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	<title>Adiparva Adhyaya 50 (आदिपर्वणि अध्यायः ५०) - Revision history</title>
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	<updated>2026-05-06T10:49:35Z</updated>
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		<title>P16459: new pg</title>
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		<updated>2019-10-16T11:52:24Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;new pg&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;&lt;b&gt;New page&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;div&gt;प्रतिश्रुतिः&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मन्त्रिण ऊचुः&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ततः स राजा राजेन्द्र स्कन्धे तस्य भुजङ्गमम्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मुनेः क्षुत्क्षाम आसज्य स्वपुरं प्रययौ पुनः [पुनराययौ]॥ 1-50-1&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ऋषेस्तस्य तु पुत्रोऽभूद्गवि जातो महायशाः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शृङ्गी नाम महातेजास्तिग्मवीर्योऽतिकोपनः॥ 1-50-2&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ब्रह्माणं समुपागम्य मुनिः पूजां चकार ह।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सोऽनुज्ञातो मुनि [तस्तत]स्तत्र शृङ्गी शुश्राव तं तदा॥ 1-50-3&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सख्युः सकाशात्पितरं पित्रा ते धर्षितं पुरा।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मृतं सर्पं समासक्तं स्थाणुभूतस्य तस्य तम्॥ 1-50-4&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वहन्तं राजशार्दूल स्कन्धेनानपकारिणम्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तपस्विनमतीवाथ तं मुनिप्रवरं नृप॥ 1-50-5&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जितेन्द्रियं विशुद्धं च स्थितं कर्मण्यथाद्भुतम्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तपसा द्योतितात्मानं स्वेष्वङ्गेषु यतं तदा॥ 1-50-6&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शुभाचारं शुभकथं सुस्थितं तमलोलुपम्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अक्षुद्रमनसूयं च वृद्धं मौनव्रते स्थितम्॥ 1-50-7&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शरण्यं सर्वभूतानां पित्रा विनिकृतं तव।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शशापाथ महातेजाः पितरं ते रुषान्वितः॥ 1-50-8&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ऋषेः पुत्रो महाते[जा]जाः बालोऽपि स्थविरद्युतिः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
स क्षिप्रमुदकं स्पृष्ट्वा रोषादिदमुवाच च[ह]॥ 1-50-9&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पितरं तेऽभिसंधाय तेजसा प्रज्वलन्निव।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अनागसि गुरौ यो मे मृतं सर्पमवासृजत्॥ 1-50-10&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तं नागस्तक्षकः क्रुद्धस्तेजसा प्रदहिष्यति।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आशीविषस्तिग्मतेजा मद्वाक्यबलचोदितः॥ 1-50-11&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सप्तरात्रादितः पापं पश्य मे तपसो बलम्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इत्युक्त्वा प्रययौ तत्र पिता यत्रास्य सोऽभवत्॥ 1-50-12&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दृष्ट्वा च पितरं तस्मै तं शापं प्रत्यवेदयत्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
स चापि मुनिशार्दूलः प्रेषयामास ते पितुः॥ 1-50-13&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शिष्यं गौरमुखं नाम शीलवन्तं गुणान्वितम्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आचख्यौ स च विश्रान्तो राज्ञः सर्वमशेषतः॥ 1-50-14&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शप्तोऽसि मम पुत्रेण यत्तो भव महीपते।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तक्षकस्त्वां महाराज तेजसासौ दहिष्यति॥ 1-50-15&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
श्रुत्वा च तद्वचो घोरं पिता ते जनमेजय।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यत्तोऽभवत्परित्रस्तस्तक्षकात्पन्नगोत्तमात्॥ 1-50-16&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ततस्तस्मिंस्तु दिवसे सप्तमे समुपस्थिते।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
राज्ञः समीपं ब्रह्मर्षिः काश्यपो गन्तुमैच्छत॥ 1-50-17&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तं ददर्शाथ नागेन्द्रस्तक्षकः काश्यपं तदा।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तमब्रवीत्पन्नगेन्द्रः काश्यपं त्वरितं द्विजम्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
क्व भवांस्त्वरितो याति किं च कार्यं चिकीर्षति॥ 1-50-18&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
काश्यप उवाच&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यत्र राजा कुरुश्रेष्ठ परिक्षिन्नाम वै द्विज।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तक्षकेण भुजङ्गेन धक्ष्यते किल सोऽद्य वै॥ 1-50-19&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
गच्छाम्यहं तं त्वरितः सद्यः कर्तुमपज्वरम्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मयाभिपन्नं तं चापि न सर्पो धर्षयिष्यति॥ 1-50-20&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तक्षक उवाच&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
किमर्थं तं मया दष्टं संजीवयितुमिच्छसि।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ब्रूहि काममहं तत्ते दद्द्मि स्वं वेश्म गम्यताम्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अहं स तक्षको ब्रह्मन्पश्य मे वीर्यमद्भुतम्॥ 1-50-21&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
न शक्तस्त्वं मया दृष्टं तं संजीवयितुं नृपम्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इत्युक्त्वा तक्षकस्तत्र सोऽदशद्वै वनस्पतिम्॥ 1-50-22&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
स दष्टमात्रो नागेन भस्मीभूतोऽभवन्नगः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
काश्यपश्च ततो राजन्नजीवयत तं नगम्॥ 1-50-23&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ततस्तं लोभयामास कामं ब्रूहीति तक्षकः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
स एवमुक्तस्तं प्राह काश्यपस्तक्षकं पुनः॥ 1-50-24&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
धनलिप्सुरहं तत्र यामीत्युक्तश्च तेन सः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तमुवाच महात्मानं तक्षकः श्लक्ष्णया गिरा॥ 1-50-25&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यावद्धनं प्रार्थयसे राज्ञस्तस्मात्ततोऽधिकम्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
गृहाण मत्त एव त्वं संनिवर्तस्व चानघ॥ 1-50-26&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
स एवमुक्तो नागेन काश्यपो द्विपदां वरः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
लब्ध्वा वित्तं निववृते तक्षकाद्यावदीप्सितम्॥ 1-50-27&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तस्मिन्प्रतिगते विप्रे छ्दमनोपेत्य तक्षकः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तं नृपं नृपतिश्रेष्ठं पितरं धार्मिकं तव॥ 1-50-28&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
प्रासादस्थं यत्तमपि दग्धवान्विषवह्निना।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ततस्त्वं पुरुषव्याघ्र विजयायाभिषेचितः॥ 1-50-29&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
एतद्दृष्टं श्रुतं चापि यथावन्नृपसत्तम।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अस्माभिर्निखिलं सर्वं कथितं तेऽतिदारुणम्॥ 1-50-30&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
श्रुत्वा चै[नं न]तन्नरश्रेष्ठ पार्थिवस्य पराभवम्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अस्य चर्षेरु[त]दङ्कस्य विधत्स्व यदनन्तरम्॥ 1-50-31&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सौतिरुवाच&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
एतस्मिन्नेव काले तु स राजा जनमेजयः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उवाच मन्त्रिणः सर्वानिदं वाक्यमरिन्दमः॥ 1-50-32&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जनमेजय उवाच&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अथ तत्कथितं केन यद्वृत्तं तद्वनस्पतौ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आश्चर्यभूतं लोकस्य भस्मराशीकृतं तदा।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यद्वृक्षं जीवयामास काश्यपस्तक्षकेण वै॥ 1-50-33&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
नूनं मन्त्रैर्हतविषो न प्रणश्येत काश्यपात्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
चिन्तयामास पापात्मा मनसा पन्नगाधमः॥ 1-50-34&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दष्टं यदि मया विप्रः पार्थिवं जीवयिष्यति।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तक्षकः संहतविषो लोके यास्यति हास्यताम्॥ 1-50-35&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
विचिन्त्यैवं कृता तेन ध्रुवं तुष्टिर्द्विजस्य वै।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भविष्यति ह्युपायेन यस्य दास्यामि यातनाम्॥ 1-50-36&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
एकं तु श्रोतुमिच्छामि तद्वृत्तं निर्जने वने।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
संवादं पन्नगेन्द्रस्य काश्यपस्य वचस्तथा [च कस्तदा]॥ 1-50-37&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
श्रुतवान्दृष्टवांश्चापि भवत्सु कथमागतम्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
श्रुत्वा तस्य विधास्येऽहं पन्नगान्तकरीं मतिम्॥ 1-50-38&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मन्त्रिण ऊचुः&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शृणु राजन्यथास्माकं येन तत्कथितं पुरा।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
समागतं द्विजेन्द्रस्य पन्नगेन्द्रस्य चाध्वनि॥ 1-50-39&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तस्मिन्वृक्षे नरः कश्चिदिन्धनार्थाय पार्थिव।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
विचिन्वन्पूर्वमारूढः शुष्कशाखां वनस्पतौ॥ 1-50-40&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
न बुध्येतामुभौ तौ च नगस्थं पन्नगद्विजौ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सह तेनैव वृक्षेण भस्मीभूतोऽभवन्नृप॥ 1-50-41&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
द्विजप्रभावाद्राजेन्द्र व्यजीवत्सवनस्पतिः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तेनागम्य नरश्रेष्ठ पुंसास्मासु निवेदितम्॥ 1-50-42&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यथावृत्तं तु तत्सर्वं तक्षकस्य द्विजस्य च।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
एतत्ते कथितं राजन्यथा दृष्टं श्रुतं च यत्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
श्रुत्वा च नृपशार्दूल विधत्स्व यदनन्तरम्॥ 1-50-43&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सौतिरुवाच&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मन्त्रिणां तु वचः श्रुत्वा स राजा जनमेजयः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पर्यतप्यत दुःखार्तः प्रत्यपिंषत्करं करे॥ 1-50-44&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
निःश्वासमुष्णमसकृद्दीर्घं राजीवलोचनः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मुमोचाश्रूणि च तदा नेत्राभ्यां प्ररुदन्नृपः॥ 1-50-45&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उवाच च महीपालो दुःखशोकसमन्वितः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दुर्धरं वाष्पमुत्सृज्य स्पृष्ट्वा चापो यथाविधि॥ 1-50-46&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मुहूर्तमिव च ध्यात्वा निश्चित्य मनसा नृपः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अमर्षी मन्त्रिणः सर्वानिदं वचनमब्रवीत्॥ 1-50-47&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जनमेजय उवाच&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
श्रुत्वैतद्भवतां वाक्यं पितुर्मे स्वर्गतिं प्रति।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
निश्चितेयं मम मतिर्या च तां मे निबोधत॥ 1-50-48&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अनन्तरं च मन्येऽहं तक्षकाय दुरात्मने।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
प्रतिकर्तव्यमित्येवं येन मे हिंसितः पिता।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शृङ्गिणं हेतुमात्रं यः कृत्वा दग्ध्वा च पार्थिवम्॥ 1-50-49&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इयं दुरात्मता तस्य काश्यपं यो न्यवर्तयत्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यद्या[दा]ऽऽगच्छेत्स वै विप्रो ननु जीवेत्पिता मम॥ 1-50-50&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
परिहीयेत किं तस्य यदि जीवेत्स पार्थिवः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
काश्यपस्य प्रसादेन मन्त्रिणां विनयेन च॥ 1-50-51&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
स तु वारितवान्मोहात्काश्यपं द्विजसत्तमम्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सञ्जीजीवयिषुं प्राप्तं राजानमपराजितम्॥ 1-50-52&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
महानतिक्रमो ह्येष तक्षकस्य दुरात्मनः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
द्विजस्य योऽददद्द्रव्यं मा नृपं जीवयेदिति॥ 1-50-53&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उद[त्त]ङ्कस्य प्रियं कर्तुमात्मनश्च महत्प्रियम्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भवतां चैव सर्वेषां गच्छाम्यपचितिं पितुः॥ 1-50-54&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि आस्तीकपर्वणि पारिक्षिन्मन्त्रिसंवादे पञ्चाशत्तमोऽध्यायः॥ 50 ॥&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>P16459</name></author>
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