Adhikamasa and Kshyamasa(अधिकमास एवं क्षयमास)
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भारतीय कालगणना में नवविध कालमान के अन्तर्गत सौर एवं चान्द्र दोनों कालमानों को स्वीकार किया गया और व्यवहार में भी दोनों का प्रयोग किया जाता है। भारतीय पंचांग चान्द्र-सौर दोनों गणनाओं के समन्वय से निर्मित होते हैं। जिसमें सौर वर्ष (Solar Year) और चांद्र वर्ष (Lunar Year) के मध्य सामंजस्य बनाए रखना अनिवार्य होता है। इन दोनों गणनाओं में आने वाले अंतर को समाप्त करने के लिए भारतीय ज्योतिष शास्त्र में 'अधिक मास' एवं 'क्षयमास' की व्यवस्था की गई है। अधिकमास को ही पुरुषोत्तम मास या मलमास कहते हैं।
परिचय॥ Introduction
भारतीय कालगणना में मास का अधिक महत्त्व है। कालमान के अनुसार चान्द्रमान के आधार पर ही मास की गणना ज्योतिषशास्त्र में बताई गई है। ग्रहसाधन के प्रसंग में अधिकमास और क्षयमास का अत्यधिक महत्त्व बताया गया है। भारतीय यही प्रमुख कारण है कि अधिकमास एवं क्षयमास उत्पन्न होते हैं तथा उनका साधन भी शास्त्रों में किया गया है। केवल सिद्धान्त ग्रन्थों में ही नहीं परन्तु फलित एवं मुहूर्त ग्रन्थों में भी अधिकमास एवं क्षयमास का उल्लेख किया गया है। सौर वर्ष और चान्द्र वर्ष में सामंजस्य स्थापित करने के लिये हर तीसरे वर्ष पंचांगों में एक चान्द्रमास की वृद्धि कर दी जाती है। इसी को अधिकमास या पुरुषोत्तम मास कहते हैं। मास संबंधी ज्ञान के विषय में अधिकमास का ज्ञान परम आवश्यक है क्योंकि धार्मिक एवं ज्योतिषीय दोनों की दृष्टि से अधिकमास का आनयन एवं विचार महत्त्वपूर्ण है। सूर्यसिद्धान्त में कहा गया है कि -
भवन्ति शशिनो मासाः सूर्य्येन्दु भगणान्तरम्। रविमासोनितास्ते तु शेषाः स्युरधिमासकाः॥ (सूर्य सिद्धान्त)
भाषार्थ - सूर्य और चन्द्रमा की गतियों (भगणों) के अन्तर से जो चान्द्रमास बनते हैं, उनमें से जब सौरमासों को घटाया जाता है, तब जो शेष बचता है वही अधिमास कहलाता है।
शुभ एवं अशुभ कार्यों में अधिकमास एवं क्षयमास दोनों का विचार-विमर्श शास्त्रों में गंभीरता पूर्वक किया है। व्यवहारमें सौर और चान्द्रमासों की गणना प्रचलित है। जिसके साथ सावन दिनों का सम्बन्ध जुडा रहता है सूर्य के एक राशिभोग को सौरमास और ३० तिथ्यात्मक दो अमान्त कालाभ्यन्तर वर्तमान काल को चान्द्रमास कहते हैं। एक सौरमास को सावन दिन से मापा जाय तो जितने सावन दिन होंगे उससे कम सावन दिन १ चान्द्रमास में होते हैं अर्थात् चान्द्रमास की अपेक्षा सौरमास बडा होता है। चान्द्रमास से सौरमास जितना अधिक होता है उसी को अधिशेष कहते हैं। मध्यम मान से एक सौरमास ३० सावनदिन, २६ घटी एवं १५ पल का होता है और चान्द्रमास २९दिन, ३४ घटी एवं २० पल का होता है। दोनों का अन्तर (३०।२६।१५)-(२९।३४।२०)=०।५१।५५ सावनदिनादि १ सौरमास में होता है। यही अधिशेष प्रतिमास बढते हुये अनुपात से- १सौरमास + २९ दि०३४।२०/आन्तर शेष= ३०+२९ दिन ३४/ घ० २०/०।५१।५५= ३२ १/३ आसन्न मास में १ चान्द्रमास पड जाता है। वही अधिमास कहा जाता है। जब अधिशेष १चान्द्रमास बराबर होता है तो उस चान्द्रमास में सूर्य संक्रान्ति नहीं होती है। अर्थात् वह चान्द्रमास सूर्य संक्रान्ति से विहीन होता है, उसी को अधिमास या मलमास अथवा पुरुषोत्तममास कहते हैं।
परिभाषा॥ Definition
सिद्धान्तशिरोमणि के आधार पर अधिकमास एवं क्षयमास का लक्षण इस प्रकार है-
असंक्रान्तिमासोऽधिमासः स्फुटं स्याद् द्विसंक्रान्तिमासः क्षयाख्यः कदाचित्। क्षयः कार्तिकादित्रये नान्यतः स्यात्तदा वर्षमध्येऽधिमासद्वयंञ्च॥ (सिद्धान्त शिरोमणि)[1]
जिस चान्द्र मास में सूर्य की संक्रान्ति नहीं होती है तो उस मास की अधिकमास संज्ञा होती है। एवं जिस मास में अर्थात् चान्द्रमास में दो संक्रान्ति हो उस चान्द्रमास को क्षयमास कहते हैं। क्षयमास प्रायः कार्तिकादि तीन मास में होता है। तथा जिस वर्ष में क्षय मास होता है उस वर्ष में दो अधिक मास १ तीन मास के पूर्व तथा १ बाद में होता है।
मलमासोऽयं सौरचान्द्रमासयोः विकारः।
सौरमास और चान्द्रमास के विकार स्वरूप मलमास की उत्पत्ति होती है।
मस्ये परिमियते इत मासः।(शब्दकल्पद्रुमः)[2]
अर्थ-काल प्रमाण ही मास है। सौर मास, चन्द्र मास, नाक्षत्रमास और सावन मास – ये ही मास के चार भेद हैं ।
यस्मिन्मासे न संक्रान्ति संक्रान्तिद्वयमेव वा। मलमासः स विज्ञेयः। (शब्दकल्पद्रुमः)
अधिकमास और क्षयमास दोनों में विकार है। एक संक्रान्ति रहित है। दूसरा दो संक्रान्ति से युक्त है।
संक्रान्ति रहितो मासोऽधिमासः। (शब्दकल्पद्रुमः)
अधिकमास संक्रान्ति रहित है।
संक्रान्तिद्वययुक्तो मासः क्षयमासः। (शब्दकल्पद्रुमः)
क्षयमास दो संक्रान्तियों से युक्त होता है।
अधिकमास विज्ञान॥ Adhikamasa Vigyana
पाण्डवों को बन गये कितने दिन हुए, इसके विषय में गोग्रहण के समय भीष्म दुर्योधन से कहते हैं -
तेषां कालातिरेकेण ज्योतिषाञ्च व्यतिक्रमात्। पञ्चमे पञ्चमे वर्षे द्वौ मासावुपजायतः॥
एषामभ्यधिकाः मासाः पञ्च च द्वादशक्षपाः। त्रयोदशानां वर्षाणामिति मे वर्तते मतिः॥ (विराट पर्व, अध्याय ५२)
यहाँ पाँच वर्षों में दो अधिकमास बतलाये गये हैं।[3]
मीनादिस्थो रविर्येषामारंभप्रथमे क्षणे। भवेत्तेब्दे चान्द्रमासाश्चैत्राद्या द्वादश स्मृताः॥
मेषादिस्थे सवितरि यो यो मासः प्रपूर्यते चान्द्रः। चैत्राद्यः स ज्ञेयः पूर्तिद्वित्वेऽधिमासोऽन्त्यः॥ (भारतीय ज्योतिष)
अधिकमास कई नामों से विख्यात है - अधिमास, मलमास, मलिम्लुच, संसर्प, अंहस्पति या अंहसस्पति, पुरुषोत्तममास। इनकी व्याख्या आवश्यक है।
सौरवर्ष का मान - ३६५ दिन - १५ घटी - ३१ पल - ३० विपल
चान्द्रवर्ष का मान - ३५४ दिन - २२ घटी - ०१ पल - ३३ विपल
अतः स्पष्ट है कि चान्द्रवर्ष सौर वर्ष से १० दिन - ५३ घटी - ३० पल - ०७ विपल कम है। इस क्षतिपूर्ति और दोनों मासों के सामञ्जस्य के उद्देश्य से हर तीसरे वर्ष अधिक चान्द्रमास तथा एक बार १४१ वर्षों के बाद तथा दूसरी बार १९ वर्षों के बाद क्षय-चान्द्रमास की आवृत्ति होती है।[4]
सौर एवं चांद्र वर्ष का गणितीय विश्लेषण
भारतीय कालगणना परम्परा में अनेक कालमानों का मिश्रित व्यवहार होता है जिसके अन्तर्गत मास व्यवहार में चैत्रमास से आरम्भ कर फाल्गुनमास तक दो-दो अमावस्याओं के मध्य क्रमशः मेषादि बारह राशियों की सूर्य संक्रान्तियों से चैत्र वैशाखादि बारह मास सिद्ध होते हैं, परन्तु वर्ष के मध्य में यदि इन चैत्रादि बारह मासों के अतिरिक्त तेरहवां मास आ जाता है तो वह अधिमास कहलाता है। क्षयमास को लुप्तमास के नाम से भी जाना जाता है अर्थात् ज्योतिषीय गणना में कभी-कभी ऐसी स्थिति भी आती है जब एक चन्द्रमास में दो संक्रान्तियाँ घटित हो जाती हैं। ऐसी अवस्था ‘क्षयमास’ कहलाती है। क्षयमास अत्यन्त दुर्लभ माना गया है। सामान्यतः क्षयमास की स्थिति होने पर उसके समीपवर्ती समय में दो अधिक मास भी पड़ सकते हैं। यदि कभी भी चैत्रादि मास के गणना क्रम में किसी मास का व्यवहार न हो तो उसे लुप्त अथवा क्षयमास की संज्ञा से जानते हैं। पंचांग गणना के अनुसार सौर और चांद्र वर्ष की अवधि में स्पष्ट अंतर पाया जाता है, जिसका विवरण निम्नवत है -
- सौर वर्ष का मान - ३६५ दिन, १५ घटी, २२ पल और ५७ विपल।
- चांद्र वर्ष का मान - ३५४ दिन, २२ घटी, १ पल और २३ विपल।
इस प्रकार, दोनों गणनाओं के मध्य प्रतिवर्ष लगभग १० दिन, ५३ घटी और २१ पल (अर्थात लगभग ११ दिन) का अंतर उत्पन्न हो जाता है। इस गणितीय अंतर को पाटने के लिए हर तीसरे वर्ष चांद्र वर्ष में १२ मासों के स्थान पर १३ मास समायोजित किए जाते हैं।
अधिकमास की उपपत्ति॥ Upapatti of Adhikamasa
सैद्धांतिक दृष्टि के आधार पर जब भी दो अमान्त के मध्य में संक्रान्ति का अभाव हो जाये तो उसे अधिमास की संज्ञा दी जाती है। सौरवर्ष ३६५ दिन का और चन्द्र वर्ष ३५५ दिन का होता है । जिससे दोनों में प्रतिवर्ष १० दिनों का अंतर पड़ता है । इस वैषम्य को दूर करने के लिए प्रति तीसरे वर्ष बारह की जगह १३ चान्द्र मास होते हैं । ऐसे बढे हुए मास को अधिमास या मलमास कहते हैं ।
मेषादिस्थे सवितरि यो यो मासः प्रपूर्यते चान्द्रः। चैत्राद्यः स विज्ञेयः पूर्तिर्द्वित्वे ऽधिमासोऽन्त्यः॥
अर्थात् मेषादि राशियों पर गमन करता हुआ सूर्य जब-जब चान्द्रमासों की पूर्ति करता है उस मासों को क्रम से चैत्रादि मास की संज्ञा दी गई है। जिसमें संक्रान्ति की पूर्ति नहीं होती है उसे अधिकमास कहते हैं।[5] अन्य मत के अनुसार, जिसे आरम्भ पक्ष कहते हैं-
मीनादिस्थो रविर्येषामारम्भप्रथमे क्षणे। भवेत् तेऽब्दे चान्द्रमासाश्चैत्राद्या द्वादश स्मृताः॥
अर्थात् जिस चान्द्रमास के आरम्भ क्षण में रवि मीन राशि में हो, वह चैत्र मास कहलाता है। इसी प्रकार वर्ष के चैत्रादि बारह मास होते हैं। किसी सामान्य चान्द्रमास में आरम्भ पक्ष और पूर्तिपक्ष दोनों नियमों से एक ही मास की संज्ञा प्राप्त होती है। सौर-वर्ष का मान ३६५ दिन, १५ घटी, २२ पल और ५७ विपल है। जबकि चंद्र वर्ष में ३५४ दिन, २२ घटी, १ पल और २३ विपल का होता है। इस प्रकार दोनों वर्षमानों में प्रतिवर्ष १० दिन, ५३ घटी, २१ पल (अर्थात लगभग ११ दिन) का अंतर है। सौरवर्ष और चन्द्र वर्ष में सामञ्जस्य स्थापित करना परम आवश्यक है। यह सामञ्जस्य स्थापित करने के लिये हर तीसरे वर्ष भारतीय पञ्चांगों में एक चंद्रमास की वृद्धि कर दी जाती है। यही अधिकमास है। वस्तुतः यह स्थिति स्वयं ही आ जाती है जब दो अमावस्या के बीच सूर्य की संक्रान्ति नहीं आती।
द्वात्रिंशद्-भिर्गतैर्मासैर्दिनैः षोडशभिस्तथा। घटिकानां चतुष्केण पततिह्यधिमासकः॥ (वसिष्ठ-सिद्धान्त)
अधिमास ३२ महीने, १६ दिन और ४ घटी बीत जाने पर अधिकमास होता है। सूर्यसिद्धान्त के अनुसार ३३,५३५१ चांद्रमासों में ३२,५३४ सौर मास होते हैं। इस कारण सौरमासों को चांद्रमास बनाने के लिये सौरमासों के उपरान्त अथवा २ वर्ष ८ महीनों के उपरान्त अधिकमास होता है।
जब किसी चांद्रमास में सूर्य की कोई संक्रांति (एक राशि से दूसरी राशि में प्रवेश) नहीं होती, तो उस मास को 'अधिक मास' कहा जाता है। इसे क्षेत्रीय और धार्मिक मान्यताओं के अनुसार अधिमास, मलमास, मलिम्लुच मास या पुरुषोत्तम मास के नाम से भी जाना जाता है।
क्षयमास की उपपत्ति॥ Upapatti of Kshayamasa
जिस चान्द्रमास में दो सूर्य-संक्रान्ति का समावेश हो जाय, वह क्षयमास कहलाता है। क्षयमास केवल कार्तिक, मार्ग व पौष मासों में होता है। जिस वर्ष क्षय-मास पडता है, उसी वर्ष अधिमास भी अवश्य पडता है परन्तु यह स्थिति १९ वर्षों या १४१ वर्षों के पश्चात् आती है। जैसे विक्रमी संवत् २०२० एवं २०३९ में क्षयमासों का आगमन हुआ तथा भविष्य में संवत् २०५८, २१५० में पडने की संभावना है।
क्षयमास की विशेषता
क्षयमास अत्यन्त दुर्लभ घटना है। जब एक चन्द्रमास के भीतर सूर्य दो राशियों में प्रवेश कर लेता है, तब एक मास का लोप हो जाता है। इसे क्षयमास कहते हैं, ग्रन्थों के अनुसार -
- क्षयमास प्रायः कार्तिक, मार्गशीर्ष या पौष मास में ही सम्भव होता है।
- क्षयमास के पहले अथवा बाद में अधिकमास अवश्य पड़ता है।
- यह घटना बहुत लम्बे अन्तराल पर घटित होती है।
क्षयमास एक दुर्लभ स्थिति है जो तब उत्पन्न होती है जब एक ही चंद्रमास के भीतर दो सूर्य संक्रांतियों का समावेश हो जाता है।
- निर्धारित मास: क्षयमास मुख्य रूप से कार्तिक, मार्गशीर्ष (अगहन) और पौष मास में ही संभव होता है।
- सम्बद्धता: यह एक ज्योतिषीय नियम है कि जिस वर्ष क्षयमास पड़ता है, उस वर्ष अधिमास (अधिक मास) का आगमन भी अनिवार्य रूप से होता है।
- पुनरावृत्ति: क्षयमास की स्थिति सामान्यतः १९ वर्षों या १४१ वर्षों के अंतराल पर आती है।
अधिक मास और क्षयमास की व्यवस्था यह दर्शाती है कि प्राचीन भारतीय ऋषियों और खगोलविदों को आकाशीय पिण्डों की गति का सूक्ष्म ज्ञान था। यह व्यवस्था न केवल ऋतुओं और त्योहारों के समन्वय को बनाए रखती है, अपितु समय की गणना को खगोलीय सत्यता के निकट लाती है।
अधिकमास एवं क्षयमास में त्याग योग्य कर्म॥ Adhikamasa evam Kshayamasa mein Tyaga yogya karma
गर्गाचार्य जी के मत से अधिकमास में त्याज्य कर्म -
अग्न्याधानं प्रतिष्ठां च यज्ञो दानव्रतानि च। वेदव्रतवृषोत्सर्ग चूडाकरणमेखलाः॥गमनं देवतीर्थानां विवाहमभिषेचनम्। यानं च गृहकर्माणि मलमासे विवर्जयेत्॥ (गर्ग संहिता)
भाषार्थ - अग्न्याधान, प्रतिष्ठा, यज्ञ, दान, व्रतादि, वेदव्रत वृषोत्सर्ग, चूडाकर्म, व्रतबन्ध, देवतीर्थों में गमन, विवाह, अभिषेक, यान और घर के काम अर्थात् गृहारम्भादि कार्य अधिक मास में नहीं करना चाहिये। मनुस्मृति के आधार पर कर्त्तव्य इस प्रकार हैं -
तीर्थश्राद्धं दर्शश्राद्धं प्रेतश्राद्धं सपिण्डनम्। चन्द्रसूर्यग्रहे स्नानं मलमासे विधीयते॥ (मनु स्मृति)
भाषार्थ - तीर्थश्राद्ध, दर्शश्राद्ध, प्रेतश्राद्ध, सपिण्डीकरण, चन्द्रसूर्यग्रहणीय स्नान अधिकमास में भी करना चाहिये।
न कुर्यादधिके मासि काम्यं कर्म कदाचन। (स्मृत्यन्तर)
भाषार्थ - अधिकमास में फल-प्राप्ति की कामना से किये जानेवाले प्रायः सभी काम वर्जित हैं।
वाप्याराम-तडाग-कूप-भवनारम्भ प्रतिष्ठे व्रतारम्भोत्सर्ग-वधूप्रवेशन-महादानानि सोमाष्टके। गोदानाग्रयण-प्रपा-प्रथमकोपाकर्म वेदव्रतं नीलोद्वाहमथातिपन्न शिशुसंस्कारान् सुरस्थापनम् ॥
दीक्षा-मौञ्जि-विवाह-मुण्डनम पूर्वं देवतीर्थेक्षणं संन्यासाग्निपरिग्रहौ नृपतिसन्दर्शाऽभिषेकौ गमम्। चातुर्मास्य समावृती श्रवणयोर्वेधं परीक्षां त्यजेद् वृद्धत्वास्तशिशुत्व इज्य-सितयोर्न्यूनाधिमासे तथा॥ (मुहूर्त चिंतामणि)
अधिकमास की पौराणिक कथा
पुराणों में अधिक मास के संबंध में एक अत्यंत रोचक एवं दार्शनिक कथा का वर्णन प्राप्त होता है, जो दैत्यराज हिरण्यकश्यप के वध से संबंधित है। इस कथा के माध्यम से यह प्रतिपादित किया गया है कि ईश्वर की व्यवस्था और कालचक्र के समक्ष किसी भी प्रकार का अहंकार स्थायी नहीं रह सकता। पुराणों के अनुसार दैत्यराज हिरण्यकश्यप ने कठोर तपस्या द्वारा ब्रह्मा जी को प्रसन्न किया। उसकी तपस्या से संतुष्ट होकर ब्रह्मा जी ने उसे वरदान मांगने का अवसर प्रदान किया। हिरण्यकश्यप ने अमरता का वरदान चाहा, किंतु सृष्टि के नियमों के अनुसार ब्रह्मा जी किसी को अमरता प्रदान नहीं कर सकते थे। अतः उन्होंने हिरण्यकश्यप से कोई अन्य वर मांगने के लिए कहा।
तब हिरण्यकश्यप ने अत्यंत चतुराई से अनेक शर्तों सहित वरदान मांगा। उसने कहा कि उसकी मृत्यु न किसी मनुष्य द्वारा हो, न किसी स्त्री द्वारा, न किसी पशु, देवता अथवा असुर द्वारा। वह वर्ष के बारह महीनों में किसी भी समय मृत्यु को प्राप्त न हो। उसकी मृत्यु न दिन में हो और न रात में। वह न किसी अस्त्र से मारा जाए और न किसी शस्त्र से। साथ ही, उसका वध न घर के भीतर हो और न घर के बाहर। ब्रह्मा जी ने उसकी इन शर्तों को स्वीकार कर उसे वरदान प्रदान कर दिया। इस वरदान को प्राप्त करने के पश्चात् हिरण्यकश्यप अत्यंत अहंकारी हो गया। उसने स्वयं को ईश्वर घोषित कर दिया तथा समस्त प्रजा को अपनी उपासना करने के लिए बाध्य किया। धर्म और भक्ति का दमन होने लगा। ऐसे समय में भगवान विष्णु ने धर्म की रक्षा तथा भक्त प्रह्लाद के उद्धार हेतु नरसिंह अवतार धारण किया। यह अवतार आधे मनुष्य और आधे सिंह के रूप में था, जिससे हिरण्यकश्यप के वरदान की शर्तें निष्फल हो गईं।
पुराणों में वर्णित है कि भगवान नरसिंह अधिक मास में संध्या समय प्रकट हुए। संध्या न पूर्णतः दिन होती है और न ही रात। उन्होंने हिरण्यकश्यप को राजमहल की देहरी पर पकड़ा, जो न घर के भीतर थी और न बाहर। तत्पश्चात् भगवान ने किसी अस्त्र या शस्त्र का प्रयोग न करके अपने नाखूनों से उसका वध किया। इस प्रकार हिरण्यकश्यप के सभी वरदान निष्प्रभावी सिद्ध हुए और धर्म की पुनः स्थापना हुई। यह कथा अधिक मास की महत्ता को भी प्रतिपादित करती है। सामान्य बारह महीनों से पृथक अधिक मास को भगवान विष्णु का विशेष प्रिय काल माना गया है। इसी कारण इसे “पुरुषोत्तम मास” भी कहा जाता है। धार्मिक दृष्टि से यह मास साधना, भक्ति, दान तथा आत्मचिंतन के लिए अत्यंत पुण्यदायी माना गया है।
धार्मिक दृष्टि से अधिकमास
अधिकमास को पुरुषोत्तम मास भी कहा जाता है। वैष्णव परम्परा में इसका अत्यधिक महत्व है। इस मास में भगवान विष्णु की आराधना, जप, तप, दान, तीर्थस्नान, कथा-श्रवण आदि का विशेष पुण्य माना गया है। धर्मशास्त्रों में विवाह, गृहप्रवेश, यज्ञोपवीत आदि मांगलिक कार्यों को अधिकमास में वर्जित बताया गया है, किन्तु - जप, तप, व्रत, दान, तीर्थयात्रा तथा भगवद्भक्ति आदि इनका विशेष विधान किया गया है।
वैज्ञानिक दृष्टिकोण से महत्व
अधिकमास की व्यवस्था न हो, तो ऋतुओं और मासों में असंतुलन उत्पन्न हो जाएगा। जैसे -
- चैत्र मास - शीतऋतु में आने लगेगा
- दीपावली - ग्रीष्म ऋतु में पड़ सकती है
- होली - वर्षा ऋतु में आने लगेगी।
अतः अधिकमास भारतीय पंचांग को ऋतु-संगत बनाए रखने का वैज्ञानिक साधन है।
सारांश॥ Summary
विश्व के कैलेंडर के इतिहास में केवल भारत में ही महीनों का नामकरण वैज्ञानिक कहा जा सकता है। क्षयमास सामान्यतया ११९ या १९ वर्ष बाद घटित हुआ करता है। जब क्षयमास आता है तब ६-७ मासों के भीतर ही दो अधिक मास आ जाते हैं, जिनमें एक अधिमास क्षयमास से पूर्व और एक क्षयमास के बाद होता है। दो सूर्यसंक्रान्तियों से युक्त शुक्लादि चान्द्रमास को क्षयमास कहते हैं, इसे अंहस्पति वा न्यूनमास की संज्ञा भी दी गई है।[6]
सौर वर्ष और चान्द्रवर्ष में सामञ्जस्य स्थापित करने के लिये हर तीसरे वर्ष पंचाँगों में एक चान्द्रमास की वृद्धि कर दी जाती है। इसी को अधिक मास कहते हैं। सौर वर्ष का मान ३६५ दिन, १५ घटी, २२ पल और ५७ विपल हैं। जबकि चान्द्रवर्ष ३५४ दिन, २२ घडी, १ पल और २३ विपल का होता है। दोनों वर्षमानों में प्रतिवर्ष १० दिन, ५३ घटी, २१॥ पल( औसतन ११ दिन) का अन्तर पडता है। इस अन्तर में समानता लाने के लिये चान्द्रवर्ष १२ मासों के स्थान पर १३ मास का हो जाता है। वास्तव में यह स्थिति स्वयं ही उत्पन्न हो जाती है क्योंकि जिस चान्द्रमास में सूर्य संक्रान्ति नहीं पडती, उसी को अधिकमास की संज्ञा दे दी जाती है।[7]
उद्धरण॥ References
- ↑ श्रीकेदारदत्त जोशी, सिद्धान्त शिरोमणि-वासनाभाष्य सहित (१९६१), काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, वाराणसी (पृ० ८०)।
- ↑ शब्दकल्पद्रुम पृ०३/७१८।
- ↑ श्री शिवनाथ झारखंडी, भारतीय ज्योतिष (१९७५), उत्तर प्रदेश शासन-हिन्दी समिति, लखनऊ (पृ० ५०७)।
- ↑ डॉ० जितेन्द्र कुमारी द्विवेदी, पंचांग का व्यावहारिक जीवन में उपयोग, वर्धमान महावीर खुला विश्वविद्यालय, कोटा (पृ० १२)।
- ↑ श्री नारायण प्रसाद, वेद वाणी, अधिकमास एवं क्षयमास, सन् २००२, हरियाणा- वेदवाणी कार्यालय रेवली, (पृ० १२)। https://drive.google.com/file/d/1qsSgtZwIZs6iMUPpMeDhWFXjvgpa-XMq/view
- ↑ प्रियव्रत-शक्तिधर शर्मा, शास्त्रीय पञ्चांग मीमांसा, सन् १९७९, श्रीमार्त्तण्ड ज्यौतिष कार्यालयः (पृ० १८६)।
- ↑ पं० पन्नालाल ज्योतिषी, ज्योतिष तत्त्व, देवी दयालु ज्योतिषी एण्ड संज होशियारपुर, जालन्धर(पृ० २५)।