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भारतीय संस्कृति में व्रत (संस्कृत: व्रियते इति व्रतम्) जिसका वरण, ग्रहण, अनुपालन, आचरण और अनुष्ठान किया जाये उसे व्रत कहते हैं। व्रत एवं नियम को पर्यायवाचक माना गया है तथा उपवास, पुण्यक आदि को व्रत का प्रकार कहा है। किसी विशेष उद्देश्य की प्राप्ति के लिए संकल्पपूर्वक नियमों का पालन करना व्रत कहलाता है। इसमें व्यक्ति अपने आहार, व्यवहार तथा विचारों पर नियंत्रण रखता है। व्रत धार्मिक अनुष्ठान मात्र नहीं, अपितु आत्मसंयम, आचार-शुद्धि एवं संकल्प-प्रधान जीवन पद्धति का द्योतक है। इसका संबंध व्यक्ति के आंतरिक अनुशासन तथा बाह्य आचरण दोनों से है, जो उसे आत्मिक विकास की ओर अग्रसर करता है।
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भारतीय संस्कृति में व्रत (संस्कृत: व्रियते इति व्रतम्) जिसका वरण, ग्रहण, अनुपालन, आचरण और अनुष्ठान किया जाए उसे व्रत कहते हैं। व्रत एवं नियम को पर्यायवाचक माना गया है। किसी विशेष उद्देश्य की प्राप्ति के लिए संकल्पपूर्वक नियमों का पालन करना व्रत कहलाता है। इसमें व्यक्ति अपने आहार, व्यवहार तथा विचारों पर नियंत्रण रखता है। व्रत धार्मिक अनुष्ठान मात्र नहीं, अपितु आत्मसंयम, आचार-शुद्धि एवं संकल्प-प्रधान जीवन पद्धति का द्योतक है। इसका संबंध व्यक्ति के आंतरिक अनुशासन तथा बाह्य आचरण दोनों से है, जो उसे आत्मिक विकास की ओर अग्रसर करता है।
    
==परिचय॥ Introduction==
 
==परिचय॥ Introduction==
व्रियते इति व्रतम जिसका वरण, ग्रहण, अनुपालन, आचरण, अनुष्ठान किया जाए उसे व्रत कहते हैं। ऋग्वेद में वर्णित है कि सत्य इत्यादि व्रतों को व्यवहारिक जीवन में प्रयोग करने वाले मनुष्य दीर्घजीवी होते हैं। ऋग्वेद में सत्य एवं परिमित बोलने को व्रत कहा है। यजुर्वेद में सत्य एवं श्रेष्ठ कार्यों में निपुण होने को सभी व्रतों में श्रेष्ठ कहा है। संयम व्रत का वर्णन करते हुए सामवेद में कहा गया है कि देवता संयमी लोगों पर कृपा करते हैं। दान करना प्रत्येक व्रत का अभिन्न अंग कहा गया है। अन्नदान के महत्व का वर्णन करते हुए कहा गया है कि जो अतिथियों को अन्न दान करता है वह सभी प्राणियों का रक्षक है। अथर्ववेद में कहा गया है कि कटुवाणी का उपयोग नहीं करना चाहिए।
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भारतीय धार्मिक एवं दार्शनिक परंपरा में व्रत का स्वरूप केवल बाह्य आचरण या अनुष्ठान तक सीमित नहीं है, अपितु यह गहन आंतरिक अनुशासन, मानसिक संयम तथा आध्यात्मिक साधना का समन्वित रूप है। प्रस्तुत विवेचन से यह स्पष्ट होता है कि व्रत का वास्तविक आधार नियम (discipline) है, और यही नियम तपस्वरूप माने गए हैं। इस प्रकार व्रत का मूल उद्देश्य इन्द्रियनिग्रह एवं चित्तशुद्धि है। व्रियते इति व्रतम जिसका वरण, ग्रहण, अनुपालन, आचरण, अनुष्ठान किया जाए उसे व्रत कहते हैं। ऋग्वेद में वर्णित है कि सत्य इत्यादि व्रतों को व्यवहारिक जीवन में प्रयोग करने वाले मनुष्य दीर्घजीवी होते हैं। ऋग्वेद में सत्य एवं परिमित बोलने को व्रत कहा है। यजुर्वेद में सत्य एवं श्रेष्ठ कार्यों में निपुण होने को सभी व्रतों में श्रेष्ठ कहा है। संयम व्रत का वर्णन करते हुए सामवेद में कहा गया है कि देवता संयमी लोगों पर कृपा करते हैं। दान करना प्रत्येक व्रत का अभिन्न अंग कहा गया है। अन्नदान के महत्व का वर्णन करते हुए कहा गया है कि जो अतिथियों को अन्न दान करता है वह सभी प्राणियों का रक्षक है। अथर्ववेद में कहा गया है कि कटुवाणी का उपयोग नहीं करना चाहिए। मनुष्य जीवन को सफल बनाने वाले कर्मों में व्रतों की बड़ी महिमा है। देवल का कहना है कि व्रत और उपवास के नियम पालन से शरीर को तपाना ही तप है -<blockquote>वेदोक्तेन प्रकारेण कृच्छ्रचान्द्रायणादिभिः। शरीरशोषणं यत् तत् तप इत्युच्यते बुधैः॥ (व्रत परिचय)<ref>हनुमान् शर्मा, व्रतपरिचय (सं.2051), गीताप्रेस गोरखपुर, (पृ. 3)।</ref></blockquote>व्रत अनेक हैं और व्रतों के प्रकार भी अनेक हैं। लोकप्रसिद्धि में व्रत एवं उपवास दो होते हैं। ये कायिक, वाचिक, मानसिक, नित्य, नैमित्तिक, काम्य, एकभुक्त, अयाचित, मितभुक्, चान्द्रायण और प्राजापत्य के रूप में किये जाते हैं। वास्तव में व्रत और उपवास दोनों एक हैं, अन्तर यह है कि व्रत में भोजन किया जा सकता है जबकि उपवास में निराहार रहना पड़ता है। इनके कायिक आदि तीन भेद इस प्रकार हैं -  
 
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मनुष्य जीवन को सफल बनाने वाले कर्मों में व्रतों की बड़ी महिमा है। देवल का कहना है कि व्रत और उपवास के नियम पालन से शरीर को तपाना ही तप है - <blockquote>वेदोक्तेन प्रकारेण कृच्छ्रचान्द्रायणादिभिः। शरीरशोषणं यत् तत् तप इत्युच्यते बुधैः॥ (व्रत परिचय)<ref>हनुमान् शर्मा, व्रतपरिचय (सं.2051), गीताप्रेस गोरखपुर, (पृ. 3)।</ref></blockquote>व्रत अनेक हैं और व्रतों के प्रकार भी अनेक हैं। लोकप्रसिद्धि में व्रत एवं उपवास दो होते हैं। ये कायिक, वाचिक, मानसिक, नित्य, नैमित्तिक, काम्य, एकभुक्त, अयाचित, मितभुक्, चान्द्रायण और प्राजापत्य के रूप में किये जाते हैं। वास्तव में व्रत और उपवास दोनों एक हैं, अन्तर यह है कि व्रत में भोजन किया जा सकता है जबकि उपवास में निराहार रहना पड़ता है। इनके कायिक आदि तीन भेद इस प्रकार हैं -  
      
#शस्त्राघात, मर्माघात और कार्यहानि आदि जनित हिंसा के त्याग से कायिक कहलाता है।
 
#शस्त्राघात, मर्माघात और कार्यहानि आदि जनित हिंसा के त्याग से कायिक कहलाता है।
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ये कुर्वन्ति उपवासांश्च विधानेन शुभान्विताः। न यान्ति ते मुनिश्रेष्ठ नरकान् भीमदारुणान्॥ (पद्मपुराण)</blockquote>उपवासके समान कोई तपश्चर्या नहीं है। महामति महर्षि विश्वामित्रजीने दिव्य हजार वर्षोंतक महान् तप किया और एकभुक्तव्रतका आचरण किया, उसीके प्रभावसे उन्होंने ब्राह्मणत्व प्राप्त किया, उन्होंने व्रतोपवासद्वारा विविध देवताओंकी उपासना कर उत्तम स्वर्गलोक प्राप्त किया। ऋषियोंने भी उपवासोंके परिपालनसे परम सिद्धि प्राप्त की। जो कल्याणकामी विधिपूर्वक व्रतोपवासोंका परिपालन करते हैं, वे दारुण तथा भयंकर नरकोंमें नहीं जाते।<blockquote>व्रतोपवासैर्यैर्विष्णुर्नान्यजन्मनि तोषितः। ते नरा मुनिशार्दूल ग्रहरोगादिबाधिनः॥ (विष्णुधर्मोत्तरपुराण)</blockquote>जिन्होंने पूर्वजन्ममें व्रतोपवासोंके द्वारा भगवान् विष्णुको प्रसन्न नहीं किया, वे मनुष्य ही इस जन्ममें ग्रह, रोग, व्याधिकष्ट आदिसे पीडित रहते हैं।<blockquote>न पूजितो भूतपतिः पुरा यै-र्व्रतं न चीर्णं न च सत्यमुक्तम्। दारिद्र्यशोकामयदुःखदग्धाः प्रायोऽनुशोचन्ति त एव मर्त्याः॥ (स्कन्दपुराण)</blockquote>जिन्होंने पूर्वमें भूतोंके अधिपति भगवान् शंकरका पूजन नहीं किया, व्रतपालन नहीं किया, सत्य वचनका पालन नहीं किया, वे ही मनुष्य दरिद्रता, शोक, रोग तथा दुःखोंसे दग्ध होते हैं तथा पश्चात्तापको प्राप्त होते हैं।<blockquote>ये सर्वदा व्रतपराश्च शिवं स्मरन्ति तेषां न दृष्टिपथमप्युपयान्ति दूताः। याम्या महाभयकृतोऽपि च पाशहस्ताः दंष्ट्राकरालवदना विकटोग्रवेषा ॥ (स्कन्दपुराण)</blockquote>जो सदा ही व्रतपरायण रहते हैं और भगवान् शिवका स्मरण करते रहते हैं, उनके सामने महान् भय उत्पन्न करनेवाले, हाथमें पाश धारण किये हुए, भयंकर दाढ़ोंसे युक्त मुखवाले तथा उग्र वेशवाले यमराजके विकट दूत नहीं आते।<blockquote>अर्चयन्ति महादेवं यज्ञदानसमाधिभिः॥ व्रतोपवासनियमैहोंमैः स्वाध्यायतर्पणैः।
 
ये कुर्वन्ति उपवासांश्च विधानेन शुभान्विताः। न यान्ति ते मुनिश्रेष्ठ नरकान् भीमदारुणान्॥ (पद्मपुराण)</blockquote>उपवासके समान कोई तपश्चर्या नहीं है। महामति महर्षि विश्वामित्रजीने दिव्य हजार वर्षोंतक महान् तप किया और एकभुक्तव्रतका आचरण किया, उसीके प्रभावसे उन्होंने ब्राह्मणत्व प्राप्त किया, उन्होंने व्रतोपवासद्वारा विविध देवताओंकी उपासना कर उत्तम स्वर्गलोक प्राप्त किया। ऋषियोंने भी उपवासोंके परिपालनसे परम सिद्धि प्राप्त की। जो कल्याणकामी विधिपूर्वक व्रतोपवासोंका परिपालन करते हैं, वे दारुण तथा भयंकर नरकोंमें नहीं जाते।<blockquote>व्रतोपवासैर्यैर्विष्णुर्नान्यजन्मनि तोषितः। ते नरा मुनिशार्दूल ग्रहरोगादिबाधिनः॥ (विष्णुधर्मोत्तरपुराण)</blockquote>जिन्होंने पूर्वजन्ममें व्रतोपवासोंके द्वारा भगवान् विष्णुको प्रसन्न नहीं किया, वे मनुष्य ही इस जन्ममें ग्रह, रोग, व्याधिकष्ट आदिसे पीडित रहते हैं।<blockquote>न पूजितो भूतपतिः पुरा यै-र्व्रतं न चीर्णं न च सत्यमुक्तम्। दारिद्र्यशोकामयदुःखदग्धाः प्रायोऽनुशोचन्ति त एव मर्त्याः॥ (स्कन्दपुराण)</blockquote>जिन्होंने पूर्वमें भूतोंके अधिपति भगवान् शंकरका पूजन नहीं किया, व्रतपालन नहीं किया, सत्य वचनका पालन नहीं किया, वे ही मनुष्य दरिद्रता, शोक, रोग तथा दुःखोंसे दग्ध होते हैं तथा पश्चात्तापको प्राप्त होते हैं।<blockquote>ये सर्वदा व्रतपराश्च शिवं स्मरन्ति तेषां न दृष्टिपथमप्युपयान्ति दूताः। याम्या महाभयकृतोऽपि च पाशहस्ताः दंष्ट्राकरालवदना विकटोग्रवेषा ॥ (स्कन्दपुराण)</blockquote>जो सदा ही व्रतपरायण रहते हैं और भगवान् शिवका स्मरण करते रहते हैं, उनके सामने महान् भय उत्पन्न करनेवाले, हाथमें पाश धारण किये हुए, भयंकर दाढ़ोंसे युक्त मुखवाले तथा उग्र वेशवाले यमराजके विकट दूत नहीं आते।<blockquote>अर्चयन्ति महादेवं यज्ञदानसमाधिभिः॥ व्रतोपवासनियमैहोंमैः स्वाध्यायतर्पणैः।
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तेषां वै रुद्रसायुज्यं सामीप्यञ्चातिदुर्लभम्॥ सलोकतां च सारूप्यं जायते तत्प्रसादतः॥ (कूर्मपुराण)
 
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</blockquote>जो व्रत, उपवास, नियम, होम, स्वाध्याय, तर्पण, यज्ञ, दान तथा ध्यान-समाधिके द्वारा भगवान् महादेवका अर्चन करते हैं, उन्हें भगवान् शंकरकी कृपासे अति दुर्लभ रुद्रसायुज्य, सामीप्य, सालोक्य तथा सारूप्य मोक्षकी प्राप्ति होती है।<ref>[https://dn710602.ca.archive.org/0/items/in.ernet.dli.2015.402143/2015.402143.Kalyaan-Virat.pdf कल्याण विशेषांक-व्रतपर्वोत्सव], गीताप्रेस गोरखपुर (पृ० १०१)।</ref>
तेषां वै रुद्रसायुज्यं सामीप्यञ्चातिदुर्लभम्॥ सलोकतां च सारूप्यं जायते तत्प्रसादतः॥ (कूर्मपुराण)</blockquote>जो व्रत, उपवास, नियम, होम, स्वाध्याय, तर्पण, यज्ञ, दान तथा ध्यान-समाधिके द्वारा भगवान् महादेवका अर्चन करते हैं, उन्हें भगवान् शंकरकी कृपासे अति दुर्लभ रुद्रसायुज्य, सामीप्य, सालोक्य तथा सारूप्य मोक्षकी प्राप्ति होती है।<ref>[https://dn710602.ca.archive.org/0/items/in.ernet.dli.2015.402143/2015.402143.Kalyaan-Virat.pdf कल्याण विशेषांक-व्रतपर्वोत्सव], गीताप्रेस गोरखपुर (पृ० १०१)।</ref>
      
==परिभाषा॥ Definition==
 
==परिभाषा॥ Definition==
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'''ऋग्वेद में व्रत॥ fasting in rigveda'''  
 
'''ऋग्वेद में व्रत॥ fasting in rigveda'''  
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व्रतों को व्यवाहारिक जीवन में प्रयोग करने वाले मनुष्य दीर्घजीवी होते हैं। सभी के साथ मित्रता की भावना रखने वाले व्रती को अगाध मात्रा में धन प्राप्त होता है। वाणी के सत्य एवं परिमित व्रतों के बारे में कहा गया है कि जो वाणी से कर्मों की महिमा बढ़ाते हैं उन्हें देवगण दुष्कर्म रूपी पापों से सुरक्षित करते हैं।
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व्रतों को व्यवाहारिक जीवन में प्रयोग करने वाले मनुष्य दीर्घजीवी होते हैं। सभी के साथ मित्रता की भावना रखने वाले व्रती को अगाध मात्रा में धन प्राप्त होता है। वाणी के सत्य एवं परिमित व्रतों के बारे में कहा गया है कि जो वाणी से कर्मों की महिमा बढ़ाते हैं उन्हें देवगण दुष्कर्म रूपी पापों से सुरक्षित करते हैं - <blockquote>
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त्वमग्ने व्रतपा असि देव आ मत्र्येष्वा। त्वं यज्ञेष्वीड्यः॥ (ऋग्वेद ८।११।१)
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</blockquote>हे अग्निदेव! आप व्रतका पालन-रक्षण करनेवाले हैं। हे दीप्तिमान् देव! आप सभी मनुष्योंमें विद्यमान रहते हैं। आप सभी यज्ञों (कर्मों) में विराजमान रहते हैं। आप प्रशंसनीय हैं, स्तुत्य हैं।  
    
'''यजुर्वेद में व्रत॥ fasting in yajurveda'''
 
'''यजुर्वेद में व्रत॥ fasting in yajurveda'''
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यजुर्वेद में सत्य बोलना एवं श्रेष्ठ कार्यों में निपुण होने को सभी व्रतों में श्रेष्ठ कहा है। अग्नि को व्रतपते कह कर सम्बोधित किया गया है। याचकों द्वारा अग्नि देव के अनुग्रह से सत्य का पालन करना वर्णित है। नियमपूर्वक सद्‌कार्यों से व्यक्ति का समर्थवान बनना वर्णित है। यह मनुष्य के आचरण, विचार और अन्तःकरण की शुद्धि का साधन है, जो उसे सत्य के मार्ग पर अग्रसर करता है। यजुर्वेद के मन्त्रों में कहा गया है कि -<blockquote>अग्ने व्रतपते व्रतं चरिष्यामि तच्छकेयं तन्मे राध्यताम्। इदमहमनृतात्सत्यमुपैमि॥ (यजु० १।५)</blockquote>व्रतोंकी रक्षा करनेवाले हे अग्निदेव! मैं व्रताचरण करूँगा, आप मुझे व्रतोंके आचरणकी शक्ति प्रदान कीजिये। मेरा यह व्रताचरण निर्विघ्न सम्पन्न हो जाय। मैं असत्यसे दूर रहकर सत्यका ही आचरण करूँ। ऐसा आशीर्वाद मुझे प्रदान कीजिये।<blockquote>व्रतेन दीक्षामाप्नोति दीक्षयाऽऽप्नोति दक्षिणाम्। दक्षिणा श्रद्धामाप्नोति श्रद्धया सत्यमाप्यते॥ (यजु० १९।३०)</blockquote>व्रत धारण करनेसे मनुष्य दीक्षित होता है। दीक्षासे उसे दाक्षिण्य (दक्षता, निपुणता) प्राप्त होता है। दक्षताकी प्राप्तिसे श्रद्धाका भाव जाग्रत् होता है और श्रद्धासे ही सत्यस्वरूप ब्रह्मकी प्राप्ति होती है।<blockquote>व्रतेन त्वं व्रतपते समक्तो विश्वाहा सुमना दीदिहीह। तं त्वा वयं जातवेदः समिद्धं प्रजावन्त उप सदेम सर्वे॥ (अथर्व० ७।७४।४)</blockquote>व्रतोंके स्वामी हे अग्निदेव ! आप व्रतानुष्ठानके द्वारा सम्यक् रूपसे प्रसन्न होते हैं। सर्वदा प्रसन्न मनवाले होकर आप हमारे घरमें प्रकाशित होनेकी कृपा करें। इस प्रकारके गुणोंसे सम्पन्न तथा सम्यक् रूपसे प्रकाशमान हे जातवेद ! पुत्र-पौत्रादिसे युक्त हम सभी आपकी उपासनामें लगे रहें।<blockquote>त्वमग्ने व्रतपा असि देव आ मत्र्येष्वा। त्वं यज्ञेष्वीड्यः॥ (ऋग्वेद ८।११।१)</blockquote>हे अग्निदेव! आप व्रतका पालन-रक्षण करनेवाले हैं। हे दीप्तिमान् देव! आप सभी मनुष्योंमें विद्यमान रहते हैं। आप सभी यज्ञों (कर्मों) में विराजमान रहते हैं। आप प्रशंसनीय हैं, स्तुत्य हैं। <blockquote>अन्नं न निन्द्यात्। तद् व्रतम्। अन्नं न परिचक्षीत। तद् व्रतम्। अन्नं बहु कुर्वीत। तद् व्रतम्। न कञ्चन वसतौ प्रत्याचक्षीत। तद् व्रतम्॥ (तैत्तिरीयोपनिषद् भृगुवल्ली अनु० ७-१०)</blockquote>अन्नकी निन्दा न करे, वह व्रत है। अन्नकी अवहेलना न करे, वह एक व्रत है। अन्नको बढ़ाये, वह एक व्रत है। अपने घरपर ठहरनेके लिये आये हुए किसी भी अतिथिको प्रतिकूल उत्तर न दे, वह एक व्रत है।<blockquote>सत्यमेव जयति नानृतं सत्येन पन्था विततो देवयानः। येनाक्रमन्त्वृषयो ह्याप्तकामा यत्र तत् सत्यस्य परमं निधानम्॥ (मुण्डक० ३।१।६) </blockquote>सत्य ही विजयी होता है, झूठ नहीं; क्योंकि वह देवयान नामक मार्ग सत्यसे परिपूर्ण है। जिससे पूर्णकाम ऋषिलोग (वहाँ) गमन करते हैं, जहाँ वह सत्यस्वरूप परब्रह्म परमात्माका उत्कृष्ट धाम है।
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यजुर्वेद में सत्य बोलना एवं श्रेष्ठ कार्यों में निपुण होने को सभी व्रतों में श्रेष्ठ कहा है। अग्नि को व्रतपते कह कर सम्बोधित किया गया है। याचकों द्वारा अग्नि देव के अनुग्रह से सत्य का पालन करना वर्णित है। नियमपूर्वक सद्‌कार्यों से व्यक्ति का समर्थवान बनना वर्णित है। यह मनुष्य के आचरण, विचार और अन्तःकरण की शुद्धि का साधन है, जो उसे सत्य के मार्ग पर अग्रसर करता है। यजुर्वेद के मन्त्रों में कहा गया है कि -<blockquote>अग्ने व्रतपते व्रतं चरिष्यामि तच्छकेयं तन्मे राध्यताम्। इदमहमनृतात्सत्यमुपैमि॥ (यजु० १।५)</blockquote>व्रतोंकी रक्षा करनेवाले हे अग्निदेव! मैं व्रताचरण करूँगा, आप मुझे व्रतोंके आचरणकी शक्ति प्रदान कीजिये। मेरा यह व्रताचरण निर्विघ्न सम्पन्न हो जाय। मैं असत्यसे दूर रहकर सत्यका ही आचरण करूँ। ऐसा आशीर्वाद मुझे प्रदान कीजिये।<blockquote>व्रतेन दीक्षामाप्नोति दीक्षयाऽऽप्नोति दक्षिणाम्। दक्षिणा श्रद्धामाप्नोति श्रद्धया सत्यमाप्यते॥ (यजु० १९।३०)</blockquote>व्रत धारण करनेसे मनुष्य दीक्षित होता है। दीक्षासे उसे दाक्षिण्य (दक्षता, निपुणता) प्राप्त होता है। दक्षताकी प्राप्तिसे श्रद्धाका भाव जाग्रत् होता है और श्रद्धासे ही सत्यस्वरूप ब्रह्मकी प्राप्ति होती है।
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'''अथर्ववेद में व्रत॥ fasting in Atharvaveda'''<blockquote>व्रतेन त्वं व्रतपते समक्तो विश्वाहा सुमना दीदिहीह। तं त्वा वयं जातवेदः समिद्धं प्रजावन्त उप सदेम सर्वे॥ (अथर्व० ७।७४।४)</blockquote>व्रतोंके स्वामी हे अग्निदेव ! आप व्रतानुष्ठानके द्वारा सम्यक् रूपसे प्रसन्न होते हैं। सर्वदा प्रसन्न मनवाले होकर आप हमारे घरमें प्रकाशित होनेकी कृपा करें। इस प्रकारके गुणोंसे सम्पन्न तथा सम्यक् रूपसे प्रकाशमान हे जातवेद ! पुत्र-पौत्रादिसे युक्त हम सभी आपकी उपासनामें लगे रहें।<blockquote>अन्नं न निन्द्यात्। तद् व्रतम्। अन्नं न परिचक्षीत। तद् व्रतम्। अन्नं बहु कुर्वीत। तद् व्रतम्। न कञ्चन वसतौ प्रत्याचक्षीत। तद् व्रतम्॥ (तैत्तिरीयोपनिषद् भृगुवल्ली अनु० ७-१०)</blockquote>अन्नकी निन्दा न करे, वह व्रत है। अन्नकी अवहेलना न करे, वह एक व्रत है। अन्नको बढ़ाये, वह एक व्रत है। अपने घरपर ठहरनेके लिये आये हुए किसी भी अतिथिको प्रतिकूल उत्तर न दे, वह एक व्रत है।<blockquote>सत्यमेव जयति नानृतं सत्येन पन्था विततो देवयानः। येनाक्रमन्त्वृषयो ह्याप्तकामा यत्र तत् सत्यस्य परमं निधानम्॥ (मुण्डक० ३।१।६) </blockquote>सत्य ही विजयी होता है, झूठ नहीं; क्योंकि वह देवयान नामक मार्ग सत्यसे परिपूर्ण है। जिससे पूर्णकाम ऋषिलोग (वहाँ) गमन करते हैं, जहाँ वह सत्यस्वरूप परब्रह्म परमात्माका उत्कृष्ट धाम है।
    
== पुराणों में व्रत परंपरा॥ fasting tradition in Puranas==
 
== पुराणों में व्रत परंपरा॥ fasting tradition in Puranas==
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पुराण विभिन्न प्रकार के व्रतों को दर्शाते हैं, जैसे -  
 
पुराण विभिन्न प्रकार के व्रतों को दर्शाते हैं, जैसे -  
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*'''कायिका व्रत -''' यह शरीर से संबंधित व्रत है। उपवास जैसी शारीरिक तपस्या पर जोर दिया जाता है।
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*'''कायिक व्रत -''' यह शरीर से संबंधित व्रत है। उपवास जैसी शारीरिक तपस्या पर जोर दिया जाता है। हिंसा आदिके त्यागको कायिकव्रत कहते हैं।
*'''वाचिक व्रत -''' यह वाणी से संबंधित व्रत। यहां सत्य बोलने और धर्मग्रंथों का पाठ करने को बहुत महत्व दिया जाता है।
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*'''वाचिक व्रत -''' यह वाणी से संबंधित व्रत है, इसमें सत्य बोलने और धर्मग्रंथों का पाठ करने को बहुत महत्व दिया जाता है। कटुवाणी, पिशुनता (चुगुली) तथा निन्दाका त्याग और सत्य, परिमित तथा हितयुक्त मधुर भाषण वाचिकव्रत कहा जाता है।
*'''मानसिक व्रत -''' यह मन से संबंधित व्रत। यहां जोर मन को नियंत्रित करने, उसमें उत्पन्न होने वाले जुनून और पूर्वाग्रहों को नियंत्रित करने पर है।
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*'''मानसिक व्रत -''' यह मन से संबंधित व्रत। यहां जोर मन को नियंत्रित करने, उसमें उत्पन्न होने वाले जुनून और पूर्वाग्रहों को नियंत्रित करने पर है। काम, क्रोध, लोभ, मद, मात्सर्य, ईर्ष्या तथा राग-द्वेष आदिसे रहित रहना मानसिक व्रत है।
    
एक व्रत को उसकी अवधि के आधार पर भी वर्गीकृत किया जा सकता है, एक दिन तक चलने वाला व्रत दिन-व्रत होता है, और एक पक्ष (सप्ताह) तक चलने वाला व्रत पक्ष-व्रत होता है।
 
एक व्रत को उसकी अवधि के आधार पर भी वर्गीकृत किया जा सकता है, एक दिन तक चलने वाला व्रत दिन-व्रत होता है, और एक पक्ष (सप्ताह) तक चलने वाला व्रत पक्ष-व्रत होता है।
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#लक्ष्यके प्रति जागरूकता
 
#लक्ष्यके प्रति जागरूकता
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व्रतोंसे अन्तःकरणकी शुद्धिके साथ-साथ बाह्य वातावरणमें भी पवित्रता आती है तथा संकल्पशक्तिमें दृढ़ता आती है। इनसे मानसिक शान्ति और ईश्वरकी भक्ति भी प्राप्त होती है। भौतिक दृष्टिसे स्वास्थ्यमें भी लाभ होता है अर्थात् रोगोंकी आत्यन्तिक निवृत्ति होती है। यद्यपि रोग भी पाप हैं और ऐसे पाप व्रतोंसे ही दूर भी होते हैं तथापि कायिक, वाचिक, मानसिक और संसर्गजनित सभी प्रकारके पाप, उपपाप और महापापादि भी व्रतोंसे ही दूर होते हैं। व्रत दो प्रकारसे किये जाते हैं -<ref>भवनाथ झा, धर्मायण-व्रत विधि विशेषांक, [https://mahavirmandirpatna.org/dharmayan/wp-content/uploads/2022/07/Dharmayan-vol.-119-Vrata-vidhi-Ank-ebook.pdf म०म० रुद्रधर कृत व्रत-पद्धति में व्रत-विधान] (२०२२), महावीर मन्दिर, पटना (पृ० ३)।</ref>
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व्रतोंसे अन्तःकरणकी शुद्धिके साथ-साथ बाह्य वातावरणमें भी पवित्रता आती है तथा संकल्पशक्तिमें दृढ़ता आती है। इनसे मानसिक शान्ति और ईश्वरकी भक्ति भी प्राप्त होती है। भौतिक दृष्टिसे स्वास्थ्यमें भी लाभ होता है अर्थात् रोगोंकी आत्यन्तिक निवृत्ति होती है। यद्यपि रोग भी पाप हैं और ऐसे पाप व्रतोंसे ही दूर भी होते हैं तथापि कायिक, वाचिक, मानसिक और संसर्गजनित सभी प्रकारके पाप, उपपाप और महापापादि भी व्रतोंसे ही दूर होते हैं। व्रत दो प्रकारसे किये जाते हैं -<ref>भवनाथ झा, धर्मायण-व्रत विधि विशेषांक, [https://mahavirmandirpatna.org/dharmayan/wp-content/uploads/2022/07/Dharmayan-vol.-119-Vrata-vidhi-Ank-ebook.pdf म०म० रुद्रधर कृत व्रत-पद्धति में व्रत-विधान] (२०२२), महावीर मन्दिर, पटना (पृ० ३)।</ref> उपवास - निराहार रहकर और एक बार संयमित आहारके द्वारा, इन व्रतोंके कई भेद हैं।
 
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उपवास - निराहार रहकर और एक बार संयमित आहारके द्वारा। इन व्रतोंके कई भेद हैं-
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#कायिक हिंसा आदिके त्यागको कायिकव्रत कहते हैं।
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#वाचिक- कटुवाणी, पिशुनता (चुगुली) तथा निन्दाका त्याग और सत्य, परिमित तथा हितयुक्त मधुर भाषण 'वाचिकव्रत' कहा जाता है।
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#मानसिक - काम, क्रोध, लोभ, मद, मात्सर्य, ईर्ष्या तथा राग-द्वेष आदिसे रहित रहना 'मानसिकव्रत' है।
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मुख्य रूपसे अपने यहाँ तीन प्रकारके व्रत माने गये हैं-
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#नित्य
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#नैमित्तिक
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#काम्य
      
==व्रत की उपयोगिता॥ Vrat ki Upayogita==
 
==व्रत की उपयोगिता॥ Vrat ki Upayogita==
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==निष्कर्ष॥ Conclusion==
 
==निष्कर्ष॥ Conclusion==
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अग्नि पुराण तथा गरुड़ पुराण में यह प्रतिपादित किया गया है कि व्रत का वास्तविक स्वरूप इन्द्रियों के संयम से ही सिद्ध होता है। केवल बाह्य क्रियाएँ जैसे - उपवास, स्नान या पूजा व्रत की पूर्णता नहीं प्रदान करतीं, जब तक कि साधक आंतरिक रूप से विषयासक्ति का त्याग न करे। अतः व्रत का स्वरूप द्वि-आयामी है -
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* बाह्य (External): उपवास, पूजा, आचार
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* आंतरिक (Internal): मनोनिग्रह, इन्द्रियसंयम, संकल्पशुद्धि
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यह द्वैत ही व्रत को एक समग्र आध्यात्मिक साधना बनाता है।
    
==उद्धरण॥ References==
 
==उद्धरण॥ References==
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