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तीर्थस्थान पवित्र है क्योंकि वहाँ जाने वाले हजारों यात्रियों के मन के सद्भाव और सद्वृत्तियों का वहाँ पुंज बनकर वातावरण को अभिमन्त्रित करता है। वह कल्याणकारी है इसलिये पवित्र है।
 
तीर्थस्थान पवित्र है क्योंकि वहाँ जाने वाले हजारों यात्रियों के मन के सद्भाव और सद्वृत्तियों का वहाँ पुंज बनकर वातावरण को अभिमन्त्रित करता है। वह कल्याणकारी है इसलिये पवित्र है।
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ज्ञान पवित्र है क्योंकि वह मुक्ति दिलाता है, सबको सज्जन बनाता है, हिंसा कम करता है, सद्भाव बढाता है,
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ज्ञान पवित्र है क्योंकि वह मुक्ति दिलाता है, सबको सज्जन बनाता है, हिंसा कम करता है, सद्भाव बढाता है, विवेक और विनय सिखाता है।
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अपवित्र हैं ?
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सन्तजन पवित्र हैं क्योंकि वे भी यही कार्य करते हैं । पुस्तक पवित्र है क्योंकि वह ज्ञान का प्रतीक है ।
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अर्थात् कोई भी पदार्थ, व्यक्ति, व्यवस्था जब जीवनरक्षक, संस्काररक्षक, सद्भावरक्षक होते है, शुभ, कल्याणकारी होते है तब वह पवित्र होते है।
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==== पवित्रता का व्यावहारिक सूत्र ====
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पवित्रता का जतन करना चाहिये । पवित्रता के प्रति व्यवहार करने के भी तरीके हमारी परम्परा ने बनायें हैं । जैसे कि -
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* पवित्र वस्तु को अस्वच्छ नहीं किया जाता, अस्वच्छ स्थान पर रखा नहीं जाता, अस्वच्छ वस्तुओं के साथ नहीं रखा जाता।
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* पवित्र वस्तु के पास अस्वच्छ रहकर जाया नहीं जाता ।
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* पवित्र वस्तु के प्रति मन में दुर्भाव नहीं रखा जाता।
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* पवित्र वस्तु का प्रयोग अनुचित उद्देश्यों की पूर्ति के लिये नहीं किया जाता।
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* पवित्र वस्तु को अपवित्र भाव से दूषित नहीं किया जाता।
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भारतीय मानस को पवित्र वस्तु के साथ कैसा व्यवहार करना चाहिये यह सहज समझता है । केवल पवित्र वस्तु को पवित्र नहीं मानते तभी गडबड होती है ।
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वर्तमान में विद्यालय को पवित्र नहीं माना जाता इसलिये अनेक अकरणीय बातें होती हैं ।
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==== विद्यालय मन्दिर है ====
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विद्या पवित्र है। विद्यालय में पवित्रता बनाये रखना चाहिय यह सहज अपेक्षा है ।
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==== क्या किया जा सकता है ? ====
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* विद्यालय में पादत्राण पहनकर नहीं जाना । इसके लिये विशेष व्यवस्था करनी चाहिये ।
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* विद्यालय में आत्यन्तिक स्वच्छता होनी चाहिये ।
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* विद्यालय में शैक्षिक सामग्री का सम्मान किया जाना चाहिये । पुस्तक को पैर नहीं लगाना ऐसा ही एक आचार है।
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* बिना स्नान किये विद्यालय में नहीं आना ऐसा भी एक आचार है।
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* अपवित्र, अमेध्य भोजन कर अध्ययन नहीं किया जाता यह स्वाभाविक सत्य है।
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* किसी का अकल्याण करने हेतु विद्या का उपयोग करना उसे अपवित्र बनाना है, किसी के भले के लिये विद्या का प्रयोग करना उसकी पवित्रता की रक्षा करना है।
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* पानी के स्थान को, भोजन के स्थान को, अध्ययन के स्थान को स्वच्छ और सम्मानित रखना पवित्रता है।
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* व्यापक अर्थ में प्लास्टिक का प्रयोग करना भी विद्याकेन्द्र को दुषित करना ही है। आज हमने अपने आपको चारों और से सिन्थेटिक वस्तुओं से घेर परन्तु विद्यालय परम्परा से पवित्र स्थान है क्योंकि अपवित्र हैं ?
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अर्थात् पवित्रता की भावना को तिलांजलि देकर हमने जीवन को सांस्कृतिक धरातल से गिराकर भौतिक स्तर पर ला दिया है, संस्कृति और भौतिकता का सम्बन्ध विच्छेद कर दिया है और अपने आपको संकटग्रस्त बना लिया है।
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संकटों के कठिन कवच को तोडकर उससे मुक्त होने में पवित्रता का जतन करने की आवश्यकता है।
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=== विद्यालयों के लिए विचारणीय ===
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विद्यालय समाज के निर्माण, स्वास्थ्य, सुखसुविधा, संस्कारिता और ज्ञान के महत्त्वपूर्ण केन्द्र हैं। वर्तमान में कुछ समस्यायें वैश्विक व्याप्ति लिये हुए हैं। इनमें मुख्य समस्यायें स्वास्थ्य, संस्कारिता और पर्यावरण से सम्बन्धित हैं। विद्यालय में आने वाले छात्र का स्वास्थ्य सामान्यतः कमजोर होता है। आँख, कान आदि ज्ञानेन्द्रियों की अनुभव शक्ति, हाथ पैर आदि कर्मेन्द्रियों की कार्यकुशलता, श्वसनतन्त्र, चेतातन्त्र, पाचनतन्त्र आदि की मन्दता और सारे
    
समय मूल्यवान है ।
 
समय मूल्यवान है ।
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