अध्ययन और अनुसन्धान

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वर्तमान अध्ययन पद्धति

१. 'भारत शब्द का अर्थ ही ज्ञान में रत' ऐसा होता है । भारत ऐसा देश है जो अपना सारा व्यवहार ज्ञान के प्रकाश में करता है । ज्ञानोपासना एवं ज्ञानसाधना यहाँ की प्रिय वृत्ति-प्रवृत्ति है। ज्ञान को यहाँ पवित्रतम माना गया है और उसे सभी प्रकार के बन्धनों से मुक्त करनेवाला बताया गया है ।

२. वर्तमान भारत आत्मविस्मृति के संकट से ग्रस्त हो गया है क्योंकि भारत की ज्ञानसाधना रुक गई है । विगत दो सौ वर्षों में पश्चिमी शिक्षा के प्रचलन का यह परिणाम है । पश्चिमी शिक्षा ने धार्मिक ज्ञानधारा को अवरुद्ध कर दिया है । इस अवरोध को दूर कर

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ज्ञानधारा को पुनः प्रवाहित करने हेतु अध्ययन करना एक मात्र उपाय है ।

३. धार्मिक ज्ञानधारा को पुनर्प्रवाहित करने हेतु हमें अपने शास्त्रग्रन्थो का अध्ययन करना पड़ेगा । हमारे शास्त्रग्रन्थ हैं वेद, उपनिषद, दर्शनों के सूत्रग्रन्थ, रामायण, महाभारत, पुराण आदि इनके साथ साथ भौतिक विज्ञान के भी अनेक ग्रन्थ उपलब्ध हैं जो भारत की भौतिक समृद्धि के लिये मार्गदर्शक रहे हैं ।

४. अध्ययन करने की सही पद्धति को अपनाना आवश्यक होगा । सही आलम्बन भी हमें निश्चित करना होगा । इन दो बातों के परिणाम स्वरूप हमें राष्ट्र के जीवन के लिये सही अधिष्ठान और दिशा प्राप्त होगी ।

५. अध्ययन की पद्धति से क्या तात्पर्य है ? आज भी देश में वेदों का अध्ययन होता है । देशभर में हजारों वेद पाठशालायें चलती हैं । उनमें हजारो बाल, किशोर, युवा अध्ययन करते हैं। परन्तु उनका अध्ययन कण्ठस्थीकरण और कर्मकाण्ड तक ही सीमित रहता है । व्यवहारजीवन में वह दिखाई नहीं देता ।

६. इन वेद पाठशालाओं का इतना उपकार अवश्य है कि उनके कण्ठस्थीकरण के कारण वेद आज श्रुति रूप में जिन्दा हैं, हम वेद्मन्त्रों को सुन सकते हैं । वेदों की अगणित शाखायें अध्ययन के खण्डित होने के कारण आज श्रुति और ग्रन्थ दोनों रूपों में लुप्त हो गई हैं । इन पाठशालाओं के कारण अल्प मात्रा में ही सही, परन्तु कुछ शाखायें बच गई हैं ।

७. इसी प्रकार अनेक प्रकार के यज्ञ, अनुष्ठान आदि कर्मकाण्ड उनके शुद्ध स्वरूप में हो सकते हैं । यद्यपि इन सब की मात्रा अत्यन्त अल्प है तथापि वेदों का अस्तित्व अभी मिट नहीं गया है यह हमारे देश का महदू भाग्य है ।

८. साथ ही हमें उपनिषदों का अध्ययन भी करना होगा । उपनिषद् वेदों का ज्ञानकाण्ड है । धार्मिक ज्ञानविश्व के लिये यह अध्ययन अनिवार्य है। धार्मिक जीवनदृष्टि को सम्यक्‌ रूप में समझने के लिये इनका अध्ययन आवश्यक है ।

९. धार्मिक अध्येताओं के लिये यह जीवनदृष्टि को समझना ही सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण और मूल बात है । इस विषय में ही बहुत बडा सम्ध्रम है। पश्चिमी ज्ञानधारा में जिन्होंने अवगाहन किया है ऐसे असंख्य विद्वान आज भारत में हैं जिन्हें जीवनदृष्टि जैसा कुछ होता है, और जीवनदृष्टियों में भी कुछ अन्तर होता है इसका पता ही नहीं है ।

१०. फिर धार्मिक जीवनदृष्टि पश्चिमी जीवनदृष्टि से भिन्न है, सर्वथा भिन्न है इसका पता होने की तो सम्भावना ही नहीं बनती है । फिर धार्मिक और पश्चिमी जीवनदृष्टि में क्या अन्तर है और इसके परिणाम क्या होते हैं इसका पता न होना भी स्वाभाविक है । आज भारत में पश्चिमी जीवन दृष्टि को अपनाया गया है और वह शरीर में जिस प्रकार “फोरेन बॉडी' उपट्रव करता रहता है उस प्रकार उपद्रव करता रहता है । और पता ही नहीं है तो आगे की सारी बातें तो अपने आप असम्भव हो जाती हैं ।

११. अतः उपनिषदों के अध्ययन का एक उद्देश्य धार्मिक जीवनदृष्टि को समझने का होना चाहिये । यदि यह उद्देश्य नहीं रहा तो अध्ययन की पद्धति में अन्तर पड जाता है । इस प्रकार का अध्ययन भी हमारे देश में आज चल ही रहा है ।

१२. उदाहरण के लिये देश के अनेक विश्वविद्यालयों में उपनिषदों का अध्ययन होता है । वह संस्कृत विभाग के अन्तर्गत होता है। कुछ अल्पमात्रा में दर्शन विभाग में भी होता है । कदाचित्‌ धर्म और संस्कृति के विभाग में भी होता है । परन्तु यह अध्ययन एक तो अत्यन्त अल्प मात्रा में होता है, दूसरा उसका कोई सन्दर्भ नहीं है ।

१३. उदाहरण के लिये संस्कृत भाषा और साहित्यविभाग में ब्रह्मसून्न शांकरभाष्य का कुछ अंश अध्ययन हेतु निश्चित किया जाता है । उसके कुल पन्द्रह सूत्रों का अध्ययन करना है । यह तो विषय और पाठ्यक्रम

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हुआ । प्रश्न यह है कि दर्शन का यह विषय भाषा और साहित्य विभाग में क्यों है ? केवल संस्कृत में लिखा गया है इसलिये । केवल पन्‍्द्रह सूत्र क्यों हैं ? एक वर्ष में इतने ही पढ़े जा सकते हैं इसलिये । इन्हें पढने से क्या होगा ? इसका उचित उत्तर देश के हजारों छात्रों को नहीं मिलता है क्योंकि देश के सैकड़ो अध्यापकों और पाठ्यक्रम निर्धारित करनेवालों के पास भी नहीं है । इस प्रकार अनिश्चित उद्देश्य और आलम्बनरहित अध्ययन की पद्धति हमें बदलनी होगी ।

१४. देश में अनेक संन्यासी सम्प्रदाय, मठ, आश्रम आदि चलते हैं । संन्यासियों के लिये, धर्माचार्यों के लिये उपनिषदों का, दर्शन ग्रन्थों का या वेदों का अध्ययन करना अनिवार्य होता है । वर्षों तक ऐसा अध्ययन यहाँ होता भी है । परन्तु यह या तो ज्ञान बढ़ाने के लिये अथवा मोक्ष प्राप्त करने के लिये होता है । समाज की जीवनशैली बदलना इनके लिये बहुत कठिन होता है । कदाचित यह उद्देश्य भी नहीं होता । हमें इस पद्धति में भी परिवर्तन करना होगा ।

१५. बीसवीं शताब्दी के प्रारम्भ से अध्ययन का एक नया तरीका भी आरम्भ हुआ है । संस्कृत में नहीं आपितु अधिकतर अंग्रेजी में धार्मिक शास्त्रग्रन्थों का अध्ययन होता है । पाश्चात्य पद्धति से जो व्यवस्थायें बनी हुई हैं उनमें भी हमारे ग्रन्थ कितने उपयोगी हैं यह बताना इनका उद्देश्य होता है । उदाहरण के लिये भगवदूगीता में कितनी अध्यापन पद्धतियों का निरूपण मिलता है अथवा व्यवस्थापन के कितने सूत्र मिलते हैं यह बताकर व्यवहार में भी भगवदूगीता कितनी उपयोगी है यह सिद्ध करने का प्रयास होता है । शिक्षा की या व्यवस्थापन की प्रस्थापित पद्धति को बदलने का निर्देश नहीं होता मूल सूत्र वही रहते हैं, उनको समृद्ध कैसे किया जाय इसका विचार होता है । इसे भी बदलना होगा ।

१६. एक बहुत छोटा परन्तु सफल प्रयास दिखाई देता है जहाँ उपनिषदों की वास्तव में प्रतिष्ठा हुई है। उदाहरण के लिये. रवीन्द्रनाथ ठाकुर का शिक्षाचिन्तन औपनिषदिक चिन्तन के प्रकाश में ही विकसित हुआ है । श्री अरविन्द का समग्र जीवन चिन्तन-विचार और व्यवहार सहित-वेद और उपनिषदों के आधार पर ही प्रतिष्ठित हुआ है । विनोबा भावे उसी मालिका में जुडते हैं । महात्मा गांधी भी उसी विचार से अनुप्राणित होकर अपना व्यवहार चिन्तन प्रस्तुत करते हैं । अध्ययन का यह तरीका हमारे लिये उदाहरण स्वरूप हो सकता है ।

अध्ययन का उद्देश एवं स्वरूप

१७. यहाँ जितने भी उदाहरण दिये हैं वे सब वर्तमान समय के हैं । उनमें नाम तो जुड ही सकते हैं परन्तु हमें अध्ययन के उद्देश्य एवं आलम्बन को तो निश्चित रूप से व्याख्यायित करना होगा |

१८. धार्मिक जीवनदृष्टि को समझना यह प्रथम उद्देश्य है । उस दृष्टि से जीवन की हर व्यवस्था और व्यवहार का दर्शन करना यह दूसरा उद्देश्य है । इस दृष्टि से पश्चिमी व्यवस्था और व्यवहार का दर्शन करना तीसरा उद्देश्य है । और इसके आधार पर जीवन की हर व्यवस्था और व्यवहार में परिवर्तन करना इसका आलम्बन है ।

१९. इस दृष्टि से अध्ययन और अनुसन्धान की प्रक्रिया साथ साथ चलना आवश्यक है । एक और तो उपनिषदों में क्या कहा गया है उसका तत्वार्थ समझना, वेदों में इस सृष्टि का निरूपण, मनुष्य और सृष्टि के सम्बन्ध किस प्रकार निरूपित किये गये हैं, भगवद्गीता कौनसी जीवनदृष्टि समझा रही है इसका तत्वार्थ समझना यह अध्ययन का विषय होगा और दूसरी ओर वर्तमान व्यवस्थाओं में और व्यवहार में किस प्रकार आमूल परिवर्तन होगा । इसका निरूपण होता जाय यह अनुसन्धान है । इसे व्यावहारिक अनुसन्धान कहा. जायेगा । ऐसे अध्ययन और अनुसन्धान की आज आवश्यकता है ।

२०. मुख्य बात तो यह है कि हमें समग्रता में अध्ययन की

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योजना बनानी होगी । वेद और उपनिषदों के बारे में अध्ययन करना यह पर्याप्त नहीं है, जीवन के अध्ययन के लिये वेद उपनिषद से निर्देशक सूत्र प्राप्त करना यह आवश्यक मुद्दा है । प्राचीन समय में रचे गये इन ग्रन्थों के आधार पर अर्वचीन जीवन कैसे चलेगा इसका चिंतन करते जाना. आवश्यक है। अर्थात्‌ तत्त्वचिन्तन और व्यवहार चिन्तन साथ साथ चलना चाहिये । तभी हम उससे लाभान्वित हो सकते हैं ।

२१. तत्त्व को भारत में श्रुति कहा गया है । वह शाश्वत सत्य है। उसमें परिवर्तन होता नहीं है। परन्तु व्यवहार देशकाल परिस्थिति के अनुसार बदलता है । नित्य परिवर्तनशील जगत में उसे बदलना ही चाहिये । व्यवहार को स्मृति कहते हैं । शाश्वत तत्त्व के प्रकाश में वर्तमान व्यवहार कैसा हो इसका निरूपण करना स्मृति की रचना करना है। तत्त्वचिन्तन हमारे अध्ययन का आलम्बन है और स्मृति की रचना करते जाना अनुसन्धान का । दोनों साथ साथ चलें यह अनिवार्यता है ।

२२. अध्ययन और अनुसन्धान के साथ ही उसे व्यवहार्य बनाने के उपायों का निरूपण करना उसका तीसरा आयाम है । इस प्रकार तत्त्वचिन्तन, स्मृतिरचना और क्रियान्वयन के उपाय इन तीन आयामों में हमारा ज्ञानव्यवहार चलना आवश्यक है ।

प्रमाणव्यवस्था

२३. अध्ययन और अनुसन्धान के समस्त ज्ञानव्यापार के लिये हमें प्रमाणव्यवस्था की भी आवश्यकता होगी । हमारे लिये यह मानसिक साहस का प्रश्न है, बौद्धिक साहस का नहीं । हम वेद और उपनिषदों को प्रमाण मान सकते हैं कि नहीं इसका निश्चय पहले करना होगा । भगवदूगीता प्रमाण है कि नहीं इसका निश्चय प्रथम करना होगा । जीवन के किस क्षेत्र में कौन सा ग्रन्थ हमारे लिये प्रमाण है इसका भी निश्चय करना होगा । जीवनदृष्टि किस ग्रन्थ में किस रूप में निरूपित हुई है और भिन्न भिन्न रूपों और प्रक्रियाओं में किस प्रकार एक ही है इसका निश्चय करना होगा और उस तत्त्व को व्यवहार में रूपान्तरित करते समय प्रक्रिया शुद्ध रही है कि नहीं इसका भी विचार करते रहना होगा। यह निश्चिति नहीं होती तब तक हमारा अध्ययन दुलमुल ही चलता रहेगा । हम विश्वास के साथ कुछ बोल नहीं पायेंगे ।

२४. यदि हम वेद, उपनिषद्‌ आदि को प्रमाण मानते हैं तो उसका कारण क्या है ? क्या वह हमारे पूर्वजों ने रचा है इसलिये ? क्या उसकी रचना भारत में हुई है इसलिये ? क्या वह प्राचीन है, प्राचीनतम है इसलिये ? क्‍या हम पश्चिम का कुछ भी नहीं चाहते हैं इसलिये ? क्या हम दुराग्रही और स्वमत आग्रही हैं इसलिये ? क्‍या हम पुराणपंथी हैं इसलिये ? क्या उनकी भाषा संस्कृत है इसलिये ?

२५. नहीं । ज्ञान वैश्विक होता है । ज्ञान के विश्व में कोई अपना पराया नहीं होता । स्वमत आग्रह तत्त्वचिन्तन में नहीं चलता । दुराग्रह तो बिल्कुल नहीं चलता । विवेक ही इसका अधिष्ठान है । निष्पक्षपाती होना ही अपेक्षित है । जहाँ भी जो कुछ भी सत्य है उसका स्वीकार करना ही ज्ञानविश्व का धर्म है । जो शाश्वत है उसमें प्राचीन और अर्वाचीन का भेद नहीं होता । वह चिरपुरातन और नित्यनूतन होता है । अतः जो सत्य है, शाश्वत है, वैश्विक है उसका ही प्रमाण के रूप में स्वीकार करना चाहिये । इस सिद्धान्त का स्वीकार तो सबको करना ही होगा । जो इसका स्वीकार नहीं करेगा वह ज्ञानविश्व से निष्कासित होगा ।

२६. वैश्विक क्या है ? जो सम्पूर्ण विश्व से सम्बन्धित है वह वैश्विक है । विश्व केवल धार्मिकों से नहीं बना @ | विश्व में वसुधा मात्र के मनुष्य हैं । विश्व केवल मनुष्यों का नहीं बना है । विश्व में मनुष्य के अलावा प्राणी, वनस्पति और पंचमहाभूत हैं । ये सब मिलकर ब्रह्माण्ड बनते हैं । विश्व केवल एक ब्रह्मांड से नहीं बना है । विश्व में अनन्तकोटि ब्रह्मांड है । इन सबका

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पहुँचने की प्रक्रिया को भारत में साधना कहा गया है । साधना के विविध मार्ग भी बताये गये हैं। इस अनुभूति को भी विविध शब्दों में व्यक्त किया गया है । कहीं उसे स्वस्वरूप में अवस्थिति कहा गया है, कहीं अहं ब्रह्माइस्मि तो कहीं ad UG इदं ब्रह्म तो कहीं आत्मसाक्षात्कार या ईश्वरसाक्षात्कार कहा गया है ।

३७. तत्त्वचिन्तन से लेकर, सामान्यजन तक अनुभूति के तत्त्व का स्वीकार हुआ है और लोग उसे अपनी अपनी भाषा में बोलते और समझते हैं । कोई “कण कण में भगवान' कहता है, कोई “सचराचर में परमात्मा का वास है' कहता है, कोई “नर ही नारायण है' कहता है तो कोई अन्तरात्मा कहता है । तात्पर्य यह है कि अनुभूति का प्रमाण भारत में प्रास्भ से ही स्वीकार्य है इतना ही नहीं तो वह सर्वश्रेष्ठ प्रमाण के रूप में स्वीकार्य है और स्वतःप्रमाण के रूप में प्रतिष्ठित है । इस विषय में परम्परा में तो किसी को आपत्ति नहीं है परन्तु वर्तमान में इसकी पुनःपरीक्षा करने की स्थिति उत्पन्न हुई है।

३८. पश्चिमी जगत की प्रमाण व्यवस्था अत्यन्त संकुचित है। पश्चिम एक ओर बुद्धि प्रामाण्य को स्वीकार करता है, दूसरी ओर भूतप्रामाण्य अर्थात्‌ भौतिकजगत के प्रामाण्य को स्वीकार करता है । तीसरी मर्यादा यह है कि वह मुखरित होकर स्पष्ट रूप से कहे या न कहे पश्चिम अपने को केन्द्र में रखकर स्वतः सापेक्ष प्रमाण को स्वीकार करता है, वैश्विकता को नहीं, जो वैश्विक है उसको मान्य करना ऐसी उसकी प्रवृत्ति नहीं है, जो अपना है वही वैश्विक है ऐसा प्रतिपादन करने की उसकी प्रवृत्ति है । इस प्रकार भारत और पश्चिम एकदूसरे से अत्यन्त भिन्न भूमि पर खडे हैं ।

३९. इसके साथ ही पश्चिम अनुभूति के प्रमाण को नहीं मानता है। पश्चिम के विश्व में अनुभूति जैसी संकल्पना ही नहीं है । धार्मिक भाषाओं में अंग्रेजी शब्द 'रिअलाइझेशन' का अनुवाद 'अनुभूति' किया है परन्तु वह उचित नहीं है । रिअलाइझेशन भी वहाँ बुद्धि से ही सम्बन्धित है बुद्धि से परे नहीं । अतः जो बुद्धि तक ही पहुँचता है उससे अनुभूति अस्पर्श्य ही रहती है ।

४०. इन पश्चिमी बौद्धिकों से प्रभावित धार्मिक वौद्धिक भी अनुभूति के प्रमाण को स्वीकार नहीं करते हैं और बुद्धिप्रामाण्य को ही प्रतिष्ठा देते हैं । धार्मिक ज्ञानविश्व में वेद और उपनिषद्‌ धर्मप्रामाण्य से तो प्रमाण रूप में स्वीकार्य हैं ही, उससे भी अधिक अनुभूति प्रामाण्य से प्रमाणरूप में स्वीकार्य हैं। आज भारत का ही ज्ञानविश्व इन्हें नकारने की स्थिति में पहुँच गया है । धार्मिकता के पक्षधर असंख्य विद्वान वेद्उपनिषदादि से अपरिचित हैं, उनको प्रमाण मानना कि नहीं मानना इस विषय में ट्रिधा बुद्धि वाले हैं और अनुभूति का प्रमाण उन्हें मान्य नहीं है । अनुभूति प्रमाण हो सकती है कि नहीं इसका लेशमात्र विचार किये बिना ही वह प्रमाण नहीं हो सकती ऐसा उनका निष्कर्ष है ।

४१. धार्मिक विद्वान बेदउपनिषद्‌, धर्म, अनुभूति आदि के प्रमाण होने के सामर्थ्य पर सन्देह करते हैं अथवा उन्हें अमान्य करते हैं इसका कारण उनका संस्कृत का अआज्ञान नहीं है । कारण तो विचार का अज्ञान ही है |

४२. अतः अध्ययन के क्षेत्र में हमारे समक्ष दो गट चयन के लिये हैं। एक है धर्मप्रामाण्य, वेदप्रामाण्य, अनुभूतिप्रामाण्य, आत्मप्रामाण्य का गट । दूसरा है केवल बुद्धि प्रामाण्य और भौतिक प्रामाण्य का गट । सीधा अन्तर तो यही है कि प्रथम गट का ही चयन कोई भी करेगा | पश्चिमी प्रमाणव्यवस्था अपने आपपमें सीमित ही है । धार्मिक ज्ञानविश्व के लिये यह गौरव का अनुभव करने का विषय है कि उन्होंने कभी भी व्यापकता को छोडा नहीं और परीक्षा के लिये आसान और संकुचित निकष अपनाये नहीं ।

४३. तो भी यदि भारत का वर्तमान ज्ञानविश्व इसे अमान्य करता है तो यह दोष अपनी विगत दस पीढ़ियों से

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चली आ रही शिक्षा प्रणाली का ही है। विश्वविद्यालय क्षेत्र अपने आपको परिष्कृत करे और उत्कष्टता को प्राप्त करे यह प्रथम कार्य है ।

४४. अब रही बात अनुभूति की । भारत के वर्तमान विश्वविद्यालय क्षेत्र में अनुभूति को स्थान नहीं है । विश्वविद्यालय का कोई भी अध्यापक अपने आपको अनुभूति के स्तर तक पहुँचाने की कल्पना भी नहीं कर सकता । यह साधना इस विश्व से परे है । किसे अनुभूति हुई है यह जानना भी उसके लिये असम्भव सी बात है। विश्वविद्यालयों की नियमावली के प्रावधानों से न अनुभूति प्राप्त की जाती है, न इस प्रणाली में इसके लिये पीएचडी जैसी उपाधियाँ निर्मित की जाती हैं, न विषय निर्धारण किया जा सकता है न किसे अनुभूति प्राप्त हुई है यह पहचाना जा सकता है । अनुभूति इस विश्वविद्यालय विश्व से तो परे है ।

४५. परन्तु अनुभूति को नकारना तो बुद्धिमानी नहीं है । एक अज्ञानी मनुष्य अपने पास के मूल्यवान रत्नों को जानता नहीं है इसलिये उन्हें काँच के क्षुछ्लक टुकडे मानकर फेंक देता है और उसे दुःख भी नहीं होता क्योंकि क्या फेंका यह उसे ज्ञात ही नहीं है वैसी ही स्थिति अनुभूति को नकारने वाले बुद्धिमानों की होगी । कुछ लोग स्वयं को जो ज्ञात नहीं है वह होता ही नहीं है ऐसा कहने वाले होते हैं। ये अहंकारी और क्षुद्र बुद्धिवाले होते हैं । भारत के बौद्धिक ऐसे नहीं हैं। यदि हैं तो उन्हें ऐसा रहना नहीं चाहिये । इसलिये अनुभूति को परम प्रमाण, स्वतः प्रमाण की प्रतिष्ठा मिलनी चाहिये । यह ज्ञानविश्व के हित में है । ज्ञानविश्व इससे परिष्कृत होगा, समृद्ध होगा, सिद्ध होगा ।

४६. इसके बाद भी अनुभूति की खोज तो शेष रह जाती है | विश्वविद्यालय के बाहर के क्षेत्र में अनुभूति प्राप्त व्यक्ति को सहज. पहचाना जा सकता है। सामान्यजन के पास भी पहचानने की सहज क्षमता होती है । परन्तु विश्वविद्यालय क्षेत्र श्रद्धावान नहीं होता है। पदवी, पद, प्रतिष्ठा और पैसा उसके अवरोध हैं । अतः विश्वविद्यालय के किसी शुद्ध अन्तःकरण युक्त अध्यापकों को अनुभूति प्राप्त करने की तपश्चर्या करनी चाहिये । अन्तःकरण को शुद्ध बनाकर ज्ञान की उपासना करने वाले विद्वान को जब मंत्रदर्शन होता है तभी उसे ऋषि कहा जाता था । ऐसे ऋषि ही भारत में ज्ञान और विज्ञान के ज्ञाता और प्रवर्तक थे । ऐसे द्रष्टा अध्यापकों को विश्वविद्यालय क्षेत्र के बाहर भी अनुभूति प्राप्त ऋषि को पहचानना सम्भव होगा |

४७. अभी पढ़ते समय ये बातें कपोल कल्पित लग सकती हैं परन्तु इनका बार बार उच्चारण होगा तो सम्भवता के दायरे में आती जायेंगी । परन्तु तब तक विश्वासपूर्वक हमने वेद्प्रामाण्य को मानना लाभकारी रहेगा ऐसी प्रमाण निश्चिति नहीं होगी तब तक धार्मिक शिक्षा की पुनप्रतिष्ठा की कल्पना भी हम नहीं कर सकते । विश्वविद्यालय भारत के ज्ञानप्रवाह के मूल हैं । वहीं पर यदि अनवस्था है तो शेष विश्व की सुस्थिति कैसे हो सकती है ?

युगानुकूलता

४८. धार्मिक ज्ञानविश्व के अन्दर के इस वाद को ही निपटना पहली आवश्यकता है । उससे यदि निपट कर अनुभूति प्रामाण्य, धर्म प्रामाण्य, वेद प्रामाण्य पर सर्वसम्मति हो गई तो दूसरा प्रश्न भी उतना ही महत्त्वपूर्ण है । वह है युगानुकूल निरूपण का ।

४९. वेद उपनिषद दर्शनादि के अनुसार हमारा व्यवहार जीवन चलना चाहिये तभी ये प्रमाण सार्थक हैं । यह केवल तात्तविक चर्चा तक सीमित नहीं है, दैनन्दिन जीवन को स्पर्श करने वाला है । उदाहरण के लिये संसद, बाजार, विद्यालय, घर आदि धार्मिक शास्त्रग्रन्थों द्वारा दी गई दृष्टि के अनुसार चलने चाहिये । तभी धार्मिक शास्त्रीय ज्ञान की प्रासंगिकता और प्रतिष्ठा है । आज तो इन चार में से एक भी इन शास्त्रों के अनुसार नहीं चलता है ।

५०. तो उपाय क्या है ? वेदों को हम धार्मिक ज्ञानधारा

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का स्रोत कहते हैं, तो फिर इस ज्ञानधारा के अनुसार संसद की प्रणाली और सांसदों का व्यवहार, बाजार का उत्पादन और वितरण, विद्यालयों की शिक्षा योजना और परिवार की जीवनशैली बननी चाहिये । इसके लिये धार्मिक ज्ञानधारा के मूल सिद्धान्तों का अध्ययन कर, चिन्तन कर वर्तमान आवश्यकताओं, वर्तमान परिस्थिति, वर्तमान सम्भावनाओं को ध्यान में रखकर व्यवस्थाओं और व्यवहार की प्रणाली का निरूपण करना तात्विक अध्ययन से भी अधिक चुनौतीपूर्ण कार्य है । इसे ही व्यावहारिक अनुसन्धान कहते हैं । आज हमने अनुसन्धान को भी बहुत क्षुद्र और क्षुल्लक बना दिया है। उसका परिष्कार करना चाहिये ।

५१. यह कार्य श्रेष्ठ कक्षा के अध्ययन अनुसन्धान पीठ का काम है । वर्तमान में जो विश्वविद्यालयों की दुनिया है उससे भिन्न प्रकार की व्यवस्था करने की आवश्यकता रहेगी । इस कार्य के लिये श्रेष्ठ कोटि के संन्यासी, शास्त्रवेत्ता, . अनुभूति wo विद्वान तथा विश्वविद्यालयों के जिज्ञासु_ और परिश्रमशील अध्यापकों को एकत्रित करना होगा ।

५२. जिस प्रकार अनेक महापुरुष नवीन सम्प्रदायों की स्थापना करते हैं उसी प्रकार किसी विद्वान ने ऐसी पीठ की स्थापना करनी चाहिये और धार्मिक ज्ञानधारा को पश्चिमी प्रभाव से मुक्त करने का स्पष्ट लक्ष्य और उसके लिये कार्ययोजना बनानी चाहिये । देशभर में जो भी धार्मिक ज्ञानधारा में अवगाहन करना चाहते हैं और समाज का हित चाहते हैं उन्हें इस पीठ की योजना में सम्मिलित करना चाहिये ।

५३. अध्ययन और अनुसन्धान के कार्य के व्यावहारिक पक्ष भी विचारणीय है । अध्ययन और अनुसन्धान के आधार पर दैनन्दिन जीवनशैली का निरूपण करना सरल परन्तु महत्त्वपूर्ण विषय है । दैनन्दिन जीवन से सम्बन्धित जितने भी विषय हैं उन सबके जानकारों ने एकत्रित आकर जीवनशैली के सूत्र बनाने चाहिये । उदाहरण के लिये शरीर और मन का स्वास्थ्य, दिनचर्या, शिष्टाचार, नैतिकता अथवा सदाचार, शील और चरित्र, अर्थव्यवहार, शिक्षा जैसे विषय दैनन्दिन जीवनशैली के अंग हैं । इन सबके ज्ञाता विद्वानों ने मिलकर जीवनशैली के सूत्र तैयार करना चाहिये । इन्हें समझाना चाहिये । समझाने हेतु विभिन्न स्वरूपों का प्रयोग हो सकता है । इनका तात्तिक और व्यावहारिक विवेचन भी हो सकता है । इन्हें प्रयोग में लाने हेतु प्रचार, प्रबोधन, प्रशिक्षण की योजना भी आवश्यक है। इन योजना के क्रियान्वयन हेतु विद्यालयों का सहयोग लिया जा सकता है ।

५४. इसी प्रकार से परिवार की जीवनशैली के सूत्र तैयार कर प्रबोधन, प्रशिक्षण और प्रचार की योजना बनानी चाहिये ।

५५. वर्तमान राष्ट्रजीवन की मूल समस्याओं को जीवनदृष्टि के प्रकाश में समझने हेतु चिन्तन सत्र चलाना चाहिये । इस दृष्टि से राष्ट्रजीवन के प्रवाहों से सम्यक्‌ रूप से अवगत होना आवश्यक है । विश्वविद्यालय का क्षेत्र समाजजीवन की गतीविधियों से विमुख नहीं हो सकता । आज तो स्थिति यह है कि वैश्विक प्रवाहों से भी अवगत होना पडेगा ।

५६. इन समस्याओं को समझकर, इनका विश्लेषण कर इनके उद्गम के स्रोत कौन से हैं, इनका परिणाम क्या हो रहा है और इन्हें दूर करने के उपाय क्या है इसके ज्ञानात्मक उत्तर खोजने होंगे । ज्ञानात्मक उत्तर ही सबसे प्रभावी होते हैं यह अनुभवजन्य सत्य है । इन उत्तरों के आधार पर मार्गदर्शक सूत्र बन सकते हैं ।

५७. अर्थशास्त्र को नये से निरूपित करना आज के समय में अत्यन्त आवश्यक है यह बात सहज ही समझ में आयेगी । वर्तमान समय में धर्म को एक और फेंककर अर्थ समाजजीवन को संचालित करनेवाला तत्त्व बन गया है । अर्थ जब सर्वाधिकार में आ जाता है तब वह औरों का विनाश करने के बाद अपना भी विनाश करता है यह भी अनुभवजन्य सत्य है, यदि बुद्धि से जानना चाहें तो यह बुद्धिगम्य सत्य भी है ।

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अर्थशास्त्र को. अनर्थशास्त्र कहना अनुचित नहीं होगा । इतना विनाशक वह बन गया है ।

५८. इसलिये अर्थशास्त्र की नये से रचना करनी चाहिये | अर्थशास्त्र के सम्बन्ध में जो निर्देश दिये गये हैं उन्हें आधारभूत सिद्धान्त बनाना चाहिये। जैसे कि 'अर्थशास्त्रातुबलवतू धर्मशास्त्रमिति स्मृतः' : इसका तात्पर्य यह है कि अर्थशास्त्र धर्मशास्त्र के अधीन होना चाहिये । धर्मप्रामाण्य का मुद्दा तो पूर्व में चर्चा में आया ही है ।

५९. एक और अर्थशास्त्र की रचना और साथ ही साथ इस प्रकार के नये अर्थशास्त्र की आवश्यकता का महत्त्व समझाने वाले लेख प्रकाशित होने की योजना भी बननी चाहिये । सामान्य जन और विट्रज्जनों की मानसिक और वैचारिक अनुकूलता बनना आवश्यक है।

६०. साथ ही इस नये अर्थशास्त्र के अनुसार देश की अर्थनीति और अर्थव्यवस्था के निर्देश निश्चित होना आवश्यक है । अर्थात्‌ अर्थशास्त्र का अध्ययन और अर्थशास्त्र का व्यवहार साथ साथ चलना चाहिये । सामान्यजन के अर्थव्यवहार के लिये भी निर्देश तैयार करने चाहिये ।

६१. बाजार कैसे चलेगा, उत्पादन और वितरण की क्या व्यवस्था होगी और व्यक्ति तथा समाज की समृद्धि परस्पर अविरोधी रहकर कैसे बढ़ेगी इसका निरूपण कर उसे सर्वजनसुलभ भाषा में प्रसारित करना चाहिये ।

६२. अर्थात्‌ इस अध्ययन अनुसन्धान के लिये जो पीठ अथवा संस्थान अथवा विश्वविद्यालय बनेगा उसका स्वरूप शास्त्राभिमुख और लोकाभिमुख दोनों प्रकार का रहेगा ।

६३. अर्थशास्त्र के समान ही दूसरा केन्द्रवर्ती विषय शिक्षा का होना आवश्यक है । धर्म को एक पीढ़ी से दूसरी पीढी को हस्तान्तरित कर ज्ञानपस्म्परा को बनाये रखना और प्रजा को धर्माचरण में प्रवृत्त करना अर्थात्‌ लोकव्यवहार को धर्माधिष्टित बनाना शिक्षा का ही काम है । इस दृष्टि से शिक्षा का शास्त्र, शिक्षा की व्यवस्था, शिक्षा को सुलभ बनाने के उपाय आदि का अर्थशास्त्र के समान ही तात्विक और व्यावहारिक धरातल पर पहुँच कर निरूपण करना होगा |

अध्ययन अनुसन्धान की देशव्यापी योजना

६४. अध्ययन और अनुसन्धान के अन्तर्गत और एक महत्त्वपूर्ण विषय है तुलनात्मक अध्ययन का । आज संचार माध्यमों के प्रभाव के परिणाम स्वरूप विश्व के सभी देश एकदूसरे को प्रभावित करते हैं । विगत दो सौ वर्षों में धार्मिक शिक्षा का पूर्ण रूप से पश्चिमीकरण हुआ है । अर्थजीवन के केन्द्र में आ जाने के कारण उपभोग प्रधान असंयमी जीवनशैली प्रचलित हो गई है । इस स्थिति में धार्मिक ज्ञानधारा का प्रवाह अवरुद्ध हो गया है और अधार्मिक ज्ञानधारा ने उसका स्थान ले लिया है । यह स्थिति अकेले भारत के लिये नहीं अपितु सम्पूर्ण विश्व के लिये और जहाँ से इसका प्रवाह आरम्भ हुआ है ऐसे स्वयं पश्चिम के लिये भी विनाशक ही सिद्ध हो रही है ।

६५. इसको ध्यान में रखते हुए धार्मिक और ज्ञानधारा के विभिन्न विषयों को लेकर तुलनात्मक अध्ययन की एक योजना बनाने की आवश्यकता है । इस अध्ययन को भी अनुभूति प्रामाण्य और धर्मप्रामाण्य के आधार लेकर ही चलाना चाहिये । पश्चिमी ज्ञानधारा से प्रेरित होकर जीवन की जो व्यवस्थायें बनी हैं और बन रही हैं, जो व्यवहार विकसित हो रहा है, जो वृत्तियाँ पनप रही हैं वे कितनी अकल्याणकारी हैं यह तथ्यों के साथ बताना होगा । ऐसे तुलनात्मक अध्ययन से ही भारत और पश्चिम दोनों को पता चलेगा कि धार्मिक ज्ञानधारा विश्व के लिये वास्तव में कितनी कल्याणकारी है ।

६६. भारत की सरकार और समाज दोनों के लिये निर्देशों के साथ साथ विश्व के अन्यान्य देशों के लिये भी

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७४. इस व्यवस्था में इस प्रकार तो सरकार की सहभागिता सुनिश्चित नहीं हो सकती । इस पद्धति को बदलना सरकार और शिक्षा दोनों के पक्ष में है । इसलिये उसे बदलने का प्रयास प्रथम करना चाहिये । अध्ययन और अध्यापन की सुस्पष्ट योजना बनाकर प्रथम तो देश के विट्रदूवर्ग को इससे सुपरिचित बनाना चाहिये । उनका समर्थन जुटाना चाहिये । संख्याबल नहीं अपितु ज्ञान और निष्ठा का बल बढाना चाहिये । इसे देशव्यापी भी बनाना चाहिये ।

७५. दूसरे चरण में सरकार के साथ संवाद आरम्भ करना चाहिये । यह धन, भूमि या मान्यता के लिये नहीं करना चाहिये अपितु उन्हें शिक्षा को धार्मिक बनाने का विषय समझाने के लिये करना चाहिये । सभी सांसदों, विधायकों, पार्षदों तक संचार माध्यमों तथा प्रत्यक्ष भेंट के माध्यम से पहुँचना चाहिये । साथ ही हम सरकार का सम्पर्क कर रहे हैं इस विषय से लोगों को भी अवगत करना चाहिये ।

७६. जनप्रतिनिधियों के बाद प्रशासनिक अधिकारियों से सम्पर्क करना चाहिये । उनसे भौतिक लाभ या कानूनी मान्यता आदि नहीं चाहिये यह स्पष्ट करना चाहिये परन्तु अपनी योजना में वैचारिक सहयोग और जहाँ सम्भव है सहभागिता माँगनी चाहिये ।

७७. इसके बाद संचार माध्यमों के संचालकों, समाचार पत्रों के सम्पादकों, नियतकालिकों के सम्पादकों के साथ सम्पर्क बनाकर उन्हें प्रचार और प्रसार की योजना में सहयोग देने का निवेदन करना चाहिये ।

७८. विश्वविद्यालयों के कुलपतियों को और कुलाधिपतियों को इस योजना में ज्ञाननिष्ठ बनकर सहभागी बनने का आवाहन करना चाहिये । उनका सहयोग अति मूल्यवान होगा यह भी बताना चाहिये ।

७९. इस योजना में विद्यार्थियों को तो विशेष रूप से सम्मिलित करना चाहिये क्योंकि बीस वर्ष के बाद वे ही इसे आगे बढायेंगे । तेजस्वी और मेधावी विद्यार्थियों को विशेष रूप से जोड़ना चाहिये ।

८०. इस योजना के लिये अर्थसहाय करने हेतु धनवान लोगों को भी साथ में जोडना चाहिये । परन्तु आज जो धन देता है वह रौब भी जमाता है, प्रतिष्ठा भी चाहता है इस स्थिति को बदलने का प्रयास भी करना चाहिये ।

८१. देश में अनेक शैक्षिक और सांस्कृतिक संगठन शिक्षा के क्षेत्र में कार्यरत हैं । कई संगठनों के तो अपने विश्वविद्यालय हैं । इन्हें इस योजना को अपनाना आसान है । इन संगठनों के प्रमुख लोगों के साथ संवाद स्थापित करना चाहिये । ये सारे संगठन अत्यन्त प्रभावी हैं । वे चाहें तो साथ मिलकर, चाहें तो अकेले भी अध्ययन-अनुसन्धान की योजना बना सकते हैं ।

८२. इस प्रकार अध्ययन अनुसन्धान की देशव्यापी योजना बनानी चाहिये । इसके बिना पश्चिमीकरण के प्रभाव से मुक्त होना सम्भव नहीं है ।

८३. अध्ययन अध्यापन की इस योजना के साथ दो काम उसके सहयोगी के रूप में और करने चाहिये । एक काम है संस्कृत भाषा को जनमानस में और व्यवहार में प्रतिष्ठित करना । देशभर के संस्कृत के क्षेत्र में कार्यरत लोगों को इस काम का सूत्रसंचालन देना चाहिये । साथ ही संस्कृत विश्वविद्यालयों, वेद पाठशालाओं को अध्ययन अनुसन्धान की योजना समझाकर अपने अपने कार्य को इसके अनुरूप ढालने का आग्रह करना चाहिये । दूसरा है बालअवस्था से आरम्भ होने वाली शिक्षा हेतु पाठ्यक्रम और सामग्री बनाकर ह्वउन्हें प्रत्यक्ष क्रियान्वयन हेतु प्रवृत्त करना । शिशु-अवस्था से भी पूर्व गर्भावस्‍था. और शिशुअवस्था में भी शिक्षा तो होती ही है। उस शिक्षा हेतु मातापिताओं को इस योजना के अन्तर्गत बने पाठ्यक्रमों के आधार पर शिक्षित करना चाहिये ।

८४. धार्मिक विद्याओं, जैसे कि आयुर्वेद, ज्योतिष, वेद्विद्या, दर्शन, संगीत, नृत्य आदि की अनेक सरकारी और गैरसरकारी संस्थायें देशभर में चलती हैं। इन संस्थाओं में कमअधिक शुद्ध रूप में इन

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