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पुण्यसंचय के एकादशी और त्रयोदशी आदि 'नित्य' व्रत, पापक्षय के चान्द्रायणादि 'नैमित्तिक' व्रत और सुख-सौभाग्यादि के वटसावित्री आदि 'काम्य' व्रत माने गये हैं। इनमें द्रव्यविशेष के भोजन और पूजनादि की साधना के द्वारा साध्य व्रत 'प्रवृत्तिरूप' होते हैं और केवल उपवासादि करने के द्वारा साध्य व्रत 'निवृत्तिरूप' होते हैं। इनका यथोचित उपयोग फल देता है।
 
पुण्यसंचय के एकादशी और त्रयोदशी आदि 'नित्य' व्रत, पापक्षय के चान्द्रायणादि 'नैमित्तिक' व्रत और सुख-सौभाग्यादि के वटसावित्री आदि 'काम्य' व्रत माने गये हैं। इनमें द्रव्यविशेष के भोजन और पूजनादि की साधना के द्वारा साध्य व्रत 'प्रवृत्तिरूप' होते हैं और केवल उपवासादि करने के द्वारा साध्य व्रत 'निवृत्तिरूप' होते हैं। इनका यथोचित उपयोग फल देता है।
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व्रतों को सम्पन्न करने के लिये अनेक प्रकार के धार्मिक अनुष्ठान किये जाते हैं। जिनमें वैदिक मन्त्रों का उपयोग होता है, मन्त्रों के शुद्ध उच्चारण के लिये वेदांगों का विशेष महत्व है। रामायण का आधार सत्यव्रत है। रामायण में राम के दृढ़व्रत, सीता के पतिव्रत तथा भरत के तपोव्रत एवं हनुमान के सेवाव्रत का उल्लेख प्राप्त होता है। महाभारत में क्षमा को सर्वश्रेष्ठ व्रत कहा है। क्षमाशील मनुष्य को यज्ञवेता, ब्रह्मवेता एवं तपस्वी पुरुषों से भी श्रेष्ठ बताया है। महाभारत में ब्रह्मचर्य, सत्य एवं पतिव्रत आदि व्रतों का वर्णन मिलता है। पुराणों में वर्णित है कि प्रत्येक व्रत में इन्द्रियों का नियमन (संयम) करना होता है। इस लिये इसे नियम कहते हैं। पुराणों में व्रतों के लक्षणों का वर्णन प्राप्त होता है। सत्य, क्षमा, दया, दान, शौच, इन्द्रियसंयम, देवपूजा प्रत्येक तिथि, मास, नक्षत्र एवं दिन के अनुसार धारण किये जाने वाले व्रतों का विस्तृत वर्णन पुराणों में वर्णित है। व्रताचरण, उपवास, नियमोंके परिपालन तथा विविध दानोंसे व्रतियों पर सभी देवता, ऋषि-मुनि तथा संसारके प्राणी निश्चित प्रसन्न हो जाते हैं, इसमें संशय नहीं -<blockquote>व्रतोपवासनियमैर्नानादानैस्तथा देवादयो भवन्त्येव तेषां प्रीता न संशयः॥ (भविष्यपुराण)
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व्रतों को सम्पन्न करने के लिये अनेक प्रकार के धार्मिक अनुष्ठान किये जाते हैं। जिनमें वैदिक मन्त्रों का उपयोग होता है, मन्त्रों के शुद्ध उच्चारण के लिये वेदांगों का विशेष महत्व है। रामायण का आधार सत्यव्रत है। रामायण में राम के दृढ़व्रत, सीता के पतिव्रत तथा भरत के तपोव्रत एवं हनुमान के सेवाव्रत का उल्लेख प्राप्त होता है। महाभारत में क्षमा को सर्वश्रेष्ठ व्रत कहा है। क्षमाशील मनुष्य को यज्ञवेता, ब्रह्मवेता एवं तपस्वी पुरुषों से भी श्रेष्ठ बताया है। महाभारत में ब्रह्मचर्य, सत्य एवं पतिव्रत आदि व्रतों का वर्णन मिलता है। पुराणों में वर्णित है कि प्रत्येक व्रत में इन्द्रियों का नियमन (संयम) करना होता है। इस लिये इसे नियम कहते हैं। पुराणों में व्रतों के लक्षणों का वर्णन प्राप्त होता है। सत्य, क्षमा, दया, दान, शौच, इन्द्रियसंयम, देवपूजा प्रत्येक तिथि, मास, नक्षत्र एवं दिन के अनुसार धारण किये जाने वाले व्रतों का विस्तृत वर्णन पुराणों में वर्णित है। व्रताचरण, उपवास, नियमोंके परिपालन तथा विविध दानोंसे व्रतियों पर सभी देवता, ऋषि-मुनि तथा संसारके प्राणी निश्चित प्रसन्न हो जाते हैं, इसमें संशय नहीं -<ref>पी० वी० काणे, [https://archive.org/details/litI_dharma-shastra-ka-itihas-vol-4-of-dr.-pandurang-vaman-kane-uttar-pradesh-hindi-sansthan/page/n90/mode/1up धर्मशास्त्र का इतिहास - भाग 4], उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान, लखनऊ (पृ० ४३)।</ref><blockquote>व्रतोपवासनियमैर्नानादानैस्तथा देवादयो भवन्त्येव तेषां प्रीता न संशयः॥ (भविष्यपुराण)
    
उपवासैस्तथा तुल्यं तपः कर्म न विद्यते॥ दिव्यं वर्षसहस्त्रं तु विश्वामित्रेण धीमता। तपसाक्रान्तमेकेन भक्तेन स च विप्रत्वमागतः॥
 
उपवासैस्तथा तुल्यं तपः कर्म न विद्यते॥ दिव्यं वर्षसहस्त्रं तु विश्वामित्रेण धीमता। तपसाक्रान्तमेकेन भक्तेन स च विप्रत्वमागतः॥
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#लक्ष्यके प्रति जागरूकता
 
#लक्ष्यके प्रति जागरूकता
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व्रतोंसे अन्तःकरणकी शुद्धिके साथ-साथ बाह्य वातावरणमें भी पवित्रता आती है तथा संकल्पशक्तिमें दृढ़ता आती है। इनसे मानसिक शान्ति और ईश्वरकी भक्ति भी प्राप्त होती है। भौतिक दृष्टिसे स्वास्थ्यमें भी लाभ होता है अर्थात् रोगोंकी आत्यन्तिक निवृत्ति होती है। यद्यपि रोग भी पाप हैं और ऐसे पाप व्रतोंसे ही दूर भी होते हैं तथापि कायिक, वाचिक, मानसिक और संसर्गजनित सभी प्रकारके पाप, उपपाप और महापापादि भी व्रतोंसे ही दूर होते हैं। व्रत दो प्रकारसे किये जाते हैं -<ref>भवनाथ झा, धर्मायण-व्रत विधि विशेषांक, [https://mahavirmandirpatna.org/dharmayan/wp-content/uploads/2022/07/Dharmayan-vol.-119-Vrata-vidhi-Ank-ebook.pdf म०म० रुद्रधर कृत व्रत-पद्धति में व्रत-विधान] (२०२२), महावीर मन्दिर, पटना (पृ० ३)।</ref> उपवास - निराहार रहकर और एक बार संयमित आहारके द्वारा, इन व्रतोंके कई भेद हैं।
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व्रतोंसे अन्तःकरणकी शुद्धिके साथ-साथ बाह्य वातावरणमें भी पवित्रता आती है तथा संकल्पशक्तिमें दृढ़ता आती है। इनसे मानसिक शान्ति और ईश्वरकी भक्ति भी प्राप्त होती है। भौतिक दृष्टिसे स्वास्थ्यमें भी लाभ होता है अर्थात् रोगोंकी आत्यन्तिक निवृत्ति होती है। यद्यपि रोग भी पाप हैं और ऐसे पाप व्रतोंसे ही दूर भी होते हैं तथापि कायिक, वाचिक, मानसिक और संसर्गजनित सभी प्रकारके पाप, उपपाप और महापापादि भी व्रतोंसे ही दूर होते हैं।<ref>भवनाथ झा, धर्मायण-व्रत विधि विशेषांक, [https://mahavirmandirpatna.org/dharmayan/wp-content/uploads/2022/07/Dharmayan-vol.-119-Vrata-vidhi-Ank-ebook.pdf म०म० रुद्रधर कृत व्रत-पद्धति में व्रत-विधान] (२०२२), महावीर मन्दिर, पटना (पृ० ३)।</ref>
    
==व्रत की उपयोगिता॥ Vrat ki Upayogita==
 
==व्रत की उपयोगिता॥ Vrat ki Upayogita==
व्रत - व्रियते इति व्रतम् जिसका वरण, ग्रहण, अनुपालन, आचरण, अनुष्ठान किया जाए उसे व्रत कहते हैं। व्रत एवं नियम को पर्यायवाचक माना गया है तथा उपवास, पुण्यक आदि को व्रत का प्रकार कहा है। वेदों में उल्लेख प्राप्त होता है कि व्रत धारण करने से मनुष्य दीक्षित होता है। दाक्षिण्य (दक्षता से, निपुणता) प्राप्त होती है। दक्षता की प्राप्ति से श्रद्धा का भाव जाग्रत होता है एवं श्रद्धा से सत्यस्वरूप ब्रह्म की प्राप्ति होती है।
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वेदों में उल्लेख प्राप्त होता है कि व्रत धारण करने से मनुष्य दीक्षित होता है। दाक्षिण्य (दक्षता से, निपुणता) प्राप्त होती है। दक्षता की प्राप्ति से श्रद्धा का भाव जाग्रत होता है एवं श्रद्धा से सत्यस्वरूप ब्रह्म की प्राप्ति होती है।
    
ऋग्वेद में सत्य बोलना व्रत कहा गया है। सत्य बोलने वाले मनुष्य पर देवताओं का प्रसन्न होना वर्णित है। मधुर भाषण को श्रेष्ठ व्रत कहा है। ऋग्वेद में दानशीलता को उत्तम व्रत कहा है। जो सामर्थ्यशाली एवं मित्र होते हुए भी मित्र को अन्नदान नहीं करते या उसका सत्कार नहीं करते ऐसे कृपण मनुष्य का परित्याग कर देना चाहिए।
 
ऋग्वेद में सत्य बोलना व्रत कहा गया है। सत्य बोलने वाले मनुष्य पर देवताओं का प्रसन्न होना वर्णित है। मधुर भाषण को श्रेष्ठ व्रत कहा है। ऋग्वेद में दानशीलता को उत्तम व्रत कहा है। जो सामर्थ्यशाली एवं मित्र होते हुए भी मित्र को अन्नदान नहीं करते या उसका सत्कार नहीं करते ऐसे कृपण मनुष्य का परित्याग कर देना चाहिए।
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