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	<title>Adiparva Adhyaya 134 (आदिपर्वणि अध्यायः १३४) - Revision history</title>
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		<title>Pṛthvī: Created page with &quot;वैशम्पायन उवाच  कुरुराजे हि रङ्गस्थे भीमे च बलिनां वरे।  पक्षपातक...&quot;</title>
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		<updated>2019-08-22T09:48:21Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Created page with &amp;quot;वैशम्पायन उवाच  कुरुराजे हि रङ्गस्थे भीमे च बलिनां वरे।  पक्षपातक...&amp;quot;&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;&lt;b&gt;New page&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;div&gt;वैशम्पायन उवाच&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कुरुराजे हि रङ्गस्थे भीमे च बलिनां वरे।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पक्षपातकृतस्नेहः स द्विधेवाभवज्जनः॥ 1-134-1&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ही वीर कुरुराजेति ही भीमेति च[भीम इति] जल्पताम्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पुरुषाणां सुविपुलाः प्रणादाः सहसोत्थिताः॥ 1-134-2&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ततः क्षुब्धार्णवनिभं रङ्गमालोक्य बुद्धिमान्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भारद्वाजः प्रियं पुत्रमश्वत्थामानमब्रवीत्॥ 1-134-3&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
द्रोण उवाच&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वारयैतौ महावीर्यौ कृतयोग्यावुभावपि।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मा भूद्रङ्गप्रकोपोऽयं भीमदुर्योधननोद्भवः॥ 1-134-4&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वैशम्पायन उवाच&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
(तत उत्थाय वेगेन अश्वत्थामा न्यवारयत्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
गुरोराज्ञा भीम इति गान्धारे गुरुशासनम्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अलं योग्यकृतं वेगमलं साहसमित्युत॥)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ततस्तावुद्यतगदौ गुरुपुत्रेण वारितौ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
युगान्तानिलसङ्क्षुब्धौ महावेलाविवार्णवौ॥ 1-134-5&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ततो रङ्गाङ्गणगतो द्रोणो वचनमब्रवीत्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
निवार्य वादित्रगणं महामेघनिभस्वनम्॥ 1-134-6&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यो मे पुत्रात्प्रियतरः सर्वशस्त्रविशारदः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ऐन्द्रिरिन्द्रानुजसमः स पार्थो दृश्यतामिति॥ 1-134-7&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आचार्यवचनेनाथ कृतस्वस्त्ययनो युवा।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बद्धगोधाङ्गुलित्राणः पूर्णतूणः सकार्मुकः॥ 1-134-8&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
काञ्चनं कवचं बिभ्रत्प्रत्यदृश्यत फाल्गुनः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सार्कः सेन्द्रायुधतटित्[डित्] ससंध्य इव तोयदः॥ 1-134-9&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ततः सर्वस्य रङ्गस्य समुत्पिञ्जलकोऽभवत्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
प्रावाद्यन्त च वाद्यानि सशङ्खानि समन्ततः॥ 1-134-10&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
एष कुन्तीसुतः श्रीमानेष मध्यमपाण्डवः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
एष पुत्रो महेन्द्रस्य कुरूणामेष रक्षिता॥ 1-134-11&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
एषोऽस्त्रविदुषां श्रेष्ठ एष धर्मभृतां वरः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
एष शीलवतां चा[वा]पि शीलज्ञाननिधिः परः॥ 1-134-12&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इत्येवं तुमुला वाचः शुशृवुः[शृण्वत्याः] प्रेक्षकेरिताः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कुन्त्याः प्रस्रवसंयुक्तैरस्रैः क्लिन्नमुरोऽभवत्॥ 1-134-13&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तेन शब्देन महता पूर्णश्रुतिरथाब्रवीत्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
धृतराष्ट्रो नरश्रेष्ठो विदुरं हृष्टमानसः॥ 1-134-14&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
क्षत्तः क्षुब्धार्णवनिभः किमेष सुमहास्वनः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सहसैवोत्थितो रङ्गे भिन्दन्निव नभस्तलम्॥ 1-134-15&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
विदुर उवाच&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
एष पार्थो महाराज फाल्गुनः पाण्डुनन्दनः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अवतीर्णः सकवचस्तत्रैष सुमहास्वनः॥ 1-134-16&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
धृतराष्ट्र उवाच&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
धन्योऽस्म्यनुगृहीतोऽस्मि रक्षितोऽस्मि महामते।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पृथारणिसमुद्भूतैस्त्रिभिः पाण्डववह्निभिः॥ 1-134-17&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वैशम्पायन उवाच&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तस्मिन्प्रमुदिते रङ्गे कथञ्चित्प्रत्युपस्थिते।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दर्शयामास बीभत्सुराचार्यायास्त्रलाघवम्॥ 1-134-18&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आग्नेयेनासृजद्वह्निं वारुणेनासृजत्पयः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वायव्येनासृजद्वायुं पार्जन्येनासृजद्घनान्॥ 1-134-19&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भौमेन प्राविशद्भूमिं पार्वतेनाभजद्गिरिम्[सृजद्गिरीन्]।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अन्तर्धानेन चास्त्रेण पुनरन्तर्हितोऽभवत्॥ 1-134-20&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
क्षणात्प्रांशुः क्षणाद्ध्रस्वः क्षणाच्च रथधूर्गतः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
क्षणेन रथमध्यस्थः क्षणेनावतरन्महीम्॥ 1-134-21&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सुकुमारं च सूक्ष्मं च गुरुं चापि गुरुप्रियः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सौष्ठवेनाभिसङ्क्षिप्तः सोऽविध्यद्विविधैः शरैः॥ 1-134-22&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भ्रमतश्च वराहस्य लोहस्य प्रमुखे समम्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पञ्च बाणानसंयुक्तान्सम्मुमोचैकबाणवत्॥ 1-134-23&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
गव्ये विषाणकोशे[षे] च बि[च]ले रज्ज्ववलम्बिनि।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
निचखान महावीर्यः सायकानेकविंशतिम्॥ 1-134-24&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इत्येवमादि सुमहत्ख़ड्गे धनुषि चानघ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
गदायां शस्त्रकुशलो मण्डलान्यन्व[नि ह्य]दर्शयत्॥ 1-134-25&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
चक्रे तोमरपाशानां भिण्डिपालपरश्वथान्॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अन्येषां चापि शिक्षाणां दर्शयामास लाघवम्॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वैशम्पायनः--&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इत्येवमतुला वाचश्शृण्वन्त्याः प्रेक्षकेरिताः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कुन्त्याः प्रस्रवसंमिश्रैरस्रैः क्लिन्नमुरोऽभवत्॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तेन शब्देन महता पूर्णश्रुतिरथाब्रवीत्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
धृतराष्ट्रो नरश्रेष्ठो विदुरं हृष्टमानसः॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
धृतराष्ट्रः--&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
क्षत्तः क्षुब्धार्णवसमः किमेष सुमहास्वनः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सहसैवोत्थितो रङ्गे भिन्दन्निव नभस्तलम्॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
विदुरः--&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
एष पार्थो महाबाहुः कौन्तेयः पाण्डुनन्दनः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अवतीर्णस्सकवचस्तत्रैष जननिस्वनः॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
धृतराष्ट्रः--&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
धन्योऽस्म्यनुगृहीतोऽस्मि रक्षितोऽस्मि महामते।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पृथारणिसमुद्भूतैत्त्रिभिः पाण्डववह्रिभिः॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वैशंपायनः--&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तस्मिन्प्रमुदिते रङ्गे कथंचित्पर्यवस्थिते।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ततः समाप्तभूयिष्ठे तस्मिन्कर्मणि भारत।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मन्दीभूते समाजे च वादित्रस्य च निःस्वने॥ 1-134-26&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
द्वारदेशात्समुद्भूतो माहात्म्यबलसूचकः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वज्रनिष्पेषसदृशः शुश्रुवे भुजनि[निः]स्वनः॥ 1-134-27&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दीर्यन्ते किं नु गिरयः किंस्विद्भूमिर्विदीर्यते।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
किंस्विदापूर्यते व्योम जलधाराघनैर्घनैः॥ 1-134-28&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
रङ्गस्यैवं मतिरभूत्क्षणेन वसुधाधिप।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
द्वारं चाभिमुखाः सर्वे बभूवुः प्रेक्षकास्तदा॥ 1-134-29&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पञ्चभिर्भ्रातृभिः पार्थैर्द्रोणः परिवृतो बभौ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पञ्चतारेण संयुक्तः सावित्रेण एव चन्द्रमाः॥ 1-134-30&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अश्वत्थाम्ना च सहितं भ्रातॄणां शतमूर्जितम्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दुर्योधनममित्रघ्नमुत्थितं पर्यवारयत्॥ 1-134-31&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
स तैस्तदा भ्रातृभिरुद्यतायुधैर्गदाग्रपाणिः समवस्थितैर्वृतः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बभौ यथा दानवसङ्क्षये पुरा पुरन्दरो देवगणैः समावृतः॥ 1-134-32&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि सम्भवपर्वणि अस्त्रदर्शने चतुस्त्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः॥ 134॥&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Pṛthvī</name></author>
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