्यता से है, इस पश्चिमी जीवन दृष्टि से है। अंग्रेज तो ठीक है, आज हैं, कल चले जायेंगे, उससे कोई फर्क नहीं पड़ता । कब तक रहेंगे हमारे यहाँ । लेकिन ये जो दृष्टि आ गई है, ये कब जायेगी मुझे इसकी चिन्ता है। भारत आजाद होने के बाद जो मार्ग चुना जा रहा था, वह उसके निर्माण का मार्ग नहीं था। तो एक प्रश्न यह है कि बुद्धि का क्षरण हुआ, जिससे हमारी दृष्टि का विखण्डन हुआ और हम टुकडों-टुकडों में समस्याओं को देखने व समाधान करने में लग गये । मूल प्रश्न क्या है और उस मूल प्रश्न की ओर समग्र दृष्टि से देखा जाना क्यों आवश्यक है, यह शायद चिन्ता नहीं रही।

समग्र दृष्टि का अभाव

यहाँ पर एक दूसरी बात यह है कि हमारी जो समस्या है, वह यह है कि हमने हरचीज specialist लोगों के हवाले कर रखी है। यह राजनैतिक प्रश्न है इसको राजनीतिज्ञ देखेंगे, संसद देखेंगी। यह आर्थिक प्रश्न है तो अर्थशास्त्री देखेंगे । घर-परिवार का प्रश्न है तो समाजशास्त्री देखेंगे। भारत की यह दृष्टि कभी नहीं थी। हमारे यहाँ इस प्रश्न को पहले तत्त्वशास्त्री को refer किया जाता था । हमारे यहाँ के तत्त्वदर्शी केवल ब्रह्म चिन्तन नहीं करते थे वे विश्व चिन्तन भी करते थे। वे विश्वकल्याण का मार्ग भी बताते थे । तत्त्व चिन्तन हमारे देश में रहा नहीं, ज्ञान खेमों में बँट गया इसलिए ज्ञान की कोई समग्र दृष्टि रही नहीं । ऐसी स्थिति में बुद्धि में विकार आना स्वाभाविक था और वह आ गया और उससे बचा नहीं जा सकता था।

तो पहली बात तो यह है कि बुद्धि विपर्यय का परिणाम क्या होता है तो धर्मबुद्धि का अभाव होने लगता है। धर्म का क्षय होता है। अब धर्म शब्द को हम ने केवल एक पूजा-उपासना तक केन्द्रित कर दिया है। समस्या भारत के साथ तो यह है । पश्चिम में तो नहीं है, क्योंकि उनके यहाँ धर्म को 'सेक्रेड' और 'प्रोफेन में अलग-अलग बाँट दिया गया है। हमारे यहाँ कुछ भी प्रोफेन नहीं है । हर चीज पवित्र है, हर चीज महत्त्वपूर्ण है। क्योंकि हर वस्तु में परमात्मा की झलक है। हर वस्तु में परमसत्ता विद्यमान है। इसलिए भारत की दृष्टि सेक्रेड और प्रोफेन में चीजों को बाँटने में विश्वास नहीं करती। भगवत् चिन्तन, कर्मकाण्ड ये आवश्यक हैं क्यों कि उससे बुद्धि को एक सम्यकरूप में चीजों को देखने की शक्ति आती है। इसलिए उपासना धर्म का अनिवार्य पक्ष है। लेकिन जिसको हमलोग secular life कहते हैं, ऐसा हमारे यहाँ कुछ नहीं है। कोई भी चीज 'सेकुलर' नहीं है। जबसे यह शब्द वहाँ से हमारे यहाँ आया तब से हमने मानना शुरु कर दिया । यह रीलिजियस' है और यह सेकुलर' है। हमारी दृष्टि उस प्रकार की है नहीं। राजनीति क्या कोई 'सेकुलर' प्रवृत्ति है ? गाँधीजीने एक जगह लिखा कि 'धर्म विहीन राजनीति मोत का फन्दा है (politics bereft of religion is deathtrap) | अगर धर्म से राजनीति स्वतन्त्र हो जायेगी, अर्थशास्त्र स्वतन्त्र हो जायेगा, कला स्वतन्त्र हो जायेगी, साहित्य स्वतन्त्र हो जायेगा तो वे केवल entertainment रह जायेंगे और अन्ततः अनाचार के साधक बनेंगे । इसलिए भी इनको धर्म से स्वतन्त्र नहीं होना है, तो यह धर्म का वैश्विक पक्ष है । एक धर्म का उपासना परक पक्ष है, पारलौकिक पक्ष है, और एक धर्म का लौकिक पक्ष है। एक उतना ही आवश्यक है जितना कि दूसरा । इसीलिए हमारे यहाँ शब्द ही है नारीधर्म, पुरुषधर्म, अतिथिधर्म, साधारणधर्म, असाधारणधर्म, आपदधर्म, कृषकधर्म, पुत्र धर्म, पिता का धर्म । भारत की तो सारी शब्दावली यही है । कलाकार का क्या धर्म है, संगीतकार का क्या धर्म है। धर्म से कोई स्वतन्त्र नहीं है। क्योंकि धर्म ही तो वह दिशा है, मर्यादा है, जो इन योग्यताओं को, इन क्षमताओं को सम्यक् रखती हैं। अगर वह मर्यादा न रहें तो वे सब चीजें बेलगाम हो जायेंगी, अराजक हो जायेगा और कला के नाम पर अश्लीलता की स्थापना हो जायेगी ।

धर्मनिरपेक्ष शब्द हमारा नहीं

हमारे यहाँ सेकुलारिझम शब्द पर बड़ी बहस होती है। हम उससे छुटकारा पाने के लिए कहते हैं कि हम लोग तो सर्वधर्म समभाव में विश्वास करते हैं । सेकुलर शब्द का अर्थ तो मूल रूप से लेटिन भाषा का अर्थ है और न तो वह धर्म निरपेक्षता है और न सर्वधर्म समभाव है, जिसे हमने अपने लिए आविष्कृत कर लिया है। सेकुलर शब्द का मतलब होता है भौतिकवादी दृष्टिकोण, ईहलोकवादी दृष्टिकोण, पदार्थवादी दृष्टि । खाओ-पीओ और मौज करो वाली दृष्टि जो कि पश्चिम में सत्रहवीं शताब्दी में आई जब वहाँ पर ईसाईयत प्रवर्तमान थी। इसाईयत भी एक जीवनदृष्टि है, और धर्म वहाँ पर भी हर क्षेत्र पर मर्यादा लगाता है। जब उससे वे लोग स्वतन्त्र हुए और जब Christian से unchristian बनें, जिसको रेनेगोने ने कहा, unchristian west | यह जो आधुनिक यूरोप है यह कोई Christian west थोडे ही है यह तो unchristian west है । वह ईसाईयत तो कब का छोड़ चुका है । उसको क्या लेना-देना ईसाईयतसे, चर्च में ताले पड़ गये। चर्च तोड़कर गिरा दिये गये। और शोपिंग काम्पलेक्स बना दिये गये । हमारे यहाँ भी बहुत से लोग कहते हैं कि मंदिर-मस्जिद का झगड़ा खत्म होना चाहिए और उसकी जगह कोई शिक्षा संस्था खोल देनी चाहिए, यह खोल देना चाहिए वह खोल देना चाहिए सुझाव दिये जाते हैं। वे भूल जाते हैं कि 'किसी भी समाज की आस्तिकता धर्म स्थानों की उपस्थिति व उनकी पवित्रता पर निर्भर करती है। इसलिए सेक्यूलर का अर्थ होता है, शुद्ध भौतिक दृष्टि से चीजों पर विचार करना, ईहलोकवादी

दृष्टिकोण । यही दुनिया है और कोई दुनिया नहीं। कहीं कोई ईश्वर होगा भी तो उसको यहाँ से कोई लेना-देना नहीं । तो क्या भारतीय दृष्टि इस अर्थ में सेक्यूलर है ? तो हमलोग क्यों उसको अदालतों में और कहाँ-कहाँ defend __ करते हैं। कोई भी यह नहीं कहता कि इस शब्द से और अर्थ से तो हमारा कोई लेना देना ही नहीं हैं । यह तो भारत में कतई misfit शब्द है यहाँ तो यह शब्द बोला ही नहीं जाना चाहिए। लेकिन हम लोग उसे defend करते हैं क्योंकि उनके प्रभाव में आकर नये अर्थ देने की कोशिश करते ही नहीं है । भारतीय व्यक्ति किसी भी अर्थ में सेकुलर हो ही नहीं सकता। क्योंकि हमारी संस्कृति ईहलोकवादी संस्कृति है ही नहीं।

धर्म बुद्धि का जब क्षय हुआ तो अधर्म की वृद्धि होना, अधर्म की वृद्धि से समस्याओं और संकटों की वृद्धि होना स्वाभाविक है उसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं । जब तक हमारी धर्म बुद्धि होगी भाव का शुद्धिकरण भी होता रहेगा। धर्म की शक्ति ही भाव को शुद्ध करती है । हम और आप दो नहीं एक ही हैं, यह तो भावजगत का प्रश्न है, लेकिन यह भाव पैदा किस शक्ति से होता है ? धर्म की शक्ति से, और जब धर्म बुद्धि का ह्रास होगा, धर्म की शक्ति धीरे-धीरे क्षीण __ होगी तो यह भाव कभी पैदा हो ही नहीं सकता । इसीलिए समाज टूट रहा है, इसीलिए परिवार टूट रहे हैं क्योंकि वह भाव जिस शक्ति पर प्रतिष्ठित है, उस शक्ति का क्षरण हो रहा है। मंदिर तो बन रहे हैं लेकिन घर मंदिर नहीं बन रहा । यह नहीं कि मंदिर न बने, मंदिर तो बने ही, घर भी मंदिर बने, शिक्षा संस्था भी मंदिर बनें । संसद भी मन्दिर की तरह पवित्र हो, सांसद भी संसद में इस भाव से बैठे जैसे कि किसी पवित्र कार्य करने बैठे हैं । शिक्षक भी शिक्षालय में इस भाव से जायें कि जैसे कोई पवित्र कार्य करने आये हैं। professionalism करने नहीं आये हैं, profession की दृष्टि खतम हो । vocation की दृष्टि पाये, यह धर्म की दृष्टि है। लेकिन आज हरचीज को हमने professionalise कर दिया गया है क्यों कि धर्म दृष्टि से, धर्मबुद्धि से हमने चीजों को देखना समाप्त कर दिया है।

व्यवसायीकरण से धर्मबुद्धि का क्षय

आज स्थिति यह है कि हम न तो शिक्षा के व्यवसायीकरण को रोक सकते हैं, न राजनीति के, न अर्थव्यवस्था के। न स्त्री-पुरुष सम्बन्धों को आप व्यवसायीकरण होने से रोक सकते हैं, ना भाई-बहन के । हर चीज का बाजारीकरण होना तय है। अंग्रेजी साहित्य में एक बड़े कवि हुए हैं,ओलिवर गोल्डस्मिथ उनकी एक बड़ी श्रेष्ठ रचना है, 'ध डेझर्टेड विलेज', उजडा गाँव'। वह इसी सन्ताप को प्रकट करती है कि जिसके अन्दर भावना है, भाव है उसे जब परम्परागत ग्राम और समाज टूटता है तो क्या दुःख होता है । जिसमें नहीं है उसको तो कोई फर्क नहीं पड़ता। 'जब राष्ट्रों के दिल ठंडे पड़ जाते हैं तो सम्बन्धों में भी ठंडापन आ जाता है और हर शाखा पर व्यापार-वाणिज्य फलनेफूलने लगता है। जब हर चीज कॉमर्स हो जायेगी तो फिर उसमें विवाद होंगे ही होंगे । जब कोई चीज व्यवसाय बन गई तो फिर लाभ-हानि की दृष्टि से विवाद होना तय है । हम को ज्यादा मिला कि तुम को ज्यादा मिला यह विचार तो आयेगा ही आयेगा । यह विचार तो तब नहीं आयेगा जब सम्बन्धों के प्रति, समाज के प्रति, संस्थाओं के प्रति धर्म की दृष्टि होगी । धर्म की बुद्धि होगी।

सामंजस्य समान धर्मियों में, विधर्मियों में नहीं

और जब धर्म बुद्धि का क्षय हआ तो उस में से एक तीसरी जो नई प्रवृत्ति आयी उससे बचने के लिए हमने यह कहना शुरु कर दिया कि भाई परम्परागत समाज में कुछ बुराइयाँ थीं, त्रुटियाँ थी या परम्परा प्रस्तुत नहीं रह गई, प्रासंगिक नहीं रह गई। और एक शब्दावली चली 'Modernization of Traditions'| परम्परा का आधुनिकीकरण होना चाहिए। या कुछ लोग कहते हैं कि दोनों में सामंजस्य बिठा लीजिये। यह वैसा ही काम है जैसा कि आग व पानी में सामंजस्य बिठाने का काम करना । पानी की अधिकता से या तो आग बुझ जायेगी या पानी भाप बन जायेगा, उनमें कोई सामंजस्य नहीं हो सकता। अगर दोनों एक ही प्रकार के वृक्ष हैं तो शायद उनका या एक ही प्रकार की चीजें हैं तो शायद उनका समन्वय सम्भव हो। लेकिन जो । विरोधी चीजें हैं, उनका समन्वय कैसे होगा ? उसमें तो क्या होगा, जो चीज प्रबल होगी वह निर्बल चीज को खा जायेगी, उसे समाप्त कर देगी, उसका अस्तित्व नष्ट कर देगी। आधुनिकता के जो मूलाधार हैं जो foundations हैं, शक्ति केन्द्रित राजनीति, लाभ केन्द्रित अर्थव्यवस्था, स्वार्थ केन्द्रित समाज और सामाजिक सम्बन्ध, ये संक्षेप में आधुनिकता के मूल सिद्धान्त हैं। कला एक मनोरंजन है, व्यवसाय है। ये पश्चिमी आधुनिकता के सिद्धान्त है। भारतीय दृष्टि है, राजनीति धर्म के अधीन हो, राजीनति सेवा के लिए हों, अर्थ आयाम कभी लोभ या लाभ से दूषित नहीं होना चाहिए, समाज में धन की ज्यादा प्रतिष्ठा नहीं होनी चाहिए, समाज में धनिक तो हों लेकिन धनिक हमेशा धर्म की मर्यादा में रहें । कला व साहित्य साधना है, भगवद् उपासना है, केवल मनोरंजन नहीं है, मनोरंजन हो जाय तो हो जाय लेकिन उनका साध्य यह नहीं है। जो कला है वह catharsis यानि शुद्धिकरण का माध्यम है, आत्मा की शुद्धि का साधन है । संगीत आत्मा की शुद्धि का साधन है, आत्मोपलब्धि का साधन है, यह भारतीय दृष्टि है। अब पूर्व और पश्चिम दोनों का समन्वय कैसे हो सकता है ? जैसे रहीमने कहा -

'कहो रहीम कैसे निभे बेर केर को संग ।

वे डोलत रस आपने, उनके फाटत अंग ॥'

अब आप केर के पेड़ को और बेर के पेड़ को साथ साथ लगा दो और कहो कि दोनों लोग शान्ति से रहे. सहअस्तित्व से रहे। तो क्या आपकी शिक्षा से सहअस्तित्व कायम हो जायेगा ? जब पश्चिमी सभ्यता powerful साबित हुई तो हम को उसने खाने की पूरी कौशिश की। हम उसके आगे टिक नहीं पाये । यह नहीं कि हम उनसे श्रेष्ठ नहीं थे, शक्ति उनके पास ज्यादा थी। उनकी शक्ति से हम लोग परास्त हो गये । ऐसा नहीं था कि वे हमसे श्रेष्ठ थे।

भारतीय परम्परा का आधुनिकीकरण

एक संभ्रम तो यह है कि परम्परा और आधुनिकता का समन्वय होना चाहिए या परम्परा का आधुनिकरण होना चाहिए। यह भी संकट का दूसरा बड़ा कारण है। क्योंकि हम समझते हैं कि उससे संकट हल हो जायेगा परन्तु ऐसा नहीं है, उससे तो संकट और गहरा हो जायेगा । कारण यह है कि जो हमारा मूल है वह और कमजोर हो जाता है, बजाय सशक्त होने के । हमें विचार करना चाहिए कि क्या ये जो एक नया मार्ग तलाश किया गया है, मॉडर्नाइजेशन ऑफ ट्रेडिशन का यह वास्तव में सम्यक मार्ग होगा ? या इसका आभास होता है कि ऐसा होगा। एक होता है तर्क और एक होता है ताभास । न्यायशास्त्र में यह तर्काभास तो हो सकता है, तर्क नहीं हो सकता । इसलिए यह भी वर्तमान संकट का कारण है। उसे संक्षेप में अगर कहें तो ये सब चीजें मिलकर हमारे सामने एक बड़ी विषम स्थिति उत्पन्न कर रही हैं। अब प्रश्न यह है कि समाधान क्या है ?

पहली बात तो दिशाबोध बहुत आवश्यक है। जब व्यक्ति दिग्भ्रमित हो जाय तो हाथ में कम्पास लेकर दिशाबोध करना पड़ता है। इसलिए पहले तो विश्व को अपनी दिशा को तलाश करना है कि जिस दिशा में हम अभी तक जा रहे थे, वही दिशा सही थी या कोई दूसरी दिशा में जाना है। जब दिशाबोध हो तब चलने का भी परिश्रम सार्थक है। जब दिशा ही गलत चुनी हो तो चलने का परिश्रम भी निरर्थक होगा। इसलिए पहला कार्य तो दिशा बोध का है।

नैतिक प्रश्नों का समाधान तकनीकसे नहीं

दूसरा हम ये समझें कि आज के जो प्रश्न हैं वो तकनीकी प्रश्न नहीं हैं, technical Problems नहीं हैं। Moral Problems है। इसलिए तकनीक से वे हल नहीं होंगे, नीति से हल होंगे । बहुत सारी चीजें जो आजकल कही जा रही हैं कि हमारे यहाँ ये टेकनॉलोजी आ जायगी, कम्प्युटर आ जायेगा । जैसे कि हमारे मन में कभी कभी ये प्रश्न उठता है, अभी हमने सिंस्थेसिस की बात कही, कि क्या कम्प्युटर और भारतीय परम्परा संगत चीजें हैं ? कम्प्युटराईझेशन अगर होगा और इस तरह आप अपनी परम्परा का आधुनिकिकरण करेंगे तो हमारी परम्परा शक्तिशाली होगी कि नष्ट हो जायेगी इस प्रश्न पर विचार करना चाहिये। आजकल इस प्रश्न की बड़ी चर्चा है कि कम्प्युटराईझेशन हो जाय, हम उसको स्वीकार कर लें, हम उसका सदुपयोग करें । प्रश्न सदुपयोग या दुरुपयोग का ही नहीं है। प्रश्न ये है कि यह जो टेकनिक' आप लायेंगे तो फिर भारतीय परम्परा की रक्षा का प्रश्न भूल जाइये । क्योंकि जब मशीन आई तो मशीन के हिसाब से सारा समाज बन जायगा । मार्क्सने एक बड़ी अच्छी बात कही है कि जो technology होती है, वह ideology भी होती है, केवल technology नहीं होती। हमारा प्रश्न यह है कि थोड़ा सा विचार करने की आवश्यकता है कि क्या ये जो तकनीक आ रही हैं, आपकी परम्परा से इसकी संगति बनेगी या नहीं बनेगी। इस तकनीक को अपनाने से आप की परम्परा सुरक्षित होगी या उसके सामने एक नया खतरा पैदा हो जायेगा । इसीलिए मेरा ऐसा मानना है कि तकनीक से नहीं, समाज की रक्षा समाज के संकट का निवारण नीति से होता है। प्रश्न नैतिक है और समाधान तकनीकी ये कैसे हो सकता है ?

भारत को विशेषज्ञ नहीं तत्त्वदर्शी चाहिए

तीसरी बात कि हमें विशेषज्ञों की आवश्यकता नहीं है या कम है। अगर हम यह उम्मीद कर रहे हैं कि राजशास्त्री या राजनीतिज्ञ समाधान निकाल लेंगे, अर्थशास्त्री समाधान निकाल लेंगे, वैज्ञानिक समाधान निकाल लेंगे तो एक बड़ी भ्रान्ति में हम लोग फंसे हुए हैं क्योंकि समाधान ऋषि निकालता है, तत्त्वदर्शी निकालता है, विशेषज्ञ नहीं । क्योंकि तत्त्वदर्शी ही पूरी समस्या को समझ सकता है कि चीज कहाँ से है और कहाँ तक है। राजनीतिशास्त्री, अर्थशास्त्री की दृष्टि तो बड़ी सीमित होती है । वे केवल प्रश्न का एक पहलु जानते हैं। वे उसके सारे पक्षों को नहीं जानते । लेकिन जो तत्त्वदर्शी है उनकी दृष्टि बड़ी विराट होती है। वे अपनी ज्ञान साधना से राजनैतिक, सामाजिक, आर्थिक प्रश्नों को चुटकी में समझ लेते हैं कि इसमें क्या है ? तो इसलिए भारत को आज विशेषज्ञों की आवश्यकता नहीं है, बहुत हैं विशेषज्ञ । विशेषज्ञ जितने बढ़ रहे हैं समस्या उतनी ही उलझ रही है । क्योंकि एक समस्या को हर विशेषज्ञ अपने अपने तरीके से देख कर इसी बात में अपनी विद्वत्ता समझता है कि हमने कोई नया पेच पैदा कर दिया यह विशेषज्ञता है, उलझे हुए प्रश्न को सुलझाना नहीं । विशेषज्ञता सामान्यतः अहंकार को जन्म देती है, 'little learning is dangereous thing' ऐसा कहा भी गया है। और विशेषज्ञता क्या है ? केवल 'little learning' है। भारत को आज समग्र दृष्टि चाहिए. Metaphysicians चाहिए, आचार्य चाहिए, ऋषि चाहिए जो हमारे प्रश्नों को समझकर उनका समाधान निकाले। हमें सुकरात चाहिए, ढेरों राजनेता नहीं चाहिए । एक सुकरात एक हजार सवालों का जवाब दे सकता है और एक प्रश्न - को ढेरों राजनेता भी हल नहीं कर सकते । तत्त्वदर्शन की यह महत्ता होती है । इसलिए अगर इन दो-तीन उपायों को हम अपना सकें तो शायद मार्ग निकल जाये । भारतीय परम्परा निराशावादी नहीं है, आशावादी है। वह यह मानती है कि कोई अन्धकार दीर्घजीवी या चिरंजीवी नहीं होता । और अन्ततः सत्य की विजय होती है। तो यह जो हमारी परम्परा का मूल सिद्धांत है, वो अगर हमें प्रेरित कर सके और हम निराशा में फंसने की बजाय एक सम्यक मार्ग को तलाश कर चल सकें तो शायद हमारा कल्याण होगा। और इन वैश्विक संकटों का समाधान होगा।

References

भारतीय शिक्षा : वैश्विक संकटों का निवारण भारतीय शिक्षा (भारतीय शिक्षा ग्रन्थमाला ५), प्रकाशक: पुनरुत्थान प्रकाशन सेवा ट्रस्ट, लेखन एवं संपादन: श्रीमती इंदुमती काटदरे