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==== शिक्षा को बाजारीकरण से मुक्त करना ====
 
==== शिक्षा को बाजारीकरण से मुक्त करना ====
इसी प्रकार गणवेश, बस्ता, वाहन, विद्यालय में पानी, पंखे, मेज-कुर्सी आदि अनेक बातें ऐसी हैं जिन्हें लेकर बेसुमार खर्च होता है । ट्यूशन और कोचिंग भी भारी
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इसी प्रकार गणवेश, बस्ता, वाहन, विद्यालय में पानी, पंखे, मेज-कुर्सी आदि अनेक बातें ऐसी हैं जिन्हें लेकर बेसुमार खर्च होता है । ट्यूशन और कोचिंग भी भारी खर्च करवाते हैं। कई इण्टरनेशनल स्कूलों का प्राथमिक विद्यालयों का शुल्क एक लाख रुपये के लगभग होता है। जो भी लोग इस खर्च के निमित्त बन रहे हैं वे सब भगवती सरस्वती के और समाज के अपराधी हैं। ज्ञान के क्षेत्र के ये बड़े कंटक हैं। इन कंटकों का उपाय करने की आवश्यकता है ।
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एक बार शिक्षा का बाजारीकरण हुआ तो ये सारी बातें अपने आप जन्म लेती हैं। बाजारीकरण से शिक्षा विकृत हो गई है। उसने अपना स्वाभाविक रूप ही खो दिया है । परन्तु इन संकटों के साथ एक-एक कर लड़ने से समस्या हल नहीं होगी। किसी विषवृक्ष के पत्ते या फूलों को एक के बाद एक तोड़ने से या टहनियाँ काटने से विषवृक्ष नष्ट नहीं होता है । अभी हम जिन बातों की चर्चा कर रहे हैं, वे बाजारीकरण रूपी विषवृक्ष की टहनियाँ, फूल और पत्ते हैं। जिस प्रकार पत्ते आदि असंख्य होते हैं उसी प्रकार ये उदाहरण भी असंख्य हैं । जिस प्रकार एक टहनी काटो तो दूसरी निकल आती है, कई बार तो एक के स्थान पर एक से अधिक आती हैं उसी प्रकार आर्थिक अनाचार का एक किस्सा निपटाओ तो और अनेक नये किस्से पैदा होंगे। बाजारीकरण के वृक्ष का बीज है वही जड़वादी, अनात्मवादी, कामकेन्द्री, अर्थाधिष्ठित जीवनदृष्टि । यह वृक्ष जब फलता-फूलता है तब इसी प्रकार कहर ढाता है और उसे कैसे नष्ट करें, यह भी समझ से परे हो जाता है । यह ऐसा वृक्ष है और ऐसे इसके फल और फूल हैं जो दिखने में और चखने में अच्छे लगते हैं परन्तु परिणाम हानि और नाश ही होता है। श्रीमद भगवद गीता ने इसे तामस सुख कहा है।<blockquote>'''यदने चानुबन्धे च सुखं मोहनमात्मनः ।'''</blockquote><blockquote>'''निद्रालस्यप्रमादोत्थं तत्तामसमुदाहृतम् ।।'''</blockquote>अतः इन उदाहरणों के सम्बन्ध में अधिक समय और शक्ति खर्च करने के स्थान पर और बातों पर विचार करना चाहिये, और पहलुओं पर ध्यान देना चाहिये ।
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फिजूलखर्ची का एक नमूना बढ़ती हुई ट्यूशनप्रथा और कोचिंग क्लास का प्रचलन भी है। यह खर्चीला मामला तो है ही, साथ में यह समय और शक्ति का भी
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आहति देने योग्य पदार्थ ही अहम माना जाता था। किन्तु इसका लाक्षणिक अर्थ है, गुरु के लिये उपयोगी हो ऐसा कुछ न कछ लेकर जाना। क्या
 
आहति देने योग्य पदार्थ ही अहम माना जाता था। किन्तु इसका लाक्षणिक अर्थ है, गुरु के लिये उपयोगी हो ऐसा कुछ न कछ लेकर जाना। क्या
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