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२४. इस प्रकार के दृष्टिकोण के परिणामस्वरूप समाज में श्रद्धा और विश्वास आधारभूत तत्त्व बनते हैं । इससे निर्शिताता आती है । चिन्ता एवं मानसिक तनाव पैदा ही नहीं होते । इस स्थिति में स्वास्थ्य, सुरक्षा, शान्ति, समृद्धि और सुख,स्वाभाविक हो जाते हैं ।
 
२४. इस प्रकार के दृष्टिकोण के परिणामस्वरूप समाज में श्रद्धा और विश्वास आधारभूत तत्त्व बनते हैं । इससे निर्शिताता आती है । चिन्ता एवं मानसिक तनाव पैदा ही नहीं होते । इस स्थिति में स्वास्थ्य, सुरक्षा, शान्ति, समृद्धि और सुख,स्वाभाविक हो जाते हैं ।
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२५, एकमात्र आत्मीयता के मूल्य से इतना लाभ होता है । जहां स्वकेन्द्री विचार है वहाँ स्वयं के हितों की रक्षा के लिए हमेशा चिन्ता रहती है, अपने जानमाल की रक्षा के लिए सावधानी रखनी पड़ती है, अपने फायदे के लिए ही सारा व्यवहार होता है ।
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२५, एकमात्र आत्मीयता के मूल्य से इतना लाभ होता है । जहां स्वकेन्द्री विचार है वहाँ स्वयं के हितों की रक्षा के लिए सदा चिन्ता रहती है, अपने जानमाल की रक्षा के लिए सावधानी रखनी पड़ती है, अपने फायदे के लिए ही सारा व्यवहार होता है ।
    
२६. समाज में परस्पर विश्वास का अभाव रहता है, पुलिस, न्यायालय, जेल,हॉस्पिटल, अनाथालय, वृद्धाश्रम आदि की संख्या बढ़ती है ।
 
२६. समाज में परस्पर विश्वास का अभाव रहता है, पुलिस, न्यायालय, जेल,हॉस्पिटल, अनाथालय, वृद्धाश्रम आदि की संख्या बढ़ती है ।
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६५. जड़ तन्त्र को लगता है कि सुविधा होने से छात्र शिक्षा ग्रहण करेंगे। अत: यह तन्त्र छात्रों को निःशुल्क शिक्षा देने की, पाठ्यपुस्तकें देने की, भोजन देने की, गणवेश देने की व्यवस्था करता है । इसमें सदूभाव होता है । परन्तु यह जड़ सद्धाव है । छात्रों के परिवार को सहायता मिलती है परन्तु छात्र शिक्षा ग्रहण नहीं करते । शिक्षा जिज्ञासा के कारण ग्रहण कि जाती है, सुविधा प्राप्त होने से नहीं । जिज्ञासा जागृत करने का काम सुविधा के बस की बात नहीं है ।
 
६५. जड़ तन्त्र को लगता है कि सुविधा होने से छात्र शिक्षा ग्रहण करेंगे। अत: यह तन्त्र छात्रों को निःशुल्क शिक्षा देने की, पाठ्यपुस्तकें देने की, भोजन देने की, गणवेश देने की व्यवस्था करता है । इसमें सदूभाव होता है । परन्तु यह जड़ सद्धाव है । छात्रों के परिवार को सहायता मिलती है परन्तु छात्र शिक्षा ग्रहण नहीं करते । शिक्षा जिज्ञासा के कारण ग्रहण कि जाती है, सुविधा प्राप्त होने से नहीं । जिज्ञासा जागृत करने का काम सुविधा के बस की बात नहीं है ।
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६६. जड़ तन्त्र कभी दायित्वबोध की, निष्ठा की, छात्र के कल्याण की भावना की शिक्षा नहीं दे सकता । अत: शिक्षकों में, या तन्त्र सम्हालने वाले लोगोंं में ये तत्त्व प्रभावी होंगे ऐसी अपेक्षा नहीं की जा सकती । इस स्थिति में मनुष्य का मन उसे और स्वैराचारी बनाता है । अनिबंध मन हमेशा पानी की तरह नीचे की ओर बहता है, अर्थात दायित्वबोध, निष्ठा आदि से भागता है। मन को सज्जन बनाने की व्यवस्था किए बिना शिक्षा का कार्य अध्यापक, छात्र या तन्त्र के लिए कदापि संभव नहीं है ।
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६६. जड़ तन्त्र कभी दायित्वबोध की, निष्ठा की, छात्र के कल्याण की भावना की शिक्षा नहीं दे सकता । अत: शिक्षकों में, या तन्त्र सम्हालने वाले लोगोंं में ये तत्त्व प्रभावी होंगे ऐसी अपेक्षा नहीं की जा सकती । इस स्थिति में मनुष्य का मन उसे और स्वैराचारी बनाता है । अनिबंध मन सदा पानी की तरह नीचे की ओर बहता है, अर्थात दायित्वबोध, निष्ठा आदि से भागता है। मन को सज्जन बनाने की व्यवस्था किए बिना शिक्षा का कार्य अध्यापक, छात्र या तन्त्र के लिए कदापि संभव नहीं है ।
    
६७. वर्तमान भारत में एक अतार्किक धारणा साक्षरता को शिक्षा मानती है । पढ़ना और लिखना आने से न ज्ञान आता है न संस्कार । पढ़ने लिखने से ही जानकारी भी नहीं मिलती । साक्षरता अलग है, शिक्षा अलग यह बात अनेक मंचों से बार बार बोली जाती है परन्तु तन्त्र के कानों पर जूं भी नहीं रेंगती ।
 
६७. वर्तमान भारत में एक अतार्किक धारणा साक्षरता को शिक्षा मानती है । पढ़ना और लिखना आने से न ज्ञान आता है न संस्कार । पढ़ने लिखने से ही जानकारी भी नहीं मिलती । साक्षरता अलग है, शिक्षा अलग यह बात अनेक मंचों से बार बार बोली जाती है परन्तु तन्त्र के कानों पर जूं भी नहीं रेंगती ।

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