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	<title>Adiparva Adhyaya 47 (आदिपर्वणि अध्यायः ४७) - Revision history</title>
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	<updated>2026-05-06T10:44:05Z</updated>
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		<title>P16459: NEW pg</title>
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		<updated>2019-10-16T11:48:08Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;NEW pg&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;&lt;b&gt;New page&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;div&gt;सौतिरुवाच&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वासुकिस्त्वब्रवीद्वाक्यं जरत्कारुमृषिं तदा।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सनाम्नी तव कन्येयं स्वसा मे तपसान्विता॥ 1-47-1&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भरिष्यामि च ते भा[र्या]र्यां प्रतीच्छेमां द्विजोत्तम।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
रक्षणं च करिष्येऽस्याः सर्वशक्त्या तपोधन॥ 1-47-2&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
त्वदर्थं रक्ष्यते चैषा मया मुनिवरोत्तम।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ऋषिरुवाच&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
न भरिष्येऽहमेतां वा[वै] एष मे समयः कृतः॥ 1-47-3&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अप्रियं च न कर्तव्यं कृते चैनां त्यजाम्यहम्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सौतिरुवाच&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
प्रतिश्रुते तु नागेन भरिष्ये भगिनीमिति॥ 1-47-4&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जरत्कारुस्तदा वेश्म भुजगस्य जगाम ह।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तत्र मन्त्रविदां श्रेष्ठस्तपोवृद्धो महाव्रतः॥ 1-47-5&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जग्राह पाणिं धर्मात्मा विधिम[न्त्रपुर]न्त्रैः पुरस्कृतम्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ततो वासगृहं रम्यं पन्नगेन्द्रस्य सम्मतम्॥ 1-47-6&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जगाम भार्यामादाय स्तूयमानो महर्षिभिः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शयनं तत्र संक्लृप्तं स्व[स्प]र्ध्यास्तरणसंवृतम्॥ 1-47-7&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तत्र भार्यासहायो वै जरत्कारुरुवास ह।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
स तत्र समयं चक्रे भार्यया सह सत्तमः॥ 1-47-8&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
विप्रियं मे न कर्तव्यं न च वाच्यं कदाचन।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
त्यजेयं विप्रिये च त्वां कृते वासं च ते गृहे॥ 1-47-9&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
एतद्गृहाण वचनं मया यत्समुदीरितम्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ततः परमसंविग्ना स्वसा नागपतेस्तदा॥ 1-47-10&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अतिदुःखान्विता वाक्यं तमुवाचैवमस्त्विति।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तथैव सा च भर्तारं दुःखशीलमुपाचरत्॥ 1-47-11&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उपायैः श्वेतकाकीयैः प्रियकामा यशस्विनी।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ऋतुकाले ततः स्नाता कदाचिद्वासुकेः स्वसा॥ 1-47-12&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भर्तारं वै यथान्यायमुपतस्थे महामुनिम्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तत्र तस्याः समभवद्गर्भो ज्वलनसंनिभः॥ 1-47-13&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अतीवतेजसा युक्तो वैश्वानरसमद्युतिः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शुक्लपक्षे यथा सोमो व्यवर्धत तथैव सः॥ 1-47-14&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ततः कतिपयाह[स्य]स्सु जरत्कारुर्महायशाः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उत्सङ्गेऽस्याः शिरः कृत्वा सुष्वाप परिखिन्नवत्॥ 1-47-15&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तस्मिंश्च सुप्ते विप्रेन्द्रे सवितास्तमियाद्गिरिम्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अह्नः परिक्षये ब्रह्मंस्ततः साचिन्तयत्तदा॥ 1-47-16&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वासुकेर्भगिनी भीता धर्मलोपान्मनस्विनी।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
किं नु मे सुकृतं भूयाद्भर्तुरुत्थापनं न वा॥ 1-47-17&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दुःखशीलो हि धर्मात्मा कथं नाम्यापराध्नुयाम्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कोपो वा धर्मशीलस्य धर्मलोपोऽथवा पुनः॥ 1-47-18&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
धर्मलोपो गरीयान्वै स्यादित्यत्राकरोन्मतिम्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उत्थापयिष्ये यद्येनं ध्रुवं कोपं करिष्यति॥ 1-47-19&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
धर्मलोपो भवेदस्य संध्यातिक्रमणे ध्रुवम्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इति निश्चित्य मनसा जरत्कारुर्भुजङ्गमा॥ 1-47-20&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तमृषिं दीप्ततपसं शयानमनलोपमम्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उवाचेदं वचः श्लक्ष्णं ततो मधुरभाषिणी॥ 1-47-21&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उत्तिष्ठ त्वं महाभाग सूर्योऽस्तमुपगच्छति।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सन्ध्यामुपास्स्व भगवन्नपः स्पृष्ट्वा यतव्र[तः]त॥ 1-47-22&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
प्रादुष्कृताग्निहोत्रोऽयं मुहूर्तो रम्यदारुणः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
संध्या प्रवर्तते चेयं पश्चि[मायां]मस्यां दिशि प्रभो॥ 1-47-23&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
एवमुक्तः स भगवान्जरत्कारुर्महातपाः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भार्यां प्रस्फुरमाणौष्ठ इदं वचनमब्रवीत्॥ 1-47-24&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अवमानः प्रयुक्तोऽयं त्वया मम भुजङ्गमे।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
समीपे ते न वत्स्यामि गमिष्यामि यथागतम्॥ 1-47-25&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शक्तिरस्ति न वामोरु मयि सुप्ते विभावसोः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अस्तं गन्तुं यथाकालमिति मे हृदि वर्तते॥ 1-47-26&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
न वा[चा]प्यवमतस्येह वासो रोचेत कस्यचित्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
किं पुनर्धर्मशीलस्य मम वा मद्विधस्य वा॥ 1-47-27&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
एवमुक्ता जरत्कारुर्भर्त्रा हृदयकम्पनम्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अब्रवीद्भगिनी तत्र वासुकेः संनिवेशने॥ 1-47-28&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
नावमानात्कृतवती तवाहं विप्र बोधनम्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
धर्मलोपो न ते विप्र स्यादित्येतन्मया कृतम्॥ 1-47-29&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उवाच भार्यामित्युक्तो जरत्कारुर्महातपाः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ऋषिः कोपसमाविष्टस्त्यक्तुकामो भुजङ्गमाम्॥ 1-47-30&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
न मे वागनृतं प्राह गमिष्येऽहं भुजङ्गमे।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
समयो ह्येष मे पूर्वं त्वया सह मिथः कृतः॥ 1-47-31&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सुखमस्म्युषितो भद्रे ब्रूयास्त्वं भ्रातरं शुभे।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इतो मयि गते भीरु गतः स भगवानिति॥ 1-47-32&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
त्वं चापि मयि निष्क्रान्ते न शोकं कर्तुमर्हसि।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इत्युक्ता सानवद्याङ्गी प्रत्युवाच मुनिं तदा॥ 1-47-33&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जरत्कारुं जरत्कारुश्चिन्ताशोकपरायणा।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बाष्पगद्गदया वाचा मुखेन परिशुष्यता॥ 1-47-34&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कृताञ्जलिर्वरारोहा पर्यश्रुनयना ततः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
धैर्यमालम्ब्य वामोरुर्हृदयेन प्रवेपता॥ 1-47-35&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
न मामर्हसि धर्मज्ञ परित्यक्तुमनागसम्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
धर्मे स्थितां स्थितो धर्मे सदा प्रियहिते रताम्॥ 1-47-36&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
प्रदाने कारणं यच्च मम तुभ्यं द्विजोत्तम।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अपत्यार्थं तुमे भ्रात्रा ज्ञातीनां हितकाम्यया।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तदलब्धवतीं मन्दां किं मां वक्ष्यति वासुकिः॥ 1-47-37&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मातृशापाभिभूतानां ज्ञातीनां मम सत्तम।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अपत्यमीप्सितं त्वत्तस्तच्च तावन्न दृश्यते॥ 1-47-38&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
त्वत्तो ह्यपत्यलाभेन ज्ञातीनां मे शिवं भवेत्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सम्प्रयोगो भवेन्नायं मम मोघस्त्वया द्विज॥ 1-47-39&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ज्ञातीनां हितमिच्छन्ती भगवंस्त्वां प्रसादये।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इममव्यक्तरूपं मे गर्भमाधाय सत्तम॥ 1-47-40&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कथं त्यक्त्वा महात्मा सन्गन्तुमिच्छस्यनागसम्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
एवमुक्तस्तु स मुनिर्भार्यां वचनमब्रवीत्॥ 1-47-41&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यद्युक्तमनुरूपं च जरत्कारुं तपोधनः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अस्त्ययं सुभगे गर्भस्तव वैश्वानरोपमः॥ 1-47-42&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ऋषिः परमधर्मात्मा वेदवेदाङ्गपारगः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
एवमुक्त्वा स धर्मात्मा जरत्कारुर्महानृषिः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उग्राय तपसे भूयो जगाम कृतनिश्चयः॥ 1-47-43&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि आस्तीकपर्वणि जरत्कारुनिर्गमे सप्तचत्वारिंशोऽध्यायः॥ 47 ॥&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>P16459</name></author>
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