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| | ==आजीविका की संकल्पना॥ Concept of livelihood== | | ==आजीविका की संकल्पना॥ Concept of livelihood== |
| | भारतीय धर्मशास्त्रीय परंपरा में मानव जीवन के सामाजिक, आर्थिक एवं नैतिक आयामों का समन्वित विधान प्रस्तुत करती है। जीवन-वृत्ति अथवा भरण-पोषण का प्रश्न इसमें केवल जीविका अर्जन तक सीमित नहीं है, अपितु धर्म, नीति और सामाजिक उत्तरदायित्व से गहराई से जुड़ा हुआ है। धर्मशास्त्रमें प्रतिपादित धनागमन के सात धर्मयुक्त स्रोत तथा आजीविका के दस मान्य साधनों का विश्लेषण किया गया है, साथ ही उनकी समकालीन प्रासंगिकता पर भी विचार किया गया है। | | भारतीय धर्मशास्त्रीय परंपरा में मानव जीवन के सामाजिक, आर्थिक एवं नैतिक आयामों का समन्वित विधान प्रस्तुत करती है। जीवन-वृत्ति अथवा भरण-पोषण का प्रश्न इसमें केवल जीविका अर्जन तक सीमित नहीं है, अपितु धर्म, नीति और सामाजिक उत्तरदायित्व से गहराई से जुड़ा हुआ है। धर्मशास्त्रमें प्रतिपादित धनागमन के सात धर्मयुक्त स्रोत तथा आजीविका के दस मान्य साधनों का विश्लेषण किया गया है, साथ ही उनकी समकालीन प्रासंगिकता पर भी विचार किया गया है। |
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| − | ==धर्मशास्त्रों में भरण-पोषण का दायित्व==
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| | '''मनुस्मृति में धनागमन स्रोत''' | | '''मनुस्मृति में धनागमन स्रोत''' |
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| | मनुस्मृति में धनागमन के सात साधनों का उल्लेख प्राप्त होता है, जिन्हें सभी वर्णों के लिए सामान्य रूप से स्वीकार किया गया है -<blockquote>सप्त वित्तागमा धर्म्या दायो लाभः क्रयो जयः। प्रयोगः कर्मयोगश्च सत्प्रतिग्रह एव च॥ (मनुस्मृति १०.११५)<ref>[https://sa.wikisource.org/wiki/%E0%A4%AE%E0%A4%A8%E0%A5%81%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%AE%E0%A5%83%E0%A4%A4%E0%A4%BF%E0%A4%83/%E0%A4%A6%E0%A4%B6%E0%A4%AE%E0%A5%8B%E0%A4%A7%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%AF%E0%A4%83 मनुस्मृति], अध्याय 10, श्लोक 115।</ref></blockquote>धर्मसम्मत धन प्राप्ति के दाय, लाभ, क्रय, जय, प्रयोग, कर्मयोग तथा सत्प्रतिग्रह ये सात प्रकार के साधन बताए गए हैं। इन सातों को धर्मानुकूल माना गया है और इन्हीं माध्यमों से अर्जित धन को शास्त्रसम्मत एवं पवित्र कहा गया है। इनका संक्षिप्त विवेचन इस प्रकार है - | | मनुस्मृति में धनागमन के सात साधनों का उल्लेख प्राप्त होता है, जिन्हें सभी वर्णों के लिए सामान्य रूप से स्वीकार किया गया है -<blockquote>सप्त वित्तागमा धर्म्या दायो लाभः क्रयो जयः। प्रयोगः कर्मयोगश्च सत्प्रतिग्रह एव च॥ (मनुस्मृति १०.११५)<ref>[https://sa.wikisource.org/wiki/%E0%A4%AE%E0%A4%A8%E0%A5%81%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%AE%E0%A5%83%E0%A4%A4%E0%A4%BF%E0%A4%83/%E0%A4%A6%E0%A4%B6%E0%A4%AE%E0%A5%8B%E0%A4%A7%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%AF%E0%A4%83 मनुस्मृति], अध्याय 10, श्लोक 115।</ref></blockquote>धर्मसम्मत धन प्राप्ति के दाय, लाभ, क्रय, जय, प्रयोग, कर्मयोग तथा सत्प्रतिग्रह ये सात प्रकार के साधन बताए गए हैं। इन सातों को धर्मानुकूल माना गया है और इन्हीं माध्यमों से अर्जित धन को शास्त्रसम्मत एवं पवित्र कहा गया है। इनका संक्षिप्त विवेचन इस प्रकार है - |
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| − | ===दाय॥ Inheritance===
| + | '''दाय॥ Inheritance -''' धर्मयुक्त उत्तराधिकार द्वारा प्राप्त संपत्ति दाय कहलाती है। यह पारिवारिक संपत्ति का वैध और नैतिक हस्तांतरण है। |
| − | धर्मयुक्त उत्तराधिकार द्वारा प्राप्त संपत्ति दाय कहलाती है। यह पारिवारिक संपत्ति का वैध और नैतिक हस्तांतरण है। | + | |
| | + | '''लाभ॥ Gains -''' मित्रों, संबंधियों अथवा समाज से प्राप्त उपहार, सहयोग अथवा सहायता द्वारा अर्जित धन लाभ की श्रेणी में आता है। |
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| − | ===लाभ॥ Gains===
| + | '''क्रय॥ Purchase / Exchange -''' अपने धन से क्रय-विक्रय कर प्राप्त संपत्ति क्रय कहलाती है। यह व्यापार और विनिमय का धर्मसम्मत रूप है। |
| − | मित्रों, संबंधियों अथवा समाज से प्राप्त उपहार, सहयोग अथवा सहायता द्वारा अर्जित धन लाभ की श्रेणी में आता है।
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| − | ===क्रय॥ Purchase / Exchange===
| + | '''जय॥ Victory -''' धर्मयुक्त युद्ध या प्रतियोगिता में प्राप्त संपत्ति जय मानी जाती है। यह विशेषतः क्षत्रिय वर्ग से संबद्ध है। |
| − | अपने धन से क्रय-विक्रय कर प्राप्त संपत्ति क्रय कहलाती है। यह व्यापार और विनिमय का धर्मसम्मत रूप है।
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| − | ===जय॥ Victory===
| + | '''प्रयोग॥ Investment / Lending -''' अपने धन को अन्य कार्यों में लगाकर उससे आय प्राप्त करना प्रयोग कहलाता है, जैसे ब्याज, साझेदारी अथवा निवेश। |
| − | धर्मयुक्त युद्ध या प्रतियोगिता में प्राप्त संपत्ति जय मानी जाती है। यह विशेषतः क्षत्रिय वर्ग से संबद्ध है।
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| − | ===प्रयोग॥ Investment / Lending===
| + | '''कर्मयोग॥ Labour and Profession -''' कृषि, उद्योग, शिल्प, पशुपालन आदि श्रम आधारित कार्यों से अर्जित धन कर्मयोग के अंतर्गत आता है। |
| − | अपने धन को अन्य कार्यों में लगाकर उससे आय प्राप्त करना प्रयोग कहलाता है, जैसे ब्याज, साझेदारी अथवा निवेश।
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| − | ===कर्मयोग॥ Labour and Profession===
| + | '''सत्प्रतिग्रह॥ Honourable Acceptance -''' धर्मयुक्त रूप से प्राप्त दान या वेतन को सत्प्रतिग्रह कहा गया है, विशेषतः ब्राह्मणों के लिए। |
| − | कृषि, उद्योग, शिल्प, पशुपालन आदि श्रम आधारित कार्यों से अर्जित धन कर्मयोग के अंतर्गत आता है।
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| − | ===सत्प्रतिग्रह॥ Honourable Acceptance===
| + | मनु के अनुसार, इन स्रोतों के अतिरिक्त अन्य सभी प्रकार का धन अधर्मजन्य माना गया है। |
| − | धर्मयुक्त रूप से प्राप्त दान या वेतन को सत्प्रतिग्रह कहा गया है, विशेषतः ब्राह्मणों के लिए। मनु के अनुसार, इन स्रोतों के अतिरिक्त अन्य सभी प्रकार का धन अधर्मजन्य माना गया है। मनु के अनुसार, इन स्रोतों के अतिरिक्त अन्य सभी प्रकार का धन अधर्मजन्य अथवा अवैध माना गया है।
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| | ==आजीविका के साधन== | | ==आजीविका के साधन== |
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| | यह व्यवस्था आज के समय में आर्थिक नैतिकता और सतत विकास की अवधारणा से साम्य रखती है। | | यह व्यवस्था आज के समय में आर्थिक नैतिकता और सतत विकास की अवधारणा से साम्य रखती है। |
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| − | ==भरण-पोषण और उत्तराधिकार का संबंध == | + | ==भरण-पोषण और उत्तराधिकार का संबंध== |
| | + | भारतीय परंपरा में भरण-पोषण के उत्तरदायित्व का विधान प्राचीन व्यवहार के अन्तर्गत दो रूपों में प्राप्त होता है। परस्पर संबंध के कारण या सम्पत्ति-प्राप्ति की स्थिति के कारण। मनु ने कहा है - <blockquote>वृद्धौ च मातापितरौ साध्वी भार्या सुतः शिशुः। अप्यकार्यशतं कृत्वा भर्तव्या मनुरब्रवीत्॥ (मनुभाष्य ४।२५१); (मिता०याज्ञ० २।१७५)<ref>संपादक- गंगानाथ झा, [https://archive.org/details/manusmriti-with-bhashya-of-medhatithi-vol-1-sanskrit-text-ganganath-jha-1932-bis/Manusmriti%20with%20Bhashya%20of%20Medhatithi%20Vol%201%20-%20Sanskrit%20Text%20-%20Ganganath%20Jha%201932%20%28BIS%29/page/n422/mode/1up मनुस्मृति-मेधातिथि-मनुभाष्यसमेत] (१९३९), अध्याय-४, श्लोक-२५१, एशियाटिक सोसाइटी, कलकत्ता (पृ० ४१४)।</ref></blockquote>एक सौ बुरे कर्मों के सम्पादन से भी वृद्ध माता-पिता, साध्वी पत्नी एवं शिशु का भरण-पोषण करना चाहिये। इससे स्पष्ट होता है कि चाहे सम्पत्ति हो या न हो, पिता का यह कर्त्तव्य है कि वह शिशु का पालन करे, पति का कर्त्तव्य है कि वह अपनी पतिव्रता स्त्री का भरण-पोषण करे और पुत्र का यह कर्त्तव्य है कि वह अपने वृद्ध माता-पिता का संवर्धन करें। कौटिल्य ने भी कहा है कि - <blockquote>अपत्य-दारं माता-पितरौ भ्रातृऋनप्राप्त-व्यवहारान्भगिनीः कन्याविधवाश्चाबिभ्रतः शक्तिमतो द्वादश-पणो दण्डः। अन्यत्र पतितेभ्यः, अन्यत्र मातुः॥ (अर्थशास्त्र २.१.२८)<ref>[https://sa.wikisource.org/wiki/%E0%A4%85%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%A5%E0%A4%B6%E0%A4%BE%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%AE%E0%A5%8D/%E0%A4%85%E0%A4%A7%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%B0%E0%A4%A3%E0%A4%AE%E0%A5%8D_%E0%A5%A8/%E0%A4%85%E0%A4%A7%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%AF%E0%A4%83_%E0%A5%A7 अर्थशास्त्र], अधिकरण-२, अध्याय- १, सूत्र-२८।</ref></blockquote>भाषार्थ - जो अपने अपतित बच्चों, पत्नी, माता-पिता, छोटे भाइयों एवं बहिनों, कुमारी कन्याओं, विधवा पुत्रियों का भरण-पोषण नहीं करता उस पर १२ पणों का दण्ड लगाया है। |
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| | ==निष्कर्ष॥ Conclusion== | | ==निष्कर्ष॥ Conclusion== |