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महाभारत के वीर, पाँच पाण्डवों में तीसरे, अद्वितीय धनुर्धर, पार्थ,सव्यसाची और धनंजय नामों से अभिहित,द्रोणाचार्य के प्रिय शिष्य,स्वयंवर में शस्त्र— कौशल दिखाकर द्रौपदी को जीतने वाले, भारत के उत्तरीय प्रदेशों के दिग्विजयी, वीर अभिमन्यु के पिता, महाभारत युद्ध में पाण्डव पक्ष के मेरुदंड अर्जुन को महाभारत आरम्भ में कुरुक्षेत्र के मैदान में दोनों ओर स्वजनों के ही संहार की शोककारी परिस्थिति देखकर युद्ध से विरक्ति हो गयी थी। भगवान् श्रीकृष्ण ने,जो अर्जुन के घनिष्ठ सखा, सम्बन्धी और मार्गदर्शक थे तथा महाभारत युद्ध में उनके सारथी बने थे, उन्हें श्रीमद्भगवद्गीता का उपदेश देकर व्यामोह-मुक्त किया था। अर्जुन का चरित्र भगवान् के प्रति पूर्ण समर्पण का श्रेष्ठ उदाहरण है।
 
महाभारत के वीर, पाँच पाण्डवों में तीसरे, अद्वितीय धनुर्धर, पार्थ,सव्यसाची और धनंजय नामों से अभिहित,द्रोणाचार्य के प्रिय शिष्य,स्वयंवर में शस्त्र— कौशल दिखाकर द्रौपदी को जीतने वाले, भारत के उत्तरीय प्रदेशों के दिग्विजयी, वीर अभिमन्यु के पिता, महाभारत युद्ध में पाण्डव पक्ष के मेरुदंड अर्जुन को महाभारत आरम्भ में कुरुक्षेत्र के मैदान में दोनों ओर स्वजनों के ही संहार की शोककारी परिस्थिति देखकर युद्ध से विरक्ति हो गयी थी। भगवान् श्रीकृष्ण ने,जो अर्जुन के घनिष्ठ सखा, सम्बन्धी और मार्गदर्शक थे तथा महाभारत युद्ध में उनके सारथी बने थे, उन्हें श्रीमद्भगवद्गीता का उपदेश देकर व्यामोह-मुक्त किया था। अर्जुन का चरित्र भगवान् के प्रति पूर्ण समर्पण का श्रेष्ठ उदाहरण है।
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'''<u><big>मार्कण्डेय</big></u>'''
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भूगुवंश में उत्पन्न नैष्ठिक ब्रह्मचारी और कठोर तपस्वी। बाल्यावस्था में ही भविष्यवक्ताओं ने इन्हेंअल्पायु घोषित कर दिया था,इसलिए इन्होंने ऋषि-मुनियोंसे आशीर्वाद लेकर घोर तपस्या करके मृत्यु पर विजय पायी थी और कल्पान्त में सृष्टि का प्रलय प्रत्यक्ष देखा था। रामायण में सर्वत्र इनका निर्देश दीर्घायु नाम से किया गया है। मार्कण्डेय मुनि ने पाण्डवों को धर्म का उपदेश दिया था, विशेष रूप से युधिष्ठिर इनके धर्मोपदेश एवं तत्वज्ञान से बहुत प्रभावित थे।
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'''<u><big>हरिश्चन्द्र</big></u>'''
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अयोध्या के इक्ष्वाकुवंशी राजा, जिन्होंने सत्य के दृढ़ व्रत का पालन किया। वसिष्ठऋषि से इनके सत्यव्रत की प्रशंसा सुनकर ईष्र्या से विश्वामित्र ऋषि ने इनके सत्यव्रत की परीक्षा ली और इनसे राज्यदान करवाया। दान के पश्चात्दक्षिणा-पूर्ति के लिए हरिश्चन्द्र ने पुत्र रोहित,पत्नी तारामती तथा स्वयं को भी बेच डाला और एक चाण्डाल के दास बनकर शमशान-भूमि पर शव जलाने का काम करने लगे। पुत्र रोहित सर्पदंश से मर गया तो तारामती उसे दाह-संस्कार हेतु उसी शमशान में लेकर आयी। हरिश्चन्द्र ने दाह-संस्कार का शुल्क लिये बिना रोहित का दाह-संस्कार करने देने से इन्कार कर दिया। सत्य-परीक्षा में उन्हें खरा उतरा देखकर विश्वामित्र प्रसन्न हुए। उन्होंने रोहित को जीवित किया और हरिश्चन्द्र को न केवल पूर्वस्थिति अपितु अक्षय कीर्ति प्राप्त हुई। 
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'''<u><big>प्रह्लाद</big></u>'''
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श्रेष्ठ भगवद्भक्त प्रह्लाद दैत्य-सम्राट् हिरण्यकशिपु के पुत्र थे। भक्ति-मार्ग के विरोधी पिता ने पुत्र को ईश्वर-भक्ति से विमुख करने के उद्देश्य से नाना प्रकार के कष्ट दिये। किन्तु प्रह्लाद की ईश-भक्ति में आस्था अडिग रही। हिरण्यकशिपु की योजनासे प्रह्लाद की बुआ होलिका प्रह्लाद को गोद में लेकर अग्नि-ज्वालाओं के बीच जा बैठी, पर भगवद्भक्ति के प्रताप से होलिका जल गयी और प्रह्लाद का बाल भी बाँका नहीं हुआ। पिता ने इन्हें आग में तपे लोहे से बँधवाया, पर इससे भी प्रह्लाद को क्षति नहीं पहुँची। अपने इस अविचल भक्त की रक्षा के लिए स्वयं भगवान् नृसिंह रूप में प्रकटहुए और हिरण्यकशिपु का वध किया।
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'''<u><big>नारद</big></u>'''
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चारों वेद,इतिहास-पुराण, स्मृति,व्याकरण,दर्शनादि नाना विद्याओं में पारंगतदेवर्षि नारद भागवत धर्म के आधार पांचरात्र के प्रवर्तक, भक्ति,संगीत-विद्या, नीति आदि के मुख्याचार्य,नित्य परिव्राजक,रामकथा के आदिकवि वाल्मीकि तथा वैदिक संस्कृति के व्यवस्थापक एवं महाभारतकार वेदव्यास के प्रेरक,जीवमात्र के कल्याण के व्रती,बालक ध्रुव के उपदेष्टा,देव-दैत्य दोनों के ही सम्मान के पात्र और भगवद्भक्ति के प्रचारक,महान् वैष्णव हैं। इन्हें ब्रह्मा का मानस पुत्र कहा जाता है। भगवान्ब्रह्मासेप्राप्त वीणा लेकर बराबर भगवन्नामगुण गाते रहना ही इनका स्वभाव है। नारद सतत तीनों लोकों में भ्रमण करने वाले और कहाँ क्या चल रहा है, इसका ज्ञान रखने वाले आदि—संवाददाता हैं। ये धर्म-संस्थापना के भगवत्कार्य में सदैव सहयोगी रहते हैं।
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'''<u><big>ध्रुव</big></u>'''
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राजा उत्तानपाद के पुत्र, श्रेष्ठ भगवद्भक्त,जिन्होंने सुकोमल बाल्यावस्था में ही कठोर तपस्या कर भगवान्विष्णु को प्रसन्न किया और अपनी अटल भक्ति के प्रतीक बन आकाश में अविचल ध्रुव नक्षत्र के रूप में स्थित हुए। बचपन में इन्होंने अपनी विमाता सुरुचि के दुव्र्यवहार से भारी कष्ट झेला। माता सुनीति की आज्ञा और महर्षि नारद के उपदेश से पाँच वर्ष की सुकुमार अवस्था में ही राजकुमार ध्रुव के अन्त:करण में भगवद्भक्ति की प्रेरणा उत्पन्न हुई और उन्होंने यमुना-तट पर मधुवन में अखंड तप किया।
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