Personality (व्यक्तित्व)

From Dharmawiki
Jump to: navigation, search

भारत में शिक्षा का लक्ष्य बालक के व्यक्तित्व का सर्वांगीण विकास है ऐसा कुछ लोग मानते हैं तो कुछ लोग समग्र विकास को मानते हैं। यूरो अमरीकी सोच के अनुसार सोचनेवाले ‘ओल राऊंड डेव्हलपमेंट ऑफ पर्सनालिटी’ को शिक्षा का लक्ष्य मानते हैं। किन्तु ‘सर्वांगीण’, ‘समग्र’ और ओल राऊंड इन के अर्थों में बहुत अंतर है। ‘समग्र” के अर्थ सर्वांगीण से भी अधिक व्यापक और सटीक हैं। अंग्रेजी में जिसे पर्सनॅलिटी कहते है वह और धार्मिक (धार्मिक) व्यक्तित्व की संकल्पना यह भिन्न बातें है । पर्सनॅलिटी शब्द लॅटीन शब्द ‘पर्सोना’ से बना है । पर्सोना का अर्थ है मुखौटा। अर्थात् मनुष्य का वास्तविक स्वरूप नहीं। मनुष्य ने धारण किया मुखौटा। याने बाहर से दिखनेवाला रूप ।

व्यक्तित्व और पर्सनालिटी में ‘होना’ और ‘बनाया’ जाना का अंतर है। इनमें होना स्वाभाविक होता है। बनाना कृत्रिम होता है। स्वाभाविक का अर्थ है जो स्वभाव के अनुकूल है। धार्मिक (धार्मिक) या हिन्दू जन्म से ही होता है। जैसे बाप्तिस्मा से ईसाई बनता है, सुन्नत से मुसलमान बनता है, धार्मिक (धार्मिक) या हिन्दू बनने के लिए इन जैसी कोई विधि नहीं होती।

सर्वांगीण विकास को जो लोग लक्ष्य मानते हैं उनके अनुसार अन्नमय, प्राणमय, मनोमय, विज्ञानमय और आनंदमय ऐसे पाँच कोशों का विकास ही मनुष्य का विकास होता है। समग्र विकास की व्याप्ति इससे अधिक है। उसका विचार हम आगे करेंगे।

हमारे पंचमहाभौतिक शरीर में से हम में विद्यमान उस परमात्म तत्व की जो सहज अभिव्यक्ति होती है उसे धार्मिक (धार्मिक) सोच में व्यक्तित्व कहते है । यह मुखौटे जैसी कृत्रिम नहीं होती । और ना ही किसी को बताने के लिये धारण की हुई होती है। इसलिये हम ऑल राऊंड पर्सनॅलिटी डेव्हलपमेंट का विचार नहीं करेंगे । हम विचार करेंगे अष्टधा प्रकृति के सभी अंगों के सर्वांगीण विकास से भी अधिक व्यापक ऐसे व्यक्तित्व के समग्र विकास का। लेकिन उससे पहले व्यक्तित्व क्या है इसे समझना आवश्यक है।[1]

व्यक्तित्व का अर्थ

व्यक्तित्व एक बहुत व्यापक अर्थवाला शब्द है। संसार में अनगिनत अस्तित्व हैं। श्रीमद्भगवद्गीता के अध्याय ७ में कहा है[2]:

भूमिराप: अनलो वायु: खं मनो बुद्धिरेव च।

अहंकार इतीयं में भिन्ना प्रकृतिरष्टधा ।। 7.4 ।।

अपरेयमितस्त्वन्याम् प्रकृतिं विद्धि मे पराम् ।

जीवभूतां महाबाहो ययेदं धार्यते जगत् ।। 7.5 ।।

आगे और कहा है[3]

एतद्योनीनि भूतानि सर्वाणीत्युपधारय ।

अहं कृत्स्नस्य जगत: प्रभव: प्रलयस्तथा ।। 7.6 ।।

अर्थ : यह सब परमात्मा के ही भिन्न भिन्न रूप हैं। ये दो तत्वों से बनें हैं। एक है भूमि, आप, तेज, वायु, आकाश, मन, बुद्धि और अहंकार ऐसे आठ घटकों की अचेतन याने अपरा प्रकृति। और दूसरी है जीवरूप परा प्रकृति याने जीवात्मा। परा और अपरा दोनों ही परमात्मा के ही अंशों से बनें हैं। संसार में जितने भी भूतमात्र हैं वे सब मेरी इन दो प्रकृतियों से ही बनें हैं। मैं ही संसार की उत्पत्ति और प्रलय का मूल कारण हूँ।

सभी अस्तित्वों की भिन्नता उनमें उपस्थित अष्टधा प्रकृति के आठों घटकों के अनगिनत भिन्न भिन्न प्रमाणों में संयोग (कोंबिनेशन) के कारण है। परमात्मा की अष्टधा प्रकृति के जिस संयोग-विशेष के साथ परमात्मा का अंश याने परा प्रकृति याने आत्मतत्व जुड़ता है उन्हें जीव कहते हैं, और परमात्मा के उस अंश को उस जीव का जीवात्मा। परमात्मा का अंश अस्तित्व में से अपने को अभिव्यक्त करता है, अपने गुण-लक्षण प्रकट करता है इसलिये उसे ‘व्यक्ति’ कहा जाता है। हर अस्तित्व की अभिव्यक्ति अष्टधा प्रकृति के भिन्न मेल-विशेष के कारण अन्य अस्तित्वों से भिन्न होती है। इसे ही उस अस्तित्व का ‘व्यक्तित्व‘ कहा जाता है। मनुष्य के संबंध में जब इस शब्द का प्रयोग किया जाता है तब व्यक्तित्व से तात्पर्य है उस मनुष्य की अष्टधा प्रकृतिके मेल-विशेष के कारण होनेवाली जीवात्मा की अभिव्यक्ति।

व्यक्तित्व का समग्र विकास ही पूर्णत्व

स्वामी विवेकानंदजी ने शिक्षा की व्याख्या की है। वे बताते हैं – ‘मनुष्य में पहले से ही विद्यमान ‘पूर्णत्व’ के प्रकटीकरण को ही शिक्षा कहते हैं।’ इस पूर्णत्व शब्द को ठीक समझना होगा। पूर्णत्व का अर्थ है हर बात में पूर्णत्व। यह तो केवल परमात्मा में ही होता है। अन्य किसी में नहीं। स्वामीजी के कथन का अर्थ है की परमात्मपद प्राप्ति ही शिक्षा का लक्ष्य है। यही तो भारत की सहस्रकों से चली आ रही मान्यता है[4]:

सा विद्या या विमुक्तये ।। 1-19-41 ।।

अर्थात जो मुक्ति दिलाए, मोक्ष की प्राप्ति जिससे हो, जिससे प्रमात्मपद प्राप्त हो वही शिक्षा है।

एकात्म मानव दर्शन में इसी समग्र विकास की व्याख्या पंडित दीनदयाल उपाध्यायजी ने सरल शब्दों में प्रस्तुत की। वे बताते हैं कि व्यक्तित्व का समग्र विकास उसके शरीर, मन, बुद्धि इन अंगों के विकास के साथ ही समष्टीगत और सृष्टिगत विकास होने से होता है। मनुष्य समाज और सृष्टि के बिना जी नहीं सकता। इन दोनों के साथ समायोजन अनिवार्य है। इसलिए इन के साथ समायोजन आवश्यक है।

यह समायोजन भी दो प्रकार से होता है। एक होता है अपने स्वार्थ के लिए और दूसरा होता है इन के साथ अपना संबंध आत्मीयता का है ऐसा मानने से। चिरकाल से मनुष्य के सभी सामाजिक और सृष्टिगत संबंधों के पीछे ‘स्वार्थ’ और ‘आत्मीयता’ यही दो कारण रहे हैं। इन संबंधों का आधार स्वार्थ है ऐसा माननेवाले लोगों को ‘असुर’ स्वभाव और संबंधों का आधार आत्मीयता है ऐसा माननेवालों को ‘सुर’ स्वभाव कहा गया है।

भारत हमेशा से ही सुर स्वभाव का प्रतिनिधित्व करता रहा है। समग्र विकास की संकल्पना में अन्नमय से लेकर आनंदमय के विकास को ‘व्यक्तिगत’ विकास कहा जाता है। इससे आगे जब उस व्यक्ति को समाज के बारे में आत्मीयता का अनुभव होता है। तब इसे समष्टीगत विकास कहते हैं। जैसे बालक माता के साथ परिवार के सदस्यों के साथ जब आत्मीयता का व्यवहार करने लगता है, उसमें कुटुंब भावना का विकास होता है तो यह उस बालक के समष्टीगत विकास है। समूचे मानव समाज के साथ जब मनुष्य आत्मीयता अनुभव करता है तब समष्टीगत विकास पूरा होता है

इसी तरह सृष्टि के मानवेतर सभी अस्तित्वों के साथ जब वह आत्मीयता या परिवार भावना अनुभव करता है तो उसका सृष्टिगत विकास होता है। व्यक्तिगत, समष्टीगत और सृष्टिगत ऐसे तीनों प्रकार के विकास के समुच्चय को ही ‘समग्र विकास’ कहते हैं। ऐसे समग्र विकसित मनुष्य को संसार में उपस्थित सभी अस्तित्वों के साथ आत्मीयता की अनुभूति होती है। ये सभी अस्तित्व परमात्मा के ही रूप होने से इन के साथ जो एकात्मता अनुभव करता है उसमें और परमात्मा में कोई अंतर नहीं रह जाता। यही मोक्ष की अवस्था है। यही मुक्ति है। यही पूर्णत्व की प्राप्ति है।

धार्मिक (धार्मिक) सोच के अनुसार व्यक्तित्व विकास के चार आयाम है । वे है व्यक्तिगत् विकास, समष्टिगत् विकास, सृष्टिगत् विकास और परमेष्ठीगत् विकास। पहले तीन के विकास से चौथे का विकास अपने आप हो जाता है।

व्यक्तिगत् विकास से अर्थ है, शरीर, प्राण, मन, बुद्धि, चित्त इन पाँच घटकों का विकास । ये पाँच घटक हर व्यक्ति के भिन्न होते है । इन्ही पाँच बातों को पंचकोश विकास भी कहा जाता है । शरीर अर्थात् अन्नमय कोश, प्राण अर्थात् प्राणमय कोष, मन अर्थात् मनोमय कोश, बुद्धि याने विज्ञानमय कोश और चित्त अर्थात् आनंदमय कोश का विकास । शरीर एक यंत्र जैसा है । पंच कर्मेन्द्रिय और पंच ज्ञानेन्द्रिय तथा शरीर मे काम करनेवाली चेतातंत्र, रक्ताभिसरण, पाचनतंत्र आदि विभिन्न प्रणालियाँ प्राण शक्ति के कारण चलती है । प्राण इस शरीर रूपी यंत्र को चलानेवाला इंधन है । प्राण शरीर और इंन्द्रियों से अधिक सूक्ष्म है । इसलिये अधिक बलवान है । तीसरा घटक है मन । मनोमय का संबंध मन से होता है । मन के विकास का अर्थ है चंचलता मुक्त, स्थिर, एकाग्र, अलिप्त, निर्द्वंद्व, और विकार रहित मन । इंन्द्रियोंपर नियंत्रण करने वाले और बुद्धि के नियंत्रण में रहने वाला मन । ग्रहणशक्ति, धारणाशक्ति, स्मृति, निरीक्षण, परीक्षण, तर्क, अन्मान, विश्लेषण, संश्लेषण और कल्पनाशक्ति का विकास ही बुद्धि का विकास होता है ।

आनंदमय कोश के विकास का अर्थ है, चित्त का विकास । अपने शरीर में स्थित उस परमात्वतत्व को जैसा वह है वैसा ही जानने की क्षमता, सहजता, स्वतंत्रता, सौंदर्यबोध यह चित्त के विकास के लक्षण है ।

मनुष्य और समाज - इन का परस्पर संबंध अन्योन्याश्रित है । समाज के बिना मनुष्य जी नही सकता । इस समाज के संबंध में आत्मीयता की, एकात्मता की भावना का विकास ही समष्टिगत् विकास कहलाता है । समाज के हर घटक के दुख में दुख की अनुभूति होना इसका लक्षण है । इसी तरह मनुष्य और समाज सृष्टि के बिना जीवित नही रह सकते। इस चराचर सृष्टि के साथ आत्मीयता की, एकात्मता की भावना का विकास ही सृष्टिगत् विकास है । उपर्युक्त तीनों प्रकार से विकास होने से परमेष्ठिगत् विकास अपने आप हो जाता है ।

अहं ब्रह्मास्मि[5]

तत् त्वं असि[6]

सर्वं खल्विदं ब्रह्मं[7]

अर्थात् मैं ही वह परमात्मतत्व हूं, तुम भी वह परमात्वत्व ही हो और चराचर में वह परमात्मतत्व ही व्याप्त है इस की अनुभूति होना ही परमेष्ठिगत् विकास है । यही पूर्णत्व है । यही मोक्ष है । यही अहंकार विजय है। यही मानव जीवन का लक्ष्य है ।

मानव जीवन का लक्ष्य

अधार्मिक (अधार्मिक) और धार्मिक (धार्मिक) विचार प्रवाह में सबसे पहला अंतर है मानव जीवन के लक्ष्य का । विश्व में यहूदी, ईसाई, मुसलमान समाजों की जनसंख्या विशाल और लक्षणीय है। इन सभी का लक्ष्य हेवन या जन्नत माना गया है। हेवन या जन्नत यह संकल्पनाएं मोक्ष से एकदम भिन्न हैं। मोक्ष का अर्थ है परमात्मपद की प्राप्ति। अर्थात् सुख और दुख की सीमा से परे चले जाना । सर्वं खल्विदं ब्रह्मं अर्थात् चराचर में एकत्व की या एक ही आत्मतत्व की अनूभूति करना । कई लोग ईसाई सॅल्व्हेशन या इस्लामी कयामत (आखिरत) की तुलना मोक्ष से करते हैं। किन्तु यह गलत है। यह दोनों पूर्णत: भिन्न बातें हैं।

सॅल्व्हेशन या आखिरत यह तो हेवन और जन्नत तथा हेल और दोजख की संकल्पनाओं से जुडी संकल्पनाएं ही हैं। धार्मिक (धार्मिक) विचार में स्वर्ग और नरक की संकल्पनाएं भी हेवन और जन्नत और हेल और दोजख की संकल्पनाओं से भिन्न है। ईसाईयत की सॅल्व्हेशन और इस्लाम की कयामत (आखिरत) की कल्पना और मोक्ष में कोई साम्य नहीं है। अधार्मिक (अधार्मिक) मान्यता है कि मनुष्य मरने के बाद अपनी दफनभूमि में पडा रहता है। डे ऑफ सॅल्व्हेशन या कयामत के दिन को गॉड या अल्लाह अपने प्रेषित के माध्यम से सब को उठाते हैं। प्रेषित के कहे अनुसार जिसने ईसाईयत पर श्रद्धा रखी थी उसे गॉड हमेशा के लिये स्वर्ग भेज देता है। और जिन्होंने गॉड पर श्रद्धा नहीं रखी थी उन सबको हेल में भेज देता है। इसी प्रकार से प्रेषित के कहने से अल्लाहताला प्रत्येक मनुष्य की रूह का क्या होगा यह निर्णय करता है। जिसने अल्लाहताला में निष्ठा रखी थी उन सब को हमेशा के लिये जन्नत में भेज देता है। और जिसने अल्लाहताला पर निष्ठा नहीं रखी थी उन सब को हमेशा के लिये दोजख में भेज देता है।

धार्मिक (धार्मिक) स्वर्ग और नरक की कल्पना भी इन से पूर्णत: भिन्न है। स्वर्ग या नरक की प्राप्ति में परमात्मा सीधा न्याय करता है। उसे किसी मध्यस्थ की कोई आवश्यकता नहीं होती। वह सर्वशक्तिमान और सर्वज्ञानी होने से वह प्रत्येक द्वारा किये सत्कर्म और दुष्कर्म जानता है। प्रत्येक मनुष्य द्वारा किये इन सत्कर्मों के अनुसार ही परमात्मा उस के लिये स्वर्ग सुख या नरक यातनाओं की व्यवस्था करता है। जैसे ही स्वर्ग सुख या नरक यातनाओं के भोग पूरे हो जाते हैं, मनुष्य स्वर्ग सुख से वंचित और नरक यातनाओं से मुक्त हो जाता है। यह भोग हर मनुष्य अपने वर्तमान जन्म में और आगामी जन्मों में प्राप्त करता है। धार्मिक (धार्मिक) सोच में तो सीधा सीधा गणित है। जितना सत्कर्म उतना सुख जितना दुष्कर्म उतना दु:ख। अधार्मिक (अधार्मिक) समाजों में सत्कर्म और दुष्कर्म की कोई संकल्पना ही नहीं है। हेवन या जन्नत का अर्थ है सदैव सुखी रहने की स्थिति और हेल और दोजख का अर्थ है हमेशा दुखी रहने की स्थिति।

अधार्मिक (अधार्मिक) समाज तो मोक्ष की कल्पना तक नहीं कर सके हैं। धार्मिक (धार्मिक) मोक्ष की कल्पना धार्मिक (धार्मिक) सोच को आध्यात्मिक बना देती है। देहभाव से मुक्ति ही मोक्ष है। जीवात्मा जब देह-भाव से ग्रस्त होता है तब उसमें करता भाव, भोक्ता भाव और ज्ञाताभाव आ जाते हैं। इन के अभाव में जीवात्मा अपने देहभाव से मुक्त हो जाता है। फिर उसमें और परमात्मा में अंतर नहीं रहा जाता। अधि का अर्थ है श्रेष्ठ या उत्तम। श्रीमदभगवदगीता १५ वें अध्याय के १७ में परमात्मा को उत्तम पुरूष कहा है। अर्थात् अधि-आत्मा ही परमात्मा होता है। देहभाव से मुक्त होकर परमात्मा से तादात्म्य की दिशा में बढ़ना ही जीवन है। ऐसी धार्मिक (धार्मिक) मान्यता के कारण सम्पूर्ण जीवन और जीवन का हर पहलू अध्यात्म से ओतप्रोत होता है। धार्मिक (धार्मिक) समाज ने अपने सम्मुख व्यक्तिगत, सामाजिक और सृष्टिगत ऐसे तीन प्रकार के एक दूसरे से सुसंगत ऐसे लक्ष्य रखे हैं। लक्ष्य का निर्धारण करते समय वे ‘स्वभावज’ हों इसका ध्यान रखा गया है। व्यक्तिगत स्तर का लक्ष्य और सामाजिक स्तर का लक्ष्य परस्पर पूरक और पोषक होना आवश्यक है। इसी तरह सृष्टिगत लक्ष्य, व्यक्तिगत और समष्टिगत लक्ष्य ये तीनों परस्पर पूरक पोषक होना आवश्यक हैं। व्यक्तिगत स्तर का लक्ष्य मोक्ष या त्रिवर्ग के माध्यम से अभ्युदय है। यह सामाजिक लक्ष्य स्वतंत्रता को बाधक नहीं होना चाहिये। इसीलिये हमारे पूर्वजों ने कहा है:

आत्मनो मोक्षार्थं जगत् हिताय च।[8]

मुझे मोक्ष मिले लेकिन जगत् का हित करते हुए मिले। और त्रिवर्ग में तो मूलत: धर्म का ही अधिष्ठान है और धर्माचरण सृष्टिगत लक्ष्य है। तीनों स्तरों के लक्ष्यों का नियामक धर्म ही है। इसलिये तीनों स्तरों के लक्ष्य परस्पर पूरक और पोषक बनें रहते हैं।

मानव के व्यक्तित्व से संबंधित महत्वपूर्ण बातें

  1. मानव यह परमात्मा की सर्वश्रेष्ठ रचना है। सर्वश्रेष्ठ अभिव्यक्ति है। परमात्मा की सभी शक्तियाँ मनुष्य के पास विद्यमान होतीं हैं। केवल मात्रा का अंतर होता है। मानव की शक्तियाँ मर्यादित हैं। परमात्मा की अमर्याद हैं।
  2. मानव जीवन का नियमन उसके कर्म ही करते हैं। धार्मिक (धार्मिक) मान्यता है कि जीवों की ८४ लक्ष योनियाँ हैं। इनमें केवल मानव योनि ही कर्मयोनि है। अन्य सभी प्राणियों की योनियाँ भोग योनियाँ हैं। प्राणि उन्हें कहते हैं जो प्राण के यानि आहार, निद्रा, भय और मैथुन इन प्राणिक आवेगों के स्तरपर जीते हैं। इन अर्थों में मानव एक प्राणि भी है। जन्म से तो मानव भी अन्य प्राणियों जैसा प्राण के स्तर पर जीनेवाला जीव ही होता है। संस्कार और शिक्षा से वह मन के स्तर पर जीने लगता है। मन के स्तर पर जीनेवाले को मानव कहते हैं। बुद्धि के स्तर पर जीनेवाले को महामानव और चित्त या आत्मिक स्तर पर जीनेवाले को और भी अधिक श्रेष्ठ मानव या नरोत्तम कहा जाता है।
  3. मानवेतर योनियों के प्राणियों को अपने स्वाभाविक प्राणिक आवेगों के अनुसार चलने मात्र की बुद्धि और मन मिला है। इसलिये सामान्यत: ये प्राणि स्वतंत्र कर्म नहीं कर सकते। केवल मानव को विशेष मन, बुद्धि, स्मृति आदि मिले हैं इस कारण वह अन्य प्राणियों से भिन्न, प्राणिक आवेगों से भिन्न और प्राणिक आवेगों के विपरीत भी कर्म करने की स्वतंत्रता ले सकता है। मानव व्यवहार की इस स्वतंत्रता का नियमन उस के कर्मों से होता है। यह नियमन कर्मसिध्दांत के आधार पर होता है। कर्मसिध्दांत की अधिक जानकारी के लिये ‘जीवनशैली के सूत्र‘ अध्याय में देखें। ऋणसिद्धांत का आधार भी कर्मसिद्धांत ही है।
  4. सृष्टि में मानव निर्माण तो सब से अंत में हुआ था। उससे पहले सृष्टि थी। सृष्टि के विलय की प्रक्रिया में भी मानव जाति नष्ट होने के उपरांत भी सृष्टि होगी। सृष्टि को मानव की आवश्यकता नहीं है। लेकिन मानव सृष्टि के बगैर जी नहीं सकता। इसलिये मानव के लिये यह अनिवार्य है कि वह सृष्टि के साथ अपने को समायोजित करे। अपने सभी व्यवहार प्रकृति सुसंगत रखे। प्रकृति का संतुलन नहीं बिगाडे। सृष्टि चक्र को अबाधित रखे। वैसे भी सृष्टि या प्रकृति के साथ जब मानव खिलवाड़ करता है, एक सीमा तक तो प्रकृति उसे सहन कर लेती है। इस सीमा को लाँघने के बाद प्रकृति भी उसकी प्रतिक्रया देती है। इस प्रतिक्रया से मानव का ही नुकसान होता है।
  5. श्रेष्ठता के साथ दायित्व आता है। दायित्व बोध आना चाहिये। मानव को जो श्रेष्ठता परमात्मा से मिली है उस के कारण मानव का यह दायित्व बनता है कि वह विवेक से काम ले। प्रकृति नहीं बिगाडे। जीवश्रृंखला को नहीं तोडे। प्रकृति के साथ खिलवाड नहीं करे। दुर्बलों की सहायता करे। मानव को मिली श्रेष्ठ स्मृति के कारण ‘कृतज्ञता’, उपकार से उतराई होना यह मानव का अनिवार्य लक्षण है।
  6. धार्मिक (धार्मिक) दृष्टि से मानव जीवन का लक्ष्य मोक्षप्राप्ति या मुक्ति है। व्यक्तिगत से ऊपर परमेष्ठीगत विकास है। इसी तरह मानव का सामाजिक स्तर पर लक्ष्य ‘स्वतंत्रता’ है। और सृष्टि के स्तरपर ‘धर्माचरण’ है। सृष्टि के नियमों के अनुकूल व्यवहार भी धर्म ही होता है। स्वतंत्रता का अर्थ स्वैराचार नहीं होता। स्वतंत्रता के साथ जिम्मेदारियाँ आतीं हैं। दायित्व आते हैं। धर्म के विषय में अधिक जानकारी के लिये अध्याय ३ ‘धर्म’ में देखें।
  7. मानव सदैव सुख की खोज करता रहता है। मानव के सारे प्रयास मूलत: सुखप्राप्ति के लिये होते हैं। सुख का अर्थ अनुकूल संवेदना है। सुख प्राप्ति के लिये निम्न बातें अनिवार्य होती है:
    • सुसाध्य आजीविका
    • स्वतंत्रता
    • शांति
    • पौरुष
    • इन चारों बातों का समष्टीगत होना व्यक्ति के सुख के लिये आवश्यक है। जितने प्रमाण में ये समष्टिगत होंगी उतने प्रमाण में ही व्यक्ति को भी सुख मिल सकता है।
  8. सुख के भी भिन्न भिन्न प्रकार होते हैं। दैवी, मानवी और पाशवी। दैवी सुख आत्मिक सुख को कहते हैं। इस में ममता, सहानुभूति, आत्मीयता, परोपकार, प्रेम आदि के कारण मिले सुखों का समावेश होता है। मानवी सुख मन का सुख होता है। यह मन को प्रसन्न करनेवाला सुख होता है। पाशवी सुख में शरीर और इंद्रियों का सुख आता है। यह स्तर प्राणिक आवेगों में अनुकूल अनुभवों का स्तर है। सुख के भिन्न भिन्न स्तर भी होते हैं। इंद्रिय सुख का स्तर सबसे नीचे होता है। मन का सुख उससे ऊपर, बुद्धि का सुख उससे ऊपर, चित्त का सुख या आनंद उससे ऊपर और परमानंद का या परम कल्याण का सुख (आत्मीय) सब से ऊपर होता है। इस परम सुख का नाम ही मोक्ष है। आत्मिक सुख की प्राप्ति के लिये अन्य तीनों के न्यूनतम सुख की प्राप्ति की आवश्यकता होती है। यह मन-बुद्धि में स्थापित करने के लिये ही धर्मशिक्षा की व्यवस्था की जाती है।
  9. मानवेतर प्राणियों में नवजात बच्चे बहुत शीघ्र स्वावलंबी बन जाते हैं। मानव में व्यक्तित्व विकास यह लंबी चलनेवाली प्रक्रिया होती है। इसलिये मानव परिवार की रचना और पशूओं के परिवार की रचना में और प्रवर्तन में अंतर होता है।
  10. मानव का व्यक्तित्व पाँच पहलुओं से बना है। तैत्तिरीय उपनिषद् में इन्हें पञ्चविध पुरूष कहा है। आदि जगदगुरु शंकराचार्य इन पहलुओं को पंचकोश कहते हैं। अन्नमय, प्राणमय, मनोमय, विज्ञानमय और आनंदमय - ऐसे उन पञ्चविध पुरूषों के या पाँच कोशों के नाम हैं। सामान्य लोगों की भाषा में इन्हें शरीर (इंद्रियाँ), प्राण, मन, बुद्धि और चित्त कहा जा सकता है। जन्म के समय इन सभी का स्वरूप अविकसित होता है। ये सब बातें वैसे तो हर प्राणि के पास भी होतीं ही हैं। किंतु मानवेतर प्राणियों में मन, बुद्धि और चित्त या तो अक्रिय होते हैं या अत्यंत निम्न स्तर के होते हैं।
    • हर मानव के पंचकोशीय स्वरूप में से स्वयं परमात्मा अभिव्यक्त होता है इसीलिये मानव को व्यक्ति कहते हैं। इन कोशों के साथ तादात्म्य हो जाने से उस व्यक्ति में उपस्थित आत्म तत्व अपने को व्यक्ति मानने लग जाता है। जब मानव इन पंचकोशों के परे जाता है तब ही उस का साक्षात्कार परमात्मा से होता है। हर मानव का व्यक्तित्व अन्य मानवों से भिन्न होता है। इसलिये उसके विकास का रास्ता भी अन्यों से भिन्न होता है।
  11. मानव व्यक्तित्व के पहलुओं का विकास भी एकसाथ नहीं होता। गर्भधारणा के बाद सर्वप्रथम चित्त सक्रिय होता है। इस काल में गर्भ अपनी माँ से भी कहीं अधिक संवेदनशील होता है। अब तक इंद्रियों का विकास नहीं होने से शब्द, स्पर्श, रूप रस और गंध के सूक्ष्म से सूक्ष्म संस्कार वह ग्रहण कर लेता है। जब इंद्रियों का निर्माण शुरू होता है तब फिर संस्कार क्षमता उस इंद्रिय की क्षमता जितनी कम हो जाती है।
    • शिशू अवस्था में बालक के इंद्रियों के विकास का काल होता है। पूर्वबाल्यावस्था में मन का या विचार शक्ति का, उत्तर बाल्यावस्था और पूर्व किशोरावस्था में बुद्धि, तर्क आदि का और उत्तर किशोरवस्था में तथा यौवन में अहंकार का यानी 'मै' का यानी कर्ता भाव (मैं करता हूँ), ज्ञाता भाव (मैं जानता हूँ) और भोक्ता भाव (मैं उपभोग करता हूँ) का विकास होता है। इसलिये व्यक्तित्व विकास के लिये संस्कारों का और शिक्षा का स्वरूप आयु की अवस्था के अनुसार बदलता है।
  12. हर मानव जन्म लेते समय अपने पूर्व जन्मों के कर्मों के अनुसार विकास की कुछ संभाव्य सीमाएँ लेकर जन्म लेता है। अच्छा संगोपन मिलने से वह पूरी संभावनाओं तक विकास कर सकता है। कुछ विशेष इच्छाशक्ति रखने वाले बच्चे अपनी संभावनाओं से भी अधिक विकास कर लेते हैं। लेकिन ऐसे बच्चे अल्प संख्या में ही होते हैं। अपवाद स्वरूप ही होते हैं। अपवाद स्वरूप बच्चों के विकास के लिये सामान्य बच्चों के नियम और पद्धतियाँ पर्याप्त नहीं होतीं। सामान्य बच्चों के साथ भी विशेष प्रतिभा रखनेवाले बच्चों जैसा व्यवहार करने से सामान्य बच्चों की हानि होती है। समाज के सभी लोग प्रतिभावान या जिन्हें श्रीमद्भगवद्गीता ‘श्रेष्ठ’ कहती है या जिन्हें ‘महाजनो येन गत: स: पंथ:’ में ‘महाजन’ कहा गया है ऐसे नहीं होते हैं। इनका समाज में प्रमाण ५-१० प्रतिशत से अधिक नहीं होता है। इसीलिये धार्मिक (धार्मिक) समाज के पतन के कालखण्ड छोड दें तो सामान्यत: धार्मिक (धार्मिक) न्याय व्यवस्था में एक ही प्रकार के अपराध के लिये ब्राह्मण को क्षत्रिय से अधिक, क्षत्रिय को वैश्य से अधिक और वैश्य को शूद्र से अधिक दण्ड का विधान था। इस विषय में चीनी प्रवासी द्वारा लिखी विक्रमादित्य की कथा ध्यान देने योग्य है। कुछ स्मृतियों में ब्राह्मण को अवध्य कहा गया है। अवध्यता से तात्पर्य है शारीरिक अवध्यता। ब्राह्मण का अपराधी सिध्द होना उसके सम्मान की समाप्ति होती है। और ब्राह्मण का सम्मान छिन जाना मृत्यू से अधिक बडा दंड माना जाता था। ब्राह्मणों में क्षत्रियों में और वैश्यों में भी महाजन होते हैं। इनका प्रमाण ५-१० % से कम ही होता है।
  13. आवश्यकता और इच्छा एक नहीं हैं। आवश्यकताएँ शरीर और प्राण के लिये होती हैं। इसलिये वे मर्यादित होतीं हैं। इच्छाएँ मन करता है। मन की शक्ति असीम होती है। इसीलिये इच्छाएँ अमर्याद होतीं हैं। इच्छाओं की पूर्ति से मन तृप्त नहीं होता। वह और इच्छा करने लग जाता है। इसी का वर्णन श्रीमद्भागवत महापुराण में किया है[9]:

न जातु काम: कामानाम् उपभोगेन शाम्यम् ।

हविषा कृष्णवर्त्वेम् भूयं एवाभिवर्धते ॥ 9.19.14 ॥

प्रत्येक मानव को उसकी आवश्यकताओं की पूर्ति का अधिकार और सामर्थ्य होती है। लेकिन साथ ही में इच्छाओं को नियंत्रण में रखने का दायित्व भी होता है। इसलिए मन के संयम की शिक्षा, शिक्षा का एक महत्वपूर्ण पहलू है। स्वाद संयम, वाणी संयम ऐसे सभी इन्द्रियों की तन्मात्राओं याने स्पर्श, रूप, रस, गंध और शब्द इन के विषय में संयम रखना चाहिए । सामान्यत: बुद्धि, जब तक कि इन्द्रिय नियंत्रित मन उसे प्रभावित नहीं करता, ठीक ही काम करती है। इसलिए हम ऐसा भी कह सकते हैं कि इन्द्रियों को मन के नियंत्रण में रखने की और मन को बुद्धि के नियंत्रण में रखने की शिक्षा भी शिक्षा का आवश्यक पहलू है।

  1. मानव अपनी सभी आवश्यकताओं की पूर्ति प्रकृति में उपलब्ध पदार्थों से या तो सीधे या समाज के अन्य सदस्यों के माध्यम से करता है। इसलिये यह मानव के ही हित में है कि वह प्रकृति के साथ कोई खिलवाड नहीं करे।
  2. श्रीमद्भगवद्गीता के अनुसार चारों वर्ण परमात्मा द्वारा निर्मित हैं । इन में अंतर गुणों का और कर्मों का है। गुण का अर्थ है सत्व, रज और तम गुण। वैसे तो प्रत्येक मनुष्य में तीनों गुण कम अधिक मात्रा में होते ही हैं, लेकिन जिस वर्ण की प्रधानता होगी उसी वर्ण का वह व्यक्ति माना जाता है। वर्णश: गुणों का संबंध निम्न है:
    • ब्राह्मण वर्ण- सत्व प्रधान, दूसरे और तीसरे क्रमांक पर रज या तम
    • क्षत्रिय वर्ण- रज प्रधान, दूसरे और तीसरे क्रमांक पर सत्व या तम
    • वैश्य वर्ण- रज प्रधान, दूसरे और तीसरे क्रमांक पर सत्व या तम
    • शूद्र वर्ण- तम प्रधान, दूसरे और तीसरे क्रमांक पर सत्व या रज
    समाज सुखी बनें इसलिये विप्र वर्ण स्वतंत्रता के लिये, क्षत्रिय वर्ण सुरक्षा के लिये, वैश्य वर्ण सुसाध्य आजीविका के लिये और शूद्र वर्ण शांति के लिये जिम्मेदार है। ब्राह्मण वर्ण की जिम्मेदारी स्वाभाविक स्वतंत्रता की प्रस्थापना, क्षत्रिय वर्ण की जिम्मेदारी शासनिक स्वतंत्रता की प्रस्थापना, वैश्य वर्ण की जिम्मेदारी आर्थिक स्वतंत्रता की प्रस्थापना की है।
  3. देशिक शास्त्र इन स्वतंत्रताओं की व्याख्या निम्न रूप में करता है:
    • स्वाभाविक स्वतंत्रता : जो काम किसी के प्राकृतिक हित के प्रतिकूल नहीं हो उस काम को करने में किसी का और किसी भी प्रकारका हस्तक्षेप नहीं होने को स्वाभाविक स्वतंत्रता कहते हैं। शासनिक और आर्थिक स्वतंत्रता स्वाभाविक स्वतंत्रता में साविष्ट हैं।
    • शासनिक स्वतंत्रता : शासक के अथवा प्रजा के प्राकृतिक हित में किसी प्रकार का हस्तक्षेप नहीं होकर सदा प्रजा के हित के अनुकूल होने को ही शासनिक स्वतंत्रता कहते हैं। आथिक स्वतंत्रता भी इस में समाविष्ट है।
    • आर्थिक स्वतंत्रता : अर्थ के अभाव या प्रभाव के कारण मनुष्य के प्राकृतिक हित में कोई बाधा निर्माण नहीं होने की स्थिति को आर्थिक स्वतंत्रता कहते हैं। उपर्युक्त व्याख्याओं से यह समझ में आएगा कि स्वाभाविक स्वतंत्रता में अन्य दोनों स्वतंत्रताओं का समावेश हो जाता है। इसी प्रकार से शासनिक स्वतंत्रता में आर्थिक स्वतंत्रता का समावेष हो जाता है।
  4. इसीलिये ब्राह्मण वर्ण को सर्वोच्च जिम्मेदारी के अनुसार सर्वोच्च प्रतिष्ठा और क्षत्रिय को दूसरे क्रमांक की प्रातिष्ठा समाज में प्राप्त होनी चाहिये। इन स्वतंत्रताओं की प्राप्ति ही सामाजिक दृष्टि से मानव का लक्ष्य है । ऐसा देशिक शास्त्र का कहना है। श्रीमद्भगवद्गीता कर्म का महत्व विषद करती है। श्रीमद्भगवद्गीता कहती है कि प्रत्येक व्यक्ति को अपने ‘स्वभावज’ कर्म अनिवार्यता से करने चाहिये। स्वभावज का अर्थ है जन्म से ही जैसा स्वभाव है उस के अनुरूप। श्रीमद्भगवद्गीता में शब्दप्रयोग हैं: ब्रह्मकर्मस्वभावजम्, वैश्यकर्मस्वभावजम् आदि। साथ में यह भी कहा है कि अपने वर्ण का काम भले ही अच्छा नहीं लगता हो तब भी वही करना चाहिये। सामान्य मानव को तो इसी तरह व्यवहार करना चाहिये।
    • जो प्रतिभावान हैं उन्हें शायद सामान्य नियम नहीं लगाये जाते। जैसे गुरू के बिना भवसागर तर नहीं सकते ऐसा कहते हैं। लेकिन जो विशेष प्रतिभावान हैं उन्हें यह बात अनिवार्य नहीं है। वे तो आप ही बिना गुरू के मोक्षगामी हो सकते हैं। वर्णों में परस्पर पूरकता और परस्पर अनुकूलता होती है। इसीलिये वेद कहते हैं कि चारों वर्ण एक शरीर के चार अंगों के समान हैं। जब ज्ञान का विषय होगा, स्वाभाविक स्ववतंत्रता की रक्षा का विषय होगा तो ब्राह्मण का, जब सुरक्षा का प्रश्न होगा,शासनिक स्वतंत्रता की रक्षा का विषय होगा तब क्षत्रिय का, जब उदरभरण का, आर्थिक स्वतंत्रता की रक्षा का विषय होगा तो वैश्य का और जब कला, कारीगरी, परिचर्या, मनोरंजन आदि का विषय होगा तो शूद्र का महत्व होगा।
    • श्रेष्ठ और हीन का विवेक समझाने का, अभ्युदय के साथ नि:श्रेयस की प्राप्ति का मार्गदर्शन करने का काम ब्राह्मण का होने से वह समाज का शिक्षक बन जाता है। स्वाभाविक स्वतंत्रता में शासनिक स्वतंत्रता और आर्थिक स्वतंत्रता दोनों का समावेश होता है। पूरे समाज की स्वाभाविक स्वतंत्रता की रक्षा का दायित्व उठाने के कारण शिक्षक सर्वोच्च आदर प्राप्ति का अधिकारी होता है। मोक्ष - इस परम लक्ष्य के कारण शिक्षक या गुरू का सम्मान सबसे अधिक होना उचित ही है।
    • दूसरे क्रमांक पर शासनिक स्वतंत्रता याने सुरक्षा का विषय आता है। शासनिक स्वतंत्रता की जिम्मेदारी लेने के कारण शासक या क्षत्रिय वर्ग का सम्मान होना भी स्वाभाविक ही है। किंतु अपने वर्ण के अनुसार व्यवहार नहीं करना और अपने ब्राह्मण या क्षत्रिय होने का दंभ भरना यह समाज के पतन की आश्वस्ति है। ऐसे लोग कठोर दण्ड के अधिकारी हैं।
  1. संस्कारों के तीन प्रकार होते हैं। सहज, कृत्रिम और अन्वयागत। सहज में फिर तीन संस्कार होते हैं। योनि संस्कार (मानव योनि के), वर्ण संस्कार और राष्ट्रीयता के संस्कार । कृत्रिम में १६ या कुछ लोगों के अनुसार ४९ संस्कार होते हैं। पितरों और माता-पिता की ओर से प्राप्त संस्कारों को अन्वयागत संस्कार कहते हैं। अन्वयागत में माता-पिता और पूर्वजों के सहज संस्कार और तीव्र कृत्रिम संस्कार होते हैं। तीव्र कृत्रिम संस्कार दीर्घ अभ्यास के कारण बनीं आदतों के कारण होते हैं। इन संस्कारों में माता की ओर से पाँच पीढ़ियों के मन से संबंधित और पिता की ओर से १४ पीढ़ियों के शरीर से संबंधित संस्कार होते हैं। करीब की पीढ़ी के संस्कार अधिक और दूर की पीढ़ी के संस्कार कम होते हैं।
  2. हर मानव सुर और असुर प्रवृत्तियों से भरा होता है। इसी प्रकार से समाज में भी सुर और असुर दोनों प्रवृत्तियों के लोग होते हैं। भर्तृहरि के अनुसार अपना कोई हित नहीं होते हुए भी औरों के अहित में आनंद लेने वाले असुर से भी गये गुजरे लोग भी समाज में होते है। इन सभी के लिये सदाचार की शिक्षा की व्यवस्था करना समाज का दायित्व है। जो बात अपने को प्रिय होती है उसे प्रेय कहते हैं। और जो अंतिमत: कल्याणकारी बात होती है उसे श्रेय कहते हैं। अपने प्रेय के लिये अन्यों का अहित करनेवाले को असुर कहते हैं। ऐसे मानव को भी श्रेय ही प्रेय लगने लग जाए इसलिये शिक्षा होती है। कुल मिलाकर शिक्षा का स्वरूप धर्मशिक्षा का होता है। पुरूषार्थ चतुष्ट्य की शिक्षा का होता है।
  3. मानव अच्छा डॉक्टर बनता है, अच्छा व्यावसायिक आदि बनता है यह समाज के लिये महत्वपूर्ण बात होती है। किंतु इससे भी अधिक महत्वपूर्ण बात हर बालक के लिये यह है कि वह एक अच्छा बेटा, अच्छा भाई, अच्छा पति, अच्छा गृहस्थ, अच्छा पिता, अच्छा देशभक्त और अच्छा मानव बने। इसी तरह हर बालिका अच्छी बेटी, अच्छी बहन, अच्छी पत्नि, अच्छी गृहिणी, अच्छी देशभक्त और अच्छी मानव बनें यह अधिक महत्वपूर्ण होता है। इसे सुनिश्चित करने के लिये सब से अधिक अवसर माता को होता है इसलिए सबसे अधिक जिम्मेदारी माता की होती है। दूसरे स्थान पर पिता जिम्मेदार होता है। कहा गया है ‘माता प्रथमो गुरू: पिता द्वितीयो’। इस में माता पिता समान घर के सब ज्येष्ठ लोगों का भी योगदान होता है। तीसरी जिम्मेदारी शिक्षक की होती है। ऐसी मान्यता है कि बालक के विकास में २५ प्रतिशत हिस्सा उसके पूर्वजन्मों के कर्मों का होता है। दूसरा २५ प्रतिशत उसे प्राप्त संस्कार और शिक्षा का होता है। तीसरा २५ प्रतिशत उसे मिले वातावरण, संगत, मित्र आदि का होता है। चौथा २५ प्रतिशत उसके अपने प्रयासों का होता है। इन हिस्सों का महत्वक्रम भी इसी क्रम से होता है। पूर्व कर्मों का प्रभाव सबसे अधिक, उसके उपरांत संस्कार और शिक्षा का आदि। अन्य एक वर्गीकरण के अनुसार श्रेष्ठ मानव निर्माण के दो मुख्य पहलू हैं। पहला श्रेष्ठ जीवात्मा होना। और दूसरा है उसे अच्छी शिक्षा और संस्कार प्राप्त होना। इस दृष्टि से श्रेष्ठ मानव निर्माण में ५० प्रतिशत हिस्सा तो जन्म देनेवाले माता पिता का है। संस्कारों का काम भी घर में ही मुख्यत: चलता है। इसलिए संस्कारों का २५ प्रतिशत हिस्सा कुटुंब का होता है। शेष २५ प्रतिशत शिक्षा का जिसमें विद्यालयीन शिक्षा और लोकशिक्षा के माध्यमों का सहभाग होता है। समाज में यदि समस्याएँ हैं और बढ रहीं हैं तो माता, पिता और शिक्षक ये तीन लोग क्रम से इस के जिम्मेदार होते हैं।
  4. मानव के लिये कुछ बातें जन्मजात और कुछ समाज से प्राप्त होनेवाली होतीं हैं।
    • पूर्व जन्मों के कर्मों के अनुसार आने वाली बातें - दस इंद्रिय, मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार, श्रेष्ठ जीवात्मा, प्रारब्ध (पूर्व कर्मों का फल) जो जन्म कुंडली में दिखाई देता है, त्रिगुणयुक्त व्यक्तित्व, त्रिदोषयुक्त शरीर, माता पिता आदि।
    • माता-पिता से जन्म से प्राप्त होने वाली बातें : पितर और उन की विरासत- सामाजिक प्रतिष्ठा, नाम, भौतिक समृध्दि, शारीरिक स्वास्थ्य, जाति और आनुवांशिकता से आनेवाली बातें जैसे वर्ण, (त्रिदोषात्मक) शारीरिक स्वास्थ्य, व्यावसायिक और अन्य कुशलताएँ, परम्पराएँ आदि
    • परिवार में और समाज में प्राप्त होनेवाली बातें : नाम, प्यार, आत्मीयता, रक्षण, पोषण, संस्कार, शिक्षण, आदतें, आर्थिक और पारिवारिक विरासत और परंपराएँ, सामाजिकता, सामाजिक प्रतिष्ठा, कुलधर्म, कुलाचार, विविध पारिवारिक यानी रक्तसंबंध के रिश्ते, विविध सामाजिक रिश्ते, सदाचार, धर्म आदि की शिक्षा आदि।
  5. मानव के जन्म, जीवन और मृत्यू के चक्र में आयू की अवस्था के अनुसार निम्न बातें बदलतीं हैं।
    • प्यार-दुलार
    • रक्षण/पोषण
    • संस्कार और शिक्षण
    • क्षमताएँ
    • योग्यताएँ
    • भावनाएँ
    • आवश्यकताएँ
    • इच्छाएँ
    • जिम्मेदारियाँ
    • कर्तव्य/बोध
    • अधिकार/बोध
    इन का समायोजन सामाजिक संगठन और व्यवस्थाओं में होना आवश्यक है। इस हेतु से समाज भिन्न भिन्न प्रकार की प्रक्रियाओं को चलाता है, भिन्न भिन्न संगठन और व्यवस्थाएँ निर्माण करता है।
  6. सामान्यत: गृहस्थ के लिये चारों आश्रमों के लोगों तथा अन्य जीव जगत के योगक्षेम की जिम्मेदारी के अलावा दो और महत्वपूर्ण जिम्मेदारियाँ होतीं हैं। पहली यह है कि वह धर्म चिंतन, धर्म शिक्षण और धर्म रक्षण (शासन) में लगे लोगों के योगक्षेम की व्यवस्था करे। दूसरी है समाज की विभिन्न भौतिक आवश्यकताओं की पूर्ति में सार्थक योगदान दे। धर्म चिंतन, धर्म शिक्षण और धर्म रक्षण (शासन) में लगे लोगों की संख्या का समाज की कुल आबादी के साथ संतुलन भी महत्वपूर्ण है। धर्म चिंतन, धर्म शिक्षण और धर्म रक्षण (शासन) में लगे लोगों के योगक्षेम की व्यवस्था करने से वह नि:श्रेयस को और भौतिक वस्तुओं के उत्पादन से वह व्यक्तिगत और सामाजिक स्तरपर अभ्युदय को प्राप्त करता है ।
  7. धार्मिक (धार्मिक) समाज में गृहस्थ के लिये तीन बातें आवश्यक मानीं गईं हैं: पहली बात यह है कि वह केवल धर्म की कमाई करे, दूसरे व्यय भी धर्मानुसार ही करे और तीसरे आवश्यकता से अतिरिक्त कमाई यथासंभव अधिक से अधिक दान में दे।
  8. सुख और सुविधा में अंतर होता है। सुविधा से सुख बढेगा यह आवश्यक नहीं है। जब सुविधा मानव को पंगु बना देती है, उसकी स्वाभाविक क्षमताओं को कुंठित कर देती है या स्वाभाविक क्षमताओं का क्षरण करती है तब वह दुख का कारण बनती है। इसलिये कितना सुविधाभोगी बनना यह विवेक महत्वपूर्ण है। सुविधाओं के विकास में दो बातें ध्यान में रखना चाहिये। पहली यह कि सुविधा अक्षम लोगों की मदद के लिये होती है। दूसरी बात यह है कि उससे मानव की प्राकृतिक क्षमताओं में और सामाजिकता यानी पारिवारिक भावना और व्यवहार में वृध्दि हो। कम से कम हानि तो नहीं हो।
  9. कोई भी वस्तु खरीदते समय उस वस्तु की पर्यावरण सुसंगतता, सामाजिकता से सुसंगतता, उपयोगिता, सौंदर्यबोध और सबसे अंत में उसकी कीमत को महत्व देना चाहिये।
  10. हर गृहस्थ को लोकहितकारी उत्पादक व्यवसाय करना चाहिये। इससे एक ओर तो वह अपनी सामजिक जिम्मेदारी का निर्वहन करता है तो दूसरी ओर वह (अधम गति से विपरीत) श्रेष्ठ गति को प्राप्त कर लेता है।
  11. मनुष्य के शरीर की रचना शाकाहारी प्राणि के अनुसार है।
  12. हर मनुष्य शरीर, प्राण, मन, बुद्धि और चित्त का स्वामी होता है। ये पाँचों बातें हर मनुष्य की भिन्न होतीं हैं। परमात्व तत्व भी इन पाँच घटकों के माध्यम से ही अभि‘व्यक्त’ होता है। इसीलिये मनुष्य को व्यक्ति कहते हैं। और व्यक्ति के स्वभाव, क्षमताएँ, प्रभाव आदि को व्यक्तित्व कहते हैं। व्यक्तित्व से संबंधित कुछ बातें निम्न हैं:
    • प्राणिक आवेग : आहार, निद्रा, भय और मैथुन ये चार प्राणिक आवेग हैं। ये मनुष्य और पशू दोनों में समान हैं। इसलिये मनुष्य भी प्राणि होता ही है।
    • प्रत्येक व्यक्ति को सुख, दु:ख, ममता, प्रेम, आत्मीयता, तथा द्वेष, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मत्सर जैसे षड्विकार यानी मन की भावनाएँ होतीं हैं
    • आवश्यकताएँ और इच्छाएँ : प्राणिक आवेगों की पूर्ति को आवश्यकता और मन की चाहतों को इच्छा कहते हैं। आवश्यकताएँ मर्यादित और इच्छाएँ अमर्याद होतीं हैं।
    • कर्म योनि : प्राणिक आवेगों की पूर्ति के लिये और इच्छाओं की पूर्ति के लिये जो बातें की जातीं हैं उन्हें कर्म कहते हैं। उसे प्राप्त मन और बुद्धि की श्रेष्ठता के कारण मनुष्य कर्म करने में स्वतंत्र होता है। यह कर्म ही मनुष्य के जीवन का नियमन करते हैं। इस नियमन को कर्म सिध्दांत के माध्यम से समझा जा सकता है। कर्मसिध्दांत की जानकारी के लिये कृपया ‘ धार्मिक (धार्मिक) जीवन दृष्टि और जीवन शैली ‘ अध्याय में देखें।
  13. समाज में व्यक्ति के दो प्रकार हैं। स्त्री और पुरूष। परमात्मा ने इन्हें जैसे ये आज हैं इसी स्वरूप में निर्माण किया था। समाज धारणा के लिये यानि समाज बना रहने के लिये के लिये स्त्री और पुरूष दोनों की आवश्यकता होती है। एक की अनुपस्थिति में समाज जी नहीं सकता। स्त्री और पुरूष एक दूसरे के पूरक होते हैं। बच्चे को जन्म देने का काम दोनों मिलकर करते हैं। अन्य एक भी ऐसा काम नहीं है जो स्त्री नहीं कर सकती या पुरूष नहीं कर सकता। किंतु इनको एक दूसरे से कई बातों में भिन्न बनाने में परमात्मा का कुछ प्रयोजन अवश्य है। इस प्रयोजन के अनुसार इनमें कार्य विभाजन होने से समाज ठीक चलता है। सुखी, समृध्द और चिरंजीवी बनता है। स्त्री-पुरूष संबंधों के विषय में थोड़ा अधिक गहराई से अब हम विचार करेंगे।

स्त्री और पुरूष संबंधी धार्मिक (धार्मिक) सोच

धार्मिक (धार्मिक) सोच के अनुसार स्त्री और पुरूष दोनों एकसाथ ही निर्माण हुए थे। श्रीमद्भगवद्गीता के अध्याय 3 के श्लोक 10 में कहा है[10]:

सहयज्ञा: प्रजा सृष्ट: ।। 3.10 ।।

प्रजा अर्थात् स्त्री और पुरूष साथ ही पैदा हुए थे। स्त्री और पुरूष की भिन्नता का बुद्धियुक्त सोच के आधार पर धार्मिक (धार्मिक) मनीषियों ने मूल्यांकन किया है।

परमात्मा ने सृष्टि को एक संतुलन के साथ बनाया है। स्त्री और पुरूष दोनों एक दूसरे के बिना अधूरे होते है । दोनों की पूर्ण बनने की चाह ही स्त्री और पुरूष में परस्पर आकर्षण निर्माण करती है।

संसार में प्रत्येक वस्तु के निर्माण में परमात्मा का कोई प्रयोजन होता है। स्त्री की और पुरूष की शारीरिक और मानसिक भिन्नता का भी कुछ प्रयोजन है। दोनों की भूमिकाएं भिन्न किंतु परस्पर पूरक होंगी।

परमात्मा से ही बना होने के कारण, परमात्मपद ( पूर्णत्व ) प्राप्ति की दिशा में आगे बढना ही प्रत्येक मानव के जीवन का लक्ष्य है। लेकिन शारीरिक रचना के कारण, सुरक्षा की आवश्यकता के कारण स्त्री के पूर्णत्व की दिशा में विकास का मार्ग अधिक कठिन होता है।

पारीवारिक मामलों में स्त्री को निर्णय का अधिकार और सामाजिक मामलों में जहाँ परिवार से बाहर के वातावरण का संबंध होता है, स्त्री के लिये सुरक्षा की समस्या निर्माण हो सकती है, उस में पुरूष को निर्णय का अधिकार धार्मिक (धार्मिक) परिवार और समाज व्यवस्था की विशेषता रही है।

हिंदू शास्त्र बताते है:

'आत्मवत् सर्वभूतेषू'[citation needed] या 'आत्मन: प्रतिकूलानि परेषां न समाचरेत्[11] '

अर्थ है - जो बात अपने लिये अयोग्य या प्रतिकूल समझते हो उसे औरों के लिये भी अयोग्य और प्रतिकूल समझो और उसे मत करो। इसी का विस्तार है ' मातृवत् परदारेषू '। अपनी बहन, बेटी, माता और पत्नि के साथ अन्य पुरूष अभद्र व्यवहार न करें, सम्मान का व्यवहार करें ऐसी यदि आप औरों से अपेक्षा करते है तो आप भी किसी अन्य की बहन, बेटी, पत्नि या माता के साथ अभद्र व्यवहार न करें, उन्हे सम्मान दें।

समाज में स्त्री को योग्य स्थान और सम्मान मिले इस दृष्टि से स्त्री को माँ के रूप में देखा गया। अपनी पत्नि को छोडकर अन्य सभी स्त्रियों के प्रति माता की भावना को सुसंस्कार कहा गया।

समाज में स्त्री को योग्य स्थान और सम्मान मिले इस दृष्टि से स्त्री को माँ के रूप में देखा गया। यह भी कहा गया कि

यत्र नार्यस्तु पुज्यंते रमंते तत्र देवता:[12]

अर्थ : जहाँ नारी की पूजा होती है वहाँ देवता रहते है अर्थात् वह समाज देवता स्वरूप बन जाता है। सुख समृध्दि से भर जाता है।

धार्मिक (धार्मिक) स्त्री विषयक दृष्टि - तत्व और व्यवहार

उपर्युक्त स्त्री विषयक धार्मिक (धार्मिक) दृष्टि से सब परिचित है। फिर प्रश्न उठता है कि वर्तमान में धार्मिक (धार्मिक) समाज में स्त्री की दुरवस्था क्यों है? इस के लिये थोडा इतिहास देखना पडेगा। दो बडे कारण समझ में आते है। एक तो बौद्ध काल में महात्मा गौतम बुध्द के निर्वाण के पश्चात् कई बौद्ध विहार अनैतिकता के अड्डे बन गये थे। बौद्ध मत को राजाश्रय मिला हुआ था। यौवन में स्त्री का पुरूषों के प्रति और पुरूष का स्त्री के प्रति यौन आकर्षण अत्यंत स्वाभाविक बात है। फिर यौवन में विवेक और अनुभव भी कुछ कम ही होते है। ऐसी युवतियाँ इस स्वाभाविक आकर्षण के कारण विहारों में शरण लेतीं थीं। उन्हें वापस लाना असंभव हो जाता था। इसलिये सावधानी के तौर पर स्त्रियों का घर से बाहर निकलना पूर्णत: बंद नहीं हुआ तो भी बहुत कम हो गया। दूसरे मुस्लिम आक्रांताओं ने जो अत्याचार स्त्रियों पर किये, स्त्रियों को जबरन उठाकर अरब देशों में बेचा इस से आतंकित होकर स्त्रियों का घर से बाहर निकलना पूर्णत: बंद हो गया। स्त्री शिक्षा के मामले में और इसलिये अन्य सभी मामलों में भी बहुत पिछड गई।

स्वाधीनता के पश्चात यह अपेक्षा थी कि शिक्षा राष्ट्रीय बनेगी, धार्मिक (धार्मिक) बनेगी, सेमेटिक मजहबों के प्रभाव से बाहर निकलेगी । दो तीन पीढ़ियों में स्त्री को योग्य स्थान दिलाएगी। लेकिन ऐसा नहीं हुआ।

वर्तमान में धार्मिक (धार्मिक) स्त्री, जिस में अभी कुछ धार्मिकता शेष है, वह बहुत संभ्रम में है। उस के विरासत में मिले संस्कार उस की शिक्षा से मेल नहीं खाते। वर्तमान शिक्षा की झंझा उसे पश्चिमी रहन सहन की ओर घसीटती रहती है। जो पाश्चात्य शिक्षा से प्रभावित है ऐसी स्त्रियाँ भी अपेक्षा तो यह करतीं है कि हर अन्य पुरूष उन की ओर ध्यान अवश्य दे किन्तु उनकी तय की हुई मर्यादा को नहीं लांघे। उन से आदर से व्यवहार करे। किन्तु इस के लिये वह अपने बच्चों पर ऐसे संस्कार करने के लिये न तो तैयार है और न ही सक्षम।

समाज में कामों का वर्गीकरण

पारिवारिक और सामाजिक काम निम्न है ।

पारिवारिक काम वे है जो केवल परिवार में किये जाते है, और सामाजिक काम वे है जो समाज ( परिवार भी समाज का ही हिस्सा होता है ) में किये जाते है। कुछ प्रमुख कार्य इस प्रकार हैं:

  1. प्रजा का निर्माण
  2. संस्कार और शिक्षा
  3. सामाजिक व्यवस्थाओं को चलाना।

जीने के लिये या मनोरंजन के लिये आवश्यक वस्तुओं का उत्पादन

इन में प्रजा का निर्माण यह तो शुध्द पारिवारिक काम है। इस से आगे पाँच वर्ष तक की शिक्षा का अर्थात् इंद्रिय, मन और संस्कारों की शिक्षा का काम भी मोटे तौर पर परिवार में ही होता है। इस के बाद जब बालक विद्यालय में शिक्षा प्राप्त करने जाता है तब वह जिम्मेदारी समाज की होती है। जीवन की विविध आवश्यकताओं की पूर्ति के लिये भिन्न भिन्न प्रकार के उद्योग चलाये जाते है। यह सामाजिक प्रयासों का ही क्षेत्र होता है। समाज ठीक चले इस दृष्टि से विभिन्न व्यवस्थाओं का निर्माण भी किया जाता है। जैसे सडक बनाना, कुए बनाना, धर्मशालाएं बनाना, मंदिर बनाना, विद्यालय बनाना आदि। यह व्यवस्थाएं अच्छीं चलें इस के लिये भी ध्यान देना पडता है। सामाजिक सुरक्षा का भी एक महत्वपूर्ण पहलू सामाजिक कार्यों की सूची में आता है।

पुरूष और स्त्री की विशेषताएं

पुरूष और स्त्री को परमात्मा ने मूलत: ही भिन्न बनाया है। फिर भी यदि ठीक से देखा जाये तो बच्चे को जन्म देना, जो दोनों का साझा काम है, उसे छोडकर दूसरा ऐसा कोई भी काम नहीं है जो स्त्री या पुरूष नहीं कर सकता। किंतु केवल ' कर सकना ' के आधार पर स्त्री और पुरूष दोनों जो काम वर्तमान में स्त्रियाँ करतीं है वही करने लग जाएं तो जीना हराम हो जाएगा। इसीलिये सामान्यत: विभिन्न कामों का स्त्री सुलभ और पुरूष सुलभ कामों में बँटवारा किया जाता है और स्त्री के काम कौन से है और पुरूष के कौन से है यह निश्चय किया जाता है। वैसे तो कई काम ऐसे है जो सीमा रेखा पर होते है। जो स्त्री भी और पुरूष भी सहजता से कर सकते है।

स्त्री में इस्ट्रोजन और प्रोजेस्टेरॉन नाम के लैंगिक अंत:स्त्राव (हार्मोन) होते है। इन के कारण स्त्री के शरीर और अवयवों की रचना भिन्न और कोमल बनती है। पुरूष में ऍंड्रोजन और टेस्टोस्टेरॉन नाम के स्त्राव (हार्मोन) होते है। इन के कारण पुरूष के शरीर और अवयवों की रचना भिन्न और मजबूत बनती है। वैसे तो स्त्री और पुरूष दोनों में इस्ट्रोजन और टेस्टोस्टेरॉन दोनों हार्मोन होते ही है। लेकिन पुरूष में टेस्टोस्टेरॉन का प्रमाण स्त्री से १५ से २० गुना अधिक होता है। इसी प्रकार से स्त्री के शरीर में २६ प्रतिशत चरबी (फॅट्) और २० प्रतिशत प्रथिन (प्रोटीन) होते है तो पुरूष के शरीर में १५ प्रतिशत चरबी और ४५ प्रतिशत प्रथिन होते है। इन्हीं घटकों के कारण स्त्री और पुरूष में शारीरिक और मानसिक भिन्नता होती है। स्त्री में स्त्रीत्व और पुरूष में पुरूषत्व होता है। स्त्री का स्त्रीत्व और पुरूष का पुरूषत्व तीव्र होने से संतति अधिक तेजस्वी और ओजस्वी बनती है। सामाजिक संस्कारों के माध्यम से स्त्री के स्त्रीत्व को और पुरूष के पुरूषत्व को अधिक तीव्र बनाया जा सकता है। अधिजनन शास्त्र के माध्यम से धार्मिक (धार्मिक) परंपराओं में ऐसा बनाया जाता रहा है।

स्त्री का स्वभाव भावना प्रधान होता है तो पुरूष का स्वभाव वस्तुनिष्ठ और तर्कनिष्ठ होता है। दिशा, गणित, विज्ञान, समय आदि विश्लेषण और संश्लेषण के विषय पुरूष के लिये अधिक सरल होते है। स्त्री के लिये कला, कौशल, कोमलता से करने के विषय सरल होते है। स्त्री की त्वचा भी पुरूष की त्वचा से महीन और इसलिये अधिक संवेदनशील होती है। स्पर्श ही नही तो स्पर्श के पीछे छुपी इच्छाओं को भी समझने की सामर्थ्य स्त्री में होती है। स्त्री में संवाद कुशलता अधिक अच्छी होती है। अन्यों के भाव स्त्री आसानी से समझ जाती है। पुरूष को उस के लिये प्रयास करने पडते है। पुरूष मेहनत के काम दीर्घ काल तक कर सकता है। स्त्री, उस के स्नायू कोमल होने के कारण शारीरिक दृष्टि से अधिक सहनशील होती है जब की पुरूष मानसिक आघातों को अधिक अच्छी तरह सहन कर लेता है।

१२-१३ वर्ष की अर्थात् माहवारी शुरू होने की आयु में स्त्री के शरीर में इस्ट्रोजन का प्रमाण और इस कारण प्रभाव बढ जाता है। यह स्त्री में लैंगिक आकर्षण निर्माण करता है। माहवारी के काल में स्त्री के अंत:स्त्रावों के असंतुलन के कारण स्त्री का स्वभाव चिडचिडा बन जाता है। पुरूषों में यह आयु १५-१६ वर्ष की होती है। इस आयु में पुरूषों में टेस्टोस्टेरॉन का प्रमाण बढता है। उस के स्नायू कठोर बनने लगते है। वह मदमस्त बन किसी को टकराने की इच्छा करने लगता है। आजकल लैंगिक स्वैराचार और खुलापन बढ़ने से यह आयु कम हो रही है।

गर्भ धारणा से लेकर संतान के पाँच वर्ष का होने तक के लिये स्त्री को किसी अन्य की मदद की आवश्यकता होती है। स्त्री में काम वासना से वात्सल्य की भावना अधिक प्रबल होती है। इसीलिये कहा गया है कि स्त्री क्षण काल की पत्नि और अनंत काल की माता होती है।

स्त्री का स्वभाव बचत का होता है। उस के लिये प्रतिष्ठा से बचत का मूल्य अधिक होता है। इस लिये वह नि:संकोच होकर बीच बाजार में भी रुपये दो रुपयों के लिये भाव ताव करती दिखाई देती है।

स्त्री को अंतर्मुख होना कठिन होता है। त्रयस्थ वृत्ति से वह अपने व्यवहार का विश्लेषण नहीं कर सकती। स्त्री शारीरिक दृष्टि से पुरूष से दुर्बल तो होती ही है, गर्भावस्था में वह और भी परावलंबी बन जाती है।

इस दुर्बलता के कारण ही मनु ने कहा है

पिता रक्षति कौमार्ये, भर्ता रक्षति यौवने, स्थवीरे रक्षति पुत्र:[13]

अर्थात् कौमार्यावस्था में स्त्री को पिता का यौवन में पति का और वार्धक्य में पुत्र का संरक्षण मिलना आवश्यक होता है। इस से उस स्त्री का और समाज का भी भला होता है।

इस सब विश्लेषण का हेतु पुरूष और स्त्री में परमात्मा प्रदत्त अंतर होता है यह बताने का है। इस अंतर के कारण स्त्रियों के और पुरूषों के बल स्थान और दुर्बल स्थान भिन्न होते है, यह बताने का है।

उपसंहार

मनुष्य एक स्खलनशील जीव है। स्खलन यह प्रकृति का नियम है। जैसे पानी हमेशा नीचे की ओर प्रवाहित होता है उसी तरह मनुष्य की प्रेरणाएँ भी उसे स्वभावत: निन्म स्तर की दिशा में आगे बढातीं हैं। इस कारण मानव व्यवस्थाओं को और संस्कारों को बिगाडता रहता है। मानव जीवन और समाज जीवन सुचारू रूप से चलने के लिये मानव को तीव्र संस्कारों और शिक्षा की तथा दंण्ड व्यवस्था की आवश्यकता होती है।

मानव जीवन को मोक्षगामी बनाने का साधन धर्म है। अपनी इच्छाओं (काम) को और उन इच्छाओं की पूर्ति के लिये किये गये प्रयासों तथा उपयोग में लाए गये धन, साधन और संसाधनों (तीनों मिलाकर अर्थ) को धर्मानुकूल रखने से मनुष्य मोक्षगामी बनता है। इसलिये काम और अर्थ को धर्मानुकूल रखने की शिक्षा ही वास्तव में शिक्षा होती है। जो मोक्षगामी नहीं बनना चाहते उन के लिये भी काम और अर्थ को धर्मानुकूल रखना उतना ही आवश्यक और महत्वपूर्ण है जितना मोक्षगामी लोगों के लिये। काम और अर्थ को धर्मानुकूल रखने से ही समाज सुखी, समृध्द और सुसंस्कृत बनता है। जब मानव के व्यवहारों को यानि इच्छाओं की पूर्ति के प्रयासों को धर्म के दायरे में रखा जाता है तब 'सर्वे भवन्तु सुखिन: की प्राप्ति होती है, अन्यथा नहीं।

जब मनुष्य पैदा होता है उस समय उसके कोई कर्तव्य नहीं होते। केवल अधिकार ही होते हैं। ऐसे केवल अधिकार लेकर जिन्होंने जन्म लिया है उन बच्चों को अपने कर्तव्यों की पूर्ति के लिये जीनेवाले मनुष्य नहीं बनाया गया तो मानव का समाज जीवन नरक बन जाएगा। उसे कर्तव्यों के लिए जीनेवाला मनुष्य बनाना यह परिवार का काम है। और ऐसा विकास ही व्यक्ति का विकास है।

References

  1. जीवन का धार्मिक प्रतिमान-खंड १, अध्याय ८, लेखक - दिलीप केलकर
  2. श्रीमद्भगवद्गीता 7.4 and 7.5
  3. श्रीमद्भगवद्गीता 7.6
  4. श्रीविष्णुपुराण 1-19-41 तत्कर्म यन्न बन्धाय सा विद्या या विमुक्तये। आयासायापरं कर्म विद्यान्या शिल्पनैपुणम्॥
  5. बृहदारण्यक उपनिषद १/४/१० - यजुर्वेद
  6. छान्दोग्य उपनिषद 6.8.7
  7. छान्दोग्य उपनिषद 3.14.1- सामवेद
  8. Swami Vivekananda Volume 6 page 473.
  9. श्रीमद्भागवत महापुराण 9।19।14
  10. श्रीमद्भगवद्गीता 3.10
  11. पद्मपुराण, शृष्टि १९.३५७ श्रूयतां धर्म सर्वस्व श्रुत्वा धार्यताम्। आत्मन: प्रतिकूलानि परेषां न समाचरेत्
  12. मनुस्मृति अध्याय ३, श्लोक ५६-६०
  13. मनुस्मृतिः 9.3

अन्य स्रोत:

१. शिक्षा का समग्र विकास प्रतिमान, लेखक सुश्री इंदुमती काटदरे, पुनरुत्थान प्रकाशन सेवा ट्रस्ट द्वारा प्रकाशित