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कात्यायनकृताश्चैव तथा प्राचेतसन्मुनेः। श्रुताः ह्येते भवत्प्रोक्ताः श्रुत्यर्थं मे न विस्मृताः॥ (पराशर स्मृति १. १२-१५)<ref name=":2" /></blockquote>इसका आशय यह है कि व्यास अपने पिता से निवेदन करते हैं कि वे उन्हें पुनः धर्मविषयक उपदेश प्रदान करें, यद्यपि उन्होंने मनु, वसिष्ठ, कश्यप, गर्ग, गौतम, उशना, अत्रि, विष्णु, संवर्त, अंगिरस, शातातप, हारीत, याज्ञवल्क्य, आपस्तम्ब, शंख, लिखित, कात्यायन, प्रचेता तथा स्वयं पिता द्वारा प्रतिपादित धर्म का श्रवण कर लिया है। इससे यह स्पष्ट होता है कि धर्मशास्त्र परम्परा एक सतत और बहुविध विचारधारा वाली परम्परा रही है, जिसमें विभिन्न आचार्यों ने समय, समाज और युग के अनुसार धर्म का विवेचन किया है। याज्ञवल्क्य स्मृति में धर्मशास्त्रकारों का उल्लेख इस प्रकार मिलता है - <blockquote>मन्वत्रिविष्णुहारीतयाज्ञवल्क्योशनांऽगिराः। यमापस्तम्बसंवर्ताः कात्यायनबृहस्पती॥
 
कात्यायनकृताश्चैव तथा प्राचेतसन्मुनेः। श्रुताः ह्येते भवत्प्रोक्ताः श्रुत्यर्थं मे न विस्मृताः॥ (पराशर स्मृति १. १२-१५)<ref name=":2" /></blockquote>इसका आशय यह है कि व्यास अपने पिता से निवेदन करते हैं कि वे उन्हें पुनः धर्मविषयक उपदेश प्रदान करें, यद्यपि उन्होंने मनु, वसिष्ठ, कश्यप, गर्ग, गौतम, उशना, अत्रि, विष्णु, संवर्त, अंगिरस, शातातप, हारीत, याज्ञवल्क्य, आपस्तम्ब, शंख, लिखित, कात्यायन, प्रचेता तथा स्वयं पिता द्वारा प्रतिपादित धर्म का श्रवण कर लिया है। इससे यह स्पष्ट होता है कि धर्मशास्त्र परम्परा एक सतत और बहुविध विचारधारा वाली परम्परा रही है, जिसमें विभिन्न आचार्यों ने समय, समाज और युग के अनुसार धर्म का विवेचन किया है। याज्ञवल्क्य स्मृति में धर्मशास्त्रकारों का उल्लेख इस प्रकार मिलता है - <blockquote>मन्वत्रिविष्णुहारीतयाज्ञवल्क्योशनांऽगिराः। यमापस्तम्बसंवर्ताः कात्यायनबृहस्पती॥
         
पाराशर्यव्यासशंखलिखितौ दक्षगौतमौ। शातातपो वसिष्ठश्च धर्मशास्त्रप्रयोजकाः॥ (याज्ञवल्क्य स्मृति)<ref>[https://sa.wikisource.org/wiki/%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%9C%E0%A5%8D%E0%A4%9E%E0%A4%B5%E0%A4%B2%E0%A5%8D%E0%A4%95%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%AE%E0%A5%83%E0%A4%A4%E0%A4%BF%E0%A4%83/%E0%A4%86%E0%A4%9A%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%A7%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%AF%E0%A4%83/%E0%A4%89%E0%A4%AA%E0%A5%8B%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%98%E0%A4%BE%E0%A4%A4%E0%A4%AA%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%95%E0%A4%B0%E0%A4%A3%E0%A4%AE%E0%A5%8D याज्ञवल्क्यस्मृति], आचार अध्याय, उपोद्घातप्रकरण, श्लोक ४-५।</ref></blockquote>इन श्लोकों के अनुसार मनु, अत्रि, विष्णु, हारीत, याज्ञवल्क्य, उशना, अंगिरा, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, पाराशर, व्यास, शंख, लिखित, दक्ष, गौतम, शातातप और वसिष्ठ - ये सभी धर्मशास्त्रों के प्रवर्तक (प्रणेता) माने गए हैं। यहाँ पाराशर और व्यास जैसे उत्तरवर्ती काल के मुनियों का उल्लेख यह स्पष्ट करता है कि धर्मशास्त्रकारों में कोई कठोर कालक्रम (पौर्वापर्य) नहीं है। जैसे मनु ने धर्म का प्रतिपादन किया, वैसे ही अन्य ऋषियों ने भी अपने-अपने दृष्टिकोण से उसी धर्म को विवेचित किया।
 
पाराशर्यव्यासशंखलिखितौ दक्षगौतमौ। शातातपो वसिष्ठश्च धर्मशास्त्रप्रयोजकाः॥ (याज्ञवल्क्य स्मृति)<ref>[https://sa.wikisource.org/wiki/%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%9C%E0%A5%8D%E0%A4%9E%E0%A4%B5%E0%A4%B2%E0%A5%8D%E0%A4%95%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%AE%E0%A5%83%E0%A4%A4%E0%A4%BF%E0%A4%83/%E0%A4%86%E0%A4%9A%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%A7%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%AF%E0%A4%83/%E0%A4%89%E0%A4%AA%E0%A5%8B%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%98%E0%A4%BE%E0%A4%A4%E0%A4%AA%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%95%E0%A4%B0%E0%A4%A3%E0%A4%AE%E0%A5%8D याज्ञवल्क्यस्मृति], आचार अध्याय, उपोद्घातप्रकरण, श्लोक ४-५।</ref></blockquote>इन श्लोकों के अनुसार मनु, अत्रि, विष्णु, हारीत, याज्ञवल्क्य, उशना, अंगिरा, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, पाराशर, व्यास, शंख, लिखित, दक्ष, गौतम, शातातप और वसिष्ठ - ये सभी धर्मशास्त्रों के प्रवर्तक (प्रणेता) माने गए हैं। यहाँ पाराशर और व्यास जैसे उत्तरवर्ती काल के मुनियों का उल्लेख यह स्पष्ट करता है कि धर्मशास्त्रकारों में कोई कठोर कालक्रम (पौर्वापर्य) नहीं है। जैसे मनु ने धर्म का प्रतिपादन किया, वैसे ही अन्य ऋषियों ने भी अपने-अपने दृष्टिकोण से उसी धर्म को विवेचित किया।
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याज्ञवल्क्य ने व्यवहार-निर्णय के सम्बन्ध में यह नियम दिया है कि यदि दो स्मृतियों में निर्णय के सम्बन्ध में परस्पर विरोध हो तो लोक व्यवहार अर्थात् युक्ति द्वारा निर्धारित परम्परानुसार निर्णय किया जाये, क्योंकि लोक व्यवहार द्वारा किया गया निर्णय सर्वमान्य होता है - <blockquote>स्मृत्योर्विरोधे न्यायस्तु बलवान् व्यवहारतः। (याज्ञवल्क्य स्मृति)</blockquote>उपर्युक्त निर्णयों को ध्यान में रखते हुए बृहस्पति ने अपना विशिष्ट नियम दिया है कि केवल शास्त्रों के आधार पर निर्णय नहीं करना चाहिए, अपितु युक्ति अर्थात् तर्क आदि के द्वारा निर्णय करना चाहिए, क्योंकि युक्तिहीन निर्णय से धर्म की हानि होती है -<blockquote>केवलं शास्त्रमाश्रित्य न कर्तव्यो हि निर्णयः। युक्तिहीनं विचारस्तु धर्महानिं प्रजायते॥ (याज्ञवल्क्य स्मृति)</blockquote>व्यवहार सम्बन्धी नियमों को स्पष्ट करते हुए व्यवहार मयूख में कहा गया है कि देश, जाति तथा कुलों में जो नियम पहले से चले आ रहे हैं, उनका उसी प्रकार पालन करना चाहिए। यही व्यवहार का नियम है - <blockquote>देशजातिकुलानां च ये धर्माः प्रवर्तिताः। तथैव ते पालनीयाः प्रजास्वप्रतिवर्तिताः॥ (याज्ञवल्क्य स्मृति)</blockquote>उक्त परम्परा के विपरीत निर्णय करने पर प्रजा में आक्रोश उत्पन्न होता है और न्यायाधीश अपयश का भागी होता है।<ref>अनुसंधित्सु- स्वाति सिंह, [https://shodhganga.inflibnet.ac.in/handle/10603/277434 याज्ञवल्क्य एवं नारदीय स्मृति के परिप्रेक्ष्य में आधुनिक व्यवहार पद्धति का समीक्षात्मक अध्ययन], सन् २०००, शोध केन्द्र - सी०एस०एन० स्नातकोत्तर महाविद्यालय, हरदोई (पृ० ४१)।</ref>
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याज्ञवल्क्य ने व्यवहार-निर्णय के सम्बन्ध में यह नियम दिया है कि यदि दो स्मृतियों में निर्णय के सम्बन्ध में परस्पर विरोध हो तो लोक व्यवहार अर्थात् युक्ति द्वारा निर्धारित परम्परानुसार निर्णय किया जाये, क्योंकि लोक व्यवहार द्वारा किया गया निर्णय सर्वमान्य होता है - <blockquote>स्मृत्योर्विरोधे न्यायस्तु बलवान् व्यवहारतः। (याज्ञवल्क्य स्मृति २/२१)<ref>[https://sa.wikisource.org/wiki/%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%9C%E0%A5%8D%E0%A4%9E%E0%A4%B5%E0%A4%B2%E0%A5%8D%E0%A4%95%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%AE%E0%A5%83%E0%A4%A4%E0%A4%BF%E0%A4%83/%E0%A4%B5%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%B5%E0%A4%B9%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%A7%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%AF%E0%A4%83/%E0%A4%85%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%A7%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A4%A3%E0%A4%B5%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%B5%E0%A4%B9%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A4%AE%E0%A4%BE%E0%A4%A4%E0%A5%83%E0%A4%95%E0%A4%BE%E0%A4%AA%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%95%E0%A4%B0%E0%A4%A3%E0%A4%AE%E0%A5%8D याज्ञवल्क्यस्मृतिः], व्यवहाराध्यायः, असाधारणव्यवहारमातृकाप्रकरणम्, श्लोक-२१।</ref></blockquote>उपर्युक्त निर्णयों को ध्यान में रखते हुए बृहस्पति ने अपना विशिष्ट नियम दिया है कि केवल शास्त्रों के आधार पर निर्णय नहीं करना चाहिए, अपितु युक्ति अर्थात् तर्क आदि के द्वारा निर्णय करना चाहिए, क्योंकि युक्तिहीन निर्णय से धर्म की हानि होती है -<blockquote>केवलं शास्त्रमाश्रित्य न कर्तव्यो हि निर्णयः। युक्तिहीनं विचारस्तु धर्महानिं प्रजायते॥ (याज्ञवल्क्य स्मृति)</blockquote>व्यवहार सम्बन्धी नियमों को स्पष्ट करते हुए व्यवहार मयूख में कहा गया है कि देश, जाति तथा कुलों में जो नियम पहले से चले आ रहे हैं, उनका उसी प्रकार पालन करना चाहिए। यही व्यवहार का नियम है - <blockquote>देशजातिकुलानां च ये धर्माः प्रवर्तिताः। तथैव ते पालनीयाः प्रजास्वप्रतिवर्तिताः॥ (याज्ञवल्क्य स्मृति)</blockquote>उक्त परम्परा के विपरीत निर्णय करने पर प्रजा में आक्रोश उत्पन्न होता है और न्यायाधीश अपयश का भागी होता है।<ref>अनुसंधित्सु- स्वाति सिंह, [https://shodhganga.inflibnet.ac.in/handle/10603/277434 याज्ञवल्क्य एवं नारदीय स्मृति के परिप्रेक्ष्य में आधुनिक व्यवहार पद्धति का समीक्षात्मक अध्ययन], सन् २०००, शोध केन्द्र - सी०एस०एन० स्नातकोत्तर महाविद्यालय, हरदोई (पृ० ४१)।</ref>
    
'''पाराशर स्मृति में युगानुरूप धर्म-विकास'''
 
'''पाराशर स्मृति में युगानुरूप धर्म-विकास'''
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भारतीय धर्मशास्त्रीय (Dharmashastric) परम्परा में युग-चतुष्टय के अनुसार धर्म के स्वरूप में परिवर्तन (Transformation) की अवधारणा अत्यन्त महत्त्वपूर्ण मानी गयी है। पाराशर स्मृति में महर्षि पराशर ने इस युगानुरूप धर्म-परिवर्तन (Epochal Modification of Dharma) को अत्यन्त व्यावहारिक दृष्टिकोण (Pragmatic Approach) से प्रतिपादित किया है।
 
भारतीय धर्मशास्त्रीय (Dharmashastric) परम्परा में युग-चतुष्टय के अनुसार धर्म के स्वरूप में परिवर्तन (Transformation) की अवधारणा अत्यन्त महत्त्वपूर्ण मानी गयी है। पाराशर स्मृति में महर्षि पराशर ने इस युगानुरूप धर्म-परिवर्तन (Epochal Modification of Dharma) को अत्यन्त व्यावहारिक दृष्टिकोण (Pragmatic Approach) से प्रतिपादित किया है।
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'''युगधर्मानुसार साधन-प्रधानता॥ Primacy of Means as per Yuga-Dharma'''<blockquote>तपः परं कृतयुगे त्रेतायां ज्ञानमुच्यते। द्वापरे यज्ञमेवाहुर्दानमेकं कलौ युगे॥ (पाराशर स्मृति-23)</blockquote>'''कृतयुग में तप॥ Austerity as Supreme Discipline -''' कृतयुग में तप (Austerity) को सर्वप्रधान धर्म कहा गया। तप का तात्पर्य केवल शारीरिक कष्ट-सहन (Physical Mortification) नहीं, अपितु इन्द्रियनिग्रह (Self-restraint), चित्त-शुद्धि (Purification of Consciousness) तथा आध्यात्मिक उत्कर्ष (Spiritual Elevation) से है। उस काल में मनुष्य की आयु (Longevity), धैर्य (Endurance) और सात्त्विकता (Purity) उच्च कोटि की थी; अतः तप ही मोक्षोपाय (Means of Liberation) माना गया।
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'''युगधर्मानुसार साधन-प्रधानता॥ Primacy of Means as per Yuga-Dharma'''<blockquote>तपः परं कृतयुगे त्रेतायां ज्ञानमुच्यते। द्वापरे यज्ञमेवाहुर्दानमेकं कलौ युगे॥ (पाराशर स्मृति-23)</blockquote>'''कृतयुग में तप॥ Austerity as Supreme Discipline -''' कृतयुग में तप को सर्वप्रधान धर्म कहा गया। तप का तात्पर्य केवल शारीरिक कष्ट-सहन नहीं, अपितु इन्द्रियनिग्रह (Self-restraint), चित्त-शुद्धि (Purification of Consciousness) तथा आध्यात्मिक उत्कर्ष (Spiritual Elevation) से है। उस काल में मनुष्य की आयु (Longevity), धैर्य (Endurance) और सात्त्विकता (Purity) उच्च कोटि की थी; अतः तप ही मोक्षोपाय माना गया।
 
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'''त्रेतायुग में ज्ञान॥ Epistemic Realization -''' त्रेता में ज्ञान (Spiritual Knowledge) को प्रधानता मिली। ज्ञान यहाँ तत्त्वबोध (Metaphysical Insight) एवं आत्मसाक्षात्कार (Self-realization) का द्योतक है। यह युग दार्शनिक अन्वेषण (Philosophical Inquiry) का युग माना गया।
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'''द्वापर में यज्ञ॥ Ritual Sacrifice -''' द्वापर में यज्ञ-यागादि (Ritualism) को महत्त्व मिला। अश्वमेध, गोमेध आदि महायज्ञ सामाजिक-राजनीतिक प्रतिष्ठा (Royal Prestige) के प्रतीक बन गये। धर्म का रूप अधिकाधिक कर्मकाण्डात्मक (Ritualistic) हो गया।
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'''त्रेतायुग में ज्ञान॥ Epistemic Realization -''' त्रेता में ज्ञान (Spiritual Knowledge) को प्रधानता मिली। ज्ञान यहाँ तत्त्वबोध एवं आत्मसाक्षात्कार का द्योतक है। यह युग दार्शनिक अन्वेषण का युग माना गया।
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'''कलियुग में दान॥ Charity as Ethical Core -''' कलियुग में दान (Charitable Giving) को ही सर्वोपरि धर्म माना गया। इसका कारण मानव की अल्पायु (Short-lived Nature), मन्दबुद्धिता (Intellectual Weakness) एवं अनुत्साह (Lethargy) है। अतः सरलतम साधन (Simplified Spiritual Method) के रूप में दान को प्रतिष्ठित किया गया। इस संदर्भ में बृहदारण्यक उपनिषद् का प्रसिद्ध वाक्य -  “दत्त, दयध्वं, दम्यत्” दान, दया और दम का त्रिविध उपदेश देता है।
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'''द्वापर में यज्ञ॥ Ritual Sacrifice -''' द्वापर में यज्ञ-यागादि को महत्त्व मिला। अश्वमेध, गोमेध आदि महायज्ञ सामाजिक-राजनीतिक प्रतिष्ठा के प्रतीक बन गये। धर्म का रूप अधिकाधिक कर्मकाण्डात्मक हो गया।
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भर्तृहरि ने भी कहा - <nowiki>''</nowiki>दानेन पाणिर्नतु कंकणेन<nowiki>''</nowiki> अर्थात् दान ही कर-कमलों की वास्तविक शोभा है। धर्मनियन्ताओं का युगानुसार परिवर्तन आदि विषयों का पाराशर स्मृति में उल्लेख इस प्रकार है -<blockquote>कृते तु मानवा धर्मास्त्रेतायां गौतमाः स्मृताः। द्वापरे शङ्खलिखितौ कलौ पाराशराः स्मृताः॥ (पाराशर स्मृति-24)</blockquote>सत्ययुग में मनु का विधान प्रचलित था, त्रेता में गौतम के नियम मान्य हुए, द्वापर में शंख और लिखित का अधिकार स्थापित हुआ, कलियुग में महर्षि पराशर स्वयं धर्मनियन्ता माने गये। यह परिवर्तन धर्म की ऐतिहासिकता (Historicity of Dharma) को सूचित करता है। धर्म कोई स्थिर तत्त्व नहीं, अपितु काल-सापेक्ष (Time-conditioned) व्यवस्था है।
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'''कलियुग में दान॥ Charity as Ethical Core -''' कलियुग में दान को ही सर्वोपरि धर्म माना गया। इसका कारण मानव की अल्पायु, मन्दबुद्धिता (Intellectual Weakness) एवं अनुत्साह है। अतः सरलतम साधन के रूप में दान को प्रतिष्ठित किया गया। इस संदर्भ में बृहदारण्यक उपनिषद् का प्रसिद्ध वाक्य -  “दत्त, दयध्वं, दम्यत्” दान, दया और दम का त्रिविध उपदेश देता है। भर्तृहरि ने भी कहा - <nowiki>''</nowiki>दानेन पाणिर्नतु कंकणेन<nowiki>''</nowiki> अर्थात् दान ही कर-कमलों की वास्तविक शोभा है। धर्मनियन्ताओं का युगानुसार परिवर्तन आदि विषयों का पाराशर स्मृति में उल्लेख इस प्रकार है -<blockquote>कृते तु मानवा धर्मास्त्रेतायां गौतमाः स्मृताः। द्वापरे शङ्खलिखितौ कलौ पाराशराः स्मृताः॥ (पाराशर स्मृति-24)</blockquote>सत्ययुग में मनु का विधान प्रचलित था, त्रेता में गौतम के नियम मान्य हुए, द्वापर में शंख और लिखित का अधिकार स्थापित हुआ, कलियुग में महर्षि पराशर स्वयं धर्मनियन्ता माने गये। यह परिवर्तन धर्म की ऐतिहासिकता को सूचित करता है। धर्म कोई स्थिर तत्त्व नहीं, अपितु काल-सापेक्ष (Time-conditioned) व्यवस्था है।
    
'''दण्ड-व्यवस्था में शिथिलीकरण॥ Penal Relaxation and Reformative Justice'''
 
'''दण्ड-व्यवस्था में शिथिलीकरण॥ Penal Relaxation and Reformative Justice'''
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*कलियुग में प्रायश्चित्त (Expiatory Reform)
 
*कलियुग में प्रायश्चित्त (Expiatory Reform)
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यहाँ दण्ड-नीति (Penology) में सुधारात्मक दृष्टिकोण (Reformative Approach) स्पष्ट होता है। कलियुग में अपराधी को पुनर्वास (Rehabilitation) का अवसर प्रदान किया गया है - <blockquote>कृते सम्भाषणादेव त्रेतायां स्पर्शनेन च। द्वापरे त्वत्रमादाय कलौ पतति कर्मणा॥ (पाराशर स्मृति-26)</blockquote>उपर्युक्त श्लोक में पापी के साथ संसर्ग (Association with Sinner) के नियमों का विवेचन है -  
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यहाँ दण्ड-नीति में सुधारात्मक दृष्टिकोण (Reformative Approach) स्पष्ट होता है। कलियुग में अपराधी को पुनर्वास (Rehabilitation) का अवसर प्रदान किया गया है - <blockquote>कृते सम्भाषणादेव त्रेतायां स्पर्शनेन च। द्वापरे त्वत्रमादाय कलौ पतति कर्मणा॥ (पाराशर स्मृति-26)</blockquote>उपर्युक्त श्लोक में पापी के साथ संसर्ग के नियमों का विवेचन है -  
    
*कृतयुग - सम्भाषण मात्र से पतन
 
*कृतयुग - सम्भाषण मात्र से पतन
* त्रेता - स्पर्श से पतन
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*त्रेता - स्पर्श से पतन
 
*द्वापर - अन्नग्रहण से पतन
 
*द्वापर - अन्नग्रहण से पतन
 
*कलियुग - केवल स्वयं के कर्म से पतन
 
*कलियुग - केवल स्वयं के कर्म से पतन
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यह नैतिक उत्तरदायित्व की व्यक्तिगतता (Individualization of Responsibility) को सूचित करता है। धर्म का केन्द्र बाह्य संसर्ग से हटकर आन्तरिक कर्तृत्व (Internal Agency) पर आ गया। पाराशर का यह प्रतिपादन स्पष्ट करता है कि -  
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यह नैतिक उत्तरदायित्व की व्यक्तिगतता (Individualization of Responsibility) को सूचित करता है। धर्म का केन्द्र बाह्य संसर्ग से हटकर आन्तरिक कर्तृत्व पर आ गया। पाराशर का यह प्रतिपादन स्पष्ट करता है कि -  
    
*धर्म स्थिर न होकर परिस्थितिजन्य है।
 
*धर्म स्थिर न होकर परिस्थितिजन्य है।
*दण्ड से अधिक प्रायश्चित्त (Atonement) को महत्त्व दिया गया।
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*दण्ड से अधिक प्रायश्चित्त को महत्त्व दिया गया।
 
*बाह्याचार (External Conduct) से अधिक आन्तरिक नैतिकता (Inner Morality) को प्रधानता मिली।
 
*बाह्याचार (External Conduct) से अधिक आन्तरिक नैतिकता (Inner Morality) को प्रधानता मिली।
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अतः पाराशर-स्मृति में धर्म का स्वरूप विकासमान (Evolutionary), अनुकूलनीय (Adaptive) एवं समाजोपयोगी (Socially Relevant) है। युगानुसार धर्म के साधन, दण्ड-विधान, सामाजिक मर्यादा तथा आध्यात्मिक प्रभाव की यह क्रमिक शिथिलता (Gradual Relaxation) भारतीय धर्मशास्त्र की व्यावहारिक बुद्धिमत्ता (Practical Wisdom) को प्रमाणित करती है।
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अतः पाराशर-स्मृति में धर्म का स्वरूप विकासमान, अनुकूलनीय एवं समाजोपयोगी है। युगानुसार धर्म के साधन, दण्ड-विधान, सामाजिक मर्यादा तथा आध्यात्मिक प्रभाव की यह क्रमिक शिथिलता भारतीय धर्मशास्त्र की व्यावहारिक बुद्धिमत्ता को प्रमाणित करती है।
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यह प्रतिपादन आधुनिक विधिशास्त्र (Modern Jurisprudence) की उस धारणा से साम्य रखता है जिसमें विधि (Law) को समाज की आवश्यकताओं (Social Needs) के अनुरूप संशोधित किया जाता है। इस प्रकार पाराशर का दृष्टिकोण न केवल धार्मिक आचारसंहिता (Religious Code of Conduct) है, अपितु एक गतिशील सामाजिक-दर्शन भी है, जो काल, परिस्थिति और मानवीय क्षमता के अनुरूप धर्म की पुनर्व्याख्या का उत्कृष्ट उदाहरण प्रस्तुत करता है।
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यह प्रतिपादन आधुनिक विधिशास्त्र (Modern Jurisprudence) की उस धारणा से साम्य रखता है जिसमें विधि (Law) को समाज की आवश्यकताओं के अनुरूप संशोधित किया जाता है। इस प्रकार पाराशर का दृष्टिकोण न केवल धार्मिक आचारसंहिता है, अपितु एक गतिशील सामाजिक-दर्शन भी है, जो काल, परिस्थिति और मानवीय क्षमता के अनुरूप धर्म की पुनर्व्याख्या का उत्कृष्ट उदाहरण प्रस्तुत करता है।
    
==धर्मशास्त्रों के वर्ण्यविषय==
 
==धर्मशास्त्रों के वर्ण्यविषय==
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