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== परिचय॥ Introduction==
 
== परिचय॥ Introduction==
भारतीय संस्कृति का मूल आधार धर्म है। विविध शास्त्रकारों ने धर्म शब्द के भिन्न-भिन्न अर्थ किये हैं। धर्मशास्त्र में सामाजिक आचार-विचार, [[Varnashrama Dharma (वर्णाश्रमधर्मः)|वर्णाश्रम-धर्म]], [[Achara (आचार)|सदाचार]], [[Niti Shastra (नीति शास्त्र)|नीति]], राजा-प्रजा के अधिकार एवं कर्तव्य तथा शासन से सम्बन्धित नियम आदि का सुव्यवस्थित विवेचन किया गया है। धर्मशास्त्र शब्द दो पदों [[Dharma (धर्मः)|धर्म]] और [[Shastra Shikshana Paddhati (शास्त्रशिक्षणपद्धतिः)|शास्त्र]] के संयोग से निर्मित है। इन दोनों पदों के शाब्दिक अर्थों का ज्ञान आवश्यक है। धर्म शब्द पुल्लिंग एवं नपुंसकलिंग दोनों रूपों में प्रयुक्त होता है। प्रसिद्ध प्राच्यविद् पण्डित तारिणीश झा ने संस्कृत शब्दार्थ कोश में क्रमशः -<blockquote>ध्रियते लोकानेन, ध्रियते लोकाः वा तथा ध्रियते लोकान् ध्रियते पुण्यात्मान् इति वा। (शब्दकोश)</blockquote>इस प्रकार व्युत्पत्ति करते हुए धृ धातु से मन प्रत्यय द्वारा धर्म शब्द की निष्पत्ति मानी है तथा इसके पुल्लिंग एवं नपुंसकलिंग दोनों प्रयोगों को स्वीकार किया है। शास्त्र शब्द का अर्थ भी उपर्युक्त शब्दकोशकार द्वारा प्रायः समान रूप में ग्रहण किया गया है। शास् धातु से ष्ट्रन् प्रत्यय के योग से शास्त्र शब्द की निष्पत्ति मानी गई है। विभिन्न विद्वानों ने इसके अर्थ क्रमशः आज्ञा, उपदेश, नियम, धार्मिक ग्रन्थ, वेद एवं धर्मशास्त्र तथा जनसामान्य के कल्याण हेतु विधि-विधान प्रतिपादित करने वाले ग्रन्थ आदि स्वीकार किए हैं। इस प्रकार धर्मशास्त्र शब्द का तात्पर्य उस व्यवस्था से है, जो मनुष्य के आचार-व्यवहार, कर्तव्य-अकर्तव्य, सामाजिक मर्यादाओं एवं आध्यात्मिक उद्देश्यों को नियंत्रित एवं निर्देशित करती है। सामान्यतः स्मृतिग्रन्थों को धर्मशास्त्र का पर्याय माना जाता है। मनुस्मृति में यह प्रतिपादित किया गया है - <blockquote>श्रुतिस्तु वेदो विज्ञेयो धर्मशास्त्रं तु वै स्मृतिः॥ (मनु स्मृति)<ref>[https://sa.wikisource.org/wiki/%E0%A4%AE%E0%A4%A8%E0%A5%81%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%AE%E0%A5%83%E0%A4%A4%E0%A4%BF%E0%A4%83/%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%A4%E0%A5%80%E0%A4%AF%E0%A5%8B%E0%A4%A7%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%AF%E0%A4%83 मनु स्मृति], अध्याय-२, श्लोक-१०।</ref></blockquote>भाषार्थ - [[Shruti (श्रुतिः)|श्रुति]] को [[Vedas (वेदाः)|वेद]] तथा [[Smrti (स्मृतिः)|स्मृति]] को धर्मशास्त्र के रूप में स्वीकार किया जाना चाहिए। इस प्रकार [[Mukhya Smritis (मुख्य स्मृतियां)|स्मृतिग्रन्थों]] को धर्मशास्त्र की संज्ञा प्रदान की गई है तथा स्मृतिकारों को धर्मशास्त्रकार कहा गया है। इस प्रकार धर्मशास्त्र का मूलाधार [[Vaidika Vangmaya (वैदिकवाङ्मयम्)|वैदिक परम्परा]] में निहित है, परन्तु उसका व्यावहारिक स्वरूप सूत्र, स्मृति, भाष्य एवं निबन्धात्मक ग्रन्थों के माध्यम से विकसित हुआ है। धर्मशास्त्र से सम्बन्धित साहित्य मुख्यतः दो वर्गों में विभक्त है - धर्मसूत्र एवं स्मृतियाँ। वैदिक अध्ययन की परम्परा में छह [[Shad Vedangas (षड्वेदाङ्गानि)|वेदाङ्गों]] का विधान किया गया, जिन्हें [[Shiksha (शिक्षा)|शिक्षा]], [[Kalpa Vedanga (कल्पवेदाङ्गम्)|कल्प]], [[Vyakarana Vedanga (व्याकरणवेदाङ्गम्)|व्याकरण]], [[Nirukta (निरुक्त)|निरुक्त]], [[Chandas (छन्दस्)|छन्द]] एवं [[Jyotisha (ज्योतिष)|ज्योतिष]] कहा जाता है - <blockquote>छन्‍द: पादौ तु वेदस्‍य, हस्‍तौ कल्‍पोऽथ पठ्यते। ज्‍योतिषामयनं चक्षुर्निरुक्‍तं श्रोत्रमुच्‍यते॥  
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भारतीय संस्कृति का मूल आधार धर्म है। विविध शास्त्रकारों ने धर्म शब्द के भिन्न-भिन्न अर्थ किये हैं। धर्मशास्त्र में सामाजिक आचार-विचार, [[Varnashrama Dharma (वर्णाश्रमधर्मः)|वर्णाश्रम-धर्म]], [[Achara (आचार)|सदाचार]], [[Niti Shastra (नीति शास्त्र)|नीति]], राजा-प्रजा के अधिकार एवं कर्तव्य तथा शासन से सम्बन्धित नियम आदि का सुव्यवस्थित विवेचन किया गया है। धर्मशास्त्र शब्द दो पदों [[Dharma (धर्मः)|धर्म]] और [[Shastra Shikshana Paddhati (शास्त्रशिक्षणपद्धतिः)|शास्त्र]] के संयोग से निर्मित है। इन दोनों पदों के शाब्दिक अर्थों का ज्ञान आवश्यक है। धर्म शब्द पुल्लिंग एवं नपुंसकलिंग दोनों रूपों में प्रयुक्त होता है। प्रसिद्ध प्राच्यविद् पण्डित तारिणीश झा ने संस्कृत शब्दार्थ कोश में क्रमशः -<blockquote>ध्रियते लोकानेन, ध्रियते लोकाः वा तथा ध्रियते लोकान् ध्रियते पुण्यात्मान् इति वा। (शब्दकोश)</blockquote>इस प्रकार व्युत्पत्ति करते हुए धृ धातु से मन प्रत्यय द्वारा धर्म शब्द की निष्पत्ति मानी है तथा इसके पुल्लिंग एवं नपुंसकलिंग दोनों प्रयोगों को स्वीकार किया है। शास्त्र शब्द का अर्थ भी उपर्युक्त शब्दकोशकार द्वारा प्रायः समान रूप में ग्रहण किया गया है। शास् धातु से ष्ट्रन् प्रत्यय के योग से शास्त्र शब्द की निष्पत्ति मानी गई है। विभिन्न विद्वानों ने इसके अर्थ क्रमशः आज्ञा, उपदेश, नियम, धार्मिक ग्रन्थ, वेद एवं धर्मशास्त्र तथा जनसामान्य के कल्याण हेतु विधि-विधान प्रतिपादित करने वाले ग्रन्थ आदि स्वीकार किए हैं। इस प्रकार धर्मशास्त्र शब्द का तात्पर्य उस व्यवस्था से है, जो मनुष्य के आचार-व्यवहार, कर्तव्य-अकर्तव्य, सामाजिक मर्यादाओं एवं आध्यात्मिक उद्देश्यों को नियंत्रित एवं निर्देशित करती है। सामान्यतः स्मृतिग्रन्थों को धर्मशास्त्र का पर्याय माना जाता है। मनुस्मृति में यह प्रतिपादित किया गया है - <blockquote>श्रुतिस्तु वेदो विज्ञेयो धर्मशास्त्रं तु वै स्मृतिः॥ (मनु स्मृति)<ref>[https://sa.wikisource.org/wiki/%E0%A4%AE%E0%A4%A8%E0%A5%81%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%AE%E0%A5%83%E0%A4%A4%E0%A4%BF%E0%A4%83/%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%A4%E0%A5%80%E0%A4%AF%E0%A5%8B%E0%A4%A7%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%AF%E0%A4%83 मनु स्मृति], अध्याय-२, श्लोक-१०।</ref></blockquote>भाषार्थ - [[Shruti (श्रुतिः)|श्रुति]] को [[Vedas (वेदाः)|वेद]] तथा [[Smrti (स्मृतिः)|स्मृति]] को धर्मशास्त्र के रूप में स्वीकार किया जाना चाहिए। इस प्रकार [[Mukhya Smritis (मुख्य स्मृतियां)|स्मृतिग्रन्थों]] को धर्मशास्त्र की संज्ञा प्रदान की गई है तथा स्मृतिकारों को धर्मशास्त्रकार कहा गया है। इस प्रकार धर्मशास्त्र का मूलाधार [[Vaidika Vangmaya (वैदिकवाङ्मयम्)|वैदिक परम्परा]] में निहित है, परन्तु उसका व्यावहारिक स्वरूप सूत्र, स्मृति, भाष्य एवं निबन्धात्मक ग्रन्थों के माध्यम से विकसित हुआ है।  
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पुराणन्यायमीमांसाधर्मशास्त्राङ्गमिश्रिताः। वेदाः स्थानानि विद्यानां धर्मस्य च चतुर्दश॥ (याज्ञवल्क्यस्मृति)
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अङ्गानि वेदाश्चत्वारो मीमांसा न्यायविस्तरः। धर्मशास्त्रं पुराणं च विद्या ह्येताश्चतुर्दश॥ (विष्णुपुराण)
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चार वेद, छह वेदाङ्ग, मीमांसा, न्याय, धर्मशास्त्र और पुराण विद्याओं के चौदह आधार माने गए हैं।
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धर्मशास्त्र से सम्बन्धित साहित्य मुख्यतः दो वर्गों में विभक्त है - धर्मसूत्र एवं स्मृतियाँ। वैदिक अध्ययन की परम्परा में छह [[Shad Vedangas (षड्वेदाङ्गानि)|वेदाङ्गों]] का विधान किया गया, जिन्हें [[Shiksha (शिक्षा)|शिक्षा]], [[Kalpa Vedanga (कल्पवेदाङ्गम्)|कल्प]], [[Vyakarana Vedanga (व्याकरणवेदाङ्गम्)|व्याकरण]], [[Nirukta (निरुक्त)|निरुक्त]], [[Chandas (छन्दस्)|छन्द]] एवं [[Jyotisha (ज्योतिष)|ज्योतिष]] कहा जाता है - <blockquote>छन्‍द: पादौ तु वेदस्‍य, हस्‍तौ कल्‍पोऽथ पठ्यते। ज्‍योतिषामयनं चक्षुर्निरुक्‍तं श्रोत्रमुच्‍यते॥  
    
शिक्षा घ्राणं तु वेदस्‍य मुखं व्‍याकरणं स्‍मृतम्। तस्‍मात्‍सांगमधीत्‍यैव ब्रह्मलोके महीयते॥ (पाणिनीय शिक्षा)<ref>[https://sa.wikisource.org/wiki/%E0%A4%AA%E0%A4%BE%E0%A4%A3%E0%A4%BF%E0%A4%A8%E0%A5%80%E0%A4%AF%E0%A4%B6%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A5%8D%E0%A4%B7%E0%A4%BE/%E0%A4%85%E0%A4%B7%E0%A5%8D%E0%A4%9F%E0%A4%AE%E0%A4%96%E0%A4%A3%E0%A5%8D%E0%A4%A1%E0%A4%83 पाणिनीय शिक्षा], खण्ड- ८, श्लोक- ४१-४२।</ref></blockquote>इनमें [[Kalpa Vedanga (कल्पवेदाङ्गम्)|कल्प वेदांग]] का विशेष स्थान है, शास्त्रीय दृष्टि से कल्प उस शास्त्र को कहते हैं, जिसमें यज्ञानुष्ठान का विधि-विधान एवं  धार्मिक संस्कारों के नियम बतलाये गये हैं। विष्णुमित्र ने कल्प का शाब्दिक अर्थ बताते हुए कहा है -  <blockquote>कल्पो वेदविहितानां कर्मणामानुपूर्व्येण कल्पनाशास्त्रम्। (ऋक्प्रातिशाख्य वृत्ति)</blockquote>'''भाषार्थ -''' वेद में विहित कर्मों को क्रमबद्ध रूप में विवेचित करने वाला शास्त्र कल्प है। कल्पसूत्रों के अन्तर्गत चार प्रकार की सूत्र रचनाएं हैं - [[Shrautasutras (श्रौतसूत्राणि)|श्रौतसूत्र]], [[Grhyasutras (गृह्यसूत्राणि)|गृह्यसूत्र]], [[Dharmasutras (धर्मसूत्राणि)|धर्मसूत्र]] तथा [[Shulbasutras (शुल्बसूत्राणि)|शुल्बसूत्र]]। इनका संक्षिप्त विवेचन निम्नलिखित प्रकार से किया जा सकता है -
 
शिक्षा घ्राणं तु वेदस्‍य मुखं व्‍याकरणं स्‍मृतम्। तस्‍मात्‍सांगमधीत्‍यैव ब्रह्मलोके महीयते॥ (पाणिनीय शिक्षा)<ref>[https://sa.wikisource.org/wiki/%E0%A4%AA%E0%A4%BE%E0%A4%A3%E0%A4%BF%E0%A4%A8%E0%A5%80%E0%A4%AF%E0%A4%B6%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A5%8D%E0%A4%B7%E0%A4%BE/%E0%A4%85%E0%A4%B7%E0%A5%8D%E0%A4%9F%E0%A4%AE%E0%A4%96%E0%A4%A3%E0%A5%8D%E0%A4%A1%E0%A4%83 पाणिनीय शिक्षा], खण्ड- ८, श्लोक- ४१-४२।</ref></blockquote>इनमें [[Kalpa Vedanga (कल्पवेदाङ्गम्)|कल्प वेदांग]] का विशेष स्थान है, शास्त्रीय दृष्टि से कल्प उस शास्त्र को कहते हैं, जिसमें यज्ञानुष्ठान का विधि-विधान एवं  धार्मिक संस्कारों के नियम बतलाये गये हैं। विष्णुमित्र ने कल्प का शाब्दिक अर्थ बताते हुए कहा है -  <blockquote>कल्पो वेदविहितानां कर्मणामानुपूर्व्येण कल्पनाशास्त्रम्। (ऋक्प्रातिशाख्य वृत्ति)</blockquote>'''भाषार्थ -''' वेद में विहित कर्मों को क्रमबद्ध रूप में विवेचित करने वाला शास्त्र कल्प है। कल्पसूत्रों के अन्तर्गत चार प्रकार की सूत्र रचनाएं हैं - [[Shrautasutras (श्रौतसूत्राणि)|श्रौतसूत्र]], [[Grhyasutras (गृह्यसूत्राणि)|गृह्यसूत्र]], [[Dharmasutras (धर्मसूत्राणि)|धर्मसूत्र]] तथा [[Shulbasutras (शुल्बसूत्राणि)|शुल्बसूत्र]]। इनका संक्षिप्त विवेचन निम्नलिखित प्रकार से किया जा सकता है -
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*बौधायन धर्मसूत्र
 
*बौधायन धर्मसूत्र
 
*आपस्तम्ब धर्मसूत्र
 
*आपस्तम्ब धर्मसूत्र
* वसिष्ठ धर्मसूत्र
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*वसिष्ठ धर्मसूत्र
    
इनके अतिरिक्त तीन धर्मसूत्रों का और उल्लेख मिलता है- विष्णुधर्मसूत्र, हिरण्यकेशि धर्मसूत्र और वैखानसधर्मसूत्र। इनमें हिरण्यकेशि धर्मसूत्र आपस्तम्ब से ही अधिकांशतः मिलता-जुलता है। वैखानस मुख्यरूप से संन्यास व वानप्रस्थ आश्रमों के अध्ययन के लिए उपयोगी है। अतः अध्ययन की दृष्टि से केवल पाँच धर्मसूत्र ही उपयोगी है- गौतम, आपस्तम्ब, बौधायन, वसिष्ठ और विष्णु धर्मसूत्र।
 
इनके अतिरिक्त तीन धर्मसूत्रों का और उल्लेख मिलता है- विष्णुधर्मसूत्र, हिरण्यकेशि धर्मसूत्र और वैखानसधर्मसूत्र। इनमें हिरण्यकेशि धर्मसूत्र आपस्तम्ब से ही अधिकांशतः मिलता-जुलता है। वैखानस मुख्यरूप से संन्यास व वानप्रस्थ आश्रमों के अध्ययन के लिए उपयोगी है। अतः अध्ययन की दृष्टि से केवल पाँच धर्मसूत्र ही उपयोगी है- गौतम, आपस्तम्ब, बौधायन, वसिष्ठ और विष्णु धर्मसूत्र।
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!धर्मसूत्र
 
!धर्मसूत्र
 
!विषय-वस्तु
 
!विषय-वस्तु
! भाष्य एवं टीकाएं
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!भाष्य एवं टीकाएं
 
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! rowspan="2" |ऋग्वेद
 
! rowspan="2" |ऋग्वेद
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|कौषीतकि
 
|कौषीतकि
| विष्णु
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|विष्णु
 
|१०० अध्याय
 
|१०० अध्याय
 
|नन्द पण्डित (वैजयन्ती व्याख्या), भारुचि
 
|नन्द पण्डित (वैजयन्ती व्याख्या), भारुचि
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|महादेव दीक्षित (वैजयन्ती)
 
|महादेव दीक्षित (वैजयन्ती)
 
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|वैखानस धर्मसूत्र
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| वैखानस धर्मसूत्र
 
|वैखानस स्मार्तसूत्र के 3 प्रश्न (51 काण्ड एवं 365 सूत्र)
 
|वैखानस स्मार्तसूत्र के 3 प्रश्न (51 काण्ड एवं 365 सूत्र)
 
|कोई भाष्य उपलब्ध नहीं
 
|कोई भाष्य उपलब्ध नहीं
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मेधातिथि द्वारा रचित मनुभाष्य (मनुस्मृति पर भाष्य) तथा याज्ञवल्क्यस्मृति पर विज्ञानेश्वर कृत मिताक्षरा टीका आदि ग्रंथों को भी व्यापक अर्थ में धर्मशास्त्रीय साहित्य की श्रेणी में सम्मिलित किया जाता है। यद्यपि ये मूल स्मृतियाँ नहीं हैं, तथापि इनके माध्यम से धर्मशास्त्रीय सिद्धांतों का विस्तृत विवेचन, व्याख्या तथा व्यवहारिक प्रतिपादन किया गया है, अतः इनका स्थान धर्मशास्त्र-परम्परा में अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। क्षेत्रीय दृष्टि से भी धर्मशास्त्रीय निबन्ध-साहित्य का विकास उल्लेखनीय है -   
 
मेधातिथि द्वारा रचित मनुभाष्य (मनुस्मृति पर भाष्य) तथा याज्ञवल्क्यस्मृति पर विज्ञानेश्वर कृत मिताक्षरा टीका आदि ग्रंथों को भी व्यापक अर्थ में धर्मशास्त्रीय साहित्य की श्रेणी में सम्मिलित किया जाता है। यद्यपि ये मूल स्मृतियाँ नहीं हैं, तथापि इनके माध्यम से धर्मशास्त्रीय सिद्धांतों का विस्तृत विवेचन, व्याख्या तथा व्यवहारिक प्रतिपादन किया गया है, अतः इनका स्थान धर्मशास्त्र-परम्परा में अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। क्षेत्रीय दृष्टि से भी धर्मशास्त्रीय निबन्ध-साहित्य का विकास उल्लेखनीय है -   
* उत्तर भारत: काशीनाथ उपाध्याय का कार्य - धर्मसिंधु।
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*उत्तर भारत: काशीनाथ उपाध्याय का कार्य - धर्मसिंधु।
 
*महाराष्ट्र: विज्ञानेश्वर की मिताक्षरा टीका और कमलाकर भट्ट का निर्णयसिंधु।
 
*महाराष्ट्र: विज्ञानेश्वर की मिताक्षरा टीका और कमलाकर भट्ट का निर्णयसिंधु।
 
*दक्षिण भारत: वैद्यनाथ दीक्षित का वैद्यनाथ-दीक्षितीयम इसको  स्मृतिमुक्ताफल ग्रंथ के रूप में भी जानते हैं।
 
*दक्षिण भारत: वैद्यनाथ दीक्षित का वैद्यनाथ-दीक्षितीयम इसको  स्मृतिमुक्ताफल ग्रंथ के रूप में भी जानते हैं।
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कात्यायनकृताश्चैव तथा प्राचेतसन्मुनेः। श्रुताः ह्येते भवत्प्रोक्ताः श्रुत्यर्थं मे न विस्मृताः॥ (पराशर स्मृति १. १२-१५)<ref name=":2" /></blockquote>इसका आशय यह है कि व्यास अपने पिता से निवेदन करते हैं कि वे उन्हें पुनः धर्मविषयक उपदेश प्रदान करें, यद्यपि उन्होंने मनु, वसिष्ठ, कश्यप, गर्ग, गौतम, उशना, अत्रि, विष्णु, संवर्त, अंगिरस, शातातप, हारीत, याज्ञवल्क्य, आपस्तम्ब, शंख, लिखित, कात्यायन, प्रचेता तथा स्वयं पिता द्वारा प्रतिपादित धर्म का श्रवण कर लिया है। इससे यह स्पष्ट होता है कि धर्मशास्त्र परम्परा एक सतत और बहुविध विचारधारा वाली परम्परा रही है, जिसमें विभिन्न आचार्यों ने समय, समाज और युग के अनुसार धर्म का विवेचन किया है। याज्ञवल्क्य स्मृति में धर्मशास्त्रकारों का उल्लेख इस प्रकार मिलता है - <blockquote>मन्वत्रिविष्णुहारीतयाज्ञवल्क्योशनांऽगिराः। यमापस्तम्बसंवर्ताः कात्यायनबृहस्पती॥
 
कात्यायनकृताश्चैव तथा प्राचेतसन्मुनेः। श्रुताः ह्येते भवत्प्रोक्ताः श्रुत्यर्थं मे न विस्मृताः॥ (पराशर स्मृति १. १२-१५)<ref name=":2" /></blockquote>इसका आशय यह है कि व्यास अपने पिता से निवेदन करते हैं कि वे उन्हें पुनः धर्मविषयक उपदेश प्रदान करें, यद्यपि उन्होंने मनु, वसिष्ठ, कश्यप, गर्ग, गौतम, उशना, अत्रि, विष्णु, संवर्त, अंगिरस, शातातप, हारीत, याज्ञवल्क्य, आपस्तम्ब, शंख, लिखित, कात्यायन, प्रचेता तथा स्वयं पिता द्वारा प्रतिपादित धर्म का श्रवण कर लिया है। इससे यह स्पष्ट होता है कि धर्मशास्त्र परम्परा एक सतत और बहुविध विचारधारा वाली परम्परा रही है, जिसमें विभिन्न आचार्यों ने समय, समाज और युग के अनुसार धर्म का विवेचन किया है। याज्ञवल्क्य स्मृति में धर्मशास्त्रकारों का उल्लेख इस प्रकार मिलता है - <blockquote>मन्वत्रिविष्णुहारीतयाज्ञवल्क्योशनांऽगिराः। यमापस्तम्बसंवर्ताः कात्यायनबृहस्पती॥
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पाराशर्यव्यासशंखलिखितौ दक्षगौतमौ। शातातपो वसिष्ठश्च धर्मशास्त्रप्रयोजकाः॥ (याज्ञवल्क्य स्मृति)<ref>[https://sa.wikisource.org/wiki/%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%9C%E0%A5%8D%E0%A4%9E%E0%A4%B5%E0%A4%B2%E0%A5%8D%E0%A4%95%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%AE%E0%A5%83%E0%A4%A4%E0%A4%BF%E0%A4%83/%E0%A4%86%E0%A4%9A%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%A7%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%AF%E0%A4%83/%E0%A4%89%E0%A4%AA%E0%A5%8B%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%98%E0%A4%BE%E0%A4%A4%E0%A4%AA%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%95%E0%A4%B0%E0%A4%A3%E0%A4%AE%E0%A5%8D याज्ञवल्क्यस्मृति], आचार अध्याय, उपोद्घातप्रकरण, श्लोक ४-५।</ref></blockquote>इन श्लोकों के अनुसार मनु, अत्रि, विष्णु, हारीत, याज्ञवल्क्य, उशना, अंगिरा, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, पाराशर, व्यास, शंख, लिखित, दक्ष, गौतम, शातातप और वसिष्ठ - ये सभी धर्मशास्त्रों के प्रवर्तक (प्रणेता) माने गए हैं। यहाँ पाराशर और व्यास जैसे उत्तरवर्ती काल के मुनियों का उल्लेख यह स्पष्ट करता है कि धर्मशास्त्रकारों में कोई कठोर कालक्रम (पौर्वापर्य) नहीं है। जैसे मनु ने धर्म का प्रतिपादन किया, वैसे ही अन्य ऋषियों ने भी अपने-अपने दृष्टिकोण से उसी धर्म को विवेचित किया।
 
पाराशर्यव्यासशंखलिखितौ दक्षगौतमौ। शातातपो वसिष्ठश्च धर्मशास्त्रप्रयोजकाः॥ (याज्ञवल्क्य स्मृति)<ref>[https://sa.wikisource.org/wiki/%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%9C%E0%A5%8D%E0%A4%9E%E0%A4%B5%E0%A4%B2%E0%A5%8D%E0%A4%95%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%AE%E0%A5%83%E0%A4%A4%E0%A4%BF%E0%A4%83/%E0%A4%86%E0%A4%9A%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%A7%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%AF%E0%A4%83/%E0%A4%89%E0%A4%AA%E0%A5%8B%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%98%E0%A4%BE%E0%A4%A4%E0%A4%AA%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%95%E0%A4%B0%E0%A4%A3%E0%A4%AE%E0%A5%8D याज्ञवल्क्यस्मृति], आचार अध्याय, उपोद्घातप्रकरण, श्लोक ४-५।</ref></blockquote>इन श्लोकों के अनुसार मनु, अत्रि, विष्णु, हारीत, याज्ञवल्क्य, उशना, अंगिरा, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, पाराशर, व्यास, शंख, लिखित, दक्ष, गौतम, शातातप और वसिष्ठ - ये सभी धर्मशास्त्रों के प्रवर्तक (प्रणेता) माने गए हैं। यहाँ पाराशर और व्यास जैसे उत्तरवर्ती काल के मुनियों का उल्लेख यह स्पष्ट करता है कि धर्मशास्त्रकारों में कोई कठोर कालक्रम (पौर्वापर्य) नहीं है। जैसे मनु ने धर्म का प्रतिपादन किया, वैसे ही अन्य ऋषियों ने भी अपने-अपने दृष्टिकोण से उसी धर्म को विवेचित किया।
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याज्ञवल्क्य ने व्यवहार-निर्णय के सम्बन्ध में यह नियम दिया है कि यदि दो स्मृतियों में निर्णय के सम्बन्ध में परस्पर विरोध हो तो लोक व्यवहार अर्थात् युक्ति द्वारा निर्धारित परम्परानुसार निर्णय किया जाये, क्योंकि लोक व्यवहार द्वारा किया गया निर्णय सर्वमान्य होता है - <blockquote>स्मृत्योर्विरोधे न्यायस्तु बलवान् व्यवहारतः। (याज्ञवल्क्य स्मृति)</blockquote>उपर्युक्त निर्णयों को ध्यान में रखते हुए बृहस्पति ने अपना विशिष्ट नियम दिया है कि केवल शास्त्रों के आधार पर निर्णय नहीं करना चाहिए, अपितु युक्ति अर्थात् तर्क आदि के द्वारा निर्णय करना चाहिए, क्योंकि युक्तिहीन निर्णय से धर्म की हानि होती है -<blockquote>केवलं शास्त्रमाश्रित्य न कर्तव्यो हि निर्णयः। युक्तिहीनं विचारस्तु धर्महानिं प्रजायते॥ (याज्ञवल्क्य स्मृति)</blockquote>व्यवहार सम्बन्धी नियमों को स्पष्ट करते हुए व्यवहार मयूख में कहा गया है कि देश, जाति तथा कुलों में जो नियम पहले से चले आ रहे हैं, उनका उसी प्रकार पालन करना चाहिए। यही व्यवहार का नियम है - <blockquote>देशजातिकुलानां च ये धर्माः प्रवर्तिताः। तथैव ते पालनीयाः प्रजास्वप्रतिवर्तिताः॥ (याज्ञवल्क्य स्मृति)</blockquote>उक्त परम्परा के विपरीत निर्णय करने पर प्रजा में आक्रोश उत्पन्न होता है और न्यायाधीश अपयश का भागी होता है।<ref>अनुसंधित्सु- स्वाति सिंह, [https://shodhganga.inflibnet.ac.in/handle/10603/277434 याज्ञवल्क्य एवं नारदीय स्मृति के परिप्रेक्ष्य में आधुनिक व्यवहार पद्धति का समीक्षात्मक अध्ययन], सन् २०००, शोध केन्द्र - सी०एस०एन० स्नातकोत्तर महाविद्यालय, हरदोई (पृ० ४१)।</ref>
    
'''पाराशर स्मृति में युगानुरूप धर्म-विकास'''
 
'''पाराशर स्मृति में युगानुरूप धर्म-विकास'''
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'''कलियुग में दान॥ Charity as Ethical Core -''' कलियुग में दान (Charitable Giving) को ही सर्वोपरि धर्म माना गया। इसका कारण मानव की अल्पायु (Short-lived Nature), मन्दबुद्धिता (Intellectual Weakness) एवं अनुत्साह (Lethargy) है। अतः सरलतम साधन (Simplified Spiritual Method) के रूप में दान को प्रतिष्ठित किया गया। इस संदर्भ में बृहदारण्यक उपनिषद् का प्रसिद्ध वाक्य -  “दत्त, दयध्वं, दम्यत्” दान, दया और दम का त्रिविध उपदेश देता है।
 
'''कलियुग में दान॥ Charity as Ethical Core -''' कलियुग में दान (Charitable Giving) को ही सर्वोपरि धर्म माना गया। इसका कारण मानव की अल्पायु (Short-lived Nature), मन्दबुद्धिता (Intellectual Weakness) एवं अनुत्साह (Lethargy) है। अतः सरलतम साधन (Simplified Spiritual Method) के रूप में दान को प्रतिष्ठित किया गया। इस संदर्भ में बृहदारण्यक उपनिषद् का प्रसिद्ध वाक्य -  “दत्त, दयध्वं, दम्यत्” दान, दया और दम का त्रिविध उपदेश देता है।
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भर्तृहरि ने भी कहा - “दानेन पाणिर्नतु कंकणेन” — अर्थात् दान ही कर-कमलों की वास्तविक शोभा (True Ornamentation) है।
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भर्तृहरि ने भी कहा - <nowiki>''</nowiki>दानेन पाणिर्नतु कंकणेन<nowiki>''</nowiki> अर्थात् दान ही कर-कमलों की वास्तविक शोभा है। धर्मनियन्ताओं का युगानुसार परिवर्तन आदि विषयों का पाराशर स्मृति में उल्लेख इस प्रकार है -<blockquote>कृते तु मानवा धर्मास्त्रेतायां गौतमाः स्मृताः। द्वापरे शङ्खलिखितौ कलौ पाराशराः स्मृताः॥ (पाराशर स्मृति-24)</blockquote>सत्ययुग में मनु का विधान प्रचलित था, त्रेता में गौतम के नियम मान्य हुए, द्वापर में शंख और लिखित का अधिकार स्थापित हुआ, कलियुग में महर्षि पराशर स्वयं धर्मनियन्ता माने गये। यह परिवर्तन धर्म की ऐतिहासिकता (Historicity of Dharma) को सूचित करता है। धर्म कोई स्थिर तत्त्व नहीं, अपितु काल-सापेक्ष (Time-conditioned) व्यवस्था है।
 
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'''धर्मनियन्ताओं का युगानुसार परिवर्तन (Shift of Normative Authorities)'''
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श्लोक 24 में उल्लेख है—<blockquote>कृते तु मानवा धर्मास्त्रेतायां गौतमाः स्मृताः । द्वापरे शङ्खलिखिती कली पाराशराः स्मृताः॥ (पाराशर स्मृति-24)</blockquote>सत्ययुग में मनु के विधान (Manava Dharma) प्रचलित थे।
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त्रेता में गौतम के नियम मान्य हुए।
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द्वापर में शंख और लिखित का अधिकार स्थापित हुआ।
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कलियुग में महर्षि पराशर स्वयं धर्मनियन्ता (Normative Authority) माने गये।
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यह परिवर्तन धर्म की ऐतिहासिकता (Historicity of Dharma) को सूचित करता है। धर्म कोई स्थिर (Static) तत्त्व नहीं, अपितु काल-सापेक्ष (Time-conditioned) व्यवस्था है।
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'''दण्ड-व्यवस्था में शिथिलीकरण (Penal Relaxation and Reformative Justice)'''<blockquote>त्यजेद्देशं कृतयुगे त्रेतायां ग्राममुत्सृजेत् । द्वापरे कुलमेकं तु कत्तारं च कलौ युगे ॥ (पाराशर स्मृति-25)</blockquote>श्लोक 25 के अनुसार -
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'''दण्ड-व्यवस्था में शिथिलीकरण॥ Penal Relaxation and Reformative Justice'''
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* कृतयुग में देश-निर्वासन (Exile from Nation)
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त्यजेद्देशं कृतयुगे त्रेतायां ग्राममुत्सृजेत्। द्वापरे कुलमेकं तु कर्त्तारं च कलौ युगे॥ (पाराशर स्मृति-25)
* त्रेता में ग्राम-निर्वासन (Village Banishment)
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*कृतयुग में देश-निर्वासन (Exile from Nation)
* द्वापर में कुल-बहिष्कार (Family Ostracism)
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*त्रेता में ग्राम-निर्वासन (Village Banishment)
* कलियुग में प्रायश्चित्त (Expiatory Reform)
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*द्वापर में कुल-बहिष्कार (Family Ostracism)
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*कलियुग में प्रायश्चित्त (Expiatory Reform)
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यहाँ दण्ड-नीति (Penology) में सुधारात्मक दृष्टिकोण (Reformative Approach) स्पष्ट होता है। कलियुग में अपराधी को पुनर्वास (Rehabilitation) का अवसर प्रदान किया गया है।<blockquote>कृते सम्भाषणादेव त्रेतायां स्पर्शनेन च। द्वापरे त्वत्रमादाय कलौ पतति कर्मणा ॥ (पाराशर स्मृति-26)</blockquote>श्लोक 26 में पापी के साथ संसर्ग (Association with Sinner) के नियमों का विवेचन है -  
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यहाँ दण्ड-नीति (Penology) में सुधारात्मक दृष्टिकोण (Reformative Approach) स्पष्ट होता है। कलियुग में अपराधी को पुनर्वास (Rehabilitation) का अवसर प्रदान किया गया है - <blockquote>कृते सम्भाषणादेव त्रेतायां स्पर्शनेन च। द्वापरे त्वत्रमादाय कलौ पतति कर्मणा॥ (पाराशर स्मृति-26)</blockquote>उपर्युक्त श्लोक में पापी के साथ संसर्ग (Association with Sinner) के नियमों का विवेचन है -  
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* कृतयुग: सम्भाषण मात्र से पतन
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*कृतयुग - सम्भाषण मात्र से पतन
* त्रेता: स्पर्श से पतन
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* त्रेता - स्पर्श से पतन
* द्वापर: अन्नग्रहण से पतन
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*द्वापर - अन्नग्रहण से पतन
* कलियुग: केवल स्वयं के कर्म से पतन
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*कलियुग - केवल स्वयं के कर्म से पतन
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यह नैतिक उत्तरदायित्व (Moral Accountability) की व्यक्तिगतता (Individualization of Responsibility) को सूचित करता है। धर्म का केन्द्र बाह्य संसर्ग से हटकर आन्तरिक कर्तृत्व (Internal Agency) पर आ गया। पाराशर का यह प्रतिपादन स्पष्ट करता है कि -  
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यह नैतिक उत्तरदायित्व की व्यक्तिगतता (Individualization of Responsibility) को सूचित करता है। धर्म का केन्द्र बाह्य संसर्ग से हटकर आन्तरिक कर्तृत्व (Internal Agency) पर आ गया। पाराशर का यह प्रतिपादन स्पष्ट करता है कि -  
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* धर्म स्थिर न होकर परिस्थितिजन्य है।
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*धर्म स्थिर न होकर परिस्थितिजन्य है।
* कठोरता के स्थान पर लोचशीलता को वरण किया गया।
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*दण्ड से अधिक प्रायश्चित्त (Atonement) को महत्त्व दिया गया।
* दण्ड से अधिक प्रायश्चित्त (Atonement) को महत्त्व दिया गया।
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*बाह्याचार (External Conduct) से अधिक आन्तरिक नैतिकता (Inner Morality) को प्रधानता मिली।
* बाह्याचार (External Conduct) से अधिक आन्तरिक नैतिकता (Inner Morality) को प्रधानता मिली।
      
अतः पाराशर-स्मृति में धर्म का स्वरूप विकासमान (Evolutionary), अनुकूलनीय (Adaptive) एवं समाजोपयोगी (Socially Relevant) है। युगानुसार धर्म के साधन, दण्ड-विधान, सामाजिक मर्यादा तथा आध्यात्मिक प्रभाव की यह क्रमिक शिथिलता (Gradual Relaxation) भारतीय धर्मशास्त्र की व्यावहारिक बुद्धिमत्ता (Practical Wisdom) को प्रमाणित करती है।
 
अतः पाराशर-स्मृति में धर्म का स्वरूप विकासमान (Evolutionary), अनुकूलनीय (Adaptive) एवं समाजोपयोगी (Socially Relevant) है। युगानुसार धर्म के साधन, दण्ड-विधान, सामाजिक मर्यादा तथा आध्यात्मिक प्रभाव की यह क्रमिक शिथिलता (Gradual Relaxation) भारतीय धर्मशास्त्र की व्यावहारिक बुद्धिमत्ता (Practical Wisdom) को प्रमाणित करती है।
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==निष्कर्ष॥ Conclusion==
 
==निष्कर्ष॥ Conclusion==
धर्मशास्त्रों में युगसापेक्ष एवं आधुनिक सन्दर्भों से सामंजस्य रखने वाले विषयों जैसे - स्त्री-अधिकार, हिन्दू विधि, संस्कार-प्रणाली, नैतिक शिक्षा, पर्यावरण-चिन्तन, मानवाधिकार, राजधर्म, दण्ड-व्यवस्था तथा अपराध-विचार पर अध्ययन-अध्यापन सम्पन्न होता है। इसके परिणामस्वरूप सामाजिक विधि-व्यवस्थाओं के उन्नत दार्शनिक आयामों का बोध होता है तथा मानवीय मूल्यों के विकास के साथ आत्मिक उन्नयन भी सुनिश्चित होता है।
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धर्मशास्त्रों में युगसापेक्ष एवं आधुनिक सन्दर्भों से सामंजस्य रखने वाले विषयों जैसे- स्त्री-अधिकार, हिन्दू विधि, संस्कार-प्रणाली, नैतिक शिक्षा, पर्यावरण-चिन्तन, मानवाधिकार, राजधर्म, दण्ड-व्यवस्था तथा अपराध-विचार पर अध्ययन-अध्यापन सम्पन्न होता है। इसके परिणामस्वरूप सामाजिक विधि-व्यवस्थाओं के उन्नत दार्शनिक आयामों का बोध होता है तथा मानवीय मूल्यों के विकास के साथ आत्मिक उन्नयन भी सुनिश्चित होता है।
    
धर्मसूत्र प्राचीनतम ग्रन्थ हैं, जिनमें राजधर्म के सिद्धान्तों का क्रमबद्ध एवं संहितात्मक प्रतिपादन किया गया है। इनमें राजा के कर्तव्य, चतुर्वर्ण व्यवस्था, कर-नियम, सम्पत्ति-विधान आदि विषयों का विस्तृत विवेचन उपलब्ध होता है। राजा तथा राज्य से सम्बन्धित विषयों को धर्मसूत्रों के अन्तर्गत विशेष रूप से सम्मिलित किया गया है और प्रत्येक धर्मसूत्र में किसी न किसी रूप में राजधर्म की चर्चा अवश्य की गई है। क्योंकि धर्मसूत्रों का प्रधान विषय धर्म है, अतः धर्म की परिधि में राजा तथा राज्य-व्यवस्था के सिद्धान्त भी अन्तर्निहित माने गए हैं। विशेषतः विष्णु धर्मसूत्र में राजदण्ड, न्यायिक व्यवस्था एवं प्रशासन को राजधर्म का अनिवार्य अंग स्वीकार किया गया है। इस प्रकार न्याय-सम्बन्धी सिद्धान्तों का सुव्यवस्थित प्रतिपादन धर्मसूत्रों के माध्यम से किया गया है।
 
धर्मसूत्र प्राचीनतम ग्रन्थ हैं, जिनमें राजधर्म के सिद्धान्तों का क्रमबद्ध एवं संहितात्मक प्रतिपादन किया गया है। इनमें राजा के कर्तव्य, चतुर्वर्ण व्यवस्था, कर-नियम, सम्पत्ति-विधान आदि विषयों का विस्तृत विवेचन उपलब्ध होता है। राजा तथा राज्य से सम्बन्धित विषयों को धर्मसूत्रों के अन्तर्गत विशेष रूप से सम्मिलित किया गया है और प्रत्येक धर्मसूत्र में किसी न किसी रूप में राजधर्म की चर्चा अवश्य की गई है। क्योंकि धर्मसूत्रों का प्रधान विषय धर्म है, अतः धर्म की परिधि में राजा तथा राज्य-व्यवस्था के सिद्धान्त भी अन्तर्निहित माने गए हैं। विशेषतः विष्णु धर्मसूत्र में राजदण्ड, न्यायिक व्यवस्था एवं प्रशासन को राजधर्म का अनिवार्य अंग स्वीकार किया गया है। इस प्रकार न्याय-सम्बन्धी सिद्धान्तों का सुव्यवस्थित प्रतिपादन धर्मसूत्रों के माध्यम से किया गया है।
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