Difference between revisions of "भारत की शिक्षाव्यवस्था के प्रमुख आयाम"

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शिक्षा शासन के अधीन होने के दुष्परिणाम भारत में छः से चौदह वर्ष के आयु के बच्चों की
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{{ToBeEdited}}==== स्वायत्त शिक्षा ====
शिक्षा अनिवार्य है । इस नियम के तहत कोई अपने
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1. शिक्षा धर्म सिखाती है । धर्म मनुष्य को पशु से भिन्न जीवन जीना सिखाता है। धर्म ही मनुष्य के मनुष्यत्व का मुख्य लक्षण है । अतः मनुष्य बिना शिक्षा के रह नहीं सकता |
बालक को विद्यालय में नहीं भेजना चाहता तो
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भेजे ऐसा भी नहीं हो सकता इसे बच्चे को शिक्षा
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2. शिक्षा मनुष्य के जीवन के साथ प्रारम्भ से ही जुड़ी हुई है। मनुष्य अपना हर व्यवहार सीख सीख कर ही करता है। मनुष्य को पशु से भिन्न रखने के लिए प्रकृति ने ही ऐसी स्चना बनाई है। बिना शिक्षा के मनुष्य मनुष्य नहीं ।
के अधिकार से वंचित रखने का अपराध माना जाता
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3. मनुष्य का सीखना गर्भाधान के क्षण से ही आरम्भ हो जाता है। गर्भाधान मनुष्य के जीवन का प्रथम संस्कार होता है । इस संस्कार के साथ मनुष्य का इस जन्म का जीवन आरम्भ होता है । तब से आरम्भ होकर शिक्षा अंत्येष्टि संस्कार तक निरन्तर चलती रहती है । अंत्येष्टि इस जन्म के जीवन का अन्तिम संस्कार है ।
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4. गर्भ, शिशु, बाल, किशोर, तरुण, युवा, प्रौढ़ और वृद्ध आदि सभी अवस्थाओं में शिक्षा निर्तर चलती रहती है । संस्कार, क्रिया, अनुभव, विचार, विवेक और अनुभूति इसके क्रमश: स्वरूप हैं। शिक्षा से जो ज्ञानार्जन होता है उसके ही ये विविध रूप हैं ।
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5. शिक्षा ज्ञान और संस्कृति को एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को हस्तान्तरित करने का माध्यम है । परम्परा बनाए रखना, उसे खंडित नहीं होने देना, उत्तरोत्तर समृद्ध करना सुज्ञ मनुष्य का कर्तव्यरूपी धर्म है । इसे निभाए बिना मनुष्य अपने पूर्वजों के ऋण से मुक्त नहीं होता ।
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6.  समाज को शिक्षित करने का दायित्व शिक्षक का है। शिक्षक अपने ज्ञान, चरित्र और कौशल से छात्रों को शिक्षित कर समाज की सेवा करता है । समाज ऐसे शिक्षक के प्रति कृतज्ञ रहता है और उसे आदर और श्रद्धा से देखता है तथा उसके योगक्षेम की चिन्ता करता है ।
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7. समाज को शिक्षित करने के अपने काम में शिक्षक स्वतंत्र और स्वायत्त होता है। धन या सत्ता उसे नियंत्रित नहीं करते । शिक्षा शिक्षाकाधिष्टित होती है। ऐसी शिक्षा ही समाज का कल्याण कर सकती  है।
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8. शिक्षा यदि स्वायत्त  नहीं रही तो वह समाज का मार्गदर्शन करने का अपना कर्तव्य ही  नहीं निभा सकती और समाज उससे लाभान्वित नहीं हो सकता। किसी भी समाज के लिए यह इष्ट नहीं है ।
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==== समाज का सहयोग ====
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9. भारत ज्ञान को पवित्रतम सत्ता मानता है। वह सत्ता, धन, बल आदि से परे है । अतः वह wa और विक्रय का साधन नहीं है । इस अर्थ में भारत में शिक्षा अर्थनिरपेक्ष रही है । वह अर्थनिरपेक्ष रहे इसकी चिन्ता शिक्षक को करनी है ।
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10.  शिक्षक और विद्यार्थी के मध्य होने वाला अध्ययन  और अध्यापन स्वेच्छा, स्वतन्त्रता, जिज्ञासा, श्रद्धा और ज्ञाननिष्ठा से चलता है । विवशता, बाध्यता, स्वार्थ, अविनय, उदरपूर्ति का लक्ष्य इन्हें दूषित करते हैं । भारत में कभी ऐसा नहीं होता ।
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11.  भिक्षा, समिधा, दान और गुरुदक्षिणा शिक्षक और विद्यार्थी के योगक्षेम के साधन हैं; शुल्क और वेतन नहीं । शिक्षक और विद्यार्थी भिक्षा मांगते हैं, शिष्य समीत्पाणि होकर शिक्षा ग्रहण करने के लिए आता है, अध्ययन पूर्ण होने पर गुरुदक्षिणा देता है, समाज और राज्य दान देते हैं । यही शिक्षाक्षेत्र का अर्थव्यवहार है ।
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१२. ज्ञान की पवित्रता और श्रेष्ठता की रक्षा करना अच्छे समाज का अनिवार्य कर्तव्य है क्योंकि यदि ज्ञान की श्रेष्ठता और पवित्रता नहीं रही तो समाज दीनहीन, दरिद्र और असंस्कृत बन जाता है, आसुरी और पाशवी वृत्तियाँ समाज को नाश की ओर ले जाती हैं। इसे ही अधर्म का अभ्युत्थान कहते हैं ।
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==== अध्यात्मनिष्ट शिक्षा ====
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13. भारत में शिक्षा भौतिक नहीं अपितु आध्यात्मिक प्रक्रिया रही है क्योंकि भारत की. जीवनदृष्टि आध्यात्मिक है । जीवनदृष्टि के अनुरूप होना और जीवनदृष्टि को पुष्ट करना शिक्षा का स्वाभाविक लक्षण है ।
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14. शिक्षा कर्मेन्द्रियों, ज्ञानेन्द्रियों , मन, बुद्धि, चित्त और हे इसके अहंकार को अपने अपने दोषों से मुक्त करती है, उन्हें संस्कारित करती है और इन सभी करणों को आत्मनिष्ठ बनाकर मुक्ति का मार्ग प्रशस्त करती है।  इसीलिए कहा गया है, सा विद्या या विमुक्‍्तये ' ।
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15. व्यवहार में शिक्षा को तीन आयामों में विभाजित किया गया है। ये हैं धर्मशिक्षा, कर्मशिक्षा और  शास्त्रशिक्षा । ये तीनों मिलकर व्यक्ति और समाज के  समन्वित अभ्युद्य और निःश्रेयस का माध्यम बनते  हैं ।
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16.  धर्मशिक्षा सबके लिए अनिवार्य है। राजा हो या प्रजा, धनवान हो या गरीब, समर्थ हो या सामान्य, मालिक हो या नौकर, स्त्री हो या पुरुष, धर्मशिक्षा सबके लिए समान रूप से अनिवार्य है धर्मशिक्षा  को ही सदुण और सदाचार की, संस्कारों की या मूल्यों की शिक्षा कहते हैं ।
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17.  कर्मशिक्षा उद्योग की शिक्षा है । संन्यासी, अपाहिज, रुगण, ब्रह्मचारी, वानप्रस्थ, शिशु आदि को छोड़ शेष सबके लिए कर्मशिक्षा अनिवार्य है । कर्मशिक्षा उत्पादकता का गुण है जिससे समाज समृद्ध होता है और किसीको आवश्यक वस्तुओं का अभाव नहीं रहता ।
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18. शाख््रशिक्षा ज्ञान का क्षेत्र है । सर्वजनसमाज के लिए ज्ञान व्यवहार में अनुस्यूत होकर प्रवर्तित होता है, परंतु कुछ लोगोंं के लिए शास्त्रीय ज्ञान की साधना  करने की आवश्यकता है । लोकव्यवहार की नित्य परिष्कृति के लिए, ज्ञानक्षेत्र में युगानुकूल परिवर्तन के लिए शास्त्रों के अध्ययन और अनुसन्धान की आवश्यकता होती है । समाज के एक वर्ग को ऐसा अध्ययन और अनुसन्धान करने की आवश्यकता होती है । इसके लिए शास्त्रशिक्षा है । यह सबके लिए आवश्यक नहीं है ।
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19. इसके बाद अनुभूति कि शिक्षा होती है जो इन सबसे परे होती है यह लौकिक शिक्षा नहीं है । यह पराविद्या का क्षेत्र है। इसे ब्रह्मविद्या या अध्यात्मविद्या कहते हैं । धर्मशिक्षा, कर्मशिक्षा या शस्त्रशिक्षा से अनुभूति होती भी है और नहीं भी  होती । ये इसके कारण भी नहीं हैं और इसके  विरोधी भी नहीं हैं ।
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२०. भारत में ऐसी शिक्षा को व्यक्तित्व का अभिन्न अंग रत में ऐसी शिक्षा को व्यक्तित्व का अभिन्न अंग  माना गया है। समाज में सब शिक्षित हों इसकी  चिन्ता शिक्षक को करनी है और समाज ने शिक्षक  के योगक्षेम की चिन्ता करनी है । ऐसी धार्मिक  शिक्षा की आज की अवस्था अत्यंत शोचनीय है ।  हमें उसकी चिन्ता करनी है ।

Latest revision as of 03:47, 16 November 2020

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==== स्वायत्त शिक्षा ====

1. शिक्षा धर्म सिखाती है । धर्म मनुष्य को पशु से भिन्न जीवन जीना सिखाता है। धर्म ही मनुष्य के मनुष्यत्व का मुख्य लक्षण है । अतः मनुष्य बिना शिक्षा के रह नहीं सकता |

2. शिक्षा मनुष्य के जीवन के साथ प्रारम्भ से ही जुड़ी हुई है। मनुष्य अपना हर व्यवहार सीख सीख कर ही करता है। मनुष्य को पशु से भिन्न रखने के लिए प्रकृति ने ही ऐसी स्चना बनाई है। बिना शिक्षा के मनुष्य मनुष्य नहीं ।

3. मनुष्य का सीखना गर्भाधान के क्षण से ही आरम्भ हो जाता है। गर्भाधान मनुष्य के जीवन का प्रथम संस्कार होता है । इस संस्कार के साथ मनुष्य का इस जन्म का जीवन आरम्भ होता है । तब से आरम्भ होकर शिक्षा अंत्येष्टि संस्कार तक निरन्तर चलती रहती है । अंत्येष्टि इस जन्म के जीवन का अन्तिम संस्कार है ।

4. गर्भ, शिशु, बाल, किशोर, तरुण, युवा, प्रौढ़ और वृद्ध आदि सभी अवस्थाओं में शिक्षा निर्तर चलती रहती है । संस्कार, क्रिया, अनुभव, विचार, विवेक और अनुभूति इसके क्रमश: स्वरूप हैं। शिक्षा से जो ज्ञानार्जन होता है उसके ही ये विविध रूप हैं ।

5. शिक्षा ज्ञान और संस्कृति को एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को हस्तान्तरित करने का माध्यम है । परम्परा बनाए रखना, उसे खंडित नहीं होने देना, उत्तरोत्तर समृद्ध करना सुज्ञ मनुष्य का कर्तव्यरूपी धर्म है । इसे निभाए बिना मनुष्य अपने पूर्वजों के ऋण से मुक्त नहीं होता ।

6. समाज को शिक्षित करने का दायित्व शिक्षक का है। शिक्षक अपने ज्ञान, चरित्र और कौशल से छात्रों को शिक्षित कर समाज की सेवा करता है । समाज ऐसे शिक्षक के प्रति कृतज्ञ रहता है और उसे आदर और श्रद्धा से देखता है तथा उसके योगक्षेम की चिन्ता करता है ।

7. समाज को शिक्षित करने के अपने काम में शिक्षक स्वतंत्र और स्वायत्त होता है। धन या सत्ता उसे नियंत्रित नहीं करते । शिक्षा शिक्षाकाधिष्टित होती है। ऐसी शिक्षा ही समाज का कल्याण कर सकती है।

8. शिक्षा यदि स्वायत्त नहीं रही तो वह समाज का मार्गदर्शन करने का अपना कर्तव्य ही नहीं निभा सकती और समाज उससे लाभान्वित नहीं हो सकता। किसी भी समाज के लिए यह इष्ट नहीं है ।

समाज का सहयोग

9. भारत ज्ञान को पवित्रतम सत्ता मानता है। वह सत्ता, धन, बल आदि से परे है । अतः वह wa और विक्रय का साधन नहीं है । इस अर्थ में भारत में शिक्षा अर्थनिरपेक्ष रही है । वह अर्थनिरपेक्ष रहे इसकी चिन्ता शिक्षक को करनी है ।

10. शिक्षक और विद्यार्थी के मध्य होने वाला अध्ययन और अध्यापन स्वेच्छा, स्वतन्त्रता, जिज्ञासा, श्रद्धा और ज्ञाननिष्ठा से चलता है । विवशता, बाध्यता, स्वार्थ, अविनय, उदरपूर्ति का लक्ष्य इन्हें दूषित करते हैं । भारत में कभी ऐसा नहीं होता ।

11. भिक्षा, समिधा, दान और गुरुदक्षिणा शिक्षक और विद्यार्थी के योगक्षेम के साधन हैं; शुल्क और वेतन नहीं । शिक्षक और विद्यार्थी भिक्षा मांगते हैं, शिष्य समीत्पाणि होकर शिक्षा ग्रहण करने के लिए आता है, अध्ययन पूर्ण होने पर गुरुदक्षिणा देता है, समाज और राज्य दान देते हैं । यही शिक्षाक्षेत्र का अर्थव्यवहार है ।

१२. ज्ञान की पवित्रता और श्रेष्ठता की रक्षा करना अच्छे समाज का अनिवार्य कर्तव्य है क्योंकि यदि ज्ञान की श्रेष्ठता और पवित्रता नहीं रही तो समाज दीनहीन, दरिद्र और असंस्कृत बन जाता है, आसुरी और पाशवी वृत्तियाँ समाज को नाश की ओर ले जाती हैं। इसे ही अधर्म का अभ्युत्थान कहते हैं ।

अध्यात्मनिष्ट शिक्षा

13. भारत में शिक्षा भौतिक नहीं अपितु आध्यात्मिक प्रक्रिया रही है क्योंकि भारत की. जीवनदृष्टि आध्यात्मिक है । जीवनदृष्टि के अनुरूप होना और जीवनदृष्टि को पुष्ट करना शिक्षा का स्वाभाविक लक्षण है ।

14. शिक्षा कर्मेन्द्रियों, ज्ञानेन्द्रियों , मन, बुद्धि, चित्त और हे इसके अहंकार को अपने अपने दोषों से मुक्त करती है, उन्हें संस्कारित करती है और इन सभी करणों को आत्मनिष्ठ बनाकर मुक्ति का मार्ग प्रशस्त करती है। इसीलिए कहा गया है, सा विद्या या विमुक्‍्तये ' ।

15. व्यवहार में शिक्षा को तीन आयामों में विभाजित किया गया है। ये हैं धर्मशिक्षा, कर्मशिक्षा और शास्त्रशिक्षा । ये तीनों मिलकर व्यक्ति और समाज के समन्वित अभ्युद्य और निःश्रेयस का माध्यम बनते हैं ।

16. धर्मशिक्षा सबके लिए अनिवार्य है। राजा हो या प्रजा, धनवान हो या गरीब, समर्थ हो या सामान्य, मालिक हो या नौकर, स्त्री हो या पुरुष, धर्मशिक्षा सबके लिए समान रूप से अनिवार्य है । धर्मशिक्षा को ही सदुण और सदाचार की, संस्कारों की या मूल्यों की शिक्षा कहते हैं ।

17. कर्मशिक्षा उद्योग की शिक्षा है । संन्यासी, अपाहिज, रुगण, ब्रह्मचारी, वानप्रस्थ, शिशु आदि को छोड़ शेष सबके लिए कर्मशिक्षा अनिवार्य है । कर्मशिक्षा उत्पादकता का गुण है जिससे समाज समृद्ध होता है और किसीको आवश्यक वस्तुओं का अभाव नहीं रहता ।

18. शाख््रशिक्षा ज्ञान का क्षेत्र है । सर्वजनसमाज के लिए ज्ञान व्यवहार में अनुस्यूत होकर प्रवर्तित होता है, परंतु कुछ लोगोंं के लिए शास्त्रीय ज्ञान की साधना करने की आवश्यकता है । लोकव्यवहार की नित्य परिष्कृति के लिए, ज्ञानक्षेत्र में युगानुकूल परिवर्तन के लिए शास्त्रों के अध्ययन और अनुसन्धान की आवश्यकता होती है । समाज के एक वर्ग को ऐसा अध्ययन और अनुसन्धान करने की आवश्यकता होती है । इसके लिए शास्त्रशिक्षा है । यह सबके लिए आवश्यक नहीं है ।

19. इसके बाद अनुभूति कि शिक्षा होती है जो इन सबसे परे होती है यह लौकिक शिक्षा नहीं है । यह पराविद्या का क्षेत्र है। इसे ब्रह्मविद्या या अध्यात्मविद्या कहते हैं । धर्मशिक्षा, कर्मशिक्षा या शस्त्रशिक्षा से अनुभूति होती भी है और नहीं भी होती । ये इसके कारण भी नहीं हैं और इसके विरोधी भी नहीं हैं ।

२०. भारत में ऐसी शिक्षा को व्यक्तित्व का अभिन्न अंग रत में ऐसी शिक्षा को व्यक्तित्व का अभिन्न अंग माना गया है। समाज में सब शिक्षित हों इसकी चिन्ता शिक्षक को करनी है और समाज ने शिक्षक के योगक्षेम की चिन्ता करनी है । ऐसी धार्मिक शिक्षा की आज की अवस्था अत्यंत शोचनीय है । हमें उसकी चिन्ता करनी है ।