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| − | भारतीय संस्कृति में "व्रत" की संकल्पना अत्यंत प्राचीन एवं व्यापक रही है। किसी विशेष उद्देश्य की प्राप्ति के लिए संकल्पपूर्वक नियमों का पालन करना। इसमें व्यक्ति अपने आहार, व्यवहार तथा विचारों पर नियंत्रण रखता है। यह मात्र धार्मिक अनुष्ठान नहीं, अपितु आत्मसंयम, आचार-शुद्धि एवं संकल्प-प्रधान जीवन पद्धति का द्योतक है। व्रत का संबंध व्यक्ति के आंतरिक अनुशासन तथा बाह्य आचरण दोनों से है, जो उसे आध्यात्मिक उन्नति की दिशा में अग्रसर करता है। | + | भारतीय संस्कृति में "व्रत" की संकल्पना अत्यंत प्राचीन एवं व्यापक रही है। किसी विशेष उद्देश्य की प्राप्ति के लिए संकल्पपूर्वक नियमों का पालन करना व्रत कहलाता है। इसमें व्यक्ति अपने आहार, व्यवहार तथा विचारों पर नियंत्रण रखता है। व्रत मात्र धार्मिक अनुष्ठान नहीं, अपितु आत्मसंयम, आचार-शुद्धि एवं संकल्प-प्रधान जीवन पद्धति का द्योतक है। इसका संबंध व्यक्ति के आंतरिक अनुशासन तथा बाह्य आचरण दोनों से है, जो उसे आध्यात्मिक उन्नति की दिशा में अग्रसर करता है। |
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| | ==परिचय॥ Introduction== | | ==परिचय॥ Introduction== |
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| | जो सदा ही व्रतपरायण रहते हैं और भगवान् शिवका स्मरण करते रहते हैं, उनके सामने महान् भय उत्पन्न करनेवाले, हाथमें पाश धारण किये हुए, भयंकर दाढ़ोंसे युक्त मुखवाले तथा उग्र वेशवाले यमराजके विकट दूत नहीं आते। | | जो सदा ही व्रतपरायण रहते हैं और भगवान् शिवका स्मरण करते रहते हैं, उनके सामने महान् भय उत्पन्न करनेवाले, हाथमें पाश धारण किये हुए, भयंकर दाढ़ोंसे युक्त मुखवाले तथा उग्र वेशवाले यमराजके विकट दूत नहीं आते। |
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| − | अर्चयन्ति महादेवं यज्ञदानसमाधिभिः ॥ व्रतोपवासनियमैहोंमैः स्वाध्यायतर्पणैः । तेषां वै रुद्रसायुज्यं सामीप्यञ्चातिदुर्लभम् ॥ सलोकतां च सारूप्यं जायते तत्प्रसादतः । (कूर्मपुराण) | + | अर्चयन्ति महादेवं यज्ञदानसमाधिभिः॥ व्रतोपवासनियमैहोंमैः स्वाध्यायतर्पणैः। तेषां वै रुद्रसायुज्यं सामीप्यञ्चातिदुर्लभम् ॥ सलोकतां च सारूप्यं जायते तत्प्रसादतः। (कूर्मपुराण) |
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| | जो व्रत, उपवास, नियम, होम, स्वाध्याय, तर्पण, यज्ञ, दान तथा ध्यान-समाधिके द्वारा भगवान् महादेवका अर्चन करते हैं, उन्हें भगवान् शंकरकी कृपासे अति दुर्लभ रुद्रसायुज्य, सामीप्य, सालोक्य तथा सारूप्य मोक्षकी प्राप्ति होती है।<ref>[https://dn710602.ca.archive.org/0/items/in.ernet.dli.2015.402143/2015.402143.Kalyaan-Virat.pdf कल्याण विशेषांक-व्रतपर्वोत्सव], गीताप्रेस गोरखपुर (पृ० १०१)।</ref> | | जो व्रत, उपवास, नियम, होम, स्वाध्याय, तर्पण, यज्ञ, दान तथा ध्यान-समाधिके द्वारा भगवान् महादेवका अर्चन करते हैं, उन्हें भगवान् शंकरकी कृपासे अति दुर्लभ रुद्रसायुज्य, सामीप्य, सालोक्य तथा सारूप्य मोक्षकी प्राप्ति होती है।<ref>[https://dn710602.ca.archive.org/0/items/in.ernet.dli.2015.402143/2015.402143.Kalyaan-Virat.pdf कल्याण विशेषांक-व्रतपर्वोत्सव], गीताप्रेस गोरखपुर (पृ० १०१)।</ref> |
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| | + | ==परिभाषा== |
| | + | व्रत शब्द संस्कृत के वृञ् वरणे धातु से बना है, जिसका अर्थ है, चुनना और संकल्प करना। अर्थात इंद्रियनिग्रह, मनोनिग्रह और आचरण शुद्धि का समन्वय जिसमें सम्मिलित होता हो। अतः व्रत का मूल अर्थ हुआ - नियमपूर्वक किया गया दृढ संकल्प। |
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| | + | == वैदिक साहित्य में व्रत विधान== |
| | + | वैदिक एवं उपनिषद् साहित्य में व्रत की संकल्पना अत्यन्त व्यापक रूप में प्रस्तुत हुई है। सामान्यतः व्रत को केवल उपवास या किसी विशेष तिथि पर किए जाने वाले धार्मिक अनुष्ठान के रूप में समझ लिया जाता है, किन्तु वैदिक दृष्टि में व्रत का स्वरूप इससे कहीं अधिक गूढ़ और जीवनपर्यन्त साधना से सम्बद्ध है। यह मनुष्य के आचरण, विचार और अन्तःकरण की शुद्धि का साधन है, जो उसे सत्य के मार्ग पर अग्रसर करता है। यजुर्वेद के मन्त्रों में कहा गया है कि - <blockquote>अग्ने व्रतपते व्रतं चरिष्यामि तच्छकेयं तन्मे राध्यताम्। इदमहमनृतात्सत्यमुपैमि॥ (यजु० १।५)</blockquote>व्रतोंकी रक्षा करनेवाले हे अग्निदेव! मैं व्रताचरण करूँगा, आप मुझे व्रतोंके आचरणकी शक्ति प्रदान कीजिये। मेरा यह व्रताचरण निर्विघ्न सम्पन्न हो जाय। मैं असत्यसे दूर रहकर सत्यका ही आचरण करूँ। ऐसा आशीर्वाद मुझे प्रदान कीजिये।<blockquote>व्रतेन दीक्षामाप्नोति दीक्षयाऽऽप्नोति दक्षिणाम्। दक्षिणा श्रद्धामाप्नोति श्रद्धया सत्यमाप्यते॥ (यजु० १९।३०)</blockquote>व्रत धारण करनेसे मनुष्य दीक्षित होता है। दीक्षासे उसे दाक्षिण्य (दक्षता, निपुणता) प्राप्त होता है। दक्षताकी प्राप्तिसे श्रद्धाका भाव जाग्रत् होता है और श्रद्धासे ही सत्यस्वरूप ब्रह्मकी प्राप्ति होती है।<blockquote>व्रतेन त्वं व्रतपते समक्तो विश्वाहा सुमना दीदिहीह। तं त्वा वयं जातवेदः समिद्धं प्रजावन्त उप सदेम सर्वे॥ (अथर्व० ७।७४।४)</blockquote>व्रतोंके स्वामी हे अग्निदेव ! आप व्रतानुष्ठानके द्वारा सम्यक् रूपसे प्रसन्न होते हैं। सर्वदा प्रसन्न मनवाले होकर आप हमारे घरमें प्रकाशित होनेकी कृपा करें। इस प्रकारके गुणोंसे सम्पन्न तथा सम्यक् रूपसे प्रकाशमान हे जातवेद ! पुत्र-पौत्रादिसे युक्त हम सभी आपकी उपासनामें लगे रहें।<blockquote>त्वमग्ने व्रतपा असि देव आ मत्र्येष्वा। त्वं यज्ञेष्वीड्यः॥ (ऋग्वेद ८।११।१)</blockquote>हे अग्निदेव! आप व्रतका पालन-रक्षण करनेवाले हैं। हे दीप्तिमान् देव! आप सभी मनुष्योंमें विद्यमान रहते हैं। आप सभी यज्ञों (कर्मों) में विराजमान रहते हैं। आप प्रशंसनीय हैं, स्तुत्य हैं। <blockquote>अन्नं न निन्द्यात्। तद् व्रतम्। अन्नं न परिचक्षीत। तद् व्रतम्। अन्नं बहु कुर्वीत। तद् व्रतम्। न कञ्चन वसतौ प्रत्याचक्षीत। तद् व्रतम्॥ (तैत्तिरीयोपनिषद् भृगुवल्ली अनु० ७-१०)</blockquote>अन्नकी निन्दा न करे, वह व्रत है। अन्नकी अवहेलना न करे, वह एक व्रत है। अन्नको बढ़ाये, वह एक व्रत है। अपने घरपर ठहरनेके लिये आये हुए किसी भी अतिथिको प्रतिकूल उत्तर न दे, वह एक व्रत है।<blockquote>सत्यमेव जयति नानृतं सत्येन पन्था विततो देवयानः। येनाक्रमन्त्वृषयो ह्याप्तकामा यत्र तत् सत्यस्य परमं निधानम्॥ (मुण्डक० ३।१।६) </blockquote>सत्य ही विजयी होता है, झूठ नहीं; क्योंकि वह देवयान नामक मार्ग सत्यसे परिपूर्ण है। जिससे पूर्णकाम ऋषिलोग (वहाँ) गमन करते हैं, जहाँ वह सत्यस्वरूप परब्रह्म परमात्माका उत्कृष्ट धाम है। |
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| | + | ==पुराणों में व्रत परंपरा== |
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| | ==व्रतों के प्रकार॥ Types of Vrat== | | ==व्रतों के प्रकार॥ Types of Vrat== |
| | + | शास्त्रों के अनुसार व्रत के निम्नलिखित चार प्रकार हैं - |
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| | + | #उपवास |
| | + | #एकभुक्त |
| | + | #नक्त |
| | + | #अयाचित |
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| | व्रताचरणसे मनुष्यकों उन्नत जीवनकी योग्यता प्राप्त होती है। व्रतोंमें तीन बातोंकी प्रधानता है - | | व्रताचरणसे मनुष्यकों उन्नत जीवनकी योग्यता प्राप्त होती है। व्रतोंमें तीन बातोंकी प्रधानता है - |
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| − | #संयम- नियमका पालन | + | #संयम-नियमका पालन |
| | #देवाराधन | | #देवाराधन |
| | #लक्ष्यके प्रति जागरूकता | | #लक्ष्यके प्रति जागरूकता |
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| − | व्रतोंसे अन्तःकरणकी शुद्धिके साथ-साथ बाह्य वातावरणमें भी पवित्रता आती है तथा संकल्पशक्तिमें दृढ़ता आती है। इनसे मानसिक शान्ति और ईश्वरकी भक्ति भी प्राप्त होती है। भौतिक दृष्टिसे स्वास्थ्यमें भी लाभ होता है अर्थात् रोगोंकी आत्यन्तिक निवृत्ति होती है। यद्यपि रोग भी पाप हैं और ऐसे पाप व्रतोंसे ही दूर भी होते हैं तथापि कायिक, वाचिक, मानसिक और संसर्गजनित सभी प्रकारके पाप, उपपाप और महापापादि भी व्रतोंसे ही दूर होते हैं। व्रत दो प्रकारसे किये जाते हैं - | + | व्रतोंसे अन्तःकरणकी शुद्धिके साथ-साथ बाह्य वातावरणमें भी पवित्रता आती है तथा संकल्पशक्तिमें दृढ़ता आती है। इनसे मानसिक शान्ति और ईश्वरकी भक्ति भी प्राप्त होती है। भौतिक दृष्टिसे स्वास्थ्यमें भी लाभ होता है अर्थात् रोगोंकी आत्यन्तिक निवृत्ति होती है। यद्यपि रोग भी पाप हैं और ऐसे पाप व्रतोंसे ही दूर भी होते हैं तथापि कायिक, वाचिक, मानसिक और संसर्गजनित सभी प्रकारके पाप, उपपाप और महापापादि भी व्रतोंसे ही दूर होते हैं। व्रत दो प्रकारसे किये जाते हैं -<ref>भवनाथ झा, धर्मायण-व्रत विधि विशेषांक, [https://mahavirmandirpatna.org/dharmayan/wp-content/uploads/2022/07/Dharmayan-vol.-119-Vrata-vidhi-Ank-ebook.pdf म०म० रुद्रधर कृत व्रत-पद्धति में व्रत-विधान] (२०२२), महावीर मन्दिर, पटना (पृ० ३)।</ref> |
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| | उपवास - निराहार रहकर और एक बार संयमित आहारके द्वारा। इन व्रतोंके कई भेद हैं- | | उपवास - निराहार रहकर और एक बार संयमित आहारके द्वारा। इन व्रतोंके कई भेद हैं- |
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| | #नैमित्तिक | | #नैमित्तिक |
| | #काम्य | | #काम्य |
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| | + | ==व्रत की उपयोगिता== |
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| | ==निष्कर्ष॥ Conclusion== | | ==निष्कर्ष॥ Conclusion== |
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| | [[Category:हिंदी भाषा के लेख]] | | [[Category:हिंदी भाषा के लेख]] |
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| | + | <references /> |