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	<title>Adiparva Adhyaya 135 (आदिपर्वणि अध्यायः १३५) - Revision history</title>
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		<title>Pṛthvī: Created page with &quot;वैशम्पायन उवाच  एतस्मिन्नेव काले तु तस्मिन्जनसमागमे।  दत्तेऽवका...&quot;</title>
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		<updated>2019-08-22T09:50:07Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Created page with &amp;quot;वैशम्पायन उवाच  एतस्मिन्नेव काले तु तस्मिन्जनसमागमे।  दत्तेऽवका...&amp;quot;&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;&lt;b&gt;New page&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;div&gt;वैशम्पायन उवाच&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
एतस्मिन्नेव काले तु तस्मिन्जनसमागमे।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दत्तेऽवकाशे पुरुषैर्विस्मयोत्फुल्ललोचनः[नैः]।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
विवेश रङ्गं विस्तीर्णं कर्णः परपुरञ्जयः॥ 1-135-1&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सहजं कवचं बिभ्रत्कुण्डलोद्द्योतिताननः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सधनुर्बद्धनिस्त्रिंशः पादचारीव पर्वतः॥ 1-135-2&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कन्यागर्भः पृथुयशाः पृथायाः पृथुलोचनः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तीक्ष्णांशोर्भास्करस्यांशः कर्णोऽरिगणसूदनः॥ 1-135-3&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सिंहर्षभगजेन्द्राणां बलवीर्यपराक्रमः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दीप्तिकान्तिद्युतिगुणैः सूर्येन्दुज्वलनोपमः॥ 1-135-4&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
प्रांशुः कनकतालाभः सिंहसंहननो युवा।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
असङ्ख्येयगुणः श्रीमान्भास्करस्यात्मसम्भवः॥ 1-135-5&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
स निरीक्ष्य महाबाहुः सर्वतो रङ्गमण्डलम्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
प्रणामं द्रोणकृपयोर्नात्यादृतमिवाकरोत्॥ 1-135-6&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
स समाजजनः सर्वो निश्चलः स्थिरलोचनः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कोऽयमित्यागतक्षोभः कौतूहलपरोऽभवत्॥ 1-135-7&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
विवेश रङ्गं विस्तीर्णं कर्णः परपुरञ्जयः॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सहजं कवचं बिभ्रत्कुण्डलद्योतिताननः॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सधनुर्बद्धनिस्त्रिंशः पादचारीव पर्वतः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कानीनस्तु पृथुयशाः पृथापुत्रः प्रतापवान्॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सोऽब्रवीन्मेघगम्भीरस्वरेण वदतां वरः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भ्राता भ्रातरमज्ञातं सावित्रः पाकशासनिम्॥ 1-135-8&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पार्थ यत्ते कृतं कर्म विशेषवदहं ततः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
करिष्ये पश्यतां नॄणा[णां]माऽऽत्मना विस्मयं गमः॥ 1-135-9&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
असमाप्ते ततस्तस्य वचने वदतां वर।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यन्त्रोत्क्षिप्त इवोत्तस्थौ क्षिप्रं वै सर्वतो जनः॥ 1-135-10&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
प्रीतिश्च मनुजव्याघ्र दुर्योधनमुपाविशत्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ह्रीश्च क्रोधश्च बीभत्सुं क्षणेनान्वाविवेश ह॥ 1-135-11&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ततो द्रोणाभ्यनुज्ञातः कर्णः प्रियरणः सदा।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यत्कृतं तत्र पार्थेन तच्चकार महाबलः॥ 1-135-12&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अथ दुर्योधनस्तत्र भ्रातृभिः सह भारत।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कर्णं परिष्वज्य मुदा ततो वचनमब्रवीत्॥ 1-135-13&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दुर्योधन उवाच&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
स्वागतं ते महाबाहो दिष्ट्या प्राप्तोऽसि मानद।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अहं च कुरुराज्यं च यथेष्टमुपभुज्यताम्॥ 1-135-14&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कर्ण उवाच&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कृतं सर्वमहं मन्ये सखित्वं च त्वया वृणे।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
द्वन्द्वयुद्धं च पार्थेन कर्तुमिच्छाम्यहं प्रभो॥ 1-135-15&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दुर्योधन उवाच&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भुङ्क्ष्व भोगान्मया सार्धं बन्धूनां प्रियकृद्भव।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दुर्हृदां कुरु सर्वेषां मूर्ध्नि पादमरिन्दम॥ 1-135-16&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वैशम्पायन उवाच&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ततः क्षिप्तमिवात्मानं मत्वा पार्थोऽभ्यभाषत।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कर्णं भ्रातृसमूहस्य मध्येऽचलमिव स्थितम्॥ 1-135-17&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अर्जुन उवाच&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अनाहूतोपदि[सृ]ष्टानामनाहूतोपजल्पिनाम्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ये लोकास्तान्हतः कर्ण मया त्वं प्रतिपत्स्यसे॥ 1-135-18&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कर्ण उवाच&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
रङ्गोऽयं सर्वसामान्यः किमत्र तव फाल्गुन।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वीर्यश्रेष्ठाश्च राजानो बलं धर्मोऽनुवर्तते॥ 1-135-19&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
किं क्षेपैर्दुर्बलायासैः शरैः कथय भारत।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
गुरोः समक्षं यावत्ते हराम्यद्य शिरः शरैः॥ 1-135-20&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वैशम्पायन उवाच&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ततो द्रोणाभ्यनुज्ञातः पार्थः परपुरञ्जयः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भ्रातृभिस्त्वरयाऽऽश्लिष्टो रणायोपजगाम तम्॥ 1-135-21&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ततो दुर्योधनेनापि सभ्रात्रा समरोद्यतः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
परिष्वक्तः स्थितः कर्णः प्रगृह्य सशरं धनुः॥ 1-135-22&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ततः सविद्युत्स्तनितैः सेन्द्रायुधपुरोगमैः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आवृतं गगनं मेघैर्बलाकापङ्क्तिदा[हा]सिभिः॥ 1-135-23&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ततः स्नेहाद्धरिहयं दृष्ट्वा रङ्गावलोकिनम्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भास्करोऽप्यनयन्नाशं समीपोपगतान्घनान्॥ 1-135-24&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मेघच्छायोपगूढस्तु ततोऽदृश्यत फाल्गुनः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सूर्यातपपरिक्षिप्तः कर्णोऽपि समदृश्यत॥ 1-135-25&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
धार्तराष्ट्रा यतः कर्णस्तस्मिन्देशे व्यवस्थिताः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भारद्वाजः कृपो भीष्मो यतः पार्थस्ततोऽभवन्॥ 1-135-26&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
द्विधा रङ्गः समभवत्स्त्रीणां द्वैधमजायत।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कुन्तिभोजसुता मोहं विज्ञातार्था जगाम ह॥ 1-135-27&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तां तथा मोहमापन्नां विदुरः सर्वधर्मवित्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कुन्तीमाश्वासयामास प्रेष्याभिश्चन्दनोदकैः॥ 1-135-28&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ततः प्रत्यागतप्राणा तावुभौ परिदंशितौ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पुत्रौ दृष्ट्वा सुसम्भ्रान्ता नान्वपद्यत किञ्चन॥ 1-135-29&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तावुद्यतमहाचापौ कृपः शारद्वतोऽब्रवीत्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
द्वन्द्वयुद्धसमाचारे कुशलः सर्वधर्मवित्॥ 1-135-30&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अयं पृथायास्तनयः कनीयान्पाण्डुनन्दनः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कौरवो भवता सार्धं द्वन्द्वयुद्धं करिष्यति॥ 1-135-31&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
त्वमप्येवं महाबाहो मातरं पितरं कुलम्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कथयस्व नरेन्द्राणां येषां त्वं कुलभूषणः[णम्]॥ 1-135-32&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ततो विदित्वा पार्थस्त्वां प्रतियोत्स्यति वा न वा।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वृथाकुलसमाचारैर्न युध्यन्ते नृपात्मजाः॥ 1-135-33&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वैशम्पायन उवाच&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
एवमुक्तस्य कर्णस्य व्रीडावनतमाननम्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बभौ वर्षाम्बुविक्लिन्नं पद्ममागलितं यथा॥ 1-135-34&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दुर्योधन उवाच&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आचार्य त्रिविधा योनी राज्ञां शास्त्रविनिश्चये।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सत्कुलीनश्च शूरश्च यश्च सेनां प्रकर्षति॥ 1-135-35&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अद्भ्योऽग्निर्ब्रह्मणः क्षत्रमश्मनो लोहमुत्थितम्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तेषां सर्वगतं तेजः स्वासु योनिषु शाम्यति॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यद्ययं फाल्गुनो युद्धे नाराज्ञा योद्धुमिच्छति।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तस्मादेषोऽङ्गविषये मया राज्येऽभिषिच्यते॥ 1-135-36&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वैशम्पायन उवाच&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
(ततो राजानमामन्त्र्य गाङ्गेयं च पितामहम्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अभिषेकस्य सम्भारान्समानीय द्विजातिभिः॥)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
गोसहस्रायुतं दत्त्वा युक्तानां पुण्यकर्मणाम्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अर्होऽयमङ्गराज्यस्य इति वाच्य द्विजातिभिः॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ततस्तस्मिन्क्षणे कर्णः सलाजकुसुमैर्घटैः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
काञ्चनैः काञ्चने पीठे मन्त्रविद्भिर्महारथः॥ 1-135-37&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अभिषिक्तोऽङ्गराज्यस्य[ज्ये स] श्रिया युक्तो महाबलः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
(समौलिहारकेयूरैः सहस्ताभरणाङ्गदैः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
राजलिङ्गैस्तथान्यैश्च भूषितो भूषणैः शुभैः॥)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सच्छत्रवालव्यजनो जयशब्दोत्तरेण च॥ 1-135-38&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
(सभाज्यमानो विप्रैश्च प्रदत्त्वा ह्यमितं वसु।)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उवाच कौरवं राजा[जन्] वचनं स वृषस्तदा।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अस्य राज्यप्रदानस्य सदृशं किं ददानि ते॥ 1-135-39&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
प्रब्रूहि राजशार्दूल कर्ता ह्यस्मि तथा नृप।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अत्यन्तं सख्यमिच्छामीत्याह तं स सुयोधनः॥ 1-135-40&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
एवमुक्तस्ततः कर्णस्तथेति प्रत्युवाच तम्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हर्षाच्चोभौ समाश्लिष्य परां मुदमवापतुः॥ 1-135-41&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि सम्भवपर्वणि कर्णाभिषेके पञ्चत्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः॥ 135॥&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Pṛthvī</name></author>
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