वैदिक गणित

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परिचय || Introduction

पश्चिम के देशों में गणित का विकास 14वीं शताब्दी (६0) तक इतना कम था कि स्कूली शिक्षा में जोड़ना और घटाना ही सिखाया जाता था। उससे पूर्व गिनती भी मालूम न होने के कारण शाम को भेड़ें चर कर पूरी की पूरी लौटीं या नहीं यह जानने के लिए एक भेड़ बाड़े में जाती तो एक पत्थर बाड़े से बाहर किया जाता और सभी पत्थर बाहर हो जाने पर निश्चिन्तता की सांस ली जाती कि सारी भेड़ें आ गई।

भारत में इससे बहुत पहले सूर्यमण्डल के सभी ग्रहों की सही गति जानने का गणित विकसित हो चुका था। वेदी शुद्ध बनाने की ज्यामिति विकसित हो चुकी थी। समुद्र में चलने वाली नावों की सही दिशा समझने के लिए नक्षत्र मण्डल की गति जानने का विज्ञान विकसित हो चुका था। प्रकाश की गति जानने का विज्ञान विकसित हो चुका था। प्रकाश की गति का जान और बृत की परिधि नापने की विधि निकाली जा चुकी थी। लीलावती और आर्यभटीय में बीजगणित, चलन -कलन और गति शास्त्र का विकसित रूप मिलता है। ये दोनों ग्रन्थ 19वीं शताब्दी (६0) तक भारत में गणित की पाठ्य पुस्तक के रूप में चलते रहे।

प्राचीन काल में लेखन की सर्वसुलभ व्यवस्था न रहने के कारण सारा ही ज्ञान श्रुति के रूप में प्रकट हुआ। ज्ञान के द्रष्टा ऋषियों ने अपना नाम लेखक के या शोधकर्ता के स्थान पर न रखकर ज्ञान को ईश्वरीय कहा। युग की आवश्यकता के अनुसार गणित की पद्धतियाँ भी ऐसी विकसित हुईं जिनमें अधिक मौखिक और कम ही लिखित कार्य हो। मौखिक होने के कारण सरल भी हुआ। अब से 80-90 वर्ष पूर्व हुए रामानुजन्‌ को जितना काम गणित में करना था उसके लिए उनको औसतन एक दस्ता कागज गेज चाहिए था। धनाभाव के कारण उन्होंने प्राचीन भारतीय गणित की पद्धतियाँ विकसित करने का सारा काम न्यूनतम कागज में किया और कोई 50 वर्ष पूर्व जगद्गुरु स्वामी भारती कृष्णतीर्थ ने इन्हीं पद्धतियों का विकास कर आठ वर्षो की कठिन साधना से अद्भुत कार्य किया।

वैदिक गणित की पद्धतियों का अभ्यास करने पर उत्तर जल्दी निकलता है और गलती होने की संभावना घटती है। कागज कलम की आवश्यकता न्यूनतम होती है और कई बार तो एक पंक्ति में उत्तर लिखना संभव होता है। आजकल प्रतियोगिता का युग है। विभिन्‍न पाठ्यक्रमों में नामांकन हेत परीक्षाएँ होती हैं और सरकारी तथा गैर सरकारी पदों पर चयन हेतु भी परीक्षाएं होती हैं। इनमें गणित के तथा गणित की सहायता से बनने वाले अन्य विषयों के प्रश्न अवश्य होते हैं। इनका हल कम समय में सरलता से और आत्मविश्वास पूर्वक कर सकने वाले परीक्षार्थी को बड़ा लाभ मिलता है। विद्यालय में भी गणित की पाठ्यपुस्तक के प्रश्नों का हल अधिकतर वैदिक गणित की पद्धति से करना इतना सरल है कि गणित से बचने वाले बालक को भी थोड़े अभ्यास के बाद बड़ा आनन्द आने लगता है। साथ ही उसका स्वाभिमान भी जागता है कि अपने देश में कितनी उच्च कोटि का गणित जान रहा है।

ज्ञान और विज्ञान के क्षेत्र में भारत की अद्विनीय देन है। ज्ञान ः विज्ञान का ऐसा कोई क्षेत्र नहीं जिसे प्राचीन भारतीय विद्वानों ने न छुआ हो। इतना ही नहीं, इन विद्वानों ने प्रत्येक आयाम को एक विलक्षण विशिष्ट आधारभूत दिशा दी है। इस ज्ञान विज्ञान के क्षेत्र में गणित की आधारभूत PATA a aed a विशिष्ट हैं। शून्य की कल्पना, संख्या | लेखन की दाशमिक प्रणाली का आविष्कार एवं sat A waa ag 5 का स्वरूप प्राचीन भारत की ऐसी देन है जिसके बिना गणित के क्षेत्र में कोई प्रगति सम्भव नहीं थी। शून्य की संकल्पना में भारतीय मनीषियों का वह स्वभाव प्रकट होता है जिससे वे आध्यात्मिकता की वैचारिक |

अमूर्त अव्यक्त कल्पनाओं को जीवन का सरल अंग बनाने हेतु अत्यंत सहज सरल पद्धतियों का आविष्कार करते थे। प्रो, जे०पी० हालस्टैड ने अपनी पुस्तक “On the Foundation and Technique of Arithmetic में शून्य के आविष्कार के fava A fear @ -

”The importance of the creation of the ZERO mark can never be exaggerated, this is not merely giving a habitation but helpful power in the characteristic of the Hindu Race whence it sprang. It is like coining Nirvana into dynamas. No single mathematical creation has been more potent for the general ongo of intelligence and power.”

दाशमिक प्रणाली और अंकों के स्थानीय मूल्य का स्वरूप भी गणित के क्षेत्र में अद्भुत सृजन है। इनके प्रयोग से गणित विषय के विकास के कपाट खुल गए। इनके बिना एक हजार दो सौ सतासी को 1287 नहीं लिख Gadi क्योंकि अंक 1, जो 7 से छोटा है, मात्र स्थान के क्‍ कारण एक हजार बन गया और 7 सात ही रह गया । गणनाओं के सहज होने के कारण अरब के व्यापारियों ने ये सब संकल्पनाएं भारत से सीखीं। लगभग आठवीं शताब्दी में कंक नाम के हिन्दू विद्वान को उज्जैन से अब्बासईद खलिफजलमनसूर ने बगदाद में गणित एवं गणित ज्योतिष सिखाने के लिए आमंत्रित किया। इनकी सहायता से अरब | विद्वानों ने ब्ह्मादत्त द्वारा लिखित TSEC सिद्धान्त का अरबी भाषा में अनुवाद किया। ra अको को अरब में 'हिदसा' नाम दिया गया। अरब से अंकों की सकल्‍पना यूरोप मे पहची और वहां इन्हें अरबी अंक (Arabic numerals) @T ara दिया गया। यहा यह बात कहने मे अतिशयोक्ति न होगी कि मैकाले की शिक्षा पद्धति के भारत में लागू होने से पूर्व भारतीय पाठशालाओं में गणित शिक्षण में द्रतगगति से गणना की वैदिक गणित विधियों का भरपूर उपयोग होता था। यह बात अलग है कि ''ये विधियां वैदिक काल से ही विकलित होती रही हैं" यह बताने का कार्य पज्य स्वामी भारती कृष्ण तीर्थ जी महाराज ने किया। वैदिक साहित्य के 16 सूत्र और 13 उपसूत्र : Arithmetic, Algebra. Geometry-Plane Solid and Analytical, Trigonometry, Sphere, Conics, Calculus.

वेदिक गणित की कुछ विशेषताएँ नीचे दी जा रही हैं - -

1. आज की दुरूह गणितीय पद्धतियों के कारण शिशुओं एवं प्राथमिक कक्षाओं के विद्यार्थियों के लिए गणित विषय हठआ बन गया है। वैदिक गणित के प्रश्न सरल, सहज एवं शीघ्र हल करने की पद्धतियां उनके लिए इस विषय को रोमांचक एवं आनन्ददायक बना देती हैं। इस आयु में निर्मित गणित अभिरुचि जीवन भर उनके काम आती है और जिज्ञासा बनी रहती है । 2. वैदिक गणितीय पद्धति की स्वाभाविक मानसिक प्रणालियों के नियमित अभ्यास से मस्तिष्क का स्वतः ही सर्वांगीण विकास होने लगता है। यह कम्प्यूटर द्वारा TH Sa करने से सम्भव नहीं है। 3. वैदिक गणित में प्रत्येक गणितीय समस्या को हल करने की अनेक विधियाँ हैं जिनके प्रयोग से विद्यार्थियों में उत्साह, आनन्द, विश्वास और अनुसंधान प्रवृत्ति का जागरण होता है।

4. यह गणित अध्ययन के दृष्टिकोण में क्रांति लाने वाला है तथा शोध एवं विकास के लिए नवीन दृष्टिकोण प्रस्तुत करता है।

5. इस पद्धति में उत्तर की सरल जांच पद्धति सहज रूप में समाविप्ट हे ।

6. वैदिक गणित द्वारा हर भारतीय के हृदय में अपने देश, धर्म, संस्क॒ति और इतिहास के प्रति गौरव की भावना पैदा होती है। इससे अपने महान पूर्वजों के प्रति हमारा मस्तक श्रद्धा से नत हो जाता हे। यह भावना कहने से नहीं आ सकती।

7. वैदिक गणित पद्धति ग्रामीण, वनवासी, गिरिकन्दराओं एवं झुग्गी -ओपड़ी में निवास करने वाले विद्यार्थियों एवं उनके अध्यापकों के लिए विद्या भारती के लक्ष्य के अनुरूप गणित विषय को विशेष रूप से सुखद एवं रोमांचक बनाती है।

वैदिक गणित के सोलह सूत्र एवं उनके अर्थ

1. एकाधिकेन पूर्वेण - पहले से एक अधिक के द्वारा | By one more than the previous one.

2. निखिल नवतश्चरमं दशत: - सभी नौ में से परन्तु अन्तिम दस में से। All from nine and last from ten.

3. ऊर्ध्वतिर्यग्भ्याम्‌ - सीधे (खड़े) और तिरछे दोनों प्रकार से। Vertically and crosswise

4. परावर्त्य योजयेत्‌ - पक्षान्तरण कर उपयोग करें । Transpose and apply.

5. शान्यं साम्यसमुच्चये - समुच्चय समान होने पर शून्य होता है। When the 'Samuchaya’s are the same, that '‘Samuchaya' is zero.

6. आनुरूप्ये शून्यमन्यत्‌ - अनुरूपता होने पर दूसरा शून्य होता है। If one is in ratio, the other one is Zero.

7. संकलनव्यवकलनाभ्यामू _- जोड़कर और घटाकर । By addition and subtraction.

8. प्रणाप्रणाभ्याम्‌ - अपूर्ण को पूर्ण करके। By completing.

9. चलनकलनाभ्याम्‌ - चलन -कलन के द्वारा। | By Calculus.

10. यावदूनम्‌ - जितना कम है अर्थात्‌ विचलन। , The deficiency.

11. व्यष्टिसमष्टि: - एक को पूर्ण और पूर्ण को एक मानते हुए। Whole as one and one as whole.

12 शेषाण्यड्रेन चरमेण - अंतिम अक से अवशेष को । े Remainder by the last digit.

13. सोपान्त्यद्वयमन्त्यन्‌ - अंतिम और उपान्तिम का दगना। Ultimate and twice the penultimate.

14. एकन्यूनेन पूर्वेण - पहले से एक कम के द्वारा । By one less than the previous One.

15. गुणितत्तनुच्चय: - गुणितों का समुच्चय । The whole product.

16. गुणकसमुच्चय: - गुणकों का समुच्चय । Set of multipliers.

उपसूत्र

1. आनुन्प्येण - अनुर्पता के द्वारा । Proportionately.

2. शिष्यते शेषसंज: ' - बचे हुए को शेष कहते हैं । Which remains, is called remainder.

3 SER; ea aed a, aaa अंतिम से। | First by the first and last by the last.

4. केवलै: सप्तक Wa - “क', व', 'ल' से 7 का गुणा करें। Multiply ‘ka’ (1), 'va' (4), ‘la’ (3) by 7 (Formula for 1/7).

5. वेष्टनम्‌ - विभाजनीयता परीक्षण की एक विशिष्ट क्रिया का नाम । The osculation. (A method for divisibility test).

6. यावदून तावदूनम्‌ - जितना कम उतना और कम। What ever deficiency further lessen that much.

7. यावदून तावदूनीकृत्य वर्ग - जितना कम उतना और कम करके वर्ग च योजयेत्‌ की योजना भी करें। Lessen by the deficiency and add its square.

8. अन्त्ययोर्दशकेषपि - अंतिम अंकों का योग cai Sum of last digits is ten.

9. अन्त्ययोरेव - केवल अंतिम द्वारा। Only by the last.

10. समुच्चयगुणित: - सर्व गुणन। Product of whole.

1. लोपनस्थापनाभ्याम्‌ - विलोपन एवं स्थापना द्वारा। By elimination and retention.

12. विलोकनम्‌ - अवलोकन द्वारा। By observing

13. गुणितसमुच्चय: समुच्चयगुणित: - गुणांकों के समूहों का गुणनफल और गुणनफल के गुणांकों का योग समान होगा। Product of the whole is equal to whole of the product.

अन्य विशिष्ट संकल्पनाएँ : -

1. द्न्द्ययोग - द्यात्मक पद। Duplex.

2 Te - शोधित राशि। Purity.

3. ध्वजांक - घात के स्थान का अंक। Flag digit.

वैदिक गणित पाठ्यक्रम

वर्तमान पाठ्यकम मे वैदिक गणित की दृष्टि से कक्षानुसार निम्नलिखित विषयो -उपविषयो का भी समावेश किया जाए :-

शिशु प्रथम

सूत्र -अवलोकनम्‌, एकाधिकेन पूर्वेण, एकन्यूनेन पूर्वेण । द

1. बड़ा -छोटा, लबा-नाटा, थोड़ा -अधिक, मोटा -पतला, दूर -पास, ऊँचा -नीचा इनमें अधिक, न्यून तथा बराबर की कल्पना समझाना (विभिन्‍न राधनों से)

2. आगे-पीछे, पहले-बाद में, अंदर-बाहर की कल्पना (विभिन्न साधनों से)

3. सीधी गिनती (एकाधिकेन पूर्वेण का प्रयोग) उल्टी गिनती, शून्य की कल्पना (एक न्यूनेन पूर्वेण का प्रयोग)।

4. अंकों की पहचान-समानता व असमानता के कारण, भ्रम एवं निवारण। (विभिन्‍न साधनों के कटआउट, अंगुली घुमाना, रेत पर लिखना आदि)

5. सरख्यांक-पहला, दूसरा आदि (विभिन्न साधनों से)

6. परम मित्र कल्पना (1 का 9, 2 का 8, 3 का 7, 4 का 6, 5 का 5- ये परस्पर परम मित्र हैं एवं पूरक अंक हैं।)

7. समय का ज्ञान - प्रातः, दोपहर, साय॑, रात्रि ।

8. a wm नाम, दिनों के नाम

9. आकृतियों की पहचान-धीरे -धीरे अंकों की आकृति तक पहुंचना।

10. गीत के माध्यम से सूत्र याद करना ।

11. एक-एक कंकड़ लेकर एकन्यूनेन कराते हुए शून्य ash ले जाना एवं शून्य के चिह्न की प्राथमिक जानकारी । सारे क्रिया -कलाप गीत, कहानी व खेल के माध्यम से करना ।

शिशु द्वितीय

सूत्र- शिशु प्रथम के अनुसार 1. पुनरावृत्ति, दहाइयों में गिनती, | से 100 तक गिनती (उल्टी भी)

2. उनन्‍नीस, उनतीस, उनसठ आदि का अर्थ तथा अभ्यास।

3 कुछ अन्य आकृतियाँ ।

4 कुछ तिथियों के नाम - अमावस्या, पूर्णिमा । 5. 1 से 9 तक जोड़ना, घटाना । (सूत्रों का प्रयोग)

कक्षा प्रथम

सूत्र - निखिल नवत: चरम दशत: एवं पहले के सूत्र पुनरावृत्ति -

1. परम मित्र की सहायता से जोड़ना । पूरक अंक की सहायता से Ger (2 में क्‍या जोड़ें कि 7 बन जाए ।) 2. निखिल सूत्र का अर्थ (एक एक शब्द का) तथा अभ्यास । 3. निखिल की सहायता से घटाना (मोखिक)

4. संख्याओं के नाम 1-100 (मौखिक)

5. 2-2, 4-4, 5-5, 10-10 करके गिनना ।

6. आकृतियाँ

7. घड़ी में घंटे की सई - waa, van, पूरक का अभ्यास, समय देखना । (केवल घंटे) 8. सख्याओं को दुगुना करना । 9. तुलना <, >, ८ 10. क्रम ज्ञान - पहले, बाद में, बीच में, 11.  ऋणांक (विनकुलम्‌) की कल्पना। 12. 1 से 10 तक पहाड़े। 13. बढ़ता-घटता क्रम। 14. मुद्रा-सिक्के का ज्ञान (मोखिक) । 15. हिन्दी अंक लेखन 16. 10 से 99 तक जोड़ना, घटाना।

कक्षा द्वितीय

सूत्र :- ऊर्ध्वतिर्यग्भ्याम्‌ एवं पूर्व के सूत्र

1.  पुनरावृत्ति

2. संख्या ज्ञान - 10 से 99१, संख्या व नाम ।

3. योग - 100 से 999, योगफल 999 से अधिक न हो, योग की जांच विधि (9 पर विभाजित करने पर शेष)

4. Gat 1 से 20 त्क। 5. ert 1 a0 ae afee afta a fafa a, 6. घटाना - तीन अंकों तक (परम मित्र अक, निखिल सूत्र) 7. गृणा - एक अक का एक अक से, दो अंकों की सख्याओं का ऊध्वीतिर्यक्‌ एव निखिल सूत्रों से। 8. शून्य और एक की विशेषता। ऋणांक (विनकुलम) का अभ्यास, रेखाक परिचय। 2 अंकों की सामान्य Sean a विनकुलम में तथा विनकूलम सरख्या को सामान्य सरव्या में बदलना।

9. मापों का ज्ञान एवं परस्पर विनिमय -क्रियात्मक पद्धति से (क) मुद्रा-रुपए व पैसे (@) तौल-ग्राम, किलोग्राम (ग) लन्‍्बाई-किलोमीटर, मीटर, सेंटीमीटर (घ) धारिता-लीटर, मिलिलीटर (च) समय-घंटा, मिनट, सेकण्ड

10. घड़ी एवं कैलेण्डर देखना, पढ़ना

11. भिन्‍न की संकल्पना (1/2, 1/4, 1/8 ) दैनिक जीवन में उपयोग

12. ज्यामिति -वृत्ताकार, चौकोर, तिकोनी आकृतियाँ, गोलाकार, घनाकार, बैलनाकार (पर्यावरण में उपलब्ध वस्तुओं से)

कक्षा तृतीय

सूत्र :-पूर्व के सूत्र

1. पुनरावृत्ति

2 Fel ज्ञान - पहचानना, पढ़ना, लिखना, स्थानीय मान, प्रसारित संकेतन -शून्‍्य की विशेषता, तुलना, हिन्दी और अंग्रेजी अंकों का ज्ञान।

3. जोड़ना - 10,000 तक (विधियाँ पूर्ववत्‌) समस्यात्मक प्रश्न व उत्तर की जांच।

4. व्यवकलन -10,000 तक (विधियाँ पूर्ववत्‌), व समस्यात्मक प्रश्न। उत्तर की जाँच। (1 से शेष विधि)

5. विनकुलम का अभ्यास (3अंक की सरव्या) विनकुलम से सामान्य सर्या में परिवर्तन।

6. गुणा-शून्यांत गुणा, गृुण्य अधिकतम 3 अंक व गुणक 2 अंक। व्यावहारिक प्रश्न। विचलन का पूर्वाभ्याम (आधार के निकट की संख्याएँ)

7 पहाड़ा ॥ से 20 तक (वैदिक विधि से)

8. भाग -चिह्न का ज्ञान

9. चारों मूल क्रियाओं पर आधारित जोड़ने व घटाने के प्रडन । मिश्रित प्रशन (निखिल सूत्र) एक साथ हल करना ।

10. रोमन सख्याएँ | से 12 तक - इनकी सीमाएँ, भारतीय पद्धति से तुलना।

11. मापन इकाइयाँ - जोड़ना, घटाना-व्यावहारिक प्रयोग ।

12. समय - घडी देखना - 1/4, 1/2, 3३/4 का ज्ञान |

13. भिन्‍न-अंश, हर का ज्ञान । (अंश 1 व हर 10 सें बड़ा न हो) तुल्य भिन्‍न |

14. ज्यामिति-रेखाखण्ड, किरण, रेखा । (सूत्र -अवलोकनम्‌) | कोण, समकोण, वर्ग, आयत, त्रिभुज एवं वृत्त, घन, घनाभ, बेलन, शंक्‌, गोला ।

कक्षा चतुर्थ

1. पुनरावृत्ति

2. गणना - एक करोड़ तक (इकाई, दहाई .........)

3. विनकलम्‌ (4 अंकों की सामान्य संख्या को विनकुलम में तथा विनकुलम संख्या को सामान्य संख्या में बदलना )।

4. गुणा - ऊर्ध्वतिर्यक्‌ सूत्र (३3 HH x 3 WH) |

5. गुणा - विनकुलम संख्याओं का (1 अंक ५1 अंक, 2 अंक ५ 2 अंक)

6 भाग - निखिल सूत्र (भाजक 2 अंक), परावर्त्य (भाजक 2 अंक), ध्वजांक (भाजक 2 अंक )

7. वर्ग-एकाधिकेन पूर्वेण ।

8. लघुतम समापवर्त्य (विलोकनम्‌ एवं अनुरूप्येण विधि), महत्तम समापवर्तक (संकलन -व्यवकलनाभ्यां विधि)।

9. Pra - जोड़ना, घटाना (हर समान) ।

10. विभाजनीयता 2,3,5,7,9,1,13 (विलोकनम्‌ व लिख कर) (मौखिक प्रश्नों का आग्रह प्रत्येक कक्षा में)

कक्षा पंचम

1. पुनरावृत्ति

2 गुणा - ऊरध्व तिर्यक (4 अक ५४ 4 अक)

3. भाग - ध्वजाक-भाज्य 4, 5 अंक, भाजक - 2 अंक, निखिल-

3 HR

4... भिन्‍न का गुणा, भाग

5... दशमलवों का जोड़, घटाना, गुणा, भाग।

6. साधारण ब्याज, समानुपात, प्रतिशत

7. विभाजनीयता - 7, 1, 13

8. वर्ग (सभी विधियाँ द्वन्द्र योग छोड़कर)

9. क्षेत्रफल

10. घन

11. आयतन

कक्षा षष्ठ

1. सख्याएँ :- अंक, धनात्मक अंक, ऋणात्मक HH, tan, Ge, se, उपाधार, परममित्र अंक, पड़ोसी अंक, निखिल अंक, चरम अंक ।

2. जोड़ना, घटाना, गुणा, भाग की सामान्य जानकारी, जोड़ना- उपसूत्र -एकाधिक चिह्न “सूत्र -एकन्यूनेन पूर्वण । गुणा -एकन्यूनेन पूर्वेण, एकाधिकेन पूर्वेण । आधार wa SEM Gen से विचलन विधि, ऊर्ध्वतिर्यग्भ्याम्‌ विधि, दो अंकों, तीन अंकों वाली दो संरख्याओं, तीन सरव्याओं का आपस में गुणा । भाग -परावर्त्य योजयेत्‌, ऊर्ध्वतिर्यग्भ्याम्‌ -ध्वजांक, एकाधिकेन पूर्वेण।

3. गृुणनखंड :-

3.1 विभाजनीयता - (2, 3, 4, 5, 6, 7, 6, 9, 1, 13, 15,17, 19, 23, 29 @)

3.2. महत्तम समापवर्तक -संकलन व्यवकलनाभ्यां विधि

3.3 लघुतम समापवर्त्य -विलोकनम्‌ एवं आनुरूप्येण विधि। बीजगणित : - 1. गुणा - ऊर्ध्वतिर्यग्भ्याम्‌ विधि

2. भाग - परावर्त्य योजयेत्‌

3. सरल समीकरण - विलोकनम्‌, शून्यं साम्यसमुच्चये'

कक्षा सप्तम

अंकगणित गुणा, बीजांक से जाँच

बीजगणित

1. व्यंजकों का गुणनखण्ड (आद्यम्‌ आद्येन अन्त्यम्‌ अन्त्येन)

2. द्विबीजीय व्यंजकों के गुणनखण्ड

रेखागणित

1... बोधायन संख्याएँ गए आर 9 8 7 x

2. इनमें से किस समूह से समकोण त्रिभुज बनता है।

a. 5, 12, 14

' b. 7, 24, 26

०. 8, 15, 18

0. 9, 40, 41

कक्षा अष्टम

अंकगणित :-

1. (क) वर्ग -यावदूनं तावदूनीकृत्य वर्ग च योजयेत्‌

(ख) वर्गमूल-4 अंकों तक की पूर्ण वर्ग संख्या का विलोकनम्‌ विधि से।

(ग) ७6 अंकों तक की पूर्ण वर्ग संख्या का वर्गमूल निकालना।

(a) इन्द्र योग विधि से वर्गनूल निकालना।

2. (क) घन- आनुरुप्येण विधि, निखिलम्‌ विधि। |

(स्व) घनमूल - ७ अको तक की पूर्ण घन सख्या का विलोकनम्‌ से।

(ग) 9 अकों की सर्या तक का घनमूल निकालना।

3. यक्रवृद्धि ब्याज एवं समय-गति में गुणा का प्रयोग

4. तीन सरव्याओं का, तीन-तीन अंको का गुणा । (आधार एवं निस्विल सूत्र का प्रयोग)

क्षेत्रमिति -

1 क्षेत्रफल, पृष्ठीय क्षेत्रफल, आयतन, कमरे की चारों दीवारों का पृष्ठीय क्षेत्रफल

बीजगणित

1. गुणन (ऊर्ध्वत्तियग्भ्याम्‌ विधि)

2. बीजीय व्यंजकों के गुणनखवण्ड

(क) ०४/2+ ७५ + ८ (विलोकनम्‌ द्वारा)

(ख) ०४२- ७२ (संकलन -व्यवकलनाभ्याम्‌ विधि) द

3. बीजीय व्यंजक के भाग

3.1. एकपदीय से परावर्त्य योजयेत्‌ द्वारा भाग

3.2. अहुपदीय से भी भाग |

4. तरल सनीकरण (शून्यं साम्य समुच्चये) क्‍

5. युगपत्‌ समीकरण (ऊर्ध्वतिर्यग्भ्याम्‌ एवं परावर्त्य योजयेत्‌) क्‍ ध्यान रहे कि उपर्युक्त पाठ्यक्रम अनम्य (Rigid) नहीं है । यह लचीला है और प्रत्येक प्रांत अपने सामान्य्र गणित पाठ्यक्रम के अनुसार आवश्यक परिवर्तन कर सकता है |

वेदिक गणित की चमत्कारी झलकियाँ

References

वैदिक गणित : निर्देशिका, जगद्गुरु शंकराचार्य श्री भारतीकृष्णतीर्थ जी महाराज, विद्या भारती अखिल भारतीय शिक्षा संस्थान, लखनऊ.