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	<title>Adiparva Adhyaya 131 (आदिपर्वणि अध्यायः १३१) - Revision history</title>
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		<title>Tsvora at 15:06, 3 August 2019</title>
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		<updated>2019-08-03T15:06:26Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;&lt;/p&gt;
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		<author><name>Tsvora</name></author>
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		<title>Pṛthvī: Created page with &quot;वैशम्पायन उवाच  ततः सम्पूजितो द्रोणो भीष्मेण द्विपदां वरः।  विशश्...&quot;</title>
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		<updated>2019-07-28T11:56:00Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Created page with &amp;quot;वैशम्पायन उवाच  ततः सम्पूजितो द्रोणो भीष्मेण द्विपदां वरः।  विशश्...&amp;quot;&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;&lt;b&gt;New page&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;div&gt;वैशम्पायन उवाच&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ततः सम्पूजितो द्रोणो भीष्मेण द्विपदां वरः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
विशश्राम महातेजाः पूजितः कुरुवेश्मनि॥ 1-131-1&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
विश्रान्तेऽथ गुरौ तस्मिन्पौत्रानादाय कौरवान्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शिष्यत्वेन ददौ भीष्मो वसूनि विविधानि च॥ 1-131-2&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
गृहं च सुपरिच्छन्नं धनधान्यसमाकुलम्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भारद्वाजाय सुप्रीतः प्रत्यपादयत प्रभुः॥ 1-131-3&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
स ताञ्शिष्यान्महेष्वासः प्रतिजग्राह कौरवान्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पाण्डवान्धार्तराष्ट्रांश्च द्रोणो मुदितमानसः॥ 1-131-4&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
प्रतिगृह्य च तान्सर्वान्द्रोणो वचनमब्रवीत्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
रहस्येकः प्रतीतात्मा कृतोपसदनांस्तथा॥ 1-131-5&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
द्रोण उवाच&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कार्यं मे काङ्क्षितं किञ्चिद्धृदि सम्परिवर्तते।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कृतास्त्रैस्तत्प्रदेयं मे तदेतद्वदतानघाः॥ 1-131-6&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वैशम्पायन उवाच&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तच्छ्रुत्वा कौरवेयास्ते तूष्णीमासन्विशाम्पते।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अर्जुनस्तु ततः सर्वं प्रतिजज्ञे परन्तप॥ 1-131-7&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ततोऽर्जुनं तदा मूर्ध्नि समाघ्राय पुनः पुनः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
प्रीतिपूर्वं परिष्वज्य प्ररुरोद मुदा तदा॥ 1-131-8&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ततो द्रोणः पाण्डुपुत्रानस्त्राणि विविधानि च।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ग्राहयामास दिव्यानि मानुषाणि च वीर्यवान्॥ 1-131-9&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
राजपुत्रास्तथा चान्ये समेत्य भरतर्षभ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अभिजग्मुस्ततो द्रोणमस्त्रार्थे द्विजसत्तमम्॥ 1-131-10&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वृष्णयश्चान्धकाश्चैव नानादेश्याश्च पार्थिवाः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सूतपुत्रश्च राधेयो गुरुं द्रोणमियात्तदा॥ 1-131-11&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
स्पर्धमानस्तु पार्थेन सूतपुत्रोऽत्यमर्षणः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दुर्योधनं समाश्रित्य सोऽवमन्यत पाण्डवान्॥ 1-131-12&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अभ्ययात्स ततो द्रोणं धनुर्वेदचिकीर्षया।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शिक्षाभुजबलोद्योगैस्तेषु सर्वेषु पाण्डवः॥ 1-131-13&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अस्त्रविद्यानुरागाच्च विशिष्टोऽभवदर्जुनः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तुल्येष्वस्त्रप्रयोगेषु लाघवे सौष्ठवेषु च॥ 1-131-14&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सर्वेषामेव शिष्याणां बभूवाभ्यधिकोऽर्जुनः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ऐन्द्रिमप्रतिमं द्रोण उपदेशेष्वमन्यत॥ 1-131-15&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
एवं सर्वकुमाराणामिष्वस्त्रं प्रत्यपादयत्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कमण्डलुं च सर्वेषां प्रायच्छच्चिरकारणात्॥ 1-131-16&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पुत्राय च ददौ कुम्भमविलम्बनकारणात्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यावत्ते नोपगच्छन्ति तावदस्मै परां क्रियाम्॥ 1-131-17&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
द्रोण आचष्ट पुत्राय तत्कर्म जिष्णुरौहत।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ततः स वारुणास्त्रेण पूरयित्वा कमण्डलुम्॥ 1-131-18&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सममाचार्यपुत्रेण गुरुमभ्येति फाल्गुनः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आचार्यपुत्रात्तस्मात्तु विशेषोपचयेऽपृथक्॥ 1-131-19&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
न व्यहीयत मेधावी पार्थोऽप्यस्त्रविदां वरः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अर्जुनः परमं यत्नमातिष्ठद्गुरुपूजने॥ 1-131-20&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अस्त्रे च परमं योगं प्रियो द्रोणस्य चाभवत्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तं दृष्ट्वा नित्यमुद्युक्तमिष्वस्त्रं प्रति फाल्गुनम्॥ 1-131-21&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आहूय वचनं द्रोणो रहः सूदमभाषत।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अन्धकारेऽर्जुनायान्नं न देयं ते कदाचन॥ 1-131-22&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
न चाख्येयमिदं चापि मद्वाक्यं विजये त्वया।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ततः कदाचिद्भुञ्जाने प्रववौ वायुरर्जुने॥ 1-131-23&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तेन तत्र प्रदीपः स दीप्यमानो विलोपितः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भुङ्क्त एव तु कौन्तेयो नास्यादन्यत्र वर्तते॥ 1-131-24&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हस्तस्तेजस्विनस्तस्य अनुग्रहणकारणात्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तदभ्यासकृतं मत्वा रात्रावपि स पाण्डवः॥ 1-131-25&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
योग्यां चक्रे महाबाहुर्धनुषा पाण्डुनन्दनः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तस्य ज्यातलनिर्घोषं द्रोणः शुश्राव भारत।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उपेत्य चैनमुत्थाय परिष्वज्येदमब्रवीत्॥ 1-131-26&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
द्रोण उवाच&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
प्रयतिष्ये तथा कर्तुं यथा नान्यो धनुर्धरः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
त्वत्समो भविता लोके सत्यमेतद्ब्रवीमि ते॥ 1-131-27&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वैशम्पायन उवाच&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ततो द्रोणोऽर्जुनं भूयो हयेषु च गजेषु च।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
रथेषु भूमावपि च रणशिक्षामशिक्षयत्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
गदायुद्धेऽसिचर्यायां तोमरप्रासशक्तिषु॥ 1-131-28&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
द्रोणः सङ्कीर्णयुद्धे च शिक्षयामास कौरवान्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तस्य तत्कौशलं श्रुत्वा धनुर्वेदजिघृक्षवः॥ 1-131-29&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
राजानो राजपुत्राश्च समाजग्मुः सहस्रशः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तान्सर्वान्शिक्षयामास द्रोणः शस्त्रभृतां वरः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ततो निषादराजस्य हिरण्यधनुषः सुतः॥ 1-131-30&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
एकलव्यो महाराज द्रोणमभ्याजगाम ह।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
न स तं प्रतिजग्राह नैषादिरिति चिन्तयन्॥ 1-131-31&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शिष्यं धनुषि धर्मज्ञस्तेषामेवान्ववेक्षया।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शिष्योऽसि मम नैषादे! प्रयोगे बलवत्तरः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
निवर्तस्व गृहानेव अनुज्ञातोऽसि नित्यशः॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
स तु द्रोणस्य शिरसा पादौ गृह्य परन्तपः॥ 1-131-32&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अरण्यमनुसम्प्राप्य कृत्वा द्रोणं महीमयम्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तस्मिन्नाचार्यवृत्तिं च परमामास्थितस्तदा॥ 1-131-33&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इष्वस्त्रे योगमातस्थे परं नियममास्थितः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
परया श्रद्धयोपेतो योगेन परमेण च॥ 1-131-34&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
विमोक्षादानसन्धाने लघुत्वं परमाप सः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
लाघवं चास्त्रयोगं च न चिरात्प्रत्यपद्यत&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अथ द्रोणाभ्यनुज्ञाताः कदाचित्कुरुपाण्डवाः॥ 1-131-35&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
रथैर्विनिर्ययुः सर्वे मृगयामरिमर्दन।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तत्रोपकरणं गृह्य नरः कश्चिद्यदृच्छया॥ 1-131-36&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
राजन्ननुजगामैकः श्वानमादाय पाण्डवान्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तेषां विचरतां तत्र तत्तत्कर्मचिकीर्षया॥ 1-131-37&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
श्वा चरन्स वने मूढो नैषादिं प्रति जग्मिवान्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
स कृष्णं मलदिग्धाङ्गं कृष्णाजिनजटाधरम्॥ 1-131-38&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
नैषादिं श्वा न[स]मालक्ष्य भषंस्तस्थौ तदन्तिके।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तदा तस्याथ भव[ष]तः शुनः सप्त शरान्मुखे॥ 1-131-39&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
लाघवं दर्शयन्नस्त्रे मुमोच युगपद्यथा।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
स तु श्वा शरपूर्णास्यः पाण्डवानाजगाम ह॥ 1-131-40&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तं दृष्ट्वा पाण्डवा वीराः परं विस्मयमागताः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
लाघवं शब्दवेधित्वं दृष्ट्वा तत्परमं तदा॥ 1-131-41&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
प्रेक्ष्य तं व्रीडिताश्चासन्प्रशशंसुश्च सर्वशः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तं ततोऽन्वेषमाणास्ते वने वननिवासिनम्॥ 1-131-42&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ददृशुः पाण्डवा राजन्नस्यन्तमनिशं शरान्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
न चैनमभ्यजानंस्ते तदा विकृतदर्शनम्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अथैनं परिपप्रच्छुः को भवान्कस्य वेत्युत॥ 1-131-43&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
एकलव्य उवाच&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
निषादाधिपतेर्वीरा हिरण्यधनुषः सुतम्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
द्रोणशिष्यं च मां वित्त धनुर्वेदकृतश्रमम्॥ 1-131-44&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वैशम्पायन उवाच&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ते तमाज्ञाय तत्त्वेन पुनरागम्य पाण्डवाः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यथावृत्तं वने सर्वं द्रोणायाचख्युरद्भुतम्॥ 1-131-45&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कौन्तेयस्त्वर्जुनो राजन्नेकलव्यमनुस्मरन्॥ 1-131-46&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
रहो द्रोणं समासाद्य प्रणयादिदमब्रवीत्॥ 1-131-46&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अर्जुन उवाच&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तदाहं परिरभ्यैकः प्रीतिपूर्वमिदं वचः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भवतोक्तो न मे शिष्यस्त्वद्विशिष्टो भविष्यति॥ 1-131-47&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अथ कस्मान्मद्विशिष्टो लोकादपि च वीर्यवान्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अन्योऽस्ति भवतः शिष्यो निषादाधिपतेः सुतः॥ 1-131-48&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वैशम्पायन उवाच&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मुहूर्तमिव तं द्रोणश्चिन्तयित्वा विनिश्चयम्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सव्यसाचिनमादाय नैषादिं प्रति जग्मिवान्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ददर्श मलदिग्धाङ्गं जटिलं चीरवाससम्॥ 1-131-49&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
एकलव्यं धनुष्पाणिमस्यन्तमनिशं शरान्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
एकलव्यस्तु तं दृष्ट्वा द्रोणमायान्तमन्तिकात्॥ 1-131-50&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अभिगम्योपसङ्गृह्य जगाम शिरसा महीम्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पूजयित्वा ततो द्रोणं विधिवत्स निषादजः॥ 1-131-51&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
निवेद्य शिष्यमात्मानं तस्थौ प्राञ्जलिरग्रतः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ततो द्रोणोऽब्रवीद्राजन्नेकलव्यमिदं वचः॥ 1-131-52&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यदि शिष्योऽसि मे वीर वेतनं दीयतां मम।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
एकलव्यस्तु तच्छ्रुत्वा प्रीयमाणोऽब्रवीदिदम्॥ 1-131-53&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
एकलव्य उवाच&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
किं प्रयच्छामि भगवन्नाज्ञापयतु मां गुरुः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
न हि किञ्चिददेयं मे गुरवे ब्रह्मवित्तम॥ 1-131-54&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वैशम्पायन उवाच&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तमब्रवीत्त्वयाङ्गुष्ठो दक्षिणो दीयतामिति।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
एकलव्यस्तु तच्छ्रुत्वा वचो द्रोणस्य दारुणम्॥ 1-131-55&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
किं प्रयच्छामि भगवनाज्ञापयतु मां गुरुः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
न हि किंचिददेयं मे गुरवे ब्रह्मवित्तम॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वैशंपायनः--&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तमब्रवीत्त्वयाऽङ्गुष्ठो दक्षिणो दीयतामिति॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
एकलव्यस्तु तच्छ्रत्वा वचो द्रोणस्य दारुणम्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
प्रतिज्ञामात्मनो रक्षन्सत्ये च निरतस्सदा॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
प्रतिज्ञामात्मनो रक्षन्सत्ये च नियतः सदा।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तथैव हृष्टवदनस्तथैवादीनमानसः॥ 1-131-56&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
छित्त्वाविचार्य तं प्रादाद्द्रोणायाङ्गुष्ठमात्मनः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
(स सत्यसन्धं नैषादिं दृष्ट्वा प्रीतोऽब्रवीदिदम्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
एवं कर्तव्यमिति वा एकलव्यमभाषत॥)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ततः शरं तु नैषादिरङ्गुलीभिर्व्यकर्षत॥ 1-131-57&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
न तथा च स शीघ्रोऽभूद्यथा पूर्वं नराधिप।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ततोऽर्जुनः प्रीतमना बभूव विगतज्वरः॥ 1-131-58&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
द्रोणश्च सत्यवागासीन्नान्योऽभिभवितार्जुनम्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
द्रोणस्य तु तदा शिष्यौ गदायोग्यौ बभूवतुः॥ 1-131-59&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दुर्योधनश्च भीमश्च सदा संरब्धमानसौ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अश्वत्थामा रहस्येषु सर्वेष्वभ्यधिकोऽभवत्॥ 1-131-60&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तथाति पुरुषानन्यान्त्सारुकौ यमजावुभौ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
युधिष्ठिरो रथश्रेष्ठः सर्वत्र तु धनञ्जयः॥ 1-131-61&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
प्रथितः सागरान्तायां रथयूथपयूथपः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बुद्धियोगबलोत्साहैः सर्वास्त्रेषु च निष्ठितः॥ 1-131-62&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अस्त्रे गुर्वनुरागे च विशिष्टोऽभवदर्जुनः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तुल्येष्वस्त्रोपदेशेषु सौष्ठवेन च वीर्यवान्॥ 1-131-63&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
एकः सर्वकुमाराणां बभूवातिरथोऽर्जुनः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
प्राणाधिकं भीमसेनं कृतविद्यं धनञ्जयम्॥ 1-131-64&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
धार्तराष्ट्रा दुरात्मानो नामृष्यन्त परस्परम्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तांस्तु सर्वान्समानीय सर्वविद्यास्त्रशिक्षितान्॥ 1-131-65&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
द्रोणः प्रहरणज्ञाने जिज्ञासुः पुरुषर्षभः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कृत्रिमं भासमारोप्य वृक्षाग्रे शिल्पिभिः कृतम्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अविज्ञातं कुमाराणां लक्ष्यभूतमुपादिशत्॥ 1-131-66&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
द्रोण उवाच&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शीघ्रं भवन्तः सर्वेऽपि धनूंष्यादाय सर्वशः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भासमेतं समुद्दिश्य तिष्ठध्वं सन्धितेषवः॥ 1-131-67&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मद्वाक्यसमकालं तु शिरोऽस्य विनिपात्यताम्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
एकैकशो नियोक्ष्यामि तथा कुरुत पुत्रकाः॥ 1-131-68&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वैशम्पायन उवाच&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ततो युधिष्ठिरं पूर्वमुवाचाङ्गिरसां वरः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सन्धत्स्व बाणं दुर्धष मद्वाक्यान्ते विमुञ्च तम्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ततो युधिष्ठिरः पूर्वं धनुर्गृह्य परन्तपः॥ 1-131-69&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तस्थौ भासं समुद्दिश्य गुरुवाक्यप्रचोदितः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ततो विततधन्वानं द्रोणस्तं कुरुनन्दनम्॥ 1-131-70&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
स मुहूर्तादुवाचेदं वचनं भरतर्षभ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पश्यैनं तं द्रुमाग्रस्थं भासं नरवरात्मज॥ 1-131-71&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पश्यामीत्येवमाचार्यं प्रत्युवाच युधिष्ठिरः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
स मुहूर्तादिव पुनर्द्रोणस्तं प्रत्यभाषत॥ 1-131-72&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
द्रोण उवाच&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पश्यस्येनं द्रुमाग्रस्थं भासं नरवरात्मज!।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पश्यामीत्येवमाचार्यं प्रत्युवाच युधिष्ठिरः॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अथ वृक्षमिमं मां वा भ्रातॄन्वापि प्रपश्यसि।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तमुवाच स कौन्तेयः पश्याम्येनं वनस्पतिम्॥ 1-131-73&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भवन्तं च तथा भ्रातॄन्भासं चेति पुनः पुनः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तमुवाचापसर्पेति द्रोणोऽप्रीतमना इव॥ 1-131-74&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
नैतच्छक्यं त्वया वेद्धुं लक्ष्यमित्येव कुत्सयन्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ततो दुर्योधनादींस्तान्धार्तराष्ट्रान्महायशाः॥ 1-131-75&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तेनैव क्रमयोगेन जिज्ञासुः पर्यपृच्छत।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अन्यांश्च शिष्यान्भीमादीन्राज्ञश्चैवान्यदेशजान्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तथा च सर्वे तत्सर्वं पश्याम इति कुत्सिताः॥ 1-131-76&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि सम्भवपर्वणि द्रोणशिष्यपरीक्षायामेकत्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः॥ 131॥&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Pṛthvī</name></author>
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