Difference between revisions of "Navaratri (नवरात्रि)"

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(नया लेख प्रारंभ - नवरात्रि)
 
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भारतीय धार्मिक परंपरा में नवरात्रि एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण व्रत एवं उत्सव है, जो शक्ति-उपासना का प्रमुख साधन माना जाता है। यह वर्ष में चार बार मनाया जाता है। नवरात्रि का शाब्दिक अर्थ है 'नौ रात्रियाँ, जिनमें आदिशक्ति के विविध रूपों की उपासना की जाती है। दुर्गापूजा का यह उत्सव विविध रूपों में मनाया जाता है। इसे दुर्गोत्सव या नवरात्र कहा जाता है।
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भारतीय धार्मिक परंपरा में नवरात्रि एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण व्रत एवं उत्सव है, जो शक्ति-उपासना का प्रमुख साधन माना जाता है। यह वर्ष में चार बार मनाया जाता है। नवरात्रि का शाब्दिक अर्थ है 'नौ रात्रियाँ, जिनमें आदिशक्ति के विविध रूपों की उपासना की जाती है। दुर्गापूजा का यह उत्सव विविध रूपों में मनाया जाता इसे दुर्गोत्सव या नवरात्र कहा जाता है।
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== परिचय॥ Introduction ==
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भारतीय परंपरा में नवरात्रि मात्र एक उत्सव नहीं, अपितु अत्यंत संगठित व्रत-साधना का काल है, जिसमें शक्ति-तत्त्व की उपासना, काल-विज्ञान तथा अनुष्ठानिक अनुशासन का समन्वय देखने को मिलता है। नवरात्रि व्रत वर्ष में चैत्र, आषाढ़, आश्विन और माघ - इन चार महीनों के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से प्रारम्भ होकर नवमी तिथि तक, कुल नौ दिनों तक विधिवत् सम्पन्न किया जाता है। इन नौ दिनों में साधक देवी के विभिन्न रूपों की उपासना, व्रत, जप, ध्यान एवं अनुष्ठान करते हुए आत्मशुद्धि और आध्यात्मिक उन्नति का प्रयास करता है।
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== व्रत-विधान के प्रमुख अंग ==
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== उद्धरण ==
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[[Category:हिंदी भाषा के लेख]]
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[[Category:Hindi Articles]]

Revision as of 16:41, 28 April 2026

भारतीय धार्मिक परंपरा में नवरात्रि एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण व्रत एवं उत्सव है, जो शक्ति-उपासना का प्रमुख साधन माना जाता है। यह वर्ष में चार बार मनाया जाता है। नवरात्रि का शाब्दिक अर्थ है 'नौ रात्रियाँ, जिनमें आदिशक्ति के विविध रूपों की उपासना की जाती है। दुर्गापूजा का यह उत्सव विविध रूपों में मनाया जाता इसे दुर्गोत्सव या नवरात्र कहा जाता है।

परिचय॥ Introduction

भारतीय परंपरा में नवरात्रि मात्र एक उत्सव नहीं, अपितु अत्यंत संगठित व्रत-साधना का काल है, जिसमें शक्ति-तत्त्व की उपासना, काल-विज्ञान तथा अनुष्ठानिक अनुशासन का समन्वय देखने को मिलता है। नवरात्रि व्रत वर्ष में चैत्र, आषाढ़, आश्विन और माघ - इन चार महीनों के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से प्रारम्भ होकर नवमी तिथि तक, कुल नौ दिनों तक विधिवत् सम्पन्न किया जाता है। इन नौ दिनों में साधक देवी के विभिन्न रूपों की उपासना, व्रत, जप, ध्यान एवं अनुष्ठान करते हुए आत्मशुद्धि और आध्यात्मिक उन्नति का प्रयास करता है।

व्रत-विधान के प्रमुख अंग

उद्धरण