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५. आजीवन शिक्षा, सार्वत्रिक (घर, विद्यालय और समाज में) शिक्षा और राष्ट्रीय शिक्षा के सूत्रों को लेकर हमें शिक्षा की एक व्यापक और सर्वसमावेशक योजना बनाने की आवश्यकता होगी। इस योजना के कुछ आयाम इस प्रकार हो सकते हैं...
 
५. आजीवन शिक्षा, सार्वत्रिक (घर, विद्यालय और समाज में) शिक्षा और राष्ट्रीय शिक्षा के सूत्रों को लेकर हमें शिक्षा की एक व्यापक और सर्वसमावेशक योजना बनाने की आवश्यकता होगी। इस योजना के कुछ आयाम इस प्रकार हो सकते हैं...
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विश्वविद्यालयों का एक ऐसा प्रारूप तैयार करना जो भारत की, भारतीय शिक्षा की आवश्यकताओं को समझकर शिक्षा का स्वरूप विकसित कर सके। भारत के वर्तमान विश्वविद्यालयों का प्रारम्भिक ढाँचा लन्दन युनिवर्सिटी के ढाँचे के नमूने पर बना था। सन १८५७ में शुरू हुए कोलकोता, मद्रास और बॉम्बे विश्वविद्यालय उस प्रकार के थे । वे देश में चल रही शिक्षा व्यवस्था का संयोजन, नियमन और निर्देश करने के तथा प्रमाणपत्र देने के लिये बने थे। धीरे धीरे वे ऑक्सफर्ड और कैम्ब्रिज के समान अध्यापन भी करने लगे । वर्तमान में वे हार्वर्ड जैसे विश्वविद्यालयों को भी आदर्श के रूप में मानने की स्थिति में पहुँचे हैं । परन्तु भारतीय विश्वविद्यालय का आदर्श लन्दन, ऑक्सफर्ड या हार्वर्ड तो नहीं हो विकास अवरुद्ध हो जाता है। अतः इस शिक्षा का महत्त्व समझाना होगा, आकर्षण बढाना होगा।  
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विश्वविद्यालयों का एक ऐसा प्रारूप तैयार करना जो भारत की, भारतीय शिक्षा की आवश्यकताओं को समझकर शिक्षा का स्वरूप विकसित कर सके। भारत के वर्तमान विश्वविद्यालयों का प्रारम्भिक ढाँचा लन्दन युनिवर्सिटी के ढाँचे के नमूने पर बना था। सन १८५७ में आरम्भ हुए कोलकोता, मद्रास और बॉम्बे विश्वविद्यालय उस प्रकार के थे । वे देश में चल रही शिक्षा व्यवस्था का संयोजन, नियमन और निर्देश करने के तथा प्रमाणपत्र देने के लिये बने थे। धीरे धीरे वे ऑक्सफर्ड और कैम्ब्रिज के समान अध्यापन भी करने लगे । वर्तमान में वे हार्वर्ड जैसे विश्वविद्यालयों को भी आदर्श के रूप में मानने की स्थिति में पहुँचे हैं । परन्तु भारतीय विश्वविद्यालय का आदर्श लन्दन, ऑक्सफर्ड या हार्वर्ड तो नहीं हो विकास अवरुद्ध हो जाता है। अतः इस शिक्षा का महत्त्व समझाना होगा, आकर्षण बढाना होगा।  
 
* वर्तमान में भौतिक विज्ञान, तन्त्रज्ञान, प्रबन्धन, प्रौद्योगिकी, संगणक आदि विद्याशाखाओं का महत्त्व बढ गया है। व्यक्ति के और समाज के जीवन पर इसका गहरा विपरीत प्रभाव होता है। हमें समझना चाहिये कि आज जिन्हें हम सामाजिक विज्ञान कहते हैं, परन्तु भारत की भाषा में जिन्हें सांस्कृतिक कहा जाना चाहिये, ऐसे विषयों का अध्ययन केन्द्रवर्ती बनना चाहिये, विज्ञान आदि सांस्कृतिक अध्ययन के अंग के रूप में ही हो सकते हैं । उदाहरण के लिये भारत में आयुर्विज्ञान (मेडिकल सायन्स) आयुर्वेद है और आत्मा की चर्चा के बिना उसका अध्ययन नहीं होता । राजनीति की चर्चा धर्म के बिना नहीं होती, तन्त्रज्ञान संस्कृति और समाज के अविरोधी होता है । इस प्रकार संस्कृति को केन्द्रस्थान में रखकर समस्त ज्ञानक्षेत्र की रचना करनी होगी।
 
* वर्तमान में भौतिक विज्ञान, तन्त्रज्ञान, प्रबन्धन, प्रौद्योगिकी, संगणक आदि विद्याशाखाओं का महत्त्व बढ गया है। व्यक्ति के और समाज के जीवन पर इसका गहरा विपरीत प्रभाव होता है। हमें समझना चाहिये कि आज जिन्हें हम सामाजिक विज्ञान कहते हैं, परन्तु भारत की भाषा में जिन्हें सांस्कृतिक कहा जाना चाहिये, ऐसे विषयों का अध्ययन केन्द्रवर्ती बनना चाहिये, विज्ञान आदि सांस्कृतिक अध्ययन के अंग के रूप में ही हो सकते हैं । उदाहरण के लिये भारत में आयुर्विज्ञान (मेडिकल सायन्स) आयुर्वेद है और आत्मा की चर्चा के बिना उसका अध्ययन नहीं होता । राजनीति की चर्चा धर्म के बिना नहीं होती, तन्त्रज्ञान संस्कृति और समाज के अविरोधी होता है । इस प्रकार संस्कृति को केन्द्रस्थान में रखकर समस्त ज्ञानक्षेत्र की रचना करनी होगी।
 
एक अत्यन्त विचित्र और हास्यास्पद बात को हमें तुरन्त बदलना होगा। वाणिज्य विज्ञान या तन्त्रज्ञान पढने वाले को संस्कृत की गन्ध भी नहीं होती। भारतीय जीवनदृष्टि, संस्कृति, इतिहास, वेद, धर्म, भगवद्गीता, ज्ञान और पराक्रमी पूर्वज आदि के बारे में लेशमात्र जानकारी नहीं होती। वे पूर्णरूप से संस्कृति के कटे हुए रहते हैं। अतः आज का विनयन अथवा कलाशाखा, वाणिज्य, तन्त्रज्ञान, विज्ञान आदि विभाजनों को मिटाकर सभी विषयों का सांस्कृतिक आधार पक्का बनाकर, एकदूसरे के साथ उचित समायोजन कर पुनर्रचना करनी होगी।  
 
एक अत्यन्त विचित्र और हास्यास्पद बात को हमें तुरन्त बदलना होगा। वाणिज्य विज्ञान या तन्त्रज्ञान पढने वाले को संस्कृत की गन्ध भी नहीं होती। भारतीय जीवनदृष्टि, संस्कृति, इतिहास, वेद, धर्म, भगवद्गीता, ज्ञान और पराक्रमी पूर्वज आदि के बारे में लेशमात्र जानकारी नहीं होती। वे पूर्णरूप से संस्कृति के कटे हुए रहते हैं। अतः आज का विनयन अथवा कलाशाखा, वाणिज्य, तन्त्रज्ञान, विज्ञान आदि विभाजनों को मिटाकर सभी विषयों का सांस्कृतिक आधार पक्का बनाकर, एकदूसरे के साथ उचित समायोजन कर पुनर्रचना करनी होगी।  
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जिस प्रकार हर व्यक्ति के लिये धर्मशिक्षा अनिवार्य है उस प्रकार अधिकांश लोगों के लिये काम करना अनिवार्य है । काम सीखना तो सबके लिये अनिवार्य है परन्तु कुछ व्यक्तियों को काम करने से आवश्यकता के अनुसार मुक्ति मिल सकती है । उदाहरण के लिये घर में युवा सन्तानें हों तो वृद्धों को, गुरुकुल में विद्यार्थी हों तो गुरु को, रुग्णों को, अपाहिजों को, दुर्बलों को काम करने से मुक्ति मिल सकती है । शेष सबको तो काम करना ही है।
 
जिस प्रकार हर व्यक्ति के लिये धर्मशिक्षा अनिवार्य है उस प्रकार अधिकांश लोगों के लिये काम करना अनिवार्य है । काम सीखना तो सबके लिये अनिवार्य है परन्तु कुछ व्यक्तियों को काम करने से आवश्यकता के अनुसार मुक्ति मिल सकती है । उदाहरण के लिये घर में युवा सन्तानें हों तो वृद्धों को, गुरुकुल में विद्यार्थी हों तो गुरु को, रुग्णों को, अपाहिजों को, दुर्बलों को काम करने से मुक्ति मिल सकती है । शेष सबको तो काम करना ही है।
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व्यक्ति का और राष्ट्र का अर्थार्जन और अर्थोत्पादन काम के अनुपात में ही होना चाहिये । यदि काम कम कर यन्त्रों के सहारे अधिक उत्पादन शुरू किया तो सम्पूर्ण विश्व में अर्थसंकट पैदा होता है, इतना ही नहीं तो राष्ट्रों राष्ट्रों में विषमता बढ़ती है। शोषण, भ्रष्टाचार, भुखमरी, बेरोजगारी, दारिद्य जैसे सारे अर्थसंकट निर्माण होते हैं। आज वही हो रहा है। परन्तु धर्मशिक्षा और कर्मशिक्षा के अभाव में यह समझ में ही नहीं आता कि कर्मसंस्कृति के अभाव से ये संकट पैदा हुए हैं। हमारी स्थिति ऐसी है कि हमें कर्म भी नहीं चाहिये और संकट भी नहीं चाहिये । परन्तु ऐसा होना असम्भव है ! कर्म नहीं करेंगे तो संकट बढेंगे ही और संकट से मुक्ति चाहिये तो कर्म अर्थात् काम तो करना ही होगा।
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व्यक्ति का और राष्ट्र का अर्थार्जन और अर्थोत्पादन काम के अनुपात में ही होना चाहिये । यदि काम कम कर यन्त्रों के सहारे अधिक उत्पादन आरम्भ किया तो सम्पूर्ण विश्व में अर्थसंकट पैदा होता है, इतना ही नहीं तो राष्ट्रों राष्ट्रों में विषमता बढ़ती है। शोषण, भ्रष्टाचार, भुखमरी, बेरोजगारी, दारिद्य जैसे सारे अर्थसंकट निर्माण होते हैं। आज वही हो रहा है। परन्तु धर्मशिक्षा और कर्मशिक्षा के अभाव में यह समझ में ही नहीं आता कि कर्मसंस्कृति के अभाव से ये संकट पैदा हुए हैं। हमारी स्थिति ऐसी है कि हमें कर्म भी नहीं चाहिये और संकट भी नहीं चाहिये । परन्तु ऐसा होना असम्भव है ! कर्म नहीं करेंगे तो संकट बढेंगे ही और संकट से मुक्ति चाहिये तो कर्म अर्थात् काम तो करना ही होगा।
    
वास्तव में काम करने में ही आनन्द का अनुभव हो ऐसी शिक्षा होनी चाहिये । भारत ने पूर्व में ऐसा अनुभव लिया ही है। कुम्हार, किसान, गारा तैयार करने वाला, वस्र बुनने वाला आदि कारीगर अपने काम के साथ गीत, नृत्य, कथा आदि को जोडते थे और काम का आनन्द लेते थे। जिसकी धर्मशिक्षा और कर्मशिक्षा अच्छी हुई है उसे ही शास्त्रों के अध्ययन का अधिकार है । वास्तव में शास्त्रशिक्षा को लेकर हमें साहस या धृष्टता दिखानी पडेगी । धर्मशिक्षा सबके लिये अनिवार्य है, कर्मशिक्षा अधिकांश के लिये अनिवार्य है परन्तु शास्त्रशिक्षा न तो सबके लिये अनिवार्य है न आवश्यक । वास्तव में समाज के पाँच या दस प्रतिशत लोगों के लिये ही शास्त्रशिक्षा आवश्यक है। सबके लिये शास्त्रशिक्षा का निषेध नहीं है परन्तु शास्त्रशिक्षा को लेकर कुछ बातों की स्पष्टता होनी चाहिये ।
 
वास्तव में काम करने में ही आनन्द का अनुभव हो ऐसी शिक्षा होनी चाहिये । भारत ने पूर्व में ऐसा अनुभव लिया ही है। कुम्हार, किसान, गारा तैयार करने वाला, वस्र बुनने वाला आदि कारीगर अपने काम के साथ गीत, नृत्य, कथा आदि को जोडते थे और काम का आनन्द लेते थे। जिसकी धर्मशिक्षा और कर्मशिक्षा अच्छी हुई है उसे ही शास्त्रों के अध्ययन का अधिकार है । वास्तव में शास्त्रशिक्षा को लेकर हमें साहस या धृष्टता दिखानी पडेगी । धर्मशिक्षा सबके लिये अनिवार्य है, कर्मशिक्षा अधिकांश के लिये अनिवार्य है परन्तु शास्त्रशिक्षा न तो सबके लिये अनिवार्य है न आवश्यक । वास्तव में समाज के पाँच या दस प्रतिशत लोगों के लिये ही शास्त्रशिक्षा आवश्यक है। सबके लिये शास्त्रशिक्षा का निषेध नहीं है परन्तु शास्त्रशिक्षा को लेकर कुछ बातों की स्पष्टता होनी चाहिये ।
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भारत के विश्वकल्याण के महान अभियान के लिये केवल एक करोड अस्सी लाख लोगों की ही आवश्यकता है। देश में अभी ६६५ विश्वविद्यालय हैं। इनमें से दो करोड विद्यार्थियों और अध्यापकों को चयन करना कोई बहुत कठिन तो नहीं है। केवल तय करने की आवश्यकता है।  
 
भारत के विश्वकल्याण के महान अभियान के लिये केवल एक करोड अस्सी लाख लोगों की ही आवश्यकता है। देश में अभी ६६५ विश्वविद्यालय हैं। इनमें से दो करोड विद्यार्थियों और अध्यापकों को चयन करना कोई बहुत कठिन तो नहीं है। केवल तय करने की आवश्यकता है।  
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परन्तु तय कौन करे यह समस्या है। वर्तमान में देश की शिक्षा राज्य के अर्थात् शासन के हाथ में है। राज्य शिक्षाक्षेत्र में ऐसा कोई साहस दिखा नहीं सकता, उसकी अपनी ही अनेक मर्यादायें हैं । बन्धन हैं। यदि राज्य नहीं करता तो उच्च शिक्षा का क्षेत्र ही यह तय करे । इसकी सीमा यह है कि शासन के निर्देश और अनुमति के बिना वे कर नहीं सकते । दोनो होने के बाद अध्यापकों की इच्छाशक्ति चाहिये । आज तो इसकी कल्पना करना कठिन है । विश्वविद्यालयों को साथ में जोडते हुए संगठित करने वाली कोई रचना नहीं है। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग सभी विश्वविद्यालयों को अपने साथ जोडे रखता है। परन्तु यह आर्थिक पक्ष ही देखता है । यदि सरकार इसे विश्वविद्यालय शिक्षा आयोग बनाकर इसे शैक्षिक संगठन का रूप दे और इसका एकमात्र कार्य शिक्षा को भारतीय बनाने का ही निश्चित किया जाय तो स्थिति बदलनी शुरू हो सकती है। दूसरी एक आशा है देश में चल रहे अखिल भारतीय स्तर के शैक्षिक और सांस्कृतिक - धार्मिक संगठनों से । धर्म और शिक्षा एक साथ मिलकर भारतीय शिक्षा की प्रतिष्ठा करना निश्चित कर लें तो यह कार्य हो सकता है। डेढ सौ वर्षों से राष्ट्रीय शिक्षा आन्दोलन विविध स्वरूपों में चल रहा है । सफलता और असफलता के मध्य झूल रहा है । डेढ सौ वर्षों के अनुभवों से सीखकर, वर्तमान समय का आकलन कर यदि संगठित होकर शिक्षा योजना बनाई जाय और इसमें शासन का भी सहयोग प्राप्त हो तो प्रजा का अनुकूल होना कठिन नहीं है, बल्कि प्रजा तो ऐसी किसी योजना का स्वागत करने हेतु तत्पर है। शिक्षा के ज्ञानात्मक पक्ष का संक्षेप में विचार कर अब हम दूसरे व्यवस्थाकीय पहलू का विचार करेंगे।
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परन्तु तय कौन करे यह समस्या है। वर्तमान में देश की शिक्षा राज्य के अर्थात् शासन के हाथ में है। राज्य शिक्षाक्षेत्र में ऐसा कोई साहस दिखा नहीं सकता, उसकी अपनी ही अनेक मर्यादायें हैं । बन्धन हैं। यदि राज्य नहीं करता तो उच्च शिक्षा का क्षेत्र ही यह तय करे । इसकी सीमा यह है कि शासन के निर्देश और अनुमति के बिना वे कर नहीं सकते । दोनो होने के बाद अध्यापकों की इच्छाशक्ति चाहिये । आज तो इसकी कल्पना करना कठिन है । विश्वविद्यालयों को साथ में जोडते हुए संगठित करने वाली कोई रचना नहीं है। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग सभी विश्वविद्यालयों को अपने साथ जोडे रखता है। परन्तु यह आर्थिक पक्ष ही देखता है । यदि सरकार इसे विश्वविद्यालय शिक्षा आयोग बनाकर इसे शैक्षिक संगठन का रूप दे और इसका एकमात्र कार्य शिक्षा को भारतीय बनाने का ही निश्चित किया जाय तो स्थिति बदलनी आरम्भ हो सकती है। दूसरी एक आशा है देश में चल रहे अखिल भारतीय स्तर के शैक्षिक और सांस्कृतिक - धार्मिक संगठनों से । धर्म और शिक्षा एक साथ मिलकर भारतीय शिक्षा की प्रतिष्ठा करना निश्चित कर लें तो यह कार्य हो सकता है। डेढ सौ वर्षों से राष्ट्रीय शिक्षा आन्दोलन विविध स्वरूपों में चल रहा है । सफलता और असफलता के मध्य झूल रहा है । डेढ सौ वर्षों के अनुभवों से सीखकर, वर्तमान समय का आकलन कर यदि संगठित होकर शिक्षा योजना बनाई जाय और इसमें शासन का भी सहयोग प्राप्त हो तो प्रजा का अनुकूल होना कठिन नहीं है, बल्कि प्रजा तो ऐसी किसी योजना का स्वागत करने हेतु तत्पर है। शिक्षा के ज्ञानात्मक पक्ष का संक्षेप में विचार कर अब हम दूसरे व्यवस्थाकीय पहलू का विचार करेंगे।
    
==== ३. शिक्षा का व्यवसायात्मक पक्ष ====
 
==== ३. शिक्षा का व्यवसायात्मक पक्ष ====
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यह काम सरल तो नहीं ही है परन्तु असम्भव भी तो नहीं है । एक एक गाँव में ऐसे शिक्षकों से निवेदन किया जाय तो गाँव के बच्चों की शिक्षा की चिन्ता करे और मातापिता को भी अपने बच्चों की शिक्षा की चिन्ता करने में सहयोग करे।
 
यह काम सरल तो नहीं ही है परन्तु असम्भव भी तो नहीं है । एक एक गाँव में ऐसे शिक्षकों से निवेदन किया जाय तो गाँव के बच्चों की शिक्षा की चिन्ता करे और मातापिता को भी अपने बच्चों की शिक्षा की चिन्ता करने में सहयोग करे।
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कदाचित प्रथम ऐसा करना पड़ेगा कि मातापिताओं के लिये विद्यालयों का प्रारम्भ करना पड़े क्योंकि बच्चों का संगोपन उनके लिये भी कठिन विषय बन गया है। साथ ही शिक्षकों के लिये विद्यालय शुरू किये जाय । शिक्षक और मातापिता को विद्यालय और घर चलाने के बारे में सक्षम बनाया जाय । धर्मकेन्द्र ऐसे विद्यालयों की जिम्मेदारी उठायें ।
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कदाचित प्रथम ऐसा करना पड़ेगा कि मातापिताओं के लिये विद्यालयों का प्रारम्भ करना पड़े क्योंकि बच्चों का संगोपन उनके लिये भी कठिन विषय बन गया है। साथ ही शिक्षकों के लिये विद्यालय आरम्भ किये जाय । शिक्षक और मातापिता को विद्यालय और घर चलाने के बारे में सक्षम बनाया जाय । धर्मकेन्द्र ऐसे विद्यालयों की जिम्मेदारी उठायें ।
    
यह भारत के अनुरूप व्यवस्था होगी। अभी विचार करने में तो यह विचित्र और असम्भव सा लगता है परन्तु भारत के अन्तरंग में अभी भी भारत ही जिन्दा है इसलिये बहुत जल्दी इसका स्वीकार हो जायेगा । प्रजा के अन्तःकरण को सुख का अनुभव होगा और आशा पल्लवित होगी।
 
यह भारत के अनुरूप व्यवस्था होगी। अभी विचार करने में तो यह विचित्र और असम्भव सा लगता है परन्तु भारत के अन्तरंग में अभी भी भारत ही जिन्दा है इसलिये बहुत जल्दी इसका स्वीकार हो जायेगा । प्रजा के अन्तःकरण को सुख का अनुभव होगा और आशा पल्लवित होगी।

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