Changes

Jump to navigation Jump to search
m
no edit summary
Line 171: Line 171:  
*'''राज शास्त्र के प्रवर्तकों का उल्लेख'''
 
*'''राज शास्त्र के प्रवर्तकों का उल्लेख'''
   −
भारतीय सैन्य विज्ञान का नाम धनुर्वेद होना सिद्ध करता है कि वैदिक काल में भी प्राचीन भारत में धनुर्विद्या प्रतिष्ठित थी। संहिताओं और ब्राह्मणों में वज्र के साथ ही धनुष बाण का भी उल्लेख मिलता है। कौशीतकी ब्राह्मण में लिखा है कि धनुर्धर की यात्रा धनुष के कारण सकुशल और निरापद होती है। जो धनुर्धर शास्त्रोक्त विधि से बाण का प्रयोग करता है, वह बड़ा यशस्वी होता है। भीष्म ने छह हाथ लंबे धनुष का प्रयोग किया था। धनुष विद्या की एक विशेषता यह थी कि इसका उपयोग चतुरंगिणी सेना के चारों अंग कर सकते थे । पौराणिक समय में सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर सगर, श्री राम, भीष्म, अर्जुन आदि सभी प्रतिष्ठित रूप से दिव्य हथियार(दिव्यास्त्र) बुला सकते थे, जो ऐसी मारक क्षमता उत्पन्न करते थे जिसका मुकाबला सामान्य रथ पर सवार धनुर्धर नहीं कर सकते थे। कोई भी इन धनुषधारकों के प्रभाव को समझ नहीं सकता है। भीष्म ने स्वयं अपने आदेशानुसार प्रतिदिन 10,000 सैनिकों को नष्ट करने की शपथ ली थी।  
+
भारतीय सैन्य विज्ञान का नाम धनुर्वेद होना सिद्ध करता है कि वैदिक काल में भी प्राचीन भारत में धनुर्विद्या प्रतिष्ठित थी। संहिताओं और ब्राह्मणों में वज्र के साथ ही धनुष बाण का भी उल्लेख मिलता है। कौशीतकी ब्राह्मण में लिखा है कि धनुर्धर की यात्रा धनुष के कारण सकुशल और निरापद होती है। जो धनुर्धर शास्त्रोक्त विधि से बाण का प्रयोग करता है, वह बड़ा यशस्वी होता है। भीष्म ने छह हाथ लंबे धनुष का प्रयोग किया था। धनुष विद्या की एक विशेषता यह थी कि इसका उपयोग चतुरंगिणी सेना के चारों अंग कर सकते थे । पौराणिक समय में सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर सगर, श्री राम, भीष्म, अर्जुन आदि सभी प्रतिष्ठित रूप से दिव्य हथियार(दिव्यास्त्र) बुला सकते थे, जो ऐसी मारक क्षमता उत्पन्न करते थे जिसका मुकाबला सामान्य रथ पर सवार धनुर्धर नहीं कर सकते थे। कोई भी इन धनुषधारकों के प्रभाव को समझ नहीं सकता है। भीष्म ने स्वयं अपने आदेशानुसार प्रतिदिन 10,000 सैनिकों को नष्ट करने की शपथ ली थी।  
   −
==धनुर्वेद का प्रयोग॥ Application of Dhanurveda==
+
=== युद्ध धर्म और नैतिक धर्म ===
अग्निपुराण में राजधर्म तथा उसके अंगों के वर्णन के प्रसंग में धनुर्विद्या का अध्याय 249 प्रारंभ में होकर 252 अध्याय पर्यंत वर्णन प्राप्त होता है। प्राचीन काल में धनुर्वेद पर बहुत सारे ग्रंथ उपलब्ध थे, किन्तु कालांतर में धनुर्वेद के प्रायः सभी ग्रंथ लुप्त हो गए। धनुर्वेद के तेरह (13) उपांगों का वर्णन किया गया है – (नीति प्रकाशिका पृ0 9)
+
प्राचीन भारत में लोक कल्याण ही युद्ध का लक्ष्य था। स्वार्थ-पूर्ति के लिए किया गया युद्ध हीन था। युद्ध धर्म का अंतिम उद्देश्य यह था कि युद्धार्थी शक्तियों का प्रयोग करें पर अवसर विशेष पर क्रूरता का परिहार करें। इसलिये नीति, धर्म और नैतिकता, आवश्यक मानी जाती थीं। मनुस्मृति के अनुसार -
   −
'''शब्द'''
+
* युद्ध के समय शत्रु को कूट आयुध से मारना वर्जित है।
 +
* विषाक्त, दग्ध और जले अस्त्रों का प्रयोग निषिद्ध है।
 +
* क्लीब और कृताञ्जलि का वध न करें।
 +
* सोए हुए, नग्न, निःशस्त्र आदि पर प्रहार वर्जित है।
   −
'''स्पर्श''' 
+
इसी प्रकार के अनेक नियम मनु ने सप्तम अध्याय में लिखे हैं। शुक्रनीति, कामन्दकनीति और अर्थशास्त्र में भी ऐसे अनेक नियम हैं। प्राचीन भारतीय सैनिकों और योद्धाओं के आचार ही युद्ध धर्म के गहन तत्त्व थे। जैसे रामायण के अरण्यकांड में कहा गया है कि शूर की शूरता पीडितों के संरक्षण में निहित है। चुनौती पाने पर पीठ दिखाना कायरता है। योद्धा का आत्मसम्मान अनिवार्य है। शरणागत की रक्षा के लिए भारतीय वीर प्राणों का परित्याग कर देते थे। वह मृत्यु से नहीं अपितु असत्य आचरण से डरते थे।<ref>एम. सिराज अनवर, [https://www.ncert.nic.in/pdf/publication/otherpublications/sanskrit_vangmay.pdf संस्कृत वाङ्मय में विज्ञान का इतिहास], दशम अध्याय-सैन्य विज्ञान, सन् २०१८, राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद् नई दिल्ली (पृ० १९४)।</ref>
   −
'''गंध''' 
+
==धनुर्वेद का प्रयोग॥ Application of Dhanurveda==
 
+
अग्निपुराण में राजधर्म तथा उसके अंगों के वर्णन के प्रसंग में धनुर्विद्या का अध्याय 249 प्रारंभ में होकर 252 अध्याय पर्यंत वर्णन प्राप्त होता है। प्राचीन काल में धनुर्वेद पर बहुत सारे ग्रंथ उपलब्ध थे, किन्तु कालांतर में धनुर्वेद के प्रायः सभी ग्रंथ लुप्त हो गए। धनुर्वेद के तेरह (13) उपांगों का वर्णन किया गया है – (नीति प्रकाशिका पृ0 9){{columns-list|colwidth=10em|style=width: 800px; font-style: regular;|
'''रस''' 
  −
 
  −
'''दूर''' 
  −
 
  −
'''चल''' 
  −
 
  −
'''अदर्शन''' 
  −
 
  −
'''पृष्ठ''' 
  −
 
  −
'''स्थित''' 
  −
 
  −
'''स्थिर''' 
  −
 
  −
'''भ्रमण''' 
     −
'''प्रतिबिंब'''   
+
# '''शब्द'''
 
+
# '''स्पर्श''' 
'''उद्देश (ऊपर) लक्ष्यों पर शरनिपातन करना (वेध करना)'''
+
# '''गंध''' 
 +
# '''रस''' 
 +
# '''दूर''' 
 +
# '''चल''' 
 +
# '''अदर्शन''' 
 +
# '''पृष्ठ''' 
 +
# '''स्थित''' 
 +
# '''स्थिर''' 
 +
# '''भ्रमण''' 
 +
# '''प्रतिबिंब'''   
 +
# '''उद्देश (ऊपर) लक्ष्यों पर शरनिपातन करना (वेध करना)'''}}
    
धनुर्वेद में मुक्त और अमुक्त आयुधों की संख्या बत्तीस है –  
 
धनुर्वेद में मुक्त और अमुक्त आयुधों की संख्या बत्तीस है –  
Line 212: Line 210:  
=== आयुधों के प्रकार ॥ Kinds of Weapons ===
 
=== आयुधों के प्रकार ॥ Kinds of Weapons ===
   −
 
+
महाभारत के प्रथम खण्ड अनुसार जब कुरु राजकुमार बड़े होने लगे तो उनकी आरंभिक शिक्षा का भार राजगुरु कृपाचार्य जी के पास गया। उन्हीं से कुरु राजकुमारों ने धनुर्वेद की शिक्षा ग्रहण की। कृपाचार्य जी के अनुसार धनुर्वेद के प्रमुख चार भेद इस प्रकार हैं जो कि उन्होंने शिष्यों को सिखाए –<blockquote>चतुष्पाच्च धनुर्वेदः सांगोपांग रहस्यकः।(नी० प्रका० 1-38)<ref>टी०चंद्रशेखरन, [https://archive.org/details/in.ernet.dli.2015.369604/page/5/mode/1up?view=theater वैशम्पायननीतिप्रकाशिका], सन् 1953,  मद्रास गवर्नमेंट ओरिएंटल मैनुस्क्रिप्ट्स सीरीज- 24, अध्याय-१, श्लोक १६ (पृ० 6)।</ref> मुक्तं चैव ह्यमुक्तं च मुक्तामुक्तमतः परम् । मंत्रमुक्तं च चत्वारि धनुर्वेदपदानी वै॥(नी० प्रका० 2-11)<ref name=":0">टी०चंद्रशेखरन, [https://archive.org/details/in.ernet.dli.2015.369604/page/5/mode/1up?view=theater वैशम्पायननीतिप्रकाशिका], सन् 1953,  मद्रास गवर्नमेंट ओरिएंटल मैनुस्क्रिप्ट्स सीरीज- 24, अध्याय-२, श्लोक-११ (पृ० २१)।</ref></blockquote>'''1. मुक्त–''' जो बाण छोड़ दिया जाए उसे मुक्त कहते हैं।
महाभारत के प्रथम खण्ड अनुसार जब कुरु राजकुमार बड़े होने लगे तो उनकी आरंभिक शिक्षा का भार राजगुरु कृपाचार्य जी के पास गया। उन्हीं से कुरु राजकुमारों ने धनुर्वेद की शिक्षा ग्रहण की। कृपाचार्य जी के अनुसार धनुर्वेद के प्रमुख चार भेद इस प्रकार हैं जो कि उन्होंने शिष्यों को सिखाए – <blockquote>चतुष्पाच्च धनुर्वेदः सांगोपांग रहस्यकः।(नी० प्रका० 1-38)<ref>टी०चंद्रशेखरन, [https://archive.org/details/in.ernet.dli.2015.369604/page/5/mode/1up?view=theater वैशम्पायननीतिप्रकाशिका], सन् 1953,  मद्रास गवर्नमेंट ओरिएंटल मैनुस्क्रिप्ट्स सीरीज- 24, अध्याय-१, श्लोक १६ (पृ० 6)।</ref> मुक्तं चैव ह्यमुक्तं च मुक्तामुक्तमतः परम् । मंत्रमुक्तं च चत्वारि धनुर्वेदपदानी वै॥(नी० प्रका० 2-11)<ref name=":0">टी०चंद्रशेखरन, [https://archive.org/details/in.ernet.dli.2015.369604/page/5/mode/1up?view=theater वैशम्पायननीतिप्रकाशिका], सन् 1953,  मद्रास गवर्नमेंट ओरिएंटल मैनुस्क्रिप्ट्स सीरीज- 24, अध्याय-२, श्लोक-११ (पृ० २१)।</ref></blockquote>'''1. मुक्त–''' जो बाण छोड़ दिया जाए उसे मुक्त कहते हैं।
      
'''2. अमुक्त-''' जिस अस्त्र को हाथ में लेकर प्रहार किया जाए जैसे खड्ग आदि को अमुक्त कहा जाता है।
 
'''2. अमुक्त-''' जिस अस्त्र को हाथ में लेकर प्रहार किया जाए जैसे खड्ग आदि को अमुक्त कहा जाता है।
Line 278: Line 275:     
===बाण का उपयोग॥ Use of Arrows ===
 
===बाण का उपयोग॥ Use of Arrows ===
धनुर्विद्या में विभिन्न प्रकार के भयंकर बाण का उपयोग होता था इन विकराल भयंकर बाणों के समक्ष वर्तमान के विस्फोटक बम भी तुच्छ हैं यह बाण दैवीय शक्ति से सम्पन्न होते थे। कतिपय प्रमुख बाण का वर्णन इस प्रकार है
+
धनुर्विद्या में विभिन्न प्रकार के भयंकर बाण का उपयोग होता था इन विकराल भयंकर बाणों के समक्ष वर्तमान के विस्फोटक बम भी तुच्छ हैं यह बाण दैवीय शक्ति से सम्पन्न होते थे। कतिपय प्रमुख बाण का वर्णन इस प्रकार है - <ref>चित्रा सोनवानी, [https://sanskritarticle.com/wp-content/uploads/7-7-Chitra.Sonwani.pdf महाभारत के युद्ध में प्रयुक्त अस्त्र-शस्त्र], सन २०१६, नेशनल जर्नल ऑफ हिन्दी एण्ड संस्कृत रिसर्च (पृ० २३)।</ref>
    
1. '''आग्नेय बाण –''' यह एक विस्फोटक बाण है। यह अग्नि वर्षा कर सब कुछ भस्मी-भूत कर देता है, इसका प्रतीकार पर्जन्य बाण द्वारा संभव है।
 
1. '''आग्नेय बाण –''' यह एक विस्फोटक बाण है। यह अग्नि वर्षा कर सब कुछ भस्मी-भूत कर देता है, इसका प्रतीकार पर्जन्य बाण द्वारा संभव है।
Line 305: Line 302:  
==उद्धरण॥ References==
 
==उद्धरण॥ References==
 
<references />
 
<references />
 +
[[Category:Upavedas]]
 +
[[Category:Hindi Articles]]
1,272

edits

Navigation menu