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	<title>Adiparva Adhyaya 37 (आदिपर्वणि अध्यायः ३७) - Revision history</title>
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	<updated>2026-05-02T19:50:42Z</updated>
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		<title>P16459: new pg</title>
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		<updated>2019-10-16T11:33:54Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;new pg&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;&lt;b&gt;New page&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;div&gt;सौतिरुवाच&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मातुः सकाशात्तं शापं श्रुत्वा वै पन्नगोत्तमः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वासुकिश्चिन्तयामास शापोऽयं न भवेत्कथम्॥ 1-37-1&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ततः स मन्त्रयामास भ्रातृभिः सह सर्वशः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ऐरावतप्रभृतिभिः सर्वधर्मपरायणैः॥ 1-37-2&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वासुकिरुवाच&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अयं शापो यथोद्दिष्टो विदितं वस्तथानघाः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तस्य शापस्य मोक्षार्थं मन्त्रयित्वा यतामहे॥ 1-37-3&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सर्वेषामेव शापानां प्रतिघातो हि विद्यते।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
न तु मात्राभिशप्तानां मोक्षः क्वचन विद्यते॥ 1-37-4&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अव्ययस्याप्रमेयस्य सत्यस्य च तथाग्रतः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शप्ता इत्येव मे श्रुत्वा जायते हृदि वेपथुः॥ 1-37-5&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
नूनं सर्वविनाशोऽयमस्माकं समुपागतः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
न ह्येतां सोऽव्ययो देवः शपन्तीं प्रत्यषेधयत्॥ 1-37-6&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तस्मात्सम्मन्त्रयामोऽद्य भुजङ्गानामनामयम्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यथा भवेद्धि सर्वेषां मा नः कालोऽत्यगादयम्॥ 1-37-7&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सर्व एव हि नस्तावद्बुद्धिमन्तो विचक्षणाः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अपि मन्त्रयमाणा हि हेतुं पश्याम मोक्षणे॥ 1-37-8&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यथा नष्टं पुरा देवा गूढमग्निं गुहागतम्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यथा स यज्ञो न भवेद्यथा वापि पराभवः॥ 1-37-9&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जनमेजयस्य सर्पाणां विनाशकरणाय वै।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सौतिरुवाच&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तथेत्युक्त्वा ततः सर्वे काद्रवेयाः समागताः॥ 1-37-10&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
समयं चक्रिरे तत्र मन्त्रबुद्धिविशारदाः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
एके तत्राब्रुवन्नागा वयं भूत्वा द्विजर्षभाः॥ 1-37-11&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जनमेजयं तु भिक्षामो यज्ञस्ते न भवेदिति।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अपरे त्वब्रुवन्नागास्तत्र पण्डितमानिनः॥ 1-37-12&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मन्त्रिणोऽस्य वयं सर्वे भविष्यामः सुसम्मताः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
स नः प्रक्ष्यति सर्वेषु कार्येष्वर्थविनिश्चयम्॥ 1-37-13&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तत्र बुद्धिं प्रदास्यामो यथा यज्ञो निवर्त्स्यति।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
स नो बहुमतान्राजा बुद्ध्या बुद्धिमतां वरः॥ 1-37-14&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यज्ञार्थं प्रक्ष्यति व्यक्तं नेति वक्ष्यामहे वयम्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दर्शयन्तो बहून्दोषान्प्रेत्य चेह च दारुणान्॥ 1-37-15&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हेतुभिः कारणैश्चैव यथा यज्ञो भवेन्न सः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अथवा य उपाध्यायः क्रतोस्तस्य भविष्यति॥ 1-37-16&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सर्पसत्रविधानज्ञो राजकार्यहिते रतः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तं गत्वा दशतां कश्चिद्भुजङ्गः स मरिष्यति॥ 1-37-17&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तस्मिन्मृते यज्ञकारे क्रतुः स न भविष्यति।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ये चान्ये सर्पसत्रज्ञा भविष्यन्त्यस्य चर्त्विजः॥ 1-37-18&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तांश्च सर्वान्दाशिष्यामः कृतमेवं भविष्यति।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अपरे त्वब्रुवन्नागा धर्मात्मानो दयालवः॥ 1-37-19&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अबुद्धिरेषा भवतां ब्रह्महत्या न शोभनम्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सम्यक्सद्धर्ममूला वै व्यसने शान्तिरुत्तमा॥ 1-37-20&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अधर्मोत्तरता नाम कृत्स्नं व्यापादयेज्जगत्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अपरे त्वब्रुवन्नागाः समिद्धं जातवेदसम्॥ 1-37-21&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वर्षैर्निर्वापयिष्यामो मेघा भूत्वा सविद्युतः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
स्रुग्भाण्डं निशि गत्वा च ह्य[अ]परेभुजगोत्तमाः॥ 1-37-22&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
प्रमत्तानां हरन्त्वाशु विघ्न एवं भविष्यति।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यज्ञे वा भुजगास्तस्मिञ्छतशोऽथ सहस्रशः॥ 1-37-23&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जनान्दशन्तु वै सर्वानेवं [सर्वे नैवं] त्रासो भविष्यति।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अथवा संस्कृतं भोज्यं दूषयन्तु भुजङ्गमः॥ 1-37-24&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
स्वेन मूत्रपुरीषेण सर्वभोज्यविनाशिना।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अपरे त्वब्रुवंस्तत्र ऋत्विजोऽस्य भवामहे॥ 1-37-25&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यज्ञविघ्नं करिष्यामो दीयतां दक्षिणा इति।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वश्यतां च गतोऽसौ नः करिष्यति यथेप्सितम्॥ 1-37-26&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अपरे त्वब्रुवंस्तत्र जले प्रक्रीडितं नृपम्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
गृहमानीय बध्नीमः क्रतुरेव भवेन्न सः॥ 1-37-27&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अपरे त्वब्रुवंस्तत्र नागाः पण्डितमानिनः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दशामस्तं प्रगृह्याशु कृतमेवं भविष्यति॥ 1-37-28&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
छिन्नं मूलमनर्थानां मृते तस्मिन्भविष्यति।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
एषा नो नैष्ठिकी बुद्धिः सर्वेषामीक्षणश्रवः॥ 1-37-29&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अथ यन्मन्यसे राजन्द्रुतं तत्संविधीयताम्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इत्युक्त्वा समुदैक्षन्त वासुकिं पन्नगोत्तमम्॥ 1-37-30&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वासुकिश्चापि संचिन्त्य तानुवाच भुजङ्गमान्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
नैषा वो नैष्ठिकी बुद्धिर्मता कर्तुं भुजङ्गमाः॥ 1-37-31&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सर्वेषामेव मे बुद्धिः पन्नगानां न रोचते।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
किं तत्र संविधातव्यं भवतां स्याद्धितं तु यत्॥ 1-37-32&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
श्रेयःप्रसाधनं मन्ये कश्यपस्य महात्मनः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ज्ञातिवर्गस्य सौहार्दादात्मनश्च भुजङ्गमाः॥ 1-37-33&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
न च जानाति मे बुद्धिः किञ्चित्कर्तुं वचो हि वः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मया हीदं विधातव्यं भवतां यद्धितं भवेत्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अनेनाहं भृशं तप्ये गुणदोषौ मदाश्रयौ॥ 1-37-34&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि आस्तीकपर्वणि वासुक्यादिमन्त्रणे सप्तत्रिंशोऽध्यायः॥ 37 ॥&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>P16459</name></author>
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