Hindu Rashtra (हिन्दू राष्ट्र) - अध्याय १९

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इस शीर्षक में दो शब्द हैं। एक है हिन्दू और दूसरा है राष्ट्र। दोनों ही शब्दों के बारे में अनेक विद्वानों के भी मन में बहुत भ्रामक कल्पनाएँ विद्यमान हैं। विशेषत: जो अंग्रेजी शिक्षा से प्रभावित हैं उन तथाकथित विद्वानों के मन में। इस भ्रम को दूर करने का प्रयास हम करेंगे।

"हिन्दू" का अर्थ

यहाँ हिन्दू से तात्पर्य है हिन्दू धर्म के लोगों से। एक समय था जब सारे विश्व का धर्म एक ही था। यह धर्म वैश्विक था। इस धर्म का नाम वैदिक धर्म, सनातन धर्म, वैश्विक धर्म इस नाम से जाना जाता था। इस धर्म का निर्माता, प्रस्तोता और प्रसारकर्ता भारतवर्ष था। इस का प्रसार अपने श्रेष्ठ ‘सर्वभूतहित’ के व्यवहार के माध्यम से इसका विश्वभर में फैलाव हुआ था। दुनिया में दो ही प्रकार के लोग थे। वैदिक धर्म, सनातन धर्म, वैश्विक धर्म को माननेवाले और वैसा व्यवहार करनेवाले तथा दूसरा था धर्म को न मानने वाले लोगों का।

जब से दुनिया में वैश्विकता से भिन्न अपनी अलग पहचान बनानेवाले सेमेटिक मजहबों के निर्माण और हर संभव तरीके से प्रसार के प्रयास शुरू हुए तब वैदिक धर्म, सनातन धर्म, वैश्विक धर्म को माननेवाले लोगों के लिए नाम की आवश्यकता निर्माण हुई। धार्मिक (भारतीय) या हिन्दू इन दोनों शब्दों का अस्तित्व कितना भी पुराना होगा, इन का प्रयोग सेमेटिक मजहबों से भिन्नता बताने के लिए होने लगा। कहने का तात्पर्य यह है कि हिन्दू धर्म सबसे प्राचीन काल से चला आ रहा है और यह वैश्विक धर्म है। यह विश्वभर में फैला हुआ था। इसकी वैश्विकता को समझना अत्यंत सरल है। सर्वे भवन्तु सुखिन:, वसुधैव कुटुम्बकम्, आत्मवत सर्वभूतेषु, कर्म सिद्धांत आदि इसके व्यवहार सूत्र केवल भारत का या हिन्दुस्थान के हित का विचार नहीं करते, वे वैश्विकता के ही व्यवहार सूत्र हैं। हमने जीवनदृष्टि और व्यवहार सूत्र के अध्याय में इन सूत्रों के विषय में जाना है।

ऊपर से कितनी भी विविधता दिखाई दे सभी अस्तित्वों का मूल परमात्मा है इस एकमात्र सत्य को जानना। इसलिए भाषा, प्रांत, वेष, जाति, वर्ण आदि कितने भी भेद हममें हैं। भेद होना यह प्राकृतिक ही है। इसी तरह से सभी अस्तित्वों में परमात्मा (का अंश याने जीवात्मा) होने से सभी अस्तित्वों में एकात्मता की अनुभूति होने का ही अर्थ “विविधता या अनेकता में एकता” है। यही धार्मिक (भारतीय) या हिन्दू संस्कृति का आधारभूत सिद्धांत है। यही हिन्दू धर्म का मर्म है।

ऐसा नहीं है कि हिन्दू कहलानेवाले सभी लोग धर्म की समझ रखते हैं। नासमझी में ऐसे लोग चोटी-धोती जैसे बाहरी लक्षणों को ही हिन्दू धर्म के लक्षण समझते हैं। समझकर या नासमझी से भी हिन्दू धर्म के माननेवाले जहाँ बहुसंख्यक हैं, प्रभावी हैं वह हिन्दू राष्ट्र है। हिन्दू धर्म लाखों वर्षों से विश्वभर में स्थापित था। यही हिन्दू राष्ट्र की भी सीमाएं थीं। काल के प्रवाह में धर्म को ग्लानि आई। एक अवकाश निर्माण हुआ। धर्मयुक्त व्यवहार करनेवाले ओर उसका अपने जीवन की श्रेष्ठता के माध्यम से विश्वभर में प्रसार करनेवाले लोग दुर्बल हुए सेमेटिक मजहबों के निर्माण का कारण बना। सेमेटिक मजहबों ने अवकाश को भर डाला।

वर्तमान में हिन्दू समाज में काल के प्रवाह में कुछ कमियाँ निर्माण हुई हैं। यह कुछ मात्रा में संकुचित हो गया है। विपरीत शिक्षा के कारण हिन्दू धर्म के बारे में जानता और समझता नहीं है। ऐसा होते हुए भी हिन्दू समाज आज भे अन्य किसी भी समाज से वैश्विकता से अधिक निकट है।

"राष्ट्र" का अर्थ

भारत एक राष्ट्र है। भारत यह एक अति प्राचीन राष्ट्र है। भारत ही हिन्दू राष्ट्र है। भारत का अस्तित्व वेदों से पहले से है। इसी कारण वेदों में ‘भारत’ का उल्लेख आता है। ‘भारतीय राज्यशास्त्र’ पुस्तक में ॠग्वेद में भारत के उल्लेख का सन्दर्भ आता है[1] । वह है -‘विश्वामित्रस्य रक्षति ब्रह्मेंद्रं भारतं जनम्‘।

इसी प्रकार भारत में राष्ट्र संकल्पना वेदों के पूर्व से चली आ रही है। इसी कारण वेदों में राष्ट्र का बारबार उल्लेख आता है। यजुर्वेद और अथर्ववेद में ‘राष्ट्र’ का उल्लेख कई बार आता है। वेदों में राष्ट्र के उल्लेख के कुछ सदर्भ नीचे दे रहे हैं:

प्रति क्षत्रे प्रति तिष्ठामि राष्ट्रे[2]

अर्थ : मैं क्षात्रधर्म और राष्ट्र के प्रति समर्पित हूँ।

पृष्ठिमें राष्ट्रम्[3]

अर्थ : राष्ट्र मेरी रीढ़ है। राष्ट्र मेरा आधार है।

इदं राष्ट्रं पिपृहि सौभाग्य[4]

अर्थ : इस राष्ट्र की श्री वृद्धि के लिये तू इसे पुष्ट कर।

इदं राष्ट्रं प्रविश सूनृतावत्[5]

अर्थ : इस सच्चरित्र राष्ट्र में तू योगदान दे।

गातुं प्रपश्यन् राष्ट्रमाहा:[6]

अर्थ : सन्मार्गपर चलते हुए हम राष्ट्र को उन्नत करें।

राष्ट्रं च रोहं द्रविणं च रोह[7]

अर्थ : अपनी आर्थिक उन्नति के साथ हम राष्ट्र की सर्वांगीण उन्नति करें।

वर्तमान में नेशन संकल्पना

अंग्रेजी शिक्षा के परिणाम स्वरूप अंग्रेजी संज्ञा ‘नेशन स्टेट’ के साथ धार्मिक (भारतीय) राष्ट्र संकल्पना की गड़बड़ हमारे राजनेता और शिक्षा क्षेत्र के लोग करते रहते हैं। नेशन स्टेट की कल्पना का जन्म यूरोप में लगभग २००-३०० वर्ष पूर्व हुआ है। इतिहास के तथ्यों के अनुसार इससे पहले यूरोप में नेशन नहीं किंग हुआ करते थे। अंग्रेजों का किंग, फ्रांसीसियों का किंग, प्रशिया का किंग आदि हुआ करते थे। लोकतंत्र की शुरुआत के दौर में इन यूरोपीय राज्यों ने अपने को नेशन कहलाना शुरू किया। स्वाभाविकत: ही नेशन्स का सामाजिक ढाँचा किंग व्यवस्था का ही रहा। केवल किंग के स्थानपर लोकतंत्रात्मक शासन आ गया। अर्थात् नेशन का आधार ‘किंग्डम’ या समझने की दृष्टि से ‘राज्य की भूमि’ यही रहा। वैसे तो किंग भी किसी टोली का या ट्राईब से ही हुआ करता था। इसलिये उस ट्राईब की और ईसाई मजहब की मिलीजुली जीवनदृष्टि या मान्यताओं के आधार से यूरोप के नेशन्स निर्माण हुए। जैसे इंग्लैण्ड में ‘सैक्सन’ ट्राईब और प्रोटेस्टेंट ईसाईयों की मिलीजुली जीवनदृष्टि की वरीयता रही।

स्वाभाविकत: जिस प्रकार से किंग सर्वसत्ताधीश होता था वैसे ही इन नेशन्स में लोकतांत्रिक शासन सर्वसत्ताधीश बन गया। किंग के हाथ में जैसी निरंकुश सत्ता थी वैसी ही निरंकुश सत्ता अब लोकतांत्रिक सरकारों के हाथों में आ गयी। हमारे अन्ग्रेजाभिमुख नेताओं ने इसी अंग्रेजी नेशन कल्पना का आरोपण ‘इंडिया देट इज भारत’ में किया। इंडिया यह नेशन का नाम है। भारत यह राष्ट्र का नाम है। इंडियन नेशन कल्पना में शासन सर्वोपरि है। इसलिये सभी विषय शासन के मुखापेक्षी ही होते हैं। जैसे इंडिया का शासकीय भूगोल, इंडिया का राजकीय इतिहास, इंडिया की पोलिटिकल इकोनोमी आदि। भारत राष्ट्र में धर्म सर्वोपरि होगा। शासन का मार्गदर्शक होगा। नियामक होगा। धार्मिक (भारतीय) राष्ट्र के विषयों का स्वरूप सांस्कृतिक होगा। शासन उसका एक हिस्सा अवश्य होगा। जीवनदृष्टि राष्ट्र की होगी। इतिहास सांस्कृतिक इतिहास होगा। राजकीय इतिहास इस इतिहास का एक हिस्सा होगा। भूगोल का इतिहास भी सांस्कृतिक भूगोल का होगा।

लेकिन भारत राष्ट्र की संकल्पना भिन्न है। इस राष्ट्र में धर्म सर्वोपरि है। शासन भी धर्म के द्वारा मार्गदर्शित, नियमित और निर्देशित है। आज भी भारत में भारत राष्ट्र है। लेकिन इस राष्ट्र की व्यवस्थाएँ बिगड़ गयी हैं। यहाँ भी नेशन की ही तरह शासन सर्वोपरि बन बैठा है। इसमें कारण धर्मं की ग्लानि ही है। धर्म की ग्लानि जैसे जैसे दूर होगी भारत राष्ट्र की फिर जाग्रत होगा। ऐसे प्रयत्न वर्तमान में चल रहे हैं।

वेदकालीन धार्मिक (भारतीय) राष्ट संकल्पना

यजुर्वेद की निम्न प्रार्थना में राष्ट्र का विवरण मिलता है[8]:

आ ब्रह्मन् ब्राह्मणों ब्रह्मवर्चसी जायताम् । आ राष्ट्रे रजनी शूर इषव्योऽतिव्याधी ।।

महारथो जायताम् । दोग्ध्री धेनुर्वोढानंवानाशु: सप्ति:: पुरंधिर्योषा ।।

जिष्णु रथेष्ठा: सभेयो युवास्य। यजमानस्य वीरो जायताम् ।।

निकामे निकामे न: पर्जन्यो वर्षतु । फलवत्यो न ओषधय: पच्यन्ताम् ।।

योगक्षेमो न: कल्पताम् ।।

अर्थ : इस व्याख्या के अनुसार राष्ट्र के घटक निम्न हैं।

  1. परमात्मा की मान्यता
  2. वेद (सब प्रकारके ज्ञान) से युक्त विद्वानों की प्रतिष्ठा
  3. देश की रक्षा में लगे शूरवीर
  4. उत्तम और प्रचुर मात्रा में शस्त्रास्त्र
  5. शूरवीर, बुद्धिमान और साहसी सेनाध्यक्ष जो शत्रुओंपर विजय प्राप्त कर सके
  6. राजनीती के ज्ञाता ओजस्वी विद्वान शासक
  7. दूध देनेवाली गौएँ
  8. कुशल पुत्र-पुत्रों की जननी स्त्रियाँ
  9. प्रचुर मात्रा में बोझा ढोनेवाले वाहन
  10. स्वस्थ योगक्षेमयुक्त जीवन

यहाँ ब्राह्मण का अर्थ भी वेदज्ञान के जानकार और व्यवहार करनेवाले विद्वानों से है। और ब्रह्म या परमात्मा से तात्पर्य क्या है यह भी यजुर्वेद में बताया है[9]:

स पर्यगाच्छक्रमकायमव्रणमस्नाविरम् शुद्धमपापविद्धम्।

कवीर्मनीषी परिभू:स्वयम्भूर्याथातथ्यतो$र्थान्व्यदाधाच्छाश्वतीभ्य: समाभ्य: ।।

अर्थ: वह (परमात्मा) सर्वव्यापक, सर्वशक्तिमान, कायाराहित, विकाररहित, अछिद्र, नाम-नाडी के बंधन से रहित, शुद्ध पवित्र और पाप से असंबद्ध, पूर्ण ज्ञानवान, मननशील, दुष्टों से दूर, अनादी सनातन, सबके साथ समभाव्रखानेवाला, जो जैसा है उसे वैसा ही जानता है और बताता है। इन गुणों से युक्त शक्ति का नाम कुछ भी हो सकता है।

राष्ट्र की वैचारिक पहचान राष्ट्र के समाज की याने राष्ट्रीय समाज की जीवनदृष्टि होती है। राष्ट्र की भौतिक पहचान राष्ट्र की भौगोलिक सीमाएं ही हैं। इन का विस्तार होने से राष्ट्र विस्तार पाता है। भौगोलिक सीमाएं अर्थात् भूमि कम हो जाने से राष्ट्र सिकुड़ भी जाता है। जैसे भारत का १९४७ में हुआ। इसका एक टुकड़ा पाकिस्तान क रूप में इससे कटकर एक अलग राष्ट्र ही नहीं एक शत्रु राष्ट्र के रूप में खडा हो गया है। इजराईल का उदाहरण लें। इजराईल के पास १९४८ तक कोई भूमि नहीं थी। लेकिन इजराईल लोगों के मनों और संस्कारों में २००० वर्षों से इजराईल राष्ट्र जीवित था। इजराईल को भूमि प्राप्त होते ही वह फिर से एक राष्ट्र के रूप में दृष्ट स्वरूप में खडा हो गया। वहीं वर्तमान ग्रीस के लोगों की जीवन दृष्टि अब ३००० वर्ष पुराने ग्रीक समाज की जीवन दृष्टि से भिन्न है। इसका अर्थ है कि भले ही इस देश का नाम अभी भी ग्रीस ही है, फिर भी वर्तमान में जो ग्रीस खडा है वह भिन्न जीवनदृष्टि का होने के कारण भूमि वही होनेपर भी राष्ट्र बदल गया है। इसी राष्ट्रभावना के कारण ही काबूल-सीस्तान के रणबल पिता-पुत्र, दाहिर, बाप्पा रावल, राणा प्रताप, विजयनगर का राजवंश, छत्रपति शिवाजी, गुरू गोविन्दसिंह आदि ने अपनी जान की बाजी लगा दी थी। सिंध से लेकर दक्खन तक इस्लाम के बर्बर आक्रमण का प्रतिकार किया था। भोसले वंश के छत्रपति शिवाजी ने इसीलए ‘भोसला राज्य’ की नहीं ‘हिन्दवी स्वराज्य’ की प्रतिष्ठापना की थी।

गुरू गोविन्दसिंह ने कहा:

सकल जगत में खालसा पंथ गाजे ।

जगे धर्म हिन्दू सकल भंड भाजे ।।

तात्पर्य है हिन्दू धर्म पर आधारित यह हिन्दू राष्ट्र चिरंजीवी हो इस हेतु से खालसा पंथ विश्वपर हावी हो जाए।

भारत राष्ट्र में वेद पूर्व काल से सुर प्रवृत्ति का चलन रहा है। सर्वे भवन्तु सुखिन: यह धर्म का आधारभूत तत्व है। यही हजारों लाखों वर्षों से धार्मिक (भारतीय) जीवन का नियामक तत्व रहा है। आज इसमें अंग्रेजी शिक्षा के प्रभाव के कारण निकृष्टता आ गयी है। बुद्धि की सीमा सर्वे भवन्तु सुखिन: के स्थानपर बहुजन हिताय बहुजन सुखाय पर ही समाप्त हो गयी है।

राष्ट्र की चिति और विराट

राष्ट्र एक जीवंत इकाई है। इस में विद्यमान चेतन तत्व का नाम चिति है। देशिक शास्त्र के अनुसार चिति राष्ट्र की आत्मा होती है। राष्ट्रीय जीवन दृष्टि को ही राष्ट्र की चिति कह सकते हैं। जिस प्रकार से मनुष्य में चेतन तत्व जीवात्मा के रूप में विद्यमान होता है, उसी तरह राष्ट्र की चिति होती है। साथ में ही जिस प्रकार से मनुष्य में केवल जीवात्मा से काम नहीं चलता। उसके लिए प्राणशक्ति की भी आवश्यकता होती है। राष्ट्र की प्राणशक्ति को विराट कहते हैं। जब चिति का उदय होता है तब राष्ट्र का विराट जाग्रत होता है। राष्ट्रीय समाज अपने सामाजिक संगठन और सामाजिक य्वास्थाएं निर्माण करता है और चलाता है।

किसी राष्ट्र की जीवनदृष्टि उस राष्ट्र की वैचारिक पहचान होती है। हिन्दू राष्ट्र की जीवन दृष्टि के विषय में हमने इस अध्याय में जानकारी प्राप्त की है। हर राष्ट्र की चिति भिन्न होती है। यह चिति राष्ट्र निर्माण के साथ ही बनती है। दो भिन्न चिति के समाज साथ में नहीं रह सकते। इसमें जिस चिति के लोग बलवान होंगे वह चिति दूसरी चिति को आत्मसात करा लेती है या नष्ट कर देती है। जैसे भारत में हिन्दू राष्ट्र के रूप में एक चिति है। एक जीवनदृष्टि है। इसके अनुसार मूर्तिपूजा कोई पाप नहीं है। लेकिन भारत में ही रहनेवाले दूसरे समाज की चिति के याने जीवनदृष्टि के अनुसार मूर्तियों को तोड़ना अनिवार्य ऐसा पुण्यकार्य है। ऐसे दो भिन्न जीवनदृष्टि के समाज जब इकठ्ठे रहते हैं तब वे हमेशा संघर्ष की स्थिति में रहते हैं। यह हम सबका अनुभव है। इनके दीर्घकाल साथ रहने के दो ही परिणाम हो सकते हैं:

  • पहला: हिन्दू समाज इस दूसरे समाज को अपने में मिला ले और इस दूसरे समाज की जीवन दृष्टि बदल दे ।
  • दूसरा: इस जीवनदृष्टि के लोगों को नष्ट कर दे या स्वत: नष्ट हो जाए।

समान जीवनदृष्टि वाले समाज के सहजीवन को ही राष्ट्र कहते हैं

समान जीवनदृष्टि वाले समाज के घटकों की जीवन शैली समान होती है। आकांक्षाएँ और इच्छाएँ भी समान होतीं हैं। इस कारण समाज में संघर्ष की संभावनाएं बहुत कम होतीं हैं। लेकिन भिन्न जीवनदृष्टि वाले समाज के साथ सहजीवन सहज और सरल नहीं होता। समाज का एक हिस्सा मूर्तिपूजा में विश्वास रखनेवाला है। और दूसरा हिस्सा यदि बुतशिकन यानी मूर्ति तोड़ने में गौरव अनुभव करनेवाला होगा तो ऐसे दो समाज के हिस्से तो निरंतर संघर्ष में ही रहेंगे। जबतक इनमें जो बलवान है वह दूसरे हिस्से को आत्मसात नहीं कर लेता इन दो हिस्सों का सहजीवन सुखी और शांततामय नहीं हो सकता। इसलिए समान जीवनदृष्टि वाले समाज के सहजीवन के लिए भौगोलिक दृष्टि से सुरक्षित भूमि की आवश्यकता होती है।

भूमि हमें जीवन के लिए आवश्यक सभी संसाधन देती है। इस दृष्टि से हम पारिवारिक भावना से भूमि से जुड़ जाते हैं। फिर भूमि हमारी माता होती है। भौगोलिक दृष्टि से सुरक्षित भूमि और समान जीवनदृष्टि वाले समाज को राष्ट्र कहते हैं। सारे विश्व को एकात्मता के दायरे में लाने का एक चरण राष्ट्र है। राष्ट्र अपने समाज का जीवन सुचारू रूप से चले इस दृष्टि से समाज को संगठित करता है। इस संगठन को जानने का हम अब प्रयास करेंगे।

समाज-घटकों के प्राकृतिक पहलुओं पर आधारित राष्ट्र के संगठनों का स्वरूप

सामाजिक संगठन इस विषय में हमने इस लेख में जाना है। यहाँ केवल संक्षेप में उसका स्मरण कर आगे बढ़ेंगे:

  1. स्त्री-पुरुष सहजीवन : परस्पर आकर्षण के कारण पूरकता का निर्माण होता है । यह सम्बन्ध रक्तसम्बंधों से कहीं गाढे सम्बन्ध होते हैं। चराचर के साथ एकात्मता का प्रारंभ बिंदु, यह सहजीवन है। यह घटक राष्ट्र की जनसंख्या और संस्कारों की वृद्धि और नियोजन के पक्ष से जुडा है। यह सामाजिकता की वह पाठशाला है जो सिखाती है कि परिवार: कर्तव्यों के लिये कैसे जीना है । केवल अधिकारों की समझ लेकर जन्म लिये नवजात शिशु को जिसे केवल कर्तव्यों के लिये जीना है ऐसा मनुष्य बनाना, यही परिवार व्यवस्था का मुख्य लक्ष्य है। यहाँ कर्तव्यों में रक्त संबंधों से लेकर सृष्टि या चराचर तक तक सभी के प्रति कर्तव्यों का समावेश होता है। (विकसित संगठन : परिवार)
    1. पति-पत्नि
    2. बच्चे
    3. माता-पिता
    4. भाई-बहन
    5. रक्तसम्बंधी
    6. पालतू प्राणी
    7. कुलदेवता
    8. पर्यावरण
  2. स्वभाव भिन्नता, उनकी शुद्धि, वृद्धि और समायोजन यह संगठन राष्ट्र की संस्कृति का पोषक है। स्वभाव भिन्नता, स्वाभाविक या प्राकृतिक है। उससे लाभ भी हैं और हानियाँ भी। इन स्वभावों के समायोजन से लाभ मिलेंगे। अन्यथा हानि ही हानि होगी। इसी को वर्ण व्यवस्था भी कहा जाता है। (विकसित संगठन : स्वभाव समायोजन व्यवस्था)
    1. ब्राह्मण
    2. क्षत्रिय
    3. वैश्य
    4. शूद्र
  3. मनुष्य की बढती घटती क्षमताएँ  : आयु की अवस्थाएँ और बढती घटती क्षमताओं का समायोजन: यह पहलू राष्ट्र की सामाजिक भावना को बल देता है। जीवन की अनिश्चितताओं को दूर करता है। (विकसित संगठन : आश्रम व्यवस्था)
    1. ब्रह्मचर्य
    2. गृहस्थ
    3. वानप्रस्थ या उत्तर गृहस्थ
    4. संन्यास
  4. दैनंदिन जीवन की आवश्यकताओं की पूर्ति : ग्राम संगठन राष्ट्रीय समाज की आवश्यकताओं के लिए उपयुक्त पदार्थ निर्माण और उनके समुचित वितरण के पक्ष का ध्यान रखता है। न्यूनतम (विकेन्द्रित) परिवारों के परस्परावलंबन से दैनंदिन स्वावलम्बी सहजीवन । यहाँ स्वावलंबन से तात्पर्य मुख्यत: अन्न, वस्त्र भवन से है। ये मानव के लिये या समाज के लिये अनिवार्य ऐसी आवश्यकताएँ हैं। इस स्वावलंबन के कारण स्वतंत्रता की रक्षा होती है। इसलिए गाँव में ही यथासंभव हर आवश्यकता की पूर्ति हो जाए ऐसा प्रयास होता था। सीखने के लिए पूरा विश्व ही गाँव होता था। लेकिन जीने के लिए गाँव ही विश्व होता था। (विकसित संगठन : ग्राम व्यवस्था)
    1. पारिवारिक भावना
    2. पारिवारिक उद्योग
    3. स्वावलंबी आर्थिक इकाई
    4. परस्परावलंबी परिवारों का छोटे से छोटा स्वावलंबी समूह।
  5. सभी आवश्यकताओं की पूर्ति के आधारपर स्वावलंबन : समाज याने राष्ट्र की सभी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए वस्तु उत्पादन, कला, ज्ञान, सुरक्षा आदि के लिए आवश्यक कौशलों को सुनिश्चित करता है। यहाँ स्वावलंबन से तात्पर्य राष्ट्र के स्तर पर स्वावलंबन से है। राष्ट्र की हर आवश्यकता की पूर्ति की व्यवस्था से है। राष्ट्र की स्वतंत्रता के लिये स्वावलंबन अनिवार्य होता है। (विकसित संगठन : कौशल विधा व्यवस्था व्यवसायिक कौशलों के आधार पर)
    1. कौशल संतुलन
    2. कौशल विकास
    3. स्वावलंबी समाज

राष्ट्र की व्यवस्थाएँ

राष्ट्र अपने समाज की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए कुछ व्यवस्थाएं भी निर्माण करता है। यह व्यवस्थाएँ सामाजिक संगठन के साथ समायोजित होकर ही निर्माण होती हैं:

  1. पोषण व्यवस्था
  2. रक्षण व्यवस्था
  3. शिक्षण व्यवस्था

राष्ट्र की ये तीनों व्यवस्थाएँ राष्ट्राभिमुख होंगी। इसलिए शिक्षा राष्ट्रीय होगी। राष्ट्र की जीवनदृष्टि के अनुरूप होगी। राष्ट्र के लिए निम्न बातें महत्त्वपूर्ण होतीं हैं:

  • समान जीवनदृष्टि रखनेवाला समाज ही सुख, शांति से जी सकता है। भिन्न जीवनदृष्टि वाले समाज के साथ जीवन सहज नहीं रहता। भिन्न जीवनदृष्टियों के समाजों में अनबन, जीवनदृष्टि के, जीवनशैली के और विभिन्न व्यवस्थाओं के भेद होना स्वाभाविक होता है। इसीलिए समान जीवनदृष्टि वाले समाज को सुरक्षित भूमि की आवश्यकता होती है। अपनी जीवनदृष्टि के अनुसार समाज में व्यवहार हो सके इस दृष्टि से अनुरूप और अनुकूल व्यवस्थाएं भी होनी चाहिए। जीवनदृष्टि के एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी के अंतरण के लिए जीवनदृष्टि के अनुकूल श्रेष्ठ परम्पराओं का निर्माण और निर्वहन होना भी आवश्यक होता है। परम्पराओं का क्रम जब श्रेष्ठता की ओर होता है तब राष्ट्र अधिकाधिक श्रेष्ठ बनता जाता है। दीर्घकाल तक श्रेष्ठ बना रहता है।
  • मनुष्य की तरह ही राष्ट्र भी एक जिवंत इकाई होती है। राष्ट्र निर्माण होते हैं। जीते हैं और नष्ट हो जाते हैं। मनुष्य के शारीर में लाखों पेशियाँ नष्ट होती हैं और नयी निर्माण होती हैं। जब नष्ट होने वाली पेशियों की संख्या निर्माण होने वाली पेशियों से कम होती है मनुष्य यौवनावस्था में रहता है। जब नष्ट होनेवाली पेशियों का प्रमाण नयी निर्माण होने वाली पेशियों से अधिक हो जाता है तब मनुष्य वृद्धावस्था की ओर बढ़ने लगता है। विस्तार जब तक चलता है वृद्धावस्था दूर रहती है। यही बात राष्ट्र के लिए भी लागू है। किसी भी जीवंत ईकाई की तरह ही राष्ट्र के पास दो ही विकल्प होते हैं। बढ़ना या घटना। आबादी और भूमि के सबंध में जबतक राष्ट्र का विस्तार होता रहता है, या कम से कम इनमें न्यूनता नहीं आने की आश्वस्ति होती है तब राष्ट्र जीवित रहता है।
  • राष्ट्र की शिक्षा व्यवस्था, शासन व्यवस्था, न्याय व्यवस्था, अर्थ व्यवस्था आदि व्यवस्थाओं से सम्बंधित धार्मिक (भारतीय) दृष्टि का विचार हम इस अध्याय में करेंगे। प्रत्यक्ष व्यवस्थाओं का व्यावहारिक स्वरूप तो वर्तमान के परिप्रेक्ष्य में बनाना होगा।

राष्ट्र और राज्य में अंतर

राज्य यह राष्ट्र की एक सुरक्षा व्यवस्था का नाम है। राज्य का काम राष्ट्र के अंतर्गत और बाह्य शत्रुओं से राष्ट्र की सुरक्षा करने का ही है। राज्य से शिक्षा जैसे प्रेरणा देने के काम शासन करे यह राष्ट्र की संकल्पना में विकृति के कारण ही है।

References

  1. ‘भारतीय राज्यशास्त्र, लेखक गो.वा. टोकेकर और मधुकर महाजन, विद्या प्रकाशन, पृष्ठ 22
  2. यजुर्वेद 20.10
  3. यजुर्वेद 20.8
  4. अथर्ववेद 7.35.1
  5. अथर्ववेद 13.1.1
  6. अथर्ववेद 13.1.4
  7. अथर्ववेद 13.1.34
  8. यजुर्वेद 22.22
  9. यजुर्वेद 40-8

अन्य स्रोत:

1. राष्ट्र चिंतन, दीनदयाल उपाध्याय, लोकहित प्रकाशन, लखनऊ

2. राष्ट्र जीवन की समस्याएँ, दीनदयाल उपाध्याय, लोकहित प्रकाशन, लखनऊ

3. राष्ट्र जीवन की दिशा, लेखक पं. दीनादालाल उपाध्याय, प्रकाशक धार्मिक (भारतीय) संस्कृति उत्थान परिषद्, उत्तर प्रदेश

4. Why Hindoo Rashtra, M. S. Golvalkar