Shiva Sankalpa Sukta (शिवसंकल्प सूक्त)

From Dharmawiki
Revision as of 14:39, 13 January 2026 by AnuragV (talk | contribs)
(diff) ← Older revision | Latest revision (diff) | Newer revision → (diff)
Jump to navigation Jump to search
ToBeEdited.png
This article needs editing.

Add and improvise the content from reliable sources.

शुक्लयजुर्वेद के चौंतीसवें (३४) अध्याय के प्रारम्भिक छह मंत्रों को सामूहिक रूप से शिवसंकल्पसूक्त कहा जाता है। ये मंत्र अपनी संरचना, भाववस्तु तथा संदेश की दृष्टि से अत्यन्त महत्त्वपूर्ण माने जाते हैं। इस सूक्त में ‘शिवसंकल्प’ का तात्पर्य शुभ, श्रेष्ठ एवं कल्याणकारी संकल्प से है, जिसे मानव अपने आचरण में धारण करता है। जैसा संकल्प मन में उत्पन्न होता है, वैसा ही आचरण विकसित होता है और उसी के अनुरूप कर्म का स्वरूप निर्धारित होता है। इस प्रकार समस्त कर्मों का मूलाधार मन को स्वीकार किया गया है। सूक्त के प्रत्येक मंत्र के अंत में ‘तन्मे मनः शिवसंकल्पमस्तु’ - अर्थात् मेरा मन शुभ विचारों से युक्त हो - इस भावना की पुनरावृत्ति की गई है। सूक्त में मन के स्वरूप, उसकी प्रवृत्तियों तथा उसके नियंत्रण की आवश्यकता पर विशेष बल दिया गया है। आधुनिक मनोविज्ञान के दृष्टिकोण से भी यह सूक्त अत्यन्त प्रासंगिक प्रतीत होता है, क्योंकि इसमें मानसिक शुद्धता को आचरण की शुद्धता का आधार माना गया है।[1]

परिचय॥ Introduction

मन का रथक रूपक

शुक्लयजुर्वेद के चौतींसवें अध्याय के १ से ६ मन्त्र समूह को शिवसंकल्प सूक्त कहा जाता है। इसके मन देवता, त्रिष्टुप् छन्द और याज्ञवल्क्य ऋषि हैं। मन के विषय में वैदिक ऋषियों ने गहन चिंतन किया है। शिवसंकल्पसूक्त के संदर्भ में ऋषि यह प्रतिपादित करते हैं कि मनुष्य को केवल शारीरिक एवं वाचिक पापों से ही नहीं, अपितु मानसिक दोषों से भी स्वयं को दूर रखना चाहिए। मन में उत्पन्न होने वाले संकल्प यदि शुभ और श्रेयस्कर हों, तभी जीवन का मार्ग प्रशस्त होता है। मन अत्यन्त चंचल है, अतः उसे वश में रखना दुष्कर कार्य है। इसी कारण ऋषि बार-बार मन को शुभ एवं पवित्र संकल्पों से युक्त रखने की प्रार्थना करते हैं।[2] किसी भी कर्म के किये जाने के लिये पाँच आवश्यक अंग हैं -

अधिष्ठानं तथा कर्ता करणं च पृथग्विधम्। विविधाश्च पृथक्चेष्टा दैवं चैवात्र पंचमम्॥ (भगवद्गीता 18.14)[3]

अधिष्ठान (शरीर), कर्ता (मन), करण (इन्द्रियाँ), चेष्टा (पाँच -प्राण) और दैव अथवा चेतन शक्ति। लेकिन ज्ञानी जानता है कि इन सबमें भी केवल अकर्ता आत्मा की उपस्थिति मात्र के कारण सभी कर्म सम्भव हो पाते हैं।

वैदिक वाङ्मय में मन को समस्त क्रियाओं का मूल कारण माना गया है। शुक्ल यजुर्वेद में स्थित शिवसंकल्प सूक्त इसी तथ्य को उद्घाटित करता है कि, बिना शुभ संकल्प के न तो व्यक्तिगत जीवन में शान्ति संभव है और न ही सामाजिक सौहार्द की स्थापना। आधुनिक युग में व्याप्त अशान्ति, असहिष्णुता एवं वैमनस्य का मूल कारण दूषित मनोवृत्तियाँ हैं, जिनका समाधान शिवसंकल्प की वैदिक अवधारणा में निहित है।

शिवसंकल्प का तात्पर्य

शिव का अर्थ है - शुभ, कल्याणकारी तथा मंगलमय और संकल्प का अर्थ है - दृढ़ निश्चय। इस प्रकार शिवसंकल्प का अभिप्राय हुआ - ऐसा मन जो सदैव शुभ, सकारात्मक एवं परहितकारी निश्चयों में प्रवृत्त हो। सूक्त में बार-बार उच्चरित मंत्र “तन्मे मनः शिवसंकल्पमस्तु” मन की इसी आदर्श स्थिति की कामना को अभिव्यक्त करता है।

वैदिक साहित्य में सूक्तों का महत्व

शिवसंकल्पसूक्त : मनस्-तत्त्व का वैदिक एवं मनोवैज्ञानिक अध्ययन

वैदिक साहित्य में मनस् को मानव अस्तित्व का मूलाधार स्वीकार किया गया है। ज्ञान, संकल्प, स्मृति, धारणा, चेतना तथा कर्म - इन सभी का केंद्र मन ही है। शुक्ल यजुर्वेद के चौंतीसवें अध्याय में स्थित शिवसंकल्पसूक्त मन के इसी दिव्य, व्यापक और नियामक स्वरूप का गहन प्रतिपादन करता है। यह सूक्त केवल आध्यात्मिक दृष्टि से ही नहीं, अपितु मनोवैज्ञानिक, दार्शनिक तथा व्यवहारिक स्तर पर भी अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है।

‘मनस्’ शब्द मन धातु से निष्पन्न है, जिसका अर्थ है- मनन, चिन्तन तथा बोध। वेदों में मन के लिए चित्त, चेतस्, हृदय, संकल्प, आकूति, मेधा, धृति, मति, प्रज्ञा आदि अनेक पर्याय प्रयुक्त हुए हैं। इससे स्पष्ट होता है कि मन एक बहुआयामी सत्ता है, जो ज्ञानात्मक, भावात्मक एवं क्रियात्मक - तीनों स्तरों पर सक्रिय रहती है। ऋग्वेद के नासदीय सूक्त में सृष्टि की उत्पत्ति का मूल कारण काम को बताया गया है, और यह काम मन से ही उद्भूत होता है। इससे यह सिद्ध होता है कि सृष्टि-विस्तार के मूल में भी मनस्-तत्त्व ही कार्यरत है।

शुक्ल यजुर्वेद (अध्याय 34) के छः मंत्रों में मन को देवता के रूप में प्रतिष्ठित किया गया है। प्रत्येक मंत्र के अंत में “तन्मे मनः शिवसंकल्पमस्तु” की पुनरावृत्ति मन को शुभ, कल्याणकारी एवं संयमित बनाने की प्रार्थना है। यहाँ शिव का अर्थ केवल रुद्र या संहारक नहीं, अपितु कल्याण, मंगल और शुद्ध चेतना है। अतः शिवसंकल्प का तात्पर्य है - मन का ऐसा संकल्प जो लोककल्याण, आत्मोन्नति और मोक्षमार्ग की ओर प्रेरित करे।[4]

मन की गति एवं अवस्थाएँ॥ States and Motions of the Mind

सूक्त में मन की दो अवस्थाओं 'जाग्रत और स्वप्न' का वर्णन है। मन क्षणमात्र में दूर-दूर तक गमन कर सकता है, देश-विदेश, भूत-भविष्य और दृश्य-अदृश्य लोकों का अनुभव करा सकता है। इस प्रकार मन की कोई भौतिक सीमा नहीं है। स्वप्नावस्था में भी मन ही सुख-दुःख, भय-आनन्द तथा स्मृति-कल्पना का अनुभव कराता है। इसी कारण मन को द्वैत का कारण भी कहा गया है। वैदिक साहित्य में मन को अन्तःकरण की प्रमुख वृत्ति माना गया है। शतपथ ब्राह्मण में कहा गया है कि मन ही यज्ञ है, क्योंकि यज्ञ का संकल्प मन में ही उत्पन्न होता है। उपनिषदों में मन को -

  • ज्ञान का साधन
  • इन्द्रियों का नियन्ता
  • आत्मा का सहचर

भाष्यकारों के अनुसार मन दो प्रकार का है -

  1. बहिर्मुख मन (इन्द्रिय-विषयों में रत)
  2. अन्तर्मुख मन (आत्मचिन्तन में प्रवृत्त)

शिवसंकल्पसूक्त का उद्देश्य मन को बहिर्मुख से अन्तर्मुख बनाना है। शिवसंकल्पसूक्त मन के शोधन, संयमन और उन्नयन का वैदिक विधान प्रस्तुत करता है। यह सूक्त सिखाता है कि मन ही बन्धन का कारण है और मन ही मोक्ष का साधन। जब मन शुभ संकल्पों से युक्त होता है, तब व्यक्ति, समाज और समस्त सृष्टि का कल्याण सुनिश्चित होता है। अतः “तन्मे मनः शिवसंकल्पमस्तु” यह मात्र प्रार्थना नहीं, अपितु एक सम्पूर्ण जीवन-दृष्टि है।[4]

शिवसंकल्पसूक्त का संक्षिप्त परिचय॥ Introduction of the Shivasankalpa Sukta

  • प्रथम मन्त्र में मन की तीव्र, सर्वव्यापक गति का निरूपण है, जो क्षणमात्र में देश, काल और विषयों का अतिक्रमण करता हुआ स्वप्न तथा जाग्रत - दोनों अवस्थाओं में अनुभव का आधार बनता है। इसी कारण मन को दिव्य चेतन सत्ता कहा गया है, जिसे योगदर्शन और वेदान्त में कल्पना एवं विकल्प का मूल स्रोत माना गया है।
  • द्वितीय मंत्र में मन को कर्मों की प्रेरक शक्ति बताया गया है। यज्ञ, तप, अध्ययन और समस्त मानवीय क्रियाएँ मन के संकल्प से ही सम्पन्न होती हैं। मन ही श्रेय और प्रेय के मार्गों का निर्धारण करता है। शतपथ ब्राह्मण में मन को ‘पथ्यवर्ष’ अर्थात् सुखवर्षा करने वाला कहा गया है। मन कामनाओं का उद्गम है, पर वही विवेकयुक्त होकर मोक्षमार्ग का साधन भी बन सकता है।
  • मन को अन्तर्ज्योति कहा गया है, क्योंकि वही इन्द्रियों को प्रकाशित करता है। मन के बिना न ज्ञान सम्भव है, न कर्म। शतपथ ब्राह्मण का कथन है - मन से ही मनुष्य देखता और सुनता है। तृतीय मंत्र में मन के तीन मुख्य गुण स्पष्ट होते हैं -
  1. प्रज्ञा (ज्ञानात्मक शक्ति)
  2. स्मृति (अनुभूत विषयों का संधारण)
  3. धारणा/धृति (स्थिरता एवं निर्णय-क्षमता)
  • चतुर्थ मंत्र में मन को भूत-भविष्य-वर्तमान - तीनों कालों का अधिष्ठाता कहा गया है। योगी और दार्शनिक मन के संयम से त्रिकालज्ञान प्राप्त करते हैं। मन को यज्ञस्वरूप, सृष्टिचक्र का नियामक और ब्रह्मतत्त्व का प्रतीक माना गया है।
  • पंचम मंत्र में मन को समस्त वेदों एवं समस्त चेतनाओं का आधार बताया गया है। ऋग्, यजुः और साम - तीनों वेद मन में प्रतिष्ठित हैं। इससे यह सिद्ध होता है कि समस्त ज्ञान-परम्परा का मूलाधार मन ही है।
  • अन्तिम मंत्र में मन की तुलना योग्य सारथि से की गई है। उपनिषदों की रथकल्पना के अनुसार - आत्मा रथी है, शरीर रथ है, बुद्धि सारथि है और मन लगाम के समान है। यदि मन संयमित हो, तो इन्द्रियरूपी अश्व सुचारु रूप से नियंत्रित रहते हैं।

आधुनिक मनोविज्ञान मन को कभी चेतना, कभी व्यवहार और कभी संज्ञान के रूप में परिभाषित करता है। परन्तु वैदिक दृष्टि मन को केवल व्यवहार तक सीमित नहीं करती, बल्कि उसे आत्मा और ब्रह्म से जोड़ती है। शिवसंकल्पसूक्त का मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण आज के मानसिक प्रबंधन, व्यवहार-परिवर्तन और व्यक्तित्व-विकास के लिए अत्यन्त प्रासंगिक है।[4]

शिवसंकल्पसूक्त के मंत्रों का भावात्मक अध्ययन

शिवसंकल्प सूक्त शुक्ल यजुर्वेद का एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण सूक्त है, जिसमें मन को शुभ संकल्प, शुभ निश्चय एवं कल्याणकारी विचारों से युक्त करने की प्रार्थना की गई है। प्रस्तुत लेख में शिवसंकल्प की अवधारणा को वैदिक मनोविज्ञान, सामाजिक समरसता तथा आध्यात्मिक उन्नयन के सन्दर्भ में विवेचित किया गया है। इससे यह स्पष्ट होता है कि मन की शुद्धता ही व्यक्ति, समाज एवं राष्ट्र के उत्थान का मूल आधार है -

प्रथम मंत्र का भावार्थ एवं विवेचन

मन्त्र संख्‍या एक में मन को दिव्य ज्योति के रूप में निरूपित किया गया है। इसमें कहा गया है कि मन की गति अत्यन्त तीव्र है तथा इसकी पहुँच अत्यधिक दूर तक है। मन केवल जाग्रत अवस्था में ही नहीं, अपितु स्वप्न अवस्था में भी समान रूप से दूर-दूर तक विचरण करता है। यह मन स्वयं ज्योतियों का भी ज्योति-स्वरूप और समस्त प्रकाशों को प्रकाशित करने वाला प्रकाश है। ज्ञान एवं विज्ञान से संबंधित सभी तत्त्वों को प्रकाशित करने की क्षमता इसी में निहित है। इस प्रकार मन एक ऐसा दिव्य प्रकाश है, जो चेतना (Consciousness) का मूल आधार बनता है और मानव बोध तथा अनुभूति का केन्द्रीय तत्त्व सिद्ध होता है -

ओ3म् यज्जाग्रतो दूरमुदैति दैवं तदु सुप्तस्य तथैवैति। दूरङ्गमं ज्योतिषां ज्योतिरेकं तन्मे मनः शिवसङ्कल्पमस्तु॥ (शुक्लयजुर्वेद 34-1)[5]

अन्वय - जाग्रतः यत् दैवं (मनः) दूरम् उत् एति, सुप्तस्य तत् उ तथा एव एति। दूरङ्गमं ज्योतिषाम् एकः ज्योतिः मे तत् मनः शिवसंकल्पमस्तु।

उव्वटभाष्यम् - यन्मनो जाग्रतः पुरुषस्य दूरम् उदैति उद्गच्छति चक्षुः प्रभृतीन्यपेक्ष्य। यच्च दैवम्। देवो विज्ञानात्मा सोऽनेन गृह्यत इति दैवम्। उक्तञ्च- "मनसैवानुद्रष्टव्यमेतदप्रमेयं ध्रुवम्" इति। तदु सुप्तस्य। तदः स्थाने यदो वृत्तिः। उकारः समुच्चयार्थीयः। यच्च मनः सुप्तस्य तथैव तेनैव प्रकारेण एति। यच्च दूरङ्गमम्। दूरं गच्छतीति दूरङ्गमम्। अतीतानागतवर्तमानव्यवहितं मे मनः शिवसङ्कल्पम्। सङ्कल्पः काममूलपदार्थस्य स्त्र्यादेः सुरूपताज्ञानवतः काम-प्रभृति। शान्तसङ्कल्पमस्तु भवतु।

व्याख्या - ऋषि कहते हैं- वह मेरा मन शिवसङ्कल्प हो। शिव कल्याणकारी धर्म विषय सङ्कल्प जिस प्रकार का है उस प्रकार का वह मेरा मन हो। मेरा मन हमेशा धर्म में ही हो कभी भी पापी न बने। तो क्या बने जो मन जागे हुए पुरुष का दूर से भी दूर चला जाता है। चक्षु आदि वस्तुओं को ग्रहण कराता है। मन के द्वारा यह सभी कुछ देखा जाता है। और भी। यदः स्थान में उसका पर्यायवाची शब्द उकार है। और जो मन सुप्तावस्था में भी उसी प्रकार वापस आता है जिस प्रकार वह गया था। और जो दूर से भी दूरात् गच्छतीति दूरङ्गमं खश्प्रत्यय है। अतीत अनागत-वर्तमान में प्रयोग करने वाले पदार्थों का ग्राहक है। और जो मन ज्योतिप्रकाशको का श्रोत्र आदि इन्द्रियों का एक ही ज्योति प्रकाशक प्रवर्तक है। श्रोत्र आदि इन्द्रियों को अपने विषय में लगाता है। आत्मा मन को प्रेरित करता है, मन इन्द्रिय से इन्द्रिय को, अर्थ से न्याय युक्त मन सम्बन्ध को उन दोनों को प्रवृत करता है। उस प्रकार का मेरा मन शान्तसङ्कल्प वाला हो।

द्वितीय मंत्र का भावार्थ एवं विवेचन

मन्त्र संख्या दो में मन को मानव जीवन का प्रमुख प्रेरक तत्त्व (Driving Force) के रूप में प्रस्तुत किया गया है। इस मन्त्र के अनुसार मन वह आन्तरिक शक्ति (Inner Power) है, जो विद्वानों, मनीषियों तथा साधकों को यज्ञ, अध्ययन (Study), साधना (Spiritual Practice) एवं शास्त्रीय ज्ञान (Scriptural Knowledge) की ओर प्रवृत्त करता है। मन केवल विचारों का केन्द्र (Center of Thought) ही नहीं, बल्कि समस्त प्राणियों के अन्तःकरण में स्थित एक पूज्य एवं आदरणीय तत्त्व (Revered Principle) के रूप में विद्यमान है। मन्त्र में यह भी स्पष्ट किया गया है कि मन ही प्रेरणा (Motivation), संकल्प (Intention), तथा कर्म-प्रवृत्ति (Action Orientation) का मूल स्रोत है। इसी के माध्यम से चेतना (Consciousness) सक्रिय होती है और मानव अपने बौद्धिक (Cognitive), नैतिक (Ethical) तथा आध्यात्मिक (Spiritual) लक्ष्यों की ओर अग्रसर होता है -

येन कर्माण्यपसो मनीषिणो यज्ञे कृण्वन्ति विदथेषु धीराः। यदपूर्वं यक्षमन्तः प्रजानां तन्मे मनः शिवसङ्कल्पमस्तु॥ (शुक्लयजुर्वेद 34-2)[5]

अन्वय - येन अपसः मनीषिणः धीराः यज्ञे विदथेषु कर्माणि कृण्वन्ति यत् प्रजानाम् अन्तः अपूर्व यक्षं, तत् मे मनः शिवस‌ङ्कल्पम् अस्तु।

उव्वटभाष्य- येन कर्माणि। येन मनसा सत्ता कमार्णि। अपसः। अप इति कर्म नाम। तद्धितलोपः। अपस्विनः कर्मवन्तः मनीषिणो मेधाविनः। यज्ञे कृन्ति कुर्वन्ति। विदथेषु वेदेषु यज्ञविधिविधानेषु धीरा धीमन्तः। यच्चापूर्वम्। न विद्यते पूर्वमिन्द्रियं यस्मात् तद्पूर्वम्। यद्वा-अपूर्वमनपरम्। यच्च यक्षं पूज्यम्। यच्चान्तर्मध्ये प्रजानामास्ते। तन्मे मन इति व्याख्यातम्।

व्याख्या- मनीषियों मेधावियों को यज्ञ में जिस मन के द्वारा सत कर्म करते है, 'कृ करणे' स्वादि है। मन स्वास्थ्य के विना कार्य में प्रवृत्त करता है। तेषु सत्सु । विदथेषु सत्सु विद्यन्ते ज्ञायन्ते तानि विदधानि तेषु। विदधातु से औणादिक थप्रत्यय। यज्ञसम्बन्धिहवि आदि पदार्थों के ज्ञान में उसका यह अर्थ है। किस प्रकार के मनीषियों को। अपसः अप इति कर्मनाम (निघ० २.१.१)। कार्यों को करने की प्रवृति है जिसमे वे अपस्वन कर्मवन्तश्अस्मायामेधास्रजो विनिः ' (पा०सू० ५.२.१२१) इससे विन्प्रत्यय विन्मतोलुक्' (पा०सू० ५.३.६५) इससे इष्ठ अभाव में भी छन्द में विनो लुक्। हमेशा कर्मनिष्ठ यह अर्थ है। वैसे धीरा धीमन्तमेधा विद्यमान है जिसमे कर्मण्यण् (पा०सू० ३.२.१)। और हमारा मन सर्वोत्तम गुण कर्म स्वभाव वाला और जो मन इन्द्रिय से पूर्व उसकी रचना हुई। अथवा अपूर्व अनपर अबाह्य ऐसा कहने पर अपूर्व आत्मरूप यह अर्थ है। और जो योग यज्ञ में पूजनीय होकर के एकीभूत हो रहा हो। यजते औणादिक सन्प्रत्यय है। और जो प्राणिमात्र के हृदय में रहता है, अन्य इन्द्रिया तो बाहरी है, मनतो आन्तरिक इन्द्रिय है यह अर्थ है। वह उस स्वरूप वाला मेरा मन धर्मेष्ट होवे। तृतीय मन्त्र इस प्रकार है -

तृतीय मंत्र का भावार्थ एवं विवेचन

मन्त्र संख्या तीन में मन के तीन विशिष्ट एवं आधारभूत गुणों (Fundamental Attributes of Mind) का निरूपण किया गया है। इनमें प्रथम प्रज्ञान है, जिसे जानने और समझने की क्षमता (Cognition / Knowing Faculty) के रूप में वर्णित किया गया है। द्वितीय गुण चेतस् है, जो अनुभवों और ज्ञान के स्मरण की शक्ति (Recollection / Memory Function) को अभिव्यक्त करता है। तृतीय गुण धृति है, जिसे धारणा और स्थायित्व की शक्ति (Power of Retention / Sustaining Capacity) के रूप में स्वीकार किया गया है।

मन्त्र में यह भी प्रतिपादित किया गया है कि मन समस्त प्राणियों के अन्तःकरण में विद्यमान एक अमर ज्योति (Immortal Inner Light) है। यह चेतना (Consciousness) का सक्रिय केन्द्र (Active Core) बनकर समस्त मानसिक और शारीरिक क्रियाओं (Mental and Physical Functions) को संचालित करता है। मन के अभाव में जीव न तो विचार (Thinking) कर सकता है और न ही किसी कर्म (Action) का सम्पादन कर पाता है। इस प्रकार मन जीवन-व्यवस्था का अनिवार्य एवं केन्द्रीय तत्त्व सिद्ध होता है -

यत्प्रज्ञानमुत चेतो धृतिश्च यज्जोतिरन्तरमृतं प्रजासु। यस्मान्नऽऋते किञ्चन कर्म क्रियते तन्मे मनः शिवसङ्कल्पमस्तु॥ (शुक्लयजुर्वेद 34-3)[5]

अन्वय - यत् प्रज्ञानम् उत चेतः धृतिः च यत् प्रजासु अन्तः अमृतं ज्योतिः। यस्मात् ऋते किञ्चन कर्म न क्रियते, तत् मे मनः शिवसङ्कल्पम् अस्तु।

उव्वटभाष्य- यत्प्रज्ञानम्। यन्मनः प्रज्ञानम्। विशेषप्रतिपत्तिः प्रज्ञानम्। उतापि च। चेतः। सामान्यप्रतिपत्तिः चेतः। धृतिश्च। प्रसिद्धा। यन्मनोऽन्तज्योतिरमृतं च प्रजासु। यस्मान्न ऋते येन च बिना न किञ्चन कर्म क्रियते। तन्मे मन इति व्याख्यातम्।

व्याख्या - जो मन प्रज्ञा को विशेष करके ज्ञान का अच्छी प्रकार से बोध कराता है वह प्रज्ञानम् है। 'करणाधिकरणयोश्च' (पा०सू० ३.३.११७) इससे करण में ल्युट् प्रत्यय किया। और भी जो मनस्मृति का साधक है। 'चिती संज्ञाने' इस ण्यन्तहोने से असुन्प्रत्यय हुआ। सामान्य विशेष ज्ञान का बोध कराने वाला यह अर्थ है। और जो मन धैर्य स्वरूप है। मन में ही धैर्य की उत्पति होने से मन में कार्य कारण के अभेद होने से धैर्य को धारण करता है। और जो मन प्रजाओं में, मनुष्यों में अन्तरवर्तमान होने से सभी इन्द्रियों का ज्योति प्रकाशक है। कहाँ होने पर आदर के लिए पुनः कहते है। 'अभ्यासे भूयांसमर्थं मन्यन्ते' (निरु० १.४२) ऐसा यास्क ने कहा। और आत्मरूप होने से आमरण दरमि होने से विनाश रहित है। जिस मन के बिना मनुष्य कोई भी कार्य नहीं कर सकते है। सभी कार्यों को करने से पहले प्राणियों का मन पूर्वप्रवृत्त होता है, मन के स्वास्थ्य के विना कार्यों में प्रवृत नही होता है यह अर्थ है। अन्यारादितरर्ते (पा०सू० २.३.२९) इत्यादि से यस्माद इसका ऋत के योग में पञ्चमी। वह मेरा मन कल्याणकारी हो।

सरलार्थ- जो मन सामान्य और विशेषज्ञान का बोध कराता है। जो धैर्यस्वरूप विद्यमान है और जो प्राणियों के अन्तर्भाग में विद्यमान सभी इन्द्रियों का प्रकाशक है। जो विनाश रहित है। जिसके बिना कोई भी कार्य नही किया जा सकता है। इस प्रकार का जो मेरा मन है वह शुभसङ्कल्प वाला हो। चतुर्थ मन्त्र इस प्रकार है -

चतुर्थ मंत्र का भावार्थ एवं विवेचन

मन्त्र संख्या चार में मन को त्रिकालदर्शी (Tri-temporal-perceiving Mind) के रूप में निरूपित किया गया है। इस मन्त्र के अनुसार मन की सीमा केवल वर्तमान क्षण (Present) तक ही सीमित नहीं है, अपितु भूत (Past) और भविष्य (Future) भी इसके चिंतन-क्षेत्र (Domain of Thought) में समाहित हैं। मन के माध्यम से व्यक्ति तीनों कालों का साक्षात्कार (Perception of Time) कर सकता है।

मन्त्र में यह स्पष्ट किया गया है कि मन में भूतकाल की स्मृतियों का पुनर्स्मरण (Recollection), वर्तमान की अनुभूति (Awareness of the Present) तथा भविष्य की कल्पना और योजना (Imagination and Planning) करने की क्षमता विद्यमान है। इस प्रकार मन एक ऐसा बौद्धिक एवं चेतन तत्त्व (Cognitive and Conscious Principle) है, जो त्रिकाल से सम्बन्धित विषयों पर चिन्तन (Reflection) और मनन (Contemplation) करने में सक्षम है, तथा मानव की कालबोधक चेतना (Temporal Consciousness) का आधार बनता है -

येनेदं भूतं भुवनं भविष्यत्परिगृहीतममृतेन सर्वम्। येन यज्ञस्तायते सप्त होता तन्मे मनः शिवसङ्कल्पमस्तु॥ (शुक्लयजुर्वेद 34-4)[5]

अन्वय- येन अमृतेन (मनसा) इदं भूतं भूवनं भविष्यत् सर्व परिगृहीतम्। येन सप्तहोता यज्ञः तायते तत् मे मनः शिवस‌ङ्कल्पम् अस्तु।

उव्वटभाष्य- येनेदं। येन मनसा। इदं भूतकालं भुवनं वर्तमानकालं भविष्यद् भविष्यत्कालं च। परिगृहीतम् अमृतेन सर्वम्। येन च मनसा यज्ञस्तायते तन्यते। सप्तहोता। सप्तहोतारो हि अग्निष्टोमे भवन्ति। तन्में मन इति व्याख्यातम् ।।

व्याख्या- जिस मन से इसके चारो और विद्यमान वस्तुओं का ज्ञान है। यहाँ क्या हुआ। भूतकालसम्बन्धि वस्तुओं का। भुवन वर्तमान काल को कहते है। भू से क्युप्रत्यय करने पर वर्तमानकालसंबन्धि है। भविष्यत् 'लुटः सद्वा' (पा०सू० ३.३.१४) इससे शतृप्रत्यय करने पर 'तौ सत्' (पा०सू० ३.२.१२७) इसके कहने पर त्रिकालसंबद्ध वस्तुओं में मन प्रवृत होता है यह अर्थ है। श्रोत्र आदि के द्वारा तो प्रत्यक्ष ही ग्रहण करता है। यह किस प्रकार के ज्ञान को ग्रहण करता है। अमृत शाश्वत होने से। मुक्तिपर्यन्त श्रोत्र आदि का तो नाश होता है परन्तु मन तो अमर है। और जिस मन के द्वारा यज्ञ अग्निष्टोम आदि को आगे विस्तृत करते है। 'तनोतेर्यकि' (पा०सू० ६.४.४४) इससे आकार। किस प्रकार का यज्ञ। सप्तहोता सात होता के द्वारा देवो का आह्वान करते है, अर्थात होतृमैत्रवरुण आदि सात होता है। अग्निष्टोम में सात होता है। वह मेरा मन शुभसकल्प वाला हो।

सरलार्थ- जिससे विनाश रहित धर्म वाले संसार का भूतकाल, वर्तमानकाल और भविष्यत्काल के सभी पदार्थ जाने जाते है। जिसके द्वारा सात होता विशिष्ट अग्निष्टोम आदि यज्ञ का सम्पादन किया जाता है। वह मेरा मन शुभस‌ङ्कल्प वाला हो। पंचम मन्त्र का अर्थ इस प्रकार है -

पंचम मंत्र का भावार्थ एवं विवेचन

मन्त्र संख्या पाँच में मन को समस्त ज्ञान का मूलाधार (Foundation of Knowledge) माना गया है। इस मन्त्र के अनुसार समस्त वेद, अर्थात् ज्ञान-विज्ञान की सम्पूर्ण परम्परा (Complete Spectrum of Knowledge and Science) तथा बुद्धि का समावेश मन के भीतर ही माना गया है। मन ही वह केन्द्रीय तत्त्व (Central Faculty) है, जिसके माध्यम से वैदिक ज्ञान, तर्क (Reasoning) और विवेक (Discrimination) का उद्भव होता है।

मन्त्र में यह भी प्रतिपादित किया गया है कि मन में ही चित्त-शक्ति अथवा प्रज्ञा-शक्ति (Cognitive Faculty / Power of Cognition) निहित रहती है। यही शक्ति ज्ञान के ग्रहण (Perception), विश्लेषण (Analysis) तथा आत्मसात् करने (Internalization) की प्रक्रिया को सम्भव बनाती है। इस प्रकार मन न केवल ज्ञान का आधार है, अपितु सम्पूर्ण बौद्धिक चेतना (Intellectual Consciousness) और बोध-प्रक्रिया (Process of Understanding) का मूल स्रोत सिद्ध होता है -

यस्मिन्नृचः साम यजूँषि यस्मिन् प्रतिष्ठिता रथनाभाविवाराः। यस्मिँश्चित्तँ सर्वमोतं प्रजानां तन्मे मनः शिवसङ्कल्पमस्तु॥ (शुक्लयजुर्वेद 34/5)[5]

अन्वय - यस्मिन् ऋचः यस्मिन् साम यजूंषि रथनाभौ अराः इव प्रतिष्ठिताः यस्मिन् प्रजानां सर्व चित्तम् ओतं तत् मे मनः शिवसङ्कल्पम् अस्तु।

उव्वटभाष्य- यस्मिन् ऋचः। यस्मिन् ऋचः प्रतिष्ठिताः। यस्मिन् सामानि प्रतिष्ठितानि । यस्मिन् यंजूषि प्रतिष्ठितानि। कर्थामव ? रथनाभौ इव अराः। यस्मिन् चित्तं सञ्ज्ञानं सर्वे तस्य तस्यार्थस्य। ओतं निक्षिप्तम्। तदुसन्ततिमिव कृतम्। प्रजानाम्। तत् मे मन इति व्याख्यातम्।

व्याख्या - जिस मन में ऋग्वेद प्रतिष्ठित है। जिसमे सामवेद प्रतिष्ठित है। जिसमे यजुर्वेद प्रतिष्ठित है। स्वस्थ मन में ही वेदत्रयी प्रकट होते है, इस मन में शब्द मात्र स्थिर होते है 'अन्नमयं हि सोम्य मनः' इति छान्दोग्य में स्वस्थ मन से ही वेदो का उच्चारण प्रतिपादित किया गया है। वहाँ दृष्टान्त है। जैसे रथ के पहियों में लकड़ी के अरा लगे होते है। जैसे अरा रथचक्र के मध्य में प्रतिष्ठत होते है, उसी प्रकार शब्दजाल मन में स्थिर रहता है। और जिसमे प्राणियों के सम्पूर्ण सभी पदार्थविषयज्ञान धागे में मणियों के समान युक्त रहता है। स्वस्थ मन में ही ज्ञान की उत्पत्ति और मन के प्रतिकूल आचरण से ही ज्ञान का अभाव होता है। वह मेरा मन शिवसङ्कल्प हो।

सरलार्थ- जिसमे ऋग्वेद, सामवेद और यजुर्वेद चक्रनाभि में विद्यमान अरा के समान विद्यमान है और भी जिसमे प्राणियों के सभी पदार्थ विषयक ज्ञान है। वह मेरा मन शुभस‌ङ्कल्प वाला हो। षष्ठम मन्त्र का भाषार्थ इस प्रकार है -

षष्ठ मंत्र का भावार्थ एवं विवेचन

मन्त्र संख्या छह में मन के अधिष्ठान और उसकी कार्य-क्षमता का विवेचन किया गया है। इस मन्त्र के अनुसार मन का निवास हृदय (Heart) में माना गया है, जहाँ से वह समस्त अनुभूतियों और क्रियाओं का संचालन करता है। मन की गति अत्यन्त तीव्र (Extremely Swift) बताई गई है तथा इसमें असाधारण कार्य-क्षमता (Extraordinary Functional Efficiency) निहित है।[4]

मन्त्र में मन की उपमा एक सुयोग्य सारथि (Skilled Charioteer) के रूप में दी गई है, जो इन्द्रियों रूपी घोड़ों (Sense Organs as Horses) को सम्यक् रूप से नियंत्रित करता है। जब मन संयमित और जागरूक (Disciplined and Conscious) होता है, तब इन्द्रियाँ भी मर्यादा में रहती हैं और कर्म (Action) सही दिशा में प्रवृत्त होते हैं। इस प्रकार मन नियन्त्रक तत्त्व (Regulatory Principle) बनकर मानव के मानसिक, बौद्धिक एवं नैतिक आचरण (Mental, Intellectual and Ethical Conduct) का मार्गदर्शन करता है -

सुषारथिरश्वानिव यन्मनुष्यान्नेनीयतेऽभीशुभिर्वाजिनऽ इव। हृत्प्रतिष्ठं यदजिरं जविष्ठं तन्मे मनः शिवसङ्कल्पमस्तु॥ (यजुर्वेद 34/6)[5]

अन्वय - यत् (मनः) मनुष्यान् सुषारथिः अश्वान् इव नेनीयते अभीषुभिः वाजिन इव (मनुष्यान् कर्मषु प्रेरयति) यत् हृत्प्रतिष्ठम् अजिरं जविष्ठं तत् मे मनः शिवसङ्कल्पम् अस्तु।

उव्वट भाष्य - सुषारथिः। यन्मनो मनुष्यान् नेनीयतेऽत्यर्थं नीयते। कर्थामव। सुषारथिः कल्याणसारथिरश्वानिव यन्मनुष्यान्। यच्च मनः सुषारथिरिव। अभीषुभिः प्रग्रहैर्वाजिन इव वेजनवतोऽश्वानिव। यमयतीति शेषः। द्वे उपमे। एकत्र नयनमन्यत्र नियममित्यर्थः यच्च हत्प्रतिष्ठम्। तत्रोपलब्धेः। यच्च अजिरं जरारहितम्। यच्च जविष्ठमतिशयेन गन्तुं तन्मे मनः शिवसङ्कल्पमस्तु ।

व्याख्या - जो मन जैसे सुंदर घोड़े के समान, लगाम से घोड़ो को सब और चलाता है, वैसे ही मनुष्य आदि प्राणियों को शीघ्र ही इधर उधर भ्रमण कराता है। नयतेः क्रियासमभिहारे यङ् हुआ। मन के प्रेरित करने पर ही प्राणि कार्य में प्रवृत होते है। मनुष्य ग्रहण प्राणिमात्र का उपलक्षक है। वहाँ उदाहरण है। जैसे चतुर सारथि लगाम से घोड़ो को इधर उधर अपने वश में चलाता है। रस्सियों से जैसे ले जाता है। दो उपमा है। प्रथम ले जाना और दूसरी नियमन। वैसे ही मन मनुष्यों को कार्य में प्रवृत करता है और लेकर जाता है। और जो मन हृदय में प्रतिष्ठित है। और जो मन विषय आदि में प्रेरक वा वृद्धादी अवस्था से रहित है। और जो अत्यन्त वेगवान है 'न वै वातात् किञ्चनाशीयोस्ति न मनसः किञ्चनाशीयोस्ति' इति श्रुति। वह मेरा मन मंगलमय हो।

सरलार्थ- जैसे कोई चतुर सारथि घोड़ो को सही चलाता है। वह जैसे चाहता है वैसे ही उनको लेकर के जाता है। इसी प्रकार मन भी प्राणियों के शरीर को चलाता है। और जो हृदय में स्थित वृद्धावस्था से रहित अत्यन्त ही वेगवान वह मेरा मन मंगलमय हो।[6]

ऋग्वेद में शिवसंकल्प खिलसूक्त

वैदिक साहित्य में खिल सूक्त शब्द का प्रयोग उन मन्त्रों के लिए किया जाता है, जिन्हें परिशिष्ट अथवा प्रक्षिप्त के रूप में स्वीकार किया गया है। सामान्यतः वे मन्त्र, जो मूल वेद-संहिता में सम्मिलित नहीं हैं, किन्तु किसी विशेष प्रयोजन अथवा आवश्यकता की दृष्टि से बाद में संगृहीत कर लिये गये हों, खिल कहलाते हैं। इस प्रकार खिल सूक्तों का स्वरूप मुख्य संहिता से पृथक होते हुए भी वैदिक परम्परा से घनिष्ठ रूप से सम्बद्ध है। ऋग्वेद की शाकल शाखा से सम्बद्ध खिल सूक्तों का वैदिक साहित्य में विशिष्ट महत्व है, जो मुख्य संहिता के अतिरिक्त 'परिशिष्ट भाग' होते हुए भी अपनी प्राचीनता और विषय-वस्तु के कारण अत्यन्त मूल्यवान माने जाते हैं। प्रसिद्ध भाष्यकार नीलकण्ठ के अनुसार -

परशाखीयं स्वशाखायामपेक्षावशात्पठ्यते तत्खिलमुच्यते। (नीलकंठ टीका)

वेद की परशाखा से किसी विशेष अपेक्षा के कारण जो अंश ग्रहण किया जाता है, वही खिल कहलाता है। इस परिभाषा से स्पष्ट होता है कि खिल सूक्त किसी नवीन रचना के रूप में नहीं, अपितु वेद की ही किसी अन्य शाखा से चयनित अंश के रूप में स्वीकार किये गये हैं। ऋग्वेद की शाकल शाखा में बाष्कल शाखा से प्राप्त कुछ अतिरिक्त मन्त्र संकलित मिलते हैं। इन मन्त्रों का अधिकांश भाग ही खिल सूक्तों के अन्तर्गत आता है। इससे यह संकेत मिलता है कि खिल सूक्त ऋग्वैदिक परम्परा की आन्तरिक शाखागत विन्यास प्रक्रिया का परिणाम हैं। ऋग्वेद की शाकल शाखा से सम्बद्ध कुछ प्रमुख खिलसूक्त इस प्रकार हैं -

  • श्रीसूक्त
  • रात्रिसूक्त
  • मेधा सूक्त
  • शिवसंकल्पसूक्त

इस प्रकार खिल सूक्त न केवल ऋग्वेद की शाखागत परम्परा को समझने में सहायक हैं, अपितु वैदिक मन्त्रपरम्परा के विकास, संरक्षण और संप्रेषण की प्रक्रिया पर भी महत्त्वपूर्ण प्रकाश डालते हैं। इन्हीं खिलसूक्तों में शिवसंकल्पसूक्त का स्थान विशेष रूप से उल्लेखनीय है। यह सूक्त न केवल वैदिक मनोविज्ञान का सूक्ष्म निरूपण करता है, अपितु शिव-तत्त्व की सर्वोच्चता को भी उद्घाटित करता है -

येनेदं भूतं भुवनं भविष्यत् परिगृहिततममृतेन सर्वम्। येन यज्ञस्तायते सप्त होता तन्मे मनः शिवसंकल्पमस्तु॥१॥

येन कर्माण्यपसो मनीषिणो यज्ञे कृण्वन्ति विदथेषु धीराः। यदपूर्वं यक्षमन्तः प्रजानां तन्मे मनः शिवसंकल्पमस्तु॥२॥

यज्जाग्रतो दूरमुदैति दैवं तदु सुप्तस्य तथैवैति। दूरंगमं ज्योतिषां ज्योतिरेकं तन्मे मनः शिवसंकल्पमस्तु॥३॥

यत्प्रज्ञानमुत चेतो धृतिश्च यज्ज्योतिरन्तरमृतं प्रजासु। यस्मान्न ऋते किं चन कर्म क्रियते तन्मे मनः शिवसंकल्पमस्तु॥४॥

यस्मिन्नृचः साम यजूंषि यस्मिन् प्रतिष्ठिता रथनाभाविवाराः। यस्मिश्चित्तं सर्वमोतं प्रजानां तन्मे मनः शिवसंकल्पमस्तु॥५॥

सुसारथिरश्वानिव यन्मनुष्यान्नेनीयतेऽभीशुभिर्वाजिन इव। हृत्प्रतिष्ठं यदजिरं जविष्ठं तन्मे मनः शिवसंकल्पमस्तु॥६॥

यदत्र षष्ठं त्रिशतं शरीरं यज्ञस्य गुह्यं नवनाभमाद्यम्। दश पञ्च त्रिशतं यत्परं च तन्मे मनः शिवसंकल्पमस्तु॥७॥

ये पञ्चपञ्चा दशतं शतं च सहस्रं च नियुतं न्यर्बुदं च। ते यज्ञचित्तेष्टकात्तं शरीरं तन्मे मनः शिव संकल्पमस्तु॥८॥

वेदाहमेतं पुरुषं महान्तमादित्यवर्णं तमस परस्तात्। तस्ये योनि परिपश्यन्ति धीरास्तन्मे मनः शिव संकल्पमस्तु॥९॥

येन कर्माणि प्रचरन्ति धीरा विप्रा वाचा मनसा कर्मणा च। यस्यान्वितमनु सं यन्ति प्राणिनस्तन्मे मनः शिवसंकल्पमस्तु॥१०॥

ये मनो हृदयं ये च देवा ये अन्तरीक्षे बहुदा चरन्ति। ये श्रोत्रं चक्षुषी संचरन्ति तन्मे मनः शिवसंकल्पमस्तु॥११॥

येन द्यौरुग्रा पृथिवी चान्तरिक्षं ये पर्वताः प्रदिशो दिशश्च। येनेदं जगद्व्याप्तं प्रजानां तन्मे मनः शिवसंकल्पमस्तु॥१२॥

येनेदं सर्वं जगतो बभूवुर्ये देवा अपि महतो जातवेदाः। तदिवाग्निस्तपसो ज्योतिरेकं तन्मे मनः शिवसंकल्पमस्तु॥१३॥

अचिन्तयं चाप्रमेयं च व्यक्ताव्यक्तपरः च यत्। सूक्ष्मात्सूक्ष्मतरं ज्ञानं तन्मे मनः शिवसंकल्पमस्तु॥१४॥

अस्ति विनाशथित्वा सर्वमिदं नास्ति पुनस्तथैव द्दृष्टं ध्रुवम्। अस्ति नास्ति हितं मध्यमं पदं तन्मे मनः शिवसंकल्पमस्तु॥१५॥

अस्ति नास्ति विपरीतो प्रवादोऽस्ति नास्ति सर्वं वा इदं गुह्यम्। अस्ति नास्ति परात्परो यत्परं तन्मे मनः शिवसंकल्पमस्तु॥१६॥

परात्परतरं यश्च तत्पराश्चैव यत्परम्। तत्परात्परतोऽज्ञेयं तन्मे मनः शिवसंकल्पमस्तु॥१७॥

परात्परतरो ब्रह्मा तत्परात्परतो हरिः। तत्परात्परतो ईश तन्मे मन शिवसंकल्पमस्तु॥१८॥

गोभिर्जुष्टो धनेन ह्यायुषा च बलेन च। प्रजया पशुभिः पुष्कलाद्यं तन्मे मनः शिवसंकल्पमस्तु॥१९॥

प्रयतः प्रणवो नित्यं परमं पुरुषोत्तमम्। ओंकारं परमात्मानं तन्मे मनः शिवसंकल्पमस्तु॥२०॥

यो वै वेदादिषु गायत्री सर्वव्यापिमहेश्वरात्। तद्विरुक्तं यथाद्वैश्यं तन्मे मनः शिवसंकल्पमस्तु॥२१॥

यो वै वेद महादेवं परमं पुरुषोत्तमम्। यः सर्व यस्य चित्सर्व तन्मे मनः शिवसंकल्पमस्तु॥२२॥

योऽसौ सर्वेषु वेदेषु पठते ह्यज ईश्वरः। अकायो निर्गुणोऽध्यात्मा तन्मे मनः शिवसंकल्पमस्तु॥२३॥

कैलासशिखरे रम्ये शंकरस्य शुभे गृहे। देवतास्तत्र मोदन्ति तन्मे मनः शिवसंकल्पमस्तु॥२४॥

कैलासशिखराभासा हिमवद्गिरिसंस्थिताः। नीलकण्ठं त्रिनेत्रं च तन्मे मनः शिवसंकल्पमस्तु॥२५॥

आब्रह्मस्तम्बपर्यन्तं त्रैलोक्य स चराचरम्। उत्पातितं जगद्व्याप्तं तन्मे मनः शिवसंकल्पमस्तु॥२६॥

य इमं शिवसंकल्पं सदा ध्यायन्ति ब्राह्मणाः। ते परं मोक्षं गमिष्यन्ति तन्मे मनः शिवसंकल्पमस्तु॥२७॥ (ऋग्वेद खिलसूक्त)[7]

मन का दार्शनिक एवं मनोवैज्ञानिक महत्त्व

शिवसंकल्प सूक्त के अनुसार मन इन्द्रियों का प्रवर्तक, ज्ञान का आधार तथा समस्त क्रियाओं का प्रेरक तत्त्व है। इन्द्रियाँ तभी अपने विषयों का सम्यक् ग्रहण कर सकती हैं, जब मन संतुलित एवं नियंत्रित हो। कठोपनिषद् के रथ-दृष्टान्त द्वारा यह सिद्ध किया गया है कि विवेकयुक्त बुद्धि, संयमित मन और नियंत्रित इन्द्रियाँ ही जीवन को परम लक्ष्य की ओर ले जाती हैं। इस प्रकार शिवसंकल्प, मन-नियंत्रण का वैदिक सूत्र प्रदान करता है।[8]

निष्कर्ष॥ Conclusion

छः मन्त्र वाले इस सूक्त के ऋषि याज्ञवल्क्य, मनो देवता, त्रिष्टुप् छन्द है। इस सूक्त में ऋषि कहते हैं की जो मन जागने वाले पुरुष का दूर जाता है, और सोने वाले मनुष्य का वही मन वैसे ही समीप आता है अर्थात् जैसा गया है वैसे ही वापस आता है। और जो दूर से जाता है, जो मन आत्म साक्षात्कार में साधन है, और जो मन प्रकाशकों का श्रोत्र आदि इन्द्रियों का एक ही ज्योति प्रवर्तक है, सभी शरीर का चालक वह मेरा मन शुभस‌ङ्कल्पों से युक्त हो। अर्थात् मेरे मन में हमेशा धर्म ही हो कभी भी पाप नही हो। कर्मवान, बुद्धिमान, मेधावी जिस मन से कार्य करते हैं, जिससे बुद्धिमान यथाविधि यज्ञ का सम्पादन करते हैं, और जो अपूर्व, सभी इन्द्रियों से पूर्व जिसकी रचना हुई, सभी प्राणियों में विद्यमान और पूज्य वह मेरा मन शुभ सङ्कल्प से युक्त हो। जो मन प्रज्ञा को विशेष रूप से ज्ञान कराता है, और भी जो मन सामान्य ज्ञान को उत्पन्न करने वाला है, जो मन धृति धैर्य स्वरूप, जो मन अमरण धर्मी, जो मन प्रजाओं में अन्तर वर्तमान होने से सभी इन्द्रियों का प्रकाशक है, जिसके बिना कोई भी कार्य पूर्ण नही किया जा सकता है वह मेरा मन शुभसङ्कल्प से युक्त हो। जिस मन के द्वारा यह सभी सब कुछ जाना गया है, और जिस मन से भूतकाल सम्बन्धी वस्तु, वर्तमानकाल सम्बन्धी वस्तु, और भविष्यत्काल सम्बन्धी वस्तु का ज्ञान होता है, जिस मन के द्वारा होतृमैत्रावरुण आदि सात होता युक्त अग्निष्टोमयज्ञ को विस्तृत करते है वह मेरा मन शुभसङ्कल्प से युक्त हो। जैसे रथ के दोनों और आरे होते है ठीक वैसे ही मन ही सभी ऋचाओं में प्रतिष्ठित होते है। साम में प्रतिष्ठित है। और यजुर्वेद में प्रतिष्ठित है। पट में जैसे ओत-प्रोतरूप से धागे विद्यमान रहते है वैसे ही जिस मन में सभी पदार्थ विषयक ज्ञान निहित है उस प्रकार का मेरा मन शुभस‌ङ्कल्पयुक्त हो। जैसे अच्छा सारथि अपने रथ के वेगयुक्त घोड़ो को इधर-उधर लेकर जाता है और जैसे उनको नियन्त्रित करता है, वैसे ही जो मन मनुष्यों को सभी कार्यों में प्रवृत्त करता है उन्हें उस कार्य में लगाता है, और जो मन हृद् देशवाशी है, और जो जरारहित, और जो उत्पन्न हुए बालकों में, युवकों में और वृद्धों में एक समान है, वह मेरा मन शुभस‌ङ्कल्प से युक्त हो।[9]

उद्धरण॥ References

  1. डॉ० विजय शंकर पाण्डेय, वैदिक सूक्त संकलन (२००१), मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (पृ० १५१)।
  2. डॉ० अनीता जैन, वैदिक वाग् ज्योतिः-शिव संकल्प से अनुप्रेरित वैदिक मनः प्रबन्धन (२०१६), गुरुकुल कांगडी विश्वविद्यालय, हरिद्वार (पृ० ६०)।
  3. श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय- 18, श्लोक - 14।
  4. 4.0 4.1 4.2 4.3 शिखा शर्मा, यजुर्वेदे वर्णितमनोवैज्ञानिक-सिद्धान्तानामनुशीलनम् (2024), पी.एच.डी.शोध-प्रबंध, श्रीलालबहादुर शास्त्री राष्ट्रीयसंस्कृतविश्वविद्यालय, (पृ० ३७)।
  5. 5.0 5.1 5.2 5.3 5.4 5.5 शुक्लयजुर्वेद, अध्याय- ३४, मन्त्र १-६।
  6. श्री राधेश्याम खेमका, वैदिक सूक्त-संग्रह (२०१२), गीताप्रेस गोरखपुर (पृ० २१२)
  7. डॉ० अमलधारी सिंह, ऋग्वेदीय शाखा-संहिताओं का समीक्षात्मक अध्ययन (२०२३), श्रीलाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय, दिल्ली (पृ० २१९-२२१)।
  8. स्वामी श्री अखंडानन्द सरस्वती - शिवसंकल्प-सूक्त
  9. श्रीपाद दामोदर सातवलेकर, शिव संकल्प का विजय (१९२२), स्वाध्याय-मंडल, औंध (पृ० ७)।