Changes

Jump to navigation Jump to search
m
no edit summary
Line 25: Line 25:     
===धर्मसूत्रों का स्वरूप===
 
===धर्मसूत्रों का स्वरूप===
 +
{{Main|Dharmasutras_(धर्मसूत्राणि)}}
 
धर्मशास्त्रीय साहित्य का विकास मुख्यतः धर्मसूत्रों से प्रारम्भ होकर स्मृति एवं निबन्ध ग्रन्थों तक विस्तृत है। बौधायन, आपस्तम्ब, गौतम एवं वसिष्ठ आदि धर्मसूत्रकारों ने धर्मसूत्रों के माध्यम से सामाजिक आचारों एवं विधिक मान्यताओं को संक्षेप में प्रस्तुत किया। इसके पश्चात मनु, याज्ञवल्क्य, नारद, पराशर, बृहस्पति आदि स्मृतिकारों ने धर्म के विविध पक्षों राजधर्म, व्यवहार, दण्ड, उत्तराधिकार, स्त्री-अधिकार एवं सामाजिक न्याय का विस्तृत विवेचन किया।<ref>शोधार्थिनी- रोली गुप्ता, [https://shodhganga.inflibnet.ac.in/handle/10603/264777 बौधायन धर्मसूत्र : एक समीक्षात्मक अध्ययन] (२०१३), छत्रपति शाहू जी महाराज विश्वविद्यालय, कानपुर (पृ० ७-८)।</ref>
 
धर्मशास्त्रीय साहित्य का विकास मुख्यतः धर्मसूत्रों से प्रारम्भ होकर स्मृति एवं निबन्ध ग्रन्थों तक विस्तृत है। बौधायन, आपस्तम्ब, गौतम एवं वसिष्ठ आदि धर्मसूत्रकारों ने धर्मसूत्रों के माध्यम से सामाजिक आचारों एवं विधिक मान्यताओं को संक्षेप में प्रस्तुत किया। इसके पश्चात मनु, याज्ञवल्क्य, नारद, पराशर, बृहस्पति आदि स्मृतिकारों ने धर्म के विविध पक्षों राजधर्म, व्यवहार, दण्ड, उत्तराधिकार, स्त्री-अधिकार एवं सामाजिक न्याय का विस्तृत विवेचन किया।<ref>शोधार्थिनी- रोली गुप्ता, [https://shodhganga.inflibnet.ac.in/handle/10603/264777 बौधायन धर्मसूत्र : एक समीक्षात्मक अध्ययन] (२०१३), छत्रपति शाहू जी महाराज विश्वविद्यालय, कानपुर (पृ० ७-८)।</ref>
   Line 43: Line 44:  
!धर्मसूत्र
 
!धर्मसूत्र
 
!विषय-वस्तु
 
!विषय-वस्तु
!भाष्य एवं टीकाएं
+
! भाष्य एवं टीकाएं
 
|-
 
|-
 
! rowspan="2" |ऋग्वेद
 
! rowspan="2" |ऋग्वेद
Line 52: Line 53:  
|-
 
|-
 
|कौषीतकि
 
|कौषीतकि
|विष्णु
+
| विष्णु
 
|१०० अध्याय
 
|१०० अध्याय
 
|नन्द पण्डित (वैजयन्ती व्याख्या), भारुचि
 
|नन्द पण्डित (वैजयन्ती व्याख्या), भारुचि
Line 79: Line 80:  
|-
 
|-
 
|वैखानस धर्मसूत्र
 
|वैखानस धर्मसूत्र
| वैखानस स्मार्तसूत्र के 3 प्रश्न (51 काण्ड एवं 365 सूत्र)
+
|वैखानस स्मार्तसूत्र के 3 प्रश्न (51 काण्ड एवं 365 सूत्र)
 
|कोई भाष्य उपलब्ध नहीं
 
|कोई भाष्य उपलब्ध नहीं
 
|-
 
|-
Line 94: Line 95:     
===स्मृति ग्रंथो की अवधारणा===
 
===स्मृति ग्रंथो की अवधारणा===
 +
{{Main|Smrti_(स्मृतिः)}}
 
मनु का वचन 'धर्मशास्त्रं तु वै स्मृतिः' इस तथ्य को स्पष्ट रूप से स्थापित करता है कि धर्मशास्त्र मूलतः स्मृति-परम्परा से सम्बद्ध हैं। अर्थात् जितने भी धर्मशास्त्र उपलब्ध हैं, वे सभी स्मृति-ग्रन्थों के अन्तर्गत आते हैं। इन धर्मशास्त्रों के कर्त्ताओं एवं उनकी परम्परा का विवेचन पराशर स्मृति में प्राप्त होता है। पराशर मुनि कहते हैं - <blockquote>कल्पे कल्पे क्षयोत्पत्त्या ब्रह्मविष्णुमहेश्वराः।  श्रुतिस्मृतिसमाचारनिर्णेतारश्च सर्वदा॥ (पराशर स्मृति 1.20)<ref name=":2">डॉ० रामचन्द्र वर्मा शास्त्री, [https://archive.org/details/ParasharSmritiDr.RamChandraShastri/page/16/mode/1up पाराशर स्मृति]-हिन्दी टीका सहित,  अध्याय- १, श्लोक- २०, डायनेमिक पब्लिकेशंस (इण्डिया) लिमिटेड, मेरठ (पृ० २०)।</ref></blockquote>इस श्लोक पर स्मृतिमुक्ताफल में टीका करते हुए कहा गया है कि सृष्टि और प्रलय का यह क्रम प्रत्येक महाकल्प एवं अवांतर कल्प में निरन्तर चलता रहता है। ब्रह्मा, विष्णु और महेश जैसे देवता महाकल्प के अन्त में लीन होते हैं और नये महाकल्प के प्रारम्भ में पुनः प्रकट होते हैं। स्मृतिमुक्ताफल में टिप्पणी प्राप्त होती है -  <blockquote>क्षयसहिता उत्पत्तिः क्षयोत्पत्तिः। तयोपलाक्षता भवंति कल्पे कल्पे महाकल्पे अवांतरकल्पे च। ब्रह्मविष्णुमहेश्वरा महाकल्पावसाने क्षीयंते महाकल्पादावुत्पद्यंते। एवमवांतरकल्पानामवसाने प्रारंभे च स्मृत्यादीनां निर्णेतारो मन्वादयः क्षयोत्पत्तिभ्यामुपलक्ष्यंते। चकारेणानुक्तो धर्मः समुच्चीयते। सर्वदेत्यनेन सृष्टिसंहारप्रवाहस्यानादित्वमनंतत्वं च दर्शितम्। स एव॥ (स्मृति मुक्ताफलम् १।२१)<ref name=":0">वैद्यनाथ दीक्षितीय, [https://ia801409.us.archive.org/9/items/in.ernet.dli.2015.486485/2015.486485.Smrtimuktaphalama-part-1_text.pdf स्मृतिमुक्ताफलम्], वर्णाश्रमधर्मकाण्डम् (1937), विश्वनाथ जगन्नाथ घारपुरे (पृ० ११)।</ref></blockquote>   
 
मनु का वचन 'धर्मशास्त्रं तु वै स्मृतिः' इस तथ्य को स्पष्ट रूप से स्थापित करता है कि धर्मशास्त्र मूलतः स्मृति-परम्परा से सम्बद्ध हैं। अर्थात् जितने भी धर्मशास्त्र उपलब्ध हैं, वे सभी स्मृति-ग्रन्थों के अन्तर्गत आते हैं। इन धर्मशास्त्रों के कर्त्ताओं एवं उनकी परम्परा का विवेचन पराशर स्मृति में प्राप्त होता है। पराशर मुनि कहते हैं - <blockquote>कल्पे कल्पे क्षयोत्पत्त्या ब्रह्मविष्णुमहेश्वराः।  श्रुतिस्मृतिसमाचारनिर्णेतारश्च सर्वदा॥ (पराशर स्मृति 1.20)<ref name=":2">डॉ० रामचन्द्र वर्मा शास्त्री, [https://archive.org/details/ParasharSmritiDr.RamChandraShastri/page/16/mode/1up पाराशर स्मृति]-हिन्दी टीका सहित,  अध्याय- १, श्लोक- २०, डायनेमिक पब्लिकेशंस (इण्डिया) लिमिटेड, मेरठ (पृ० २०)।</ref></blockquote>इस श्लोक पर स्मृतिमुक्ताफल में टीका करते हुए कहा गया है कि सृष्टि और प्रलय का यह क्रम प्रत्येक महाकल्प एवं अवांतर कल्प में निरन्तर चलता रहता है। ब्रह्मा, विष्णु और महेश जैसे देवता महाकल्प के अन्त में लीन होते हैं और नये महाकल्प के प्रारम्भ में पुनः प्रकट होते हैं। स्मृतिमुक्ताफल में टिप्पणी प्राप्त होती है -  <blockquote>क्षयसहिता उत्पत्तिः क्षयोत्पत्तिः। तयोपलाक्षता भवंति कल्पे कल्पे महाकल्पे अवांतरकल्पे च। ब्रह्मविष्णुमहेश्वरा महाकल्पावसाने क्षीयंते महाकल्पादावुत्पद्यंते। एवमवांतरकल्पानामवसाने प्रारंभे च स्मृत्यादीनां निर्णेतारो मन्वादयः क्षयोत्पत्तिभ्यामुपलक्ष्यंते। चकारेणानुक्तो धर्मः समुच्चीयते। सर्वदेत्यनेन सृष्टिसंहारप्रवाहस्यानादित्वमनंतत्वं च दर्शितम्। स एव॥ (स्मृति मुक्ताफलम् १।२१)<ref name=":0">वैद्यनाथ दीक्षितीय, [https://ia801409.us.archive.org/9/items/in.ernet.dli.2015.486485/2015.486485.Smrtimuktaphalama-part-1_text.pdf स्मृतिमुक्ताफलम्], वर्णाश्रमधर्मकाण्डम् (1937), विश्वनाथ जगन्नाथ घारपुरे (पृ० ११)।</ref></blockquote>   
   Line 244: Line 246:     
मुख्य स्मृतियों के अतिरिक्त अनेक उपस्मृतियों का भी उल्लेख धर्मशास्त्रीय ग्रन्थों में मिलता है। ये उपस्मृतियाँ मूल स्मृतियों का विस्तार अथवा विशिष्ट विषयों पर केन्द्रित व्याख्या के रूप में देखी जा सकती हैं। जाबालि, आपस्तम्ब, बौधायन, कणाद, वैशम्पायन आदि के नाम उपस्मृति कर्ताओं के रूप में उल्लिखित हैं। अंगिरा स्मृति में भी धर्मशास्त्रकारों को लिखा है, परन्तु अंगिरा ने जिनका नामोल्लेख किया है, उन्हें उपस्मृतिकार कहा है - <blockquote>जाबालिर्नाचिकेतश्च स्कंदो लोगाक्षिकाश्यपौ। व्यासः सनत्कुमारश्च शंतनुर्जनकस्तथा॥
 
मुख्य स्मृतियों के अतिरिक्त अनेक उपस्मृतियों का भी उल्लेख धर्मशास्त्रीय ग्रन्थों में मिलता है। ये उपस्मृतियाँ मूल स्मृतियों का विस्तार अथवा विशिष्ट विषयों पर केन्द्रित व्याख्या के रूप में देखी जा सकती हैं। जाबालि, आपस्तम्ब, बौधायन, कणाद, वैशम्पायन आदि के नाम उपस्मृति कर्ताओं के रूप में उल्लिखित हैं। अंगिरा स्मृति में भी धर्मशास्त्रकारों को लिखा है, परन्तु अंगिरा ने जिनका नामोल्लेख किया है, उन्हें उपस्मृतिकार कहा है - <blockquote>जाबालिर्नाचिकेतश्च स्कंदो लोगाक्षिकाश्यपौ। व्यासः सनत्कुमारश्च शंतनुर्जनकस्तथा॥
  −
   
व्याघ्रः कात्यायनश्चैव जातुकर्णिः कपिंजलः। बोधायनश्च काणादो विश्वामित्रस्तथैव च। पैठीनसीर्गोभिलश्चेत्युपस्मृतिविधायकाः॥ (अंगिरा स्मृति)</blockquote>'''भाषार्थ -''' जाबालि, नचिकेता, स्कंद, लोगाक्षि, कश्यप, व्यासः, सनत्कुमार, शंतनु, जनक, व्याघ्र, कात्यायन, जातुकर्णि, कपिंजल, बोधायन, कणाद, विश्वामित्र, पैठीनसि, गोभिल। ये सभी उपस्मृतिकार हैं। उपस्मृतियों के माध्यम से धर्मशास्त्रीय परम्परा अधिक व्यापक होती है, जिससे विभिन्न सामाजिक परिस्थितियों का समावेश सम्भव हो पाता है।
 
व्याघ्रः कात्यायनश्चैव जातुकर्णिः कपिंजलः। बोधायनश्च काणादो विश्वामित्रस्तथैव च। पैठीनसीर्गोभिलश्चेत्युपस्मृतिविधायकाः॥ (अंगिरा स्मृति)</blockquote>'''भाषार्थ -''' जाबालि, नचिकेता, स्कंद, लोगाक्षि, कश्यप, व्यासः, सनत्कुमार, शंतनु, जनक, व्याघ्र, कात्यायन, जातुकर्णि, कपिंजल, बोधायन, कणाद, विश्वामित्र, पैठीनसि, गोभिल। ये सभी उपस्मृतिकार हैं। उपस्मृतियों के माध्यम से धर्मशास्त्रीय परम्परा अधिक व्यापक होती है, जिससे विभिन्न सामाजिक परिस्थितियों का समावेश सम्भव हो पाता है।
   Line 256: Line 256:     
मेधातिथि द्वारा रचित मनुभाष्य (मनुस्मृति पर भाष्य) तथा याज्ञवल्क्यस्मृति पर विज्ञानेश्वर कृत मिताक्षरा टीका आदि ग्रंथों को भी व्यापक अर्थ में धर्मशास्त्रीय साहित्य की श्रेणी में सम्मिलित किया जाता है। यद्यपि ये मूल स्मृतियाँ नहीं हैं, तथापि इनके माध्यम से धर्मशास्त्रीय सिद्धांतों का विस्तृत विवेचन, व्याख्या तथा व्यवहारिक प्रतिपादन किया गया है, अतः इनका स्थान धर्मशास्त्र-परम्परा में अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। क्षेत्रीय दृष्टि से भी धर्मशास्त्रीय निबन्ध-साहित्य का विकास उल्लेखनीय है -   
 
मेधातिथि द्वारा रचित मनुभाष्य (मनुस्मृति पर भाष्य) तथा याज्ञवल्क्यस्मृति पर विज्ञानेश्वर कृत मिताक्षरा टीका आदि ग्रंथों को भी व्यापक अर्थ में धर्मशास्त्रीय साहित्य की श्रेणी में सम्मिलित किया जाता है। यद्यपि ये मूल स्मृतियाँ नहीं हैं, तथापि इनके माध्यम से धर्मशास्त्रीय सिद्धांतों का विस्तृत विवेचन, व्याख्या तथा व्यवहारिक प्रतिपादन किया गया है, अतः इनका स्थान धर्मशास्त्र-परम्परा में अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। क्षेत्रीय दृष्टि से भी धर्मशास्त्रीय निबन्ध-साहित्य का विकास उल्लेखनीय है -   
*उत्तर भारत: काशीनाथ उपाध्याय का कार्य - धर्मसिंधु।
+
* उत्तर भारत: काशीनाथ उपाध्याय का कार्य - धर्मसिंधु।
 
*महाराष्ट्र: विज्ञानेश्वर की मिताक्षरा टीका और कमलाकर भट्ट का निर्णयसिंधु।
 
*महाराष्ट्र: विज्ञानेश्वर की मिताक्षरा टीका और कमलाकर भट्ट का निर्णयसिंधु।
* दक्षिण भारत: वैद्यनाथ दीक्षित का वैद्यनाथ-दीक्षितीयम इसको  स्मृतिमुक्ताफल ग्रंथ के रूप में भी जानते हैं।
+
*दक्षिण भारत: वैद्यनाथ दीक्षित का वैद्यनाथ-दीक्षितीयम इसको  स्मृतिमुक्ताफल ग्रंथ के रूप में भी जानते हैं।
 
*संन्यास आश्रम में स्थित जन: विद्येश्वर-संहिता।
 
*संन्यास आश्रम में स्थित जन: विद्येश्वर-संहिता।
   Line 271: Line 271:     
कात्यायनकृताश्चैव तथा प्राचेतसन्मुनेः। श्रुताः ह्येते भवत्प्रोक्ताः श्रुत्यर्थं मे न विस्मृताः॥ (पराशर स्मृति १. १२-१५)<ref name=":2" /></blockquote>इसका आशय यह है कि व्यास अपने पिता से निवेदन करते हैं कि वे उन्हें पुनः धर्मविषयक उपदेश प्रदान करें, यद्यपि उन्होंने मनु, वसिष्ठ, कश्यप, गर्ग, गौतम, उशना, अत्रि, विष्णु, संवर्त, अंगिरस, शातातप, हारीत, याज्ञवल्क्य, आपस्तम्ब, शंख, लिखित, कात्यायन, प्रचेता तथा स्वयं पिता द्वारा प्रतिपादित धर्म का श्रवण कर लिया है। इससे यह स्पष्ट होता है कि धर्मशास्त्र परम्परा एक सतत और बहुविध विचारधारा वाली परम्परा रही है, जिसमें विभिन्न आचार्यों ने समय, समाज और युग के अनुसार धर्म का विवेचन किया है। याज्ञवल्क्य स्मृति में धर्मशास्त्रकारों का उल्लेख इस प्रकार मिलता है - <blockquote>मन्वत्रिविष्णुहारीतयाज्ञवल्क्योशनांऽगिराः। यमापस्तम्बसंवर्ताः कात्यायनबृहस्पती॥
 
कात्यायनकृताश्चैव तथा प्राचेतसन्मुनेः। श्रुताः ह्येते भवत्प्रोक्ताः श्रुत्यर्थं मे न विस्मृताः॥ (पराशर स्मृति १. १२-१५)<ref name=":2" /></blockquote>इसका आशय यह है कि व्यास अपने पिता से निवेदन करते हैं कि वे उन्हें पुनः धर्मविषयक उपदेश प्रदान करें, यद्यपि उन्होंने मनु, वसिष्ठ, कश्यप, गर्ग, गौतम, उशना, अत्रि, विष्णु, संवर्त, अंगिरस, शातातप, हारीत, याज्ञवल्क्य, आपस्तम्ब, शंख, लिखित, कात्यायन, प्रचेता तथा स्वयं पिता द्वारा प्रतिपादित धर्म का श्रवण कर लिया है। इससे यह स्पष्ट होता है कि धर्मशास्त्र परम्परा एक सतत और बहुविध विचारधारा वाली परम्परा रही है, जिसमें विभिन्न आचार्यों ने समय, समाज और युग के अनुसार धर्म का विवेचन किया है। याज्ञवल्क्य स्मृति में धर्मशास्त्रकारों का उल्लेख इस प्रकार मिलता है - <blockquote>मन्वत्रिविष्णुहारीतयाज्ञवल्क्योशनांऽगिराः। यमापस्तम्बसंवर्ताः कात्यायनबृहस्पती॥
 +
पाराशर्यव्यासशंखलिखितौ दक्षगौतमौ। शातातपो वसिष्ठश्च धर्मशास्त्रप्रयोजकाः॥ (याज्ञवल्क्य स्मृति)<ref>[https://sa.wikisource.org/wiki/%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%9C%E0%A5%8D%E0%A4%9E%E0%A4%B5%E0%A4%B2%E0%A5%8D%E0%A4%95%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%AE%E0%A5%83%E0%A4%A4%E0%A4%BF%E0%A4%83/%E0%A4%86%E0%A4%9A%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%A7%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%AF%E0%A4%83/%E0%A4%89%E0%A4%AA%E0%A5%8B%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%98%E0%A4%BE%E0%A4%A4%E0%A4%AA%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%95%E0%A4%B0%E0%A4%A3%E0%A4%AE%E0%A5%8D याज्ञवल्क्यस्मृति], आचार अध्याय, उपोद्घातप्रकरण, श्लोक ४-५।</ref></blockquote>इन श्लोकों के अनुसार मनु, अत्रि, विष्णु, हारीत, याज्ञवल्क्य, उशना, अंगिरा, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, पाराशर, व्यास, शंख, लिखित, दक्ष, गौतम, शातातप और वसिष्ठ - ये सभी धर्मशास्त्रों के प्रवर्तक (प्रणेता) माने गए हैं। यहाँ पाराशर और व्यास जैसे उत्तरवर्ती काल के मुनियों का उल्लेख यह स्पष्ट करता है कि धर्मशास्त्रकारों में कोई कठोर कालक्रम (पौर्वापर्य) नहीं है। जैसे मनु ने धर्म का प्रतिपादन किया, वैसे ही अन्य ऋषियों ने भी अपने-अपने दृष्टिकोण से उसी धर्म को विवेचित किया।
 +
 +
 +
'''पाराशर स्मृति में युगानुरूप धर्म-विकास'''
 +
 +
भारतीय धर्मशास्त्रीय (Dharmashastric) परम्परा में युग-चतुष्टय के अनुसार धर्म के स्वरूप में परिवर्तन (Transformation) की अवधारणा अत्यन्त महत्त्वपूर्ण मानी गयी है। पाराशर स्मृति में महर्षि पराशर ने इस युगानुरूप धर्म-परिवर्तन (Epochal Modification of Dharma) को अत्यन्त व्यावहारिक दृष्टिकोण (Pragmatic Approach) से प्रतिपादित किया है।
 +
 +
'''युगधर्मानुसार साधन-प्रधानता॥ Primacy of Means as per Yuga-Dharma'''<blockquote>तपः परं कृतयुगे त्रेतायां ज्ञानमुच्यते। द्वापरे यज्ञमेवाहुर्दानमेकं कलौ युगे॥ (पाराशर स्मृति-23)</blockquote>'''कृतयुग में तप॥ Austerity as Supreme Discipline -''' कृतयुग में तप (Austerity) को सर्वप्रधान धर्म कहा गया। तप का तात्पर्य केवल शारीरिक कष्ट-सहन (Physical Mortification) नहीं, अपितु इन्द्रियनिग्रह (Self-restraint), चित्त-शुद्धि (Purification of Consciousness) तथा आध्यात्मिक उत्कर्ष (Spiritual Elevation) से है। उस काल में मनुष्य की आयु (Longevity), धैर्य (Endurance) और सात्त्विकता (Purity) उच्च कोटि की थी; अतः तप ही मोक्षोपाय (Means of Liberation) माना गया।
 +
 +
'''त्रेतायुग में ज्ञान॥ Epistemic Realization -''' त्रेता में ज्ञान (Spiritual Knowledge) को प्रधानता मिली। ज्ञान यहाँ तत्त्वबोध (Metaphysical Insight) एवं आत्मसाक्षात्कार (Self-realization) का द्योतक है। यह युग दार्शनिक अन्वेषण (Philosophical Inquiry) का युग माना गया।
 +
 +
'''द्वापर में यज्ञ॥ Ritual Sacrifice -''' द्वापर में यज्ञ-यागादि (Ritualism) को महत्त्व मिला। अश्वमेध, गोमेध आदि महायज्ञ सामाजिक-राजनीतिक प्रतिष्ठा (Royal Prestige) के प्रतीक बन गये। धर्म का रूप अधिकाधिक कर्मकाण्डात्मक (Ritualistic) हो गया।
 +
 +
'''कलियुग में दान॥ Charity as Ethical Core -''' कलियुग में दान (Charitable Giving) को ही सर्वोपरि धर्म माना गया। इसका कारण मानव की अल्पायु (Short-lived Nature), मन्दबुद्धिता (Intellectual Weakness) एवं अनुत्साह (Lethargy) है। अतः सरलतम साधन (Simplified Spiritual Method) के रूप में दान को प्रतिष्ठित किया गया। इस संदर्भ में बृहदारण्यक उपनिषद् का प्रसिद्ध वाक्य -  “दत्त, दयध्वं, दम्यत्” दान, दया और दम का त्रिविध उपदेश देता है।
 +
 +
भर्तृहरि ने भी कहा - “दानेन पाणिर्नतु कंकणेन” — अर्थात् दान ही कर-कमलों की वास्तविक शोभा (True Ornamentation) है।
 +
 +
'''धर्मनियन्ताओं का युगानुसार परिवर्तन (Shift of Normative Authorities)'''
 +
 +
श्लोक 24 में उल्लेख है—<blockquote>कृते तु मानवा धर्मास्त्रेतायां गौतमाः स्मृताः । द्वापरे शङ्खलिखिती कली पाराशराः स्मृताः॥ (पाराशर स्मृति-24)</blockquote>सत्ययुग में मनु के विधान (Manava Dharma) प्रचलित थे।
 +
 +
त्रेता में गौतम के नियम मान्य हुए।
 +
 +
द्वापर में शंख और लिखित का अधिकार स्थापित हुआ।
 +
 +
कलियुग में महर्षि पराशर स्वयं धर्मनियन्ता (Normative Authority) माने गये।
 +
 +
यह परिवर्तन धर्म की ऐतिहासिकता (Historicity of Dharma) को सूचित करता है। धर्म कोई स्थिर (Static) तत्त्व नहीं, अपितु काल-सापेक्ष (Time-conditioned) व्यवस्था है।
 +
 +
'''दण्ड-व्यवस्था में शिथिलीकरण (Penal Relaxation and Reformative Justice)'''<blockquote>त्यजेद्देशं कृतयुगे त्रेतायां ग्राममुत्सृजेत् । द्वापरे कुलमेकं तु कत्तारं च कलौ युगे ॥ (पाराशर स्मृति-25)</blockquote>श्लोक 25 के अनुसार -
 +
 +
* कृतयुग में देश-निर्वासन (Exile from Nation)
 +
* त्रेता में ग्राम-निर्वासन (Village Banishment)
 +
* द्वापर में कुल-बहिष्कार (Family Ostracism)
 +
* कलियुग में प्रायश्चित्त (Expiatory Reform)
 +
 +
यहाँ दण्ड-नीति (Penology) में सुधारात्मक दृष्टिकोण (Reformative Approach) स्पष्ट होता है। कलियुग में अपराधी को पुनर्वास (Rehabilitation) का अवसर प्रदान किया गया है।<blockquote>कृते सम्भाषणादेव त्रेतायां स्पर्शनेन च। द्वापरे त्वत्रमादाय कलौ पतति कर्मणा ॥ (पाराशर स्मृति-26)</blockquote>श्लोक 26 में पापी के साथ संसर्ग (Association with Sinner) के नियमों का विवेचन है -
 +
 +
* कृतयुग: सम्भाषण मात्र से पतन
 +
* त्रेता: स्पर्श से पतन
 +
* द्वापर: अन्नग्रहण से पतन
 +
* कलियुग: केवल स्वयं के कर्म से पतन
 +
 +
यह नैतिक उत्तरदायित्व (Moral Accountability) की व्यक्तिगतता (Individualization of Responsibility) को सूचित करता है। धर्म का केन्द्र बाह्य संसर्ग से हटकर आन्तरिक कर्तृत्व (Internal Agency) पर आ गया। पाराशर का यह प्रतिपादन स्पष्ट करता है कि -
    +
* धर्म स्थिर न होकर परिस्थितिजन्य है।
 +
* कठोरता के स्थान पर लोचशीलता को वरण किया गया।
 +
* दण्ड से अधिक प्रायश्चित्त (Atonement) को महत्त्व दिया गया।
 +
* बाह्याचार (External Conduct) से अधिक आन्तरिक नैतिकता (Inner Morality) को प्रधानता मिली।
   −
पाराशर्यव्यासशंखलिखितौ दक्षगौतमौ। शातातपो वसिष्ठश्च धर्मशास्त्रप्रयोजकाः॥ (याज्ञवल्क्य स्मृति)<ref>[https://sa.wikisource.org/wiki/%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%9C%E0%A5%8D%E0%A4%9E%E0%A4%B5%E0%A4%B2%E0%A5%8D%E0%A4%95%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%AE%E0%A5%83%E0%A4%A4%E0%A4%BF%E0%A4%83/%E0%A4%86%E0%A4%9A%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%A7%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%AF%E0%A4%83/%E0%A4%89%E0%A4%AA%E0%A5%8B%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%98%E0%A4%BE%E0%A4%A4%E0%A4%AA%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%95%E0%A4%B0%E0%A4%A3%E0%A4%AE%E0%A5%8D याज्ञवल्क्यस्मृति], आचार अध्याय, उपोद्घातप्रकरण, श्लोक ४-५।</ref></blockquote>इन श्लोकों के अनुसार मनु, अत्रि, विष्णु, हारीत, याज्ञवल्क्य, उशना, अंगिरा, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, पाराशर, व्यास, शंख, लिखित, दक्ष, गौतम, शातातप और वसिष्ठ - ये सभी धर्मशास्त्रों के प्रवर्तक (प्रणेता) माने गए हैं। यहाँ पाराशर और व्यास जैसे उत्तरवर्ती काल के मुनियों का उल्लेख यह स्पष्ट करता है कि धर्मशास्त्रकारों में कोई कठोर कालक्रम (पौर्वापर्य) नहीं है। जैसे मनु ने धर्म का प्रतिपादन किया, वैसे ही अन्य ऋषियों ने भी अपने-अपने दृष्टिकोण से उसी धर्म को विवेचित किया।
+
अतः पाराशर-स्मृति में धर्म का स्वरूप विकासमान (Evolutionary), अनुकूलनीय (Adaptive) एवं समाजोपयोगी (Socially Relevant) है। युगानुसार धर्म के साधन, दण्ड-विधान, सामाजिक मर्यादा तथा आध्यात्मिक प्रभाव की यह क्रमिक शिथिलता (Gradual Relaxation) भारतीय धर्मशास्त्र की व्यावहारिक बुद्धिमत्ता (Practical Wisdom) को प्रमाणित करती है।
 +
 
 +
यह प्रतिपादन आधुनिक विधिशास्त्र (Modern Jurisprudence) की उस धारणा से साम्य रखता है जिसमें विधि (Law) को समाज की आवश्यकताओं (Social Needs) के अनुरूप संशोधित किया जाता है। इस प्रकार पाराशर का दृष्टिकोण न केवल धार्मिक आचारसंहिता (Religious Code of Conduct) है, अपितु एक गतिशील सामाजिक-दर्शन भी है, जो काल, परिस्थिति और मानवीय क्षमता के अनुरूप धर्म की पुनर्व्याख्या का उत्कृष्ट उदाहरण प्रस्तुत करता है।
    
==धर्मशास्त्रों के वर्ण्यविषय==
 
==धर्मशास्त्रों के वर्ण्यविषय==
Line 287: Line 337:  
*'''प्रकीर्ण -''' संपत्ति का उत्तराधिकार एवं विभाजन, पुत्रों के प्रकार, भक्ष्याभक्ष्य एवं पेयापेय विचार, योग साधन आदि।
 
*'''प्रकीर्ण -''' संपत्ति का उत्तराधिकार एवं विभाजन, पुत्रों के प्रकार, भक्ष्याभक्ष्य एवं पेयापेय विचार, योग साधन आदि।
   −
==निष्कर्ष==
+
==निष्कर्ष॥ Conclusion==
 
धर्मशास्त्रों में युगसापेक्ष एवं आधुनिक सन्दर्भों से सामंजस्य रखने वाले विषयों जैसे - स्त्री-अधिकार, हिन्दू विधि, संस्कार-प्रणाली, नैतिक शिक्षा, पर्यावरण-चिन्तन, मानवाधिकार, राजधर्म, दण्ड-व्यवस्था तथा अपराध-विचार पर अध्ययन-अध्यापन सम्पन्न होता है। इसके परिणामस्वरूप सामाजिक विधि-व्यवस्थाओं के उन्नत दार्शनिक आयामों का बोध होता है तथा मानवीय मूल्यों के विकास के साथ आत्मिक उन्नयन भी सुनिश्चित होता है।
 
धर्मशास्त्रों में युगसापेक्ष एवं आधुनिक सन्दर्भों से सामंजस्य रखने वाले विषयों जैसे - स्त्री-अधिकार, हिन्दू विधि, संस्कार-प्रणाली, नैतिक शिक्षा, पर्यावरण-चिन्तन, मानवाधिकार, राजधर्म, दण्ड-व्यवस्था तथा अपराध-विचार पर अध्ययन-अध्यापन सम्पन्न होता है। इसके परिणामस्वरूप सामाजिक विधि-व्यवस्थाओं के उन्नत दार्शनिक आयामों का बोध होता है तथा मानवीय मूल्यों के विकास के साथ आत्मिक उन्नयन भी सुनिश्चित होता है।
    
धर्मसूत्र प्राचीनतम ग्रन्थ हैं, जिनमें राजधर्म के सिद्धान्तों का क्रमबद्ध एवं संहितात्मक प्रतिपादन किया गया है। इनमें राजा के कर्तव्य, चतुर्वर्ण व्यवस्था, कर-नियम, सम्पत्ति-विधान आदि विषयों का विस्तृत विवेचन उपलब्ध होता है। राजा तथा राज्य से सम्बन्धित विषयों को धर्मसूत्रों के अन्तर्गत विशेष रूप से सम्मिलित किया गया है और प्रत्येक धर्मसूत्र में किसी न किसी रूप में राजधर्म की चर्चा अवश्य की गई है। क्योंकि धर्मसूत्रों का प्रधान विषय धर्म है, अतः धर्म की परिधि में राजा तथा राज्य-व्यवस्था के सिद्धान्त भी अन्तर्निहित माने गए हैं। विशेषतः विष्णु धर्मसूत्र में राजदण्ड, न्यायिक व्यवस्था एवं प्रशासन को राजधर्म का अनिवार्य अंग स्वीकार किया गया है। इस प्रकार न्याय-सम्बन्धी सिद्धान्तों का सुव्यवस्थित प्रतिपादन धर्मसूत्रों के माध्यम से किया गया है।
 
धर्मसूत्र प्राचीनतम ग्रन्थ हैं, जिनमें राजधर्म के सिद्धान्तों का क्रमबद्ध एवं संहितात्मक प्रतिपादन किया गया है। इनमें राजा के कर्तव्य, चतुर्वर्ण व्यवस्था, कर-नियम, सम्पत्ति-विधान आदि विषयों का विस्तृत विवेचन उपलब्ध होता है। राजा तथा राज्य से सम्बन्धित विषयों को धर्मसूत्रों के अन्तर्गत विशेष रूप से सम्मिलित किया गया है और प्रत्येक धर्मसूत्र में किसी न किसी रूप में राजधर्म की चर्चा अवश्य की गई है। क्योंकि धर्मसूत्रों का प्रधान विषय धर्म है, अतः धर्म की परिधि में राजा तथा राज्य-व्यवस्था के सिद्धान्त भी अन्तर्निहित माने गए हैं। विशेषतः विष्णु धर्मसूत्र में राजदण्ड, न्यायिक व्यवस्था एवं प्रशासन को राजधर्म का अनिवार्य अंग स्वीकार किया गया है। इस प्रकार न्याय-सम्बन्धी सिद्धान्तों का सुव्यवस्थित प्रतिपादन धर्मसूत्रों के माध्यम से किया गया है।
   −
==उद्धरण==
+
==उद्धरण॥ References==
 
[[Category:Hindi Articles]]
 
[[Category:Hindi Articles]]
 
[[Category:Dharmas]]
 
[[Category:Dharmas]]
 
<references />
 
<references />
1,271

edits

Navigation menu