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| − | भारतीय ज्ञान परंपरा में आजीविका अथवा जीवन-वृत्ति मात्र आर्थिक दायित्व न होकर एक विस्तृत नैतिक, सामाजिक और धर्मसंबद्ध अवधारणा है। धर्मशास्त्र, अर्थशास्त्र तथा नीतिग्रंथ इस विषय को कर्तव्य, उत्तरदायित्व और सामाजिक संतुलन के रूप में निरूपित करते हैं। प्रस्तुत लेख में जीवन-वृत्ति की संकल्पना, उसके शास्त्रीय आधार, पारिवारिक एवं सामाजिक दायित्व तथा आधुनिक संदर्भों में उसकी प्रासंगिकता का विश्लेषण किया गया है। | + | भारतीय ज्ञान परंपरा में आजीविका अथवा जीवन-वृत्ति मात्र आर्थिक दायित्व न होकर एक विस्तृत नैतिक, सामाजिक और धर्मसंबद्ध अवधारणा है। धर्मशास्त्र, अर्थशास्त्र तथा नीतिग्रंथ इस विषय को कर्तव्य, उत्तरदायित्व और सामाजिक संतुलन के रूप में निरूपित करते हैं। प्रस्तुत लेख में आजीविका की संकल्पना, उसके शास्त्रीय आधार, पारिवारिक एवं सामाजिक दायित्व तथा आधुनिक संदर्भों में उसकी प्रासंगिकता का विश्लेषण किया गया है। |
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| − | == परिचय॥ Introduction == | + | ==परिचय॥ Introduction== |
| | मानव जीवन की निरंतरता का मूल आधार जीवन-वृत्ति है। भारतीय परंपरा में जीविका केवल आत्मनिर्वाह का साधन नहीं, अपितु समाज और परिवार के प्रति उत्तरदायित्व का भी प्रतीक है। भरण-पोषण का प्रश्न तभी उत्पन्न होता है जब व्यक्ति आश्रित संबंधों - जैसे माता-पिता, पत्नी, संतान, वृद्ध एवं दुर्बल जन के प्रति अपने कर्तव्यों का निर्वहन करता है। शास्त्रों ने इसे धर्म का अनिवार्य अंग माना है। | | मानव जीवन की निरंतरता का मूल आधार जीवन-वृत्ति है। भारतीय परंपरा में जीविका केवल आत्मनिर्वाह का साधन नहीं, अपितु समाज और परिवार के प्रति उत्तरदायित्व का भी प्रतीक है। भरण-पोषण का प्रश्न तभी उत्पन्न होता है जब व्यक्ति आश्रित संबंधों - जैसे माता-पिता, पत्नी, संतान, वृद्ध एवं दुर्बल जन के प्रति अपने कर्तव्यों का निर्वहन करता है। शास्त्रों ने इसे धर्म का अनिवार्य अंग माना है। |
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| | + | ==धर्मशास्त्रीय दृष्टि से संपत्ति-चिन्तन== |
| | + | भारतीय धर्मशास्त्रीय परम्परा में संपत्ति का विचार केवल आर्थिक अधिकार का विषय नहीं है, अपितु वह धर्म, कर्तव्य, सामाजिक संरचना और न्याय-व्यवस्था का अभिन्न अंग है। आधुनिक विधि-शास्त्र में संपत्ति को प्रायः स्वामित्व और उपभोग के अधिकार तक सीमित कर दिया जाता है, किन्तु धर्मशास्त्रों में संपत्ति एक नैतिक और दायित्वपूर्ण अवधारणा है। संपत्ति-संबंधी निर्णय केवल ग्रंथोक्त वचनों पर आधारित नहीं होते, बल्कि लोक-व्यवहार, युक्ति और परम्परा भी उनके निर्धारण में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं । |
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| | + | याज्ञवल्क्य सिद्धान्त है कि स्मृतियों में परस्पर विरोध होने पर व्यवहार को बल देना चाहिए, भारतीय विधि-चिन्तन की व्यावहारिकता को व्यक्त करता है। इसका आशय यह है कि यदि शास्त्रीय ग्रंथों में मतभेद हो, तो समाज में प्रचलित न्यायोचित आचरण को मान्यता दी जाए। यह दृष्टिकोण संपत्ति-विवादों में विशेष रूप से प्रासंगिक है, क्योंकि उत्तराधिकार, विभाजन या स्वामित्व के प्रश्न अनेक परिस्थितियों में उत्पन्न होते हैं। शास्त्र का उद्देश्य समाज की स्थिरता है, अतः जहाँ शास्त्र-वचन और व्यवहार में सामंजस्य संभव न हो, वहाँ न्यायपूर्ण व्यवहार को प्राथमिकता दी जाती है। |
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| | + | बृहस्पति का कथन कि - |
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| | + | केवल शास्त्र के आधार पर निर्णय नहीं करना चाहिए, युक्तिहीन विचार धर्म की हानि करता है - इस तथ्य को और स्पष्ट करता है। यहाँ ‘युक्ति’ का अर्थ तर्क, परिस्थिति-विवेक और सामाजिक परिणामों की समझ से है। यदि संपत्ति का विभाजन या अधिकार-निर्णय केवल ग्रंथ के शाब्दिक अर्थ पर आधारित होगा और परिस्थितियों की उपेक्षा करेगा, तो वह न्यायसंगत नहीं माना जाएगा। धर्मशास्त्र का लक्ष्य जीवंत समाज है, न कि जड़ नियमों का अनुपालन। |
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| | + | संपत्ति की संकल्पना धर्मशास्त्रों में व्यापक है। इसमें स्वार्जित धन, पैतृक दाय, स्त्रीधन, संयुक्त पारिवारिक संपत्ति और सामुदायिक अधिकार सम्मिलित हैं। पैतृक संपत्ति पर पुत्रों का जन्मसिद्ध अधिकार स्वीकार किया गया है, जिससे संयुक्त परिवार व्यवस्था को स्थायित्व प्राप्त हुआ। यह व्यवस्था केवल आर्थिक साझेदारी नहीं, अपितु पारिवारिक उत्तरदायित्व का भी प्रतीक थी। संपत्ति का अर्थ यहाँ उपभोग से अधिक संरक्षण और उत्तराधिकार की परम्परा का निर्वाह है। |
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| | + | *स्त्रीधन की अवधारणा धर्मशास्त्रीय संपत्ति-विचार का एक महत्त्वपूर्ण पक्ष है। विवाह, उपहार, आभूषण या विशेष अनुदान के रूप में स्त्री को प्राप्त धन पर उसका विशिष्ट अधिकार माना गया। यह व्यवस्था स्त्री की आर्थिक सुरक्षा का साधन थी। यद्यपि समय-समय पर इसके स्वरूप में परिवर्तन हुआ, तथापि मूल भावना स्त्री के स्वामित्व की स्वीकृति थी। |
| | + | *व्यवहार-ग्रंथों में यह भी कहा गया है कि - देश, जाति और कुल में प्रचलित नियमों का सम्मान किया जाना चाहिए। इसका आशय यह है कि संपत्ति-विवादों में स्थानीय परम्परा और सामाजिक स्वीकृति का विचार आवश्यक है। यदि न्यायाधीश लोक-परम्परा की उपेक्षा करेगा, तो समाज में असंतोष उत्पन्न होगा और न्याय-व्यवस्था की प्रतिष्ठा पर आघात पहुँचेगा। इस प्रकार धर्मशास्त्रीय संपत्ति-व्यवस्था सामाजिक संतुलन की रक्षक है। |
| | + | *धर्म, अर्थ और न्याय का यह समन्वित दृष्टिकोण आधुनिक विधि-चिन्तन के लिए भी शिक्षाप्रद है। आज के उत्तराधिकार कानून, संयुक्त परिवार की अवधारणा तथा स्त्री-अधिकारों में इस परम्परा की प्रतिध्वनि देखी जा सकती है। अंतर केवल इतना है कि आधुनिक विधि अधिक औपचारिक और संहिताबद्ध है, जबकि धर्मशास्त्रीय व्यवस्था अधिक जीवन-सापेक्ष और लचीली थी। |
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| | + | अतः यह कहा जा सकता है कि भारतीय धर्मशास्त्रीय संपत्ति-चिन्तन एक जीवंत न्याय-दर्शन प्रस्तुत करता है, जिसमें शास्त्र, युक्ति और लोकाचार का समन्वय है। यह प्रणाली कठोर विधिक संरचना न होकर सामाजिक नैतिकता का व्यावहारिक रूप है। धर्मशास्त्र में निहित सिद्धान्तों के आधार पर स्पष्ट होता है कि संपत्ति का प्रश्न केवल अधिकार का नहीं, अपितु उत्तरदायित्व और सामाजिक समन्वय का भी विषय है।<ref>शोधकर्त्री- सुनीता देवी, [https://shodhganga.inflibnet.ac.in/handle/10603/108932 स्मृति साहित्य में स्त्रियों के सम्पत्ति विषयक अधिकारों का वर्तमान परिप्रेक्ष्य में अनुशीलन] (२००९), शोधकेन्द्र- पंजाब विश्वविद्यालय, चण्डीगढ (पृ० ७९)।</ref> |
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| | + | ==संपत्ति का वर्गीकरण== |
| | + | '''चल तथा अचल सम्पत्ति''' |
| | + | {| class="wikitable" |
| | + | |+चल एवं अचल संपत्ति |
| | + | !प्रकार |
| | + | !उदाहरण |
| | + | !विशेषता |
| | + | |- |
| | + | |चल संपत्ति |
| | + | |स्वर्ण, रजत, पशु, धन आदि |
| | + | |परिवर्तनशील |
| | + | |- |
| | + | |अचल संपत्ति |
| | + | |भूमि, गृह, क्षेत्र आदि |
| | + | |स्थायी |
| | + | |} |
| | + | '''पैतृक सम्पत्ति॥ Ancestral Property -''' पूर्वजों से प्राप्त संपत्ति इस पर पुत्रों का जन्मसिद्ध अधिकार माना गया है। |
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| | + | '''स्वार्जित सम्पत्ति॥ Self-acquired Property –''' व्यक्ति के परिश्रम, व्यापार, विद्या या सेवा से अर्जित धन उपार्जित सम्पत्ति कहलाता है। |
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| | + | ==सम्पत्ति का विभाजन== |
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| | + | ==स्त्रीधन की अवधारणा== |
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| | ==आजीविका की संकल्पना॥ Concept of livelihood== | | ==आजीविका की संकल्पना॥ Concept of livelihood== |