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	<title>Adiparva Adhyaya 41 (आदिपर्वणि अध्यायः ४१) - Revision history</title>
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	<updated>2026-05-06T11:02:04Z</updated>
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		<title>P16459: new pg</title>
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		<updated>2019-10-16T11:40:04Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;new pg&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;&lt;b&gt;New page&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;div&gt;सौतिरुवाच&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
एवमुक्तः स तेजस्वी शृङ्गी कोपसमन्वितः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मृतधारं गुरुं श्रुत्वा पर्यतप्यत मन्युना॥ 1-41-1&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
स तं कृशमभिप्रेक्ष्य सूनृतां वाचमुत्सृजन्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अपृच्छत्तं कथं तातः स मेऽद्य मृतधारकः॥ 1-41-2&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कृश उवाच&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
राज्ञा परिक्षिता तात मृगयां परिधावता।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अवसक्तः पितुस्तेऽद्य मृतः स्कन्धे भुजङ्गमः॥ 1-41-3&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शृङ्ग्युवाच&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
किं मे पित्रा कृतं तस्य राज्ञोऽनिष्टं दुरात्मनः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ब्रूहि तत्कृश तत्त्वेन पश्य मे तपसो बलम्॥ 1-41-4&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कृश उवाच&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
स राजा मृगयां यातः प[रि]रीक्षिदभिमन्युजः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ससार मृगमेकाकी विद्ध्वा बाणेन शीघ्रगम्॥ 1-41-5&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
न चापश्यन्मृगं राजा चरंस्तस्मिन्महावने।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पितरं ते स दृष्ट्वैव पप्रच्छानभिभाषिणम्॥ 1-41-6&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तं स्थाणुभूतं तिष्ठन्तं क्षुत्पिपासाश्रमातुरः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पुनः पुनर्मृगं नष्टं पप्रच्छ पितरं तव॥ 1-41-7&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
स च मौनव्रतोपेतो नैव तं प्रत्यभाषत।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तस्य राजा धनुष्कोट्या सर्पं स्कन्धे समा[स]सृजत्॥ 1-41-8&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शृङ्गिंस्तव पिता सोऽपि तथैवास्ते यतव्रतः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सोऽपि राजा स्वनगरं प्रस्थितो गजसाह्वयम्॥ 1-41-9&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सौतिरुवाच&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
श्रुत्वैवमृषिपुत्रस्तु शवं कन्धे प्रतिष्ठितम्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कोपसंरक्तनयनः प्रज्वलन्निव मन्युना॥ 1-41-10&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आविष्टः स हि कोपेन शशाप नृपतिं तदा।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वार्युपस्पृश्य तेजस्वी क्रोधवेगबलात्कृतः॥ 1-41-11&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शृङ्ग्युवाच&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
योऽसौ वृद्धस्य तातस्य तथा कृच्छ्रगतस्य ह।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
स्कन्धे मृतं समास्राक्षीत्पन्नगं राजकिल्बिषी॥ 1-41-12&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तं पापमतिसंक्रुद्धस्तक्षकः पन्नगेश्वरः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आशीविषस्तिग्मतेजा मद्वाक्यबलचोदितः॥ 1-41-13&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सप्तरात्रादितो नेता यमस्य सदनं प्रति।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
द्विजानामवमन्तारं कुरूणामयशस्करम्॥ 1-41-14&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सौतिरुवाच&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इति शप्त्वातिसंक्रुद्धः शृङ्गी पितरमभ्यगात्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आसीनं गोव्रजे तस्मिन्वहन्तं शवपन्नगम्॥ 1-41-15&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
स तमालक्ष्य पितरं शृङ्गी स्कन्धगतेन वै।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शवेन भुजगेनासीद्भूयः क्रोधसमाकुलः॥ 1-41-16&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दुःखाच्चाश्रूणि मुमुचे पितरं चेदमब्रवीत्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
श्रुत्वेमां धर्षणां तात तव तेन दुरात्मना॥ 1-41-17&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
राज्ञा प[रि]रीक्षिता कोपादशपं तमहं नृपम्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यथार्हति स एवोग्रं शापं कुरुकुलाधमः॥ 1-41-18&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सप्तमेऽहनि तं पापं तक्षकः पन्नगोत्तमः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वैवस्वतस्य सदनं नेता परमदारुणम्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तमब्रवीत्पिता ब्रह्मंस्तथा कोपसमन्वितम्॥ 1-41-19&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शमीक उवाच&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
न मे प्रियं कृतं तात नैष धर्मस्तपस्विनाम्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वयं तस्य नरेन्द्रस्य विषये निवसामहे॥ 1-41-20&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
न्यायतो रक्षितास्तेन तस्य शापं न रोचये।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सर्वथा वर्तमानस्य राज्ञो ह्यस्मद्विधैः सदा।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
क्षन्तव्यं पुत्र धर्मो हि हतो हन्ति न संशयः॥ 1-41-21&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यदि राजा न संरक्षेत्पीडा नः परमा भवेत्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
न शक्नुयाम चरितुं धर्मं पुत्र यथासुखम्॥ 1-41-22&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
रक्ष्यमा[णा व]णं च यं तात राजभिर्धर्मदृष्टिभिः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
चरामो विपुलं धर्मं तेषां भागोऽस्ति धर्मतः॥ 1-41-23&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सर्वथा वर्तमानस्य राज्ञः क्षन्तव्यमेव हि।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
प[रि]रीक्षित्तु विशेषेण यथास्य प्रपितामहः॥ 1-41-24&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
रक्षत्यस्मांस्तथा राज्ञा रक्षितव्याः प्रजा विभो।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तेनेह क्षुधितेनाद्य श्रान्तेन च तपस्विना॥ 1-41-25&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अजानता कृतं मन्ये व्रतमेतदिदं मम।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अराजके जनपदे दोषा जायन्ति वै सदा॥ 1-41-26&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उद्वृत्तं सततं लोकं राजा दण्डेन शास्ति वै।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दण्डात्प्रतिभयं भूयः शान्तिरुत्पद्यते तदा॥ 1-41-27&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
नोद्विग्नश्चरते धर्मं नोद्विग्नश्चरते क्रियाम्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
राज्ञा प्रतिष्ठितो धर्मो धर्मात्स्वर्गः प्रतिष्ठितः॥ 1-41-28&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
राज्ञो यज्ञक्रियाः सर्वा यज्ञाद्देवाः प्रतिष्ठिताः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
देवाद्वृष्टिः प्रवर्तेत वृष्टेरोषधयः स्मृताः॥ 1-41-29&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ओषधिभ्यो मनुष्याणां धार[यन्]येत्सततं हितम्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मनुष्याणां च यो धाता राजा राज्यकरः पुनः॥ 1-41-30&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दशश्रोत्रियसमो राजा इत्येवं मनुरब्रवीत्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तेनेह क्षुधितेनाद्य श्रान्तेन च तपस्विना॥ 1-41-31&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अजानता कृतं मन्ये व्रतमेतदिदं मम।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कस्मादिदं त्वया बाल्यात्सहसा दुष्कृतं कृतम्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
न ह्यर्हति नृपः शापमस्मत्तः पुत्र सर्वथा॥ 1-41-32&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि आस्तीकपर्वणि परिक्षिच्छापे एकचत्वारिंशोऽध्यायः॥ 41 ॥&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>P16459</name></author>
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