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एक दिन मगध सम्राट चन्द्रगुप्त मौर्या जी से मिलाने कुछ विशेष मेहमान आये उन्होंने सम्राट से आचार्य चाणक्य से भेंट का आग्रह किया । सम्राट ने उनसे कर्ण पूछा तो उन्होंने कहा हमारी  एक निजी समस्या है आचार्य चाणक्य जी से मार्गदर्शन चाहिए था । सम्राट ने उत्तर दिया की रात्र अधिक हो चुकू है आप विश्रांति कर पथ में भेंट कर ले, परन्तु उन्हें विलम्ब हो रहा था मेहमान इंतजार करने में संकोच महसूस हर रहे थे ।  
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एक दिन मगध सम्राट चन्द्रगुप्त मौर्या जी से मिलाने कुछ विशेष मेहमान आये उन्होंने सम्राट से आचार्य चाणक्य से भेंट का आग्रह किया । सम्राट ने उनसे कर्ण पूछा तो उन्होंने कहा हमारी  एक निजी समस्या है आचार्य चाणक्य जी से मार्गदर्शन चाहिए था । सम्राट ने उत्तर दिया की रात्र अधिक हो चुकू है आप विश्रांति कर पथ में भेंट कर ले, परन्तु उन्हें विलम्ब हो रहा था मेहमान प्रतीक्षा करने में संकोच महसूस हर रहे थे ।  
    
सम्राट ने कहा आप उनके निवास स्थान पर जा कर भेंट कर ले । सभी मेहमान आचार्य चाणक्य जी के निवास पर पहुंचे आचार्य जी अपने निवास के कार्यालय में बैठकर दीपक की रोशनी में  कुछ राजकीय कार्य कर रहे थे आचार्य जी ने मेहमानों को देखा सभी ने आचार्य को प्रणाम किया कहा "आचार्य जी आपसे हमे कुछ निजी कार्य में मार्गदर्शन चाहियें । आचार्य अपने आसन से उठे और दीपक बुझाकर आचार्य जी ने दूसरा दीपक जलाकर उस दीपक के स्थान पर रख दिया । मेहमानों में एक व्यक्ति उस क्रिया पर ध्यान दे रहे थे ।
 
सम्राट ने कहा आप उनके निवास स्थान पर जा कर भेंट कर ले । सभी मेहमान आचार्य चाणक्य जी के निवास पर पहुंचे आचार्य जी अपने निवास के कार्यालय में बैठकर दीपक की रोशनी में  कुछ राजकीय कार्य कर रहे थे आचार्य जी ने मेहमानों को देखा सभी ने आचार्य को प्रणाम किया कहा "आचार्य जी आपसे हमे कुछ निजी कार्य में मार्गदर्शन चाहियें । आचार्य अपने आसन से उठे और दीपक बुझाकर आचार्य जी ने दूसरा दीपक जलाकर उस दीपक के स्थान पर रख दिया । मेहमानों में एक व्यक्ति उस क्रिया पर ध्यान दे रहे थे ।

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