आलेख

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अध्याय १६

पर्व ५

विविध

प्रथम पर्व के प्रकाश में दूसरे, दूसरे के प्रकाश में तीसरे इस प्रकार क्रमशः पर्यों की रचना हुई है । यह पाँचवा पर्व एक दृष्टि से समापन पर्व है ।

इस पर्व में कुछ आलेख दिये गये हैं समस्त शिक्षाविचार को सूत्ररूप में प्रस्तुत करते हैं । इनका प्रयोग स्वतन्त्ररूप में भी किया जा सकता है । इनके आधार पर स्थान स्थान पर चर्चा की जा सकती है ।

साथ ही जिनके माध्यम से इस ग्रन्थ के अनेक विषयों में व्यापक सहभागिता प्राप्त करने का प्रयास हुआ उन प्रश्नावलियों को भी एक साथ रखा गया है । विभिन्न समूहों में इन विषयों पर चर्चा के प्रवर्तन हेतु इनका उपयोग सुलभ बने इस दृष्टि से यह प्रयास किया है।

इस पर्व का, और इस ग्रन्थ का समापन एक सर्वसामान्य प्रश्नोत्तरी से होता है । ये प्रश्न ऐसे हैं जिनकी सर्वत्र चर्चा होती है और सब अपनी अपनी द्रष्टि से उनके उत्तर खोजते हैं । यहाँ भारतीय शैक्षिक दृष्टि से इन प्रश्नों के उत्तर देने का प्रयास किया गया है । अपेक्षा यह है कि शिक्षा के विषय में केवल चिन्ता करने के स्थान पर हम यथासम्भव, यथाशीघ्र प्रत्यक्ष परिवर्तन करने का प्रारम्भ करें ।

अनुक्रमणिका

१६. आलेख

१७. भारतीय शिक्षा के व्यावहारिक आयाम

१८. प्रश्नावलि एक सर्वसामान्य प्रश्नोत्तरी

अध्याय १६

आलेख १

अर्थकरी शिक्षा के व्यावहारिक आयाम

  • भगवान ने हाथ काम करने के लिये दिये हैं इसलिये हाथ से काम करना अनिवार्य है और अच्छा है इस बात का स्वीकार करना चाहिये।
  • घर में और विद्यालय में शिशुअवस्था से ही हाथ से काम करना सिखाना चाहिये ।
  • हाथ से काम करने वाला न करने वाले से श्रेष्ठ है ऐसा मानस बनना चाहिये ।
  • काम करने वाले हाथ में ही लक्ष्मी, सरस्वती और लक्ष्मीपति का वास है यह तथ्य समझना चाहिये।
  • श्रेष्ठ समाज समृद्ध समाज होता है। समाज को समृद्ध बनाने हेतु अर्थकरी शिक्षा की व्यवस्था होनी चाहिये।
  • समृद्धि, धर्म और संस्कृति के अविरोधी होनी चाहिये । धर्म अर्थ से श्रेष्ठ माना जाना चाहिये।
  • भौतिक पदार्थों के उत्पादन पर आधारित समृद्धि होनी चाहिये । अनेक सांस्कृतिक बातें अर्थ से परे होनी चाहिये ।
  • समाज में केवल गृहस्थ को ही अर्थार्जन करने का अधिकार है, शेष तीनों आश्रम गृहस्थ के आश्रित है।
  • हर गृहस्थ को अर्थार्जन करना ही चाहिये । परन्तु शिक्षक, वैद्य, पुरोहित, न्यायाधीश भिक्षावृत्ति से और राजा तथा अमात्य वर्ग चाकरी वृत्ति (नौकरी) से अर्थार्जन करेंगे।
  • देश की प्राकृतिक सम्पदा, मनुष्य के हाथों की कारीगरी की कुशलता और मनुष्य की बुद्धि की निर्माणक्षमता आर्थिक समृद्धि के मूल आधार हैं।
  • अर्थकरी शिक्षा उत्पादन केन्द्रों में, वाणिज्य के केन्द्रों में और शासन के केन्द्रों में दी जानी चाहिये।
  • देश की अर्थनीति विश्वविद्यालयों में बननी चाहिये, उसका क्रियान्वयन राज्य द्वारा होना चाहिये और उसका पालन प्रजा द्वारा होना चाहिये।

आलेख २

कामकरी शिक्षा के व्यावहारिक आयाम

  • काम का अर्थ केवल जातीयता नहीं है । सृजन के मूल संकल्प के रूप में वह सृष्टि में प्रथम उत्पन्न हुआ है । उसका आदरपूर्वक स्वीकार करना चाहिये ।
  • काम अनन्तकोटि कामना अर्थात् इच्छाओं का रूप धारण कर मनुष्य के मन में प्रतिष्ठित हुआ है। काम की शिक्षा मुख्य रूप से मन की शिक्षा है।
  • कामनायें उपभोग करने से कभी शान्त नहीं होतीं। कामनायें कभी समाप्त नहीं होतीं । कामनाओं को संयमित करना ही मनुष्य का लक्ष्य होना चाहिये । इसीको मनःसंयम कहते हैं।
  • सन्तोष मनःसंयम का एक महत्त्वपूर्ण आयाम है। सन्तोष से ही सुख, शान्ति, प्रसन्नता प्राप्त हो सकते हैं।
  • मनःसंयम हेतु ध्यान, जप, सत्संग, सेवा, स्वाध्याय, ॐकार उच्चारण और सात्त्विक आहार अनिवार्य है।
  • काम वस्तुओं की प्राप्ति हेतु प्रेरित करता है, येनकेन प्रकारेण उन्हें प्राप्त करने हेतु उकसाता है । उसमें बह नहीं जाना कामसाधना है ।
  • काम अनेक वस्तुओं के सृजन हेतु भी प्रेरित करता है। वस्तुओं के सृजन में कौशल, गति और उत्कृष्टता प्राप्त करना कामसाधना है।
  • काम सृजन को प्रेरित करता है । उसका सुसंस्कृत रूप कला है । कामतुष्टि विकसित होकर सौन्दर्यबोध और प्रसन्नता में परिणत होती है। काम प्रेम बन जाता है। यह काम साधना का श्रेष्ठ रूप है।
  • काम का एक अर्थ जातीयता है । वह शारीरिक स्तर पर सम्भोग, प्राणिक स्तर पर मैथुन, मानसिक स्तर पर आसक्ति, बौद्धिक स्तर पर आत्मीयता प्रेरित कर्तव्य, चित्त के स्तर पर प्रसन्नता और आत्मिक स्तर पर प्रेम के रूप में व्यक्त होता है। काम की शरीर से आत्मा तक की यात्रा कामसाधना है।
  • काम हमारा नियन्त्रण न करे अपितु हमारे नियन्त्रण में रहे तो वह बडी शक्ति है जो अनेक असम्भव बातों को सम्भव बनाती है।

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References

भारतीय शिक्षा : वैश्विक संकटों का निवारण भारतीय शिक्षा (भारतीय शिक्षा ग्रन्थमाला ५), प्रकाशक: पुनरुत्थान प्रकाशन सेवा ट्रस्ट, लेखन एवं संपादन: श्रीमती इंदुमती काटदरे