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शिक्षा के और गुरुकुल के सन्दर्भ में यह एक ऐसी व्यवस्था है जिसका नाम अत्यन्त आदर और गौरव के साथ लिया जाता है। छात्र जब अपना अध्ययन पूर्ण करता है और समावर्तन संस्कार के बाद गुरुकुल छोड़कर अपने घर की ओर प्रस्थान करता है तब वह गुरुदक्षिणा देता है।
 
शिक्षा के और गुरुकुल के सन्दर्भ में यह एक ऐसी व्यवस्था है जिसका नाम अत्यन्त आदर और गौरव के साथ लिया जाता है। छात्र जब अपना अध्ययन पूर्ण करता है और समावर्तन संस्कार के बाद गुरुकुल छोड़कर अपने घर की ओर प्रस्थान करता है तब वह गुरुदक्षिणा देता है।
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गुरुदक्षिणा शब्द हमारे देश में अत्यधिक प्रचलित है।
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गुरुदक्षिणा शब्द हमारे देश में अत्यधिक प्रचलित है। इसे श्रद्धा के भाव से देखा जाता है। भाव एवं अर्थ (धन) इन दोनों महत्त्वपूर्ण पक्षों का एक साथ विचार करके गुरुदक्षिणा से सम्बन्धित कुछ बिन्दुओं को स्पष्ट करने का प्रयास यहाँ किया गया है -
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आहति देने योग्य पदार्थ ही अहम माना जाता था। किन्तु इसका लाक्षणिक अर्थ है, गुरु के लिये उपयोगी हो ऐसा कुछ न कछ लेकर जाना। क्या
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१. विद्याध्ययन पूरा कर जब शिष्य अपने घर लौटता है और गृहस्थाश्रम स्वीकार करता है, तब जाते समय अथवा जाने के पश्चात् गुरु को दक्षिणा अर्पित करता है। दक्षिणा अर्थात् द्रव्य, द्रव्य अर्थात् पैसा जो मुख्यतया नकद राशि के स्वरूप में होता है। कभी कभी नकद राशि के स्थान पर उसके विकल्प में उसका स्थान ले सके ऐसी वस्तुएँ भी दक्षिणा में दी जाती हैं।
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आज हर विद्यालय सशुल्क ही चलता है । इसमें किसी को आपत्ति भी नहीं होती । विद्यालय की शुल्कव्यवस्था इस प्रश्नावली के प्रश्न पुछकर कुछ लोगों से बातचीत हुई उनसे प्राप्त उत्तर इस प्रकार रहे -  
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२. गुरुदक्षिणा विद्याध्ययन पूर्ण होने के पश्चात् ही दी जाती है, पहले नहीं।
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३. गुरुदक्षिणा विद्याध्ययन आरम्भ करने से पहले निश्चित नहीं की जाती। यह विद्याध्ययन का शुल्क नहीं है और प्रवेश पूर्व की कोई निर्धारित शर्त भी नहीं है।
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४. गुरु कभी गुरुदक्षिणा माँगते नहीं, इसका अनुपात भी  गुरु निश्चित नहीं करते।
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५. गुरुदक्षिणा अर्पित करना अथवा नहीं, यह शिष्य निश्चित करता है। कितनी और कब अर्पित करना यह भी शिष्य ही निश्चित करता है। इस प्रकार गुरुदक्षिणा शिष्य के लिए एच्छिक है, अनिवार्य नहीं।
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६. गुरुदक्षिणा एच्छिक होते हुए भी कोई भी शिष्य गुरुदक्षिणा अर्पित किये बिना नहीं रहता था। अध्ययन पूर्ण करने के बाद भी गुरुदक्षिणा अर्पित नहीं करना, यह शिष्य के लिए अपराध माना जाता था। यह कानूनी अपराध नहीं, नैतिक और सामाजिक अपराध माना जाता है।
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७. गुरुदक्षिणा की गणना इस आधार पर नहीं होती थी कि गुरु ने कितना और कैसा पढाया है। शिष्य की देने की क्षमता के अनुसार ही दी जाती है। कम कमाने वाला व्यक्ति कम और अधिक कमाने वाला अधिक देता है, यह स्वाभाविक है।
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८. विशेष संयोग के समय शिष्य गुरु से उनकी अपेक्षा  पूछता है, तब गुरु । आवश्यकतानुसार अपेक्षा व्यक्त भी करता है। परन्तु यह भी शिष्य की क्षमताओं का अनुमान लगाकर ही बताई जाती है। शिष्य के द्वारा स्वयं पूछने के बाद और गुरु के द्वारा अपेक्षा व्यक्त कर देने के पश्चात् यदि शिष्य वह अपेक्षा पूर्ण नहीं करता तो यह शिष्य के लिए मरण योग्य बात हो जाती है।
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९. गुरुदक्षिणा अर्पित करने में गुरु के प्रति शिष्य की कृतज्ञता व्यक्त होती है। गुरु इसे अपना अधिकार नहीं मानते फिर भी शिष्य इसे अपना कर्तव्य मानते
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१०. सामर्थ्य होते हुए भी गुरुदक्षिणा नहीं देना, जितना सामर्थ्य है उससे कम देना इसकी कल्पना भी शिष्य के मन में नहीं आती।
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११. अधिक गुरुदक्षिणा का गुरु के ऊपर प्रभाव पड़ेगा और शिष्य गुरु से अपने हित की बात करवा सकेगा अथवा गुरु इसके प्रति पक्षपात करेंगे यह भी कल्पना से परे की बात है।
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१२. गुरुदक्षिणा की कल्पना कर गुरु धनवान शिष्यों को खोजें अथवा वे ही पढ़ने आयें, इसकी इच्छा करें ऐसा भी नहीं होता। धनवान हो चाहे निर्धन, गुरु पढ़ने योग्य बौद्धिक एवं चारित्रिक पात्रता देखकर ही प्रवेश देते हैं। गुरुदक्षिणा मिलेगी अथवा नहीं इसका विचार किये बिना गुरु तो उन्हें उनकी पात्रता के अनुसार ही पढ़ाते हैं।
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गुरुदक्षिणा के सम्बन्ध में इतने तथ्यों को समझने के पश्चात् इसके आर्थिक पक्ष से जुड़े कुछ निष्कर्ष भी निकलते हैं, जो इस प्रकार हैं -
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१. गुरुदक्षिणा से गुरु का जीवन निर्वाह होता है। परन्तु यह मात्र गुरु का व्यक्तिगत निर्वाह नहीं होता। गुरु का गुरुकुल होता है, सम्पूर्ण गुरुकुल का निर्वाह इससे होता है।
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२. तथापि गुरुदक्षिणा का नियमन और सूत्रसंचालन गुरु के हाथ में नहीं होता। इसी प्रकार गुरु और शिष्य के अतिरिक्त अन्य किसी तीसरे पक्ष के (आज की भाषा
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आहति देने योग्य पदार्थ ही अहम माना जाता था। किन्तु इसका लाक्षणिक अर्थ है, गुरु के लिये उपयोगी हो ऐसा कुछ न कछ लेकर जाना। क्या आज हर विद्यालय सशुल्क ही चलता है । इसमें किसी को आपत्ति भी नहीं होती । विद्यालय की शुल्कव्यवस्था इस प्रश्नावली के प्रश्न पुछकर कुछ लोगों से बातचीत हुई उनसे प्राप्त उत्तर इस प्रकार रहे -
    
१. विद्यालय का खर्च पूरा होने के लिए की गई व्यवस्था को शुल्क मानते हैं । बिना शुल्क विद्यालय चलाना असंभव है।  
 
१. विद्यालय का खर्च पूरा होने के लिए की गई व्यवस्था को शुल्क मानते हैं । बिना शुल्क विद्यालय चलाना असंभव है।  
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