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== विवेक ==
 
== विवेक ==
सही क्या और गलत क्या, उचित क्या और अनुचित क्या, करणीय क्या और अकरणीय क्या, अच्छा क्या और बुरा क्या यह स्पष्ट रूप से जानना यह विवेक है । अपरा
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सही क्या और गलत क्या, उचित क्या और अनुचित क्या, करणीय क्या और अकरणीय क्या, अच्छा क्या और बुरा क्या यह स्पष्ट रूप से जानना यह विवेक है । अपरा विद्या का यह सर्वोच्च स्तर है । यही जानना है, समझना है, ज्ञात होना है। यह बुद्धि का क्षेत्र है। यह विज्ञान का क्षेत्र है । विज्ञान का अर्थ है जो जैसा है वैसा जानना।मन की ओर से विचारों के तरंग बुद्धि के पास आते हैं। उस समय वे मन के रंग में रंगे होते हैं। कभी कभी तो मन की ओर से आई हुई सामग्री इतनी गड्डमड्ड होती है कि बुद्धि को उसे ठीक करना बहुत कठिन पड़ता है। बुद्धि उसे सुलझाने का बहुत प्रयास करती है। अधिकांश वह सुलझाने में यशस्वी होती है पर कभी अभी हार भी जाती है और गलत समझ लेती है । अर्थात जो जैसा है वैसा नहीं अपितु मन जैसा कहता है वैसा समझ लेती है । विवेक तक पहुँचने के लिए विचारों को अनेक प्रक्रियाओं से गुजरना होता है। बुद्धि ही ये प्रक्रियायें चलाती हैं ।
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विद्या का यह सर्वोच्च स्तर है । यही जानना है, समझना है, ज्ञात होना है । यह बुद्धि का क्षेत्र है । यह विज्ञान का क्षेत्र है । विज्ञान का अर्थ है जो जैसा है वैसा जानना।मन की ओर से विचारों के तरंग बुद्धि के पास आते हैं । उस समय वे मन के रंग में रंगे होते हैं । कभी कभी तो मन की ओर से आई हुई सामग्री इतनी गड्डमड्ड होती है कि बुद्धि को उसे ठीक करना बहुत कठिन पड़ता है । बुद्धि उसे सुलझाने का बहुत प्रयास करती है। अधिकांश वह सुलझाने में यशस्वी होती है पर कभी अभी हार भी जाती है और गलत समझ लेती है । अर्थात जो जैसा है वैसा नहीं अपितु मन जैसा कहता है वैसा समझ लेती है । विवेक तक पहुँचने के लिए विचारों को अनेक प्रक्रियाओं से गुजरना होता है। बुद्धि ही ये प्रक्रियायें चलाती हैं ।
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सबसे सरल प्रक्रिया है निरीक्षण की । यह प्रक्रिया दर्शनेन्द्रिय की सहायता से होती है । दर्शनेन्द्रिय ने अपनी क्षमता से उसे जिस रंग के या आकृति के रूप में पहचाना है और मन ने जिन विचार तरंगों को ग्रहण कर प्रस्तुत किया है उन पर बुद्धि संकल्प की मुहर लगाती है । यह सम्पूर्ण रूप से आँख पर ही निर्भर करता है कि आँख क्या देखती है।
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सबसे सरल प्रक्रिया है निरीक्षण की । यह प्रक्रिया दर्शनेन्द्रिय की सहायता से होती है । दर्शनेन्द्रिय ने अपनी क्षमता से उसे जिस रंग के या आकृति के रूप में पहचाना है और मन ने जिन विचार तरंगों को ग्रहण कर प्रस्तुत किया है उन पर बुद्धि संकल्प की मुहर लगाती है यह सम्पूर्ण रूप से आँख पर ही निर्भर करता है कि आँख क्या देखती है
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यदि पूर्ण रूप से बुद्धि आँख और मन पर ही निर्भर है तो बुद्धि की भूमिका क्या रहेगी ? यदि आँख किसी पदार्थ को लाल रंग के और वृत्ताकार के रूप में पहचानती है और मन उसे नीला रंग और आयताकार कहता है तो बुद्धि तटस्थ होकर इसे लोक में और शास्त्रों में क्या कहा गया है यह देखकर अपना निश्चय करती है कि वास्तव में उस पदार्थ का आकार और रंग वही हैं जो मन कहता है या भिन्न। यदि भिन्न है तो वह मन का कहा नहीं मानती। ऐसे अनेक अनुभवों से वह यह भी तय करती है कि मन विश्वसनीय है कि नहीं।
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यदि पूर्ण रूप से बुद्धि आँख और मन पर ही निर्भर है तो बुद्धि की भूमिका क्या रहेगी ? यदि आँख किसी पदार्थ को लाल रंग के और वृत्ताकार के रूप में पहचानती है और मन उसे नीला रंग और आयताकार कहता है तो बुद्धि तटस्थ होकर इसे लोक में और शास्त्रों में क्या कहा गया है यह देखकर अपना निश्चय करती है कि वास्तव में उस पदार्थ का आकार और रंग वही हैं जो मन कहता है या भिन्न । यदि भिन्न है तो वह मन का कहा नहीं मानती । ऐसे अनेक अनुभवों से वह यह भी तय करती है कि मन विश्वसनीय है कि नहीं
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प्रश्न यह उठेगा कि फिर बुद्धि सीधे ही निरीक्षण क्यों नहीं करती, मन को बीच में लाती ही क्यों है ? या इन्द्रियां सीधे बुद्धि के समक्ष अपने संवेदनों को क्यों नहीं भेजतीं। बीच में मन को लाती ही क्यों हैं? बुद्धि और इंद्रियों को मन को बीच में लाना ही पड़ता है क्योंकि मन है और वह सक्रिय है । मन यदि अक्रिय हो जाता है तो यह काम सीधे भी हो सकता है। परन्तु मन अक्रिय हो ही नहीं सकता। वह सक्रिय भी है और बलवान और जिद्दी भी है। मन की बात मानने या नहीं मानने के लिए बुद्धि को सक्षम और शक्तिशाली होना ही पड़ता है।
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प्रश्न यह उठेगा कि फिर बुद्धि सीधे ही निरीक्षण क्यों नहीं करती, मन को बीच में लाती ही क्यों है ? या इन्द्रियां सीधे बुद्धि के समक्ष अपने संवेदनों को क्यों नहीं भेजतीं। बीच में मन को लाती ही क्यों हैं ? बुद्धि और इंद्रियों को मन को बीच में लाना ही पड़ता है क्योंकि मन है और वह सक्रिय है । मन यदि अक्रिय हो जाता है तो यह काम सीधे भी हो सकता है। परन्तु मन अक्रिय हो ही नहीं सकता । वह सक्रिय भी है और बलवान और जिद्दी भी है। मन की बात मानने या नहीं मानने के लिए बुद्धि को सक्षम और शक्तिशाली होना ही पड़ता है।
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इंद्रियों और बुद्धि के बीच में मन आता है उसे अपने वश में रखना, अथवा दूसरे शब्दों में कहें तो उसके वश में नहीं हो जाना बुद्धि का काम है बुद्धि के पास कार्यकारण भाव को समझने की शक्ति है, उसका प्रयोग बुद्धि को करना होता है। मन के पास ऐसी शक्ति नहीं है। वह नियम नहीं जानता, वह तटस्थ नहीं होता इसलिए तो हम किसी को कहते हैं कि क्या मनमें आया वह बके जा रहे हो, जरा बुद्धि से तो विचार करके बोलो । मन में कुछ भी संगत असंगत बातें आ सकती हैं बुद्धि में नहीं। कुछ भी नहीं, जो ठीक है वही आना यही विवेक है । जो ठीक है उसीको यथार्थ कहते हैं बुद्धि जब दुर्बल होती है और मन को वश में नहीं कर सकती अथवा मन की उपेक्षा नहीं कर सकती तब आकलन और निर्णय सही नहीं होते हैं। इसलिए मन को बीच में आने से रोकना बहुत आवश्यक है। मन को इस प्रकार साधना चाहिए कि वह बुद्धि के अनुकूल हो और उसकी बात माने केवल उपेक्षा करते रहने से तो वह ताक में रहता है कि कब मौका मिले और कब मनमानी करे ।
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इंद्रियों और बुद्धि के बीच में मन आता है उसे अपने वश में रखना, अथवा दूसरे शब्दों में कहें तो उसके वश में नहीं हो जाना बुद्धि का काम है । बुद्धि के पास कार्यकारण भाव को समझने की शक्ति है, उसका प्रयोग बुद्धि को करना होता है। मन के पास ऐसी शक्ति नहीं है। वह नियम नहीं जानता, वह तटस्थ नहीं होता इसलिए तो हम किसी को
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बुद्धि की दूसरी शक्ति या साधन है परीक्षण । यह भी ज्ञानेन्द्रियों के सहयोग से ही होता है । यह केवल दर्शनेन्द्रिय से नहीं तो पांचों ज्ञानेंद्रियों के सहयोग से होता है। इसकी भी स्थिति दर्शानेन्द्रिय और मन के जैसी ही होती है।
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''कहते हैं कि “क्‍या मनमें आया ae ah |= उनके मिश्रण का अनुपात, मिश्रण करने की प्रक्रिया आदि''
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इसके आगे कार्यकारण सम्बन्ध जानने की जो शक्ति है वह बुद्धि की अपनी ही है परन्तु निरीक्षण और परीक्षण के परिपक्व होने से ही वह आती है। अपने आसपास की परिस्थिति का आकलन करना और चित्त में जो पूर्व अनुभवों की स्मृतियाँ संग्रहीत हैं उनके आधार पर कार्यकारण सम्बन्ध समझना उसके लिए सम्भव होता है। बुद्धि मन से पीछा छुड़ाकर चित्तनिष्ठ और आत्मनिष्ठ बनकर व्यवहार करती है तभी विवेक कर सकती है। कार्यकारण सम्बन्ध बिठाने के लिए संश्लेषण और विश्लेषण करना होता है। एक ही घटना अथवा पदार्थ या रचना के भिन्न भिन्न आयामों को अलग अलग कर समझना विश्लेषण है। उदाहरण के लिए हमारा पूरा शरीर एक ही है परन्तु उसका कार्य समझने के लिए हम हाथ, पैर, मस्तक ऐसे अलग अलग हिस्से कर उनके कार्य समझते हैं । खाद्य पदार्थ एक ही है परन्तु उसमें कौन कौन से पदार्थों का संमिश्रण है और उनके मिश्रण की क्या प्रक्रिया है यह अलग अलग करके समझने का प्रयास करते हैं। उसके ठीक विपरीत प्रक्रिया संश्लेषण की है । पदार्थ, उनके मिश्रण का अनुपात, मिश्रण करने की प्रक्रिया आदि अलग अलग समझने के स्थान पर पूरा पदार्थ एक साथ समझना संश्लेषण है। उदाहरण के लिए हलुवा और लड्डू दोनों में आटा, घी और गुड ही सम्मिश्रित हुए हैं परन्तु उनके मिश्रण की प्रक्रिया अलग अलग है इसलिए उनका रूप, रंग, स्वाद सब अलग अलग होता एकत्व का है। विश्लेषण करके भिन्नता समझना और संश्लेषण करके अनुभव करना बुद्धि का काम है । एक चित्र में कौन कौन से रंग हैं यह जानना विश्लेषण है और उस चित्र के सौन्दर्य का आस्वाद लेना संश्लेषण है। आनन्द लेने के लिए संश्लेषणात्मक प्रक्रिया चाहिए, प्रक्रिया समझने के लिए विश्लेषणात्मक पद्धति चाहिए। ये दोनों बुद्धि से होते हैं और विवेक के प्रति ले जाते हैं।
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''जा रहे हो, जरा बुद्धि से तो विचार करके बोलो । मन में BMT अलग समझने के स्थान पर पूरा पदार्थ एक साथ''
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निरीक्षण, परीक्षण, विश्लेषण और संश्लेषण के आधार पर विवेक होता है। अभ्यास से यह विवेकशक्ति बढ़ती जाती है। अभ्यास से आकलन शक्ति भी बढ़ती जाती है। मन सहयोगी बन जाता है। मन को समझाया जाता है तब तो वह सही में सहयोगी बनता है, उसे दबाया जाता है तो कभी भी अविश्वासु अनुचर के समान धोखा देता है और मनमानी का प्रभाव बुद्धि पर होकर वह भटक जाती है।
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''कुछ भी संगत असंगत बातें आ सकती हैं बुद्धि में नहीं .. समझना संभ्लेषण है उदाहरण के लिए हलुवा और लड्डू''
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अभ्यास से बुद्धि तेजस्वी बनती है और अटपटे और जटिल विषय भी उसे कठिन नहीं लगते । समझने में उसे देर भी नहीं लगती। तब हम व्यक्ति को बुद्धिमान कहते हैं। जैसे सधे हुए हाथ सहजता से काम कर लेते हैं वैसे ही सधी हुई बुद्धि सहजता से समझ लेती है ऐसे व्यक्ति को हम बुद्धिमान व्यक्ति कहते हैं यह बुद्धि तेजस्वी के साथ साथ कुशाग्र भी होती है और विशाल भी होती है । कुशाग्र बुद्धि वह है जो अत्यन्त जटिल बातों की बारीकियों को स्पष्ट समझती है। विशाल बुद्धि वह है जो अत्यन्त व्यापक बातों का आकलन भी सहजता से कर लेती है। यह सब संभव है।
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''कुछ भी नहीं, जो ठीक है वही आना यही विवेक है । जो... दोनों में आटा, घी और गुड ही सम्मिश्रित हुए हैं परन्तु''
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बुद्धि स्वभाव से आत्मनिष्ठ होती है। वह अपने कार्यों के लिए चित्त पर निर्भर करती है यह अभी हमने देखा । '''चित्त''' संस्कारों का भंडार है । जन्मजन्मांतर के संस्कार इसमें संग्रहीत हैं । संस्कारों की ही स्मृति होती है । इस स्मृति का बुद्धि को बहुत उपयोग होता है। बुद्धि की विवेकशक्ति अत्यन्त परिपक्क होती है तब सृष्टि के सारे रहस्य उसके समक्ष प्रकट होते हैं । सृष्टि का मूल स्वरूप आत्मतत्व है यह सत्य उद्घाटित होता है और वह आत्मतत्व मैं ही हूँ, यह भी समझता है । केवल मैं ही  नहीं तो समग्र सृष्टि ही आत्मतत्व है यह भी समझ में आता है। अत: मैं और सृष्टि के सभी पदार्थ एक ही हैं ऐसा भी समझ में आता है। परिणामस्वरूप आपपर भाव समाप्त हो जाता है। और अहम ब्रह्मास्मि तथा सर्व खलु इदं ब्रह्म समझ में आता है। यह बुद्धि से आत्मतत्व को जानना है। इसे भगवान शंकराचार्य विवेकख्याति कहते हैं। विवेकख्याति से यथार्थबोध होता है। बुद्धि से आत्मतत्व को समझना ज्ञानमार्ग अथवा ज्ञानयोग है। बुद्धि से तत्व को समझना तत्वज्ञान है। बुद्धि से शास्त्रों को समझना अपरा विद्या से परा विद्या की ओर जाना है। परिपक्क बुद्धि में अनुभूति की ओर जाने की क्षमता होती है ।
 
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''ठीक है उसीको यथार्थ कहते हैं । उनके मिश्रण की प्रक्रिया अलग अलग है इसलिए उनका''
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''बुद्धि जब दुर्बल होती है और मन को वश में नहीं. रूप, रंग, स्वाद सब अलग अलग होता एकत्व का है ।''
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''कर सकती अथवा मन की उपेक्षा नहीं कर सकती तब. विश्लेषण करके भिन्नता समझना और संश्लेषण करके''
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''आकलन और निर्णय सही नहीं होते हैं । इसलिए मन को... अनुभव करना बुद्धि का काम है । एक चित्र में कौन कौन''
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''बीच में आने से रोकना बहुत आवश्यक है । मन को इस... से रंग हैं यह जानना विश्लेषण है और उस चित्र के सौन्दर्य''
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''प्रकार साधना चाहिए कि वह बुद्धि के अनुकूल हो और का आस्वाद लेना संश्लेषण है। आनन्द लेने के लिए''
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''उसकी बात माने । केवल उपेक्षा करते रहने से तो वह ताक. संश्लेषणात्मक प्रक्रिया चाहिए, प्रक्रिया समझने के लिए''
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''में रहता है कि कब मौका मिले और कब मनमानी करे । विश्लेषणात्मक पद्धति चाहिए । ये दोनों बुद्धि से होते हैं''
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''बुद्धि की दूसरी शक्ति या साधन है परीक्षण । यह भी... और विवेक के प्रति ले जाते हैं ।''
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''ज्ञानेन्द्रियों के सहयोग से ही होता है । यह केवल दर्शनिन्द्रिय निरीक्षण, परीक्षण, विश्लेषण और संश्लेषण के''
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''से नहीं तो पांचों ज्ञानेंद्रियों के सहयोग से होता है । इसकी. आधार पर विवेक होता है । अभ्यास से यह विवेकशक्ति''
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''भी स्थिति दृशनिन्द्रिय और मन के जैसी ही होती है । बढ़ती जाती है । अभ्यास से आकलन शक्ति भी बढ़ती''
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''इसके आगे कार्यकारण सम्बन्ध जानने की जो शक्ति... जाती है। मन सहयोगी बन जाता है। मन को समझाया''
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''है वह बुद्धि की अपनी ही है परन्तु निरीक्षण और परीक्षण... जाता है तब तो वह सही में सहयोगी बनता है, उसे दबाया''
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''के परिपक्क होने से ही वह आती है । अपने आसपास की... जाता है तो कभी भी अविश्वासु अनुचर के समान धोखा''
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''परिस्थिति का आकलन करना और चित्त में जो पूर्व. देता है और मनमानी का प्रभाव बुद्धि पर होकर वह भटक''
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''अनुभवों की स्मृतियाँ संग्रहीत हैं उनके आधार पर... जाती है।''
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''कार्यकारण सम्बन्ध समझना उसके लिए सम्भव होता है । अभ्यास से बुद्धि तेजस्वी बनती है और अटपटे और''
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''बुद्धि मन से पीछा छुड़ाकर चित्तनिष्ठ और आत्मनिष्ठ बनकर... जटिल विषय भी उसे कठिन नहीं लगते । समझने में उसे देर''
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''व्यवहार करती है तभी विवेक कर सकती है । कार्यकारण. भी नहीं लगती । तब हम व्यक्ति को बुद्धिमान कहते हैं ।''
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''सम्बन्ध बिठाने के लिए संश्लेषण और विश्लेषण करना... जैसे सधे हुए हाथ सहजता से काम कर लेते हैं वैसे ही''
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''होता है । एक ही घटना अथवा पदार्थ या रचना के भिन्न. सधी हुई बुद्धि सहजता से समझ लेती है । ऐसे व्यक्ति को''
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''भिन्न आयामों को अलग अलग कर समझना विश्लेषण है ।. हम बुद्धिमान व्यक्ति कहते हैं । यह बुद्धि तेजस्वी के साथ''
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''उदाहरण के लिए हमारा पूरा शरीर एक ही है परन्तु उसका... साथ कुशाग्र भी होती है और विशाल भी होती है । कुशाग्र''
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''कार्य समझने के लिए हम हाथ, पैर, मस्तक ऐसे अलग... बुद्धि वह है जो अत्यन्त जटिल बातों की बारिकियों को''
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''अलग हिस्से कर उनके कार्य समझते हैं । खाद्य पदार्थ एक... स्पष्ट समझती है । विशाल बुद्धि वह है जो अत्यन्त व्यापक''
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''ही है परन्तु उसमें कौन कौन से पदार्थों का संमिश्रण है और. बातों का आकलन भी सहजता से कर लेती है । यह सब''
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''उनके मिश्रण की क्या प्रक्रिया है यह अलग अलग करके... संभव है।''
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''समझने का प्रयास करते हैं । बुद्धि स्वभाव से आत्मनिष्ठ होती है। वह अपने''
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''उसके ठीक विपरीत प्रक्रिया संश्लेषण की है । पदार्थ, ... कार्यों के लिए चित्त पर निर्भर करती है यह अभी हमने''
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देखा । चित्त संस्कारों का भंडार है । जन्मजन्मांतर के संस्कार इसमें संग्रहीत हैं । संस्कारों की ही स्मृति होती है । इस स्मृति का बुद्धि को बहुत उपयोग होता है । बुद्धि की विवेकशक्ति अत्यन्त परिपक्क होती है तब सृष्टि के सारे रहस्य उसके समक्ष प्रकट होते हैं । सृष्टि का मूल स्वरूप आत्मतत्व है यह सत्य उद्घाटित होता है और वह आत्मतत्व मैं ही हूँ, यह भी समझता है । केवल मैं ही  नहीं तो समग्र सृष्टि ही आत्मतत्व है यह भी समझ में आता है। अत: मैं और सृष्टि के सभी पदार्थ एक ही हैं ऐसा भी समझ में आता है। परिणामस्वरूप आपपर भाव समाप्त हो जाता है। और अहम ब्रह्मास्मि तथा सर्व खलु इदं ब्रह्म समझ में आता है। यह बुद्धि से आत्मतत्व को जानना है । इसे भगवान शंकराचार्य विवेकख्याति कहते हैं। विवेकख्याति से यथार्थबोध होता है। बुद्धि से आत्मतत्व को समझना ज्ञानमार्ग अथवा ज्ञानयोग है । बुद्धि से तत्व को समझना तत्वज्ञान है। बुद्धि से शास्त्रों को समझना अपरा विद्या से परा विद्या की ओर जाना है। परिपक्क बुद्धि में अनुभूति की ओर जाने कि क्षमता होती है ।
      
विवेकशक्ति को जागृत करना और विकसित करना शिक्षा का लक्ष्य है। परन्तु आज हम बुद्धि के केवल भौतिक पक्ष पर अटक गए हैं । जीवन को और जगत को भौतिक दृष्टिकोण से देखने का यह परिणाम है। इसे भौतिकवाद से बचाने का काम प्रथम करना होगा । दूसरा अवरोध यह है कि हम इंद्रियों और मन में अटक गए हैं। भौतिकवाद में अतिशय विश्वास होने के कारण हमने मापन और आकलन के यांत्रिक साधन विकसित किए हैं और बौद्धिक क्षमताओं के स्थान पर साधनों का प्रयोग शुरू किया है जो बुद्धिविकास में अवरोध बनता है । उदाहरण के लिये पहाड़ो के स्थान पर गणनयंत्र का उपयोग करके हमने गणनक्षमता को कुंठित कर दिया । भारत की पारंपरिक पद्धति में पहाड़े कंठस्थ करना हमारा अंगभूत गणनयंत्र था । उसकी अवमानना कर यान्त्रिक साधन को अपनाना हानिकारक ही सिद्ध होता है । यह उल्टी दिशा है जो बुद्धिविकास के लिए हानिकारक है । ऐसी तो सैकड़ों बाते हैं जो सुविधा के नाम पर बुद्धिविकास के मार्ग में अवरोध बनकर जम गईं हैं । इन सबकी चर्चा करने का यह स्थान नहीं है परन्तु ज्ञानक्षेत्र के सन्दर्भ में इनका विचार करना अपरिहार्य है ।
 
विवेकशक्ति को जागृत करना और विकसित करना शिक्षा का लक्ष्य है। परन्तु आज हम बुद्धि के केवल भौतिक पक्ष पर अटक गए हैं । जीवन को और जगत को भौतिक दृष्टिकोण से देखने का यह परिणाम है। इसे भौतिकवाद से बचाने का काम प्रथम करना होगा । दूसरा अवरोध यह है कि हम इंद्रियों और मन में अटक गए हैं। भौतिकवाद में अतिशय विश्वास होने के कारण हमने मापन और आकलन के यांत्रिक साधन विकसित किए हैं और बौद्धिक क्षमताओं के स्थान पर साधनों का प्रयोग शुरू किया है जो बुद्धिविकास में अवरोध बनता है । उदाहरण के लिये पहाड़ो के स्थान पर गणनयंत्र का उपयोग करके हमने गणनक्षमता को कुंठित कर दिया । भारत की पारंपरिक पद्धति में पहाड़े कंठस्थ करना हमारा अंगभूत गणनयंत्र था । उसकी अवमानना कर यान्त्रिक साधन को अपनाना हानिकारक ही सिद्ध होता है । यह उल्टी दिशा है जो बुद्धिविकास के लिए हानिकारक है । ऐसी तो सैकड़ों बाते हैं जो सुविधा के नाम पर बुद्धिविकास के मार्ग में अवरोध बनकर जम गईं हैं । इन सबकी चर्चा करने का यह स्थान नहीं है परन्तु ज्ञानक्षेत्र के सन्दर्भ में इनका विचार करना अपरिहार्य है ।

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