Livelihood (आजीविका)

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भारतीय ज्ञान परंपरा में आजीविका अथवा जीवन-वृत्ति मात्र आर्थिक दायित्व न होकर एक विस्तृत नैतिक, सामाजिक और धर्मसंबद्ध अवधारणा है। धर्मशास्त्र, अर्थशास्त्र तथा नीतिग्रंथ इस विषय को कर्तव्य, उत्तरदायित्व और सामाजिक संतुलन के रूप में निरूपित करते हैं। प्रस्तुत लेख में जीवन-वृत्ति की संकल्पना, उसके शास्त्रीय आधार, पारिवारिक एवं सामाजिक दायित्व तथा आधुनिक संदर्भों में उसकी प्रासंगिकता का विश्लेषण किया गया है।

परिचय॥ Introduction

मानव जीवन की निरंतरता का मूल आधार जीवन-वृत्ति है। भारतीय परंपरा में जीविका केवल आत्मनिर्वाह का साधन नहीं, अपितु समाज और परिवार के प्रति उत्तरदायित्व का भी प्रतीक है। भरण-पोषण का प्रश्न तभी उत्पन्न होता है जब व्यक्ति आश्रित संबंधों - जैसे माता-पिता, पत्नी, संतान, वृद्ध एवं दुर्बल जन के प्रति अपने कर्तव्यों का निर्वहन करता है। शास्त्रों ने इसे धर्म का अनिवार्य अंग माना है।

आजीविका की संकल्पना॥ Concept of livelihood

भारतीय धर्मशास्त्रीय परंपरा में मानव जीवन के सामाजिक, आर्थिक एवं नैतिक आयामों का समन्वित विधान प्रस्तुत करती है। जीवन-वृत्ति अथवा भरण-पोषण का प्रश्न इसमें केवल जीविका अर्जन तक सीमित नहीं है, अपितु धर्म, नीति और सामाजिक उत्तरदायित्व से गहराई से जुड़ा हुआ है। धर्मशास्त्रमें प्रतिपादित धनागमन के सात धर्मयुक्त स्रोत तथा आजीविका के दस मान्य साधनों का विश्लेषण किया गया है, साथ ही उनकी समकालीन प्रासंगिकता पर भी विचार किया गया है।

धर्मशास्त्रों में भरण-पोषण का दायित्व

मनुस्मृति में धनागमन स्रोत

मनुस्मृति में धनागमन के सात साधनों का उल्लेख प्राप्त होता है, जिन्हें सभी वर्णों के लिए सामान्य रूप से स्वीकार किया गया है -

सप्त वित्तागमा धर्म्या दायो लाभः क्रयो जयः। प्रयोगः कर्मयोगश्च सत्प्रतिग्रह एव च॥ (मनुस्मृति १०.११५)[1]

धर्मसम्मत धन प्राप्ति के दाय, लाभ, क्रय, जय, प्रयोग, कर्मयोग तथा सत्प्रतिग्रह ये सात प्रकार के साधन बताए गए हैं। इन सातों को धर्मानुकूल माना गया है और इन्हीं माध्यमों से अर्जित धन को शास्त्रसम्मत एवं पवित्र कहा गया है। इनका संक्षिप्त विवेचन इस प्रकार है -

दाय॥ Inheritance

धर्मयुक्त उत्तराधिकार द्वारा प्राप्त संपत्ति दाय कहलाती है। यह पारिवारिक संपत्ति का वैध और नैतिक हस्तांतरण है।

लाभ॥ Gains

मित्रों, संबंधियों अथवा समाज से प्राप्त उपहार, सहयोग अथवा सहायता द्वारा अर्जित धन लाभ की श्रेणी में आता है।

क्रय॥ Purchase / Exchange

अपने धन से क्रय-विक्रय कर प्राप्त संपत्ति क्रय कहलाती है। यह व्यापार और विनिमय का धर्मसम्मत रूप है।

जय॥ Victory

धर्मयुक्त युद्ध या प्रतियोगिता में प्राप्त संपत्ति जय मानी जाती है। यह विशेषतः क्षत्रिय वर्ग से संबद्ध है।

प्रयोग॥ Investment / Lending

अपने धन को अन्य कार्यों में लगाकर उससे आय प्राप्त करना प्रयोग कहलाता है, जैसे ब्याज, साझेदारी अथवा निवेश।

कर्मयोग॥ Labour and Profession

कृषि, उद्योग, शिल्प, पशुपालन आदि श्रम आधारित कार्यों से अर्जित धन कर्मयोग के अंतर्गत आता है।

सत्प्रतिग्रह॥ Honourable Acceptance

धर्मयुक्त रूप से प्राप्त दान या वेतन को सत्प्रतिग्रह कहा गया है, विशेषतः ब्राह्मणों के लिए। मनु के अनुसार, इन स्रोतों के अतिरिक्त अन्य सभी प्रकार का धन अधर्मजन्य माना गया है। मनु के अनुसार, इन स्रोतों के अतिरिक्त अन्य सभी प्रकार का धन अधर्मजन्य अथवा अवैध माना गया है।

आजीविका के साधन

नागरिक के जीवन-निर्वाह हेतु आर्थिक संसाधनों की अनिवार्य आवश्यकता होती है। जिन कार्यों के माध्यम से व्यक्ति को जीवनयापन की आवश्यक सुविधाएँ सुलभ होती हैं, वे उसकी आजीविका के साधन कहलाते हैं। समाज में विभिन्न व्यक्तियों के पास भिन्न-भिन्न प्रकार की क्षमताएँ, रुचियाँ तथा योग्यताएँ पाई जाती हैं। शिक्षा के माध्यम से इन अंतर्निहित क्षमताओं का परिष्कार कर उनका सम्यक् विकास किया जाता है, जिससे व्यक्ति अपनी योग्यता के अनुरूप आजीविका अर्जित करने में समर्थ होता है।

यह सर्वविदित है कि सम्पूर्ण समाज एक ही प्रकार की आजीविका पर आधारित नहीं रह सकता। ऐसा न तो व्यावहारिक है और न ही सामाजिक संतुलन की दृष्टि से संभव। इसी कारण मनुस्मृति में मानव जीवन के निर्वाह हेतु विविध प्रकार की आजीविकाओं का उल्लेख किया गया है। मनु के अनुसार, विभिन्न स्वभाव, क्षमता एवं परिस्थितियों में स्थित मनुष्यों के लिए पृथक-पृथक आजीविका-मार्ग निर्धारित किए गए हैं, क्योंकि सभी मनुष्यों का जीवन किसी एक ही प्रकार की आजीविका से संचालित नहीं हो सकता। मनुस्मृति में जीवन-निर्वाह हेतु दस प्रकार की आजीविकाओं का उल्लेख मिलता है -

विद्या शिल्पं भृतिः सेवा गोरक्ष्यं विपणिः कृषिः। धृतिर्भैक्षं कुसीदं च दश जीवनहेतवः॥ (मनुस्मृति 10.116)[2]

भाषार्थ - विद्या (ज्ञानार्जन), शिल्प (कला-कौशल), भृति (वेतन या आजीविका हेतु किया गया कार्य), सेवा (किसी के अधीन की गई सेवा), गोरक्षा (पशुपालन), विपणि (व्यापार), कृषि (खेती), धृति (धैर्यपूर्वक संचय/स्वावलम्बन), भैक्ष (भिक्षा) तथा कुसीद (ऋण या सूद पर दिया गया धन) - ये दस मनुष्य के जीवन-निर्वाह के साधन कहे गए हैं।

  1. विद्या - विद्या से अभिप्राय वेदविद्या से है, अर्थात् संसार की विविध क्रियाओं, नियमों और व्यवस्थाओं का सम्यक् ज्ञान। इस विद्या के अन्तर्गत शिक्षा, कल्प (अनुष्ठान-विधान), इतिहास, व्याकरण, ज्योतिष (खगोल एवं अंतरिक्ष विज्ञान), निरुक्त (वेदपदों की व्याख्या) तथा तर्क आदि शास्त्र सम्मिलित हैं। यह विद्या अध्ययन-अध्यापन के रूप में ग्रहण की जाती थी। इसके माध्यम से समाज को आध्यात्मिक, बौद्धिक एवं व्यावहारिक मार्गदर्शन प्राप्त होता था तथा इसी के द्वारा आजीविका हेतु आवश्यक वस्तुएँ और साधन उपलब्ध होते थे। ज्ञानार्जन एवं शिक्षण के माध्यम से आजीविका अर्जन, इसमें वेद, शास्त्र, व्याकरण, तर्क, खगोल, चिकित्सा आदि सम्मिलित हैं।
  2. शिल्प - शिल्प से तात्पर्य सभी प्रकार की कलाओं एवं तकनीकी कौशलों से है। इसके अन्तर्गत निर्माण-कार्य, वास्तु एवं शिल्पकला, वस्त्र-निर्माण तथा वस्त्रों को सुगन्धित करने जैसी विधियाँ आती हैं। आधुनिक परिभाषा में इन्हें इंजीनियर, आर्ट-डिज़ाइनर, शिल्पकार आदि कहा जा सकता है। सभी प्रकार के कुटीर उद्योग, लघु एवं हस्तशिल्प उद्योग, नाट्यकला, नृत्य, गायन, वादन, अभिनय तथा जनसम्पर्क और विज्ञापन से सम्बद्ध कलाएँ भी शिल्प के अन्तर्गत ही मानी जाती हैं। इसी प्रकार योद्धा वर्ग अपनी युद्धकला एवं रक्षा-कौशल के प्रतिफलस्वरूप धन प्राप्त कर आजीविका का निर्वाह करता था। इस प्रकार शिल्प जीवन-यापन का एक महत्त्वपूर्ण एवं बहुआयामी साधन रहा है। निर्माण, हस्तकला, तकनीकी एवं कलात्मक कार, आधुनिक संदर्भ में इसे इंजीनियरिंग, डिजाइन और तकनीकी सेवाओं से जोड़ा जा सकता है।
  3. भृति - वेतन या पारिश्रमिक के रूप में सेवा करके जीवन-यापन करना है। भृति का तात्पर्य प्रैष्यभाव के अंतर्गत पारिश्रमिक प्राप्त करने से है। अर्थात् किसी विशेष संवाद, आदेश अथवा सन्देश के प्रेषण और प्रत्यावर्तन के प्रतिफलस्वरूप वेतन ग्रहण करना। प्राचीन समाज में यह कार्य प्रायः उन व्यक्तियों द्वारा किया जाता था जो राजपुरुषों, उच्चाधिकारियों अथवा प्रतिष्ठित व्यक्तियों के दूत के रूप में सन्देश लाने–ले जाने का दायित्व निभाते थे। व्यापारिक एवं वाणिज्यिक सन्देशों का आदान-प्रदान भी इसी श्रेणी में सम्मिलित माना जाता था।
  4. सेवा - दूसरों की सहायता एवं संरक्षण के बदले प्राप्त आय, जिसमें राजकीय और निजी सेवाएँ सम्मिलित हैं। सेवा का अर्थ है पराश्रय जीवन, अर्थात् दूसरे की आज्ञा का पालन करते हुए उसके अधीन कार्य करना और उसके प्रतिफलस्वरूप धन या वेतन प्राप्त करना। राज्य से सम्बन्धित सभी शासकीय सेवाएँ तथा व्यक्तिगत रूप से की जाने वाली निजी सेवाएँ (नौकरियाँ) इसी श्रेणी में आती हैं। इसके अतिरिक्त, विविध प्रकार की दैनिक मजदूरी भी सेवा-वृत्ति के अन्तर्गत ही मानी जाती है। धर्मशास्त्रीय परम्परा में यह कार्य प्रायः शूद्रों द्वारा किया जाने वाला बताया गया है। वर्तमान समय में भी जो व्यक्ति इस प्रकार की आजीविका को अपनाते हैं, उन्हें शास्त्रीय दृष्टि से शूद्र-वर्ग में परिगणित किया जाता है।
  5. गोरक्षा - पशुपालन एवं कृषि-आधारित आजीविका, विशेषतः गौ-पालन आदि। गोरक्षण - पशुपालन को गोरक्षण कहा गया है। इसके अंतर्गत गाय, बैल, भैंस आदि विविध पशुओं का पालन-पोषण कर उनसे दुग्ध, घृत, गोमय, कृषि-सहायता आदि के माध्यम से आय प्राप्त करना सम्मिलित है। भारतीय समाज में गोरक्षण को न केवल आर्थिक आजीविका का साधन माना गया, अपितु धार्मिक एवं सामाजिक दृष्टि से भी इसे अत्यन्त पवित्र कर्म स्वीकार किया गया। ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़ के रूप में इसका विशेष महत्व रहा है।
  6. विपणि - व्यापार, वस्तुओं का क्रय-विक्रय। वस्तुओं के क्रय-विक्रय द्वारा आय अर्जन करना ‘विपणि’ कहलाता है। यह कृषि से भिन्न एक स्वतंत्र आजीविका-साधन माना गया, जिसमें व्यापार, वाणिज्य, बाजार व्यवस्था तथा दूरस्थ क्षेत्रों के साथ लेन-देन सम्मिलित था। प्राचीन भारत में व्यापार को समृद्धि का प्रमुख माध्यम माना गया और समाज के आर्थिक संतुलन में इसकी महत्वपूर्ण भूमिका रही।
  7. कृषि - भूमि पर श्रम कर अन्न एवं अन्य उत्पादों का उत्पादन। भूमि में बीज बोकर अन्न एवं अन्य वनस्पतियों का उत्पादन करना कृषि कहलाता है। यह आय प्राप्ति का प्रमुख साधन रहा है, जिसमें समाज का एक बड़ा वर्ग संलग्न था। भारतीय सामाजिक-आर्थिक संरचना में कृषि को आधारभूत आजीविका के रूप में स्वीकार किया गया है।
  8. धृति - धैर्यपूर्वक कठिन कार्यों द्वारा आजीविका, जिसमें जोखिमपूर्ण अथवा परिश्रमसाध्य कर्म सम्मिलित हैं। धैर्यपूर्वक जीवन निर्वाह करना धृति कहलाता है। जिन व्यक्तियों में तत्काल अधिक आय अर्जन की क्षमता नहीं होती, वे संतोष और निरन्तर प्रयास के माध्यम से अपनी क्षमता का विकास करते हैं अथवा क्रमशः धन संचय कर अन्य व्यवसायों की ओर अग्रसर होते हैं। यह आत्मसंयम एवं दीर्घकालिक दृष्टि का प्रतीक है।
  9. भैक्ष - भिक्षाटन द्वारा जीवन निर्वाह करना भैक्ष कहा गया है। यह आजीविका-विधि विशेष रूप से अपरिग्रही ब्राह्मणों एवं वैराग्यशील व्यक्तियों के लिए निर्धारित मानी गई है, जिसमें आत्मसंयम और सामाजिक अनुग्रह का समन्वय दिखाई देता है।
  10. ऋण/कुसीद - सीमित और धर्मयुक्त रूप से ऋण देकर आय अर्जन, जिसे मनु ने विशेष परिस्थितियों में स्वीकार किया है। अपने पास उपलब्ध धन को आवश्यकता-मंद व्यक्तियों को देकर उससे सूद लेना कुसीद कहलाता है। यह भी आय प्राप्ति का एक साधन माना गया है, यद्यपि इसके नैतिक पक्ष पर धर्मशास्त्रों में संतुलित दृष्टिकोण अपनाया गया है। इस प्रकार विद्या, शिल्प, भृति, सेवा, गोरक्षण, विपणि, कृषि, धृति, भैक्ष एवं कुसीद - ये सभी जीवन-निर्वाह के विविध साधन हैं, जो समाज की आर्थिक विविधता, श्रम-विभाजन तथा नैतिक मर्यादाओं को प्रतिबिम्बित करते हैं।

सूद पर धर्मशास्त्र का दृष्टिकोण

मनुस्मृति (10.117) में स्पष्ट किया गया है कि ब्राह्मण और क्षत्रिय के लिए सूद पर धन लेना निषिद्ध है। किंतु वैश्यों के लिए यह सीमित रूप में स्वीकार्य है। इससे यह स्पष्ट होता है कि मनु आर्थिक गतिविधियों को वर्णानुसार नैतिक मर्यादाओं में बांधते हैं। मनुस्मृति की जीवन-वृत्ति संबंधी अवधारणा यह सुनिश्चित करती है कि -

  • आजीविका समाज को हानि न पहुँचाए
  • धन का स्रोत पारदर्शी और धर्मसम्मत हो
  • भरण-पोषण के माध्यम से परिवार और समाज की स्थिरता बनी रहे

यह व्यवस्था आज के समय में आर्थिक नैतिकता और सतत विकास की अवधारणा से साम्य रखती है।

भरण-पोषण और उत्तराधिकार का संबंध

निष्कर्ष॥ Conclusion

उद्धरण॥ References

  1. मनुस्मृति, अध्याय 10, श्लोक 115।
  2. मनुस्मृति, अध्याय 10, श्लोक 116।