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	<title>Dharmawiki - User contributions [en-gb]</title>
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	<updated>2026-04-19T07:56:10Z</updated>
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		<id>https://dharmawiki.org/index.php?title=Vanaparva_Adhyaya_10_(%E0%A4%B5%E0%A4%A8%E0%A4%AA%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%B5%E0%A4%A3%E0%A4%BF_%E0%A4%85%E0%A4%A7%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%AF%E0%A4%83_%E0%A5%A7%E0%A5%A6_)&amp;diff=121419</id>
		<title>Vanaparva Adhyaya 10 (वनपर्वणि अध्यायः १० )</title>
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		<updated>2019-11-30T05:49:28Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;ShraddhaV: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;धृतराष्ट्र उवाच&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
 एवमेतन्महाप्राज्ञ यथा वदसि नो मुने।&lt;br /&gt;
 अहं चैव विजानामि सर्वे चेमे नराधिपाः॥ 3-10-1&lt;br /&gt;
 भवांश्च मन्यते साधु यत्कुरूणां महोदयम्।&lt;br /&gt;
 तदेव विदुरोऽप्याह भीष्मो द्रोणश्च मां मुने॥ 3-10-2&lt;br /&gt;
 यदि त्वहमनुग्राह्यः कौरव्येषु दया यदि।&lt;br /&gt;
 अन्वशाधि दुरात्मानं पुत्रं दुर्योधनं मम॥ 3-10-3&lt;br /&gt;
 [[:Category:Dhrtarashtra seeks advice|Dhrtarashtra seeks advice]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
व्यास उवाच&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
 अयमायाति वै राजन्मैत्रेयो भगवानृषिः।&lt;br /&gt;
 अन्विष्य पाण्डवान्भ्रातॄनिहैत्यस्मद्दिदृक्षया॥ 3-10-4&lt;br /&gt;
 एष दुर्योधनं पुत्रं तव राजन्महानृषिः।&lt;br /&gt;
 अनुशास्ता यथान्यायं शमायास्य कुलस्य च॥ 3-10-5&lt;br /&gt;
 ब्रूयाद्यदेष कौरव्य तत्कार्यमविशङ्कया।&lt;br /&gt;
 अक्रियायां तु कार्यस्य पुत्रं ते शप्स्यते रुषा॥ 3-10-6&lt;br /&gt;
 [[:Category:Sage Maitreya|Sage Maitreya]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वैशम्पायन उवाच&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
 एवमुक्त्वा ययौ व्यासो मैत्रेयः प्रत्यदृश्यत।&lt;br /&gt;
 पूजया प्रतिजग्राह सपुत्रस्तं नराधिपः॥ 3-10-7&lt;br /&gt;
 अर्घ्याद्याभिः क्रियाभिर्वै विश्रान्तं मुनिसत्तमम्।&lt;br /&gt;
 प्रश्रयेणाब्रवीद्राजा धृतराष्ट्रोऽम्बिकासुतः॥ 3-10-8&lt;br /&gt;
 सुखेनागमनं कच्चिद्भगवन्कुरुजाङ्गलान्।&lt;br /&gt;
 कच्चित्कुशलिनो वीरा भ्रातरः पञ्च पाण्डवाः॥ 3-10-9&lt;br /&gt;
 समये स्थातुमिच्छन्ति कच्चिच्च भरतर्षभाः।&lt;br /&gt;
 कच्चित्कुरूणां सौभ्रात्रमव्युच्छिन्नं भविष्यति॥ 3-10-10&lt;br /&gt;
 [[:Category:आतिथ्यम्|आतिथ्यम्]] [[:Category:Hospitality|Hospitality]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मैत्रेय उवाच&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
 तीर्थयात्रामनुक्रामन्प्राप्तोऽस्मि कुरुजाङ्गलान्।&lt;br /&gt;
 यदृच्छया धर्मराजं दृष्टवान्काम्यके वने॥ 3-10-11&lt;br /&gt;
 तं जटाजिनसंवीतं तपोवननिवासिनम्।&lt;br /&gt;
 समाजग्मुर्महात्मानं द्रष्टुं मुनिगणाः प्रभो॥ 3-10-12&lt;br /&gt;
 [[:Category:Pandavas in exile|Pandavas in exile]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
 तत्राश्रौषं महाराज पुत्राणां तव विभ्रमम्।&lt;br /&gt;
 अनयं द्यूतरूपेण महाभयमुपस्थितम्॥ 3-10-13&lt;br /&gt;
 [[:Category:Kaurvas|Kaurvas]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
 ततोऽहं त्वामनुप्राप्तः कौरवाणामवेक्षया।&lt;br /&gt;
 सदा ह्यभ्यधिकः स्नेहः प्रीतिश्च त्वयि मे प्रभो॥ 3-10-14&lt;br /&gt;
 नैतदौपयिकं राजंस्त्वयि भीष्मे च जीवति।&lt;br /&gt;
 दन्योन्येन ते पुत्रा विरुध्यन्ते कथञ्चन॥ 3-10-15&lt;br /&gt;
 मेढीभूतः स्वयं राजन्निग्रहे प्रग्रहे भवान्।&lt;br /&gt;
 किमर्थमनयं घोरमुत्पद्यन्तमुपेक्षसे॥ 3-10-16&lt;br /&gt;
 दस्यूनामिव यद्वृत्तं सभायां कुरुनन्दन।&lt;br /&gt;
 तेन न भ्राजसे राजंस्तापसानां समागमे॥ 3-10-17&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वैशम्पायन उवाच&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
 ततो व्यावृत्य राजानं दुर्योधनममर्षणम्।&lt;br /&gt;
 उवाच श्लक्ष्णया वाचा मैत्रेयो भगवानृषिः॥ 3-10-18&lt;br /&gt;
 मैत्रेय उवाच&lt;br /&gt;
 दुर्योधन महाबाहो निबोध वदतां वर।&lt;br /&gt;
 वचनं मे महाभाग ब्रुवतो यद्धितं तव॥ 3-10-19&lt;br /&gt;
 मा द्रुहः पाण्डवान्राजन्कुरुष्व प्रियमात्मनः।&lt;br /&gt;
 पाण्डवानां कुरूणां च लोकस्य च नरर्षभ॥ 3-10-20&lt;br /&gt;
 [[:Category:Sage Maitreya advices Duryodhana|Sage Maitreya advices Duryodhana]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
 ते हि सर्वे नरव्याघ्राः शूरा विक्रान्तयोधिनः।&lt;br /&gt;
 सर्वे नागायुतप्राणा वज्रसंहनना दृढाः॥ 3-10-21&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
 सत्यव्रतधराः सर्वे सर्वे पुरुषमानिनः।&lt;br /&gt;
 हन्तारो देवशत्रूणां रक्षसां कामरूपिणाम्॥ 3-10-22&lt;br /&gt;
 [[:Category:Pandavas|Pandavas]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
 हिडिम्बबकमुख्यानां किर्मीरस्य च रक्षसः।&lt;br /&gt;
 इतः प्रद्रवतां रात्रौ यः स तेषां महात्मनाम्॥ 3-10-23&lt;br /&gt;
 आवृत्य मार्गं रौद्रात्मा तस्थौ गिरिरिवाचलः।&lt;br /&gt;
 तं भीमः समरश्लाघी बलेन बलिनां वरः॥ 3-10-24&lt;br /&gt;
 जघान पशुमारेण व्याघ्रः क्षुद्रमृगं यथा।&lt;br /&gt;
 पश्य दिग्विजये राजन्यथा भीमेन पातितः॥ 3-10-25&lt;br /&gt;
 जरासन्धो महेष्वासो नागायुतबलो युधि।&lt;br /&gt;
 सम्बन्धी वासुदेवश्च श्यालाः सर्वे च पार्षताः॥ 3-10-26&lt;br /&gt;
 [[:Category:Bheema|Bheema]] [[:Category:Draupadi's sons|Draupadi's sons]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
 कस्तान्युधि समासीत जरामरणवान्नरः।&lt;br /&gt;
 तस्य ते शम एवास्तु पाण्डवैर्भरतर्षभ।&lt;br /&gt;
 [[:Category:Pandavas|Pandavas]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कुरु मे वचनं राजन्मा मन्युवशमन्वगाः॥ 3-10-27&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वैशम्पायन उवाच&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
 एवं तु ब्रुवतस्तस्य मैत्रेयस्य विशाम्पते।&lt;br /&gt;
 ऊरुं गजकराकारं करेणाभिजघान सः॥ 3-10-28&lt;br /&gt;
 दुर्योधनः स्मितं कृत्वा चरणेनोल्लिखन्महीम्।&lt;br /&gt;
 न किञ्चिदुक्त्वा दुर्मेधास्तस्थौ किञ्चिदवाङ्मुखः॥ 3-10-29&lt;br /&gt;
 तमशुश्रूषमाणं तु विलिखन्तं वसुन्धराम्।&lt;br /&gt;
 दृष्ट्वा दुर्योधनं राजन्मैत्रेयं कोप आविशत्॥ 3-10-30&lt;br /&gt;
 स कोपवशमापन्नो मैत्रेयो मुनिसत्तमः।&lt;br /&gt;
 विधिना सम्प्रणुदितः शापायास्य मनो दधे॥ 3-10-31&lt;br /&gt;
 ततः स वार्युपस्पृश्य कोपसंरक्तलोचनः।&lt;br /&gt;
 मैत्रेयो धार्तराष्ट्रं तमशपद्दुष्टचेतसम्॥ 3-10-32&lt;br /&gt;
 [[:Category:Duryodhana offends Sage Maitreya|Duryodhana offends Sage Maitreya]] &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
 यस्मात्त्वं मामनादृत्य नेमां वाचं चिकीर्षसि।&lt;br /&gt;
 तस्मादस्याभिमानस्य सद्यः फलमवाप्नुहि॥ 3-10-33&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
 त्वदभिद्रोहसंयुक्तं युद्धमुत्पत्स्यते महत्।&lt;br /&gt;
 तत्र भीमो गदाघातैस्तवोरुं भेत्स्यते बली॥ 3-10-34&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
 इत्येवमुक्ते वचने धृतराष्ट्रो महीपतिः।&lt;br /&gt;
 प्रसादयामास मुनिं नैतदेवं भवेदिति॥ 3-10-35&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
 मैत्रेय उवाच&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
 शमं यास्यति चेत्पुत्रस्तव राजन्यदा तदा।&lt;br /&gt;
 शापो न भविता तात विपरीते भविष्यति॥ 3-10-36&lt;br /&gt;
 [[:Category:Sage Maitreya curses Duryodhana|Sage Maitreya curses Duryodhana]] &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वैशम्पायन उवाच&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
 विलक्षयंस्तु राजेन्द्रो दुर्योधनपिता तदा।&lt;br /&gt;
 मैत्रेयं प्राह किर्मीरः कथं भीमेन पातितः॥ 3-10-37&lt;br /&gt;
 मैत्रेय उवाच&lt;br /&gt;
 नाहं वक्ष्यामि ते भूयो न ते शुश्रूषते सुतः।&lt;br /&gt;
 एष ते विदुरः सर्वमाख्यास्यति गते मयि॥ 3-10-38&lt;br /&gt;
 वैशम्पायन उवाच&lt;br /&gt;
 इत्येवमुक्त्वा मैत्रेयः प्रातिष्ठत यथाऽऽगतम्।&lt;br /&gt;
 किर्मीरवधसंविग्नो बहिर्दुर्योधनो ययौ॥ 3-10-39&lt;br /&gt;
 [[:Category:Death of Kirmira|Death of Kirmira]] &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
 इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि अरण्यपर्वणि मैत्रेयशापे दशमोऽध्यायः॥ 10 ॥&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>ShraddhaV</name></author>
	</entry>
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		<id>https://dharmawiki.org/index.php?title=Vanaparva_Adhyaya_10_(%E0%A4%B5%E0%A4%A8%E0%A4%AA%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%B5%E0%A4%A3%E0%A4%BF_%E0%A4%85%E0%A4%A7%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%AF%E0%A4%83_%E0%A5%A7%E0%A5%A6_)&amp;diff=121418</id>
		<title>Vanaparva Adhyaya 10 (वनपर्वणि अध्यायः १० )</title>
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		<updated>2019-11-30T05:47:52Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;ShraddhaV: Added tags&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;धृतराष्ट्र उवाच&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
 एवमेतन्महाप्राज्ञ यथा वदसि नो मुने।&lt;br /&gt;
 अहं चैव विजानामि सर्वे चेमे नराधिपाः॥ 3-10-1&lt;br /&gt;
 भवांश्च मन्यते साधु यत्कुरूणां महोदयम्।&lt;br /&gt;
 तदेव विदुरोऽप्याह भीष्मो द्रोणश्च मां मुने॥ 3-10-2&lt;br /&gt;
 यदि त्वहमनुग्राह्यः कौरव्येषु दया यदि।&lt;br /&gt;
 अन्वशाधि दुरात्मानं पुत्रं दुर्योधनं मम॥ 3-10-3&lt;br /&gt;
 [[:Category:Dhrtarashtra seeks advice|Dhrtarashtra seeks advice]]&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
व्यास उवाच&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
 अयमायाति वै राजन्मैत्रेयो भगवानृषिः।&lt;br /&gt;
 अन्विष्य पाण्डवान्भ्रातॄनिहैत्यस्मद्दिदृक्षया॥ 3-10-4&lt;br /&gt;
 एष दुर्योधनं पुत्रं तव राजन्महानृषिः।&lt;br /&gt;
 अनुशास्ता यथान्यायं शमायास्य कुलस्य च॥ 3-10-5&lt;br /&gt;
 ब्रूयाद्यदेष कौरव्य तत्कार्यमविशङ्कया।&lt;br /&gt;
 अक्रियायां तु कार्यस्य पुत्रं ते शप्स्यते रुषा॥ 3-10-6&lt;br /&gt;
 [[:Category:Sage Maitreya|Sage Maitreya]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वैशम्पायन उवाच&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
 एवमुक्त्वा ययौ व्यासो मैत्रेयः प्रत्यदृश्यत।&lt;br /&gt;
 पूजया प्रतिजग्राह सपुत्रस्तं नराधिपः॥ 3-10-7&lt;br /&gt;
 अर्घ्याद्याभिः क्रियाभिर्वै विश्रान्तं मुनिसत्तमम्।&lt;br /&gt;
 प्रश्रयेणाब्रवीद्राजा धृतराष्ट्रोऽम्बिकासुतः॥ 3-10-8&lt;br /&gt;
 सुखेनागमनं कच्चिद्भगवन्कुरुजाङ्गलान्।&lt;br /&gt;
 कच्चित्कुशलिनो वीरा भ्रातरः पञ्च पाण्डवाः॥ 3-10-9&lt;br /&gt;
 समये स्थातुमिच्छन्ति कच्चिच्च भरतर्षभाः।&lt;br /&gt;
 कच्चित्कुरूणां सौभ्रात्रमव्युच्छिन्नं भविष्यति॥ 3-10-10&lt;br /&gt;
 [[:Category:आतिथ्यम्|आतिथ्यम्]] [[:Category:Hospitality|Hospitality]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मैत्रेय उवाच&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
 तीर्थयात्रामनुक्रामन्प्राप्तोऽस्मि कुरुजाङ्गलान्।&lt;br /&gt;
 यदृच्छया धर्मराजं दृष्टवान्काम्यके वने॥ 3-10-11&lt;br /&gt;
 तं जटाजिनसंवीतं तपोवननिवासिनम्।&lt;br /&gt;
 समाजग्मुर्महात्मानं द्रष्टुं मुनिगणाः प्रभो॥ 3-10-12&lt;br /&gt;
 [[:Category:Pandavas in exile|Pandavas in exile]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
 तत्राश्रौषं महाराज पुत्राणां तव विभ्रमम्।&lt;br /&gt;
 अनयं द्यूतरूपेण महाभयमुपस्थितम्॥ 3-10-13&lt;br /&gt;
 [[:Category:Kaurvas|Kaurvas]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
 ततोऽहं त्वामनुप्राप्तः कौरवाणामवेक्षया।&lt;br /&gt;
 सदा ह्यभ्यधिकः स्नेहः प्रीतिश्च त्वयि मे प्रभो॥ 3-10-14&lt;br /&gt;
 नैतदौपयिकं राजंस्त्वयि भीष्मे च जीवति।&lt;br /&gt;
 दन्योन्येन ते पुत्रा विरुध्यन्ते कथञ्चन॥ 3-10-15&lt;br /&gt;
 मेढीभूतः स्वयं राजन्निग्रहे प्रग्रहे भवान्।&lt;br /&gt;
 किमर्थमनयं घोरमुत्पद्यन्तमुपेक्षसे॥ 3-10-16&lt;br /&gt;
 दस्यूनामिव यद्वृत्तं सभायां कुरुनन्दन।&lt;br /&gt;
 तेन न भ्राजसे राजंस्तापसानां समागमे॥ 3-10-17&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वैशम्पायन उवाच&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
 ततो व्यावृत्य राजानं दुर्योधनममर्षणम्।&lt;br /&gt;
 उवाच श्लक्ष्णया वाचा मैत्रेयो भगवानृषिः॥ 3-10-18&lt;br /&gt;
 मैत्रेय उवाच&lt;br /&gt;
 दुर्योधन महाबाहो निबोध वदतां वर।&lt;br /&gt;
 वचनं मे महाभाग ब्रुवतो यद्धितं तव॥ 3-10-19&lt;br /&gt;
 मा द्रुहः पाण्डवान्राजन्कुरुष्व प्रियमात्मनः।&lt;br /&gt;
 पाण्डवानां कुरूणां च लोकस्य च नरर्षभ॥ 3-10-20&lt;br /&gt;
 [[:Category:Sage Maitreya advices Duryodhana|Sage Maitreya advices Duryodhana]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
 ते हि सर्वे नरव्याघ्राः शूरा विक्रान्तयोधिनः।&lt;br /&gt;
 सर्वे नागायुतप्राणा वज्रसंहनना दृढाः॥ 3-10-21&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
 सत्यव्रतधराः सर्वे सर्वे पुरुषमानिनः।&lt;br /&gt;
 हन्तारो देवशत्रूणां रक्षसां कामरूपिणाम्॥ 3-10-22&lt;br /&gt;
 [[:Category:Pandavas|Pandavas]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
 हिडिम्बबकमुख्यानां किर्मीरस्य च रक्षसः।&lt;br /&gt;
 इतः प्रद्रवतां रात्रौ यः स तेषां महात्मनाम्॥ 3-10-23&lt;br /&gt;
 आवृत्य मार्गं रौद्रात्मा तस्थौ गिरिरिवाचलः।&lt;br /&gt;
 तं भीमः समरश्लाघी बलेन बलिनां वरः॥ 3-10-24&lt;br /&gt;
 जघान पशुमारेण व्याघ्रः क्षुद्रमृगं यथा।&lt;br /&gt;
 पश्य दिग्विजये राजन्यथा भीमेन पातितः॥ 3-10-25&lt;br /&gt;
 जरासन्धो महेष्वासो नागायुतबलो युधि।&lt;br /&gt;
 सम्बन्धी वासुदेवश्च श्यालाः सर्वे च पार्षताः॥ 3-10-26&lt;br /&gt;
 [[:Category:Bheema|Bheema]] [[:Category:Draupadi's sons|Draupadi's sons]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
 कस्तान्युधि समासीत जरामरणवान्नरः।&lt;br /&gt;
 तस्य ते शम एवास्तु पाण्डवैर्भरतर्षभ।&lt;br /&gt;
 [[:Category:Pandavas|Pandavas]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कुरु मे वचनं राजन्मा मन्युवशमन्वगाः॥ 3-10-27&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वैशम्पायन उवाच&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
 एवं तु ब्रुवतस्तस्य मैत्रेयस्य विशाम्पते।&lt;br /&gt;
 ऊरुं गजकराकारं करेणाभिजघान सः॥ 3-10-28&lt;br /&gt;
 दुर्योधनः स्मितं कृत्वा चरणेनोल्लिखन्महीम्।&lt;br /&gt;
 न किञ्चिदुक्त्वा दुर्मेधास्तस्थौ किञ्चिदवाङ्मुखः॥ 3-10-29&lt;br /&gt;
 तमशुश्रूषमाणं तु विलिखन्तं वसुन्धराम्।&lt;br /&gt;
 दृष्ट्वा दुर्योधनं राजन्मैत्रेयं कोप आविशत्॥ 3-10-30&lt;br /&gt;
 स कोपवशमापन्नो मैत्रेयो मुनिसत्तमः।&lt;br /&gt;
 विधिना सम्प्रणुदितः शापायास्य मनो दधे॥ 3-10-31&lt;br /&gt;
 ततः स वार्युपस्पृश्य कोपसंरक्तलोचनः।&lt;br /&gt;
 मैत्रेयो धार्तराष्ट्रं तमशपद्दुष्टचेतसम्॥ 3-10-32&lt;br /&gt;
 [[:Category:Duryodhana offends Sage Maitreya|Duryodhana offends Sage Maitreya]] &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
 यस्मात्त्वं मामनादृत्य नेमां वाचं चिकीर्षसि।&lt;br /&gt;
 तस्मादस्याभिमानस्य सद्यः फलमवाप्नुहि॥ 3-10-33&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
 त्वदभिद्रोहसंयुक्तं युद्धमुत्पत्स्यते महत्।&lt;br /&gt;
 तत्र भीमो गदाघातैस्तवोरुं भेत्स्यते बली॥ 3-10-34&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
 इत्येवमुक्ते वचने धृतराष्ट्रो महीपतिः।&lt;br /&gt;
 प्रसादयामास मुनिं नैतदेवं भवेदिति॥ 3-10-35&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
 मैत्रेय उवाच&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
 शमं यास्यति चेत्पुत्रस्तव राजन्यदा तदा।&lt;br /&gt;
 शापो न भविता तात विपरीते भविष्यति॥ 3-10-36&lt;br /&gt;
 [[:Category:Sage Maitreya curses Duryodhana|Sage Maitreya curses Duryodhana]] &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वैशम्पायन उवाच&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
 विलक्षयंस्तु राजेन्द्रो दुर्योधनपिता तदा।&lt;br /&gt;
 मैत्रेयं प्राह किर्मीरः कथं भीमेन पातितः॥ 3-10-37&lt;br /&gt;
 मैत्रेय उवाच&lt;br /&gt;
 नाहं वक्ष्यामि ते भूयो न ते शुश्रूषते सुतः।&lt;br /&gt;
 एष ते विदुरः सर्वमाख्यास्यति गते मयि॥ 3-10-38&lt;br /&gt;
 वैशम्पायन उवाच&lt;br /&gt;
 इत्येवमुक्त्वा मैत्रेयः प्रातिष्ठत यथाऽऽगतम्।&lt;br /&gt;
 किर्मीरवधसंविग्नो बहिर्दुर्योधनो ययौ॥ 3-10-39&lt;br /&gt;
 [[:Category:Death of Kirmira|Death of Kirmira]] &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
 इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि अरण्यपर्वणि मैत्रेयशापे दशमोऽध्यायः॥ 10 ॥&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>ShraddhaV</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://dharmawiki.org/index.php?title=Vanaparva_Adhyaya_10_(%E0%A4%B5%E0%A4%A8%E0%A4%AA%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%B5%E0%A4%A3%E0%A4%BF_%E0%A4%85%E0%A4%A7%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%AF%E0%A4%83_%E0%A5%A7%E0%A5%A6_)&amp;diff=120311</id>
		<title>Vanaparva Adhyaya 10 (वनपर्वणि अध्यायः १० )</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://dharmawiki.org/index.php?title=Vanaparva_Adhyaya_10_(%E0%A4%B5%E0%A4%A8%E0%A4%AA%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%B5%E0%A4%A3%E0%A4%BF_%E0%A4%85%E0%A4%A7%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%AF%E0%A4%83_%E0%A5%A7%E0%A5%A6_)&amp;diff=120311"/>
		<updated>2019-08-22T14:59:09Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;ShraddhaV: Added verses in vanaparva chapter 10&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;धृतराष्ट्र उवाच&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
एवमेतन्महाप्राज्ञ यथा वदसि नो मुने।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अहं चैव विजानामि सर्वे चेमे नराधिपाः॥ 3-10-1&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भवांश्च मन्यते साधु यत्कुरूणां महोदयम्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तदेव विदुरोऽप्याह भीष्मो द्रोणश्च मां मुने॥ 3-10-2&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यदि त्वहमनुग्राह्यः कौरव्येषु दया यदि।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अन्वशाधि दुरात्मानं पुत्रं दुर्योधनं मम॥ 3-10-3&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
व्यास उवाच&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अयमायाति वै राजन्मैत्रेयो भगवानृषिः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अन्विष्य पाण्डवान्भ्रातॄनिहैत्यस्मद्दिदृक्षया॥ 3-10-4&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
एष दुर्योधनं पुत्रं तव राजन्महानृषिः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अनुशास्ता यथान्यायं शमायास्य कुलस्य च॥ 3-10-5&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ब्रूयाद्यदेष कौरव्य तत्कार्यमविशङ्कया।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अक्रियायां तु कार्यस्य पुत्रं ते शप्स्यते रुषा॥ 3-10-6&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वैशम्पायन उवाच&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
एवमुक्त्वा ययौ व्यासो मैत्रेयः प्रत्यदृश्यत।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पूजया प्रतिजग्राह सपुत्रस्तं नराधिपः॥ 3-10-7&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अर्घ्याद्याभिः क्रियाभिर्वै विश्रान्तं मुनिसत्तमम्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
प्रश्रयेणाब्रवीद्राजा धृतराष्ट्रोऽम्बिकासुतः॥ 3-10-8&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सुखेनागमनं कच्चिद्भगवन्कुरुजाङ्गलान्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कच्चित्कुशलिनो वीरा भ्रातरः पञ्च पाण्डवाः॥ 3-10-9&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
समये स्थातुमिच्छन्ति कच्चिच्च भरतर्षभाः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कच्चित्कुरूणां सौभ्रात्रमव्युच्छिन्नं भविष्यति॥ 3-10-10&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मैत्रेय उवाच&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तीर्थयात्रामनुक्रामन्प्राप्तोऽस्मि कुरुजाङ्गलान्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यदृच्छया धर्मराजं दृष्टवान्काम्यके वने॥ 3-10-11&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तं जटाजिनसंवीतं तपोवननिवासिनम्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
समाजग्मुर्महात्मानं द्रष्टुं मुनिगणाः प्रभो॥ 3-10-12&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तत्राश्रौषं महाराज पुत्राणां तव विभ्रमम्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अनयं द्यूतरूपेण महाभयमुपस्थितम्॥ 3-10-13&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ततोऽहं त्वामनुप्राप्तः कौरवाणामवेक्षया।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सदा ह्यभ्यधिकः स्नेहः प्रीतिश्च त्वयि मे प्रभो॥ 3-10-14&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
नैतदौपयिकं राजंस्त्वयि भीष्मे च जीवति।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यदन्योन्येन ते पुत्रा विरुध्यन्ते कथञ्चन॥ 3-10-15&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मेढीभूतः स्वयं राजन्निग्रहे प्रग्रहे भवान्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
किमर्थमनयं घोरमुत्पद्यन्तमुपेक्षसे॥ 3-10-16&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दस्यूनामिव यद्वृत्तं सभायां कुरुनन्दन।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तेन न भ्राजसे राजंस्तापसानां समागमे॥ 3-10-17&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वैशम्पायन उवाच&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ततो व्यावृत्य राजानं दुर्योधनममर्षणम्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उवाच श्लक्ष्णया वाचा मैत्रेयो भगवानृषिः॥ 3-10-18&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मैत्रेय उवाच&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दुर्योधन महाबाहो निबोध वदतां वर।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वचनं मे महाभाग ब्रुवतो यद्धितं तव॥ 3-10-19&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मा द्रुहः पाण्डवान्राजन्कुरुष्व प्रियमात्मनः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पाण्डवानां कुरूणां च लोकस्य च नरर्षभ॥ 3-10-20&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ते हि सर्वे नरव्याघ्राः शूरा विक्रान्तयोधिनः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सर्वे नागायुतप्राणा वज्रसंहनना दृढाः॥ 3-10-21&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सत्यव्रतधराः सर्वे सर्वे पुरुषमानिनः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हन्तारो देवशत्रूणां रक्षसां कामरूपिणाम्॥ 3-10-22&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हिडिम्बबकमुख्यानां किर्मीरस्य च रक्षसः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इतः प्रद्रवतां रात्रौ यः स तेषां महात्मनाम्॥ 3-10-23&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आवृत्य मार्गं रौद्रात्मा तस्थौ गिरिरिवाचलः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तं भीमः समरश्लाघी बलेन बलिनां वरः॥ 3-10-24&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जघान पशुमारेण व्याघ्रः क्षुद्रमृगं यथा।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पश्य दिग्विजये राजन्यथा भीमेन पातितः॥ 3-10-25&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जरासन्धो महेष्वासो नागायुतबलो युधि।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सम्बन्धी वासुदेवश्च श्यालाः सर्वे च पार्षताः॥ 3-10-26&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कस्तान्युधि समासीत जरामरणवान्नरः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तस्य ते शम एवास्तु पाण्डवैर्भरतर्षभ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कुरु मे वचनं राजन्मा मन्युवशमन्वगाः॥ 3-10-27&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वैशम्पायन उवाच&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
एवं तु ब्रुवतस्तस्य मैत्रेयस्य विशाम्पते।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ऊरुं गजकराकारं करेणाभिजघान सः॥ 3-10-28&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दुर्योधनः स्मितं कृत्वा चरणेनोल्लिखन्महीम्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
न किञ्चिदुक्त्वा दुर्मेधास्तस्थौ किञ्चिदवाङ्मुखः॥ 3-10-29&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तमशुश्रूषमाणं तु विलिखन्तं वसुन्धराम्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दृष्ट्वा दुर्योधनं राजन्मैत्रेयं कोप आविशत्॥ 3-10-30&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
स कोपवशमापन्नो मैत्रेयो मुनिसत्तमः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
विधिना सम्प्रणुदितः शापायास्य मनो दधे॥ 3-10-31&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ततः स वार्युपस्पृश्य कोपसंरक्तलोचनः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मैत्रेयो धार्तराष्ट्रं तमशपद्दुष्टचेतसम्॥ 3-10-32&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यस्मात्त्वं मामनादृत्य नेमां वाचं चिकीर्षसि।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तस्मादस्याभिमानस्य सद्यः फलमवाप्नुहि॥ 3-10-33&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
त्वदभिद्रोहसंयुक्तं युद्धमुत्पत्स्यते महत्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तत्र भीमो गदाघातैस्तवोरुं भेत्स्यते बली॥ 3-10-34&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इत्येवमुक्ते वचने धृतराष्ट्रो महीपतिः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
प्रसादयामास मुनिं नैतदेवं भवेदिति॥ 3-10-35&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मैत्रेय उवाच&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शमं यास्यति चेत्पुत्रस्तव राजन्यदा तदा।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शापो न भविता तात विपरीते भविष्यति॥ 3-10-36&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वैशम्पायन उवाच&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
विलक्षयंस्तु राजेन्द्रो दुर्योधनपिता तदा।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मैत्रेयं प्राह किर्मीरः कथं भीमेन पातितः॥ 3-10-37&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मैत्रेय उवाच&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
नाहं वक्ष्यामि ते भूयो न ते शुश्रूषते सुतः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
एष ते विदुरः सर्वमाख्यास्यति गते मयि॥ 3-10-38&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वैशम्पायन उवाच&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इत्येवमुक्त्वा मैत्रेयः प्रातिष्ठत यथाऽऽगतम्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
किर्मीरवधसंविग्नो बहिर्दुर्योधनो ययौ॥ 3-10-39&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि अरण्यपर्वणि मैत्रेयशापे दशमोऽध्यायः॥ 10 ॥&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>ShraddhaV</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://dharmawiki.org/index.php?title=Vanaparva_Adhyaya_9_(%E0%A4%B5%E0%A4%A8%E0%A4%AA%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%B5%E0%A4%A3%E0%A4%BF_%E0%A4%85%E0%A4%A7%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%AF%E0%A4%83_%E0%A5%AF)&amp;diff=120310</id>
		<title>Vanaparva Adhyaya 9 (वनपर्वणि अध्यायः ९)</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://dharmawiki.org/index.php?title=Vanaparva_Adhyaya_9_(%E0%A4%B5%E0%A4%A8%E0%A4%AA%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%B5%E0%A4%A3%E0%A4%BF_%E0%A4%85%E0%A4%A7%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%AF%E0%A4%83_%E0%A5%AF)&amp;diff=120310"/>
		<updated>2019-08-22T14:55:19Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;ShraddhaV: Added tags. last shloka to be tagged&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;धृतराष्ट्र उवाच&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
 भगवन्नाहमप्येतद्रोचये द्यूतसम्भवम्।&lt;br /&gt;
 मन्ये तद्विधिनाऽऽकृष्य कारितोऽस्मीति वै मुने॥ 3-9-1&lt;br /&gt;
 नैतद्रोचयते भीष्मो न द्रोणो विदुरो न च।&lt;br /&gt;
 गान्धारी नेच्छति द्यूतं तत्र मोहात्प्रवर्तितम्॥ 3-9-2&lt;br /&gt;
 [[:Category:Gambling|''Gambling'']] [[:Category:द्युत् क्रिडा|''द्युत् क्रिडा'']]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
 परित्यक्तुं न शक्नोमि दुर्योधनमचेतनम्।&lt;br /&gt;
 पुत्रस्नेहेन भगवञ्जानन्नपि प्रियव्रत॥ 3-9-3&lt;br /&gt;
 [[:Category:Duryodhana|''Duryodhana'']] [[:Category:पुत्र स्नेह​|''पुत्र स्नेह​'']]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
व्यास उवाच&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
 वैचित्रवीर्य नृपते सत्यमाह यथा भवान्।&lt;br /&gt;
 दृढं विद्मः परं पुत्रं परं पुत्रान्न विद्यते॥ 3-9-4&lt;br /&gt;
 इन्द्रोऽप्यश्रुनिपातेन सुरभ्या प्रतिबोधितः।&lt;br /&gt;
 अन्यैः समृद्धैरप्यर्थैर्न सुतान्मन्यते परम्॥ 3-9-5&lt;br /&gt;
 [[:Category:पुत्र स्नेह​|''पुत्र स्नेह​'']]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
 अत्र ते कीर्तयिष्यामि महदाख्यानमुत्तमम्।&lt;br /&gt;
 सुरभ्याश्चैव संवादमिन्द्रस्य च विशाम्पते॥ 3-9-6&lt;br /&gt;
 त्रिविष्टपगता राजन्सुरभी प्रारुदत्किल।&lt;br /&gt;
 गवां माता पुरा तात तामिन्द्रोऽन्वकृपायत॥ 3-9-7&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
 इन्द्र उवाच&lt;br /&gt;
 किमिदं रोदिषि शुभे कच्चित्क्षेमं दिवौकसाम्।&lt;br /&gt;
 मानुषेष्वथ नगे[वा गो]षु नैतदल्पं भविष्यति॥ 3-9-8&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
 सुरभिरुवाच&lt;br /&gt;
 विनिपातो न वः कश्चिद्दृश्यते त्रिदशाधिप।&lt;br /&gt;
 अहं तु पुत्रं शोचामि तेन रोदिमि कौशिक॥ 3-9-9&lt;br /&gt;
 पश्यैनं कर्षकं क्षुद्रं दुर्बलं मम पुत्रकम्।&lt;br /&gt;
 प्रतोदेनाभिनिघ्नन्तं लाङ्गलेन च पीडितम्॥ 3-9-10&lt;br /&gt;
 निषीदमानं सोत्कण्ठं वध्यमानं सुराधिप।&lt;br /&gt;
 कृपाविष्टास्मि देवेन्द्र मनश्चोद्विजते मम।&lt;br /&gt;
 एकस्तत्र बलोपेतो धुरमुद्वहतेऽधिकाम्॥ 3-9-11&lt;br /&gt;
 अपरोऽप्यबलप्राणः कृशो धमनिसंततः।&lt;br /&gt;
 कृच्छ्रादुद्वहते भारं तं वै शोचामि वासव॥ 3-9-12&lt;br /&gt;
 वध्यमानः प्रतोदेन तुद्यमानः पुनः पुनः।&lt;br /&gt;
 नैव शक्नोति तं भारमुद्वोढुं पश्य वासव॥ 3-9-13&lt;br /&gt;
 ततोऽहं तस्य शोकार्ता विरौमि भृशदुःखिता।&lt;br /&gt;
 अश्रूण्यावर्तयन्ती च नेत्राभ्यां करुणायती॥ 3-9-14&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
 शक्र उवाच&lt;br /&gt;
 तव पुत्रसहस्रेषु पीड्यमानेषु शोभने।&lt;br /&gt;
 किं कृपायितवत्यत्र पुत्र एकत्र हन्यति॥ 3-9-15&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
 सुरभिरुवाच&lt;br /&gt;
 यदि पुत्रसहस्राणि सर्वत्र समतैव मे।&lt;br /&gt;
 दीनस्य तु सतः शक्र पुत्रस्याभ्यधिका कृपा॥ 3-9-16&lt;br /&gt;
 [[:Category:इंद्र सुरभि संवाद​|''इंद्र सुरभि संवाद​'']] [[:Category:पुत्र प्रेम |''पुत्र प्रेम ​'']]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
व्यास उवाच&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
 तदिन्द्रः सुरभीवाक्यं निशम्य भृशविस्मितः।&lt;br /&gt;
 जीवितेनापि कौरव्य मेनेऽभ्यधिकमात्मजम्॥ 3-9-17&lt;br /&gt;
 प्रववर्ष च तत्रैव सहसा तोयमुल्बणम्।&lt;br /&gt;
 कर्षकस्याचरन्विघ्नं भगवान्पाकशासनः॥ 3-9-18&lt;br /&gt;
 तद्यथा सुरभिः प्राह समवेतास्तु ते तथा।&lt;br /&gt;
 सुतेषु राजन्सर्वेषु हीनेष्वभ्यधिका कृपा॥ 3-9-19&lt;br /&gt;
 यादृशो मे सुतः पाण्डुस्तादृशो मेऽसि पुत्रक।&lt;br /&gt;
 विदुरश्च महाप्राज्ञः स्नेहादेतद्ब्रवीम्यहम्॥ 3-9-20&lt;br /&gt;
 [[:Category:पुत्र प्रेम |''पुत्र प्रेम ​'']]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
 चिराय तव पुत्राणां शतमेकश्च भारत।&lt;br /&gt;
 पाण्डोः पञ्चैव लक्ष्यन्ते तेऽपि मन्दाः सुदुःखिताः॥ 3-9-21&lt;br /&gt;
 कथं जीवेयुरत्यन्तं कथं वर्धेयुरित्यपि।&lt;br /&gt;
 इति दीनेषु पार्थेषु मनो मे परितप्यते॥ 3-9-22&lt;br /&gt;
 [[:Category:Pandavas |''Pandavas ​'']] &lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
यदि पार्थिव कौरव्याञ्जीवमानानिहेच्छसि।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दुर्योधनस्तव सुतः शमं गच्छतु पाण्डवैः॥ 3-9-23&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि अरण्यपर्वणि सुरभ्युपाख्याने नवमोऽध्यायः॥ 9 ॥&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>ShraddhaV</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://dharmawiki.org/index.php?title=Vanaparva_Adhyaya_9_(%E0%A4%B5%E0%A4%A8%E0%A4%AA%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%B5%E0%A4%A3%E0%A4%BF_%E0%A4%85%E0%A4%A7%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%AF%E0%A4%83_%E0%A5%AF)&amp;diff=120227</id>
		<title>Vanaparva Adhyaya 9 (वनपर्वणि अध्यायः ९)</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://dharmawiki.org/index.php?title=Vanaparva_Adhyaya_9_(%E0%A4%B5%E0%A4%A8%E0%A4%AA%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%B5%E0%A4%A3%E0%A4%BF_%E0%A4%85%E0%A4%A7%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%AF%E0%A4%83_%E0%A5%AF)&amp;diff=120227"/>
		<updated>2019-08-13T02:34:48Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;ShraddhaV: Added shlokas to vanaparva adhyaya 9&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;धृतराष्ट्र उवाच&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भगवन्नाहमप्येतद्रोचये द्यूतसम्भवम्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मन्ये तद्विधिनाऽऽकृष्य कारितोऽस्मीति वै मुने॥ 3-9-1&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
नैतद्रोचयते भीष्मो न द्रोणो विदुरो न च।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
गान्धारी नेच्छति द्यूतं तत्र मोहात्प्रवर्तितम्॥ 3-9-2&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
परित्यक्तुं न शक्नोमि दुर्योधनमचेतनम्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पुत्रस्नेहेन भगवञ्जानन्नपि प्रियव्रत॥ 3-9-3&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
व्यास उवाच&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वैचित्रवीर्य नृपते सत्यमाह यथा भवान्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दृढं विद्मः परं पुत्रं परं पुत्रान्न विद्यते॥ 3-9-4&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इन्द्रोऽप्यश्रुनिपातेन सुरभ्या प्रतिबोधितः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अन्यैः समृद्धैरप्यर्थैर्न सुतान्मन्यते परम्॥ 3-9-5&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अत्र ते कीर्तयिष्यामि महदाख्यानमुत्तमम्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सुरभ्याश्चैव संवादमिन्द्रस्य च विशाम्पते॥ 3-9-6&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
त्रिविष्टपगता राजन्सुरभी प्रारुदत्किल।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
गवां माता पुरा तात तामिन्द्रोऽन्वकृपायत॥ 3-9-7&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इन्द्र उवाच&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
किमिदं रोदिषि शुभे कच्चित्क्षेमं दिवौकसाम्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मानुषेष्वथ नगे[वा गो]षु नैतदल्पं भविष्यति॥ 3-9-8&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सुरभिरुवाच&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
विनिपातो न वः कश्चिद्दृश्यते त्रिदशाधिप।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अहं तु पुत्रं शोचामि तेन रोदिमि कौशिक॥ 3-9-9&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पश्यैनं कर्षकं क्षुद्रं दुर्बलं मम पुत्रकम्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
प्रतोदेनाभिनिघ्नन्तं लाङ्गलेन च पीडितम्॥ 3-9-10&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
निषीदमानं सोत्कण्ठं वध्यमानं सुराधिप।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कृपाविष्टास्मि देवेन्द्र मनश्चोद्विजते मम।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
एकस्तत्र बलोपेतो धुरमुद्वहतेऽधिकाम्॥ 3-9-11&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अपरोऽप्यबलप्राणः कृशो धमनिसंततः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कृच्छ्रादुद्वहते भारं तं वै शोचामि वासव॥ 3-9-12&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वध्यमानः प्रतोदेन तुद्यमानः पुनः पुनः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
नैव शक्नोति तं भारमुद्वोढुं पश्य वासव॥ 3-9-13&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ततोऽहं तस्य शोकार्ता विरौमि भृशदुःखिता।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अश्रूण्यावर्तयन्ती च नेत्राभ्यां करुणायती॥ 3-9-14&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शक्र उवाच&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तव पुत्रसहस्रेषु पीड्यमानेषु शोभने।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
किं कृपायितवत्यत्र पुत्र एकत्र हन्यति॥ 3-9-15&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सुरभिरुवाच&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यदि पुत्रसहस्राणि सर्वत्र समतैव मे।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दीनस्य तु सतः शक्र पुत्रस्याभ्यधिका कृपा॥ 3-9-16&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
व्यास उवाच&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तदिन्द्रः सुरभीवाक्यं निशम्य भृशविस्मितः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जीवितेनापि कौरव्य मेनेऽभ्यधिकमात्मजम्॥ 3-9-17&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
प्रववर्ष च तत्रैव सहसा तोयमुल्बणम्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कर्षकस्याचरन्विघ्नं भगवान्पाकशासनः॥ 3-9-18&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तद्यथा सुरभिः प्राह समवेतास्तु ते तथा।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सुतेषु राजन्सर्वेषु हीनेष्वभ्यधिका कृपा॥ 3-9-19&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यादृशो मे सुतः पाण्डुस्तादृशो मेऽसि पुत्रक।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
विदुरश्च महाप्राज्ञः स्नेहादेतद्ब्रवीम्यहम्॥ 3-9-20&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
चिराय तव पुत्राणां शतमेकश्च भारत।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पाण्डोः पञ्चैव लक्ष्यन्ते तेऽपि मन्दाः सुदुःखिताः॥ 3-9-21&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कथं जीवेयुरत्यन्तं कथं वर्धेयुरित्यपि।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इति दीनेषु पार्थेषु मनो मे परितप्यते॥ 3-9-22&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यदि पार्थिव कौरव्याञ्जीवमानानिहेच्छसि।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दुर्योधनस्तव सुतः शमं गच्छतु पाण्डवैः॥ 3-9-23&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि अरण्यपर्वणि सुरभ्युपाख्याने नवमोऽध्यायः॥ 9 ॥&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>ShraddhaV</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://dharmawiki.org/index.php?title=Vanaparva_Adhyaya_8_(%E0%A4%B5%E0%A4%A8%E0%A4%AA%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%B5%E0%A4%A3%E0%A4%BF_%E0%A4%85%E0%A4%A7%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%AF%E0%A4%83_%E0%A5%AE)&amp;diff=120226</id>
		<title>Vanaparva Adhyaya 8 (वनपर्वणि अध्यायः ८)</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://dharmawiki.org/index.php?title=Vanaparva_Adhyaya_8_(%E0%A4%B5%E0%A4%A8%E0%A4%AA%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%B5%E0%A4%A3%E0%A4%BF_%E0%A4%85%E0%A4%A7%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%AF%E0%A4%83_%E0%A5%AE)&amp;diff=120226"/>
		<updated>2019-08-13T02:32:39Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;ShraddhaV: Added tags&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;व्यास उवाच&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
 धृतराष्ट्र महाप्राज्ञ निबोध वचनं मम।&lt;br /&gt;
 वक्ष्यामि त्वां कौरवाणां सर्वेषां हितमुत्तमम्॥ 3-8-1&lt;br /&gt;
 न मे प्रियं महाबाहो यद्गताः पाण्डवा वनम्।&lt;br /&gt;
 निकृत्या निकृताश्चैव दुर्योधनपुरोगमैः॥ 3-8-2&lt;br /&gt;
 ते स्मरन्तः परिक्लेशान्वर्षे पूर्णे त्रयोदशे।&lt;br /&gt;
 विमोक्ष्यन्ति विषं क्रुद्धाः कौरवेयेषु भारत॥ 3-8-3&lt;br /&gt;
 [[:Category:Maharishi Veda Vyasa advises Dhrtarashatra|''Maharishi Veda Vyasa advises Dhrtarashatra'']]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
 तदयं किं नु पापात्मा तव पुत्र सुमन्दधीः।&lt;br /&gt;
 पाण्डवान्नित्यसंक्रुद्धो राज्यहेतोर्जिघांसति॥ 3-8-4&lt;br /&gt;
 वार्यतां साध्वयं मूढः शमं गच्छतु ते सुतः।&lt;br /&gt;
 वनस्थांस्तानयं हन्तुमिच्छन्प्राणान्विमोक्ष्यति॥ 3-8-5&lt;br /&gt;
 [[:Category:Duryodhana|''Duryodhana'']]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
 यथा हि विदुरः प्राज्ञो यथा भीष्मो यथा वयम्। &lt;br /&gt;
 यथा कृपश्च द्रोणश्च तथा साधुर्भवानपि॥ 3-8-6&lt;br /&gt;
 [[:Category:Saintly people|''Saintly people'']]&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
 विग्रहो हि महाप्राज्ञ स्वजनेन विगर्हितः।&lt;br /&gt;
 अधर्म्यमयशस्यं च मा राजन्प्रतिपद्यताम्॥ 3-8-7&lt;br /&gt;
 समीक्षा यादृशी ह्यस्य पाण्डवान्प्रति भारत।&lt;br /&gt;
 उपेक्ष्यमाणा सा राजन्महान्तमनयं स्पृशेत्॥ 3-8-8&lt;br /&gt;
 [[:Category:Conflict|''Conflict'']]&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
 अथवायं सुमन्दात्मा वनं गच्छतु ते सुतः।&lt;br /&gt;
 पाण्डवैः सहितो राजन्नेह एवासहायवान्॥ 3-8-9&lt;br /&gt;
 ततः संसर्गजः स्नेहः पुत्रस्य तव पाण्डवैः।&lt;br /&gt;
 यदि स्यात्कृतकार्योऽद्य भवेस्त्वं मनुजेश्वर॥ 3-8-10&lt;br /&gt;
 [[:Category:Association|''Association'']]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
 अथवा जायमानस्य यच्छीलमनुजायते।&lt;br /&gt;
 श्रूयते तन्महाराज नामृतस्यापसर्पति॥ 3-8-11&lt;br /&gt;
 कथं वा मन्यते भीष्मो द्रोणोऽथ विदुरोऽपि वा।&lt;br /&gt;
 भवान्वात्र क्षमं कार्यं पुरा वोऽर्थोऽभिवर्धते॥ 3-8-12&lt;br /&gt;
 [[:Category:Svabhava at birth|''Svabhava at birth'']]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि अरण्यपर्वणि व्यासवाक्ये अष्टमोऽध्यायः॥ 8 ॥&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>ShraddhaV</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://dharmawiki.org/index.php?title=Vanaparva_Adhyaya_8_(%E0%A4%B5%E0%A4%A8%E0%A4%AA%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%B5%E0%A4%A3%E0%A4%BF_%E0%A4%85%E0%A4%A7%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%AF%E0%A4%83_%E0%A5%AE)&amp;diff=120225</id>
		<title>Vanaparva Adhyaya 8 (वनपर्वणि अध्यायः ८)</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://dharmawiki.org/index.php?title=Vanaparva_Adhyaya_8_(%E0%A4%B5%E0%A4%A8%E0%A4%AA%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%B5%E0%A4%A3%E0%A4%BF_%E0%A4%85%E0%A4%A7%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%AF%E0%A4%83_%E0%A5%AE)&amp;diff=120225"/>
		<updated>2019-08-13T01:56:09Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;ShraddhaV: Added shlokas of vanaparva adhyaya 8&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;वधृतराष्ट्र महाप्राज्ञ निबोध वचनं मम।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वक्ष्यामि त्वां कौरवाणां सर्वेषां हितमुत्तमम्॥ 3-8-1&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
न मे प्रियं महाबाहो यद्गताः पाण्डवा वनम्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
निकृत्या निकृताश्चैव दुर्योधनपुरोगमैः॥ 3-8-2&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ते स्मरन्तः परिक्लेशान्वर्षे पूर्णे त्रयोदशे।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
विमोक्ष्यन्ति विषं क्रुद्धाः कौरवेयेषु भारत॥ 3-8-3&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तदयं किं नु पापात्मा तव पुत्र सुमन्दधीः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पाण्डवान्नित्यसंक्रुद्धो राज्यहेतोर्जिघांसति॥ 3-8-4&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वार्यतां साध्वयं मूढः शमं गच्छतु ते सुतः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वनस्थांस्तानयं हन्तुमिच्छन्प्राणान्विमोक्ष्यति॥ 3-8-5&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यथा हि विदुरः प्राज्ञो यथा भीष्मो यथा वयम्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यथा कृपश्च द्रोणश्च तथा साधुर्भवानपि॥ 3-8-6&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
विग्रहो हि महाप्राज्ञ स्वजनेन विगर्हितः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अधर्म्यमयशस्यं च मा राजन्प्रतिपद्यताम्॥ 3-8-7&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
समीक्षा यादृशी ह्यस्य पाण्डवान्प्रति भारत।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उपेक्ष्यमाणा सा राजन्महान्तमनयं स्पृशेत्॥ 3-8-8&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अथवायं सुमन्दात्मा वनं गच्छतु ते सुतः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पाण्डवैः सहितो राजन्नेह एवासहायवान्॥ 3-8-9&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ततः संसर्गजः स्नेहः पुत्रस्य तव पाण्डवैः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यदि स्यात्कृतकार्योऽद्य भवेस्त्वं मनुजेश्वर॥ 3-8-10&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अथवा जायमानस्य यच्छीलमनुजायते।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
श्रूयते तन्महाराज नामृतस्यापसर्पति॥ 3-8-11&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कथं वा मन्यते भीष्मो द्रोणोऽथ विदुरोऽपि वा।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भवान्वात्र क्षमं कार्यं पुरा वोऽर्थोऽभिवर्धते॥ 3-8-12&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि अरण्यपर्वणि व्यासवाक्ये अष्टमोऽध्यायः॥ 8 ॥&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>ShraddhaV</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://dharmawiki.org/index.php?title=Vanaparva_Adhyaya_7_(%E0%A4%B5%E0%A4%A8%E0%A4%AA%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%B5%E0%A4%A3%E0%A4%BF_%E0%A4%85%E0%A4%A7%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%AF%E0%A4%83_%E0%A5%AD)&amp;diff=120224</id>
		<title>Vanaparva Adhyaya 7 (वनपर्वणि अध्यायः ७)</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://dharmawiki.org/index.php?title=Vanaparva_Adhyaya_7_(%E0%A4%B5%E0%A4%A8%E0%A4%AA%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%B5%E0%A4%A3%E0%A4%BF_%E0%A4%85%E0%A4%A7%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%AF%E0%A4%83_%E0%A5%AD)&amp;diff=120224"/>
		<updated>2019-08-13T01:42:21Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;ShraddhaV: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;वैशम्पायन उवाच&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
 श्रुत्वा च विदुरं प्राप्तं राज्ञा च परिसान्त्वितम्।&lt;br /&gt;
 धृतराष्ट्रात्मजो राजा पर्यतप्यत दुर्मतिः॥ 3-7-1&lt;br /&gt;
 स सौबलेयमानाय्य कर्णदुःशासनौ तथा।&lt;br /&gt;
 अब्रवीद्वचनं राजा प्रविश्याबुद्धिजं तमः॥ 3-7-2&lt;br /&gt;
 एष प्रत्यागतो मन्त्री धृतराष्ट्रस्य धीमतः।&lt;br /&gt;
 विदुरः पाण्डुपुत्राणां सुहृद्विद्वान्हिते रतः॥ 3-7-3&lt;br /&gt;
 यावदस्य पुनर्बुद्धिं विदुरो नापकर्षति।&lt;br /&gt;
 पाण्डवानयने तावन्मन्त्रयध्वं हितं मम॥ 3-7-4&lt;br /&gt;
 अथ पश्याम्यहं पार्थान्प्राप्तानिह कथञ्चन।&lt;br /&gt;
 पुनः शोषं गमिष्यामि निरम्बुर्निरवग्रहः॥ 3-7-5&lt;br /&gt;
 विषमुद्बन्धनं चैव शस्त्रमग्निप्रवेशनम्।&lt;br /&gt;
 करिष्ये न हि तानृद्धान्पुनर्द्रष्टुमिहोत्सहे॥ 3-7-6&lt;br /&gt;
 [[:Category:Duryodhana's hatred for Pandavas|''Duryodhana's hatred for Pandavas'']]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शकुनिरुवाच&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
 किं बालिशमतिं राजन्नास्थितोऽसि विशाम्पते।&lt;br /&gt;
 गतास्ते समयं कृत्वा नैतदेवं भविष्यति॥ 3-7-7&lt;br /&gt;
 सत्यवाक्यस्थिताः सर्वे पाण्डवा भरतर्षभ।&lt;br /&gt;
 पितुस्ते वचनं तात न ग्रहीष्यन्ति कर्हिचित्॥ 3-7-8&lt;br /&gt;
 [[:Category:प्रतिज्ञा|''प्रतिज्ञा'']]&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
 अथवा ते ग्रहीष्यन्ति पुनरेष्यन्ति वा पुरम्।&lt;br /&gt;
 निरस्य समयं सर्वे पणोऽस्माकं भविष्यति॥ 3-7-9&lt;br /&gt;
 सर्वे भवामो मध्यस्था राज्ञश्छन्दानुवर्तिनः।&lt;br /&gt;
 छिद्रं बहु प्रपश्यन्तः पाण्डवानां सुसंवृताः॥ 3-7-10&lt;br /&gt;
 [[:Category:Vidura's advice to Duryodhana|''Vidura's advice to Duryodhana'']]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दुःशासन उवाच&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
 एवमेतन्महाप्राज्ञ यथा वदसि मातुल।&lt;br /&gt;
 नित्यं हि मे कथयतस्तव बुद्धिर्विरोचते॥ 3-7-11&lt;br /&gt;
 [[:Category:Vidura's advice to Duryodhana|''Vidura's advice to Duryodhana'']]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कर्ण उवाच&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
 काममीक्षामहे सर्वे दुर्योधन तवेप्सितम्।&lt;br /&gt;
 ऐकमत्यं हि नो राजन्सर्वेषामेव लक्षये॥ 3-7-12&lt;br /&gt;
 नागमिष्यन्ति ते धीरा अकृत्वा कालसंविदम्।&lt;br /&gt;
 आगमिष्यन्ति चेन्मोहात्पुनर्द्यूतेन ताञ्जय॥ 3-7-13&lt;br /&gt;
 [[:Category:Karna's advice to Duryodhana|''Karna's advice to Duryodhana'']]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वैशम्पायन उवाच&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
 एवमुक्तस्तु कर्णेन राजा दुर्योधनस्तदा।&lt;br /&gt;
 नातिहृष्टमनाः क्षिप्रमभवत्स पराङ्मुखः॥ 3-7-14&lt;br /&gt;
 उपलभ्य ततः कर्णो विवृत्य नयने शुभे।&lt;br /&gt;
 रोषाद्दुःशासनं चैव सौबलं च तमेव च॥ 3-7-15&lt;br /&gt;
 उवाच परमक्रुद्ध उद्यम्यात्मानमात्मना।&lt;br /&gt;
 अथो मम मतं यत्तु तन्निबोधत भूमिपाः॥ 3-7-16&lt;br /&gt;
 प्रियं सर्वे करिष्यामो राज्ञः किङ्करपाणयः।&lt;br /&gt;
 न चास्य शक्नुमः स्थातुं प्रिये सर्वे ह्यतन्द्रिताः॥ 3-7-17&lt;br /&gt;
 वयं तु शस्त्राण्यादाय रथानास्थाय दंशिताः।&lt;br /&gt;
 गच्छामः सहिता हन्तुं पाण्डवान्वनगोचरान्॥ 3-7-18&lt;br /&gt;
 तेषु सर्वेषु शान्तेषु गतेष्वविदितां गतिम्।&lt;br /&gt;
 निर्विवादा भविष्यन्ति धार्तराष्ट्रास्तथा वयम्॥ 3-7-19&lt;br /&gt;
 यावदेव परिद्यूना यावच्छोकपरायणाः।&lt;br /&gt;
 यावन्मित्रविहीनाश्च तावच्छक्या मतं मम॥ 3-7-20&lt;br /&gt;
 तस्य तद्वचनं श्रुत्वा पूजयन्तः पुनः पुनः।&lt;br /&gt;
 बाढमित्येव ते सर्वे प्रत्यूचुः सूतजं तदा॥ 3-7-21&lt;br /&gt;
 [[:Category:Karna's advice to Duryodhana|''Karna's advice to Duryodhana'']]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
 एवमुक्त्वा सुसंरब्धा रथैः सर्वे पृथक्पृथक्।&lt;br /&gt;
 निर्ययुः पाण्डवान्हन्तुं सहिताः कृतनिश्चयाः॥ 3-7-22&lt;br /&gt;
 तान्प्रस्थितान्परिज्ञाय कृष्णद्वैपायनः प्रभुः।&lt;br /&gt;
 आजगाम विशुद्धात्मा दृष्ट्वा दिव्येन चक्षुषा॥ 3-7-23&lt;br /&gt;
 प्रतिषिध्याथ तान्सर्वान्भगवाँल्लोकपूजितः।&lt;br /&gt;
 प्रज्ञाचक्षुषमासीनमुवाचाभ्येत्य सत्वरम्॥ 3-7-24&lt;br /&gt;
 [[:Category:Maharishi Veda Vyasa|''Maharishi Veda Vyasa'']]&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि अरण्यपर्वणि व्यासागमने सप्तमोऽध्यायः॥ 7 ॥&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>ShraddhaV</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://dharmawiki.org/index.php?title=Vanaparva_Adhyaya_7_(%E0%A4%B5%E0%A4%A8%E0%A4%AA%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%B5%E0%A4%A3%E0%A4%BF_%E0%A4%85%E0%A4%A7%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%AF%E0%A4%83_%E0%A5%AD)&amp;diff=120223</id>
		<title>Vanaparva Adhyaya 7 (वनपर्वणि अध्यायः ७)</title>
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		<updated>2019-08-13T01:41:49Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;ShraddhaV: Added tags&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;वैशम्पायन उवाच&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
 श्रुत्वा च विदुरं प्राप्तं राज्ञा च परिसान्त्वितम्।&lt;br /&gt;
 धृतराष्ट्रात्मजो राजा पर्यतप्यत दुर्मतिः॥ 3-7-1&lt;br /&gt;
 स सौबलेयमानाय्य कर्णदुःशासनौ तथा।&lt;br /&gt;
 अब्रवीद्वचनं राजा प्रविश्याबुद्धिजं तमः॥ 3-7-2&lt;br /&gt;
 एष प्रत्यागतो मन्त्री धृतराष्ट्रस्य धीमतः।&lt;br /&gt;
 विदुरः पाण्डुपुत्राणां सुहृद्विद्वान्हिते रतः॥ 3-7-3&lt;br /&gt;
 यावदस्य पुनर्बुद्धिं विदुरो नापकर्षति।&lt;br /&gt;
 पाण्डवानयने तावन्मन्त्रयध्वं हितं मम॥ 3-7-4&lt;br /&gt;
 अथ पश्याम्यहं पार्थान्प्राप्तानिह कथञ्चन।&lt;br /&gt;
 पुनः शोषं गमिष्यामि निरम्बुर्निरवग्रहः॥ 3-7-5&lt;br /&gt;
 विषमुद्बन्धनं चैव शस्त्रमग्निप्रवेशनम्।&lt;br /&gt;
 करिष्ये न हि तानृद्धान्पुनर्द्रष्टुमिहोत्सहे॥ 3-7-6&lt;br /&gt;
 [[:Category:Duryodhana's hatred for Pandavas|''Duryodhana's hatred for Pandavas'']]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शकुनिरुवाच&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
 किं बालिशमतिं राजन्नास्थितोऽसि विशाम्पते।&lt;br /&gt;
 गतास्ते समयं कृत्वा नैतदेवं भविष्यति॥ 3-7-7&lt;br /&gt;
 सत्यवाक्यस्थिताः सर्वे पाण्डवा भरतर्षभ।&lt;br /&gt;
 पितुस्ते वचनं तात न ग्रहीष्यन्ति कर्हिचित्॥ 3-7-8&lt;br /&gt;
 [[:Category:प्रतिज्ञा|''प्रतिज्ञा'']]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
 अथवा ते ग्रहीष्यन्ति पुनरेष्यन्ति वा पुरम्।&lt;br /&gt;
 निरस्य समयं सर्वे पणोऽस्माकं भविष्यति॥ 3-7-9&lt;br /&gt;
 सर्वे भवामो मध्यस्था राज्ञश्छन्दानुवर्तिनः।&lt;br /&gt;
 छिद्रं बहु प्रपश्यन्तः पाण्डवानां सुसंवृताः॥ 3-7-10&lt;br /&gt;
 [[:Category:Vidura's advice to Duryodhana|''Vidura's advice to Duryodhana'']]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दुःशासन उवाच&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
 एवमेतन्महाप्राज्ञ यथा वदसि मातुल।&lt;br /&gt;
 नित्यं हि मे कथयतस्तव बुद्धिर्विरोचते॥ 3-7-11&lt;br /&gt;
 [[:Category:Vidura's advice to Duryodhana|''Vidura's advice to Duryodhana'']]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कर्ण उवाच&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
 काममीक्षामहे सर्वे दुर्योधन तवेप्सितम्।&lt;br /&gt;
 ऐकमत्यं हि नो राजन्सर्वेषामेव लक्षये॥ 3-7-12&lt;br /&gt;
 नागमिष्यन्ति ते धीरा अकृत्वा कालसंविदम्।&lt;br /&gt;
 आगमिष्यन्ति चेन्मोहात्पुनर्द्यूतेन ताञ्जय॥ 3-7-13&lt;br /&gt;
 [[:Category:Karna's advice to Duryodhana|''Karna's advice to Duryodhana'']]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वैशम्पायन उवाच&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
 एवमुक्तस्तु कर्णेन राजा दुर्योधनस्तदा।&lt;br /&gt;
 नातिहृष्टमनाः क्षिप्रमभवत्स पराङ्मुखः॥ 3-7-14&lt;br /&gt;
 उपलभ्य ततः कर्णो विवृत्य नयने शुभे।&lt;br /&gt;
 रोषाद्दुःशासनं चैव सौबलं च तमेव च॥ 3-7-15&lt;br /&gt;
 उवाच परमक्रुद्ध उद्यम्यात्मानमात्मना।&lt;br /&gt;
 अथो मम मतं यत्तु तन्निबोधत भूमिपाः॥ 3-7-16&lt;br /&gt;
 प्रियं सर्वे करिष्यामो राज्ञः किङ्करपाणयः।&lt;br /&gt;
 न चास्य शक्नुमः स्थातुं प्रिये सर्वे ह्यतन्द्रिताः॥ 3-7-17&lt;br /&gt;
 वयं तु शस्त्राण्यादाय रथानास्थाय दंशिताः।&lt;br /&gt;
 गच्छामः सहिता हन्तुं पाण्डवान्वनगोचरान्॥ 3-7-18&lt;br /&gt;
 तेषु सर्वेषु शान्तेषु गतेष्वविदितां गतिम्।&lt;br /&gt;
 निर्विवादा भविष्यन्ति धार्तराष्ट्रास्तथा वयम्॥ 3-7-19&lt;br /&gt;
 यावदेव परिद्यूना यावच्छोकपरायणाः।&lt;br /&gt;
 यावन्मित्रविहीनाश्च तावच्छक्या मतं मम॥ 3-7-20&lt;br /&gt;
 तस्य तद्वचनं श्रुत्वा पूजयन्तः पुनः पुनः।&lt;br /&gt;
 बाढमित्येव ते सर्वे प्रत्यूचुः सूतजं तदा॥ 3-7-21&lt;br /&gt;
 [[:Category:Karna's advice to Duryodhana|''Karna's advice to Duryodhana'']]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
 एवमुक्त्वा सुसंरब्धा रथैः सर्वे पृथक्पृथक्।&lt;br /&gt;
 निर्ययुः पाण्डवान्हन्तुं सहिताः कृतनिश्चयाः॥ 3-7-22&lt;br /&gt;
 तान्प्रस्थितान्परिज्ञाय कृष्णद्वैपायनः प्रभुः।&lt;br /&gt;
 आजगाम विशुद्धात्मा दृष्ट्वा दिव्येन चक्षुषा॥ 3-7-23&lt;br /&gt;
 प्रतिषिध्याथ तान्सर्वान्भगवाँल्लोकपूजितः।&lt;br /&gt;
 प्रज्ञाचक्षुषमासीनमुवाचाभ्येत्य सत्वरम्॥ 3-7-24&lt;br /&gt;
 [[:Category:Maharishi Veda Vyasa|''Maharishi Veda Vyasa'']]&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि अरण्यपर्वणि व्यासागमने सप्तमोऽध्यायः॥ 7 ॥&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>ShraddhaV</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://dharmawiki.org/index.php?title=Vanaparva_Adhyaya_7_(%E0%A4%B5%E0%A4%A8%E0%A4%AA%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%B5%E0%A4%A3%E0%A4%BF_%E0%A4%85%E0%A4%A7%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%AF%E0%A4%83_%E0%A5%AD)&amp;diff=120164</id>
		<title>Vanaparva Adhyaya 7 (वनपर्वणि अध्यायः ७)</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://dharmawiki.org/index.php?title=Vanaparva_Adhyaya_7_(%E0%A4%B5%E0%A4%A8%E0%A4%AA%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%B5%E0%A4%A3%E0%A4%BF_%E0%A4%85%E0%A4%A7%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%AF%E0%A4%83_%E0%A5%AD)&amp;diff=120164"/>
		<updated>2019-08-04T03:23:23Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;ShraddhaV: Added tags&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;वैशम्पायन उवाच&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
 श्रुत्वा च विदुरं प्राप्तं राज्ञा च परिसान्त्वितम्।&lt;br /&gt;
 धृतराष्ट्रात्मजो राजा पर्यतप्यत दुर्मतिः॥ 3-7-1&lt;br /&gt;
 स सौबलेयमानाय्य कर्णदुःशासनौ तथा।&lt;br /&gt;
 अब्रवीद्वचनं राजा प्रविश्याबुद्धिजं तमः॥ 3-7-2&lt;br /&gt;
 एष प्रत्यागतो मन्त्री धृतराष्ट्रस्य धीमतः।&lt;br /&gt;
 विदुरः पाण्डुपुत्राणां सुहृद्विद्वान्हिते रतः॥ 3-7-3&lt;br /&gt;
 यावदस्य पुनर्बुद्धिं विदुरो नापकर्षति।&lt;br /&gt;
 पाण्डवानयने तावन्मन्त्रयध्वं हितं मम॥ 3-7-4&lt;br /&gt;
 अथ पश्याम्यहं पार्थान्प्राप्तानिह कथञ्चन।&lt;br /&gt;
 पुनः शोषं गमिष्यामि निरम्बुर्निरवग्रहः॥ 3-7-5&lt;br /&gt;
 विषमुद्बन्धनं चैव शस्त्रमग्निप्रवेशनम्।&lt;br /&gt;
 करिष्ये न हि तानृद्धान्पुनर्द्रष्टुमिहोत्सहे॥ 3-7-6&lt;br /&gt;
 [[:Category:Duryodhana's hatred for Pandavas|''Duryodhana's hatred for Pandavas'']]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शकुनिरुवाच&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
 किं बालिशमतिं राजन्नास्थितोऽसि विशाम्पते।&lt;br /&gt;
 गतास्ते समयं कृत्वा नैतदेवं भविष्यति॥ 3-7-7&lt;br /&gt;
 सत्यवाक्यस्थिताः सर्वे पाण्डवा भरतर्षभ।&lt;br /&gt;
 पितुस्ते वचनं तात न ग्रहीष्यन्ति कर्हिचित्॥ 3-7-8&lt;br /&gt;
 [[:Category:प्रतिज्ञा|''प्रतिज्ञा'']]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
 अथवा ते ग्रहीष्यन्ति पुनरेष्यन्ति वा पुरम्।&lt;br /&gt;
 निरस्य समयं सर्वे पणोऽस्माकं भविष्यति॥ 3-7-9&lt;br /&gt;
 सर्वे भवामो मध्यस्था राज्ञश्छन्दानुवर्तिनः।&lt;br /&gt;
 छिद्रं बहु प्रपश्यन्तः पाण्डवानां सुसंवृताः॥ 3-7-10&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दुःशासन उवाच&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
 एवमेतन्महाप्राज्ञ यथा वदसि मातुल।&lt;br /&gt;
 नित्यं हि मे कथयतस्तव बुद्धिर्विरोचते॥ 3-7-11&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कर्ण उवाच&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
काममीक्षामहे सर्वे दुर्योधन तवेप्सितम्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ऐकमत्यं हि नो राजन्सर्वेषामेव लक्षये॥ 3-7-12&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
नागमिष्यन्ति ते धीरा अकृत्वा कालसंविदम्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आगमिष्यन्ति चेन्मोहात्पुनर्द्यूतेन ताञ्जय॥ 3-7-13&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वैशम्पायन उवाच&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
एवमुक्तस्तु कर्णेन राजा दुर्योधनस्तदा।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
नातिहृष्टमनाः क्षिप्रमभवत्स पराङ्मुखः॥ 3-7-14&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उपलभ्य ततः कर्णो विवृत्य नयने शुभे।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
रोषाद्दुःशासनं चैव सौबलं च तमेव च॥ 3-7-15&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उवाच परमक्रुद्ध उद्यम्यात्मानमात्मना।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अथो मम मतं यत्तु तन्निबोधत भूमिपाः॥ 3-7-16&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
प्रियं सर्वे करिष्यामो राज्ञः किङ्करपाणयः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
न चास्य शक्नुमः स्थातुं प्रिये सर्वे ह्यतन्द्रिताः॥ 3-7-17&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वयं तु शस्त्राण्यादाय रथानास्थाय दंशिताः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
गच्छामः सहिता हन्तुं पाण्डवान्वनगोचरान्॥ 3-7-18&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तेषु सर्वेषु शान्तेषु गतेष्वविदितां गतिम्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
निर्विवादा भविष्यन्ति धार्तराष्ट्रास्तथा वयम्॥ 3-7-19&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यावदेव परिद्यूना यावच्छोकपरायणाः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यावन्मित्रविहीनाश्च तावच्छक्या मतं मम॥ 3-7-20&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तस्य तद्वचनं श्रुत्वा पूजयन्तः पुनः पुनः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बाढमित्येव ते सर्वे प्रत्यूचुः सूतजं तदा॥ 3-7-21&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
@एतत्कृत्यतमं राज्ञः कौरवस्य महात्मनः॥@&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
एवमुक्त्वा सुसंरब्धा रथैः सर्वे पृथक्पृथक्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
निर्ययुः पाण्डवान्हन्तुं सहिताः कृतनिश्चयाः॥ 3-7-22&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तान्प्रस्थितान्परिज्ञाय कृष्णद्वैपायनः प्रभुः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आजगाम विशुद्धात्मा दृष्ट्वा दिव्येन चक्षुषा॥ 3-7-23&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
प्रतिषिध्याथ तान्सर्वान्भगवाँल्लोकपूजितः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
प्रज्ञाचक्षुषमासीनमुवाचाभ्येत्य सत्वरम्॥ 3-7-24&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि अरण्यपर्वणि व्यासागमने सप्तमोऽध्यायः॥ 7 ॥&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>ShraddhaV</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://dharmawiki.org/index.php?title=Vanaparva_Adhyaya_7_(%E0%A4%B5%E0%A4%A8%E0%A4%AA%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%B5%E0%A4%A3%E0%A4%BF_%E0%A4%85%E0%A4%A7%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%AF%E0%A4%83_%E0%A5%AD)&amp;diff=120158</id>
		<title>Vanaparva Adhyaya 7 (वनपर्वणि अध्यायः ७)</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://dharmawiki.org/index.php?title=Vanaparva_Adhyaya_7_(%E0%A4%B5%E0%A4%A8%E0%A4%AA%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%B5%E0%A4%A3%E0%A4%BF_%E0%A4%85%E0%A4%A7%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%AF%E0%A4%83_%E0%A5%AD)&amp;diff=120158"/>
		<updated>2019-08-03T14:19:47Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;ShraddhaV: Added vanaparva adhyaya 7 shlokas&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;वैशम्पायन उवाच&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
श्रुत्वा च विदुरं प्राप्तं राज्ञा च परिसान्त्वितम्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
धृतराष्ट्रात्मजो राजा पर्यतप्यत दुर्मतिः॥ 3-7-1&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
स सौबलेयमानाय्य कर्णदुःशासनौ तथा।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अब्रवीद्वचनं राजा प्रविश्याबुद्धिजं तमः॥ 3-7-2&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
एष प्रत्यागतो मन्त्री धृतराष्ट्रस्य धीमतः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
विदुरः पाण्डुपुत्राणां सुहृद्विद्वान्हिते रतः॥ 3-7-3&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यावदस्य पुनर्बुद्धिं विदुरो नापकर्षति।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पाण्डवानयने तावन्मन्त्रयध्वं हितं मम॥ 3-7-4&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अथ पश्याम्यहं पार्थान्प्राप्तानिह कथञ्चन।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पुनः शोषं गमिष्यामि निरम्बुर्निरवग्रहः॥ 3-7-5&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
विषमुद्बन्धनं चैव शस्त्रमग्निप्रवेशनम्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
करिष्ये न हि तानृद्धान्पुनर्द्रष्टुमिहोत्सहे॥ 3-7-6&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शकुनिरुवाच&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
किं बालिशमतिं राजन्नास्थितोऽसि विशाम्पते।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
गतास्ते समयं कृत्वा नैतदेवं भविष्यति॥ 3-7-7&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सत्यवाक्यस्थिताः सर्वे पाण्डवा भरतर्षभ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पितुस्ते वचनं तात न ग्रहीष्यन्ति कर्हिचित्॥ 3-7-8&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अथवा ते ग्रहीष्यन्ति पुनरेष्यन्ति वा पुरम्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
निरस्य समयं सर्वे पणोऽस्माकं भविष्यति॥ 3-7-9&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सर्वे भवामो मध्यस्था राज्ञश्छन्दानुवर्तिनः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
छिद्रं बहु प्रपश्यन्तः पाण्डवानां सुसंवृताः॥ 3-7-10&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दुःशासन उवाच&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
एवमेतन्महाप्राज्ञ यथा वदसि मातुल।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
नित्यं हि मे कथयतस्तव बुद्धिर्विरोचते॥ 3-7-11&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
@तथा तद्भविता राजन्नान्यथा तद्भविष्यति॥@&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कर्ण उवाच&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
काममीक्षामहे सर्वे दुर्योधन तवेप्सितम्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ऐकमत्यं हि नो राजन्सर्वेषामेव लक्षये॥ 3-7-12&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
नागमिष्यन्ति ते धीरा अकृत्वा कालसंविदम्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आगमिष्यन्ति चेन्मोहात्पुनर्द्यूतेन ताञ्जय॥ 3-7-13&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वैशम्पायन उवाच&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
एवमुक्तस्तु कर्णेन राजा दुर्योधनस्तदा।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
नातिहृष्टमनाः क्षिप्रमभवत्स पराङ्मुखः॥ 3-7-14&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उपलभ्य ततः कर्णो विवृत्य नयने शुभे।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
रोषाद्दुःशासनं चैव सौबलं च तमेव च॥ 3-7-15&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उवाच परमक्रुद्ध उद्यम्यात्मानमात्मना।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अथो मम मतं यत्तु तन्निबोधत भूमिपाः॥ 3-7-16&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
प्रियं सर्वे करिष्यामो राज्ञः किङ्करपाणयः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
न चास्य शक्नुमः स्थातुं प्रिये सर्वे ह्यतन्द्रिताः॥ 3-7-17&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वयं तु शस्त्राण्यादाय रथानास्थाय दंशिताः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
गच्छामः सहिता हन्तुं पाण्डवान्वनगोचरान्॥ 3-7-18&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तेषु सर्वेषु शान्तेषु गतेष्वविदितां गतिम्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
निर्विवादा भविष्यन्ति धार्तराष्ट्रास्तथा वयम्॥ 3-7-19&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यावदेव परिद्यूना यावच्छोकपरायणाः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यावन्मित्रविहीनाश्च तावच्छक्या मतं मम॥ 3-7-20&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तस्य तद्वचनं श्रुत्वा पूजयन्तः पुनः पुनः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बाढमित्येव ते सर्वे प्रत्यूचुः सूतजं तदा॥ 3-7-21&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
@एतत्कृत्यतमं राज्ञः कौरवस्य महात्मनः॥@&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
एवमुक्त्वा सुसंरब्धा रथैः सर्वे पृथक्पृथक्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
निर्ययुः पाण्डवान्हन्तुं सहिताः कृतनिश्चयाः॥ 3-7-22&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तान्प्रस्थितान्परिज्ञाय कृष्णद्वैपायनः प्रभुः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आजगाम विशुद्धात्मा दृष्ट्वा दिव्येन चक्षुषा॥ 3-7-23&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
प्रतिषिध्याथ तान्सर्वान्भगवाँल्लोकपूजितः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
प्रज्ञाचक्षुषमासीनमुवाचाभ्येत्य सत्वरम्॥ 3-7-24&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि अरण्यपर्वणि व्यासागमने सप्तमोऽध्यायः॥ 7 ॥&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>ShraddhaV</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://dharmawiki.org/index.php?title=Vanaparva_Adhyaya_6_(%E0%A4%B5%E0%A4%A8%E0%A4%AA%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%B5%E0%A4%A3%E0%A4%BF_%E0%A4%85%E0%A4%A7%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%AF%E0%A4%83_%E0%A5%AC)&amp;diff=120155</id>
		<title>Vanaparva Adhyaya 6 (वनपर्वणि अध्यायः ६)</title>
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		<updated>2019-08-03T13:09:26Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;ShraddhaV: Added tags to shlokas&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt; गते तु विदुरे राजन्नाश्रमं पाण्डवान्प्रति।&lt;br /&gt;
 धृतराष्ट्रो महाप्राज्ञः पर्यतप्यत भारत॥ 3-6-1&lt;br /&gt;
 विदुरस्य प्रभावं च सन्धिविग्रहकारितम्।&lt;br /&gt;
 विवृद्धिं च परां मत्वा पाण्डवानां भविष्यति॥ 3-6-2&lt;br /&gt;
 स सभाद्वारमागम्य विदुरस्मारमोहितः।&lt;br /&gt;
 समक्षं पार्थिवेन्द्राणां पपाताविष्टचेतनः॥ 3-6-3&lt;br /&gt;
 स तु लब्ध्वा पुनः संज्ञां समुत्थाय महीतलात्।&lt;br /&gt;
 समीपोपस्थितं राजा सञ्जयं वाक्यमब्रवीत्॥ 3-6-4&lt;br /&gt;
 भ्राता मम सुहृच्चैव साक्षाद्धर्म इवापरः।&lt;br /&gt;
 तस्य स्मृत्याद्य सुभृशं हृदयं दीर्यतीव मे॥ 3-6-5&lt;br /&gt;
 तमानयस्व धर्मज्ञं मम भ्रातरमाशु वै।&lt;br /&gt;
 इति ब्रुवन्स नृपतिः कृपणं पर्यदेवयत्॥ 3-6-6&lt;br /&gt;
 पश्चात्तापाभिसन्तप्तो विदुरस्मारमोहितः।&lt;br /&gt;
 भ्रातृस्नेहादिदं राजा सञ्जयं वाक्यमब्रवीत्॥ 3-6-7&lt;br /&gt;
 गच्छ सञ्जय जानीहि भ्रातरं विदुरं मम।&lt;br /&gt;
 यदि जीवति रोषेण मया पापेन निर्धुतः॥ 3-6-8&lt;br /&gt;
 न हि तेन मम भ्रात्रा सुसूक्ष्ममपि किञ्चन।&lt;br /&gt;
 व्यलीकं कृतपूर्वं वै प्राज्ञेनामितबुद्धिना॥ 3-6-9&lt;br /&gt;
 स व्यलीकं परं प्राप्तो मत्तः परमबुद्धिमान्।&lt;br /&gt;
 त्यक्ष्यामि जीवितं प्राज्ञ तं गच्छानय सञ्जय॥ 3-6-10&lt;br /&gt;
  [[:Category:Dhrtarashtra and Vidura|''Dhrtarashtra and Vidura'']] &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
 तस्य तद्वचनं श्रुत्वा राज्ञस्तमनुमान्य च।&lt;br /&gt;
 सञ्जयो बाढमित्युक्त्वा प्राद्रवत्काम्यकं प्रति॥ 3-6-11&lt;br /&gt;
 सोऽचिरेण समासाद्य तद्वनं यत्र पाण्डवाः।&lt;br /&gt;
 रौरवाजिनसंवीतं ददर्शाथ युधिष्ठिरम्॥ 3-6-12&lt;br /&gt;
 विदुरेण सहासीनं ब्राह्मणैश्च सहस्रशः।&lt;br /&gt;
 भ्रातृभिश्चाभिसंगुप्तं देवैरिव पुरन्दरम्॥ 3-6-13&lt;br /&gt;
 युधिष्ठिरमुपागम्य पूजयामास सञ्जयः।&lt;br /&gt;
 भीमार्जुनयमाश्चापि तद्युक्तं प्रतिपेदिरे॥ 3-6-14&lt;br /&gt;
 राज्ञा पृष्टः स कुशलं सुखासीनश्च सञ्जयः।&lt;br /&gt;
 शशंसागमने हेतुमिदं चैवाब्रवीद्वचः॥ 3-6-15&lt;br /&gt;
 [[:Category:Sanjaya goes to Kamyavana|''Sanjaya goes to Kamyavana'']]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सञ्जय उवाच&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
 राजा स्मरति ते क्षत्तर्धृतराष्ट्रोऽम्बिकासुतः।&lt;br /&gt;
 तं पश्य गत्वा त्वं क्षिप्रं सञ्जीवय च पार्थिवम्॥ 3-6-16&lt;br /&gt;
 सोऽनुमान्य नरश्रेष्ठान्पाण्डवान्कुरुनन्दनान्।&lt;br /&gt;
 नियोगाद्राजसिंहस्य गन्तुमर्हसि सत्तम॥ 3-6-17&lt;br /&gt;
 [[:Category:Vidura|''Vidura'']]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वैशम्पायन उवाच&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
 एवमुक्तस्तु विदुरो धीमान्स्वजनवत्सलः[वल्लभः]।&lt;br /&gt;
 युधिष्ठिरस्यानुमते पुनरायाद्गजाह्वयम्॥ 3-6-18&lt;br /&gt;
 तमब्रवीन्महातेजा धृतराष्ट्रोऽम्बिकासुतः।&lt;br /&gt;
 दिष्ट्या प्राप्तोऽसि धर्मज्ञ दिष्ट्या स्मरसि मेऽनघ॥ 3-6-19&lt;br /&gt;
 अद्य रात्रौ दिवा चाहं त्वत्कृते भरतर्षभ।&lt;br /&gt;
 प्रजागरे प्रपश्यामि विचित्रं देहमात्मनः॥ 3-6-20&lt;br /&gt;
 सोऽङ्कमानीय विदुरं मूर्धन्याघ्राय चैव ह।&lt;br /&gt;
 क्षम्यतामिति चोवाच यदुक्तोऽसि मयानघ॥ 3-6-21&lt;br /&gt;
 [[:Category:Dhrtarashtra and Vidura|''Dhrtarashtra and Vidura'']] &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
विदुर उवाच&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
 क्षान्तमेव मया राजन्गुरुर्मे परमो भवान्।&lt;br /&gt;
 एषोऽहमागतः शीघ्रं त्वद्दर्शनपरायणः॥ 3-6-22&lt;br /&gt;
 भवन्ति हि नरव्याघ्र पुरुषा धर्मचेतसः।&lt;br /&gt;
 दीनाभिपातिनो राजन्नात्र कार्या विचारणा॥ 3-6-23&lt;br /&gt;
 पाण्डोः सुता यादृशा मे तादृशास्तव भारत।&lt;br /&gt;
 दीना इतीव मे बुद्धिरभिपन्नाद्य तान्प्रति॥ 3-6-24&lt;br /&gt;
 [[:Category:Dhrtarashtra and Vidura|''Dhrtarashtra and Vidura'']] &lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
वैशम्पायन उवाच&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
 अन्योन्यमनुनीयैवं भ्रातरौ द्वौ महाद्युती।&lt;br /&gt;
 विदुरो धृतराष्ट्रश्च लेभाते परमां मुदम्॥ 3-6-25&lt;br /&gt;
 [[:Category:Dhrtarashtra and Vidura|''Dhrtarashtra and Vidura'']] &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि अरण्यपर्वणि विदुरप्रत्यागमने षष्ठोऽध्यायः॥ 6 ॥&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>ShraddhaV</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://dharmawiki.org/index.php?title=Vanaparva_Adhyaya_6_(%E0%A4%B5%E0%A4%A8%E0%A4%AA%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%B5%E0%A4%A3%E0%A4%BF_%E0%A4%85%E0%A4%A7%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%AF%E0%A4%83_%E0%A5%AC)&amp;diff=120154</id>
		<title>Vanaparva Adhyaya 6 (वनपर्वणि अध्यायः ६)</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://dharmawiki.org/index.php?title=Vanaparva_Adhyaya_6_(%E0%A4%B5%E0%A4%A8%E0%A4%AA%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%B5%E0%A4%A3%E0%A4%BF_%E0%A4%85%E0%A4%A7%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%AF%E0%A4%83_%E0%A5%AC)&amp;diff=120154"/>
		<updated>2019-08-03T12:42:01Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;ShraddhaV: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt; गते तु विदुरे राजन्नाश्रमं पाण्डवान्प्रति।&lt;br /&gt;
 धृतराष्ट्रो महाप्राज्ञः पर्यतप्यत भारत॥ 3-6-1&lt;br /&gt;
 विदुरस्य प्रभावं च सन्धिविग्रहकारितम्।&lt;br /&gt;
 विवृद्धिं च परां मत्वा पाण्डवानां भविष्यति॥ 3-6-2&lt;br /&gt;
 स सभाद्वारमागम्य विदुरस्मारमोहितः।&lt;br /&gt;
 समक्षं पार्थिवेन्द्राणां पपाताविष्टचेतनः॥ 3-6-3&lt;br /&gt;
 स तु लब्ध्वा पुनः संज्ञां समुत्थाय महीतलात्।&lt;br /&gt;
 समीपोपस्थितं राजा सञ्जयं वाक्यमब्रवीत्॥ 3-6-4&lt;br /&gt;
 भ्राता मम सुहृच्चैव साक्षाद्धर्म इवापरः।&lt;br /&gt;
 तस्य स्मृत्याद्य सुभृशं हृदयं दीर्यतीव मे॥ 3-6-5&lt;br /&gt;
 तमानयस्व धर्मज्ञं मम भ्रातरमाशु वै।&lt;br /&gt;
 इति ब्रुवन्स नृपतिः कृपणं पर्यदेवयत्॥ 3-6-6&lt;br /&gt;
 पश्चात्तापाभिसन्तप्तो विदुरस्मारमोहितः।&lt;br /&gt;
 भ्रातृस्नेहादिदं राजा सञ्जयं वाक्यमब्रवीत्॥ 3-6-7&lt;br /&gt;
 गच्छ सञ्जय जानीहि भ्रातरं विदुरं मम।&lt;br /&gt;
 यदि जीवति रोषेण मया पापेन निर्धुतः॥ 3-6-8&lt;br /&gt;
 न हि तेन मम भ्रात्रा सुसूक्ष्ममपि किञ्चन।&lt;br /&gt;
 व्यलीकं कृतपूर्वं वै प्राज्ञेनामितबुद्धिना॥ 3-6-9&lt;br /&gt;
 स व्यलीकं परं प्राप्तो मत्तः परमबुद्धिमान्।&lt;br /&gt;
 त्यक्ष्यामि जीवितं प्राज्ञ तं गच्छानय सञ्जय॥ 3-6-10&lt;br /&gt;
  [[:Category:Dhrtarashtra and Vidura|''Dhrtarashtra and Vidura'']] &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तस्य तद्वचनं श्रुत्वा राज्ञस्तमनुमान्य च।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सञ्जयो बाढमित्युक्त्वा प्राद्रवत्काम्यकं प्रति॥ 3-6-11&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सोऽचिरेण समासाद्य तद्वनं यत्र पाण्डवाः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
रौरवाजिनसंवीतं ददर्शाथ युधिष्ठिरम्॥ 3-6-12&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
विदुरेण सहासीनं ब्राह्मणैश्च सहस्रशः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भ्रातृभिश्चाभिसंगुप्तं देवैरिव पुरन्दरम्॥ 3-6-13&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
युधिष्ठिरमुपागम्य पूजयामास सञ्जयः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भीमार्जुनयमाश्चापि तद्युक्तं प्रतिपेदिरे॥ 3-6-14&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
राज्ञा पृष्टः स कुशलं सुखासीनश्च सञ्जयः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शशंसागमने हेतुमिदं चैवाब्रवीद्वचः॥ 3-6-15&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सञ्जय उवाच&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
राजा स्मरति ते क्षत्तर्धृतराष्ट्रोऽम्बिकासुतः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तं पश्य गत्वा त्वं क्षिप्रं सञ्जीवय च पार्थिवम्॥ 3-6-16&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सोऽनुमान्य नरश्रेष्ठान्पाण्डवान्कुरुनन्दनान्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
नियोगाद्राजसिंहस्य गन्तुमर्हसि सत्तम॥ 3-6-17&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वैशम्पायन उवाच&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
एवमुक्तस्तु विदुरो धीमान्स्वजनवत्सलः[वल्लभः]।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
युधिष्ठिरस्यानुमते पुनरायाद्गजाह्वयम्॥ 3-6-18&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
@सोऽभिगत्वा तदा वेश्म राज्ञस्तमभिवाद्य च।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उपातिष्ठन्महात्मानं राजानं प्रत्यवर्तत॥@&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तमब्रवीन्महातेजा धृतराष्ट्रोऽम्बिकासुतः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दिष्ट्या प्राप्तोऽसि धर्मज्ञ दिष्ट्या स्मरसि मेऽनघ॥ 3-6-19&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अद्य रात्रौ दिवा चाहं त्वत्कृते भरतर्षभ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
प्रजागरे प्रपश्यामि विचित्रं देहमात्मनः॥ 3-6-20&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
@चिन्तयाऽहं परिल्लिष्टसः त्वद्गतेनान्तरात्मना॥@&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सोऽङ्कमानीय विदुरं मूर्धन्याघ्राय चैव ह।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
क्षम्यतामिति चोवाच यदुक्तोऽसि मयानघ॥ 3-6-21&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
विदुर उवाच&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
क्षान्तमेव मया राजन्गुरुर्मे परमो भवान्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
एषोऽहमागतः शीघ्रं त्वद्दर्शनपरायणः॥ 3-6-22&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भवन्ति हि नरव्याघ्र पुरुषा धर्मचेतसः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दीनाभिपातिनो राजन्नात्र कार्या विचारणा॥ 3-6-23&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पाण्डोः सुता यादृशा मे तादृशास्तव भारत।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दीना इतीव मे बुद्धिरभिपन्नाद्य तान्प्रति॥ 3-6-24&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वैशम्पायन उवाच&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अन्योन्यमनुनीयैवं भ्रातरौ द्वौ महाद्युती।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
विदुरो धृतराष्ट्रश्च लेभाते परमां मुदम्॥ 3-6-25&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि अरण्यपर्वणि विदुरप्रत्यागमने षष्ठोऽध्यायः॥ 6 ॥&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>ShraddhaV</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://dharmawiki.org/index.php?title=Vanaparva_Adhyaya_6_(%E0%A4%B5%E0%A4%A8%E0%A4%AA%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%B5%E0%A4%A3%E0%A4%BF_%E0%A4%85%E0%A4%A7%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%AF%E0%A4%83_%E0%A5%AC)&amp;diff=120070</id>
		<title>Vanaparva Adhyaya 6 (वनपर्वणि अध्यायः ६)</title>
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		<updated>2019-07-27T04:00:22Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;ShraddhaV: Created vanaparva aranyaparva adhyay 6 page. Added verses in the chapter&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;गते तु विदुरे राजन्नाश्रमं पाण्डवान्प्रति।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
धृतराष्ट्रो महाप्राज्ञः पर्यतप्यत भारत॥ 3-6-1&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
विदुरस्य प्रभावं च सन्धिविग्रहकारितम्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
विवृद्धिं च परां मत्वा पाण्डवानां भविष्यति॥ 3-6-2&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
स सभाद्वारमागम्य विदुरस्मारमोहितः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
समक्षं पार्थिवेन्द्राणां पपाताविष्टचेतनः॥ 3-6-3&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
स तु लब्ध्वा पुनः संज्ञां समुत्थाय महीतलात्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
समीपोपस्थितं राजा सञ्जयं वाक्यमब्रवीत्॥ 3-6-4&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भ्राता मम सुहृच्चैव साक्षाद्धर्म इवापरः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तस्य स्मृत्याद्य सुभृशं हृदयं दीर्यतीव मे॥ 3-6-5&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तमानयस्व धर्मज्ञं मम भ्रातरमाशु वै।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इति ब्रुवन्स नृपतिः कृपणं पर्यदेवयत्॥ 3-6-6&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पश्चात्तापाभिसन्तप्तो विदुरस्मारमोहितः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भ्रातृस्नेहादिदं राजा सञ्जयं वाक्यमब्रवीत्॥ 3-6-7&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
गच्छ सञ्जय जानीहि भ्रातरं विदुरं मम।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यदि जीवति रोषेण मया पापेन निर्धुतः॥ 3-6-8&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
न हि तेन मम भ्रात्रा सुसूक्ष्ममपि किञ्चन।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
व्यलीकं कृतपूर्वं वै प्राज्ञेनामितबुद्धिना॥ 3-6-9&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
स व्यलीकं परं प्राप्तो मत्तः परमबुद्धिमान्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
त्यक्ष्यामि जीवितं प्राज्ञ तं गच्छानय सञ्जय॥ 3-6-10&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तस्य तद्वचनं श्रुत्वा राज्ञस्तमनुमान्य च।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सञ्जयो बाढमित्युक्त्वा प्राद्रवत्काम्यकं प्रति॥ 3-6-11&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सोऽचिरेण समासाद्य तद्वनं यत्र पाण्डवाः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
रौरवाजिनसंवीतं ददर्शाथ युधिष्ठिरम्॥ 3-6-12&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
विदुरेण सहासीनं ब्राह्मणैश्च सहस्रशः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भ्रातृभिश्चाभिसंगुप्तं देवैरिव पुरन्दरम्॥ 3-6-13&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
युधिष्ठिरमुपागम्य पूजयामास सञ्जयः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भीमार्जुनयमाश्चापि तद्युक्तं प्रतिपेदिरे॥ 3-6-14&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
राज्ञा पृष्टः स कुशलं सुखासीनश्च सञ्जयः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शशंसागमने हेतुमिदं चैवाब्रवीद्वचः॥ 3-6-15&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सञ्जय उवाच&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
राजा स्मरति ते क्षत्तर्धृतराष्ट्रोऽम्बिकासुतः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तं पश्य गत्वा त्वं क्षिप्रं सञ्जीवय च पार्थिवम्॥ 3-6-16&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सोऽनुमान्य नरश्रेष्ठान्पाण्डवान्कुरुनन्दनान्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
नियोगाद्राजसिंहस्य गन्तुमर्हसि सत्तम॥ 3-6-17&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वैशम्पायन उवाच&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
एवमुक्तस्तु विदुरो धीमान्स्वजनवत्सलः[वल्लभः]।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
युधिष्ठिरस्यानुमते पुनरायाद्गजाह्वयम्॥ 3-6-18&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
@सोऽभिगत्वा तदा वेश्म राज्ञस्तमभिवाद्य च।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उपातिष्ठन्महात्मानं राजानं प्रत्यवर्तत॥@&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तमब्रवीन्महातेजा धृतराष्ट्रोऽम्बिकासुतः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दिष्ट्या प्राप्तोऽसि धर्मज्ञ दिष्ट्या स्मरसि मेऽनघ॥ 3-6-19&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अद्य रात्रौ दिवा चाहं त्वत्कृते भरतर्षभ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
प्रजागरे प्रपश्यामि विचित्रं देहमात्मनः॥ 3-6-20&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
@चिन्तयाऽहं परिल्लिष्टसः त्वद्गतेनान्तरात्मना॥@&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सोऽङ्कमानीय विदुरं मूर्धन्याघ्राय चैव ह।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
क्षम्यतामिति चोवाच यदुक्तोऽसि मयानघ॥ 3-6-21&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
विदुर उवाच&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
क्षान्तमेव मया राजन्गुरुर्मे परमो भवान्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
एषोऽहमागतः शीघ्रं त्वद्दर्शनपरायणः॥ 3-6-22&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भवन्ति हि नरव्याघ्र पुरुषा धर्मचेतसः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दीनाभिपातिनो राजन्नात्र कार्या विचारणा॥ 3-6-23&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पाण्डोः सुता यादृशा मे तादृशास्तव भारत।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दीना इतीव मे बुद्धिरभिपन्नाद्य तान्प्रति॥ 3-6-24&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वैशम्पायन उवाच&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अन्योन्यमनुनीयैवं भ्रातरौ द्वौ महाद्युती।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
विदुरो धृतराष्ट्रश्च लेभाते परमां मुदम्॥ 3-6-25&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि अरण्यपर्वणि विदुरप्रत्यागमने षष्ठोऽध्यायः॥ 6 ॥&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>ShraddhaV</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://dharmawiki.org/index.php?title=Vanaparva_Adhyaya_5_(%E0%A4%B5%E0%A4%A8%E0%A4%AA%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%B5%E0%A4%A3%E0%A4%BF_%E0%A4%85%E0%A4%A7%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%AF%E0%A4%83_%E0%A5%AB)&amp;diff=119986</id>
		<title>Vanaparva Adhyaya 5 (वनपर्वणि अध्यायः ५)</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://dharmawiki.org/index.php?title=Vanaparva_Adhyaya_5_(%E0%A4%B5%E0%A4%A8%E0%A4%AA%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%B5%E0%A4%A3%E0%A4%BF_%E0%A4%85%E0%A4%A7%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%AF%E0%A4%83_%E0%A5%AB)&amp;diff=119986"/>
		<updated>2019-07-22T02:28:11Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;ShraddhaV: Added tag words to chapter 5 shlokas&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;वैशम्पायन उवाच&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
 पाण्डवास्तु वने वासमुद्दिश्य भरतर्षभाः।&lt;br /&gt;
 प्रययुः जाह्नवीकूलात्कुरुक्षेत्रं सहानुगाः॥ 3-5-1&lt;br /&gt;
 सरस्वतीदृषद्वत्यौ यमुनां च निषेव्य ते।&lt;br /&gt;
 ययुर्वनेनैव वनं सततं पश्चिमां दिशम्॥ 3-5-2&lt;br /&gt;
 [[:Category:Pandava's exile|''Pandava's exile'']]  [[:Category:वनवास|''वनवास'']]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
 ततः सरस्वतीकूले समेषु मरुधन्वसु।&lt;br /&gt;
 काम्यकं नाम ददृशुर्वनं मुनिजनप्रियम्॥ 3-5-3&lt;br /&gt;
 तत्र ते न्यवसन्वीरा वने बहुमृगद्विजे।&lt;br /&gt;
 अन्वास्यमाना मुनिभिः सान्त्व्यमानाश्च भारत॥ 3-5-4&lt;br /&gt;
 [[:Category:Kamyavan|''Kamyavan'']]  [[:Category:काम्यवन|''काम्यवन'']]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
 विदुरस्त्वथ पाण्डूनां सदा दर्शनलालसः।&lt;br /&gt;
 जगामैकरथेनैव काम्यकं वनमृद्धिमत्॥ 3-5-5&lt;br /&gt;
 ततो गत्वा विदुरः काम्यकं तच्छीघ्रैरश्वैर्वाहिना स्यन्दनेन।&lt;br /&gt;
 ददर्शासीनं धर्मात्मानं विविक्ते सार्धं द्रौपद्या भातृभिर्ब्राह्मणैश्च॥ 3-5-6&lt;br /&gt;
 ततोऽपश्यद्विदुरं तूर्णमारादभ्यायान्तं सत्यसन्धः स राजा।&lt;br /&gt;
 अथाब्रवीद्भ्रातरं भीमसेनं किं नु क्षत्ता वक्ष्यति नः समेत्य॥ 3-5-7&lt;br /&gt;
 [[:Category:Vidura meets Pandavas|''Vidura meets Pandavas'']]  [[:Category:विदुर पांडव मिलन |''विदुर पांडव मिलन '']]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कच्चिन्नायं वचनात्सौबलस्य समाह्वाता देवनायोपयातः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कच्चित्क्षुद्रः शकुनिर्नायुधानि जेष्यत्यस्मान्पुनरेवाक्षवत्याम्॥ 3-5-8&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
समाहूतः केनचिदाद्रवेति नाहं शक्तो भीमसेनापयातुम्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
गाण्डीवे च संशयिते कथं नु राज्यप्राप्तिः संशयिता भवेन्नः॥ 3-5-9&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वैशम्पायन उवाच&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
 तत उत्थाय विदुरं पाण्डवेयाः प्रत्यगृह्णन्नृपते सर्व एव।&lt;br /&gt;
 तैः सत्कृतः स च तानाजमीढो यथोचितं पाण्डुपुत्रान्समेयात्॥ 3-5-10&lt;br /&gt;
 समाश्वस्तं विदुरं ते नरर्षभास्ततोऽपृच्छन्नागमनाय हेतुम्।&lt;br /&gt;
 स चापि तेभ्यो विस्तरतः शशंस यथावृत्तो धृतराष्ट्रोऽम्बिकेयः॥ 3-5-11&lt;br /&gt;
 [[:Category:Vidura Pandava conversation|''Vidura Pandava conversation'']]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
विदुर उवाच&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
 अवोचन्मां धृतराष्ट्रोऽनुगुप्तमजातशत्रो परिगृह्याभिपूज्य।&lt;br /&gt;
 एवं गते समतामभ्युपेत्य पथ्यं तेषां मम चैव ब्रवीहि॥ 3-5-12&lt;br /&gt;
 मयाप्युक्तं यत्क्षेमं कौरवाणां हितं पथ्यं धृतराष्ट्रस्य चैव।&lt;br /&gt;
 तद्वै तस्मै न रुचामभ्युपैति ततश्चाहं क्षेममन्यन्न मन्ये॥ 3-5-13&lt;br /&gt;
 [[:Category:Vidura Pandava conversation|''Vidura Pandava conversation'']]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
 परं श्रेयः पाण्डवेया मयोक्तं न मे तच्च श्रुतवानाम्बिकेयः।&lt;br /&gt;
 यथाऽऽतुरस्येव हि पथ्यमन्नं न रोचते स्मास्य तदुच्यमानम्॥ 3-5-14&lt;br /&gt;
 [[:Category:Vidura Pandava conversation|''Vidura Pandava conversation'']] [[:Category:Accepting advice|''Accepting advice'']]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
 न श्रेयसे नीयतेऽजातशत्रो स्त्री श्रोत्रियस्येव गृहे प्रदुष्टा।&lt;br /&gt;
 ध्रुवं न रोचेद्भरतर्षभस्य पतिः कुमार्या इव षष्टिवर्षः॥ 3-5-15&lt;br /&gt;
 [[:Category:Vidura Pandava conversation|''Vidura Pandava conversation'']] [[:Category:Accepting advice|''Accepting advice'']]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
 ध्रुवं विनाशो नृप कौरवाणां न वै श्रेयो धृतराष्ट्रः परैति।&lt;br /&gt;
 यथा च पर्णे पुष्करस्यावसिक्तं जलं न तिष्ठेत्पथ्यमुक्तं तथास्मिन्॥ 3-5-16&lt;br /&gt;
 [[:Category:Vidura Pandava conversation|''Vidura Pandava conversation'']] [[:Category:Accepting advice|''Accepting advice'']]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
 ततः क्रुद्धो धृतराष्ट्रोऽब्रवीन्मां यस्मिन्श्रद्धा भारत तत्र याहि।&lt;br /&gt;
 नाहं भूयः कामये त्वां सहायं महीमिमां पालयितुं पुरं वा॥ 3-5-17&lt;br /&gt;
 [[:Category:Vidura Pandava conversation|''Vidura Pandava conversation'']] [[:Category:Dhrtarashtra|''Dhrtarashtra'']]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
 सोऽहं त्यक्तो धृतराष्ट्रेण राज्ञा प्रशासितुं त्वामुपयातो नरेन्द्र।&lt;br /&gt;
 तद्वै सर्वं यन्मयोक्तं सभायां तद्धार्यतां यत्प्रवक्ष्यामि भूयः॥ 3-5-18&lt;br /&gt;
 [[:Category:Vidura Pandava conversation|''Vidura Pandava conversation'']] [[:Category:Qualities of a king|''Qualities of a king'']]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
 क्लेशैस्तीव्रैर्युज्यमानः सपत्नैः क्षमां कुर्वन्कालमुपासते यः।&lt;br /&gt;
 संवर्धयन्स्तोकमिवाग्निमात्मवान्स वै भुङ्क्ते पृथिवीमेक एव॥ 3-5-19&lt;br /&gt;
 [[:Category:Vidura Pandava conversation|''Vidura Pandava conversation'']] [[:Category:Qualities of a king|''Qualities of a king'']]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
 यस्याविभक्तं वसु राजन्सहायैस्तस्य दुःखेऽप्यंशभाजः सहायाः।&lt;br /&gt;
 सहायानामेष सङ्ग्रहणेऽध्युपायः सहायाप्तौ पृथिवीप्राप्तिमाहुः॥ 3-5-20&lt;br /&gt;
 [[:Category:Vidura Pandava conversation|''Vidura Pandava conversation'']] [[:Category:Qualities of a king|''Qualities of a king'']]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
 सत्यं श्रेष्ठं पाण्डव विप्रलापं तुल्यं चान्नं सह भोज्यं सहायैः।&lt;br /&gt;
 आत्मा चैषामग्रतो न स्म पूज्य एवंवृत्तिवर्धते भूमिपालः॥ 3-5-21&lt;br /&gt;
 [[:Category:Vidura Pandava conversation|''Vidura Pandava conversation'']] [[:Category:Qualities of a king|''Qualities of a king'']]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
युधिष्ठिर उवाच&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
 एवं करिष्यामि यथा ब्रवीषि परां बुद्धिमुपगम्याप्रमत्तः।&lt;br /&gt;
 यच्चाप्यन्यद्देशकालोपपन्नं तद्वै वाच्यं तत्करिष्यामि कृत्स्नम्॥ 3-5-22&lt;br /&gt;
 [[:Category:Vidura Pandava conversation|''Vidura Pandava conversation'']]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि अरण्यपर्वणि विदुरनिर्वासे पञ्चमोऽध्यायः॥ 5 ॥&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>ShraddhaV</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://dharmawiki.org/index.php?title=Vanaparva_Adhyaya_4_(%E0%A4%B5%E0%A4%A8%E0%A4%AA%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%B5%E0%A4%A3%E0%A4%BF_%E0%A4%85%E0%A4%A7%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%AF%E0%A4%83_%E0%A5%AA)&amp;diff=119985</id>
		<title>Vanaparva Adhyaya 4 (वनपर्वणि अध्यायः ४)</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://dharmawiki.org/index.php?title=Vanaparva_Adhyaya_4_(%E0%A4%B5%E0%A4%A8%E0%A4%AA%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%B5%E0%A4%A3%E0%A4%BF_%E0%A4%85%E0%A4%A7%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%AF%E0%A4%83_%E0%A5%AA)&amp;diff=119985"/>
		<updated>2019-07-22T02:03:44Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;ShraddhaV: Corrected spellings as per phonetics&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;वैशम्पायन उवाच&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वनं प्रविष्टेष्वथ पाण्डवेषु प्रज्ञाचक्षुस्तप्यमानोऽम्बिकेयः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
धर्मात्मानं विदुरमगाधबुद्धिं सुखासीनो वाक्यमुवाच राजा॥ 3-4-1&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
धृतराष्ट्र उवाच&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
 प्रज्ञा च ते भार्गवस्येव शुद्धा धर्म च त्वं परमं वेत्थ सूक्ष्मम्।&lt;br /&gt;
 समश्च त्वं सम्मतः कौरवाणां पथ्यं चैषां मम चैव ब्रवीहि॥ 3-4-2&lt;br /&gt;
 [[:Category:Vidura|''Vidura'']]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
 एवं गते विदुर यदद्य कार्यं पौराश्च मे कथमस्मान्भजेरन्।&lt;br /&gt;
 ते चाप्यस्मान्नोद्धरेयुः समूलांस्तत्त्वं ब्रूयाः साधुकार्याणि वेत्सि॥ 3-4-3&lt;br /&gt;
 [[:Category:Dharma|''Dharma'']]&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
न कामये तांश्च विनश्यमानान्॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सौबलेनैव पापेन दुर्योधनहितैषिणा।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
क्रूरमाचरितं क्षत्तर्न मे प्रियमनुष्ठितम्॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तथैवाङ्गीकृते तव तद्भवान्वक्तुमर्हति।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उत्तरं प्राप्तकालं च किमन्यन्मन्यते क्षमम्॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
नास्ति धर्मे सहायत्वमिति मे दीर्यते मनः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यत्र पाण्डुसुतास्सर्वे क्लिश्यन्ति वनमागताः॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
विदुर उवाच&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
त्रिवर्गोऽयं धर्ममूलो नरेन्द्र राज्यं चेदं धर्ममूलं वदन्ति।&lt;br /&gt;
धर्मे राजन्वर्तमानः स्वशक्त्या पुत्रान्सर्वान्पाहि पाण्डोः सुतांश्च॥ 3-4-4&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
स वै धर्मो विप्रलब्धः सभायां पापात्मभिः सौबलेयप्रधानैः।&lt;br /&gt;
आहूय कुन्तीसुतमक्षवत्यां पराजैषीत्सत्यसन्धं सुतस्ते॥ 3-4-5&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
एतस्य ते दुष्प्रणीतस्य राजञ्छेषस्याहं परिपश्याम्युपायम्।&lt;br /&gt;
यथा पुत्रस्तव कौरव्य पापान्मुक्तो लोके प्रतितिष्ठेत साधु॥ 3-4-6&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
तद्वै सर्वं पाण्डुपुत्रा लभन्तां यत्तद्राजन्नभिसृष्टं त्वयाऽऽसीत्।&lt;br /&gt;
एष धर्मः परमो यत्स्वकेन राजा तुष्येन्न परस्वेषु गृध्येत्॥ 3-4-7&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
यशो न नश्येज्ज्ञातिभेदश्च न स्याद्धर्मो न स्यान्नैव चैवं कृते त्वाम्।&lt;br /&gt;
एतत्कार्यं तव सर्वप्रधानं तेषां तुष्टिः शकुनेश्चावमानः॥ 3-4-8&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
एवं शेषं यदि पुत्रेषु ते स्यादेतद्राजंस्त्वरमाणः कुरुष्व।&lt;br /&gt;
तथैतदेवं न करोषि राजन्ध्रुवं कुरूणां भविता विनाशः॥ 3-4-9&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
 न हि क्रुद्धो भीमसेनोऽर्जुनो वा शेषं कुर्याच्छात्रवाणामनीके।&lt;br /&gt;
 येषां योद्धा सव्यसाची कृतास्त्रो धनुर्येषां गाण्डिवं लोकसारम्॥ 3-4-10&lt;br /&gt;
 येषां भीमो बाहुशाली च योद्धा तेषां लोके किं नु न प्राप्यमस्ति।&lt;br /&gt;
 उक्तं पूर्वं जातमात्रे सुते ते मया यत्ते हितमासीत्तदानीम्॥ 3-4-11&lt;br /&gt;
 पुत्रं त्यजेममहितं कुलस्य हितं परं न च तत्त्वं चकर्थ।&lt;br /&gt;
 इदं च राजन्हितमुक्तं न चेत्त्वमेवं कर्ता परितप्तासि पश्चात्॥ 3-4-12&lt;br /&gt;
 यद्येतदेवमनुमन्ता सुतस्ते सम्प्रीयमाणः पाण्डवैरेकराज्यम्।&lt;br /&gt;
 तापो न ते भविता प्रीतियोगान्न चेन्निगृह्णीष्व सुतं सुखाय॥ 3-4-13&lt;br /&gt;
 दुर्योधनं त्वहितं वै निगृह्य पाण्डोः पुत्रं प्रकुरुष्वाधिपत्ये।&lt;br /&gt;
 अजातशत्रुर्हि विमुक्तरागो धर्मेणेमां पृथिवीं शास्तु राजन्॥ 3-4-14&lt;br /&gt;
 ततो राजन्पार्थिवाः सर्व एव वैश्या इवास्मानुपतिष्ठन्तु सद्यः।&lt;br /&gt;
 दुर्योधनः शकुनिः सूतपुत्रः प्रीत्या राजन्पाण्डुपुत्रान्भजन्तु॥ 3-4-15&lt;br /&gt;
 दुःशासनो याचतु भीमसेनं सभामध्ये द्रुपदस्यात्मजां च।&lt;br /&gt;
 युधिष्ठिरं त्वं परिसान्त्वयस्व राज्ये चैनं स्थापयस्वाभिपूज्य॥ 3-4-16&lt;br /&gt;
 त्वया पृष्टः किमहमन्यद्वदेयमेतत्कृत्वा कृतकृत्योऽसि राजन्॥ 3-4-16&lt;br /&gt;
 [[:Category:Duryodhana|''Duryodhana'']]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
धृतराष्ट्र उवाच&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
 एतद्वाक्यं विदुर यत्ते सभायामिह प्रोक्तं पाण्डवान्प्राप्य मां च।&lt;br /&gt;
 हितं तेषामहितं मामकानामेतत्सर्वं मम नावैति चेतः॥ 3-4-17&lt;br /&gt;
 इदं त्विदानीं गत एव निश्चितं तेषामर्थे पाण्डवानां यदात्थ।&lt;br /&gt;
 तेनाद्य मन्ये नासि हितो ममेति कथं हि पुत्रं पाण्डवार्थे त्यजेयम्॥ 3-4-18&lt;br /&gt;
 असंशयं तेऽपि ममैव पुत्रा दुर्योधनस्तु मम देहात्प्रसूतः।&lt;br /&gt;
 स्वं वै देहं परहेतोस्त्यजेति को तु ब्रूयात्समतामन्ववेक्ष्य॥ 3-4-19&lt;br /&gt;
 स मां जिह्मं विदुर सर्वं ब्रवीषि मानं च तेऽहमधिकं धारयामि।&lt;br /&gt;
 यथेच्छकं गच्छ वा तिष्ठ वा त्वं सुसान्त्व्यमानाप्यसती स्त्री जहाति॥ 3-4-20&lt;br /&gt;
 [[:Category:Dhrtarashtra's attachment to Duryodhana|''Dhrtarashtra's attachment to Duryodhana'']] [[:Category:आसक्ती|''आसक्ती'']] &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वैशम्पायन उवाच&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
 एतावदुक्त्वा धृतराष्ट्रोऽन्वपद्यदन्तर्वेश्म सहसोत्थाय राजन्।&lt;br /&gt;
 नेदमस्तीत्यथ विदुरो भाषमाणः सम्प्राद्रवद्यत्र पार्था बभूवुः॥ 3-4-21&lt;br /&gt;
 [[:Category:Dhrtarashtra|''Dhrtarashtra]] [[:Category:Vidura|''Vidura'']] &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
 इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि अरण्यपर्वणि विदुरवाक्यप्रत्याख्याने चतुर्थोऽध्यायः॥ 4 ॥&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>ShraddhaV</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://dharmawiki.org/index.php?title=Vanaparva_Adhyaya_4_(%E0%A4%B5%E0%A4%A8%E0%A4%AA%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%B5%E0%A4%A3%E0%A4%BF_%E0%A4%85%E0%A4%A7%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%AF%E0%A4%83_%E0%A5%AA)&amp;diff=119883</id>
		<title>Vanaparva Adhyaya 4 (वनपर्वणि अध्यायः ४)</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://dharmawiki.org/index.php?title=Vanaparva_Adhyaya_4_(%E0%A4%B5%E0%A4%A8%E0%A4%AA%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%B5%E0%A4%A3%E0%A4%BF_%E0%A4%85%E0%A4%A7%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%AF%E0%A4%83_%E0%A5%AA)&amp;diff=119883"/>
		<updated>2019-07-18T11:48:29Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;ShraddhaV: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;वैशम्पायन उवाच&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वनं प्रविष्टेष्वथ पाण्डवेषु प्रज्ञाचक्षुस्तप्यमानोऽम्बिकेयः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
धर्मात्मानं विदुरमगाधबुद्धिं सुखासीनो वाक्यमुवाच राजा॥ 3-4-1&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
धृतराष्ट्र उवाच&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
 प्रज्ञा च ते भार्गवस्येव शुद्धा धर्म च त्वं परमं वेत्थ सूक्ष्मम्।&lt;br /&gt;
 समश्च त्वं सम्मतः कौरवाणां पथ्यं चैषां मम चैव ब्रवीहि॥ 3-4-2&lt;br /&gt;
 [[:Category:Vidur|''Vidur'']]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
 एवं गते विदुर यदद्य कार्यं पौराश्च मे कथमस्मान्भजेरन्।&lt;br /&gt;
 ते चाप्यस्मान्नोद्धरेयुः समूलांस्तत्त्वं ब्रूयाः साधुकार्याणि वेत्सि॥ 3-4-3&lt;br /&gt;
 [[:Category:Dharma|''Dharma'']]&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
न कामये तांश्च विनश्यमानान्॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सौबलेनैव पापेन दुर्योधनहितैषिणा।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
क्रूरमाचरितं क्षत्तर्न मे प्रियमनुष्ठितम्॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तथैवाङ्गीकृते तव तद्भवान्वक्तुमर्हति।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उत्तरं प्राप्तकालं च किमन्यन्मन्यते क्षमम्॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
नास्ति धर्मे सहायत्वमिति मे दीर्यते मनः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यत्र पाण्डुसुतास्सर्वे क्लिश्यन्ति वनमागताः॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
विदुर उवाच&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
त्रिवर्गोऽयं धर्ममूलो नरेन्द्र राज्यं चेदं धर्ममूलं वदन्ति।&lt;br /&gt;
धर्मे राजन्वर्तमानः स्वशक्त्या पुत्रान्सर्वान्पाहि पाण्डोः सुतांश्च॥ 3-4-4&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
स वै धर्मो विप्रलब्धः सभायां पापात्मभिः सौबलेयप्रधानैः।&lt;br /&gt;
आहूय कुन्तीसुतमक्षवत्यां पराजैषीत्सत्यसन्धं सुतस्ते॥ 3-4-5&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
एतस्य ते दुष्प्रणीतस्य राजञ्छेषस्याहं परिपश्याम्युपायम्।&lt;br /&gt;
यथा पुत्रस्तव कौरव्य पापान्मुक्तो लोके प्रतितिष्ठेत साधु॥ 3-4-6&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
तद्वै सर्वं पाण्डुपुत्रा लभन्तां यत्तद्राजन्नभिसृष्टं त्वयाऽऽसीत्।&lt;br /&gt;
एष धर्मः परमो यत्स्वकेन राजा तुष्येन्न परस्वेषु गृध्येत्॥ 3-4-7&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
यशो न नश्येज्ज्ञातिभेदश्च न स्याद्धर्मो न स्यान्नैव चैवं कृते त्वाम्।&lt;br /&gt;
एतत्कार्यं तव सर्वप्रधानं तेषां तुष्टिः शकुनेश्चावमानः॥ 3-4-8&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
एवं शेषं यदि पुत्रेषु ते स्यादेतद्राजंस्त्वरमाणः कुरुष्व।&lt;br /&gt;
तथैतदेवं न करोषि राजन्ध्रुवं कुरूणां भविता विनाशः॥ 3-4-9&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
 न हि क्रुद्धो भीमसेनोऽर्जुनो वा शेषं कुर्याच्छात्रवाणामनीके।&lt;br /&gt;
 येषां योद्धा सव्यसाची कृतास्त्रो धनुर्येषां गाण्डिवं लोकसारम्॥ 3-4-10&lt;br /&gt;
 येषां भीमो बाहुशाली च योद्धा तेषां लोके किं नु न प्राप्यमस्ति।&lt;br /&gt;
 उक्तं पूर्वं जातमात्रे सुते ते मया यत्ते हितमासीत्तदानीम्॥ 3-4-11&lt;br /&gt;
 पुत्रं त्यजेममहितं कुलस्य हितं परं न च तत्त्वं चकर्थ।&lt;br /&gt;
 इदं च राजन्हितमुक्तं न चेत्त्वमेवं कर्ता परितप्तासि पश्चात्॥ 3-4-12&lt;br /&gt;
 यद्येतदेवमनुमन्ता सुतस्ते सम्प्रीयमाणः पाण्डवैरेकराज्यम्।&lt;br /&gt;
 तापो न ते भविता प्रीतियोगान्न चेन्निगृह्णीष्व सुतं सुखाय॥ 3-4-13&lt;br /&gt;
 दुर्योधनं त्वहितं वै निगृह्य पाण्डोः पुत्रं प्रकुरुष्वाधिपत्ये।&lt;br /&gt;
 अजातशत्रुर्हि विमुक्तरागो धर्मेणेमां पृथिवीं शास्तु राजन्॥ 3-4-14&lt;br /&gt;
 ततो राजन्पार्थिवाः सर्व एव वैश्या इवास्मानुपतिष्ठन्तु सद्यः।&lt;br /&gt;
 दुर्योधनः शकुनिः सूतपुत्रः प्रीत्या राजन्पाण्डुपुत्रान्भजन्तु॥ 3-4-15&lt;br /&gt;
 दुःशासनो याचतु भीमसेनं सभामध्ये द्रुपदस्यात्मजां च।&lt;br /&gt;
 युधिष्ठिरं त्वं परिसान्त्वयस्व राज्ये चैनं स्थापयस्वाभिपूज्य॥ 3-4-16&lt;br /&gt;
 त्वया पृष्टः किमहमन्यद्वदेयमेतत्कृत्वा कृतकृत्योऽसि राजन्॥ 3-4-16&lt;br /&gt;
 [[:Category:Duryodhan|''Duryodhan'']]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
धृतराष्ट्र उवाच&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
 एतद्वाक्यं विदुर यत्ते सभायामिह प्रोक्तं पाण्डवान्प्राप्य मां च।&lt;br /&gt;
 हितं तेषामहितं मामकानामेतत्सर्वं मम नावैति चेतः॥ 3-4-17&lt;br /&gt;
 इदं त्विदानीं गत एव निश्चितं तेषामर्थे पाण्डवानां यदात्थ।&lt;br /&gt;
 तेनाद्य मन्ये नासि हितो ममेति कथं हि पुत्रं पाण्डवार्थे त्यजेयम्॥ 3-4-18&lt;br /&gt;
 असंशयं तेऽपि ममैव पुत्रा दुर्योधनस्तु मम देहात्प्रसूतः।&lt;br /&gt;
 स्वं वै देहं परहेतोस्त्यजेति को तु ब्रूयात्समतामन्ववेक्ष्य॥ 3-4-19&lt;br /&gt;
 स मां जिह्मं विदुर सर्वं ब्रवीषि मानं च तेऽहमधिकं धारयामि।&lt;br /&gt;
 यथेच्छकं गच्छ वा तिष्ठ वा त्वं सुसान्त्व्यमानाप्यसती स्त्री जहाति॥ 3-4-20&lt;br /&gt;
 [[:Category:Dhristrashtra's attachment to Duryodhan|''Dhristrashtra's attachment to Duryodhan'']] [[:Category:आसक्ती|''आसक्ती'']] &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वैशम्पायन उवाच&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
 एतावदुक्त्वा धृतराष्ट्रोऽन्वपद्यदन्तर्वेश्म सहसोत्थाय राजन्।&lt;br /&gt;
 नेदमस्तीत्यथ विदुरो भाषमाणः सम्प्राद्रवद्यत्र पार्था बभूवुः॥ 3-4-21&lt;br /&gt;
 [[:Category:Dhristrashtra|''Dhristrashtra]] [[:Category:Vidur|''Vidur'']] &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
 इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि अरण्यपर्वणि विदुरवाक्यप्रत्याख्याने चतुर्थोऽध्यायः॥ 4 ॥&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>ShraddhaV</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://dharmawiki.org/index.php?title=User:ShraddhaV&amp;diff=119870</id>
		<title>User:ShraddhaV</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://dharmawiki.org/index.php?title=User:ShraddhaV&amp;diff=119870"/>
		<updated>2019-07-17T14:47:59Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;ShraddhaV: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;वैशम्पायन उवाच&lt;br /&gt;
पाण्डवास्तु वने वासमुद्दिश्य भरतर्षभाः।&lt;br /&gt;
प्रययुः जाह्नवीकूलात्कुरुक्षेत्रं सहानुगाः॥ 3-5-1&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सरस्वतीदृषद्वत्यौ यमुनां च निषेव्य ते।&lt;br /&gt;
ययुर्वनेनैव वनं सततं पश्चिमां दिशम्॥ 3-5-2&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ततः सरस्वतीकूले समेषु मरुधन्वसु।&lt;br /&gt;
काम्यकं नाम ददृशुर्वनं मुनिजनप्रियम्॥ 3-5-3&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तत्र ते न्यवसन्वीरा वने बहुमृगद्विजे।&lt;br /&gt;
अन्वास्यमाना मुनिभिः सान्त्व्यमानाश्च भारत॥ 3-5-4&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
विदुरस्त्वथ पाण्डूनां सदा दर्शनलालसः।&lt;br /&gt;
जगामैकरथेनैव काम्यकं वनमृद्धिमत्॥ 3-5-5&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ततो गत्वा विदुरः काम्यकं तच्छीघ्रैरश्वैर्वाहिना स्यन्दनेन।&lt;br /&gt;
ददर्शासीनं धर्मात्मानं विविक्ते सार्धं द्रौपद्या भातृभिर्ब्राह्मणैश्च॥ 3-5-6&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ततोऽपश्यद्विदुरं तूर्णमारादभ्यायान्तं सत्यसन्धः स राजा।&lt;br /&gt;
अथाब्रवीद्भ्रातरं भीमसेनं किं नु क्षत्ता वक्ष्यति नः समेत्य॥ 3-5-7&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कच्चिन्नायं वचनात्सौबलस्य समाह्वाता देवनायोपयातः।&lt;br /&gt;
कच्चित्क्षुद्रः शकुनिर्नायुधानि जेष्यत्यस्मान्पुनरेवाक्षवत्याम्॥ 3-5-8&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
समाहूतः केनचिदाद्रवेति नाहं शक्तो भीमसेनापयातुम्।&lt;br /&gt;
गाण्डीवे च संशयिते कथं नु राज्यप्राप्तिः संशयिता भवेन्नः॥ 3-5-9&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वैशम्पायन उवाच&lt;br /&gt;
तत उत्थाय विदुरं पाण्डवेयाः प्रत्यगृह्णन्नृपते सर्व एव।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तैः सत्कृतः स च तानाजमीढो यथोचितं पाण्डुपुत्रान्समेयात्॥ 3-5-10&lt;br /&gt;
समाश्वस्तं विदुरं ते नरर्षभास्ततोऽपृच्छन्नागमनाय हेतुम्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
स चापि तेभ्यो विस्तरतः शशंस यथावृत्तो धृतराष्ट्रोऽम्बिकेयः॥ 3-5-11&lt;br /&gt;
विदुर उवाच&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अवोचन्मां धृतराष्ट्रोऽनुगुप्तमजातशत्रो परिगृह्याभिपूज्य।&lt;br /&gt;
एवं गते समतामभ्युपेत्य पथ्यं तेषां मम चैव ब्रवीहि॥ 3-5-12&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मयाप्युक्तं यत्क्षेमं कौरवाणां हितं पथ्यं धृतराष्ट्रस्य चैव।&lt;br /&gt;
तद्वै तस्मै न रुचामभ्युपैति ततश्चाहं क्षेममन्यन्न मन्ये॥ 3-5-13&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
परं श्रेयः पाण्डवेया मयोक्तं न मे तच्च श्रुतवानाम्बिकेयः।&lt;br /&gt;
यथाऽऽतुरस्येव हि पथ्यमन्नं न रोचते स्मास्य तदुच्यमानम्॥ 3-5-14&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
न श्रेयसे नीयतेऽजातशत्रो स्त्री श्रोत्रियस्येव गृहे प्रदुष्टा।&lt;br /&gt;
ध्रुवं न रोचेद्भरतर्षभस्य पतिः कुमार्या इव षष्टिवर्षः॥ 3-5-15&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ध्रुवं विनाशो नृप कौरवाणां न वै श्रेयो धृतराष्ट्रः परैति।&lt;br /&gt;
यथा च पर्णे पुष्करस्यावसिक्तं जलं न तिष्ठेत्पथ्यमुक्तं तथास्मिन्॥ 3-5-16&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ततः क्रुद्धो धृतराष्ट्रोऽब्रवीन्मां यस्मिन्श्रद्धा भारत तत्र याहि।&lt;br /&gt;
नाहं भूयः कामये त्वां सहायं महीमिमां पालयितुं पुरं वा॥ 3-5-17&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सोऽहं त्यक्तो धृतराष्ट्रेण राज्ञा प्रशासितुं त्वामुपयातो नरेन्द्र।&lt;br /&gt;
तद्वै सर्वं यन्मयोक्तं सभायां तद्धार्यतां यत्प्रवक्ष्यामि भूयः॥ 3-5-18&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
क्लेशैस्तीव्रैर्युज्यमानः सपत्नैः क्षमां कुर्वन्कालमुपासते यः।&lt;br /&gt;
संवर्धयन्स्तोकमिवाग्निमात्मवान्स वै भुङ्क्ते पृथिवीमेक एव॥ 3-5-19&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यस्याविभक्तं वसु राजन्सहायैस्तस्य दुःखेऽप्यंशभाजः सहायाः।&lt;br /&gt;
सहायानामेष सङ्ग्रहणेऽध्युपायः सहायाप्तौ पृथिवीप्राप्तिमाहुः॥ 3-5-20&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सत्यं श्रेष्ठं पाण्डव विप्रलापं तुल्यं चान्नं सह भोज्यं सहायैः।&lt;br /&gt;
आत्मा चैषामग्रतो न स्म पूज्य एवंवृत्तिवर्धते भूमिपालः॥ 3-5-21&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
युधिष्ठिर उवाच&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
एवं करिष्यामि यथा ब्रवीषि परां बुद्धिमुपगम्याप्रमत्तः।&lt;br /&gt;
यच्चाप्यन्यद्देशकालोपपन्नं तद्वै वाच्यं तत्करिष्यामि कृत्स्नम्॥ 3-5-22&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि अरण्यपर्वणि विदुरनिर्वासे पञ्चमोऽध्यायः॥ 5 ॥&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>ShraddhaV</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://dharmawiki.org/index.php?title=User:ShraddhaV&amp;diff=119869</id>
		<title>User:ShraddhaV</title>
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		<updated>2019-07-17T14:46:46Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;ShraddhaV: Added shlokas of chp 5&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;वैशम्पायन उवाच&lt;br /&gt;
पाण्डवास्तु वने वासमुद्दिश्य भरतर्षभाः।&lt;br /&gt;
प्रययुः जाह्नवीकूलात्कुरुक्षेत्रं सहानुगाः॥ 3-5-1&lt;br /&gt;
सरस्वतीदृषद्वत्यौ यमुनां च निषेव्य ते।&lt;br /&gt;
ययुर्वनेनैव वनं सततं पश्चिमां दिशम्॥ 3-5-2&lt;br /&gt;
ततः सरस्वतीकूले समेषु मरुधन्वसु।&lt;br /&gt;
काम्यकं नाम ददृशुर्वनं मुनिजनप्रियम्॥ 3-5-3&lt;br /&gt;
तत्र ते न्यवसन्वीरा वने बहुमृगद्विजे।&lt;br /&gt;
अन्वास्यमाना मुनिभिः सान्त्व्यमानाश्च भारत॥ 3-5-4&lt;br /&gt;
विदुरस्त्वथ पाण्डूनां सदा दर्शनलालसः।&lt;br /&gt;
जगामैकरथेनैव काम्यकं वनमृद्धिमत्॥ 3-5-5&lt;br /&gt;
ततो गत्वा विदुरः काम्यकं तच्छीघ्रैरश्वैर्वाहिना स्यन्दनेन।&lt;br /&gt;
ददर्शासीनं धर्मात्मानं विविक्ते सार्धं द्रौपद्या भातृभिर्ब्राह्मणैश्च॥ 3-5-6&lt;br /&gt;
ततोऽपश्यद्विदुरं तूर्णमारादभ्यायान्तं सत्यसन्धः स राजा।&lt;br /&gt;
अथाब्रवीद्भ्रातरं भीमसेनं किं नु क्षत्ता वक्ष्यति नः समेत्य॥ 3-5-7&lt;br /&gt;
कच्चिन्नायं वचनात्सौबलस्य समाह्वाता देवनायोपयातः।&lt;br /&gt;
कच्चित्क्षुद्रः शकुनिर्नायुधानि जेष्यत्यस्मान्पुनरेवाक्षवत्याम्॥ 3-5-8&lt;br /&gt;
समाहूतः केनचिदाद्रवेति नाहं शक्तो भीमसेनापयातुम्।&lt;br /&gt;
गाण्डीवे च संशयिते कथं नु राज्यप्राप्तिः संशयिता भवेन्नः॥ 3-5-9&lt;br /&gt;
वैशम्पायन उवाच&lt;br /&gt;
तत उत्थाय विदुरं पाण्डवेयाः प्रत्यगृह्णन्नृपते सर्व एव।&lt;br /&gt;
तैः सत्कृतः स च तानाजमीढो यथोचितं पाण्डुपुत्रान्समेयात्॥ 3-5-10&lt;br /&gt;
समाश्वस्तं विदुरं ते नरर्षभास्ततोऽपृच्छन्नागमनाय हेतुम्।&lt;br /&gt;
स चापि तेभ्यो विस्तरतः शशंस यथावृत्तो धृतराष्ट्रोऽम्बिकेयः॥ 3-5-11&lt;br /&gt;
विदुर उवाच&lt;br /&gt;
अवोचन्मां धृतराष्ट्रोऽनुगुप्तमजातशत्रो परिगृह्याभिपूज्य।&lt;br /&gt;
एवं गते समतामभ्युपेत्य पथ्यं तेषां मम चैव ब्रवीहि॥ 3-5-12&lt;br /&gt;
मयाप्युक्तं यत्क्षेमं कौरवाणां हितं पथ्यं धृतराष्ट्रस्य चैव।&lt;br /&gt;
तद्वै तस्मै न रुचामभ्युपैति ततश्चाहं क्षेममन्यन्न मन्ये॥ 3-5-13&lt;br /&gt;
परं श्रेयः पाण्डवेया मयोक्तं न मे तच्च श्रुतवानाम्बिकेयः।&lt;br /&gt;
यथाऽऽतुरस्येव हि पथ्यमन्नं न रोचते स्मास्य तदुच्यमानम्॥ 3-5-14&lt;br /&gt;
न श्रेयसे नीयतेऽजातशत्रो स्त्री श्रोत्रियस्येव गृहे प्रदुष्टा।&lt;br /&gt;
ध्रुवं न रोचेद्भरतर्षभस्य पतिः कुमार्या इव षष्टिवर्षः॥ 3-5-15&lt;br /&gt;
ध्रुवं विनाशो नृप कौरवाणां न वै श्रेयो धृतराष्ट्रः परैति।&lt;br /&gt;
यथा च पर्णे पुष्करस्यावसिक्तं जलं न तिष्ठेत्पथ्यमुक्तं तथास्मिन्॥ 3-5-16&lt;br /&gt;
ततः क्रुद्धो धृतराष्ट्रोऽब्रवीन्मां यस्मिन्श्रद्धा भारत तत्र याहि।&lt;br /&gt;
नाहं भूयः कामये त्वां सहायं महीमिमां पालयितुं पुरं वा॥ 3-5-17&lt;br /&gt;
सोऽहं त्यक्तो धृतराष्ट्रेण राज्ञा प्रशासितुं त्वामुपयातो नरेन्द्र।&lt;br /&gt;
तद्वै सर्वं यन्मयोक्तं सभायां तद्धार्यतां यत्प्रवक्ष्यामि भूयः॥ 3-5-18&lt;br /&gt;
क्लेशैस्तीव्रैर्युज्यमानः सपत्नैः क्षमां कुर्वन्कालमुपासते यः।&lt;br /&gt;
संवर्धयन्स्तोकमिवाग्निमात्मवान्स वै भुङ्क्ते पृथिवीमेक एव॥ 3-5-19&lt;br /&gt;
यस्याविभक्तं वसु राजन्सहायैस्तस्य दुःखेऽप्यंशभाजः सहायाः।&lt;br /&gt;
सहायानामेष सङ्ग्रहणेऽध्युपायः सहायाप्तौ पृथिवीप्राप्तिमाहुः॥ 3-5-20&lt;br /&gt;
सत्यं श्रेष्ठं पाण्डव विप्रलापं तुल्यं चान्नं सह भोज्यं सहायैः।&lt;br /&gt;
आत्मा चैषामग्रतो न स्म पूज्य एवंवृत्तिवर्धते भूमिपालः॥ 3-5-21&lt;br /&gt;
युधिष्ठिर उवाच&lt;br /&gt;
एवं करिष्यामि यथा ब्रवीषि परां बुद्धिमुपगम्याप्रमत्तः।&lt;br /&gt;
यच्चाप्यन्यद्देशकालोपपन्नं तद्वै वाच्यं तत्करिष्यामि कृत्स्नम्॥ 3-5-22&lt;br /&gt;
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि अरण्यपर्वणि विदुरनिर्वासे पञ्चमोऽध्यायः॥ 5 ॥&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>ShraddhaV</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://dharmawiki.org/index.php?title=Vanaparva_Adhyaya_5_(%E0%A4%B5%E0%A4%A8%E0%A4%AA%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%B5%E0%A4%A3%E0%A4%BF_%E0%A4%85%E0%A4%A7%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%AF%E0%A4%83_%E0%A5%AB)&amp;diff=119862</id>
		<title>Vanaparva Adhyaya 5 (वनपर्वणि अध्यायः ५)</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://dharmawiki.org/index.php?title=Vanaparva_Adhyaya_5_(%E0%A4%B5%E0%A4%A8%E0%A4%AA%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%B5%E0%A4%A3%E0%A4%BF_%E0%A4%85%E0%A4%A7%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%AF%E0%A4%83_%E0%A5%AB)&amp;diff=119862"/>
		<updated>2019-07-17T03:35:52Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;ShraddhaV: Added chp 5 shlokas of vanaparva&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;वैशम्पायन उवाच&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पाण्डवास्तु वने वासमुद्दिश्य भरतर्षभाः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
प्रययुः जाह्नवीकूलात्कुरुक्षेत्रं सहानुगाः॥ 3-5-1&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सरस्वतीदृषद्वत्यौ यमुनां च निषेव्य ते।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ययुर्वनेनैव वनं सततं पश्चिमां दिशम्॥ 3-5-2&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ततः सरस्वतीकूले समेषु मरुधन्वसु।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
काम्यकं नाम ददृशुर्वनं मुनिजनप्रियम्॥ 3-5-3&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तत्र ते न्यवसन्वीरा वने बहुमृगद्विजे।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अन्वास्यमाना मुनिभिः सान्त्व्यमानाश्च भारत॥ 3-5-4&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
विदुरस्त्वथ पाण्डूनां सदा दर्शनलालसः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जगामैकरथेनैव काम्यकं वनमृद्धिमत्॥ 3-5-5&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ततो गत्वा विदुरः काम्यकं तच्छीघ्रैरश्वैर्वाहिना स्यन्दनेन।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ददर्शासीनं धर्मात्मानं विविक्ते सार्धं द्रौपद्या भातृभिर्ब्राह्मणैश्च॥ 3-5-6&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ततोऽपश्यद्विदुरं तूर्णमारादभ्यायान्तं सत्यसन्धः स राजा।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अथाब्रवीद्भ्रातरं भीमसेनं किं नु क्षत्ता वक्ष्यति नः समेत्य॥ 3-5-7&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कच्चिन्नायं वचनात्सौबलस्य समाह्वाता देवनायोपयातः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कच्चित्क्षुद्रः शकुनिर्नायुधानि जेष्यत्यस्मान्पुनरेवाक्षवत्याम्॥ 3-5-8&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
समाहूतः केनचिदाद्रवेति नाहं शक्तो भीमसेनापयातुम्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
गाण्डीवे च संशयिते कथं नु राज्यप्राप्तिः संशयिता भवेन्नः॥ 3-5-9&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वैशम्पायन उवाच&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तत उत्थाय विदुरं पाण्डवेयाः प्रत्यगृह्णन्नृपते सर्व एव।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तैः सत्कृतः स च तानाजमीढो यथोचितं पाण्डुपुत्रान्समेयात्॥ 3-5-10&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
समाश्वस्तं विदुरं ते नरर्षभास्ततोऽपृच्छन्नागमनाय हेतुम्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
स चापि तेभ्यो विस्तरतः शशंस यथावृत्तो धृतराष्ट्रोऽम्बिकेयः॥ 3-5-11&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
विदुर उवाच&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अवोचन्मां धृतराष्ट्रोऽनुगुप्तमजातशत्रो परिगृह्याभिपूज्य।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
एवं गते समतामभ्युपेत्य पथ्यं तेषां मम चैव ब्रवीहि॥ 3-5-12&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मयाप्युक्तं यत्क्षेमं कौरवाणां हितं पथ्यं धृतराष्ट्रस्य चैव।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तद्वै तस्मै न रुचामभ्युपैति ततश्चाहं क्षेममन्यन्न मन्ये॥ 3-5-13&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
परं श्रेयः पाण्डवेया मयोक्तं न मे तच्च श्रुतवानाम्बिकेयः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यथाऽऽतुरस्येव हि पथ्यमन्नं न रोचते स्मास्य तदुच्यमानम्॥ 3-5-14&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
न श्रेयसे नीयतेऽजातशत्रो स्त्री श्रोत्रियस्येव गृहे प्रदुष्टा।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ध्रुवं न रोचेद्भरतर्षभस्य पतिः कुमार्या इव षष्टिवर्षः॥ 3-5-15&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ध्रुवं विनाशो नृप कौरवाणां न वै श्रेयो धृतराष्ट्रः परैति।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यथा च पर्णे पुष्करस्यावसिक्तं जलं न तिष्ठेत्पथ्यमुक्तं तथास्मिन्॥ 3-5-16&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ततः क्रुद्धो धृतराष्ट्रोऽब्रवीन्मां यस्मिन्श्रद्धा भारत तत्र याहि।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
नाहं भूयः कामये त्वां सहायं महीमिमां पालयितुं पुरं वा॥ 3-5-17&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सोऽहं त्यक्तो धृतराष्ट्रेण राज्ञा प्रशासितुं त्वामुपयातो नरेन्द्र।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तद्वै सर्वं यन्मयोक्तं सभायां तद्धार्यतां यत्प्रवक्ष्यामि भूयः॥ 3-5-18&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
क्लेशैस्तीव्रैर्युज्यमानः सपत्नैः क्षमां कुर्वन्कालमुपासते यः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
संवर्धयन्स्तोकमिवाग्निमात्मवान्स वै भुङ्क्ते पृथिवीमेक एव॥ 3-5-19&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यस्याविभक्तं वसु राजन्सहायैस्तस्य दुःखेऽप्यंशभाजः सहायाः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सहायानामेष सङ्ग्रहणेऽध्युपायः सहायाप्तौ पृथिवीप्राप्तिमाहुः॥ 3-5-20&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सत्यं श्रेष्ठं पाण्डव विप्रलापं तुल्यं चान्नं सह भोज्यं सहायैः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आत्मा चैषामग्रतो न स्म पूज्य एवंवृत्तिवर्धते भूमिपालः॥ 3-5-21&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
युधिष्ठिर उवाच&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
एवं करिष्यामि यथा ब्रवीषि परां बुद्धिमुपगम्याप्रमत्तः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यच्चाप्यन्यद्देशकालोपपन्नं तद्वै वाच्यं तत्करिष्यामि कृत्स्नम्॥ 3-5-22&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि अरण्यपर्वणि विदुरनिर्वासे पञ्चमोऽध्यायः॥ 5 ॥&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>ShraddhaV</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://dharmawiki.org/index.php?title=Vanaparva_Adhyaya_4_(%E0%A4%B5%E0%A4%A8%E0%A4%AA%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%B5%E0%A4%A3%E0%A4%BF_%E0%A4%85%E0%A4%A7%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%AF%E0%A4%83_%E0%A5%AA)&amp;diff=119861</id>
		<title>Vanaparva Adhyaya 4 (वनपर्वणि अध्यायः ४)</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://dharmawiki.org/index.php?title=Vanaparva_Adhyaya_4_(%E0%A4%B5%E0%A4%A8%E0%A4%AA%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%B5%E0%A4%A3%E0%A4%BF_%E0%A4%85%E0%A4%A7%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%AF%E0%A4%83_%E0%A5%AA)&amp;diff=119861"/>
		<updated>2019-07-17T03:17:52Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;ShraddhaV: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;वैशम्पायन उवाच&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
 वनं प्रविष्टेष्वथ पाण्डवेषु प्रज्ञाचक्षुस्तप्यमानोऽम्बिकेयः।&lt;br /&gt;
 धर्मात्मानं विदुरमगाधबुद्धिं सुखासीनो वाक्यमुवाच राजा॥ 3-4-1&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
धृतराष्ट्र उवाच&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
 प्रज्ञा च ते भार्गवस्येव शुद्धा धर्म च त्वं परमं वेत्थ सूक्ष्मम्।&lt;br /&gt;
 समश्च त्वं सम्मतः कौरवाणां पथ्यं चैषां मम चैव ब्रवीहि॥ 3-4-2&lt;br /&gt;
 [[:Category:Vidur|''Vidur'']]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
 एवं गते विदुर यदद्य कार्यं पौराश्च मे कथमस्मान्भजेरन्।&lt;br /&gt;
 ते चाप्यस्मान्नोद्धरेयुः समूलांस्तत्त्वं ब्रूयाः साधुकार्याणि वेत्सि॥ 3-4-3&lt;br /&gt;
 [[:Category:Dharma|''Dharma'']]&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
न कामये तांश्च विनश्यमानान्॥&lt;br /&gt;
सौबलेनैव पापेन दुर्योधनहितैषिणा।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
क्रूरमाचरितं क्षत्तर्न मे प्रियमनुष्ठितम्॥&lt;br /&gt;
तथैवाङ्गीकृते तव तद्भवान्वक्तुमर्हति।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उत्तरं प्राप्तकालं च किमन्यन्मन्यते क्षमम्॥&lt;br /&gt;
नास्ति धर्मे सहायत्वमिति मे दीर्यते मनः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यत्र पाण्डुसुतास्सर्वे क्लिश्यन्ति वनमागताः॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
विदुर उवाच&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
त्रिवर्गोऽयं धर्ममूलो नरेन्द्र राज्यं चेदं धर्ममूलं वदन्ति।&lt;br /&gt;
धर्मे राजन्वर्तमानः स्वशक्त्या पुत्रान्सर्वान्पाहि पाण्डोः सुतांश्च॥ 3-4-4&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
स वै धर्मो विप्रलब्धः सभायां पापात्मभिः सौबलेयप्रधानैः।&lt;br /&gt;
आहूय कुन्तीसुतमक्षवत्यां पराजैषीत्सत्यसन्धं सुतस्ते॥ 3-4-5&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
एतस्य ते दुष्प्रणीतस्य राजञ्छेषस्याहं परिपश्याम्युपायम्।&lt;br /&gt;
यथा पुत्रस्तव कौरव्य पापान्मुक्तो लोके प्रतितिष्ठेत साधु॥ 3-4-6&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
तद्वै सर्वं पाण्डुपुत्रा लभन्तां यत्तद्राजन्नभिसृष्टं त्वयाऽऽसीत्।&lt;br /&gt;
एष धर्मः परमो यत्स्वकेन राजा तुष्येन्न परस्वेषु गृध्येत्॥ 3-4-7&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
यशो न नश्येज्ज्ञातिभेदश्च न स्याद्धर्मो न स्यान्नैव चैवं कृते त्वाम्।&lt;br /&gt;
एतत्कार्यं तव सर्वप्रधानं तेषां तुष्टिः शकुनेश्चावमानः॥ 3-4-8&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
एवं शेषं यदि पुत्रेषु ते स्यादेतद्राजंस्त्वरमाणः कुरुष्व।&lt;br /&gt;
तथैतदेवं न करोषि राजन्ध्रुवं कुरूणां भविता विनाशः॥ 3-4-9&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
 न हि क्रुद्धो भीमसेनोऽर्जुनो वा शेषं कुर्याच्छात्रवाणामनीके।&lt;br /&gt;
 येषां योद्धा सव्यसाची कृतास्त्रो धनुर्येषां गाण्डिवं लोकसारम्॥ 3-4-10&lt;br /&gt;
 येषां भीमो बाहुशाली च योद्धा तेषां लोके किं नु न प्राप्यमस्ति।&lt;br /&gt;
 उक्तं पूर्वं जातमात्रे सुते ते मया यत्ते हितमासीत्तदानीम्॥ 3-4-11&lt;br /&gt;
 पुत्रं त्यजेममहितं कुलस्य हितं परं न च तत्त्वं चकर्थ।&lt;br /&gt;
 इदं च राजन्हितमुक्तं न चेत्त्वमेवं कर्ता परितप्तासि पश्चात्॥ 3-4-12&lt;br /&gt;
 यद्येतदेवमनुमन्ता सुतस्ते सम्प्रीयमाणः पाण्डवैरेकराज्यम्।&lt;br /&gt;
 तापो न ते भविता प्रीतियोगान्न चेन्निगृह्णीष्व सुतं सुखाय॥ 3-4-13&lt;br /&gt;
 दुर्योधनं त्वहितं वै निगृह्य पाण्डोः पुत्रं प्रकुरुष्वाधिपत्ये।&lt;br /&gt;
 अजातशत्रुर्हि विमुक्तरागो धर्मेणेमां पृथिवीं शास्तु राजन्॥ 3-4-14&lt;br /&gt;
 ततो राजन्पार्थिवाः सर्व एव वैश्या इवास्मानुपतिष्ठन्तु सद्यः।&lt;br /&gt;
 दुर्योधनः शकुनिः सूतपुत्रः प्रीत्या राजन्पाण्डुपुत्रान्भजन्तु॥ 3-4-15&lt;br /&gt;
 दुःशासनो याचतु भीमसेनं सभामध्ये द्रुपदस्यात्मजां च।&lt;br /&gt;
 युधिष्ठिरं त्वं परिसान्त्वयस्व राज्ये चैनं स्थापयस्वाभिपूज्य॥ 3-4-16&lt;br /&gt;
 त्वया पृष्टः किमहमन्यद्वदेयमेतत्कृत्वा कृतकृत्योऽसि राजन्॥ 3-4-16&lt;br /&gt;
 [[:Category:Duryodhan|''Duryodhan'']]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
धृतराष्ट्र उवाच&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
 एतद्वाक्यं विदुर यत्ते सभायामिह प्रोक्तं पाण्डवान्प्राप्य मां च।&lt;br /&gt;
 हितं तेषामहितं मामकानामेतत्सर्वं मम नावैति चेतः॥ 3-4-17&lt;br /&gt;
 इदं त्विदानीं गत एव निश्चितं तेषामर्थे पाण्डवानां यदात्थ।&lt;br /&gt;
 तेनाद्य मन्ये नासि हितो ममेति कथं हि पुत्रं पाण्डवार्थे त्यजेयम्॥ 3-4-18&lt;br /&gt;
 असंशयं तेऽपि ममैव पुत्रा दुर्योधनस्तु मम देहात्प्रसूतः।&lt;br /&gt;
 स्वं वै देहं परहेतोस्त्यजेति को तु ब्रूयात्समतामन्ववेक्ष्य॥ 3-4-19&lt;br /&gt;
 स मां जिह्मं विदुर सर्वं ब्रवीषि मानं च तेऽहमधिकं धारयामि।&lt;br /&gt;
 यथेच्छकं गच्छ वा तिष्ठ वा त्वं सुसान्त्व्यमानाप्यसती स्त्री जहाति॥ 3-4-20&lt;br /&gt;
 [[:Category:Dhristrashtra's attachment to Duryodhan|''Dhristrashtra's attachment to Duryodhan'']] [[:Category:आसक्ती|''आसक्ती'']] &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वैशम्पायन उवाच&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
 एतावदुक्त्वा धृतराष्ट्रोऽन्वपद्यदन्तर्वेश्म सहसोत्थाय राजन्।&lt;br /&gt;
 नेदमस्तीत्यथ विदुरो भाषमाणः सम्प्राद्रवद्यत्र पार्था बभूवुः॥ 3-4-21&lt;br /&gt;
 [[:Category:Dhristrashtra|''Dhristrashtra]] [[:Category:Vidur|''Vidur'']] &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
 इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि अरण्यपर्वणि विदुरवाक्यप्रत्याख्याने चतुर्थोऽध्यायः॥ 4 ॥&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>ShraddhaV</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://dharmawiki.org/index.php?title=Vanaparva_Adhyaya_4_(%E0%A4%B5%E0%A4%A8%E0%A4%AA%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%B5%E0%A4%A3%E0%A4%BF_%E0%A4%85%E0%A4%A7%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%AF%E0%A4%83_%E0%A5%AA)&amp;diff=119860</id>
		<title>Vanaparva Adhyaya 4 (वनपर्वणि अध्यायः ४)</title>
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		<updated>2019-07-17T03:06:15Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;ShraddhaV: Added tags for this chapter.&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;वैशम्पायन उवाच&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
 वनं प्रविष्टेष्वथ पाण्डवेषु प्रज्ञाचक्षुस्तप्यमानोऽम्बिकेयः।&lt;br /&gt;
 धर्मात्मानं विदुरमगाधबुद्धिं सुखासीनो वाक्यमुवाच राजा॥ 3-4-1&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
धृतराष्ट्र उवाच&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
 प्रज्ञा च ते भार्गवस्येव शुद्धा धर्म च त्वं परमं वेत्थ सूक्ष्मम्।&lt;br /&gt;
 समश्च त्वं सम्मतः कौरवाणां पथ्यं चैषां मम चैव ब्रवीहि॥ 3-4-2&lt;br /&gt;
 [[:Category:Vidur|''Vidur'']]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
 एवं गते विदुर यदद्य कार्यं पौराश्च मे कथमस्मान्भजेरन्।&lt;br /&gt;
 ते चाप्यस्मान्नोद्धरेयुः समूलांस्तत्त्वं ब्रूयाः साधुकार्याणि वेत्सि॥ 3-4-3&lt;br /&gt;
 [[:Category:Dharma|''Dharma'']]&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
विदुर उवाच&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
त्रिवर्गोऽयं धर्ममूलो नरेन्द्र राज्यं चेदं धर्ममूलं वदन्ति।&lt;br /&gt;
धर्मे राजन्वर्तमानः स्वशक्त्या पुत्रान्सर्वान्पाहि पाण्डोः सुतांश्च॥ 3-4-4&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
स वै धर्मो विप्रलब्धः सभायां पापात्मभिः सौबलेयप्रधानैः।&lt;br /&gt;
आहूय कुन्तीसुतमक्षवत्यां पराजैषीत्सत्यसन्धं सुतस्ते॥ 3-4-5&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
एतस्य ते दुष्प्रणीतस्य राजञ्छेषस्याहं परिपश्याम्युपायम्।&lt;br /&gt;
यथा पुत्रस्तव कौरव्य पापान्मुक्तो लोके प्रतितिष्ठेत साधु॥ 3-4-6&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
तद्वै सर्वं पाण्डुपुत्रा लभन्तां यत्तद्राजन्नभिसृष्टं त्वयाऽऽसीत्।&lt;br /&gt;
एष धर्मः परमो यत्स्वकेन राजा तुष्येन्न परस्वेषु गृध्येत्॥ 3-4-7&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
यशो न नश्येज्ज्ञातिभेदश्च न स्याद्धर्मो न स्यान्नैव चैवं कृते त्वाम्।&lt;br /&gt;
एतत्कार्यं तव सर्वप्रधानं तेषां तुष्टिः शकुनेश्चावमानः॥ 3-4-8&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
एवं शेषं यदि पुत्रेषु ते स्यादेतद्राजंस्त्वरमाणः कुरुष्व।&lt;br /&gt;
तथैतदेवं न करोषि राजन्ध्रुवं कुरूणां भविता विनाशः॥ 3-4-9&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
 न हि क्रुद्धो भीमसेनोऽर्जुनो वा शेषं कुर्याच्छात्रवाणामनीके।&lt;br /&gt;
 येषां योद्धा सव्यसाची कृतास्त्रो धनुर्येषां गाण्डिवं लोकसारम्॥ 3-4-10&lt;br /&gt;
 येषां भीमो बाहुशाली च योद्धा तेषां लोके किं नु न प्राप्यमस्ति।&lt;br /&gt;
 उक्तं पूर्वं जातमात्रे सुते ते मया यत्ते हितमासीत्तदानीम्॥ 3-4-11&lt;br /&gt;
 पुत्रं त्यजेममहितं कुलस्य हितं परं न च तत्त्वं चकर्थ।&lt;br /&gt;
 इदं च राजन्हितमुक्तं न चेत्त्वमेवं कर्ता परितप्तासि पश्चात्॥ 3-4-12&lt;br /&gt;
 यद्येतदेवमनुमन्ता सुतस्ते सम्प्रीयमाणः पाण्डवैरेकराज्यम्।&lt;br /&gt;
 तापो न ते भविता प्रीतियोगान्न चेन्निगृह्णीष्व सुतं सुखाय॥ 3-4-13&lt;br /&gt;
 दुर्योधनं त्वहितं वै निगृह्य पाण्डोः पुत्रं प्रकुरुष्वाधिपत्ये।&lt;br /&gt;
 अजातशत्रुर्हि विमुक्तरागो धर्मेणेमां पृथिवीं शास्तु राजन्॥ 3-4-14&lt;br /&gt;
 ततो राजन्पार्थिवाः सर्व एव वैश्या इवास्मानुपतिष्ठन्तु सद्यः।&lt;br /&gt;
 दुर्योधनः शकुनिः सूतपुत्रः प्रीत्या राजन्पाण्डुपुत्रान्भजन्तु॥ 3-4-15&lt;br /&gt;
 दुःशासनो याचतु भीमसेनं सभामध्ये द्रुपदस्यात्मजां च।&lt;br /&gt;
 युधिष्ठिरं त्वं परिसान्त्वयस्व राज्ये चैनं स्थापयस्वाभिपूज्य॥ 3-4-16&lt;br /&gt;
 त्वया पृष्टः किमहमन्यद्वदेयमेतत्कृत्वा कृतकृत्योऽसि राजन्॥ 3-4-16&lt;br /&gt;
 [[:Category:Duryodhan|''Duryodhan'']]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
धृतराष्ट्र उवाच&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
 एतद्वाक्यं विदुर यत्ते सभायामिह प्रोक्तं पाण्डवान्प्राप्य मां च।&lt;br /&gt;
 हितं तेषामहितं मामकानामेतत्सर्वं मम नावैति चेतः॥ 3-4-17&lt;br /&gt;
 इदं त्विदानीं गत एव निश्चितं तेषामर्थे पाण्डवानां यदात्थ।&lt;br /&gt;
 तेनाद्य मन्ये नासि हितो ममेति कथं हि पुत्रं पाण्डवार्थे त्यजेयम्॥ 3-4-18&lt;br /&gt;
 असंशयं तेऽपि ममैव पुत्रा दुर्योधनस्तु मम देहात्प्रसूतः।&lt;br /&gt;
 स्वं वै देहं परहेतोस्त्यजेति को तु ब्रूयात्समतामन्ववेक्ष्य॥ 3-4-19&lt;br /&gt;
 स मां जिह्मं विदुर सर्वं ब्रवीषि मानं च तेऽहमधिकं धारयामि।&lt;br /&gt;
 यथेच्छकं गच्छ वा तिष्ठ वा त्वं सुसान्त्व्यमानाप्यसती स्त्री जहाति॥ 3-4-20&lt;br /&gt;
 [[:Category:Dhristrashtra's attachment to Duryodhan|''Dhristrashtra's attachment to Duryodhan'']] [[:Category:आसक्ती|''आसक्ती'']] &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वैशम्पायन उवाच&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
 एतावदुक्त्वा धृतराष्ट्रोऽन्वपद्यदन्तर्वेश्म सहसोत्थाय राजन्।&lt;br /&gt;
 नेदमस्तीत्यथ विदुरो भाषमाणः सम्प्राद्रवद्यत्र पार्था बभूवुः॥ 3-4-21&lt;br /&gt;
 [[:Category:Dhristrashtra|''Dhristrashtra]] [[:Category:Vidur|''Vidur'']] &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
 इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि अरण्यपर्वणि विदुरवाक्यप्रत्याख्याने चतुर्थोऽध्यायः॥ 4 ॥&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>ShraddhaV</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://dharmawiki.org/index.php?title=Vanaparva_Adhyaya_4_(%E0%A4%B5%E0%A4%A8%E0%A4%AA%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%B5%E0%A4%A3%E0%A4%BF_%E0%A4%85%E0%A4%A7%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%AF%E0%A4%83_%E0%A5%AA)&amp;diff=119859</id>
		<title>Vanaparva Adhyaya 4 (वनपर्वणि अध्यायः ४)</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://dharmawiki.org/index.php?title=Vanaparva_Adhyaya_4_(%E0%A4%B5%E0%A4%A8%E0%A4%AA%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%B5%E0%A4%A3%E0%A4%BF_%E0%A4%85%E0%A4%A7%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%AF%E0%A4%83_%E0%A5%AA)&amp;diff=119859"/>
		<updated>2019-07-17T02:36:18Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;ShraddhaV: Added tags till 10th shloka&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;वैशम्पायन उवाच&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
 वनं प्रविष्टेष्वथ पाण्डवेषु प्रज्ञाचक्षुस्तप्यमानोऽम्बिकेयः।&lt;br /&gt;
 धर्मात्मानं विदुरमगाधबुद्धिं सुखासीनो वाक्यमुवाच राजा॥ 3-4-1&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
धृतराष्ट्र उवाच&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
 प्रज्ञा च ते भार्गवस्येव शुद्धा धर्म च त्वं परमं वेत्थ सूक्ष्मम्।&lt;br /&gt;
 समश्च त्वं सम्मतः कौरवाणां पथ्यं चैषां मम चैव ब्रवीहि॥ 3-4-2&lt;br /&gt;
 [[:Category:Vidur|''Vidur'']]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
 एवं गते विदुर यदद्य कार्यं पौराश्च मे कथमस्मान्भजेरन्।&lt;br /&gt;
 ते चाप्यस्मान्नोद्धरेयुः समूलांस्तत्त्वं ब्रूयाः साधुकार्याणि वेत्सि॥ 3-4-3&lt;br /&gt;
 [[:Category:Dharma|''Dharma'']]&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
विदुर उवाच&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
 त्रिवर्गोऽयं धर्ममूलो नरेन्द्र राज्यं चेदं धर्ममूलं वदन्ति।&lt;br /&gt;
 धर्मे राजन्वर्तमानः स्वशक्त्या पुत्रान्सर्वान्पाहि पाण्डोः सुतांश्च॥ 3-4-4&lt;br /&gt;
 स वै धर्मो विप्रलब्धः सभायां पापात्मभिः सौबलेयप्रधानैः।&lt;br /&gt;
 आहूय कुन्तीसुतमक्षवत्यां पराजैषीत्सत्यसन्धं सुतस्ते॥ 3-4-5&lt;br /&gt;
 एतस्य ते दुष्प्रणीतस्य राजञ्छेषस्याहं परिपश्याम्युपायम्।&lt;br /&gt;
 यथा पुत्रस्तव कौरव्य पापान्मुक्तो लोके प्रतितिष्ठेत साधु॥ 3-4-6&lt;br /&gt;
 तद्वै सर्वं पाण्डुपुत्रा लभन्तां यत्तद्राजन्नभिसृष्टं त्वयाऽऽसीत्।&lt;br /&gt;
 एष धर्मः परमो यत्स्वकेन राजा तुष्येन्न परस्वेषु गृध्येत्॥ 3-4-7&lt;br /&gt;
 यशो न नश्येज्ज्ञातिभेदश्च न स्याद्धर्मो न स्यान्नैव चैवं कृते त्वाम्।&lt;br /&gt;
 एतत्कार्यं तव सर्वप्रधानं तेषां तुष्टिः शकुनेश्चावमानः॥ 3-4-8&lt;br /&gt;
 एवं शेषं यदि पुत्रेषु ते स्यादेतद्राजंस्त्वरमाणः कुरुष्व।&lt;br /&gt;
 तथैतदेवं न करोषि राजन्ध्रुवं कुरूणां भविता विनाशः॥ 3-4-9&lt;br /&gt;
 न हि क्रुद्धो भीमसेनोऽर्जुनो वा शेषं कुर्याच्छात्रवाणामनीके।&lt;br /&gt;
 येषां योद्धा सव्यसाची कृतास्त्रो धनुर्येषां गाण्डिवं लोकसारम्॥ 3-4-10&lt;br /&gt;
  [[:Category:Duryodhan|''Duryodhan'']]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
 येषां भीमो बाहुशाली च योद्धा तेषां लोके किं नु न प्राप्यमस्ति।&lt;br /&gt;
 उक्तं पूर्वं जातमात्रे सुते ते मया यत्ते हितमासीत्तदानीम्॥ 3-4-11&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पुत्रं त्यजेममहितं कुलस्य हितं परं न च तत्त्वं चकर्थ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इदं च राजन्हितमुक्तं न चेत्त्वमेवं कर्ता परितप्तासि पश्चात्॥ 3-4-12&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यद्येतदेवमनुमन्ता सुतस्ते सम्प्रीयमाणः पाण्डवैरेकराज्यम्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तापो न ते भविता प्रीतियोगान्न चेन्निगृह्णीष्व सुतं सुखाय॥ 3-4-13&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दुर्योधनं त्वहितं वै निगृह्य पाण्डोः पुत्रं प्रकुरुष्वाधिपत्ये।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अजातशत्रुर्हि विमुक्तरागो धर्मेणेमां पृथिवीं शास्तु राजन्॥ 3-4-14&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ततो राजन्पार्थिवाः सर्व एव वैश्या इवास्मानुपतिष्ठन्तु सद्यः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दुर्योधनः शकुनिः सूतपुत्रः प्रीत्या राजन्पाण्डुपुत्रान्भजन्तु॥ 3-4-15&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दुःशासनो याचतु भीमसेनं सभामध्ये द्रुपदस्यात्मजां च।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
युधिष्ठिरं त्वं परिसान्त्वयस्व राज्ये चैनं स्थापयस्वाभिपूज्य॥ 3-4-16&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
त्वया पृष्टः किमहमन्यद्वदेयमेतत्कृत्वा कृतकृत्योऽसि राजन्॥ 3-4-16&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
धृतराष्ट्र उवाच&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
एतद्वाक्यं विदुर यत्ते सभायामिह प्रोक्तं पाण्डवान्प्राप्य मां च।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हितं तेषामहितं मामकानामेतत्सर्वं मम नावैति चेतः॥ 3-4-17&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इदं त्विदानीं गत एव निश्चितं तेषामर्थे पाण्डवानां यदात्थ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तेनाद्य मन्ये नासि हितो ममेति कथं हि पुत्रं पाण्डवार्थे त्यजेयम्॥ 3-4-18&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
असंशयं तेऽपि ममैव पुत्रा दुर्योधनस्तु मम देहात्प्रसूतः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
स्वं वै देहं परहेतोस्त्यजेति को तु ब्रूयात्समतामन्ववेक्ष्य॥ 3-4-19&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
स मां जिह्मं विदुर सर्वं ब्रवीषि मानं च तेऽहमधिकं धारयामि।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यथेच्छकं गच्छ वा तिष्ठ वा त्वं सुसान्त्व्यमानाप्यसती स्त्री जहाति॥ 3-4-20&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वैशम्पायन उवाच&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
एतावदुक्त्वा धृतराष्ट्रोऽन्वपद्यदन्तर्वेश्म सहसोत्थाय राजन्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
नेदमस्तीत्यथ विदुरो भाषमाणः सम्प्राद्रवद्यत्र पार्था बभूवुः॥ 3-4-21&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि अरण्यपर्वणि विदुरवाक्यप्रत्याख्याने चतुर्थोऽध्यायः॥ 4 ॥&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>ShraddhaV</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://dharmawiki.org/index.php?title=Vanaparva_Adhyaya_4_(%E0%A4%B5%E0%A4%A8%E0%A4%AA%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%B5%E0%A4%A3%E0%A4%BF_%E0%A4%85%E0%A4%A7%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%AF%E0%A4%83_%E0%A5%AA)&amp;diff=119831</id>
		<title>Vanaparva Adhyaya 4 (वनपर्वणि अध्यायः ४)</title>
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		<updated>2019-07-11T11:52:06Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;ShraddhaV: sample tag&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;वैशम्पायन उवाच&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
 वनं प्रविष्टेष्वथ पाण्डवेषु प्रज्ञाचक्षुस्तप्यमानोऽम्बिकेयः।&lt;br /&gt;
 धर्मात्मानं विदुरमगाधबुद्धिं सुखासीनो वाक्यमुवाच राजा॥ 3-4-1&lt;br /&gt;
 [[:Category:Ugrashrava|''Ugrashrava'']]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
धृतराष्ट्र उवाच&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
प्रज्ञा च ते भार्गवस्येव शुद्धा धर्म च त्वं परमं वेत्थ सूक्ष्मम्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
समश्च त्वं सम्मतः कौरवाणां पथ्यं चैषां मम चैव ब्रवीहि॥ 3-4-2&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
एवं गते विदुर यदद्य कार्यं पौराश्च मे कथमस्मान्भजेरन्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ते चाप्यस्मान्नोद्धरेयुः समूलांस्तत्त्वं ब्रूयाः साधुकार्याणि वेत्सि॥ 3-4-3&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
न कामये तांश्च विनश्यमानान्॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सौबलेनैव पापेन दुर्योधनहितैषिणा।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
क्रूरमाचरितं क्षत्तर्न मे प्रियमनुष्ठितम्॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तथैवाङ्गीकृते तव तद्भवान्वक्तुमर्हति।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उत्तरं प्राप्तकालं च किमन्यन्मन्यते क्षमम्॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
नास्ति धर्मे सहायत्वमिति मे दीर्यते मनः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यत्र पाण्डुसुतास्सर्वे क्लिश्यन्ति वनमागताः॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
विदुर उवाच&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
त्रिवर्गोऽयं धर्ममूलो नरेन्द्र राज्यं चेदं धर्ममूलं वदन्ति।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
धर्मे राजन्वर्तमानः स्वशक्त्या पुत्रान्सर्वान्पाहि पाण्डोः सुतांश्च॥ 3-4-4&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
स वै धर्मो विप्रलब्धः सभायां पापात्मभिः सौबलेयप्रधानैः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आहूय कुन्तीसुतमक्षवत्यां पराजैषीत्सत्यसन्धं सुतस्ते॥ 3-4-5&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
एतस्य ते दुष्प्रणीतस्य राजञ्छेषस्याहं परिपश्याम्युपायम्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यथा पुत्रस्तव कौरव्य पापान्मुक्तो लोके प्रतितिष्ठेत साधु॥ 3-4-6&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तद्वै सर्वं पाण्डुपुत्रा लभन्तां यत्तद्राजन्नभिसृष्टं त्वयाऽऽसीत्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
एष धर्मः परमो यत्स्वकेन राजा तुष्येन्न परस्वेषु गृध्येत्॥ 3-4-7&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यशो न नश्येज्ज्ञातिभेदश्च न स्याद्धर्मो न स्यान्नैव चैवं कृते त्वाम्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
एतत्कार्यं तव सर्वप्रधानं तेषां तुष्टिः शकुनेश्चावमानः॥ 3-4-8&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
एवं शेषं यदि पुत्रेषु ते स्यादेतद्राजंस्त्वरमाणः कुरुष्व।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तथैतदेवं न करोषि राजन्ध्रुवं कुरूणां भविता विनाशः॥ 3-4-9&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
न हि क्रुद्धो भीमसेनोऽर्जुनो वा शेषं कुर्याच्छात्रवाणामनीके।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
येषां योद्धा सव्यसाची कृतास्त्रो धनुर्येषां गाण्डिवं लोकसारम्॥ 3-4-10&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
येषां भीमो बाहुशाली च योद्धा तेषां लोके किं नु न प्राप्यमस्ति।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उक्तं पूर्वं जातमात्रे सुते ते मया यत्ते हितमासीत्तदानीम्॥ 3-4-11&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पुत्रं त्यजेममहितं कुलस्य हितं परं न च तत्त्वं चकर्थ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इदं च राजन्हितमुक्तं न चेत्त्वमेवं कर्ता परितप्तासि पश्चात्॥ 3-4-12&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यद्येतदेवमनुमन्ता सुतस्ते सम्प्रीयमाणः पाण्डवैरेकराज्यम्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तापो न ते भविता प्रीतियोगान्न चेन्निगृह्णीष्व सुतं सुखाय॥ 3-4-13&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दुर्योधनं त्वहितं वै निगृह्य पाण्डोः पुत्रं प्रकुरुष्वाधिपत्ये।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अजातशत्रुर्हि विमुक्तरागो धर्मेणेमां पृथिवीं शास्तु राजन्॥ 3-4-14&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ततो राजन्पार्थिवाः सर्व एव वैश्या इवास्मानुपतिष्ठन्तु सद्यः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दुर्योधनः शकुनिः सूतपुत्रः प्रीत्या राजन्पाण्डुपुत्रान्भजन्तु॥ 3-4-15&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दुःशासनो याचतु भीमसेनं सभामध्ये द्रुपदस्यात्मजां च।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
युधिष्ठिरं त्वं परिसान्त्वयस्व राज्ये चैनं स्थापयस्वाभिपूज्य॥ 3-4-16&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
त्वया पृष्टः किमहमन्यद्वदेयमेतत्कृत्वा कृतकृत्योऽसि राजन्॥ 3-4-16&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
धृतराष्ट्र उवाच&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
एतद्वाक्यं विदुर यत्ते सभायामिह प्रोक्तं पाण्डवान्प्राप्य मां च।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हितं तेषामहितं मामकानामेतत्सर्वं मम नावैति चेतः॥ 3-4-17&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इदं त्विदानीं गत एव निश्चितं तेषामर्थे पाण्डवानां यदात्थ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तेनाद्य मन्ये नासि हितो ममेति कथं हि पुत्रं पाण्डवार्थे त्यजेयम्॥ 3-4-18&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
असंशयं तेऽपि ममैव पुत्रा दुर्योधनस्तु मम देहात्प्रसूतः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
स्वं वै देहं परहेतोस्त्यजेति को तु ब्रूयात्समतामन्ववेक्ष्य॥ 3-4-19&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
स मां जिह्मं विदुर सर्वं ब्रवीषि मानं च तेऽहमधिकं धारयामि।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यथेच्छकं गच्छ वा तिष्ठ वा त्वं सुसान्त्व्यमानाप्यसती स्त्री जहाति॥ 3-4-20&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वैशम्पायन उवाच&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
एतावदुक्त्वा धृतराष्ट्रोऽन्वपद्यदन्तर्वेश्म सहसोत्थाय राजन्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
नेदमस्तीत्यथ विदुरो भाषमाणः सम्प्राद्रवद्यत्र पार्था बभूवुः॥ 3-4-21&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि अरण्यपर्वणि विदुरवाक्यप्रत्याख्याने चतुर्थोऽध्यायः॥ 4 ॥&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>ShraddhaV</name></author>
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		<title>Vanaparva Adhyaya 4 (वनपर्वणि अध्यायः ४)</title>
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		<updated>2019-07-11T11:46:11Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;ShraddhaV: slokas&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;वैशम्पायन उवाच&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वनं प्रविष्टेष्वथ पाण्डवेषु प्रज्ञाचक्षुस्तप्यमानोऽम्बिकेयः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
धर्मात्मानं विदुरमगाधबुद्धिं सुखासीनो वाक्यमुवाच राजा॥ 3-4-1&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
धृतराष्ट्र उवाच&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
प्रज्ञा च ते भार्गवस्येव शुद्धा धर्म च त्वं परमं वेत्थ सूक्ष्मम्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
समश्च त्वं सम्मतः कौरवाणां पथ्यं चैषां मम चैव ब्रवीहि॥ 3-4-2&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
एवं गते विदुर यदद्य कार्यं पौराश्च मे कथमस्मान्भजेरन्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ते चाप्यस्मान्नोद्धरेयुः समूलांस्तत्त्वं ब्रूयाः साधुकार्याणि वेत्सि॥ 3-4-3&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
न कामये तांश्च विनश्यमानान्॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सौबलेनैव पापेन दुर्योधनहितैषिणा।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
क्रूरमाचरितं क्षत्तर्न मे प्रियमनुष्ठितम्॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तथैवाङ्गीकृते तव तद्भवान्वक्तुमर्हति।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उत्तरं प्राप्तकालं च किमन्यन्मन्यते क्षमम्॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
नास्ति धर्मे सहायत्वमिति मे दीर्यते मनः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यत्र पाण्डुसुतास्सर्वे क्लिश्यन्ति वनमागताः॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
विदुर उवाच&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
त्रिवर्गोऽयं धर्ममूलो नरेन्द्र राज्यं चेदं धर्ममूलं वदन्ति।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
धर्मे राजन्वर्तमानः स्वशक्त्या पुत्रान्सर्वान्पाहि पाण्डोः सुतांश्च॥ 3-4-4&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
स वै धर्मो विप्रलब्धः सभायां पापात्मभिः सौबलेयप्रधानैः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आहूय कुन्तीसुतमक्षवत्यां पराजैषीत्सत्यसन्धं सुतस्ते॥ 3-4-5&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
एतस्य ते दुष्प्रणीतस्य राजञ्छेषस्याहं परिपश्याम्युपायम्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यथा पुत्रस्तव कौरव्य पापान्मुक्तो लोके प्रतितिष्ठेत साधु॥ 3-4-6&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तद्वै सर्वं पाण्डुपुत्रा लभन्तां यत्तद्राजन्नभिसृष्टं त्वयाऽऽसीत्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
एष धर्मः परमो यत्स्वकेन राजा तुष्येन्न परस्वेषु गृध्येत्॥ 3-4-7&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यशो न नश्येज्ज्ञातिभेदश्च न स्याद्धर्मो न स्यान्नैव चैवं कृते त्वाम्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
एतत्कार्यं तव सर्वप्रधानं तेषां तुष्टिः शकुनेश्चावमानः॥ 3-4-8&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
एवं शेषं यदि पुत्रेषु ते स्यादेतद्राजंस्त्वरमाणः कुरुष्व।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तथैतदेवं न करोषि राजन्ध्रुवं कुरूणां भविता विनाशः॥ 3-4-9&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
न हि क्रुद्धो भीमसेनोऽर्जुनो वा शेषं कुर्याच्छात्रवाणामनीके।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
येषां योद्धा सव्यसाची कृतास्त्रो धनुर्येषां गाण्डिवं लोकसारम्॥ 3-4-10&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
येषां भीमो बाहुशाली च योद्धा तेषां लोके किं नु न प्राप्यमस्ति।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उक्तं पूर्वं जातमात्रे सुते ते मया यत्ते हितमासीत्तदानीम्॥ 3-4-11&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पुत्रं त्यजेममहितं कुलस्य हितं परं न च तत्त्वं चकर्थ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इदं च राजन्हितमुक्तं न चेत्त्वमेवं कर्ता परितप्तासि पश्चात्॥ 3-4-12&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यद्येतदेवमनुमन्ता सुतस्ते सम्प्रीयमाणः पाण्डवैरेकराज्यम्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तापो न ते भविता प्रीतियोगान्न चेन्निगृह्णीष्व सुतं सुखाय॥ 3-4-13&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दुर्योधनं त्वहितं वै निगृह्य पाण्डोः पुत्रं प्रकुरुष्वाधिपत्ये।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अजातशत्रुर्हि विमुक्तरागो धर्मेणेमां पृथिवीं शास्तु राजन्॥ 3-4-14&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ततो राजन्पार्थिवाः सर्व एव वैश्या इवास्मानुपतिष्ठन्तु सद्यः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दुर्योधनः शकुनिः सूतपुत्रः प्रीत्या राजन्पाण्डुपुत्रान्भजन्तु॥ 3-4-15&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दुःशासनो याचतु भीमसेनं सभामध्ये द्रुपदस्यात्मजां च।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
युधिष्ठिरं त्वं परिसान्त्वयस्व राज्ये चैनं स्थापयस्वाभिपूज्य॥ 3-4-16&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
त्वया पृष्टः किमहमन्यद्वदेयमेतत्कृत्वा कृतकृत्योऽसि राजन्॥ 3-4-16&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
धृतराष्ट्र उवाच&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
एतद्वाक्यं विदुर यत्ते सभायामिह प्रोक्तं पाण्डवान्प्राप्य मां च।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हितं तेषामहितं मामकानामेतत्सर्वं मम नावैति चेतः॥ 3-4-17&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इदं त्विदानीं गत एव निश्चितं तेषामर्थे पाण्डवानां यदात्थ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तेनाद्य मन्ये नासि हितो ममेति कथं हि पुत्रं पाण्डवार्थे त्यजेयम्॥ 3-4-18&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
असंशयं तेऽपि ममैव पुत्रा दुर्योधनस्तु मम देहात्प्रसूतः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
स्वं वै देहं परहेतोस्त्यजेति को तु ब्रूयात्समतामन्ववेक्ष्य॥ 3-4-19&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
स मां जिह्मं विदुर सर्वं ब्रवीषि मानं च तेऽहमधिकं धारयामि।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यथेच्छकं गच्छ वा तिष्ठ वा त्वं सुसान्त्व्यमानाप्यसती स्त्री जहाति॥ 3-4-20&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वैशम्पायन उवाच&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
एतावदुक्त्वा धृतराष्ट्रोऽन्वपद्यदन्तर्वेश्म सहसोत्थाय राजन्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
नेदमस्तीत्यथ विदुरो भाषमाणः सम्प्राद्रवद्यत्र पार्था बभूवुः॥ 3-4-21&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि अरण्यपर्वणि विदुरवाक्यप्रत्याख्याने चतुर्थोऽध्यायः॥ 4 ॥&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>ShraddhaV</name></author>
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		<id>https://dharmawiki.org/index.php?title=Vanaparva_Adhyaya_3_(%E0%A4%B5%E0%A4%A8%E0%A4%AA%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%B5%E0%A4%A3%E0%A4%BF_%E0%A4%85%E0%A4%A7%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%AF%E0%A4%83_%E0%A5%A9)&amp;diff=119812</id>
		<title>Vanaparva Adhyaya 3 (वनपर्वणि अध्यायः ३)</title>
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		<updated>2019-07-10T12:30:13Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;ShraddhaV: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt; वैशम्पायन उवाच&lt;br /&gt;
 शौनकेनैवमुक्तस्तु कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः।&lt;br /&gt;
 पुरोहितमुपागम्य भ्रातृमध्येऽब्रवीदिदम्॥ 3-3-1&lt;br /&gt;
 प्रस्थितं मानुयान्तीमे ब्राह्मणा वेदपारगाः।&lt;br /&gt;
 न चास्मि पोषणे शक्तो बहुदुःखसमन्वितः॥ 3-3-2&lt;br /&gt;
 परित्यक्तुं न शक्तोऽस्मि दानशक्तिश्च नास्ति मे।&lt;br /&gt;
 कथमत्र मया कार्यं तद्ब्रूहि भगवन्मम॥ 3-3-3&lt;br /&gt;
 [[:Category:Service|''Service'']] [[:Category:सेवा|''सेवा'']]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
 वैशम्पायन उवाच&lt;br /&gt;
 मुहूर्तमिव स ध्यात्वा धर्मेणान्विष्य तां गतिम्।&lt;br /&gt;
 युधिष्ठिरमुवाचेदं धौम्यो धर्मभृतां वरः॥ 3-3-4&lt;br /&gt;
 [[:Category:Dhaumya Rishi|''Dhaumya Rishi'']] [[:Category:धौम्य ऋषि|''धौम्य ऋषि'']]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
 धौम्य उवाच&lt;br /&gt;
 पुरा सृष्टानि भूतानि पीड्यन्ते क्षुधया भृशम्।&lt;br /&gt;
 ततोऽनुकम्पया तेषां सविता स्वपिता यथा॥ 3-3-5&lt;br /&gt;
 गत्वोत्तरायणं तेजो रसानुद्धृत्य रश्मिभिः।&lt;br /&gt;
 दक्षिणायनमावृत्तो महीं निविशते रविः॥ 3-3-6&lt;br /&gt;
 [[:Category:Sun God|''Sun God'']] [[:Category:सूर्य देव|''सूर्य देव'']] [[:Category:अन्न|''अन्न'']]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
 क्षेत्रभूते ततस्तस्मिन्नोषधीरोषधीपतिः।&lt;br /&gt;
 दिवस्तेजः समुद्धृत्य जनयामास वारिणा॥ 3-3-7&lt;br /&gt;
 निषिक्तश्चन्द्रतेजोभिः स्वयोनौ निर्गते रविः।&lt;br /&gt;
 ओषध्यः षड्रसा मेध्यास्तदन्नं प्राणिनां भुवि॥ 3-3-8&lt;br /&gt;
 [[:Category:Sun God|''Sun God'']] [[:Category:सूर्य देव|''सूर्य देव'']] [[:Category:अन्न|''अन्न'']] [[:Category:Moon God|''Moon God'']] [[:Category:चंद्रमा|''चंद्रमा'']] [[:Category:चंद्र देव|''चंद्र देव'']]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
 एवं भानुमयं ह्यन्नं भूतानां प्राणधारणम्।&lt;br /&gt;
 पितैष सर्वभूतानां तस्मात्तं शरणं व्रज॥ 3-3-9&lt;br /&gt;
 [[:Category:Sun God|''Sun God'']] [[:Category:सूर्य देव|''सूर्य देव'']] [[:Category:अन्न|''अन्न'']]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
 राजानो हि महात्मानो योनिकर्मविशोधिताः।&lt;br /&gt;
 उद्धरन्ति प्रजाः सर्वास्तप आस्थाय पुष्कलम्॥ 3-3-10&lt;br /&gt;
 भीमेन कार्तवीर्येण वैन्येन नहुषेण च।&lt;br /&gt;
 तपोयोगसमाधिस्थैरुद्धता ह्यापदः प्रजाः॥ 3-3-11&lt;br /&gt;
 तथा त्वमपि धर्मात्मन्कर्मणा च विशोधितः।&lt;br /&gt;
 तप आस्थाय धर्मेण द्विजातीन्भर भारत॥ 3-3-12&lt;br /&gt;
 [[:Category:Penance|''Penance'']] [[:Category:tapasya|''tapasya'']]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
 जनमेजय उवाच&lt;br /&gt;
 कथं कुरूणामृषभः स तु राजा युधिष्ठिरः।&lt;br /&gt;
 विप्रार्थमाराधितवान्सूर्यमद्भुतदर्शनम्॥ 3-3-13&lt;br /&gt;
 वैशम्पायन उवाच&lt;br /&gt;
 शृणुष्वावहितो राजञ्शुचिर्भूत्वा समाहितः।&lt;br /&gt;
 क्षणं च कुरु राजेन्द्र सम्प्रवक्ष्याम्यशेषतः॥ 3-3-14&lt;br /&gt;
 धौम्येन तु यथा पूर्वं पार्थाय सुमहात्मने।&lt;br /&gt;
 नामाष्टशतमाख्यातं तच्छृणुष्व महामते॥ 3-3-15&lt;br /&gt;
 [[:Category:Sun God|''Sun God'']] [[:Category:सूर्य देव|''सूर्य देव'']]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
 धौम्य उवाच&lt;br /&gt;
 सूर्योऽर्यमा भगस्त्वष्टा पूषार्कः सविता रविः।&lt;br /&gt;
 गभस्तिमानजः कालो मृत्युर्धाता प्रभाकरः॥ 3-3-16&lt;br /&gt;
 पृथिव्यापश्च तेजश्च खं वायुश्च परायणम्।&lt;br /&gt;
 सोमो बृहस्पतिः शुक्रो बुधोऽङ्गारक एव च॥ 3-3-17&lt;br /&gt;
 इन्द्रो विवस्वान्दीप्तांशुः शुचिः शौरिः शनैश्चरः।&lt;br /&gt;
 ब्रह्मा विष्णुश्च रुद्रश्च स्कन्दो वै वरुणो यमः॥ 3-3-18&lt;br /&gt;
 वैद्युतो जाठरश्चाग्निरैन्धनस्तेजसां पतिः।&lt;br /&gt;
 धर्मध्वजो वेदकर्ता वेदाङ्गो वेदवाहनः॥ 3-3-19&lt;br /&gt;
 कृतं त्रेता द्वापरश्च कलिः सर्वमलाश्रयः।&lt;br /&gt;
 कला काष्ठा मुहूर्ताश्च क्षपा यामस्तथा क्षणः॥ 3-3-20&lt;br /&gt;
 संवत्सरकरोऽश्वत्थः कालचक्रो विभावसुः।&lt;br /&gt;
 पुरुषः शाश्वतो योगी व्यक्ताव्यक्तः सनातनः॥ 3-3-21&lt;br /&gt;
 कालाध्यक्षः प्रजाध्यक्षो विश्वकर्मा तमोनुदः।&lt;br /&gt;
 वरुणः सागरोंऽशुश्च जीमूतो जीवनोऽरिहा॥ 3-3-22&lt;br /&gt;
 भूताश्रयो भूतपतिः सर्वलोकनमस्कृतः।&lt;br /&gt;
 स्रष्टा संवर्तको वह्निः सर्वस्यादिरलोलुपः॥ 3-3-23&lt;br /&gt;
 अनन्तः कपिलो भानुः कामदः सर्वतोमुखः।&lt;br /&gt;
 जयो विशालो वरदः सर्वधातुनिषेचिता॥ 3-3-24&lt;br /&gt;
 मनःसुपर्णो भूतादिः शीघ्रगः प्राणधारकः।&lt;br /&gt;
 धन्वन्तरिर्धूमकेतुरादिदेवोऽदितेः सुतः॥ 3-3-25&lt;br /&gt;
 द्वादशात्मारविन्दाक्षः पिता माता पितामहः।&lt;br /&gt;
 स्वर्गद्वारं प्रजाद्वारं मोक्षद्वारं त्रिविष्टपम्॥ 3-3-26&lt;br /&gt;
 देहकर्ता प्रशान्तात्मा विश्वात्मा विश्वतोमुखः।&lt;br /&gt;
 चराचरात्मा सूक्ष्मात्मा मैत्रेयः करुणान्वितः॥ 3-3-27&lt;br /&gt;
 एतद्वै कीर्तनीयस्य सूर्यस्यामिततेजसः।&lt;br /&gt;
 नामाष्टशतकं चेदं प्रोक्तमेतत्स्वयंभुवा॥ 3-3-28&lt;br /&gt;
 [[:Category:108 names of Sun God|''108 names of Sun God'']] [[:Category:सूर्य देव|''सूर्य देव'']] [[:Category:१०८|''१०८'']]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
 सुरगणपितृयक्षसेवितं ह्यसुरनिशाचरसिद्धवन्दितम्।&lt;br /&gt;
 वरकनकहुताशनप्रभं प्रणिपतितोऽस्मि हिताय भास्करम्॥ 3-3-29&lt;br /&gt;
 सूर्योदये यः सुसमाहितः पठेत्स पुत्रदारान्धनरत्नसञ्चयान्।&lt;br /&gt;
 लभेत जातिस्मरतां नरः सदा धृतिं च मेधां च स विन्दते पुमान्॥ 3-3-30&lt;br /&gt;
 इमं स्तवं देववरस्य यो नरः प्रकीर्तयेच्छुचिसुमनाः समाहितः।&lt;br /&gt;
 विमुच्यते शोकदवाग्निसागराल्लभेत कामान्मनसा यथेप्सितान्॥ 3-3-31&lt;br /&gt;
 [[:Category:Worship of Sun God|''Worship of Sun God'']] [[:Category:सूर्य देव आराधना|''सूर्य देव आराधना'']]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
 वैशम्पायन उवाच&lt;br /&gt;
 एवमुक्तस्तु धौम्येन तत्कालसदृशं वचः।&lt;br /&gt;
 विप्रत्यागसमाधिस्थः संयतात्मा दृढव्रतः॥ 3-3-32&lt;br /&gt;
 धर्मराजो विशुद्धात्मा तप आतिष्ठदुत्तमम्।&lt;br /&gt;
 पुष्पोपहारैर्बलिभिरर्चयित्वा दिवाकरम्॥ 3-3-33&lt;br /&gt;
 सोऽवगाह्य जलं राजा देवस्याभिमुखोऽभवत्।&lt;br /&gt;
 योगमास्थाय धर्मात्मा वायुभक्षो जितेन्द्रियः॥ 3-3-34&lt;br /&gt;
 गाङ्गेयं वार्युपस्पृश्य प्राणायामेन तस्थिवान्।&lt;br /&gt;
 शुचिः प्रयतवाग्भूत्वा स्तोत्रमारब्धवांस्ततः॥ 3-3-35&lt;br /&gt;
 [[:Category:Worship|''Worship'']] [[:Category:पुजा|''पुजा'']]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
 युधिष्ठिर उवाच&lt;br /&gt;
 त्वं भानो जगतश्चक्षुस्त्वमात्मा सर्वदेहिनाम्।&lt;br /&gt;
 त्वं योनिः सर्वभूतानां त्वमाचारः क्रियावताम्॥ 3-3-36&lt;br /&gt;
 त्वं गतिः सर्वसांख्यानां योगिनां त्वं परायणम्।&lt;br /&gt;
 अनावृतार्गलद्वारं त्वं गतिस्त्वं मुमुक्षताम्॥ 3-3-37&lt;br /&gt;
 त्वया संधार्यते लोकस्त्वया लोकः प्रकाश्यते।&lt;br /&gt;
 त्वया पवित्रीक्रियते निर्व्याजं पाल्यते त्वया॥ 3-3-38&lt;br /&gt;
 त्वामुपस्थाय काले तु ब्राह्मणा वेदपारगाः।&lt;br /&gt;
 स्वशाखाविहितैर्मन्त्रैरर्चन्त्यृषिगणार्चितम्॥ 3-3-39&lt;br /&gt;
 तव दिव्यं रथं यान्तमनुयान्ति वरार्थिनः।&lt;br /&gt;
 सिद्धचारणगन्धर्वा यक्षगुह्यकपन्नगाः॥ 3-3-40&lt;br /&gt;
 त्रयस्त्रिंशच्च वै देवास्तथा वैमानिका गणाः।&lt;br /&gt;
 सोपेन्द्राः समहेन्द्राश्च त्वामिष्ट्वा सिद्धिमागताः॥ 3-3-41&lt;br /&gt;
 उपयान्त्यर्चयित्वा तु त्वां वै प्राप्तमनोरथाः।&lt;br /&gt;
 दिव्यमन्दारमालाभिस्तूर्णं विद्याधरोत्तमाः॥ 3-3-42&lt;br /&gt;
 गुह्याः पितृगणाः सप्त ये दिव्या ये च मानुषाः।&lt;br /&gt;
 ते पूजयित्वा त्वामेव गच्छन्त्याशु प्रधानताम्॥ 3-3-43&lt;br /&gt;
 वसवो मरुतो रुद्रा ये च साध्या मरीचिपाः।&lt;br /&gt;
 वालखिल्यादयः सिद्धाः श्रेष्ठत्वं प्राणिनां गताः॥ 3-3-44&lt;br /&gt;
 सब्रह्मकेषु लोकेषु सप्तस्वप्यखिलेषु च।&lt;br /&gt;
 न तद्भूतमहं मन्ये यदर्कादतिरिच्यते॥ 3-3-45&lt;br /&gt;
 सन्ति चान्यानि सत्त्वानि वीर्यवन्ति महान्ति च।&lt;br /&gt;
 न तु तेषां तथा दीप्तिः प्रभावो वा यथा तव॥ 3-3-46&lt;br /&gt;
 ज्योतींषि त्वयि सर्वाणि त्वं सर्वज्योतिषां पतिः।&lt;br /&gt;
 त्वयि सत्यं च सत्त्वं च सर्वे भावाश्च सात्त्विकाः॥ 3-3-47&lt;br /&gt;
 त्वत्तेजसा कृतं चक्रं सुनाभं विश्वकर्मणा।&lt;br /&gt;
 देवारीणां मदो येन नाशितः शार्ङ्गधन्वना॥ 3-3-48&lt;br /&gt;
 त्वमादायांशुभिस्तेजो निदाघे सर्वदेहिनाम्।&lt;br /&gt;
 सर्वौषधिरसानां च पुनर्वर्षासु मुञ्चसि॥ 3-3-49&lt;br /&gt;
 तपन्त्यन्ये दहन्त्यन्ये गर्जन्त्यन्ये तथा घनाः।&lt;br /&gt;
 विद्योतन्ते प्रवर्षन्ति तव प्रावृषि रश्मयः॥ 3-3-50&lt;br /&gt;
 न तथा सुखयत्यग्निर्न प्रावारा न कम्बलाः।&lt;br /&gt;
 शीतवातार्दितं लोकं यथा तव मरीचयः॥ 3-3-51&lt;br /&gt;
 त्रयोदशद्वीपवतीं गोभिर्भासयसे महीम्।&lt;br /&gt;
 त्रयाणामपि लोकानां हितायैकः प्रवर्तसे॥ 3-3-52&lt;br /&gt;
 तव यद्युदयो न स्यादन्धं जगदिदं भवेत्।&lt;br /&gt;
 न च धर्मार्थकामेषु प्रवर्तेरन्मनीषिणः॥ 3-3-53&lt;br /&gt;
 आधानपशुबन्धेष्टिमन्त्रयज्ञतपःक्रियाः।&lt;br /&gt;
 त्वत्प्रसादादवाप्यन्ते ब्रह्मक्षत्रविशां गणैः॥ 3-3-54&lt;br /&gt;
 यदहर्ब्रह्मणः प्रोक्तं सहस्रयुगसम्मितम्।&lt;br /&gt;
 तस्य त्वमादिरन्तश्च कालज्ञैः परिकीर्तितः॥ 3-3-55&lt;br /&gt;
 मनूनां मनुपुत्राणां जगतोऽमानवस्य च।&lt;br /&gt;
 मन्वन्तराणां सर्वेषामीश्वराणां त्वमीश्वरः॥ 3-3-56&lt;br /&gt;
 संहारकाले सम्प्राप्ते तव क्रोधविनिःसृतः।&lt;br /&gt;
 संवर्तकाग्निस्त्रैलोक्यं भस्मीकृत्यावतिष्ठते॥ 3-3-57&lt;br /&gt;
 त्वद्दीधितिसमुत्पन्ना नानावर्णा महाघनाः।&lt;br /&gt;
 सैरावताः साशनयः कुर्वन्त्याभूतसम्प्लवम्॥ 3-3-58&lt;br /&gt;
 कृत्वा द्वादशधाऽऽत्मानं द्वादशादित्यतां गतः।&lt;br /&gt;
 संहृत्यैकार्णवं सर्वं त्वं शोषयसि रश्मिभिः॥ 3-3-59&lt;br /&gt;
 त्वामिन्द्रमाहुस्त्वं रुद्रस्त्वं विष्णुस्त्वं प्रजापतिः।&lt;br /&gt;
 त्वमग्निस्त्वं मनः सूक्ष्मं प्रभुस्त्वं ब्रह्म शाश्वतम्॥ 3-3-60&lt;br /&gt;
 त्वं हंसः सविता भानुरंशुमाली वृषाकपिः।&lt;br /&gt;
 विवस्वान्मिहिरः पूषा मित्रो धर्मस्तथैव च॥ 3-3-61&lt;br /&gt;
 सहस्ररश्मिरादित्यस्तपनस्त्वं गवाम्पतिः।&lt;br /&gt;
 मार्तण्डोऽर्को रविः सूर्यः शरण्यो दिनकृत्तथा॥ 3-3-62&lt;br /&gt;
 दिवाकरः सप्तसप्तिर्धामकेशी विरोचनः।&lt;br /&gt;
 आशुगामी तमोघ्नश्च हरिताश्वश्च कीर्त्यसे॥ 3-3-63&lt;br /&gt;
 सप्तम्यामथवा षष्ठ्यां भक्त्या पूजां करोति यः।&lt;br /&gt;
 अनिर्विण्णोऽनहङ्कारी तं लक्ष्मीर्भजते नरम्॥ 3-3-64&lt;br /&gt;
 न तेषामापदः सन्ति नाधयो व्याधयस्तथा।&lt;br /&gt;
 ये तवानन्यमनसः कुर्वन्त्यर्चनवन्दनम्॥ 3-3-65&lt;br /&gt;
 सर्वरोगैर्विरहिताः सर्वपापविवर्जिताः।&lt;br /&gt;
 त्वद्भावभक्ताः सुखिनो भवन्ति चिरजीविनः॥ 3-3-66&lt;br /&gt;
 त्वं ममाप्यन्नकामस्य सर्वातिथ्यं चिकीर्षतः।&lt;br /&gt;
 अन्नमन्नपते दातुमभितः श्रद्धयार्हसि॥ 3-3-67&lt;br /&gt;
 ये च तेऽनुचराः सर्वे पादोपान्तं समाश्रिताः।&lt;br /&gt;
 माठरारुणदण्डाद्यास्तांस्तान्वन्देऽशनिक्षुभान्॥ 3-3-68&lt;br /&gt;
 क्षुभया सहिता मैत्री याश्चान्या भूतमातरः।&lt;br /&gt;
 ताश्च सर्वा नमस्यामि पान्तु मां शरणागतम्॥ 3-3-69&lt;br /&gt;
 वैशम्पायन उवाच&lt;br /&gt;
 एवं स्तुतो महाराज भास्करो लोकभावनः।&lt;br /&gt;
 ततो दिवाकरः प्रीतो दर्शयामास पाण्डवम्।&lt;br /&gt;
 दीप्यमानः स्ववपुषा ज्वलन्निव हुताशनः॥ 3-3-70&lt;br /&gt;
 [[:Category:Sun God|''Sun God'']] [[:Category:सूर्य देव|''सूर्य देव'']]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
 विवस्वानुवाच&lt;br /&gt;
 यत्तेऽभिलषितं किञ्चित्तत्त्वं सर्वमवाप्स्यसि।&lt;br /&gt;
 अहमन्नं प्रदास्यामि सप्त पञ्च च ते समाः॥ 3-3-71&lt;br /&gt;
 फलमूलामिषं शाकं संस्कृतं यन्महानसे।&lt;br /&gt;
 गृह्णीष्व पिठरं ताम्रं मया दत्त नराधिप।&lt;br /&gt;
 यावद्वर्त्स्यति पाञ्चाली पात्रेणानेन सुव्रत॥ 3-3-72&lt;br /&gt;
 फलमूलामिषं शाकं संस्कृतं यन्महानसे।&lt;br /&gt;
 चतुर्विधं तदन्नाद्यमक्षय्यं ते भविष्यति।&lt;br /&gt;
 धनं च विविधं तुभ्यमित्युक्त्वान्तरधीयत॥&lt;br /&gt;
 इतश्चतुर्दशे वर्षे भूयो राज्यमवाप्स्यसि॥ 3-3-73&lt;br /&gt;
 [[:Category:Pandavas get Akshaypatra|''Pandavas get Akshaypatra'']] [[:Category:अक्षयपात्र|''अक्षयपात्र'']]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
 वैशम्पायन उवाच&lt;br /&gt;
 एवमुक्त्वा तु भगवांस्तत्रैवान्तरधीयत॥ 3-3-74&lt;br /&gt;
 इमं स्तवं प्रयतमनाः समाधिना पठेदिहान्योऽपि वरं समर्थयन्।&lt;br /&gt;
 तत्तस्य दद्याच्च रविर्मनीषितं तदाप्नुयाद्यद्यपि तत्सुदुर्लभम्॥ 3-3-74&lt;br /&gt;
 यश्चेदं धारयेन्नित्यं शृणुयाद्वाप्यभीक्ष्णशः।&lt;br /&gt;
 पुत्रार्थी लभते पुत्रं धनार्थी लभते धनम्॥ 3-3-75&lt;br /&gt;
 विद्यार्थी लभते विद्यां पुरुषोऽप्यथवा स्त्रियः।&lt;br /&gt;
 उभे सन्ध्ये पठेन्नित्यं नारी वा पुरुषो यदि॥ 3-3-76&lt;br /&gt;
 आपदं प्राप्य मुच्येत बद्धो मुच्येत बन्धनात्।&lt;br /&gt;
 एतद्ब्रह्मा ददौ पूर्वं शक्राय सुमहात्मने॥ 3-3-77&lt;br /&gt;
 शक्राच्च नारदः प्राप्तो धौम्यस्तु तदनन्तरम्।&lt;br /&gt;
 धौम्याद्युधिष्ठिरः प्राप्य सर्वान्कामानवाप्तवान्॥ 3-3-78&lt;br /&gt;
 सङ्ग्रामे च जयेन्नित्यं विपुलं चाप्नुयाद्वसु।&lt;br /&gt;
 मुच्यते सर्वपापेभ्यः सूर्यलोकं स गच्छति॥ 3-3-79&lt;br /&gt;
 [[:Category:Benefits of worshiping Sun God|''Benefits of worshiping Sun God'']]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
 वैशम्पायन उवाच&lt;br /&gt;
 लब्ध्वा वरं तु कौन्तेयो जलादुत्तीर्य धर्मवित्।&lt;br /&gt;
 जग्राह पादौ धौम्यस्य भ्रातॄंश्च परिषस्वजे॥ 3-3-80&lt;br /&gt;
 द्रौपद्या सह सङ्गम्य वन्द्यमानस्तया प्रभुः।&lt;br /&gt;
 महानसे तदानीं तु साधयामास पाण्डवः॥ 3-3-81&lt;br /&gt;
 संस्कृतं प्रसवं याति स्वल्पमन्नं चतुर्विधम्।&lt;br /&gt;
 अक्षय्यं वर्धते चान्नं तेन भोजयते द्विजान्॥ 3-3-82&lt;br /&gt;
 भुक्तवत्सु च विप्रेषु भोजयित्वानुजानपि।&lt;br /&gt;
 शेषं विघससंज्ञं तु पश्चाद्भुङ्क्ते युधिष्ठिरः॥ 3-3-83&lt;br /&gt;
 युधिष्ठिरं भोजयित्वा शेषमश्नाति पार्षती।&lt;br /&gt;
 द्रौपद्यां भुज्यमानायां तदन्नं क्षयमेति च।&lt;br /&gt;
 एवं दिवाकरात्प्राप्य दिवाकरसमप्रभः॥ 3-3-84&lt;br /&gt;
 कामान्मनोऽभिलषितान्ब्राह्मणेभ्योऽददात्प्रभुः।&lt;br /&gt;
 पुरोहितपुरोगाश्च तिथिनक्षत्रपर्वसु।&lt;br /&gt;
 यज्ञियार्थाः प्रवर्तन्ते विधिमन्त्रप्रमाणतः॥ 3-3-85&lt;br /&gt;
 [[:Category:Serving Brahmanas|''Serving Brahmanas'']] [[:Category:Akshaypatra|''Akshaypatra'']] [[:Category:अक्षयपात्र|''अक्षयपात्र'']]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
 ततः कृतस्वस्त्ययना धौम्येन सह पाण्डवाः।&lt;br /&gt;
 द्विजसङ्घैः परिवृताः प्रययुः काम्यकं वनम्॥ 3-3-86&lt;br /&gt;
 [[:Category:Kamyavan|''Kamyavan'']] [[:Category:काम्यवन|''काम्यवन'']]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जनमेजयः पुष्पोपहारबलिभिर्बहुशश्च यथाविधि।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सर्वात्मभूतं सम्पूज्य यतप्राणो जितेन्द्रियः॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
स्तवेन केन विप्रर्षे स तु राजा युधिष्ठिरः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
विप्रार्थमाराधितवान्सूर्यमद्भुतविक्रमम्॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मयि स्नेहोऽस्ति चेद्ब्रह्मन्यदनुग्रहभागहम्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भगवान्नास्ति चेद्गुह्यं तच्च मे ब्रूहि साम्प्रतम्॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वैशम्पायनः शृणुष्वावहितो राजन्शुचिर्भूत्वा समाहितः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
क्षणं च कुरु राजेन्द्र गुह्यं वक्ष्यामि ते हितम्॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
धौम्येन तु यथाप्रोक्तं पार्थाय सुमहात्मने।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
नाम्नामष्टशतं पुण्यं तच्छृणुष्व महामते॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सूर्योऽर्यमा भगस्त्वष्टा पूषाऽर्कस्सविता रविः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
गभस्तिमानजः कालो मृत्युर्धाता प्रभाकरः॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पृथिव्यापश्च तेजश्च खं वायुश्च परायणम्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सोमो बृहस्पतिश्शुक्रो बुधोऽङ्गारक एव च॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इन्द्रो विवस्वान्दीप्तांशुश्शुचिश्शौरिश्शनैश्चरः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ब्रह्मा विष्णुश्च रुद्रश्च स्कन्दो वैश्रवणो यमः॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वैद्युतो जाठरश्चाग्निः ऐन्धनस्तेजसां पतिः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
धर्मध्वजो वेदकर्ता वेदाङ्गो वेदवाहनः॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कृतं त्रेता द्वापरश्च कलिस्सर्वामराश्रयः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कला काष्ठा मुहूर्ताश्च पक्षा मासा ऋतुस्तथा॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
संवत्सरकरोऽश्वत्थः कालचक्रो विभावसुः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पुरुषश्शाश्वतो योगी व्यक्ताव्यक्तस्सनातनः॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
लोकाध्यक्षस्सुराध्यक्षो विश्वकर्मा तमोनुदः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वरुणस्सागरोंशुश्च जीमूतो जीवनोऽरिहा॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भूताश्रयो भूतपतिस्सर्वभूतनिषेवितः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मणिस्सुवर्णो भूतादिः कामदस्सर्वतोमुखः॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जयो विशालो वरदश्शीघ्रगः प्राणधारणः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
धन्वन्तरिर्धूमकेतुः आदिदेवोऽदितेस्सुतः॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
द्वादशात्माऽरविन्दाक्षः पिता माता पितामहः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
स्वर्गद्वारं प्रजाद्वारं मोक्षद्वारं त्रिविष्टपम्॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
देवकर्ता प्रशान्तात्मा विश्वात्मा विश्वतोमुखः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
चराचरात्मा सूक्ष्मात्मा मैत्रेण वपुषाऽन्वितः॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
एतद्वै कीर्तनीयस्य सूर्यस्यैव महात्मनः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
नाम्नामष्टशतं पुण्यं शक्रेणोक्तं महात्मना॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शक्राच्च नारदः प्राप्तो धौम्यश्च तदनन्तरम्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
धौम्याद्युधिष्ठिरः प्राप्य सर्वान्कामानवाप्तवान्॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सुरपितृगणयक्षसेवितं निशिचरसिद्धगणैश्च वन्दितम्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वरकनकहुताशनप्रभं त्वमपि मनस्यभिधेहि भास्करम्॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सूर्योदये यस्सुसमाहितः पठेत्स पुत्रलाभं धनरत्नसञ्चयान्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
लभेत जातिस्मरतां सदा नरे धृतिं च मेधां च स विन्दते वराम्॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इमं स्तवं देववरस्य कीर्तयेच्छृणोति वा यस्सुमनास्समाहितः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
स मुच्यते शोकदवाग्निसागराल्लभेत कामान्मनसा यथेप्सितान्॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इति श्रीमिहाभारते वनपर्वणि अरण्यपर्वणि काम्यकवनप्रवेशे तृतीयोऽध्यायः॥ 3 ॥&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>ShraddhaV</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://dharmawiki.org/index.php?title=Vanaparva_Adhyaya_2_(%E0%A4%B5%E0%A4%A8%E0%A4%AA%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%B5%E0%A4%A3%E0%A4%BF_%E0%A4%85%E0%A4%A7%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%AF%E0%A4%83_%E0%A5%A8)&amp;diff=119811</id>
		<title>Vanaparva Adhyaya 2 (वनपर्वणि अध्यायः २)</title>
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		<updated>2019-07-10T12:28:48Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;ShraddhaV: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt; वैशम्पायन उवाच&lt;br /&gt;
 प्रभातायां तु शर्वर्यां तेषामक्लिष्टकर्मणाम्।&lt;br /&gt;
 वनं यियासतां विप्रास्तस्थुर्भिक्षाभुजोऽग्रतः॥ 3-2-1&lt;br /&gt;
 तानुवाच ततो राजा कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः।&lt;br /&gt;
 वयं हि हृतसर्वस्वा हृतराज्या हृतश्रियः॥ 3-2-2&lt;br /&gt;
 फलमूलाशनाहारा वनं गच्छाम दुःखिताः।&lt;br /&gt;
 वनं च दोषबहुलं बहुव्यालसरीसृपम्॥ 3-2-3&lt;br /&gt;
 परिक्लेशश्च वो मन्ये ध्रुवं तत्र भविष्यति।&lt;br /&gt;
 ब्राह्मणानां परिक्लेशो दैवतान्यपि सादयेत्।&lt;br /&gt;
 किं पुनर्मामितो विप्रा निवर्तध्वं यथेष्टतः॥ 3-2-4&lt;br /&gt;
 ब्राह्मणा ऊचुः&lt;br /&gt;
 गतिर्या भवतां राजंस्तां वयं गन्तुमुद्यताः।&lt;br /&gt;
 नार्हस्यस्मान्परित्यक्तुं भक्तान्सद्धर्मदर्शिनः॥ 3-2-5&lt;br /&gt;
 अनुकम्पां हि भक्तेषु देवता ह्यपि कुर्वते।&lt;br /&gt;
 विशेषतो ब्राह्मणेषु सदाचारावलम्बिषु॥ 3-2-6&lt;br /&gt;
 [[:Category:Yudhishtir - brahmans conversation|''Yudhishtir - brahmans conversation'']] [[:Category:युधिष्टीर ब्राह्मण संवाद|''युधिष्टीर ब्राह्मण संवाद'']]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
 युधिष्ठिर उवाच&lt;br /&gt;
 ममापि परमा भक्तिर्ब्राह्मणेषु सदा द्विजाः।&lt;br /&gt;
 सहायविपरिभ्रंशस्त्वयं सादयतीव माम्॥ 3-2-7&lt;br /&gt;
 आहरेयुरिमे येऽपि फलमूलमृगांस्तथा[मधूनि च]।&lt;br /&gt;
 त इमे शोकजैर्दुःखैर्भ्रातरो मे विमोहिताः॥ 3-2-8&lt;br /&gt;
 द्रौपद्या विप्रकर्षेण राज्यापहरणेन च।&lt;br /&gt;
 दुःखार्दितानिमान्क्लेशैर्नाहं योक्तुमिहोत्सहे॥ 3-2-9&lt;br /&gt;
 [[:Category:Yudhishtir - brahmans conversation|''Yudhishtir - brahmans conversation'']] [[:Category:युधिष्टीर ब्राह्मण संवाद|''युधिष्टीर ब्राह्मण संवाद'']] [[:Category:Sadness|''Sadness'']] [[:Category:दु:ख|''दु:ख'']] [[:Category:शोक|''शोक'']]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
 ब्राह्मणा ऊचुः&lt;br /&gt;
 अस्मत्पोषणजा चिन्ता मा भूत्ते हृदि पार्थिव।&lt;br /&gt;
 स्वयमाहृत्य चान्नानि चोपयोक्षा[त्वानुयास्या]महे वयम्॥ 3-2-10&lt;br /&gt;
 अनुध्यानेन जप्येन विधास्यामः शिवं तव।&lt;br /&gt;
 कथाभिश्चाभिरम्याभिः सह रंस्यामहे वयम्॥ 3-2-11&lt;br /&gt;
 युधिष्ठिर उवाच&lt;br /&gt;
 एवमेतन्न सन्देहो रमेऽहं सततं द्विजैः।&lt;br /&gt;
 मा[न्यू]नभावात्तु पश्यामि प्रत्यादेशमिवात्मनः॥ 3-2-12&lt;br /&gt;
 कथं द्रक्ष्यामि वः सर्वान्स्वयमाहृतभोजनान्।&lt;br /&gt;
 मद्भक्त्या क्लिश्यतोऽनर्हान्धिक्पापान्धृतराष्ट्रजान्॥ 3-2-13&lt;br /&gt;
 [[:Category:Yudhishtir - brahmans conversation|''Yudhishtir - brahmans conversation'']] [[:Category:युधिष्टीर ब्राह्मण संवाद|''युधिष्टीर ब्राह्मण संवाद'']]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वैशम्पायन उवाच&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इत्युक्त्वा स नृपः शोचन्निषसाद महीतले।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तमध्यात्मरतो विद्वान्शौनको नाम वै द्विजः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
योगे सांख्ये च कुशलो राजानमिदमब्रवीत्॥ 3-2-14&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
 शोकस्थानसहस्राणि भयस्थानशतानि च।&lt;br /&gt;
 दिवसे दिवसे मूढमाविशन्ति न पण्डितम्॥ 3-2-15&lt;br /&gt;
 न हि ज्ञानविरुद्धेषु बहुदोषेषु कर्मसु।&lt;br /&gt;
 श्रेयोघातिषु सज्जन्ते बुद्धिमन्तो भवद्विधाः॥ 3-2-16&lt;br /&gt;
 अष्टाङ्गां बुद्धिमाहुर्यां सर्वाश्रेयोऽभिघातिनीम्।&lt;br /&gt;
 श्रुतिस्मृतिसमायुक्तां राजन्सा त्वय्यवस्थिता॥ 3-2-17&lt;br /&gt;
 अर्थकृच्छ्रेषु दुर्गेषु व्यापत्सु स्वजनस्य च।&lt;br /&gt;
 शारीरमानसैर्दुःखैर्न सीदन्ति भवद्विधाः॥ 3-2-18&lt;br /&gt;
 [[:Category:Description of a knowledgeable person|''Description of a knowledgeable person'']] [[:Category:ज्ञानी जनस्य वर्णनं|''ज्ञानी जनस्य वर्णनं'']]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
श्रूयतां चाभिधास्यामि जनकेन यथा पुरा।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आत्मव्यवस्थानकरा गीताः श्लोका महात्मना॥ 3-2-19&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
 मनोदेहसमुत्थाभ्यां दुःखाभ्यामर्दितं जगत्।&lt;br /&gt;
 तयोर्व्याससमासाभ्यां शमोपायमिमं शृणु॥ 3-2-20&lt;br /&gt;
 व्याधेरनिष्टसंस्पर्शाच्छ्रमादिष्टविवर्जनात्।&lt;br /&gt;
 दुःखं चतुर्भिः शारीरं कारणैः सम्प्रवर्तते॥ 3-2-21&lt;br /&gt;
 तदा तत्प्रतिकाराच्च सततं चाविचिन्तनात्।&lt;br /&gt;
 आधिव्याधिप्रशमनं क्रियायोगद्वयेन तु॥ 3-2-22&lt;br /&gt;
 मतिमन्तो ह्यतो वैद्याः शमं प्रागेव कुर्वते।&lt;br /&gt;
 मानसस्य प्रियाख्यानैः सम्भोगोपनयैर्नृणाम्॥ 3-2-23&lt;br /&gt;
 [[:Category:solution to overcome sadness|''solution to overcome sadness'']]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
 मानसेन हि दुःखेन शरीरमुपतप्यते।&lt;br /&gt;
 अयःपिण्डेन तप्तेन कुम्भसंस्थमिवोदकम्॥ 3-2-24&lt;br /&gt;
 मानसं शमयेत्तस्माज्ज्ञानेनाग्निमिवाम्बुना।&lt;br /&gt;
 प्रशान्ते मानसे ह्यस्य शारीरमुपशाम्यति॥ 3-2-25&lt;br /&gt;
 [[:Category:solution to overcome sadness|''solution to overcome sadness'']] [[:Category:connection between physical and mental health|''connection between physical and mental health'']]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
 मनसो दुःखमूलं तु स्नेह इत्युपलभ्यते।&lt;br /&gt;
 स्नेहात्तु सज्जते जन्तुर्दुःखयोगमुपैति च॥ 3-2-26&lt;br /&gt;
 स्नेहमूलानि दुःखानि स्नेहजानि भयानि च।&lt;br /&gt;
 शोकहर्षौ तथाऽऽयासः सर्वं स्नेहात्प्रवर्तते॥ 3-2-27&lt;br /&gt;
 स्नेहाद्भावोऽनुरागश्च प्रजज्ञे विषये तथा।&lt;br /&gt;
 अश्रेयस्कावुभावेतौ पूर्वस्तत्र गुरुः स्मृतः॥ 3-2-28&lt;br /&gt;
 कोटराग्निर्यथाशेषं समूलं पादपं दहेत्।&lt;br /&gt;
 धर्मार्थौ तु तथाल्पोऽपि रागदोषो विनाशयेत्॥ 3-2-29&lt;br /&gt;
 [[:Category:solution to overcome sadness|''solution to overcome sadness'']] [[:Category:attachment|''attachment'']] [[:Category:आसक्ती|''आसक्ती'']]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
 विप्रयोगे न तु त्यागी दोषदर्शी समागमे।&lt;br /&gt;
 विरागं भजते जन्तुर्निर्वैरो निरवग्रहः॥ 3-2-30&lt;br /&gt;
 [[:Category:detachment|''detachment'']] [[:Category:त्याग|''त्याग'']]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
 तस्मात्स्नेहं न लिप्सेत मित्रेभ्यो धनसञ्चयात्।&lt;br /&gt;
 स्वशरीरसमुत्थं च ज्ञानेन विनिवर्तयेत्॥ 3-2-31&lt;br /&gt;
 ज्ञानान्वितेषु युक्तेषु शास्त्रज्ञेषु कृतात्मसु।&lt;br /&gt;
 न तेषु सज्जते स्नेहः पद्मपत्रेष्विवोदकम्॥ 3-2-32&lt;br /&gt;
 [[:Category:attachment|''attachment'']] [[:Category:आसक्ती|''आसक्ती'']]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
 रागाभिभूतः पुरुषः कामेन परिकृष्यते।&lt;br /&gt;
 इच्छा सञ्जायते तस्य ततस्तृष्णा विवर्धते॥ 3-2-33&lt;br /&gt;
 तृष्णा हि सर्वपापिष्ठा नित्योद्वेगकरी स्मृता।&lt;br /&gt;
 अधर्मबहुला चैव घोरा पापानुबन्धिनी॥ 3-2-34&lt;br /&gt;
 या दुस्त्यजा दुर्मतिभिर्या न जीर्यति जीर्यतः।&lt;br /&gt;
 योऽसौ प्राणान्तिको रोगस्तां तृष्णां त्यजतः सुखम्॥ 3-2-35&lt;br /&gt;
 अनाद्यन्ता तु सा तृष्णा अन्तर्देहगता नृणाम्।&lt;br /&gt;
 विनाशयति भूतानि अयोनिज इवानलः॥ 3-2-36&lt;br /&gt;
 यथैधः स्वसमुत्थेन वह्निना नाशमृच्छति।&lt;br /&gt;
 तथाकृतात्मा लोभेन सहजेन विनश्यति॥ 3-2-37&lt;br /&gt;
 [[:Category:anarthas|''anarthas'']] [[:Category:अनर्थ|''अनर्थ'']]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
 राजतः सलिलादग्नेश्चोरतः स्वजनादपि।&lt;br /&gt;
 भयमर्थवतां नित्यं मृत्योः प्राणभृतामिव॥ 3-2-38&lt;br /&gt;
 यथा ह्यामिषमाकाशे पक्षिभिः श्वापदैर्भुवि।&lt;br /&gt;
 भक्ष्यते सलिले मत्स्यैस्तथा सर्वत्र वित्तवान्॥ 3-2-39&lt;br /&gt;
 [[:Category:anarthas|''anarthas'']] [[:Category:अनर्थ|''अनर्थ'']] [[:Category:Disadvantages of being wealthy|''Disadvantages of being wealthy'']] [[:Category:धन दोष|''धन दोष'']]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
 अर्थ एव हि केषाञ्चिदनर्थं भजते नृणाम्।&lt;br /&gt;
 अर्थश्रेयसि चासक्तो च श्रेयो विन्दते नरः॥ 3-2-40&lt;br /&gt;
 तस्मादर्थागमाः सर्वे मनोमोहविवर्धनाः।&lt;br /&gt;
 कार्पण्यं दर्पमानौ च भयमुद्वेग एव च॥ 3-2-41&lt;br /&gt;
 अर्थजानि विदुः प्राज्ञा दुःखान्येतानि देहिनाम्।&lt;br /&gt;
 अर्थस्योत्पादने चैव पालने च तथा क्षये॥ 3-2-42&lt;br /&gt;
 सहन्ति च महद्दुःखं घ्नन्ति चैवार्थकारणात्।&lt;br /&gt;
 अर्था दुःखं परित्यक्तुं पालिताश्चैव शत्रवः॥ 3-2-43&lt;br /&gt;
 दुःखेन चाधिगम्यन्ते तस्मान्नाशं न चिन्तयेत्।&lt;br /&gt;
 असन्तोषपरा मूढाः सन्तोषं यान्ति पण्डिताः॥ 3-2-44&lt;br /&gt;
 अन्तो नास्ति पिपासायाः सन्तोषः परमं सुखम्।&lt;br /&gt;
 तस्मात्सन्तोषमेवेह परं पश्यन्ति पण्डिताः॥ 3-2-45&lt;br /&gt;
 अनित्यं यौवनं रूपं जीवितं रत्नसंचयः।&lt;br /&gt;
 ऐश्वर्यं प्रियसंवासो गृध्येत्तत्र न पण्डितः॥ 3-2-46&lt;br /&gt;
 त्यजेत सञ्चयांस्तस्मात्तज्जान्क्लेशान्सहेत च।&lt;br /&gt;
 न हि सञ्चयवान्कश्चिद्दृश्यते निरुपद्रवः।&lt;br /&gt;
 अतश्च धार्मिकैः पुंभिरनीहार्थः प्रशस्यते॥ 3-2-47&lt;br /&gt;
 धर्मार्थं यस्य वित्तेहा वरं तस्य निरीहता।&lt;br /&gt;
 प्रक्षालनाद्धि पङ्कस्य श्रेयो न स्पर्शनं नृणाम्॥ 3-2-48&lt;br /&gt;
 युधिष्ठिरैवं सर्वेषु न स्पृहां कर्तुमर्हसि।&lt;br /&gt;
 धर्मेण यदि ते कार्यं विमुक्तेच्छो भवार्थतः॥ 3-2-49&lt;br /&gt;
 [[:Category:Disadvantages of being wealthy|''Disadvantages of being wealthy'']] [[:Category:धन दोष|''धन दोष'']]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
 युधिष्ठिर उवाच&lt;br /&gt;
 नार्थोपभोगलिप्सार्थमियमर्थेप्सुता मम।&lt;br /&gt;
 भरणार्थं तु विप्राणां ब्रह्मन्काङ्क्षे न लोभतः॥ 3-2-50&lt;br /&gt;
 कथं ह्यस्मद्विधो ब्रह्मन्वर्तमानो गृहाश्रमे।&lt;br /&gt;
 भरणं पालनं चापि न कुर्यादनुयायिनाम्॥ 3-2-51&lt;br /&gt;
 संविभागो हि भूतानां सर्वेषामेव दृश्यते।&lt;br /&gt;
 तथैवापचमानेभ्यः प्रदेयं गृहमेधिना॥ 3-2-52&lt;br /&gt;
 तृणानि भूमिरुदकं वाक्चतुर्थी च सूनृता।&lt;br /&gt;
 सतामेतानि गेहेषु नोच्छिद्यन्ते कदाचन॥ 3-2-53&lt;br /&gt;
 देयमार्तस्य शयनं स्थितश्रान्तस्य चासनम्।&lt;br /&gt;
 तृषितस्य च पानीयं क्षुधितस्य च भोजनम्॥ 3-2-54&lt;br /&gt;
 चक्षुर्दद्यान्मनो दद्याद्वाचं दद्यात्सुभाषिताम्।&lt;br /&gt;
 उत्थाय चासनं दद्यादेष धर्मः सनातनः।&lt;br /&gt;
 रत्युत्थायाभिगमनं कुर्यान्न्यायेन चार्चनम्॥ 3-2-55&lt;br /&gt;
 [[:Category:Duties of a householder|''Duties of a householder'']] [[:Category:गृहस्थ धर्म|''गृहस्थ धर्म'']] [[:Category:Sanatan dharma|''Sanatan dharma'']] [[:Category:सनातन धर्म|''सनातन धर्म'']]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
 अग्निहोत्रमनड्वांश्च ज्ञातयोऽतिथिबान्धवाः।&lt;br /&gt;
 पुत्रा दाराश्च भृत्याश्च निर्दहेयुरपूजिताः॥ 3-2-56&lt;br /&gt;
 आत्मार्थं पाचयेन्नान्नं न वृथा घातयेत्पशून्।&lt;br /&gt;
 न च तत्स्वयमश्नीयाद्विधिवद्यन्न निर्वपेत्॥ 3-2-57&lt;br /&gt;
 श्वभ्यश्च श्वपचेभ्यश्च वयोभ्यश्चावपेद्भुवि।&lt;br /&gt;
 वैश्वदेवं हि नामैतत्सायं प्रातश्च दीयते॥ 3-2-58&lt;br /&gt;
 विघसाशी भवेत्तस्मान्नित्यं चामृतभोजनः।&lt;br /&gt;
 विघसो भुक्तशेषं तु यज्ञशेषं तथामृतम्॥ 3-2-59&lt;br /&gt;
 चक्षुर्दद्यान्मनो दद्याद्वाचं दद्याच्च सूनृताम्।&lt;br /&gt;
 अनुव्रजेदुपासीत स यज्ञः पञ्चदक्षिणः॥ 3-2-60&lt;br /&gt;
 यो दद्यादपरिक्लिष्टमन्नमध्वनि वर्तते।&lt;br /&gt;
 श्रान्तायादृष्टपूर्वाय तस्य पुण्यफलं महत्॥ 3-2-61&lt;br /&gt;
 एवं यो वर्तते वृत्तिं वर्तमानो गृहाश्रमे।&lt;br /&gt;
 तस्य धर्मं परं प्राहुः कथं वा विप्र मन्यसे॥ 3-2-62&lt;br /&gt;
 [[:Category:Duties of a householder|''Duties of a householder'']] [[:Category:गृहस्थ धर्म|''गृहस्थ धर्म'']]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
 शौनक उवाच&lt;br /&gt;
 अहो बत महत्कष्टं विपरीतमिदं जगत्।&lt;br /&gt;
 येनापत्रपते साधुरसाधुस्तेन तुष्यति॥ 3-2-63&lt;br /&gt;
 शिश्नोदरकृतेऽप्राज्ञः करोति विघसं बहु।&lt;br /&gt;
 मोहरागवशाक्रान्त इन्द्रियार्थवशानुगः॥ 3-2-64&lt;br /&gt;
 ह्रियते बुध्यमानोऽपि नरो हारिभिरिन्द्रियैः।&lt;br /&gt;
 विमूढसंज्ञो दुष्टाश्वैरुद्भान्तैरिव सारथिः॥ 3-2-65&lt;br /&gt;
 षडिन्द्रियाणि विषयं समागच्छन्ति वै यदा।&lt;br /&gt;
 तदा प्रादुर्भवत्येषां पूर्वसङ्कल्पजं मनः॥ 3-2-66&lt;br /&gt;
 मनो यस्येन्द्रियस्येह विषयान्याति सेवितुम्।&lt;br /&gt;
 तस्यौत्सुक्यं सम्भवति प्रवृत्तिश्चोपजायते॥ 3-2-67&lt;br /&gt;
 ततः सङ्कल्पबीजेन कामेन विषयेषुभिः।&lt;br /&gt;
 विद्धः पतति लोभाग्नौ ज्योतिर्लोभात्पतङ्गवत्॥ 3-2-68&lt;br /&gt;
 ततो विहारैराहारैर्मोहितश्च यथेप्सया।&lt;br /&gt;
 महामोहे सुखे मग्नो नात्मानमवबुध्यते॥ 3-2-69&lt;br /&gt;
 एवं पतति संसारे तासु तास्विह योनिषु।&lt;br /&gt;
 अविद्याकर्मतृष्णाभिर्भ्राम्यमाणोऽथ चक्रवत्॥ 3-2-70&lt;br /&gt;
 ब्रह्मादिषु तृणान्तेषु भूतेषु परिवर्तते।&lt;br /&gt;
 जले भुवि तथाऽऽकाशे जायमानः पुनः पुनः॥ 3-2-71&lt;br /&gt;
 [[:Category:consequences of sense gratification|''consequences of sense gratification'']] [[:Category:इंद्रिय तृप्ति|''इंद्रिय तृप्ति'']] [[:Category:अविवेकी पुरुषोकी गती|''अविवेकी पुरुषोकी गती'']]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
 अबुधानां गतिस्त्वेषा बुधानामपि मे शृणु।&lt;br /&gt;
 ये धर्मे श्रेयसि रता विमोक्षरतयो जनाः॥ 3-2-72&lt;br /&gt;
 तदिदं वेदवचनं कुरु कर्म त्यजेति च।&lt;br /&gt;
 तस्माद्धर्मानिमान्सर्वान्नाभिमानात्समाचरेत्॥ 3-2-73&lt;br /&gt;
 इज्याध्ययनदानानि तपः सत्यं क्षमा दमः।&lt;br /&gt;
 अलोभ इति मार्गोऽयं धर्मस्याष्टविधः स्मृतः॥ 3-2-74&lt;br /&gt;
 अत्र पूर्वश्चतुर्वर्गः पितृयाणपथे स्थितः।&lt;br /&gt;
 कर्तव्यमिति यत्कार्यं नाभिमानात्समाचरेत्॥ 3-2-75&lt;br /&gt;
 उत्तरो देवयानस्तु सद्भिराचरितः सदा।&lt;br /&gt;
 अष्टाङ्गेनैव मार्गेण विशुद्धात्मा समाचरेत्॥ 3-2-76&lt;br /&gt;
 सम्यक्सङ्कल्पसम्बन्धात्सम्यक्चेन्द्रियनिग्रहात्।&lt;br /&gt;
 सम्यग्व्रतविशेषाच्च सम्यक्च गुरुसेवनात्॥ 3-2-77&lt;br /&gt;
 सम्यगाहारयोगाच्च सम्यक्चाध्ययनागमात्।&lt;br /&gt;
 सम्यक्कर्मोपसन्न्यासात्सम्यक्चित्तनिरोधनात्॥ 3-2-78&lt;br /&gt;
 एवं कर्माणि कुर्वन्ति संसारविजिगीषवः।&lt;br /&gt;
 रागद्वेषविनिर्मुक्ता ऐश्वर्यं देवता गताः॥ 3-2-79&lt;br /&gt;
 रुद्राः साध्यास्तथाऽऽदित्या वसवोऽथ तथाश्विनौ।&lt;br /&gt;
 योगैश्वर्येण संयुक्ता धारयन्ति प्रजा इमाः॥ 3-2-80&lt;br /&gt;
 [[:Category:Righteousness|''Righteousness'']] [[:Category:धर्म|''धर्म'']] [[:Category:विवेकी पुरुषोकी गती|''विवेकी पुरुषोकी गती'']]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
 तथा त्वमपि कौन्तेय शममास्थाय पुष्कलम्।&lt;br /&gt;
 तपसा सिद्धिमन्विच्छ योगसिद्धिं च भारत॥ 3-2-81&lt;br /&gt;
 [[:Category:Penance|''Penance'']] [[:Category:तपस्या|''तपस्या'']] [[:Category:Righteousness|''Righteousness'']] [[:Category:धर्म|''धर्म'']] [[:Category:विवेकी पुरुषोकी गती|''विवेकी पुरुषोकी गती'']]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
 पितृमातृमयी सिद्धिः प्राप्ता कर्ममयी च ते।&lt;br /&gt;
 तपसा सिद्धिमन्विच्छ द्विजानां भरणाय वै॥ 3-2-82&lt;br /&gt;
 सिद्धा हि यद्यदिच्छन्ति कुर्वते तदनुग्रहात्।&lt;br /&gt;
 तस्मात्तपः समास्थाय कुरुष्वात्ममनोरथम्॥ 3-2-83&lt;br /&gt;
 [[:Category:Penance|''Penance'']] [[:Category:तपस्या|''तपस्या'']]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि अरण्यपर्वणि पाण्डवानां प्रव्रजने द्वितीयोऽध्यायः॥ 2 ॥&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>ShraddhaV</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://dharmawiki.org/index.php?title=Vanaparva_Adhyaya_3_(%E0%A4%B5%E0%A4%A8%E0%A4%AA%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%B5%E0%A4%A3%E0%A4%BF_%E0%A4%85%E0%A4%A7%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%AF%E0%A4%83_%E0%A5%A9)&amp;diff=119810</id>
		<title>Vanaparva Adhyaya 3 (वनपर्वणि अध्यायः ३)</title>
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		<updated>2019-07-10T12:24:04Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;ShraddhaV: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt; वैशम्पायन उवाच&lt;br /&gt;
 शौनकेनैवमुक्तस्तु कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः।&lt;br /&gt;
 पुरोहितमुपागम्य भ्रातृमध्येऽब्रवीदिदम्॥ 3-3-1&lt;br /&gt;
 प्रस्थितं मानुयान्तीमे ब्राह्मणा वेदपारगाः।&lt;br /&gt;
 न चास्मि पोषणे शक्तो बहुदुःखसमन्वितः॥ 3-3-2&lt;br /&gt;
 परित्यक्तुं न शक्तोऽस्मि दानशक्तिश्च नास्ति मे।&lt;br /&gt;
 कथमत्र मया कार्यं तद्ब्रूहि भगवन्मम॥ 3-3-3&lt;br /&gt;
 [[:Category:Service|''Service'']] [[:Category:सेवा|''सेवा'']]&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
 वैशम्पायन उवाच&lt;br /&gt;
 मुहूर्तमिव स ध्यात्वा धर्मेणान्विष्य तां गतिम्।&lt;br /&gt;
 युधिष्ठिरमुवाचेदं धौम्यो धर्मभृतां वरः॥ 3-3-4&lt;br /&gt;
 [[:Category:Dhaumya Rishi|''Dhaumya Rishi'']] [[:Category:धौम्य ऋषि|''धौम्य ऋषि'']]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
 धौम्य उवाच&lt;br /&gt;
 पुरा सृष्टानि भूतानि पीड्यन्ते क्षुधया भृशम्।&lt;br /&gt;
 ततोऽनुकम्पया तेषां सविता स्वपिता यथा॥ 3-3-5&lt;br /&gt;
 गत्वोत्तरायणं तेजो रसानुद्धृत्य रश्मिभिः।&lt;br /&gt;
 दक्षिणायनमावृत्तो महीं निविशते रविः॥ 3-3-6&lt;br /&gt;
 [[:Category:Sun God|''Sun God'']] [[:Category:सूर्य देव|''सूर्य देव'']] [[:Category:अन्न|''अन्न'']]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
 क्षेत्रभूते ततस्तस्मिन्नोषधीरोषधीपतिः।&lt;br /&gt;
 दिवस्तेजः समुद्धृत्य जनयामास वारिणा॥ 3-3-7&lt;br /&gt;
 निषिक्तश्चन्द्रतेजोभिः स्वयोनौ निर्गते रविः।&lt;br /&gt;
 ओषध्यः षड्रसा मेध्यास्तदन्नं प्राणिनां भुवि॥ 3-3-8&lt;br /&gt;
 [[:Category:Sun God|''Sun God'']] [[:Category:सूर्य देव|''सूर्य देव'']] [[:Category:अन्न|''अन्न'']] [[:Category:Moon God|''Moon God'']] [[:Category:चंद्रमा|''चंद्रमा'']] [[:Category:चंद्र देव|''चंद्र देव'']]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
 एवं भानुमयं ह्यन्नं भूतानां प्राणधारणम्।&lt;br /&gt;
 पितैष सर्वभूतानां तस्मात्तं शरणं व्रज॥ 3-3-9&lt;br /&gt;
 [[:Category:Sun God|''Sun God'']] [[:Category:सूर्य देव|''सूर्य देव'']] [[:Category:अन्न|''अन्न'']]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
 राजानो हि महात्मानो योनिकर्मविशोधिताः।&lt;br /&gt;
 उद्धरन्ति प्रजाः सर्वास्तप आस्थाय पुष्कलम्॥ 3-3-10&lt;br /&gt;
 भीमेन कार्तवीर्येण वैन्येन नहुषेण च।&lt;br /&gt;
 तपोयोगसमाधिस्थैरुद्धता ह्यापदः प्रजाः॥ 3-3-11&lt;br /&gt;
 तथा त्वमपि धर्मात्मन्कर्मणा च विशोधितः।&lt;br /&gt;
 तप आस्थाय धर्मेण द्विजातीन्भर भारत॥ 3-3-12&lt;br /&gt;
 [[:Category:Penance|''Penance'']] [[:Category:tapasya|''tapasya'']]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
 जनमेजय उवाच&lt;br /&gt;
 कथं कुरूणामृषभः स तु राजा युधिष्ठिरः।&lt;br /&gt;
 विप्रार्थमाराधितवान्सूर्यमद्भुतदर्शनम्॥ 3-3-13&lt;br /&gt;
 वैशम्पायन उवाच&lt;br /&gt;
 शृणुष्वावहितो राजञ्शुचिर्भूत्वा समाहितः।&lt;br /&gt;
 क्षणं च कुरु राजेन्द्र सम्प्रवक्ष्याम्यशेषतः॥ 3-3-14&lt;br /&gt;
 धौम्येन तु यथा पूर्वं पार्थाय सुमहात्मने।&lt;br /&gt;
 नामाष्टशतमाख्यातं तच्छृणुष्व महामते॥ 3-3-15&lt;br /&gt;
 [[:Category:Sun God|''Sun God'']] [[:Category:सूर्य देव|''सूर्य देव'']]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
 धौम्य उवाच&lt;br /&gt;
 सूर्योऽर्यमा भगस्त्वष्टा पूषार्कः सविता रविः।&lt;br /&gt;
 गभस्तिमानजः कालो मृत्युर्धाता प्रभाकरः॥ 3-3-16&lt;br /&gt;
 पृथिव्यापश्च तेजश्च खं वायुश्च परायणम्।&lt;br /&gt;
 सोमो बृहस्पतिः शुक्रो बुधोऽङ्गारक एव च॥ 3-3-17&lt;br /&gt;
 इन्द्रो विवस्वान्दीप्तांशुः शुचिः शौरिः शनैश्चरः।&lt;br /&gt;
 ब्रह्मा विष्णुश्च रुद्रश्च स्कन्दो वै वरुणो यमः॥ 3-3-18&lt;br /&gt;
 वैद्युतो जाठरश्चाग्निरैन्धनस्तेजसां पतिः।&lt;br /&gt;
 धर्मध्वजो वेदकर्ता वेदाङ्गो वेदवाहनः॥ 3-3-19&lt;br /&gt;
 कृतं त्रेता द्वापरश्च कलिः सर्वमलाश्रयः।&lt;br /&gt;
 कला काष्ठा मुहूर्ताश्च क्षपा यामस्तथा क्षणः॥ 3-3-20&lt;br /&gt;
 संवत्सरकरोऽश्वत्थः कालचक्रो विभावसुः।&lt;br /&gt;
 पुरुषः शाश्वतो योगी व्यक्ताव्यक्तः सनातनः॥ 3-3-21&lt;br /&gt;
 कालाध्यक्षः प्रजाध्यक्षो विश्वकर्मा तमोनुदः।&lt;br /&gt;
 वरुणः सागरोंऽशुश्च जीमूतो जीवनोऽरिहा॥ 3-3-22&lt;br /&gt;
 भूताश्रयो भूतपतिः सर्वलोकनमस्कृतः।&lt;br /&gt;
 स्रष्टा संवर्तको वह्निः सर्वस्यादिरलोलुपः॥ 3-3-23&lt;br /&gt;
 अनन्तः कपिलो भानुः कामदः सर्वतोमुखः।&lt;br /&gt;
 जयो विशालो वरदः सर्वधातुनिषेचिता॥ 3-3-24&lt;br /&gt;
 मनःसुपर्णो भूतादिः शीघ्रगः प्राणधारकः।&lt;br /&gt;
 धन्वन्तरिर्धूमकेतुरादिदेवोऽदितेः सुतः॥ 3-3-25&lt;br /&gt;
 द्वादशात्मारविन्दाक्षः पिता माता पितामहः।&lt;br /&gt;
 स्वर्गद्वारं प्रजाद्वारं मोक्षद्वारं त्रिविष्टपम्॥ 3-3-26&lt;br /&gt;
 देहकर्ता प्रशान्तात्मा विश्वात्मा विश्वतोमुखः।&lt;br /&gt;
 चराचरात्मा सूक्ष्मात्मा मैत्रेयः करुणान्वितः॥ 3-3-27&lt;br /&gt;
 एतद्वै कीर्तनीयस्य सूर्यस्यामिततेजसः।&lt;br /&gt;
 नामाष्टशतकं चेदं प्रोक्तमेतत्स्वयंभुवा॥ 3-3-28&lt;br /&gt;
 [[:Category:108 names of Sun God|''108 names of Sun God'']] [[:Category:सूर्य देव|''सूर्य देव'']] [[:Category:१०८|''१०८'']]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
 सुरगणपितृयक्षसेवितं ह्यसुरनिशाचरसिद्धवन्दितम्।&lt;br /&gt;
 वरकनकहुताशनप्रभं प्रणिपतितोऽस्मि हिताय भास्करम्॥ 3-3-29&lt;br /&gt;
 सूर्योदये यः सुसमाहितः पठेत्स पुत्रदारान्धनरत्नसञ्चयान्।&lt;br /&gt;
 लभेत जातिस्मरतां नरः सदा धृतिं च मेधां च स विन्दते पुमान्॥ 3-3-30&lt;br /&gt;
 इमं स्तवं देववरस्य यो नरः प्रकीर्तयेच्छुचिसुमनाः समाहितः।&lt;br /&gt;
 विमुच्यते शोकदवाग्निसागराल्लभेत कामान्मनसा यथेप्सितान्॥ 3-3-31&lt;br /&gt;
 [[:Category:Worship of Sun God|''Worship of Sun God'']] [[:Category:सूर्य देव आराधना|''सूर्य देव आराधना'']]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
 वैशम्पायन उवाच&lt;br /&gt;
 एवमुक्तस्तु धौम्येन तत्कालसदृशं वचः।&lt;br /&gt;
 विप्रत्यागसमाधिस्थः संयतात्मा दृढव्रतः॥ 3-3-32&lt;br /&gt;
 धर्मराजो विशुद्धात्मा तप आतिष्ठदुत्तमम्।&lt;br /&gt;
 पुष्पोपहारैर्बलिभिरर्चयित्वा दिवाकरम्॥ 3-3-33&lt;br /&gt;
 सोऽवगाह्य जलं राजा देवस्याभिमुखोऽभवत्।&lt;br /&gt;
 योगमास्थाय धर्मात्मा वायुभक्षो जितेन्द्रियः॥ 3-3-34&lt;br /&gt;
 गाङ्गेयं वार्युपस्पृश्य प्राणायामेन तस्थिवान्।&lt;br /&gt;
 शुचिः प्रयतवाग्भूत्वा स्तोत्रमारब्धवांस्ततः॥ 3-3-35&lt;br /&gt;
 [[:Category:Worship|''Worship'']] [[:Category:पुजा|''पुजा'']]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
 युधिष्ठिर उवाच&lt;br /&gt;
 त्वं भानो जगतश्चक्षुस्त्वमात्मा सर्वदेहिनाम्।&lt;br /&gt;
 त्वं योनिः सर्वभूतानां त्वमाचारः क्रियावताम्॥ 3-3-36&lt;br /&gt;
 त्वं गतिः सर्वसांख्यानां योगिनां त्वं परायणम्।&lt;br /&gt;
 अनावृतार्गलद्वारं त्वं गतिस्त्वं मुमुक्षताम्॥ 3-3-37&lt;br /&gt;
 त्वया संधार्यते लोकस्त्वया लोकः प्रकाश्यते।&lt;br /&gt;
 त्वया पवित्रीक्रियते निर्व्याजं पाल्यते त्वया॥ 3-3-38&lt;br /&gt;
 त्वामुपस्थाय काले तु ब्राह्मणा वेदपारगाः।&lt;br /&gt;
 स्वशाखाविहितैर्मन्त्रैरर्चन्त्यृषिगणार्चितम्॥ 3-3-39&lt;br /&gt;
 तव दिव्यं रथं यान्तमनुयान्ति वरार्थिनः।&lt;br /&gt;
 सिद्धचारणगन्धर्वा यक्षगुह्यकपन्नगाः॥ 3-3-40&lt;br /&gt;
 त्रयस्त्रिंशच्च वै देवास्तथा वैमानिका गणाः।&lt;br /&gt;
 सोपेन्द्राः समहेन्द्राश्च त्वामिष्ट्वा सिद्धिमागताः॥ 3-3-41&lt;br /&gt;
 उपयान्त्यर्चयित्वा तु त्वां वै प्राप्तमनोरथाः।&lt;br /&gt;
 दिव्यमन्दारमालाभिस्तूर्णं विद्याधरोत्तमाः॥ 3-3-42&lt;br /&gt;
 गुह्याः पितृगणाः सप्त ये दिव्या ये च मानुषाः।&lt;br /&gt;
 ते पूजयित्वा त्वामेव गच्छन्त्याशु प्रधानताम्॥ 3-3-43&lt;br /&gt;
 वसवो मरुतो रुद्रा ये च साध्या मरीचिपाः।&lt;br /&gt;
 वालखिल्यादयः सिद्धाः श्रेष्ठत्वं प्राणिनां गताः॥ 3-3-44&lt;br /&gt;
 सब्रह्मकेषु लोकेषु सप्तस्वप्यखिलेषु च।&lt;br /&gt;
 न तद्भूतमहं मन्ये यदर्कादतिरिच्यते॥ 3-3-45&lt;br /&gt;
 सन्ति चान्यानि सत्त्वानि वीर्यवन्ति महान्ति च।&lt;br /&gt;
 न तु तेषां तथा दीप्तिः प्रभावो वा यथा तव॥ 3-3-46&lt;br /&gt;
 ज्योतींषि त्वयि सर्वाणि त्वं सर्वज्योतिषां पतिः।&lt;br /&gt;
 त्वयि सत्यं च सत्त्वं च सर्वे भावाश्च सात्त्विकाः॥ 3-3-47&lt;br /&gt;
 त्वत्तेजसा कृतं चक्रं सुनाभं विश्वकर्मणा।&lt;br /&gt;
 देवारीणां मदो येन नाशितः शार्ङ्गधन्वना॥ 3-3-48&lt;br /&gt;
 त्वमादायांशुभिस्तेजो निदाघे सर्वदेहिनाम्।&lt;br /&gt;
 सर्वौषधिरसानां च पुनर्वर्षासु मुञ्चसि॥ 3-3-49&lt;br /&gt;
 तपन्त्यन्ये दहन्त्यन्ये गर्जन्त्यन्ये तथा घनाः।&lt;br /&gt;
 विद्योतन्ते प्रवर्षन्ति तव प्रावृषि रश्मयः॥ 3-3-50&lt;br /&gt;
 न तथा सुखयत्यग्निर्न प्रावारा न कम्बलाः।&lt;br /&gt;
 शीतवातार्दितं लोकं यथा तव मरीचयः॥ 3-3-51&lt;br /&gt;
 त्रयोदशद्वीपवतीं गोभिर्भासयसे महीम्।&lt;br /&gt;
 त्रयाणामपि लोकानां हितायैकः प्रवर्तसे॥ 3-3-52&lt;br /&gt;
 तव यद्युदयो न स्यादन्धं जगदिदं भवेत्।&lt;br /&gt;
 न च धर्मार्थकामेषु प्रवर्तेरन्मनीषिणः॥ 3-3-53&lt;br /&gt;
 आधानपशुबन्धेष्टिमन्त्रयज्ञतपःक्रियाः।&lt;br /&gt;
 त्वत्प्रसादादवाप्यन्ते ब्रह्मक्षत्रविशां गणैः॥ 3-3-54&lt;br /&gt;
 यदहर्ब्रह्मणः प्रोक्तं सहस्रयुगसम्मितम्।&lt;br /&gt;
 तस्य त्वमादिरन्तश्च कालज्ञैः परिकीर्तितः॥ 3-3-55&lt;br /&gt;
 मनूनां मनुपुत्राणां जगतोऽमानवस्य च।&lt;br /&gt;
 मन्वन्तराणां सर्वेषामीश्वराणां त्वमीश्वरः॥ 3-3-56&lt;br /&gt;
 संहारकाले सम्प्राप्ते तव क्रोधविनिःसृतः।&lt;br /&gt;
 संवर्तकाग्निस्त्रैलोक्यं भस्मीकृत्यावतिष्ठते॥ 3-3-57&lt;br /&gt;
 त्वद्दीधितिसमुत्पन्ना नानावर्णा महाघनाः।&lt;br /&gt;
 सैरावताः साशनयः कुर्वन्त्याभूतसम्प्लवम्॥ 3-3-58&lt;br /&gt;
 कृत्वा द्वादशधाऽऽत्मानं द्वादशादित्यतां गतः।&lt;br /&gt;
 संहृत्यैकार्णवं सर्वं त्वं शोषयसि रश्मिभिः॥ 3-3-59&lt;br /&gt;
 त्वामिन्द्रमाहुस्त्वं रुद्रस्त्वं विष्णुस्त्वं प्रजापतिः।&lt;br /&gt;
 त्वमग्निस्त्वं मनः सूक्ष्मं प्रभुस्त्वं ब्रह्म शाश्वतम्॥ 3-3-60&lt;br /&gt;
 त्वं हंसः सविता भानुरंशुमाली वृषाकपिः।&lt;br /&gt;
 विवस्वान्मिहिरः पूषा मित्रो धर्मस्तथैव च॥ 3-3-61&lt;br /&gt;
 सहस्ररश्मिरादित्यस्तपनस्त्वं गवाम्पतिः।&lt;br /&gt;
 मार्तण्डोऽर्को रविः सूर्यः शरण्यो दिनकृत्तथा॥ 3-3-62&lt;br /&gt;
 दिवाकरः सप्तसप्तिर्धामकेशी विरोचनः।&lt;br /&gt;
 आशुगामी तमोघ्नश्च हरिताश्वश्च कीर्त्यसे॥ 3-3-63&lt;br /&gt;
 सप्तम्यामथवा षष्ठ्यां भक्त्या पूजां करोति यः।&lt;br /&gt;
 अनिर्विण्णोऽनहङ्कारी तं लक्ष्मीर्भजते नरम्॥ 3-3-64&lt;br /&gt;
 न तेषामापदः सन्ति नाधयो व्याधयस्तथा।&lt;br /&gt;
 ये तवानन्यमनसः कुर्वन्त्यर्चनवन्दनम्॥ 3-3-65&lt;br /&gt;
 सर्वरोगैर्विरहिताः सर्वपापविवर्जिताः।&lt;br /&gt;
 त्वद्भावभक्ताः सुखिनो भवन्ति चिरजीविनः॥ 3-3-66&lt;br /&gt;
 त्वं ममाप्यन्नकामस्य सर्वातिथ्यं चिकीर्षतः।&lt;br /&gt;
 अन्नमन्नपते दातुमभितः श्रद्धयार्हसि॥ 3-3-67&lt;br /&gt;
 ये च तेऽनुचराः सर्वे पादोपान्तं समाश्रिताः।&lt;br /&gt;
 माठरारुणदण्डाद्यास्तांस्तान्वन्देऽशनिक्षुभान्॥ 3-3-68&lt;br /&gt;
 क्षुभया सहिता मैत्री याश्चान्या भूतमातरः।&lt;br /&gt;
 ताश्च सर्वा नमस्यामि पान्तु मां शरणागतम्॥ 3-3-69&lt;br /&gt;
 वैशम्पायन उवाच&lt;br /&gt;
 एवं स्तुतो महाराज भास्करो लोकभावनः।&lt;br /&gt;
 ततो दिवाकरः प्रीतो दर्शयामास पाण्डवम्।&lt;br /&gt;
 दीप्यमानः स्ववपुषा ज्वलन्निव हुताशनः॥ 3-3-70&lt;br /&gt;
 [[:Category:Sun God|''Sun God'']] [[:Category:सूर्य देव|''सूर्य देव'']]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
 विवस्वानुवाच&lt;br /&gt;
 यत्तेऽभिलषितं किञ्चित्तत्त्वं सर्वमवाप्स्यसि।&lt;br /&gt;
 अहमन्नं प्रदास्यामि सप्त पञ्च च ते समाः॥ 3-3-71&lt;br /&gt;
 फलमूलामिषं शाकं संस्कृतं यन्महानसे।&lt;br /&gt;
 गृह्णीष्व पिठरं ताम्रं मया दत्त नराधिप।&lt;br /&gt;
 यावद्वर्त्स्यति पाञ्चाली पात्रेणानेन सुव्रत॥ 3-3-72&lt;br /&gt;
 फलमूलामिषं शाकं संस्कृतं यन्महानसे।&lt;br /&gt;
 चतुर्विधं तदन्नाद्यमक्षय्यं ते भविष्यति।&lt;br /&gt;
 धनं च विविधं तुभ्यमित्युक्त्वान्तरधीयत॥&lt;br /&gt;
 इतश्चतुर्दशे वर्षे भूयो राज्यमवाप्स्यसि॥ 3-3-73&lt;br /&gt;
 [[:Category:Pandavas get Akshaypatra|''Pandavas get Akshaypatra'']] [[:Category:अक्षयपात्र|''अक्षयपात्र'']]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
 वैशम्पायन उवाच&lt;br /&gt;
 एवमुक्त्वा तु भगवांस्तत्रैवान्तरधीयत॥ 3-3-74&lt;br /&gt;
 इमं स्तवं प्रयतमनाः समाधिना पठेदिहान्योऽपि वरं समर्थयन्।&lt;br /&gt;
 तत्तस्य दद्याच्च रविर्मनीषितं तदाप्नुयाद्यद्यपि तत्सुदुर्लभम्॥ 3-3-74&lt;br /&gt;
 यश्चेदं धारयेन्नित्यं शृणुयाद्वाप्यभीक्ष्णशः।&lt;br /&gt;
 पुत्रार्थी लभते पुत्रं धनार्थी लभते धनम्॥ 3-3-75&lt;br /&gt;
 विद्यार्थी लभते विद्यां पुरुषोऽप्यथवा स्त्रियः।&lt;br /&gt;
 उभे सन्ध्ये पठेन्नित्यं नारी वा पुरुषो यदि॥ 3-3-76&lt;br /&gt;
 आपदं प्राप्य मुच्येत बद्धो मुच्येत बन्धनात्।&lt;br /&gt;
 एतद्ब्रह्मा ददौ पूर्वं शक्राय सुमहात्मने॥ 3-3-77&lt;br /&gt;
 शक्राच्च नारदः प्राप्तो धौम्यस्तु तदनन्तरम्।&lt;br /&gt;
 धौम्याद्युधिष्ठिरः प्राप्य सर्वान्कामानवाप्तवान्॥ 3-3-78&lt;br /&gt;
 सङ्ग्रामे च जयेन्नित्यं विपुलं चाप्नुयाद्वसु।&lt;br /&gt;
 मुच्यते सर्वपापेभ्यः सूर्यलोकं स गच्छति॥ 3-3-79&lt;br /&gt;
 [[:Category:Benefits of worshiping Sun God|''Benefits of worshiping Sun God'']]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
 वैशम्पायन उवाच&lt;br /&gt;
 लब्ध्वा वरं तु कौन्तेयो जलादुत्तीर्य धर्मवित्।&lt;br /&gt;
 जग्राह पादौ धौम्यस्य भ्रातॄंश्च परिषस्वजे॥ 3-3-80&lt;br /&gt;
 द्रौपद्या सह सङ्गम्य वन्द्यमानस्तया प्रभुः।&lt;br /&gt;
 महानसे तदानीं तु साधयामास पाण्डवः॥ 3-3-81&lt;br /&gt;
 संस्कृतं प्रसवं याति स्वल्पमन्नं चतुर्विधम्।&lt;br /&gt;
 अक्षय्यं वर्धते चान्नं तेन भोजयते द्विजान्॥ 3-3-82&lt;br /&gt;
 भुक्तवत्सु च विप्रेषु भोजयित्वानुजानपि।&lt;br /&gt;
 शेषं विघससंज्ञं तु पश्चाद्भुङ्क्ते युधिष्ठिरः॥ 3-3-83&lt;br /&gt;
 युधिष्ठिरं भोजयित्वा शेषमश्नाति पार्षती।&lt;br /&gt;
 द्रौपद्यां भुज्यमानायां तदन्नं क्षयमेति च।&lt;br /&gt;
 एवं दिवाकरात्प्राप्य दिवाकरसमप्रभः॥ 3-3-84&lt;br /&gt;
 कामान्मनोऽभिलषितान्ब्राह्मणेभ्योऽददात्प्रभुः।&lt;br /&gt;
 पुरोहितपुरोगाश्च तिथिनक्षत्रपर्वसु।&lt;br /&gt;
 यज्ञियार्थाः प्रवर्तन्ते विधिमन्त्रप्रमाणतः॥ 3-3-85&lt;br /&gt;
 [[:Category:Serving Brahmanas|''Serving Brahmanas'']] [[:Category:Akshaypatra|''Akshaypatra'']] [[:Category:अक्षयपात्र|''अक्षयपात्र'']]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
 ततः कृतस्वस्त्ययना धौम्येन सह पाण्डवाः।&lt;br /&gt;
 द्विजसङ्घैः परिवृताः प्रययुः काम्यकं वनम्॥ 3-3-86&lt;br /&gt;
 [[:Category:Kamyavan|''Kamyavan'']] [[:Category:काम्यवन|''काम्यवन'']]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जनमेजयः पुष्पोपहारबलिभिर्बहुशश्च यथाविधि।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सर्वात्मभूतं सम्पूज्य यतप्राणो जितेन्द्रियः॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
स्तवेन केन विप्रर्षे स तु राजा युधिष्ठिरः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
विप्रार्थमाराधितवान्सूर्यमद्भुतविक्रमम्॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मयि स्नेहोऽस्ति चेद्ब्रह्मन्यदनुग्रहभागहम्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भगवान्नास्ति चेद्गुह्यं तच्च मे ब्रूहि साम्प्रतम्॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वैशम्पायनः शृणुष्वावहितो राजन्शुचिर्भूत्वा समाहितः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
क्षणं च कुरु राजेन्द्र गुह्यं वक्ष्यामि ते हितम्॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
धौम्येन तु यथाप्रोक्तं पार्थाय सुमहात्मने।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
नाम्नामष्टशतं पुण्यं तच्छृणुष्व महामते॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सूर्योऽर्यमा भगस्त्वष्टा पूषाऽर्कस्सविता रविः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
गभस्तिमानजः कालो मृत्युर्धाता प्रभाकरः॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पृथिव्यापश्च तेजश्च खं वायुश्च परायणम्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सोमो बृहस्पतिश्शुक्रो बुधोऽङ्गारक एव च॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इन्द्रो विवस्वान्दीप्तांशुश्शुचिश्शौरिश्शनैश्चरः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ब्रह्मा विष्णुश्च रुद्रश्च स्कन्दो वैश्रवणो यमः॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वैद्युतो जाठरश्चाग्निः ऐन्धनस्तेजसां पतिः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
धर्मध्वजो वेदकर्ता वेदाङ्गो वेदवाहनः॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कृतं त्रेता द्वापरश्च कलिस्सर्वामराश्रयः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कला काष्ठा मुहूर्ताश्च पक्षा मासा ऋतुस्तथा॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
संवत्सरकरोऽश्वत्थः कालचक्रो विभावसुः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पुरुषश्शाश्वतो योगी व्यक्ताव्यक्तस्सनातनः॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
लोकाध्यक्षस्सुराध्यक्षो विश्वकर्मा तमोनुदः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वरुणस्सागरोंशुश्च जीमूतो जीवनोऽरिहा॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भूताश्रयो भूतपतिस्सर्वभूतनिषेवितः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मणिस्सुवर्णो भूतादिः कामदस्सर्वतोमुखः॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जयो विशालो वरदश्शीघ्रगः प्राणधारणः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
धन्वन्तरिर्धूमकेतुः आदिदेवोऽदितेस्सुतः॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
द्वादशात्माऽरविन्दाक्षः पिता माता पितामहः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
स्वर्गद्वारं प्रजाद्वारं मोक्षद्वारं त्रिविष्टपम्॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
देवकर्ता प्रशान्तात्मा विश्वात्मा विश्वतोमुखः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
चराचरात्मा सूक्ष्मात्मा मैत्रेण वपुषाऽन्वितः॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
एतद्वै कीर्तनीयस्य सूर्यस्यैव महात्मनः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
नाम्नामष्टशतं पुण्यं शक्रेणोक्तं महात्मना॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शक्राच्च नारदः प्राप्तो धौम्यश्च तदनन्तरम्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
धौम्याद्युधिष्ठिरः प्राप्य सर्वान्कामानवाप्तवान्॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सुरपितृगणयक्षसेवितं निशिचरसिद्धगणैश्च वन्दितम्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वरकनकहुताशनप्रभं त्वमपि मनस्यभिधेहि भास्करम्॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सूर्योदये यस्सुसमाहितः पठेत्स पुत्रलाभं धनरत्नसञ्चयान्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
लभेत जातिस्मरतां सदा नरे धृतिं च मेधां च स विन्दते वराम्॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इमं स्तवं देववरस्य कीर्तयेच्छृणोति वा यस्सुमनास्समाहितः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
स मुच्यते शोकदवाग्निसागराल्लभेत कामान्मनसा यथेप्सितान्॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इति श्रीमिहाभारते वनपर्वणि अरण्यपर्वणि काम्यकवनप्रवेशे तृतीयोऽध्यायः॥ 3 ॥&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>ShraddhaV</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://dharmawiki.org/index.php?title=Vanaparva_Adhyaya_2_(%E0%A4%B5%E0%A4%A8%E0%A4%AA%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%B5%E0%A4%A3%E0%A4%BF_%E0%A4%85%E0%A4%A7%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%AF%E0%A4%83_%E0%A5%A8)&amp;diff=119809</id>
		<title>Vanaparva Adhyaya 2 (वनपर्वणि अध्यायः २)</title>
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		<updated>2019-07-10T12:19:55Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;ShraddhaV: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt; वैशम्पायन उवाच&lt;br /&gt;
 प्रभातायां तु शर्वर्यां तेषामक्लिष्टकर्मणाम्।&lt;br /&gt;
 वनं यियासतां विप्रास्तस्थुर्भिक्षाभुजोऽग्रतः॥ 3-2-1&lt;br /&gt;
 तानुवाच ततो राजा कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः।&lt;br /&gt;
 वयं हि हृतसर्वस्वा हृतराज्या हृतश्रियः॥ 3-2-2&lt;br /&gt;
 फलमूलाशनाहारा वनं गच्छाम दुःखिताः।&lt;br /&gt;
 वनं च दोषबहुलं बहुव्यालसरीसृपम्॥ 3-2-3&lt;br /&gt;
 परिक्लेशश्च वो मन्ये ध्रुवं तत्र भविष्यति।&lt;br /&gt;
 ब्राह्मणानां परिक्लेशो दैवतान्यपि सादयेत्।&lt;br /&gt;
 किं पुनर्मामितो विप्रा निवर्तध्वं यथेष्टतः॥ 3-2-4&lt;br /&gt;
 ब्राह्मणा ऊचुः&lt;br /&gt;
 गतिर्या भवतां राजंस्तां वयं गन्तुमुद्यताः।&lt;br /&gt;
 नार्हस्यस्मान्परित्यक्तुं भक्तान्सद्धर्मदर्शिनः॥ 3-2-5&lt;br /&gt;
 अनुकम्पां हि भक्तेषु देवता ह्यपि कुर्वते।&lt;br /&gt;
 विशेषतो ब्राह्मणेषु सदाचारावलम्बिषु॥ 3-2-6&lt;br /&gt;
 [[:Category:Yudhishtir - brahmans conversation|''Yudhishtir - brahmans conversation'']] [[:Category:युधिष्टीर ब्राह्मण संवाद|''युधिष्टीर ब्राह्मण संवाद'']]&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
 युधिष्ठिर उवाच&lt;br /&gt;
 ममापि परमा भक्तिर्ब्राह्मणेषु सदा द्विजाः।&lt;br /&gt;
 सहायविपरिभ्रंशस्त्वयं सादयतीव माम्॥ 3-2-7&lt;br /&gt;
 आहरेयुरिमे येऽपि फलमूलमृगांस्तथा[मधूनि च]।&lt;br /&gt;
 त इमे शोकजैर्दुःखैर्भ्रातरो मे विमोहिताः॥ 3-2-8&lt;br /&gt;
 द्रौपद्या विप्रकर्षेण राज्यापहरणेन च।&lt;br /&gt;
 दुःखार्दितानिमान्क्लेशैर्नाहं योक्तुमिहोत्सहे॥ 3-2-9&lt;br /&gt;
 [[:Category:Yudhishtir - brahmans conversation|''Yudhishtir - brahmans conversation'']] [[:Category:युधिष्टीर ब्राह्मण संवाद|''युधिष्टीर ब्राह्मण संवाद'']] [[:Category:Sadness|''Sadness'']] [[:Category:दु:ख|''दु:ख'']] [[:Category:शोक|''शोक'']]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
 ब्राह्मणा ऊचुः&lt;br /&gt;
 अस्मत्पोषणजा चिन्ता मा भूत्ते हृदि पार्थिव।&lt;br /&gt;
 स्वयमाहृत्य चान्नानि चोपयोक्षा[त्वानुयास्या]महे वयम्॥ 3-2-10&lt;br /&gt;
 अनुध्यानेन जप्येन विधास्यामः शिवं तव।&lt;br /&gt;
 कथाभिश्चाभिरम्याभिः सह रंस्यामहे वयम्॥ 3-2-11&lt;br /&gt;
 युधिष्ठिर उवाच&lt;br /&gt;
 एवमेतन्न सन्देहो रमेऽहं सततं द्विजैः।&lt;br /&gt;
 मा[न्यू]नभावात्तु पश्यामि प्रत्यादेशमिवात्मनः॥ 3-2-12&lt;br /&gt;
 कथं द्रक्ष्यामि वः सर्वान्स्वयमाहृतभोजनान्।&lt;br /&gt;
 मद्भक्त्या क्लिश्यतोऽनर्हान्धिक्पापान्धृतराष्ट्रजान्॥ 3-2-13&lt;br /&gt;
 [[:Category:Yudhishtir - brahmans conversation|''Yudhishtir - brahmans conversation'']] [[:Category:युधिष्टीर ब्राह्मण संवाद|''युधिष्टीर ब्राह्मण संवाद'']]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वैशम्पायन उवाच&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इत्युक्त्वा स नृपः शोचन्निषसाद महीतले।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तमध्यात्मरतो विद्वान्शौनको नाम वै द्विजः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
योगे सांख्ये च कुशलो राजानमिदमब्रवीत्॥ 3-2-14&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
 शोकस्थानसहस्राणि भयस्थानशतानि च।&lt;br /&gt;
 दिवसे दिवसे मूढमाविशन्ति न पण्डितम्॥ 3-2-15&lt;br /&gt;
 न हि ज्ञानविरुद्धेषु बहुदोषेषु कर्मसु।&lt;br /&gt;
 श्रेयोघातिषु सज्जन्ते बुद्धिमन्तो भवद्विधाः॥ 3-2-16&lt;br /&gt;
 अष्टाङ्गां बुद्धिमाहुर्यां सर्वाश्रेयोऽभिघातिनीम्।&lt;br /&gt;
 श्रुतिस्मृतिसमायुक्तां राजन्सा त्वय्यवस्थिता॥ 3-2-17&lt;br /&gt;
 अर्थकृच्छ्रेषु दुर्गेषु व्यापत्सु स्वजनस्य च।&lt;br /&gt;
 शारीरमानसैर्दुःखैर्न सीदन्ति भवद्विधाः॥ 3-2-18&lt;br /&gt;
 [[:Category:Description of a knowledgeable person|''Description of a knowledgeable person'']] [[:Category:ज्ञानी जनस्य वर्णनं|''ज्ञानी जनस्य वर्णनं'']]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
श्रूयतां चाभिधास्यामि जनकेन यथा पुरा।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आत्मव्यवस्थानकरा गीताः श्लोका महात्मना॥ 3-2-19&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
 मनोदेहसमुत्थाभ्यां दुःखाभ्यामर्दितं जगत्।&lt;br /&gt;
 तयोर्व्याससमासाभ्यां शमोपायमिमं शृणु॥ 3-2-20&lt;br /&gt;
 व्याधेरनिष्टसंस्पर्शाच्छ्रमादिष्टविवर्जनात्।&lt;br /&gt;
 दुःखं चतुर्भिः शारीरं कारणैः सम्प्रवर्तते॥ 3-2-21&lt;br /&gt;
 तदा तत्प्रतिकाराच्च सततं चाविचिन्तनात्।&lt;br /&gt;
 आधिव्याधिप्रशमनं क्रियायोगद्वयेन तु॥ 3-2-22&lt;br /&gt;
 मतिमन्तो ह्यतो वैद्याः शमं प्रागेव कुर्वते।&lt;br /&gt;
 मानसस्य प्रियाख्यानैः सम्भोगोपनयैर्नृणाम्॥ 3-2-23&lt;br /&gt;
 [[:Category:solution to overcome sadness|''solution to overcome sadness'']]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
 मानसेन हि दुःखेन शरीरमुपतप्यते।&lt;br /&gt;
 अयःपिण्डेन तप्तेन कुम्भसंस्थमिवोदकम्॥ 3-2-24&lt;br /&gt;
 मानसं शमयेत्तस्माज्ज्ञानेनाग्निमिवाम्बुना।&lt;br /&gt;
 प्रशान्ते मानसे ह्यस्य शारीरमुपशाम्यति॥ 3-2-25&lt;br /&gt;
 [[:Category:solution to overcome sadness|''solution to overcome sadness'']] [[:Category:connection between physical and mental health|''connection between physical and mental health'']]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
 मनसो दुःखमूलं तु स्नेह इत्युपलभ्यते।&lt;br /&gt;
 स्नेहात्तु सज्जते जन्तुर्दुःखयोगमुपैति च॥ 3-2-26&lt;br /&gt;
 स्नेहमूलानि दुःखानि स्नेहजानि भयानि च।&lt;br /&gt;
 शोकहर्षौ तथाऽऽयासः सर्वं स्नेहात्प्रवर्तते॥ 3-2-27&lt;br /&gt;
 स्नेहाद्भावोऽनुरागश्च प्रजज्ञे विषये तथा।&lt;br /&gt;
 अश्रेयस्कावुभावेतौ पूर्वस्तत्र गुरुः स्मृतः॥ 3-2-28&lt;br /&gt;
 कोटराग्निर्यथाशेषं समूलं पादपं दहेत्।&lt;br /&gt;
 धर्मार्थौ तु तथाल्पोऽपि रागदोषो विनाशयेत्॥ 3-2-29&lt;br /&gt;
 [[:Category:solution to overcome sadness|''solution to overcome sadness'']] [[:Category:attachment|''attachment'']] [[:Category:आसक्ती|''आसक्ती'']]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
 विप्रयोगे न तु त्यागी दोषदर्शी समागमे।&lt;br /&gt;
 विरागं भजते जन्तुर्निर्वैरो निरवग्रहः॥ 3-2-30&lt;br /&gt;
 [[:Category:detachment|''detachment'']] [[:Category:त्याग|''त्याग'']]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
 तस्मात्स्नेहं न लिप्सेत मित्रेभ्यो धनसञ्चयात्।&lt;br /&gt;
 स्वशरीरसमुत्थं च ज्ञानेन विनिवर्तयेत्॥ 3-2-31&lt;br /&gt;
 ज्ञानान्वितेषु युक्तेषु शास्त्रज्ञेषु कृतात्मसु।&lt;br /&gt;
 न तेषु सज्जते स्नेहः पद्मपत्रेष्विवोदकम्॥ 3-2-32&lt;br /&gt;
 [[:Category:attachment|''attachment'']] [[:Category:आसक्ती|''आसक्ती'']]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
 रागाभिभूतः पुरुषः कामेन परिकृष्यते।&lt;br /&gt;
 इच्छा सञ्जायते तस्य ततस्तृष्णा विवर्धते॥ 3-2-33&lt;br /&gt;
 तृष्णा हि सर्वपापिष्ठा नित्योद्वेगकरी स्मृता।&lt;br /&gt;
 अधर्मबहुला चैव घोरा पापानुबन्धिनी॥ 3-2-34&lt;br /&gt;
 या दुस्त्यजा दुर्मतिभिर्या न जीर्यति जीर्यतः।&lt;br /&gt;
 योऽसौ प्राणान्तिको रोगस्तां तृष्णां त्यजतः सुखम्॥ 3-2-35&lt;br /&gt;
 अनाद्यन्ता तु सा तृष्णा अन्तर्देहगता नृणाम्।&lt;br /&gt;
 विनाशयति भूतानि अयोनिज इवानलः॥ 3-2-36&lt;br /&gt;
 यथैधः स्वसमुत्थेन वह्निना नाशमृच्छति।&lt;br /&gt;
 तथाकृतात्मा लोभेन सहजेन विनश्यति॥ 3-2-37&lt;br /&gt;
 [[:Category:anarthas|''anarthas'']] [[:Category:अनर्थ|''अनर्थ'']]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
 राजतः सलिलादग्नेश्चोरतः स्वजनादपि।&lt;br /&gt;
 भयमर्थवतां नित्यं मृत्योः प्राणभृतामिव॥ 3-2-38&lt;br /&gt;
 यथा ह्यामिषमाकाशे पक्षिभिः श्वापदैर्भुवि।&lt;br /&gt;
 भक्ष्यते सलिले मत्स्यैस्तथा सर्वत्र वित्तवान्॥ 3-2-39&lt;br /&gt;
 [[:Category:anarthas|''anarthas'']] [[:Category:अनर्थ|''अनर्थ'']] [:Category:Disadvantages of being wealthy|''Disadvantages of being wealthy'']] [[:Category:धन दोष|''धन दोष'']]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
 अर्थ एव हि केषाञ्चिदनर्थं भजते नृणाम्।&lt;br /&gt;
 अर्थश्रेयसि चासक्तो च श्रेयो विन्दते नरः॥ 3-2-40&lt;br /&gt;
 तस्मादर्थागमाः सर्वे मनोमोहविवर्धनाः।&lt;br /&gt;
 कार्पण्यं दर्पमानौ च भयमुद्वेग एव च॥ 3-2-41&lt;br /&gt;
 अर्थजानि विदुः प्राज्ञा दुःखान्येतानि देहिनाम्।&lt;br /&gt;
 अर्थस्योत्पादने चैव पालने च तथा क्षये॥ 3-2-42&lt;br /&gt;
 सहन्ति च महद्दुःखं घ्नन्ति चैवार्थकारणात्।&lt;br /&gt;
 अर्था दुःखं परित्यक्तुं पालिताश्चैव शत्रवः॥ 3-2-43&lt;br /&gt;
 दुःखेन चाधिगम्यन्ते तस्मान्नाशं न चिन्तयेत्।&lt;br /&gt;
 असन्तोषपरा मूढाः सन्तोषं यान्ति पण्डिताः॥ 3-2-44&lt;br /&gt;
 अन्तो नास्ति पिपासायाः सन्तोषः परमं सुखम्।&lt;br /&gt;
 तस्मात्सन्तोषमेवेह परं पश्यन्ति पण्डिताः॥ 3-2-45&lt;br /&gt;
 अनित्यं यौवनं रूपं जीवितं रत्नसंचयः।&lt;br /&gt;
 ऐश्वर्यं प्रियसंवासो गृध्येत्तत्र न पण्डितः॥ 3-2-46&lt;br /&gt;
 त्यजेत सञ्चयांस्तस्मात्तज्जान्क्लेशान्सहेत च।&lt;br /&gt;
 न हि सञ्चयवान्कश्चिद्दृश्यते निरुपद्रवः।&lt;br /&gt;
 अतश्च धार्मिकैः पुंभिरनीहार्थः प्रशस्यते॥ 3-2-47&lt;br /&gt;
 धर्मार्थं यस्य वित्तेहा वरं तस्य निरीहता।&lt;br /&gt;
 प्रक्षालनाद्धि पङ्कस्य श्रेयो न स्पर्शनं नृणाम्॥ 3-2-48&lt;br /&gt;
 युधिष्ठिरैवं सर्वेषु न स्पृहां कर्तुमर्हसि।&lt;br /&gt;
 धर्मेण यदि ते कार्यं विमुक्तेच्छो भवार्थतः॥ 3-2-49&lt;br /&gt;
 [[:Category:Disadvantages of being wealthy|''Disadvantages of being wealthy'']] [[:Category:धन दोष|''धन दोष'']]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
 युधिष्ठिर उवाच&lt;br /&gt;
 नार्थोपभोगलिप्सार्थमियमर्थेप्सुता मम।&lt;br /&gt;
 भरणार्थं तु विप्राणां ब्रह्मन्काङ्क्षे न लोभतः॥ 3-2-50&lt;br /&gt;
 कथं ह्यस्मद्विधो ब्रह्मन्वर्तमानो गृहाश्रमे।&lt;br /&gt;
 भरणं पालनं चापि न कुर्यादनुयायिनाम्॥ 3-2-51&lt;br /&gt;
 संविभागो हि भूतानां सर्वेषामेव दृश्यते।&lt;br /&gt;
 तथैवापचमानेभ्यः प्रदेयं गृहमेधिना॥ 3-2-52&lt;br /&gt;
 तृणानि भूमिरुदकं वाक्चतुर्थी च सूनृता।&lt;br /&gt;
 सतामेतानि गेहेषु नोच्छिद्यन्ते कदाचन॥ 3-2-53&lt;br /&gt;
 देयमार्तस्य शयनं स्थितश्रान्तस्य चासनम्।&lt;br /&gt;
 तृषितस्य च पानीयं क्षुधितस्य च भोजनम्॥ 3-2-54&lt;br /&gt;
 चक्षुर्दद्यान्मनो दद्याद्वाचं दद्यात्सुभाषिताम्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
 उत्थाय चासनं दद्यादेष धर्मः सनातनः।&lt;br /&gt;
 रत्युत्थायाभिगमनं कुर्यान्न्यायेन चार्चनम्॥ 3-2-55&lt;br /&gt;
 [[:Category:Duties of a householder|''Duties of a householder'']] [[:Category:गृहस्थ धर्म|''गृहस्थ धर्म'']] [[:Category:Sanatan dharma|''Sanatan dharma'']] [[:Category:सनातन धर्म|''सनातन धर्म'']]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
 अग्निहोत्रमनड्वांश्च ज्ञातयोऽतिथिबान्धवाः।&lt;br /&gt;
 पुत्रा दाराश्च भृत्याश्च निर्दहेयुरपूजिताः॥ 3-2-56&lt;br /&gt;
 आत्मार्थं पाचयेन्नान्नं न वृथा घातयेत्पशून्।&lt;br /&gt;
 न च तत्स्वयमश्नीयाद्विधिवद्यन्न निर्वपेत्॥ 3-2-57&lt;br /&gt;
 श्वभ्यश्च श्वपचेभ्यश्च वयोभ्यश्चावपेद्भुवि।&lt;br /&gt;
 वैश्वदेवं हि नामैतत्सायं प्रातश्च दीयते॥ 3-2-58&lt;br /&gt;
 विघसाशी भवेत्तस्मान्नित्यं चामृतभोजनः।&lt;br /&gt;
 विघसो भुक्तशेषं तु यज्ञशेषं तथामृतम्॥ 3-2-59&lt;br /&gt;
 चक्षुर्दद्यान्मनो दद्याद्वाचं दद्याच्च सूनृताम्।&lt;br /&gt;
 अनुव्रजेदुपासीत स यज्ञः पञ्चदक्षिणः॥ 3-2-60&lt;br /&gt;
 यो दद्यादपरिक्लिष्टमन्नमध्वनि वर्तते।&lt;br /&gt;
 श्रान्तायादृष्टपूर्वाय तस्य पुण्यफलं महत्॥ 3-2-61&lt;br /&gt;
 एवं यो वर्तते वृत्तिं वर्तमानो गृहाश्रमे।&lt;br /&gt;
 तस्य धर्मं परं प्राहुः कथं वा विप्र मन्यसे॥ 3-2-62&lt;br /&gt;
 [[:Category:Duties of a householder|''Duties of a householder'']] [[:Category:गृहस्थ धर्म|''गृहस्थ धर्म'']]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
 शौनक उवाच&lt;br /&gt;
 अहो बत महत्कष्टं विपरीतमिदं जगत्।&lt;br /&gt;
 येनापत्रपते साधुरसाधुस्तेन तुष्यति॥ 3-2-63&lt;br /&gt;
 शिश्नोदरकृतेऽप्राज्ञः करोति विघसं बहु।&lt;br /&gt;
 मोहरागवशाक्रान्त इन्द्रियार्थवशानुगः॥ 3-2-64&lt;br /&gt;
 ह्रियते बुध्यमानोऽपि नरो हारिभिरिन्द्रियैः।&lt;br /&gt;
 विमूढसंज्ञो दुष्टाश्वैरुद्भान्तैरिव सारथिः॥ 3-2-65&lt;br /&gt;
 षडिन्द्रियाणि विषयं समागच्छन्ति वै यदा।&lt;br /&gt;
 तदा प्रादुर्भवत्येषां पूर्वसङ्कल्पजं मनः॥ 3-2-66&lt;br /&gt;
 मनो यस्येन्द्रियस्येह विषयान्याति सेवितुम्।&lt;br /&gt;
 तस्यौत्सुक्यं सम्भवति प्रवृत्तिश्चोपजायते॥ 3-2-67&lt;br /&gt;
 ततः सङ्कल्पबीजेन कामेन विषयेषुभिः।&lt;br /&gt;
 विद्धः पतति लोभाग्नौ ज्योतिर्लोभात्पतङ्गवत्॥ 3-2-68&lt;br /&gt;
 ततो विहारैराहारैर्मोहितश्च यथेप्सया।&lt;br /&gt;
 महामोहे सुखे मग्नो नात्मानमवबुध्यते॥ 3-2-69&lt;br /&gt;
 एवं पतति संसारे तासु तास्विह योनिषु।&lt;br /&gt;
 अविद्याकर्मतृष्णाभिर्भ्राम्यमाणोऽथ चक्रवत्॥ 3-2-70&lt;br /&gt;
 ब्रह्मादिषु तृणान्तेषु भूतेषु परिवर्तते।&lt;br /&gt;
 जले भुवि तथाऽऽकाशे जायमानः पुनः पुनः॥ 3-2-71&lt;br /&gt;
 [[:Category:consequences of sense gratification|''consequences of sense gratification'']] [[:Category:इंद्रिय तृप्ति|''इंद्रिय तृप्ति'']] [[:Category:अविवेकी पुरुषोकी गती|''अविवेकी पुरुषोकी गती'']]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
 अबुधानां गतिस्त्वेषा बुधानामपि मे शृणु।&lt;br /&gt;
 ये धर्मे श्रेयसि रता विमोक्षरतयो जनाः॥ 3-2-72&lt;br /&gt;
 तदिदं वेदवचनं कुरु कर्म त्यजेति च।&lt;br /&gt;
 तस्माद्धर्मानिमान्सर्वान्नाभिमानात्समाचरेत्॥ 3-2-73&lt;br /&gt;
 इज्याध्ययनदानानि तपः सत्यं क्षमा दमः।&lt;br /&gt;
 अलोभ इति मार्गोऽयं धर्मस्याष्टविधः स्मृतः॥ 3-2-74&lt;br /&gt;
 अत्र पूर्वश्चतुर्वर्गः पितृयाणपथे स्थितः।&lt;br /&gt;
 कर्तव्यमिति यत्कार्यं नाभिमानात्समाचरेत्॥ 3-2-75&lt;br /&gt;
 उत्तरो देवयानस्तु सद्भिराचरितः सदा।&lt;br /&gt;
 अष्टाङ्गेनैव मार्गेण विशुद्धात्मा समाचरेत्॥ 3-2-76&lt;br /&gt;
 सम्यक्सङ्कल्पसम्बन्धात्सम्यक्चेन्द्रियनिग्रहात्।&lt;br /&gt;
 सम्यग्व्रतविशेषाच्च सम्यक्च गुरुसेवनात्॥ 3-2-77&lt;br /&gt;
 सम्यगाहारयोगाच्च सम्यक्चाध्ययनागमात्।&lt;br /&gt;
 सम्यक्कर्मोपसन्न्यासात्सम्यक्चित्तनिरोधनात्॥ 3-2-78&lt;br /&gt;
 एवं कर्माणि कुर्वन्ति संसारविजिगीषवः।&lt;br /&gt;
 रागद्वेषविनिर्मुक्ता ऐश्वर्यं देवता गताः॥ 3-2-79&lt;br /&gt;
 रुद्राः साध्यास्तथाऽऽदित्या वसवोऽथ तथाश्विनौ।&lt;br /&gt;
 योगैश्वर्येण संयुक्ता धारयन्ति प्रजा इमाः॥ 3-2-80&lt;br /&gt;
 [[:Category:Righteousness|''Righteousness'']] [[:Category:धर्म|''धर्म'']] [[:Category:विवेकी पुरुषोकी गती|''विवेकी पुरुषोकी गती'']]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
 तथा त्वमपि कौन्तेय शममास्थाय पुष्कलम्।&lt;br /&gt;
 तपसा सिद्धिमन्विच्छ योगसिद्धिं च भारत॥ 3-2-81&lt;br /&gt;
 [[:Category:Penance|''Penance'']] [[:Category:तपस्या|''तपस्या'']] [[:Category:Righteousness|''Righteousness'']] [[:Category:धर्म|''धर्म'']] [[:Category:विवेकी पुरुषोकी गती|''विवेकी पुरुषोकी गती'']]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
 पितृमातृमयी सिद्धिः प्राप्ता कर्ममयी च ते।&lt;br /&gt;
 तपसा सिद्धिमन्विच्छ द्विजानां भरणाय वै॥ 3-2-82&lt;br /&gt;
 सिद्धा हि यद्यदिच्छन्ति कुर्वते तदनुग्रहात्।&lt;br /&gt;
 तस्मात्तपः समास्थाय कुरुष्वात्ममनोरथम्॥ 3-2-83&lt;br /&gt;
 [[:Category:Penance|''Penance'']] [[:Category:तपस्या|''तपस्या'']]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि अरण्यपर्वणि पाण्डवानां प्रव्रजने द्वितीयोऽध्यायः॥ 2 ॥&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>ShraddhaV</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://dharmawiki.org/index.php?title=Vanaparva_Adhyaya_2_(%E0%A4%B5%E0%A4%A8%E0%A4%AA%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%B5%E0%A4%A3%E0%A4%BF_%E0%A4%85%E0%A4%A7%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%AF%E0%A4%83_%E0%A5%A8)&amp;diff=119808</id>
		<title>Vanaparva Adhyaya 2 (वनपर्वणि अध्यायः २)</title>
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		<updated>2019-07-10T12:09:29Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;ShraddhaV: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt; वैशम्पायन उवाच&lt;br /&gt;
 प्रभातायां तु शर्वर्यां तेषामक्लिष्टकर्मणाम्।&lt;br /&gt;
 वनं यियासतां विप्रास्तस्थुर्भिक्षाभुजोऽग्रतः॥ 3-2-1&lt;br /&gt;
 तानुवाच ततो राजा कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः।&lt;br /&gt;
 वयं हि हृतसर्वस्वा हृतराज्या हृतश्रियः॥ 3-2-2&lt;br /&gt;
 फलमूलाशनाहारा वनं गच्छाम दुःखिताः।&lt;br /&gt;
 वनं च दोषबहुलं बहुव्यालसरीसृपम्॥ 3-2-3&lt;br /&gt;
 परिक्लेशश्च वो मन्ये ध्रुवं तत्र भविष्यति।&lt;br /&gt;
 ब्राह्मणानां परिक्लेशो दैवतान्यपि सादयेत्।&lt;br /&gt;
 किं पुनर्मामितो विप्रा निवर्तध्वं यथेष्टतः॥ 3-2-4&lt;br /&gt;
 ब्राह्मणा ऊचुः&lt;br /&gt;
 गतिर्या भवतां राजंस्तां वयं गन्तुमुद्यताः।&lt;br /&gt;
 नार्हस्यस्मान्परित्यक्तुं भक्तान्सद्धर्मदर्शिनः॥ 3-2-5&lt;br /&gt;
 अनुकम्पां हि भक्तेषु देवता ह्यपि कुर्वते।&lt;br /&gt;
 विशेषतो ब्राह्मणेषु सदाचारावलम्बिषु॥ 3-2-6&lt;br /&gt;
 [[:Category:Yudhishtir - brahmans conversation|''Yudhishtir - brahmans conversation'']] [[:Category:युधिष्टीर ब्राह्मण संवाद|''युधिष्टीर ब्राह्मण संवाद'']]&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
 युधिष्ठिर उवाच&lt;br /&gt;
 ममापि परमा भक्तिर्ब्राह्मणेषु सदा द्विजाः।&lt;br /&gt;
 सहायविपरिभ्रंशस्त्वयं सादयतीव माम्॥ 3-2-7&lt;br /&gt;
 आहरेयुरिमे येऽपि फलमूलमृगांस्तथा[मधूनि च]।&lt;br /&gt;
 त इमे शोकजैर्दुःखैर्भ्रातरो मे विमोहिताः॥ 3-2-8&lt;br /&gt;
 द्रौपद्या विप्रकर्षेण राज्यापहरणेन च।&lt;br /&gt;
 दुःखार्दितानिमान्क्लेशैर्नाहं योक्तुमिहोत्सहे॥ 3-2-9&lt;br /&gt;
 [[:Category:Yudhishtir - brahmans conversation|''Yudhishtir - brahmans conversation'']] [[:Category:युधिष्टीर ब्राह्मण संवाद|''युधिष्टीर ब्राह्मण संवाद'']] [[:Category:Sadness|''Sadness'']] [[:Category:दु:ख|''दु:ख'']] [[:Category:शोक|''शोक'']]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
 ब्राह्मणा ऊचुः&lt;br /&gt;
 अस्मत्पोषणजा चिन्ता मा भूत्ते हृदि पार्थिव।&lt;br /&gt;
 स्वयमाहृत्य चान्नानि चोपयोक्षा[त्वानुयास्या]महे वयम्॥ 3-2-10&lt;br /&gt;
 अनुध्यानेन जप्येन विधास्यामः शिवं तव।&lt;br /&gt;
 कथाभिश्चाभिरम्याभिः सह रंस्यामहे वयम्॥ 3-2-11&lt;br /&gt;
 युधिष्ठिर उवाच&lt;br /&gt;
 एवमेतन्न सन्देहो रमेऽहं सततं द्विजैः।&lt;br /&gt;
 मा[न्यू]नभावात्तु पश्यामि प्रत्यादेशमिवात्मनः॥ 3-2-12&lt;br /&gt;
 कथं द्रक्ष्यामि वः सर्वान्स्वयमाहृतभोजनान्।&lt;br /&gt;
 मद्भक्त्या क्लिश्यतोऽनर्हान्धिक्पापान्धृतराष्ट्रजान्॥ 3-2-13&lt;br /&gt;
 [[:Category:Yudhishtir - brahmans conversation|''Yudhishtir - brahmans conversation'']] [[:Category:युधिष्टीर ब्राह्मण संवाद|''युधिष्टीर ब्राह्मण संवाद'']]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वैशम्पायन उवाच&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इत्युक्त्वा स नृपः शोचन्निषसाद महीतले।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तमध्यात्मरतो विद्वान्शौनको नाम वै द्विजः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
योगे सांख्ये च कुशलो राजानमिदमब्रवीत्॥ 3-2-14&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
 शोकस्थानसहस्राणि भयस्थानशतानि च।&lt;br /&gt;
 दिवसे दिवसे मूढमाविशन्ति न पण्डितम्॥ 3-2-15&lt;br /&gt;
 न हि ज्ञानविरुद्धेषु बहुदोषेषु कर्मसु।&lt;br /&gt;
 श्रेयोघातिषु सज्जन्ते बुद्धिमन्तो भवद्विधाः॥ 3-2-16&lt;br /&gt;
 अष्टाङ्गां बुद्धिमाहुर्यां सर्वाश्रेयोऽभिघातिनीम्।&lt;br /&gt;
 श्रुतिस्मृतिसमायुक्तां राजन्सा त्वय्यवस्थिता॥ 3-2-17&lt;br /&gt;
 अर्थकृच्छ्रेषु दुर्गेषु व्यापत्सु स्वजनस्य च।&lt;br /&gt;
 शारीरमानसैर्दुःखैर्न सीदन्ति भवद्विधाः॥ 3-2-18&lt;br /&gt;
 [[:Category:Description of a knowledgeable person|''Description of a knowledgeable person'']] [[:Category:ज्ञानी जनस्य वर्णनं|''ज्ञानी जनस्य वर्णनं'']]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
श्रूयतां चाभिधास्यामि जनकेन यथा पुरा।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आत्मव्यवस्थानकरा गीताः श्लोका महात्मना॥ 3-2-19&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
 मनोदेहसमुत्थाभ्यां दुःखाभ्यामर्दितं जगत्।&lt;br /&gt;
 तयोर्व्याससमासाभ्यां शमोपायमिमं शृणु॥ 3-2-20&lt;br /&gt;
 व्याधेरनिष्टसंस्पर्शाच्छ्रमादिष्टविवर्जनात्।&lt;br /&gt;
 दुःखं चतुर्भिः शारीरं कारणैः सम्प्रवर्तते॥ 3-2-21&lt;br /&gt;
 तदा तत्प्रतिकाराच्च सततं चाविचिन्तनात्।&lt;br /&gt;
 आधिव्याधिप्रशमनं क्रियायोगद्वयेन तु॥ 3-2-22&lt;br /&gt;
 मतिमन्तो ह्यतो वैद्याः शमं प्रागेव कुर्वते।&lt;br /&gt;
 मानसस्य प्रियाख्यानैः सम्भोगोपनयैर्नृणाम्॥ 3-2-23&lt;br /&gt;
 [[:Category:solution to overcome sadness|''solution to overcome sadness'']]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
 मानसेन हि दुःखेन शरीरमुपतप्यते।&lt;br /&gt;
 अयःपिण्डेन तप्तेन कुम्भसंस्थमिवोदकम्॥ 3-2-24&lt;br /&gt;
 मानसं शमयेत्तस्माज्ज्ञानेनाग्निमिवाम्बुना।&lt;br /&gt;
 प्रशान्ते मानसे ह्यस्य शारीरमुपशाम्यति॥ 3-2-25&lt;br /&gt;
 [[:Category:connection between physical and mental health|''connection between physical and mental health'']]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
 मनसो दुःखमूलं तु स्नेह इत्युपलभ्यते।&lt;br /&gt;
 स्नेहात्तु सज्जते जन्तुर्दुःखयोगमुपैति च॥ 3-2-26&lt;br /&gt;
 स्नेहमूलानि दुःखानि स्नेहजानि भयानि च।&lt;br /&gt;
 शोकहर्षौ तथाऽऽयासः सर्वं स्नेहात्प्रवर्तते॥ 3-2-27&lt;br /&gt;
 स्नेहाद्भावोऽनुरागश्च प्रजज्ञे विषये तथा।&lt;br /&gt;
 अश्रेयस्कावुभावेतौ पूर्वस्तत्र गुरुः स्मृतः॥ 3-2-28&lt;br /&gt;
 कोटराग्निर्यथाशेषं समूलं पादपं दहेत्।&lt;br /&gt;
 धर्मार्थौ तु तथाल्पोऽपि रागदोषो विनाशयेत्॥ 3-2-29&lt;br /&gt;
 [[:Category:attachment|''attachment'']] [[:Category:आसक्ती|''आसक्ती'']]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
 विप्रयोगे न तु त्यागी दोषदर्शी समागमे।&lt;br /&gt;
 विरागं भजते जन्तुर्निर्वैरो निरवग्रहः॥ 3-2-30&lt;br /&gt;
 [[:Category:detachment|''detachment'']] [[:Category:त्याग|''त्याग'']]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
 तस्मात्स्नेहं न लिप्सेत मित्रेभ्यो धनसञ्चयात्।&lt;br /&gt;
 स्वशरीरसमुत्थं च ज्ञानेन विनिवर्तयेत्॥ 3-2-31&lt;br /&gt;
 ज्ञानान्वितेषु युक्तेषु शास्त्रज्ञेषु कृतात्मसु।&lt;br /&gt;
 न तेषु सज्जते स्नेहः पद्मपत्रेष्विवोदकम्॥ 3-2-32&lt;br /&gt;
 [[:Category:attachment|''attachment'']] [[:Category:आसक्ती|''आसक्ती'']]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
 रागाभिभूतः पुरुषः कामेन परिकृष्यते।&lt;br /&gt;
 इच्छा सञ्जायते तस्य ततस्तृष्णा विवर्धते॥ 3-2-33&lt;br /&gt;
 तृष्णा हि सर्वपापिष्ठा नित्योद्वेगकरी स्मृता।&lt;br /&gt;
 अधर्मबहुला चैव घोरा पापानुबन्धिनी॥ 3-2-34&lt;br /&gt;
 या दुस्त्यजा दुर्मतिभिर्या न जीर्यति जीर्यतः।&lt;br /&gt;
 योऽसौ प्राणान्तिको रोगस्तां तृष्णां त्यजतः सुखम्॥ 3-2-35&lt;br /&gt;
 अनाद्यन्ता तु सा तृष्णा अन्तर्देहगता नृणाम्।&lt;br /&gt;
 विनाशयति भूतानि अयोनिज इवानलः॥ 3-2-36&lt;br /&gt;
 यथैधः स्वसमुत्थेन वह्निना नाशमृच्छति।&lt;br /&gt;
 तथाकृतात्मा लोभेन सहजेन विनश्यति॥ 3-2-37&lt;br /&gt;
 [[:Category:anarthas|''anarthas'']] [[:Category:अनर्थ|''अनर्थ'']]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
 राजतः सलिलादग्नेश्चोरतः स्वजनादपि।&lt;br /&gt;
 भयमर्थवतां नित्यं मृत्योः प्राणभृतामिव॥ 3-2-38&lt;br /&gt;
 यथा ह्यामिषमाकाशे पक्षिभिः श्वापदैर्भुवि।&lt;br /&gt;
 भक्ष्यते सलिले मत्स्यैस्तथा सर्वत्र वित्तवान्॥ 3-2-39&lt;br /&gt;
 अर्थ एव हि केषाञ्चिदनर्थं भजते नृणाम्।&lt;br /&gt;
 अर्थश्रेयसि चासक्तो च श्रेयो विन्दते नरः॥ 3-2-40&lt;br /&gt;
 तस्मादर्थागमाः सर्वे मनोमोहविवर्धनाः।&lt;br /&gt;
 कार्पण्यं दर्पमानौ च भयमुद्वेग एव च॥ 3-2-41&lt;br /&gt;
 अर्थजानि विदुः प्राज्ञा दुःखान्येतानि देहिनाम्।&lt;br /&gt;
 अर्थस्योत्पादने चैव पालने च तथा क्षये॥ 3-2-42&lt;br /&gt;
 सहन्ति च महद्दुःखं घ्नन्ति चैवार्थकारणात्।&lt;br /&gt;
 अर्था दुःखं परित्यक्तुं पालिताश्चैव शत्रवः॥ 3-2-43&lt;br /&gt;
 दुःखेन चाधिगम्यन्ते तस्मान्नाशं न चिन्तयेत्।&lt;br /&gt;
 असन्तोषपरा मूढाः सन्तोषं यान्ति पण्डिताः॥ 3-2-44&lt;br /&gt;
 अन्तो नास्ति पिपासायाः सन्तोषः परमं सुखम्।&lt;br /&gt;
 तस्मात्सन्तोषमेवेह परं पश्यन्ति पण्डिताः॥ 3-2-45&lt;br /&gt;
 अनित्यं यौवनं रूपं जीवितं रत्नसंचयः।&lt;br /&gt;
 ऐश्वर्यं प्रियसंवासो गृध्येत्तत्र न पण्डितः॥ 3-2-46&lt;br /&gt;
 त्यजेत सञ्चयांस्तस्मात्तज्जान्क्लेशान्सहेत च।&lt;br /&gt;
 न हि सञ्चयवान्कश्चिद्दृश्यते निरुपद्रवः।&lt;br /&gt;
 अतश्च धार्मिकैः पुंभिरनीहार्थः प्रशस्यते॥ 3-2-47&lt;br /&gt;
 धर्मार्थं यस्य वित्तेहा वरं तस्य निरीहता।&lt;br /&gt;
 प्रक्षालनाद्धि पङ्कस्य श्रेयो न स्पर्शनं नृणाम्॥ 3-2-48&lt;br /&gt;
 युधिष्ठिरैवं सर्वेषु न स्पृहां कर्तुमर्हसि।&lt;br /&gt;
 धर्मेण यदि ते कार्यं विमुक्तेच्छो भवार्थतः॥ 3-2-49&lt;br /&gt;
 [[:Category:Disadvantages of being wealthy|''Disadvantages of being wealthy'']] [[:Category:धन दोष|''धन दोष'']]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
 युधिष्ठिर उवाच&lt;br /&gt;
 नार्थोपभोगलिप्सार्थमियमर्थेप्सुता मम।&lt;br /&gt;
 भरणार्थं तु विप्राणां ब्रह्मन्काङ्क्षे न लोभतः॥ 3-2-50&lt;br /&gt;
 कथं ह्यस्मद्विधो ब्रह्मन्वर्तमानो गृहाश्रमे।&lt;br /&gt;
 भरणं पालनं चापि न कुर्यादनुयायिनाम्॥ 3-2-51&lt;br /&gt;
 संविभागो हि भूतानां सर्वेषामेव दृश्यते।&lt;br /&gt;
 तथैवापचमानेभ्यः प्रदेयं गृहमेधिना॥ 3-2-52&lt;br /&gt;
 तृणानि भूमिरुदकं वाक्चतुर्थी च सूनृता।&lt;br /&gt;
 सतामेतानि गेहेषु नोच्छिद्यन्ते कदाचन॥ 3-2-53&lt;br /&gt;
 देयमार्तस्य शयनं स्थितश्रान्तस्य चासनम्।&lt;br /&gt;
 तृषितस्य च पानीयं क्षुधितस्य च भोजनम्॥ 3-2-54&lt;br /&gt;
 चक्षुर्दद्यान्मनो दद्याद्वाचं दद्यात्सुभाषिताम्।&lt;br /&gt;
  उत्थाय चासनं दद्यादेष धर्मः सनातनः।&lt;br /&gt;
  रत्युत्थायाभिगमनं कुर्यान्न्यायेन चार्चनम्॥ 3-2-55&lt;br /&gt;
  [[:Category:Sanatan dharma|''Sanatan dharma'']] [[:Category:सनातन धर्म|''सनातन धर्म'']]&lt;br /&gt;
 अग्निहोत्रमनड्वांश्च ज्ञातयोऽतिथिबान्धवाः।&lt;br /&gt;
 पुत्रा दाराश्च भृत्याश्च निर्दहेयुरपूजिताः॥ 3-2-56&lt;br /&gt;
 आत्मार्थं पाचयेन्नान्नं न वृथा घातयेत्पशून्।&lt;br /&gt;
 न च तत्स्वयमश्नीयाद्विधिवद्यन्न निर्वपेत्॥ 3-2-57&lt;br /&gt;
 श्वभ्यश्च श्वपचेभ्यश्च वयोभ्यश्चावपेद्भुवि।&lt;br /&gt;
 वैश्वदेवं हि नामैतत्सायं प्रातश्च दीयते॥ 3-2-58&lt;br /&gt;
 विघसाशी भवेत्तस्मान्नित्यं चामृतभोजनः।&lt;br /&gt;
 विघसो भुक्तशेषं तु यज्ञशेषं तथामृतम्॥ 3-2-59&lt;br /&gt;
 चक्षुर्दद्यान्मनो दद्याद्वाचं दद्याच्च सूनृताम्।&lt;br /&gt;
 अनुव्रजेदुपासीत स यज्ञः पञ्चदक्षिणः॥ 3-2-60&lt;br /&gt;
 यो दद्यादपरिक्लिष्टमन्नमध्वनि वर्तते।&lt;br /&gt;
 श्रान्तायादृष्टपूर्वाय तस्य पुण्यफलं महत्॥ 3-2-61&lt;br /&gt;
 एवं यो वर्तते वृत्तिं वर्तमानो गृहाश्रमे।&lt;br /&gt;
 तस्य धर्मं परं प्राहुः कथं वा विप्र मन्यसे॥ 3-2-62&lt;br /&gt;
 [[:Category:Duties of a householder|''Duties of a householder'']] [[:Category:गृहस्थ धर्म|''गृहस्थ धर्म'']]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
 शौनक उवाच&lt;br /&gt;
 अहो बत महत्कष्टं विपरीतमिदं जगत्।&lt;br /&gt;
 येनापत्रपते साधुरसाधुस्तेन तुष्यति॥ 3-2-63&lt;br /&gt;
 शिश्नोदरकृतेऽप्राज्ञः करोति विघसं बहु।&lt;br /&gt;
 मोहरागवशाक्रान्त इन्द्रियार्थवशानुगः॥ 3-2-64&lt;br /&gt;
 ह्रियते बुध्यमानोऽपि नरो हारिभिरिन्द्रियैः।&lt;br /&gt;
 विमूढसंज्ञो दुष्टाश्वैरुद्भान्तैरिव सारथिः॥ 3-2-65&lt;br /&gt;
 षडिन्द्रियाणि विषयं समागच्छन्ति वै यदा।&lt;br /&gt;
 तदा प्रादुर्भवत्येषां पूर्वसङ्कल्पजं मनः॥ 3-2-66&lt;br /&gt;
 मनो यस्येन्द्रियस्येह विषयान्याति सेवितुम्।&lt;br /&gt;
 तस्यौत्सुक्यं सम्भवति प्रवृत्तिश्चोपजायते॥ 3-2-67&lt;br /&gt;
 ततः सङ्कल्पबीजेन कामेन विषयेषुभिः।&lt;br /&gt;
 विद्धः पतति लोभाग्नौ ज्योतिर्लोभात्पतङ्गवत्॥ 3-2-68&lt;br /&gt;
 ततो विहारैराहारैर्मोहितश्च यथेप्सया।&lt;br /&gt;
 महामोहे सुखे मग्नो नात्मानमवबुध्यते॥ 3-2-69&lt;br /&gt;
 एवं पतति संसारे तासु तास्विह योनिषु।&lt;br /&gt;
 अविद्याकर्मतृष्णाभिर्भ्राम्यमाणोऽथ चक्रवत्॥ 3-2-70&lt;br /&gt;
 ब्रह्मादिषु तृणान्तेषु भूतेषु परिवर्तते।&lt;br /&gt;
 जले भुवि तथाऽऽकाशे जायमानः पुनः पुनः॥ 3-2-71&lt;br /&gt;
 [[:Category:consequences of sense gratification|''consequences of sense gratification'']] [[:Category:इंद्रिय तृप्ति|''इंद्रिय तृप्ति'']] [[:Category:अविवेकी पुरुषोकी गती|''अविवेकी पुरुषोकी गती'']]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
 अबुधानां गतिस्त्वेषा बुधानामपि मे शृणु।&lt;br /&gt;
 ये धर्मे श्रेयसि रता विमोक्षरतयो जनाः॥ 3-2-72&lt;br /&gt;
 तदिदं वेदवचनं कुरु कर्म त्यजेति च।&lt;br /&gt;
 तस्माद्धर्मानिमान्सर्वान्नाभिमानात्समाचरेत्॥ 3-2-73&lt;br /&gt;
 इज्याध्ययनदानानि तपः सत्यं क्षमा दमः।&lt;br /&gt;
 अलोभ इति मार्गोऽयं धर्मस्याष्टविधः स्मृतः॥ 3-2-74&lt;br /&gt;
 अत्र पूर्वश्चतुर्वर्गः पितृयाणपथे स्थितः।&lt;br /&gt;
 कर्तव्यमिति यत्कार्यं नाभिमानात्समाचरेत्॥ 3-2-75&lt;br /&gt;
 उत्तरो देवयानस्तु सद्भिराचरितः सदा।&lt;br /&gt;
 अष्टाङ्गेनैव मार्गेण विशुद्धात्मा समाचरेत्॥ 3-2-76&lt;br /&gt;
 सम्यक्सङ्कल्पसम्बन्धात्सम्यक्चेन्द्रियनिग्रहात्।&lt;br /&gt;
 सम्यग्व्रतविशेषाच्च सम्यक्च गुरुसेवनात्॥ 3-2-77&lt;br /&gt;
 सम्यगाहारयोगाच्च सम्यक्चाध्ययनागमात्।&lt;br /&gt;
 सम्यक्कर्मोपसन्न्यासात्सम्यक्चित्तनिरोधनात्॥ 3-2-78&lt;br /&gt;
 एवं कर्माणि कुर्वन्ति संसारविजिगीषवः।&lt;br /&gt;
 रागद्वेषविनिर्मुक्ता ऐश्वर्यं देवता गताः॥ 3-2-79&lt;br /&gt;
 रुद्राः साध्यास्तथाऽऽदित्या वसवोऽथ तथाश्विनौ।&lt;br /&gt;
 योगैश्वर्येण संयुक्ता धारयन्ति प्रजा इमाः॥ 3-2-80&lt;br /&gt;
 [[:Category:Righteousness|''Righteousness'']] [[:Category:धर्म|''धर्म'']] [[:Category:विवेकी पुरुषोकी गती|''विवेकी पुरुषोकी गती'']]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
 तथा त्वमपि कौन्तेय शममास्थाय पुष्कलम्।&lt;br /&gt;
 तपसा सिद्धिमन्विच्छ योगसिद्धिं च भारत॥ 3-2-81&lt;br /&gt;
 पितृमातृमयी सिद्धिः प्राप्ता कर्ममयी च ते।&lt;br /&gt;
 तपसा सिद्धिमन्विच्छ द्विजानां भरणाय वै॥ 3-2-82&lt;br /&gt;
 सिद्धा हि यद्यदिच्छन्ति कुर्वते तदनुग्रहात्।&lt;br /&gt;
 तस्मात्तपः समास्थाय कुरुष्वात्ममनोरथम्॥ 3-2-83&lt;br /&gt;
 [[:Category:Penance|''Penance'']] [[:Category:तपस्या|''तपस्या'']]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि अरण्यपर्वणि पाण्डवानां प्रव्रजने द्वितीयोऽध्यायः॥ 2 ॥&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>ShraddhaV</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://dharmawiki.org/index.php?title=Vanaparva_Adhyaya_2_(%E0%A4%B5%E0%A4%A8%E0%A4%AA%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%B5%E0%A4%A3%E0%A4%BF_%E0%A4%85%E0%A4%A7%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%AF%E0%A4%83_%E0%A5%A8)&amp;diff=119806</id>
		<title>Vanaparva Adhyaya 2 (वनपर्वणि अध्यायः २)</title>
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		<updated>2019-07-10T12:01:39Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;ShraddhaV: tagging&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt; वैशम्पायन उवाच&lt;br /&gt;
 प्रभातायां तु शर्वर्यां तेषामक्लिष्टकर्मणाम्।&lt;br /&gt;
 वनं यियासतां विप्रास्तस्थुर्भिक्षाभुजोऽग्रतः॥ 3-2-1&lt;br /&gt;
 तानुवाच ततो राजा कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः।&lt;br /&gt;
 वयं हि हृतसर्वस्वा हृतराज्या हृतश्रियः॥ 3-2-2&lt;br /&gt;
 फलमूलाशनाहारा वनं गच्छाम दुःखिताः।&lt;br /&gt;
 वनं च दोषबहुलं बहुव्यालसरीसृपम्॥ 3-2-3&lt;br /&gt;
 परिक्लेशश्च वो मन्ये ध्रुवं तत्र भविष्यति।&lt;br /&gt;
 ब्राह्मणानां परिक्लेशो दैवतान्यपि सादयेत्।&lt;br /&gt;
 किं पुनर्मामितो विप्रा निवर्तध्वं यथेष्टतः॥ 3-2-4&lt;br /&gt;
 ब्राह्मणा ऊचुः&lt;br /&gt;
 गतिर्या भवतां राजंस्तां वयं गन्तुमुद्यताः।&lt;br /&gt;
 नार्हस्यस्मान्परित्यक्तुं भक्तान्सद्धर्मदर्शिनः॥ 3-2-5&lt;br /&gt;
 अनुकम्पां हि भक्तेषु देवता ह्यपि कुर्वते।&lt;br /&gt;
 विशेषतो ब्राह्मणेषु सदाचारावलम्बिषु॥ 3-2-6&lt;br /&gt;
  युधिष्ठिर उवाच&lt;br /&gt;
  ममापि परमा भक्तिर्ब्राह्मणेषु सदा द्विजाः।&lt;br /&gt;
  सहायविपरिभ्रंशस्त्वयं सादयतीव माम्॥ 3-2-7&lt;br /&gt;
  आहरेयुरिमे येऽपि फलमूलमृगांस्तथा[मधूनि च]।&lt;br /&gt;
  त इमे शोकजैर्दुःखैर्भ्रातरो मे विमोहिताः॥ 3-2-8&lt;br /&gt;
  द्रौपद्या विप्रकर्षेण राज्यापहरणेन च।&lt;br /&gt;
  दुःखार्दितानिमान्क्लेशैर्नाहं योक्तुमिहोत्सहे॥ 3-2-9&lt;br /&gt;
  [[:Category:Sadness|''Sadness'']] [[:Category:दु:ख|''दु:ख'']] [[:Category:शोक|''शोक'']]&lt;br /&gt;
 ब्राह्मणा ऊचुः&lt;br /&gt;
 अस्मत्पोषणजा चिन्ता मा भूत्ते हृदि पार्थिव।&lt;br /&gt;
 स्वयमाहृत्य चान्नानि चोपयोक्षा[त्वानुयास्या]महे वयम्॥ 3-2-10&lt;br /&gt;
 अनुध्यानेन जप्येन विधास्यामः शिवं तव।&lt;br /&gt;
 कथाभिश्चाभिरम्याभिः सह रंस्यामहे वयम्॥ 3-2-11&lt;br /&gt;
 युधिष्ठिर उवाच&lt;br /&gt;
 एवमेतन्न सन्देहो रमेऽहं सततं द्विजैः।&lt;br /&gt;
 मा[न्यू]नभावात्तु पश्यामि प्रत्यादेशमिवात्मनः॥ 3-2-12&lt;br /&gt;
 कथं द्रक्ष्यामि वः सर्वान्स्वयमाहृतभोजनान्।&lt;br /&gt;
 मद्भक्त्या क्लिश्यतोऽनर्हान्धिक्पापान्धृतराष्ट्रजान्॥ 3-2-13&lt;br /&gt;
 [[:Category:Yudhishtir - brahmans conversation|''Yudhishtir - brahmans conversation'']] [[:Category:युधिष्टीर ब्राह्मण संवाद|''युधिष्टीर ब्राह्मण संवाद'']]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वैशम्पायन उवाच&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इत्युक्त्वा स नृपः शोचन्निषसाद महीतले।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तमध्यात्मरतो विद्वान्शौनको नाम वै द्विजः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
योगे सांख्ये च कुशलो राजानमिदमब्रवीत्॥ 3-2-14&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
 शोकस्थानसहस्राणि भयस्थानशतानि च।&lt;br /&gt;
 दिवसे दिवसे मूढमाविशन्ति न पण्डितम्॥ 3-2-15&lt;br /&gt;
 न हि ज्ञानविरुद्धेषु बहुदोषेषु कर्मसु।&lt;br /&gt;
 श्रेयोघातिषु सज्जन्ते बुद्धिमन्तो भवद्विधाः॥ 3-2-16&lt;br /&gt;
 अष्टाङ्गां बुद्धिमाहुर्यां सर्वाश्रेयोऽभिघातिनीम्।&lt;br /&gt;
 श्रुतिस्मृतिसमायुक्तां राजन्सा त्वय्यवस्थिता॥ 3-2-17&lt;br /&gt;
 अर्थकृच्छ्रेषु दुर्गेषु व्यापत्सु स्वजनस्य च।&lt;br /&gt;
 शारीरमानसैर्दुःखैर्न सीदन्ति भवद्विधाः॥ 3-2-18&lt;br /&gt;
 [[:Category:Description of a knowledgeable person|''Description of a knowledgeable person'']] [[:Category:ज्ञानी जनस्य वर्णनं|''ज्ञानी जनस्य वर्णनं'']]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
श्रूयतां चाभिधास्यामि जनकेन यथा पुरा।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आत्मव्यवस्थानकरा गीताः श्लोका महात्मना॥ 3-2-19&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
 मनोदेहसमुत्थाभ्यां दुःखाभ्यामर्दितं जगत्।&lt;br /&gt;
 तयोर्व्याससमासाभ्यां शमोपायमिमं शृणु॥ 3-2-20&lt;br /&gt;
 व्याधेरनिष्टसंस्पर्शाच्छ्रमादिष्टविवर्जनात्।&lt;br /&gt;
 दुःखं चतुर्भिः शारीरं कारणैः सम्प्रवर्तते॥ 3-2-21&lt;br /&gt;
 तदा तत्प्रतिकाराच्च सततं चाविचिन्तनात्।&lt;br /&gt;
 आधिव्याधिप्रशमनं क्रियायोगद्वयेन तु॥ 3-2-22&lt;br /&gt;
 मतिमन्तो ह्यतो वैद्याः शमं प्रागेव कुर्वते।&lt;br /&gt;
 मानसस्य प्रियाख्यानैः सम्भोगोपनयैर्नृणाम्॥ 3-2-23&lt;br /&gt;
 [[:Category:solution to overcome sadness|''solution to overcome sadness'']]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
 मानसेन हि दुःखेन शरीरमुपतप्यते।&lt;br /&gt;
 अयःपिण्डेन तप्तेन कुम्भसंस्थमिवोदकम्॥ 3-2-24&lt;br /&gt;
 मानसं शमयेत्तस्माज्ज्ञानेनाग्निमिवाम्बुना।&lt;br /&gt;
 प्रशान्ते मानसे ह्यस्य शारीरमुपशाम्यति॥ 3-2-25&lt;br /&gt;
 [[:Category:connection between physical and mental health|''connection between physical and mental health'']]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
 मनसो दुःखमूलं तु स्नेह इत्युपलभ्यते।&lt;br /&gt;
 स्नेहात्तु सज्जते जन्तुर्दुःखयोगमुपैति च॥ 3-2-26&lt;br /&gt;
 स्नेहमूलानि दुःखानि स्नेहजानि भयानि च।&lt;br /&gt;
 शोकहर्षौ तथाऽऽयासः सर्वं स्नेहात्प्रवर्तते॥ 3-2-27&lt;br /&gt;
 स्नेहाद्भावोऽनुरागश्च प्रजज्ञे विषये तथा।&lt;br /&gt;
 अश्रेयस्कावुभावेतौ पूर्वस्तत्र गुरुः स्मृतः॥ 3-2-28&lt;br /&gt;
 कोटराग्निर्यथाशेषं समूलं पादपं दहेत्।&lt;br /&gt;
 धर्मार्थौ तु तथाल्पोऽपि रागदोषो विनाशयेत्॥ 3-2-29&lt;br /&gt;
 [[:Category:attachment|''attachment'']] [[:Category:आसक्ती|''आसक्ती'']]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
 विप्रयोगे न तु त्यागी दोषदर्शी समागमे।&lt;br /&gt;
 विरागं भजते जन्तुर्निर्वैरो निरवग्रहः॥ 3-2-30&lt;br /&gt;
 [[:Category:detachment|''detachment'']] [[:Category:त्याग|''त्याग'']]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
 तस्मात्स्नेहं न लिप्सेत मित्रेभ्यो धनसञ्चयात्।&lt;br /&gt;
 स्वशरीरसमुत्थं च ज्ञानेन विनिवर्तयेत्॥ 3-2-31&lt;br /&gt;
 ज्ञानान्वितेषु युक्तेषु शास्त्रज्ञेषु कृतात्मसु।&lt;br /&gt;
 न तेषु सज्जते स्नेहः पद्मपत्रेष्विवोदकम्॥ 3-2-32&lt;br /&gt;
 [[:Category:attachment|''attachment'']] [[:Category:आसक्ती|''आसक्ती'']]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
 रागाभिभूतः पुरुषः कामेन परिकृष्यते।&lt;br /&gt;
 इच्छा सञ्जायते तस्य ततस्तृष्णा विवर्धते॥ 3-2-33&lt;br /&gt;
 तृष्णा हि सर्वपापिष्ठा नित्योद्वेगकरी स्मृता।&lt;br /&gt;
 अधर्मबहुला चैव घोरा पापानुबन्धिनी॥ 3-2-34&lt;br /&gt;
 या दुस्त्यजा दुर्मतिभिर्या न जीर्यति जीर्यतः।&lt;br /&gt;
 योऽसौ प्राणान्तिको रोगस्तां तृष्णां त्यजतः सुखम्॥ 3-2-35&lt;br /&gt;
 अनाद्यन्ता तु सा तृष्णा अन्तर्देहगता नृणाम्।&lt;br /&gt;
 विनाशयति भूतानि अयोनिज इवानलः॥ 3-2-36&lt;br /&gt;
 यथैधः स्वसमुत्थेन वह्निना नाशमृच्छति।&lt;br /&gt;
 तथाकृतात्मा लोभेन सहजेन विनश्यति॥ 3-2-37&lt;br /&gt;
 [[:Category:anarthas|''anarthas'']] [[:Category:अनर्थ|''अनर्थ'']]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
 राजतः सलिलादग्नेश्चोरतः स्वजनादपि।&lt;br /&gt;
 भयमर्थवतां नित्यं मृत्योः प्राणभृतामिव॥ 3-2-38&lt;br /&gt;
 यथा ह्यामिषमाकाशे पक्षिभिः श्वापदैर्भुवि।&lt;br /&gt;
 भक्ष्यते सलिले मत्स्यैस्तथा सर्वत्र वित्तवान्॥ 3-2-39&lt;br /&gt;
 अर्थ एव हि केषाञ्चिदनर्थं भजते नृणाम्।&lt;br /&gt;
 अर्थश्रेयसि चासक्तो च श्रेयो विन्दते नरः॥ 3-2-40&lt;br /&gt;
 तस्मादर्थागमाः सर्वे मनोमोहविवर्धनाः।&lt;br /&gt;
 कार्पण्यं दर्पमानौ च भयमुद्वेग एव च॥ 3-2-41&lt;br /&gt;
 अर्थजानि विदुः प्राज्ञा दुःखान्येतानि देहिनाम्।&lt;br /&gt;
 अर्थस्योत्पादने चैव पालने च तथा क्षये॥ 3-2-42&lt;br /&gt;
 सहन्ति च महद्दुःखं घ्नन्ति चैवार्थकारणात्।&lt;br /&gt;
 अर्था दुःखं परित्यक्तुं पालिताश्चैव शत्रवः॥ 3-2-43&lt;br /&gt;
 दुःखेन चाधिगम्यन्ते तस्मान्नाशं न चिन्तयेत्।&lt;br /&gt;
 असन्तोषपरा मूढाः सन्तोषं यान्ति पण्डिताः॥ 3-2-44&lt;br /&gt;
 अन्तो नास्ति पिपासायाः सन्तोषः परमं सुखम्।&lt;br /&gt;
 तस्मात्सन्तोषमेवेह परं पश्यन्ति पण्डिताः॥ 3-2-45&lt;br /&gt;
 अनित्यं यौवनं रूपं जीवितं रत्नसंचयः।&lt;br /&gt;
 ऐश्वर्यं प्रियसंवासो गृध्येत्तत्र न पण्डितः॥ 3-2-46&lt;br /&gt;
 त्यजेत सञ्चयांस्तस्मात्तज्जान्क्लेशान्सहेत च।&lt;br /&gt;
 न हि सञ्चयवान्कश्चिद्दृश्यते निरुपद्रवः।&lt;br /&gt;
 अतश्च धार्मिकैः पुंभिरनीहार्थः प्रशस्यते॥ 3-2-47&lt;br /&gt;
 धर्मार्थं यस्य वित्तेहा वरं तस्य निरीहता।&lt;br /&gt;
 प्रक्षालनाद्धि पङ्कस्य श्रेयो न स्पर्शनं नृणाम्॥ 3-2-48&lt;br /&gt;
 युधिष्ठिरैवं सर्वेषु न स्पृहां कर्तुमर्हसि।&lt;br /&gt;
 धर्मेण यदि ते कार्यं विमुक्तेच्छो भवार्थतः॥ 3-2-49&lt;br /&gt;
 [[:Category:Disadvantages of being wealthy|''Disadvantages of being wealthy'']] [[:Category:धन दोष|''धन दोष'']]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
 युधिष्ठिर उवाच&lt;br /&gt;
 नार्थोपभोगलिप्सार्थमियमर्थेप्सुता मम।&lt;br /&gt;
 भरणार्थं तु विप्राणां ब्रह्मन्काङ्क्षे न लोभतः॥ 3-2-50&lt;br /&gt;
 कथं ह्यस्मद्विधो ब्रह्मन्वर्तमानो गृहाश्रमे।&lt;br /&gt;
 भरणं पालनं चापि न कुर्यादनुयायिनाम्॥ 3-2-51&lt;br /&gt;
 संविभागो हि भूतानां सर्वेषामेव दृश्यते।&lt;br /&gt;
 तथैवापचमानेभ्यः प्रदेयं गृहमेधिना॥ 3-2-52&lt;br /&gt;
 तृणानि भूमिरुदकं वाक्चतुर्थी च सूनृता।&lt;br /&gt;
 सतामेतानि गेहेषु नोच्छिद्यन्ते कदाचन॥ 3-2-53&lt;br /&gt;
 देयमार्तस्य शयनं स्थितश्रान्तस्य चासनम्।&lt;br /&gt;
 तृषितस्य च पानीयं क्षुधितस्य च भोजनम्॥ 3-2-54&lt;br /&gt;
 चक्षुर्दद्यान्मनो दद्याद्वाचं दद्यात्सुभाषिताम्।&lt;br /&gt;
  उत्थाय चासनं दद्यादेष धर्मः सनातनः।&lt;br /&gt;
  रत्युत्थायाभिगमनं कुर्यान्न्यायेन चार्चनम्॥ 3-2-55&lt;br /&gt;
  [[:Category:Sanatan dharma|''Sanatan dharma'']] [[:Category:सनातन धर्म|''सनातन धर्म'']]&lt;br /&gt;
 अग्निहोत्रमनड्वांश्च ज्ञातयोऽतिथिबान्धवाः।&lt;br /&gt;
 पुत्रा दाराश्च भृत्याश्च निर्दहेयुरपूजिताः॥ 3-2-56&lt;br /&gt;
 आत्मार्थं पाचयेन्नान्नं न वृथा घातयेत्पशून्।&lt;br /&gt;
 न च तत्स्वयमश्नीयाद्विधिवद्यन्न निर्वपेत्॥ 3-2-57&lt;br /&gt;
 श्वभ्यश्च श्वपचेभ्यश्च वयोभ्यश्चावपेद्भुवि।&lt;br /&gt;
 वैश्वदेवं हि नामैतत्सायं प्रातश्च दीयते॥ 3-2-58&lt;br /&gt;
 विघसाशी भवेत्तस्मान्नित्यं चामृतभोजनः।&lt;br /&gt;
 विघसो भुक्तशेषं तु यज्ञशेषं तथामृतम्॥ 3-2-59&lt;br /&gt;
 चक्षुर्दद्यान्मनो दद्याद्वाचं दद्याच्च सूनृताम्।&lt;br /&gt;
 अनुव्रजेदुपासीत स यज्ञः पञ्चदक्षिणः॥ 3-2-60&lt;br /&gt;
 यो दद्यादपरिक्लिष्टमन्नमध्वनि वर्तते।&lt;br /&gt;
 श्रान्तायादृष्टपूर्वाय तस्य पुण्यफलं महत्॥ 3-2-61&lt;br /&gt;
 एवं यो वर्तते वृत्तिं वर्तमानो गृहाश्रमे।&lt;br /&gt;
 तस्य धर्मं परं प्राहुः कथं वा विप्र मन्यसे॥ 3-2-62&lt;br /&gt;
 [[:Category:Duties of a householder|''Duties of a householder'']] [[:Category:गृहस्थ धर्म|''गृहस्थ धर्म'']]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
 शौनक उवाच&lt;br /&gt;
 अहो बत महत्कष्टं विपरीतमिदं जगत्।&lt;br /&gt;
 येनापत्रपते साधुरसाधुस्तेन तुष्यति॥ 3-2-63&lt;br /&gt;
 शिश्नोदरकृतेऽप्राज्ञः करोति विघसं बहु।&lt;br /&gt;
 मोहरागवशाक्रान्त इन्द्रियार्थवशानुगः॥ 3-2-64&lt;br /&gt;
 ह्रियते बुध्यमानोऽपि नरो हारिभिरिन्द्रियैः।&lt;br /&gt;
 विमूढसंज्ञो दुष्टाश्वैरुद्भान्तैरिव सारथिः॥ 3-2-65&lt;br /&gt;
 षडिन्द्रियाणि विषयं समागच्छन्ति वै यदा।&lt;br /&gt;
 तदा प्रादुर्भवत्येषां पूर्वसङ्कल्पजं मनः॥ 3-2-66&lt;br /&gt;
 मनो यस्येन्द्रियस्येह विषयान्याति सेवितुम्।&lt;br /&gt;
 तस्यौत्सुक्यं सम्भवति प्रवृत्तिश्चोपजायते॥ 3-2-67&lt;br /&gt;
 ततः सङ्कल्पबीजेन कामेन विषयेषुभिः।&lt;br /&gt;
 विद्धः पतति लोभाग्नौ ज्योतिर्लोभात्पतङ्गवत्॥ 3-2-68&lt;br /&gt;
 ततो विहारैराहारैर्मोहितश्च यथेप्सया।&lt;br /&gt;
 महामोहे सुखे मग्नो नात्मानमवबुध्यते॥ 3-2-69&lt;br /&gt;
 एवं पतति संसारे तासु तास्विह योनिषु।&lt;br /&gt;
 अविद्याकर्मतृष्णाभिर्भ्राम्यमाणोऽथ चक्रवत्॥ 3-2-70&lt;br /&gt;
 ब्रह्मादिषु तृणान्तेषु भूतेषु परिवर्तते।&lt;br /&gt;
 जले भुवि तथाऽऽकाशे जायमानः पुनः पुनः॥ 3-2-71&lt;br /&gt;
 [[:Category:consequences of sense gratification|''consequences of sense gratification'']] [[:Category:इंद्रिय तृप्ति|''इंद्रिय तृप्ति'']] [[:Category:अविवेकी पुरुषोकी गती|''अविवेकी पुरुषोकी गती'']]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
 अबुधानां गतिस्त्वेषा बुधानामपि मे शृणु।&lt;br /&gt;
 ये धर्मे श्रेयसि रता विमोक्षरतयो जनाः॥ 3-2-72&lt;br /&gt;
 तदिदं वेदवचनं कुरु कर्म त्यजेति च।&lt;br /&gt;
 तस्माद्धर्मानिमान्सर्वान्नाभिमानात्समाचरेत्॥ 3-2-73&lt;br /&gt;
 इज्याध्ययनदानानि तपः सत्यं क्षमा दमः।&lt;br /&gt;
 अलोभ इति मार्गोऽयं धर्मस्याष्टविधः स्मृतः॥ 3-2-74&lt;br /&gt;
 अत्र पूर्वश्चतुर्वर्गः पितृयाणपथे स्थितः।&lt;br /&gt;
 कर्तव्यमिति यत्कार्यं नाभिमानात्समाचरेत्॥ 3-2-75&lt;br /&gt;
 उत्तरो देवयानस्तु सद्भिराचरितः सदा।&lt;br /&gt;
 अष्टाङ्गेनैव मार्गेण विशुद्धात्मा समाचरेत्॥ 3-2-76&lt;br /&gt;
 सम्यक्सङ्कल्पसम्बन्धात्सम्यक्चेन्द्रियनिग्रहात्।&lt;br /&gt;
 सम्यग्व्रतविशेषाच्च सम्यक्च गुरुसेवनात्॥ 3-2-77&lt;br /&gt;
 सम्यगाहारयोगाच्च सम्यक्चाध्ययनागमात्।&lt;br /&gt;
 सम्यक्कर्मोपसन्न्यासात्सम्यक्चित्तनिरोधनात्॥ 3-2-78&lt;br /&gt;
 एवं कर्माणि कुर्वन्ति संसारविजिगीषवः।&lt;br /&gt;
 रागद्वेषविनिर्मुक्ता ऐश्वर्यं देवता गताः॥ 3-2-79&lt;br /&gt;
 रुद्राः साध्यास्तथाऽऽदित्या वसवोऽथ तथाश्विनौ।&lt;br /&gt;
 योगैश्वर्येण संयुक्ता धारयन्ति प्रजा इमाः॥ 3-2-80&lt;br /&gt;
 [[:Category:Righteousness|''Righteousness'']] [[:Category:धर्म|''धर्म'']] [[:Category:विवेकी पुरुषोकी गती|''विवेकी पुरुषोकी गती'']]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
 तथा त्वमपि कौन्तेय शममास्थाय पुष्कलम्।&lt;br /&gt;
 तपसा सिद्धिमन्विच्छ योगसिद्धिं च भारत॥ 3-2-81&lt;br /&gt;
 पितृमातृमयी सिद्धिः प्राप्ता कर्ममयी च ते।&lt;br /&gt;
 तपसा सिद्धिमन्विच्छ द्विजानां भरणाय वै॥ 3-2-82&lt;br /&gt;
 सिद्धा हि यद्यदिच्छन्ति कुर्वते तदनुग्रहात्।&lt;br /&gt;
 तस्मात्तपः समास्थाय कुरुष्वात्ममनोरथम्॥ 3-2-83&lt;br /&gt;
 [[:Category:Penance|''Penance'']] [[:Category:तपस्या|''तपस्या'']]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि अरण्यपर्वणि पाण्डवानां प्रव्रजने द्वितीयोऽध्यायः॥ 2 ॥&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>ShraddhaV</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://dharmawiki.org/index.php?title=Vanaparva_Adhyaya_3_(%E0%A4%B5%E0%A4%A8%E0%A4%AA%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%B5%E0%A4%A3%E0%A4%BF_%E0%A4%85%E0%A4%A7%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%AF%E0%A4%83_%E0%A5%A9)&amp;diff=119800</id>
		<title>Vanaparva Adhyaya 3 (वनपर्वणि अध्यायः ३)</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://dharmawiki.org/index.php?title=Vanaparva_Adhyaya_3_(%E0%A4%B5%E0%A4%A8%E0%A4%AA%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%B5%E0%A4%A3%E0%A4%BF_%E0%A4%85%E0%A4%A7%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%AF%E0%A4%83_%E0%A5%A9)&amp;diff=119800"/>
		<updated>2019-07-10T11:27:51Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;ShraddhaV: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt; वैशम्पायन उवाच&lt;br /&gt;
 शौनकेनैवमुक्तस्तु कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः।&lt;br /&gt;
 पुरोहितमुपागम्य भ्रातृमध्येऽब्रवीदिदम्॥ 3-3-1&lt;br /&gt;
 प्रस्थितं मानुयान्तीमे ब्राह्मणा वेदपारगाः।&lt;br /&gt;
 न चास्मि पोषणे शक्तो बहुदुःखसमन्वितः॥ 3-3-2&lt;br /&gt;
 परित्यक्तुं न शक्तोऽस्मि दानशक्तिश्च नास्ति मे।&lt;br /&gt;
 कथमत्र मया कार्यं तद्ब्रूहि भगवन्मम॥ 3-3-3&lt;br /&gt;
 [[:Category:Service|''Service'']] [[:Category:सेवा|''सेवा'']]&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
 वैशम्पायन उवाच&lt;br /&gt;
 मुहूर्तमिव स ध्यात्वा धर्मेणान्विष्य तां गतिम्।&lt;br /&gt;
 युधिष्ठिरमुवाचेदं धौम्यो धर्मभृतां वरः॥ 3-3-4&lt;br /&gt;
 [[:Category:Dhaumya Rishi|''Dhaumya Rishi'']] [[:Category:धौम्य ऋषि|''धौम्य ऋषि'']]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
धौम्य उवाच&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पुरा सृष्टानि भूतानि पीड्यन्ते क्षुधया भृशम्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ततोऽनुकम्पया तेषां सविता स्वपिता यथा॥ 3-3-5&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
गत्वोत्तरायणं तेजो रसानुद्धृत्य रश्मिभिः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दक्षिणायनमावृत्तो महीं निविशते रविः॥ 3-3-6&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
 क्षेत्रभूते ततस्तस्मिन्नोषधीरोषधीपतिः।&lt;br /&gt;
 दिवस्तेजः समुद्धृत्य जनयामास वारिणा॥ 3-3-7&lt;br /&gt;
 निषिक्तश्चन्द्रतेजोभिः स्वयोनौ निर्गते रविः।&lt;br /&gt;
 ओषध्यः षड्रसा मेध्यास्तदन्नं प्राणिनां भुवि॥ 3-3-8&lt;br /&gt;
 [[:Category:Moon God|''Moon God'']] [[:Category:चंद्रमा|''चंद्रमा'']] [[:Category:चंद्र देव|''चंद्र देव'']]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
एवं भानुमयं ह्यन्नं भूतानां प्राणधारणम्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पितैष सर्वभूतानां तस्मात्तं शरणं व्रज॥ 3-3-9&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
 राजानो हि महात्मानो योनिकर्मविशोधिताः।&lt;br /&gt;
 उद्धरन्ति प्रजाः सर्वास्तप आस्थाय पुष्कलम्॥ 3-3-10&lt;br /&gt;
 भीमेन कार्तवीर्येण वैन्येन नहुषेण च।&lt;br /&gt;
 तपोयोगसमाधिस्थैरुद्धता ह्यापदः प्रजाः॥ 3-3-11&lt;br /&gt;
 तथा त्वमपि धर्मात्मन्कर्मणा च विशोधितः।&lt;br /&gt;
 तप आस्थाय धर्मेण द्विजातीन्भर भारत॥ 3-3-12&lt;br /&gt;
 [[:Category:Penance|''Penance'']] [[:Category:tapasya|''tapasya'']]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
 जनमेजय उवाच&lt;br /&gt;
 कथं कुरूणामृषभः स तु राजा युधिष्ठिरः।&lt;br /&gt;
 विप्रार्थमाराधितवान्सूर्यमद्भुतदर्शनम्॥ 3-3-13&lt;br /&gt;
 वैशम्पायन उवाच&lt;br /&gt;
 शृणुष्वावहितो राजञ्शुचिर्भूत्वा समाहितः।&lt;br /&gt;
 क्षणं च कुरु राजेन्द्र सम्प्रवक्ष्याम्यशेषतः॥ 3-3-14&lt;br /&gt;
 धौम्येन तु यथा पूर्वं पार्थाय सुमहात्मने।&lt;br /&gt;
 नामाष्टशतमाख्यातं तच्छृणुष्व महामते॥ 3-3-15&lt;br /&gt;
 [[:Category:Sun God|''Sun God'']] [[:Category:सूर्य देव|''सूर्य देव'']]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
 धौम्य उवाच&lt;br /&gt;
 सूर्योऽर्यमा भगस्त्वष्टा पूषार्कः सविता रविः।&lt;br /&gt;
 गभस्तिमानजः कालो मृत्युर्धाता प्रभाकरः॥ 3-3-16&lt;br /&gt;
 पृथिव्यापश्च तेजश्च खं वायुश्च परायणम्।&lt;br /&gt;
 सोमो बृहस्पतिः शुक्रो बुधोऽङ्गारक एव च॥ 3-3-17&lt;br /&gt;
 इन्द्रो विवस्वान्दीप्तांशुः शुचिः शौरिः शनैश्चरः।&lt;br /&gt;
 ब्रह्मा विष्णुश्च रुद्रश्च स्कन्दो वै वरुणो यमः॥ 3-3-18&lt;br /&gt;
 वैद्युतो जाठरश्चाग्निरैन्धनस्तेजसां पतिः।&lt;br /&gt;
 धर्मध्वजो वेदकर्ता वेदाङ्गो वेदवाहनः॥ 3-3-19&lt;br /&gt;
 कृतं त्रेता द्वापरश्च कलिः सर्वमलाश्रयः।&lt;br /&gt;
 कला काष्ठा मुहूर्ताश्च क्षपा यामस्तथा क्षणः॥ 3-3-20&lt;br /&gt;
 संवत्सरकरोऽश्वत्थः कालचक्रो विभावसुः।&lt;br /&gt;
 पुरुषः शाश्वतो योगी व्यक्ताव्यक्तः सनातनः॥ 3-3-21&lt;br /&gt;
 कालाध्यक्षः प्रजाध्यक्षो विश्वकर्मा तमोनुदः।&lt;br /&gt;
 वरुणः सागरोंऽशुश्च जीमूतो जीवनोऽरिहा॥ 3-3-22&lt;br /&gt;
 भूताश्रयो भूतपतिः सर्वलोकनमस्कृतः।&lt;br /&gt;
 स्रष्टा संवर्तको वह्निः सर्वस्यादिरलोलुपः॥ 3-3-23&lt;br /&gt;
 अनन्तः कपिलो भानुः कामदः सर्वतोमुखः।&lt;br /&gt;
 जयो विशालो वरदः सर्वधातुनिषेचिता॥ 3-3-24&lt;br /&gt;
 मनःसुपर्णो भूतादिः शीघ्रगः प्राणधारकः।&lt;br /&gt;
 धन्वन्तरिर्धूमकेतुरादिदेवोऽदितेः सुतः॥ 3-3-25&lt;br /&gt;
 द्वादशात्मारविन्दाक्षः पिता माता पितामहः।&lt;br /&gt;
 स्वर्गद्वारं प्रजाद्वारं मोक्षद्वारं त्रिविष्टपम्॥ 3-3-26&lt;br /&gt;
 देहकर्ता प्रशान्तात्मा विश्वात्मा विश्वतोमुखः।&lt;br /&gt;
 चराचरात्मा सूक्ष्मात्मा मैत्रेयः करुणान्वितः॥ 3-3-27&lt;br /&gt;
 एतद्वै कीर्तनीयस्य सूर्यस्यामिततेजसः।&lt;br /&gt;
 नामाष्टशतकं चेदं प्रोक्तमेतत्स्वयंभुवा॥ 3-3-28&lt;br /&gt;
 [[:Category:108 names of Sun God|''108 names of Sun God'']] [[:Category:सूर्य देव|''सूर्य देव'']] [[:Category:१०८|''१०८'']]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
 सुरगणपितृयक्षसेवितं ह्यसुरनिशाचरसिद्धवन्दितम्।&lt;br /&gt;
 वरकनकहुताशनप्रभं प्रणिपतितोऽस्मि हिताय भास्करम्॥ 3-3-29&lt;br /&gt;
 सूर्योदये यः सुसमाहितः पठेत्स पुत्रदारान्धनरत्नसञ्चयान्।&lt;br /&gt;
 लभेत जातिस्मरतां नरः सदा धृतिं च मेधां च स विन्दते पुमान्॥ 3-3-30&lt;br /&gt;
 इमं स्तवं देववरस्य यो नरः प्रकीर्तयेच्छुचिसुमनाः समाहितः।&lt;br /&gt;
 विमुच्यते शोकदवाग्निसागराल्लभेत कामान्मनसा यथेप्सितान्॥ 3-3-31&lt;br /&gt;
 [[:Category:Worship of Sun God|''Worship of Sun God'']] [[:Category:सूर्य देव आराधना|''सूर्य देव आराधना'']]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
 वैशम्पायन उवाच&lt;br /&gt;
 एवमुक्तस्तु धौम्येन तत्कालसदृशं वचः।&lt;br /&gt;
 विप्रत्यागसमाधिस्थः संयतात्मा दृढव्रतः॥ 3-3-32&lt;br /&gt;
 धर्मराजो विशुद्धात्मा तप आतिष्ठदुत्तमम्।&lt;br /&gt;
 पुष्पोपहारैर्बलिभिरर्चयित्वा दिवाकरम्॥ 3-3-33&lt;br /&gt;
 सोऽवगाह्य जलं राजा देवस्याभिमुखोऽभवत्।&lt;br /&gt;
 योगमास्थाय धर्मात्मा वायुभक्षो जितेन्द्रियः॥ 3-3-34&lt;br /&gt;
 गाङ्गेयं वार्युपस्पृश्य प्राणायामेन तस्थिवान्।&lt;br /&gt;
 शुचिः प्रयतवाग्भूत्वा स्तोत्रमारब्धवांस्ततः॥ 3-3-35&lt;br /&gt;
 [[:Category:Worship|''Worship'']] [[:Category:पुजा|''पुजा'']]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
 युधिष्ठिर उवाच&lt;br /&gt;
 त्वं भानो जगतश्चक्षुस्त्वमात्मा सर्वदेहिनाम्।&lt;br /&gt;
 त्वं योनिः सर्वभूतानां त्वमाचारः क्रियावताम्॥ 3-3-36&lt;br /&gt;
 त्वं गतिः सर्वसांख्यानां योगिनां त्वं परायणम्।&lt;br /&gt;
 अनावृतार्गलद्वारं त्वं गतिस्त्वं मुमुक्षताम्॥ 3-3-37&lt;br /&gt;
 त्वया संधार्यते लोकस्त्वया लोकः प्रकाश्यते।&lt;br /&gt;
 त्वया पवित्रीक्रियते निर्व्याजं पाल्यते त्वया॥ 3-3-38&lt;br /&gt;
 त्वामुपस्थाय काले तु ब्राह्मणा वेदपारगाः।&lt;br /&gt;
 स्वशाखाविहितैर्मन्त्रैरर्चन्त्यृषिगणार्चितम्॥ 3-3-39&lt;br /&gt;
 तव दिव्यं रथं यान्तमनुयान्ति वरार्थिनः।&lt;br /&gt;
 सिद्धचारणगन्धर्वा यक्षगुह्यकपन्नगाः॥ 3-3-40&lt;br /&gt;
 त्रयस्त्रिंशच्च वै देवास्तथा वैमानिका गणाः।&lt;br /&gt;
 सोपेन्द्राः समहेन्द्राश्च त्वामिष्ट्वा सिद्धिमागताः॥ 3-3-41&lt;br /&gt;
 उपयान्त्यर्चयित्वा तु त्वां वै प्राप्तमनोरथाः।&lt;br /&gt;
 दिव्यमन्दारमालाभिस्तूर्णं विद्याधरोत्तमाः॥ 3-3-42&lt;br /&gt;
 गुह्याः पितृगणाः सप्त ये दिव्या ये च मानुषाः।&lt;br /&gt;
 ते पूजयित्वा त्वामेव गच्छन्त्याशु प्रधानताम्॥ 3-3-43&lt;br /&gt;
 वसवो मरुतो रुद्रा ये च साध्या मरीचिपाः।&lt;br /&gt;
 वालखिल्यादयः सिद्धाः श्रेष्ठत्वं प्राणिनां गताः॥ 3-3-44&lt;br /&gt;
 सब्रह्मकेषु लोकेषु सप्तस्वप्यखिलेषु च।&lt;br /&gt;
 न तद्भूतमहं मन्ये यदर्कादतिरिच्यते॥ 3-3-45&lt;br /&gt;
 सन्ति चान्यानि सत्त्वानि वीर्यवन्ति महान्ति च।&lt;br /&gt;
 न तु तेषां तथा दीप्तिः प्रभावो वा यथा तव॥ 3-3-46&lt;br /&gt;
 ज्योतींषि त्वयि सर्वाणि त्वं सर्वज्योतिषां पतिः।&lt;br /&gt;
 त्वयि सत्यं च सत्त्वं च सर्वे भावाश्च सात्त्विकाः॥ 3-3-47&lt;br /&gt;
 त्वत्तेजसा कृतं चक्रं सुनाभं विश्वकर्मणा।&lt;br /&gt;
 देवारीणां मदो येन नाशितः शार्ङ्गधन्वना॥ 3-3-48&lt;br /&gt;
 त्वमादायांशुभिस्तेजो निदाघे सर्वदेहिनाम्।&lt;br /&gt;
 सर्वौषधिरसानां च पुनर्वर्षासु मुञ्चसि॥ 3-3-49&lt;br /&gt;
 तपन्त्यन्ये दहन्त्यन्ये गर्जन्त्यन्ये तथा घनाः।&lt;br /&gt;
 विद्योतन्ते प्रवर्षन्ति तव प्रावृषि रश्मयः॥ 3-3-50&lt;br /&gt;
 न तथा सुखयत्यग्निर्न प्रावारा न कम्बलाः।&lt;br /&gt;
 शीतवातार्दितं लोकं यथा तव मरीचयः॥ 3-3-51&lt;br /&gt;
 त्रयोदशद्वीपवतीं गोभिर्भासयसे महीम्।&lt;br /&gt;
 त्रयाणामपि लोकानां हितायैकः प्रवर्तसे॥ 3-3-52&lt;br /&gt;
 तव यद्युदयो न स्यादन्धं जगदिदं भवेत्।&lt;br /&gt;
 न च धर्मार्थकामेषु प्रवर्तेरन्मनीषिणः॥ 3-3-53&lt;br /&gt;
 आधानपशुबन्धेष्टिमन्त्रयज्ञतपःक्रियाः।&lt;br /&gt;
 त्वत्प्रसादादवाप्यन्ते ब्रह्मक्षत्रविशां गणैः॥ 3-3-54&lt;br /&gt;
 यदहर्ब्रह्मणः प्रोक्तं सहस्रयुगसम्मितम्।&lt;br /&gt;
 तस्य त्वमादिरन्तश्च कालज्ञैः परिकीर्तितः॥ 3-3-55&lt;br /&gt;
 मनूनां मनुपुत्राणां जगतोऽमानवस्य च।&lt;br /&gt;
 मन्वन्तराणां सर्वेषामीश्वराणां त्वमीश्वरः॥ 3-3-56&lt;br /&gt;
 संहारकाले सम्प्राप्ते तव क्रोधविनिःसृतः।&lt;br /&gt;
 संवर्तकाग्निस्त्रैलोक्यं भस्मीकृत्यावतिष्ठते॥ 3-3-57&lt;br /&gt;
 त्वद्दीधितिसमुत्पन्ना नानावर्णा महाघनाः।&lt;br /&gt;
 सैरावताः साशनयः कुर्वन्त्याभूतसम्प्लवम्॥ 3-3-58&lt;br /&gt;
 कृत्वा द्वादशधाऽऽत्मानं द्वादशादित्यतां गतः।&lt;br /&gt;
 संहृत्यैकार्णवं सर्वं त्वं शोषयसि रश्मिभिः॥ 3-3-59&lt;br /&gt;
 त्वामिन्द्रमाहुस्त्वं रुद्रस्त्वं विष्णुस्त्वं प्रजापतिः।&lt;br /&gt;
 त्वमग्निस्त्वं मनः सूक्ष्मं प्रभुस्त्वं ब्रह्म शाश्वतम्॥ 3-3-60&lt;br /&gt;
 त्वं हंसः सविता भानुरंशुमाली वृषाकपिः।&lt;br /&gt;
 विवस्वान्मिहिरः पूषा मित्रो धर्मस्तथैव च॥ 3-3-61&lt;br /&gt;
 सहस्ररश्मिरादित्यस्तपनस्त्वं गवाम्पतिः।&lt;br /&gt;
 मार्तण्डोऽर्को रविः सूर्यः शरण्यो दिनकृत्तथा॥ 3-3-62&lt;br /&gt;
 दिवाकरः सप्तसप्तिर्धामकेशी विरोचनः।&lt;br /&gt;
 आशुगामी तमोघ्नश्च हरिताश्वश्च कीर्त्यसे॥ 3-3-63&lt;br /&gt;
 सप्तम्यामथवा षष्ठ्यां भक्त्या पूजां करोति यः।&lt;br /&gt;
 अनिर्विण्णोऽनहङ्कारी तं लक्ष्मीर्भजते नरम्॥ 3-3-64&lt;br /&gt;
 न तेषामापदः सन्ति नाधयो व्याधयस्तथा।&lt;br /&gt;
 ये तवानन्यमनसः कुर्वन्त्यर्चनवन्दनम्॥ 3-3-65&lt;br /&gt;
 सर्वरोगैर्विरहिताः सर्वपापविवर्जिताः।&lt;br /&gt;
 त्वद्भावभक्ताः सुखिनो भवन्ति चिरजीविनः॥ 3-3-66&lt;br /&gt;
 त्वं ममाप्यन्नकामस्य सर्वातिथ्यं चिकीर्षतः।&lt;br /&gt;
 अन्नमन्नपते दातुमभितः श्रद्धयार्हसि॥ 3-3-67&lt;br /&gt;
 ये च तेऽनुचराः सर्वे पादोपान्तं समाश्रिताः।&lt;br /&gt;
 माठरारुणदण्डाद्यास्तांस्तान्वन्देऽशनिक्षुभान्॥ 3-3-68&lt;br /&gt;
 क्षुभया सहिता मैत्री याश्चान्या भूतमातरः।&lt;br /&gt;
 ताश्च सर्वा नमस्यामि पान्तु मां शरणागतम्॥ 3-3-69&lt;br /&gt;
 वैशम्पायन उवाच&lt;br /&gt;
 एवं स्तुतो महाराज भास्करो लोकभावनः।&lt;br /&gt;
 ततो दिवाकरः प्रीतो दर्शयामास पाण्डवम्।&lt;br /&gt;
 दीप्यमानः स्ववपुषा ज्वलन्निव हुताशनः॥ 3-3-70&lt;br /&gt;
 [[:Category:Sun God|''Sun God'']] [[:Category:सूर्य देव|''सूर्य देव'']]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
 विवस्वानुवाच&lt;br /&gt;
 यत्तेऽभिलषितं किञ्चित्तत्त्वं सर्वमवाप्स्यसि।&lt;br /&gt;
 अहमन्नं प्रदास्यामि सप्त पञ्च च ते समाः॥ 3-3-71&lt;br /&gt;
 फलमूलामिषं शाकं संस्कृतं यन्महानसे।&lt;br /&gt;
 गृह्णीष्व पिठरं ताम्रं मया दत्त नराधिप।&lt;br /&gt;
 यावद्वर्त्स्यति पाञ्चाली पात्रेणानेन सुव्रत॥ 3-3-72&lt;br /&gt;
 फलमूलामिषं शाकं संस्कृतं यन्महानसे।&lt;br /&gt;
 चतुर्विधं तदन्नाद्यमक्षय्यं ते भविष्यति।&lt;br /&gt;
 धनं च विविधं तुभ्यमित्युक्त्वान्तरधीयत॥&lt;br /&gt;
 इतश्चतुर्दशे वर्षे भूयो राज्यमवाप्स्यसि॥ 3-3-73&lt;br /&gt;
 [[:Category:Pandavas get Akshaypatra|''Pandavas get Akshaypatra'']] [[:Category:अक्षयपात्र|''अक्षयपात्र'']]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
 वैशम्पायन उवाच&lt;br /&gt;
 एवमुक्त्वा तु भगवांस्तत्रैवान्तरधीयत॥ 3-3-74&lt;br /&gt;
 इमं स्तवं प्रयतमनाः समाधिना पठेदिहान्योऽपि वरं समर्थयन्।&lt;br /&gt;
 तत्तस्य दद्याच्च रविर्मनीषितं तदाप्नुयाद्यद्यपि तत्सुदुर्लभम्॥ 3-3-74&lt;br /&gt;
 यश्चेदं धारयेन्नित्यं शृणुयाद्वाप्यभीक्ष्णशः।&lt;br /&gt;
 पुत्रार्थी लभते पुत्रं धनार्थी लभते धनम्॥ 3-3-75&lt;br /&gt;
 विद्यार्थी लभते विद्यां पुरुषोऽप्यथवा स्त्रियः।&lt;br /&gt;
 उभे सन्ध्ये पठेन्नित्यं नारी वा पुरुषो यदि॥ 3-3-76&lt;br /&gt;
 आपदं प्राप्य मुच्येत बद्धो मुच्येत बन्धनात्।&lt;br /&gt;
 एतद्ब्रह्मा ददौ पूर्वं शक्राय सुमहात्मने॥ 3-3-77&lt;br /&gt;
 शक्राच्च नारदः प्राप्तो धौम्यस्तु तदनन्तरम्।&lt;br /&gt;
 धौम्याद्युधिष्ठिरः प्राप्य सर्वान्कामानवाप्तवान्॥ 3-3-78&lt;br /&gt;
 सङ्ग्रामे च जयेन्नित्यं विपुलं चाप्नुयाद्वसु।&lt;br /&gt;
 मुच्यते सर्वपापेभ्यः सूर्यलोकं स गच्छति॥ 3-3-79&lt;br /&gt;
 [[:Category:Benefits of worshiping Sun God|''Benefits of worshiping Sun God'']]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
 वैशम्पायन उवाच&lt;br /&gt;
 लब्ध्वा वरं तु कौन्तेयो जलादुत्तीर्य धर्मवित्।&lt;br /&gt;
 जग्राह पादौ धौम्यस्य भ्रातॄंश्च परिषस्वजे॥ 3-3-80&lt;br /&gt;
 द्रौपद्या सह सङ्गम्य वन्द्यमानस्तया प्रभुः।&lt;br /&gt;
 महानसे तदानीं तु साधयामास पाण्डवः॥ 3-3-81&lt;br /&gt;
 संस्कृतं प्रसवं याति स्वल्पमन्नं चतुर्विधम्।&lt;br /&gt;
 अक्षय्यं वर्धते चान्नं तेन भोजयते द्विजान्॥ 3-3-82&lt;br /&gt;
 भुक्तवत्सु च विप्रेषु भोजयित्वानुजानपि।&lt;br /&gt;
 शेषं विघससंज्ञं तु पश्चाद्भुङ्क्ते युधिष्ठिरः॥ 3-3-83&lt;br /&gt;
 युधिष्ठिरं भोजयित्वा शेषमश्नाति पार्षती।&lt;br /&gt;
 द्रौपद्यां भुज्यमानायां तदन्नं क्षयमेति च।&lt;br /&gt;
 एवं दिवाकरात्प्राप्य दिवाकरसमप्रभः॥ 3-3-84&lt;br /&gt;
 कामान्मनोऽभिलषितान्ब्राह्मणेभ्योऽददात्प्रभुः।&lt;br /&gt;
 पुरोहितपुरोगाश्च तिथिनक्षत्रपर्वसु।&lt;br /&gt;
 यज्ञियार्थाः प्रवर्तन्ते विधिमन्त्रप्रमाणतः॥ 3-3-85&lt;br /&gt;
 [[:Category:Serving Brahmanas|''Serving Brahmanas'']] [[:Category:Akshaypatra|''Akshaypatra'']] [[:Category:अक्षयपात्र|''अक्षयपात्र'']]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
 ततः कृतस्वस्त्ययना धौम्येन सह पाण्डवाः।&lt;br /&gt;
 द्विजसङ्घैः परिवृताः प्रययुः काम्यकं वनम्॥ 3-3-86&lt;br /&gt;
 [[:Category:Kamyavan|''Kamyavan'']] [[:Category:काम्यवन|''काम्यवन'']]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जनमेजयः पुष्पोपहारबलिभिर्बहुशश्च यथाविधि।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सर्वात्मभूतं सम्पूज्य यतप्राणो जितेन्द्रियः॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
स्तवेन केन विप्रर्षे स तु राजा युधिष्ठिरः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
विप्रार्थमाराधितवान्सूर्यमद्भुतविक्रमम्॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मयि स्नेहोऽस्ति चेद्ब्रह्मन्यदनुग्रहभागहम्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भगवान्नास्ति चेद्गुह्यं तच्च मे ब्रूहि साम्प्रतम्॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वैशम्पायनः शृणुष्वावहितो राजन्शुचिर्भूत्वा समाहितः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
क्षणं च कुरु राजेन्द्र गुह्यं वक्ष्यामि ते हितम्॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
धौम्येन तु यथाप्रोक्तं पार्थाय सुमहात्मने।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
नाम्नामष्टशतं पुण्यं तच्छृणुष्व महामते॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सूर्योऽर्यमा भगस्त्वष्टा पूषाऽर्कस्सविता रविः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
गभस्तिमानजः कालो मृत्युर्धाता प्रभाकरः॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पृथिव्यापश्च तेजश्च खं वायुश्च परायणम्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सोमो बृहस्पतिश्शुक्रो बुधोऽङ्गारक एव च॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इन्द्रो विवस्वान्दीप्तांशुश्शुचिश्शौरिश्शनैश्चरः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ब्रह्मा विष्णुश्च रुद्रश्च स्कन्दो वैश्रवणो यमः॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वैद्युतो जाठरश्चाग्निः ऐन्धनस्तेजसां पतिः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
धर्मध्वजो वेदकर्ता वेदाङ्गो वेदवाहनः॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कृतं त्रेता द्वापरश्च कलिस्सर्वामराश्रयः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कला काष्ठा मुहूर्ताश्च पक्षा मासा ऋतुस्तथा॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
संवत्सरकरोऽश्वत्थः कालचक्रो विभावसुः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पुरुषश्शाश्वतो योगी व्यक्ताव्यक्तस्सनातनः॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
लोकाध्यक्षस्सुराध्यक्षो विश्वकर्मा तमोनुदः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वरुणस्सागरोंशुश्च जीमूतो जीवनोऽरिहा॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भूताश्रयो भूतपतिस्सर्वभूतनिषेवितः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मणिस्सुवर्णो भूतादिः कामदस्सर्वतोमुखः॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जयो विशालो वरदश्शीघ्रगः प्राणधारणः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
धन्वन्तरिर्धूमकेतुः आदिदेवोऽदितेस्सुतः॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
द्वादशात्माऽरविन्दाक्षः पिता माता पितामहः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
स्वर्गद्वारं प्रजाद्वारं मोक्षद्वारं त्रिविष्टपम्॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
देवकर्ता प्रशान्तात्मा विश्वात्मा विश्वतोमुखः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
चराचरात्मा सूक्ष्मात्मा मैत्रेण वपुषाऽन्वितः॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
एतद्वै कीर्तनीयस्य सूर्यस्यैव महात्मनः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
नाम्नामष्टशतं पुण्यं शक्रेणोक्तं महात्मना॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शक्राच्च नारदः प्राप्तो धौम्यश्च तदनन्तरम्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
धौम्याद्युधिष्ठिरः प्राप्य सर्वान्कामानवाप्तवान्॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सुरपितृगणयक्षसेवितं निशिचरसिद्धगणैश्च वन्दितम्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वरकनकहुताशनप्रभं त्वमपि मनस्यभिधेहि भास्करम्॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सूर्योदये यस्सुसमाहितः पठेत्स पुत्रलाभं धनरत्नसञ्चयान्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
लभेत जातिस्मरतां सदा नरे धृतिं च मेधां च स विन्दते वराम्॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इमं स्तवं देववरस्य कीर्तयेच्छृणोति वा यस्सुमनास्समाहितः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
स मुच्यते शोकदवाग्निसागराल्लभेत कामान्मनसा यथेप्सितान्॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इति श्रीमिहाभारते वनपर्वणि अरण्यपर्वणि काम्यकवनप्रवेशे तृतीयोऽध्यायः॥ 3 ॥&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>ShraddhaV</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://dharmawiki.org/index.php?title=Vanaparva_Adhyaya_3_(%E0%A4%B5%E0%A4%A8%E0%A4%AA%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%B5%E0%A4%A3%E0%A4%BF_%E0%A4%85%E0%A4%A7%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%AF%E0%A4%83_%E0%A5%A9)&amp;diff=119798</id>
		<title>Vanaparva Adhyaya 3 (वनपर्वणि अध्यायः ३)</title>
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		<updated>2019-07-10T11:25:11Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;ShraddhaV: tagging 10-80&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;वैशम्पायन उवाच&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शौनकेनैवमुक्तस्तु कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पुरोहितमुपागम्य भ्रातृमध्येऽब्रवीदिदम्॥ 3-3-1&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
प्रस्थितं मानुयान्तीमे ब्राह्मणा वेदपारगाः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
न चास्मि पोषणे शक्तो बहुदुःखसमन्वितः॥ 3-3-2&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
परित्यक्तुं न शक्तोऽस्मि दानशक्तिश्च नास्ति मे।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कथमत्र मया कार्यं तद्ब्रूहि भगवन्मम॥ 3-3-3&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वैशम्पायन उवाच&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मुहूर्तमिव स ध्यात्वा धर्मेणान्विष्य तां गतिम्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
युधिष्ठिरमुवाचेदं धौम्यो धर्मभृतां वरः॥ 3-3-4&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
धौम्य उवाच&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पुरा सृष्टानि भूतानि पीड्यन्ते क्षुधया भृशम्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ततोऽनुकम्पया तेषां सविता स्वपिता यथा॥ 3-3-5&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
गत्वोत्तरायणं तेजो रसानुद्धृत्य रश्मिभिः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दक्षिणायनमावृत्तो महीं निविशते रविः॥ 3-3-6&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
 क्षेत्रभूते ततस्तस्मिन्नोषधीरोषधीपतिः।&lt;br /&gt;
 दिवस्तेजः समुद्धृत्य जनयामास वारिणा॥ 3-3-7&lt;br /&gt;
 निषिक्तश्चन्द्रतेजोभिः स्वयोनौ निर्गते रविः।&lt;br /&gt;
 ओषध्यः षड्रसा मेध्यास्तदन्नं प्राणिनां भुवि॥ 3-3-8&lt;br /&gt;
 [[:Category:Moon God|''Moon God'']] [[:Category:चंद्रमा|''चंद्रमा'']] [[:Category:चंद्र देव|''चंद्र देव'']]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
एवं भानुमयं ह्यन्नं भूतानां प्राणधारणम्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पितैष सर्वभूतानां तस्मात्तं शरणं व्रज॥ 3-3-9&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
 राजानो हि महात्मानो योनिकर्मविशोधिताः।&lt;br /&gt;
 उद्धरन्ति प्रजाः सर्वास्तप आस्थाय पुष्कलम्॥ 3-3-10&lt;br /&gt;
 भीमेन कार्तवीर्येण वैन्येन नहुषेण च।&lt;br /&gt;
 तपोयोगसमाधिस्थैरुद्धता ह्यापदः प्रजाः॥ 3-3-11&lt;br /&gt;
 तथा त्वमपि धर्मात्मन्कर्मणा च विशोधितः।&lt;br /&gt;
 तप आस्थाय धर्मेण द्विजातीन्भर भारत॥ 3-3-12&lt;br /&gt;
 [[:Category:Penance|''Penance'']] [[:Category:tapasya|''tapasya'']]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
 जनमेजय उवाच&lt;br /&gt;
 कथं कुरूणामृषभः स तु राजा युधिष्ठिरः।&lt;br /&gt;
 विप्रार्थमाराधितवान्सूर्यमद्भुतदर्शनम्॥ 3-3-13&lt;br /&gt;
 वैशम्पायन उवाच&lt;br /&gt;
 शृणुष्वावहितो राजञ्शुचिर्भूत्वा समाहितः।&lt;br /&gt;
 क्षणं च कुरु राजेन्द्र सम्प्रवक्ष्याम्यशेषतः॥ 3-3-14&lt;br /&gt;
 धौम्येन तु यथा पूर्वं पार्थाय सुमहात्मने।&lt;br /&gt;
 नामाष्टशतमाख्यातं तच्छृणुष्व महामते॥ 3-3-15&lt;br /&gt;
 [[:Category:Sun God|''Sun God'']] [[:Category:सूर्य देव|''सूर्य देव'']]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
 धौम्य उवाच&lt;br /&gt;
 सूर्योऽर्यमा भगस्त्वष्टा पूषार्कः सविता रविः।&lt;br /&gt;
 गभस्तिमानजः कालो मृत्युर्धाता प्रभाकरः॥ 3-3-16&lt;br /&gt;
 पृथिव्यापश्च तेजश्च खं वायुश्च परायणम्।&lt;br /&gt;
 सोमो बृहस्पतिः शुक्रो बुधोऽङ्गारक एव च॥ 3-3-17&lt;br /&gt;
 इन्द्रो विवस्वान्दीप्तांशुः शुचिः शौरिः शनैश्चरः।&lt;br /&gt;
 ब्रह्मा विष्णुश्च रुद्रश्च स्कन्दो वै वरुणो यमः॥ 3-3-18&lt;br /&gt;
 वैद्युतो जाठरश्चाग्निरैन्धनस्तेजसां पतिः।&lt;br /&gt;
 धर्मध्वजो वेदकर्ता वेदाङ्गो वेदवाहनः॥ 3-3-19&lt;br /&gt;
 कृतं त्रेता द्वापरश्च कलिः सर्वमलाश्रयः।&lt;br /&gt;
 कला काष्ठा मुहूर्ताश्च क्षपा यामस्तथा क्षणः॥ 3-3-20&lt;br /&gt;
 संवत्सरकरोऽश्वत्थः कालचक्रो विभावसुः।&lt;br /&gt;
 पुरुषः शाश्वतो योगी व्यक्ताव्यक्तः सनातनः॥ 3-3-21&lt;br /&gt;
 कालाध्यक्षः प्रजाध्यक्षो विश्वकर्मा तमोनुदः।&lt;br /&gt;
 वरुणः सागरोंऽशुश्च जीमूतो जीवनोऽरिहा॥ 3-3-22&lt;br /&gt;
 भूताश्रयो भूतपतिः सर्वलोकनमस्कृतः।&lt;br /&gt;
 स्रष्टा संवर्तको वह्निः सर्वस्यादिरलोलुपः॥ 3-3-23&lt;br /&gt;
 अनन्तः कपिलो भानुः कामदः सर्वतोमुखः।&lt;br /&gt;
 जयो विशालो वरदः सर्वधातुनिषेचिता॥ 3-3-24&lt;br /&gt;
 मनःसुपर्णो भूतादिः शीघ्रगः प्राणधारकः।&lt;br /&gt;
 धन्वन्तरिर्धूमकेतुरादिदेवोऽदितेः सुतः॥ 3-3-25&lt;br /&gt;
 द्वादशात्मारविन्दाक्षः पिता माता पितामहः।&lt;br /&gt;
 स्वर्गद्वारं प्रजाद्वारं मोक्षद्वारं त्रिविष्टपम्॥ 3-3-26&lt;br /&gt;
 देहकर्ता प्रशान्तात्मा विश्वात्मा विश्वतोमुखः।&lt;br /&gt;
 चराचरात्मा सूक्ष्मात्मा मैत्रेयः करुणान्वितः॥ 3-3-27&lt;br /&gt;
 एतद्वै कीर्तनीयस्य सूर्यस्यामिततेजसः।&lt;br /&gt;
 नामाष्टशतकं चेदं प्रोक्तमेतत्स्वयंभुवा॥ 3-3-28&lt;br /&gt;
 [[:Category:108 names of Sun God|''108 names of Sun God'']] [[:Category:सूर्य देव|''सूर्य देव'']] [[:Category:१०८|''१०८'']]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
 सुरगणपितृयक्षसेवितं ह्यसुरनिशाचरसिद्धवन्दितम्।&lt;br /&gt;
 वरकनकहुताशनप्रभं प्रणिपतितोऽस्मि हिताय भास्करम्॥ 3-3-29&lt;br /&gt;
 सूर्योदये यः सुसमाहितः पठेत्स पुत्रदारान्धनरत्नसञ्चयान्।&lt;br /&gt;
 लभेत जातिस्मरतां नरः सदा धृतिं च मेधां च स विन्दते पुमान्॥ 3-3-30&lt;br /&gt;
 इमं स्तवं देववरस्य यो नरः प्रकीर्तयेच्छुचिसुमनाः समाहितः।&lt;br /&gt;
 विमुच्यते शोकदवाग्निसागराल्लभेत कामान्मनसा यथेप्सितान्॥ 3-3-31&lt;br /&gt;
 [[:Category:Worship of Sun God|''Worship of Sun God'']] [[:Category:सूर्य देव आराधना|''सूर्य देव आराधना'']]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
 वैशम्पायन उवाच&lt;br /&gt;
 एवमुक्तस्तु धौम्येन तत्कालसदृशं वचः।&lt;br /&gt;
 विप्रत्यागसमाधिस्थः संयतात्मा दृढव्रतः॥ 3-3-32&lt;br /&gt;
 धर्मराजो विशुद्धात्मा तप आतिष्ठदुत्तमम्।&lt;br /&gt;
 पुष्पोपहारैर्बलिभिरर्चयित्वा दिवाकरम्॥ 3-3-33&lt;br /&gt;
 सोऽवगाह्य जलं राजा देवस्याभिमुखोऽभवत्।&lt;br /&gt;
 योगमास्थाय धर्मात्मा वायुभक्षो जितेन्द्रियः॥ 3-3-34&lt;br /&gt;
 गाङ्गेयं वार्युपस्पृश्य प्राणायामेन तस्थिवान्।&lt;br /&gt;
 शुचिः प्रयतवाग्भूत्वा स्तोत्रमारब्धवांस्ततः॥ 3-3-35&lt;br /&gt;
 [[:Category:Worship|''Worship'']] [[:Category:पुजा|''पुजा'']]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
 युधिष्ठिर उवाच&lt;br /&gt;
 त्वं भानो जगतश्चक्षुस्त्वमात्मा सर्वदेहिनाम्।&lt;br /&gt;
 त्वं योनिः सर्वभूतानां त्वमाचारः क्रियावताम्॥ 3-3-36&lt;br /&gt;
 त्वं गतिः सर्वसांख्यानां योगिनां त्वं परायणम्।&lt;br /&gt;
 अनावृतार्गलद्वारं त्वं गतिस्त्वं मुमुक्षताम्॥ 3-3-37&lt;br /&gt;
 त्वया संधार्यते लोकस्त्वया लोकः प्रकाश्यते।&lt;br /&gt;
 त्वया पवित्रीक्रियते निर्व्याजं पाल्यते त्वया॥ 3-3-38&lt;br /&gt;
 त्वामुपस्थाय काले तु ब्राह्मणा वेदपारगाः।&lt;br /&gt;
 स्वशाखाविहितैर्मन्त्रैरर्चन्त्यृषिगणार्चितम्॥ 3-3-39&lt;br /&gt;
 तव दिव्यं रथं यान्तमनुयान्ति वरार्थिनः।&lt;br /&gt;
 सिद्धचारणगन्धर्वा यक्षगुह्यकपन्नगाः॥ 3-3-40&lt;br /&gt;
 त्रयस्त्रिंशच्च वै देवास्तथा वैमानिका गणाः।&lt;br /&gt;
 सोपेन्द्राः समहेन्द्राश्च त्वामिष्ट्वा सिद्धिमागताः॥ 3-3-41&lt;br /&gt;
 उपयान्त्यर्चयित्वा तु त्वां वै प्राप्तमनोरथाः।&lt;br /&gt;
 दिव्यमन्दारमालाभिस्तूर्णं विद्याधरोत्तमाः॥ 3-3-42&lt;br /&gt;
 गुह्याः पितृगणाः सप्त ये दिव्या ये च मानुषाः।&lt;br /&gt;
 ते पूजयित्वा त्वामेव गच्छन्त्याशु प्रधानताम्॥ 3-3-43&lt;br /&gt;
 वसवो मरुतो रुद्रा ये च साध्या मरीचिपाः।&lt;br /&gt;
 वालखिल्यादयः सिद्धाः श्रेष्ठत्वं प्राणिनां गताः॥ 3-3-44&lt;br /&gt;
 सब्रह्मकेषु लोकेषु सप्तस्वप्यखिलेषु च।&lt;br /&gt;
 न तद्भूतमहं मन्ये यदर्कादतिरिच्यते॥ 3-3-45&lt;br /&gt;
 सन्ति चान्यानि सत्त्वानि वीर्यवन्ति महान्ति च।&lt;br /&gt;
 न तु तेषां तथा दीप्तिः प्रभावो वा यथा तव॥ 3-3-46&lt;br /&gt;
 ज्योतींषि त्वयि सर्वाणि त्वं सर्वज्योतिषां पतिः।&lt;br /&gt;
 त्वयि सत्यं च सत्त्वं च सर्वे भावाश्च सात्त्विकाः॥ 3-3-47&lt;br /&gt;
 त्वत्तेजसा कृतं चक्रं सुनाभं विश्वकर्मणा।&lt;br /&gt;
 देवारीणां मदो येन नाशितः शार्ङ्गधन्वना॥ 3-3-48&lt;br /&gt;
 त्वमादायांशुभिस्तेजो निदाघे सर्वदेहिनाम्।&lt;br /&gt;
 सर्वौषधिरसानां च पुनर्वर्षासु मुञ्चसि॥ 3-3-49&lt;br /&gt;
 तपन्त्यन्ये दहन्त्यन्ये गर्जन्त्यन्ये तथा घनाः।&lt;br /&gt;
 विद्योतन्ते प्रवर्षन्ति तव प्रावृषि रश्मयः॥ 3-3-50&lt;br /&gt;
 न तथा सुखयत्यग्निर्न प्रावारा न कम्बलाः।&lt;br /&gt;
 शीतवातार्दितं लोकं यथा तव मरीचयः॥ 3-3-51&lt;br /&gt;
 त्रयोदशद्वीपवतीं गोभिर्भासयसे महीम्।&lt;br /&gt;
 त्रयाणामपि लोकानां हितायैकः प्रवर्तसे॥ 3-3-52&lt;br /&gt;
 तव यद्युदयो न स्यादन्धं जगदिदं भवेत्।&lt;br /&gt;
 न च धर्मार्थकामेषु प्रवर्तेरन्मनीषिणः॥ 3-3-53&lt;br /&gt;
 आधानपशुबन्धेष्टिमन्त्रयज्ञतपःक्रियाः।&lt;br /&gt;
 त्वत्प्रसादादवाप्यन्ते ब्रह्मक्षत्रविशां गणैः॥ 3-3-54&lt;br /&gt;
 यदहर्ब्रह्मणः प्रोक्तं सहस्रयुगसम्मितम्।&lt;br /&gt;
 तस्य त्वमादिरन्तश्च कालज्ञैः परिकीर्तितः॥ 3-3-55&lt;br /&gt;
 मनूनां मनुपुत्राणां जगतोऽमानवस्य च।&lt;br /&gt;
 मन्वन्तराणां सर्वेषामीश्वराणां त्वमीश्वरः॥ 3-3-56&lt;br /&gt;
 संहारकाले सम्प्राप्ते तव क्रोधविनिःसृतः।&lt;br /&gt;
 संवर्तकाग्निस्त्रैलोक्यं भस्मीकृत्यावतिष्ठते॥ 3-3-57&lt;br /&gt;
 त्वद्दीधितिसमुत्पन्ना नानावर्णा महाघनाः।&lt;br /&gt;
 सैरावताः साशनयः कुर्वन्त्याभूतसम्प्लवम्॥ 3-3-58&lt;br /&gt;
 कृत्वा द्वादशधाऽऽत्मानं द्वादशादित्यतां गतः।&lt;br /&gt;
 संहृत्यैकार्णवं सर्वं त्वं शोषयसि रश्मिभिः॥ 3-3-59&lt;br /&gt;
 त्वामिन्द्रमाहुस्त्वं रुद्रस्त्वं विष्णुस्त्वं प्रजापतिः।&lt;br /&gt;
 त्वमग्निस्त्वं मनः सूक्ष्मं प्रभुस्त्वं ब्रह्म शाश्वतम्॥ 3-3-60&lt;br /&gt;
 त्वं हंसः सविता भानुरंशुमाली वृषाकपिः।&lt;br /&gt;
 विवस्वान्मिहिरः पूषा मित्रो धर्मस्तथैव च॥ 3-3-61&lt;br /&gt;
 सहस्ररश्मिरादित्यस्तपनस्त्वं गवाम्पतिः।&lt;br /&gt;
 मार्तण्डोऽर्को रविः सूर्यः शरण्यो दिनकृत्तथा॥ 3-3-62&lt;br /&gt;
 दिवाकरः सप्तसप्तिर्धामकेशी विरोचनः।&lt;br /&gt;
 आशुगामी तमोघ्नश्च हरिताश्वश्च कीर्त्यसे॥ 3-3-63&lt;br /&gt;
 सप्तम्यामथवा षष्ठ्यां भक्त्या पूजां करोति यः।&lt;br /&gt;
 अनिर्विण्णोऽनहङ्कारी तं लक्ष्मीर्भजते नरम्॥ 3-3-64&lt;br /&gt;
 न तेषामापदः सन्ति नाधयो व्याधयस्तथा।&lt;br /&gt;
 ये तवानन्यमनसः कुर्वन्त्यर्चनवन्दनम्॥ 3-3-65&lt;br /&gt;
 सर्वरोगैर्विरहिताः सर्वपापविवर्जिताः।&lt;br /&gt;
 त्वद्भावभक्ताः सुखिनो भवन्ति चिरजीविनः॥ 3-3-66&lt;br /&gt;
 त्वं ममाप्यन्नकामस्य सर्वातिथ्यं चिकीर्षतः।&lt;br /&gt;
 अन्नमन्नपते दातुमभितः श्रद्धयार्हसि॥ 3-3-67&lt;br /&gt;
 ये च तेऽनुचराः सर्वे पादोपान्तं समाश्रिताः।&lt;br /&gt;
 माठरारुणदण्डाद्यास्तांस्तान्वन्देऽशनिक्षुभान्॥ 3-3-68&lt;br /&gt;
 क्षुभया सहिता मैत्री याश्चान्या भूतमातरः।&lt;br /&gt;
 ताश्च सर्वा नमस्यामि पान्तु मां शरणागतम्॥ 3-3-69&lt;br /&gt;
 वैशम्पायन उवाच&lt;br /&gt;
 एवं स्तुतो महाराज भास्करो लोकभावनः।&lt;br /&gt;
 ततो दिवाकरः प्रीतो दर्शयामास पाण्डवम्।&lt;br /&gt;
 दीप्यमानः स्ववपुषा ज्वलन्निव हुताशनः॥ 3-3-70&lt;br /&gt;
 [[:Category:Sun God|''Sun God'']] [[:Category:सूर्य देव|''सूर्य देव'']]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
 विवस्वानुवाच&lt;br /&gt;
 यत्तेऽभिलषितं किञ्चित्तत्त्वं सर्वमवाप्स्यसि।&lt;br /&gt;
 अहमन्नं प्रदास्यामि सप्त पञ्च च ते समाः॥ 3-3-71&lt;br /&gt;
 फलमूलामिषं शाकं संस्कृतं यन्महानसे।&lt;br /&gt;
 गृह्णीष्व पिठरं ताम्रं मया दत्त नराधिप।&lt;br /&gt;
 यावद्वर्त्स्यति पाञ्चाली पात्रेणानेन सुव्रत॥ 3-3-72&lt;br /&gt;
 फलमूलामिषं शाकं संस्कृतं यन्महानसे।&lt;br /&gt;
 चतुर्विधं तदन्नाद्यमक्षय्यं ते भविष्यति।&lt;br /&gt;
 धनं च विविधं तुभ्यमित्युक्त्वान्तरधीयत॥&lt;br /&gt;
 इतश्चतुर्दशे वर्षे भूयो राज्यमवाप्स्यसि॥ 3-3-73&lt;br /&gt;
 [[:Category:Pandavas get Akshaypatra|''Pandavas get Akshaypatra'']] [[:Category:अक्षयपात्र|''अक्षयपात्र'']]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
 वैशम्पायन उवाच&lt;br /&gt;
 एवमुक्त्वा तु भगवांस्तत्रैवान्तरधीयत॥ 3-3-74&lt;br /&gt;
 इमं स्तवं प्रयतमनाः समाधिना पठेदिहान्योऽपि वरं समर्थयन्।&lt;br /&gt;
 तत्तस्य दद्याच्च रविर्मनीषितं तदाप्नुयाद्यद्यपि तत्सुदुर्लभम्॥ 3-3-74&lt;br /&gt;
 यश्चेदं धारयेन्नित्यं शृणुयाद्वाप्यभीक्ष्णशः।&lt;br /&gt;
 पुत्रार्थी लभते पुत्रं धनार्थी लभते धनम्॥ 3-3-75&lt;br /&gt;
 विद्यार्थी लभते विद्यां पुरुषोऽप्यथवा स्त्रियः।&lt;br /&gt;
 उभे सन्ध्ये पठेन्नित्यं नारी वा पुरुषो यदि॥ 3-3-76&lt;br /&gt;
 आपदं प्राप्य मुच्येत बद्धो मुच्येत बन्धनात्।&lt;br /&gt;
 एतद्ब्रह्मा ददौ पूर्वं शक्राय सुमहात्मने॥ 3-3-77&lt;br /&gt;
 शक्राच्च नारदः प्राप्तो धौम्यस्तु तदनन्तरम्।&lt;br /&gt;
 धौम्याद्युधिष्ठिरः प्राप्य सर्वान्कामानवाप्तवान्॥ 3-3-78&lt;br /&gt;
 सङ्ग्रामे च जयेन्नित्यं विपुलं चाप्नुयाद्वसु।&lt;br /&gt;
 मुच्यते सर्वपापेभ्यः सूर्यलोकं स गच्छति॥ 3-3-79&lt;br /&gt;
 [[:Category:Benefits of worshiping Sun God|''Benefits of worshiping Sun God'']]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
 वैशम्पायन उवाच&lt;br /&gt;
 लब्ध्वा वरं तु कौन्तेयो जलादुत्तीर्य धर्मवित्।&lt;br /&gt;
 जग्राह पादौ धौम्यस्य भ्रातॄंश्च परिषस्वजे॥ 3-3-80&lt;br /&gt;
 द्रौपद्या सह सङ्गम्य वन्द्यमानस्तया प्रभुः।&lt;br /&gt;
 महानसे तदानीं तु साधयामास पाण्डवः॥ 3-3-81&lt;br /&gt;
 संस्कृतं प्रसवं याति स्वल्पमन्नं चतुर्विधम्।&lt;br /&gt;
 अक्षय्यं वर्धते चान्नं तेन भोजयते द्विजान्॥ 3-3-82&lt;br /&gt;
 भुक्तवत्सु च विप्रेषु भोजयित्वानुजानपि।&lt;br /&gt;
 शेषं विघससंज्ञं तु पश्चाद्भुङ्क्ते युधिष्ठिरः॥ 3-3-83&lt;br /&gt;
 युधिष्ठिरं भोजयित्वा शेषमश्नाति पार्षती।&lt;br /&gt;
 द्रौपद्यां भुज्यमानायां तदन्नं क्षयमेति च।&lt;br /&gt;
 एवं दिवाकरात्प्राप्य दिवाकरसमप्रभः॥ 3-3-84&lt;br /&gt;
 कामान्मनोऽभिलषितान्ब्राह्मणेभ्योऽददात्प्रभुः।&lt;br /&gt;
 पुरोहितपुरोगाश्च तिथिनक्षत्रपर्वसु।&lt;br /&gt;
 यज्ञियार्थाः प्रवर्तन्ते विधिमन्त्रप्रमाणतः॥ 3-3-85&lt;br /&gt;
 [[:Category:Serving Brahmanas|''Serving Brahmanas'']] [[:Category:Akshaypatra|''Akshaypatra'']] [[:Category:अक्षयपात्र|''अक्षयपात्र'']]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
 ततः कृतस्वस्त्ययना धौम्येन सह पाण्डवाः।&lt;br /&gt;
 द्विजसङ्घैः परिवृताः प्रययुः काम्यकं वनम्॥ 3-3-86&lt;br /&gt;
 [[:Category:Kamyavan|''Kamyavan'']] [[:Category:काम्यवन|''काम्यवन'']]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जनमेजयः पुष्पोपहारबलिभिर्बहुशश्च यथाविधि।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सर्वात्मभूतं सम्पूज्य यतप्राणो जितेन्द्रियः॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
स्तवेन केन विप्रर्षे स तु राजा युधिष्ठिरः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
विप्रार्थमाराधितवान्सूर्यमद्भुतविक्रमम्॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मयि स्नेहोऽस्ति चेद्ब्रह्मन्यदनुग्रहभागहम्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भगवान्नास्ति चेद्गुह्यं तच्च मे ब्रूहि साम्प्रतम्॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वैशम्पायनः शृणुष्वावहितो राजन्शुचिर्भूत्वा समाहितः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
क्षणं च कुरु राजेन्द्र गुह्यं वक्ष्यामि ते हितम्॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
धौम्येन तु यथाप्रोक्तं पार्थाय सुमहात्मने।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
नाम्नामष्टशतं पुण्यं तच्छृणुष्व महामते॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सूर्योऽर्यमा भगस्त्वष्टा पूषाऽर्कस्सविता रविः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
गभस्तिमानजः कालो मृत्युर्धाता प्रभाकरः॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पृथिव्यापश्च तेजश्च खं वायुश्च परायणम्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सोमो बृहस्पतिश्शुक्रो बुधोऽङ्गारक एव च॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इन्द्रो विवस्वान्दीप्तांशुश्शुचिश्शौरिश्शनैश्चरः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ब्रह्मा विष्णुश्च रुद्रश्च स्कन्दो वैश्रवणो यमः॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वैद्युतो जाठरश्चाग्निः ऐन्धनस्तेजसां पतिः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
धर्मध्वजो वेदकर्ता वेदाङ्गो वेदवाहनः॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कृतं त्रेता द्वापरश्च कलिस्सर्वामराश्रयः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कला काष्ठा मुहूर्ताश्च पक्षा मासा ऋतुस्तथा॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
संवत्सरकरोऽश्वत्थः कालचक्रो विभावसुः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पुरुषश्शाश्वतो योगी व्यक्ताव्यक्तस्सनातनः॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
लोकाध्यक्षस्सुराध्यक्षो विश्वकर्मा तमोनुदः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वरुणस्सागरोंशुश्च जीमूतो जीवनोऽरिहा॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भूताश्रयो भूतपतिस्सर्वभूतनिषेवितः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मणिस्सुवर्णो भूतादिः कामदस्सर्वतोमुखः॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जयो विशालो वरदश्शीघ्रगः प्राणधारणः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
धन्वन्तरिर्धूमकेतुः आदिदेवोऽदितेस्सुतः॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
द्वादशात्माऽरविन्दाक्षः पिता माता पितामहः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
स्वर्गद्वारं प्रजाद्वारं मोक्षद्वारं त्रिविष्टपम्॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
देवकर्ता प्रशान्तात्मा विश्वात्मा विश्वतोमुखः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
चराचरात्मा सूक्ष्मात्मा मैत्रेण वपुषाऽन्वितः॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
एतद्वै कीर्तनीयस्य सूर्यस्यैव महात्मनः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
नाम्नामष्टशतं पुण्यं शक्रेणोक्तं महात्मना॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शक्राच्च नारदः प्राप्तो धौम्यश्च तदनन्तरम्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
धौम्याद्युधिष्ठिरः प्राप्य सर्वान्कामानवाप्तवान्॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सुरपितृगणयक्षसेवितं निशिचरसिद्धगणैश्च वन्दितम्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वरकनकहुताशनप्रभं त्वमपि मनस्यभिधेहि भास्करम्॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सूर्योदये यस्सुसमाहितः पठेत्स पुत्रलाभं धनरत्नसञ्चयान्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
लभेत जातिस्मरतां सदा नरे धृतिं च मेधां च स विन्दते वराम्॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इमं स्तवं देववरस्य कीर्तयेच्छृणोति वा यस्सुमनास्समाहितः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
स मुच्यते शोकदवाग्निसागराल्लभेत कामान्मनसा यथेप्सितान्॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इति श्रीमिहाभारते वनपर्वणि अरण्यपर्वणि काम्यकवनप्रवेशे तृतीयोऽध्यायः॥ 3 ॥&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>ShraddhaV</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://dharmawiki.org/index.php?title=Vanaparva_Adhyaya_3_(%E0%A4%B5%E0%A4%A8%E0%A4%AA%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%B5%E0%A4%A3%E0%A4%BF_%E0%A4%85%E0%A4%A7%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%AF%E0%A4%83_%E0%A5%A9)&amp;diff=119796</id>
		<title>Vanaparva Adhyaya 3 (वनपर्वणि अध्यायः ३)</title>
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		<updated>2019-07-10T10:57:44Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;ShraddhaV: tagging+80&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;वैशम्पायन उवाच&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शौनकेनैवमुक्तस्तु कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पुरोहितमुपागम्य भ्रातृमध्येऽब्रवीदिदम्॥ 3-3-1&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
प्रस्थितं मानुयान्तीमे ब्राह्मणा वेदपारगाः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
न चास्मि पोषणे शक्तो बहुदुःखसमन्वितः॥ 3-3-2&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
परित्यक्तुं न शक्तोऽस्मि दानशक्तिश्च नास्ति मे।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कथमत्र मया कार्यं तद्ब्रूहि भगवन्मम॥ 3-3-3&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वैशम्पायन उवाच&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मुहूर्तमिव स ध्यात्वा धर्मेणान्विष्य तां गतिम्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
युधिष्ठिरमुवाचेदं धौम्यो धर्मभृतां वरः॥ 3-3-4&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
धौम्य उवाच&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पुरा सृष्टानि भूतानि पीड्यन्ते क्षुधया भृशम्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ततोऽनुकम्पया तेषां सविता स्वपिता यथा॥ 3-3-5&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
गत्वोत्तरायणं तेजो रसानुद्धृत्य रश्मिभिः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दक्षिणायनमावृत्तो महीं निविशते रविः॥ 3-3-6&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
क्षेत्रभूते ततस्तस्मिन्नोषधीरोषधीपतिः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दिवस्तेजः समुद्धृत्य जनयामास वारिणा॥ 3-3-7&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
निषिक्तश्चन्द्रतेजोभिः स्वयोनौ निर्गते रविः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ओषध्यः षड्रसा मेध्यास्तदन्नं प्राणिनां भुवि॥ 3-3-8&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
एवं भानुमयं ह्यन्नं भूतानां प्राणधारणम्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पितैष सर्वभूतानां तस्मात्तं शरणं व्रज॥ 3-3-9&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
राजानो हि महात्मानो योनिकर्मविशोधिताः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उद्धरन्ति प्रजाः सर्वास्तप आस्थाय पुष्कलम्॥ 3-3-10&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भीमेन कार्तवीर्येण वैन्येन नहुषेण च।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तपोयोगसमाधिस्थैरुद्धता ह्यापदः प्रजाः॥ 3-3-11&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तथा त्वमपि धर्मात्मन्कर्मणा च विशोधितः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तप आस्थाय धर्मेण द्विजातीन्भर भारत॥ 3-3-12&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जनमेजय उवाच&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कथं कुरूणामृषभः स तु राजा युधिष्ठिरः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
विप्रार्थमाराधितवान्सूर्यमद्भुतदर्शनम्॥ 3-3-13&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वैशम्पायन उवाच&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शृणुष्वावहितो राजञ्शुचिर्भूत्वा समाहितः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
क्षणं च कुरु राजेन्द्र सम्प्रवक्ष्याम्यशेषतः॥ 3-3-14&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
धौम्येन तु यथा पूर्वं पार्थाय सुमहात्मने।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
नामाष्टशतमाख्यातं तच्छृणुष्व महामते॥ 3-3-15&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
धौम्य उवाच&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सूर्योऽर्यमा भगस्त्वष्टा पूषार्कः सविता रविः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
गभस्तिमानजः कालो मृत्युर्धाता प्रभाकरः॥ 3-3-16&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पृथिव्यापश्च तेजश्च खं वायुश्च परायणम्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सोमो बृहस्पतिः शुक्रो बुधोऽङ्गारक एव च॥ 3-3-17&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इन्द्रो विवस्वान्दीप्तांशुः शुचिः शौरिः शनैश्चरः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ब्रह्मा विष्णुश्च रुद्रश्च स्कन्दो वै वरुणो यमः॥ 3-3-18&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वैद्युतो जाठरश्चाग्निरैन्धनस्तेजसां पतिः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
धर्मध्वजो वेदकर्ता वेदाङ्गो वेदवाहनः॥ 3-3-19&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कृतं त्रेता द्वापरश्च कलिः सर्वमलाश्रयः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कला काष्ठा मुहूर्ताश्च क्षपा यामस्तथा क्षणः॥ 3-3-20&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
संवत्सरकरोऽश्वत्थः कालचक्रो विभावसुः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पुरुषः शाश्वतो योगी व्यक्ताव्यक्तः सनातनः॥ 3-3-21&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कालाध्यक्षः प्रजाध्यक्षो विश्वकर्मा तमोनुदः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वरुणः सागरोंऽशुश्च जीमूतो जीवनोऽरिहा॥ 3-3-22&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भूताश्रयो भूतपतिः सर्वलोकनमस्कृतः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
स्रष्टा संवर्तको वह्निः सर्वस्यादिरलोलुपः॥ 3-3-23&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अनन्तः कपिलो भानुः कामदः सर्वतोमुखः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जयो विशालो वरदः सर्वधातुनिषेचिता॥ 3-3-24&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मनःसुपर्णो भूतादिः शीघ्रगः प्राणधारकः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
धन्वन्तरिर्धूमकेतुरादिदेवोऽदितेः सुतः॥ 3-3-25&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
द्वादशात्मारविन्दाक्षः पिता माता पितामहः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
स्वर्गद्वारं प्रजाद्वारं मोक्षद्वारं त्रिविष्टपम्॥ 3-3-26&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
देहकर्ता प्रशान्तात्मा विश्वात्मा विश्वतोमुखः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
चराचरात्मा सूक्ष्मात्मा मैत्रेयः करुणान्वितः॥ 3-3-27&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
एतद्वै कीर्तनीयस्य सूर्यस्यामिततेजसः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
नामाष्टशतकं चेदं प्रोक्तमेतत्स्वयंभुवा॥ 3-3-28&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सुरगणपितृयक्षसेवितं ह्यसुरनिशाचरसिद्धवन्दितम्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वरकनकहुताशनप्रभं प्रणिपतितोऽस्मि हिताय भास्करम्॥ 3-3-29&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सूर्योदये यः सुसमाहितः पठेत्स पुत्रदारान्धनरत्नसञ्चयान्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
लभेत जातिस्मरतां नरः सदा धृतिं च मेधां च स विन्दते पुमान्॥ 3-3-30&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इमं स्तवं देववरस्य यो नरः प्रकीर्तयेच्छुचिसुमनाः समाहितः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
विमुच्यते शोकदवाग्निसागराल्लभेत कामान्मनसा यथेप्सितान्॥ 3-3-31&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वैशम्पायन उवाच&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
एवमुक्तस्तु धौम्येन तत्कालसदृशं वचः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
विप्रत्यागसमाधिस्थः संयतात्मा दृढव्रतः॥ 3-3-32&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
धर्मराजो विशुद्धात्मा तप आतिष्ठदुत्तमम्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पुष्पोपहारैर्बलिभिरर्चयित्वा दिवाकरम्॥ 3-3-33&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सोऽवगाह्य जलं राजा देवस्याभिमुखोऽभवत्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
योगमास्थाय धर्मात्मा वायुभक्षो जितेन्द्रियः॥ 3-3-34&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
गाङ्गेयं वार्युपस्पृश्य प्राणायामेन तस्थिवान्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शुचिः प्रयतवाग्भूत्वा स्तोत्रमारब्धवांस्ततः॥ 3-3-35&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
युधिष्ठिर उवाच&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
त्वं भानो जगतश्चक्षुस्त्वमात्मा सर्वदेहिनाम्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
त्वं योनिः सर्वभूतानां त्वमाचारः क्रियावताम्॥ 3-3-36&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
त्वं गतिः सर्वसांख्यानां योगिनां त्वं परायणम्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अनावृतार्गलद्वारं त्वं गतिस्त्वं मुमुक्षताम्॥ 3-3-37&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
त्वया संधार्यते लोकस्त्वया लोकः प्रकाश्यते।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
त्वया पवित्रीक्रियते निर्व्याजं पाल्यते त्वया॥ 3-3-38&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
त्वामुपस्थाय काले तु ब्राह्मणा वेदपारगाः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
स्वशाखाविहितैर्मन्त्रैरर्चन्त्यृषिगणार्चितम्॥ 3-3-39&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तव दिव्यं रथं यान्तमनुयान्ति वरार्थिनः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सिद्धचारणगन्धर्वा यक्षगुह्यकपन्नगाः॥ 3-3-40&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
त्रयस्त्रिंशच्च वै देवास्तथा वैमानिका गणाः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सोपेन्द्राः समहेन्द्राश्च त्वामिष्ट्वा सिद्धिमागताः॥ 3-3-41&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उपयान्त्यर्चयित्वा तु त्वां वै प्राप्तमनोरथाः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दिव्यमन्दारमालाभिस्तूर्णं विद्याधरोत्तमाः॥ 3-3-42&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
गुह्याः पितृगणाः सप्त ये दिव्या ये च मानुषाः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ते पूजयित्वा त्वामेव गच्छन्त्याशु प्रधानताम्॥ 3-3-43&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वसवो मरुतो रुद्रा ये च साध्या मरीचिपाः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वालखिल्यादयः सिद्धाः श्रेष्ठत्वं प्राणिनां गताः॥ 3-3-44&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सब्रह्मकेषु लोकेषु सप्तस्वप्यखिलेषु च।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
न तद्भूतमहं मन्ये यदर्कादतिरिच्यते॥ 3-3-45&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सन्ति चान्यानि सत्त्वानि वीर्यवन्ति महान्ति च।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
न तु तेषां तथा दीप्तिः प्रभावो वा यथा तव॥ 3-3-46&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ज्योतींषि त्वयि सर्वाणि त्वं सर्वज्योतिषां पतिः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
त्वयि सत्यं च सत्त्वं च सर्वे भावाश्च सात्त्विकाः॥ 3-3-47&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
त्वत्तेजसा कृतं चक्रं सुनाभं विश्वकर्मणा।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
देवारीणां मदो येन नाशितः शार्ङ्गधन्वना॥ 3-3-48&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
त्वमादायांशुभिस्तेजो निदाघे सर्वदेहिनाम्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सर्वौषधिरसानां च पुनर्वर्षासु मुञ्चसि॥ 3-3-49&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तपन्त्यन्ये दहन्त्यन्ये गर्जन्त्यन्ये तथा घनाः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
विद्योतन्ते प्रवर्षन्ति तव प्रावृषि रश्मयः॥ 3-3-50&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
न तथा सुखयत्यग्निर्न प्रावारा न कम्बलाः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शीतवातार्दितं लोकं यथा तव मरीचयः॥ 3-3-51&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
त्रयोदशद्वीपवतीं गोभिर्भासयसे महीम्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
त्रयाणामपि लोकानां हितायैकः प्रवर्तसे॥ 3-3-52&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तव यद्युदयो न स्यादन्धं जगदिदं भवेत्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
न च धर्मार्थकामेषु प्रवर्तेरन्मनीषिणः॥ 3-3-53&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आधानपशुबन्धेष्टिमन्त्रयज्ञतपःक्रियाः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
त्वत्प्रसादादवाप्यन्ते ब्रह्मक्षत्रविशां गणैः॥ 3-3-54&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यदहर्ब्रह्मणः प्रोक्तं सहस्रयुगसम्मितम्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तस्य त्वमादिरन्तश्च कालज्ञैः परिकीर्तितः॥ 3-3-55&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मनूनां मनुपुत्राणां जगतोऽमानवस्य च।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मन्वन्तराणां सर्वेषामीश्वराणां त्वमीश्वरः॥ 3-3-56&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
संहारकाले सम्प्राप्ते तव क्रोधविनिःसृतः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
संवर्तकाग्निस्त्रैलोक्यं भस्मीकृत्यावतिष्ठते॥ 3-3-57&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
त्वद्दीधितिसमुत्पन्ना नानावर्णा महाघनाः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सैरावताः साशनयः कुर्वन्त्याभूतसम्प्लवम्॥ 3-3-58&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कृत्वा द्वादशधाऽऽत्मानं द्वादशादित्यतां गतः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
संहृत्यैकार्णवं सर्वं त्वं शोषयसि रश्मिभिः॥ 3-3-59&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
त्वामिन्द्रमाहुस्त्वं रुद्रस्त्वं विष्णुस्त्वं प्रजापतिः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
त्वमग्निस्त्वं मनः सूक्ष्मं प्रभुस्त्वं ब्रह्म शाश्वतम्॥ 3-3-60&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
त्वं हंसः सविता भानुरंशुमाली वृषाकपिः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
विवस्वान्मिहिरः पूषा मित्रो धर्मस्तथैव च॥ 3-3-61&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सहस्ररश्मिरादित्यस्तपनस्त्वं गवाम्पतिः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मार्तण्डोऽर्को रविः सूर्यः शरण्यो दिनकृत्तथा॥ 3-3-62&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दिवाकरः सप्तसप्तिर्धामकेशी विरोचनः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आशुगामी तमोघ्नश्च हरिताश्वश्च कीर्त्यसे॥ 3-3-63&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सप्तम्यामथवा षष्ठ्यां भक्त्या पूजां करोति यः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अनिर्विण्णोऽनहङ्कारी तं लक्ष्मीर्भजते नरम्॥ 3-3-64&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
न तेषामापदः सन्ति नाधयो व्याधयस्तथा।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ये तवानन्यमनसः कुर्वन्त्यर्चनवन्दनम्॥ 3-3-65&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सर्वरोगैर्विरहिताः सर्वपापविवर्जिताः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
त्वद्भावभक्ताः सुखिनो भवन्ति चिरजीविनः॥ 3-3-66&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
त्वं ममाप्यन्नकामस्य सर्वातिथ्यं चिकीर्षतः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अन्नमन्नपते दातुमभितः श्रद्धयार्हसि॥ 3-3-67&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ये च तेऽनुचराः सर्वे पादोपान्तं समाश्रिताः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
माठरारुणदण्डाद्यास्तांस्तान्वन्देऽशनिक्षुभान्॥ 3-3-68&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
क्षुभया सहिता मैत्री याश्चान्या भूतमातरः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ताश्च सर्वा नमस्यामि पान्तु मां शरणागतम्॥ 3-3-69&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वैशम्पायन उवाच&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
एवं स्तुतो महाराज भास्करो लोकभावनः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ततो दिवाकरः प्रीतो दर्शयामास पाण्डवम्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दीप्यमानः स्ववपुषा ज्वलन्निव हुताशनः॥ 3-3-70&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
विवस्वानुवाच&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यत्तेऽभिलषितं किञ्चित्तत्त्वं सर्वमवाप्स्यसि।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अहमन्नं प्रदास्यामि सप्त पञ्च च ते समाः॥ 3-3-71&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
फलमूलामिषं शाकं संस्कृतं यन्महानसे।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
गृह्णीष्व पिठरं ताम्रं मया दत्त नराधिप।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यावद्वर्त्स्यति पाञ्चाली पात्रेणानेन सुव्रत॥ 3-3-72&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
फलमूलामिषं शाकं संस्कृतं यन्महानसे।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
चतुर्विधं तदन्नाद्यमक्षय्यं ते भविष्यति।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
धनं च विविधं तुभ्यमित्युक्त्वान्तरधीयत॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इतश्चतुर्दशे वर्षे भूयो राज्यमवाप्स्यसि॥ 3-3-73&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वैशम्पायन उवाच&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
एवमुक्त्वा तु भगवांस्तत्रैवान्तरधीयत॥ 3-3-74&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इमं स्तवं प्रयतमनाः समाधिना पठेदिहान्योऽपि वरं समर्थयन्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तत्तस्य दद्याच्च रविर्मनीषितं तदाप्नुयाद्यद्यपि तत्सुदुर्लभम्॥ 3-3-74&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यश्चेदं धारयेन्नित्यं शृणुयाद्वाप्यभीक्ष्णशः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पुत्रार्थी लभते पुत्रं धनार्थी लभते धनम्॥ 3-3-75&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
विद्यार्थी लभते विद्यां पुरुषोऽप्यथवा स्त्रियः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उभे सन्ध्ये पठेन्नित्यं नारी वा पुरुषो यदि॥ 3-3-76&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आपदं प्राप्य मुच्येत बद्धो मुच्येत बन्धनात्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
एतद्ब्रह्मा ददौ पूर्वं शक्राय सुमहात्मने॥ 3-3-77&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शक्राच्च नारदः प्राप्तो धौम्यस्तु तदनन्तरम्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
धौम्याद्युधिष्ठिरः प्राप्य सर्वान्कामानवाप्तवान्॥ 3-3-78&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सङ्ग्रामे च जयेन्नित्यं विपुलं चाप्नुयाद्वसु।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मुच्यते सर्वपापेभ्यः सूर्यलोकं स गच्छति॥ 3-3-79&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वैशम्पायन उवाच&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
 लब्ध्वा वरं तु कौन्तेयो जलादुत्तीर्य धर्मवित्।&lt;br /&gt;
 जग्राह पादौ धौम्यस्य भ्रातॄंश्च परिषस्वजे॥ 3-3-80&lt;br /&gt;
 द्रौपद्या सह सङ्गम्य वन्द्यमानस्तया प्रभुः।&lt;br /&gt;
 महानसे तदानीं तु साधयामास पाण्डवः॥ 3-3-81&lt;br /&gt;
 संस्कृतं प्रसवं याति स्वल्पमन्नं चतुर्विधम्।&lt;br /&gt;
 अक्षय्यं वर्धते चान्नं तेन भोजयते द्विजान्॥ 3-3-82&lt;br /&gt;
 भुक्तवत्सु च विप्रेषु भोजयित्वानुजानपि।&lt;br /&gt;
 शेषं विघससंज्ञं तु पश्चाद्भुङ्क्ते युधिष्ठिरः॥ 3-3-83&lt;br /&gt;
 युधिष्ठिरं भोजयित्वा शेषमश्नाति पार्षती।&lt;br /&gt;
 द्रौपद्यां भुज्यमानायां तदन्नं क्षयमेति च।&lt;br /&gt;
 एवं दिवाकरात्प्राप्य दिवाकरसमप्रभः॥ 3-3-84&lt;br /&gt;
 कामान्मनोऽभिलषितान्ब्राह्मणेभ्योऽददात्प्रभुः।&lt;br /&gt;
 पुरोहितपुरोगाश्च तिथिनक्षत्रपर्वसु।&lt;br /&gt;
 यज्ञियार्थाः प्रवर्तन्ते विधिमन्त्रप्रमाणतः॥ 3-3-85&lt;br /&gt;
 [[:Category:Serving Brahmanas|''Serving Brahmanas'']] [[:Category:Akshaypatra|''Akshaypatra'']] [[:Category:अक्षयपात्र|''अक्षयपात्र'']]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
 ततः कृतस्वस्त्ययना धौम्येन सह पाण्डवाः।&lt;br /&gt;
 द्विजसङ्घैः परिवृताः प्रययुः काम्यकं वनम्॥ 3-3-86&lt;br /&gt;
 [[:Category:Kamyavan|''Kamyavan'']] [[:Category:काम्यवन|''काम्यवन'']]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जनमेजयः पुष्पोपहारबलिभिर्बहुशश्च यथाविधि।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सर्वात्मभूतं सम्पूज्य यतप्राणो जितेन्द्रियः॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
स्तवेन केन विप्रर्षे स तु राजा युधिष्ठिरः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
विप्रार्थमाराधितवान्सूर्यमद्भुतविक्रमम्॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मयि स्नेहोऽस्ति चेद्ब्रह्मन्यदनुग्रहभागहम्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भगवान्नास्ति चेद्गुह्यं तच्च मे ब्रूहि साम्प्रतम्॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वैशम्पायनः शृणुष्वावहितो राजन्शुचिर्भूत्वा समाहितः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
क्षणं च कुरु राजेन्द्र गुह्यं वक्ष्यामि ते हितम्॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
धौम्येन तु यथाप्रोक्तं पार्थाय सुमहात्मने।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
नाम्नामष्टशतं पुण्यं तच्छृणुष्व महामते॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सूर्योऽर्यमा भगस्त्वष्टा पूषाऽर्कस्सविता रविः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
गभस्तिमानजः कालो मृत्युर्धाता प्रभाकरः॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पृथिव्यापश्च तेजश्च खं वायुश्च परायणम्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सोमो बृहस्पतिश्शुक्रो बुधोऽङ्गारक एव च॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इन्द्रो विवस्वान्दीप्तांशुश्शुचिश्शौरिश्शनैश्चरः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ब्रह्मा विष्णुश्च रुद्रश्च स्कन्दो वैश्रवणो यमः॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वैद्युतो जाठरश्चाग्निः ऐन्धनस्तेजसां पतिः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
धर्मध्वजो वेदकर्ता वेदाङ्गो वेदवाहनः॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कृतं त्रेता द्वापरश्च कलिस्सर्वामराश्रयः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कला काष्ठा मुहूर्ताश्च पक्षा मासा ऋतुस्तथा॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
संवत्सरकरोऽश्वत्थः कालचक्रो विभावसुः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पुरुषश्शाश्वतो योगी व्यक्ताव्यक्तस्सनातनः॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
लोकाध्यक्षस्सुराध्यक्षो विश्वकर्मा तमोनुदः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वरुणस्सागरोंशुश्च जीमूतो जीवनोऽरिहा॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भूताश्रयो भूतपतिस्सर्वभूतनिषेवितः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मणिस्सुवर्णो भूतादिः कामदस्सर्वतोमुखः॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जयो विशालो वरदश्शीघ्रगः प्राणधारणः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
धन्वन्तरिर्धूमकेतुः आदिदेवोऽदितेस्सुतः॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
द्वादशात्माऽरविन्दाक्षः पिता माता पितामहः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
स्वर्गद्वारं प्रजाद्वारं मोक्षद्वारं त्रिविष्टपम्॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
देवकर्ता प्रशान्तात्मा विश्वात्मा विश्वतोमुखः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
चराचरात्मा सूक्ष्मात्मा मैत्रेण वपुषाऽन्वितः॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
एतद्वै कीर्तनीयस्य सूर्यस्यैव महात्मनः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
नाम्नामष्टशतं पुण्यं शक्रेणोक्तं महात्मना॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शक्राच्च नारदः प्राप्तो धौम्यश्च तदनन्तरम्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
धौम्याद्युधिष्ठिरः प्राप्य सर्वान्कामानवाप्तवान्॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सुरपितृगणयक्षसेवितं निशिचरसिद्धगणैश्च वन्दितम्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वरकनकहुताशनप्रभं त्वमपि मनस्यभिधेहि भास्करम्॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सूर्योदये यस्सुसमाहितः पठेत्स पुत्रलाभं धनरत्नसञ्चयान्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
लभेत जातिस्मरतां सदा नरे धृतिं च मेधां च स विन्दते वराम्॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इमं स्तवं देववरस्य कीर्तयेच्छृणोति वा यस्सुमनास्समाहितः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
स मुच्यते शोकदवाग्निसागराल्लभेत कामान्मनसा यथेप्सितान्॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इति श्रीमिहाभारते वनपर्वणि अरण्यपर्वणि काम्यकवनप्रवेशे तृतीयोऽध्यायः॥ 3 ॥&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>ShraddhaV</name></author>
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		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://dharmawiki.org/index.php?title=Vanaparva_Adhyaya_3_(%E0%A4%B5%E0%A4%A8%E0%A4%AA%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%B5%E0%A4%A3%E0%A4%BF_%E0%A4%85%E0%A4%A7%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%AF%E0%A4%83_%E0%A5%A9)&amp;diff=119794"/>
		<updated>2019-07-10T10:41:16Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;ShraddhaV: slokas added&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;वैशम्पायन उवाच&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शौनकेनैवमुक्तस्तु कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पुरोहितमुपागम्य भ्रातृमध्येऽब्रवीदिदम्॥ 3-3-1&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
प्रस्थितं मानुयान्तीमे ब्राह्मणा वेदपारगाः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
न चास्मि पोषणे शक्तो बहुदुःखसमन्वितः॥ 3-3-2&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
परित्यक्तुं न शक्तोऽस्मि दानशक्तिश्च नास्ति मे।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कथमत्र मया कार्यं तद्ब्रूहि भगवन्मम॥ 3-3-3&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वैशम्पायन उवाच&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मुहूर्तमिव स ध्यात्वा धर्मेणान्विष्य तां गतिम्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
युधिष्ठिरमुवाचेदं धौम्यो धर्मभृतां वरः॥ 3-3-4&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
धौम्य उवाच&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पुरा सृष्टानि भूतानि पीड्यन्ते क्षुधया भृशम्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ततोऽनुकम्पया तेषां सविता स्वपिता यथा॥ 3-3-5&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
गत्वोत्तरायणं तेजो रसानुद्धृत्य रश्मिभिः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दक्षिणायनमावृत्तो महीं निविशते रविः॥ 3-3-6&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
क्षेत्रभूते ततस्तस्मिन्नोषधीरोषधीपतिः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दिवस्तेजः समुद्धृत्य जनयामास वारिणा॥ 3-3-7&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
निषिक्तश्चन्द्रतेजोभिः स्वयोनौ निर्गते रविः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ओषध्यः षड्रसा मेध्यास्तदन्नं प्राणिनां भुवि॥ 3-3-8&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
एवं भानुमयं ह्यन्नं भूतानां प्राणधारणम्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पितैष सर्वभूतानां तस्मात्तं शरणं व्रज॥ 3-3-9&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
राजानो हि महात्मानो योनिकर्मविशोधिताः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उद्धरन्ति प्रजाः सर्वास्तप आस्थाय पुष्कलम्॥ 3-3-10&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भीमेन कार्तवीर्येण वैन्येन नहुषेण च।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तपोयोगसमाधिस्थैरुद्धता ह्यापदः प्रजाः॥ 3-3-11&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तथा त्वमपि धर्मात्मन्कर्मणा च विशोधितः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तप आस्थाय धर्मेण द्विजातीन्भर भारत॥ 3-3-12&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जनमेजय उवाच&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कथं कुरूणामृषभः स तु राजा युधिष्ठिरः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
विप्रार्थमाराधितवान्सूर्यमद्भुतदर्शनम्॥ 3-3-13&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वैशम्पायन उवाच&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शृणुष्वावहितो राजञ्शुचिर्भूत्वा समाहितः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
क्षणं च कुरु राजेन्द्र सम्प्रवक्ष्याम्यशेषतः॥ 3-3-14&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
धौम्येन तु यथा पूर्वं पार्थाय सुमहात्मने।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
नामाष्टशतमाख्यातं तच्छृणुष्व महामते॥ 3-3-15&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
धौम्य उवाच&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सूर्योऽर्यमा भगस्त्वष्टा पूषार्कः सविता रविः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
गभस्तिमानजः कालो मृत्युर्धाता प्रभाकरः॥ 3-3-16&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पृथिव्यापश्च तेजश्च खं वायुश्च परायणम्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सोमो बृहस्पतिः शुक्रो बुधोऽङ्गारक एव च॥ 3-3-17&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इन्द्रो विवस्वान्दीप्तांशुः शुचिः शौरिः शनैश्चरः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ब्रह्मा विष्णुश्च रुद्रश्च स्कन्दो वै वरुणो यमः॥ 3-3-18&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वैद्युतो जाठरश्चाग्निरैन्धनस्तेजसां पतिः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
धर्मध्वजो वेदकर्ता वेदाङ्गो वेदवाहनः॥ 3-3-19&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कृतं त्रेता द्वापरश्च कलिः सर्वमलाश्रयः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कला काष्ठा मुहूर्ताश्च क्षपा यामस्तथा क्षणः॥ 3-3-20&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
संवत्सरकरोऽश्वत्थः कालचक्रो विभावसुः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पुरुषः शाश्वतो योगी व्यक्ताव्यक्तः सनातनः॥ 3-3-21&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कालाध्यक्षः प्रजाध्यक्षो विश्वकर्मा तमोनुदः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वरुणः सागरोंऽशुश्च जीमूतो जीवनोऽरिहा॥ 3-3-22&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भूताश्रयो भूतपतिः सर्वलोकनमस्कृतः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
स्रष्टा संवर्तको वह्निः सर्वस्यादिरलोलुपः॥ 3-3-23&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अनन्तः कपिलो भानुः कामदः सर्वतोमुखः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जयो विशालो वरदः सर्वधातुनिषेचिता॥ 3-3-24&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मनःसुपर्णो भूतादिः शीघ्रगः प्राणधारकः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
धन्वन्तरिर्धूमकेतुरादिदेवोऽदितेः सुतः॥ 3-3-25&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
द्वादशात्मारविन्दाक्षः पिता माता पितामहः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
स्वर्गद्वारं प्रजाद्वारं मोक्षद्वारं त्रिविष्टपम्॥ 3-3-26&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
देहकर्ता प्रशान्तात्मा विश्वात्मा विश्वतोमुखः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
चराचरात्मा सूक्ष्मात्मा मैत्रेयः करुणान्वितः॥ 3-3-27&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
एतद्वै कीर्तनीयस्य सूर्यस्यामिततेजसः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
नामाष्टशतकं चेदं प्रोक्तमेतत्स्वयंभुवा॥ 3-3-28&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सुरगणपितृयक्षसेवितं ह्यसुरनिशाचरसिद्धवन्दितम्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वरकनकहुताशनप्रभं प्रणिपतितोऽस्मि हिताय भास्करम्॥ 3-3-29&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सूर्योदये यः सुसमाहितः पठेत्स पुत्रदारान्धनरत्नसञ्चयान्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
लभेत जातिस्मरतां नरः सदा धृतिं च मेधां च स विन्दते पुमान्॥ 3-3-30&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इमं स्तवं देववरस्य यो नरः प्रकीर्तयेच्छुचिसुमनाः समाहितः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
विमुच्यते शोकदवाग्निसागराल्लभेत कामान्मनसा यथेप्सितान्॥ 3-3-31&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वैशम्पायन उवाच&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
एवमुक्तस्तु धौम्येन तत्कालसदृशं वचः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
विप्रत्यागसमाधिस्थः संयतात्मा दृढव्रतः॥ 3-3-32&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
धर्मराजो विशुद्धात्मा तप आतिष्ठदुत्तमम्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पुष्पोपहारैर्बलिभिरर्चयित्वा दिवाकरम्॥ 3-3-33&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सोऽवगाह्य जलं राजा देवस्याभिमुखोऽभवत्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
योगमास्थाय धर्मात्मा वायुभक्षो जितेन्द्रियः॥ 3-3-34&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
गाङ्गेयं वार्युपस्पृश्य प्राणायामेन तस्थिवान्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शुचिः प्रयतवाग्भूत्वा स्तोत्रमारब्धवांस्ततः॥ 3-3-35&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
युधिष्ठिर उवाच&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
त्वं भानो जगतश्चक्षुस्त्वमात्मा सर्वदेहिनाम्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
त्वं योनिः सर्वभूतानां त्वमाचारः क्रियावताम्॥ 3-3-36&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
त्वं गतिः सर्वसांख्यानां योगिनां त्वं परायणम्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अनावृतार्गलद्वारं त्वं गतिस्त्वं मुमुक्षताम्॥ 3-3-37&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
त्वया संधार्यते लोकस्त्वया लोकः प्रकाश्यते।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
त्वया पवित्रीक्रियते निर्व्याजं पाल्यते त्वया॥ 3-3-38&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
त्वामुपस्थाय काले तु ब्राह्मणा वेदपारगाः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
स्वशाखाविहितैर्मन्त्रैरर्चन्त्यृषिगणार्चितम्॥ 3-3-39&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तव दिव्यं रथं यान्तमनुयान्ति वरार्थिनः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सिद्धचारणगन्धर्वा यक्षगुह्यकपन्नगाः॥ 3-3-40&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
त्रयस्त्रिंशच्च वै देवास्तथा वैमानिका गणाः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सोपेन्द्राः समहेन्द्राश्च त्वामिष्ट्वा सिद्धिमागताः॥ 3-3-41&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उपयान्त्यर्चयित्वा तु त्वां वै प्राप्तमनोरथाः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दिव्यमन्दारमालाभिस्तूर्णं विद्याधरोत्तमाः॥ 3-3-42&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
गुह्याः पितृगणाः सप्त ये दिव्या ये च मानुषाः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ते पूजयित्वा त्वामेव गच्छन्त्याशु प्रधानताम्॥ 3-3-43&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वसवो मरुतो रुद्रा ये च साध्या मरीचिपाः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वालखिल्यादयः सिद्धाः श्रेष्ठत्वं प्राणिनां गताः॥ 3-3-44&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सब्रह्मकेषु लोकेषु सप्तस्वप्यखिलेषु च।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
न तद्भूतमहं मन्ये यदर्कादतिरिच्यते॥ 3-3-45&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सन्ति चान्यानि सत्त्वानि वीर्यवन्ति महान्ति च।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
न तु तेषां तथा दीप्तिः प्रभावो वा यथा तव॥ 3-3-46&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ज्योतींषि त्वयि सर्वाणि त्वं सर्वज्योतिषां पतिः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
त्वयि सत्यं च सत्त्वं च सर्वे भावाश्च सात्त्विकाः॥ 3-3-47&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
त्वत्तेजसा कृतं चक्रं सुनाभं विश्वकर्मणा।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
देवारीणां मदो येन नाशितः शार्ङ्गधन्वना॥ 3-3-48&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
त्वमादायांशुभिस्तेजो निदाघे सर्वदेहिनाम्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सर्वौषधिरसानां च पुनर्वर्षासु मुञ्चसि॥ 3-3-49&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तपन्त्यन्ये दहन्त्यन्ये गर्जन्त्यन्ये तथा घनाः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
विद्योतन्ते प्रवर्षन्ति तव प्रावृषि रश्मयः॥ 3-3-50&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
न तथा सुखयत्यग्निर्न प्रावारा न कम्बलाः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शीतवातार्दितं लोकं यथा तव मरीचयः॥ 3-3-51&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
त्रयोदशद्वीपवतीं गोभिर्भासयसे महीम्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
त्रयाणामपि लोकानां हितायैकः प्रवर्तसे॥ 3-3-52&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तव यद्युदयो न स्यादन्धं जगदिदं भवेत्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
न च धर्मार्थकामेषु प्रवर्तेरन्मनीषिणः॥ 3-3-53&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आधानपशुबन्धेष्टिमन्त्रयज्ञतपःक्रियाः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
त्वत्प्रसादादवाप्यन्ते ब्रह्मक्षत्रविशां गणैः॥ 3-3-54&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यदहर्ब्रह्मणः प्रोक्तं सहस्रयुगसम्मितम्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तस्य त्वमादिरन्तश्च कालज्ञैः परिकीर्तितः॥ 3-3-55&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मनूनां मनुपुत्राणां जगतोऽमानवस्य च।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मन्वन्तराणां सर्वेषामीश्वराणां त्वमीश्वरः॥ 3-3-56&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
संहारकाले सम्प्राप्ते तव क्रोधविनिःसृतः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
संवर्तकाग्निस्त्रैलोक्यं भस्मीकृत्यावतिष्ठते॥ 3-3-57&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
त्वद्दीधितिसमुत्पन्ना नानावर्णा महाघनाः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सैरावताः साशनयः कुर्वन्त्याभूतसम्प्लवम्॥ 3-3-58&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कृत्वा द्वादशधाऽऽत्मानं द्वादशादित्यतां गतः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
संहृत्यैकार्णवं सर्वं त्वं शोषयसि रश्मिभिः॥ 3-3-59&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
त्वामिन्द्रमाहुस्त्वं रुद्रस्त्वं विष्णुस्त्वं प्रजापतिः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
त्वमग्निस्त्वं मनः सूक्ष्मं प्रभुस्त्वं ब्रह्म शाश्वतम्॥ 3-3-60&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
त्वं हंसः सविता भानुरंशुमाली वृषाकपिः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
विवस्वान्मिहिरः पूषा मित्रो धर्मस्तथैव च॥ 3-3-61&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सहस्ररश्मिरादित्यस्तपनस्त्वं गवाम्पतिः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मार्तण्डोऽर्को रविः सूर्यः शरण्यो दिनकृत्तथा॥ 3-3-62&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दिवाकरः सप्तसप्तिर्धामकेशी विरोचनः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आशुगामी तमोघ्नश्च हरिताश्वश्च कीर्त्यसे॥ 3-3-63&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सप्तम्यामथवा षष्ठ्यां भक्त्या पूजां करोति यः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अनिर्विण्णोऽनहङ्कारी तं लक्ष्मीर्भजते नरम्॥ 3-3-64&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
न तेषामापदः सन्ति नाधयो व्याधयस्तथा।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ये तवानन्यमनसः कुर्वन्त्यर्चनवन्दनम्॥ 3-3-65&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सर्वरोगैर्विरहिताः सर्वपापविवर्जिताः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
त्वद्भावभक्ताः सुखिनो भवन्ति चिरजीविनः॥ 3-3-66&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
त्वं ममाप्यन्नकामस्य सर्वातिथ्यं चिकीर्षतः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अन्नमन्नपते दातुमभितः श्रद्धयार्हसि॥ 3-3-67&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ये च तेऽनुचराः सर्वे पादोपान्तं समाश्रिताः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
माठरारुणदण्डाद्यास्तांस्तान्वन्देऽशनिक्षुभान्॥ 3-3-68&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
क्षुभया सहिता मैत्री याश्चान्या भूतमातरः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ताश्च सर्वा नमस्यामि पान्तु मां शरणागतम्॥ 3-3-69&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वैशम्पायन उवाच&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
एवं स्तुतो महाराज भास्करो लोकभावनः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ततो दिवाकरः प्रीतो दर्शयामास पाण्डवम्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दीप्यमानः स्ववपुषा ज्वलन्निव हुताशनः॥ 3-3-70&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
विवस्वानुवाच&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यत्तेऽभिलषितं किञ्चित्तत्त्वं सर्वमवाप्स्यसि।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अहमन्नं प्रदास्यामि सप्त पञ्च च ते समाः॥ 3-3-71&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
फलमूलामिषं शाकं संस्कृतं यन्महानसे।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
गृह्णीष्व पिठरं ताम्रं मया दत्त नराधिप।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यावद्वर्त्स्यति पाञ्चाली पात्रेणानेन सुव्रत॥ 3-3-72&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
फलमूलामिषं शाकं संस्कृतं यन्महानसे।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
चतुर्विधं तदन्नाद्यमक्षय्यं ते भविष्यति।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
धनं च विविधं तुभ्यमित्युक्त्वान्तरधीयत॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इतश्चतुर्दशे वर्षे भूयो राज्यमवाप्स्यसि॥ 3-3-73&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वैशम्पायन उवाच&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
एवमुक्त्वा तु भगवांस्तत्रैवान्तरधीयत॥ 3-3-74&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इमं स्तवं प्रयतमनाः समाधिना पठेदिहान्योऽपि वरं समर्थयन्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तत्तस्य दद्याच्च रविर्मनीषितं तदाप्नुयाद्यद्यपि तत्सुदुर्लभम्॥ 3-3-74&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यश्चेदं धारयेन्नित्यं शृणुयाद्वाप्यभीक्ष्णशः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पुत्रार्थी लभते पुत्रं धनार्थी लभते धनम्॥ 3-3-75&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
विद्यार्थी लभते विद्यां पुरुषोऽप्यथवा स्त्रियः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उभे सन्ध्ये पठेन्नित्यं नारी वा पुरुषो यदि॥ 3-3-76&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आपदं प्राप्य मुच्येत बद्धो मुच्येत बन्धनात्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
एतद्ब्रह्मा ददौ पूर्वं शक्राय सुमहात्मने॥ 3-3-77&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शक्राच्च नारदः प्राप्तो धौम्यस्तु तदनन्तरम्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
धौम्याद्युधिष्ठिरः प्राप्य सर्वान्कामानवाप्तवान्॥ 3-3-78&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सङ्ग्रामे च जयेन्नित्यं विपुलं चाप्नुयाद्वसु।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मुच्यते सर्वपापेभ्यः सूर्यलोकं स गच्छति॥ 3-3-79&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वैशम्पायन उवाच&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
लब्ध्वा वरं तु कौन्तेयो जलादुत्तीर्य धर्मवित्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जग्राह पादौ धौम्यस्य भ्रातॄंश्च परिषस्वजे॥ 3-3-80&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
द्रौपद्या सह सङ्गम्य वन्द्यमानस्तया प्रभुः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
महानसे तदानीं तु साधयामास पाण्डवः॥ 3-3-81&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
संस्कृतं प्रसवं याति स्वल्पमन्नं चतुर्विधम्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अक्षय्यं वर्धते चान्नं तेन भोजयते द्विजान्॥ 3-3-82&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भुक्तवत्सु च विप्रेषु भोजयित्वानुजानपि।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शेषं विघससंज्ञं तु पश्चाद्भुङ्क्ते युधिष्ठिरः॥ 3-3-83&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
युधिष्ठिरं भोजयित्वा शेषमश्नाति पार्षती।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
द्रौपद्यां भुज्यमानायां तदन्नं क्षयमेति च।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
एवं दिवाकरात्प्राप्य दिवाकरसमप्रभः॥ 3-3-84&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कामान्मनोऽभिलषितान्ब्राह्मणेभ्योऽददात्प्रभुः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पुरोहितपुरोगाश्च तिथिनक्षत्रपर्वसु।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यज्ञियार्थाः प्रवर्तन्ते विधिमन्त्रप्रमाणतः॥ 3-3-85&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ततः कृतस्वस्त्ययना धौम्येन सह पाण्डवाः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
द्विजसङ्घैः परिवृताः प्रययुः काम्यकं वनम्॥ 3-3-86&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जनमेजयः पुष्पोपहारबलिभिर्बहुशश्च यथाविधि।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सर्वात्मभूतं सम्पूज्य यतप्राणो जितेन्द्रियः॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
स्तवेन केन विप्रर्षे स तु राजा युधिष्ठिरः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
विप्रार्थमाराधितवान्सूर्यमद्भुतविक्रमम्॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मयि स्नेहोऽस्ति चेद्ब्रह्मन्यदनुग्रहभागहम्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भगवान्नास्ति चेद्गुह्यं तच्च मे ब्रूहि साम्प्रतम्॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वैशम्पायनः शृणुष्वावहितो राजन्शुचिर्भूत्वा समाहितः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
क्षणं च कुरु राजेन्द्र गुह्यं वक्ष्यामि ते हितम्॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
धौम्येन तु यथाप्रोक्तं पार्थाय सुमहात्मने।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
नाम्नामष्टशतं पुण्यं तच्छृणुष्व महामते॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सूर्योऽर्यमा भगस्त्वष्टा पूषाऽर्कस्सविता रविः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
गभस्तिमानजः कालो मृत्युर्धाता प्रभाकरः॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पृथिव्यापश्च तेजश्च खं वायुश्च परायणम्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सोमो बृहस्पतिश्शुक्रो बुधोऽङ्गारक एव च॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इन्द्रो विवस्वान्दीप्तांशुश्शुचिश्शौरिश्शनैश्चरः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ब्रह्मा विष्णुश्च रुद्रश्च स्कन्दो वैश्रवणो यमः॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वैद्युतो जाठरश्चाग्निः ऐन्धनस्तेजसां पतिः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
धर्मध्वजो वेदकर्ता वेदाङ्गो वेदवाहनः॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कृतं त्रेता द्वापरश्च कलिस्सर्वामराश्रयः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कला काष्ठा मुहूर्ताश्च पक्षा मासा ऋतुस्तथा॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
संवत्सरकरोऽश्वत्थः कालचक्रो विभावसुः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पुरुषश्शाश्वतो योगी व्यक्ताव्यक्तस्सनातनः॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
लोकाध्यक्षस्सुराध्यक्षो विश्वकर्मा तमोनुदः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वरुणस्सागरोंशुश्च जीमूतो जीवनोऽरिहा॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भूताश्रयो भूतपतिस्सर्वभूतनिषेवितः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मणिस्सुवर्णो भूतादिः कामदस्सर्वतोमुखः॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जयो विशालो वरदश्शीघ्रगः प्राणधारणः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
धन्वन्तरिर्धूमकेतुः आदिदेवोऽदितेस्सुतः॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
द्वादशात्माऽरविन्दाक्षः पिता माता पितामहः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
स्वर्गद्वारं प्रजाद्वारं मोक्षद्वारं त्रिविष्टपम्॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
देवकर्ता प्रशान्तात्मा विश्वात्मा विश्वतोमुखः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
चराचरात्मा सूक्ष्मात्मा मैत्रेण वपुषाऽन्वितः॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
एतद्वै कीर्तनीयस्य सूर्यस्यैव महात्मनः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
नाम्नामष्टशतं पुण्यं शक्रेणोक्तं महात्मना॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शक्राच्च नारदः प्राप्तो धौम्यश्च तदनन्तरम्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
धौम्याद्युधिष्ठिरः प्राप्य सर्वान्कामानवाप्तवान्॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सुरपितृगणयक्षसेवितं निशिचरसिद्धगणैश्च वन्दितम्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वरकनकहुताशनप्रभं त्वमपि मनस्यभिधेहि भास्करम्॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सूर्योदये यस्सुसमाहितः पठेत्स पुत्रलाभं धनरत्नसञ्चयान्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
लभेत जातिस्मरतां सदा नरे धृतिं च मेधां च स विन्दते वराम्॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इमं स्तवं देववरस्य कीर्तयेच्छृणोति वा यस्सुमनास्समाहितः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
स मुच्यते शोकदवाग्निसागराल्लभेत कामान्मनसा यथेप्सितान्॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इति श्रीमिहाभारते वनपर्वणि अरण्यपर्वणि काम्यकवनप्रवेशे तृतीयोऽध्यायः॥ 3 ॥&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>ShraddhaV</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://dharmawiki.org/index.php?title=Vanaparva_Adhyaya_1_(%E0%A4%B5%E0%A4%A8%E0%A4%AA%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%B5%E0%A4%A3%E0%A4%BF_%E0%A4%85%E0%A4%A7%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%AF%E0%A4%83_%E0%A5%A7)&amp;diff=119793</id>
		<title>Vanaparva Adhyaya 1 (वनपर्वणि अध्यायः १)</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://dharmawiki.org/index.php?title=Vanaparva_Adhyaya_1_(%E0%A4%B5%E0%A4%A8%E0%A4%AA%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%B5%E0%A4%A3%E0%A4%BF_%E0%A4%85%E0%A4%A7%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%AF%E0%A4%83_%E0%A5%A7)&amp;diff=119793"/>
		<updated>2019-07-10T10:37:27Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;ShraddhaV: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;जनमेजय उवाच&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
 एवं द्यूतजिताः पार्थाः कोपिताश्च दुरात्मभिः।&lt;br /&gt;
 धार्तराष्ट्रैः सहामात्यैर्निकृत्या द्विजसत्तम॥ 3-1-1&lt;br /&gt;
 श्राविताः परुषा वाचः सृजद्भिर्वैरमुत्तमम्।&lt;br /&gt;
 किमकुर्वत कौरव्या मम पूर्वपितामहाः॥ 3-1-2&lt;br /&gt;
 कथं चैश्वर्यविभ्रष्टाः सहसा दुःखमेयुषः।&lt;br /&gt;
 वने विजह्रिरे पार्थाः शक्रप्रतिमतेजसः॥ 3-1-3&lt;br /&gt;
 के वै तानन्ववर्तन्त प्राप्तान्व्यसनमुत्तमम्।&lt;br /&gt;
 किमाचाराः किमाहाराः क्व च वासो महात्मनाम्॥ 3-1-4&lt;br /&gt;
 कथं च द्वादश समा वने तेषां महामुने।&lt;br /&gt;
 व्यतीयुर्ब्राह्मणश्रेष्ठ शूराणामरिघातिनाम्॥ 3-1-5&lt;br /&gt;
 [[:Category:Pandavas leave for exile|''Pandavas leave for exile'']]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
 कथं च राजपुत्री सा प्रवरा सर्वयोषिताम्।&lt;br /&gt;
 पतिव्रता महाभागा सततं सत्यवादिनी॥ 3-1-6&lt;br /&gt;
 वनवासमदुःखार्हा दारुणं प्रत्यपद्यत।&lt;br /&gt;
 एतदाचक्ष्व मे सर्वं विस्तरेण तपोधन॥ 3-1-7&lt;br /&gt;
 [[:Category:Pandavas leave for exile|''Pandavas leave for exile'']] [[:Category:Qualities of Draupadi|''Qualities of Draupadi'']] [[:Category:द्रौपदी|''द्रौपदी'']]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
 श्रोतुमिच्छामि चरितं भूरिद्रविणतेजसाम्।&lt;br /&gt;
 कथ्यमानं त्वया विप्र परं कौतूहलं हि मे॥ 3-1-8&lt;br /&gt;
 वैशम्पायन उवाच&lt;br /&gt;
 एवं द्यूतजिताः पार्थाः कोपिताश्च दुरात्मभिः।&lt;br /&gt;
 धार्तराष्ट्रैः सहामात्यैर्निर्ययुर्गजसाह्वयात्॥ 3-1-9&lt;br /&gt;
 वर्धमानपुरद्वारादभिनिष्क्रम्य पाण्डवाः।&lt;br /&gt;
 उदङ्मुखाः शस्त्रभृतः प्रययुः सह कृष्णया॥ 3-1-10&lt;br /&gt;
 इन्द्रसेनादयश्चैव भृत्याः परि चतुर्दश।&lt;br /&gt;
 रथैरनुययुः शीघ्रैः स्त्रिय आदाय सर्वशः॥ 3-1-11&lt;br /&gt;
 गतानेतान्विदित्वा तु पौराः शोकाभिपीडिताः।&lt;br /&gt;
 गर्हयन्तोऽसकृद्भीष्मविदुरद्रोणगौतमान्॥ 3-1-12&lt;br /&gt;
 [[:Category:Pandavas leave for exile|''Pandavas leave for exile'']]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
 ऊचुर्विगतसंत्रासाः समागम्य परस्परम्।&lt;br /&gt;
 पौरा ऊचुः।&lt;br /&gt;
 नेदमस्ति कुलं सर्वं न वयं न च नो गृहाः॥ 3-1-13&lt;br /&gt;
 यत्र दुर्योधनः पापः सौबलयेन[लेनाभि]पालितः।&lt;br /&gt;
 कर्णदुःशासनाभ्यां च राज्यमेतच्चिकीर्षति॥ 3-1-14&lt;br /&gt;
 न तत्कुलं न चाचारो न धर्मोऽर्थः कुतः सुखम्।&lt;br /&gt;
 यत्र पापसहायोऽयं पापो राज्यं चिकीर्षति॥ 3-1-15&lt;br /&gt;
 दुर्योधनो गुरुद्वेषी त्यक्ताचारसुहृज्जनः।&lt;br /&gt;
 अर्थलुब्धोऽभिमानी च नीचः प्रकृतिनिर्घृणः॥ 3-1-16&lt;br /&gt;
 नेयमस्ति मही कृत्स्ना यत्र दुर्योधनो नृपः।&lt;br /&gt;
 साधु गच्छामहे सर्वे यत्र गच्छन्ति पाण्डवाः॥ 3-1-17&lt;br /&gt;
 [[:Category:दुर्योधन|''दुर्योधन'']]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
 सानुक्रोशा महात्मानो विजितेन्द्रियशत्रवः।&lt;br /&gt;
 ह्रीमन्तः कीर्तिमन्तश्च धर्माचारपरायणाः॥ 3-1-18&lt;br /&gt;
 [[:Category:पांडव|''पांडव'']]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वैशम्पायन उवाच&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
एवमुक्त्वानुजग्मुस्ते पाण्डवांस्तान्समेत्य च।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ऊचुः प्राञ्जलयः सर्वे कौन्तेयान्माद्रिनन्दनान्॥ 3-1-19&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
क्व गमिष्यथ भद्रं वस्त्यक्त्वास्मान्दुःखभागिनः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वयमप्यनुयास्यामो यत्र यूयं गमिष्यथ॥ 3-1-20&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अधर्मेण जिताञ्छ्रुत्वा युष्मांस्त्यक्तघृणैः परैः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उद्विग्नाः स्मो भृशं सर्वे नास्मान्हातुमिहार्हथ॥ 3-1-21&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भक्तानुरक्तान्सुहृदः सदा प्रियहिते रतान्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कुराजाधिष्ठिते राज्ये न विनश्येम सर्वशः॥ 3-1-22&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
 श्रूयन्तां चाभिधास्यामो गुणदोषान्नरर्षभाः।&lt;br /&gt;
 शुभाशुभाधिवासेन संसर्गः कुरुते यथा॥ 3-1-23&lt;br /&gt;
 अपोवस्त्रं तिलान्[वस्त्रमापस्तिलान्] भूमिं गन्धो वासयते यथा।&lt;br /&gt;
 पुष्पाणामधिवासेन तथा संसर्गजा गुणाः॥ 3-1-24&lt;br /&gt;
 मोहजालस्य योनिर्हि मूढैरेव समागमः।&lt;br /&gt;
 अहन्यहनि धर्मस्य योनिः साधुसमागमः॥ 3-1-25&lt;br /&gt;
 तस्मात्प्राज्ञैश्च वृद्धैश्च सुस्वभावैस्तपस्विभिः।&lt;br /&gt;
 सद्भिश्च सह संसर्गः कार्यः शमपरायणैः॥ 3-1-26&lt;br /&gt;
 येषां त्रीण्यवदातानि विद्या योनिश्च कर्म च।&lt;br /&gt;
 ते सेव्यास्तैः समास्या हि शास्त्रेभ्योऽपि गरीयसी॥ 3-1-27&lt;br /&gt;
 निरारम्भा ह्यपि वयं पुण्यशीलेषु साधुषु।&lt;br /&gt;
 पुण्यमेवाप्नुयामेह पापं पापोपसेवनात्॥ 3-1-28&lt;br /&gt;
 असतां दर्शनात्स्पर्शात्संजल्पाच्च सहासनात्।&lt;br /&gt;
 धर्माचाराः प्रहीयन्ते सिद्ध्यन्ति च न मानवाः॥ 3-1-29&lt;br /&gt;
 बुद्धिश्च हीयते पुंसां नीचैः सह समागमात्।&lt;br /&gt;
 मध्यमैर्मध्यतां याति श्रेष्ठतां याति चोत्तमैः॥ 3-1-30&lt;br /&gt;
 अनीचैर्नाप्यविषयैर्नाधर्मिष्ठैर्विशेषतः।&lt;br /&gt;
 ये गुणाः कीर्तिता लोके धर्मकामार्थसम्भवाः।&lt;br /&gt;
 लोकाचारेषु सम्भूता वेदोक्ताः शिष्टसम्मताः॥ 3-1-31&lt;br /&gt;
 ते युष्मासु समस्ताश्च व्यस्ताश्चैवेह सद्गुणाः।&lt;br /&gt;
 इच्छामो गुणवन्मध्ये वस्तुं श्रेयोऽभिकाङ्क्षिणः॥ 3-1-32&lt;br /&gt;
 [[:Category:association|''association'']]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
युधिष्ठिर उवाच&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
 धन्या वयं यदस्माकं स्नेहकारुण्ययन्त्रिताः।&lt;br /&gt;
 असतोऽपि गुणानाहुर्ब्राह्मणप्रमुखाः प्रजाः॥ 3-1-33&lt;br /&gt;
 तदहं भ्रातृसहितः सर्वान्विज्ञापयामि वः।&lt;br /&gt;
 नान्यथा तद्धि कर्तव्यमस्मत्स्नेहानुकम्पया॥ 3-1-34&lt;br /&gt;
 भीष्मः पितामहो राजा विदुरो जननी च मे।&lt;br /&gt;
 सुहृज्जनश्च प्रायो मे नगरे नागसाह्वये॥ 3-1-35&lt;br /&gt;
 ते त्वस्मद्धितकामार्थं पालनीयाः प्रयत्नतः।&lt;br /&gt;
 युष्माभिः सहिताः सर्वे शोकसन्तापविह्वलाः॥ 3-1-36&lt;br /&gt;
 निवर्ततागता दूरं समागमनशापिताः।&lt;br /&gt;
 स्वजने न्यासभूते मे कार्या स्नेहान्विता मतिः॥ 3-1-37&lt;br /&gt;
 एतद्धि मम कार्याणां परमं हृदि संस्थितम्।&lt;br /&gt;
 कृता तेन तु तुष्टिर्मे सत्कारश्च भविष्यति॥ 3-1-38&lt;br /&gt;
 [[:Category:Duty|''Duty'']] [[:Category:Responsibility|''Responsibility'']]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वैशम्पायन उवाच&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
 तथानुमन्त्रितास्तेन धर्मराजेन ताः प्रजाः।&lt;br /&gt;
 चक्रुरार्तस्वरं घोरं हा राजन्निति संहताः॥ 3-1-39&lt;br /&gt;
 गुणान्पार्थस्य संस्मृत्य दुःखार्ताः परमातुराः।&lt;br /&gt;
 अकामाः सन्न्यवर्तन्त समागम्याथ पाण्डवान्॥ 3-1-40&lt;br /&gt;
 निवृत्तेषु तु पौरेषु रथानास्थाय पाण्डवाः।&lt;br /&gt;
 आजग्मुर्जाह्नवीतीरे प्रमाण आख्यं महावटम्॥ 3-1-41&lt;br /&gt;
 ते तं दिवसशेषेण वटं गत्वा तु पाण्डवाः।&lt;br /&gt;
 ऊषुस्तां रजनीं वीराः संस्पृश्य सलिलं शुचि॥ 3-1-42&lt;br /&gt;
 उदकेनैव तां रात्रिमूषुस्ते दुःखकर्षिताः।&lt;br /&gt;
 अनुजग्मुश्च तत्रैतान्स्नेहात्केचिद्द्विजातयः॥ 3-1-43&lt;br /&gt;
 साग्नयोऽनग्नयश्चैव सशिष्यगणबान्धवाः।&lt;br /&gt;
 स तैः परिवृतो राजा शुशुभे ब्रह्मवादिभिः॥ 3-1-44&lt;br /&gt;
 तेषां प्रादुष्कृताग्नीनां मुहूर्ते रम्यदारुणे।&lt;br /&gt;
 ब्रह्मघोषपुरस्कारः संजल्पः समजायत॥ 3-1-45&lt;br /&gt;
 राजानं तु कुरुश्रेष्ठं ते हंसमधुरस्वराः।&lt;br /&gt;
 आश्वासयन्तो विप्राग्र्याः क्षपां सर्वां व्यनोदयन्॥ 3-1-46&lt;br /&gt;
 [[:Category:वनवास|''वनवास'']]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
राजा तु भ्रातृभिस्सार्धं तथा सर्वैस्सुहृद्गणैः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अशेत तां निशां राजन्दुःखशोकसमाहितः॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि अरण्यपर्वणि पौरप्रत्यागमने प्रथमोऽध्यायः॥ 1 ॥&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>ShraddhaV</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://dharmawiki.org/index.php?title=Vanaparva_Adhyaya_2_(%E0%A4%B5%E0%A4%A8%E0%A4%AA%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%B5%E0%A4%A3%E0%A4%BF_%E0%A4%85%E0%A4%A7%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%AF%E0%A4%83_%E0%A5%A8)&amp;diff=119792</id>
		<title>Vanaparva Adhyaya 2 (वनपर्वणि अध्यायः २)</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://dharmawiki.org/index.php?title=Vanaparva_Adhyaya_2_(%E0%A4%B5%E0%A4%A8%E0%A4%AA%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%B5%E0%A4%A3%E0%A4%BF_%E0%A4%85%E0%A4%A7%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%AF%E0%A4%83_%E0%A5%A8)&amp;diff=119792"/>
		<updated>2019-07-10T10:36:07Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;ShraddhaV: slokas added&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;वैशम्पायन उवाच&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
प्रभातायां तु शर्वर्यां तेषामक्लिष्टकर्मणाम्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वनं यियासतां विप्रास्तस्थुर्भिक्षाभुजोऽग्रतः॥ 3-2-1&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तानुवाच ततो राजा कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वयं हि हृतसर्वस्वा हृतराज्या हृतश्रियः॥ 3-2-2&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
फलमूलाशनाहारा वनं गच्छाम दुःखिताः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वनं च दोषबहुलं बहुव्यालसरीसृपम्॥ 3-2-3&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
परिक्लेशश्च वो मन्ये ध्रुवं तत्र भविष्यति।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ब्राह्मणानां परिक्लेशो दैवतान्यपि सादयेत्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
किं पुनर्मामितो विप्रा निवर्तध्वं यथेष्टतः॥ 3-2-4&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ब्राह्मणा ऊचुः&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
गतिर्या भवतां राजंस्तां वयं गन्तुमुद्यताः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
नार्हस्यस्मान्परित्यक्तुं भक्तान्सद्धर्मदर्शिनः॥ 3-2-5&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अनुकम्पां हि भक्तेषु देवता ह्यपि कुर्वते।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
विशेषतो ब्राह्मणेषु सदाचारावलम्बिषु॥ 3-2-6&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
युधिष्ठिर उवाच&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ममापि परमा भक्तिर्ब्राह्मणेषु सदा द्विजाः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सहायविपरिभ्रंशस्त्वयं सादयतीव माम्॥ 3-2-7&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आहरेयुरिमे येऽपि फलमूलमृगांस्तथा[मधूनि च]।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
त इमे शोकजैर्दुःखैर्भ्रातरो मे विमोहिताः॥ 3-2-8&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
द्रौपद्या विप्रकर्षेण राज्यापहरणेन च।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दुःखार्दितानिमान्क्लेशैर्नाहं योक्तुमिहोत्सहे॥ 3-2-9&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ब्राह्मणा ऊचुः&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अस्मत्पोषणजा चिन्ता मा भूत्ते हृदि पार्थिव।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
स्वयमाहृत्य चान्नानि चोपयोक्षा[त्वानुयास्या]महे वयम्॥ 3-2-10&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अनुध्यानेन जप्येन विधास्यामः शिवं तव।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कथाभिश्चाभिरम्याभिः सह रंस्यामहे वयम्॥ 3-2-11&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
युधिष्ठिर उवाच&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
एवमेतन्न सन्देहो रमेऽहं सततं द्विजैः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मा[न्यू]नभावात्तु पश्यामि प्रत्यादेशमिवात्मनः॥ 3-2-12&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कथं द्रक्ष्यामि वः सर्वान्स्वयमाहृतभोजनान्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मद्भक्त्या क्लिश्यतोऽनर्हान्धिक्पापान्धृतराष्ट्रजान्॥ 3-2-13&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वैशम्पायन उवाच&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इत्युक्त्वा स नृपः शोचन्निषसाद महीतले।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तमध्यात्मरतो विद्वान्शौनको नाम वै द्विजः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
योगे सांख्ये च कुशलो राजानमिदमब्रवीत्॥ 3-2-14&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शोकस्थानसहस्राणि भयस्थानशतानि च।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दिवसे दिवसे मूढमाविशन्ति न पण्डितम्॥ 3-2-15&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
न हि ज्ञानविरुद्धेषु बहुदोषेषु कर्मसु।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
श्रेयोघातिषु सज्जन्ते बुद्धिमन्तो भवद्विधाः॥ 3-2-16&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अष्टाङ्गां बुद्धिमाहुर्यां सर्वाश्रेयोऽभिघातिनीम्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
श्रुतिस्मृतिसमायुक्तां राजन्सा त्वय्यवस्थिता॥ 3-2-17&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अर्थकृच्छ्रेषु दुर्गेषु व्यापत्सु स्वजनस्य च।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शारीरमानसैर्दुःखैर्न सीदन्ति भवद्विधाः॥ 3-2-18&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
श्रूयतां चाभिधास्यामि जनकेन यथा पुरा।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आत्मव्यवस्थानकरा गीताः श्लोका महात्मना॥ 3-2-19&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मनोदेहसमुत्थाभ्यां दुःखाभ्यामर्दितं जगत्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तयोर्व्याससमासाभ्यां शमोपायमिमं शृणु॥ 3-2-20&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
व्याधेरनिष्टसंस्पर्शाच्छ्रमादिष्टविवर्जनात्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दुःखं चतुर्भिः शारीरं कारणैः सम्प्रवर्तते॥ 3-2-21&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तदा तत्प्रतिकाराच्च सततं चाविचिन्तनात्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आधिव्याधिप्रशमनं क्रियायोगद्वयेन तु॥ 3-2-22&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मतिमन्तो ह्यतो वैद्याः शमं प्रागेव कुर्वते।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मानसस्य प्रियाख्यानैः सम्भोगोपनयैर्नृणाम्॥ 3-2-23&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मानसेन हि दुःखेन शरीरमुपतप्यते।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अयःपिण्डेन तप्तेन कुम्भसंस्थमिवोदकम्॥ 3-2-24&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मानसं शमयेत्तस्माज्ज्ञानेनाग्निमिवाम्बुना।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
प्रशान्ते मानसे ह्यस्य शारीरमुपशाम्यति॥ 3-2-25&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मनसो दुःखमूलं तु स्नेह इत्युपलभ्यते।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
स्नेहात्तु सज्जते जन्तुर्दुःखयोगमुपैति च॥ 3-2-26&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
स्नेहमूलानि दुःखानि स्नेहजानि भयानि च।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शोकहर्षौ तथाऽऽयासः सर्वं स्नेहात्प्रवर्तते॥ 3-2-27&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
स्नेहाद्भावोऽनुरागश्च प्रजज्ञे विषये तथा।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अश्रेयस्कावुभावेतौ पूर्वस्तत्र गुरुः स्मृतः॥ 3-2-28&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कोटराग्निर्यथाशेषं समूलं पादपं दहेत्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
धर्मार्थौ तु तथाल्पोऽपि रागदोषो विनाशयेत्॥ 3-2-29&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
विप्रयोगे न तु त्यागी दोषदर्शी समागमे।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
विरागं भजते जन्तुर्निर्वैरो निरवग्रहः॥ 3-2-30&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तस्मात्स्नेहं न लिप्सेत मित्रेभ्यो धनसञ्चयात्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
स्वशरीरसमुत्थं च ज्ञानेन विनिवर्तयेत्॥ 3-2-31&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ज्ञानान्वितेषु युक्तेषु शास्त्रज्ञेषु कृतात्मसु।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
न तेषु सज्जते स्नेहः पद्मपत्रेष्विवोदकम्॥ 3-2-32&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
रागाभिभूतः पुरुषः कामेन परिकृष्यते।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इच्छा सञ्जायते तस्य ततस्तृष्णा विवर्धते॥ 3-2-33&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तृष्णा हि सर्वपापिष्ठा नित्योद्वेगकरी स्मृता।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अधर्मबहुला चैव घोरा पापानुबन्धिनी॥ 3-2-34&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
या दुस्त्यजा दुर्मतिभिर्या न जीर्यति जीर्यतः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
योऽसौ प्राणान्तिको रोगस्तां तृष्णां त्यजतः सुखम्॥ 3-2-35&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अनाद्यन्ता तु सा तृष्णा अन्तर्देहगता नृणाम्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
विनाशयति भूतानि अयोनिज इवानलः॥ 3-2-36&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यथैधः स्वसमुत्थेन वह्निना नाशमृच्छति।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तथाकृतात्मा लोभेन सहजेन विनश्यति॥ 3-2-37&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
राजतः सलिलादग्नेश्चोरतः स्वजनादपि।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भयमर्थवतां नित्यं मृत्योः प्राणभृतामिव॥ 3-2-38&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यथा ह्यामिषमाकाशे पक्षिभिः श्वापदैर्भुवि।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भक्ष्यते सलिले मत्स्यैस्तथा सर्वत्र वित्तवान्॥ 3-2-39&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अर्थ एव हि केषाञ्चिदनर्थं भजते नृणाम्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अर्थश्रेयसि चासक्तो च श्रेयो विन्दते नरः॥ 3-2-40&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तस्मादर्थागमाः सर्वे मनोमोहविवर्धनाः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कार्पण्यं दर्पमानौ च भयमुद्वेग एव च॥ 3-2-41&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अर्थजानि विदुः प्राज्ञा दुःखान्येतानि देहिनाम्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अर्थस्योत्पादने चैव पालने च तथा क्षये॥ 3-2-42&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सहन्ति च महद्दुःखं घ्नन्ति चैवार्थकारणात्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अर्था दुःखं परित्यक्तुं पालिताश्चैव शत्रवः॥ 3-2-43&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दुःखेन चाधिगम्यन्ते तस्मान्नाशं न चिन्तयेत्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
असन्तोषपरा मूढाः सन्तोषं यान्ति पण्डिताः॥ 3-2-44&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अन्तो नास्ति पिपासायाः सन्तोषः परमं सुखम्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तस्मात्सन्तोषमेवेह परं पश्यन्ति पण्डिताः॥ 3-2-45&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अनित्यं यौवनं रूपं जीवितं रत्नसंचयः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ऐश्वर्यं प्रियसंवासो गृध्येत्तत्र न पण्डितः॥ 3-2-46&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
त्यजेत सञ्चयांस्तस्मात्तज्जान्क्लेशान्सहेत च।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
न हि सञ्चयवान्कश्चिद्दृश्यते निरुपद्रवः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अतश्च धार्मिकैः पुंभिरनीहार्थः प्रशस्यते॥ 3-2-47&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
धर्मार्थं यस्य वित्तेहा वरं तस्य निरीहता।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
प्रक्षालनाद्धि पङ्कस्य श्रेयो न स्पर्शनं नृणाम्॥ 3-2-48&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
युधिष्ठिरैवं सर्वेषु न स्पृहां कर्तुमर्हसि।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
धर्मेण यदि ते कार्यं विमुक्तेच्छो भवार्थतः॥ 3-2-49&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
युधिष्ठिर उवाच&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
नार्थोपभोगलिप्सार्थमियमर्थेप्सुता मम।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भरणार्थं तु विप्राणां ब्रह्मन्काङ्क्षे न लोभतः॥ 3-2-50&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कथं ह्यस्मद्विधो ब्रह्मन्वर्तमानो गृहाश्रमे।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भरणं पालनं चापि न कुर्यादनुयायिनाम्॥ 3-2-51&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
संविभागो हि भूतानां सर्वेषामेव दृश्यते।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तथैवापचमानेभ्यः प्रदेयं गृहमेधिना॥ 3-2-52&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तृणानि भूमिरुदकं वाक्चतुर्थी च सूनृता।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सतामेतानि गेहेषु नोच्छिद्यन्ते कदाचन॥ 3-2-53&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
देयमार्तस्य शयनं स्थितश्रान्तस्य चासनम्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तृषितस्य च पानीयं क्षुधितस्य च भोजनम्॥ 3-2-54&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
चक्षुर्दद्यान्मनो दद्याद्वाचं दद्यात्सुभाषिताम्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उत्थाय चासनं दद्यादेष धर्मः सनातनः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
प्रत्युत्थायाभिगमनं कुर्यान्न्यायेन चार्चनम्॥ 3-2-55&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अग्निहोत्रमनड्वांश्च ज्ञातयोऽतिथिबान्धवाः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पुत्रा दाराश्च भृत्याश्च निर्दहेयुरपूजिताः॥ 3-2-56&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आत्मार्थं पाचयेन्नान्नं न वृथा घातयेत्पशून्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
न च तत्स्वयमश्नीयाद्विधिवद्यन्न निर्वपेत्॥ 3-2-57&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
श्वभ्यश्च श्वपचेभ्यश्च वयोभ्यश्चावपेद्भुवि।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वैश्वदेवं हि नामैतत्सायं प्रातश्च दीयते॥ 3-2-58&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
विघसाशी भवेत्तस्मान्नित्यं चामृतभोजनः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
विघसो भुक्तशेषं तु यज्ञशेषं तथामृतम्॥ 3-2-59&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
चक्षुर्दद्यान्मनो दद्याद्वाचं दद्याच्च सूनृताम्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अनुव्रजेदुपासीत स यज्ञः पञ्चदक्षिणः॥ 3-2-60&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यो दद्यादपरिक्लिष्टमन्नमध्वनि वर्तते।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
श्रान्तायादृष्टपूर्वाय तस्य पुण्यफलं महत्॥ 3-2-61&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
एवं यो वर्तते वृत्तिं वर्तमानो गृहाश्रमे।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तस्य धर्मं परं प्राहुः कथं वा विप्र मन्यसे॥ 3-2-62&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शौनक उवाच&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अहो बत महत्कष्टं विपरीतमिदं जगत्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
येनापत्रपते साधुरसाधुस्तेन तुष्यति॥ 3-2-63&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शिश्नोदरकृतेऽप्राज्ञः करोति विघसं बहु।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मोहरागवशाक्रान्त इन्द्रियार्थवशानुगः॥ 3-2-64&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ह्रियते बुध्यमानोऽपि नरो हारिभिरिन्द्रियैः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
विमूढसंज्ञो दुष्टाश्वैरुद्भान्तैरिव सारथिः॥ 3-2-65&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
षडिन्द्रियाणि विषयं समागच्छन्ति वै यदा।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तदा प्रादुर्भवत्येषां पूर्वसङ्कल्पजं मनः॥ 3-2-66&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मनो यस्येन्द्रियस्येह विषयान्याति सेवितुम्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तस्यौत्सुक्यं सम्भवति प्रवृत्तिश्चोपजायते॥ 3-2-67&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ततः सङ्कल्पबीजेन कामेन विषयेषुभिः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
विद्धः पतति लोभाग्नौ ज्योतिर्लोभात्पतङ्गवत्॥ 3-2-68&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ततो विहारैराहारैर्मोहितश्च यथेप्सया।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
महामोहे सुखे मग्नो नात्मानमवबुध्यते॥ 3-2-69&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
एवं पतति संसारे तासु तास्विह योनिषु।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अविद्याकर्मतृष्णाभिर्भ्राम्यमाणोऽथ चक्रवत्॥ 3-2-70&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ब्रह्मादिषु तृणान्तेषु भूतेषु परिवर्तते।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जले भुवि तथाऽऽकाशे जायमानः पुनः पुनः॥ 3-2-71&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अबुधानां गतिस्त्वेषा बुधानामपि मे शृणु।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ये धर्मे श्रेयसि रता विमोक्षरतयो जनाः॥ 3-2-72&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तदिदं वेदवचनं कुरु कर्म त्यजेति च।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तस्माद्धर्मानिमान्सर्वान्नाभिमानात्समाचरेत्॥ 3-2-73&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इज्याध्ययनदानानि तपः सत्यं क्षमा दमः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अलोभ इति मार्गोऽयं धर्मस्याष्टविधः स्मृतः॥ 3-2-74&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अत्र पूर्वश्चतुर्वर्गः पितृयाणपथे स्थितः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कर्तव्यमिति यत्कार्यं नाभिमानात्समाचरेत्॥ 3-2-75&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उत्तरो देवयानस्तु सद्भिराचरितः सदा।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अष्टाङ्गेनैव मार्गेण विशुद्धात्मा समाचरेत्॥ 3-2-76&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सम्यक्सङ्कल्पसम्बन्धात्सम्यक्चेन्द्रियनिग्रहात्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सम्यग्व्रतविशेषाच्च सम्यक्च गुरुसेवनात्॥ 3-2-77&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सम्यगाहारयोगाच्च सम्यक्चाध्ययनागमात्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सम्यक्कर्मोपसन्न्यासात्सम्यक्चित्तनिरोधनात्॥ 3-2-78&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
एवं कर्माणि कुर्वन्ति संसारविजिगीषवः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
रागद्वेषविनिर्मुक्ता ऐश्वर्यं देवता गताः॥ 3-2-79&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
रुद्राः साध्यास्तथाऽऽदित्या वसवोऽथ तथाश्विनौ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
योगैश्वर्येण संयुक्ता धारयन्ति प्रजा इमाः॥ 3-2-80&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तथा त्वमपि कौन्तेय शममास्थाय पुष्कलम्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तपसा सिद्धिमन्विच्छ योगसिद्धिं च भारत॥ 3-2-81&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पितृमातृमयी सिद्धिः प्राप्ता कर्ममयी च ते।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तपसा सिद्धिमन्विच्छ द्विजानां भरणाय वै॥ 3-2-82&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सिद्धा हि यद्यदिच्छन्ति कुर्वते तदनुग्रहात्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तस्मात्तपः समास्थाय कुरुष्वात्ममनोरथम्॥ 3-2-83&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि अरण्यपर्वणि पाण्डवानां प्रव्रजने द्वितीयोऽध्यायः॥ 2 ॥&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>ShraddhaV</name></author>
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	<entry>
		<id>https://dharmawiki.org/index.php?title=Vanaparva_Adhyaya_1_(%E0%A4%B5%E0%A4%A8%E0%A4%AA%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%B5%E0%A4%A3%E0%A4%BF_%E0%A4%85%E0%A4%A7%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%AF%E0%A4%83_%E0%A5%A7)&amp;diff=119758</id>
		<title>Vanaparva Adhyaya 1 (वनपर्वणि अध्यायः १)</title>
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		<updated>2019-07-09T06:40:45Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;ShraddhaV: Adding tags&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;जनमेजय उवाच&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
 एवं द्यूतजिताः पार्थाः कोपिताश्च दुरात्मभिः।&lt;br /&gt;
 धार्तराष्ट्रैः सहामात्यैर्निकृत्या द्विजसत्तम॥ 3-1-1&lt;br /&gt;
 श्राविताः परुषा वाचः सृजद्भिर्वैरमुत्तमम्।&lt;br /&gt;
 किमकुर्वत कौरव्या मम पूर्वपितामहाः॥ 3-1-2&lt;br /&gt;
 कथं चैश्वर्यविभ्रष्टाः सहसा दुःखमेयुषः।&lt;br /&gt;
 वने विजह्रिरे पार्थाः शक्रप्रतिमतेजसः॥ 3-1-3&lt;br /&gt;
 के वै तानन्ववर्तन्त प्राप्तान्व्यसनमुत्तमम्।&lt;br /&gt;
 किमाचाराः किमाहाराः क्व च वासो महात्मनाम्॥ 3-1-4&lt;br /&gt;
 कथं च द्वादश समा वने तेषां महामुने।&lt;br /&gt;
 व्यतीयुर्ब्राह्मणश्रेष्ठ शूराणामरिघातिनाम्॥ 3-1-5&lt;br /&gt;
 [[:Category:Pandavas leave for exile|''Pandavas leave for exile'']]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
 कथं च राजपुत्री सा प्रवरा सर्वयोषिताम्।&lt;br /&gt;
 पतिव्रता महाभागा सततं सत्यवादिनी॥ 3-1-6&lt;br /&gt;
 वनवासमदुःखार्हा दारुणं प्रत्यपद्यत।&lt;br /&gt;
 एतदाचक्ष्व मे सर्वं विस्तरेण तपोधन॥ 3-1-7&lt;br /&gt;
 [[:Category:Pandavas leave for exile|''Pandavas leave for exile'']] [[:Category:Qualities of Draupadi|''Qualities of Draupadi'']] [[:Category:द्रौपदी|''द्रौपदी'']]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
 श्रोतुमिच्छामि चरितं भूरिद्रविणतेजसाम्।&lt;br /&gt;
 कथ्यमानं त्वया विप्र परं कौतूहलं हि मे॥ 3-1-8&lt;br /&gt;
 वैशम्पायन उवाच&lt;br /&gt;
 एवं द्यूतजिताः पार्थाः कोपिताश्च दुरात्मभिः।&lt;br /&gt;
 धार्तराष्ट्रैः सहामात्यैर्निर्ययुर्गजसाह्वयात्॥ 3-1-9&lt;br /&gt;
 वर्धमानपुरद्वारादभिनिष्क्रम्य पाण्डवाः।&lt;br /&gt;
 उदङ्मुखाः शस्त्रभृतः प्रययुः सह कृष्णया॥ 3-1-10&lt;br /&gt;
 इन्द्रसेनादयश्चैव भृत्याः परि चतुर्दश।&lt;br /&gt;
 रथैरनुययुः शीघ्रैः स्त्रिय आदाय सर्वशः॥ 3-1-11&lt;br /&gt;
 गतानेतान्विदित्वा तु पौराः शोकाभिपीडिताः।&lt;br /&gt;
 गर्हयन्तोऽसकृद्भीष्मविदुरद्रोणगौतमान्॥ 3-1-12&lt;br /&gt;
 [[:Category:Pandavas leave for exile|''Pandavas leave for exile'']]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
 ऊचुर्विगतसंत्रासाः समागम्य परस्परम्।&lt;br /&gt;
 पौरा ऊचुः।&lt;br /&gt;
 नेदमस्ति कुलं सर्वं न वयं न च नो गृहाः॥ 3-1-13&lt;br /&gt;
 यत्र दुर्योधनः पापः सौबलयेन[लेनाभि]पालितः।&lt;br /&gt;
 कर्णदुःशासनाभ्यां च राज्यमेतच्चिकीर्षति॥ 3-1-14&lt;br /&gt;
 न तत्कुलं न चाचारो न धर्मोऽर्थः कुतः सुखम्।&lt;br /&gt;
 यत्र पापसहायोऽयं पापो राज्यं चिकीर्षति॥ 3-1-15&lt;br /&gt;
 दुर्योधनो गुरुद्वेषी त्यक्ताचारसुहृज्जनः।&lt;br /&gt;
 अर्थलुब्धोऽभिमानी च नीचः प्रकृतिनिर्घृणः॥ 3-1-16&lt;br /&gt;
 नेयमस्ति मही कृत्स्ना यत्र दुर्योधनो नृपः।&lt;br /&gt;
 साधु गच्छामहे सर्वे यत्र गच्छन्ति पाण्डवाः॥ 3-1-17&lt;br /&gt;
 [[:Category:दुर्योधन|''दुर्योधन'']]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
 सानुक्रोशा महात्मानो विजितेन्द्रियशत्रवः।&lt;br /&gt;
 ह्रीमन्तः कीर्तिमन्तश्च धर्माचारपरायणाः॥ 3-1-18&lt;br /&gt;
 [[:Category:पांडव|''पांडव'']]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वैशम्पायन उवाच&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
एवमुक्त्वानुजग्मुस्ते पाण्डवांस्तान्समेत्य च।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ऊचुः प्राञ्जलयः सर्वे कौन्तेयान्माद्रिनन्दनान्॥ 3-1-19&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
क्व गमिष्यथ भद्रं वस्त्यक्त्वास्मान्दुःखभागिनः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वयमप्यनुयास्यामो यत्र यूयं गमिष्यथ॥ 3-1-20&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अधर्मेण जिताञ्छ्रुत्वा युष्मांस्त्यक्तघृणैः परैः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उद्विग्नाः स्मो भृशं सर्वे नास्मान्हातुमिहार्हथ॥ 3-1-21&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भक्तानुरक्तान्सुहृदः सदा प्रियहिते रतान्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कुराजाधिष्ठिते राज्ये न विनश्येम सर्वशः॥ 3-1-22&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
 श्रूयन्तां चाभिधास्यामो गुणदोषान्नरर्षभाः।&lt;br /&gt;
 शुभाशुभाधिवासेन संसर्गः कुरुते यथा॥ 3-1-23&lt;br /&gt;
 अपोवस्त्रं तिलान्[वस्त्रमापस्तिलान्] भूमिं गन्धो वासयते यथा।&lt;br /&gt;
 पुष्पाणामधिवासेन तथा संसर्गजा गुणाः॥ 3-1-24&lt;br /&gt;
 मोहजालस्य योनिर्हि मूढैरेव समागमः।&lt;br /&gt;
 अहन्यहनि धर्मस्य योनिः साधुसमागमः॥ 3-1-25&lt;br /&gt;
 तस्मात्प्राज्ञैश्च वृद्धैश्च सुस्वभावैस्तपस्विभिः।&lt;br /&gt;
 सद्भिश्च सह संसर्गः कार्यः शमपरायणैः॥ 3-1-26&lt;br /&gt;
 येषां त्रीण्यवदातानि विद्या योनिश्च कर्म च।&lt;br /&gt;
 ते सेव्यास्तैः समास्या हि शास्त्रेभ्योऽपि गरीयसी॥ 3-1-27&lt;br /&gt;
 निरारम्भा ह्यपि वयं पुण्यशीलेषु साधुषु।&lt;br /&gt;
 पुण्यमेवाप्नुयामेह पापं पापोपसेवनात्॥ 3-1-28&lt;br /&gt;
 असतां दर्शनात्स्पर्शात्संजल्पाच्च सहासनात्।&lt;br /&gt;
 धर्माचाराः प्रहीयन्ते सिद्ध्यन्ति च न मानवाः॥ 3-1-29&lt;br /&gt;
 बुद्धिश्च हीयते पुंसां नीचैः सह समागमात्।&lt;br /&gt;
 मध्यमैर्मध्यतां याति श्रेष्ठतां याति चोत्तमैः॥ 3-1-30&lt;br /&gt;
 अनीचैर्नाप्यविषयैर्नाधर्मिष्ठैर्विशेषतः।&lt;br /&gt;
 ये गुणाः कीर्तिता लोके धर्मकामार्थसम्भवाः।&lt;br /&gt;
 लोकाचारेषु सम्भूता वेदोक्ताः शिष्टसम्मताः॥ 3-1-31&lt;br /&gt;
 ते युष्मासु समस्ताश्च व्यस्ताश्चैवेह सद्गुणाः।&lt;br /&gt;
 इच्छामो गुणवन्मध्ये वस्तुं श्रेयोऽभिकाङ्क्षिणः॥ 3-1-32&lt;br /&gt;
 [[:Category:association|''association'']]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
युधिष्ठिर उवाच&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
 धन्या वयं यदस्माकं स्नेहकारुण्ययन्त्रिताः।&lt;br /&gt;
 असतोऽपि गुणानाहुर्ब्राह्मणप्रमुखाः प्रजाः॥ 3-1-33&lt;br /&gt;
 तदहं भ्रातृसहितः सर्वान्विज्ञापयामि वः।&lt;br /&gt;
 नान्यथा तद्धि कर्तव्यमस्मत्स्नेहानुकम्पया॥ 3-1-34&lt;br /&gt;
 भीष्मः पितामहो राजा विदुरो जननी च मे।&lt;br /&gt;
 सुहृज्जनश्च प्रायो मे नगरे नागसाह्वये॥ 3-1-35&lt;br /&gt;
 ते त्वस्मद्धितकामार्थं पालनीयाः प्रयत्नतः।&lt;br /&gt;
 युष्माभिः सहिताः सर्वे शोकसन्तापविह्वलाः॥ 3-1-36&lt;br /&gt;
 निवर्ततागता दूरं समागमनशापिताः।&lt;br /&gt;
 स्वजने न्यासभूते मे कार्या स्नेहान्विता मतिः॥ 3-1-37&lt;br /&gt;
 एतद्धि मम कार्याणां परमं हृदि संस्थितम्।&lt;br /&gt;
 कृता तेन तु तुष्टिर्मे सत्कारश्च भविष्यति॥ 3-1-38&lt;br /&gt;
 [[:Category:Duty|''Duty'']] [[:Category:Responsibility|''Responsibility'']]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वैशम्पायन उवाच&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
 तथानुमन्त्रितास्तेन धर्मराजेन ताः प्रजाः।&lt;br /&gt;
 चक्रुरार्तस्वरं घोरं हा राजन्निति संहताः॥ 3-1-39&lt;br /&gt;
 गुणान्पार्थस्य संस्मृत्य दुःखार्ताः परमातुराः।&lt;br /&gt;
 अकामाः सन्न्यवर्तन्त समागम्याथ पाण्डवान्॥ 3-1-40&lt;br /&gt;
 निवृत्तेषु तु पौरेषु रथानास्थाय पाण्डवाः।&lt;br /&gt;
 आजग्मुर्जाह्नवीतीरे प्रमाण आख्यं महावटम्॥ 3-1-41&lt;br /&gt;
 ते तं दिवसशेषेण वटं गत्वा तु पाण्डवाः।&lt;br /&gt;
 ऊषुस्तां रजनीं वीराः संस्पृश्य सलिलं शुचि॥ 3-1-42&lt;br /&gt;
 उदकेनैव तां रात्रिमूषुस्ते दुःखकर्षिताः।&lt;br /&gt;
 अनुजग्मुश्च तत्रैतान्स्नेहात्केचिद्द्विजातयः॥ 3-1-43&lt;br /&gt;
 साग्नयोऽनग्नयश्चैव सशिष्यगणबान्धवाः।&lt;br /&gt;
 स तैः परिवृतो राजा शुशुभे ब्रह्मवादिभिः॥ 3-1-44&lt;br /&gt;
 तेषां प्रादुष्कृताग्नीनां मुहूर्ते रम्यदारुणे।&lt;br /&gt;
 ब्रह्मघोषपुरस्कारः संजल्पः समजायत॥ 3-1-45&lt;br /&gt;
 राजानं तु कुरुश्रेष्ठं ते हंसमधुरस्वराः।&lt;br /&gt;
 आश्वासयन्तो विप्राग्र्याः क्षपां सर्वां व्यनोदयन्॥ 3-1-46&lt;br /&gt;
 [[:Category:वनवास|''वनवास'']]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
@राजा तु भ्रातृभिस्सार्धं तथा सर्वैस्सुहृद्गणैः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अशेत तां निशां राजन्दुःखशोकसमाहितः॥@&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि अरण्यपर्वणि पौरप्रत्यागमने प्रथमोऽध्यायः॥ 1 ॥&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>ShraddhaV</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://dharmawiki.org/index.php?title=Vanaparva_Adhyaya_1_(%E0%A4%B5%E0%A4%A8%E0%A4%AA%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%B5%E0%A4%A3%E0%A4%BF_%E0%A4%85%E0%A4%A7%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%AF%E0%A4%83_%E0%A5%A7)&amp;diff=119739</id>
		<title>Vanaparva Adhyaya 1 (वनपर्वणि अध्यायः १)</title>
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		<updated>2019-07-08T12:53:26Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;ShraddhaV: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;जनमेजय उवाच&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
एवं द्यूतजिताः पार्थाः कोपिताश्च दुरात्मभिः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
धार्तराष्ट्रैः सहामात्यैर्निकृत्या द्विजसत्तम॥ 3-1-1&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
श्राविताः परुषा वाचः सृजद्भिर्वैरमुत्तमम्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
किमकुर्वत कौरव्या मम पूर्वपितामहाः॥ 3-1-2&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कथं चैश्वर्यविभ्रष्टाः सहसा दुःखमेयुषः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वने विजह्रिरे पार्थाः शक्रप्रतिमतेजसः॥ 3-1-3&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
के वै तानन्ववर्तन्त प्राप्तान्व्यसनमुत्तमम्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
किमाचाराः किमाहाराः क्व च वासो महात्मनाम्॥ 3-1-4&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कथं च द्वादश समा वने तेषां महामुने।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
व्यतीयुर्ब्राह्मणश्रेष्ठ शूराणामरिघातिनाम्॥ 3-1-5&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कथं च राजपुत्री सा प्रवरा सर्वयोषिताम्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पतिव्रता महाभागा सततं सत्यवादिनी॥ 3-1-6&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वनवासमदुःखार्हा दारुणं प्रत्यपद्यत।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
एतदाचक्ष्व मे सर्वं विस्तरेण तपोधन॥ 3-1-7&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
श्रोतुमिच्छामि चरितं भूरिद्रविणतेजसाम्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कथ्यमानं त्वया विप्र परं कौतूहलं हि मे॥ 3-1-8&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वैशम्पायन उवाच&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
एवं द्यूतजिताः पार्थाः कोपिताश्च दुरात्मभिः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
धार्तराष्ट्रैः सहामात्यैर्निर्ययुर्गजसाह्वयात्॥ 3-1-9&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वर्धमानपुरद्वारादभिनिष्क्रम्य पाण्डवाः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उदङ्मुखाः शस्त्रभृतः प्रययुः सह कृष्णया॥ 3-1-10&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इन्द्रसेनादयश्चैव भृत्याः परि चतुर्दश।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
रथैरनुययुः शीघ्रैः स्त्रिय आदाय सर्वशः॥ 3-1-11&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
गतानेतान्विदित्वा तु पौराः शोकाभिपीडिताः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
गर्हयन्तोऽसकृद्भीष्मविदुरद्रोणगौतमान्॥ 3-1-12&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ऊचुर्विगतसंत्रासाः समागम्य परस्परम्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पौरा ऊचुः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
नेदमस्ति कुलं सर्वं न वयं न च नो गृहाः॥ 3-1-13&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यत्र दुर्योधनः पापः सौबलयेन[लेनाभि]पालितः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कर्णदुःशासनाभ्यां च राज्यमेतच्चिकीर्षति॥ 3-1-14&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
न तत्कुलं न चाचारो न धर्मोऽर्थः कुतः सुखम्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यत्र पापसहायोऽयं पापो राज्यं चिकीर्षति॥ 3-1-15&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दुर्योधनो गुरुद्वेषी त्यक्ताचारसुहृज्जनः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अर्थलुब्धोऽभिमानी च नीचः प्रकृतिनिर्घृणः॥ 3-1-16&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
नेयमस्ति मही कृत्स्ना यत्र दुर्योधनो नृपः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
साधु गच्छामहे सर्वे यत्र गच्छन्ति पाण्डवाः॥ 3-1-17&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सानुक्रोशा महात्मानो विजितेन्द्रियशत्रवः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ह्रीमन्तः कीर्तिमन्तश्च धर्माचारपरायणाः॥ 3-1-18&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वैशम्पायन उवाच&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
एवमुक्त्वानुजग्मुस्ते पाण्डवांस्तान्समेत्य च।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ऊचुः प्राञ्जलयः सर्वे कौन्तेयान्माद्रिनन्दनान्॥ 3-1-19&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
क्व गमिष्यथ भद्रं वस्त्यक्त्वास्मान्दुःखभागिनः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वयमप्यनुयास्यामो यत्र यूयं गमिष्यथ॥ 3-1-20&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अधर्मेण जिताञ्छ्रुत्वा युष्मांस्त्यक्तघृणैः परैः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उद्विग्नाः स्मो भृशं सर्वे नास्मान्हातुमिहार्हथ॥ 3-1-21&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भक्तानुरक्तान्सुहृदः सदा प्रियहिते रतान्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कुराजाधिष्ठिते राज्ये न विनश्येम सर्वशः॥ 3-1-22&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
श्रूयन्तां चाभिधास्यामो गुणदोषान्नरर्षभाः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शुभाशुभाधिवासेन संसर्गः कुरुते यथा॥ 3-1-23&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अपोवस्त्रं तिलान्[वस्त्रमापस्तिलान्] भूमिं गन्धो वासयते यथा।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पुष्पाणामधिवासेन तथा संसर्गजा गुणाः॥ 3-1-24&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मोहजालस्य योनिर्हि मूढैरेव समागमः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अहन्यहनि धर्मस्य योनिः साधुसमागमः॥ 3-1-25&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तस्मात्प्राज्ञैश्च वृद्धैश्च सुस्वभावैस्तपस्विभिः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सद्भिश्च सह संसर्गः कार्यः शमपरायणैः॥ 3-1-26&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
येषां त्रीण्यवदातानि विद्या योनिश्च कर्म च।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ते सेव्यास्तैः समास्या हि शास्त्रेभ्योऽपि गरीयसी॥ 3-1-27&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
निरारम्भा ह्यपि वयं पुण्यशीलेषु साधुषु।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पुण्यमेवाप्नुयामेह पापं पापोपसेवनात्॥ 3-1-28&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
असतां दर्शनात्स्पर्शात्संजल्पाच्च सहासनात्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
धर्माचाराः प्रहीयन्ते सिद्ध्यन्ति च न मानवाः॥ 3-1-29&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बुद्धिश्च हीयते पुंसां नीचैः सह समागमात्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मध्यमैर्मध्यतां याति श्रेष्ठतां याति चोत्तमैः॥ 3-1-30&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अनीचैर्नाप्यविषयैर्नाधर्मिष्ठैर्विशेषतः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ये गुणाः कीर्तिता लोके धर्मकामार्थसम्भवाः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
लोकाचारेषु सम्भूता वेदोक्ताः शिष्टसम्मताः॥ 3-1-31&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ते युष्मासु समस्ताश्च व्यस्ताश्चैवेह सद्गुणाः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इच्छामो गुणवन्मध्ये वस्तुं श्रेयोऽभिकाङ्क्षिणः॥ 3-1-32&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
युधिष्ठिर उवाच&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
धन्या वयं यदस्माकं स्नेहकारुण्ययन्त्रिताः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
असतोऽपि गुणानाहुर्ब्राह्मणप्रमुखाः प्रजाः॥ 3-1-33&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तदहं भ्रातृसहितः सर्वान्विज्ञापयामि वः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
नान्यथा तद्धि कर्तव्यमस्मत्स्नेहानुकम्पया॥ 3-1-34&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भीष्मः पितामहो राजा विदुरो जननी च मे।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सुहृज्जनश्च प्रायो मे नगरे नागसाह्वये॥ 3-1-35&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ते त्वस्मद्धितकामार्थं पालनीयाः प्रयत्नतः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
युष्माभिः सहिताः सर्वे शोकसन्तापविह्वलाः॥ 3-1-36&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
निवर्ततागता दूरं समागमनशापिताः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
स्वजने न्यासभूते मे कार्या स्नेहान्विता मतिः॥ 3-1-37&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
एतद्धि मम कार्याणां परमं हृदि संस्थितम्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कृता तेन तु तुष्टिर्मे सत्कारश्च भविष्यति॥ 3-1-38&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वैशम्पायन उवाच&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तथानुमन्त्रितास्तेन धर्मराजेन ताः प्रजाः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
चक्रुरार्तस्वरं घोरं हा राजन्निति संहताः॥ 3-1-39&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
गुणान्पार्थस्य संस्मृत्य दुःखार्ताः परमातुराः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अकामाः सन्न्यवर्तन्त समागम्याथ पाण्डवान्॥ 3-1-40&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
निवृत्तेषु तु पौरेषु रथानास्थाय पाण्डवाः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आजग्मुर्जाह्नवीतीरे प्रमाण आख्यं महावटम्॥ 3-1-41&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ते तं दिवसशेषेण वटं गत्वा तु पाण्डवाः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ऊषुस्तां रजनीं वीराः संस्पृश्य सलिलं शुचि॥ 3-1-42&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उदकेनैव तां रात्रिमूषुस्ते दुःखकर्षिताः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अनुजग्मुश्च तत्रैतान्स्नेहात्केचिद्द्विजातयः॥ 3-1-43&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
साग्नयोऽनग्नयश्चैव सशिष्यगणबान्धवाः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
स तैः परिवृतो राजा शुशुभे ब्रह्मवादिभिः॥ 3-1-44&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तेषां प्रादुष्कृताग्नीनां मुहूर्ते रम्यदारुणे।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ब्रह्मघोषपुरस्कारः संजल्पः समजायत॥ 3-1-45&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
राजानं तु कुरुश्रेष्ठं ते हंसमधुरस्वराः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आश्वासयन्तो विप्राग्र्याः क्षपां सर्वां व्यनोदयन्॥ 3-1-46&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
@राजा तु भ्रातृभिस्सार्धं तथा सर्वैस्सुहृद्गणैः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अशेत तां निशां राजन्दुःखशोकसमाहितः॥@&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि अरण्यपर्वणि पौरप्रत्यागमने प्रथमोऽध्यायः॥ 1 ॥&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>ShraddhaV</name></author>
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		<id>https://dharmawiki.org/index.php?title=Vanaparva_Adhyaya_1_(%E0%A4%B5%E0%A4%A8%E0%A4%AA%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%B5%E0%A4%A3%E0%A4%BF_%E0%A4%85%E0%A4%A7%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%AF%E0%A4%83_%E0%A5%A7)&amp;diff=119738</id>
		<title>Vanaparva Adhyaya 1 (वनपर्वणि अध्यायः १)</title>
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		<updated>2019-07-08T12:50:16Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;ShraddhaV: slokas added&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;जनमेजय उवाच&lt;br /&gt;
एवं द्यूतजिताः पार्थाः कोपिताश्च दुरात्मभिः।&lt;br /&gt;
धार्तराष्ट्रैः सहामात्यैर्निकृत्या द्विजसत्तम॥ 3-1-1&lt;br /&gt;
श्राविताः परुषा वाचः सृजद्भिर्वैरमुत्तमम्।&lt;br /&gt;
किमकुर्वत कौरव्या मम पूर्वपितामहाः॥ 3-1-2&lt;br /&gt;
कथं चैश्वर्यविभ्रष्टाः सहसा दुःखमेयुषः।&lt;br /&gt;
वने विजह्रिरे पार्थाः शक्रप्रतिमतेजसः॥ 3-1-3&lt;br /&gt;
के वै तानन्ववर्तन्त प्राप्तान्व्यसनमुत्तमम्।&lt;br /&gt;
किमाचाराः किमाहाराः क्व च वासो महात्मनाम्॥ 3-1-4&lt;br /&gt;
कथं च द्वादश समा वने तेषां महामुने।&lt;br /&gt;
व्यतीयुर्ब्राह्मणश्रेष्ठ शूराणामरिघातिनाम्॥ 3-1-5&lt;br /&gt;
कथं च राजपुत्री सा प्रवरा सर्वयोषिताम्।&lt;br /&gt;
पतिव्रता महाभागा सततं सत्यवादिनी॥ 3-1-6&lt;br /&gt;
वनवासमदुःखार्हा दारुणं प्रत्यपद्यत।&lt;br /&gt;
एतदाचक्ष्व मे सर्वं विस्तरेण तपोधन॥ 3-1-7&lt;br /&gt;
श्रोतुमिच्छामि चरितं भूरिद्रविणतेजसाम्।&lt;br /&gt;
कथ्यमानं त्वया विप्र परं कौतूहलं हि मे॥ 3-1-8&lt;br /&gt;
वैशम्पायन उवाच&lt;br /&gt;
एवं द्यूतजिताः पार्थाः कोपिताश्च दुरात्मभिः।&lt;br /&gt;
धार्तराष्ट्रैः सहामात्यैर्निर्ययुर्गजसाह्वयात्॥ 3-1-9&lt;br /&gt;
वर्धमानपुरद्वारादभिनिष्क्रम्य पाण्डवाः।&lt;br /&gt;
उदङ्मुखाः शस्त्रभृतः प्रययुः सह कृष्णया॥ 3-1-10&lt;br /&gt;
इन्द्रसेनादयश्चैव भृत्याः परि चतुर्दश।&lt;br /&gt;
रथैरनुययुः शीघ्रैः स्त्रिय आदाय सर्वशः॥ 3-1-11&lt;br /&gt;
गतानेतान्विदित्वा तु पौराः शोकाभिपीडिताः।&lt;br /&gt;
गर्हयन्तोऽसकृद्भीष्मविदुरद्रोणगौतमान्॥ 3-1-12&lt;br /&gt;
ऊचुर्विगतसंत्रासाः समागम्य परस्परम्।&lt;br /&gt;
पौरा ऊचुः।&lt;br /&gt;
नेदमस्ति कुलं सर्वं न वयं न च नो गृहाः॥ 3-1-13&lt;br /&gt;
यत्र दुर्योधनः पापः सौबलयेन[लेनाभि]पालितः।&lt;br /&gt;
कर्णदुःशासनाभ्यां च राज्यमेतच्चिकीर्षति॥ 3-1-14&lt;br /&gt;
न तत्कुलं न चाचारो न धर्मोऽर्थः कुतः सुखम्।&lt;br /&gt;
यत्र पापसहायोऽयं पापो राज्यं चिकीर्षति॥ 3-1-15&lt;br /&gt;
दुर्योधनो गुरुद्वेषी त्यक्ताचारसुहृज्जनः।&lt;br /&gt;
अर्थलुब्धोऽभिमानी च नीचः प्रकृतिनिर्घृणः॥ 3-1-16&lt;br /&gt;
नेयमस्ति मही कृत्स्ना यत्र दुर्योधनो नृपः।&lt;br /&gt;
साधु गच्छामहे सर्वे यत्र गच्छन्ति पाण्डवाः॥ 3-1-17&lt;br /&gt;
सानुक्रोशा महात्मानो विजितेन्द्रियशत्रवः।&lt;br /&gt;
ह्रीमन्तः कीर्तिमन्तश्च धर्माचारपरायणाः॥ 3-1-18&lt;br /&gt;
वैशम्पायन उवाच&lt;br /&gt;
एवमुक्त्वानुजग्मुस्ते पाण्डवांस्तान्समेत्य च।&lt;br /&gt;
ऊचुः प्राञ्जलयः सर्वे कौन्तेयान्माद्रिनन्दनान्॥ 3-1-19&lt;br /&gt;
क्व गमिष्यथ भद्रं वस्त्यक्त्वास्मान्दुःखभागिनः।&lt;br /&gt;
वयमप्यनुयास्यामो यत्र यूयं गमिष्यथ॥ 3-1-20&lt;br /&gt;
अधर्मेण जिताञ्छ्रुत्वा युष्मांस्त्यक्तघृणैः परैः।&lt;br /&gt;
उद्विग्नाः स्मो भृशं सर्वे नास्मान्हातुमिहार्हथ॥ 3-1-21&lt;br /&gt;
भक्तानुरक्तान्सुहृदः सदा प्रियहिते रतान्।&lt;br /&gt;
कुराजाधिष्ठिते राज्ये न विनश्येम सर्वशः॥ 3-1-22&lt;br /&gt;
श्रूयन्तां चाभिधास्यामो गुणदोषान्नरर्षभाः।&lt;br /&gt;
शुभाशुभाधिवासेन संसर्गः कुरुते यथा॥ 3-1-23&lt;br /&gt;
अपोवस्त्रं तिलान्[वस्त्रमापस्तिलान्] भूमिं गन्धो वासयते यथा।&lt;br /&gt;
पुष्पाणामधिवासेन तथा संसर्गजा गुणाः॥ 3-1-24&lt;br /&gt;
मोहजालस्य योनिर्हि मूढैरेव समागमः।&lt;br /&gt;
अहन्यहनि धर्मस्य योनिः साधुसमागमः॥ 3-1-25&lt;br /&gt;
तस्मात्प्राज्ञैश्च वृद्धैश्च सुस्वभावैस्तपस्विभिः।&lt;br /&gt;
सद्भिश्च सह संसर्गः कार्यः शमपरायणैः॥ 3-1-26&lt;br /&gt;
येषां त्रीण्यवदातानि विद्या योनिश्च कर्म च।&lt;br /&gt;
ते सेव्यास्तैः समास्या हि शास्त्रेभ्योऽपि गरीयसी॥ 3-1-27&lt;br /&gt;
निरारम्भा ह्यपि वयं पुण्यशीलेषु साधुषु।&lt;br /&gt;
पुण्यमेवाप्नुयामेह पापं पापोपसेवनात्॥ 3-1-28&lt;br /&gt;
असतां दर्शनात्स्पर्शात्संजल्पाच्च सहासनात्।&lt;br /&gt;
धर्माचाराः प्रहीयन्ते सिद्ध्यन्ति च न मानवाः॥ 3-1-29&lt;br /&gt;
बुद्धिश्च हीयते पुंसां नीचैः सह समागमात्।&lt;br /&gt;
मध्यमैर्मध्यतां याति श्रेष्ठतां याति चोत्तमैः॥ 3-1-30&lt;br /&gt;
अनीचैर्नाप्यविषयैर्नाधर्मिष्ठैर्विशेषतः।&lt;br /&gt;
ये गुणाः कीर्तिता लोके धर्मकामार्थसम्भवाः।&lt;br /&gt;
लोकाचारेषु सम्भूता वेदोक्ताः शिष्टसम्मताः॥ 3-1-31&lt;br /&gt;
ते युष्मासु समस्ताश्च व्यस्ताश्चैवेह सद्गुणाः।&lt;br /&gt;
इच्छामो गुणवन्मध्ये वस्तुं श्रेयोऽभिकाङ्क्षिणः॥ 3-1-32&lt;br /&gt;
युधिष्ठिर उवाच&lt;br /&gt;
धन्या वयं यदस्माकं स्नेहकारुण्ययन्त्रिताः।&lt;br /&gt;
असतोऽपि गुणानाहुर्ब्राह्मणप्रमुखाः प्रजाः॥ 3-1-33&lt;br /&gt;
तदहं भ्रातृसहितः सर्वान्विज्ञापयामि वः।&lt;br /&gt;
नान्यथा तद्धि कर्तव्यमस्मत्स्नेहानुकम्पया॥ 3-1-34&lt;br /&gt;
भीष्मः पितामहो राजा विदुरो जननी च मे।&lt;br /&gt;
सुहृज्जनश्च प्रायो मे नगरे नागसाह्वये॥ 3-1-35&lt;br /&gt;
ते त्वस्मद्धितकामार्थं पालनीयाः प्रयत्नतः।&lt;br /&gt;
युष्माभिः सहिताः सर्वे शोकसन्तापविह्वलाः॥ 3-1-36&lt;br /&gt;
निवर्ततागता दूरं समागमनशापिताः।&lt;br /&gt;
स्वजने न्यासभूते मे कार्या स्नेहान्विता मतिः॥ 3-1-37&lt;br /&gt;
एतद्धि मम कार्याणां परमं हृदि संस्थितम्।&lt;br /&gt;
कृता तेन तु तुष्टिर्मे सत्कारश्च भविष्यति॥ 3-1-38&lt;br /&gt;
वैशम्पायन उवाच&lt;br /&gt;
तथानुमन्त्रितास्तेन धर्मराजेन ताः प्रजाः।&lt;br /&gt;
चक्रुरार्तस्वरं घोरं हा राजन्निति संहताः॥ 3-1-39&lt;br /&gt;
गुणान्पार्थस्य संस्मृत्य दुःखार्ताः परमातुराः।&lt;br /&gt;
अकामाः सन्न्यवर्तन्त समागम्याथ पाण्डवान्॥ 3-1-40&lt;br /&gt;
निवृत्तेषु तु पौरेषु रथानास्थाय पाण्डवाः।&lt;br /&gt;
आजग्मुर्जाह्नवीतीरे प्रमाण आख्यं महावटम्॥ 3-1-41&lt;br /&gt;
ते तं दिवसशेषेण वटं गत्वा तु पाण्डवाः।&lt;br /&gt;
ऊषुस्तां रजनीं वीराः संस्पृश्य सलिलं शुचि॥ 3-1-42&lt;br /&gt;
उदकेनैव तां रात्रिमूषुस्ते दुःखकर्षिताः।&lt;br /&gt;
अनुजग्मुश्च तत्रैतान्स्नेहात्केचिद्द्विजातयः॥ 3-1-43&lt;br /&gt;
साग्नयोऽनग्नयश्चैव सशिष्यगणबान्धवाः।&lt;br /&gt;
स तैः परिवृतो राजा शुशुभे ब्रह्मवादिभिः॥ 3-1-44&lt;br /&gt;
तेषां प्रादुष्कृताग्नीनां मुहूर्ते रम्यदारुणे।&lt;br /&gt;
ब्रह्मघोषपुरस्कारः संजल्पः समजायत॥ 3-1-45&lt;br /&gt;
राजानं तु कुरुश्रेष्ठं ते हंसमधुरस्वराः।&lt;br /&gt;
आश्वासयन्तो विप्राग्र्याः क्षपां सर्वां व्यनोदयन्॥ 3-1-46&lt;br /&gt;
@राजा तु भ्रातृभिस्सार्धं तथा सर्वैस्सुहृद्गणैः।&lt;br /&gt;
अशेत तां निशां राजन्दुःखशोकसमाहितः॥@&lt;br /&gt;
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि अरण्यपर्वणि पौरप्रत्यागमने प्रथमोऽध्यायः॥ 1 ॥&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>ShraddhaV</name></author>
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