Shiva Sankalpa Sukta (शिवसंकल्प सूक्त)
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शुक्लयजुर्वेद के चतुस्त्रिंशत् (३४) अध्याय के प्रारम्भिक छह मंत्रों को सामूहिक रूप से शिवसंकल्पसूक्त कहा जाता है। ये मंत्र अपनी संरचना, भाववस्तु तथा संदेश की दृष्टि से अत्यन्त महत्त्वपूर्ण माने जाते हैं। इस सूक्त में ‘शिवसंकल्प’ का तात्पर्य शुभ, श्रेष्ठ एवं कल्याणकारी संकल्प से है, जिसे मानव अपने आचरण में धारण करता है। जैसा संकल्प मन में उत्पन्न होता है, वैसा ही आचरण विकसित होता है और उसी के अनुरूप कर्म का स्वरूप निर्धारित होता है। इस प्रकार समस्त कर्मों का मूलाधार मन को स्वीकार किया गया है। सूक्त के प्रत्येक मंत्र के अंत में ‘तन्मे मनः शिवसंकल्पमस्तु’ - अर्थात् मेरा मन शुभ विचारों से युक्त हो - इस भावना की पुनरावृत्ति की गई है। सूक्त में मन के स्वरूप, उसकी प्रवृत्तियों तथा उसके नियंत्रण की आवश्यकता पर विशेष बल दिया गया है। आधुनिक मनोविज्ञान के दृष्टिकोण से भी यह सूक्त अत्यन्त प्रासंगिक प्रतीत होता है, क्योंकि इसमें मानसिक शुद्धता को आचरण की शुद्धता का आधार माना गया है।[1]
परिचय॥ Introduction
शुक्लयजुर्वेद के चौतींसवें अध्याय के १ से ६ मन्त्र समूह को शिवसंकल्प सूक्त कहा जाता है। इसके मन देवता, त्रिष्टुप् छन्द और याज्ञवल्क्य ऋषि हैं। मन के विषय में वैदिक ऋषियों ने गहन चिंतन किया है। शिवसंकल्पसूक्त के संदर्भ में ऋषि यह प्रतिपादित करते हैं कि मनुष्य को केवल शारीरिक एवं वाचिक पापों से ही नहीं, अपितु मानसिक दोषों से भी स्वयं को दूर रखना चाहिए। मन में उत्पन्न होने वाले संकल्प यदि शुभ और श्रेयस्कर हों, तभी जीवन का मार्ग प्रशस्त होता है। मन अत्यन्त चंचल है, अतः उसे वश में रखना दुष्कर कार्य है। इसी कारण ऋषि बार-बार मन को शुभ एवं पवित्र संकल्पों से युक्त रखने की प्रार्थना करते हैं।[2] किसी भी कर्म के किये जाने के लिये पाँच आवश्यक अंग हैं -
अधिष्ठानं तथा कर्ता करणं च पृथग्विधम्। विविधाश्च पृथक्चेष्टा दैवं चैवात्र पंचमम्॥ (भगवद्गीता 18.14)[3]
अधिष्ठान (शरीर), कर्ता (मन), करण (इन्द्रियाँ), चेष्टा (पाँच -प्राण) और दैव अथवा चेतन शक्ति। लेकिन ज्ञानी जानता है कि इन सबमें भी केवल अकर्ता आत्मा की उपस्थिति मात्र के कारण सभी कर्म सम्भव हो पाते हैं।
वैदिक वाङ्मय में मन को समस्त क्रियाओं का मूल कारण माना गया है। शुक्ल यजुर्वेद में स्थित शिवसंकल्प सूक्त इसी तथ्य को उद्घाटित करता है कि, बिना शुभ संकल्प के न तो व्यक्तिगत जीवन में शान्ति संभव है और न ही सामाजिक सौहार्द की स्थापना। आधुनिक युग में व्याप्त अशान्ति, असहिष्णुता एवं वैमनस्य का मूल कारण दूषित मनोवृत्तियाँ हैं, जिनका समाधान शिवसंकल्प की वैदिक अवधारणा में निहित है।
शिवसंकल्प का तात्पर्य
शिव का अर्थ है - शुभ, कल्याणकारी तथा मंगलमय और संकल्प का अर्थ है - दृढ़ निश्चय। इस प्रकार शिवसंकल्प का अभिप्राय हुआ - ऐसा मन जो सदैव शुभ, सकारात्मक एवं परहितकारी निश्चयों में प्रवृत्त हो। सूक्त में बार-बार उच्चरित मंत्र “तन्मे मनः शिवसंकल्पमस्तु” मन की इसी आदर्श स्थिति की कामना को अभिव्यक्त करता है।
वैदिक साहित्य में सूक्तों का महत्व
शिवसंकल्पसूक्त का संक्षिप्त परिचय
शिवसंकल्पसूक्त के मंत्रों का भावात्मक अध्ययन
प्रथम मंत्र का भावार्थ एवं विवेचन
ओ3म् यज्जाग्रतो दूरमुदैति दैवं तदु सुप्तस्य तथैवैति। दूरङ्गमं ज्योतिषां ज्योतिरेकं तन्मे मनः शिवसङ्कल्पमस्तु॥
अन्वय - जाग्रतः यत् दैवं (मनः) दूरम् उत् एति, सुप्तस्य तत् उ तथा एव एति। दूरङ्गमं ज्योतिषाम् एकः ज्योतिः मे तत् मनः शिवसंकल्पमस्तु।
उव्वटभाष्यम् - यन्मनो जाग्रतः पुरुषस्य दूरम् उदैति उद्गच्छति चक्षुः प्रभृतीन्यपेक्ष्य। यच्च दैवम्। देवो विज्ञानात्मा सोऽनेन गृह्यत इति दैवम्। उक्तञ्च- "मनसैवानुद्रष्टव्यमेतदप्रमेयं ध्रुवम्" इति। तदु सुप्तस्य। तदः स्थाने यदो वृत्तिः। उकारः समुच्चयार्थीयः। यच्च मनः सुप्तस्य तथैव तेनैव प्रकारेण एति। यच्च दूरङ्गमम् । दूरं गच्छतीति दूरङ्गमम् । अतीतानागतवर्तमानव्यवहितं मे मनः शिवसङ्कल्पम्। सङ्कल्पः काममूलपदार्थस्य स्त्र्यादेः सुरूपताज्ञानवतः काम-प्रभृति। शान्तसङ्कल्पमस्तु भवतु।
व्याख्या - ऋषि कहते हैं- वह मेरा मन शिवसङ्कल्प हो। शिव कल्याणकारी धर्म विषय सङ्कल्प जिस प्रकार का है उस प्रकार का वह मेरा मन हो। मेरा मन हमेशा धर्म में ही हो कभी भी पापी न बने। तो क्या बने जो मन जागे हुए पुरुष का दूर से भी दूर चला जाता है। चक्षु आदि वस्तुओं को ग्रहण कराता है। मन के द्वारा यह सभी कुछ देखा जाता है। और भी। यदः स्थान में उसका पर्यायवाची शब्द उकार है। और जो मन सुप्तावस्था में भी उसी प्रकार वापस आता है जिस प्रकार वह गया था। और जो दूर से भी दूरात् गच्छतीति दूरङ्गमं खश्प्रत्यय है। अतीत अनागत-वर्तमान में प्रयोग करने वाले पदार्थों का ग्राहक है। और जो मन ज्योतिप्रकाशको का श्रोत्र आदि इन्द्रियों का एक ही ज्योति प्रकाशक प्रवर्तक है। श्रोत्र आदि इन्द्रियों को अपने विषय में लगाता है। आत्मा मन को प्रेरित करता है, मन इन्द्रिय से इन्द्रिय को, अर्थ से न्याय युक्त मन सम्बन्ध को उन दोनों को प्रवृत करता है। उस प्रकार का मेरा मन शान्तसङ्कल्प वाला हो। द्वितीय मन्त्र इस प्रकार है -
द्वितीय मंत्र का भावार्थ एवं विवेचन
येन कर्माण्यपसो मनीषिणो यज्ञे कृण्वन्ति विदथेषु धीराः। यदपूर्व यक्षमन्तः प्रजानां तन्मे मनः शिवसङ्कल्पमस्तु॥
अन्वय - येन अपसः मनीषिणः धीराः यज्ञे विदथेषु कर्माणि कृण्वन्ति यत् प्रजानाम् अन्तः अपूर्व यक्षं, तत् मे मनः शिवसङ्कल्पम् अस्तु।
उव्वटभाष्य- येन कर्माणि। येन मनसा सत्ता कमार्णि। अपसः। अप इति कर्म नाम। तद्धितलोपः। अपस्विनः कर्मवन्तः मनीषिणो मेधाविनः। यज्ञे कृन्ति कुर्वन्ति। विदथेषु वेदेषु यज्ञविधिविधानेषु धीरा धीमन्तः। यच्चापूर्वम्। न विद्यते पूर्वमिन्द्रियं यस्मात् तद्पूर्वम्। यद्वा-अपूर्वमनपरम्। यच्च यक्षं पूज्यम्। यच्चान्तर्मध्ये प्रजानामास्ते। तन्मे मन इति व्याख्यातम्।
व्याख्या- मनीषियों मेधावियों को यज्ञ में जिस मन के द्वारा सत कर्म करते है, 'कृ करणे' स्वादि है। मन स्वास्थ्य के विना कार्य में प्रवृत्त करता है। तेषु सत्सु । विदथेषु सत्सु विद्यन्ते ज्ञायन्ते तानि विदधानि तेषु। विदधातु से औणादिक थप्रत्यय। यज्ञसम्बन्धिहवि आदि पदार्थों के ज्ञान में उसका यह अर्थ है। किस प्रकार के मनीषियों को। अपसः अप इति कर्मनाम (निघ० २.१.१)। कार्यों को करने की प्रवृति है जिसमे वे अपस्वन कर्मवन्तश्अस्मायामेधास्रजो विनिः ' (पा०सू० ५.२.१२१) इससे विन्प्रत्यय विन्मतोलुक्' (पा०सू० ५.३.६५) इससे इष्ठ अभाव में भी छन्द में विनो लुक्। हमेशा कर्मनिष्ठ यह अर्थ है। वैसे धीरा धीमन्तमेधा विद्यमान है जिसमे कर्मण्यण् (पा०सू० ३.२.१)। और हमारा मन सर्वोत्तम गुण कर्म स्वभाव वाला और जो मन इन्द्रिय से पूर्व उसकी रचना हुई। अथवा अपूर्व अनपर अबाह्य ऐसा कहने पर अपूर्व आत्मरूप यह अर्थ है। और जो योग यज्ञ में पूजनीय होकर के एकीभूत हो रहा हो। यजते औणादिक सन्प्रत्यय है। और जो प्राणिमात्र के हृदय में रहता है, अन्य इन्द्रिया तो बाहरी है, मनतो आन्तरिक इन्द्रिय है यह अर्थ है। वह उस स्वरूप वाला मेरा मन धर्मेष्ट होवे। तृतीय मन्त्र इस प्रकार है -
तृतीय मंत्र का भावार्थ एवं विवेचन
यत्प्रज्ञानमुत चेतो धृतिश्च यज्जोतिरन्तरमृतं प्रजासु। यस्मान्नऽऋते किञ्चन कर्म क्रियते तन्मे मनः शिवसङ्कल्पमस्तु॥
अन्वय - यत् प्रज्ञानम् उत चेतः धृतिः च यत् प्रजासु अन्तः अमृतं ज्योतिः। यस्मात् ऋते किञ्चन कर्म न क्रियते, तत् मे मनः शिवसङ्कल्पम् अस्तु।
उव्वटभाष्य- यत्प्रज्ञानम्। यन्मनः प्रज्ञानम्। विशेषप्रतिपत्तिः प्रज्ञानम्। उतापि च। चेतः। सामान्यप्रतिपत्तिः चेतः। धृतिश्च। प्रसिद्धा। यन्मनोऽन्तज्योतिरमृतं च प्रजासु। यस्मान्न ऋते येन च बिना न किञ्चन कर्म क्रियते। तन्मे मन इति व्याख्यातम्॥
व्याख्या - जो मन प्रज्ञा को विशेष करके ज्ञान का अच्छी प्रकार से बोध कराता है वह प्रज्ञानम् है। 'करणाधिकरणयोश्च' (पा०सू० ३.३.११७) इससे करण में ल्युट् प्रत्यय किया। और भी जो मनस्मृति का साधक है। 'चिती संज्ञाने' इस ण्यन्तहोने से असुन्प्रत्यय हुआ। सामान्य विशेष ज्ञान का बोध कराने वाला यह अर्थ है। और जो मन धैर्य स्वरूप है। मन में ही धैर्य की उत्पति होने से मन में कार्य कारण के अभेद होने से धैर्य को धारण करता है। और जो मन प्रजाओं में, मनुष्यों में अन्तरवर्तमान होने से सभी इन्द्रियों का ज्योति प्रकाशक है। कहाँ होने पर आदर के लिए पुनः कहते है। 'अभ्यासे भूयांसमर्थं मन्यन्ते' (निरु० १.४२) ऐसा यास्क ने कहा। और आत्मरूप होने से आमरण दरमि होने से विनाश रहित है। जिस मन के बिना मनुष्य कोई भी कार्य नहीं कर सकते है। सभी कार्यों को करने से पहले प्राणियों का मन पूर्वप्रवृत्त होता है, मन के स्वास्थ्य के विना कार्यों में प्रवृत नही होता है यह अर्थ है। अन्यारादितरर्ते (पा०सू० २.३.२९) इत्यादि से यस्माद इसका ऋत के योग में पञ्चमी। वह मेरा मन कल्याणकारी हो।
सरलार्थ- जो मन सामान्य और विशेषज्ञान का बोध कराता है। जो धैर्यस्वरूप विद्यमान है। और जो प्राणियों के अन्तर्भाग में विद्यमान सभी इन्द्रियों का प्रकाशक है। और जो विनाश रहित है। जिसके बिना कोई भी कार्य नही किया जा सकता है। इस प्रकार का जो मेरा मन है वह शुभसङ्कल्प वाला हो। चतुर्थ मन्त्र इस प्रकार है -
चतुर्थ मंत्र का भावार्थ एवं विवेचन
येनेदं भूतं भुवनं भविष्यत्परिगृहीतममृतेन सर्वम्। येन यज्ञस्तायते सप्त होता तन्मे मनः शिवसङ्कल्पमस्तु॥
अन्वय- येन अमृतेन (मनसा) इदं भूतं भूवनं भविष्यत् सर्व परिगृहीतम्। येन सप्तहोता यज्ञः तायते तत् मे मनः शिवसङ्कल्पम् अस्तु।
उव्वटभाष्य- येनेदं। येन मनसा। इदं भूतकालं भुवनं वर्तमानकालं भविष्यद् भविष्यत्कालं च। परिगृहीतम् अमृतेन सर्वम्। येन च मनसा यज्ञस्तायते तन्यते। सप्तहोता। सप्तहोतारो हि अग्निष्टोमे भवन्ति। तन्में मन इति व्याख्यातम् ।।
व्याख्या- जिस मन से इसके चारो और विद्यमान वस्तुओं का ज्ञान है। यहाँ क्या हुआ। भूतकालसम्बन्धि वस्तुओं का। भुवन वर्तमान काल को कहते है। भू से क्युप्रत्यय करने पर वर्तमानकालसंबन्धि है। भविष्यत् 'लुटः सद्वा' (पा०सू० ३.३.१४) इससे शतृप्रत्यय करने पर 'तौ सत्' (पा०सू० ३.२.१२७) इसके कहने पर त्रिकालसंबद्ध वस्तुओं में मन प्रवृत होता है यह अर्थ है। श्रोत्र आदि के द्वारा तो प्रत्यक्ष ही ग्रहण करता है। यह किस प्रकार के ज्ञान को ग्रहण करता है। अमृत शाश्वत होने से। मुक्तिपर्यन्त श्रोत्र आदि का तो नाश होता है परन्तु मन तो अमर है। और जिस मन के द्वारा यज्ञ अग्निष्टोम आदि को आगे विस्तृत करते है। 'तनोतेर्यकि' (पा०सू० ६.४.४४) इससे आकार। किस प्रकार का यज्ञ। सप्तहोता सात होता के द्वारा देवो का आह्वान करते है, अर्थात होतृमैत्रवरुण आदि सात होता है। अग्निष्टोम में सात होता है। वह मेरा मन शुभसकल्प वाला हो।
सरलार्थ- जिससे विनाश रहित धर्म वाले संसार का भूतकाल, वर्तमानकाल और भविष्यत्काल के सभी पदार्थ जाने जाते है। जिसके द्वारा सात होता विशिष्ट अग्निष्टोम आदि यज्ञ का सम्पादन किया जाता है। वह मेरा मन शुभसङ्कल्प वाला हो। पंचम मन्त्र का अर्थ इस प्रकार है -
पंचम मंत्र का भावार्थ एवं विवेचन
यस्मिन्नृचः साम यजूँषि यस्मिन् प्रतिष्ठिता रथनाभाविवाराः। यस्मिँश्चित्तँ सर्वमोतं प्रजानां तन्मे मनः शिवसङ्कल्पमस्तु॥
अन्वय - यस्मिन् ऋचः यस्मिन् साम यजूंषि रथनाभौ अराः इव प्रतिष्ठिताः यस्मिन् प्रजानां सर्व चित्तम् ओतं तत् मे मनः शिवसङ्कल्पम् अस्तु।
उव्वटभाष्य- यस्मिन् ऋचः। यस्मिन् ऋचः प्रतिष्ठिताः। यस्मिन् सामानि प्रतिष्ठितानि । यस्मिन् यंजूषि प्रतिष्ठितानि। कर्थामव ? रथनाभौ इव अराः। यस्मिन् चित्तं सञ्ज्ञानं सर्वे तस्य तस्यार्थस्य। ओतं निक्षिप्तम्। तदुसन्ततिमिव कृतम्। प्रजानाम्। तत् मे मन इति व्याख्यातम्।
व्याख्या - जिस मन में ऋग्वेद प्रतिष्ठित है। जिसमे सामवेद प्रतिष्ठित है। जिसमे यजुर्वेद प्रतिष्ठित है। स्वस्थ मन में ही वेदत्रयी प्रकट होते है, इस मन में शब्द मात्र स्थिर होते है 'अन्नमयं हि सोम्य मनः' इति छान्दोग्य में स्वस्थ मन से ही वेदो का उच्चारण प्रतिपादित किया गया है। वहाँ दृष्टान्त है। जैसे रथ के पहियों में लकड़ी के अरा लगे होते है। जैसे अरा रथचक्र के मध्य में प्रतिष्ठत होते है, उसी प्रकार शब्दजाल मन में स्थिर रहता है। और जिसमे प्राणियों के सम्पूर्ण सभी पदार्थविषयज्ञान धागे में मणियों के समान युक्त रहता है। स्वस्थ मन में ही ज्ञान की उत्पत्ति और मन के प्रतिकूल आचरण से ही ज्ञान का अभाव होता है। वह मेरा मन शिवसङ्कल्प हो।
सरलार्थ- जिसमे ऋग्वेद, सामवेद और यजुर्वेद चक्रनाभि में विद्यमान अरा के समान विद्यमान है और भी जिसमे प्राणियों के सभी पदार्थ विषयक ज्ञान है। वह मेरा मन शुभसङ्कल्प वाला हो। षष्ठम मन्त्र का भाषार्थ इस प्रकार है -
षष्ठ मंत्र का भावार्थ एवं विवेचन
सुषारथिरश्वानिव यन्मनुष्यान्नेनीयतेऽभीशुभिर्वाजिनऽ इव। हृत्प्रतिष्ठं यदजिरं जविष्ठं तन्मे मनः शिवसङ्कल्पमस्तु॥ (यजुर्वेद 34/1-6)[4]
अन्वय - यत् (मनः) मनुष्यान् सुषारथिः अश्वान् इव नेनीयते अभीषुभिः वाजिन इव (मनुष्यान् कर्मषु प्रेरयति) यत् हृत्प्रतिष्ठम् अजिरं जविष्ठं तत् मे मनः शिवसङ्कल्पम् अस्तु।
उव्वट भाष्य - सुषारथिः। यन्मनो मनुष्यान् नेनीयतेऽत्यर्थं नीयते। कर्थामव। सुषारथिः कल्याणसारथिरश्वानिव यन्मनुष्यान्। यच्च मनः सुषारथिरिव। अभीषुभिः प्रग्रहैर्वाजिन इव वेजनवतोऽश्वानिव। यमयतीति शेषः। द्वे उपमे। एकत्र नयनमन्यत्र नियममित्यर्थः यच्च हत्प्रतिष्ठम्। तत्रोपलब्धेः। यच्च अजिरं जरारहितम्। यच्च जविष्ठमतिशयेन गन्तुं तन्मे मनः शिवसङ्कल्पमस्तु ।
व्याख्या - जो मन जैसे सुंदर घोड़े के समान, लगाम से घोड़ो को सब और चलाता है, वैसे ही मनुष्य आदि प्राणियों को शीघ्र ही इधर उधर भ्रमण कराता है। नयतेः क्रियासमभिहारे यङ् हुआ। मन के प्रेरित करने पर ही प्राणि कार्य में प्रवृत होते है। मनुष्य ग्रहण प्राणिमात्र का उपलक्षक है। वहाँ उदाहरण है। जैसे चतुर सारथि लगाम से घोड़ो को इधर उधर अपने वश में चलाता है। रस्सियों से जैसे ले जाता है। दो उपमा है। प्रथम ले जाना और दूसरी नियमन। वैसे ही मन मनुष्यों को कार्य में प्रवृत करता है और लेकर जाता है। और जो मन हृदय में प्रतिष्ठित है। और जो मन विषय आदि में प्रेरक वा वृद्धादी अवस्था से रहित है। और जो अत्यन्त वेगवान है 'न वै वातात् किञ्चनाशीयोस्ति न मनसः किञ्चनाशीयोस्ति' इति श्रुति। वह मेरा मन मंगलमय हो।
सरलार्थ- जैसे कोई चतुर सारथि घोड़ो को सही चलाता है। वह जैसे चाहता है वैसे ही उनको लेकर के जाता है। इसी प्रकार मन भी प्राणियों के शरीर को चलाता है। और जो हृदय में स्थित वृद्धावस्था से रहित अत्यन्त ही वेगवान वह मेरा मन मंगलमय हो।[5]
मन का दार्शनिक एवं मनोवैज्ञानिक महत्त्व
शिवसंकल्प सूक्त के अनुसार मन इन्द्रियों का प्रवर्तक, ज्ञान का आधार तथा समस्त क्रियाओं का प्रेरक तत्त्व है। इन्द्रियाँ तभी अपने विषयों का सम्यक् ग्रहण कर सकती हैं, जब मन संतुलित एवं नियंत्रित हो। कठोपनिषद् के रथ-दृष्टान्त द्वारा यह सिद्ध किया गया है कि विवेकयुक्त बुद्धि, संयमित मन और नियंत्रित इन्द्रियाँ ही जीवन को परम लक्ष्य की ओर ले जाती हैं। इस प्रकार शिवसंकल्प, मन-नियंत्रण का वैदिक सूत्र प्रदान करता है।
निष्कर्ष॥ Conclusion
छः मन्त्र वाले इस सूक्त के ऋषि याज्ञवल्क्य, मनो देवता, त्रिष्टुप् छन्द है। इस सूक्त में ऋषि कहते हैं की जो मन जागने वाले पुरुष का दूर जाता है, और सोने वाले मनुष्य का वही मन वैसे ही समीप आता है अर्थात् जैसा गया है वैसे ही वापस आता है। और जो दूर से जाता है, जो मन आत्म साक्षात्कार में साधन है, और जो मन प्रकाशकों का श्रोत्र आदि इन्द्रियों का एक ही ज्योति प्रवर्तक है, सभी शरीर का चालक वह मेरा मन शुभसङ्कल्पों से युक्त हो। अर्थात् मेरे मन में हमेशा धर्म ही हो कभी भी पाप नही हो। कर्मवान, बुद्धिमान, मेधावी जिस मन से कार्य करते हैं, जिससे बुद्धिमान यथाविधि यज्ञ का सम्पादन करते हैं, और जो अपूर्व, सभी इन्द्रियों से पूर्व जिसकी रचना हुई, सभी प्राणियों में विद्यमान और पूज्य वह मेरा मन शुभ सङ्कल्प से युक्त हो। जो मन प्रज्ञा को विशेष रूप से ज्ञान कराता है, और भी जो मन सामान्य ज्ञान को उत्पन्न करने वाला है, जो मन धृति धैर्य स्वरूप, जो मन अमरण धर्मी, जो मन प्रजाओं में अन्तर वर्तमान होने से सभी इन्द्रियों का प्रकाशक है, जिसके बिना कोई भी कार्य पूर्ण नही किया जा सकता है वह मेरा मन शुभसङ्कल्प से युक्त हो। जिस मन के द्वारा यह सभी सब कुछ जाना गया है, और जिस मन से भूतकाल सम्बन्धी वस्तु, वर्तमानकाल सम्बन्धी वस्तु, और भविष्यत्काल सम्बन्धी वस्तु का ज्ञान होता है, जिस मन के द्वारा होतृमैत्रावरुण आदि सात होता युक्त अग्निष्टोमयज्ञ को विस्तृत करते है वह मेरा मन शुभसङ्कल्प से युक्त हो। जैसे रथ के दोनों और आरे होते है ठीक वैसे ही मन ही सभी ऋचाओं में प्रतिष्ठित होते है। साम में प्रतिष्ठित है। और यजुर्वेद में प्रतिष्ठित है। पट में जैसे ओत-प्रोतरूप से धागे विद्यमान रहते है वैसे ही जिस मन में सभी पदार्थ विषयक ज्ञान निहित है उस प्रकार का मेरा मन शुभसङ्कल्पयुक्त हो। जैसे अच्छा सारथि अपने रथ के वेगयुक्त घोड़ो को इधर-उधर लेकर जाता है और जैसे उनको नियन्त्रित करता है, वैसे ही जो मन मनुष्यों को सभी कार्यों में प्रवृत्त करता है उन्हें उस कार्य में लगाता है, और जो मन हृद् देशवाशी है, और जो जरारहित, और जो उत्पन्न हुए बालकों में, युवकों में और वृद्धों में एक समान है, वह मेरा मन शुभसङ्कल्प से युक्त हो।[6]
उद्धरण॥ References
- ↑ डॉ० विजय शंकर पाण्डेय, वैदिक सूक्त संकलन (२००१), मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (पृ० १५१)।
- ↑ डॉ० अनीता जैन, वैदिक वाग् ज्योतिः-शिव संकल्प से अनुप्रेरित वैदिक मनः प्रबन्धन (२०१६), गुरुकुल कांगडी विश्वविद्यालय, हरिद्वार (पृ० ६०)।
- ↑ श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय- 18, श्लोक - 14।
- ↑ शुक्लयजुर्वेद, अध्याय- ३४, मन्त्र १-६।
- ↑ श्री राधेश्याम खेमका, वैदिक सूक्त-संग्रह (२०१२), गीताप्रेस गोरखपुर (पृ० २१२)
- ↑ श्रीपाद दामोदर सातवलेकर, शिव संकल्प का विजय (१९२२), स्वाध्याय-मंडल, औंध (पृ० ७)।