Difference between revisions of "'जिहादी आतंकवाद - वैश्विक संकट"

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जिहादी आतंकवाद ने आज विश्व में वैसी ही कुख्याति हासिल कर ली है, जैसे पचास वर्ष पहले कम्युनिज्म ने की थी। पूरी दुनिया के स्वतंत्रताप्रेमी, लोकतांत्रिक, जानकार लोग हर देश में कम्युनिज्म के प्रभाव या प्रचार से साशंकित रहते थे । सच पूछे, तो यह भी एक कारण था कि उसी बीच उभरती एक नई हानिकारक वैश्विक प्रवृत्ति पर ध्यान नहीं दिया जा सका । यह प्रवृत्ति थी इस्लामी विचारधारा से प्रेरित उग्रवादी, आतंकवादी गुटों का उभार ।
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अरब में तेल मिलने के बाद समय के साथ कुछ अरब देशों में अकूत धन भी जमा होने लगा। इस से इस्लामी अस्मिता, फिर इस्लामवाद और अंततः जिहादी भावना को बढ़ने, प्रचार पाने में मदद मिली। इसी के अगले चरण में वह पुरानी साम्राज्यवादी, विस्तारवादी उग्र प्रवृत्ति जो लंबे समय से दब गई थी (क्योंकि उस के लिए कोई राजनीतिक, आर्थिक, सैनिक बल मुस्लिम देशों में नहीं था), फिर से सिर उठाने लगी।
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आधुनिक युग में जिहाद आतंकवाद का आरंभ पश्चिम एशिया से हआ। ब्लैक सेप्टेंबर' के आतंक से दुनिया में इस राजनीति की पहचान बनी। म्यूनिख ओलंपिक (१९७२) में इजराइली खिलाड़ियों की हत्या से फिलीस्तीनी आतंकवाद विश्व-कुख्यात हुआ। फिलीस्तीनी आंदोलन (पी.एल.ओ.) और इस के नेता यासिर अराफात लंबे समय तक खुले तौर पर आतंकवादी ही थे। बाद में, इन्हें पीछे छोड़ने वाले संगठन फतह और हमास भी आतंकी रणनीति में ही आगे बढ़े। फिलीस्तीनी आतंकवाद के बाद १९७९ में ईरान में अयातुल्ला खुमैनी द्वारा तख्तापलट और इस्लामी तानाशाही, उस की प्रतिद्वंदिता में सऊदी अरब द्वारा दुनिया भर में बहावी सुन्नी इस्लाम का प्रसार, १९८० के दशक में अफगानिस्तान में सोवियत सेना के विरुद्ध पाकिस्तान से संचालित अंतर्राष्ट्रीय जिहादी मोर्चेबंदी, ओसामा बिन लादेन व 'अल कायदा' का उदय और दुनिया भर में आतंकी हमले, अफगानिस्तान में तालिबान राज, कश्मीर में जिहादी घुसपैठ, भारतीय विमान अपहरण, कारगिल हमला, फिर दिल्ली, कोलकाता, हैदराबाद, मुंबई, गोधरा से लेकर भारतीय संसद तक पर अंतहीन जिहादी हमले, उधर न्यूयॉर्क, मॉस्को, लंदन, पेरिस, बाली, ढाका, आदि तमाम यूरोपीय, एशियाई नगरों पर आतंकी कहर, नाइजीरिया में बोको हराम तथा सीरिया-ईराक में इस्लामी स्टेट के साथ जिहादी आतंकवाद आज सब से बड़ी अंतर्राष्ट्रीय समस्या बना हुआ है । तरह-तरह के नाम और रूप में जिहादी राजनीति अब दुनिया के हर क्षेत्र में कमो-बेश सक्रिय है। हर कहीं इस्लाम, कुरान और प्रोफेट मुहम्मद का नाम ले-लेकर विभत्स कारनामे करने की एक पूरी समाप्त नहीं होने वाली श्रृंखला है। इस की खुली चर्चा न करना और लोगों को पूरी जानकारी न होना जनता को असुरक्षित छोड़ देने सा है। इस पर ध्यान देना चाहिए।
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आश्चर्य है कि इतने लंबे अनुभव के बाद भी जिहाद की विचारधारा और रणनीति को समझा नहीं गया । अब जाकर इसे इस्लाम से जोड़ कर देखने में हिचक कम हुई है। हाल में अमेरिकी राष्ट्रपति ने सऊदी अरब में ५५ मुस्लिम देशों के शासकों के सामने 'इस्लामवाद' की हानिकारक भूमिका का खुला उल्लेख किया । डोनाल्ड ट्रंप ने २१ मई २०१७ को उन सारे इकट्ठे मुस्लिम शासकों के सामने 'इस्लामी उग्रवाद और उस से प्रेरित इस्लामी आतंकी
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<references />भारतीय शिक्षा : वैश्विक संकटों का निवारण भारतीय शिक्षा (भारतीय शिक्षा ग्रन्थमाला ५), प्रकाशक: पुनरुत्थान प्रकाशन सेवा ट्रस्ट, लेखन एवं संपादन: श्रीमती इंदुमती काटदरे
 
<references />भारतीय शिक्षा : वैश्विक संकटों का निवारण भारतीय शिक्षा (भारतीय शिक्षा ग्रन्थमाला ५), प्रकाशक: पुनरुत्थान प्रकाशन सेवा ट्रस्ट, लेखन एवं संपादन: श्रीमती इंदुमती काटदरे

Revision as of 17:24, 11 January 2020

अध्याय ३२

जिहादी आतंकवाद ने आज विश्व में वैसी ही कुख्याति हासिल कर ली है, जैसे पचास वर्ष पहले कम्युनिज्म ने की थी। पूरी दुनिया के स्वतंत्रताप्रेमी, लोकतांत्रिक, जानकार लोग हर देश में कम्युनिज्म के प्रभाव या प्रचार से साशंकित रहते थे । सच पूछे, तो यह भी एक कारण था कि उसी बीच उभरती एक नई हानिकारक वैश्विक प्रवृत्ति पर ध्यान नहीं दिया जा सका । यह प्रवृत्ति थी इस्लामी विचारधारा से प्रेरित उग्रवादी, आतंकवादी गुटों का उभार ।

अरब में तेल मिलने के बाद समय के साथ कुछ अरब देशों में अकूत धन भी जमा होने लगा। इस से इस्लामी अस्मिता, फिर इस्लामवाद और अंततः जिहादी भावना को बढ़ने, प्रचार पाने में मदद मिली। इसी के अगले चरण में वह पुरानी साम्राज्यवादी, विस्तारवादी उग्र प्रवृत्ति जो लंबे समय से दब गई थी (क्योंकि उस के लिए कोई राजनीतिक, आर्थिक, सैनिक बल मुस्लिम देशों में नहीं था), फिर से सिर उठाने लगी।

आधुनिक युग में जिहाद आतंकवाद का आरंभ पश्चिम एशिया से हआ। ब्लैक सेप्टेंबर' के आतंक से दुनिया में इस राजनीति की पहचान बनी। म्यूनिख ओलंपिक (१९७२) में इजराइली खिलाड़ियों की हत्या से फिलीस्तीनी आतंकवाद विश्व-कुख्यात हुआ। फिलीस्तीनी आंदोलन (पी.एल.ओ.) और इस के नेता यासिर अराफात लंबे समय तक खुले तौर पर आतंकवादी ही थे। बाद में, इन्हें पीछे छोड़ने वाले संगठन फतह और हमास भी आतंकी रणनीति में ही आगे बढ़े। फिलीस्तीनी आतंकवाद के बाद १९७९ में ईरान में अयातुल्ला खुमैनी द्वारा तख्तापलट और इस्लामी तानाशाही, उस की प्रतिद्वंदिता में सऊदी अरब द्वारा दुनिया भर में बहावी सुन्नी इस्लाम का प्रसार, १९८० के दशक में अफगानिस्तान में सोवियत सेना के विरुद्ध पाकिस्तान से संचालित अंतर्राष्ट्रीय जिहादी मोर्चेबंदी, ओसामा बिन लादेन व 'अल कायदा' का उदय और दुनिया भर में आतंकी हमले, अफगानिस्तान में तालिबान राज, कश्मीर में जिहादी घुसपैठ, भारतीय विमान अपहरण, कारगिल हमला, फिर दिल्ली, कोलकाता, हैदराबाद, मुंबई, गोधरा से लेकर भारतीय संसद तक पर अंतहीन जिहादी हमले, उधर न्यूयॉर्क, मॉस्को, लंदन, पेरिस, बाली, ढाका, आदि तमाम यूरोपीय, एशियाई नगरों पर आतंकी कहर, नाइजीरिया में बोको हराम तथा सीरिया-ईराक में इस्लामी स्टेट के साथ जिहादी आतंकवाद आज सब से बड़ी अंतर्राष्ट्रीय समस्या बना हुआ है । तरह-तरह के नाम और रूप में जिहादी राजनीति अब दुनिया के हर क्षेत्र में कमो-बेश सक्रिय है। हर कहीं इस्लाम, कुरान और प्रोफेट मुहम्मद का नाम ले-लेकर विभत्स कारनामे करने की एक पूरी समाप्त नहीं होने वाली श्रृंखला है। इस की खुली चर्चा न करना और लोगों को पूरी जानकारी न होना जनता को असुरक्षित छोड़ देने सा है। इस पर ध्यान देना चाहिए।

आश्चर्य है कि इतने लंबे अनुभव के बाद भी जिहाद की विचारधारा और रणनीति को समझा नहीं गया । अब जाकर इसे इस्लाम से जोड़ कर देखने में हिचक कम हुई है। हाल में अमेरिकी राष्ट्रपति ने सऊदी अरब में ५५ मुस्लिम देशों के शासकों के सामने 'इस्लामवाद' की हानिकारक भूमिका का खुला उल्लेख किया । डोनाल्ड ट्रंप ने २१ मई २०१७ को उन सारे इकट्ठे मुस्लिम शासकों के सामने 'इस्लामी उग्रवाद और उस से प्रेरित इस्लामी आतंकी

References

भारतीय शिक्षा : वैश्विक संकटों का निवारण भारतीय शिक्षा (भारतीय शिक्षा ग्रन्थमाला ५), प्रकाशक: पुनरुत्थान प्रकाशन सेवा ट्रस्ट, लेखन एवं संपादन: श्रीमती इंदुमती काटदरे