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भारतीय ज्ञान परम्परा द्वारा समाज में धर्मसम्मत आचार, व्यवहार, प्रायश्चित्त, सामाजिक एवं वैयक्तिक कर्तव्य-अकर्तव्य आदि कर्मों के सुव्यवस्थित निर्धारण हेतु धर्मशास्त्र का प्रवर्तन हुआ तथा वैदिकसाहित्य में यह कल्प नामक वेदांग के रूप में प्रतिष्ठित है। इस शास्त्र के अन्तर्गत मनु, याज्ञवल्क्य, पराशर, बृहस्पति, बौधायन, जीमूतवाहन, विज्ञानेश्वर तथा कौटिल्य आदि आचार्यों के सूत्र, स्मृतियाँ, भाष्य एवं समकालीन निबन्धात्मक प्राचीन ग्रन्थों का अध्ययन किया जाता है।
परिचय
धर्मशास्त्र में सामाजिक आचार-विचार, व्यवस्था, वर्ण-आश्रम धर्म, नीति, सदाचार, राजा-प्रजा के अधिकार एवं कर्तव्य तथा शासन से सम्बन्धित नियम आदि का सुव्यवस्थित विवेचन किया गया है। धर्मशास्त्र शब्द दो पदों धर्म और शास्त्र के संयोग से निर्मित है। इन दोनों पदों के शाब्दिक अर्थों का ज्ञान आवश्यक है। धर्म शब्द पुल्लिंग एवं नपुंसकलिंग दोनों रूपों में प्रयुक्त होता है। प्रसिद्ध प्राच्यविद् पण्डित तारिणीश झा ने संस्कृत-शब्दार्थ-कोश में क्रमशः -
ध्रियते लोकानेन, ध्रियते लोकाः वा तथा ध्रियते लोकान् ध्रियते पुण्यात्मान् इति वा। (शब्दकोश)
इस प्रकार व्युत्पत्ति करते हुए धृ धातु से मन प्रत्यय द्वारा धर्म शब्द की निष्पत्ति मानी है तथा इसके पुल्लिंग एवं नपुंसकलिंग दोनों प्रयोगों को स्वीकार किया है। शास्त्र शब्द का अर्थ भी उपर्युक्त शब्दकोशकार द्वारा प्रायः समान रूप में ग्रहण किया गया है। शास् धातु से ष्ट्रन् प्रत्यय के योग से शास्त्र शब्द की निष्पत्ति मानी गई है। विभिन्न विद्वानों ने इसके अर्थ क्रमशः आज्ञा, उपदेश, नियम, धार्मिक ग्रन्थ, वेद एवं धर्मशास्त्र तथा जनसामान्य के कल्याण हेतु विधि-विधान प्रतिपादित करने वाले ग्रन्थ स्वीकार किए हैं। इस प्रकार धर्मशास्त्र शब्द का तात्पर्य उस व्यवस्था से है, जो मनुष्य के आचार-व्यवहार, कर्तव्य-अकर्तव्य, सामाजिक मर्यादाओं एवं आध्यात्मिक उद्देश्यों को नियंत्रित एवं निर्देशित करती है। सामान्यतः स्मृतिग्रन्थों को धर्मशास्त्र का पर्याय माना जाता है। मनुस्मृति में यह प्रतिपादित किया गया है -
श्रुतिस्तु वेदो विज्ञेयो धर्मशास्त्रं तु वै स्मृतिः॥ (मनु स्मृति)
अर्थात् श्रुति को वेद तथा स्मृति को धर्मशास्त्र के रूप में स्वीकार किया जाना चाहिए। इस प्रकार स्मृतिग्रन्थों को धर्मशास्त्र की संज्ञा प्रदान की गई है तथा स्मृतिकारों को धर्मशास्त्रकार कहा गया है। इस प्रकार धर्मशास्त्र का मूलाधार वैदिक परम्परा में निहित है, परन्तु उसका व्यावहारिक स्वरूप सूत्र, स्मृति, भाष्य एवं निबन्धात्मक ग्रन्थों के माध्यम से विकसित हुआ है।
धर्मशास्त्र से सम्बन्धित साहित्य मुख्यतः दो वर्गों में विभक्त है - धर्मसूत्र एवं स्मृतियाँ। वैदिक अध्ययन की परम्परा में षड्वेदाङ्गों का विधान किया गया, जिन्हें शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छन्द एवं ज्योतिष कहा जाता है। इनमें कल्प वेदांग का विशेष स्थान है, जिसके चार प्रमुख भेद माने गए हैं - श्रौतसूत्र, गृह्यसूत्र, धर्मसूत्र तथा शुल्बसूत्र। इनका संक्षिप्त विवेचन निम्नलिखित प्रकार से किया जा सकता है -
- श्रौतसूत्र - श्रौतसूत्रों में वेदाधारित यज्ञों का क्रमबद्ध, सुव्यवस्थित तथा विधिपूर्वक विवरण प्राप्त होता है। इनमें श्रुति (वेदों) में वर्णित याग-यज्ञों की प्रक्रिया का विस्तारपूर्वक प्रतिपादन किया गया है।
- गृह्यसूत्र - गृह्यसूत्रों का मुख्य विषय कर्मकाण्ड है। इनमें गृहस्थ जीवन से सम्बन्धित यज्ञों, संस्कारों तथा उत्सवों आदि से सम्बद्ध विविध विधानों का निरूपण किया गया है।
- धर्मसूत्र - आचारशास्त्र से सम्बन्धित सूत्रों को धर्मसूत्रों के अन्तर्गत सम्मिलित किया जाता है। इनमें सामाजिक, नैतिक एवं वैयक्तिक कर्तव्यों का संहितात्मक विवेचन प्राप्त होता है।
- शुल्बसूत्र - शुल्बसूत्रों में यज्ञों के लिए वेदियों के निर्माण से सम्बन्धित मापन, रेखांकन एवं स्थापत्य-विधियों का विशद वर्णन किया गया है।
धर्मसूत्र प्राचीनतम ग्रन्थ हैं, जिनमें राजधर्म के सिद्धान्तों का क्रमबद्ध एवं संहितात्मक प्रतिपादन किया गया है। इनमें राजा के कर्तव्य, चतुर्वर्ण व्यवस्था, कर-नियम, सम्पत्ति-विधान आदि विषयों का विस्तृत विवेचन उपलब्ध होता है। राजा तथा राज्य से सम्बन्धित विषयों को धर्मसूत्रों के अन्तर्गत विशेष रूप से सम्मिलित किया गया है और प्रत्येक धर्मसूत्र में किसी न किसी रूप में राजधर्म की चर्चा अवश्य की गई है। क्योंकि धर्मसूत्रों का प्रधान विषय धर्म है, अतः धर्म की परिधि में राजा तथा राज्य-व्यवस्था के सिद्धान्त भी अन्तर्निहित माने गए हैं। विशेषतः विष्णु धर्मसूत्र में राजदण्ड, न्यायिक व्यवस्था एवं प्रशासन को राजधर्म का अनिवार्य अंग स्वीकार किया गया है। इस प्रकार न्याय-सम्बन्धी सिद्धान्तों का सुव्यवस्थित प्रतिपादन धर्मसूत्रों के माध्यम से किया गया है।
धर्मसूत्र और उसका वर्गीकरण
धर्मशास्त्रीय साहित्य का विकास मुख्यतः धर्मसूत्रों से प्रारम्भ होकर स्मृति एवं निबन्ध ग्रन्थों तक विस्तृत है। बौधायन, आपस्तम्ब, गौतम एवं वसिष्ठ आदि धर्मसूत्रकारों ने धर्मसूत्रों के माध्यम से सामाजिक आचारों एवं विधिक मान्यताओं को संक्षेप में प्रस्तुत किया। इसके पश्चात् मनु, याज्ञवल्क्य, नारद, पराशर, बृहस्पति आदि स्मृतिकारों ने धर्म के विविध पक्षों राजधर्म, व्यवहार, दण्ड, उत्तराधिकार, स्त्री-अधिकार एवं सामाजिक न्याय का विस्तृत विवेचन किया।
स्मृतियों की अवधारणा
स्मृतियों की संख्या
निबन्धकारों एवं धर्मशास्त्रीय परम्परा में स्मृतियों की संख्या को लेकर विभिन्न मत प्राप्त होते हैं। कुछ परम्पराओं में 36 स्मृतियों का उल्लेख है, तो कहीं यह संख्या और अधिक बतायी गयी है। वर्तमान में उपलब्ध स्मृतियों की संख्या सौ से भी अधिक मानी जाती है।
उपस्मृति परम्परा
मुख्य स्मृतियों के अतिरिक्त अनेक उपस्मृतियों का भी उल्लेख धर्मशास्त्रीय ग्रन्थों में मिलता है। ये उपस्मृतियाँ मूल स्मृतियों का विस्तार अथवा विशिष्ट विषयों पर केन्द्रित व्याख्या के रूप में देखी जा सकती हैं। जाबालि, आपस्तम्ब, बौधायन, कणाद, वैशम्पायन आदि के नाम उपस्मृति कर्ताओं के रूप में उल्लिखित हैं। उपस्मृतियों के माध्यम से धर्मशास्त्रीय परम्परा अधिक व्यापक होती है, जिससे विभिन्न सामाजिक परिस्थितियों का समावेश सम्भव हो पाता है।
धर्मशास्त्रकारों की परम्परा
निष्कर्ष
धर्मशास्त्रों में युगसापेक्ष एवं आधुनिक सन्दर्भों से सामंजस्य रखने वाले विषयों जैसे - स्त्री-अधिकार, हिन्दू विधि, संस्कार-प्रणाली, नैतिक शिक्षा, पर्यावरण-चिन्तन, मानवाधिकार, राजधर्म, दण्ड-व्यवस्था तथा अपराध-विचार पर अध्ययन-अध्यापन सम्पन्न होता है। इसके परिणामस्वरूप सामाजिक विधि-व्यवस्थाओं के उन्नत दार्शनिक आयामों का बोध होता है तथा मानवीय मूल्यों के विकास के साथ आत्मिक उन्नयन भी सुनिश्चित होता है।