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पृष्ट जोडा
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१. सन्‌ १८६६ में उठा राष्ट्रीय स्वर : राजनारायण बसु
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==== १. सन्‌ १८६६ में उठा राष्ट्रीय स्वर : राजनारायण बसु ====
    
(योगी श्रीअरविंद के नाना श्री राजनारायण की गणना अंग्रेजी शिक्षा प्राप्त करनेवाली प्रारंभिक बंगाली पीढ़ी में होती है । उन्होंने सन्‌ १८४५ में हिंदू कॉलेज, कोलकत्ता से अपनी शिक्षा पूर्ण की । कुछ समय तक वे भी हिंदू संस्कृति एवं परंपरा से संबंध-विच्छेद के प्रवाह में बहे; किंतु सौभाग्य से उन्हें रवींदट्रनाथ ठाकुर के पिता देवेंद्रनाथ ठाकुर के ऋषितुल्य व्यक्तित्व ने आकर्षित कर लिया । देवेन्द्र बाबू के प्रभाव में आकर उन्होंने बंगाल की युवा पीढ़ी पर अंग्रेजी शिक्षा के दुष्परिणामों की गहरी समीक्षा की और राष्ट्रीय पुनर्जागरण के गंभीर प्रयास की आवश्यकता अनुभव की । इस प्रयास का आरंभ करने की दृष्टि से उन्होंने एक नई संस्था की स्थापना का विचार किया । इसका नामकरण उनहोंने सोचा “सोसाइटी फॉर द प्रोमोशन ऑफ नेशनल फीलिंग अमंग दि एजुकेटेड नोटिव्ज ऑफ बंगाल' (शिक्षित बंगालियों में राष्ट्रीय भावना संचारिणी संस्था) । सन्‌ १८६६ में उन्होंने इस प्रस्तावित संस्था की भावभूमि की स्पष्ट कल्पना देने के लिए एक प्रॉस्पेक्टस या उद्देश्यावली प्रकाशित की । उसी के कुछ अंश यहाँ प्रस्तुत हैं ।)  
 
(योगी श्रीअरविंद के नाना श्री राजनारायण की गणना अंग्रेजी शिक्षा प्राप्त करनेवाली प्रारंभिक बंगाली पीढ़ी में होती है । उन्होंने सन्‌ १८४५ में हिंदू कॉलेज, कोलकत्ता से अपनी शिक्षा पूर्ण की । कुछ समय तक वे भी हिंदू संस्कृति एवं परंपरा से संबंध-विच्छेद के प्रवाह में बहे; किंतु सौभाग्य से उन्हें रवींदट्रनाथ ठाकुर के पिता देवेंद्रनाथ ठाकुर के ऋषितुल्य व्यक्तित्व ने आकर्षित कर लिया । देवेन्द्र बाबू के प्रभाव में आकर उन्होंने बंगाल की युवा पीढ़ी पर अंग्रेजी शिक्षा के दुष्परिणामों की गहरी समीक्षा की और राष्ट्रीय पुनर्जागरण के गंभीर प्रयास की आवश्यकता अनुभव की । इस प्रयास का आरंभ करने की दृष्टि से उन्होंने एक नई संस्था की स्थापना का विचार किया । इसका नामकरण उनहोंने सोचा “सोसाइटी फॉर द प्रोमोशन ऑफ नेशनल फीलिंग अमंग दि एजुकेटेड नोटिव्ज ऑफ बंगाल' (शिक्षित बंगालियों में राष्ट्रीय भावना संचारिणी संस्था) । सन्‌ १८६६ में उन्होंने इस प्रस्तावित संस्था की भावभूमि की स्पष्ट कल्पना देने के लिए एक प्रॉस्पेक्टस या उद्देश्यावली प्रकाशित की । उसी के कुछ अंश यहाँ प्रस्तुत हैं ।)  
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राष्ट्रीयता संचारिणी संस्था यूरोपीय संस्कृत विद्वानों द्वारा भारत के अतीत के संबंध में किए गए अनुसंधानों को बंगाली भाषा के माध्यम से प्रकाशित करेगी । भौतिक, बौद्धिक, नैतिक, सामाजिक, राजनीतिक, साहित्यिक एवं वैज्ञानिक क्षेत्र में प्राचीन भारत के वैभव एवं उपलब्धियों का जो वर्णन उन्होंने किया है, उसे विशेष रूप से प्रकाश में लाया जाएगा ।... राष्ट्रीयता संचारिणी संस्था संस्कृत की प्रगति को अपनी शक्ति भर पूरा प्रोत्साहन देगी । वह महत्त्वपूर्ण संस्कृत ग्रंथों के प्रकाशन की व्यवस्था करेगी । इस कार्य में बंगाल
 
राष्ट्रीयता संचारिणी संस्था यूरोपीय संस्कृत विद्वानों द्वारा भारत के अतीत के संबंध में किए गए अनुसंधानों को बंगाली भाषा के माध्यम से प्रकाशित करेगी । भौतिक, बौद्धिक, नैतिक, सामाजिक, राजनीतिक, साहित्यिक एवं वैज्ञानिक क्षेत्र में प्राचीन भारत के वैभव एवं उपलब्धियों का जो वर्णन उन्होंने किया है, उसे विशेष रूप से प्रकाश में लाया जाएगा ।... राष्ट्रीयता संचारिणी संस्था संस्कृत की प्रगति को अपनी शक्ति भर पूरा प्रोत्साहन देगी । वह महत्त्वपूर्ण संस्कृत ग्रंथों के प्रकाशन की व्यवस्था करेगी । इस कार्य में बंगाल
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अभिमान की संस्कार-धारा और पिता डॉ. कृष्णधन घोष के माध्यम से स्वदेश के प्रति वितृष्णा और पाश्चात्य संस्कृति के प्रति अंधभक्ति की संस्कार-धारा । पिता की इच्छानुसार बालक अरविंद सात वर्ष की आयु में इंग्लैंड भेज दिए गए और एक अंग्रेज परिवार में रख दिए गए - इस निर्देश के साथ कि बालक का संबंध भारतीय संस्कारों में जरा भी नहीं आना चाहिए । फलतः संस्कृत तो क्या मातृभाषा बांगला से भी नाता नहीं था । अंग्रेजी के माध्यम से शिक्षा आरंभ हुई । ग्रीक, लैटिन एवं यूरोपीय भाषाओं का अध्ययन किया । पश्चिम के श्रेष्ठतम ज्ञान-भंडार में अवगाहन किया । बाल्‍्य, किशोर व तरुणावस्था के १४ संस्कार-क्षम वर्ष विशुद्ध पाश्चात्य वातावरण में पाश्चात्य शिक्षा-प्रणाली के सर्वोत्तम प्रकाश में गुजारे । सन्‌ १८९३ में इक्कीस वर्ष की आयु में जब वे भारत वापस लौटे तो उन्हें एक प्रकार से पाश्चात्य संस्कृति की उपज ही कहा जा सकता था । किंतु भारत की धरती पर पहला कदम रखते ही उनका भारतीयत्व जाग उठा, मानो माता के माध्यम से प्राप्त नाना की संस्कार-धारा झटका देकर ऊपर आ गई । भारतीय चेतना के सामने पश्चिम पराजित हो गया । अरविंद ने बड़ौदा में रहकर बांगला सीखी, संस्कृत सीखी, योग-साधना आरंभ की, भारतीय ज्ञान गंगा में डुबकियाँ लगाईं । वे पश्चिम और पूर्व के सर्वोत्तम ज्ञान को जोड़नेवाले पुल बन गए । बड़ौदा के अंग्रेजी कॉलेज में पहले अंग्रेजी व फ्रेंच भाषाओं के अध्यापक बने, फिर वाइस प्रिंसिपल का दायित्व मिला और अंत में कार्यकारी प्रिंसिपल का अवसर मिला । इस प्रकार पाश्चात्य शिक्षा-प्रणाली का इंग्लैंड में शुद्ध रूप देखने के बाद उन्होंने भारत में उसका विकृत रूप भी देखा । दोनों प्रकार के अनुभवों से युक्त एक ऐसा व्यक्ति ही भारत के लिए राष्ट्रीय शिक्षा-प्रणाली का सफल अन्वेषक बन सकता था।
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श्री अरविंद कॉलेज से विदा
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श्री अरविंद इन दिनों बंगाल नेशनल कॉलेज के प्रधानाचार्य के साथ-साथ अंग्रेजी दैनिक “बंदे मातरम्‌ के संपादक का दायित्व भी सँभाल रहे थे । समूचे स्वदेशी आंदोलन का वे केंद्र बन गए थे । ब्रिटिश सरकार उन्हें कानून के शिकंजे में फैंसाकर कारावास में दूँसने का अवसर ढूँढ रही थी । 'वंदे मातरम्‌' में प्रकाशित एक लेख को आधार बनाकर उनके विस्द्ध राजद्रोह का मुदूकमा चलाया गया । इस मुकदमे के आगे बढ़ने पर ऐसा लगने लगा कि शायद श्री अरविंद बच न सकेंगे और उन्हें सजा हो जाएगी । उस स्थिति में नेशनल कॉलेज पर किसी प्रकार की आँच न आने पावे, यह सोचकर श्री अरविंद ने अगस्त १९०७ में प्रिंसिपल पद से त्यागपत्र दे दिया । उनके इस पत्र से छात्रों, अध्यापकों व संचालकों को बहुत परेशानी हुई और उन्होंने एक सभा में सरकार की दमन नीति की निंदा करते हुए श्री अरविंद से अपना त्यागपत्र वापस लेने की प्रार्थना की । किंतु वे अटल रहे। अतः २२ अगस्त, १९०७ को उनको अश्रुपूरित भावभीनी विदाई दी गई । इस अवसर पर अपने संक्षिप्त भाषण में श्री अरविंदने राष्ट्रीय शिक्षा आंदोलन के बारे में अपनी उस समय की कल्पना को प्रस्तुत करते हुए कहा -
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'जिस समय हमने इस कॉलेज की स्थापना की और अपने अन्य धंधों व जीवन के अवसरों को लात मारकर अपने जीवनों को इस संस्था के प्रति समर्पित करने का संकल्प लिया, तब हमने आशा की थी कि इस संस्था के रूप में एक नए राष्ट्र, एक नए भारत की आधारशिला रख रहे हैं। हमने कभी यह इच्छा नहीं की कि केवल कुछ जानकारियाँ आपके दिमागों में दूस दें अथवा जीविकार्जन के लुभावने अवसर आपको उपलब्ध करा दें; बल्कि हमारी इच्छा रही है कि आप में से मातृभूमि के ऐसे सपूत पैदा करें जो उसके लिए जीवित रहें और कष्ट उठाएँ ।'
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ब्रिटिश सरकार पूरा प्रयत्न करके भी श्री अरविंद के विरुद्ध अपना आरोप सिद्ध न कर पाई, अतः उन्हें न्यायालय ने ससम्मान बरी कर दिया । उनकी इस मुक्ति पर नेशनल कॉलेज में एक समारोह का आयोजन कर काफी हर्षोछ्लास प्रकट किया गया । किंतु अब श्री अरविंद “वंदे Ae एवं राष्ट्रीय आंदोलन की अन्य गतिविधियों से इतना अधिक उलझ चुके थे कि उन्होंने कॉलेज के प्रिंसिपल पद पर वापस न आकर बाहर से ही राष्ट्रीय शिक्षा आंदोलन की
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सफलता के लिए कार्य करने का निश्चय किया ।
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प्राचीन शिक्षा-पद्धति के मूल तत्त्व
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श्री अरविंद ने प्राचीन भारतीय शिक्षा-पद्धति के मूलाधारों की खोज का प्रयास शुरू किया । इस खोज के परिणामस्वरूप उन्होंने पाया कि केवल जानकारी देना शिक्षा का मुख्य अथवा प्रथम लक्ष्य नहीं है । उनके मतानुसार “जो शिक्षा केवल जानकारी देने तक अपने को सीमित रखती है वह सिक्षा कहलाने योग्य नहीं है ।' उन्होंने कहा कि 'हिंदू धारणा के अनुसार समस्त ज्ञान मनुष्य के भीतर विद्यमान है । शिक्षा का काम यह है कि वह ज्ञान को बाहर से ठूसने के बजाय अंदर से ज्ञान के जागरण की स्थिति उत्पन्न at | और इसका उपाय है - ज्ञान को आच्छादित करनेवाले तमोभाव का क्रमशः शमन करते हुए सतोगुण का उद्रेक करते जाना । सत्य का उद्रेक करने के लिए आवृत्ति, मनन और तत््व-चर्चा की त्रिविध प्रक्रिया को अपनाया जाना चाहिए । इसकी चरम परिणति योग-शक्ति में होती है। यह योग-शक्ति ही अध्यात्म का दूसरा नाम है। पार्थिव शरीर को इस शक्ति का उपयुक्त आधार ब्रह्मचर्य के पालन से ही बनाया जा सकता है। इसीलिए प्राचीन शिक्षा-पद्धति में ब्रह्मचर्य पर अत्यधिक बल दिया गया था । ब्रह्मचर्य के पालन से ही उस ऊर्जा का जागरण संभव है जो शरीर, मन, बुद्धि और आत्मा की सब आवश्यकताओं को पूर्ण कर सकती है । ब्रह्मचर्य-पालन के फलस्वरूप मनुष्य शरीर के भीतर जो ऊर्जा उत्पन्न होती थी वह समस्त शारीरिक कर्मों को पूरा करके मस्तिष्क और आत्मा के उन्नयन में लग जाती थी । श्री अरविंद इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि ब्रह्मचर्य और सात्तविक विकास में से ही भारत के मस्तिष्क का गठन हुआ है, जो योग-साधना के द्वारा पूर्णता को पा सका । उन्होंने कहा कि प्राचीन शिक्षा-प्रणाली में एक साथ अनेक विषयों की जानकारी को छात्र के मस्तिष्क में दूसने का प्रयास नहीं किया जाता था अपितु एक ही विषय को एक बार पुख्ता ढंग से पढ़ाया जाता था, जिसके फलस्वरूप छात्र की जानकारी का क्षेत्र सीमित रहते हुए भी उसकी नींव गहरी व मजबूत होती थी और उसकी स्मरण- शक्ति दृढ़ होती थी । उन्होंने कहा कि इन्हीं मुख्य मनोवैज्ञानिक सिद्धांती के आधार पर प्राचीन भारतीय मनीषा ने अपनी शिक्षा-प्रणाली का ढाँचा खड़ा किया था । बाहर से जानकारी ढूसने के बजाय छात्र की आंतरिक शक्तियों का जागरण ही इस शिक्षा-प्रणाली का मुख्य लक्ष्य था ।
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नई शिक्षा-प्रणाली असफल क्यों ?
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इस विश्लेषण के पश्चात्‌ श्री अरविंद इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि यदि नई शिक्षा-प्रणाली सफल नहीं हो सकी तो उसका एक कारण तो यह था कि उसके अध्यापकों को नई प्रणाली की आवश्यकताओं का सम्यक्‌ बोध नहीं था, दूसरा यह था कि “उसके नियंत्रणकर्ता एवं निर्देशकगण पुरानी (अंग्रेजी) शिक्षा-प्रणाली की मान्यताओं से चिपके हुए थे ।' उन्होंने कहा कि “इस प्रयोग ने अपने लिए ‘usta’ नाम धारण तो कर लिया, किंतु इसमें पूर्वजों की महान्‌ उपलब्धियों की आधारशिला अर्थात्‌ ज्ञान के उपकरणों के चरम विकास के सिद्धांत की पूर्ण उपेक्षा की गई ।' श्री अरविंद ने अंत में लिखा - “हमारा यह कहना कदापि नहीं है कि प्राचीन शिक्षा-प्रणाली के बाह्य रूप को ज्यों-का- त्यों पुनरुज्जीवित किया जाए, जैसा कि अतीत के अनेक भावुक भक्त माँग करते देखे जाते हैं, क्योंकि प्राचीन शिक्षा- पद्धति की अनेक बातें आधुनिक युग की आवश्यकताओं के अनुरूप नहीं हैं; किंतु उसके मूलभूत सिद्धांत सब कालों के लिए समान रूप से लागू होते हैं और जब तक उससे अधिक प्रभावकारी शिक्षा-पद्धति का आविष्कार नहीं होता तब तक उसे त्यागना उचित नहीं है । निश्चय ही यूरोपीय शिक्षा-पद्धति हमें वह विकल्प प्रदान नहीं करती ।'
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युगानुकूल पद्धति की खोज
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अब श्री अरविंद के सामने प्रश्न खड़ा हुआ कि यदि यूरोपीय शिक्षाप्रणाली का अनुकरण नहीं करना और प्राचीन शिक्षा-पद्धति को भी ज्यों-का-त्यों पुनरुज्जीवित नहीं करना तो प्राचीन भारतीय शैक्षणिक सिद्धांतों के आधार पर युगानुकूल शिक्षा-प्रणाली का स्वरूप क्या हो ? इस प्रक्ष
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शिक्षा स्वरूप और भावना में पूर्णतया आधुनिक होगी ।
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क्या शिक्षा 'राष्ट्रीय' हो सकती है ?
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अब श्री अरविंद के सामने प्रश्न खड़ा हो जाता है कि यदि सबकुछ नया ही बनाना है, आधुनिकतम ज्ञान-विज्ञान को भी शिक्षा में समाविष्ट करना है तो नई शिक्षा-पद्धति में “राष्ट्रीय क्या रह जाता है ? इससे भी अगला प्रश्न खड़ा होता है कि क्‍या “शिक्षा' का कोई राष्ट्रीय संस्करण हो सकता है ? राष्ट्रीय शिक्षा के अब तक के प्रयोगों की असफलता से हताश व भारतीय बुद्धिजीवी वर्ग अब तक तर्क का आश्रय लेने लगा था कि “राष्ट्रीय शिक्षा की अवधारणा ही मिथ्या है और संकीर्ण देशप्रेम का एक ऐसे क्षेत्र में अवांछनीय, अहितकर व अनधिकार प्रवेश है, जहाँ उसके लिए कोई वैध स्थान नहीं । यहां देश-प्रेम का बस इतना ही स्थान हो सकता है कि अच्छे नागरिक होने की शिक्षा दी जाए । और इस उद्देश्य के लिए अलग-अलग प्रकार की शिक्षा देने की जरूरत नहीं है, क्योंकि अच्छा नागरिक बनाने के शिक्षा के मूल तत्त्व सभी जगह एक से होंगे, चाहे वह पूर्व हो या पश्चिम, इंग्लैंड हो या जर्मनी, जापान हो या हिंदुस्तान ।'
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राष्ट्रीय शिक्षा की अवधारणा के विरुद्ध दूसरा तर्क यह दिया गया कि “मानव जाति और उसकी आवश्यकताएँ सब जगह एक हैं । सत्य और ज्ञान एक ही है, उनका कोई देश नहीं होता । अतः ज्ञान देने का साधन होने के कारण शिक्षा भी सार्वभौम होनी चाहिए, जिसकी कोई राष्ट्रीयता न हो, कोई सीमों न हों । उदाहरणार्थ, भौतिक विज्ञान में राष्ट्रीय शिक्षा का भला क्या अर्थ हो सकता है !'
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आधुनिक विज्ञान बनाम राष्ट्रीय शिक्षा
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इन तर्कों की धज्जियाँ उड़ाते हुए श्री अरविंद ने लिखा कि “राष्ट्रीय शिक्षा के विरुद्ध यह तर्क-वितर्क इस निर्जीव शैक्षिक धारणा में से शुरू होता है कि शिक्षा का एकमात्र अथवा मुख्य उद्देस्य कुछ विषयों को पढ़ाना एवं इस या उस प्रकार की जानकारी प्रदान करना भर है । लेकिन विभिन्न प्रकार के जानकारियाँ प्राप्त करना शिक्षा के उद्देश्य एवं आवश्यकताओं में से केवल एक है और वह भी केंद्रीय नहीं । शिक्षा का केंद्रीय उद्देश्य है मानव मन और आत्मा को शक्तिशाली बनाना । मैं अपने शब्दों में कहना चाहूँ तो वह उद्देश्य है ज्ञान, चरित्र और संस्कृति : तीनों का प्रबोधन ।'
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उन्होंने कहा कि हमारे सामने मुख्य प्रश्न यह नहीं है कि पश्चिम के विज्ञान को लें या नहीं अथवा कौन सा विज्ञान हम सीखें, बल्कि यह है कि हम इस विज्ञान का क्या उपयोग करेंगे और कैसे उसका नाता मानव मन की अन्य शक्तियों के साथ जोड़े सकेंगे, कैसे आधुनिक वैज्ञानिक ज्ञान का संबंध उस ज्ञान के साथ जोड़ सकेंगे, जिसका हमारी बुद्धि और स्वभाव के अधिक प्रकाशदायक एवं शक्तिदायक अंशों से अंतरंग संबंध है । और यही भारतीय मानस का विशेष गठन, उसकी मनोवैज्ञानिक परंपरा, उसकी आनुवंशिक क्षमता, रुझान और ज्ञान ऐसे सांस्कृतिक तत्त्व प्रस्तुत कर देते हैं जिनका अत्यधिक महत्त्व है ।
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राष्रीय शिक्षा के विरुद्ध उन दिनों दूसरा तर्क यह दिया जाता था कि “आधुनिक अर्थात्‌ यूरोपीय सभ्यता ही वह चीज है जिसे हमें प्राप्त करना है और जिसके योग्य हमें स्वयं को बनाना है; क्योंकि इसी तरह हम जी और फल- फूल सकते हैं । अतः हमारी शिक्षा को हमारे लिए यही करना चाहिए ।' इस तर्क के उत्तर में श्री अरविंद ने यूरोपीय सभ्यता के पूरे विकास-क्रम का चित्र प्रस्तुत करते हुए कहा कि “पश्चिम की वैज्ञानिक, तर्कवादी, औद्योगिक एवं तथाकथित गणतंत्रवादी सभ्यता अब विघटन के दौर से गुजर रही है । यदि हम अंधे होकर आज भी इस धँसती हुई नींव के ऊपर अपने भविष्य का भवन बनाने का प्रयत्न करें तो इससे बड़ा पागलपन और क्या होगा ? आज अब यूरोप के सबसे अग्रगण्य मनीषी पश्चिम की इस सांध्यवेला में नई आध्यात्मिक सभ्यता को पाने के लिए एशिया की प्रतिभा का मुँह ताक रहे हैं, तब कितना विचित्र होगा, यदि हम अपने “स्व' को और उसमें निहित अपनी संभावनाओं को किनारे फेंककर यूरोप के विलीन होते हुए मृत्योन्मुख आज को अपना भविष्य सौंप दें ।'
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व्यक्ति, राष्ट्र और मानव जाति
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राष्ट्रीय शिक्षा के विरोधियों का तीसरा तर्क यह है कि “मानव मन सब जगह एक ही है और उसे हर जगह एक जैसी मशीन में से गुजारकर एक जैसा ही गढ़ा जा सकता है ।' इस तर्क को धराशायी करते हुए श्री अरविंद ने कहा कि “यह तर्क बुद्दि का पुराना और घिसा-पिटा अंधविश्वास है, जिसे तिलांजलि देने का अब समय आ गया है । मानव जाति के समष्टित मन और आत्मा के अंदर अनंत विभिन्ननाओं को लिये हुए असंख्य व्यक्तिगत मन और आत्मा भी होते हैं । हम आत्माओं के कुछ सामान्य लक्षण होते हैं और कुछ विशिष्ट । इन दोनों के बीच एक मध्यवर्ती सत्ता होती है, जिसे कहते हैं राष्ट्रीय मानस या जन-चेतना । और अगर शिक्षा को मशीन निर्मित साँचा बनने के बजाय मानवीय मन और चेतना की शक्तियों के जीवंत प्रबोधन की प्रक्रिया बनना है तो इसे इन तीनों सत्ताओं का ख्याल रखना होगा ।'
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इस कथन को और स्पष्ट करते हुए उन्होंने लिखा कि सच्ची और प्राणवान्‌ शिक्षा में तीनों बातों का ध्यान रखना पड़ता है - (१) मनुष्य-व्यक्ति रूप में अपनी सामान्यता व अनोखेपन के साथ, (२) राष्ट्र या समाज और (३) समस्त मानव जाति । इससे सहज निष्कर्ष निकलता है कि सच्ची और प्राणवान्‌ शिक्षा उसे ही कहा जा सकता है जो व्यक्ति के रूप में मनुष्य कि इस प्रकार सहायता दे कि उसके भीतर विद्यमान क्षमता एवं प्रतिभा को पूरे लाभकारी ढंग से बाहर प्रगट होने का अवसर मिले और जो मानव जीवन के पूर्ण उद्देश्य व संभावनाओं की प्राप्ति की सिद्धता प्रदान करे । साथ ही जो शिक्षा मनुष्य को अपने समाज के, जिसका कि वह अंग है, जीवन, मानस व अंतरात्मा के साथ और उससे भी आगे बढ़कर संपूर्ण मानव जाति, जिसकी वह स्वयं एक इकाई है और उसका राष्ट्र या समाज जिसका सजीव, पृथक किंतु अविच्छेद्‌ सदस्य है, वे समग्र महानू जीवन, मानस व अंतरात्मा के साथ सम्यक्‌ संबंध स्थापित करने में सहायक हो।
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किंतु यहां मनुष्य, राष्ट्र व मानव जाति के जीवन के बारे में अलग-अलग धारणाओं का प्रश्न खड़ा हो जाता है । भिन्न धारणाओं के अनुसार शिक्षा का स्वरूप भी भिन्न होना अवश्यंभावी है । श्री अरविंद ने इन प्रश्नों को उठाकर उनके उत्तर में व्यक्ति, राष्ट्र व मानव जाति के बारे में भारत की आध्यात्मिक दृष्टि का विवेचन किया और विविधता में एकता के भारतीय दर्शन का प्रतिपादन किया । निष्कर्ष रूप में उन्होंने कहा कि “हमारी शिक्षा ऐसी होनी चाहिए, जिसका व्यक्ति की दृष्टि से केंद्रीय लक्ष्य होगा उसकी आत्मा और उसकी शक्तियों व संभावनाओं का पूर्ण विकास; राष्ट्र की दृष्टि से उसका मुख्य प्रयास होगा । राष्ट्रीयता और धर्म का संरक्षण, दृढ़ीकरण एवं समृद्धिकरण करते हुए दोनों को मानव जाति के जीवन और मानव आत्मा की उन्नायक शक्तियों के रूप में उपर उठाना । ऐसी शिक्षा मनुष्य के सर्वोच्च लक्ष्य अर्थात्‌ उसकी आध्यात्मिक चेतना के जागरण और विकास को किसी भी क्षण अपनी दृष्टि से ओझल नहीं होने देगी ।'
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इस बिंदु पर आकर अचानक ही यह लेखमाला रुक जाती है । यहाँ तक श्री अरविंद सच्ची शिक्षा व्याख्या के संदर्भ में भारत के लिए राष्ट्रीय शिक्षा के आधारभूत सिद्धांतो का प्रतिपादन भर कर पाते हैं, किंतु इन सिद्धांतों को व्यावहारिक रूप देनेवाले संगठनात्मक ढाँचे, शिक्षण विधि एवं पाठ्यक्रम आदि की कोई ठोस रूपरेखा प्रस्तुत नहीं कर पाते । जनवरी १९२१ में ही “आर्य' का प्रकाशन बंद हो जाने के कारण यह लेखमाला भी अधूरी रह गई। बहुत संभव है कि यदि “आर्य' का प्रकाशन इसी अंक पर बंद न हो जाता तो श्री अरविंद यह रूपरेखा भी प्रस्तुत करते, क्योंकि उनका विषय-प्रतिपादन क्रमशः उसी दिशा में बढ़ रहा था । कैसा विचित्र संयोग है कि सन्‌ १९१० में “कर्मयोगी' के समान इस समय 'आर्य' में भी राष्ट्रीय शिक्षा के बारे में श्री अरविंद की कलम उसी समय उठी जब aren 'आर्य' का प्रकाशन बंद होने वाला था । आगे चलकर अरविंद आश्रम एवं उसके अंतरराष्ट्रीय शिक्षा केंद्र के माध्यम से श्री अरविंद की यह कल्पना कितनी मात्रा में रूपायित हो पाई, इसकी खोजबीन राष्ट्रीय शिक्षा आंदोलन के विगत इतिहास की दृष्टि से ही नहीं, उसके भावी स्वरूप का विचार करने की दृष्टि से भी बहुत उपयोगी सिद्ध हो सकती है ।
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३. स्वामी विवेकानन्द का शिक्षा दर्शन
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शिक्षा क्‍या है ?
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मनुष्य की अंतर्निहित पूर्णता को अभिव्यक्त करना ही शिक्षा है। समस्त ज्ञान, चाहे वह लौकिक हो अथवा आध्यात्मिक, मनुष्य के मन में है । बहुधा वह प्रकाशित न होकर ढ़का रहता है और जब आवरण धीरे-धीरे हटता जाता है तो हम कहते हैं कि हम सीख रहे हैं ।' ज्यों -ज्यों इस आविष्करण की क्रिया बढ़ती जाती है त्यों त्यों हमारे ज्ञान की वृद्धि होती जाती है । जिस मनुष्य पर से यह आवरण उठता जा रहा है, वह अन्य व्यक्तियों की अपेक्षा अधिक ज्ञानी है और जिस पर यह आवरण तह-पर-तह पड़ा हुआ है, वह आज्ञानी है ।
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वास्तव में कभी किसी व्यक्ति ने किसी दूसरे को नहीं सिखाया । हममें से प्रत्येक को अपने आपको सिखाना होगा । बाहर के गुरु तो केवल सुझाव या प्रेरणा देनेवाले कारण मात्र हैं, जो हमारे अतंधस्थ गुरु को सब विषयों का मर्म समझने के लिए उद्बोधित कर देते हैं ।
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शिक्षा कया नहीं है ?
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शिक्षा विविध जानकारियों का ढेर नहीं है, जो तुम्हारे मास्तिष्क में दूस दिया गया है और जो आत्मसात्‌ हुए बिना वहाँ आजन्म पड़ा रहकर गड़बड़ मचाया करता है । हमें उन विचारों की अनुभूति कर लेने की आवश्यकता है, जो जीवन-निर्माण, “मनुष्य -निर्माण तथा चखिन-निर्माण में सहायक हों ।
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विदेशी भाषा में दूसरे के विचारों को रटकर, अपने मस्तिष्क में उन्हें दूसकर और विश्वविद्यालयों की कुछ पदवियाँ प्राप्त करके तुम अपने को शिक्षित समझते हो ! क्या यही शिक्षा है ? तुम्हारी शिक्षा का उद्देश्य क्‍या है ? या तो मुंशीगिरी मिलाना या वकील हो जाना, या अधिक- से-अधिक डिप्टी मेजिस्ट्रेट बन जाना, जो मुंशीगिरी का ही दूसरा रूप है - बस यही न ! इससे तुमको या तुम्हारे देश को क्या लाभ होगा ? आंखें खोलकर देखों, जो भरतखंड अन्न का अक्षय भंडार रहा है, आज वहीं, उसी अन्न के लिए कैसी करुण पुकार उठ रही है । क्या तुम्हारी शिक्षा इस अभाव की पूर्ति करेगी ? वह शिक्षा, जो जनसमुदाय को जीवन-संग्राम के उपयुक्त नहीं बनाती, जो उनकी चारित्य-शक्ति का विकास नहीं करती, जो उनमें भूत-दया का भाव और सिंह का साहस पैदा नहीं करती, क्या उसे भी हम “शिक्षा का नाम दे सकते हैं ?
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हमें तो ऐसी शिक्षा चाहिए, जिससे चरित्र बने, मानसिक बल बढ़े, बुद्धि का विकास हो और जिससे मनुष्य अपने पैरों पर खड़ा हो सके । हमें आवश्यकता इस बातकी है कि हम विदेशी अधिकार से स्वतंत्र रहकर अपने निजी ज्ञान-भंडार की विभिन्न शाखाओं का और उसके साथ ही अंग्रेजी भाषा एवं पाश्चात्य विज्ञान का अध्ययन करें । हमें यांत्रिक और ऐसी सभी शिक्षाओं की आवश्यकता है, जिनसे उद्योग-धंधो की वृद्धि और विकास हो, जिससे मनुष्य नौकरी के लिए मारा-मारा fea के बदले अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए पर्याप्त कमाई कर सके और आपातकाल के लिए संचय भी कर सके ।
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सभी प्रकार की शिक्षा और अभ्यास का उद्देश्य “मनुष्य-निर्माण' ही हो । सारे प्रशिक्षणों का अंतिम ध्येय मनुष्य का विकास करना ही है । जिस प्रक्रिया से मनुष्य की इच्छा-शक्ति का प्रवाह और प्रकाश संयमित होकर फलदायी बन सके, उसी का नाम है शिक्षा ।
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शिक्षा का लक्ष्य - चरित्र-निर्माण
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मनुष्य का चरित्र उसकी विभिन्न प्रवृत्तियों की समष्टि है, उसके मन के समस्त झुकावों का योग है ।
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हम वही हैं, जो हमारे विचारों ने हमें बनाया है । प्रत्येक विचार हमारे शरीर पर, लोहे के टुकड़े पर हथौड़े की हलकी चोट के समान है और उसके द्वारा हम जो बनना चाहते हैं, बनते जाते हैं । वाणी तो गौण है । विचार सजीव होते हैं; उनकी दौड़ बहुत दूर तक हुआ करती है ।
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ही बन गया है । कारण क्‍या है ? - शारीरिक दुर्बलता । इस प्रकार के दुर्बल मस्तिष्क से कोई काम नहीं हो सकता । हमें उसे सबल बनाना होगा । सर्वप्रथम हमें नवयुवकों को बलवान बनाना चाहिए । धर्म पीछे आ जाएगा । मेरे नवयुवक मित्रो ! बलवान्‌ बनो । तुमको मेरी यह सलाह है । गीता के अभ्यास की अपेक्षा फुटबॉल खेल के द्वारा तुम स्वर्ग के अधिक निकट पहुँच जाओगे । तुम्हारी कलाई और भुजाएँ अधिक मजबूत होने पर तुम गीता को अधिक अच्छी तरह समझोगे ।
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एकाग्रता व ब्रह्मचर्य
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एकाग्रता की शक्ति जितनी अधिक होगी, ज्ञान की प्राप्ति भी उतनी ही अधिक होगी । ९० प्रतिशत विचार- शक्ति को साधारण मनुष्य व्यर्थ खो देता है और इसी कारण वह सदा बड़ी-बड़ी भूलें किया करता है । अभ्यस्त मन कभी भूल नहीं करता । मनुष्यों और पशुओं में मुख्य भेद केवल चित्त की एकाग्रता-शक्ति का तारतम्य ही है । पशु में एकाग्रता की शक्ति बहुत कम होती है ।
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मैं तो मन की एकाग्रता को ही शिक्षा का यथार्थ सार समझता हूँ - ज्ञातव्य विषयों के संग्रह को नहीं । यदि मुझे एक बार फिर से अपनी शिक्षा प्राप्त करने का अवसर मिले तो मैं विषयों का अध्ययन नहीं करूँगा । मैं तो एकाग्रता की ओर मन को विषय से अलग कर लेने की शक्ति बढ़ाऊँगा और तब साधन या यंत्र की पूर्णता प्राप्त हो जाने पर इच्छानुसार विषयों का संग्रह करूँगा ।
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बारह वर्ष तक अखंड ब्रह्मचर्य-पालन करनेवाले को शक्ति प्राप्त होती है। पूर्ण ब्रह्मचर्य से प्रबल बौद्धिक और आध्यात्मिक शक्ति उत्पन्न होती है ।
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इस ब्रह्मचर्य के अभाव के कारण हमारे देश में प्रत्येक वस्तु नष्टप्राय हो रही है । कड़े ब्रह्मचर्य के पालन से कोई भी विद्या अल्पकाल में ही अवगत की जा सकती है, एक ही बार सुनी या जानी हुई बात को याद रखने की अचूक स्मृति-शक्ति आ जाती है ।
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शिक्षक और शिष्य
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मेरे विचार के अनुसार शिक्षा का अर्थ है - 'गुरुगृह- वास' । शिक्षक अर्थात्‌ गुरु के व्यक्तिगत जीवन के बिना कोई शिक्षा नहीं हो सकती । शिष्य को बाल्यावस्था से ऐसे व्यक्ति (गुरु) के साथ रहना चाहिए, जिनका चरित्र जाज्वल्यमान्‌ अधि के समान हो, जिससे उच्चतम शिक्षा का सजीव आदर्श शिष्य के समान रहे । हमारे देश में ज्ञान का दान सदा त्यागी पुरुषों द्वारा ही होता आया है । ज्ञान-दान का भार पुनः त्यागियों के कंधों पर पड़ना चाहिए ।
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गुरु के लिए दूसरी आवश्यक बात है - निष्पापता । बहुधा प्रश्न पूछा जाता है, “हम गरु के चरित्र और व्यक्तित्व की ओर ध्यान ही क्यों दें ?' यह ठीक नहीं है । अपने कई आध्यात्मिक सत्य की उपलब्धि करने और दूसरों में उसका संचार करने का एकमात्र उपाय है - हृदय और मन की पवित्रता । गुरु को पूर्ण रूप से शुद्ध चित्त होना चाहिए, तभी उनके शब्दों का मूल्य होगा । वास्तव में गुरु का काम ही यह है कि वे शिष्य में आध्यात्मिक शक्ति का संचार कर दें, न कि शिष्य की बुद्धि-वृत्ति अथवा अन्य किसी शक्ति को उत्तेजित मात्र करें । यह स्पष्ट अनुभव किया जा सकता है कि गुरु से शिष्य में सचमुच एक शक्ति आ रही है । अतः गुरु का शुद्ध चित्त होना आवश्यक है ।
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गुरु को शिष्य की प्रवृत्ति में अपनी सारी शक्ति लगा देनी चाहिए । सच्ची सहानुभूति के बिना हम अच्छी शिक्षा कभी नहीं दे सकते ।
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ताड़ना नहीं, सहानुभूति
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हमें विधायक विचार सामने रखने चाहिये । निषेधात्मक विचार लोगों को दुर्बल बना देते हैं । क्या तुमने यह नहीं देखा कि जहाँ माता-पिता पढ़ने-लिखने के लिए अपने बालकों के सदा पीछे लगे रहते हैं और कहा करते हैं कि तुम कभी कुछ सीख नहीं सकते, तुम गधे बने रहोगे - वहाँ बालक यथार्थ में वैसे ही बन जाते हैं । यदि तुम उनसे सहानुभूति भरी बातें करो और उन्हें उत्साह दो तो समय पाकर उनकी उन्नति होना निश्चित है । यदि तुम उनके सामने विधायक विचार रखो तो उनमें मनुषत्व आएगा और वे अपने पैरों पर खड़ा होना सीखेंगे । भाषा और साहित्य,
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धर्मोपदेश करते फिरते हैं । यदि उनमें से कुछ को भौतिक विषयों के भी शिक्षक के रूप में संगठित किया जा सके तो वे एक स्थान से दूसरे स्थान को, एक दरवाजे से दूसरे दरवाजे को न केवल धर्मोपदेश करते हुए वरन्‌ शिक्षा-कार्य भी करते हुए जाएँगे । मान लो, इनमें से दो मनुष्य संध्या समय किसी गाँव में अपने साथ मैजिक लैंटर्न, पृथ्वी का गोला और कुछ नक्शे आदि लेकर गए तो वे अनजान मनुष्यों को बहुत सा ज्योतिष और भूगोल सिखा सकते हैं । भिन्न भिन्न देशों की कहानियाँ बताकर वे गरीबों को जन्म भर में पुस्तकों के द्वारा जो जानकारी प्राप्त होती, उससे कई सौ गुना अधिक कानों के द्वारा सिखा सकते हैं । आधुनिक विज्ञान की सहायता से उनके ज्ञान को wafer कर दो । उन्हें इतिहास, भूगोल, विज्ञान एवं साहित्य पढ़ाओ और इन्हीं के साथ-साथ एवं इन्हीं के द्वारा धर्म के गंभीर सत्यों की भी शिक्षा दो ।
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(रामकृष्ण आश्रम, नागपुर द्वारा प्रकाशित 'शिक्षा' नामक संकलन में से उद्धृत ।)
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४. राष्ट्रीय शिक्षा क्‍या, कैसी : भगिनी निवेदिता
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राष्ट्रनिर्माणकारी शिक्षा
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आज भारत की शिक्षा को न केवल “राष्ट्री' अपितु “राष्ट्र-विधायिका' होना है । हम देख चुके हैं कि राष्ट्रीय शिक्षा किसे कहते हैं, एक ऐसा प्रशिक्षण, जिसमें अपने स्वत्व का विशिष्ट रंग रहता है और जो प्रारंभ में तो बच्चे का उसके संपूर्ण परिचित-परिवेश के माध्यम से उसके घर और अपने देश के साथ संबंध-सूत्र जोड़ता है, परंतु जो अंत में उसको इन सब सीमाओं से “सर्वमुक्त' बना देता है अर्थात्‌ सच्चे अर्थों में सार्वदेशिक एवं वैश्विक । सभी देशों में स्वस्थ शिक्षा के लिए यह अनिवार्य शर्त है, भले ही वहाँ की राजनीतिक स्थिति अथवा विकास का स्तर कैसा भी हो । ये सामान्य कथन इंग्लैंड और फ्रांस के लिए उतने ही सत्य हैं जितने भारत के लिए और वैभव-काल में भी उतने ही सुसंगत हैं जितने संकट-काल में ।
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राष्ट्रभाव का सर्वोपरि अर्थ है - परहित चिंतन । उसकी जड़े जनसेवा व सशक्त नागरिक प्रवृत्ति में होती हैं । परंतु ये भारी भरकम शब्द भी 'सुयोजित निस्स्वार्थ भाव' का ही दूसरा नाम हैं । राष्ट्रनिर्माण के संस्कार बालक पर डालने की सर्वोत्तम विधि है कि घर के बड़े लोग उसे हर क्षण स्वार्थ से ऊपर उठकर व्यापक लोक-कल्याण के लिए चिंतित दिखाई दें ।
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लोककल्याण की तीव्र इच्छा स्वयं एक उच्च जीवनलक्ष्य है । अवतारों के हृदयों में दुःखी मानवता के प्रति जगनेवाली अनंत करुणा उसी का रूप है । राष्ट्रनिर्माण के यही मूल एवं बीज तत्त्व हैं। “राष्ट्र तब बनता है जब प्रत्येक व्यक्ति समष्टि का अंग बन जाता है और जब समष्टि का प्रत्येक अंग अनमोल हो जाता है एवं जब समाज की तुलना में परिवार भी नगण्य प्रतीत होता है ।
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हमें बालकों के चारों ओर राष्ट्र तथा देशप्रेम का वायुमंडल निर्माण करना चाहिए । उनकी निष्ठाओं का आधारबिंदु परिवार से बाहर होना चाहिए । हमें उनसे अपने भारत देश के लिए बलिदान, भारत के लिए भक्ति, भारत के लिए ज्ञान का आह्वान करना चाहिए । आदर्श स्वयं लक्ष्य हो; भारत का उत्थान भारत के लिए हो । यह भाव उनके जीवन में प्राण के समान व्याप्त हो । हमें उन्हें विद्यालय और घर दोनों में भारत के विषय में बताते रहना चाहिए ।
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राष्ट्र के पुननिर्माण की प्रक्रिया का आरंभ उसके arent की व्याख्या से करना होगा । यह इसलिए कि राष्ट्र में हमें तीन मूलभूत तत्त्वों का विचार करना है पहला देश अथवा क्षेत्र, दूसरा हमारा समाज और तीसरा राष्ट्रमानस । इनमें से अंतिम सर्वाधिक प्रभावशाली और सर्वनिदेशक है । उसको शक्तिशाली बनाकर हम शेष किसी एक या दोनों तत्त्वों में संशोधन, यहाँ तक कि उसकी पुरनरचना भी कर सकते हैं, जबकि इन दोनों तत्त्वों का उस पर प्रभाव अपेक्षाकृत क्षीण तथा अप्रत्यक्ष है । मनोशक्ति के द्वारा तो चाहे जितनी जड़ एवं दिद्रोही वस्तु का भी कायाकल्प
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किया जा सकता है, किंतु यदि मन ही विद्रोही हो तो उस तक कौन पहुँच सकता है ? इसका सीधा निष्कर्ष है कि राष्ट्र की पुर्नाचना में “शिक्षा' जितना महत्त्वपूर्ण तत्त्व अन्य कोई नहीं है ।
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अब प्रश्न है कि इसे राष्ट्रीय एवं राष्ट्रनिर्माणकारी कैसे बनाया जाए ? राष्ट्रीय शिक्षा किसे कहते हैं ? या उलटकर पूछो तो अराष्ट्रीय शिक्षा कैसी होती है ? इससे भी आगे बढ़कर पूछा जा सकता है कि किस प्रकार की शिक्षा हमें अपनी राष्ट्रीय समस्याओं को सुलझाने के लिए सक्षम और कटिबद्ध बना सकती है ? किस प्रकार की शिक्षा हो, जो केवल राष्ट्रीय ही नहीं बल्कि राष्ट्रनिर्मात्री भी हो ?
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शिक्षाप्रणाली में अनेक तत्त्वों का विचार करना पड़ता है विशेष प्रकार की शिक्षण विधियों की खोज, विभिन्न प्रकार के ज्ञान का उपयुक्त मात्रा में आत्मसातीकरण और स्वयं मनुष्य के व्यक्तित्व का निर्माण । निस्संदेह इन सब में यह अंतिम तत्त्व ही है । मनुष्य के अंदर भी उसके आदर्श ही सर्वोपरि निर्णायक तत्त्व होते हैं । किसी भी मनुष्य को ऐसा कुछ सिखाने का प्रयत्न व्यर्थ है, जिसे सीखने को वह इच्छुक नहीं है । जिस लाभ को वह लेना ही नहीं चाहता, उसे उस पर लादना मुूर्खता है । शिक्षा का काम खान खोदने के समान है, वह भी ऊपरी सतह से आदर्शों से शुरू होता है ।
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पुराने आदर्शों के माध्यम से ही नए आदर्शों तक पहुँचा जा सकता है । “अज्ञात' की यात्रा 'ज्ञात' से ही शुरू होती है । वास्तव में एक तो “आदर्श' है और एक उसे अभिव्यक्ति देनेवाला कोई स्थूल रूप होता है ale हम उस आदर्श तक पहुँच गए तो समझ लो कि हमने अनंत को प्राप्त कर लिया । यहाँ सारी मानवता एक हो जाती है । यहां न कुछ पुराना है, न नया है; न अपना है, न पराया है । आदर्श को सीमाबद्ध करनेवाले स्थूल रूप भले ही नए पुराने हो सकते हैं, परंतु आदर्श स्वयं में “कालातीत' होता है । फिर भी “नए आदर्श' जैसी शब्दावली का एक विशिष्ट अर्थ होता है । उदाहरणार्थ, यूरोपीय काव्य में सगाई हो चुकी हुई कुमारी को महानता और दिव्यता प्रदान की गई है; भारतीय काव्य पतितव्रता पत्नी का वैसा ही गुणगान करता है । ये दोनों ही परंपरागत रूप हैं, जिनके माध्यम से 'नारी की पवित्रता के सर्वोच्च आदर्श को प्राप्त करने का प्रयास किया गया है । फिर भी किसी यूरोपीय रूपक के माध्यम से भारतीय बालक की कल्पना को इस आदर्श तक ले जाना उसी प्रकार निष्फल रहेगा जिस प्रकार कि भारत में प्रचलित किसी रूपक के माध्यम से यूरोपीय बालक की कल्पना का उद्बुद्ध करना । परंतु जब शिक्षा के द्वारा कल्पना का उदात्तीकरण होकर नारीत्व के महान्‌ तथा दिव्य स्वरूप का दर्शन हो जाता है तो नए रूपों में भी उस आदर्श को हृदयंगम करने में कोई कठिनाई नहीं होगी । कोई प्रशिक्षित एवं विकसित हृदय टेनीसन अथवा ब्राउनिंग के काव्य को उसकी समस्त ऊँचाइयों व गहराइयों के साथ सुगमता से समझ सकेगा; परंतु इन Heat के माध्यम से किसी भारतीय बालक के विकास का प्रयास करना भारी अपराध होगा । उसी प्रकार किसी यूरोपीय बालक को बीट्रिस या जॉन ऑफ आर्क के बजाय सीता और सातित्री के चरित्र के माध्यम से शिक्षा देना उतना ही मुूर्खतापूर्ण होगा यद्यपि वही बालक बड़ा होने पर पौर्वात्य नारी रत्नों के प्रति सहज सहानुभूति से अभिभूत होकर अपनी संस्कृति की गहराई को आँक सकेगा ।
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राष्ट्रीय शिक्षा की व्याख्या
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राष्ट्रीय शिक्षा की पहली और सर्वोपरि व्याख्या है कि वह राष्ट्रीय आदर्शों का ज्ञान व संस्कार देनेवाली शिक्षा है । परंतु हमें याद रखना चाहिए कि शिक्षा का अंतिम उद्देश्य “सहानुभूति एवं विवेकबुद्धि का उदात्तीकरण' है । विदेशी प्रणालियों के द्वारा इस लक्ष्य पर पहुंचना प्रायः संभव नहीं होता । अधिकतम लोगों के उदृत्तीकरण के कार्य को सरल और प्रभावकारी ढंग से संपन्न करने के लिए आवश्यक है कि सुपरिचित आदर्शों और रूपकों का सहारा लिया जाए । प्रत्येक छात्र की शिक्षा को एक सतत प्रक्रिया के रूप में आयोजित करना होगा, ताकि उसकी बाल्यावस्था के अनुभवों एवं बाद के अनुभवों के बीच भारी दूरी न दिखाई दे। ऐसी दूरी से विचारों में संभ्रम पैदा होता है और यह वैचारिक भटकाव एक प्रकार से शैक्षिक प्रलय है । अतः राष्ट्रीय शिक्षा का तानाबाना परिचित परिवेश के आधार पर ही बुना जाना चाहिए। आदर्शों को सदैव हमारे अपने
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पहुँची है । हमारा चरित्र विदेशी आधार पर अंकुरित हुआ है । केवल बीज ही नहीं, गमला भी विदेशी है । हमारा पौरुष बरामदे में अमरबेल की तरह निराधार झूल रहा है, जिसकी जड़ें इस देश की वास्तविकता हमारे जीवन एवं हमारा समाज की पुरानी परंपराओं में कहीं नहीं है ।
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भारत में विगत काल में देशभक्ति का हास शिक्षा और राष्ट्रजीवन में इस विच्छेद्‌ के कारण ही हुआ है ।
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जनशिक्षा का दायित्व हम लें
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यह शिक्षा अंग्रेज सरकार द्वारा पचास से अधिक वर्ष पहले मुख्यतः अपने ही हित के लिए आरंभ की गई थी । अतः समय आ गया है कि अपने राष्ट्र के बौद्धिक जीवन के हित में - नहीं, इससे भी आगे संपूर्ण राष्ट्रजीवन के हित में आप और हम जनशिक्षा का दायित्व अपने हाथों में लें, जिससे हम लोकमानस को, राष्ट्र की इच्छाशक्ति को, राष्ट्र के हृदय को, राष्ट्र की ऊर्जा को दिशा देकर अपने राष्ट्र का भावी भाग्य स्वयं निर्माण कर सकें ।
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हमारी शिक्षाप्रणाली का ढाँचा
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अपने इस देश में हम जो शिक्षाप्रणाली आरंभ करना चाहते हैं, उसमें उदार तथा विज्ञानसम्मत सांस्कृतिक शिक्षा एवं तकनीकी शिक्षा दोनों का योग रहेगा । नेशनल काउंसिल ऑफ एजुकेशन ऑफ बंगाल (बंगाल की राष्ट्रीय शिक्षा परिषदू) के तत्त्वावधान में हमने पहले से ही जिस प्रणाली का ढाँचा तैयार किया है, उसमें भी उदार तथा वैज्ञानिक शिक्षा एवं तकनीकी प्रशिक्षण को साथसाथ मिलाया है । अन्य देशों में चाहे जो भी किया जा रहा हो, भारत में उदार तथा वैज्ञानिक शिक्षण से बिलकुल अलग करके केवल तकनीकी प्रशिक्षण को प्रस्थापित करना आत्मघाती होगा । हम मूलतः बुद्धिप्रधान राष्ट्र हैं और हम मात्र रोटीरोजी के लिए बौद्धिक जीवन का बलिदान नहीं कर सकते । आदमी केवल रोटी के लिए ही तो जिंदा नहीं रहता और न ही राष्ट्र केवल रोटी के लिए जीवित रहते हैं । किसी राष्ट्र के भावी भाग्य का निर्माण केवल साबुन के कारखाने तथा कपड़ा मिलें स्थापित करके नहीं होता । वास्तव में तो राष्ट्रकी आर्थिक उन्नति के लिए भी उदार तथा वैज्ञानिक शिक्षा अनिवार्य है । बुद्धि का प्रशिक्षण उदार शिक्षा एवं उदार संस्कारों से ही होता है। साथ ही तकनीकी विकास के लिए पदार्थों का ज्ञान प्राप्त करना आवश्यक है । यह पदार्थज्ञान वैज्ञानिक शिक्षा द्वारा ही प्राप्त हो सकता है । अतएव राष्ट्रीय शिक्षा की अपनी प्रणाली में हमने बारह वर्ष की आयु तक के बच्चों के लिए स्कूलों की छोटी कक्षाओं में तकनीकी प्रशिक्षण के साथ उदार तथा वैज्ञानिक शिक्षा का अनिवार्य सम्मिश्रण किया है। सामान्यतः उन कक्षाओं में जहाँ तक बारह वर्ष की आयु का बालक पहुँचता है, हम तकनीकी शिल्प नहीं सिखाते | इस कालावधि का पूरा उपयोग बालककी सहज बुद्धि का विकास करने, उसकी ग्रहणशक्ति को बढ़ाने एवं उसकी आँखों व हाथों को अधिक पुष्ट बनाने के लिए किया जाता है । इस काल में उनकी ज्ञानेंद्रियों के प्रशिक्षण की ओर भी ध्यान दिया जाता है । इंट्रियों के प्रशिक्षण के लिए उसे पदार्थों का सामान्य ज्ञान प्रदान किया जाता है । तेरहवें से चौदहवें वर्ष की आयु तक अर्थात्‌ दो वर्षों में इस प्रशिक्षित बुद्धि का और विकास हौता है एवं पदार्थज्ञान में और वृद्धि होती है । साथ ही हम उसे सिखाते हैं कि कैसे वह अपनी विकसित बुद्धि का दोनों कालखंडों में विशिष्ट वैज्ञानिक वातावरण में अर्जित पदार्थज्ञान पर प्रयोग करके किसीनकिसी विक्रय योग्य वस्तु का उत्पादन करें । और यह प्रशिक्षण क्रमशः आगे बढ़ता जाता है ।
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तीन शाखाएँ
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जब कोई नवयुवक राष्ट्रीय विद्यालय (नेशनल कॉलेज) में पहुँचता है तो वहाँ तीन शाखाएँ होती हैं । एक सामान्य उदार शिक्षा, जिसमें उसे भाषा इतिहास, दर्शन तथा कलाएँ सिखाई जाती हैं; दूसरी शाखा में विशुद्ध विज्ञान की शिक्षा दी जाती है और तीसरी शाखा में उसे ऊँची तकनीकी शिक्षा ग्रहण करने का प्रशिक्षण तथा उच्च स्तर के उत्पादन एवं वस्तुनिर्माण के लिए प्रोत्साहन दिया जाता है । वे लोग जिन्हें जीवनयापन के लिए कमाना नहीं पड़ता अर्थात्‌
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अनुसार विभिन्न वर्गों में विभाजित थे, जिनकी उपस्थिति उनकी प्रगति से निर्धारित होती थी । कलकत्ता विश्वविद्यालय के मैट्रीकुलेशन की परीक्षा आठ वर्षों की जगह छह वर्ष में पूरी कराई जाती थी । उस वर्ग को छोड़कर अन्य वर्गों में पुस्तकों का प्रचलन न था ।
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बांगला, अंग्रेजी और संस्कृत भाषोएँ वार्तालाप द्वारा पढ़ाई जाती थीं । मातृभाषा का स्तर ऊँचा रखने के लिए पाठ्यपुस्तकों के अतिरिक्त अन्य पुस्तकों को पढ़ने के लिए प्रोत्साहित किया जाता था । गुरुदेव स्वयं छात्रों को शेक्यपीयर तथा वर्ड्सवर्थ के साहित्य से परिचित कराया करते थे, क्योंकि उनका विश्वास था कि छात्र हमारी आशा से अधिक ज्ञान ग्रहण करने की क्षमता रखते हैं । विज्ञान में नक्षत्रों तथा अन्य प्राकृतिक तत्त्वों का अध्ययन साक्षात्‌ साधनों से प्रकृति की प्रयोगशाला में संपन्न होता था । छात्र किसी विशिष्ट कृमि एवं पुष्प का उसके जन्म से मृत्यु तक निरीक्षण करते थे । इतिहास और पुराण शास्त्र कहानियों के माध्यम से पढ़ाए जाते थे, जिससे तथ्यों पर कम और भारत के feat पर अधिक बल रहता था । संगीत और चित्रांकन नियमित रूप से चलते थे । बाद में अभिनय भी आरंभ हुआ, जिसके लिए टैगोर स्वयं नाटक लिखते थे ।
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शांति निकेतन का दैनिक जीवन बड़ा मोहक और शिक्षाप्रद था । छात्र सूर्योदय से बहुत पहले ही उठ जाते थे और भजन गाते हुए आश्रम की प्रभात-फेरी करते थे । निस्तब्ध वायुमंडल में उनकी सरस ध्वनियाँ ऐसा भक्तिभाव जाग्रत करती थीं कि उससे आत्मा को बड़ी शांति मिलती थी । कुछ समय के बाद प्रत्येक छात्र अपनाअपना आसन लेकर मैदान में बैठकर मनन करता था । फिर विद्यालय का कार्य आरंभ होने पर सब छात्र एवं अध्यापक वृक्षों की छाया में सामूहिक प्रार्थना करते थे । फिर साढ़े दस या ग्यारह बजे तक पढ़ाई होती थी । मुक्त गान या वृक्षों के नीचे आठ- आठ, दस-दस छात्र शिक्षक को घेरकर बैठ जाते और उससे प्रश्न पूछते । इससे प्रत्येक वर्ग के अध्यापन में पर्याप्त सजीवता और सक्रियता बनी रहती । बालक नंगे पैर घूमघूमकर अथवा वृक्षों पर बैठकर पढ़ते थे । प्रातःरकालीन अध्ययन समाप्त कर छात्र नहातेधोते और भोजन करते थे ।
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अपराह्व दो बजे से फिर पढ़ाई शुरू होती; किंतु अब हस्तकला, कताई-बुनाई, काष्ठकला, चित्रांकन, संगीत आदि का कार्य कराया जाता था । इस समय पुस्तकीय कार्य बहुत कम होता था । चार बजे तक कक्षाएँ समाप्त हो जातीं और बालक खेल के मैदान की ओर दौड़ पड़ते । कुछ खेतों व वनों में कार्य करने चले जाते तो कुछ ग्रामसेवा के लिए निकल जाते । वे औषधियाँ भी वितरित करते थे । सूर्यास्त होते ही सब लौट आते और कुछ क्षणों के लिए मौन मनन करते । रात्रि में विनोद गोष्ठियाँ होतीं, जिनमें गुरुदेव कहानियाँ सुनाते, गीत गाते, नाटक और सम्मेलन होते । नौ बजे रात्रि में भजन मंडली फिर घुमती और तदनंतर सब शयन करने चले जाते ।
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सारा वातावरण रवींद्र संगीत से गूँजा करता था और क्रियाशीलता, स्वतंत्रता तथा आनंद से ओतप्रोत रहता था । पियर्सन ने अपनी अनुभूति व्यक्त करते हुए लिखा है 'इस वातावरण में आत्मनुभूति संभव है यहाँ मानव अपने को समस्त विश्व के ऊपर पाता है । यहाँ मानव की व्यथित आत्मा को शांति प्राप्त होती है ।' परंतु शांति निकेतन की आर्थिक कठिनाइयाँ कवि के लिए सदैव चिंता का विषय बनी रहीं । जब कभी उसमें निर्जीव पदार्थों के अधिक मात्रा में संकलित होने पर उन्हें विचारअवरुद्ध होने की आशंका हुई तो उन्होंने परिवर्तन करने में हिचकिचाहट नहीं दिखाई ।
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श्री निकेतन
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कवि के अपने शब्दों में “श्री निकेतन का उद्देश्य गाँवों में पूर्ण जीवन बिखेर देना है, ताकि ग्रामीणों में आत्मविश्वास और आत्मसम्मान बढ़े । वे अपने देश की सांस्कृतिक परंपराओं से परिचित हों और अपनी शारीरिक, बौद्धिक तथा आर्थिक स्थितियों में सुधार करने के लिए आधुनिक साधनों का उपयोग कर सकें ।' श्री निकेतन का कार्यक्रम चार प्रमुख विभागों में विभाजित किया गया ।
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१. कृषि (पशुपालन सहित) इसके अंतर्गत कृषि, दुग्धशाला, कुक्टपालन, कोश कीट-पालन तथा मत्स्य अनुभाग हैं ।
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२. उद्योग विभाग, जिसमें प्राचीन कुटीर उद्योग एवं
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शिल्पकारी को प्रोत्साहित किया जाता है और चमड़ा, मिट्टी, काठ आदि के शिल्प कार्य होते हैं ।
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३. ग्राम कल्याण विभाग, ग्रामवासियों को वे सब उपादान उपलब्ध कराता है, जिनसे वे अपनी समस्याएँ स्वयं सुलझा लें और आत्मनिर्भर बनें । इसके लिए बीजों तथा पादपों का वितरण, नई विधियों और उपकरणों का प्रयोग, स्वास्थ्य संबंधी जानकारी देना, सहकारी समितियों का गठन, ब्रती बालकों का बालचर संगठन तथा ग्राम सर्वेक्षण एवं शोध आते हैं ।
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४. शिक्षा विभाग, इसकी क्रियाएँ चार मुख्य भागों में विभक्त हैं, यथा, शिक्षा सत्र, लोक शिक्षा संस४द, व्यावसायिक शिक्षा और शिक्षा चर्चा भवन ।
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पहले दो भागों का वर्णन अलग से नीचे दिया जा रहा है । व्यावसायिक शिक्षा संबंधी प्रायोगिक कार्य, जो उपविभागों में होता है, उनका सैद्धांतिक विवेचन इस विभाग में किया जाता है । शिक्षा चर्चा भवन में प्राथमिक विद्यालयों के शिक्षकों के प्रशिक्षण का कार्य होता है । उनके पाठ्यक्रम में संगीत, कृषि, स्वास्थ्य, बालचर तथा ग्राम पुनर्निर्माण के सिद्धांत भी सम्मिलित हैं ।
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श्री निकेतन का कार्यक्रम जीवन केंद्रित तथा समाज केंद्रित है । इसका समस्त कार्यक्रम मानव जीवन की क्रियाओं को आधार मानकर बनाया गया है । ज्ञान अपने स्वयं के लिए नहीं दिया जाता वरन्‌ किसी सार्थक क्रिया से संबंधित होने के कारण सजीव ढंग से दिया जाता है । सामुदायिक जीवन की आवश्यकताओं, जैसे आपसी संबंधों, सांस्कृतिक कार्यक्रमों, त्योहारों तथा आयोजनों को प्रमुखता दी जाती है । जॉन रसेल के अनुसार, “इसकी विशेषता यह है कि सब कार्य ग्रामीणों के ट्वारा ही किया जाता है, जो अपने गाँव का उत्थान करने में बड़ी रुचि लेते हैं । उनमें मानव जीवन के उत्कर्ष की प्रेरणा देखते ही बनती है ।'
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शिक्षासत्र
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शिक्षासत्र अलग से खोला गया था, किंतु दो वर्ष बाद वह श्री निकेतन में मिला दिया गया । उसका उद्देश्य उन्मुक्त अनुभवों और स्वच्छंद अभिव्यक्ति ट्वारा बालक का निर्बाध विकास करना था, जिससे वह अपनी सुरक्षा दैनिक व्यावहारिक कार्यों की कुशलता, जीविकोपार्जन की निपुणता तथा सहकारितापूर्वक कार्य करने की सामाजिक दक्षता प्राप्त कर सके । ग्रामीण बालकों को नेतृत्व का प्रशिक्षण देना इसका प्रमुख लक्ष्य था । इसके लिए एक क्रियात्मक पाठ्यक्रम बनाया गया था, जो प्रकृति या समाज के प्रत्यक्ष अनुभव से प्रसूत होता था । आरंभ से ही बालकों को गृहशिल्प या हस्तशिल्प की शिक्षा दी जाती थी | प्रत्येक बालक को निश्चित भूखंड निर्धारित कर दिया गया था, जिसमें वह फलफूल, शाकभाजी उगाकर उसका रक्षण करता था । इन कार्यों से संबंधित पढ़नेलिखने, गिनने तथा विज्ञान की शिक्षा दी जाती थी ।
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शिक्षासत्र समयसारणी अथवा नियमावली से मुक्त था । दिनचर्या बागबानी से आरंभ होती थी । एक घंटे तक भाषा तथा गणित के अध्यापन के बाद बालक अपने लिए निर्धारित भूखंडों में कार्य करने चले जाते थे । शेष दिन गृहशिल्प या eased सीखने में लगाते थे । सायंकाल अध्यापक *रामायण' तथा “महाभारत” जैसे धार्मिक ग्रंथों का पाठ सुनाया करते थे । सब बालक अपना भोजन बनाते थे । प्रति सप्ताह सरस्वती यात्राएँ होती थीं । भजन, संगीत, अभिनय का भी कार्यक्रम निश्चित रहता था । बालजीवन की स्फूर्तियों , आकर्षणों तथा सादगी पर आधारित ऐसा उन्मुक्त वातावरण प्रस्तुत करना, जो स्चनात्मक संभावनाओं तथा आनंदमय क्रिड़ाओं की सुविधाओं से परिपूर्ण हो, इस प्रयोग का लक्ष्य था, जिसमें वह बड़ी सीमा तक सफल भी हुआ |
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लोकशिक्षा संसद्‌
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खींद्रनाथ चाहते थे कि देश के ऐसे असंख्य लोगों के लिए भी उच्च शिक्षा सुलभ हो, जो धनाभाव के कारण स्कूलों और कॉलेजों में नहीं पढ़ पाते । उनके लिए वे देश में शिक्षा और परीक्षा के केंद्रों का जाल बिछा देना चाहते थे । अतएव उन्होंने सन्‌ १९३६ में लोकशिक्षा संसदू की स्थापना की । संसदू ने मैट्रीकुलेशन, इंटरमीडिएट तथा बी.ए. के समकक्ष आद्या, मध्या और उपाधि की परीक्षाएँ लेना आरंभ किया तथा बाद में पूर्वमैट्रीकुलेशन की भी परीक्षा चलाई ।
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पाठ्यक्रम में बँगला, प्रारंभिक हिंदी, इतिहास, भूगोल, गणित, विज्ञान, हाइजीन, सामान्य ज्ञान आदि विषय रखे गए थे ।
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इसके तत्त्वावधान में उन्होंने सरल संक्षिप्त भाषा में सस्ती पुस्तकें प्रकाशित करने की व्यवस्था की, जिससे सामान्य ज्ञान का लोगों में विस्तार हो सके । इस लोकशिक्षा ग्रंथमाला के अंतर्गत उनके द्वारा लिखित पहला प्रकाशन “विश्व परिचय था, जो विज्ञान की पुस्तक थी । इसी प्रकार साहित्य, इतिहास, संस्कृति और विज्ञान पर अन्य अनेक ग्रंथों का प्रकाशन हुआ । जन शिक्षा के लिए किया गया यह उनका महत्त्वपूर्ण प्रयास था । उनका विश्वास था कि देश के उत्थान के लिए अधिकाधिक शिक्षा का प्रसार आवश्यक है ।
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विश्वभारती
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शांति निकेतन की स्थापना के बाद कवि के मन में यह विचार आया कि हमारे विश्वविद्यालय पाश्चात्य प्रतिमानों के अनुकरण मात्र हैं । युगों से भारत की संस्कृति गौरवमयी रही है; किंतु उसकी परंपराओं को प्रतिबिबित करनेवाली कोई संस्था नहीं है, अतएव एक भारतीय संस्कृति का केंद्र खोला जाए । किंतु इस शताब्दी के आरंभ से पाश्चात्य देशों की बढ़ती हुई राष्ट्रीयता, जिसका अंत प्रथम विश्वयुद्ध की विभीषिका में हुआ, से वे बड़े उद्धिम हुए । कविवर सोचने लगे कि इस अहंकारी एकांतिक राष्ट्रीयता के परे जाकर समग्र मानवता तक पहुँचना चाहिए । अतएव विश्वभारती की पूर्ण संकल्पना में उन्होंने पूर्व और पश्चिम को पूरी तरह से सम्मिलित कर मानव जाति की एकता के लिए ज्ञान और आध्यात्मिक प्रयत्नों के सहयोग की सोची । इस प्रयोजन से उन्होंने शांति निकेतन में सन्‌ १९२१ में विश्वमारती की स्थापना की ।
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विश्वमारती का आदर्श वाक्य था -‘यत्र विधं भवति एक नीडमू' इसके प्रमुख उद्देश्य इस प्रकार थे -
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१, भारतीय संस्कृति और आदर्शों के आधार पर शिक्षा देना,
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२. प्राच्य संस्कृतियों में घनिष्ठ संबंध और सामंजस्य स्थापित करना तथा उनका पाश्चात्य विचारधारा से समन्वय करना,
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३. विश्वबंधुत्व की भावना विकसित करते हुए विश्वशांति की स्थिति उत्पन्न करना,
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¥. संस्था को ऐसा सांस्कृतिक विश्व केंद्र बनाना जहाँ धर्म, साहित्य, विज्ञान, इतिहास तथा भारतीय और पाश्चात्य सभ्यताओं का अध्ययन हो सके ।
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विश्वभारती के क्रियाकलापों को चार क्षेत्रों में विभाजित किया गया है, यथाभारतीय संस्कृति का केंद्र, प्राच्य संस्कृति का केंद्र, आंतरराष्ट्रीय संस्कृति का केंद्र तथा ग्राम्य पुनर्निर्माण एवं जन-कल्याण केंद्र ।
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विश्वभारती में अग्रांकित दस विभाग हैं -
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१, पथ भवन - शालेय शिक्षा का विभाग, २. शिक्षा भवन - उच्चतर माध्यमिक विभाग, २. विद्या भवन - महाविद्यालय विभाग, ४. विनय भवन - शिक्षक प्रशिक्षण विभाग, ५. कला भवन - ललित कला विभाग, ६. शिल्प भवन - कुटीर उद्योग विभाग, ७. संगीत भवन - संगीत नृत्य विभाग, ८. चीन भवन - चीनी एवं भारतीय संस्कृतियों का अध्ययन विभाग, ९. हिंदी भवन - हिंदी तथा तिब्बती शोध विभाग, और १०. श्री निकेतन - ग्रामोद्धार विभाग ।
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विश्वभारती की अनेक विशेषताएँ हैं । इसका पाठ्यक्रम बड़ा व्यापक है, जिससे छात्र अपनी रुचि का विषय चुन सकते हैं । यहाँ भारत के विभिन्न प्रदेशों तथा एशिया, यूरोप और अमेरिका के अनेक देशों से छात्र व छात्राएँ अध्ययन करने आते हैं । वे किसी एक विभाग में प्रवेश लेने पर बिना अतिरिक्त शुल्क दिए अपनी रुचि अनुसार अन्य विभागों में भी शिक्षा प्राप्त कर सकते हैं । यहाँ सामुदायिक जीवनयापन और समाज सेवा पर बल दिया जाता है । मारजरी साइबस के कथनानुसार - “विश्वभारती में तीन संकेंद्रीय वृत्त हैं - सबसे आंतरिक भारत का, दूसरा एशिया का और तीसरा सारे विश्व का । जाति, धर्म, वर्ण आदि के भेदों के परे यह संस्था परम सत्ता के नाम पर प्राच्य एवं पाश्चात्य विद्वानों तथा चिंतकों के विचार-विनिमय करने का संगम स्थल है ।'
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७. गांधीजी के शैक्षिक प्रयोग
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भारतीय शैक्षिक क्षितिज पर गांधीजी के अवतरण के पूर्व ही अनेक शिक्षा-चिंतकों ने आंग्ल शिक्षा-प्रणाली की व्यर्थता का अनुभव करते हुए तत्कालीन शिक्षा-प्रणाली की ae आलोचना की थी । भारतीय संस्कृति का पुनरुत्थान करने, युवकों में स्वदेश-प्रेम का स्फुरण करने एवं शिक्षा को सार्वभौमिक बनाने के लिए उस समय यह अनुभव किया जा रहा था कि सात समुद्र पार से लाई गई शिक्षा-प्रणाली के विकल्प के रूप में कोई राष्ट्रीय शिक्षा-प्रणाली विकसित की जाए । कुछ प्रयोग इस दिशा में किए जा रहे थे । ऐसे ही समय में सन्‌ १९१५ में गांधीजी जब दक्षिण अफ्रीका से लौटे तो कुछ समय गुरुदेव रवींट्रनाथ ठाकुर के शैक्षिक प्रयोग शांति निकेतन के सान्निध्य में रहे ।
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प्रत्यक्ष अनुभव
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गांधीजी के शिक्षा संबंधी विचार किताबी ज्ञान पर आधारित नहीं थे । जनवरी १८९७ में गांधीजी दक्षिण आफ्रीका वापस लौटकर डरबन में अपने परिवार के साथ रहने लगे । उस समय उनके तीन बच्चे थे, जिनकी आयु क्रमशः दस, आठ और पाँच वर्ष थी । उनकी शिक्षा का प्रश्न जब उपस्थित हुआ तो सबसे पहले उनके मन में शिक्षा संबंधी विचार उठे । गांधीजी के शब्दों में - “बच्चे एक सुन्यवस्थित घर में कुदरती तौर पर जो शिक्षा ग्रहण करते हैं, वह छात्रावासों में मिलना असंभव है; इसलिए मैंने अपने बच्चों को अपने साथ रखा ।' कुछ धंधों के माध्यम से गांधीजी ने अपने बच्चों को शिक्षा देना प्रारंभ कर दिया । सन्‌ १९०४ में गांधीजीने अपने साथियों के सहयोग से डरबन से १४ मील दूर एवं फीनिक्स स्टेशन से २.५ मील दूर २० एकड़ भूमि पर “फीनिक्स परिवार नाम से एक आश्रम की स्थापना की और वहाँ के बच्चों की शिक्षा- दीक्षा का प्रबंध किया । सन्‌ १९०९ में ट्रांससाल नामक स्थान पर “टॉल्स्टॉय आश्रम' की स्थापना करके गांधीजीने उपयोगी शिक्षा-पद्धति खोज निकालने का संकल्प लिया । फीनिक्स परिवार के अनुभव उनके पास थे ही । टॉल्स्टॉय आश्रम में उन्होंने अपनी दो मूलभूत धारणाओं को मूर्तरूप दिया । उनकी पहली धारणा यह थी कि सच्ची शिक्षा माता-पिता ही दे सकते हैं । अतः उन्होंने आश्रम में अपने को पिता के स्थान पर रखकर कार्यारिंभ किया । उनकी दूसरी धारणा थी कि सच्ची शिक्षा की नींव चरित्र-निर्माण है । अतः टॉल्स्टॉय आश्रम में चरित्र-निर्माण पर बल था ।
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गांधीजी जब भारत आए तो कुछ समय शांति निकेतन में रहने के बाद उन्होंने अहमदाबाद के समीप साबरमती आश्रम की स्थापना की । साबरमती आश्रम में उन्होंने उत्पादक उद्योगों की ओर बालकों का ध्यान आकृष्ट किया और साक्षरता के साथ-साथ किसी उद्योग को सीखने के लिए बालकों को प्रोत्साहित किया । साबरमती के बाद गांधीजी वर्धा जिले के सेवाग्राम में रहने लगे, यहाँ पर भी आश्रम के बच्चों पर उनके शिक्षा-प्रयोग चलते रहे ।
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विद्यापीठों की श्रृंखला
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सन्‌ १९२० में राष्ट्रीय आंदोलन के क्रम में गांधी ने यह अनुभव किया कि जो छात्र अंग्रेजी शिक्षा का बहिष्कार करके राष्ट्र के स्वाधीनता आंदोलन में भाग लेने चले आए हैं, उनकी शिक्षा का प्रबंध कहीं-न-कहीं होना चाहिए । इसी चिंतन की प्रक्रिया में उन्हें राष्ट्रीय विद्यापीठों की स्थापना की आवश्यकता की अनुभूति हुई । इसका परिणाम यह हुआ कि महाराष्ट्र में तिलक विद्यापीठ, बिहार में बिहार विद्यापीठ, उत्तर प्रदेश में काशी विद्यापीठ और गुजरात में गुजरात विद्यापीठ की स्थापना हो गई । अन्य विद्यापीठ भी स्थापित हुए । महात्मा गांधी की प्रेरणा से स्थापित गुजरात विद्यापीठ में राष्ट्रीय आवश्यकता की पूर्ति में समर्थ नागरिकों का निर्माण करने का संकल्प लिया गया । इस विद्यापीठ में शिक्षण की योजना इस प्रकार बताई गई कि इसके प्रत्येक कार्य से छात्रों को देशप्रेम तथा राष्ट्रीयता की प्रेरणा प्राप्त हों । पाठ्यक्रम में भारतीय साहित्य, भारतीय संस्कृति,
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भारतीय सभ्यता और भारतीय इतिहास को प्रमुख स्थान दिया गया । पाश्चात्य ज्ञान-विज्ञान के शिक्षण की भी उत्तम व्यवस्था की गई । शिक्षा का माध्यम गुजराती भाषा को बनाया गया; किंतु हिंदी व संस्कृत के अध्ययन पर बल दिया गया और अंग्रेजी को भी स्थान दिया गया । शिक्षक प्रायः स्वतंत्रता संग्राम के सेनानी थे । इन शिक्षकों के आचरण में सच्चरित्रता, वाणी में तेजस्विता, व्यवहार व कर्म में देश-प्रेम व्याप्त था । शिक्षण व्यवसाय इन शिक्षकों के लिए जीविका का आधार न था । इन्होंने शिक्षण कार्य को स्वतंत्रता आंदोलन व राष्ट्र-विकास का महत्त्वपूर्ण अंग माना था । विद्यार्थी प्रायः वह थे जिन्होंने राष्ट्र की पुकार पर अंग्रेजी शिक्षा का बहिष्कार किया और स्कूल-कोलेज छोड़कर स्वतंत्रता संग्राम में कूद पड़े थे । अपने समय में गुजरात विद्यापीठ बहुत सफल रहा । आज यह विद्यापीठ सरकार द्वारा मान्य विश्वविद्यालय है । यद्यपि इसमें अभी भी अनेक विशेषताएँ विद्यमान हैं, किंतु यह भी अब अन्य विश्वविद्यालयों की भाँति अनेक सामाजिक बुराइयों का शिकार होता जा रहा है ।
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जामिया मिछ्लिया
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जामिया मिढ्ठिया की स्थापना २९ अक्टूबर, १९२० को अलीगढ़ में हुई । पं. जवाहरलाल नहेरु के शब्दो में - “यह असहयोग आंदोलन का स्वस्थ बच्चा था ।' गांधीजी मौलाना मुहम्मद अली और शौकत अली के साथ देश का भ्रमण करते हुए अलीगढ़ कॉलेज पहुँचे और वहाँ के छात्रों को स्वतंत्रता आंदोलन में भाग लेने को प्रेरित किया । इन छात्रों के लिए वैकल्पिक शिक्षा की व्यवस्था हेतु जामिया की स्थापना हुई। हकीम अजमल खाँ इसके प्रथम कुलाधिपति तथा मौलाना मुहम्मद अली इसके कुलपति बनाए गए । डॉ. मुक्थार अहमद अंसारी इसके अवैतनिक सचिव नियुक्त हुए । जामिया के व्यय का भार केंद्रीय खिलाफत कमेटी के ऊपर डाला गया । मुसलमानों की धार्मिक शिक्षा के प्रबंध का भी निश्चय किया गया । २२ नवंबर, १९२० के फाउंडेशन कमेटी के प्रथम उत्सव के अवसर पर १९ सदस्यों की एक समिति नियुक्त हुई, जिसमें पं, जवाहरलाल नहेरू एवं डॉ. राजेंद्र प्रसाद के नाम भी थे । सन्‌ १९२१ में जामिया मिडिया का प्रथम दीक्षांत समारोह हुआ । इस अवसर पर हकीम अजमल खाँने अपने अध्यक्षीय भाषण में जामिया मिढट्डिया के पाँच सिद्धांत बताए |
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प्रथम सिद्दांत था धर्म की कुंजी से दुनिया के दरवाजे खोलो ।' उन्होंने आगे कहा, “अगरचे हमने तमाम आधुनिक शास्त्रों को अपनी शिक्षा में जगह दी है, लेकिन कुरान और इस्लाम को मुख्य और उन्हें गौण बनाया है ।' दूसरा सिद्धांत इस्लाम के इतिहास से संबद्ध था । इस्लामी इतिहास को जामिया की शिक्षा में अनिवार्य बनाया गया था, क्योंकि उनका खयाल था कि यह मुसलिम कौम की परंपरा को एकसूत्र में पिरोने के लिए स्मरण रखनेवाली चीज है । तीसरा सिद्धांत था - मातृभाषा के माध्यम से शिक्षा और चौथा सिद्दांत था - रोजगार और दस्तकारी की शिक्षा को अनिवार्य बनाना । पाँचवाँ सिद्धांत बताया गया कि जामिया में मिलीजुली राष्ट्रीता का विकास होगा । हकीम साहब ने फरमाया था, “चुनांचे इस बात का विशेष रूप से ध्यान रखा गया है कि यहाँ हिंदू तालिब इल्मों के लिए इस्लाम की बहुत सी बातों का ज्ञान प्राप्त करना जरूरी है, वहाँ मुसलमान विद्यार्थी भी हिंदू रीति-रिवाजों और हिंदू सभ्यता से अपरिचित नहीं रहेंगे ।'
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दो वर्ष बाद जामिया पर आर्थिक संकट आ गया । राष्ट्रीयता का जोश कुछ ठंडा होने लगा । उस समय गांधीजी इसके “विजिटर' थे । उन्होंने हकीम साहब को हिम्मत दिलाई और उनकी प्रेरणा से सन्‌ १९२४ में जामिया को अलीगढ़ से दिल्ली स्थानांतरित कर दिया गया । कुछ समय पश्चात्‌ इसके कुलपति के रूप में डॉ. जाकिर हुसैन का आगमन हुआ और यह संस्था दिनानुदिन विकसित होती गई ।
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जामिया मिढ़लिया में गांधीजी के बेसिक शिक्षा के सिद्धांतों को मूर्तरूप देने का प्रयास किया गया । यही नहीं, आधुनिकतम शिक्षण-विधियों को अपनाने में जामिया को कोई झिझक नहीं हुई । प्रोजेक्ट मैथड पर उपयोगी कार्य हुआ । बच्चों का बैंक खोला गया, बच्चों की दुकान खोली
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गई । मुरगीखाना, चिड़ियाघर, दीवारी अखबार जैसे शैक्षिक कार्य चल निकले । स्वतंत्र भारत में भी जामिया ने अपने पुराने आदर्शों को कायम रखने का प्रयास किया । जून १९६२ में विश्वविद्यालय अनुदान आयोग ने इसे राष्ट्रीय महत्त्व की संस्था घोषित किया । आज यह एक डीम्ड विश्वविद्यालय है और इसकी उपाधियों की सर्वत्र मान्यता है; किंतु इस मान्यता के साथ जामिया भी अब दूसरे महाविद्यालयों एवं विश्वविद्यालयों की भाँति साधारण संस्था के रूप में परिवर्तित हो गई है ।
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बेसिक शिक्षा का जन्म
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स्वपरिवार, फीनिक्स परिवार, टॉल्स्टॉय आश्रम, शांति निकेतन, साबरमती आश्रम और सेवाग्राम तथा विद्यापीठों के अनुभवों एवं प्रयोगों को ठोस रूप मिला २२ और २३ अक्तूबर, १९३७ को वर्धा सम्मेलन में, जिसमें डॉ. जाकिर हुसैन, खुशाल तलकशी शाह, डॉ. सैयद महमूद, विनोबा भावे, प्रफुल्लचंद्र राय, काका कालेलकर, रविशंकर शुक्ल, अविनाश लिंगमू, श्रीमती आशा देवी, किशोरीलाल मशरूवाला, के. जी. dada, जे. सी. कुमारप्पा, आर्यनायकम्‌ प्रभृति अस्सी शिक्षाप्रेमी एकत्र हुए थे और गांधीजी के प्रस्ताव के पक्ष या विपक्ष में उन्होंने अपने विचार प्रकट किए । इस सम्मेलन की अध्यक्षता स्वयं गांधीजी ने की । वर्धा सम्मेलन में पारित प्रस्तावों के आधार पर एक शिक्षा योजना प्रस्तुत करने के लिए डॉ. जाकिर हुसैन के सभापतित्व में एक समिति की नियुक्ति की गई और इस समिति का प्रतिवेदन ही बेसिक शिक्षा का प्रामाणिक दस्तावेज बना । अप्रैल १९३८ में हिरपुरा में संपन्न कांग्रेस अधिवेशन में इस प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया गया और बेसिक शिक्षा को पार्टी के कार्यक्रम में समाविष्ट कर लिया गया ।
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बेसिक शिक्षा के मूलभूत सिद्धांत
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“बेसिक शिक्षा' अथवा “आधारभूत शिक्षा' या “बुनियादी शिक्षा' या बुनियादी तालीम' या “नई तालीम' के नाम से जानी गई इस शिक्षा के चार प्रमुख सिद्धांत हैं -
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१, सार्वभौम अनिवार्य निःशुल्क शिक्षा - वर्धा सम्मेलन में पारित पहला प्रस्ताव था । “इस परिषदू की सम्मति में देश के सब बच्चों के लिए सात वर्षों की निःशुल्क और अनिवार्य शिक्षा का प्रबंध होना चाहिए ।' वैसे वर्धा सम्मेलन के सत्ताईस वर्ष पूर्व गोपाल कृष्ण गोखले ने एक प्रस्ताव द्वारा प्राथमिक शिक्षा को अनिवार्य एवं निःशुल्क करने की माँग की थी और सन्‌ १९११ में उन्होंने इस आशय का एक बिल भी पेश किया था, जो पास नहीं हो सका था । सन्‌ १९१८-२० में विभिन्न प्रांतीय सरकारों ने प्राइमरी एजुकेशन एक्ट पास कर प्राथमिक शिक्षा को अनिवार्य एवं निःशुल्क बनाने का अधिकार जिला परिषदों एवं नगर पालिकाओं को दे दिया; किंतु इससे कोई विशेष लाभ नहीं हुआ |
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जिस समय बेसिक शिक्षा की कल्पना की गई उस समय देश परतंत्र था, अनेक अभिशापों से ग्रस्त था । भारतीय गरीब, दुःखी व निरक्षर थे । प्राकृतिक साधनों से संपन्न यह देश विदेशियों की विलास-स्थली बना हुआ था । अपने ही देश में भारतीय बच्चे पराए थे, परित्यक्त थे और उपेक्षित व दीन-हीन थे । इसका मूल कारण था व्यापक निरक्षरता व अशिक्षा । कुछ गिने-चुने लोग साक्षर एवं सचेत हो रहे थे; किंतु जब तक व्यापक रूप में जनता शिक्षित न हो तब तक विकास अवरुद्ध ही रहेगा । यह सब तभी संभव है जब कुछ समय तक की शिक्षा को अनिवार्य किया जाए। अंग्रेजी शिक्षा की तत्कालीन प्रणाली में अनिवार्यता नहीं थी । कुछ साधन-संपन्न लोग पढ़ाई का खर्च उठा सकने में समर्थ थे और वे ही शिक्षा प्राप्त कर रहे थे। शेष अज्ञान तथा अंधकार में डूबे हुए थे । अतः अनिवार्यता के लिए यह आवश्यक था कि शिक्षा को निःशुल्क बनाया जाए । इसीलिए मूल प्रस्ताव के अनुसार सात वर्षों की शिक्षा को निःशुल्क एवं अनिवार्य बनाने का आग्रह किया गया । बाद में स्वतंत्र भारत में संविधान ने चौदह वर्ष की आयु तक के बालकों को अनिवार्य एवं निःशुल्क शिक्षा देने की घोषणा की ।
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२. मातृभाषा के माध्यम से शिक्षा - बेसिक शिक्षा का दूसरा मूल सिद्धांत था मातृभाषा के माध्यम से शिक्षा
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मंत्री आर्यनायकम्‌ नियुक्त हुए । इस संघ ने गांधीजी के सिद्धांतों का संकलन, संपादन एवं प्रकाशन का कार्य अपने हाथ में लिया । बेसिक शिक्षा के प्रसार में हिंदुस्तानी तालीम संघ का बहुत योगदान है । हिंदुस्तानी तालीमी संघ ने कुछ दिन जामिया मिढ्ठिया के माध्यमिक विद्यालय को आर्थिक सहायता भी प्रदान की । सन्‌ १९५९ में यह संघ सर्वसेवा संघ में विलीन हो गया |
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बेसिक शिक्षा की समीक्षा
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उपर्युक्त मूल सिद्धांती के आधार पर बेसिक शिक्षा का प्रयोग देश में प्रारंभ हुआ । अनेक शिक्षा-शाख्ियों ने शिक्षा-शाख्त्र की दृष्टि से इस प्रयोग की समीक्षा प्रारंभ की । डॉ. कालूलाल श्रीमाली ने वर्धा शिक्षा योजना पर डॉक्टेेट स्तर का कार्य किया । डॉ. एम. एस. पटेल ने “महात्मा गांधी का शिक्षा-दर्शन' (नवजीवन पब्लिशिंग हाउस से प्रकाशित) नामक शोध ग्रंथ लिखा। अन्य शिक्षा अनुसंधानों में भी बेसिक शिक्षा पर गंभीरता से विचार किया गया । सभी अनुसंधानकर्ताओं ने बेसिक शिक्षा के उपर्युक्त सिद्धांतों की समीक्षा की और उनका विश्लेषण वर्तमान शिक्षा-शाख्र के संदर्भ में किया । इन अनुसंधानों में यह बताया गया कि बेसिक शिक्षा का दर्शन समयानुकूल है, इसका मनोवैज्ञानिक पक्ष सबल है । इसका समाज-शास्त्रीय पक्ष पुष्ठ है और इसमें आर्थिक पक्ष की उपेक्षा नहीं की गई है । बेसिक शिक्षा को बाल-केंद्रित शिक्षा बताया गया है । इसे गतिशील शिक्षा कहा गया है और इसमें सहकारिता के गुण को उजागर किया गया है ।
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गांधीजी के सत्य एवं अहिंसा की दृष्टि से भी बेसिक शिक्षा पर विचार किया गया है और इसे सत्यान्वेषी शिक्षा कहा गया है । केवल पुस्तकीय शिक्षा बालकों को सत्य और वास्तविकता से दूर रखती है । जीवन का प्रत्यक्ष सत्य अनुभव बेसिक शिक्षा में संभव है। इसमें बालक के आत्मविश्वास को जगा दिया जाता है । आत्मबल के अभाव में बालक कायर बन जाता है और कायर पुरुष हिंसक व्यापार करता है। बेसिक शिक्षा में अहिंसा के प्रयोग के अवसर विद्यमान हैं ।
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गांधीवादी दर्शन का व्यावहारिक पक्ष
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गांधी-दर्सन का एक मूल सिद्धांत है - कर्मयोग तथा अनासक्ति योग । गीता के निष्काम कर्मयोग का प्रभाव गांधीवाद पर स्पष्ट दृष्टिगोचर होता है । ईश्वर की प्राप्ति या आत्मानुभूति को गांधीवाद में प्रमुख स्थान मिला है । सत्य की प्राप्ति के लिए अहिंसा का मार्ग अपनाना ही गांधीवाद है । गांधीवाद में साध्य और साधन दोनों की पवित्रता पर बल दिया गया है । व्यक्ति और समाज के बीच सामंजस्य स्थापित करना गांधीवाद की अपनी विशेषता है । सत्य के लिए आग्रह करना आवश्यक है । सत्याग्रह आत्मबलयुक्त वीर पुरुषों का गुण है । अहिंसा और सत्याग्रह कायरों के वश की बात नहीं है । बेसिक शिक्षा गांधीवादी दर्शन का व्यावहारिक पक्ष है । गांदीवाद जिस शोषणहीन, वर्गहीन, जातिहीन समाज की कल्पना करता है, उसके प्राप्त करने के लिए बेसिक शिक्षा आवश्यक शर्त है ।
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अनिवार्यता एवं माध्यम का प्रश्न
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बेसिक शिक्षा के पहले सिद्धांत को संसार भर में मान्यता प्राप्त है । संयुक्त राज्य अमेरिका में हाई स्कूल तक की शिक्षा अनिवार्य है । संसार के सभी देशों में किसी-न- किसी स्तर तक शिक्षा सार्वभौम, निःशुल्क एवं अनिवार्य है । उसका द्वितीय सिद्धांत भी शिक्षा-शाख्र की दृष्टि से महत्त्वपूर्ण है । कोई भी सभ्य देश अपने देश में शिक्षा का माध्यम विदेशी भाषा नहीं बनाता । भारत में माध्यमिक शिक्षा के क्षेत्र में अस्वाभाविक प्रक्रिया बहुत दिनों तक चलती रही । शिक्षा के क्षेत्र में आज तक जितने आयोग और समितियाँ नियुक्त हुई हैं, उन सबने मातृभाषा को शिक्षा का माध्यम बनाने का समर्थन किया है । तब कौन कहेगा कि गांधीजी इस बात पर गलत थे ? किंतु आश्चर्य है कि स्वतंत्र भारत में हमारा अंग्रेजी-मोह बढ़ा है, घटा नहीं । आज की अंग्रेजी को शासन में, समाज में और शिक्षालयों में वह स्थान मिला हुआ है जो उसे नहीं मिलना चाहिए । भारतीय समाज की शिक्षा गांधीवाद के विपरीत चल रही है । आज हमारे देश के विद्वान्‌ अंग्रेजी में लेख लिखने या
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भाषण देने को विद्धता की कसौटी मानते हैं । इसके विपरीत गांधीजी का साहस देखिए, उन्होंने सन्‌ १९१८ में अंग्रेज वायसराय के सामने हिंदी में भाषण दिया था । अंग्रेजी आतंक के उस वातावरण में उनका भाषण जिस साहस का प्रतीक था, उसका लेशमात्र भी आज के किसी राजनेता या शिक्षा-चिंतक में क्या दिखाई पड़ता है ? सन्‌ १९३१ में संयुक्त भारत के चैंबर ऑफ कोमर्स के कराची अधिवेशन में अंग्रेजीदाँ लोगों के सामने गांधीजी ने हिंदी में भाषण दिया था । दिसंबर १९१६ में कांग्रेस के इक्कीसवें अधिवेशन में लखनऊ में गांधीजी ने हिंदी में भाषण प्रारंभ किया कि इतने में मद्रासी प्रतिनिधियों ने “इंग्लिश प्लीज' की आवाज लगाई । उत्तर में गांधीजी ने कहा, “आपकी आज्ञा मुझे स्वीकार है, पर एक शर्त है - अगले साल की कांग्रेस तक आपको यह “लिंगुआ फ्रांका' (अर्थात्‌ हिंदी) अवश्य सीख लेनी चाहिए । देखिए, इसमें गलती या लापरवाही न हो ।' है ऐसा साहस आज के भारतीय कर्णधारो में ? तब यदि बेसिक शिक्षा को आज तिलांजलि दे दी गई है तो क्या आश्चर्य ! आज गली-गली में, कस्बे में और प्रत्येक मुहट्ले में अंग्रेजी माध्यम के कॉन्‍न्वेंट स्कूल खोलने एवं उनमें अपने बच्चों को पढ़ाने की भारतीय समाज में होड़ लगी हुई है । इतना अंग्रेजी-मोह तो परतंत्र भारत में भी नहीं था । राष्ट्रीयता की दृष्टि से हम आगे बढ़ने की अपेक्षा पीछे हटे हैं ।
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क्रिया-केंद्रित शिक्षा की विदेशों में भी मान्यता
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बेसिक शिक्षा का तीसरा सिद्धांत भी कम महत्त्वपूर्ण नहीं है । “करके सीखने का सिद्धांत' (लर्निंग बाई डूइंग) आज एक मान्य सिद्धांत बना हुआ है । रूसो ने “एमील' में करके सीखने पर बल दिया है। जॉन डीवीने अनुभव- केंद्रित शिक्षा की बात की है । किलपैट्रिक ने प्रोजेक्ट मैथड में “कार्य द्वारा सीखने' पर बल दिया है । फ्रोबेल ने उपहारों ट्वारा या कार्य ट्वारा सीखने की बात की है, मांटेसरीने बाल सुलभ क्रियाओं के माध्यम से शिक्षा देने का समर्थन किया है । सान्सीकी ने रूस में कॉम्प्लेक्स मैथड में “अनुभव द्वारा सीखने' को महत्त्वपूर्ण माना है । इस विश्लेषण का तात्पर्य यह कदापि नहीं है कि गांधीजी ने अनेक पश्चिमी शिक्षा- शाख्ियों के सिद्धांतों को पढ़कर उनके आधार पर उद्योग- केंद्रित शिक्षा की बात कर दी है । गांधीजी स्वतंत्र रूप से शैक्षिक प्रयोग करते हुए उद्योग-केंद्रित शिक्षा के निष्कर्ष पर पहुँचे थे । इस संदर्भ में महादेव देसाई का कथन दृष्टव्य है । वे कहते हैं, “उन्होंने (महात्मा गांधी) कोई शैक्षिक सिद्दातं नहीं पढ़ा है । मैं नहीं सोचता कि उन्हें 'एमील' नामक पुस्तक के अस्तित्व की जानकारी है, और जब उन्होंने अपनी योजना की शिक्षा-शाख़ियों के सम्मेलन में चर्चा की, वे एबड-वुड के प्रतिवेदन के अस्तित्व से भी परिचित नहीं थे ।'
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स्वावलंबन पर बल देना आवश्यक नहीं
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गांधीजी की सर्वाधिक आलोचना उनके स्वावलंबन के सिद्धांत को लेकर है। ऐसा लगता है, तत्कालीन परिस्थिति को देखकर सार्वभौमिक शिक्षा के लिए गांधीजी को कोई दूसरा उपाय नहीं सुझा । किंतु उस समय की परिस्थिति के अनुसार आज तक किसी शिक्षा-शाख्त्री ने किसी अन्य विकल्प का संकेत नहीं दिया । यह ठीक ही हुआ, किंतु उसके मूल भाव को तो हमें सदा याद रखना चाहिए । शिक्षा प्राप्त करके बालक भावी जीवन में आत्मनिर्भर बने, यह तो कोई बुरी बात नहीं है । आचार्य विनोबा भावे ने बालवाड़ी में अपने प्रयोग द्वारा स्वावलंबन के सिद्धांत को उचित ठहराने का प्रयास किया था, किंतु स्वतंत्र भारत में इस पर बल देने की आवश्यकता नहीं प्रतीत होती ।
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बेसिक शिक्षा का अंतिम संस्कार
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स्वतंत्र भारत में कुछ समय तक बड़े उत्साह से बेसिक शिक्षा को अपनाने का क्रम चला । गांधीजी के राजनीतिक उत्तराधिकारी पं. जवाहरलाल नहेरू हुए और उनके मानस- पुत्र विनोबा ने उनके बेसिक शिक्षा एवं सामाजिक क्रांति के उत्तराधिकार को सँभाला । राजनति में गांधी के नाम का खूब शोषण किया गया । उनके विचारों की जिस निर्दयता के साथ राजनीति में हत्या कर दी गई है उसे याद करते ही
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