Bharat's Governance Systems (भारतीय शासन दृष्टि) - अध्याय ३१

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प्रस्तावना

समाज के व्यवहार सुख शांति, समाधान से चलें, समाज और समाज के विभिन्न घटक जीवन के अपने अपने लक्ष्य की प्राप्ति में अग्रसर हो सकें, समाज में अन्याय नहीं हों, सज्जनों को सुरक्षा मिले, दुष्टों को नियंत्रण में रखा जाये इसलिये शासन व्यवस्था होती है। यही शासन व्यवस्था के निर्माण का उद्देश्य होना चाहिये ऐसा सामान्य लोगों को लगता है। यह स्वाभाविक भी है। किंतु इस के लिये व्यवस्था कैसी हो, उस व्यवस्था को चलाने का काम कौन करेगा आदि तय करना यह सामान्य लोगों का काम नहीं है।

वर्तमान में ऐसा माना जाता है कि लोकतंत्र किसी भी समाज के लिये सबसे श्रेष्ठ शासन व्यवस्था है। ऐसा कहना गलत नहीं होगा की वर्तमान में इस विचार का इतना अतिरेक हो गया है कि ‘लोकतंत्र’ साध्य बन गया है। इतना ही नहीं तो लोग इस विषय में विविध कारणों से इतने संवेदनशील हो गये हैं कि वर्तमान लोकतंत्र के लिये वैकल्पिक शासन व्यवस्था के बारे में प्रकट रूप (भाषण या लेखन) से बात करते ही लोग असहिष्णुता पर उतर आते हैं। इस वैकल्पिक शासन व्यवस्था के विचारों में समाज के लिये कुछ लाभकारी है या नहीं इस का विचार किये बगैर ही विकल्प की चर्चा करनेवाले को गालियाँ देने पर या मारने पर उतारू हो जाते हैं। अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भी यूरोपीय देश और अमरिकी देश लोकतंत्र से भिन्न किसी शासन व्यवस्था को चलने नहीं देते। इसलिये वर्तमान में लोकतंत्र के विरोध में बोलने की किसी की हिम्मत नहीं होती।

वर्तमान लोकतंत्र में लोग अनेकों विविध और विकट समस्याओं से जूझ रहे हैं। गरीबी, बेरोजगारी, हिंसा, असुरक्षा, आतंकवाद, भ्रष्टाचार, अस्वास्थ्य, प्रदूषण, टूटते परिवार, पगढीलापन, सांस्कृतिक विघटन, बढती मँहगाई, बढती विषमता, प्रकृति और दुर्बलों का शोषण, अपराधीकरण, स्त्रियोंपर अत्याचार, एक-पालकीय बच्चे, अविवाहित संबंध, घटते जंगल, घटता भूजलस्तर, बढता जन-धन-उत्पादन और सत्ता का केंद्रीकरण आदि। यह सूची और भी बढ सकती है। इस के उपरांत भी कोई वर्तमान लोकतंत्र के विषय में नहीं सोचे, चर्चा नहीं करे यह या तो तानाशाही कही जायेगी या फिर ऐसे समाज को एक विचारहीन समाज कहा जायेगा। लेकिन हिंदू या धार्मिक (भारतीय) समाज तो ऐसा कभी नहीं रहा। यह समाज तो सदैव ज्ञान संपन्न रहा है। युगानुकूल विचार करता रहा है। विश्व में संस्कृति और समृध्दि दोनों बातों में अग्रणी रहा है। फिर यह ऐसा बुद्धू कैसे बन गया? यह भी विचारणीय है।

आहार, निद्रा, भय और मैथुन यह प्राणिक आवेग हैं। इन प्राणिक आवेगों के स्तरपर जो जीते हैं उन्हें प्राणी कहते हैं। यह चारों बातें मनुष्य और पशु दोनों में होतीं हैं। इसलिये मनुष्य को भी प्राणी कहा जाता है। लेकिन अन्य जीवों की तरह मनुष्य केवल प्राणी नहीं होता। वह मनुष्य होता है। वह प्राण के स्तर से ऊपर के स्तर पर यानी मन के स्तर पर भी जीता है। अपने प्राणिक आवेगों को मन के द्वारा नियंत्रण में रखता है। और विचार करना यह मन का क्षेत्र है। लोगों ने अनेकों समस्याओं के होते हुए भी यदि विचार करना छोड दिया है तो वर्तमान में मनुष्य, मानव से पतित होकर पशुत्व की ओर बढ रहा है, इस का यह लक्षण है। यह मानव समाज के लिये वांछनीय नहीं है।

वांछनीय तो यह है कि मनुष्य केवल मन के या विचार के स्तर से भी आगे बढ कर बुद्धि के स्तर पर जिये और उस से भी आगे बढ कर ज्ञान के स्तर पर जिये। ऐसे विकास की दृष्टि से भी बौध्दिक स्तर पर वर्तमान लोकतंत्रात्मक शासन जैसी व्यवस्थाओं को परखना केवल आवश्यक ही नहीं तो अनिवार्य भी है।

हिंदू समाज को ऐसा बनाने में सबसे बडा कारण विपरीत शिक्षा है। विदेशी मुस्लिम शासन के काल में शासित होने के उपरांत भी हिंदू अपने को मुसलमान से श्रेष्ठ ही मानता रहा। किंतु अंग्रेजी शासन ने इस स्थिति को बदल दिया। विशेषत: अंग्रेजी शिक्षा ने धार्मिक (भारतीय) समाज को आत्मनिंदाग्रस्त बना दिया, इसे स्वत्वहीन बना दिया। पश्चिम का अंधा अनुगामी बना दिया।

स्वामी विवेकानंदजीने वर्तमान शिक्षा के बारे में कहा था - टुडेज एज्युकेशन इज ऑल राँग। माईंड इज क्रॅम्ड विथ फॅक्ट्स् बिफोर इट इज टॉट हाऊ टु थिंक (Today's education is all wrong. Mind is crammed with facts before it is taught how to think.)। यानी वर्तमान शिक्षा पूरी गलत है। मन को ‘विचार कैसे किया जाता है’ यह सिखाये बिना ही जानकारी ठूँस ठूँस कर दिमाग में भर दी जाती है। लोकतंत्र के संबंध में उपर बताई वैचारिक धांधली का शायद यही कारण है।

  • भारतीय मान्यता यह है की प्रजा ने किये पुण्यों का फल जैसे राजा को अनायास ही मिलता है, उसी प्रकार से प्रजा ने किये पापों का फल शासक को भुगतना पडता है।
  • लोग धर्मशास्त्र के नियमों का अर्थात् धर्म का पालन करें यह सुनिश्चित करना शासन का पहला और सब से महत्वपूर्ण काम है। इस दृष्टि से राष्ट्र की सीमाओं के अंदर और बाहर के असहिष्णू और असामाजिक तत्वों को नियंत्रण में रखने का काम शासन का है।
  • शिक्षा क्षेत्र को अभय और सहायता देने की जिम्मेदारी शासन की है। किंतु शिक्षा क्षेत्र का नियंत्रण तो शिक्षक के अधीन ही रहेगा।
  • शासन की भूमिका जनता के पिता जैसी होगी। अभिभावक जैसी होगी।

प्रजासुखे सुखम् राज्ञ: प्रजानांच हिते हितम्।[1]

नात्मप्रियं हितं राज्ञ: प्रजानां तु प्रियं हितम् ।।

शासक बनने के लिये योग्यता

  • क्षात्रतेज और ब्राह्मतेज। शास्त्रों का ज्ञाता होना आवश्यक।
  • अन्याय ही नहीं हो ऐसी शासन व्यवस्था हो। जिस राज्य में माँगने से न्याय मिलता है वह घटिया शासन है। जिस राज्य में झगडने से न्याय मिलता है वह निकम्मा शासन है। माँगने से मिलने वाला न्याय घटिया होता है। झगडकर मिलने वाले न्याय में तो अन्याय होने की ही सम्भावनाएँ रहतीं हैं। झगड कर (मुकदमे चलाकर) मिलने वाला न्याय बलवानों के पक्ष में ही जाता है।
  • लोकतंत्र की मर्यादाएं और दोषों को समझना। सर्वसहमति का लोकतंत्र ही धार्मिक (भारतीय) लोकतंत्र है। लोकतंत्रात्मक शासन व्यवस्था नहीं सुशासन - जिससे “सर्वे भवन्तु सुखिन: साध्य होगा” वह लक्ष्य हो।
  • भारतीय शासन व्यवस्था में किसी अधिकारी के दायरे में अपराध होने से वह व्यक्ति अपराधी माना जाता था। किसी अधिकारी के क्षेत्र में आनेवाले किसी के घर में चोरी हुए माल को वह अधिकारी यदि ढूण्ढने में असफल हो जाता था तो जिसका नुकसान हुआ है उस की नुकसान भरपाई उस अधिकारी को करनी पडती थी।

राज्य की आवश्यकता - धार्मिक (भारतीय) दृष्टि

मनुष्य जन्म से तो प्राणी ही होता है। जो प्राणिक आवेगों के स्तर पर जीता है, उसे प्राणी कहते हैं। प्राणिक स्तर पर व्यवहार करना इस का अर्थ है आहार, निद्रा, भय और मैथुन इन प्राणिक आवेगों के अधीन रहकर काम करना। सामान्यत: पशू, पक्षी और प्राणियों के आवेग अनियंत्रित ही होते हैं। ऐसे प्राणिक आवेग की स्थिति में वह केवल अपने आवेग की पूर्ति के विषय में ही सोचता है। लेकिन पशुओं में भी आवेगों की पूर्ति के उपरांत पशु उस आवेग को कुछ काल के लिये भूल जाता है। यानी जब तक फिर उसे उस आवेग का दौर नहीं पडता तब तक भूल जाता है। भूख मिट जाने के उपरांत वह सामने कितना भी ताजा, सहज प्राप्त अन्न मिलने पर भी उस की वासना नहीं रखता।

किंतु मनुष्य का ऐसा नहीं है। वह पशु से अधिक बुद्धि रखता है। विचार करने वाला मन रखता है। इस लिये वह प्रयास करता है कि प्राणिक आवेगों की पूर्ति की व्यवस्था निरंतर बनीं रहे। पशु जैसा ही मनुष्य भी अपने आवेगों की पूर्ति में आने वाले किसी अवरोध को पसंद नहीं करता। बुद्धि के कारण वह अपने मृत्यू के या अभाव के 'भय' के आवेग से बचने के लिये आवेगों की पूर्ति होती रहे इस की व्यवस्था करता है। अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति हो, यहाँ तक अपने विषय में जैसे पशु सोचता है वैसा सोचना यह तो मनुष्य के लिये भी स्वाभाविक ही है। किंतु जब वह आवश्यकताओं से अधिक का संचय और अन्यों की आवश्यकताओं पर अतिक्रमण करता है तो वह विरोध, संघर्ष आदि निर्माण करता है। इस तरह अपने काम यानी इच्छाओं के और मोह के प्रभाव में जब वह होता है तो समाज की शांति का भंग होता है। जब समाज में जिनका काम और मोह नियंत्रण में नहीं है ऐसे लोगों की बहुलता हो जाती है तो समाज में अराजक हो गया माना जाता है। काम और मोह ये मन की भावनाएँ होतीं हैं। काम और मोह को नियंत्रण में रखना सिखाने को ही 'शिक्षा' कहते हैं।

स्वहित या स्वार्थ साधने के लिए स्वतन्त्रता आवश्यक होती है। काम और मोह अनियंत्रित हो जाने के कारण मनुष्य अपनी स्वतन्त्रता के लिए अन्यों के हित का हनन करने लग जाता है। इससे समाज नष्ट न हो इस हेतु से सदाचार सिखाया जाता है। सदाचार के लिए सहानुभूति आवश्यक होती है। सहानुभूति का अर्थ है अन्यों की स्वतन्त्रता की रक्षा करना। मनुष्य न केवल स्वतन्त्रता से और न ही केवल सदाचार से जी सकता है। इसलिए व्यवस्था की आवश्यकता होती है। इसलिए व्यवस्था धर्म अनुपालन का साधन है।

अराजक दूर करने के लिये 'राज्य' की आवश्यकता होती है। इस लिये राज्य व्यवस्था का कर्तव्य जनता में बढते काम और लोभ को नियंत्रण में रखने का होता है। जिन का काम और मोह नियंत्रण में नहीं है ऐसे बलवान और स्वार्थी लोगों से सज्जन और दुर्बलों को बचाने का होता है।

अराजक होने का प्रत्यक्ष में शासक होने या नहीं होने से संबंध नहीं है। अराजक होने का संबंध काम और मोह अनियंत्रित होने से है। एक समय था जब सभी लोग धर्माचरण करते थे। महाभारत में शांतिपर्व में बताया है[2]

न राज्यं न राजासित न दंडयो न च दांडिक:।

धर्मेणैव प्रजासर्वं रक्षतिस्म परस्परम् ॥

धर्माचरण करने के कारण वे सभी अपनी सुरक्षा अपने आप करते थे। कहने का तात्पर्य यह है कि वे धर्माचरणी होने के कारण काम और मोह को धर्म के नियंत्रण से बाहर नहीं जाने देते थे। इस कारण अराजक नहीं था। इसीलिये किसी राज्य की या शासक की आवश्यकता ही नहीं थी।

किंतु मानव के स्खलनशील स्वभाव के कारण धर्माचरण में कमी आई। आबादी भी बढी। आबादी की घनता भी बढी। प्राकृतिक संसाधनों की निकटता की समस्या खडी हो गई। निकट में प्राप्त प्राकृतिक संसाधनों को लेकर लोग झगडने लगे। निकटवाले संसाधन के लिये झगडने वाले लोगों की कामनाओं और मोह को धर्म के नियंत्रण में रखने के लिये किये हुए शिक्षा के प्रयास भी कम पडने लगे। अराजक की अवस्था निर्माण हो गई। तब समाज का सदैव हितचिंतन करनेवाले विद्वान एकत्रित हुए। उन्होंने मंत्रणा की। और सब मिलकर धर्माचरण करनेवाले, धर्म को स्थापित करने की क्षमता रखनेवाले ऐसे बलवान और क्षात्रतेज से युक्त व्यक्ति के पास गये। उससे उन्होंने अनुरोध किया कि वह राजा बने। दण्ड व्यवस्था निर्माण करे। कोई किसी पर भी अन्याय नहीं कर सके ऐसी शासन व्यवस्था निर्माण करे। इस व्यवस्था को चलाने के लिये लोगों से 'कर' ले।

कुछ राजाओं का कार्यकाल तो ठीक चला किंतु एक राजा मनमानी करने लगा। अधर्माचरण करने लगा। तब विद्वानों के नेतृत्व में प्रजा ने उस का वध कर दिया। अब राजा के राज्याभिषेक के साथ ही यह स्पष्ट कर दिया जाने लगा की राजा की इच्छा या सत्ता सर्वोपरि नहीं है। धर्म ही सर्वोपरि है। राजा के राज्याभिषेक के समय सिंहासन पर आरूढ होने से पहले राजा कहता ‘अदंडयोऽस्मि’ धर्मगुरू या राजपुरोहित धर्मदंड से राजा के सिर पर हल्की चोट देकर कहता था ‘धर्मदंडयोसि’। ऐसा तीन बार दोहराने के बाद यानी धर्मसत्ता के नियंत्रण में रहने को मान्य कर राजा सिंहासन पर बैठने का अधिकारी बनता था।

भारतीय सामाजिक व्यवस्थाओं के संबंध में एक और महत्व की बात यह है कि धार्मिक (भारतीय) समाज में सभी सामाजिक संबंधों का आधार और इसलिये सभी व्यवस्थाओं का आधार भी कौटुम्बिक संबंध ही हुआ करते हैं। गुरू शिष्य का मानस पिता होता है। व्याख्यान सुनने आए हुए लोग केवल ‘लेडीज ऍंड जंटलमेन’ नहीं होते। वे होते हैं ‘मेरे प्रिय भाईयों और बहनों[3] (स्वामी विवेकानंद का शिकागो धर्मपरिषद में संबोधन)’। इस कारण से ही राजा द्वारा शासित जनसमूह को प्रजा (संतान) कहा जाता है। राजा प्रजा का मानस पिता होता है। पालनकर्ता होता है। पोषण और रक्षण का जिम्मेदार होता है। प्रजा दुखी हो तो राजा की नींद हराम होनी चाहिये। प्रजा दुखी होने पर राजा को सुख की नींद सोने का कोई अधिकार नहीं है ऐसा माना जाता है।

राजा और प्रजा संबंधी धार्मिक (भारतीय) मान्यताएँ

भारतीय सोच में राजा और प्रजा के संबंध में कई स्वस्थ मान्यताएँ स्थापित थीं। वे निम्न हैं:

  1. यथा राजा तथा प्रजा : सामान्य जन राजा का अनुकरण करते हैं। इस से यदि राजा श्रेष्ठ होता है तो प्रजा भी वैसी ही बन जाती है।
  2. राज्यो रक्षति रक्षित: : जब राजा प्रजा की रक्षा करता है तब प्रजा भी राज्य और राजा की रक्षा में कोई कसर नहीं रखती।
  3. मूलत: राजा की प्रजा इस शब्दावली से ही राजा और प्रजा के संबंध स्पष्ट हो जाते हैं। प्रजा का अर्थ ही 'संतान' होता है। राजा प्रजा का पालक है, पिता-स्वरूप है ऐसा यहाँ की प्रजा भी मानती थी और राजा भी मानते थे।
  4. जब तक प्रजा दु:खी है राजा को चैन की नींद सोने का अधिकार नहीं है। राजा का अपना कोई व्यक्ति जीवन नहीं होता। वह सदैव प्रजाराधन के लिये उपलब्ध हो यह आवश्यक माना गया है। सभी प्रकार के भोग उपलब्ध होते हुए भी वह भोग लिप्त नहीं हो यह शासक से अपेक्षा होती है।
  5. किसी राजा के राज्य में यदि पाप होता है तो राजा भी उस पाप में हिस्सेदार बनता है अर्थात् उसका बुरा फल भी पाता है। इसी तरह यदि राजा कोई पाप करता है तो प्रजा को भी उस के फल भोगने पडते हैं। जैसे जवाहरलाल नेहरू ने प्रधानमंत्री पद से कश्मीर के संबंध में जो पाप किया था उस के परिणाम ७० वर्षों के बाद भी जनता भुगत रही है।
  6. राजा कालस्य कारणम् : जिस प्रकार का राजा होगा वैसी परिस्थितियाँ बनतीं जातीं हैं। अच्छे राजा के काल में प्रजा को सुख-शांति प्राप्त होगी और बुरे राजा के काल में प्रजा का सुख चैन छिन जायेगा।
  7. महर्षि व्यास कहते हैं[4]:

आदावेव कुरुश्रेष्ठ राजा रंजन काम्यया। दैवतानां द्विजानां च वर्तितव्यं यथा विधिम् ।।

देवितान्यर्चयित्वा हि ब्राह्मणाश्च कुरुद्वः। आनृष्यं याति धर्मस्य लोकेन च समर्च्यते ।।

भावार्थ : प्रजारंजन के दो कार्य हैं। विद्वानों का पूजन और देवताओं का पूजन। विद्वानों के पूजन से तात्पर्य है विद्वानों के मार्गदर्शन में राज्य चलाना। राजा विद्वानों के बनाए राजा होता है। शिक्षित उसे कहते हैं जो शिक्षा प्राप्त कर अपनी भलाई में लगा हुआ है। विद्वान वह होता है जो बिना नियुक्ति के ही लोकहित का चिंतन करता रहता है। विद्वान यह जानता ही लोककल्याण ही विद्वत्ता का सार है। देवताओं के पूजन से तात्पर्य है देवताओं के (प्रकृति) प्रकोप से जनता को बचाना। इस दृष्टि से अकाल का सामना करने के लिए अन्न के भण्डार रखना। बारिश नहीं होनेपर भी पानी की कमी न हो ऐसे तालाब, बाँध, कुए, बावड़ियां पर्याप्त मात्रा में बनाना।

लोकतंत्र के लिये अनिवार्य बातें

अच्छे लोकतंत्र के अच्छी तरह चलने के लिये कुछ बातें अनिवार्य होती हैं। वे निम्न हैं:

  1. लोग स्वतंत्र हों : स्वतंत्र होने का अर्थ है लोग अपनी इच्छा के अनुसार जिस किसी प्रतिनिधि का चयन करना चाहते हैं उसका चयन कर सकें। यह तब होता है जब लोग आत्मनिर्भर या स्वावलंबी भी होते हैं।
  2. लोग शिक्षित हों : लोग जब पढे-लिखे होंगे तो उनकी चुनाव लड़ रहे सभी प्रत्याशियों के बारे में जानकारी प्राप्त कर सकने की संभावनाएँ बढतीं हैं। अनपढ तो चुनाव में धूर्तों द्वारा कई तरह से बेवकूफ बनाया जा सकता है।
  3. लोग जागरूक हों : चुनाव जिस पद के लिये हो रहे हों, उस पद पर योग्य व्यक्ति ही चुनकर आये ऐसा प्रयास करनेवाले हों । अपने लोकतंत्रात्मक आधिकारों के और अपने व्यापक हित के बारे में सजग हों ।
  4. लोग समझदार हों : जिस पद के लिये चुनाव हों उस पद पर काम करने के लिये प्रत्याशी में किन गुण, लक्षणों और सामर्थ्य की आवश्यकता होगी इसकी समझ लोगों को होनी चाहिये।
  5. लोग लालची नहीं हों और गरीब भी नहीं हों : कई बार लोग पैसे के या सुविधाओं के लालच में मतदान करते हैं। वास्तव में यह मतदान नहीं होता। यह तो मत का क्रय-विक्रय ही होता है। लालची स्वभाव नहीं होने पर भी कई बार गरीबी लोगों को लाचार बना देती है। वह चंद सिक्कों के लिये अपना मत बेच देते हैं।
  6. लोग चुनाव लड़़ने वाले प्रत्येक प्रत्याशी को अंदर बाहर से जानते हों : छोटे गाँव के चुनाव में चुनाव क्षेत्र मर्यादित होता है। इसलिये वहाँ हर मतदाता प्रत्याशी के रूप में चुनाव लड़़नेवाले प्रत्येक व्यक्ति को व्यक्तिश: और अंदर-बाहर से जानने की संभावनाएँ बहुत अधिक होतीं हैं। इसलिये चुनाव लड़़ने वाला प्रत्याशी जिस पद के लिये चुनाव लड़ रहा है उस की योग्यता को वह ठीक से समझ सकता है। ऐसी स्थिति में मतदाता जब अपने विवेक से मत डालता है तो वह योग्य व्यक्ति का चयन करता है। किंतु जब चुनाव क्षेत्र की जनसंख्या बहुत अधिक होगी (लाखों में) तब सामान्यत: कोई भी व्यक्ति ऐसा नहीं होता जो सभी प्रत्याशियों को अंदर-बाहर से जानता हो। ऐसे में तो फिर प्रत्याशी की योग्यता यह कसौटी नहीं रह जाती। राजनीतिक दल, जाति, रिश्तेदारी, पहचान, अपने गाँव का होना आदि योग्यता से जिनका कोई संबंध नहीं है ऐसे मुद्दों पर मत डाला जाता है। सच्चे लोकतंत्र में यह अपेक्षित नहीं है।
  7. भौगोलिक निकटता हो : जब भौगोलिक क्षेत्र बहुत विशाल होता है तब हर मतदाता प्रत्याशी के रूप में चुनाव लड़़नेवाले प्रत्येक व्यक्ति को व्यक्तिश: और अंदर-बाहर से जानने की संभावनाएँ बहुत कम होतीं हैं। ऐसे में योग्य व्यक्ति को ही मतदान होने की संभावनाएँ बहुत कम हो जातीं हैं। यहाँ भी विशाल आबादी के क्षेत्र जैसी कसौटीयों पर ही अर्थात् लोकतंत्र के लिये गलत कारणों से लोग मत देते हैं। मतदान केन्द्र की दूरी भी मतदान को प्रभावित करती है।
  8. लोग निर्भय हों : बाहुबलियों से डरकर गलत मतदान करनेवालों की संख्या भी कम नहीं है। देश में कई निर्वाचन क्षेत्र ऐसे हैं जहाँ बाहुबली ही चुनकर आते हैं। वे उस पद के योग्य हैं ऐसा लोगों को लगता है इसलिये नहीं अपितु उन के बाहुबल के डर से ही लोग उन्हें मत देकर छुटकारा पाते हैं। बंगाल में चुनावों में हो रहा शस्त्र प्रदर्शन जिस प्रकार दूरदर्शन पर बताया गया था उससे लगता है कि क्या वास्तव में हम लोकतंत्र में जी रहे हैं?
  9. लोग सुरक्षित हों : लोगों का निर्भय होना ही पर्याप्त नहीं है। सुरक्षित होना वास्तव में अधिक आवश्यक है। बाहुबली या आतंकवादी चुनाव को प्रभावित तब ही कर पाते हैं जब चुनाव क्षेत्र में सुरक्षा की पक्की व्यवस्था नहीं होती।
  10. चुनाव की व्यवस्था निर्दोष हो : चुनाव की व्यवस्थाओं में धांधली से भी गलत व्यक्ति चुनकर आ जाता है। लोकतंत्र असफल हो जाता है। कभी मतदान यंत्र ही बिगड जाता है। कभी उँगली पर लगाई स्याही धुल जाती है। तो कभी कर्मचारीही अनुपस्थित रह जाते हैं।
  11. चुनाव का आयोजन करनेवाली व्यवस्था के और शासन के लोग लोकतंत्र में गहरा विश्वास रखते हों : जिस शासन के काल में चुनाव हो रहे हैं वह शासन यदि लोकतंत्र में श्रध्दा रखनेवाला नहीं हो तो कोई चुनाव ठीक ढंग से नहीं हो सकते। इसी तरह यदि चुनाव के लिये की गई उम्मीदवारों की अर्जी से लेकर प्रत्यक्ष मतदान की व्यवस्थाएँ चुनाव आयोग के अधिकारी लापरवाही से करते हैं तो चुनाव ठीक होंगे इस की आश्वस्ति नहीं दी जा सकती।
  12. जनता देशभक्त हो : देश के हित में काम करनेवाले लोग चुनकर आएँ इसलिये तो वास्तव में चुनाव होते हैं। लेकिन जब मतदाताओं में देशहित के विरोधी लोगों की संख्या लक्षणीय होती है तब थोडे से देशद्रोहियों के इकठ्ठे मतों से भी परिणाम विपरीत आ जाते हैं।
  13. जो योग्य है वह चुनाव में प्रत्याशी हो : सब से महत्वपूर्ण बात तो यह है कि जो सज्जन भी हैं, क्षमतावान भी हैं और बुद्धिमान भी हैं ऐसे लोग अपवाद से ही राजनीति के क्षेत्र में आते हैं। सामान्यत: तो धूर्त ही राजनीति के क्षेत्र के बादशाह होते हैं। ऐसे में व्यक्ति योग्य है किंतु चुनाव के या राजनीति के कीचड़ में नहीं उतरना चाहता ऐसा व्यक्ति प्रत्याशी बनने से दूर ही रहता है।

लोकतंत्र की मर्यादाएँ

  1. लोकतंत्र में सब लोग समान माने जाते हैं। एक व्यक्ति के स्वरूप में तो सब समान होते ही हैं। किंतु जब समझदारी का विषय आता है, जानकार होने का विषय आता है, निर्भयता का विषय आता है तो प्रत्येक मनुष्य अन्य मनुष्यों से भिन्न ही होता है। लोकतंत्र में बुद्धिमान की बुद्धि और बुद्धू की बुद्धि को समान आँका जाता है। सामान्य लोगों द्वारा योग्यता के बगैर ही बराबरी की अपेक्षा की जाती है। वास्तव में यह अराजक की स्थिति ही है। टके सेर भाजी टके सेर खाजा की स्थिति है।
  2. मतदाता की अर्हता तय करना भी एक कठिन विषय होता है। केवल सज्ञानता की कानून द्वारा निर्धारित आयु और पागल नहीं होना इन दो बातों के आधार पर ही वर्तमान में मतदान का अधिकार मान्य हो जाता है। लेकिन आवश्यकता तो समझदारी की होती है। समझदार बनने की कोई आयु नहीं होती। कोई 15 वर्ष की आयु में समझदार हो जाता है तो कोई 50 वर्ष का होने पर भी समझदार नहीं बनता।
  3. मतदाता का 'मत' कई कारणों से प्रभावित होता है। चुनाव लड़ रहे हर प्रत्याशी की अंदर बाहर से जानकारी नहीं होने से, जिस पद के लिये चुनाव हो रहे हैं उस पद की जिम्मेदारियाँ क्या हैं इस की जानकारी नहीं होने से, और उपर्युक्त लोकतंत्र के लिये अनिवार्य बातों में से कुछ बातों के अनुपस्थित होने से यह हो सकता है। ऐसी परिस्थिति में मतदाता द्वारा किया मतदान सटीक नहीं रह सकता।
  4. जिस प्रकार से मतदाता की अर्हता महत्वपूर्ण है उसी प्रकार से प्रत्याशी की अर्हता तो उस से भी अधिक महत्व रखती है। किंतु इस विषय में भी जिस पद के लिये वह चुनाव लड़ रहा है उस दृष्टि से प्रत्याशी के संस्कार, लालन-पालन, उसकी शिक्षा और प्रशिक्षण इन बातों की कोई शर्त नहीं होती।
  5. मतदान कभी भी १०० प्रतिशत नहीं होता। जो होता है उसी में अधिकतम मत जिसे मिलते हैं वह चुनाव जीत जाता है। विभिन्न कारणों से कई बार मतदान ४० प्रतिशत से भी कम होता है। ऐसी स्थिति में या अधिक प्रत्याशी संख्या होने पर मात्र २० प्रतिशत मत पाने वाला प्रत्याशी भी चुनाव जीत जाता है। स्वाधीनता के बाद के चुनाव में काँग्रेस ने संसद और विधानसभा की मिलाकर देशभर में ७२ प्रतिशत बैठकें जीतीं थीं। किंतु कुल बालिग मतदान का प्रत्यक्ष पेटी में प्राप्त हुआ मतदान मात्र २३ प्रतिशत ही था। इस २३ प्रतिशत में भी काँग्रेस को केवल ४५ प्रतिशत मत ही प्राप्त हुए थे। इसका अर्थ यह है कि कुल मतों में से केवल १०.३५ प्रतिशत मत पाने से काँग्रेस को पाशवी (ब्रूटल) बहुमत प्राप्त हो गया था।
  6. चुनाव का व्यय इतना अधिक होता है कि सामान्य माली हालत वाला व्यक्ति चुनाव लड़़ने का व्यय वहन नहीं कर सकता। फिर वह विविध प्रकार के हथकण्डे अपनाकर धन की व्यवस्था करता है। जब चुन कर आ जाता है तो जिन से उसने धन लिया है वे अपने दिये धन से कई गुना लाभ उससे प्राप्त करते हैं। इस से भ्रष्टाचार को बढावा मिलता है। कई बार तो लोग गुण्डों की मदद लेते हैं। विदेशी शक्तियों की मदद लेने वाले भी कई लोग होते हैं। ऐसे लोग चुन कर आने के बाद उन गुण्डों के लिये या विदेशी शक्तियों के लिये काम करते हैं।
  7. वास्तव में अल्पमत और बहुमत वाला लोकतंत्र तो सीधा ' सर्व्हायव्हल ऑफ द फिटेस्ट यानी बलवानों को ही जीने का अधिकार है' इस सूत्र के आधार पर ही बनाया हुआ तंत्र है। जब आप बहुमत में आ जाते हैं यानी बलवान हो जाते हैं तब आप की इच्छा के अनुसार अल्पमत वालों को चलना पडेगा।
  8. प्रत्याशी लोगों को क्या आश्वासन दे इस के कोई नियम नहीं बनाये जाते। चाँद तोडकर लाने जैसे झूठे आश्वासन भी वे दे सकते हैं। सामान्यत: सभी प्रत्याशी लोगों के काम (अपेक्षाओं) और मोह को बढाने वाले आश्वासन ही देते हैं। आश्वासनों की पूर्ति नहीं होने पर समाज में अराजक निर्माण होता है।
  9. चुन कर आने के लिये प्रत्याशी का चालाक होना अनिवार्य होता है। बुद्धिमान होना, विवेकी होना इन गुणों से चालाकी को वरीयता मिलती है। चालाक प्रत्याशी लोगों को अच्छी तरह से भ्रमित कर (वास्तव में बेवकूफ बना) सकता है। बार बार भ्रमित कर सकता है।
  10. कोई भी ऐरा गैरा श्रेष्ठ शासक नहीं बन सकता। श्रेष्ठ शासक तो जन्मजात होता है ऐसी धार्मिक (भारतीय) मान्यता है। ऐसा व्यक्ति जो जन्मजात शासक के गुण लक्षणोंवाला हो, जिसे संस्कार, शिक्षण और प्रशिक्षण भी शासक बनने का मिला हो, मिलना लोकतंत्र में अपघात से ही होता है। ऐसे शासक निर्माण की व्यवस्था धार्मिक (भारतीय) राज-कुटुम्ब अपने बच्चों के लिये करते थे। वर्तमान अधार्मिक (अभारतीय) लोकतंत्र में नौकरशाही और नौकरशाहों का निर्माण मात्र हो सकता है।

भारतीय समाज की व्यवस्थाओं का स्वरूप

शिक्षण का उद्देष्य भी समाज को धर्माचरणी बनाने का होता है। सामान्यत: जब समाज भी धर्माचरणी होता है तो शासन को धर्म की रक्षा करना सहज ही संभव हो जाता है। किंतु जब समाज का बडा हिस्सा अधर्माचरणी होता है तब कोई भी शासन समाज को दुष्टों से और अन्याय से छुटकारा नहीं दिला सकता। इसलिये धर्माचरण सिखाने वाली शिक्षा समाज में प्रतिष्टित हो यह देखना यह शासन का दायित्व होता है। उसी प्रकार से धर्माचरणी राजा शासक बने यह सुनिश्चित करना यह धर्माचरण की शिक्षा देनेवाली व्यवस्था का दायित्व होता है।

प्रकृति विकेंद्रित है। हवा, पानी, सूर्यप्रकाश, जंगल, खनिज पदार्थ ये संसाधन प्रकृति में बिखरे हुए हैं, विकेंद्रित हैं। और इन के बिना मानव का जीना असंभव है। इसलिये मानव जीवन की रचना में एक तो प्रकृति सुसंगत जीना यानी प्राकृतिक पदार्थों में न्यूनतम फेरफार कर उनका उपयोग करना और दूसरे विकेंद्रित जन, धन, उत्पादन और सत्ता की रचना करना मानव के लिये, समाज के लिये और मानवेतर सृष्टि के लिये भी हितकर होता है। इसे समझकर हमारे पूर्वजों ने सामाजिक व्यवस्थाओं का तानाबाना रचा था। समाज जीवन के लिये आवश्यक पोषण, रक्षण और शिक्षण तीनों की विकेंद्रित व्यवस्था की गई थी। शासन व्यवस्था भी गृह, ग्राम, गुरुकुल, जाति, राजा या सम्राट और अंत में त्याग, तपस्या, ज्ञान, चराचर के हित का सदैव चिंतन और चिंता करनेवाली नैतिक सत्ता अर्थात् धर्मसत्ता ऐसी विकेंद्रित थी। लेकिन इन सभी स्तरों पर जो प्रमुख होता था उसकी भूमिका एक कुटुम्ब के मुखिया जैसी ही होती थी और आचरण धर्मानुसारी ही रहता था।

भारतीय लोकराज्य का स्वरूप - धर्मराज्य

बच्चा जब पैदा होता है तब वह केवल 'मम हिताय मम सुखाय' जानता है। इस अवस्था से आगे विकास की क्रमश: अवस्थाएँ मम जन हिताय मम जन सुखाय, बहुजन हिताय बहुजन सुखाय, सर्वजन हिताय सर्वजन सुखाय और सबसे ऊपर सर्वे भवन्तु सुखिन: ये होतीं हैं। सर्वे भवन्तु सुखिन: के स्तर के आचरण को ही धर्म कहते हैं। इस का अर्थ है कि मनुष्य जीवन की सर्वाधिक विकास की अवस्था धर्माचरणी जीवन की है।

भारत में धर्म को अनन्यसाधारण महत्व दिया गया है। हमारी सभी व्यवस्थाएँ धर्माधिष्ठित ही होतीं हैं। राज्य भी धर्मराज्य होता है। मूलत: धर्म को छोडकर राज्य का विचार ही नहीं किया जा सकता। राज्य का स्वरूप भले ही लोकतंत्रात्मक हो चाहे राजा का हो उसे यदि लोकहितकरी होना है तो उसका धर्मानुसारी होना अनिवार्य माना गया है। धर्माधिष्ठित नहीं हैं तो शासन लोकतंत्रात्मक हो या एकतंत्रीय राजा का हो उसमें लोगों का उत्पीडन होगा ही।

धर्मराज्य में व्यक्ति और समाज के साथ साथ ही प्रकृति का हित भी उतना ही महत्वपूर्ण माना जाता है। केवल व्यक्ति का हित या केवल समाज का हित सर्वोपरि मानने से राज्य एकांगी बन जाता है। व्यक्तिवादी यानी पूँजीवादी राज्यव्यवस्था में समाज का और सृष्टि का हित गौण बन जाता है। इसी तरह से समाज के हितपर आधारित यानी साम्यवादी राज्य में व्यक्ति का और सृष्टि का हित खतरे में पड जाता है।

धर्मराज्य का अर्थ पंथ, संप्रदाय, रिलीजन या मजहब का राज्य नहीं होता। यह थिओक्रेटिक राज्य नहीं होता। ये सभी प्रकार के राज्य अपने पंथ, संप्रदाय, रिलीजन या मजहब के प्रेषित की नीतियों के अनुसार चलते हैं। अपने मत को अन्य मतों के माननेवाली जनतापर बलपूर्वक थोपते हैं।

धर्मराज्य को हम आज की भाषा में संवैधानिक शासन कह सकते हैं। लेकिन संवैधानिक शासन में संविधान बनानेवाले लोग कौन हैं यह महत्त्वपूर्ण है। धर्म के सिद्धांत समाधि अवस्था प्राप्त लोगों ने तय किये हुए हैं। वे काल की कसौटीपर भी खरे उतरे हैं। ऐसे धर्म के तत्त्वोंपर आधारित संविधान के अनुसार चलनेवाला शासन धर्मराज्य ही होगा। धर्मविरोधी शासक को बदलने का अधिकार प्रजा को होता है। लेकिन धर्माधिष्ठित शासन चलाने वाले शासक को हटाने का अधिकार प्रजा को नहीं होता। धर्म के अनुसार आचरण करना यह प्रजा का धर्म है। राजा को हटाना यह प्रजा का धर्म नहीं है। लेकिन जब प्रजा के धर्म पालन में राजा अवरोध बनता है तब राजा को हटाना प्रजा का धर्म बन जाता है।

वर्तमान अधार्मिक (अभारतीय) प्रजातंत्र में राजा और प्रजा के हितसंबंधों में स्थाई विरोध होता है ऐसा मानकर एक विरोधी दल का प्रावधान किया होता है। राजा को प्रजा के हित का विरोधी नहीं बनने देना ही इस विरोधी दल का उद्देष्य होता है। धार्मिक (भारतीय) जीवनदृष्टि के ज्ञाता और एकात्म मानव दर्शन के प्रस्तोता पं. दीनदयालजी उपाध्याय कहते हैं कि प्रजातंत्र के इस स्वरूप का विचार शायद बायबल के गॉड और इंप (शैतान) इनके द्वैतवादी सिद्धांत से उभरा होगा। धर्मराज्य में कोई विरोधक नहीं होता। शुभेच्छुक और अभिभावक ही होते हैं। अभिभावक बच्चों के विरोधक नहीं होते किंतु बच्चा अच्छा बने, बिगडे नहीं यह देखना उनका दायित्व होता है, उसी प्रकार धर्मराज्य में विरोधक नहीं होते हुए भी अभिभावक धर्मसत्ता के कारण शासन बिगड नहीं पाता।

लोकतंत्र की व्यवस्था का वर्णन लोगों का लोगों के हित में लोगोंद्वारा चलायी जानेवाली शासन व्यवस्था ऐसा लोकतंत्र का वर्णन किया जाता है। वर्तमान में विश्व के १२५ से ऊपर देशों में लोकतंत्रात्मक शासन चलते हैं। इन सब के लोकतंत्रों में भिन्नता है। लेकिन इन लोकतंत्रों से जो समाज के अंतिम छोर के व्यक्ति के भी हित में काम करने की अपेक्षा की जाती है वह ये जबतक सर्वे भवन्तु सुखिन: के आधारपर शासन नहीं चलाते पूर्ण नहीं होतीं। इसलिये हम कह सकते हैं कि लोकतंत्र हो तानाशाही हो या राजा का तंत्र वह लोगों के लिये तभी होगा, लोकराज्य तब ही कहलाएगा जब वह धर्मराज्य हो।

निष्कर्ष

उपर्युक्त विवेचन से निम्न बातें ध्यान में आतीं हैं:

  1. हजारों लाखों वर्षों में हमारे पूर्वजों ने जो सोच और व्यवस्थाएँ निर्माण की थीं वह कालसिद्ध हैं।
  2. अभारतीय समाजों द्वारा पुरस्कृत की हुई और आग्रहपूर्वक लादी गई व्यवस्थाएँ तो उन के लिये भी हितकारी सिद्ध नहीं हुईं हैं। तो भारत के लिये हितकारी कैसे सिद्ध होंगी।
  3. 'धर्मराज्य' ही वास्तव में लोगों का, लोगों (चराचर के हित की चिंता करनेवालों) द्वारा चलाया गया, लोगों के ही नहीं तो चराचर के हित में काम करनेवाले शासन का श्रेष्ठ स्वरूप है। इसी को हम रामराज्य भी कहते हैं। रामराज्य का वर्णन यहाँ है।

References

  1. कौटिलीय अर्थशास्त्र, प्रथम अधिकरण, अध्याय 18
  2. महाभारत, शांतिपर्व
  3. स्वामी विवेकानंद का शिकागो धर्मपरिषद में संबोधन
  4. महाभारतम्-12-शांतिपर्व-055, 12 and 13

अन्य स्रोत:

१. महाभारत

२. धार्मिक (भारतीय) राज्यशास्त्र, लेखक गो. वा. टोकेकर और मधुकर महाजन, प्रकाशक : विद्या प्रकाशन, मुम्बई

३. प्रजातंत्र अथवा वर्णाश्रम व्यवस्था, लेखक गुरुदत्त, प्रकाशक हिन्दी साहित्य सदन, नई दिल्ली