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	<title>Dharmawiki - User contributions [en-gb]</title>
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	<updated>2026-04-05T17:40:30Z</updated>
	<subtitle>User contributions</subtitle>
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		<id>https://dharmawiki.org/index.php?title=Form_of_an_Ideal_Society_(%E0%A4%86%E0%A4%A6%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%B6_%E0%A4%B8%E0%A4%AE%E0%A4%BE%E0%A4%9C_%E0%A4%95%E0%A4%BE_%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%B5%E0%A4%B0%E0%A5%82%E0%A4%AA)&amp;diff=119975</id>
		<title>Form of an Ideal Society (आदर्श समाज का स्वरूप)</title>
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		<updated>2019-07-21T07:09:09Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Dilipkelkar: लेख सम्पादित किया&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{One source|date=January 2019}}&lt;br /&gt;
# समाज में धर्म के जानकार और मार्गदर्शकों का प्रमाण भिन्न स्वभाव विशिष्टताओं के लोगों में लगभग २ % से अधिक का होगा। प्रतिशत कम होने पर भी इनकी समाज में प्रतिष्ठा होगी। इनकी संख्या बढ़ने का वातावरण होगा।&lt;br /&gt;
# स्वभाव के अनुसार काम का समीकरण २० % लोगों में दिखाई देगा। इनकी संख्या बढ़ने का वातावरण होगा।&lt;br /&gt;
# २० % जनसंख्या संयुक्त परिवारों के सदस्यों की होगी। यह संख्या बढ़ने का वातावरण होगा।&lt;br /&gt;
# ६०-६५ % उद्योग कौटुम्बिक उद्योग होंगे। यह संख्या बढ़ने का वातावरण होगा।&lt;br /&gt;
# देश के हर विद्यालय में भारतीय शिक्षा ही प्रतिष्ठित होगी। नि:शुल्क होगी। शिक्षकाधिष्ठित होगी। शासन की भूमिका सहायक, समर्थक और संरक्षक की होगी। शिक्षा का माध्यम भारतीय भाषाएँ होंगी। १०-१२ % लोग संस्कृत में धाराप्रवाह संभाषण करने की सामर्थ्य रखने वाले होंगे। ५-७ % शास्त्रों के अच्छे जानकर होंगे। यह प्रमाण बढ़ने का वातावरण होगा।&lt;br /&gt;
# २० % माताएँ ‘माता प्रथमो गुरू:’ के अनुसार व्यवहार कर रही होंगी। यह संख्या बढ़ने का वातावरण रहेगा। २०% पिता भी पिता द्वितियो गुरु: की भूमिका का निर्वहन करा रहे होंगे। ऐसे पिताओं की भी संख्या बढ़ने का वातावरण होगा।&lt;br /&gt;
# भारतीय दृष्टि से स्वाध्याय करनेवाले लोगों की संख्या कुल आबादी के २० % होगी। यह प्रमाण बढ़ने का वातावरण होगा।&lt;br /&gt;
# ग्रामाधारित, गोआधारित और कौटुम्बिक उद्योग आधारित अर्थव्यवस्था का प्रमाण ३०-४० % होगा।&lt;br /&gt;
# सामाजिक संबंधों में कौटुम्बिक भावना का प्रमाण ४० % होगा। यह प्रमाण बढ़ने का वातावरण होगा।&lt;br /&gt;
# मालिकों का समाज होगा। ८०-८५ % लोग मालिक होंगे। नौकर बनना हीनता का लक्षण माना जाएगा।&lt;br /&gt;
# २० % लोगों में दान की, अर्पण/समर्पण की मानसिकता होगी। यह प्रमाण बढ़ने का वातावरण होगा।&lt;br /&gt;
# परिवारों के साथ ही सुधारित आश्रम व्यवस्था को समाज का समर्थन, स्वीकृति और सहायता मिलेगी। &lt;br /&gt;
# व्यापारी वर्ग के प्रामाणिक और दानी व्यवहार से लोगों की व्यापारियों के बारे में सोच बदलेगी। व्यापारियों के व्यवहार में लाभ और शुभ का सन्तुलन बनेगा। इसमें शुभ को प्रधानता होगी।&lt;br /&gt;
# सामान्य मनुष्य जो धर्म का जानकार नहीं होता उस में इस की समझ होना और उसने धर्म के अनुसार चलनेवालों का अनुसरण करना। ऐसा करने वालों की संख्या लक्षणीय होगी।&lt;br /&gt;
# जीवन की गति इष्ट गति होने की दिशा प्राप्त करेगी।&lt;br /&gt;
# तन्त्रज्ञान के क्षेत्र में भारतीय तन्त्रज्ञान  विकास और उपयोग नीति का स्वीकार विश्व के सभी देश करेंगे। सुख और साधन में अन्तर समझने वाला समाज विश्वभर में वृद्धि पाएगा। भारत की पहल से विश्व के सभी देश संहारक शस्त्रास्त्रों को नष्ट करेंगे।&lt;br /&gt;
# भारत माता विश्वगुरु के स्थानपर विराजमान होगी। भारत परम वैभव को प्राप्त होगा।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==References==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references /&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अन्य स्रोत:&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[Category:Bhartiya Jeevan Pratiman (भारतीय जीवन प्रतिमान)]]&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Dilipkelkar</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://dharmawiki.org/index.php?title=Responsibilities_at_Societal_Level_(%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%AE%E0%A4%BE%E0%A4%9C%E0%A4%BF%E0%A4%95_%E0%A4%A7%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%AE_%E0%A4%85%E0%A4%A8%E0%A5%81%E0%A4%AA%E0%A4%BE%E0%A4%B2%E0%A4%A8)&amp;diff=119974</id>
		<title>Responsibilities at Societal Level (सामाजिक धर्म अनुपालन)</title>
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		<updated>2019-07-21T07:05:32Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Dilipkelkar: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{One source|date=January 2019}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जीवन के भारतीय प्रतिमान की पुनर्प्रतिष्ठा के लिए राष्ट्र के संगठन की विभिन्न प्रणालियों के स्तर पर उन कर्तव्यों का याने ईकाई धर्म का विचार और प्रत्यक्ष धर्म अनुपालन की प्रक्रिया कैसे चलेगी, ऐसा दो पहलुओं में हम परिवर्तन की प्रक्रिया का विचार करेंगे। वैसे तो धर्म अनुपालन की प्रक्रिया का विचार हमने समाज धारणा शास्त्र के विषय में किया है। फिर भी परिवर्तन प्रक्रिया को यहाँ फिर से दोहराना उपयुक्त होगा।   &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== विभिन्न सामाजिक प्रणालियों के धर्म ==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== कुटुम्ब ===&lt;br /&gt;
कुटुम्ब परिवर्तन का सबसे जड़मूल का माध्यम है। समाज जीवन की वह नींव होता है। वह जितना सशक्त और व्यापक भूमिका का निर्वहन करेगा समाज उतना ही श्रेष्ठ बनेगा। कुटुम्ब में दो प्रकार के काम होते हैं। पहले हैं कुटुम्ब के लिए और दूसरे हैं कुटुम्ब में याने समाज, सृष्टि के लिए। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== कुटुम्ब की – कुटुम्ब के लिए ===&lt;br /&gt;
# क्षमता और योग्यता आधारित कर्तव्य  &lt;br /&gt;
# क्षमता और योग्यता के अनुसार सार्थक योगदान  &lt;br /&gt;
# शुद्ध सस्नेहयुक्त सदाचारयुक्त परस्पर व्यवहार  &lt;br /&gt;
# बड़ों का आदर, सेवा। छोटों के लिए आदर्श और प्यार।  &lt;br /&gt;
# कुटुंबहित अपने हित से ऊपर। कर्त्तव्य परायणता। अपने कर्तव्यों के प्रति आग्रही।  &lt;br /&gt;
# स्वावलंबन / परस्परावलंबन।  &lt;br /&gt;
# कुटुम्ब के सभी काम करना आना और करना।  &lt;br /&gt;
# एकात्मता का विस्तार – कुटुंब&amp;lt; समाज&amp;lt; सृष्टि&amp;lt; विश्व। लेकिन इसकी नींव कुटुंब जीवन में ही पड़ेगी और पक्की होगी।  &lt;br /&gt;
# कौशल, ज्ञान, बल और पुण्य अर्जन की दृष्टी से अध्ययन और संस्कार  &lt;br /&gt;
# कौटुम्बिक कुशलताएँ, आदतें, रीति-रिवाज, परम्पराएँ आदि  &lt;br /&gt;
# कुटुम्ब प्रमुख सर्वोपरि : कुटुम्ब के सब ही सदस्यों को कुटुम्ब प्रमुख बनने की प्रेरणा और इस हेतु से उनके द्वारा अपना विवेक, कौशल, सयानापन, निर्णय क्षमता, अपार स्नेह आदि का विकास। कुटुम्ब प्रमुख की आज्ञाओं का पालन - आज्ञाकारिता।  &lt;br /&gt;
# काया, वाचा, मनसा सभी से मधुर व्यवहार।  &lt;br /&gt;
# अच्छा – बेटा/बेटी, भाई/बहन, पति/पत्नि, पिता/माता, गृहस्थ/गृहिणी, रिश्तेदार आदि बनना/बनाना।  &lt;br /&gt;
# वर्णाश्रम धर्म का पालन – स्वभावज कर्म करते जाना।  &lt;br /&gt;
## सवर्ण/सजातीय विवाह  &lt;br /&gt;
## कौटुम्बिक व्यवसाय में सहभाग  &lt;br /&gt;
## ज्ञान, कौशल, श्रेष्ठ परम्पराओं का निर्वहन, परिष्कार, निर्माण और अगली पीढी को अंतरण  &lt;br /&gt;
## आयु की अवस्था के अनुसार ब्रह्मचर्य, गृहस्थ और वानप्रस्थ आदि आश्रमों के धर्म की जिम्मेदारियों का निर्वहन।  &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== कुटुम्ब में – समाज के लिए ===&lt;br /&gt;
# सामाजिक कर्तव्यों का निर्वहन &lt;br /&gt;
## समाज संगठन की प्रणालियों (कुटुंब, जाति, ग्राम, राष्ट्र) में &lt;br /&gt;
## सामाजिक व्यवस्थाओं (रक्षण, पोषण और शिक्षण) में &lt;br /&gt;
# ज्ञानार्जन, कौशलार्जन, बलार्जन और पुण्यार्जन की मानसिकता और केवल इन के लिए अटन। &lt;br /&gt;
# स्वावलंबन और परस्परावलंबन। &lt;br /&gt;
# शत्रुत्व भाववाले समाज के घटकों के साथ भी शान्ततापूर्ण और सुखी सहजीवन। &lt;br /&gt;
# एकात्मता (समाज और सृष्टि के साथ) का व्यवहार / सुख और दु:ख में सहानुभूति और सहभागिता। &lt;br /&gt;
# विभिन्न क्षेत्रों में - जैसे शासन, न्याय, समृद्धि आदि क्षेत्रों के नेता &amp;gt; आचार्य &amp;gt; धर्म । धर्म सर्वोपरि। &lt;br /&gt;
# सद्गुण, सदाचार, स्वावलंबन, सत्यनिष्ठा, सादगी, सहजता, सौन्दर्यबोध, स्वतंत्रता, संयम, स्वदेशी आदि का व्यवहार साथ ही में त्याग, तपस्या, समाधान, शान्ति, अभय, विजिगीषा आदि गुणों का विकास। &lt;br /&gt;
# मनसा, वाचा कर्मणा ‘सर्वे भवन्तु सुखिन:’ के प्रयास। &lt;br /&gt;
# वर्ण-धर्म की और जाति-धर्म की शिक्षा देना। जब लोग अपने वर्ण के अनुसार आचरण करते हैं, तब राष्ट्र की संस्कृति का विकास और रक्षण होता है। और जब लोग अपने जातिधर्म के अनुसार व्यवसाय करते हैं तब देश समृद्ध बनता है, ओर बना रहता है। &lt;br /&gt;
# धर्माचरणी और समाजभक्त / देशभक्त / राष्ट्रभक्त / परमात्मा में श्रद्धा रखने वालों का निर्माण। &lt;br /&gt;
# धर्मशिक्षा और कर्मशिक्षा। &lt;br /&gt;
# संयमित उपभोग। न्यूनतम (इष्टतम) उपभोग। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== ग्रामकुल ==&lt;br /&gt;
# ग्राम को स्वावलंबी ग्राम बनाना&lt;br /&gt;
# ग्राम की अर्थव्यवस्था को ठीक से बिठाना और चलाना&lt;br /&gt;
# संयुक्त कुटुंबों की प्रतिष्ठापना का वातावरण&lt;br /&gt;
# कौटुम्बिक उद्योगों की प्रतिष्ठापना का वातावरण&lt;br /&gt;
# कुटुम्ब भावना से प्रत्येक व्यक्ति की सम्मानपूर्ण आजीविका की व्यवस्था करना&lt;br /&gt;
# कौटुम्बिक उद्योग और जातियों में समन्वय रखना&lt;br /&gt;
# शासकीय व्यवस्थाओं के प्रति जिम्मेदारियां : कर देना, शिक्षण, पोषण और रक्षण की व्यवस्थाओं में श्रेष्ठ व्यक्तियों का और संसाधनों का योगदान देना&lt;br /&gt;
# ग्राम, एक कुल बने ऐसा वातावरण बनाए रखना।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== गुरुकुल / विद्यालय ==&lt;br /&gt;
# वर्णशिक्षा की व्यवस्था &lt;br /&gt;
# ज्ञानार्जन, कौशलार्जन, बलार्जन के लिए मार्गदर्शन &lt;br /&gt;
# शास्त्रीय शिक्षा का प्रावधान &lt;br /&gt;
# श्रेष्ठ परम्पराओं के निर्माण की शिक्षा &lt;br /&gt;
# जीवन के तत्व ज्ञान और व्यवहार की शिक्षा &lt;br /&gt;
# जीवन के लिए महत्वपूर्ण सामाजिक संगठन प्रणालियाँ और व्यवस्थाओं की समझ और यथाशक्ति योगदान की प्रेरणा। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== कौशल विधा पंचायत ==&lt;br /&gt;
# समाज की किसी एक आवश्यकता की पूर्ति करना। कभी कोई कमी न हो यह सुनिश्चित करना। &lt;br /&gt;
# धर्म के मार्गदर्शन में अपने कौशल विधा-धर्म का निर्धारण और कौशल विधा प्रणाली में प्रचार प्रसार &lt;br /&gt;
# अन्य कौशल विधाओं के साथ समन्वय &lt;br /&gt;
# राष्ट्र सर्वोपरि यह भावना सदा जाग्रत रखना &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== व्यवस्थाओं के धर्म ==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== धर्म व्यवस्था ===&lt;br /&gt;
यह कोई नियमित व्यवस्था नहीं होती। यह जाग्रत, नि:स्वार्थी, सर्वभूतहित में सदैव प्रयासरत रहनेवाले पंडितों का समूह होता है। यह समूह सक्रिय होने से समाज ठीक चलता है। आवश्यकतानुसार इस समूह की जिम्मेदारियां बढ़ जातीं है। ऐसे आपद्धर्म के निर्वहन के लिए भी यह समूह पर्याप्त सामर्थ्यवान हो। &lt;br /&gt;
# कालानुरूप धर्म को व्याख्यायित करना। &lt;br /&gt;
# वर्णों के ‘स्व’धर्मों का पालन करने की व्यवस्था की पस्तुति कर शिक्षा और शासन की मदद से समाज में उन्हें स्थापित करना। व्यक्तिगत और सामाजिक धर्म/संस्कृति के अनुसार व्यवहार का वातावरण बनाना। जब वर्ण-धर्म का पालन लोग करते हैं तब देश में संस्कृति का विकास और रक्षण होता है। जिनकी ओर देखकर लोग वर्ण धर्म का पालन कर सकें ऐसे ‘श्रेष्ठ’ लोगों का निर्माण करना। &lt;br /&gt;
# स्वाभाविक, शासनिक और आर्थिक ऐसी सभी प्रकार की स्वतन्त्रता की रक्षा करना। &lt;br /&gt;
# शासन पर अपने ज्ञान, त्याग, तपस्या, लोकसंग्रह तथा सदैव लोकहित के चिंतन के माध्यम से नैतिक दबाव निर्माण करना। शासन को सदाचारी, कुशल और सामर्थ्य संपन्न बनाए रखने के लिए मार्गदर्शन करना। अधर्माचरणी शासन को हटाकर धर्माचरणी शासन को प्रतिष्ठित करना। &lt;br /&gt;
# लोकशिक्षा (कुटुम्ब शिक्षा इसी का हिस्सा है) और विद्यालयीन शिक्षा की प्रभावी व्यवस्था करना। जैसे लिखा पढी न्यूनतम करने की दिशा में बढ़ना। वाणी / शब्द की प्रतिष्ठा बढ़ाना। जीवन को साधन सापेक्षता से साधना सापेक्षता की ओर ले जाने के लिए अपनी कथनी और करनी से मार्गदर्शन करना। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== शासन व्यवस्था ===&lt;br /&gt;
# अंतर्बाह्य शत्रुओं से लोगों की शासनिक स्वतन्त्रता की रक्षा करना।  &lt;br /&gt;
# धर्म के दायरे में रहकर दुष्टों और मूर्खों को नियंत्रण में रखना।  &lt;br /&gt;
# दंड व्यवस्था के अंतर्गत न्याय व्यवस्था का निर्माण करना। किसी पर अन्याय हो ही नहीं, ऐसी दंड व्यवस्था के निर्माण का प्रयास करना।  &lt;br /&gt;
# श्रेष्ठ शासक परम्परा निर्माण करना।  &lt;br /&gt;
# प्रभावी, समाजहित की शिक्षा देनेवाले शिक्षा केन्द्रों को संरक्षण, समर्थन और सहायता देकर और प्रभावी बनाने के लिए यथाशक्ति प्रयास करना। ऐसा करने से शासन का काम काफी सरल हो जाता है।  &lt;br /&gt;
# धर्म व्यवस्था से समय समय पर मार्गदर्शन प्राप्त करते रहना।  &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== समृद्धि व्यवस्था ===&lt;br /&gt;
# योग्य शिक्षा के द्वारा समाज में धर्म के अविरोधी इच्छाओं का ही विकास हो यह सुनिश्चित करना।&lt;br /&gt;
# समाज के प्रत्येक घटक की सभी आवश्यकताओं की पूर्ति करना, धर्म विरोधी इच्छाओं की नहीं। समाज की आर्थिक स्वतन्त्रता को अबाधित रखना।&lt;br /&gt;
# प्राकृतिक संसाधनों का न्यूनतम उपयोग हो ऐसा वातावरण बनाना। संयमित उपभोग को प्रतिष्ठित करना।&lt;br /&gt;
# प्रकृति का प्रदूषण नहीं होने देना। प्रकृति का सन्तुलन बनाए रखना।&lt;br /&gt;
# कौटुम्बिक उद्योग, जातियाँ और ग्राम मिलकर समृद्धि निर्माण होती है। ये तीनों ईकाईयाँ फलेफूले और इनका स्वस्थ ऐसा तानाबाना बना रहे ऐसा वातावरण रहे।&lt;br /&gt;
# पैसे का विनिमय न्यूनतम रहे ऐसी व्यवस्था निर्माण करना।&lt;br /&gt;
अब हम धर्म के अनुपालन की प्रक्रिया का विचार आगे करेंगे।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== धर्म अनुपालन की प्रक्रिया ==&lt;br /&gt;
हमने जाना है कि समाज के सुख, शांति, स्वतंत्रता, सुसंस्कृतता के लिए समाज का धर्मनिष्ठ होना आवश्यक होता है। यहाँ मोटे तौर पर धर्म का मतलब कर्तव्य से है। समाज धारणा के लिए कर्तव्यों पर आधारित जीवन अनिवार्य होता है। समाज धारणा के लिए धर्म-युक्त व्यवहार में आनेवाली जटिलताओं को और उसके अनुपालन की प्रक्रिया को समझने का प्रयास करेंगे। इन में व्यक्तिगत स्तर की बातों का हमने [[Personal Responsibilities (व्यक्तिगत धर्म अनुपालन)|पूर्व के अध्याय]] में विचार किया है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== विभिन्न ईकाईयों के स्तर पर ===&lt;br /&gt;
# कुटुम्ब : समाज की सभी इकाइयों के विभिन्न स्तरोंपर उचित भूमिका निभानेवाले श्रेष्ठ मानव का निर्माण करना। कौटुम्बिक व्यवसाय के माध्यम से समाज की किसी आवश्यकता की पूर्ति करना।&lt;br /&gt;
# ग्राम : ग्राम की भूमिका छोटे विश्व और बड़े कुटुम्ब की तरह ही होती है। जिस तरह कुटुम्ब के सदस्यों में आपस में पैसे का लेनदेन नहीं होता उसी तरह अच्छे ग्राम में कुटुम्बों में आपस में पैसे का लेनदेन नहीं होता। प्रत्येक की सम्मान और स्वतन्त्रता के साथ अन्न, वस्त्र, भवन, शिक्षा, आजीविका, सुरक्षा आदि सभी आवश्यकताओं की पूर्ति होती है।&lt;br /&gt;
# कौशल विधा : समाज जीवन की आवश्यकताओं की हर विधा के अनुसार व्यवसाय विधा समूह बनते हैं। इन समूहों के भी सामान्य व्यक्ति से लेकर विश्व के स्तर तक के लिए करणीय और अकरणीय कार्य होते हैं। कर्तव्य होते हैं। इन्हें व्यवसाय विधा धर्म कहेंगे। इनमें पदार्थ के उत्पादन के रूप में आर्थिक स्वतन्त्रता के किसी एक पहलू की रक्षा में योगदान करना होता है। शिक्षा / संस्कार, वस्तुएं, भावनाएं, विचार, कला आदि में से समाज जीवन की आवश्यकता में से किसी एक विधा के पदार्थ की निरंतर आपूर्ति करना। पदार्थ का अर्थ केवल वस्तु नहीं है। जिस पद याने शब्द का अर्थ होता है वह पदार्थ कहलाता है। व्यावसायिक समूह का काम कौशल का विकास करना, कौशल का पीढ़ी दर पीढ़ी अंतरण करना और अन्य व्यवसायिक समूहों से समन्वय रखना आदि है।&lt;br /&gt;
# भाषिक समूह : भाषा का मुख्य उपयोग परस्पर संवाद है। संवाद विचारों की सटीक अभिव्यक्ति करने वाला हो इस हेतु से भाषाएँ बनतीं हैं। संवाद में सहजता, सरलता, सुगमता से आत्मीयता बढ़ती है। इसी हेतु से भाषिक समूह बनते हैं।&lt;br /&gt;
# प्रादेशिक समूह : शासनिक और व्यवस्थात्मक सुविधा की दृष्टि से प्रादेशिक स्तर का मह्त्व होता है।&lt;br /&gt;
# राष्ट्र : राष्ट्र अपने समाज के लिये विविध प्रकार के संगठनों का और व्यवस्थाओं का निर्माण करता है।&lt;br /&gt;
# विश्व : पूर्व में बताई हुई 1 से लेकर 6 तक की सभी इकाइयां वैश्विक हित की अविरोधी रहें।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== प्रकृति सुसंगतता ===&lt;br /&gt;
समाज जीवन में केन्द्रिकरण और विकेंद्रीकरण का समन्वय हो यह आवश्यक है। विशाल उद्योग, बाजार की मंडियां, शासकीय कार्यालय, व्यावसायिक, भाषिक, प्रादेशिक समूहों के समन्वय की व्यवस्थाएं आदि के लिये शहरों की आवश्यकता होती है। लेकिन इनमें अनावश्यक केन्द्रीकरण न हो पाए। वनवासी या गिरिजन भी ग्राम व्यवस्था से ही जुड़े हुए होने चाहिए। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== प्रक्रियाएं ===&lt;br /&gt;
धर्म के अनुपालन में बुद्धि के स्तर पर धर्म के प्रति पर्याप्त संज्ञान, मन के स्तर पर कौटुम्बिक भावना, अनुशासन और श्रद्धा (आज्ञाकारिता) का विकास तथा शारीरिक स्तर पर सहकारिता और परोपकार की आदतें अत्यंत आवश्यक हैं।&lt;br /&gt;
# धर्म संज्ञान : ‘समझना’ यह बुद्धि का काम होता है। इसलिए जब बच्चे का बुद्धि का अंग विकसित हो रहा होता है उसे धर्म की बौद्धिक याने तर्क तथा कर्मसिद्धांत के आधार पर शिक्षा देना उचित होता है। इस दृष्टि से तर्कशास्त्र की समझ या सरल शब्दों में ‘किसी भी बात के करने से पहले चराचर के हित में उस बात को कैसे करना चाहिए’ इसे समझने की क्षमता का विकास आवश्यक होता है।&lt;br /&gt;
# कौटुम्बिक भावना का विकास : समाज के सभी परस्पर संबंधों में कौटुम्बिक भावना से व्यवहार का आधार धर्मसंज्ञान ही तो होता है। मन को बुद्धि के नियंत्रण में रखना ही मन की शिक्षा होती है। दुर्योधन के निम्न कथन से सब परिचित हैं{{Citation needed}}:&lt;br /&gt;
&amp;lt;blockquote&amp;gt;जानामी धर्मं न च में प्रवृत्ति: । जानाम्यधर्मं न च में निवृत्ति: ।।&amp;lt;/blockquote&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;ol start=&amp;quot;3&amp;quot;&amp;gt; &lt;br /&gt;
&amp;lt;li&amp;gt;धर्माचरण की आदतें: दुर्योधन के उपर्युक्त कथन को ध्यान में रखकर ही गर्भधारणा से ही बच्चे को धर्माचरण की आदतों की शिक्षा देना मह्त्वपूर्ण बन जाता है। आदत का अर्थ है जिस बात के करने में कठिनाई का अनुभव नहीं होता। जब किसी बात के बारबार करने से आचरण में यह सहजता आती है तब वह आदत बन जाती है। और जब उसे बुद्धिका अधिष्ठान मिल जाता है तब वह आदतें मनुष्य का स्वभाव ही बन जातीं हैं।&lt;br /&gt;
&amp;lt;/ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== धर्म के अनुपालन के स्तर और साधन ===&lt;br /&gt;
# धर्म के अनुपालन करनेवालों के राष्ट्रभक्त, अराष्ट्रीय और राष्ट्रद्रोही ऐसे मोटे-मोटे तीन स्तर होते हैं।&lt;br /&gt;
# धर्म के अनुपालन के साधन : धर्म का अनुपालन पूर्व में बताए अनुसार शिक्षा, आदेश, प्रायश्चित्त/ पश्चात्ताप तथा दंड ऐसा चार प्रकार से होता है। शासन दुर्बल होने से समाज में प्रमाद करनेवालों की संख्या में वृद्धि होती है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== धर्म के अनुपालन के अवरोध ===&lt;br /&gt;
धर्म के अनुपालन में निम्न बातें अवरोध-रूप होतीं हैं:&lt;br /&gt;
# भिन्न जीवनदृष्टि के लोग : शीघ्रातिशीघ्र भिन्न जीवनदृष्टि के लोगों को आत्मसात करना आवश्यक होता है। अन्यथा समाज जीवन अस्थिर और संघर्षमय बन जाता है।&lt;br /&gt;
# स्वार्थ / संकुचित अस्मिताएँ : आवश्यकताओं की पुर्ति तक तो स्वार्थ भावना समर्थनीय है। अस्मिता या अहंकार यह प्रत्येक जीवंत ईकाई का एक स्वाभाविक पहलू होता है। किन्तु जब किसी ईकाई के विशिष्ट स्तर की यह अस्मिता अपने से ऊपर की ईकाई जिसका वह हिस्सा है, उसकी अस्मिता से बड़ी लगने लगती है तब समाज जीवन की शांति नष्ट हो जाती है। इसलिए यह आवश्यक है कि मजहब, रिलिजन, प्रादेशिक अलगता, भाषिक भिन्नता, धन का अहंकार, बौद्धिक श्रेष्ठता आदि जैसी संकुचित अस्मिताएँ अपने से ऊपर की जीवंत ईकाई की अस्मिता के विरोध में नहीं हो।&lt;br /&gt;
# विपरीत शिक्षा : विपरीत या दोषपूर्ण शिक्षा यह तो सभी समस्याओं की जड़ होती है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== कारक तत्व ===&lt;br /&gt;
कारक तत्वों से मतलब है धर्मपालन में सहायता देनेवाले घटक। ये निम्न होते हैं:&lt;br /&gt;
# धर्म व्यवस्था : शासन धर्मनिष्ठ रहे यह सुनिश्चित करना धर्म व्यवस्था की जिम्मेदारी है। अपने त्याग, तपस्या, ज्ञान, लोकसंग्रह, चराचर के हित का चिन्तन, समर्पण भाव और कार्यकुशलता के आधार पर समाज से प्राप्त समर्थन प्राप्त कर वह देखे कि कोई अयोग्य व्यक्ति शासक नहीं बनें।&lt;br /&gt;
# शिक्षा : &lt;br /&gt;
## कुटुम्ब शिक्षा&lt;br /&gt;
## विद्याकेन्द्र की शिक्षा&lt;br /&gt;
## लोकशिक्षा&lt;br /&gt;
# धर्मनिष्ठ शासन: शासक का धर्मशास्त्र का जानकार होना और स्वयं धर्माचरणी होना भी आवश्यक होता है। जब शासन धर्म के अनुसार चलता है, धर्म व्यवस्थाद्वारा नियमित निर्देशित होता है तब धर्म भी स्थापित होता है और राज्य व्यवस्था भी श्रेष्ठ बनती है।&lt;br /&gt;
# धर्मनिष्ठों का सामाजिक नेतृत्व : समाज जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में धर्मनिष्ठ लोग जब अच्छी संख्या में दिखाई देते हैं तब समाज मानस धर्मनिष्ठ बनता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== चरण ==&lt;br /&gt;
धर्म का अनुपालन जब लोग स्वेच्छा से करनेवाले समाज के निर्माण के लिए दो बातें अत्यंत महत्वपूर्ण होतीं हैं। एक गर्भ में श्रेष्ठ जीवात्मा की स्थापना और दूसरे शिक्षा और संस्कार। शिक्षा और संस्कार में:&lt;br /&gt;
# जन्मपूर्व और शैशव काल में अधिजनन शास्त्र के आधार पर मार्गदर्शन। &lt;br /&gt;
# बाल्य काल : कुटुम्ब की शिक्षा के साथ विद्याकेन्द्र शिक्षा का समायोजन &lt;br /&gt;
# यौवन काल: अहंकार, बुद्धि के सही मोड़ हेतु सत्संग, प्रेरणा, वातावरण, ज्ञानार्जन/बलार्जन/कौशलार्जन आदि  &lt;br /&gt;
# प्रौढ़ावस्था: पूर्व ज्ञान/आदतों को व्यवस्थित करने के लिए सामाजिक वातावरण और मार्गदर्शन &lt;br /&gt;
## पुरोहित &lt;br /&gt;
## मेले/यात्राएं &lt;br /&gt;
## कीर्तनकार/प्रवचनकार &lt;br /&gt;
## धर्माचार्य &lt;br /&gt;
## दृक्श्राव्य माध्यम –चित्रपट, दूरदर्शन आदि &lt;br /&gt;
## आन्तरजाल &lt;br /&gt;
## कानून का डर &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== धर्म निर्णय व्यवस्था ==&lt;br /&gt;
सामान्यत: जब भी धर्म की समझ से सम्बन्धित समस्या हो तब धर्म निर्णय की व्यवस्था उपलब्ध होनी चाहिये। इस व्यवस्था के तीन स्तर होना आवश्यक है। पहला स्तर तो स्थानिक धर्म के जानकार, दूसरा जनपदीय या निकट के तीर्थक्षेत्र में धर्मज्ञ परिषद्, और तीसरा स्तर अखिल भारतीय या राष्ट्रीय धर्मज्ञ परिषद्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== माध्यम ==&lt;br /&gt;
धर्म अनुपालन करवाने के मुख्यत: दो प्रकार के माध्यम होते हैं:&lt;br /&gt;
# कुटुम्ब के दायरे में : धर्म शिक्षा का अर्थ है सदाचार की शिक्षा। धर्म की शिक्षा के लिए कुटुम्ब यह सबसे श्रेष्ठ पाठशाला है। विद्याकेन्द्र की शिक्षा तो कुटुम्ब में मिली धर्म शिक्षा की पुष्टि या आवश्यक सुधार के लिए ही होती है। कुटुम्ब में धर्म शिक्षा तीन तरह से होती है: गर्भपूर्व संस्कार, गर्भ संस्कार और शिशु संस्कार और आदतें। मनुष्य की आदतें भी बचपन में ही पक्की हो जातीं हैं।&lt;br /&gt;
# कुटुम्ब से बाहर के माध्यम : मनुष्य तो हर पल सीखता ही रहता है। इसलिए कुटुम्ब से बाहर भी वह कई बातें सीखता है। माध्यमों में मित्र मंडली, विद्यालय, समाज का सांस्कृतिक स्तर और क़ानून व्यवस्था आदि।&lt;br /&gt;
जीवन के भारतीय प्रतिमान की प्रतिष्ठापना की प्रक्रिया से अपेक्षित परिणामों की चर्चा हम [[Form of an Ideal Society (आदर्श समाज का स्वरूप)|अगले]] अध्याय में करेंगे।&lt;br /&gt;
==References==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references /&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अन्य स्रोत:&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[Category:Bhartiya Jeevan Pratiman (भारतीय जीवन प्रतिमान)]]&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Dilipkelkar</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://dharmawiki.org/index.php?title=Form_of_an_Ideal_Society_(%E0%A4%86%E0%A4%A6%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%B6_%E0%A4%B8%E0%A4%AE%E0%A4%BE%E0%A4%9C_%E0%A4%95%E0%A4%BE_%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%B5%E0%A4%B0%E0%A5%82%E0%A4%AA)&amp;diff=119973</id>
		<title>Form of an Ideal Society (आदर्श समाज का स्वरूप)</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://dharmawiki.org/index.php?title=Form_of_an_Ideal_Society_(%E0%A4%86%E0%A4%A6%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%B6_%E0%A4%B8%E0%A4%AE%E0%A4%BE%E0%A4%9C_%E0%A4%95%E0%A4%BE_%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%B5%E0%A4%B0%E0%A5%82%E0%A4%AA)&amp;diff=119973"/>
		<updated>2019-07-21T07:05:18Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Dilipkelkar: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{One source|date=January 2019}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
क)समाज में धर्म के जानकार और मार्गदर्शकों का प्रमाण भिन्न स्वभाव विशिष्टताओं के लोगों में लगभग २ % से अधिक का होगा| % कम होनेपर भी इनकी समाज में प्रतिष्ठा होगी| इनकी संख्या बढ़ने का वातावरण होगा|&lt;br /&gt;
ख) स्वभाव के अनुसार काम का समीकरण २० % लोगों में दिखाई देगा| इनकी संख्या बढ़ने का वातावरण होगा|&lt;br /&gt;
ग) २० % जनसंख्या संयुक्त परिवारों के सदस्यों की होगी| यह संख्या बढ़ने का वातावरण होगा|&lt;br /&gt;
घ) ६०-६५ % उद्योग कौटुम्बिक उद्योग होंगे| यह संख्या बढ़ने का वातावरण होगा| &lt;br /&gt;
च) देश के हर विद्यालय में भारतीय शिक्षा ही प्रतिष्ठित होगी| नि:शुल्क होगी| शिक्षकाधिष्ठित होगी| शासन की भूमिका सहायक, समर्थक और संरक्षक की होगी| शिक्षा का माध्यम भारतीय भाषाएँ होंगी| १०-१२ % लोग संस्कृत में धाराप्रवाह संभाषण करने की सामर्थ्य रखनेवाले होंगे| ५-७ % शास्त्रों के अच्छे जानकर होंगे| यह प्रमाण बढ़ने का वातावरण होगा|&lt;br /&gt;
छ) २० % माताएँ ‘माता प्रथमो गुरू:’ के अनुसार व्यवहार कर रही होंगी| यह संख्या बढ़ने का वातावरण रहेगा| २०% पिता भी पिता द्वितियो गुरु: की भूमिका का निर्वहन करा रहे होंगे| ऐसे पिताओं की भी संख्या बढ़ने का वातावरण होगा|&lt;br /&gt;
ज) भारतीय दृष्टि से स्वाध्याय करनेवाले लोगों की संख्या कुल आबादी के २० % होगी| यह प्रमाण बढ़ने का वातावरण होगा|&lt;br /&gt;
झ) ग्रामाधारित, गोआधारित और कौटुम्बिक उद्योग आधारित अर्थव्यवस्था का प्रमाण ३०-४० % होगा| &lt;br /&gt;
प) सामाजिक संबंधों में कौटुम्बिक भावना का प्रमाण ४० % होगा| यह प्रमाण बढ़ने का वातावरण होगा|&lt;br /&gt;
फ) मालिकों का समाज होगा| ८०-८५ % लोग मालिक होंगे| नौकर बनना हीनता का लक्षण माना जाएगा|&lt;br /&gt;
ब) २० % लोगों में दान की, अर्पण/समर्पण की मानसिकता होगी| यह प्रमाण बढ़ने का वातावरण होगा|&lt;br /&gt;
भ) परिवारों के साथ ही सुधारित आश्रम व्यवस्था को समाज का समर्थन, स्वीकृति और सहायता मिलेगी| &lt;br /&gt;
म) व्यापारी वर्ग के प्रामाणिक और दानी व्यवहार से लोगों की व्यापारियों के बारे में सोच बदलेगी| व्यापारियों के व्यवहार में लाभ और शुभ का सन्तुलन  बनेगा| इसमें शुभ को प्रधानता होगी|&lt;br /&gt;
त) सामान्य मनुष्य जो धर्म का जानकार नहीं होता उस में इस की समझ होना और उसने धर्म के अनुसार चलनेवालों का अनुसरण करना| ऐसा करनेवालों की संख्या लक्षणीय होगी| &lt;br /&gt;
थ) जीवन की गति इष्ट गति होने की दिशा प्राप्त करेगी| &lt;br /&gt;
द) तन्त्रज्ञान  के क्षेत्र में भारतीय तन्त्रज्ञान  विकास और उपयोग नीति का स्वीकार विश्व के सभी देश करेंगे| सुख और साधन में अन्तर समझनेवाला समाज विश्वभर में वृद्धि पाएगा| भारत की पहल से विश्व के सभी देश संहारक शस्त्रास्त्रों को नष्ट करेंगे|&lt;br /&gt;
ध) भारत माता विश्वगुरु के स्थानपर विराजमान होगी| भारत परम वैभव को प्राप्त होगा|&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==References==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references /&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अन्य स्रोत:&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[Category:Bhartiya Jeevan Pratiman (भारतीय जीवन प्रतिमान)]]&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Dilipkelkar</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://dharmawiki.org/index.php?title=Responsibilities_at_Societal_Level_(%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%AE%E0%A4%BE%E0%A4%9C%E0%A4%BF%E0%A4%95_%E0%A4%A7%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%AE_%E0%A4%85%E0%A4%A8%E0%A5%81%E0%A4%AA%E0%A4%BE%E0%A4%B2%E0%A4%A8)&amp;diff=119972</id>
		<title>Responsibilities at Societal Level (सामाजिक धर्म अनुपालन)</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://dharmawiki.org/index.php?title=Responsibilities_at_Societal_Level_(%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%AE%E0%A4%BE%E0%A4%9C%E0%A4%BF%E0%A4%95_%E0%A4%A7%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%AE_%E0%A4%85%E0%A4%A8%E0%A5%81%E0%A4%AA%E0%A4%BE%E0%A4%B2%E0%A4%A8)&amp;diff=119972"/>
		<updated>2019-07-21T07:02:41Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Dilipkelkar: /* माध्यम */ लेख सम्पादित किया&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{One source|date=January 2019}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जीवन के भारतीय प्रतिमान की पुनर्प्रतिष्ठा के लिए राष्ट्र के संगठन की विभिन्न प्रणालियों के स्तर पर उन कर्तव्यों का याने ईकाई धर्म का विचार और प्रत्यक्ष धर्म अनुपालन की प्रक्रिया कैसे चलेगी, ऐसा दो पहलुओं में हम परिवर्तन की प्रक्रिया का विचार करेंगे। वैसे तो धर्म अनुपालन की प्रक्रिया का विचार हमने समाज धारणा शास्त्र के विषय में किया है। फिर भी परिवर्तन प्रक्रिया को यहाँ फिर से दोहराना उपयुक्त होगा।   &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== विभिन्न सामाजिक प्रणालियों के धर्म ==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== कुटुम्ब ===&lt;br /&gt;
कुटुम्ब परिवर्तन का सबसे जड़मूल का माध्यम है। समाज जीवन की वह नींव होता है। वह जितना सशक्त और व्यापक भूमिका का निर्वहन करेगा समाज उतना ही श्रेष्ठ बनेगा। कुटुम्ब में दो प्रकार के काम होते हैं। पहले हैं कुटुम्ब के लिए और दूसरे हैं कुटुम्ब में याने समाज, सृष्टि के लिए। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== कुटुम्ब की – कुटुम्ब के लिए ===&lt;br /&gt;
# क्षमता और योग्यता आधारित कर्तव्य  &lt;br /&gt;
# क्षमता और योग्यता के अनुसार सार्थक योगदान  &lt;br /&gt;
# शुद्ध सस्नेहयुक्त सदाचारयुक्त परस्पर व्यवहार  &lt;br /&gt;
# बड़ों का आदर, सेवा। छोटों के लिए आदर्श और प्यार।  &lt;br /&gt;
# कुटुंबहित अपने हित से ऊपर। कर्त्तव्य परायणता। अपने कर्तव्यों के प्रति आग्रही।  &lt;br /&gt;
# स्वावलंबन / परस्परावलंबन।  &lt;br /&gt;
# कुटुम्ब के सभी काम करना आना और करना।  &lt;br /&gt;
# एकात्मता का विस्तार – कुटुंब&amp;lt; समाज&amp;lt; सृष्टि&amp;lt; विश्व। लेकिन इसकी नींव कुटुंब जीवन में ही पड़ेगी और पक्की होगी।  &lt;br /&gt;
# कौशल, ज्ञान, बल और पुण्य अर्जन की दृष्टी से अध्ययन और संस्कार  &lt;br /&gt;
# कौटुम्बिक कुशलताएँ, आदतें, रीति-रिवाज, परम्पराएँ आदि  &lt;br /&gt;
# कुटुम्ब प्रमुख सर्वोपरि : कुटुम्ब के सब ही सदस्यों को कुटुम्ब प्रमुख बनने की प्रेरणा और इस हेतु से उनके द्वारा अपना विवेक, कौशल, सयानापन, निर्णय क्षमता, अपार स्नेह आदि का विकास। कुटुम्ब प्रमुख की आज्ञाओं का पालन - आज्ञाकारिता।  &lt;br /&gt;
# काया, वाचा, मनसा सभी से मधुर व्यवहार।  &lt;br /&gt;
# अच्छा – बेटा/बेटी, भाई/बहन, पति/पत्नि, पिता/माता, गृहस्थ/गृहिणी, रिश्तेदार आदि बनना/बनाना।  &lt;br /&gt;
# वर्णाश्रम धर्म का पालन – स्वभावज कर्म करते जाना।  &lt;br /&gt;
## सवर्ण/सजातीय विवाह  &lt;br /&gt;
## कौटुम्बिक व्यवसाय में सहभाग  &lt;br /&gt;
## ज्ञान, कौशल, श्रेष्ठ परम्पराओं का निर्वहन, परिष्कार, निर्माण और अगली पीढी को अंतरण  &lt;br /&gt;
## आयु की अवस्था के अनुसार ब्रह्मचर्य, गृहस्थ और वानप्रस्थ आदि आश्रमों के धर्म की जिम्मेदारियों का निर्वहन।  &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== कुटुम्ब में – समाज के लिए ===&lt;br /&gt;
# सामाजिक कर्तव्यों का निर्वहन &lt;br /&gt;
## समाज संगठन की प्रणालियों (कुटुंब, जाति, ग्राम, राष्ट्र) में &lt;br /&gt;
## सामाजिक व्यवस्थाओं (रक्षण, पोषण और शिक्षण) में &lt;br /&gt;
# ज्ञानार्जन, कौशलार्जन, बलार्जन और पुण्यार्जन की मानसिकता और केवल इन के लिए अटन। &lt;br /&gt;
# स्वावलंबन और परस्परावलंबन। &lt;br /&gt;
# शत्रुत्व भाववाले समाज के घटकों के साथ भी शान्ततापूर्ण और सुखी सहजीवन। &lt;br /&gt;
# एकात्मता (समाज और सृष्टि के साथ) का व्यवहार / सुख और दु:ख में सहानुभूति और सहभागिता। &lt;br /&gt;
# विभिन्न क्षेत्रों में - जैसे शासन, न्याय, समृद्धि आदि क्षेत्रों के नेता &amp;gt; आचार्य &amp;gt; धर्म । धर्म सर्वोपरि। &lt;br /&gt;
# सद्गुण, सदाचार, स्वावलंबन, सत्यनिष्ठा, सादगी, सहजता, सौन्दर्यबोध, स्वतंत्रता, संयम, स्वदेशी आदि का व्यवहार साथ ही में त्याग, तपस्या, समाधान, शान्ति, अभय, विजिगीषा आदि गुणों का विकास। &lt;br /&gt;
# मनसा, वाचा कर्मणा ‘सर्वे भवन्तु सुखिन:’ के प्रयास। &lt;br /&gt;
# वर्ण-धर्म की और जाति-धर्म की शिक्षा देना। जब लोग अपने वर्ण के अनुसार आचरण करते हैं, तब राष्ट्र की संस्कृति का विकास और रक्षण होता है। और जब लोग अपने जातिधर्म के अनुसार व्यवसाय करते हैं तब देश समृद्ध बनता है, ओर बना रहता है। &lt;br /&gt;
# धर्माचरणी और समाजभक्त / देशभक्त / राष्ट्रभक्त / परमात्मा में श्रद्धा रखने वालों का निर्माण। &lt;br /&gt;
# धर्मशिक्षा और कर्मशिक्षा। &lt;br /&gt;
# संयमित उपभोग। न्यूनतम (इष्टतम) उपभोग। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== ग्रामकुल ==&lt;br /&gt;
# ग्राम को स्वावलंबी ग्राम बनाना&lt;br /&gt;
# ग्राम की अर्थव्यवस्था को ठीक से बिठाना और चलाना&lt;br /&gt;
# संयुक्त कुटुंबों की प्रतिष्ठापना का वातावरण&lt;br /&gt;
# कौटुम्बिक उद्योगों की प्रतिष्ठापना का वातावरण&lt;br /&gt;
# कुटुम्ब भावना से प्रत्येक व्यक्ति की सम्मानपूर्ण आजीविका की व्यवस्था करना&lt;br /&gt;
# कौटुम्बिक उद्योग और जातियों में समन्वय रखना&lt;br /&gt;
# शासकीय व्यवस्थाओं के प्रति जिम्मेदारियां : कर देना, शिक्षण, पोषण और रक्षण की व्यवस्थाओं में श्रेष्ठ व्यक्तियों का और संसाधनों का योगदान देना&lt;br /&gt;
# ग्राम, एक कुल बने ऐसा वातावरण बनाए रखना।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== गुरुकुल / विद्यालय ==&lt;br /&gt;
# वर्णशिक्षा की व्यवस्था &lt;br /&gt;
# ज्ञानार्जन, कौशलार्जन, बलार्जन के लिए मार्गदर्शन &lt;br /&gt;
# शास्त्रीय शिक्षा का प्रावधान &lt;br /&gt;
# श्रेष्ठ परम्पराओं के निर्माण की शिक्षा &lt;br /&gt;
# जीवन के तत्व ज्ञान और व्यवहार की शिक्षा &lt;br /&gt;
# जीवन के लिए महत्वपूर्ण सामाजिक संगठन प्रणालियाँ और व्यवस्थाओं की समझ और यथाशक्ति योगदान की प्रेरणा। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== कौशल विधा पंचायत ==&lt;br /&gt;
# समाज की किसी एक आवश्यकता की पूर्ति करना। कभी कोई कमी न हो यह सुनिश्चित करना। &lt;br /&gt;
# धर्म के मार्गदर्शन में अपने कौशल विधा-धर्म का निर्धारण और कौशल विधा प्रणाली में प्रचार प्रसार &lt;br /&gt;
# अन्य कौशल विधाओं के साथ समन्वय &lt;br /&gt;
# राष्ट्र सर्वोपरि यह भावना सदा जाग्रत रखना &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== व्यवस्थाओं के धर्म ==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== धर्म व्यवस्था ===&lt;br /&gt;
यह कोई नियमित व्यवस्था नहीं होती। यह जाग्रत, नि:स्वार्थी, सर्वभूतहित में सदैव प्रयासरत रहनेवाले पंडितों का समूह होता है। यह समूह सक्रिय होने से समाज ठीक चलता है। आवश्यकतानुसार इस समूह की जिम्मेदारियां बढ़ जातीं है। ऐसे आपद्धर्म के निर्वहन के लिए भी यह समूह पर्याप्त सामर्थ्यवान हो। &lt;br /&gt;
# कालानुरूप धर्म को व्याख्यायित करना। &lt;br /&gt;
# वर्णों के ‘स्व’धर्मों का पालन करने की व्यवस्था की पस्तुति कर शिक्षा और शासन की मदद से समाज में उन्हें स्थापित करना। व्यक्तिगत और सामाजिक धर्म/संस्कृति के अनुसार व्यवहार का वातावरण बनाना। जब वर्ण-धर्म का पालन लोग करते हैं तब देश में संस्कृति का विकास और रक्षण होता है। जिनकी ओर देखकर लोग वर्ण धर्म का पालन कर सकें ऐसे ‘श्रेष्ठ’ लोगों का निर्माण करना। &lt;br /&gt;
# स्वाभाविक, शासनिक और आर्थिक ऐसी सभी प्रकार की स्वतन्त्रता की रक्षा करना। &lt;br /&gt;
# शासन पर अपने ज्ञान, त्याग, तपस्या, लोकसंग्रह तथा सदैव लोकहित के चिंतन के माध्यम से नैतिक दबाव निर्माण करना। शासन को सदाचारी, कुशल और सामर्थ्य संपन्न बनाए रखने के लिए मार्गदर्शन करना। अधर्माचरणी शासन को हटाकर धर्माचरणी शासन को प्रतिष्ठित करना। &lt;br /&gt;
# लोकशिक्षा (कुटुम्ब शिक्षा इसी का हिस्सा है) और विद्यालयीन शिक्षा की प्रभावी व्यवस्था करना। जैसे लिखा पढी न्यूनतम करने की दिशा में बढ़ना। वाणी / शब्द की प्रतिष्ठा बढ़ाना। जीवन को साधन सापेक्षता से साधना सापेक्षता की ओर ले जाने के लिए अपनी कथनी और करनी से मार्गदर्शन करना। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== शासन व्यवस्था ===&lt;br /&gt;
# अंतर्बाह्य शत्रुओं से लोगों की शासनिक स्वतन्त्रता की रक्षा करना।  &lt;br /&gt;
# धर्म के दायरे में रहकर दुष्टों और मूर्खों को नियंत्रण में रखना।  &lt;br /&gt;
# दंड व्यवस्था के अंतर्गत न्याय व्यवस्था का निर्माण करना। किसी पर अन्याय हो ही नहीं, ऐसी दंड व्यवस्था के निर्माण का प्रयास करना।  &lt;br /&gt;
# श्रेष्ठ शासक परम्परा निर्माण करना।  &lt;br /&gt;
# प्रभावी, समाजहित की शिक्षा देनेवाले शिक्षा केन्द्रों को संरक्षण, समर्थन और सहायता देकर और प्रभावी बनाने के लिए यथाशक्ति प्रयास करना। ऐसा करने से शासन का काम काफी सरल हो जाता है।  &lt;br /&gt;
# धर्म व्यवस्था से समय समय पर मार्गदर्शन प्राप्त करते रहना।  &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== समृद्धि व्यवस्था ===&lt;br /&gt;
# योग्य शिक्षा के द्वारा समाज में धर्म के अविरोधी इच्छाओं का ही विकास हो यह सुनिश्चित करना।&lt;br /&gt;
# समाज के प्रत्येक घटक की सभी आवश्यकताओं की पूर्ति करना, धर्म विरोधी इच्छाओं की नहीं। समाज की आर्थिक स्वतन्त्रता को अबाधित रखना।&lt;br /&gt;
# प्राकृतिक संसाधनों का न्यूनतम उपयोग हो ऐसा वातावरण बनाना। संयमित उपभोग को प्रतिष्ठित करना।&lt;br /&gt;
# प्रकृति का प्रदूषण नहीं होने देना। प्रकृति का सन्तुलन बनाए रखना।&lt;br /&gt;
# कौटुम्बिक उद्योग, जातियाँ और ग्राम मिलकर समृद्धि निर्माण होती है। ये तीनों ईकाईयाँ फलेफूले और इनका स्वस्थ ऐसा तानाबाना बना रहे ऐसा वातावरण रहे।&lt;br /&gt;
# पैसे का विनिमय न्यूनतम रहे ऐसी व्यवस्था निर्माण करना।&lt;br /&gt;
अब हम धर्म के अनुपालन की प्रक्रिया का विचार आगे करेंगे।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== धर्म अनुपालन की प्रक्रिया ==&lt;br /&gt;
हमने जाना है कि समाज के सुख, शांति, स्वतंत्रता, सुसंस्कृतता के लिए समाज का धर्मनिष्ठ होना आवश्यक होता है। यहाँ मोटे तौर पर धर्म का मतलब कर्तव्य से है। समाज धारणा के लिए कर्तव्यों पर आधारित जीवन अनिवार्य होता है। समाज धारणा के लिए धर्म-युक्त व्यवहार में आनेवाली जटिलताओं को और उसके अनुपालन की प्रक्रिया को समझने का प्रयास करेंगे। इन में व्यक्तिगत स्तर की बातों का हमने [[Personal Responsibilities (व्यक्तिगत धर्म अनुपालन)|पूर्व के अध्याय]] में विचार किया है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== विभिन्न ईकाईयों के स्तर पर ===&lt;br /&gt;
# कुटुम्ब : समाज की सभी इकाइयों के विभिन्न स्तरोंपर उचित भूमिका निभानेवाले श्रेष्ठ मानव का निर्माण करना। कौटुम्बिक व्यवसाय के माध्यम से समाज की किसी आवश्यकता की पूर्ति करना।&lt;br /&gt;
# ग्राम : ग्राम की भूमिका छोटे विश्व और बड़े कुटुम्ब की तरह ही होती है। जिस तरह कुटुम्ब के सदस्यों में आपस में पैसे का लेनदेन नहीं होता उसी तरह अच्छे ग्राम में कुटुम्बों में आपस में पैसे का लेनदेन नहीं होता। प्रत्येक की सम्मान और स्वतन्त्रता के साथ अन्न, वस्त्र, भवन, शिक्षा, आजीविका, सुरक्षा आदि सभी आवश्यकताओं की पूर्ति होती है।&lt;br /&gt;
# कौशल विधा : समाज जीवन की आवश्यकताओं की हर विधा के अनुसार व्यवसाय विधा समूह बनते हैं। इन समूहों के भी सामान्य व्यक्ति से लेकर विश्व के स्तर तक के लिए करणीय और अकरणीय कार्य होते हैं। कर्तव्य होते हैं। इन्हें व्यवसाय विधा धर्म कहेंगे। इनमें पदार्थ के उत्पादन के रूप में आर्थिक स्वतन्त्रता के किसी एक पहलू की रक्षा में योगदान करना होता है। शिक्षा / संस्कार, वस्तुएं, भावनाएं, विचार, कला आदि में से समाज जीवन की आवश्यकता में से किसी एक विधा के पदार्थ की निरंतर आपूर्ति करना। पदार्थ का अर्थ केवल वस्तु नहीं है। जिस पद याने शब्द का अर्थ होता है वह पदार्थ कहलाता है। व्यावसायिक समूह का काम कौशल का विकास करना, कौशल का पीढ़ी दर पीढ़ी अंतरण करना और अन्य व्यवसायिक समूहों से समन्वय रखना आदि है।&lt;br /&gt;
# भाषिक समूह : भाषा का मुख्य उपयोग परस्पर संवाद है। संवाद विचारों की सटीक अभिव्यक्ति करने वाला हो इस हेतु से भाषाएँ बनतीं हैं। संवाद में सहजता, सरलता, सुगमता से आत्मीयता बढ़ती है। इसी हेतु से भाषिक समूह बनते हैं।&lt;br /&gt;
# प्रादेशिक समूह : शासनिक और व्यवस्थात्मक सुविधा की दृष्टि से प्रादेशिक स्तर का मह्त्व होता है।&lt;br /&gt;
# राष्ट्र : राष्ट्र अपने समाज के लिये विविध प्रकार के संगठनों का और व्यवस्थाओं का निर्माण करता है।&lt;br /&gt;
# विश्व : पूर्व में बताई हुई 1 से लेकर 6 तक की सभी इकाइयां वैश्विक हित की अविरोधी रहें।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== प्रकृति सुसंगतता ===&lt;br /&gt;
समाज जीवन में केन्द्रिकरण और विकेंद्रीकरण का समन्वय हो यह आवश्यक है। विशाल उद्योग, बाजार की मंडियां, शासकीय कार्यालय, व्यावसायिक, भाषिक, प्रादेशिक समूहों के समन्वय की व्यवस्थाएं आदि के लिये शहरों की आवश्यकता होती है। लेकिन इनमें अनावश्यक केन्द्रीकरण न हो पाए। वनवासी या गिरिजन भी ग्राम व्यवस्था से ही जुड़े हुए होने चाहिए। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== प्रक्रियाएं ===&lt;br /&gt;
धर्म के अनुपालन में बुद्धि के स्तर पर धर्म के प्रति पर्याप्त संज्ञान, मन के स्तर पर कौटुम्बिक भावना, अनुशासन और श्रद्धा (आज्ञाकारिता) का विकास तथा शारीरिक स्तर पर सहकारिता और परोपकार की आदतें अत्यंत आवश्यक हैं।&lt;br /&gt;
# धर्म संज्ञान : ‘समझना’ यह बुद्धि का काम होता है। इसलिए जब बच्चे का बुद्धि का अंग विकसित हो रहा होता है उसे धर्म की बौद्धिक याने तर्क तथा कर्मसिद्धांत के आधार पर शिक्षा देना उचित होता है। इस दृष्टि से तर्कशास्त्र की समझ या सरल शब्दों में ‘किसी भी बात के करने से पहले चराचर के हित में उस बात को कैसे करना चाहिए’ इसे समझने की क्षमता का विकास आवश्यक होता है।&lt;br /&gt;
# कौटुम्बिक भावना का विकास : समाज के सभी परस्पर संबंधों में कौटुम्बिक भावना से व्यवहार का आधार धर्मसंज्ञान ही तो होता है। मन को बुद्धि के नियंत्रण में रखना ही मन की शिक्षा होती है। दुर्योधन के निम्न कथन से सब परिचित हैं{{Citation needed}}:&lt;br /&gt;
&amp;lt;blockquote&amp;gt;जानामी धर्मं न च में प्रवृत्ति: । जानाम्यधर्मं न च में निवृत्ति: ।।&amp;lt;/blockquote&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;ol start=&amp;quot;3&amp;quot;&amp;gt; &lt;br /&gt;
&amp;lt;li&amp;gt;धर्माचरण की आदतें: दुर्योधन के उपर्युक्त कथन को ध्यान में रखकर ही गर्भधारणा से ही बच्चे को धर्माचरण की आदतों की शिक्षा देना मह्त्वपूर्ण बन जाता है। आदत का अर्थ है जिस बात के करने में कठिनाई का अनुभव नहीं होता। जब किसी बात के बारबार करने से आचरण में यह सहजता आती है तब वह आदत बन जाती है। और जब उसे बुद्धिका अधिष्ठान मिल जाता है तब वह आदतें मनुष्य का स्वभाव ही बन जातीं हैं।&lt;br /&gt;
&amp;lt;/ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== धर्म के अनुपालन के स्तर और साधन ===&lt;br /&gt;
# धर्म के अनुपालन करनेवालों के राष्ट्रभक्त, अराष्ट्रीय और राष्ट्रद्रोही ऐसे मोटे-मोटे तीन स्तर होते हैं।&lt;br /&gt;
# धर्म के अनुपालन के साधन : धर्म का अनुपालन पूर्व में बताए अनुसार शिक्षा, आदेश, प्रायश्चित्त/ पश्चात्ताप तथा दंड ऐसा चार प्रकार से होता है। शासन दुर्बल होने से समाज में प्रमाद करनेवालों की संख्या में वृद्धि होती है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== धर्म के अनुपालन के अवरोध ===&lt;br /&gt;
धर्म के अनुपालन में निम्न बातें अवरोध-रूप होतीं हैं:&lt;br /&gt;
# भिन्न जीवनदृष्टि के लोग : शीघ्रातिशीघ्र भिन्न जीवनदृष्टि के लोगों को आत्मसात करना आवश्यक होता है। अन्यथा समाज जीवन अस्थिर और संघर्षमय बन जाता है।&lt;br /&gt;
# स्वार्थ / संकुचित अस्मिताएँ : आवश्यकताओं की पुर्ति तक तो स्वार्थ भावना समर्थनीय है। अस्मिता या अहंकार यह प्रत्येक जीवंत ईकाई का एक स्वाभाविक पहलू होता है। किन्तु जब किसी ईकाई के विशिष्ट स्तर की यह अस्मिता अपने से ऊपर की ईकाई जिसका वह हिस्सा है, उसकी अस्मिता से बड़ी लगने लगती है तब समाज जीवन की शांति नष्ट हो जाती है। इसलिए यह आवश्यक है कि मजहब, रिलिजन, प्रादेशिक अलगता, भाषिक भिन्नता, धन का अहंकार, बौद्धिक श्रेष्ठता आदि जैसी संकुचित अस्मिताएँ अपने से ऊपर की जीवंत ईकाई की अस्मिता के विरोध में नहीं हो।&lt;br /&gt;
# विपरीत शिक्षा : विपरीत या दोषपूर्ण शिक्षा यह तो सभी समस्याओं की जड़ होती है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== कारक तत्व ===&lt;br /&gt;
कारक तत्वों से मतलब है धर्मपालन में सहायता देनेवाले घटक। ये निम्न होते हैं:&lt;br /&gt;
# धर्म व्यवस्था : शासन धर्मनिष्ठ रहे यह सुनिश्चित करना धर्म व्यवस्था की जिम्मेदारी है। अपने त्याग, तपस्या, ज्ञान, लोकसंग्रह, चराचर के हित का चिन्तन, समर्पण भाव और कार्यकुशलता के आधार पर समाज से प्राप्त समर्थन प्राप्त कर वह देखे कि कोई अयोग्य व्यक्ति शासक नहीं बनें।&lt;br /&gt;
# शिक्षा : &lt;br /&gt;
## कुटुम्ब शिक्षा&lt;br /&gt;
## विद्याकेन्द्र की शिक्षा&lt;br /&gt;
## लोकशिक्षा&lt;br /&gt;
# धर्मनिष्ठ शासन: शासक का धर्मशास्त्र का जानकार होना और स्वयं धर्माचरणी होना भी आवश्यक होता है। जब शासन धर्म के अनुसार चलता है, धर्म व्यवस्थाद्वारा नियमित निर्देशित होता है तब धर्म भी स्थापित होता है और राज्य व्यवस्था भी श्रेष्ठ बनती है।&lt;br /&gt;
# धर्मनिष्ठों का सामाजिक नेतृत्व : समाज जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में धर्मनिष्ठ लोग जब अच्छी संख्या में दिखाई देते हैं तब समाज मानस धर्मनिष्ठ बनता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== चरण ==&lt;br /&gt;
धर्म का अनुपालन जब लोग स्वेच्छा से करनेवाले समाज के निर्माण के लिए दो बातें अत्यंत महत्वपूर्ण होतीं हैं। एक गर्भ में श्रेष्ठ जीवात्मा की स्थापना और दूसरे शिक्षा और संस्कार। शिक्षा और संस्कार में:&lt;br /&gt;
# जन्मपूर्व और शैशव काल में अधिजनन शास्त्र के आधार पर मार्गदर्शन। &lt;br /&gt;
# बाल्य काल : कुटुम्ब की शिक्षा के साथ विद्याकेन्द्र शिक्षा का समायोजन &lt;br /&gt;
# यौवन काल: अहंकार, बुद्धि के सही मोड़ हेतु सत्संग, प्रेरणा, वातावरण, ज्ञानार्जन/बलार्जन/कौशलार्जन आदि  &lt;br /&gt;
# प्रौढ़ावस्था: पूर्व ज्ञान/आदतों को व्यवस्थित करने के लिए सामाजिक वातावरण और मार्गदर्शन &lt;br /&gt;
## पुरोहित &lt;br /&gt;
## मेले/यात्राएं &lt;br /&gt;
## कीर्तनकार/प्रवचनकार &lt;br /&gt;
## धर्माचार्य &lt;br /&gt;
## दृक्श्राव्य माध्यम –चित्रपट, दूरदर्शन आदि &lt;br /&gt;
## आन्तरजाल &lt;br /&gt;
## कानून का डर &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== धर्म निर्णय व्यवस्था ==&lt;br /&gt;
सामान्यत: जब भी धर्म की समझ से सम्बन्धित समस्या हो तब धर्म निर्णय की व्यवस्था उपलब्ध होनी चाहिये। इस व्यवस्था के तीन स्तर होना आवश्यक है। पहला स्तर तो स्थानिक धर्म के जानकार, दूसरा जनपदीय या निकट के तीर्थक्षेत्र में धर्मज्ञ परिषद्, और तीसरा स्तर अखिल भारतीय या राष्ट्रीय धर्मज्ञ परिषद्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== माध्यम ==&lt;br /&gt;
धर्म अनुपालन करवाने के मुख्यत: दो प्रकार के माध्यम होते हैं:&lt;br /&gt;
# कुटुम्ब के दायरे में : धर्म शिक्षा का अर्थ है सदाचार की शिक्षा। धर्म की शिक्षा के लिए कुटुम्ब यह सबसे श्रेष्ठ पाठशाला है। विद्याकेन्द्र की शिक्षा तो कुटुम्ब में मिली धर्म शिक्षा की पुष्टि या आवश्यक सुधार के लिए ही होती है। कुटुम्ब में धर्म शिक्षा तीन तरह से होती है: गर्भपूर्व संस्कार, गर्भ संस्कार और शिशु संस्कार और आदतें। मनुष्य की आदतें भी बचपन में ही पक्की हो जातीं हैं।&lt;br /&gt;
# कुटुम्ब से बाहर के माध्यम : मनुष्य तो हर पल सीखता ही रहता है। इसलिए कुटुम्ब से बाहर भी वह कई बातें सीखता है। माध्यमों में मित्र मंडली, विद्यालय, समाज का सांस्कृतिक स्तर और क़ानून व्यवस्था आदि।&lt;br /&gt;
जीवन के भारतीय प्रतिमान की प्रतिष्ठापना की प्रक्रिया से अपेक्षित परिणामों की चर्चा हम [[Form of an Ideal Society (आदर्श समाज का स्वरूप)|अगले]] अध्याय में करेंगे।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[Category:Bhartiya Jeevan Pratiman (भारतीय जीवन प्रतिमान)]]&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Dilipkelkar</name></author>
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		<title>Responsibilities at Societal Level (सामाजिक धर्म अनुपालन)</title>
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		<updated>2019-07-21T07:01:38Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Dilipkelkar: /* माध्यम */&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{One source|date=January 2019}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जीवन के भारतीय प्रतिमान की पुनर्प्रतिष्ठा के लिए राष्ट्र के संगठन की विभिन्न प्रणालियों के स्तर पर उन कर्तव्यों का याने ईकाई धर्म का विचार और प्रत्यक्ष धर्म अनुपालन की प्रक्रिया कैसे चलेगी, ऐसा दो पहलुओं में हम परिवर्तन की प्रक्रिया का विचार करेंगे। वैसे तो धर्म अनुपालन की प्रक्रिया का विचार हमने समाज धारणा शास्त्र के विषय में किया है। फिर भी परिवर्तन प्रक्रिया को यहाँ फिर से दोहराना उपयुक्त होगा।   &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== विभिन्न सामाजिक प्रणालियों के धर्म ==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== कुटुम्ब ===&lt;br /&gt;
कुटुम्ब परिवर्तन का सबसे जड़मूल का माध्यम है। समाज जीवन की वह नींव होता है। वह जितना सशक्त और व्यापक भूमिका का निर्वहन करेगा समाज उतना ही श्रेष्ठ बनेगा। कुटुम्ब में दो प्रकार के काम होते हैं। पहले हैं कुटुम्ब के लिए और दूसरे हैं कुटुम्ब में याने समाज, सृष्टि के लिए। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== कुटुम्ब की – कुटुम्ब के लिए ===&lt;br /&gt;
# क्षमता और योग्यता आधारित कर्तव्य  &lt;br /&gt;
# क्षमता और योग्यता के अनुसार सार्थक योगदान  &lt;br /&gt;
# शुद्ध सस्नेहयुक्त सदाचारयुक्त परस्पर व्यवहार  &lt;br /&gt;
# बड़ों का आदर, सेवा। छोटों के लिए आदर्श और प्यार।  &lt;br /&gt;
# कुटुंबहित अपने हित से ऊपर। कर्त्तव्य परायणता। अपने कर्तव्यों के प्रति आग्रही।  &lt;br /&gt;
# स्वावलंबन / परस्परावलंबन।  &lt;br /&gt;
# कुटुम्ब के सभी काम करना आना और करना।  &lt;br /&gt;
# एकात्मता का विस्तार – कुटुंब&amp;lt; समाज&amp;lt; सृष्टि&amp;lt; विश्व। लेकिन इसकी नींव कुटुंब जीवन में ही पड़ेगी और पक्की होगी।  &lt;br /&gt;
# कौशल, ज्ञान, बल और पुण्य अर्जन की दृष्टी से अध्ययन और संस्कार  &lt;br /&gt;
# कौटुम्बिक कुशलताएँ, आदतें, रीति-रिवाज, परम्पराएँ आदि  &lt;br /&gt;
# कुटुम्ब प्रमुख सर्वोपरि : कुटुम्ब के सब ही सदस्यों को कुटुम्ब प्रमुख बनने की प्रेरणा और इस हेतु से उनके द्वारा अपना विवेक, कौशल, सयानापन, निर्णय क्षमता, अपार स्नेह आदि का विकास। कुटुम्ब प्रमुख की आज्ञाओं का पालन - आज्ञाकारिता।  &lt;br /&gt;
# काया, वाचा, मनसा सभी से मधुर व्यवहार।  &lt;br /&gt;
# अच्छा – बेटा/बेटी, भाई/बहन, पति/पत्नि, पिता/माता, गृहस्थ/गृहिणी, रिश्तेदार आदि बनना/बनाना।  &lt;br /&gt;
# वर्णाश्रम धर्म का पालन – स्वभावज कर्म करते जाना।  &lt;br /&gt;
## सवर्ण/सजातीय विवाह  &lt;br /&gt;
## कौटुम्बिक व्यवसाय में सहभाग  &lt;br /&gt;
## ज्ञान, कौशल, श्रेष्ठ परम्पराओं का निर्वहन, परिष्कार, निर्माण और अगली पीढी को अंतरण  &lt;br /&gt;
## आयु की अवस्था के अनुसार ब्रह्मचर्य, गृहस्थ और वानप्रस्थ आदि आश्रमों के धर्म की जिम्मेदारियों का निर्वहन।  &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== कुटुम्ब में – समाज के लिए ===&lt;br /&gt;
# सामाजिक कर्तव्यों का निर्वहन &lt;br /&gt;
## समाज संगठन की प्रणालियों (कुटुंब, जाति, ग्राम, राष्ट्र) में &lt;br /&gt;
## सामाजिक व्यवस्थाओं (रक्षण, पोषण और शिक्षण) में &lt;br /&gt;
# ज्ञानार्जन, कौशलार्जन, बलार्जन और पुण्यार्जन की मानसिकता और केवल इन के लिए अटन। &lt;br /&gt;
# स्वावलंबन और परस्परावलंबन। &lt;br /&gt;
# शत्रुत्व भाववाले समाज के घटकों के साथ भी शान्ततापूर्ण और सुखी सहजीवन। &lt;br /&gt;
# एकात्मता (समाज और सृष्टि के साथ) का व्यवहार / सुख और दु:ख में सहानुभूति और सहभागिता। &lt;br /&gt;
# विभिन्न क्षेत्रों में - जैसे शासन, न्याय, समृद्धि आदि क्षेत्रों के नेता &amp;gt; आचार्य &amp;gt; धर्म । धर्म सर्वोपरि। &lt;br /&gt;
# सद्गुण, सदाचार, स्वावलंबन, सत्यनिष्ठा, सादगी, सहजता, सौन्दर्यबोध, स्वतंत्रता, संयम, स्वदेशी आदि का व्यवहार साथ ही में त्याग, तपस्या, समाधान, शान्ति, अभय, विजिगीषा आदि गुणों का विकास। &lt;br /&gt;
# मनसा, वाचा कर्मणा ‘सर्वे भवन्तु सुखिन:’ के प्रयास। &lt;br /&gt;
# वर्ण-धर्म की और जाति-धर्म की शिक्षा देना। जब लोग अपने वर्ण के अनुसार आचरण करते हैं, तब राष्ट्र की संस्कृति का विकास और रक्षण होता है। और जब लोग अपने जातिधर्म के अनुसार व्यवसाय करते हैं तब देश समृद्ध बनता है, ओर बना रहता है। &lt;br /&gt;
# धर्माचरणी और समाजभक्त / देशभक्त / राष्ट्रभक्त / परमात्मा में श्रद्धा रखने वालों का निर्माण। &lt;br /&gt;
# धर्मशिक्षा और कर्मशिक्षा। &lt;br /&gt;
# संयमित उपभोग। न्यूनतम (इष्टतम) उपभोग। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== ग्रामकुल ==&lt;br /&gt;
# ग्राम को स्वावलंबी ग्राम बनाना&lt;br /&gt;
# ग्राम की अर्थव्यवस्था को ठीक से बिठाना और चलाना&lt;br /&gt;
# संयुक्त कुटुंबों की प्रतिष्ठापना का वातावरण&lt;br /&gt;
# कौटुम्बिक उद्योगों की प्रतिष्ठापना का वातावरण&lt;br /&gt;
# कुटुम्ब भावना से प्रत्येक व्यक्ति की सम्मानपूर्ण आजीविका की व्यवस्था करना&lt;br /&gt;
# कौटुम्बिक उद्योग और जातियों में समन्वय रखना&lt;br /&gt;
# शासकीय व्यवस्थाओं के प्रति जिम्मेदारियां : कर देना, शिक्षण, पोषण और रक्षण की व्यवस्थाओं में श्रेष्ठ व्यक्तियों का और संसाधनों का योगदान देना&lt;br /&gt;
# ग्राम, एक कुल बने ऐसा वातावरण बनाए रखना।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== गुरुकुल / विद्यालय ==&lt;br /&gt;
# वर्णशिक्षा की व्यवस्था &lt;br /&gt;
# ज्ञानार्जन, कौशलार्जन, बलार्जन के लिए मार्गदर्शन &lt;br /&gt;
# शास्त्रीय शिक्षा का प्रावधान &lt;br /&gt;
# श्रेष्ठ परम्पराओं के निर्माण की शिक्षा &lt;br /&gt;
# जीवन के तत्व ज्ञान और व्यवहार की शिक्षा &lt;br /&gt;
# जीवन के लिए महत्वपूर्ण सामाजिक संगठन प्रणालियाँ और व्यवस्थाओं की समझ और यथाशक्ति योगदान की प्रेरणा। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== कौशल विधा पंचायत ==&lt;br /&gt;
# समाज की किसी एक आवश्यकता की पूर्ति करना। कभी कोई कमी न हो यह सुनिश्चित करना। &lt;br /&gt;
# धर्म के मार्गदर्शन में अपने कौशल विधा-धर्म का निर्धारण और कौशल विधा प्रणाली में प्रचार प्रसार &lt;br /&gt;
# अन्य कौशल विधाओं के साथ समन्वय &lt;br /&gt;
# राष्ट्र सर्वोपरि यह भावना सदा जाग्रत रखना &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== व्यवस्थाओं के धर्म ==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== धर्म व्यवस्था ===&lt;br /&gt;
यह कोई नियमित व्यवस्था नहीं होती। यह जाग्रत, नि:स्वार्थी, सर्वभूतहित में सदैव प्रयासरत रहनेवाले पंडितों का समूह होता है। यह समूह सक्रिय होने से समाज ठीक चलता है। आवश्यकतानुसार इस समूह की जिम्मेदारियां बढ़ जातीं है। ऐसे आपद्धर्म के निर्वहन के लिए भी यह समूह पर्याप्त सामर्थ्यवान हो। &lt;br /&gt;
# कालानुरूप धर्म को व्याख्यायित करना। &lt;br /&gt;
# वर्णों के ‘स्व’धर्मों का पालन करने की व्यवस्था की पस्तुति कर शिक्षा और शासन की मदद से समाज में उन्हें स्थापित करना। व्यक्तिगत और सामाजिक धर्म/संस्कृति के अनुसार व्यवहार का वातावरण बनाना। जब वर्ण-धर्म का पालन लोग करते हैं तब देश में संस्कृति का विकास और रक्षण होता है। जिनकी ओर देखकर लोग वर्ण धर्म का पालन कर सकें ऐसे ‘श्रेष्ठ’ लोगों का निर्माण करना। &lt;br /&gt;
# स्वाभाविक, शासनिक और आर्थिक ऐसी सभी प्रकार की स्वतन्त्रता की रक्षा करना। &lt;br /&gt;
# शासन पर अपने ज्ञान, त्याग, तपस्या, लोकसंग्रह तथा सदैव लोकहित के चिंतन के माध्यम से नैतिक दबाव निर्माण करना। शासन को सदाचारी, कुशल और सामर्थ्य संपन्न बनाए रखने के लिए मार्गदर्शन करना। अधर्माचरणी शासन को हटाकर धर्माचरणी शासन को प्रतिष्ठित करना। &lt;br /&gt;
# लोकशिक्षा (कुटुम्ब शिक्षा इसी का हिस्सा है) और विद्यालयीन शिक्षा की प्रभावी व्यवस्था करना। जैसे लिखा पढी न्यूनतम करने की दिशा में बढ़ना। वाणी / शब्द की प्रतिष्ठा बढ़ाना। जीवन को साधन सापेक्षता से साधना सापेक्षता की ओर ले जाने के लिए अपनी कथनी और करनी से मार्गदर्शन करना। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== शासन व्यवस्था ===&lt;br /&gt;
# अंतर्बाह्य शत्रुओं से लोगों की शासनिक स्वतन्त्रता की रक्षा करना।  &lt;br /&gt;
# धर्म के दायरे में रहकर दुष्टों और मूर्खों को नियंत्रण में रखना।  &lt;br /&gt;
# दंड व्यवस्था के अंतर्गत न्याय व्यवस्था का निर्माण करना। किसी पर अन्याय हो ही नहीं, ऐसी दंड व्यवस्था के निर्माण का प्रयास करना।  &lt;br /&gt;
# श्रेष्ठ शासक परम्परा निर्माण करना।  &lt;br /&gt;
# प्रभावी, समाजहित की शिक्षा देनेवाले शिक्षा केन्द्रों को संरक्षण, समर्थन और सहायता देकर और प्रभावी बनाने के लिए यथाशक्ति प्रयास करना। ऐसा करने से शासन का काम काफी सरल हो जाता है।  &lt;br /&gt;
# धर्म व्यवस्था से समय समय पर मार्गदर्शन प्राप्त करते रहना।  &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== समृद्धि व्यवस्था ===&lt;br /&gt;
# योग्य शिक्षा के द्वारा समाज में धर्म के अविरोधी इच्छाओं का ही विकास हो यह सुनिश्चित करना।&lt;br /&gt;
# समाज के प्रत्येक घटक की सभी आवश्यकताओं की पूर्ति करना, धर्म विरोधी इच्छाओं की नहीं। समाज की आर्थिक स्वतन्त्रता को अबाधित रखना।&lt;br /&gt;
# प्राकृतिक संसाधनों का न्यूनतम उपयोग हो ऐसा वातावरण बनाना। संयमित उपभोग को प्रतिष्ठित करना।&lt;br /&gt;
# प्रकृति का प्रदूषण नहीं होने देना। प्रकृति का सन्तुलन बनाए रखना।&lt;br /&gt;
# कौटुम्बिक उद्योग, जातियाँ और ग्राम मिलकर समृद्धि निर्माण होती है। ये तीनों ईकाईयाँ फलेफूले और इनका स्वस्थ ऐसा तानाबाना बना रहे ऐसा वातावरण रहे।&lt;br /&gt;
# पैसे का विनिमय न्यूनतम रहे ऐसी व्यवस्था निर्माण करना।&lt;br /&gt;
अब हम धर्म के अनुपालन की प्रक्रिया का विचार आगे करेंगे।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== धर्म अनुपालन की प्रक्रिया ==&lt;br /&gt;
हमने जाना है कि समाज के सुख, शांति, स्वतंत्रता, सुसंस्कृतता के लिए समाज का धर्मनिष्ठ होना आवश्यक होता है। यहाँ मोटे तौर पर धर्म का मतलब कर्तव्य से है। समाज धारणा के लिए कर्तव्यों पर आधारित जीवन अनिवार्य होता है। समाज धारणा के लिए धर्म-युक्त व्यवहार में आनेवाली जटिलताओं को और उसके अनुपालन की प्रक्रिया को समझने का प्रयास करेंगे। इन में व्यक्तिगत स्तर की बातों का हमने [[Personal Responsibilities (व्यक्तिगत धर्म अनुपालन)|पूर्व के अध्याय]] में विचार किया है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== विभिन्न ईकाईयों के स्तर पर ===&lt;br /&gt;
# कुटुम्ब : समाज की सभी इकाइयों के विभिन्न स्तरोंपर उचित भूमिका निभानेवाले श्रेष्ठ मानव का निर्माण करना। कौटुम्बिक व्यवसाय के माध्यम से समाज की किसी आवश्यकता की पूर्ति करना।&lt;br /&gt;
# ग्राम : ग्राम की भूमिका छोटे विश्व और बड़े कुटुम्ब की तरह ही होती है। जिस तरह कुटुम्ब के सदस्यों में आपस में पैसे का लेनदेन नहीं होता उसी तरह अच्छे ग्राम में कुटुम्बों में आपस में पैसे का लेनदेन नहीं होता। प्रत्येक की सम्मान और स्वतन्त्रता के साथ अन्न, वस्त्र, भवन, शिक्षा, आजीविका, सुरक्षा आदि सभी आवश्यकताओं की पूर्ति होती है।&lt;br /&gt;
# कौशल विधा : समाज जीवन की आवश्यकताओं की हर विधा के अनुसार व्यवसाय विधा समूह बनते हैं। इन समूहों के भी सामान्य व्यक्ति से लेकर विश्व के स्तर तक के लिए करणीय और अकरणीय कार्य होते हैं। कर्तव्य होते हैं। इन्हें व्यवसाय विधा धर्म कहेंगे। इनमें पदार्थ के उत्पादन के रूप में आर्थिक स्वतन्त्रता के किसी एक पहलू की रक्षा में योगदान करना होता है। शिक्षा / संस्कार, वस्तुएं, भावनाएं, विचार, कला आदि में से समाज जीवन की आवश्यकता में से किसी एक विधा के पदार्थ की निरंतर आपूर्ति करना। पदार्थ का अर्थ केवल वस्तु नहीं है। जिस पद याने शब्द का अर्थ होता है वह पदार्थ कहलाता है। व्यावसायिक समूह का काम कौशल का विकास करना, कौशल का पीढ़ी दर पीढ़ी अंतरण करना और अन्य व्यवसायिक समूहों से समन्वय रखना आदि है।&lt;br /&gt;
# भाषिक समूह : भाषा का मुख्य उपयोग परस्पर संवाद है। संवाद विचारों की सटीक अभिव्यक्ति करने वाला हो इस हेतु से भाषाएँ बनतीं हैं। संवाद में सहजता, सरलता, सुगमता से आत्मीयता बढ़ती है। इसी हेतु से भाषिक समूह बनते हैं।&lt;br /&gt;
# प्रादेशिक समूह : शासनिक और व्यवस्थात्मक सुविधा की दृष्टि से प्रादेशिक स्तर का मह्त्व होता है।&lt;br /&gt;
# राष्ट्र : राष्ट्र अपने समाज के लिये विविध प्रकार के संगठनों का और व्यवस्थाओं का निर्माण करता है।&lt;br /&gt;
# विश्व : पूर्व में बताई हुई 1 से लेकर 6 तक की सभी इकाइयां वैश्विक हित की अविरोधी रहें।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== प्रकृति सुसंगतता ===&lt;br /&gt;
समाज जीवन में केन्द्रिकरण और विकेंद्रीकरण का समन्वय हो यह आवश्यक है। विशाल उद्योग, बाजार की मंडियां, शासकीय कार्यालय, व्यावसायिक, भाषिक, प्रादेशिक समूहों के समन्वय की व्यवस्थाएं आदि के लिये शहरों की आवश्यकता होती है। लेकिन इनमें अनावश्यक केन्द्रीकरण न हो पाए। वनवासी या गिरिजन भी ग्राम व्यवस्था से ही जुड़े हुए होने चाहिए। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== प्रक्रियाएं ===&lt;br /&gt;
धर्म के अनुपालन में बुद्धि के स्तर पर धर्म के प्रति पर्याप्त संज्ञान, मन के स्तर पर कौटुम्बिक भावना, अनुशासन और श्रद्धा (आज्ञाकारिता) का विकास तथा शारीरिक स्तर पर सहकारिता और परोपकार की आदतें अत्यंत आवश्यक हैं।&lt;br /&gt;
# धर्म संज्ञान : ‘समझना’ यह बुद्धि का काम होता है। इसलिए जब बच्चे का बुद्धि का अंग विकसित हो रहा होता है उसे धर्म की बौद्धिक याने तर्क तथा कर्मसिद्धांत के आधार पर शिक्षा देना उचित होता है। इस दृष्टि से तर्कशास्त्र की समझ या सरल शब्दों में ‘किसी भी बात के करने से पहले चराचर के हित में उस बात को कैसे करना चाहिए’ इसे समझने की क्षमता का विकास आवश्यक होता है।&lt;br /&gt;
# कौटुम्बिक भावना का विकास : समाज के सभी परस्पर संबंधों में कौटुम्बिक भावना से व्यवहार का आधार धर्मसंज्ञान ही तो होता है। मन को बुद्धि के नियंत्रण में रखना ही मन की शिक्षा होती है। दुर्योधन के निम्न कथन से सब परिचित हैं{{Citation needed}}:&lt;br /&gt;
&amp;lt;blockquote&amp;gt;जानामी धर्मं न च में प्रवृत्ति: । जानाम्यधर्मं न च में निवृत्ति: ।।&amp;lt;/blockquote&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;ol start=&amp;quot;3&amp;quot;&amp;gt; &lt;br /&gt;
&amp;lt;li&amp;gt;धर्माचरण की आदतें: दुर्योधन के उपर्युक्त कथन को ध्यान में रखकर ही गर्भधारणा से ही बच्चे को धर्माचरण की आदतों की शिक्षा देना मह्त्वपूर्ण बन जाता है। आदत का अर्थ है जिस बात के करने में कठिनाई का अनुभव नहीं होता। जब किसी बात के बारबार करने से आचरण में यह सहजता आती है तब वह आदत बन जाती है। और जब उसे बुद्धिका अधिष्ठान मिल जाता है तब वह आदतें मनुष्य का स्वभाव ही बन जातीं हैं।&lt;br /&gt;
&amp;lt;/ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== धर्म के अनुपालन के स्तर और साधन ===&lt;br /&gt;
# धर्म के अनुपालन करनेवालों के राष्ट्रभक्त, अराष्ट्रीय और राष्ट्रद्रोही ऐसे मोटे-मोटे तीन स्तर होते हैं।&lt;br /&gt;
# धर्म के अनुपालन के साधन : धर्म का अनुपालन पूर्व में बताए अनुसार शिक्षा, आदेश, प्रायश्चित्त/ पश्चात्ताप तथा दंड ऐसा चार प्रकार से होता है। शासन दुर्बल होने से समाज में प्रमाद करनेवालों की संख्या में वृद्धि होती है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== धर्म के अनुपालन के अवरोध ===&lt;br /&gt;
धर्म के अनुपालन में निम्न बातें अवरोध-रूप होतीं हैं:&lt;br /&gt;
# भिन्न जीवनदृष्टि के लोग : शीघ्रातिशीघ्र भिन्न जीवनदृष्टि के लोगों को आत्मसात करना आवश्यक होता है। अन्यथा समाज जीवन अस्थिर और संघर्षमय बन जाता है।&lt;br /&gt;
# स्वार्थ / संकुचित अस्मिताएँ : आवश्यकताओं की पुर्ति तक तो स्वार्थ भावना समर्थनीय है। अस्मिता या अहंकार यह प्रत्येक जीवंत ईकाई का एक स्वाभाविक पहलू होता है। किन्तु जब किसी ईकाई के विशिष्ट स्तर की यह अस्मिता अपने से ऊपर की ईकाई जिसका वह हिस्सा है, उसकी अस्मिता से बड़ी लगने लगती है तब समाज जीवन की शांति नष्ट हो जाती है। इसलिए यह आवश्यक है कि मजहब, रिलिजन, प्रादेशिक अलगता, भाषिक भिन्नता, धन का अहंकार, बौद्धिक श्रेष्ठता आदि जैसी संकुचित अस्मिताएँ अपने से ऊपर की जीवंत ईकाई की अस्मिता के विरोध में नहीं हो।&lt;br /&gt;
# विपरीत शिक्षा : विपरीत या दोषपूर्ण शिक्षा यह तो सभी समस्याओं की जड़ होती है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== कारक तत्व ===&lt;br /&gt;
कारक तत्वों से मतलब है धर्मपालन में सहायता देनेवाले घटक। ये निम्न होते हैं:&lt;br /&gt;
# धर्म व्यवस्था : शासन धर्मनिष्ठ रहे यह सुनिश्चित करना धर्म व्यवस्था की जिम्मेदारी है। अपने त्याग, तपस्या, ज्ञान, लोकसंग्रह, चराचर के हित का चिन्तन, समर्पण भाव और कार्यकुशलता के आधार पर समाज से प्राप्त समर्थन प्राप्त कर वह देखे कि कोई अयोग्य व्यक्ति शासक नहीं बनें।&lt;br /&gt;
# शिक्षा : &lt;br /&gt;
## कुटुम्ब शिक्षा&lt;br /&gt;
## विद्याकेन्द्र की शिक्षा&lt;br /&gt;
## लोकशिक्षा&lt;br /&gt;
# धर्मनिष्ठ शासन: शासक का धर्मशास्त्र का जानकार होना और स्वयं धर्माचरणी होना भी आवश्यक होता है। जब शासन धर्म के अनुसार चलता है, धर्म व्यवस्थाद्वारा नियमित निर्देशित होता है तब धर्म भी स्थापित होता है और राज्य व्यवस्था भी श्रेष्ठ बनती है।&lt;br /&gt;
# धर्मनिष्ठों का सामाजिक नेतृत्व : समाज जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में धर्मनिष्ठ लोग जब अच्छी संख्या में दिखाई देते हैं तब समाज मानस धर्मनिष्ठ बनता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== चरण ==&lt;br /&gt;
धर्म का अनुपालन जब लोग स्वेच्छा से करनेवाले समाज के निर्माण के लिए दो बातें अत्यंत महत्वपूर्ण होतीं हैं। एक गर्भ में श्रेष्ठ जीवात्मा की स्थापना और दूसरे शिक्षा और संस्कार। शिक्षा और संस्कार में:&lt;br /&gt;
# जन्मपूर्व और शैशव काल में अधिजनन शास्त्र के आधार पर मार्गदर्शन। &lt;br /&gt;
# बाल्य काल : कुटुम्ब की शिक्षा के साथ विद्याकेन्द्र शिक्षा का समायोजन &lt;br /&gt;
# यौवन काल: अहंकार, बुद्धि के सही मोड़ हेतु सत्संग, प्रेरणा, वातावरण, ज्ञानार्जन/बलार्जन/कौशलार्जन आदि  &lt;br /&gt;
# प्रौढ़ावस्था: पूर्व ज्ञान/आदतों को व्यवस्थित करने के लिए सामाजिक वातावरण और मार्गदर्शन &lt;br /&gt;
## पुरोहित &lt;br /&gt;
## मेले/यात्राएं &lt;br /&gt;
## कीर्तनकार/प्रवचनकार &lt;br /&gt;
## धर्माचार्य &lt;br /&gt;
## दृक्श्राव्य माध्यम –चित्रपट, दूरदर्शन आदि &lt;br /&gt;
## आन्तरजाल &lt;br /&gt;
## कानून का डर &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== धर्म निर्णय व्यवस्था ==&lt;br /&gt;
सामान्यत: जब भी धर्म की समझ से सम्बन्धित समस्या हो तब धर्म निर्णय की व्यवस्था उपलब्ध होनी चाहिये। इस व्यवस्था के तीन स्तर होना आवश्यक है। पहला स्तर तो स्थानिक धर्म के जानकार, दूसरा जनपदीय या निकट के तीर्थक्षेत्र में धर्मज्ञ परिषद्, और तीसरा स्तर अखिल भारतीय या राष्ट्रीय धर्मज्ञ परिषद्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== माध्यम ==&lt;br /&gt;
धर्म अनुपालन करवाने के मुख्यत: दो प्रकार के माध्यम होते हैं। &lt;br /&gt;
९.१ कुटुम्ब के दायरे में : धर्म शिक्षा का अर्थ है सदाचार की शिक्षा। धर्म की शिक्षा के लिए कुटुम्ब यह सबसे श्रेष्ठ पाठशाला है। विद्याकेन्द्र की शिक्षा तो कुटुम्ब में मिली धर्म शिक्षा की पुष्टि या आवश्यक सुधार के लिए ही होती है। कुटुम्ब में धर्म शिक्षा तीन तरह से होती है। गर्भपूर्व संस्कार, गर्भ संस्कार और शिशु संस्कार और आदतें। मनुष्य की आदतें भी बचपन में ही पक्की हो जातीं हैं। &lt;br /&gt;
९.२ कुटुम्ब से बाहर के माध्यम : मनुष्य तो हर पल सीखता ही रहता है। इसलिए कुटुम्ब से बाहर भी वह कई बातें सीखता है। माध्यमों में मित्र मंडली, विद्यालय, समाज का सांस्कृतिक स्तर और क़ानून व्यवस्था आदि।&lt;br /&gt;
जीवन के भारतीय प्रतिमान की प्रतिष्ठापना की प्रक्रिया से अपेक्षित परिणामों की चर्चा हम [[Form of an Ideal Society (आदर्श समाज का स्वरूप)|अगले]] अध्याय में करेंगे।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[Category:Bhartiya Jeevan Pratiman (भारतीय जीवन प्रतिमान)]]&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Dilipkelkar</name></author>
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		<title>Responsibilities at Societal Level (सामाजिक धर्म अनुपालन)</title>
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		<updated>2019-07-21T07:01:18Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Dilipkelkar: /* धर्म निर्णय व्यवस्था */&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{One source|date=January 2019}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जीवन के भारतीय प्रतिमान की पुनर्प्रतिष्ठा के लिए राष्ट्र के संगठन की विभिन्न प्रणालियों के स्तर पर उन कर्तव्यों का याने ईकाई धर्म का विचार और प्रत्यक्ष धर्म अनुपालन की प्रक्रिया कैसे चलेगी, ऐसा दो पहलुओं में हम परिवर्तन की प्रक्रिया का विचार करेंगे। वैसे तो धर्म अनुपालन की प्रक्रिया का विचार हमने समाज धारणा शास्त्र के विषय में किया है। फिर भी परिवर्तन प्रक्रिया को यहाँ फिर से दोहराना उपयुक्त होगा।   &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== विभिन्न सामाजिक प्रणालियों के धर्म ==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== कुटुम्ब ===&lt;br /&gt;
कुटुम्ब परिवर्तन का सबसे जड़मूल का माध्यम है। समाज जीवन की वह नींव होता है। वह जितना सशक्त और व्यापक भूमिका का निर्वहन करेगा समाज उतना ही श्रेष्ठ बनेगा। कुटुम्ब में दो प्रकार के काम होते हैं। पहले हैं कुटुम्ब के लिए और दूसरे हैं कुटुम्ब में याने समाज, सृष्टि के लिए। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== कुटुम्ब की – कुटुम्ब के लिए ===&lt;br /&gt;
# क्षमता और योग्यता आधारित कर्तव्य  &lt;br /&gt;
# क्षमता और योग्यता के अनुसार सार्थक योगदान  &lt;br /&gt;
# शुद्ध सस्नेहयुक्त सदाचारयुक्त परस्पर व्यवहार  &lt;br /&gt;
# बड़ों का आदर, सेवा। छोटों के लिए आदर्श और प्यार।  &lt;br /&gt;
# कुटुंबहित अपने हित से ऊपर। कर्त्तव्य परायणता। अपने कर्तव्यों के प्रति आग्रही।  &lt;br /&gt;
# स्वावलंबन / परस्परावलंबन।  &lt;br /&gt;
# कुटुम्ब के सभी काम करना आना और करना।  &lt;br /&gt;
# एकात्मता का विस्तार – कुटुंब&amp;lt; समाज&amp;lt; सृष्टि&amp;lt; विश्व। लेकिन इसकी नींव कुटुंब जीवन में ही पड़ेगी और पक्की होगी।  &lt;br /&gt;
# कौशल, ज्ञान, बल और पुण्य अर्जन की दृष्टी से अध्ययन और संस्कार  &lt;br /&gt;
# कौटुम्बिक कुशलताएँ, आदतें, रीति-रिवाज, परम्पराएँ आदि  &lt;br /&gt;
# कुटुम्ब प्रमुख सर्वोपरि : कुटुम्ब के सब ही सदस्यों को कुटुम्ब प्रमुख बनने की प्रेरणा और इस हेतु से उनके द्वारा अपना विवेक, कौशल, सयानापन, निर्णय क्षमता, अपार स्नेह आदि का विकास। कुटुम्ब प्रमुख की आज्ञाओं का पालन - आज्ञाकारिता।  &lt;br /&gt;
# काया, वाचा, मनसा सभी से मधुर व्यवहार।  &lt;br /&gt;
# अच्छा – बेटा/बेटी, भाई/बहन, पति/पत्नि, पिता/माता, गृहस्थ/गृहिणी, रिश्तेदार आदि बनना/बनाना।  &lt;br /&gt;
# वर्णाश्रम धर्म का पालन – स्वभावज कर्म करते जाना।  &lt;br /&gt;
## सवर्ण/सजातीय विवाह  &lt;br /&gt;
## कौटुम्बिक व्यवसाय में सहभाग  &lt;br /&gt;
## ज्ञान, कौशल, श्रेष्ठ परम्पराओं का निर्वहन, परिष्कार, निर्माण और अगली पीढी को अंतरण  &lt;br /&gt;
## आयु की अवस्था के अनुसार ब्रह्मचर्य, गृहस्थ और वानप्रस्थ आदि आश्रमों के धर्म की जिम्मेदारियों का निर्वहन।  &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== कुटुम्ब में – समाज के लिए ===&lt;br /&gt;
# सामाजिक कर्तव्यों का निर्वहन &lt;br /&gt;
## समाज संगठन की प्रणालियों (कुटुंब, जाति, ग्राम, राष्ट्र) में &lt;br /&gt;
## सामाजिक व्यवस्थाओं (रक्षण, पोषण और शिक्षण) में &lt;br /&gt;
# ज्ञानार्जन, कौशलार्जन, बलार्जन और पुण्यार्जन की मानसिकता और केवल इन के लिए अटन। &lt;br /&gt;
# स्वावलंबन और परस्परावलंबन। &lt;br /&gt;
# शत्रुत्व भाववाले समाज के घटकों के साथ भी शान्ततापूर्ण और सुखी सहजीवन। &lt;br /&gt;
# एकात्मता (समाज और सृष्टि के साथ) का व्यवहार / सुख और दु:ख में सहानुभूति और सहभागिता। &lt;br /&gt;
# विभिन्न क्षेत्रों में - जैसे शासन, न्याय, समृद्धि आदि क्षेत्रों के नेता &amp;gt; आचार्य &amp;gt; धर्म । धर्म सर्वोपरि। &lt;br /&gt;
# सद्गुण, सदाचार, स्वावलंबन, सत्यनिष्ठा, सादगी, सहजता, सौन्दर्यबोध, स्वतंत्रता, संयम, स्वदेशी आदि का व्यवहार साथ ही में त्याग, तपस्या, समाधान, शान्ति, अभय, विजिगीषा आदि गुणों का विकास। &lt;br /&gt;
# मनसा, वाचा कर्मणा ‘सर्वे भवन्तु सुखिन:’ के प्रयास। &lt;br /&gt;
# वर्ण-धर्म की और जाति-धर्म की शिक्षा देना। जब लोग अपने वर्ण के अनुसार आचरण करते हैं, तब राष्ट्र की संस्कृति का विकास और रक्षण होता है। और जब लोग अपने जातिधर्म के अनुसार व्यवसाय करते हैं तब देश समृद्ध बनता है, ओर बना रहता है। &lt;br /&gt;
# धर्माचरणी और समाजभक्त / देशभक्त / राष्ट्रभक्त / परमात्मा में श्रद्धा रखने वालों का निर्माण। &lt;br /&gt;
# धर्मशिक्षा और कर्मशिक्षा। &lt;br /&gt;
# संयमित उपभोग। न्यूनतम (इष्टतम) उपभोग। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== ग्रामकुल ==&lt;br /&gt;
# ग्राम को स्वावलंबी ग्राम बनाना&lt;br /&gt;
# ग्राम की अर्थव्यवस्था को ठीक से बिठाना और चलाना&lt;br /&gt;
# संयुक्त कुटुंबों की प्रतिष्ठापना का वातावरण&lt;br /&gt;
# कौटुम्बिक उद्योगों की प्रतिष्ठापना का वातावरण&lt;br /&gt;
# कुटुम्ब भावना से प्रत्येक व्यक्ति की सम्मानपूर्ण आजीविका की व्यवस्था करना&lt;br /&gt;
# कौटुम्बिक उद्योग और जातियों में समन्वय रखना&lt;br /&gt;
# शासकीय व्यवस्थाओं के प्रति जिम्मेदारियां : कर देना, शिक्षण, पोषण और रक्षण की व्यवस्थाओं में श्रेष्ठ व्यक्तियों का और संसाधनों का योगदान देना&lt;br /&gt;
# ग्राम, एक कुल बने ऐसा वातावरण बनाए रखना।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== गुरुकुल / विद्यालय ==&lt;br /&gt;
# वर्णशिक्षा की व्यवस्था &lt;br /&gt;
# ज्ञानार्जन, कौशलार्जन, बलार्जन के लिए मार्गदर्शन &lt;br /&gt;
# शास्त्रीय शिक्षा का प्रावधान &lt;br /&gt;
# श्रेष्ठ परम्पराओं के निर्माण की शिक्षा &lt;br /&gt;
# जीवन के तत्व ज्ञान और व्यवहार की शिक्षा &lt;br /&gt;
# जीवन के लिए महत्वपूर्ण सामाजिक संगठन प्रणालियाँ और व्यवस्थाओं की समझ और यथाशक्ति योगदान की प्रेरणा। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== कौशल विधा पंचायत ==&lt;br /&gt;
# समाज की किसी एक आवश्यकता की पूर्ति करना। कभी कोई कमी न हो यह सुनिश्चित करना। &lt;br /&gt;
# धर्म के मार्गदर्शन में अपने कौशल विधा-धर्म का निर्धारण और कौशल विधा प्रणाली में प्रचार प्रसार &lt;br /&gt;
# अन्य कौशल विधाओं के साथ समन्वय &lt;br /&gt;
# राष्ट्र सर्वोपरि यह भावना सदा जाग्रत रखना &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== व्यवस्थाओं के धर्म ==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== धर्म व्यवस्था ===&lt;br /&gt;
यह कोई नियमित व्यवस्था नहीं होती। यह जाग्रत, नि:स्वार्थी, सर्वभूतहित में सदैव प्रयासरत रहनेवाले पंडितों का समूह होता है। यह समूह सक्रिय होने से समाज ठीक चलता है। आवश्यकतानुसार इस समूह की जिम्मेदारियां बढ़ जातीं है। ऐसे आपद्धर्म के निर्वहन के लिए भी यह समूह पर्याप्त सामर्थ्यवान हो। &lt;br /&gt;
# कालानुरूप धर्म को व्याख्यायित करना। &lt;br /&gt;
# वर्णों के ‘स्व’धर्मों का पालन करने की व्यवस्था की पस्तुति कर शिक्षा और शासन की मदद से समाज में उन्हें स्थापित करना। व्यक्तिगत और सामाजिक धर्म/संस्कृति के अनुसार व्यवहार का वातावरण बनाना। जब वर्ण-धर्म का पालन लोग करते हैं तब देश में संस्कृति का विकास और रक्षण होता है। जिनकी ओर देखकर लोग वर्ण धर्म का पालन कर सकें ऐसे ‘श्रेष्ठ’ लोगों का निर्माण करना। &lt;br /&gt;
# स्वाभाविक, शासनिक और आर्थिक ऐसी सभी प्रकार की स्वतन्त्रता की रक्षा करना। &lt;br /&gt;
# शासन पर अपने ज्ञान, त्याग, तपस्या, लोकसंग्रह तथा सदैव लोकहित के चिंतन के माध्यम से नैतिक दबाव निर्माण करना। शासन को सदाचारी, कुशल और सामर्थ्य संपन्न बनाए रखने के लिए मार्गदर्शन करना। अधर्माचरणी शासन को हटाकर धर्माचरणी शासन को प्रतिष्ठित करना। &lt;br /&gt;
# लोकशिक्षा (कुटुम्ब शिक्षा इसी का हिस्सा है) और विद्यालयीन शिक्षा की प्रभावी व्यवस्था करना। जैसे लिखा पढी न्यूनतम करने की दिशा में बढ़ना। वाणी / शब्द की प्रतिष्ठा बढ़ाना। जीवन को साधन सापेक्षता से साधना सापेक्षता की ओर ले जाने के लिए अपनी कथनी और करनी से मार्गदर्शन करना। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== शासन व्यवस्था ===&lt;br /&gt;
# अंतर्बाह्य शत्रुओं से लोगों की शासनिक स्वतन्त्रता की रक्षा करना।  &lt;br /&gt;
# धर्म के दायरे में रहकर दुष्टों और मूर्खों को नियंत्रण में रखना।  &lt;br /&gt;
# दंड व्यवस्था के अंतर्गत न्याय व्यवस्था का निर्माण करना। किसी पर अन्याय हो ही नहीं, ऐसी दंड व्यवस्था के निर्माण का प्रयास करना।  &lt;br /&gt;
# श्रेष्ठ शासक परम्परा निर्माण करना।  &lt;br /&gt;
# प्रभावी, समाजहित की शिक्षा देनेवाले शिक्षा केन्द्रों को संरक्षण, समर्थन और सहायता देकर और प्रभावी बनाने के लिए यथाशक्ति प्रयास करना। ऐसा करने से शासन का काम काफी सरल हो जाता है।  &lt;br /&gt;
# धर्म व्यवस्था से समय समय पर मार्गदर्शन प्राप्त करते रहना।  &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== समृद्धि व्यवस्था ===&lt;br /&gt;
# योग्य शिक्षा के द्वारा समाज में धर्म के अविरोधी इच्छाओं का ही विकास हो यह सुनिश्चित करना।&lt;br /&gt;
# समाज के प्रत्येक घटक की सभी आवश्यकताओं की पूर्ति करना, धर्म विरोधी इच्छाओं की नहीं। समाज की आर्थिक स्वतन्त्रता को अबाधित रखना।&lt;br /&gt;
# प्राकृतिक संसाधनों का न्यूनतम उपयोग हो ऐसा वातावरण बनाना। संयमित उपभोग को प्रतिष्ठित करना।&lt;br /&gt;
# प्रकृति का प्रदूषण नहीं होने देना। प्रकृति का सन्तुलन बनाए रखना।&lt;br /&gt;
# कौटुम्बिक उद्योग, जातियाँ और ग्राम मिलकर समृद्धि निर्माण होती है। ये तीनों ईकाईयाँ फलेफूले और इनका स्वस्थ ऐसा तानाबाना बना रहे ऐसा वातावरण रहे।&lt;br /&gt;
# पैसे का विनिमय न्यूनतम रहे ऐसी व्यवस्था निर्माण करना।&lt;br /&gt;
अब हम धर्म के अनुपालन की प्रक्रिया का विचार आगे करेंगे।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== धर्म अनुपालन की प्रक्रिया ==&lt;br /&gt;
हमने जाना है कि समाज के सुख, शांति, स्वतंत्रता, सुसंस्कृतता के लिए समाज का धर्मनिष्ठ होना आवश्यक होता है। यहाँ मोटे तौर पर धर्म का मतलब कर्तव्य से है। समाज धारणा के लिए कर्तव्यों पर आधारित जीवन अनिवार्य होता है। समाज धारणा के लिए धर्म-युक्त व्यवहार में आनेवाली जटिलताओं को और उसके अनुपालन की प्रक्रिया को समझने का प्रयास करेंगे। इन में व्यक्तिगत स्तर की बातों का हमने [[Personal Responsibilities (व्यक्तिगत धर्म अनुपालन)|पूर्व के अध्याय]] में विचार किया है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== विभिन्न ईकाईयों के स्तर पर ===&lt;br /&gt;
# कुटुम्ब : समाज की सभी इकाइयों के विभिन्न स्तरोंपर उचित भूमिका निभानेवाले श्रेष्ठ मानव का निर्माण करना। कौटुम्बिक व्यवसाय के माध्यम से समाज की किसी आवश्यकता की पूर्ति करना।&lt;br /&gt;
# ग्राम : ग्राम की भूमिका छोटे विश्व और बड़े कुटुम्ब की तरह ही होती है। जिस तरह कुटुम्ब के सदस्यों में आपस में पैसे का लेनदेन नहीं होता उसी तरह अच्छे ग्राम में कुटुम्बों में आपस में पैसे का लेनदेन नहीं होता। प्रत्येक की सम्मान और स्वतन्त्रता के साथ अन्न, वस्त्र, भवन, शिक्षा, आजीविका, सुरक्षा आदि सभी आवश्यकताओं की पूर्ति होती है।&lt;br /&gt;
# कौशल विधा : समाज जीवन की आवश्यकताओं की हर विधा के अनुसार व्यवसाय विधा समूह बनते हैं। इन समूहों के भी सामान्य व्यक्ति से लेकर विश्व के स्तर तक के लिए करणीय और अकरणीय कार्य होते हैं। कर्तव्य होते हैं। इन्हें व्यवसाय विधा धर्म कहेंगे। इनमें पदार्थ के उत्पादन के रूप में आर्थिक स्वतन्त्रता के किसी एक पहलू की रक्षा में योगदान करना होता है। शिक्षा / संस्कार, वस्तुएं, भावनाएं, विचार, कला आदि में से समाज जीवन की आवश्यकता में से किसी एक विधा के पदार्थ की निरंतर आपूर्ति करना। पदार्थ का अर्थ केवल वस्तु नहीं है। जिस पद याने शब्द का अर्थ होता है वह पदार्थ कहलाता है। व्यावसायिक समूह का काम कौशल का विकास करना, कौशल का पीढ़ी दर पीढ़ी अंतरण करना और अन्य व्यवसायिक समूहों से समन्वय रखना आदि है।&lt;br /&gt;
# भाषिक समूह : भाषा का मुख्य उपयोग परस्पर संवाद है। संवाद विचारों की सटीक अभिव्यक्ति करने वाला हो इस हेतु से भाषाएँ बनतीं हैं। संवाद में सहजता, सरलता, सुगमता से आत्मीयता बढ़ती है। इसी हेतु से भाषिक समूह बनते हैं।&lt;br /&gt;
# प्रादेशिक समूह : शासनिक और व्यवस्थात्मक सुविधा की दृष्टि से प्रादेशिक स्तर का मह्त्व होता है।&lt;br /&gt;
# राष्ट्र : राष्ट्र अपने समाज के लिये विविध प्रकार के संगठनों का और व्यवस्थाओं का निर्माण करता है।&lt;br /&gt;
# विश्व : पूर्व में बताई हुई 1 से लेकर 6 तक की सभी इकाइयां वैश्विक हित की अविरोधी रहें।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== प्रकृति सुसंगतता ===&lt;br /&gt;
समाज जीवन में केन्द्रिकरण और विकेंद्रीकरण का समन्वय हो यह आवश्यक है। विशाल उद्योग, बाजार की मंडियां, शासकीय कार्यालय, व्यावसायिक, भाषिक, प्रादेशिक समूहों के समन्वय की व्यवस्थाएं आदि के लिये शहरों की आवश्यकता होती है। लेकिन इनमें अनावश्यक केन्द्रीकरण न हो पाए। वनवासी या गिरिजन भी ग्राम व्यवस्था से ही जुड़े हुए होने चाहिए। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== प्रक्रियाएं ===&lt;br /&gt;
धर्म के अनुपालन में बुद्धि के स्तर पर धर्म के प्रति पर्याप्त संज्ञान, मन के स्तर पर कौटुम्बिक भावना, अनुशासन और श्रद्धा (आज्ञाकारिता) का विकास तथा शारीरिक स्तर पर सहकारिता और परोपकार की आदतें अत्यंत आवश्यक हैं।&lt;br /&gt;
# धर्म संज्ञान : ‘समझना’ यह बुद्धि का काम होता है। इसलिए जब बच्चे का बुद्धि का अंग विकसित हो रहा होता है उसे धर्म की बौद्धिक याने तर्क तथा कर्मसिद्धांत के आधार पर शिक्षा देना उचित होता है। इस दृष्टि से तर्कशास्त्र की समझ या सरल शब्दों में ‘किसी भी बात के करने से पहले चराचर के हित में उस बात को कैसे करना चाहिए’ इसे समझने की क्षमता का विकास आवश्यक होता है।&lt;br /&gt;
# कौटुम्बिक भावना का विकास : समाज के सभी परस्पर संबंधों में कौटुम्बिक भावना से व्यवहार का आधार धर्मसंज्ञान ही तो होता है। मन को बुद्धि के नियंत्रण में रखना ही मन की शिक्षा होती है। दुर्योधन के निम्न कथन से सब परिचित हैं{{Citation needed}}:&lt;br /&gt;
&amp;lt;blockquote&amp;gt;जानामी धर्मं न च में प्रवृत्ति: । जानाम्यधर्मं न च में निवृत्ति: ।।&amp;lt;/blockquote&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;ol start=&amp;quot;3&amp;quot;&amp;gt; &lt;br /&gt;
&amp;lt;li&amp;gt;धर्माचरण की आदतें: दुर्योधन के उपर्युक्त कथन को ध्यान में रखकर ही गर्भधारणा से ही बच्चे को धर्माचरण की आदतों की शिक्षा देना मह्त्वपूर्ण बन जाता है। आदत का अर्थ है जिस बात के करने में कठिनाई का अनुभव नहीं होता। जब किसी बात के बारबार करने से आचरण में यह सहजता आती है तब वह आदत बन जाती है। और जब उसे बुद्धिका अधिष्ठान मिल जाता है तब वह आदतें मनुष्य का स्वभाव ही बन जातीं हैं।&lt;br /&gt;
&amp;lt;/ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== धर्म के अनुपालन के स्तर और साधन ===&lt;br /&gt;
# धर्म के अनुपालन करनेवालों के राष्ट्रभक्त, अराष्ट्रीय और राष्ट्रद्रोही ऐसे मोटे-मोटे तीन स्तर होते हैं।&lt;br /&gt;
# धर्म के अनुपालन के साधन : धर्म का अनुपालन पूर्व में बताए अनुसार शिक्षा, आदेश, प्रायश्चित्त/ पश्चात्ताप तथा दंड ऐसा चार प्रकार से होता है। शासन दुर्बल होने से समाज में प्रमाद करनेवालों की संख्या में वृद्धि होती है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== धर्म के अनुपालन के अवरोध ===&lt;br /&gt;
धर्म के अनुपालन में निम्न बातें अवरोध-रूप होतीं हैं:&lt;br /&gt;
# भिन्न जीवनदृष्टि के लोग : शीघ्रातिशीघ्र भिन्न जीवनदृष्टि के लोगों को आत्मसात करना आवश्यक होता है। अन्यथा समाज जीवन अस्थिर और संघर्षमय बन जाता है।&lt;br /&gt;
# स्वार्थ / संकुचित अस्मिताएँ : आवश्यकताओं की पुर्ति तक तो स्वार्थ भावना समर्थनीय है। अस्मिता या अहंकार यह प्रत्येक जीवंत ईकाई का एक स्वाभाविक पहलू होता है। किन्तु जब किसी ईकाई के विशिष्ट स्तर की यह अस्मिता अपने से ऊपर की ईकाई जिसका वह हिस्सा है, उसकी अस्मिता से बड़ी लगने लगती है तब समाज जीवन की शांति नष्ट हो जाती है। इसलिए यह आवश्यक है कि मजहब, रिलिजन, प्रादेशिक अलगता, भाषिक भिन्नता, धन का अहंकार, बौद्धिक श्रेष्ठता आदि जैसी संकुचित अस्मिताएँ अपने से ऊपर की जीवंत ईकाई की अस्मिता के विरोध में नहीं हो।&lt;br /&gt;
# विपरीत शिक्षा : विपरीत या दोषपूर्ण शिक्षा यह तो सभी समस्याओं की जड़ होती है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== कारक तत्व ===&lt;br /&gt;
कारक तत्वों से मतलब है धर्मपालन में सहायता देनेवाले घटक। ये निम्न होते हैं:&lt;br /&gt;
# धर्म व्यवस्था : शासन धर्मनिष्ठ रहे यह सुनिश्चित करना धर्म व्यवस्था की जिम्मेदारी है। अपने त्याग, तपस्या, ज्ञान, लोकसंग्रह, चराचर के हित का चिन्तन, समर्पण भाव और कार्यकुशलता के आधार पर समाज से प्राप्त समर्थन प्राप्त कर वह देखे कि कोई अयोग्य व्यक्ति शासक नहीं बनें।&lt;br /&gt;
# शिक्षा : &lt;br /&gt;
## कुटुम्ब शिक्षा&lt;br /&gt;
## विद्याकेन्द्र की शिक्षा&lt;br /&gt;
## लोकशिक्षा&lt;br /&gt;
# धर्मनिष्ठ शासन: शासक का धर्मशास्त्र का जानकार होना और स्वयं धर्माचरणी होना भी आवश्यक होता है। जब शासन धर्म के अनुसार चलता है, धर्म व्यवस्थाद्वारा नियमित निर्देशित होता है तब धर्म भी स्थापित होता है और राज्य व्यवस्था भी श्रेष्ठ बनती है।&lt;br /&gt;
# धर्मनिष्ठों का सामाजिक नेतृत्व : समाज जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में धर्मनिष्ठ लोग जब अच्छी संख्या में दिखाई देते हैं तब समाज मानस धर्मनिष्ठ बनता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== चरण ==&lt;br /&gt;
धर्म का अनुपालन जब लोग स्वेच्छा से करनेवाले समाज के निर्माण के लिए दो बातें अत्यंत महत्वपूर्ण होतीं हैं। एक गर्भ में श्रेष्ठ जीवात्मा की स्थापना और दूसरे शिक्षा और संस्कार। शिक्षा और संस्कार में:&lt;br /&gt;
# जन्मपूर्व और शैशव काल में अधिजनन शास्त्र के आधार पर मार्गदर्शन। &lt;br /&gt;
# बाल्य काल : कुटुम्ब की शिक्षा के साथ विद्याकेन्द्र शिक्षा का समायोजन &lt;br /&gt;
# यौवन काल: अहंकार, बुद्धि के सही मोड़ हेतु सत्संग, प्रेरणा, वातावरण, ज्ञानार्जन/बलार्जन/कौशलार्जन आदि  &lt;br /&gt;
# प्रौढ़ावस्था: पूर्व ज्ञान/आदतों को व्यवस्थित करने के लिए सामाजिक वातावरण और मार्गदर्शन &lt;br /&gt;
## पुरोहित &lt;br /&gt;
## मेले/यात्राएं &lt;br /&gt;
## कीर्तनकार/प्रवचनकार &lt;br /&gt;
## धर्माचार्य &lt;br /&gt;
## दृक्श्राव्य माध्यम –चित्रपट, दूरदर्शन आदि &lt;br /&gt;
## आन्तरजाल &lt;br /&gt;
## कानून का डर &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== धर्म निर्णय व्यवस्था ==&lt;br /&gt;
सामान्यत: जब भी धर्म की समझ से सम्बन्धित समस्या हो तब धर्म निर्णय की व्यवस्था उपलब्ध होनी चाहिये। इस व्यवस्था के तीन स्तर होना आवश्यक है। पहला स्तर तो स्थानिक धर्म के जानकार, दूसरा जनपदीय या निकट के तीर्थक्षेत्र में धर्मज्ञ परिषद्, और तीसरा स्तर अखिल भारतीय या राष्ट्रीय धर्मज्ञ परिषद्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== माध्यम ==&lt;br /&gt;
 : धर्म अनुपालन करवाने के मुख्यत: दो प्रकारके माध्यम होते हैं। &lt;br /&gt;
९.१ कुटुम्ब के दायरे में : धर्म शिक्षा का अर्थ है सदाचार की शिक्षा। धर्म की शिक्षा के लिए कुटुम्ब यह सबसे श्रेष्ठ पाठशाला है। विद्याकेन्द्र की शिक्षा तो कुटुम्ब में मिली धर्म शिक्षा की पुष्टि या आवश्यक सुधार के लिए ही होती है। कुटुम्ब में धर्म शिक्षा तीन तरह से होती है। गर्भपूर्व संस्कार, गर्भ संस्कार और शिशु संस्कार और आदतें। मनुष्य की आदतें भी बचपन में ही पक्की हो जातीं हैं। &lt;br /&gt;
९.२ कुटुम्ब से बाहर के माध्यम : मनुष्य तो हर पल सीखता ही रहता है। इसलिए कुटुम्ब से बाहर भी वह कई बातें सीखता है। माध्यमों में मित्र मंडली, विद्यालय, समाज का सांस्कृतिक स्तर और क़ानून व्यवस्था आदि।&lt;br /&gt;
जीवन के भारतीय प्रतिमान की प्रतिष्ठापना की प्रक्रिया से अपेक्षित परिणामों की चर्चा हम [[Form of an Ideal Society (आदर्श समाज का स्वरूप)|अगले]] अध्याय में करेंगे।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[Category:Bhartiya Jeevan Pratiman (भारतीय जीवन प्रतिमान)]]&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Dilipkelkar</name></author>
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		<title>Responsibilities at Societal Level (सामाजिक धर्म अनुपालन)</title>
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		<updated>2019-07-21T07:00:55Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Dilipkelkar: /* धर्म निर्णय व्यवस्था */&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{One source|date=January 2019}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जीवन के भारतीय प्रतिमान की पुनर्प्रतिष्ठा के लिए राष्ट्र के संगठन की विभिन्न प्रणालियों के स्तर पर उन कर्तव्यों का याने ईकाई धर्म का विचार और प्रत्यक्ष धर्म अनुपालन की प्रक्रिया कैसे चलेगी, ऐसा दो पहलुओं में हम परिवर्तन की प्रक्रिया का विचार करेंगे। वैसे तो धर्म अनुपालन की प्रक्रिया का विचार हमने समाज धारणा शास्त्र के विषय में किया है। फिर भी परिवर्तन प्रक्रिया को यहाँ फिर से दोहराना उपयुक्त होगा।   &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== विभिन्न सामाजिक प्रणालियों के धर्म ==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== कुटुम्ब ===&lt;br /&gt;
कुटुम्ब परिवर्तन का सबसे जड़मूल का माध्यम है। समाज जीवन की वह नींव होता है। वह जितना सशक्त और व्यापक भूमिका का निर्वहन करेगा समाज उतना ही श्रेष्ठ बनेगा। कुटुम्ब में दो प्रकार के काम होते हैं। पहले हैं कुटुम्ब के लिए और दूसरे हैं कुटुम्ब में याने समाज, सृष्टि के लिए। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== कुटुम्ब की – कुटुम्ब के लिए ===&lt;br /&gt;
# क्षमता और योग्यता आधारित कर्तव्य  &lt;br /&gt;
# क्षमता और योग्यता के अनुसार सार्थक योगदान  &lt;br /&gt;
# शुद्ध सस्नेहयुक्त सदाचारयुक्त परस्पर व्यवहार  &lt;br /&gt;
# बड़ों का आदर, सेवा। छोटों के लिए आदर्श और प्यार।  &lt;br /&gt;
# कुटुंबहित अपने हित से ऊपर। कर्त्तव्य परायणता। अपने कर्तव्यों के प्रति आग्रही।  &lt;br /&gt;
# स्वावलंबन / परस्परावलंबन।  &lt;br /&gt;
# कुटुम्ब के सभी काम करना आना और करना।  &lt;br /&gt;
# एकात्मता का विस्तार – कुटुंब&amp;lt; समाज&amp;lt; सृष्टि&amp;lt; विश्व। लेकिन इसकी नींव कुटुंब जीवन में ही पड़ेगी और पक्की होगी।  &lt;br /&gt;
# कौशल, ज्ञान, बल और पुण्य अर्जन की दृष्टी से अध्ययन और संस्कार  &lt;br /&gt;
# कौटुम्बिक कुशलताएँ, आदतें, रीति-रिवाज, परम्पराएँ आदि  &lt;br /&gt;
# कुटुम्ब प्रमुख सर्वोपरि : कुटुम्ब के सब ही सदस्यों को कुटुम्ब प्रमुख बनने की प्रेरणा और इस हेतु से उनके द्वारा अपना विवेक, कौशल, सयानापन, निर्णय क्षमता, अपार स्नेह आदि का विकास। कुटुम्ब प्रमुख की आज्ञाओं का पालन - आज्ञाकारिता।  &lt;br /&gt;
# काया, वाचा, मनसा सभी से मधुर व्यवहार।  &lt;br /&gt;
# अच्छा – बेटा/बेटी, भाई/बहन, पति/पत्नि, पिता/माता, गृहस्थ/गृहिणी, रिश्तेदार आदि बनना/बनाना।  &lt;br /&gt;
# वर्णाश्रम धर्म का पालन – स्वभावज कर्म करते जाना।  &lt;br /&gt;
## सवर्ण/सजातीय विवाह  &lt;br /&gt;
## कौटुम्बिक व्यवसाय में सहभाग  &lt;br /&gt;
## ज्ञान, कौशल, श्रेष्ठ परम्पराओं का निर्वहन, परिष्कार, निर्माण और अगली पीढी को अंतरण  &lt;br /&gt;
## आयु की अवस्था के अनुसार ब्रह्मचर्य, गृहस्थ और वानप्रस्थ आदि आश्रमों के धर्म की जिम्मेदारियों का निर्वहन।  &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== कुटुम्ब में – समाज के लिए ===&lt;br /&gt;
# सामाजिक कर्तव्यों का निर्वहन &lt;br /&gt;
## समाज संगठन की प्रणालियों (कुटुंब, जाति, ग्राम, राष्ट्र) में &lt;br /&gt;
## सामाजिक व्यवस्थाओं (रक्षण, पोषण और शिक्षण) में &lt;br /&gt;
# ज्ञानार्जन, कौशलार्जन, बलार्जन और पुण्यार्जन की मानसिकता और केवल इन के लिए अटन। &lt;br /&gt;
# स्वावलंबन और परस्परावलंबन। &lt;br /&gt;
# शत्रुत्व भाववाले समाज के घटकों के साथ भी शान्ततापूर्ण और सुखी सहजीवन। &lt;br /&gt;
# एकात्मता (समाज और सृष्टि के साथ) का व्यवहार / सुख और दु:ख में सहानुभूति और सहभागिता। &lt;br /&gt;
# विभिन्न क्षेत्रों में - जैसे शासन, न्याय, समृद्धि आदि क्षेत्रों के नेता &amp;gt; आचार्य &amp;gt; धर्म । धर्म सर्वोपरि। &lt;br /&gt;
# सद्गुण, सदाचार, स्वावलंबन, सत्यनिष्ठा, सादगी, सहजता, सौन्दर्यबोध, स्वतंत्रता, संयम, स्वदेशी आदि का व्यवहार साथ ही में त्याग, तपस्या, समाधान, शान्ति, अभय, विजिगीषा आदि गुणों का विकास। &lt;br /&gt;
# मनसा, वाचा कर्मणा ‘सर्वे भवन्तु सुखिन:’ के प्रयास। &lt;br /&gt;
# वर्ण-धर्म की और जाति-धर्म की शिक्षा देना। जब लोग अपने वर्ण के अनुसार आचरण करते हैं, तब राष्ट्र की संस्कृति का विकास और रक्षण होता है। और जब लोग अपने जातिधर्म के अनुसार व्यवसाय करते हैं तब देश समृद्ध बनता है, ओर बना रहता है। &lt;br /&gt;
# धर्माचरणी और समाजभक्त / देशभक्त / राष्ट्रभक्त / परमात्मा में श्रद्धा रखने वालों का निर्माण। &lt;br /&gt;
# धर्मशिक्षा और कर्मशिक्षा। &lt;br /&gt;
# संयमित उपभोग। न्यूनतम (इष्टतम) उपभोग। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== ग्रामकुल ==&lt;br /&gt;
# ग्राम को स्वावलंबी ग्राम बनाना&lt;br /&gt;
# ग्राम की अर्थव्यवस्था को ठीक से बिठाना और चलाना&lt;br /&gt;
# संयुक्त कुटुंबों की प्रतिष्ठापना का वातावरण&lt;br /&gt;
# कौटुम्बिक उद्योगों की प्रतिष्ठापना का वातावरण&lt;br /&gt;
# कुटुम्ब भावना से प्रत्येक व्यक्ति की सम्मानपूर्ण आजीविका की व्यवस्था करना&lt;br /&gt;
# कौटुम्बिक उद्योग और जातियों में समन्वय रखना&lt;br /&gt;
# शासकीय व्यवस्थाओं के प्रति जिम्मेदारियां : कर देना, शिक्षण, पोषण और रक्षण की व्यवस्थाओं में श्रेष्ठ व्यक्तियों का और संसाधनों का योगदान देना&lt;br /&gt;
# ग्राम, एक कुल बने ऐसा वातावरण बनाए रखना।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== गुरुकुल / विद्यालय ==&lt;br /&gt;
# वर्णशिक्षा की व्यवस्था &lt;br /&gt;
# ज्ञानार्जन, कौशलार्जन, बलार्जन के लिए मार्गदर्शन &lt;br /&gt;
# शास्त्रीय शिक्षा का प्रावधान &lt;br /&gt;
# श्रेष्ठ परम्पराओं के निर्माण की शिक्षा &lt;br /&gt;
# जीवन के तत्व ज्ञान और व्यवहार की शिक्षा &lt;br /&gt;
# जीवन के लिए महत्वपूर्ण सामाजिक संगठन प्रणालियाँ और व्यवस्थाओं की समझ और यथाशक्ति योगदान की प्रेरणा। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== कौशल विधा पंचायत ==&lt;br /&gt;
# समाज की किसी एक आवश्यकता की पूर्ति करना। कभी कोई कमी न हो यह सुनिश्चित करना। &lt;br /&gt;
# धर्म के मार्गदर्शन में अपने कौशल विधा-धर्म का निर्धारण और कौशल विधा प्रणाली में प्रचार प्रसार &lt;br /&gt;
# अन्य कौशल विधाओं के साथ समन्वय &lt;br /&gt;
# राष्ट्र सर्वोपरि यह भावना सदा जाग्रत रखना &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== व्यवस्थाओं के धर्म ==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== धर्म व्यवस्था ===&lt;br /&gt;
यह कोई नियमित व्यवस्था नहीं होती। यह जाग्रत, नि:स्वार्थी, सर्वभूतहित में सदैव प्रयासरत रहनेवाले पंडितों का समूह होता है। यह समूह सक्रिय होने से समाज ठीक चलता है। आवश्यकतानुसार इस समूह की जिम्मेदारियां बढ़ जातीं है। ऐसे आपद्धर्म के निर्वहन के लिए भी यह समूह पर्याप्त सामर्थ्यवान हो। &lt;br /&gt;
# कालानुरूप धर्म को व्याख्यायित करना। &lt;br /&gt;
# वर्णों के ‘स्व’धर्मों का पालन करने की व्यवस्था की पस्तुति कर शिक्षा और शासन की मदद से समाज में उन्हें स्थापित करना। व्यक्तिगत और सामाजिक धर्म/संस्कृति के अनुसार व्यवहार का वातावरण बनाना। जब वर्ण-धर्म का पालन लोग करते हैं तब देश में संस्कृति का विकास और रक्षण होता है। जिनकी ओर देखकर लोग वर्ण धर्म का पालन कर सकें ऐसे ‘श्रेष्ठ’ लोगों का निर्माण करना। &lt;br /&gt;
# स्वाभाविक, शासनिक और आर्थिक ऐसी सभी प्रकार की स्वतन्त्रता की रक्षा करना। &lt;br /&gt;
# शासन पर अपने ज्ञान, त्याग, तपस्या, लोकसंग्रह तथा सदैव लोकहित के चिंतन के माध्यम से नैतिक दबाव निर्माण करना। शासन को सदाचारी, कुशल और सामर्थ्य संपन्न बनाए रखने के लिए मार्गदर्शन करना। अधर्माचरणी शासन को हटाकर धर्माचरणी शासन को प्रतिष्ठित करना। &lt;br /&gt;
# लोकशिक्षा (कुटुम्ब शिक्षा इसी का हिस्सा है) और विद्यालयीन शिक्षा की प्रभावी व्यवस्था करना। जैसे लिखा पढी न्यूनतम करने की दिशा में बढ़ना। वाणी / शब्द की प्रतिष्ठा बढ़ाना। जीवन को साधन सापेक्षता से साधना सापेक्षता की ओर ले जाने के लिए अपनी कथनी और करनी से मार्गदर्शन करना। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== शासन व्यवस्था ===&lt;br /&gt;
# अंतर्बाह्य शत्रुओं से लोगों की शासनिक स्वतन्त्रता की रक्षा करना।  &lt;br /&gt;
# धर्म के दायरे में रहकर दुष्टों और मूर्खों को नियंत्रण में रखना।  &lt;br /&gt;
# दंड व्यवस्था के अंतर्गत न्याय व्यवस्था का निर्माण करना। किसी पर अन्याय हो ही नहीं, ऐसी दंड व्यवस्था के निर्माण का प्रयास करना।  &lt;br /&gt;
# श्रेष्ठ शासक परम्परा निर्माण करना।  &lt;br /&gt;
# प्रभावी, समाजहित की शिक्षा देनेवाले शिक्षा केन्द्रों को संरक्षण, समर्थन और सहायता देकर और प्रभावी बनाने के लिए यथाशक्ति प्रयास करना। ऐसा करने से शासन का काम काफी सरल हो जाता है।  &lt;br /&gt;
# धर्म व्यवस्था से समय समय पर मार्गदर्शन प्राप्त करते रहना।  &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== समृद्धि व्यवस्था ===&lt;br /&gt;
# योग्य शिक्षा के द्वारा समाज में धर्म के अविरोधी इच्छाओं का ही विकास हो यह सुनिश्चित करना।&lt;br /&gt;
# समाज के प्रत्येक घटक की सभी आवश्यकताओं की पूर्ति करना, धर्म विरोधी इच्छाओं की नहीं। समाज की आर्थिक स्वतन्त्रता को अबाधित रखना।&lt;br /&gt;
# प्राकृतिक संसाधनों का न्यूनतम उपयोग हो ऐसा वातावरण बनाना। संयमित उपभोग को प्रतिष्ठित करना।&lt;br /&gt;
# प्रकृति का प्रदूषण नहीं होने देना। प्रकृति का सन्तुलन बनाए रखना।&lt;br /&gt;
# कौटुम्बिक उद्योग, जातियाँ और ग्राम मिलकर समृद्धि निर्माण होती है। ये तीनों ईकाईयाँ फलेफूले और इनका स्वस्थ ऐसा तानाबाना बना रहे ऐसा वातावरण रहे।&lt;br /&gt;
# पैसे का विनिमय न्यूनतम रहे ऐसी व्यवस्था निर्माण करना।&lt;br /&gt;
अब हम धर्म के अनुपालन की प्रक्रिया का विचार आगे करेंगे।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== धर्म अनुपालन की प्रक्रिया ==&lt;br /&gt;
हमने जाना है कि समाज के सुख, शांति, स्वतंत्रता, सुसंस्कृतता के लिए समाज का धर्मनिष्ठ होना आवश्यक होता है। यहाँ मोटे तौर पर धर्म का मतलब कर्तव्य से है। समाज धारणा के लिए कर्तव्यों पर आधारित जीवन अनिवार्य होता है। समाज धारणा के लिए धर्म-युक्त व्यवहार में आनेवाली जटिलताओं को और उसके अनुपालन की प्रक्रिया को समझने का प्रयास करेंगे। इन में व्यक्तिगत स्तर की बातों का हमने [[Personal Responsibilities (व्यक्तिगत धर्म अनुपालन)|पूर्व के अध्याय]] में विचार किया है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== विभिन्न ईकाईयों के स्तर पर ===&lt;br /&gt;
# कुटुम्ब : समाज की सभी इकाइयों के विभिन्न स्तरोंपर उचित भूमिका निभानेवाले श्रेष्ठ मानव का निर्माण करना। कौटुम्बिक व्यवसाय के माध्यम से समाज की किसी आवश्यकता की पूर्ति करना।&lt;br /&gt;
# ग्राम : ग्राम की भूमिका छोटे विश्व और बड़े कुटुम्ब की तरह ही होती है। जिस तरह कुटुम्ब के सदस्यों में आपस में पैसे का लेनदेन नहीं होता उसी तरह अच्छे ग्राम में कुटुम्बों में आपस में पैसे का लेनदेन नहीं होता। प्रत्येक की सम्मान और स्वतन्त्रता के साथ अन्न, वस्त्र, भवन, शिक्षा, आजीविका, सुरक्षा आदि सभी आवश्यकताओं की पूर्ति होती है।&lt;br /&gt;
# कौशल विधा : समाज जीवन की आवश्यकताओं की हर विधा के अनुसार व्यवसाय विधा समूह बनते हैं। इन समूहों के भी सामान्य व्यक्ति से लेकर विश्व के स्तर तक के लिए करणीय और अकरणीय कार्य होते हैं। कर्तव्य होते हैं। इन्हें व्यवसाय विधा धर्म कहेंगे। इनमें पदार्थ के उत्पादन के रूप में आर्थिक स्वतन्त्रता के किसी एक पहलू की रक्षा में योगदान करना होता है। शिक्षा / संस्कार, वस्तुएं, भावनाएं, विचार, कला आदि में से समाज जीवन की आवश्यकता में से किसी एक विधा के पदार्थ की निरंतर आपूर्ति करना। पदार्थ का अर्थ केवल वस्तु नहीं है। जिस पद याने शब्द का अर्थ होता है वह पदार्थ कहलाता है। व्यावसायिक समूह का काम कौशल का विकास करना, कौशल का पीढ़ी दर पीढ़ी अंतरण करना और अन्य व्यवसायिक समूहों से समन्वय रखना आदि है।&lt;br /&gt;
# भाषिक समूह : भाषा का मुख्य उपयोग परस्पर संवाद है। संवाद विचारों की सटीक अभिव्यक्ति करने वाला हो इस हेतु से भाषाएँ बनतीं हैं। संवाद में सहजता, सरलता, सुगमता से आत्मीयता बढ़ती है। इसी हेतु से भाषिक समूह बनते हैं।&lt;br /&gt;
# प्रादेशिक समूह : शासनिक और व्यवस्थात्मक सुविधा की दृष्टि से प्रादेशिक स्तर का मह्त्व होता है।&lt;br /&gt;
# राष्ट्र : राष्ट्र अपने समाज के लिये विविध प्रकार के संगठनों का और व्यवस्थाओं का निर्माण करता है।&lt;br /&gt;
# विश्व : पूर्व में बताई हुई 1 से लेकर 6 तक की सभी इकाइयां वैश्विक हित की अविरोधी रहें।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== प्रकृति सुसंगतता ===&lt;br /&gt;
समाज जीवन में केन्द्रिकरण और विकेंद्रीकरण का समन्वय हो यह आवश्यक है। विशाल उद्योग, बाजार की मंडियां, शासकीय कार्यालय, व्यावसायिक, भाषिक, प्रादेशिक समूहों के समन्वय की व्यवस्थाएं आदि के लिये शहरों की आवश्यकता होती है। लेकिन इनमें अनावश्यक केन्द्रीकरण न हो पाए। वनवासी या गिरिजन भी ग्राम व्यवस्था से ही जुड़े हुए होने चाहिए। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== प्रक्रियाएं ===&lt;br /&gt;
धर्म के अनुपालन में बुद्धि के स्तर पर धर्म के प्रति पर्याप्त संज्ञान, मन के स्तर पर कौटुम्बिक भावना, अनुशासन और श्रद्धा (आज्ञाकारिता) का विकास तथा शारीरिक स्तर पर सहकारिता और परोपकार की आदतें अत्यंत आवश्यक हैं।&lt;br /&gt;
# धर्म संज्ञान : ‘समझना’ यह बुद्धि का काम होता है। इसलिए जब बच्चे का बुद्धि का अंग विकसित हो रहा होता है उसे धर्म की बौद्धिक याने तर्क तथा कर्मसिद्धांत के आधार पर शिक्षा देना उचित होता है। इस दृष्टि से तर्कशास्त्र की समझ या सरल शब्दों में ‘किसी भी बात के करने से पहले चराचर के हित में उस बात को कैसे करना चाहिए’ इसे समझने की क्षमता का विकास आवश्यक होता है।&lt;br /&gt;
# कौटुम्बिक भावना का विकास : समाज के सभी परस्पर संबंधों में कौटुम्बिक भावना से व्यवहार का आधार धर्मसंज्ञान ही तो होता है। मन को बुद्धि के नियंत्रण में रखना ही मन की शिक्षा होती है। दुर्योधन के निम्न कथन से सब परिचित हैं{{Citation needed}}:&lt;br /&gt;
&amp;lt;blockquote&amp;gt;जानामी धर्मं न च में प्रवृत्ति: । जानाम्यधर्मं न च में निवृत्ति: ।।&amp;lt;/blockquote&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;ol start=&amp;quot;3&amp;quot;&amp;gt; &lt;br /&gt;
&amp;lt;li&amp;gt;धर्माचरण की आदतें: दुर्योधन के उपर्युक्त कथन को ध्यान में रखकर ही गर्भधारणा से ही बच्चे को धर्माचरण की आदतों की शिक्षा देना मह्त्वपूर्ण बन जाता है। आदत का अर्थ है जिस बात के करने में कठिनाई का अनुभव नहीं होता। जब किसी बात के बारबार करने से आचरण में यह सहजता आती है तब वह आदत बन जाती है। और जब उसे बुद्धिका अधिष्ठान मिल जाता है तब वह आदतें मनुष्य का स्वभाव ही बन जातीं हैं।&lt;br /&gt;
&amp;lt;/ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== धर्म के अनुपालन के स्तर और साधन ===&lt;br /&gt;
# धर्म के अनुपालन करनेवालों के राष्ट्रभक्त, अराष्ट्रीय और राष्ट्रद्रोही ऐसे मोटे-मोटे तीन स्तर होते हैं।&lt;br /&gt;
# धर्म के अनुपालन के साधन : धर्म का अनुपालन पूर्व में बताए अनुसार शिक्षा, आदेश, प्रायश्चित्त/ पश्चात्ताप तथा दंड ऐसा चार प्रकार से होता है। शासन दुर्बल होने से समाज में प्रमाद करनेवालों की संख्या में वृद्धि होती है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== धर्म के अनुपालन के अवरोध ===&lt;br /&gt;
धर्म के अनुपालन में निम्न बातें अवरोध-रूप होतीं हैं:&lt;br /&gt;
# भिन्न जीवनदृष्टि के लोग : शीघ्रातिशीघ्र भिन्न जीवनदृष्टि के लोगों को आत्मसात करना आवश्यक होता है। अन्यथा समाज जीवन अस्थिर और संघर्षमय बन जाता है।&lt;br /&gt;
# स्वार्थ / संकुचित अस्मिताएँ : आवश्यकताओं की पुर्ति तक तो स्वार्थ भावना समर्थनीय है। अस्मिता या अहंकार यह प्रत्येक जीवंत ईकाई का एक स्वाभाविक पहलू होता है। किन्तु जब किसी ईकाई के विशिष्ट स्तर की यह अस्मिता अपने से ऊपर की ईकाई जिसका वह हिस्सा है, उसकी अस्मिता से बड़ी लगने लगती है तब समाज जीवन की शांति नष्ट हो जाती है। इसलिए यह आवश्यक है कि मजहब, रिलिजन, प्रादेशिक अलगता, भाषिक भिन्नता, धन का अहंकार, बौद्धिक श्रेष्ठता आदि जैसी संकुचित अस्मिताएँ अपने से ऊपर की जीवंत ईकाई की अस्मिता के विरोध में नहीं हो।&lt;br /&gt;
# विपरीत शिक्षा : विपरीत या दोषपूर्ण शिक्षा यह तो सभी समस्याओं की जड़ होती है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== कारक तत्व ===&lt;br /&gt;
कारक तत्वों से मतलब है धर्मपालन में सहायता देनेवाले घटक। ये निम्न होते हैं:&lt;br /&gt;
# धर्म व्यवस्था : शासन धर्मनिष्ठ रहे यह सुनिश्चित करना धर्म व्यवस्था की जिम्मेदारी है। अपने त्याग, तपस्या, ज्ञान, लोकसंग्रह, चराचर के हित का चिन्तन, समर्पण भाव और कार्यकुशलता के आधार पर समाज से प्राप्त समर्थन प्राप्त कर वह देखे कि कोई अयोग्य व्यक्ति शासक नहीं बनें।&lt;br /&gt;
# शिक्षा : &lt;br /&gt;
## कुटुम्ब शिक्षा&lt;br /&gt;
## विद्याकेन्द्र की शिक्षा&lt;br /&gt;
## लोकशिक्षा&lt;br /&gt;
# धर्मनिष्ठ शासन: शासक का धर्मशास्त्र का जानकार होना और स्वयं धर्माचरणी होना भी आवश्यक होता है। जब शासन धर्म के अनुसार चलता है, धर्म व्यवस्थाद्वारा नियमित निर्देशित होता है तब धर्म भी स्थापित होता है और राज्य व्यवस्था भी श्रेष्ठ बनती है।&lt;br /&gt;
# धर्मनिष्ठों का सामाजिक नेतृत्व : समाज जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में धर्मनिष्ठ लोग जब अच्छी संख्या में दिखाई देते हैं तब समाज मानस धर्मनिष्ठ बनता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== चरण ==&lt;br /&gt;
धर्म का अनुपालन जब लोग स्वेच्छा से करनेवाले समाज के निर्माण के लिए दो बातें अत्यंत महत्वपूर्ण होतीं हैं। एक गर्भ में श्रेष्ठ जीवात्मा की स्थापना और दूसरे शिक्षा और संस्कार। शिक्षा और संस्कार में:&lt;br /&gt;
# जन्मपूर्व और शैशव काल में अधिजनन शास्त्र के आधार पर मार्गदर्शन। &lt;br /&gt;
# बाल्य काल : कुटुम्ब की शिक्षा के साथ विद्याकेन्द्र शिक्षा का समायोजन &lt;br /&gt;
# यौवन काल: अहंकार, बुद्धि के सही मोड़ हेतु सत्संग, प्रेरणा, वातावरण, ज्ञानार्जन/बलार्जन/कौशलार्जन आदि  &lt;br /&gt;
# प्रौढ़ावस्था: पूर्व ज्ञान/आदतों को व्यवस्थित करने के लिए सामाजिक वातावरण और मार्गदर्शन &lt;br /&gt;
## पुरोहित &lt;br /&gt;
## मेले/यात्राएं &lt;br /&gt;
## कीर्तनकार/प्रवचनकार &lt;br /&gt;
## धर्माचार्य &lt;br /&gt;
## दृक्श्राव्य माध्यम –चित्रपट, दूरदर्शन आदि &lt;br /&gt;
## आन्तरजाल &lt;br /&gt;
## कानून का डर &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== धर्म निर्णय व्यवस्था ==&lt;br /&gt;
सामान्यत: जब भी धर्म की समझसे सम्बन्धित समस्या हो तब धर्म निर्णय की व्यवस्था उपलब्ध होनी चाहिये। इस व्यवस्था के तीन स्तर होना आवश्यक है। पहला स्तर तो स्थानिक धर्म के जानकार, दूसरा जनपदीय या निकटके तीर्थक्षेत्र में धर्मज्ञ परिषद्, और तीसरा स्तर अखिल भारतीय या राष्ट्रीय धर्मज्ञ परिषद्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== माध्यम ==&lt;br /&gt;
 : धर्म अनुपालन करवाने के मुख्यत: दो प्रकारके माध्यम होते हैं। &lt;br /&gt;
९.१ कुटुम्ब के दायरे में : धर्म शिक्षा का अर्थ है सदाचार की शिक्षा। धर्म की शिक्षा के लिए कुटुम्ब यह सबसे श्रेष्ठ पाठशाला है। विद्याकेन्द्र की शिक्षा तो कुटुम्ब में मिली धर्म शिक्षा की पुष्टि या आवश्यक सुधार के लिए ही होती है। कुटुम्ब में धर्म शिक्षा तीन तरह से होती है। गर्भपूर्व संस्कार, गर्भ संस्कार और शिशु संस्कार और आदतें। मनुष्य की आदतें भी बचपन में ही पक्की हो जातीं हैं। &lt;br /&gt;
९.२ कुटुम्ब से बाहर के माध्यम : मनुष्य तो हर पल सीखता ही रहता है। इसलिए कुटुम्ब से बाहर भी वह कई बातें सीखता है। माध्यमों में मित्र मंडली, विद्यालय, समाज का सांस्कृतिक स्तर और क़ानून व्यवस्था आदि।&lt;br /&gt;
जीवन के भारतीय प्रतिमान की प्रतिष्ठापना की प्रक्रिया से अपेक्षित परिणामों की चर्चा हम [[Form of an Ideal Society (आदर्श समाज का स्वरूप)|अगले]] अध्याय में करेंगे।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[Category:Bhartiya Jeevan Pratiman (भारतीय जीवन प्रतिमान)]]&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Dilipkelkar</name></author>
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		<title>Responsibilities at Societal Level (सामाजिक धर्म अनुपालन)</title>
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		<updated>2019-07-21T07:00:38Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Dilipkelkar: /* कारक तत्व */ लेख सम्पादित किया&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{One source|date=January 2019}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जीवन के भारतीय प्रतिमान की पुनर्प्रतिष्ठा के लिए राष्ट्र के संगठन की विभिन्न प्रणालियों के स्तर पर उन कर्तव्यों का याने ईकाई धर्म का विचार और प्रत्यक्ष धर्म अनुपालन की प्रक्रिया कैसे चलेगी, ऐसा दो पहलुओं में हम परिवर्तन की प्रक्रिया का विचार करेंगे। वैसे तो धर्म अनुपालन की प्रक्रिया का विचार हमने समाज धारणा शास्त्र के विषय में किया है। फिर भी परिवर्तन प्रक्रिया को यहाँ फिर से दोहराना उपयुक्त होगा।   &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== विभिन्न सामाजिक प्रणालियों के धर्म ==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== कुटुम्ब ===&lt;br /&gt;
कुटुम्ब परिवर्तन का सबसे जड़मूल का माध्यम है। समाज जीवन की वह नींव होता है। वह जितना सशक्त और व्यापक भूमिका का निर्वहन करेगा समाज उतना ही श्रेष्ठ बनेगा। कुटुम्ब में दो प्रकार के काम होते हैं। पहले हैं कुटुम्ब के लिए और दूसरे हैं कुटुम्ब में याने समाज, सृष्टि के लिए। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== कुटुम्ब की – कुटुम्ब के लिए ===&lt;br /&gt;
# क्षमता और योग्यता आधारित कर्तव्य  &lt;br /&gt;
# क्षमता और योग्यता के अनुसार सार्थक योगदान  &lt;br /&gt;
# शुद्ध सस्नेहयुक्त सदाचारयुक्त परस्पर व्यवहार  &lt;br /&gt;
# बड़ों का आदर, सेवा। छोटों के लिए आदर्श और प्यार।  &lt;br /&gt;
# कुटुंबहित अपने हित से ऊपर। कर्त्तव्य परायणता। अपने कर्तव्यों के प्रति आग्रही।  &lt;br /&gt;
# स्वावलंबन / परस्परावलंबन।  &lt;br /&gt;
# कुटुम्ब के सभी काम करना आना और करना।  &lt;br /&gt;
# एकात्मता का विस्तार – कुटुंब&amp;lt; समाज&amp;lt; सृष्टि&amp;lt; विश्व। लेकिन इसकी नींव कुटुंब जीवन में ही पड़ेगी और पक्की होगी।  &lt;br /&gt;
# कौशल, ज्ञान, बल और पुण्य अर्जन की दृष्टी से अध्ययन और संस्कार  &lt;br /&gt;
# कौटुम्बिक कुशलताएँ, आदतें, रीति-रिवाज, परम्पराएँ आदि  &lt;br /&gt;
# कुटुम्ब प्रमुख सर्वोपरि : कुटुम्ब के सब ही सदस्यों को कुटुम्ब प्रमुख बनने की प्रेरणा और इस हेतु से उनके द्वारा अपना विवेक, कौशल, सयानापन, निर्णय क्षमता, अपार स्नेह आदि का विकास। कुटुम्ब प्रमुख की आज्ञाओं का पालन - आज्ञाकारिता।  &lt;br /&gt;
# काया, वाचा, मनसा सभी से मधुर व्यवहार।  &lt;br /&gt;
# अच्छा – बेटा/बेटी, भाई/बहन, पति/पत्नि, पिता/माता, गृहस्थ/गृहिणी, रिश्तेदार आदि बनना/बनाना।  &lt;br /&gt;
# वर्णाश्रम धर्म का पालन – स्वभावज कर्म करते जाना।  &lt;br /&gt;
## सवर्ण/सजातीय विवाह  &lt;br /&gt;
## कौटुम्बिक व्यवसाय में सहभाग  &lt;br /&gt;
## ज्ञान, कौशल, श्रेष्ठ परम्पराओं का निर्वहन, परिष्कार, निर्माण और अगली पीढी को अंतरण  &lt;br /&gt;
## आयु की अवस्था के अनुसार ब्रह्मचर्य, गृहस्थ और वानप्रस्थ आदि आश्रमों के धर्म की जिम्मेदारियों का निर्वहन।  &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== कुटुम्ब में – समाज के लिए ===&lt;br /&gt;
# सामाजिक कर्तव्यों का निर्वहन &lt;br /&gt;
## समाज संगठन की प्रणालियों (कुटुंब, जाति, ग्राम, राष्ट्र) में &lt;br /&gt;
## सामाजिक व्यवस्थाओं (रक्षण, पोषण और शिक्षण) में &lt;br /&gt;
# ज्ञानार्जन, कौशलार्जन, बलार्जन और पुण्यार्जन की मानसिकता और केवल इन के लिए अटन। &lt;br /&gt;
# स्वावलंबन और परस्परावलंबन। &lt;br /&gt;
# शत्रुत्व भाववाले समाज के घटकों के साथ भी शान्ततापूर्ण और सुखी सहजीवन। &lt;br /&gt;
# एकात्मता (समाज और सृष्टि के साथ) का व्यवहार / सुख और दु:ख में सहानुभूति और सहभागिता। &lt;br /&gt;
# विभिन्न क्षेत्रों में - जैसे शासन, न्याय, समृद्धि आदि क्षेत्रों के नेता &amp;gt; आचार्य &amp;gt; धर्म । धर्म सर्वोपरि। &lt;br /&gt;
# सद्गुण, सदाचार, स्वावलंबन, सत्यनिष्ठा, सादगी, सहजता, सौन्दर्यबोध, स्वतंत्रता, संयम, स्वदेशी आदि का व्यवहार साथ ही में त्याग, तपस्या, समाधान, शान्ति, अभय, विजिगीषा आदि गुणों का विकास। &lt;br /&gt;
# मनसा, वाचा कर्मणा ‘सर्वे भवन्तु सुखिन:’ के प्रयास। &lt;br /&gt;
# वर्ण-धर्म की और जाति-धर्म की शिक्षा देना। जब लोग अपने वर्ण के अनुसार आचरण करते हैं, तब राष्ट्र की संस्कृति का विकास और रक्षण होता है। और जब लोग अपने जातिधर्म के अनुसार व्यवसाय करते हैं तब देश समृद्ध बनता है, ओर बना रहता है। &lt;br /&gt;
# धर्माचरणी और समाजभक्त / देशभक्त / राष्ट्रभक्त / परमात्मा में श्रद्धा रखने वालों का निर्माण। &lt;br /&gt;
# धर्मशिक्षा और कर्मशिक्षा। &lt;br /&gt;
# संयमित उपभोग। न्यूनतम (इष्टतम) उपभोग। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== ग्रामकुल ==&lt;br /&gt;
# ग्राम को स्वावलंबी ग्राम बनाना&lt;br /&gt;
# ग्राम की अर्थव्यवस्था को ठीक से बिठाना और चलाना&lt;br /&gt;
# संयुक्त कुटुंबों की प्रतिष्ठापना का वातावरण&lt;br /&gt;
# कौटुम्बिक उद्योगों की प्रतिष्ठापना का वातावरण&lt;br /&gt;
# कुटुम्ब भावना से प्रत्येक व्यक्ति की सम्मानपूर्ण आजीविका की व्यवस्था करना&lt;br /&gt;
# कौटुम्बिक उद्योग और जातियों में समन्वय रखना&lt;br /&gt;
# शासकीय व्यवस्थाओं के प्रति जिम्मेदारियां : कर देना, शिक्षण, पोषण और रक्षण की व्यवस्थाओं में श्रेष्ठ व्यक्तियों का और संसाधनों का योगदान देना&lt;br /&gt;
# ग्राम, एक कुल बने ऐसा वातावरण बनाए रखना।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== गुरुकुल / विद्यालय ==&lt;br /&gt;
# वर्णशिक्षा की व्यवस्था &lt;br /&gt;
# ज्ञानार्जन, कौशलार्जन, बलार्जन के लिए मार्गदर्शन &lt;br /&gt;
# शास्त्रीय शिक्षा का प्रावधान &lt;br /&gt;
# श्रेष्ठ परम्पराओं के निर्माण की शिक्षा &lt;br /&gt;
# जीवन के तत्व ज्ञान और व्यवहार की शिक्षा &lt;br /&gt;
# जीवन के लिए महत्वपूर्ण सामाजिक संगठन प्रणालियाँ और व्यवस्थाओं की समझ और यथाशक्ति योगदान की प्रेरणा। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== कौशल विधा पंचायत ==&lt;br /&gt;
# समाज की किसी एक आवश्यकता की पूर्ति करना। कभी कोई कमी न हो यह सुनिश्चित करना। &lt;br /&gt;
# धर्म के मार्गदर्शन में अपने कौशल विधा-धर्म का निर्धारण और कौशल विधा प्रणाली में प्रचार प्रसार &lt;br /&gt;
# अन्य कौशल विधाओं के साथ समन्वय &lt;br /&gt;
# राष्ट्र सर्वोपरि यह भावना सदा जाग्रत रखना &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== व्यवस्थाओं के धर्म ==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== धर्म व्यवस्था ===&lt;br /&gt;
यह कोई नियमित व्यवस्था नहीं होती। यह जाग्रत, नि:स्वार्थी, सर्वभूतहित में सदैव प्रयासरत रहनेवाले पंडितों का समूह होता है। यह समूह सक्रिय होने से समाज ठीक चलता है। आवश्यकतानुसार इस समूह की जिम्मेदारियां बढ़ जातीं है। ऐसे आपद्धर्म के निर्वहन के लिए भी यह समूह पर्याप्त सामर्थ्यवान हो। &lt;br /&gt;
# कालानुरूप धर्म को व्याख्यायित करना। &lt;br /&gt;
# वर्णों के ‘स्व’धर्मों का पालन करने की व्यवस्था की पस्तुति कर शिक्षा और शासन की मदद से समाज में उन्हें स्थापित करना। व्यक्तिगत और सामाजिक धर्म/संस्कृति के अनुसार व्यवहार का वातावरण बनाना। जब वर्ण-धर्म का पालन लोग करते हैं तब देश में संस्कृति का विकास और रक्षण होता है। जिनकी ओर देखकर लोग वर्ण धर्म का पालन कर सकें ऐसे ‘श्रेष्ठ’ लोगों का निर्माण करना। &lt;br /&gt;
# स्वाभाविक, शासनिक और आर्थिक ऐसी सभी प्रकार की स्वतन्त्रता की रक्षा करना। &lt;br /&gt;
# शासन पर अपने ज्ञान, त्याग, तपस्या, लोकसंग्रह तथा सदैव लोकहित के चिंतन के माध्यम से नैतिक दबाव निर्माण करना। शासन को सदाचारी, कुशल और सामर्थ्य संपन्न बनाए रखने के लिए मार्गदर्शन करना। अधर्माचरणी शासन को हटाकर धर्माचरणी शासन को प्रतिष्ठित करना। &lt;br /&gt;
# लोकशिक्षा (कुटुम्ब शिक्षा इसी का हिस्सा है) और विद्यालयीन शिक्षा की प्रभावी व्यवस्था करना। जैसे लिखा पढी न्यूनतम करने की दिशा में बढ़ना। वाणी / शब्द की प्रतिष्ठा बढ़ाना। जीवन को साधन सापेक्षता से साधना सापेक्षता की ओर ले जाने के लिए अपनी कथनी और करनी से मार्गदर्शन करना। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== शासन व्यवस्था ===&lt;br /&gt;
# अंतर्बाह्य शत्रुओं से लोगों की शासनिक स्वतन्त्रता की रक्षा करना।  &lt;br /&gt;
# धर्म के दायरे में रहकर दुष्टों और मूर्खों को नियंत्रण में रखना।  &lt;br /&gt;
# दंड व्यवस्था के अंतर्गत न्याय व्यवस्था का निर्माण करना। किसी पर अन्याय हो ही नहीं, ऐसी दंड व्यवस्था के निर्माण का प्रयास करना।  &lt;br /&gt;
# श्रेष्ठ शासक परम्परा निर्माण करना।  &lt;br /&gt;
# प्रभावी, समाजहित की शिक्षा देनेवाले शिक्षा केन्द्रों को संरक्षण, समर्थन और सहायता देकर और प्रभावी बनाने के लिए यथाशक्ति प्रयास करना। ऐसा करने से शासन का काम काफी सरल हो जाता है।  &lt;br /&gt;
# धर्म व्यवस्था से समय समय पर मार्गदर्शन प्राप्त करते रहना।  &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== समृद्धि व्यवस्था ===&lt;br /&gt;
# योग्य शिक्षा के द्वारा समाज में धर्म के अविरोधी इच्छाओं का ही विकास हो यह सुनिश्चित करना।&lt;br /&gt;
# समाज के प्रत्येक घटक की सभी आवश्यकताओं की पूर्ति करना, धर्म विरोधी इच्छाओं की नहीं। समाज की आर्थिक स्वतन्त्रता को अबाधित रखना।&lt;br /&gt;
# प्राकृतिक संसाधनों का न्यूनतम उपयोग हो ऐसा वातावरण बनाना। संयमित उपभोग को प्रतिष्ठित करना।&lt;br /&gt;
# प्रकृति का प्रदूषण नहीं होने देना। प्रकृति का सन्तुलन बनाए रखना।&lt;br /&gt;
# कौटुम्बिक उद्योग, जातियाँ और ग्राम मिलकर समृद्धि निर्माण होती है। ये तीनों ईकाईयाँ फलेफूले और इनका स्वस्थ ऐसा तानाबाना बना रहे ऐसा वातावरण रहे।&lt;br /&gt;
# पैसे का विनिमय न्यूनतम रहे ऐसी व्यवस्था निर्माण करना।&lt;br /&gt;
अब हम धर्म के अनुपालन की प्रक्रिया का विचार आगे करेंगे।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== धर्म अनुपालन की प्रक्रिया ==&lt;br /&gt;
हमने जाना है कि समाज के सुख, शांति, स्वतंत्रता, सुसंस्कृतता के लिए समाज का धर्मनिष्ठ होना आवश्यक होता है। यहाँ मोटे तौर पर धर्म का मतलब कर्तव्य से है। समाज धारणा के लिए कर्तव्यों पर आधारित जीवन अनिवार्य होता है। समाज धारणा के लिए धर्म-युक्त व्यवहार में आनेवाली जटिलताओं को और उसके अनुपालन की प्रक्रिया को समझने का प्रयास करेंगे। इन में व्यक्तिगत स्तर की बातों का हमने [[Personal Responsibilities (व्यक्तिगत धर्म अनुपालन)|पूर्व के अध्याय]] में विचार किया है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== विभिन्न ईकाईयों के स्तर पर ===&lt;br /&gt;
# कुटुम्ब : समाज की सभी इकाइयों के विभिन्न स्तरोंपर उचित भूमिका निभानेवाले श्रेष्ठ मानव का निर्माण करना। कौटुम्बिक व्यवसाय के माध्यम से समाज की किसी आवश्यकता की पूर्ति करना।&lt;br /&gt;
# ग्राम : ग्राम की भूमिका छोटे विश्व और बड़े कुटुम्ब की तरह ही होती है। जिस तरह कुटुम्ब के सदस्यों में आपस में पैसे का लेनदेन नहीं होता उसी तरह अच्छे ग्राम में कुटुम्बों में आपस में पैसे का लेनदेन नहीं होता। प्रत्येक की सम्मान और स्वतन्त्रता के साथ अन्न, वस्त्र, भवन, शिक्षा, आजीविका, सुरक्षा आदि सभी आवश्यकताओं की पूर्ति होती है।&lt;br /&gt;
# कौशल विधा : समाज जीवन की आवश्यकताओं की हर विधा के अनुसार व्यवसाय विधा समूह बनते हैं। इन समूहों के भी सामान्य व्यक्ति से लेकर विश्व के स्तर तक के लिए करणीय और अकरणीय कार्य होते हैं। कर्तव्य होते हैं। इन्हें व्यवसाय विधा धर्म कहेंगे। इनमें पदार्थ के उत्पादन के रूप में आर्थिक स्वतन्त्रता के किसी एक पहलू की रक्षा में योगदान करना होता है। शिक्षा / संस्कार, वस्तुएं, भावनाएं, विचार, कला आदि में से समाज जीवन की आवश्यकता में से किसी एक विधा के पदार्थ की निरंतर आपूर्ति करना। पदार्थ का अर्थ केवल वस्तु नहीं है। जिस पद याने शब्द का अर्थ होता है वह पदार्थ कहलाता है। व्यावसायिक समूह का काम कौशल का विकास करना, कौशल का पीढ़ी दर पीढ़ी अंतरण करना और अन्य व्यवसायिक समूहों से समन्वय रखना आदि है।&lt;br /&gt;
# भाषिक समूह : भाषा का मुख्य उपयोग परस्पर संवाद है। संवाद विचारों की सटीक अभिव्यक्ति करने वाला हो इस हेतु से भाषाएँ बनतीं हैं। संवाद में सहजता, सरलता, सुगमता से आत्मीयता बढ़ती है। इसी हेतु से भाषिक समूह बनते हैं।&lt;br /&gt;
# प्रादेशिक समूह : शासनिक और व्यवस्थात्मक सुविधा की दृष्टि से प्रादेशिक स्तर का मह्त्व होता है।&lt;br /&gt;
# राष्ट्र : राष्ट्र अपने समाज के लिये विविध प्रकार के संगठनों का और व्यवस्थाओं का निर्माण करता है।&lt;br /&gt;
# विश्व : पूर्व में बताई हुई 1 से लेकर 6 तक की सभी इकाइयां वैश्विक हित की अविरोधी रहें।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== प्रकृति सुसंगतता ===&lt;br /&gt;
समाज जीवन में केन्द्रिकरण और विकेंद्रीकरण का समन्वय हो यह आवश्यक है। विशाल उद्योग, बाजार की मंडियां, शासकीय कार्यालय, व्यावसायिक, भाषिक, प्रादेशिक समूहों के समन्वय की व्यवस्थाएं आदि के लिये शहरों की आवश्यकता होती है। लेकिन इनमें अनावश्यक केन्द्रीकरण न हो पाए। वनवासी या गिरिजन भी ग्राम व्यवस्था से ही जुड़े हुए होने चाहिए। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== प्रक्रियाएं ===&lt;br /&gt;
धर्म के अनुपालन में बुद्धि के स्तर पर धर्म के प्रति पर्याप्त संज्ञान, मन के स्तर पर कौटुम्बिक भावना, अनुशासन और श्रद्धा (आज्ञाकारिता) का विकास तथा शारीरिक स्तर पर सहकारिता और परोपकार की आदतें अत्यंत आवश्यक हैं।&lt;br /&gt;
# धर्म संज्ञान : ‘समझना’ यह बुद्धि का काम होता है। इसलिए जब बच्चे का बुद्धि का अंग विकसित हो रहा होता है उसे धर्म की बौद्धिक याने तर्क तथा कर्मसिद्धांत के आधार पर शिक्षा देना उचित होता है। इस दृष्टि से तर्कशास्त्र की समझ या सरल शब्दों में ‘किसी भी बात के करने से पहले चराचर के हित में उस बात को कैसे करना चाहिए’ इसे समझने की क्षमता का विकास आवश्यक होता है।&lt;br /&gt;
# कौटुम्बिक भावना का विकास : समाज के सभी परस्पर संबंधों में कौटुम्बिक भावना से व्यवहार का आधार धर्मसंज्ञान ही तो होता है। मन को बुद्धि के नियंत्रण में रखना ही मन की शिक्षा होती है। दुर्योधन के निम्न कथन से सब परिचित हैं{{Citation needed}}:&lt;br /&gt;
&amp;lt;blockquote&amp;gt;जानामी धर्मं न च में प्रवृत्ति: । जानाम्यधर्मं न च में निवृत्ति: ।।&amp;lt;/blockquote&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;ol start=&amp;quot;3&amp;quot;&amp;gt; &lt;br /&gt;
&amp;lt;li&amp;gt;धर्माचरण की आदतें: दुर्योधन के उपर्युक्त कथन को ध्यान में रखकर ही गर्भधारणा से ही बच्चे को धर्माचरण की आदतों की शिक्षा देना मह्त्वपूर्ण बन जाता है। आदत का अर्थ है जिस बात के करने में कठिनाई का अनुभव नहीं होता। जब किसी बात के बारबार करने से आचरण में यह सहजता आती है तब वह आदत बन जाती है। और जब उसे बुद्धिका अधिष्ठान मिल जाता है तब वह आदतें मनुष्य का स्वभाव ही बन जातीं हैं।&lt;br /&gt;
&amp;lt;/ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== धर्म के अनुपालन के स्तर और साधन ===&lt;br /&gt;
# धर्म के अनुपालन करनेवालों के राष्ट्रभक्त, अराष्ट्रीय और राष्ट्रद्रोही ऐसे मोटे-मोटे तीन स्तर होते हैं।&lt;br /&gt;
# धर्म के अनुपालन के साधन : धर्म का अनुपालन पूर्व में बताए अनुसार शिक्षा, आदेश, प्रायश्चित्त/ पश्चात्ताप तथा दंड ऐसा चार प्रकार से होता है। शासन दुर्बल होने से समाज में प्रमाद करनेवालों की संख्या में वृद्धि होती है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== धर्म के अनुपालन के अवरोध ===&lt;br /&gt;
धर्म के अनुपालन में निम्न बातें अवरोध-रूप होतीं हैं:&lt;br /&gt;
# भिन्न जीवनदृष्टि के लोग : शीघ्रातिशीघ्र भिन्न जीवनदृष्टि के लोगों को आत्मसात करना आवश्यक होता है। अन्यथा समाज जीवन अस्थिर और संघर्षमय बन जाता है।&lt;br /&gt;
# स्वार्थ / संकुचित अस्मिताएँ : आवश्यकताओं की पुर्ति तक तो स्वार्थ भावना समर्थनीय है। अस्मिता या अहंकार यह प्रत्येक जीवंत ईकाई का एक स्वाभाविक पहलू होता है। किन्तु जब किसी ईकाई के विशिष्ट स्तर की यह अस्मिता अपने से ऊपर की ईकाई जिसका वह हिस्सा है, उसकी अस्मिता से बड़ी लगने लगती है तब समाज जीवन की शांति नष्ट हो जाती है। इसलिए यह आवश्यक है कि मजहब, रिलिजन, प्रादेशिक अलगता, भाषिक भिन्नता, धन का अहंकार, बौद्धिक श्रेष्ठता आदि जैसी संकुचित अस्मिताएँ अपने से ऊपर की जीवंत ईकाई की अस्मिता के विरोध में नहीं हो।&lt;br /&gt;
# विपरीत शिक्षा : विपरीत या दोषपूर्ण शिक्षा यह तो सभी समस्याओं की जड़ होती है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== कारक तत्व ===&lt;br /&gt;
कारक तत्वों से मतलब है धर्मपालन में सहायता देनेवाले घटक। ये निम्न होते हैं:&lt;br /&gt;
# धर्म व्यवस्था : शासन धर्मनिष्ठ रहे यह सुनिश्चित करना धर्म व्यवस्था की जिम्मेदारी है। अपने त्याग, तपस्या, ज्ञान, लोकसंग्रह, चराचर के हित का चिन्तन, समर्पण भाव और कार्यकुशलता के आधार पर समाज से प्राप्त समर्थन प्राप्त कर वह देखे कि कोई अयोग्य व्यक्ति शासक नहीं बनें।&lt;br /&gt;
# शिक्षा : &lt;br /&gt;
## कुटुम्ब शिक्षा&lt;br /&gt;
## विद्याकेन्द्र की शिक्षा&lt;br /&gt;
## लोकशिक्षा&lt;br /&gt;
# धर्मनिष्ठ शासन: शासक का धर्मशास्त्र का जानकार होना और स्वयं धर्माचरणी होना भी आवश्यक होता है। जब शासन धर्म के अनुसार चलता है, धर्म व्यवस्थाद्वारा नियमित निर्देशित होता है तब धर्म भी स्थापित होता है और राज्य व्यवस्था भी श्रेष्ठ बनती है।&lt;br /&gt;
# धर्मनिष्ठों का सामाजिक नेतृत्व : समाज जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में धर्मनिष्ठ लोग जब अच्छी संख्या में दिखाई देते हैं तब समाज मानस धर्मनिष्ठ बनता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== चरण ==&lt;br /&gt;
धर्म का अनुपालन जब लोग स्वेच्छा से करनेवाले समाज के निर्माण के लिए दो बातें अत्यंत महत्वपूर्ण होतीं हैं। एक गर्भ में श्रेष्ठ जीवात्मा की स्थापना और दूसरे शिक्षा और संस्कार। शिक्षा और संस्कार में:&lt;br /&gt;
# जन्मपूर्व और शैशव काल में अधिजनन शास्त्र के आधार पर मार्गदर्शन। &lt;br /&gt;
# बाल्य काल : कुटुम्ब की शिक्षा के साथ विद्याकेन्द्र शिक्षा का समायोजन &lt;br /&gt;
# यौवन काल: अहंकार, बुद्धि के सही मोड़ हेतु सत्संग, प्रेरणा, वातावरण, ज्ञानार्जन/बलार्जन/कौशलार्जन आदि  &lt;br /&gt;
# प्रौढ़ावस्था: पूर्व ज्ञान/आदतों को व्यवस्थित करने के लिए सामाजिक वातावरण और मार्गदर्शन &lt;br /&gt;
## पुरोहित &lt;br /&gt;
## मेले/यात्राएं &lt;br /&gt;
## कीर्तनकार/प्रवचनकार &lt;br /&gt;
## धर्माचार्य &lt;br /&gt;
## दृक्श्राव्य माध्यम –चित्रपट, दूरदर्शन आदि &lt;br /&gt;
## आन्तरजाल &lt;br /&gt;
## कानून का डर &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== धर्म निर्णय व्यवस्था ==&lt;br /&gt;
 : सामान्यत: जब भी धर्म की समझसे सम्बन्धित समस्या हो तब धर्म निर्णय की व्यवस्था उपलब्ध होनी चाहिये। इस व्यवस्था के तीन स्तर होना आवश्यक है। पहला स्तर तो स्थानिक धर्म के जानकार, दूसरा जनपदीय या निकटके तीर्थक्षेत्र में धर्मज्ञ परिषद्, और तीसरा स्तर अखिल भारतीय या राष्ट्रीय धर्मज्ञ परिषद्। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== माध्यम ==&lt;br /&gt;
 : धर्म अनुपालन करवाने के मुख्यत: दो प्रकारके माध्यम होते हैं। &lt;br /&gt;
९.१ कुटुम्ब के दायरे में : धर्म शिक्षा का अर्थ है सदाचार की शिक्षा। धर्म की शिक्षा के लिए कुटुम्ब यह सबसे श्रेष्ठ पाठशाला है। विद्याकेन्द्र की शिक्षा तो कुटुम्ब में मिली धर्म शिक्षा की पुष्टि या आवश्यक सुधार के लिए ही होती है। कुटुम्ब में धर्म शिक्षा तीन तरह से होती है। गर्भपूर्व संस्कार, गर्भ संस्कार और शिशु संस्कार और आदतें। मनुष्य की आदतें भी बचपन में ही पक्की हो जातीं हैं। &lt;br /&gt;
९.२ कुटुम्ब से बाहर के माध्यम : मनुष्य तो हर पल सीखता ही रहता है। इसलिए कुटुम्ब से बाहर भी वह कई बातें सीखता है। माध्यमों में मित्र मंडली, विद्यालय, समाज का सांस्कृतिक स्तर और क़ानून व्यवस्था आदि।&lt;br /&gt;
जीवन के भारतीय प्रतिमान की प्रतिष्ठापना की प्रक्रिया से अपेक्षित परिणामों की चर्चा हम [[Form of an Ideal Society (आदर्श समाज का स्वरूप)|अगले]] अध्याय में करेंगे।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[Category:Bhartiya Jeevan Pratiman (भारतीय जीवन प्रतिमान)]]&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Dilipkelkar</name></author>
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		<title>Responsibilities at Societal Level (सामाजिक धर्म अनुपालन)</title>
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		<updated>2019-07-21T06:56:54Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Dilipkelkar: /* कारक तत्व */&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{One source|date=January 2019}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जीवन के भारतीय प्रतिमान की पुनर्प्रतिष्ठा के लिए राष्ट्र के संगठन की विभिन्न प्रणालियों के स्तर पर उन कर्तव्यों का याने ईकाई धर्म का विचार और प्रत्यक्ष धर्म अनुपालन की प्रक्रिया कैसे चलेगी, ऐसा दो पहलुओं में हम परिवर्तन की प्रक्रिया का विचार करेंगे। वैसे तो धर्म अनुपालन की प्रक्रिया का विचार हमने समाज धारणा शास्त्र के विषय में किया है। फिर भी परिवर्तन प्रक्रिया को यहाँ फिर से दोहराना उपयुक्त होगा।   &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== विभिन्न सामाजिक प्रणालियों के धर्म ==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== कुटुम्ब ===&lt;br /&gt;
कुटुम्ब परिवर्तन का सबसे जड़मूल का माध्यम है। समाज जीवन की वह नींव होता है। वह जितना सशक्त और व्यापक भूमिका का निर्वहन करेगा समाज उतना ही श्रेष्ठ बनेगा। कुटुम्ब में दो प्रकार के काम होते हैं। पहले हैं कुटुम्ब के लिए और दूसरे हैं कुटुम्ब में याने समाज, सृष्टि के लिए। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== कुटुम्ब की – कुटुम्ब के लिए ===&lt;br /&gt;
# क्षमता और योग्यता आधारित कर्तव्य  &lt;br /&gt;
# क्षमता और योग्यता के अनुसार सार्थक योगदान  &lt;br /&gt;
# शुद्ध सस्नेहयुक्त सदाचारयुक्त परस्पर व्यवहार  &lt;br /&gt;
# बड़ों का आदर, सेवा। छोटों के लिए आदर्श और प्यार।  &lt;br /&gt;
# कुटुंबहित अपने हित से ऊपर। कर्त्तव्य परायणता। अपने कर्तव्यों के प्रति आग्रही।  &lt;br /&gt;
# स्वावलंबन / परस्परावलंबन।  &lt;br /&gt;
# कुटुम्ब के सभी काम करना आना और करना।  &lt;br /&gt;
# एकात्मता का विस्तार – कुटुंब&amp;lt; समाज&amp;lt; सृष्टि&amp;lt; विश्व। लेकिन इसकी नींव कुटुंब जीवन में ही पड़ेगी और पक्की होगी।  &lt;br /&gt;
# कौशल, ज्ञान, बल और पुण्य अर्जन की दृष्टी से अध्ययन और संस्कार  &lt;br /&gt;
# कौटुम्बिक कुशलताएँ, आदतें, रीति-रिवाज, परम्पराएँ आदि  &lt;br /&gt;
# कुटुम्ब प्रमुख सर्वोपरि : कुटुम्ब के सब ही सदस्यों को कुटुम्ब प्रमुख बनने की प्रेरणा और इस हेतु से उनके द्वारा अपना विवेक, कौशल, सयानापन, निर्णय क्षमता, अपार स्नेह आदि का विकास। कुटुम्ब प्रमुख की आज्ञाओं का पालन - आज्ञाकारिता।  &lt;br /&gt;
# काया, वाचा, मनसा सभी से मधुर व्यवहार।  &lt;br /&gt;
# अच्छा – बेटा/बेटी, भाई/बहन, पति/पत्नि, पिता/माता, गृहस्थ/गृहिणी, रिश्तेदार आदि बनना/बनाना।  &lt;br /&gt;
# वर्णाश्रम धर्म का पालन – स्वभावज कर्म करते जाना।  &lt;br /&gt;
## सवर्ण/सजातीय विवाह  &lt;br /&gt;
## कौटुम्बिक व्यवसाय में सहभाग  &lt;br /&gt;
## ज्ञान, कौशल, श्रेष्ठ परम्पराओं का निर्वहन, परिष्कार, निर्माण और अगली पीढी को अंतरण  &lt;br /&gt;
## आयु की अवस्था के अनुसार ब्रह्मचर्य, गृहस्थ और वानप्रस्थ आदि आश्रमों के धर्म की जिम्मेदारियों का निर्वहन।  &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== कुटुम्ब में – समाज के लिए ===&lt;br /&gt;
# सामाजिक कर्तव्यों का निर्वहन &lt;br /&gt;
## समाज संगठन की प्रणालियों (कुटुंब, जाति, ग्राम, राष्ट्र) में &lt;br /&gt;
## सामाजिक व्यवस्थाओं (रक्षण, पोषण और शिक्षण) में &lt;br /&gt;
# ज्ञानार्जन, कौशलार्जन, बलार्जन और पुण्यार्जन की मानसिकता और केवल इन के लिए अटन। &lt;br /&gt;
# स्वावलंबन और परस्परावलंबन। &lt;br /&gt;
# शत्रुत्व भाववाले समाज के घटकों के साथ भी शान्ततापूर्ण और सुखी सहजीवन। &lt;br /&gt;
# एकात्मता (समाज और सृष्टि के साथ) का व्यवहार / सुख और दु:ख में सहानुभूति और सहभागिता। &lt;br /&gt;
# विभिन्न क्षेत्रों में - जैसे शासन, न्याय, समृद्धि आदि क्षेत्रों के नेता &amp;gt; आचार्य &amp;gt; धर्म । धर्म सर्वोपरि। &lt;br /&gt;
# सद्गुण, सदाचार, स्वावलंबन, सत्यनिष्ठा, सादगी, सहजता, सौन्दर्यबोध, स्वतंत्रता, संयम, स्वदेशी आदि का व्यवहार साथ ही में त्याग, तपस्या, समाधान, शान्ति, अभय, विजिगीषा आदि गुणों का विकास। &lt;br /&gt;
# मनसा, वाचा कर्मणा ‘सर्वे भवन्तु सुखिन:’ के प्रयास। &lt;br /&gt;
# वर्ण-धर्म की और जाति-धर्म की शिक्षा देना। जब लोग अपने वर्ण के अनुसार आचरण करते हैं, तब राष्ट्र की संस्कृति का विकास और रक्षण होता है। और जब लोग अपने जातिधर्म के अनुसार व्यवसाय करते हैं तब देश समृद्ध बनता है, ओर बना रहता है। &lt;br /&gt;
# धर्माचरणी और समाजभक्त / देशभक्त / राष्ट्रभक्त / परमात्मा में श्रद्धा रखने वालों का निर्माण। &lt;br /&gt;
# धर्मशिक्षा और कर्मशिक्षा। &lt;br /&gt;
# संयमित उपभोग। न्यूनतम (इष्टतम) उपभोग। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== ग्रामकुल ==&lt;br /&gt;
# ग्राम को स्वावलंबी ग्राम बनाना&lt;br /&gt;
# ग्राम की अर्थव्यवस्था को ठीक से बिठाना और चलाना&lt;br /&gt;
# संयुक्त कुटुंबों की प्रतिष्ठापना का वातावरण&lt;br /&gt;
# कौटुम्बिक उद्योगों की प्रतिष्ठापना का वातावरण&lt;br /&gt;
# कुटुम्ब भावना से प्रत्येक व्यक्ति की सम्मानपूर्ण आजीविका की व्यवस्था करना&lt;br /&gt;
# कौटुम्बिक उद्योग और जातियों में समन्वय रखना&lt;br /&gt;
# शासकीय व्यवस्थाओं के प्रति जिम्मेदारियां : कर देना, शिक्षण, पोषण और रक्षण की व्यवस्थाओं में श्रेष्ठ व्यक्तियों का और संसाधनों का योगदान देना&lt;br /&gt;
# ग्राम, एक कुल बने ऐसा वातावरण बनाए रखना।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== गुरुकुल / विद्यालय ==&lt;br /&gt;
# वर्णशिक्षा की व्यवस्था &lt;br /&gt;
# ज्ञानार्जन, कौशलार्जन, बलार्जन के लिए मार्गदर्शन &lt;br /&gt;
# शास्त्रीय शिक्षा का प्रावधान &lt;br /&gt;
# श्रेष्ठ परम्पराओं के निर्माण की शिक्षा &lt;br /&gt;
# जीवन के तत्व ज्ञान और व्यवहार की शिक्षा &lt;br /&gt;
# जीवन के लिए महत्वपूर्ण सामाजिक संगठन प्रणालियाँ और व्यवस्थाओं की समझ और यथाशक्ति योगदान की प्रेरणा। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== कौशल विधा पंचायत ==&lt;br /&gt;
# समाज की किसी एक आवश्यकता की पूर्ति करना। कभी कोई कमी न हो यह सुनिश्चित करना। &lt;br /&gt;
# धर्म के मार्गदर्शन में अपने कौशल विधा-धर्म का निर्धारण और कौशल विधा प्रणाली में प्रचार प्रसार &lt;br /&gt;
# अन्य कौशल विधाओं के साथ समन्वय &lt;br /&gt;
# राष्ट्र सर्वोपरि यह भावना सदा जाग्रत रखना &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== व्यवस्थाओं के धर्म ==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== धर्म व्यवस्था ===&lt;br /&gt;
यह कोई नियमित व्यवस्था नहीं होती। यह जाग्रत, नि:स्वार्थी, सर्वभूतहित में सदैव प्रयासरत रहनेवाले पंडितों का समूह होता है। यह समूह सक्रिय होने से समाज ठीक चलता है। आवश्यकतानुसार इस समूह की जिम्मेदारियां बढ़ जातीं है। ऐसे आपद्धर्म के निर्वहन के लिए भी यह समूह पर्याप्त सामर्थ्यवान हो। &lt;br /&gt;
# कालानुरूप धर्म को व्याख्यायित करना। &lt;br /&gt;
# वर्णों के ‘स्व’धर्मों का पालन करने की व्यवस्था की पस्तुति कर शिक्षा और शासन की मदद से समाज में उन्हें स्थापित करना। व्यक्तिगत और सामाजिक धर्म/संस्कृति के अनुसार व्यवहार का वातावरण बनाना। जब वर्ण-धर्म का पालन लोग करते हैं तब देश में संस्कृति का विकास और रक्षण होता है। जिनकी ओर देखकर लोग वर्ण धर्म का पालन कर सकें ऐसे ‘श्रेष्ठ’ लोगों का निर्माण करना। &lt;br /&gt;
# स्वाभाविक, शासनिक और आर्थिक ऐसी सभी प्रकार की स्वतन्त्रता की रक्षा करना। &lt;br /&gt;
# शासन पर अपने ज्ञान, त्याग, तपस्या, लोकसंग्रह तथा सदैव लोकहित के चिंतन के माध्यम से नैतिक दबाव निर्माण करना। शासन को सदाचारी, कुशल और सामर्थ्य संपन्न बनाए रखने के लिए मार्गदर्शन करना। अधर्माचरणी शासन को हटाकर धर्माचरणी शासन को प्रतिष्ठित करना। &lt;br /&gt;
# लोकशिक्षा (कुटुम्ब शिक्षा इसी का हिस्सा है) और विद्यालयीन शिक्षा की प्रभावी व्यवस्था करना। जैसे लिखा पढी न्यूनतम करने की दिशा में बढ़ना। वाणी / शब्द की प्रतिष्ठा बढ़ाना। जीवन को साधन सापेक्षता से साधना सापेक्षता की ओर ले जाने के लिए अपनी कथनी और करनी से मार्गदर्शन करना। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== शासन व्यवस्था ===&lt;br /&gt;
# अंतर्बाह्य शत्रुओं से लोगों की शासनिक स्वतन्त्रता की रक्षा करना।  &lt;br /&gt;
# धर्म के दायरे में रहकर दुष्टों और मूर्खों को नियंत्रण में रखना।  &lt;br /&gt;
# दंड व्यवस्था के अंतर्गत न्याय व्यवस्था का निर्माण करना। किसी पर अन्याय हो ही नहीं, ऐसी दंड व्यवस्था के निर्माण का प्रयास करना।  &lt;br /&gt;
# श्रेष्ठ शासक परम्परा निर्माण करना।  &lt;br /&gt;
# प्रभावी, समाजहित की शिक्षा देनेवाले शिक्षा केन्द्रों को संरक्षण, समर्थन और सहायता देकर और प्रभावी बनाने के लिए यथाशक्ति प्रयास करना। ऐसा करने से शासन का काम काफी सरल हो जाता है।  &lt;br /&gt;
# धर्म व्यवस्था से समय समय पर मार्गदर्शन प्राप्त करते रहना।  &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== समृद्धि व्यवस्था ===&lt;br /&gt;
# योग्य शिक्षा के द्वारा समाज में धर्म के अविरोधी इच्छाओं का ही विकास हो यह सुनिश्चित करना।&lt;br /&gt;
# समाज के प्रत्येक घटक की सभी आवश्यकताओं की पूर्ति करना, धर्म विरोधी इच्छाओं की नहीं। समाज की आर्थिक स्वतन्त्रता को अबाधित रखना।&lt;br /&gt;
# प्राकृतिक संसाधनों का न्यूनतम उपयोग हो ऐसा वातावरण बनाना। संयमित उपभोग को प्रतिष्ठित करना।&lt;br /&gt;
# प्रकृति का प्रदूषण नहीं होने देना। प्रकृति का सन्तुलन बनाए रखना।&lt;br /&gt;
# कौटुम्बिक उद्योग, जातियाँ और ग्राम मिलकर समृद्धि निर्माण होती है। ये तीनों ईकाईयाँ फलेफूले और इनका स्वस्थ ऐसा तानाबाना बना रहे ऐसा वातावरण रहे।&lt;br /&gt;
# पैसे का विनिमय न्यूनतम रहे ऐसी व्यवस्था निर्माण करना।&lt;br /&gt;
अब हम धर्म के अनुपालन की प्रक्रिया का विचार आगे करेंगे।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== धर्म अनुपालन की प्रक्रिया ==&lt;br /&gt;
हमने जाना है कि समाज के सुख, शांति, स्वतंत्रता, सुसंस्कृतता के लिए समाज का धर्मनिष्ठ होना आवश्यक होता है। यहाँ मोटे तौर पर धर्म का मतलब कर्तव्य से है। समाज धारणा के लिए कर्तव्यों पर आधारित जीवन अनिवार्य होता है। समाज धारणा के लिए धर्म-युक्त व्यवहार में आनेवाली जटिलताओं को और उसके अनुपालन की प्रक्रिया को समझने का प्रयास करेंगे। इन में व्यक्तिगत स्तर की बातों का हमने [[Personal Responsibilities (व्यक्तिगत धर्म अनुपालन)|पूर्व के अध्याय]] में विचार किया है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== विभिन्न ईकाईयों के स्तर पर ===&lt;br /&gt;
# कुटुम्ब : समाज की सभी इकाइयों के विभिन्न स्तरोंपर उचित भूमिका निभानेवाले श्रेष्ठ मानव का निर्माण करना। कौटुम्बिक व्यवसाय के माध्यम से समाज की किसी आवश्यकता की पूर्ति करना।&lt;br /&gt;
# ग्राम : ग्राम की भूमिका छोटे विश्व और बड़े कुटुम्ब की तरह ही होती है। जिस तरह कुटुम्ब के सदस्यों में आपस में पैसे का लेनदेन नहीं होता उसी तरह अच्छे ग्राम में कुटुम्बों में आपस में पैसे का लेनदेन नहीं होता। प्रत्येक की सम्मान और स्वतन्त्रता के साथ अन्न, वस्त्र, भवन, शिक्षा, आजीविका, सुरक्षा आदि सभी आवश्यकताओं की पूर्ति होती है।&lt;br /&gt;
# कौशल विधा : समाज जीवन की आवश्यकताओं की हर विधा के अनुसार व्यवसाय विधा समूह बनते हैं। इन समूहों के भी सामान्य व्यक्ति से लेकर विश्व के स्तर तक के लिए करणीय और अकरणीय कार्य होते हैं। कर्तव्य होते हैं। इन्हें व्यवसाय विधा धर्म कहेंगे। इनमें पदार्थ के उत्पादन के रूप में आर्थिक स्वतन्त्रता के किसी एक पहलू की रक्षा में योगदान करना होता है। शिक्षा / संस्कार, वस्तुएं, भावनाएं, विचार, कला आदि में से समाज जीवन की आवश्यकता में से किसी एक विधा के पदार्थ की निरंतर आपूर्ति करना। पदार्थ का अर्थ केवल वस्तु नहीं है। जिस पद याने शब्द का अर्थ होता है वह पदार्थ कहलाता है। व्यावसायिक समूह का काम कौशल का विकास करना, कौशल का पीढ़ी दर पीढ़ी अंतरण करना और अन्य व्यवसायिक समूहों से समन्वय रखना आदि है।&lt;br /&gt;
# भाषिक समूह : भाषा का मुख्य उपयोग परस्पर संवाद है। संवाद विचारों की सटीक अभिव्यक्ति करने वाला हो इस हेतु से भाषाएँ बनतीं हैं। संवाद में सहजता, सरलता, सुगमता से आत्मीयता बढ़ती है। इसी हेतु से भाषिक समूह बनते हैं।&lt;br /&gt;
# प्रादेशिक समूह : शासनिक और व्यवस्थात्मक सुविधा की दृष्टि से प्रादेशिक स्तर का मह्त्व होता है।&lt;br /&gt;
# राष्ट्र : राष्ट्र अपने समाज के लिये विविध प्रकार के संगठनों का और व्यवस्थाओं का निर्माण करता है।&lt;br /&gt;
# विश्व : पूर्व में बताई हुई 1 से लेकर 6 तक की सभी इकाइयां वैश्विक हित की अविरोधी रहें।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== प्रकृति सुसंगतता ===&lt;br /&gt;
समाज जीवन में केन्द्रिकरण और विकेंद्रीकरण का समन्वय हो यह आवश्यक है। विशाल उद्योग, बाजार की मंडियां, शासकीय कार्यालय, व्यावसायिक, भाषिक, प्रादेशिक समूहों के समन्वय की व्यवस्थाएं आदि के लिये शहरों की आवश्यकता होती है। लेकिन इनमें अनावश्यक केन्द्रीकरण न हो पाए। वनवासी या गिरिजन भी ग्राम व्यवस्था से ही जुड़े हुए होने चाहिए। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== प्रक्रियाएं ===&lt;br /&gt;
धर्म के अनुपालन में बुद्धि के स्तर पर धर्म के प्रति पर्याप्त संज्ञान, मन के स्तर पर कौटुम्बिक भावना, अनुशासन और श्रद्धा (आज्ञाकारिता) का विकास तथा शारीरिक स्तर पर सहकारिता और परोपकार की आदतें अत्यंत आवश्यक हैं।&lt;br /&gt;
# धर्म संज्ञान : ‘समझना’ यह बुद्धि का काम होता है। इसलिए जब बच्चे का बुद्धि का अंग विकसित हो रहा होता है उसे धर्म की बौद्धिक याने तर्क तथा कर्मसिद्धांत के आधार पर शिक्षा देना उचित होता है। इस दृष्टि से तर्कशास्त्र की समझ या सरल शब्दों में ‘किसी भी बात के करने से पहले चराचर के हित में उस बात को कैसे करना चाहिए’ इसे समझने की क्षमता का विकास आवश्यक होता है।&lt;br /&gt;
# कौटुम्बिक भावना का विकास : समाज के सभी परस्पर संबंधों में कौटुम्बिक भावना से व्यवहार का आधार धर्मसंज्ञान ही तो होता है। मन को बुद्धि के नियंत्रण में रखना ही मन की शिक्षा होती है। दुर्योधन के निम्न कथन से सब परिचित हैं{{Citation needed}}:&lt;br /&gt;
&amp;lt;blockquote&amp;gt;जानामी धर्मं न च में प्रवृत्ति: । जानाम्यधर्मं न च में निवृत्ति: ।।&amp;lt;/blockquote&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;ol start=&amp;quot;3&amp;quot;&amp;gt; &lt;br /&gt;
&amp;lt;li&amp;gt;धर्माचरण की आदतें: दुर्योधन के उपर्युक्त कथन को ध्यान में रखकर ही गर्भधारणा से ही बच्चे को धर्माचरण की आदतों की शिक्षा देना मह्त्वपूर्ण बन जाता है। आदत का अर्थ है जिस बात के करने में कठिनाई का अनुभव नहीं होता। जब किसी बात के बारबार करने से आचरण में यह सहजता आती है तब वह आदत बन जाती है। और जब उसे बुद्धिका अधिष्ठान मिल जाता है तब वह आदतें मनुष्य का स्वभाव ही बन जातीं हैं।&lt;br /&gt;
&amp;lt;/ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== धर्म के अनुपालन के स्तर और साधन ===&lt;br /&gt;
# धर्म के अनुपालन करनेवालों के राष्ट्रभक्त, अराष्ट्रीय और राष्ट्रद्रोही ऐसे मोटे-मोटे तीन स्तर होते हैं।&lt;br /&gt;
# धर्म के अनुपालन के साधन : धर्म का अनुपालन पूर्व में बताए अनुसार शिक्षा, आदेश, प्रायश्चित्त/ पश्चात्ताप तथा दंड ऐसा चार प्रकार से होता है। शासन दुर्बल होने से समाज में प्रमाद करनेवालों की संख्या में वृद्धि होती है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== धर्म के अनुपालन के अवरोध ===&lt;br /&gt;
धर्म के अनुपालन में निम्न बातें अवरोध-रूप होतीं हैं:&lt;br /&gt;
# भिन्न जीवनदृष्टि के लोग : शीघ्रातिशीघ्र भिन्न जीवनदृष्टि के लोगों को आत्मसात करना आवश्यक होता है। अन्यथा समाज जीवन अस्थिर और संघर्षमय बन जाता है।&lt;br /&gt;
# स्वार्थ / संकुचित अस्मिताएँ : आवश्यकताओं की पुर्ति तक तो स्वार्थ भावना समर्थनीय है। अस्मिता या अहंकार यह प्रत्येक जीवंत ईकाई का एक स्वाभाविक पहलू होता है। किन्तु जब किसी ईकाई के विशिष्ट स्तर की यह अस्मिता अपने से ऊपर की ईकाई जिसका वह हिस्सा है, उसकी अस्मिता से बड़ी लगने लगती है तब समाज जीवन की शांति नष्ट हो जाती है। इसलिए यह आवश्यक है कि मजहब, रिलिजन, प्रादेशिक अलगता, भाषिक भिन्नता, धन का अहंकार, बौद्धिक श्रेष्ठता आदि जैसी संकुचित अस्मिताएँ अपने से ऊपर की जीवंत ईकाई की अस्मिता के विरोध में नहीं हो।&lt;br /&gt;
# विपरीत शिक्षा : विपरीत या दोषपूर्ण शिक्षा यह तो सभी समस्याओं की जड़ होती है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== कारक तत्व ===&lt;br /&gt;
कारक तत्वों से मतलब है धर्मपालन में सहायता देनेवाले घटक। ये निम्न होते हैं:&lt;br /&gt;
६.१ धर्म व्यवस्था : शासन धर्मनिष्ठ रहे यह सुनिश्चित करना धर्म व्यवस्था की जिम्मेदारी है। अपने त्याग, तपस्या, ज्ञान, लोकसंग्रह, चराचर के हित का चिन्तन, समर्पण भाव और कार्यकुशलता के आधारपर 	समाज से प्राप्त समर्थन प्राप्त कर वह देखे की कोई अयोग्य व्यक्ति शासक नहीं बनें।&lt;br /&gt;
६.२ शिक्षा : ६.२.१ कुटुम्ब शिक्षा 	६.२.२ विद्याकेन्द्र की शिक्षा 	६.२.३ लोकशिक्षा &lt;br /&gt;
६.३ धर्मनिष्ठ शासन : शासक का धर्मशास्त्र का जानकार होना और स्वयं धर्माचरणी होना भी आवश्यक होता है। जब शासन धर्म के अनुसार चलता है, धर्म व्यवस्थाद्वारा नियमित निर्देशित होता है तब धर्म भी 	स्थापित होता है और राज्य व्यवस्था भी श्रेष्ठ बनती है।&lt;br /&gt;
६.४ धर्मनिष्ठों का सामाजिक नेतृत्व : समाज जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में धर्मनिष्ठ लोग जब अच्छी संख्या में दिखाई देते हैं तब समाज मानस धर्मनिष्ठ बनता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== चरण ==&lt;br /&gt;
धर्म का अनुपालन जब लोग स्वेच्छा से करनेवाले समाज के निर्माण के लिए दो बातें अत्यंत महत्वपूर्ण होतीं हैं। एक गर्भ में श्रेष्ठ जीवात्मा की स्थापना और दूसरे शिक्षा और संस्कार।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शिक्षा और संस्कार में -&lt;br /&gt;
७.१ जन्मपूर्व और शैशव कालमें अधिजनन शास्त्र के आधारपर मार्गदर्शन। &lt;br /&gt;
७.२ बाल्य काल : कुटुम्ब की शिक्षा के साथ विद्याकेन्द्र शिक्षा का समायोजन 			           &lt;br /&gt;
७.३ यौवन काल: अहंकार, बुद्धि के सही मोड़ हेतु सत्संग, प्रेरणा, वातावरण, ज्ञानार्जन/बलार्जन/कौशलार्जन आदि &lt;br /&gt;
७.४ प्रौढ़ावस्था : पूर्व ज्ञान/आदतों को व्यवस्थित करने के लिए सामाजिक वातावरण और मार्गदर्शन&lt;br /&gt;
७.४.१ पुरोहित&lt;br /&gt;
७.४.२ मेले/यात्राएं&lt;br /&gt;
७.४.३ कीर्तनकार/प्रवचनकार&lt;br /&gt;
७.४.४ धर्माचार्य&lt;br /&gt;
७.४.५ दृक्श्राव्य माध्यम –चित्रपट, दूरदर्शन आदि&lt;br /&gt;
७.४.६ आन्तरजाल&lt;br /&gt;
७.४.७ कानून का डर &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== धर्म निर्णय व्यवस्था ==&lt;br /&gt;
 : सामान्यत: जब भी धर्म की समझसे सम्बन्धित समस्या हो तब धर्म निर्णय की व्यवस्था उपलब्ध होनी चाहिये। इस व्यवस्था के तीन स्तर होना आवश्यक है। पहला स्तर तो स्थानिक धर्म के जानकार, दूसरा जनपदीय या निकटके तीर्थक्षेत्र में धर्मज्ञ परिषद्, और तीसरा स्तर अखिल भारतीय या राष्ट्रीय धर्मज्ञ परिषद्। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== माध्यम ==&lt;br /&gt;
 : धर्म अनुपालन करवाने के मुख्यत: दो प्रकारके माध्यम होते हैं। &lt;br /&gt;
९.१ कुटुम्ब के दायरे में : धर्म शिक्षा का अर्थ है सदाचार की शिक्षा। धर्म की शिक्षा के लिए कुटुम्ब यह सबसे श्रेष्ठ पाठशाला है। विद्याकेन्द्र की शिक्षा तो कुटुम्ब में मिली धर्म शिक्षा की पुष्टि या आवश्यक सुधार के लिए ही होती है। कुटुम्ब में धर्म शिक्षा तीन तरह से होती है। गर्भपूर्व संस्कार, गर्भ संस्कार और शिशु संस्कार और आदतें। मनुष्य की आदतें भी बचपन में ही पक्की हो जातीं हैं। &lt;br /&gt;
९.२ कुटुम्ब से बाहर के माध्यम : मनुष्य तो हर पल सीखता ही रहता है। इसलिए कुटुम्ब से बाहर भी वह कई बातें सीखता है। माध्यमों में मित्र मंडली, विद्यालय, समाज का सांस्कृतिक स्तर और क़ानून व्यवस्था आदि।&lt;br /&gt;
जीवन के भारतीय प्रतिमान की प्रतिष्ठापना की प्रक्रिया से अपेक्षित परिणामों की चर्चा हम [[Form of an Ideal Society (आदर्श समाज का स्वरूप)|अगले]] अध्याय में करेंगे।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[Category:Bhartiya Jeevan Pratiman (भारतीय जीवन प्रतिमान)]]&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Dilipkelkar</name></author>
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		<title>Responsibilities at Societal Level (सामाजिक धर्म अनुपालन)</title>
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		<updated>2019-07-21T06:56:31Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Dilipkelkar: /* धर्म के अनुपालन के अवरोध */ लेख सम्पादित किया&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{One source|date=January 2019}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जीवन के भारतीय प्रतिमान की पुनर्प्रतिष्ठा के लिए राष्ट्र के संगठन की विभिन्न प्रणालियों के स्तर पर उन कर्तव्यों का याने ईकाई धर्म का विचार और प्रत्यक्ष धर्म अनुपालन की प्रक्रिया कैसे चलेगी, ऐसा दो पहलुओं में हम परिवर्तन की प्रक्रिया का विचार करेंगे। वैसे तो धर्म अनुपालन की प्रक्रिया का विचार हमने समाज धारणा शास्त्र के विषय में किया है। फिर भी परिवर्तन प्रक्रिया को यहाँ फिर से दोहराना उपयुक्त होगा।   &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== विभिन्न सामाजिक प्रणालियों के धर्म ==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== कुटुम्ब ===&lt;br /&gt;
कुटुम्ब परिवर्तन का सबसे जड़मूल का माध्यम है। समाज जीवन की वह नींव होता है। वह जितना सशक्त और व्यापक भूमिका का निर्वहन करेगा समाज उतना ही श्रेष्ठ बनेगा। कुटुम्ब में दो प्रकार के काम होते हैं। पहले हैं कुटुम्ब के लिए और दूसरे हैं कुटुम्ब में याने समाज, सृष्टि के लिए। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== कुटुम्ब की – कुटुम्ब के लिए ===&lt;br /&gt;
# क्षमता और योग्यता आधारित कर्तव्य  &lt;br /&gt;
# क्षमता और योग्यता के अनुसार सार्थक योगदान  &lt;br /&gt;
# शुद्ध सस्नेहयुक्त सदाचारयुक्त परस्पर व्यवहार  &lt;br /&gt;
# बड़ों का आदर, सेवा। छोटों के लिए आदर्श और प्यार।  &lt;br /&gt;
# कुटुंबहित अपने हित से ऊपर। कर्त्तव्य परायणता। अपने कर्तव्यों के प्रति आग्रही।  &lt;br /&gt;
# स्वावलंबन / परस्परावलंबन।  &lt;br /&gt;
# कुटुम्ब के सभी काम करना आना और करना।  &lt;br /&gt;
# एकात्मता का विस्तार – कुटुंब&amp;lt; समाज&amp;lt; सृष्टि&amp;lt; विश्व। लेकिन इसकी नींव कुटुंब जीवन में ही पड़ेगी और पक्की होगी।  &lt;br /&gt;
# कौशल, ज्ञान, बल और पुण्य अर्जन की दृष्टी से अध्ययन और संस्कार  &lt;br /&gt;
# कौटुम्बिक कुशलताएँ, आदतें, रीति-रिवाज, परम्पराएँ आदि  &lt;br /&gt;
# कुटुम्ब प्रमुख सर्वोपरि : कुटुम्ब के सब ही सदस्यों को कुटुम्ब प्रमुख बनने की प्रेरणा और इस हेतु से उनके द्वारा अपना विवेक, कौशल, सयानापन, निर्णय क्षमता, अपार स्नेह आदि का विकास। कुटुम्ब प्रमुख की आज्ञाओं का पालन - आज्ञाकारिता।  &lt;br /&gt;
# काया, वाचा, मनसा सभी से मधुर व्यवहार।  &lt;br /&gt;
# अच्छा – बेटा/बेटी, भाई/बहन, पति/पत्नि, पिता/माता, गृहस्थ/गृहिणी, रिश्तेदार आदि बनना/बनाना।  &lt;br /&gt;
# वर्णाश्रम धर्म का पालन – स्वभावज कर्म करते जाना।  &lt;br /&gt;
## सवर्ण/सजातीय विवाह  &lt;br /&gt;
## कौटुम्बिक व्यवसाय में सहभाग  &lt;br /&gt;
## ज्ञान, कौशल, श्रेष्ठ परम्पराओं का निर्वहन, परिष्कार, निर्माण और अगली पीढी को अंतरण  &lt;br /&gt;
## आयु की अवस्था के अनुसार ब्रह्मचर्य, गृहस्थ और वानप्रस्थ आदि आश्रमों के धर्म की जिम्मेदारियों का निर्वहन।  &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== कुटुम्ब में – समाज के लिए ===&lt;br /&gt;
# सामाजिक कर्तव्यों का निर्वहन &lt;br /&gt;
## समाज संगठन की प्रणालियों (कुटुंब, जाति, ग्राम, राष्ट्र) में &lt;br /&gt;
## सामाजिक व्यवस्थाओं (रक्षण, पोषण और शिक्षण) में &lt;br /&gt;
# ज्ञानार्जन, कौशलार्जन, बलार्जन और पुण्यार्जन की मानसिकता और केवल इन के लिए अटन। &lt;br /&gt;
# स्वावलंबन और परस्परावलंबन। &lt;br /&gt;
# शत्रुत्व भाववाले समाज के घटकों के साथ भी शान्ततापूर्ण और सुखी सहजीवन। &lt;br /&gt;
# एकात्मता (समाज और सृष्टि के साथ) का व्यवहार / सुख और दु:ख में सहानुभूति और सहभागिता। &lt;br /&gt;
# विभिन्न क्षेत्रों में - जैसे शासन, न्याय, समृद्धि आदि क्षेत्रों के नेता &amp;gt; आचार्य &amp;gt; धर्म । धर्म सर्वोपरि। &lt;br /&gt;
# सद्गुण, सदाचार, स्वावलंबन, सत्यनिष्ठा, सादगी, सहजता, सौन्दर्यबोध, स्वतंत्रता, संयम, स्वदेशी आदि का व्यवहार साथ ही में त्याग, तपस्या, समाधान, शान्ति, अभय, विजिगीषा आदि गुणों का विकास। &lt;br /&gt;
# मनसा, वाचा कर्मणा ‘सर्वे भवन्तु सुखिन:’ के प्रयास। &lt;br /&gt;
# वर्ण-धर्म की और जाति-धर्म की शिक्षा देना। जब लोग अपने वर्ण के अनुसार आचरण करते हैं, तब राष्ट्र की संस्कृति का विकास और रक्षण होता है। और जब लोग अपने जातिधर्म के अनुसार व्यवसाय करते हैं तब देश समृद्ध बनता है, ओर बना रहता है। &lt;br /&gt;
# धर्माचरणी और समाजभक्त / देशभक्त / राष्ट्रभक्त / परमात्मा में श्रद्धा रखने वालों का निर्माण। &lt;br /&gt;
# धर्मशिक्षा और कर्मशिक्षा। &lt;br /&gt;
# संयमित उपभोग। न्यूनतम (इष्टतम) उपभोग। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== ग्रामकुल ==&lt;br /&gt;
# ग्राम को स्वावलंबी ग्राम बनाना&lt;br /&gt;
# ग्राम की अर्थव्यवस्था को ठीक से बिठाना और चलाना&lt;br /&gt;
# संयुक्त कुटुंबों की प्रतिष्ठापना का वातावरण&lt;br /&gt;
# कौटुम्बिक उद्योगों की प्रतिष्ठापना का वातावरण&lt;br /&gt;
# कुटुम्ब भावना से प्रत्येक व्यक्ति की सम्मानपूर्ण आजीविका की व्यवस्था करना&lt;br /&gt;
# कौटुम्बिक उद्योग और जातियों में समन्वय रखना&lt;br /&gt;
# शासकीय व्यवस्थाओं के प्रति जिम्मेदारियां : कर देना, शिक्षण, पोषण और रक्षण की व्यवस्थाओं में श्रेष्ठ व्यक्तियों का और संसाधनों का योगदान देना&lt;br /&gt;
# ग्राम, एक कुल बने ऐसा वातावरण बनाए रखना।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== गुरुकुल / विद्यालय ==&lt;br /&gt;
# वर्णशिक्षा की व्यवस्था &lt;br /&gt;
# ज्ञानार्जन, कौशलार्जन, बलार्जन के लिए मार्गदर्शन &lt;br /&gt;
# शास्त्रीय शिक्षा का प्रावधान &lt;br /&gt;
# श्रेष्ठ परम्पराओं के निर्माण की शिक्षा &lt;br /&gt;
# जीवन के तत्व ज्ञान और व्यवहार की शिक्षा &lt;br /&gt;
# जीवन के लिए महत्वपूर्ण सामाजिक संगठन प्रणालियाँ और व्यवस्थाओं की समझ और यथाशक्ति योगदान की प्रेरणा। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== कौशल विधा पंचायत ==&lt;br /&gt;
# समाज की किसी एक आवश्यकता की पूर्ति करना। कभी कोई कमी न हो यह सुनिश्चित करना। &lt;br /&gt;
# धर्म के मार्गदर्शन में अपने कौशल विधा-धर्म का निर्धारण और कौशल विधा प्रणाली में प्रचार प्रसार &lt;br /&gt;
# अन्य कौशल विधाओं के साथ समन्वय &lt;br /&gt;
# राष्ट्र सर्वोपरि यह भावना सदा जाग्रत रखना &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== व्यवस्थाओं के धर्म ==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== धर्म व्यवस्था ===&lt;br /&gt;
यह कोई नियमित व्यवस्था नहीं होती। यह जाग्रत, नि:स्वार्थी, सर्वभूतहित में सदैव प्रयासरत रहनेवाले पंडितों का समूह होता है। यह समूह सक्रिय होने से समाज ठीक चलता है। आवश्यकतानुसार इस समूह की जिम्मेदारियां बढ़ जातीं है। ऐसे आपद्धर्म के निर्वहन के लिए भी यह समूह पर्याप्त सामर्थ्यवान हो। &lt;br /&gt;
# कालानुरूप धर्म को व्याख्यायित करना। &lt;br /&gt;
# वर्णों के ‘स्व’धर्मों का पालन करने की व्यवस्था की पस्तुति कर शिक्षा और शासन की मदद से समाज में उन्हें स्थापित करना। व्यक्तिगत और सामाजिक धर्म/संस्कृति के अनुसार व्यवहार का वातावरण बनाना। जब वर्ण-धर्म का पालन लोग करते हैं तब देश में संस्कृति का विकास और रक्षण होता है। जिनकी ओर देखकर लोग वर्ण धर्म का पालन कर सकें ऐसे ‘श्रेष्ठ’ लोगों का निर्माण करना। &lt;br /&gt;
# स्वाभाविक, शासनिक और आर्थिक ऐसी सभी प्रकार की स्वतन्त्रता की रक्षा करना। &lt;br /&gt;
# शासन पर अपने ज्ञान, त्याग, तपस्या, लोकसंग्रह तथा सदैव लोकहित के चिंतन के माध्यम से नैतिक दबाव निर्माण करना। शासन को सदाचारी, कुशल और सामर्थ्य संपन्न बनाए रखने के लिए मार्गदर्शन करना। अधर्माचरणी शासन को हटाकर धर्माचरणी शासन को प्रतिष्ठित करना। &lt;br /&gt;
# लोकशिक्षा (कुटुम्ब शिक्षा इसी का हिस्सा है) और विद्यालयीन शिक्षा की प्रभावी व्यवस्था करना। जैसे लिखा पढी न्यूनतम करने की दिशा में बढ़ना। वाणी / शब्द की प्रतिष्ठा बढ़ाना। जीवन को साधन सापेक्षता से साधना सापेक्षता की ओर ले जाने के लिए अपनी कथनी और करनी से मार्गदर्शन करना। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== शासन व्यवस्था ===&lt;br /&gt;
# अंतर्बाह्य शत्रुओं से लोगों की शासनिक स्वतन्त्रता की रक्षा करना।  &lt;br /&gt;
# धर्म के दायरे में रहकर दुष्टों और मूर्खों को नियंत्रण में रखना।  &lt;br /&gt;
# दंड व्यवस्था के अंतर्गत न्याय व्यवस्था का निर्माण करना। किसी पर अन्याय हो ही नहीं, ऐसी दंड व्यवस्था के निर्माण का प्रयास करना।  &lt;br /&gt;
# श्रेष्ठ शासक परम्परा निर्माण करना।  &lt;br /&gt;
# प्रभावी, समाजहित की शिक्षा देनेवाले शिक्षा केन्द्रों को संरक्षण, समर्थन और सहायता देकर और प्रभावी बनाने के लिए यथाशक्ति प्रयास करना। ऐसा करने से शासन का काम काफी सरल हो जाता है।  &lt;br /&gt;
# धर्म व्यवस्था से समय समय पर मार्गदर्शन प्राप्त करते रहना।  &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== समृद्धि व्यवस्था ===&lt;br /&gt;
# योग्य शिक्षा के द्वारा समाज में धर्म के अविरोधी इच्छाओं का ही विकास हो यह सुनिश्चित करना।&lt;br /&gt;
# समाज के प्रत्येक घटक की सभी आवश्यकताओं की पूर्ति करना, धर्म विरोधी इच्छाओं की नहीं। समाज की आर्थिक स्वतन्त्रता को अबाधित रखना।&lt;br /&gt;
# प्राकृतिक संसाधनों का न्यूनतम उपयोग हो ऐसा वातावरण बनाना। संयमित उपभोग को प्रतिष्ठित करना।&lt;br /&gt;
# प्रकृति का प्रदूषण नहीं होने देना। प्रकृति का सन्तुलन बनाए रखना।&lt;br /&gt;
# कौटुम्बिक उद्योग, जातियाँ और ग्राम मिलकर समृद्धि निर्माण होती है। ये तीनों ईकाईयाँ फलेफूले और इनका स्वस्थ ऐसा तानाबाना बना रहे ऐसा वातावरण रहे।&lt;br /&gt;
# पैसे का विनिमय न्यूनतम रहे ऐसी व्यवस्था निर्माण करना।&lt;br /&gt;
अब हम धर्म के अनुपालन की प्रक्रिया का विचार आगे करेंगे।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== धर्म अनुपालन की प्रक्रिया ==&lt;br /&gt;
हमने जाना है कि समाज के सुख, शांति, स्वतंत्रता, सुसंस्कृतता के लिए समाज का धर्मनिष्ठ होना आवश्यक होता है। यहाँ मोटे तौर पर धर्म का मतलब कर्तव्य से है। समाज धारणा के लिए कर्तव्यों पर आधारित जीवन अनिवार्य होता है। समाज धारणा के लिए धर्म-युक्त व्यवहार में आनेवाली जटिलताओं को और उसके अनुपालन की प्रक्रिया को समझने का प्रयास करेंगे। इन में व्यक्तिगत स्तर की बातों का हमने [[Personal Responsibilities (व्यक्तिगत धर्म अनुपालन)|पूर्व के अध्याय]] में विचार किया है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== विभिन्न ईकाईयों के स्तर पर ===&lt;br /&gt;
# कुटुम्ब : समाज की सभी इकाइयों के विभिन्न स्तरोंपर उचित भूमिका निभानेवाले श्रेष्ठ मानव का निर्माण करना। कौटुम्बिक व्यवसाय के माध्यम से समाज की किसी आवश्यकता की पूर्ति करना।&lt;br /&gt;
# ग्राम : ग्राम की भूमिका छोटे विश्व और बड़े कुटुम्ब की तरह ही होती है। जिस तरह कुटुम्ब के सदस्यों में आपस में पैसे का लेनदेन नहीं होता उसी तरह अच्छे ग्राम में कुटुम्बों में आपस में पैसे का लेनदेन नहीं होता। प्रत्येक की सम्मान और स्वतन्त्रता के साथ अन्न, वस्त्र, भवन, शिक्षा, आजीविका, सुरक्षा आदि सभी आवश्यकताओं की पूर्ति होती है।&lt;br /&gt;
# कौशल विधा : समाज जीवन की आवश्यकताओं की हर विधा के अनुसार व्यवसाय विधा समूह बनते हैं। इन समूहों के भी सामान्य व्यक्ति से लेकर विश्व के स्तर तक के लिए करणीय और अकरणीय कार्य होते हैं। कर्तव्य होते हैं। इन्हें व्यवसाय विधा धर्म कहेंगे। इनमें पदार्थ के उत्पादन के रूप में आर्थिक स्वतन्त्रता के किसी एक पहलू की रक्षा में योगदान करना होता है। शिक्षा / संस्कार, वस्तुएं, भावनाएं, विचार, कला आदि में से समाज जीवन की आवश्यकता में से किसी एक विधा के पदार्थ की निरंतर आपूर्ति करना। पदार्थ का अर्थ केवल वस्तु नहीं है। जिस पद याने शब्द का अर्थ होता है वह पदार्थ कहलाता है। व्यावसायिक समूह का काम कौशल का विकास करना, कौशल का पीढ़ी दर पीढ़ी अंतरण करना और अन्य व्यवसायिक समूहों से समन्वय रखना आदि है।&lt;br /&gt;
# भाषिक समूह : भाषा का मुख्य उपयोग परस्पर संवाद है। संवाद विचारों की सटीक अभिव्यक्ति करने वाला हो इस हेतु से भाषाएँ बनतीं हैं। संवाद में सहजता, सरलता, सुगमता से आत्मीयता बढ़ती है। इसी हेतु से भाषिक समूह बनते हैं।&lt;br /&gt;
# प्रादेशिक समूह : शासनिक और व्यवस्थात्मक सुविधा की दृष्टि से प्रादेशिक स्तर का मह्त्व होता है।&lt;br /&gt;
# राष्ट्र : राष्ट्र अपने समाज के लिये विविध प्रकार के संगठनों का और व्यवस्थाओं का निर्माण करता है।&lt;br /&gt;
# विश्व : पूर्व में बताई हुई 1 से लेकर 6 तक की सभी इकाइयां वैश्विक हित की अविरोधी रहें।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== प्रकृति सुसंगतता ===&lt;br /&gt;
समाज जीवन में केन्द्रिकरण और विकेंद्रीकरण का समन्वय हो यह आवश्यक है। विशाल उद्योग, बाजार की मंडियां, शासकीय कार्यालय, व्यावसायिक, भाषिक, प्रादेशिक समूहों के समन्वय की व्यवस्थाएं आदि के लिये शहरों की आवश्यकता होती है। लेकिन इनमें अनावश्यक केन्द्रीकरण न हो पाए। वनवासी या गिरिजन भी ग्राम व्यवस्था से ही जुड़े हुए होने चाहिए। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== प्रक्रियाएं ===&lt;br /&gt;
धर्म के अनुपालन में बुद्धि के स्तर पर धर्म के प्रति पर्याप्त संज्ञान, मन के स्तर पर कौटुम्बिक भावना, अनुशासन और श्रद्धा (आज्ञाकारिता) का विकास तथा शारीरिक स्तर पर सहकारिता और परोपकार की आदतें अत्यंत आवश्यक हैं।&lt;br /&gt;
# धर्म संज्ञान : ‘समझना’ यह बुद्धि का काम होता है। इसलिए जब बच्चे का बुद्धि का अंग विकसित हो रहा होता है उसे धर्म की बौद्धिक याने तर्क तथा कर्मसिद्धांत के आधार पर शिक्षा देना उचित होता है। इस दृष्टि से तर्कशास्त्र की समझ या सरल शब्दों में ‘किसी भी बात के करने से पहले चराचर के हित में उस बात को कैसे करना चाहिए’ इसे समझने की क्षमता का विकास आवश्यक होता है।&lt;br /&gt;
# कौटुम्बिक भावना का विकास : समाज के सभी परस्पर संबंधों में कौटुम्बिक भावना से व्यवहार का आधार धर्मसंज्ञान ही तो होता है। मन को बुद्धि के नियंत्रण में रखना ही मन की शिक्षा होती है। दुर्योधन के निम्न कथन से सब परिचित हैं{{Citation needed}}:&lt;br /&gt;
&amp;lt;blockquote&amp;gt;जानामी धर्मं न च में प्रवृत्ति: । जानाम्यधर्मं न च में निवृत्ति: ।।&amp;lt;/blockquote&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;ol start=&amp;quot;3&amp;quot;&amp;gt; &lt;br /&gt;
&amp;lt;li&amp;gt;धर्माचरण की आदतें: दुर्योधन के उपर्युक्त कथन को ध्यान में रखकर ही गर्भधारणा से ही बच्चे को धर्माचरण की आदतों की शिक्षा देना मह्त्वपूर्ण बन जाता है। आदत का अर्थ है जिस बात के करने में कठिनाई का अनुभव नहीं होता। जब किसी बात के बारबार करने से आचरण में यह सहजता आती है तब वह आदत बन जाती है। और जब उसे बुद्धिका अधिष्ठान मिल जाता है तब वह आदतें मनुष्य का स्वभाव ही बन जातीं हैं।&lt;br /&gt;
&amp;lt;/ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== धर्म के अनुपालन के स्तर और साधन ===&lt;br /&gt;
# धर्म के अनुपालन करनेवालों के राष्ट्रभक्त, अराष्ट्रीय और राष्ट्रद्रोही ऐसे मोटे-मोटे तीन स्तर होते हैं।&lt;br /&gt;
# धर्म के अनुपालन के साधन : धर्म का अनुपालन पूर्व में बताए अनुसार शिक्षा, आदेश, प्रायश्चित्त/ पश्चात्ताप तथा दंड ऐसा चार प्रकार से होता है। शासन दुर्बल होने से समाज में प्रमाद करनेवालों की संख्या में वृद्धि होती है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== धर्म के अनुपालन के अवरोध ===&lt;br /&gt;
धर्म के अनुपालन में निम्न बातें अवरोध-रूप होतीं हैं:&lt;br /&gt;
# भिन्न जीवनदृष्टि के लोग : शीघ्रातिशीघ्र भिन्न जीवनदृष्टि के लोगों को आत्मसात करना आवश्यक होता है। अन्यथा समाज जीवन अस्थिर और संघर्षमय बन जाता है।&lt;br /&gt;
# स्वार्थ / संकुचित अस्मिताएँ : आवश्यकताओं की पुर्ति तक तो स्वार्थ भावना समर्थनीय है। अस्मिता या अहंकार यह प्रत्येक जीवंत ईकाई का एक स्वाभाविक पहलू होता है। किन्तु जब किसी ईकाई के विशिष्ट स्तर की यह अस्मिता अपने से ऊपर की ईकाई जिसका वह हिस्सा है, उसकी अस्मिता से बड़ी लगने लगती है तब समाज जीवन की शांति नष्ट हो जाती है। इसलिए यह आवश्यक है कि मजहब, रिलिजन, प्रादेशिक अलगता, भाषिक भिन्नता, धन का अहंकार, बौद्धिक श्रेष्ठता आदि जैसी संकुचित अस्मिताएँ अपने से ऊपर की जीवंत ईकाई की अस्मिता के विरोध में नहीं हो।&lt;br /&gt;
# विपरीत शिक्षा : विपरीत या दोषपूर्ण शिक्षा यह तो सभी समस्याओं की जड़ होती है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== कारक तत्व ===&lt;br /&gt;
 : कारक तत्वों से मतलब है धर्मपालन में सहायता देनेवाले घटक। ये निम्न होते हैं।&lt;br /&gt;
६.१ धर्म व्यवस्था : शासन धर्मनिष्ठ रहे यह सुनिश्चित करना धर्म व्यवस्था की जिम्मेदारी है। अपने त्याग, तपस्या, ज्ञान, लोकसंग्रह, चराचर के हित का चिन्तन, समर्पण भाव और कार्यकुशलता के आधारपर 	समाज से प्राप्त समर्थन प्राप्त कर वह देखे की कोई अयोग्य व्यक्ति शासक नहीं बनें।&lt;br /&gt;
६.२ शिक्षा : ६.२.१ कुटुम्ब शिक्षा 	६.२.२ विद्याकेन्द्र की शिक्षा 	६.२.३ लोकशिक्षा &lt;br /&gt;
६.३ धर्मनिष्ठ शासन : शासक का धर्मशास्त्र का जानकार होना और स्वयं धर्माचरणी होना भी आवश्यक होता है। जब शासन धर्म के अनुसार चलता है, धर्म व्यवस्थाद्वारा नियमित निर्देशित होता है तब धर्म भी 	स्थापित होता है और राज्य व्यवस्था भी श्रेष्ठ बनती है।&lt;br /&gt;
६.४ धर्मनिष्ठों का सामाजिक नेतृत्व : समाज जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में धर्मनिष्ठ लोग जब अच्छी संख्या में दिखाई देते हैं तब समाज मानस धर्मनिष्ठ बनता है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== चरण ==&lt;br /&gt;
धर्म का अनुपालन जब लोग स्वेच्छा से करनेवाले समाज के निर्माण के लिए दो बातें अत्यंत महत्वपूर्ण होतीं हैं। एक गर्भ में श्रेष्ठ जीवात्मा की स्थापना और दूसरे शिक्षा और संस्कार।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शिक्षा और संस्कार में -&lt;br /&gt;
७.१ जन्मपूर्व और शैशव कालमें अधिजनन शास्त्र के आधारपर मार्गदर्शन। &lt;br /&gt;
७.२ बाल्य काल : कुटुम्ब की शिक्षा के साथ विद्याकेन्द्र शिक्षा का समायोजन 			           &lt;br /&gt;
७.३ यौवन काल: अहंकार, बुद्धि के सही मोड़ हेतु सत्संग, प्रेरणा, वातावरण, ज्ञानार्जन/बलार्जन/कौशलार्जन आदि &lt;br /&gt;
७.४ प्रौढ़ावस्था : पूर्व ज्ञान/आदतों को व्यवस्थित करने के लिए सामाजिक वातावरण और मार्गदर्शन&lt;br /&gt;
७.४.१ पुरोहित&lt;br /&gt;
७.४.२ मेले/यात्राएं&lt;br /&gt;
७.४.३ कीर्तनकार/प्रवचनकार&lt;br /&gt;
७.४.४ धर्माचार्य&lt;br /&gt;
७.४.५ दृक्श्राव्य माध्यम –चित्रपट, दूरदर्शन आदि&lt;br /&gt;
७.४.६ आन्तरजाल&lt;br /&gt;
७.४.७ कानून का डर &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== धर्म निर्णय व्यवस्था ==&lt;br /&gt;
 : सामान्यत: जब भी धर्म की समझसे सम्बन्धित समस्या हो तब धर्म निर्णय की व्यवस्था उपलब्ध होनी चाहिये। इस व्यवस्था के तीन स्तर होना आवश्यक है। पहला स्तर तो स्थानिक धर्म के जानकार, दूसरा जनपदीय या निकटके तीर्थक्षेत्र में धर्मज्ञ परिषद्, और तीसरा स्तर अखिल भारतीय या राष्ट्रीय धर्मज्ञ परिषद्। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== माध्यम ==&lt;br /&gt;
 : धर्म अनुपालन करवाने के मुख्यत: दो प्रकारके माध्यम होते हैं। &lt;br /&gt;
९.१ कुटुम्ब के दायरे में : धर्म शिक्षा का अर्थ है सदाचार की शिक्षा। धर्म की शिक्षा के लिए कुटुम्ब यह सबसे श्रेष्ठ पाठशाला है। विद्याकेन्द्र की शिक्षा तो कुटुम्ब में मिली धर्म शिक्षा की पुष्टि या आवश्यक सुधार के लिए ही होती है। कुटुम्ब में धर्म शिक्षा तीन तरह से होती है। गर्भपूर्व संस्कार, गर्भ संस्कार और शिशु संस्कार और आदतें। मनुष्य की आदतें भी बचपन में ही पक्की हो जातीं हैं। &lt;br /&gt;
९.२ कुटुम्ब से बाहर के माध्यम : मनुष्य तो हर पल सीखता ही रहता है। इसलिए कुटुम्ब से बाहर भी वह कई बातें सीखता है। माध्यमों में मित्र मंडली, विद्यालय, समाज का सांस्कृतिक स्तर और क़ानून व्यवस्था आदि।&lt;br /&gt;
जीवन के भारतीय प्रतिमान की प्रतिष्ठापना की प्रक्रिया से अपेक्षित परिणामों की चर्चा हम [[Form of an Ideal Society (आदर्श समाज का स्वरूप)|अगले]] अध्याय में करेंगे।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[Category:Bhartiya Jeevan Pratiman (भारतीय जीवन प्रतिमान)]]&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Dilipkelkar</name></author>
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		<id>https://dharmawiki.org/index.php?title=Responsibilities_at_Societal_Level_(%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%AE%E0%A4%BE%E0%A4%9C%E0%A4%BF%E0%A4%95_%E0%A4%A7%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%AE_%E0%A4%85%E0%A4%A8%E0%A5%81%E0%A4%AA%E0%A4%BE%E0%A4%B2%E0%A4%A8)&amp;diff=119965</id>
		<title>Responsibilities at Societal Level (सामाजिक धर्म अनुपालन)</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://dharmawiki.org/index.php?title=Responsibilities_at_Societal_Level_(%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%AE%E0%A4%BE%E0%A4%9C%E0%A4%BF%E0%A4%95_%E0%A4%A7%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%AE_%E0%A4%85%E0%A4%A8%E0%A5%81%E0%A4%AA%E0%A4%BE%E0%A4%B2%E0%A4%A8)&amp;diff=119965"/>
		<updated>2019-07-21T06:50:05Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Dilipkelkar: /* धर्म के अनुपालन के अवरोध */&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{One source|date=January 2019}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जीवन के भारतीय प्रतिमान की पुनर्प्रतिष्ठा के लिए राष्ट्र के संगठन की विभिन्न प्रणालियों के स्तर पर उन कर्तव्यों का याने ईकाई धर्म का विचार और प्रत्यक्ष धर्म अनुपालन की प्रक्रिया कैसे चलेगी, ऐसा दो पहलुओं में हम परिवर्तन की प्रक्रिया का विचार करेंगे। वैसे तो धर्म अनुपालन की प्रक्रिया का विचार हमने समाज धारणा शास्त्र के विषय में किया है। फिर भी परिवर्तन प्रक्रिया को यहाँ फिर से दोहराना उपयुक्त होगा।   &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== विभिन्न सामाजिक प्रणालियों के धर्म ==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== कुटुम्ब ===&lt;br /&gt;
कुटुम्ब परिवर्तन का सबसे जड़मूल का माध्यम है। समाज जीवन की वह नींव होता है। वह जितना सशक्त और व्यापक भूमिका का निर्वहन करेगा समाज उतना ही श्रेष्ठ बनेगा। कुटुम्ब में दो प्रकार के काम होते हैं। पहले हैं कुटुम्ब के लिए और दूसरे हैं कुटुम्ब में याने समाज, सृष्टि के लिए। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== कुटुम्ब की – कुटुम्ब के लिए ===&lt;br /&gt;
# क्षमता और योग्यता आधारित कर्तव्य  &lt;br /&gt;
# क्षमता और योग्यता के अनुसार सार्थक योगदान  &lt;br /&gt;
# शुद्ध सस्नेहयुक्त सदाचारयुक्त परस्पर व्यवहार  &lt;br /&gt;
# बड़ों का आदर, सेवा। छोटों के लिए आदर्श और प्यार।  &lt;br /&gt;
# कुटुंबहित अपने हित से ऊपर। कर्त्तव्य परायणता। अपने कर्तव्यों के प्रति आग्रही।  &lt;br /&gt;
# स्वावलंबन / परस्परावलंबन।  &lt;br /&gt;
# कुटुम्ब के सभी काम करना आना और करना।  &lt;br /&gt;
# एकात्मता का विस्तार – कुटुंब&amp;lt; समाज&amp;lt; सृष्टि&amp;lt; विश्व। लेकिन इसकी नींव कुटुंब जीवन में ही पड़ेगी और पक्की होगी।  &lt;br /&gt;
# कौशल, ज्ञान, बल और पुण्य अर्जन की दृष्टी से अध्ययन और संस्कार  &lt;br /&gt;
# कौटुम्बिक कुशलताएँ, आदतें, रीति-रिवाज, परम्पराएँ आदि  &lt;br /&gt;
# कुटुम्ब प्रमुख सर्वोपरि : कुटुम्ब के सब ही सदस्यों को कुटुम्ब प्रमुख बनने की प्रेरणा और इस हेतु से उनके द्वारा अपना विवेक, कौशल, सयानापन, निर्णय क्षमता, अपार स्नेह आदि का विकास। कुटुम्ब प्रमुख की आज्ञाओं का पालन - आज्ञाकारिता।  &lt;br /&gt;
# काया, वाचा, मनसा सभी से मधुर व्यवहार।  &lt;br /&gt;
# अच्छा – बेटा/बेटी, भाई/बहन, पति/पत्नि, पिता/माता, गृहस्थ/गृहिणी, रिश्तेदार आदि बनना/बनाना।  &lt;br /&gt;
# वर्णाश्रम धर्म का पालन – स्वभावज कर्म करते जाना।  &lt;br /&gt;
## सवर्ण/सजातीय विवाह  &lt;br /&gt;
## कौटुम्बिक व्यवसाय में सहभाग  &lt;br /&gt;
## ज्ञान, कौशल, श्रेष्ठ परम्पराओं का निर्वहन, परिष्कार, निर्माण और अगली पीढी को अंतरण  &lt;br /&gt;
## आयु की अवस्था के अनुसार ब्रह्मचर्य, गृहस्थ और वानप्रस्थ आदि आश्रमों के धर्म की जिम्मेदारियों का निर्वहन।  &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== कुटुम्ब में – समाज के लिए ===&lt;br /&gt;
# सामाजिक कर्तव्यों का निर्वहन &lt;br /&gt;
## समाज संगठन की प्रणालियों (कुटुंब, जाति, ग्राम, राष्ट्र) में &lt;br /&gt;
## सामाजिक व्यवस्थाओं (रक्षण, पोषण और शिक्षण) में &lt;br /&gt;
# ज्ञानार्जन, कौशलार्जन, बलार्जन और पुण्यार्जन की मानसिकता और केवल इन के लिए अटन। &lt;br /&gt;
# स्वावलंबन और परस्परावलंबन। &lt;br /&gt;
# शत्रुत्व भाववाले समाज के घटकों के साथ भी शान्ततापूर्ण और सुखी सहजीवन। &lt;br /&gt;
# एकात्मता (समाज और सृष्टि के साथ) का व्यवहार / सुख और दु:ख में सहानुभूति और सहभागिता। &lt;br /&gt;
# विभिन्न क्षेत्रों में - जैसे शासन, न्याय, समृद्धि आदि क्षेत्रों के नेता &amp;gt; आचार्य &amp;gt; धर्म । धर्म सर्वोपरि। &lt;br /&gt;
# सद्गुण, सदाचार, स्वावलंबन, सत्यनिष्ठा, सादगी, सहजता, सौन्दर्यबोध, स्वतंत्रता, संयम, स्वदेशी आदि का व्यवहार साथ ही में त्याग, तपस्या, समाधान, शान्ति, अभय, विजिगीषा आदि गुणों का विकास। &lt;br /&gt;
# मनसा, वाचा कर्मणा ‘सर्वे भवन्तु सुखिन:’ के प्रयास। &lt;br /&gt;
# वर्ण-धर्म की और जाति-धर्म की शिक्षा देना। जब लोग अपने वर्ण के अनुसार आचरण करते हैं, तब राष्ट्र की संस्कृति का विकास और रक्षण होता है। और जब लोग अपने जातिधर्म के अनुसार व्यवसाय करते हैं तब देश समृद्ध बनता है, ओर बना रहता है। &lt;br /&gt;
# धर्माचरणी और समाजभक्त / देशभक्त / राष्ट्रभक्त / परमात्मा में श्रद्धा रखने वालों का निर्माण। &lt;br /&gt;
# धर्मशिक्षा और कर्मशिक्षा। &lt;br /&gt;
# संयमित उपभोग। न्यूनतम (इष्टतम) उपभोग। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== ग्रामकुल ==&lt;br /&gt;
# ग्राम को स्वावलंबी ग्राम बनाना&lt;br /&gt;
# ग्राम की अर्थव्यवस्था को ठीक से बिठाना और चलाना&lt;br /&gt;
# संयुक्त कुटुंबों की प्रतिष्ठापना का वातावरण&lt;br /&gt;
# कौटुम्बिक उद्योगों की प्रतिष्ठापना का वातावरण&lt;br /&gt;
# कुटुम्ब भावना से प्रत्येक व्यक्ति की सम्मानपूर्ण आजीविका की व्यवस्था करना&lt;br /&gt;
# कौटुम्बिक उद्योग और जातियों में समन्वय रखना&lt;br /&gt;
# शासकीय व्यवस्थाओं के प्रति जिम्मेदारियां : कर देना, शिक्षण, पोषण और रक्षण की व्यवस्थाओं में श्रेष्ठ व्यक्तियों का और संसाधनों का योगदान देना&lt;br /&gt;
# ग्राम, एक कुल बने ऐसा वातावरण बनाए रखना।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== गुरुकुल / विद्यालय ==&lt;br /&gt;
# वर्णशिक्षा की व्यवस्था &lt;br /&gt;
# ज्ञानार्जन, कौशलार्जन, बलार्जन के लिए मार्गदर्शन &lt;br /&gt;
# शास्त्रीय शिक्षा का प्रावधान &lt;br /&gt;
# श्रेष्ठ परम्पराओं के निर्माण की शिक्षा &lt;br /&gt;
# जीवन के तत्त्वज्ञान और व्यवहार की शिक्षा &lt;br /&gt;
# जीवन के लिए महत्वपूर्ण सामाजिक संगठन प्रणालियाँ और व्यवस्थाओं की समझ और यथाशक्ति योगदान की प्रेरणा। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== कौशल विधा पंचायत ==&lt;br /&gt;
# समाज की किसी एक आवश्यकता की पूर्ति करना। कभी कोई कमी न हो यह सुनिश्चित करना। &lt;br /&gt;
# धर्म के मार्गदर्शन में अपने कौशल विधा-धर्म का निर्धारण और कौशल विधा प्रणाली में प्रचार प्रसार &lt;br /&gt;
# अन्य कौशल विधाओं के साथ समन्वय &lt;br /&gt;
# राष्ट्र सर्वोपरि यह भावना सदा जाग्रत रखना &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== व्यवस्थाओं के धर्म ==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== धर्म व्यवस्था ===&lt;br /&gt;
यह कोई नियमित व्यवस्था नहीं होती। यह जाग्रत, नि:स्वार्थी, सर्वभूतहित में सदैव प्रयासरत रहनेवाले पंडितों का समूह होता है। यह समूह सक्रिय होने से समाज ठीक चलता है। आवश्यकतानुसार इस समूह की जिम्मेदारियां बढ़ जातीं है। ऐसे आपद्धर्म के निर्वहन के लिए भी यह समूह पर्याप्त सामर्थ्यवान हो। &lt;br /&gt;
# कालानुरूप धर्म को व्याख्यायित करना। &lt;br /&gt;
# वर्णों के ‘स्व’धर्मों का पालन करने की व्यवस्था की पस्तुति कर शिक्षा और शासन की मदद से समाज में उन्हें स्थापित करना। व्यक्तिगत और सामाजिक धर्म/संस्कृति के अनुसार व्यवहार का वातावरण बनाना। जब वर्ण-धर्म का पालन लोग करते हैं तब देश में संस्कृति का विकास और रक्षण होता है। जिनकी ओर देखकर लोग वर्ण धर्म का पालन कर सकें ऐसे ‘श्रेष्ठ’ लोगों का निर्माण करना। &lt;br /&gt;
# स्वाभाविक, शासनिक और आर्थिक ऐसी सभी प्रकार की स्वतन्त्रता की रक्षा करना। &lt;br /&gt;
# शासन पर अपने ज्ञान, त्याग, तपस्या, लोकसंग्रह तथा सदैव लोकहित के चिंतन के माध्यम से नैतिक दबाव निर्माण करना। शासन को सदाचारी, कुशल और सामर्थ्य संपन्न बनाए रखने के लिए मार्गदर्शन करना। अधर्माचरणी शासन को हटाकर धर्माचरणी शासन को प्रतिष्ठित करना। &lt;br /&gt;
# लोकशिक्षा (कुटुम्ब शिक्षा इसी का हिस्सा है) और विद्यालयीन शिक्षा की प्रभावी व्यवस्था करना। जैसे लिखा पढी न्यूनतम करने की दिशा में बढ़ना। वाणी / शब्द की प्रतिष्ठा बढ़ाना। जीवन को साधन सापेक्षता से साधना सापेक्षता की ओर ले जाने के लिए अपनी कथनी और करनी से मार्गदर्शन करना। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== शासन व्यवस्था ===&lt;br /&gt;
# अंतर्बाह्य शत्रुओं से लोगों की शासनिक स्वतन्त्रता की रक्षा करना।  &lt;br /&gt;
# धर्म के दायरे में रहकर दुष्टों और मूर्खों को नियंत्रण में रखना।  &lt;br /&gt;
# दंड व्यवस्था के अंतर्गत न्याय व्यवस्था का निर्माण करना। किसी पर अन्याय हो ही नहीं, ऐसी दंड व्यवस्था के निर्माण का प्रयास करना।  &lt;br /&gt;
# श्रेष्ठ शासक परम्परा निर्माण करना।  &lt;br /&gt;
# प्रभावी, समाजहित की शिक्षा देनेवाले शिक्षा केन्द्रों को संरक्षण, समर्थन और सहायता देकर और प्रभावी बनाने के लिए यथाशक्ति प्रयास करना। ऐसा करने से शासन का काम काफी सरल हो जाता है।  &lt;br /&gt;
# धर्म व्यवस्था से समय समय पर मार्गदर्शन प्राप्त करते रहना।  &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== समृद्धि व्यवस्था ===&lt;br /&gt;
# योग्य शिक्षा के द्वारा समाज में धर्म के अविरोधी इच्छाओं का ही विकास हो यह सुनिश्चित करना।&lt;br /&gt;
# समाज के प्रत्येक घटक की सभी आवश्यकताओं की पूर्ति करना, धर्म विरोधी इच्छाओं की नहीं। समाज की आर्थिक स्वतन्त्रता को अबाधित रखना।&lt;br /&gt;
# प्राकृतिक संसाधनों का न्यूनतम उपयोग हो ऐसा वातावरण बनाना। संयमित उपभोग को प्रतिष्ठित करना।&lt;br /&gt;
# प्रकृति का प्रदूषण नहीं होने देना। प्रकृति का सन्तुलन बनाए रखना।&lt;br /&gt;
# कौटुम्बिक उद्योग, जातियाँ और ग्राम मिलकर समृद्धि निर्माण होती है। ये तीनों ईकाईयाँ फलेफूले और इनका स्वस्थ ऐसा तानाबाना बना रहे ऐसा वातावरण रहे।&lt;br /&gt;
# पैसे का विनिमय न्यूनतम रहे ऐसी व्यवस्था निर्माण करना।&lt;br /&gt;
अब हम धर्म के अनुपालन की प्रक्रिया का विचार आगे करेंगे।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== धर्म अनुपालन की प्रक्रिया ==&lt;br /&gt;
हमने जाना है कि समाज के सुख, शांति, स्वतंत्रता, सुसंस्कृतता के लिए समाज का धर्मनिष्ठ होना आवश्यक होता है। यहाँ मोटे तौर पर धर्म का मतलब कर्तव्य से है। समाज धारणा के लिए कर्तव्यों पर आधारित जीवन अनिवार्य होता है। समाज धारणा के लिए धर्म-युक्त व्यवहार में आनेवाली जटिलताओं को और उसके अनुपालन की प्रक्रिया को समझने का प्रयास करेंगे। इन में व्यक्तिगत स्तर की बातों का हमने [[Personal Responsibilities (व्यक्तिगत धर्म अनुपालन)|पूर्व के अध्याय]] में विचार किया है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== विभिन्न ईकाईयों के स्तर पर ===&lt;br /&gt;
# कुटुम्ब : समाज की सभी इकाइयों के विभिन्न स्तरोंपर उचित भूमिका निभानेवाले श्रेष्ठ मानव का निर्माण करना। कौटुम्बिक व्यवसाय के माध्यम से समाज की किसी आवश्यकता की पूर्ति करना।&lt;br /&gt;
# ग्राम : ग्राम की भूमिका छोटे विश्व और बड़े कुटुम्ब की तरह ही होती है। जिस तरह कुटुम्ब के सदस्यों में आपस में पैसे का लेनदेन नहीं होता उसी तरह अच्छे ग्राम में कुटुम्बों में आपस में पैसे का लेनदेन नहीं होता। प्रत्येक की सम्मान और स्वतन्त्रता के साथ अन्न, वस्त्र, भवन, शिक्षा, आजीविका, सुरक्षा आदि सभी आवश्यकताओं की पूर्ति होती है।&lt;br /&gt;
# कौशल विधा : समाज जीवन की आवश्यकताओं की हर विधा के अनुसार व्यवसाय विधा समूह बनते हैं। इन समूहों के भी सामान्य व्यक्ति से लेकर विश्व के स्तर तक के लिए करणीय और अकरणीय कार्य होते हैं। कर्तव्य होते हैं। इन्हें व्यवसाय विधा धर्म कहेंगे। इनमें पदार्थ के उत्पादन के रूप में आर्थिक स्वतन्त्रता के किसी एक पहलू की रक्षा में योगदान करना होता है। शिक्षा / संस्कार, वस्तुएं, भावनाएं, विचार, कला आदि में से समाज जीवन की आवश्यकता में से किसी एक विधा के पदार्थ की निरंतर आपूर्ति करना। पदार्थ का अर्थ केवल वस्तु नहीं है। जिस पद याने शब्द का अर्थ होता है वह पदार्थ कहलाता है। व्यावसायिक समूह का काम कौशल का विकास करना, कौशल का पीढ़ी दर पीढ़ी अंतरण करना और अन्य व्यवसायिक समूहों से समन्वय रखना आदि है।&lt;br /&gt;
# भाषिक समूह : भाषा का मुख्य उपयोग परस्पर संवाद है। संवाद विचारों की सटीक अभिव्यक्ति करने वाला हो इस हेतु से भाषाएँ बनतीं हैं। संवाद में सहजता, सरलता, सुगमता से आत्मीयता बढ़ती है। इसी हेतु से भाषिक समूह बनते हैं।&lt;br /&gt;
# प्रादेशिक समूह : शासनिक और व्यवस्थात्मक सुविधा की दृष्टि से प्रादेशिक स्तर का मह्त्व होता है।&lt;br /&gt;
# राष्ट्र : राष्ट्र अपने समाज के लिये विविध प्रकार के संगठनों का और व्यवस्थाओं का निर्माण करता है।&lt;br /&gt;
# विश्व : पूर्व में बताई हुई 1 से लेकर 6 तक की सभी इकाइयां वैश्विक हित की अविरोधी रहें।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== प्रकृति सुसंगतता ===&lt;br /&gt;
समाज जीवन में केन्द्रिकरण और विकेंद्रीकरण का समन्वय हो यह आवश्यक है। विशाल उद्योग, बाजार की मंडियां, शासकीय कार्यालय, व्यावसायिक, भाषिक, प्रादेशिक समूहों के समन्वय की व्यवस्थाएं आदि के लिये शहरों की आवश्यकता होती है। लेकिन इनमें अनावश्यक केन्द्रीकरण न हो पाए। वनवासी या गिरिजन भी ग्राम व्यवस्था से ही जुड़े हुए होने चाहिए। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== प्रक्रियाएं ===&lt;br /&gt;
धर्म के अनुपालन में बुद्धि के स्तर पर धर्म के प्रति पर्याप्त संज्ञान, मन के स्तर पर कौटुम्बिक भावना, अनुशासन और श्रद्धा (आज्ञाकारिता) का विकास तथा शारीरिक स्तर पर सहकारिता और परोपकार की आदतें अत्यंत आवश्यक हैं।&lt;br /&gt;
# धर्म संज्ञान : ‘समझना’ यह बुद्धि का काम होता है। इसलिए जब बच्चे का बुद्धि का अंग विकसित हो रहा होता है उसे धर्म की बौद्धिक याने तर्क तथा कर्मसिद्धांत के आधार पर शिक्षा देना उचित होता है। इस दृष्टि से तर्कशास्त्र की समझ या सरल शब्दों में ‘किसी भी बात के करने से पहले चराचर के हित में उस बात को कैसे करना चाहिए’ इसे समझने की क्षमता का विकास आवश्यक होता है।&lt;br /&gt;
# कौटुम्बिक भावना का विकास : समाज के सभी परस्पर संबंधों में कौटुम्बिक भावना से व्यवहार का आधार धर्मसंज्ञान ही तो होता है। मन को बुद्धि के नियंत्रण में रखना ही मन की शिक्षा होती है। दुर्योधन के निम्न कथन से सब परिचित हैं{{Citation needed}}:&lt;br /&gt;
&amp;lt;blockquote&amp;gt;जानामी धर्मं न च में प्रवृत्ति: । जानाम्यधर्मं न च में निवृत्ति: ।।&amp;lt;/blockquote&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;ol start=&amp;quot;3&amp;quot;&amp;gt; &lt;br /&gt;
&amp;lt;li&amp;gt;धर्माचरण की आदतें: दुर्योधन के उपर्युक्त कथन को ध्यान में रखकर ही गर्भधारणा से ही बच्चे को धर्माचरण की आदतों की शिक्षा देना मह्त्वपूर्ण बन जाता है। आदत का अर्थ है जिस बात के करने में कठिनाई का अनुभव नहीं होता। जब किसी बात के बारबार करने से आचरण में यह सहजता आती है तब वह आदत बन जाती है। और जब उसे बुद्धिका अधिष्ठान मिल जाता है तब वह आदतें मनुष्य का स्वभाव ही बन जातीं हैं।&lt;br /&gt;
&amp;lt;/ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== धर्म के अनुपालन के स्तर और साधन ===&lt;br /&gt;
# धर्म के अनुपालन करनेवालों के राष्ट्रभक्त, अराष्ट्रीय और राष्ट्रद्रोही ऐसे मोटे-मोटे तीन स्तर होते हैं।&lt;br /&gt;
# धर्म के अनुपालन के साधन : धर्म का अनुपालन पूर्व में बताए अनुसार शिक्षा, आदेश, प्रायश्चित्त/ पश्चात्ताप तथा दंड ऐसा चार प्रकार से होता है। शासन दुर्बल होने से समाज में प्रमाद करनेवालों की संख्या में वृद्धि होती है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== धर्म के अनुपालन के अवरोध ===&lt;br /&gt;
धर्म के अनुपालन में निम्न बातें अवरोध-रूप होतीं हैं।&lt;br /&gt;
५.१ भिन्न जीवनदृष्टि के लोग : शीघ्रातिशीघ्र भिन्न जीवनदृष्टि के लोगों को आत्मसात करना आवश्यक होता 	है। अन्यथा समाज जीवन अस्थिर और संघर्षमय बन जाता है।&lt;br /&gt;
५.२ स्वार्थ/संकुचित अस्मिताएँ :आवश्यकताओं की पुर्ति तक तो स्वार्थ भावना समर्थनीय है। अस्मिता या 	अहंकार यह प्रत्येक जिवंत ईकाई का एक स्वाभाविक पहलू होता है। किन्तु जब किसी ईकाई के विशिष्ट स्तर की यह अस्मिता अपने से ऊपर की ईकाई जिसका वह हिस्सा है, उसकी अस्मिता से बड़ी लगने लगती है तब समाज जीवन की शांति नष्ट हो जाती है। इसलिए यह आवश्यक है की मजहब, रिलिजन,प्रादेशिक अलगता, भाषिक भिन्नता, धनका अहंकार, बौद्धिक श्रेष्ठता आदि जैसी संकुचित अस्मिताएँ अपने से ऊपर की जीवंत ईकाई की अस्मिता के विरोध में नहीं हो। &lt;br /&gt;
५.३ विपरीत शिक्षा : विपरीत या दोषपूर्ण शिक्षा यह तो सभी समस्याओं की जड़ होती है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== कारक तत्त्व ===&lt;br /&gt;
 : कारक तत्वों से मतलब है धर्मपालन में सहायता देनेवाले घटक। ये निम्न होते हैं।&lt;br /&gt;
६.१ धर्म व्यवस्था : शासन धर्मनिष्ठ रहे यह सुनिश्चित करना धर्म व्यवस्था की जिम्मेदारी है। अपने त्याग, तपस्या, ज्ञान, लोकसंग्रह, चराचर के हित का चिन्तन, समर्पण भाव और कार्यकुशलता के आधारपर 	समाज से प्राप्त समर्थन प्राप्त कर वह देखे की कोई अयोग्य व्यक्ति शासक नहीं बनें।&lt;br /&gt;
६.२ शिक्षा : ६.२.१ कुटुम्ब शिक्षा 	६.२.२ विद्याकेन्द्र की शिक्षा 	६.२.३ लोकशिक्षा &lt;br /&gt;
६.३ धर्मनिष्ठ शासन : शासक का धर्मशास्त्र का जानकार होना और स्वयं धर्माचरणी होना भी आवश्यक होता है। जब शासन धर्म के अनुसार चलता है, धर्म व्यवस्थाद्वारा नियमित निर्देशित होता है तब धर्म भी 	स्थापित होता है और राज्य व्यवस्था भी श्रेष्ठ बनती है।&lt;br /&gt;
६.४ धर्मनिष्ठों का सामाजिक नेतृत्व : समाज जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में धर्मनिष्ठ लोग जब अच्छी संख्या में दिखाई देते हैं तब समाज मानस धर्मनिष्ठ बनता है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== चरण ==&lt;br /&gt;
धर्म का अनुपालन जब लोग स्वेच्छा से करनेवाले समाज के निर्माण के लिए दो बातें अत्यंत महत्वपूर्ण होतीं हैं। एक गर्भ में श्रेष्ठ जीवात्मा की स्थापना और दूसरे शिक्षा और संस्कार।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शिक्षा और संस्कार में -&lt;br /&gt;
७.१ जन्मपूर्व और शैशव कालमें अधिजनन शास्त्र के आधारपर मार्गदर्शन। &lt;br /&gt;
७.२ बाल्य काल : कुटुम्ब की शिक्षा के साथ विद्याकेन्द्र शिक्षा का समायोजन 			           &lt;br /&gt;
७.३ यौवन काल: अहंकार, बुद्धि के सही मोड़ हेतु सत्संग, प्रेरणा, वातावरण, ज्ञानार्जन/बलार्जन/कौशलार्जन आदि &lt;br /&gt;
७.४ प्रौढ़ावस्था : पूर्व ज्ञान/आदतों को व्यवस्थित करने के लिए सामाजिक वातावरण और मार्गदर्शन&lt;br /&gt;
७.४.१ पुरोहित&lt;br /&gt;
७.४.२ मेले/यात्राएं&lt;br /&gt;
७.४.३ कीर्तनकार/प्रवचनकार&lt;br /&gt;
७.४.४ धर्माचार्य&lt;br /&gt;
७.४.५ दृक्श्राव्य माध्यम –चित्रपट, दूरदर्शन आदि&lt;br /&gt;
७.४.६ आन्तरजाल&lt;br /&gt;
७.४.७ कानून का डर &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== धर्म निर्णय व्यवस्था ==&lt;br /&gt;
 : सामान्यत: जब भी धर्म की समझसे सम्बन्धित समस्या हो तब धर्म निर्णय की व्यवस्था उपलब्ध होनी चाहिये। इस व्यवस्था के तीन स्तर होना आवश्यक है। पहला स्तर तो स्थानिक धर्म के जानकार, दूसरा जनपदीय या निकटके तीर्थक्षेत्र में धर्मज्ञ परिषद्, और तीसरा स्तर अखिल भारतीय या राष्ट्रीय धर्मज्ञ परिषद्। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== माध्यम ==&lt;br /&gt;
 : धर्म अनुपालन करवाने के मुख्यत: दो प्रकारके माध्यम होते हैं। &lt;br /&gt;
९.१ कुटुम्ब के दायरे में : धर्म शिक्षा का अर्थ है सदाचार की शिक्षा। धर्म की शिक्षा के लिए कुटुम्ब यह सबसे श्रेष्ठ पाठशाला है। विद्याकेन्द्र की शिक्षा तो कुटुम्ब में मिली धर्म शिक्षा की पुष्टि या आवश्यक सुधार के लिए ही होती है। कुटुम्ब में धर्म शिक्षा तीन तरह से होती है। गर्भपूर्व संस्कार, गर्भ संस्कार और शिशु संस्कार और आदतें। मनुष्य की आदतें भी बचपन में ही पक्की हो जातीं हैं। &lt;br /&gt;
९.२ कुटुम्ब से बाहर के माध्यम : मनुष्य तो हर पल सीखता ही रहता है। इसलिए कुटुम्ब से बाहर भी वह कई बातें सीखता है। माध्यमों में मित्र मंडली, विद्यालय, समाज का सांस्कृतिक स्तर और क़ानून व्यवस्था आदि।&lt;br /&gt;
जीवन के भारतीय प्रतिमान की प्रतिष्ठापना की प्रक्रिया से अपेक्षित परिणामों की चर्चा हम [[Form of an Ideal Society (आदर्श समाज का स्वरूप)|अगले]] अध्याय में करेंगे।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[Category:Bhartiya Jeevan Pratiman (भारतीय जीवन प्रतिमान)]]&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Dilipkelkar</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://dharmawiki.org/index.php?title=Responsibilities_at_Societal_Level_(%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%AE%E0%A4%BE%E0%A4%9C%E0%A4%BF%E0%A4%95_%E0%A4%A7%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%AE_%E0%A4%85%E0%A4%A8%E0%A5%81%E0%A4%AA%E0%A4%BE%E0%A4%B2%E0%A4%A8)&amp;diff=119964</id>
		<title>Responsibilities at Societal Level (सामाजिक धर्म अनुपालन)</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://dharmawiki.org/index.php?title=Responsibilities_at_Societal_Level_(%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%AE%E0%A4%BE%E0%A4%9C%E0%A4%BF%E0%A4%95_%E0%A4%A7%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%AE_%E0%A4%85%E0%A4%A8%E0%A5%81%E0%A4%AA%E0%A4%BE%E0%A4%B2%E0%A4%A8)&amp;diff=119964"/>
		<updated>2019-07-21T06:49:45Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Dilipkelkar: /* धर्म के अनुपालन के स्तर और साधन */&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{One source|date=January 2019}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जीवन के भारतीय प्रतिमान की पुनर्प्रतिष्ठा के लिए राष्ट्र के संगठन की विभिन्न प्रणालियों के स्तर पर उन कर्तव्यों का याने ईकाई धर्म का विचार और प्रत्यक्ष धर्म अनुपालन की प्रक्रिया कैसे चलेगी, ऐसा दो पहलुओं में हम परिवर्तन की प्रक्रिया का विचार करेंगे। वैसे तो धर्म अनुपालन की प्रक्रिया का विचार हमने समाज धारणा शास्त्र के विषय में किया है। फिर भी परिवर्तन प्रक्रिया को यहाँ फिर से दोहराना उपयुक्त होगा।   &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== विभिन्न सामाजिक प्रणालियों के धर्म ==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== कुटुम्ब ===&lt;br /&gt;
कुटुम्ब परिवर्तन का सबसे जड़मूल का माध्यम है। समाज जीवन की वह नींव होता है। वह जितना सशक्त और व्यापक भूमिका का निर्वहन करेगा समाज उतना ही श्रेष्ठ बनेगा। कुटुम्ब में दो प्रकार के काम होते हैं। पहले हैं कुटुम्ब के लिए और दूसरे हैं कुटुम्ब में याने समाज, सृष्टि के लिए। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== कुटुम्ब की – कुटुम्ब के लिए ===&lt;br /&gt;
# क्षमता और योग्यता आधारित कर्तव्य  &lt;br /&gt;
# क्षमता और योग्यता के अनुसार सार्थक योगदान  &lt;br /&gt;
# शुद्ध सस्नेहयुक्त सदाचारयुक्त परस्पर व्यवहार  &lt;br /&gt;
# बड़ों का आदर, सेवा। छोटों के लिए आदर्श और प्यार।  &lt;br /&gt;
# कुटुंबहित अपने हित से ऊपर। कर्त्तव्य परायणता। अपने कर्तव्यों के प्रति आग्रही।  &lt;br /&gt;
# स्वावलंबन / परस्परावलंबन।  &lt;br /&gt;
# कुटुम्ब के सभी काम करना आना और करना।  &lt;br /&gt;
# एकात्मता का विस्तार – कुटुंब&amp;lt; समाज&amp;lt; सृष्टि&amp;lt; विश्व। लेकिन इसकी नींव कुटुंब जीवन में ही पड़ेगी और पक्की होगी।  &lt;br /&gt;
# कौशल, ज्ञान, बल और पुण्य अर्जन की दृष्टी से अध्ययन और संस्कार  &lt;br /&gt;
# कौटुम्बिक कुशलताएँ, आदतें, रीति-रिवाज, परम्पराएँ आदि  &lt;br /&gt;
# कुटुम्ब प्रमुख सर्वोपरि : कुटुम्ब के सब ही सदस्यों को कुटुम्ब प्रमुख बनने की प्रेरणा और इस हेतु से उनके द्वारा अपना विवेक, कौशल, सयानापन, निर्णय क्षमता, अपार स्नेह आदि का विकास। कुटुम्ब प्रमुख की आज्ञाओं का पालन - आज्ञाकारिता।  &lt;br /&gt;
# काया, वाचा, मनसा सभी से मधुर व्यवहार।  &lt;br /&gt;
# अच्छा – बेटा/बेटी, भाई/बहन, पति/पत्नि, पिता/माता, गृहस्थ/गृहिणी, रिश्तेदार आदि बनना/बनाना।  &lt;br /&gt;
# वर्णाश्रम धर्म का पालन – स्वभावज कर्म करते जाना।  &lt;br /&gt;
## सवर्ण/सजातीय विवाह  &lt;br /&gt;
## कौटुम्बिक व्यवसाय में सहभाग  &lt;br /&gt;
## ज्ञान, कौशल, श्रेष्ठ परम्पराओं का निर्वहन, परिष्कार, निर्माण और अगली पीढी को अंतरण  &lt;br /&gt;
## आयु की अवस्था के अनुसार ब्रह्मचर्य, गृहस्थ और वानप्रस्थ आदि आश्रमों के धर्म की जिम्मेदारियों का निर्वहन।  &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== कुटुम्ब में – समाज के लिए ===&lt;br /&gt;
# सामाजिक कर्तव्यों का निर्वहन &lt;br /&gt;
## समाज संगठन की प्रणालियों (कुटुंब, जाति, ग्राम, राष्ट्र) में &lt;br /&gt;
## सामाजिक व्यवस्थाओं (रक्षण, पोषण और शिक्षण) में &lt;br /&gt;
# ज्ञानार्जन, कौशलार्जन, बलार्जन और पुण्यार्जन की मानसिकता और केवल इन के लिए अटन। &lt;br /&gt;
# स्वावलंबन और परस्परावलंबन। &lt;br /&gt;
# शत्रुत्व भाववाले समाज के घटकों के साथ भी शान्ततापूर्ण और सुखी सहजीवन। &lt;br /&gt;
# एकात्मता (समाज और सृष्टि के साथ) का व्यवहार / सुख और दु:ख में सहानुभूति और सहभागिता। &lt;br /&gt;
# विभिन्न क्षेत्रों में - जैसे शासन, न्याय, समृद्धि आदि क्षेत्रों के नेता &amp;gt; आचार्य &amp;gt; धर्म । धर्म सर्वोपरि। &lt;br /&gt;
# सद्गुण, सदाचार, स्वावलंबन, सत्यनिष्ठा, सादगी, सहजता, सौन्दर्यबोध, स्वतंत्रता, संयम, स्वदेशी आदि का व्यवहार साथ ही में त्याग, तपस्या, समाधान, शान्ति, अभय, विजिगीषा आदि गुणों का विकास। &lt;br /&gt;
# मनसा, वाचा कर्मणा ‘सर्वे भवन्तु सुखिन:’ के प्रयास। &lt;br /&gt;
# वर्ण-धर्म की और जाति-धर्म की शिक्षा देना। जब लोग अपने वर्ण के अनुसार आचरण करते हैं, तब राष्ट्र की संस्कृति का विकास और रक्षण होता है। और जब लोग अपने जातिधर्म के अनुसार व्यवसाय करते हैं तब देश समृद्ध बनता है, ओर बना रहता है। &lt;br /&gt;
# धर्माचरणी और समाजभक्त / देशभक्त / राष्ट्रभक्त / परमात्मा में श्रद्धा रखने वालों का निर्माण। &lt;br /&gt;
# धर्मशिक्षा और कर्मशिक्षा। &lt;br /&gt;
# संयमित उपभोग। न्यूनतम (इष्टतम) उपभोग। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== ग्रामकुल ==&lt;br /&gt;
# ग्राम को स्वावलंबी ग्राम बनाना&lt;br /&gt;
# ग्राम की अर्थव्यवस्था को ठीक से बिठाना और चलाना&lt;br /&gt;
# संयुक्त कुटुंबों की प्रतिष्ठापना का वातावरण&lt;br /&gt;
# कौटुम्बिक उद्योगों की प्रतिष्ठापना का वातावरण&lt;br /&gt;
# कुटुम्ब भावना से प्रत्येक व्यक्ति की सम्मानपूर्ण आजीविका की व्यवस्था करना&lt;br /&gt;
# कौटुम्बिक उद्योग और जातियों में समन्वय रखना&lt;br /&gt;
# शासकीय व्यवस्थाओं के प्रति जिम्मेदारियां : कर देना, शिक्षण, पोषण और रक्षण की व्यवस्थाओं में श्रेष्ठ व्यक्तियों का और संसाधनों का योगदान देना&lt;br /&gt;
# ग्राम, एक कुल बने ऐसा वातावरण बनाए रखना।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== गुरुकुल / विद्यालय ==&lt;br /&gt;
# वर्णशिक्षा की व्यवस्था &lt;br /&gt;
# ज्ञानार्जन, कौशलार्जन, बलार्जन के लिए मार्गदर्शन &lt;br /&gt;
# शास्त्रीय शिक्षा का प्रावधान &lt;br /&gt;
# श्रेष्ठ परम्पराओं के निर्माण की शिक्षा &lt;br /&gt;
# जीवन के तत्त्वज्ञान और व्यवहार की शिक्षा &lt;br /&gt;
# जीवन के लिए महत्वपूर्ण सामाजिक संगठन प्रणालियाँ और व्यवस्थाओं की समझ और यथाशक्ति योगदान की प्रेरणा। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== कौशल विधा पंचायत ==&lt;br /&gt;
# समाज की किसी एक आवश्यकता की पूर्ति करना। कभी कोई कमी न हो यह सुनिश्चित करना। &lt;br /&gt;
# धर्म के मार्गदर्शन में अपने कौशल विधा-धर्म का निर्धारण और कौशल विधा प्रणाली में प्रचार प्रसार &lt;br /&gt;
# अन्य कौशल विधाओं के साथ समन्वय &lt;br /&gt;
# राष्ट्र सर्वोपरि यह भावना सदा जाग्रत रखना &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== व्यवस्थाओं के धर्म ==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== धर्म व्यवस्था ===&lt;br /&gt;
यह कोई नियमित व्यवस्था नहीं होती। यह जाग्रत, नि:स्वार्थी, सर्वभूतहित में सदैव प्रयासरत रहनेवाले पंडितों का समूह होता है। यह समूह सक्रिय होने से समाज ठीक चलता है। आवश्यकतानुसार इस समूह की जिम्मेदारियां बढ़ जातीं है। ऐसे आपद्धर्म के निर्वहन के लिए भी यह समूह पर्याप्त सामर्थ्यवान हो। &lt;br /&gt;
# कालानुरूप धर्म को व्याख्यायित करना। &lt;br /&gt;
# वर्णों के ‘स्व’धर्मों का पालन करने की व्यवस्था की पस्तुति कर शिक्षा और शासन की मदद से समाज में उन्हें स्थापित करना। व्यक्तिगत और सामाजिक धर्म/संस्कृति के अनुसार व्यवहार का वातावरण बनाना। जब वर्ण-धर्म का पालन लोग करते हैं तब देश में संस्कृति का विकास और रक्षण होता है। जिनकी ओर देखकर लोग वर्ण धर्म का पालन कर सकें ऐसे ‘श्रेष्ठ’ लोगों का निर्माण करना। &lt;br /&gt;
# स्वाभाविक, शासनिक और आर्थिक ऐसी सभी प्रकार की स्वतन्त्रता की रक्षा करना। &lt;br /&gt;
# शासन पर अपने ज्ञान, त्याग, तपस्या, लोकसंग्रह तथा सदैव लोकहित के चिंतन के माध्यम से नैतिक दबाव निर्माण करना। शासन को सदाचारी, कुशल और सामर्थ्य संपन्न बनाए रखने के लिए मार्गदर्शन करना। अधर्माचरणी शासन को हटाकर धर्माचरणी शासन को प्रतिष्ठित करना। &lt;br /&gt;
# लोकशिक्षा (कुटुम्ब शिक्षा इसी का हिस्सा है) और विद्यालयीन शिक्षा की प्रभावी व्यवस्था करना। जैसे लिखा पढी न्यूनतम करने की दिशा में बढ़ना। वाणी / शब्द की प्रतिष्ठा बढ़ाना। जीवन को साधन सापेक्षता से साधना सापेक्षता की ओर ले जाने के लिए अपनी कथनी और करनी से मार्गदर्शन करना। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== शासन व्यवस्था ===&lt;br /&gt;
# अंतर्बाह्य शत्रुओं से लोगों की शासनिक स्वतन्त्रता की रक्षा करना।  &lt;br /&gt;
# धर्म के दायरे में रहकर दुष्टों और मूर्खों को नियंत्रण में रखना।  &lt;br /&gt;
# दंड व्यवस्था के अंतर्गत न्याय व्यवस्था का निर्माण करना। किसी पर अन्याय हो ही नहीं, ऐसी दंड व्यवस्था के निर्माण का प्रयास करना।  &lt;br /&gt;
# श्रेष्ठ शासक परम्परा निर्माण करना।  &lt;br /&gt;
# प्रभावी, समाजहित की शिक्षा देनेवाले शिक्षा केन्द्रों को संरक्षण, समर्थन और सहायता देकर और प्रभावी बनाने के लिए यथाशक्ति प्रयास करना। ऐसा करने से शासन का काम काफी सरल हो जाता है।  &lt;br /&gt;
# धर्म व्यवस्था से समय समय पर मार्गदर्शन प्राप्त करते रहना।  &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== समृद्धि व्यवस्था ===&lt;br /&gt;
# योग्य शिक्षा के द्वारा समाज में धर्म के अविरोधी इच्छाओं का ही विकास हो यह सुनिश्चित करना।&lt;br /&gt;
# समाज के प्रत्येक घटक की सभी आवश्यकताओं की पूर्ति करना, धर्म विरोधी इच्छाओं की नहीं। समाज की आर्थिक स्वतन्त्रता को अबाधित रखना।&lt;br /&gt;
# प्राकृतिक संसाधनों का न्यूनतम उपयोग हो ऐसा वातावरण बनाना। संयमित उपभोग को प्रतिष्ठित करना।&lt;br /&gt;
# प्रकृति का प्रदूषण नहीं होने देना। प्रकृति का सन्तुलन बनाए रखना।&lt;br /&gt;
# कौटुम्बिक उद्योग, जातियाँ और ग्राम मिलकर समृद्धि निर्माण होती है। ये तीनों ईकाईयाँ फलेफूले और इनका स्वस्थ ऐसा तानाबाना बना रहे ऐसा वातावरण रहे।&lt;br /&gt;
# पैसे का विनिमय न्यूनतम रहे ऐसी व्यवस्था निर्माण करना।&lt;br /&gt;
अब हम धर्म के अनुपालन की प्रक्रिया का विचार आगे करेंगे।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== धर्म अनुपालन की प्रक्रिया ==&lt;br /&gt;
हमने जाना है कि समाज के सुख, शांति, स्वतंत्रता, सुसंस्कृतता के लिए समाज का धर्मनिष्ठ होना आवश्यक होता है। यहाँ मोटे तौर पर धर्म का मतलब कर्तव्य से है। समाज धारणा के लिए कर्तव्यों पर आधारित जीवन अनिवार्य होता है। समाज धारणा के लिए धर्म-युक्त व्यवहार में आनेवाली जटिलताओं को और उसके अनुपालन की प्रक्रिया को समझने का प्रयास करेंगे। इन में व्यक्तिगत स्तर की बातों का हमने [[Personal Responsibilities (व्यक्तिगत धर्म अनुपालन)|पूर्व के अध्याय]] में विचार किया है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== विभिन्न ईकाईयों के स्तर पर ===&lt;br /&gt;
# कुटुम्ब : समाज की सभी इकाइयों के विभिन्न स्तरोंपर उचित भूमिका निभानेवाले श्रेष्ठ मानव का निर्माण करना। कौटुम्बिक व्यवसाय के माध्यम से समाज की किसी आवश्यकता की पूर्ति करना।&lt;br /&gt;
# ग्राम : ग्राम की भूमिका छोटे विश्व और बड़े कुटुम्ब की तरह ही होती है। जिस तरह कुटुम्ब के सदस्यों में आपस में पैसे का लेनदेन नहीं होता उसी तरह अच्छे ग्राम में कुटुम्बों में आपस में पैसे का लेनदेन नहीं होता। प्रत्येक की सम्मान और स्वतन्त्रता के साथ अन्न, वस्त्र, भवन, शिक्षा, आजीविका, सुरक्षा आदि सभी आवश्यकताओं की पूर्ति होती है।&lt;br /&gt;
# कौशल विधा : समाज जीवन की आवश्यकताओं की हर विधा के अनुसार व्यवसाय विधा समूह बनते हैं। इन समूहों के भी सामान्य व्यक्ति से लेकर विश्व के स्तर तक के लिए करणीय और अकरणीय कार्य होते हैं। कर्तव्य होते हैं। इन्हें व्यवसाय विधा धर्म कहेंगे। इनमें पदार्थ के उत्पादन के रूप में आर्थिक स्वतन्त्रता के किसी एक पहलू की रक्षा में योगदान करना होता है। शिक्षा / संस्कार, वस्तुएं, भावनाएं, विचार, कला आदि में से समाज जीवन की आवश्यकता में से किसी एक विधा के पदार्थ की निरंतर आपूर्ति करना। पदार्थ का अर्थ केवल वस्तु नहीं है। जिस पद याने शब्द का अर्थ होता है वह पदार्थ कहलाता है। व्यावसायिक समूह का काम कौशल का विकास करना, कौशल का पीढ़ी दर पीढ़ी अंतरण करना और अन्य व्यवसायिक समूहों से समन्वय रखना आदि है।&lt;br /&gt;
# भाषिक समूह : भाषा का मुख्य उपयोग परस्पर संवाद है। संवाद विचारों की सटीक अभिव्यक्ति करने वाला हो इस हेतु से भाषाएँ बनतीं हैं। संवाद में सहजता, सरलता, सुगमता से आत्मीयता बढ़ती है। इसी हेतु से भाषिक समूह बनते हैं।&lt;br /&gt;
# प्रादेशिक समूह : शासनिक और व्यवस्थात्मक सुविधा की दृष्टि से प्रादेशिक स्तर का मह्त्व होता है।&lt;br /&gt;
# राष्ट्र : राष्ट्र अपने समाज के लिये विविध प्रकार के संगठनों का और व्यवस्थाओं का निर्माण करता है।&lt;br /&gt;
# विश्व : पूर्व में बताई हुई 1 से लेकर 6 तक की सभी इकाइयां वैश्विक हित की अविरोधी रहें।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== प्रकृति सुसंगतता ===&lt;br /&gt;
समाज जीवन में केन्द्रिकरण और विकेंद्रीकरण का समन्वय हो यह आवश्यक है। विशाल उद्योग, बाजार की मंडियां, शासकीय कार्यालय, व्यावसायिक, भाषिक, प्रादेशिक समूहों के समन्वय की व्यवस्थाएं आदि के लिये शहरों की आवश्यकता होती है। लेकिन इनमें अनावश्यक केन्द्रीकरण न हो पाए। वनवासी या गिरिजन भी ग्राम व्यवस्था से ही जुड़े हुए होने चाहिए। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== प्रक्रियाएं ===&lt;br /&gt;
धर्म के अनुपालन में बुद्धि के स्तर पर धर्म के प्रति पर्याप्त संज्ञान, मन के स्तर पर कौटुम्बिक भावना, अनुशासन और श्रद्धा (आज्ञाकारिता) का विकास तथा शारीरिक स्तर पर सहकारिता और परोपकार की आदतें अत्यंत आवश्यक हैं।&lt;br /&gt;
# धर्म संज्ञान : ‘समझना’ यह बुद्धि का काम होता है। इसलिए जब बच्चे का बुद्धि का अंग विकसित हो रहा होता है उसे धर्म की बौद्धिक याने तर्क तथा कर्मसिद्धांत के आधार पर शिक्षा देना उचित होता है। इस दृष्टि से तर्कशास्त्र की समझ या सरल शब्दों में ‘किसी भी बात के करने से पहले चराचर के हित में उस बात को कैसे करना चाहिए’ इसे समझने की क्षमता का विकास आवश्यक होता है।&lt;br /&gt;
# कौटुम्बिक भावना का विकास : समाज के सभी परस्पर संबंधों में कौटुम्बिक भावना से व्यवहार का आधार धर्मसंज्ञान ही तो होता है। मन को बुद्धि के नियंत्रण में रखना ही मन की शिक्षा होती है। दुर्योधन के निम्न कथन से सब परिचित हैं{{Citation needed}}:&lt;br /&gt;
&amp;lt;blockquote&amp;gt;जानामी धर्मं न च में प्रवृत्ति: । जानाम्यधर्मं न च में निवृत्ति: ।।&amp;lt;/blockquote&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;ol start=&amp;quot;3&amp;quot;&amp;gt; &lt;br /&gt;
&amp;lt;li&amp;gt;धर्माचरण की आदतें: दुर्योधन के उपर्युक्त कथन को ध्यान में रखकर ही गर्भधारणा से ही बच्चे को धर्माचरण की आदतों की शिक्षा देना मह्त्वपूर्ण बन जाता है। आदत का अर्थ है जिस बात के करने में कठिनाई का अनुभव नहीं होता। जब किसी बात के बारबार करने से आचरण में यह सहजता आती है तब वह आदत बन जाती है। और जब उसे बुद्धिका अधिष्ठान मिल जाता है तब वह आदतें मनुष्य का स्वभाव ही बन जातीं हैं।&lt;br /&gt;
&amp;lt;/ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== धर्म के अनुपालन के स्तर और साधन ===&lt;br /&gt;
# धर्म के अनुपालन करनेवालों के राष्ट्रभक्त, अराष्ट्रीय और राष्ट्रद्रोही ऐसे मोटे-मोटे तीन स्तर होते हैं।&lt;br /&gt;
# धर्म के अनुपालन के साधन : धर्म का अनुपालन पूर्व में बताए अनुसार शिक्षा, आदेश, प्रायश्चित्त/ पश्चात्ताप तथा दंड ऐसा चार प्रकार से होता है। शासन दुर्बल होने से समाज में प्रमाद करनेवालों की संख्या में वृद्धि होती है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== धर्म के अनुपालन के अवरोध ===&lt;br /&gt;
 : धर्म के अनुपालन में निम्न बातें अवरोध-रूप होतीं हैं।&lt;br /&gt;
५.१ भिन्न जीवनदृष्टि के लोग : शीघ्रातिशीघ्र भिन्न जीवनदृष्टि के लोगों को आत्मसात करना आवश्यक होता 	है। अन्यथा समाज जीवन अस्थिर और संघर्षमय बन जाता है।&lt;br /&gt;
५.२ स्वार्थ/संकुचित अस्मिताएँ :आवश्यकताओं की पुर्ति तक तो स्वार्थ भावना समर्थनीय है। अस्मिता या 	अहंकार यह प्रत्येक जिवंत ईकाई का एक स्वाभाविक पहलू होता है। किन्तु जब किसी ईकाई के विशिष्ट स्तर की यह अस्मिता अपने से ऊपर की ईकाई जिसका वह हिस्सा है, उसकी अस्मिता से बड़ी लगने लगती है तब समाज जीवन की शांति नष्ट हो जाती है। इसलिए यह आवश्यक है की मजहब, रिलिजन,प्रादेशिक अलगता, भाषिक भिन्नता, धनका अहंकार, बौद्धिक श्रेष्ठता आदि जैसी संकुचित अस्मिताएँ अपने से ऊपर की जीवंत ईकाई की अस्मिता के विरोध में नहीं हो। &lt;br /&gt;
५.३ विपरीत शिक्षा : विपरीत या दोषपूर्ण शिक्षा यह तो सभी समस्याओं की जड़ होती है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== कारक तत्त्व ===&lt;br /&gt;
 : कारक तत्वों से मतलब है धर्मपालन में सहायता देनेवाले घटक। ये निम्न होते हैं।&lt;br /&gt;
६.१ धर्म व्यवस्था : शासन धर्मनिष्ठ रहे यह सुनिश्चित करना धर्म व्यवस्था की जिम्मेदारी है। अपने त्याग, तपस्या, ज्ञान, लोकसंग्रह, चराचर के हित का चिन्तन, समर्पण भाव और कार्यकुशलता के आधारपर 	समाज से प्राप्त समर्थन प्राप्त कर वह देखे की कोई अयोग्य व्यक्ति शासक नहीं बनें।&lt;br /&gt;
६.२ शिक्षा : ६.२.१ कुटुम्ब शिक्षा 	६.२.२ विद्याकेन्द्र की शिक्षा 	६.२.३ लोकशिक्षा &lt;br /&gt;
६.३ धर्मनिष्ठ शासन : शासक का धर्मशास्त्र का जानकार होना और स्वयं धर्माचरणी होना भी आवश्यक होता है। जब शासन धर्म के अनुसार चलता है, धर्म व्यवस्थाद्वारा नियमित निर्देशित होता है तब धर्म भी 	स्थापित होता है और राज्य व्यवस्था भी श्रेष्ठ बनती है।&lt;br /&gt;
६.४ धर्मनिष्ठों का सामाजिक नेतृत्व : समाज जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में धर्मनिष्ठ लोग जब अच्छी संख्या में दिखाई देते हैं तब समाज मानस धर्मनिष्ठ बनता है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== चरण ==&lt;br /&gt;
धर्म का अनुपालन जब लोग स्वेच्छा से करनेवाले समाज के निर्माण के लिए दो बातें अत्यंत महत्वपूर्ण होतीं हैं। एक गर्भ में श्रेष्ठ जीवात्मा की स्थापना और दूसरे शिक्षा और संस्कार।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शिक्षा और संस्कार में -&lt;br /&gt;
७.१ जन्मपूर्व और शैशव कालमें अधिजनन शास्त्र के आधारपर मार्गदर्शन। &lt;br /&gt;
७.२ बाल्य काल : कुटुम्ब की शिक्षा के साथ विद्याकेन्द्र शिक्षा का समायोजन 			           &lt;br /&gt;
७.३ यौवन काल: अहंकार, बुद्धि के सही मोड़ हेतु सत्संग, प्रेरणा, वातावरण, ज्ञानार्जन/बलार्जन/कौशलार्जन आदि &lt;br /&gt;
७.४ प्रौढ़ावस्था : पूर्व ज्ञान/आदतों को व्यवस्थित करने के लिए सामाजिक वातावरण और मार्गदर्शन&lt;br /&gt;
७.४.१ पुरोहित&lt;br /&gt;
७.४.२ मेले/यात्राएं&lt;br /&gt;
७.४.३ कीर्तनकार/प्रवचनकार&lt;br /&gt;
७.४.४ धर्माचार्य&lt;br /&gt;
७.४.५ दृक्श्राव्य माध्यम –चित्रपट, दूरदर्शन आदि&lt;br /&gt;
७.४.६ आन्तरजाल&lt;br /&gt;
७.४.७ कानून का डर &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== धर्म निर्णय व्यवस्था ==&lt;br /&gt;
 : सामान्यत: जब भी धर्म की समझसे सम्बन्धित समस्या हो तब धर्म निर्णय की व्यवस्था उपलब्ध होनी चाहिये। इस व्यवस्था के तीन स्तर होना आवश्यक है। पहला स्तर तो स्थानिक धर्म के जानकार, दूसरा जनपदीय या निकटके तीर्थक्षेत्र में धर्मज्ञ परिषद्, और तीसरा स्तर अखिल भारतीय या राष्ट्रीय धर्मज्ञ परिषद्। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== माध्यम ==&lt;br /&gt;
 : धर्म अनुपालन करवाने के मुख्यत: दो प्रकारके माध्यम होते हैं। &lt;br /&gt;
९.१ कुटुम्ब के दायरे में : धर्म शिक्षा का अर्थ है सदाचार की शिक्षा। धर्म की शिक्षा के लिए कुटुम्ब यह सबसे श्रेष्ठ पाठशाला है। विद्याकेन्द्र की शिक्षा तो कुटुम्ब में मिली धर्म शिक्षा की पुष्टि या आवश्यक सुधार के लिए ही होती है। कुटुम्ब में धर्म शिक्षा तीन तरह से होती है। गर्भपूर्व संस्कार, गर्भ संस्कार और शिशु संस्कार और आदतें। मनुष्य की आदतें भी बचपन में ही पक्की हो जातीं हैं। &lt;br /&gt;
९.२ कुटुम्ब से बाहर के माध्यम : मनुष्य तो हर पल सीखता ही रहता है। इसलिए कुटुम्ब से बाहर भी वह कई बातें सीखता है। माध्यमों में मित्र मंडली, विद्यालय, समाज का सांस्कृतिक स्तर और क़ानून व्यवस्था आदि।&lt;br /&gt;
जीवन के भारतीय प्रतिमान की प्रतिष्ठापना की प्रक्रिया से अपेक्षित परिणामों की चर्चा हम [[Form of an Ideal Society (आदर्श समाज का स्वरूप)|अगले]] अध्याय में करेंगे।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[Category:Bhartiya Jeevan Pratiman (भारतीय जीवन प्रतिमान)]]&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Dilipkelkar</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://dharmawiki.org/index.php?title=Responsibilities_at_Societal_Level_(%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%AE%E0%A4%BE%E0%A4%9C%E0%A4%BF%E0%A4%95_%E0%A4%A7%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%AE_%E0%A4%85%E0%A4%A8%E0%A5%81%E0%A4%AA%E0%A4%BE%E0%A4%B2%E0%A4%A8)&amp;diff=119963</id>
		<title>Responsibilities at Societal Level (सामाजिक धर्म अनुपालन)</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://dharmawiki.org/index.php?title=Responsibilities_at_Societal_Level_(%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%AE%E0%A4%BE%E0%A4%9C%E0%A4%BF%E0%A4%95_%E0%A4%A7%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%AE_%E0%A4%85%E0%A4%A8%E0%A5%81%E0%A4%AA%E0%A4%BE%E0%A4%B2%E0%A4%A8)&amp;diff=119963"/>
		<updated>2019-07-21T06:49:02Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Dilipkelkar: /* धर्म के अनुपालन के स्तर और साधन */&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{One source|date=January 2019}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जीवन के भारतीय प्रतिमान की पुनर्प्रतिष्ठा के लिए राष्ट्र के संगठन की विभिन्न प्रणालियों के स्तर पर उन कर्तव्यों का याने ईकाई धर्म का विचार और प्रत्यक्ष धर्म अनुपालन की प्रक्रिया कैसे चलेगी, ऐसा दो पहलुओं में हम परिवर्तन की प्रक्रिया का विचार करेंगे। वैसे तो धर्म अनुपालन की प्रक्रिया का विचार हमने समाज धारणा शास्त्र के विषय में किया है। फिर भी परिवर्तन प्रक्रिया को यहाँ फिर से दोहराना उपयुक्त होगा।   &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== विभिन्न सामाजिक प्रणालियों के धर्म ==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== कुटुम्ब ===&lt;br /&gt;
कुटुम्ब परिवर्तन का सबसे जड़मूल का माध्यम है। समाज जीवन की वह नींव होता है। वह जितना सशक्त और व्यापक भूमिका का निर्वहन करेगा समाज उतना ही श्रेष्ठ बनेगा। कुटुम्ब में दो प्रकार के काम होते हैं। पहले हैं कुटुम्ब के लिए और दूसरे हैं कुटुम्ब में याने समाज, सृष्टि के लिए। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== कुटुम्ब की – कुटुम्ब के लिए ===&lt;br /&gt;
# क्षमता और योग्यता आधारित कर्तव्य  &lt;br /&gt;
# क्षमता और योग्यता के अनुसार सार्थक योगदान  &lt;br /&gt;
# शुद्ध सस्नेहयुक्त सदाचारयुक्त परस्पर व्यवहार  &lt;br /&gt;
# बड़ों का आदर, सेवा। छोटों के लिए आदर्श और प्यार।  &lt;br /&gt;
# कुटुंबहित अपने हित से ऊपर। कर्त्तव्य परायणता। अपने कर्तव्यों के प्रति आग्रही।  &lt;br /&gt;
# स्वावलंबन / परस्परावलंबन।  &lt;br /&gt;
# कुटुम्ब के सभी काम करना आना और करना।  &lt;br /&gt;
# एकात्मता का विस्तार – कुटुंब&amp;lt; समाज&amp;lt; सृष्टि&amp;lt; विश्व। लेकिन इसकी नींव कुटुंब जीवन में ही पड़ेगी और पक्की होगी।  &lt;br /&gt;
# कौशल, ज्ञान, बल और पुण्य अर्जन की दृष्टी से अध्ययन और संस्कार  &lt;br /&gt;
# कौटुम्बिक कुशलताएँ, आदतें, रीति-रिवाज, परम्पराएँ आदि  &lt;br /&gt;
# कुटुम्ब प्रमुख सर्वोपरि : कुटुम्ब के सब ही सदस्यों को कुटुम्ब प्रमुख बनने की प्रेरणा और इस हेतु से उनके द्वारा अपना विवेक, कौशल, सयानापन, निर्णय क्षमता, अपार स्नेह आदि का विकास। कुटुम्ब प्रमुख की आज्ञाओं का पालन - आज्ञाकारिता।  &lt;br /&gt;
# काया, वाचा, मनसा सभी से मधुर व्यवहार।  &lt;br /&gt;
# अच्छा – बेटा/बेटी, भाई/बहन, पति/पत्नि, पिता/माता, गृहस्थ/गृहिणी, रिश्तेदार आदि बनना/बनाना।  &lt;br /&gt;
# वर्णाश्रम धर्म का पालन – स्वभावज कर्म करते जाना।  &lt;br /&gt;
## सवर्ण/सजातीय विवाह  &lt;br /&gt;
## कौटुम्बिक व्यवसाय में सहभाग  &lt;br /&gt;
## ज्ञान, कौशल, श्रेष्ठ परम्पराओं का निर्वहन, परिष्कार, निर्माण और अगली पीढी को अंतरण  &lt;br /&gt;
## आयु की अवस्था के अनुसार ब्रह्मचर्य, गृहस्थ और वानप्रस्थ आदि आश्रमों के धर्म की जिम्मेदारियों का निर्वहन।  &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== कुटुम्ब में – समाज के लिए ===&lt;br /&gt;
# सामाजिक कर्तव्यों का निर्वहन &lt;br /&gt;
## समाज संगठन की प्रणालियों (कुटुंब, जाति, ग्राम, राष्ट्र) में &lt;br /&gt;
## सामाजिक व्यवस्थाओं (रक्षण, पोषण और शिक्षण) में &lt;br /&gt;
# ज्ञानार्जन, कौशलार्जन, बलार्जन और पुण्यार्जन की मानसिकता और केवल इन के लिए अटन। &lt;br /&gt;
# स्वावलंबन और परस्परावलंबन। &lt;br /&gt;
# शत्रुत्व भाववाले समाज के घटकों के साथ भी शान्ततापूर्ण और सुखी सहजीवन। &lt;br /&gt;
# एकात्मता (समाज और सृष्टि के साथ) का व्यवहार / सुख और दु:ख में सहानुभूति और सहभागिता। &lt;br /&gt;
# विभिन्न क्षेत्रों में - जैसे शासन, न्याय, समृद्धि आदि क्षेत्रों के नेता &amp;gt; आचार्य &amp;gt; धर्म । धर्म सर्वोपरि। &lt;br /&gt;
# सद्गुण, सदाचार, स्वावलंबन, सत्यनिष्ठा, सादगी, सहजता, सौन्दर्यबोध, स्वतंत्रता, संयम, स्वदेशी आदि का व्यवहार साथ ही में त्याग, तपस्या, समाधान, शान्ति, अभय, विजिगीषा आदि गुणों का विकास। &lt;br /&gt;
# मनसा, वाचा कर्मणा ‘सर्वे भवन्तु सुखिन:’ के प्रयास। &lt;br /&gt;
# वर्ण-धर्म की और जाति-धर्म की शिक्षा देना। जब लोग अपने वर्ण के अनुसार आचरण करते हैं, तब राष्ट्र की संस्कृति का विकास और रक्षण होता है। और जब लोग अपने जातिधर्म के अनुसार व्यवसाय करते हैं तब देश समृद्ध बनता है, ओर बना रहता है। &lt;br /&gt;
# धर्माचरणी और समाजभक्त / देशभक्त / राष्ट्रभक्त / परमात्मा में श्रद्धा रखने वालों का निर्माण। &lt;br /&gt;
# धर्मशिक्षा और कर्मशिक्षा। &lt;br /&gt;
# संयमित उपभोग। न्यूनतम (इष्टतम) उपभोग। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== ग्रामकुल ==&lt;br /&gt;
# ग्राम को स्वावलंबी ग्राम बनाना&lt;br /&gt;
# ग्राम की अर्थव्यवस्था को ठीक से बिठाना और चलाना&lt;br /&gt;
# संयुक्त कुटुंबों की प्रतिष्ठापना का वातावरण&lt;br /&gt;
# कौटुम्बिक उद्योगों की प्रतिष्ठापना का वातावरण&lt;br /&gt;
# कुटुम्ब भावना से प्रत्येक व्यक्ति की सम्मानपूर्ण आजीविका की व्यवस्था करना&lt;br /&gt;
# कौटुम्बिक उद्योग और जातियों में समन्वय रखना&lt;br /&gt;
# शासकीय व्यवस्थाओं के प्रति जिम्मेदारियां : कर देना, शिक्षण, पोषण और रक्षण की व्यवस्थाओं में श्रेष्ठ व्यक्तियों का और संसाधनों का योगदान देना&lt;br /&gt;
# ग्राम, एक कुल बने ऐसा वातावरण बनाए रखना।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== गुरुकुल / विद्यालय ==&lt;br /&gt;
# वर्णशिक्षा की व्यवस्था &lt;br /&gt;
# ज्ञानार्जन, कौशलार्जन, बलार्जन के लिए मार्गदर्शन &lt;br /&gt;
# शास्त्रीय शिक्षा का प्रावधान &lt;br /&gt;
# श्रेष्ठ परम्पराओं के निर्माण की शिक्षा &lt;br /&gt;
# जीवन के तत्त्वज्ञान और व्यवहार की शिक्षा &lt;br /&gt;
# जीवन के लिए महत्वपूर्ण सामाजिक संगठन प्रणालियाँ और व्यवस्थाओं की समझ और यथाशक्ति योगदान की प्रेरणा। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== कौशल विधा पंचायत ==&lt;br /&gt;
# समाज की किसी एक आवश्यकता की पूर्ति करना। कभी कोई कमी न हो यह सुनिश्चित करना। &lt;br /&gt;
# धर्म के मार्गदर्शन में अपने कौशल विधा-धर्म का निर्धारण और कौशल विधा प्रणाली में प्रचार प्रसार &lt;br /&gt;
# अन्य कौशल विधाओं के साथ समन्वय &lt;br /&gt;
# राष्ट्र सर्वोपरि यह भावना सदा जाग्रत रखना &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== व्यवस्थाओं के धर्म ==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== धर्म व्यवस्था ===&lt;br /&gt;
यह कोई नियमित व्यवस्था नहीं होती। यह जाग्रत, नि:स्वार्थी, सर्वभूतहित में सदैव प्रयासरत रहनेवाले पंडितों का समूह होता है। यह समूह सक्रिय होने से समाज ठीक चलता है। आवश्यकतानुसार इस समूह की जिम्मेदारियां बढ़ जातीं है। ऐसे आपद्धर्म के निर्वहन के लिए भी यह समूह पर्याप्त सामर्थ्यवान हो। &lt;br /&gt;
# कालानुरूप धर्म को व्याख्यायित करना। &lt;br /&gt;
# वर्णों के ‘स्व’धर्मों का पालन करने की व्यवस्था की पस्तुति कर शिक्षा और शासन की मदद से समाज में उन्हें स्थापित करना। व्यक्तिगत और सामाजिक धर्म/संस्कृति के अनुसार व्यवहार का वातावरण बनाना। जब वर्ण-धर्म का पालन लोग करते हैं तब देश में संस्कृति का विकास और रक्षण होता है। जिनकी ओर देखकर लोग वर्ण धर्म का पालन कर सकें ऐसे ‘श्रेष्ठ’ लोगों का निर्माण करना। &lt;br /&gt;
# स्वाभाविक, शासनिक और आर्थिक ऐसी सभी प्रकार की स्वतन्त्रता की रक्षा करना। &lt;br /&gt;
# शासन पर अपने ज्ञान, त्याग, तपस्या, लोकसंग्रह तथा सदैव लोकहित के चिंतन के माध्यम से नैतिक दबाव निर्माण करना। शासन को सदाचारी, कुशल और सामर्थ्य संपन्न बनाए रखने के लिए मार्गदर्शन करना। अधर्माचरणी शासन को हटाकर धर्माचरणी शासन को प्रतिष्ठित करना। &lt;br /&gt;
# लोकशिक्षा (कुटुम्ब शिक्षा इसी का हिस्सा है) और विद्यालयीन शिक्षा की प्रभावी व्यवस्था करना। जैसे लिखा पढी न्यूनतम करने की दिशा में बढ़ना। वाणी / शब्द की प्रतिष्ठा बढ़ाना। जीवन को साधन सापेक्षता से साधना सापेक्षता की ओर ले जाने के लिए अपनी कथनी और करनी से मार्गदर्शन करना। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== शासन व्यवस्था ===&lt;br /&gt;
# अंतर्बाह्य शत्रुओं से लोगों की शासनिक स्वतन्त्रता की रक्षा करना।  &lt;br /&gt;
# धर्म के दायरे में रहकर दुष्टों और मूर्खों को नियंत्रण में रखना।  &lt;br /&gt;
# दंड व्यवस्था के अंतर्गत न्याय व्यवस्था का निर्माण करना। किसी पर अन्याय हो ही नहीं, ऐसी दंड व्यवस्था के निर्माण का प्रयास करना।  &lt;br /&gt;
# श्रेष्ठ शासक परम्परा निर्माण करना।  &lt;br /&gt;
# प्रभावी, समाजहित की शिक्षा देनेवाले शिक्षा केन्द्रों को संरक्षण, समर्थन और सहायता देकर और प्रभावी बनाने के लिए यथाशक्ति प्रयास करना। ऐसा करने से शासन का काम काफी सरल हो जाता है।  &lt;br /&gt;
# धर्म व्यवस्था से समय समय पर मार्गदर्शन प्राप्त करते रहना।  &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== समृद्धि व्यवस्था ===&lt;br /&gt;
# योग्य शिक्षा के द्वारा समाज में धर्म के अविरोधी इच्छाओं का ही विकास हो यह सुनिश्चित करना।&lt;br /&gt;
# समाज के प्रत्येक घटक की सभी आवश्यकताओं की पूर्ति करना, धर्म विरोधी इच्छाओं की नहीं। समाज की आर्थिक स्वतन्त्रता को अबाधित रखना।&lt;br /&gt;
# प्राकृतिक संसाधनों का न्यूनतम उपयोग हो ऐसा वातावरण बनाना। संयमित उपभोग को प्रतिष्ठित करना।&lt;br /&gt;
# प्रकृति का प्रदूषण नहीं होने देना। प्रकृति का सन्तुलन बनाए रखना।&lt;br /&gt;
# कौटुम्बिक उद्योग, जातियाँ और ग्राम मिलकर समृद्धि निर्माण होती है। ये तीनों ईकाईयाँ फलेफूले और इनका स्वस्थ ऐसा तानाबाना बना रहे ऐसा वातावरण रहे।&lt;br /&gt;
# पैसे का विनिमय न्यूनतम रहे ऐसी व्यवस्था निर्माण करना।&lt;br /&gt;
अब हम धर्म के अनुपालन की प्रक्रिया का विचार आगे करेंगे।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== धर्म अनुपालन की प्रक्रिया ==&lt;br /&gt;
हमने जाना है कि समाज के सुख, शांति, स्वतंत्रता, सुसंस्कृतता के लिए समाज का धर्मनिष्ठ होना आवश्यक होता है। यहाँ मोटे तौर पर धर्म का मतलब कर्तव्य से है। समाज धारणा के लिए कर्तव्यों पर आधारित जीवन अनिवार्य होता है। समाज धारणा के लिए धर्म-युक्त व्यवहार में आनेवाली जटिलताओं को और उसके अनुपालन की प्रक्रिया को समझने का प्रयास करेंगे। इन में व्यक्तिगत स्तर की बातों का हमने [[Personal Responsibilities (व्यक्तिगत धर्म अनुपालन)|पूर्व के अध्याय]] में विचार किया है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== विभिन्न ईकाईयों के स्तर पर ===&lt;br /&gt;
# कुटुम्ब : समाज की सभी इकाइयों के विभिन्न स्तरोंपर उचित भूमिका निभानेवाले श्रेष्ठ मानव का निर्माण करना। कौटुम्बिक व्यवसाय के माध्यम से समाज की किसी आवश्यकता की पूर्ति करना।&lt;br /&gt;
# ग्राम : ग्राम की भूमिका छोटे विश्व और बड़े कुटुम्ब की तरह ही होती है। जिस तरह कुटुम्ब के सदस्यों में आपस में पैसे का लेनदेन नहीं होता उसी तरह अच्छे ग्राम में कुटुम्बों में आपस में पैसे का लेनदेन नहीं होता। प्रत्येक की सम्मान और स्वतन्त्रता के साथ अन्न, वस्त्र, भवन, शिक्षा, आजीविका, सुरक्षा आदि सभी आवश्यकताओं की पूर्ति होती है।&lt;br /&gt;
# कौशल विधा : समाज जीवन की आवश्यकताओं की हर विधा के अनुसार व्यवसाय विधा समूह बनते हैं। इन समूहों के भी सामान्य व्यक्ति से लेकर विश्व के स्तर तक के लिए करणीय और अकरणीय कार्य होते हैं। कर्तव्य होते हैं। इन्हें व्यवसाय विधा धर्म कहेंगे। इनमें पदार्थ के उत्पादन के रूप में आर्थिक स्वतन्त्रता के किसी एक पहलू की रक्षा में योगदान करना होता है। शिक्षा / संस्कार, वस्तुएं, भावनाएं, विचार, कला आदि में से समाज जीवन की आवश्यकता में से किसी एक विधा के पदार्थ की निरंतर आपूर्ति करना। पदार्थ का अर्थ केवल वस्तु नहीं है। जिस पद याने शब्द का अर्थ होता है वह पदार्थ कहलाता है। व्यावसायिक समूह का काम कौशल का विकास करना, कौशल का पीढ़ी दर पीढ़ी अंतरण करना और अन्य व्यवसायिक समूहों से समन्वय रखना आदि है।&lt;br /&gt;
# भाषिक समूह : भाषा का मुख्य उपयोग परस्पर संवाद है। संवाद विचारों की सटीक अभिव्यक्ति करने वाला हो इस हेतु से भाषाएँ बनतीं हैं। संवाद में सहजता, सरलता, सुगमता से आत्मीयता बढ़ती है। इसी हेतु से भाषिक समूह बनते हैं।&lt;br /&gt;
# प्रादेशिक समूह : शासनिक और व्यवस्थात्मक सुविधा की दृष्टि से प्रादेशिक स्तर का मह्त्व होता है।&lt;br /&gt;
# राष्ट्र : राष्ट्र अपने समाज के लिये विविध प्रकार के संगठनों का और व्यवस्थाओं का निर्माण करता है।&lt;br /&gt;
# विश्व : पूर्व में बताई हुई 1 से लेकर 6 तक की सभी इकाइयां वैश्विक हित की अविरोधी रहें।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== प्रकृति सुसंगतता ===&lt;br /&gt;
समाज जीवन में केन्द्रिकरण और विकेंद्रीकरण का समन्वय हो यह आवश्यक है। विशाल उद्योग, बाजार की मंडियां, शासकीय कार्यालय, व्यावसायिक, भाषिक, प्रादेशिक समूहों के समन्वय की व्यवस्थाएं आदि के लिये शहरों की आवश्यकता होती है। लेकिन इनमें अनावश्यक केन्द्रीकरण न हो पाए। वनवासी या गिरिजन भी ग्राम व्यवस्था से ही जुड़े हुए होने चाहिए। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== प्रक्रियाएं ===&lt;br /&gt;
धर्म के अनुपालन में बुद्धि के स्तर पर धर्म के प्रति पर्याप्त संज्ञान, मन के स्तर पर कौटुम्बिक भावना, अनुशासन और श्रद्धा (आज्ञाकारिता) का विकास तथा शारीरिक स्तर पर सहकारिता और परोपकार की आदतें अत्यंत आवश्यक हैं।&lt;br /&gt;
# धर्म संज्ञान : ‘समझना’ यह बुद्धि का काम होता है। इसलिए जब बच्चे का बुद्धि का अंग विकसित हो रहा होता है उसे धर्म की बौद्धिक याने तर्क तथा कर्मसिद्धांत के आधार पर शिक्षा देना उचित होता है। इस दृष्टि से तर्कशास्त्र की समझ या सरल शब्दों में ‘किसी भी बात के करने से पहले चराचर के हित में उस बात को कैसे करना चाहिए’ इसे समझने की क्षमता का विकास आवश्यक होता है।&lt;br /&gt;
# कौटुम्बिक भावना का विकास : समाज के सभी परस्पर संबंधों में कौटुम्बिक भावना से व्यवहार का आधार धर्मसंज्ञान ही तो होता है। मन को बुद्धि के नियंत्रण में रखना ही मन की शिक्षा होती है। दुर्योधन के निम्न कथन से सब परिचित हैं{{Citation needed}}:&lt;br /&gt;
&amp;lt;blockquote&amp;gt;जानामी धर्मं न च में प्रवृत्ति: । जानाम्यधर्मं न च में निवृत्ति: ।।&amp;lt;/blockquote&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;ol start=&amp;quot;3&amp;quot;&amp;gt; &lt;br /&gt;
&amp;lt;li&amp;gt;धर्माचरण की आदतें: दुर्योधन के उपर्युक्त कथन को ध्यान में रखकर ही गर्भधारणा से ही बच्चे को धर्माचरण की आदतों की शिक्षा देना मह्त्वपूर्ण बन जाता है। आदत का अर्थ है जिस बात के करने में कठिनाई का अनुभव नहीं होता। जब किसी बात के बारबार करने से आचरण में यह सहजता आती है तब वह आदत बन जाती है। और जब उसे बुद्धिका अधिष्ठान मिल जाता है तब वह आदतें मनुष्य का स्वभाव ही बन जातीं हैं।&lt;br /&gt;
&amp;lt;/ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== धर्म के अनुपालन के स्तर और साधन ===&lt;br /&gt;
धर्म के अनुपालन करनेवालों के राष्ट्रभक्त, अराष्ट्रीय और राष्ट्रद्रोही ऐसे मोटे-मोटे तीन स्तर होते हैं। &lt;br /&gt;
४.२ धर्म के अनुपालन के साधन : धर्म का अनुपालन पूर्व में बताए अनुसार शिक्षा, आदेश, प्रायश्चित्त/	पश्चात्ताप 	तथा दंड ऐसा चार प्रकार से होता है। शासन दुर्बल होने से समाज में प्रमाद करनेवालों की संख्या में वृद्धि 	होती है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== धर्म के अनुपालन के अवरोध ===&lt;br /&gt;
 : धर्म के अनुपालन में निम्न बातें अवरोध-रूप होतीं हैं।&lt;br /&gt;
५.१ भिन्न जीवनदृष्टि के लोग : शीघ्रातिशीघ्र भिन्न जीवनदृष्टि के लोगों को आत्मसात करना आवश्यक होता 	है। अन्यथा समाज जीवन अस्थिर और संघर्षमय बन जाता है।&lt;br /&gt;
५.२ स्वार्थ/संकुचित अस्मिताएँ :आवश्यकताओं की पुर्ति तक तो स्वार्थ भावना समर्थनीय है। अस्मिता या 	अहंकार यह प्रत्येक जिवंत ईकाई का एक स्वाभाविक पहलू होता है। किन्तु जब किसी ईकाई के विशिष्ट स्तर की यह अस्मिता अपने से ऊपर की ईकाई जिसका वह हिस्सा है, उसकी अस्मिता से बड़ी लगने लगती है तब समाज जीवन की शांति नष्ट हो जाती है। इसलिए यह आवश्यक है की मजहब, रिलिजन,प्रादेशिक अलगता, भाषिक भिन्नता, धनका अहंकार, बौद्धिक श्रेष्ठता आदि जैसी संकुचित अस्मिताएँ अपने से ऊपर की जीवंत ईकाई की अस्मिता के विरोध में नहीं हो। &lt;br /&gt;
५.३ विपरीत शिक्षा : विपरीत या दोषपूर्ण शिक्षा यह तो सभी समस्याओं की जड़ होती है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== कारक तत्त्व ===&lt;br /&gt;
 : कारक तत्वों से मतलब है धर्मपालन में सहायता देनेवाले घटक। ये निम्न होते हैं।&lt;br /&gt;
६.१ धर्म व्यवस्था : शासन धर्मनिष्ठ रहे यह सुनिश्चित करना धर्म व्यवस्था की जिम्मेदारी है। अपने त्याग, तपस्या, ज्ञान, लोकसंग्रह, चराचर के हित का चिन्तन, समर्पण भाव और कार्यकुशलता के आधारपर 	समाज से प्राप्त समर्थन प्राप्त कर वह देखे की कोई अयोग्य व्यक्ति शासक नहीं बनें।&lt;br /&gt;
६.२ शिक्षा : ६.२.१ कुटुम्ब शिक्षा 	६.२.२ विद्याकेन्द्र की शिक्षा 	६.२.३ लोकशिक्षा &lt;br /&gt;
६.३ धर्मनिष्ठ शासन : शासक का धर्मशास्त्र का जानकार होना और स्वयं धर्माचरणी होना भी आवश्यक होता है। जब शासन धर्म के अनुसार चलता है, धर्म व्यवस्थाद्वारा नियमित निर्देशित होता है तब धर्म भी 	स्थापित होता है और राज्य व्यवस्था भी श्रेष्ठ बनती है।&lt;br /&gt;
६.४ धर्मनिष्ठों का सामाजिक नेतृत्व : समाज जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में धर्मनिष्ठ लोग जब अच्छी संख्या में दिखाई देते हैं तब समाज मानस धर्मनिष्ठ बनता है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== चरण ==&lt;br /&gt;
धर्म का अनुपालन जब लोग स्वेच्छा से करनेवाले समाज के निर्माण के लिए दो बातें अत्यंत महत्वपूर्ण होतीं हैं। एक गर्भ में श्रेष्ठ जीवात्मा की स्थापना और दूसरे शिक्षा और संस्कार।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शिक्षा और संस्कार में -&lt;br /&gt;
७.१ जन्मपूर्व और शैशव कालमें अधिजनन शास्त्र के आधारपर मार्गदर्शन। &lt;br /&gt;
७.२ बाल्य काल : कुटुम्ब की शिक्षा के साथ विद्याकेन्द्र शिक्षा का समायोजन 			           &lt;br /&gt;
७.३ यौवन काल: अहंकार, बुद्धि के सही मोड़ हेतु सत्संग, प्रेरणा, वातावरण, ज्ञानार्जन/बलार्जन/कौशलार्जन आदि &lt;br /&gt;
७.४ प्रौढ़ावस्था : पूर्व ज्ञान/आदतों को व्यवस्थित करने के लिए सामाजिक वातावरण और मार्गदर्शन&lt;br /&gt;
७.४.१ पुरोहित&lt;br /&gt;
७.४.२ मेले/यात्राएं&lt;br /&gt;
७.४.३ कीर्तनकार/प्रवचनकार&lt;br /&gt;
७.४.४ धर्माचार्य&lt;br /&gt;
७.४.५ दृक्श्राव्य माध्यम –चित्रपट, दूरदर्शन आदि&lt;br /&gt;
७.४.६ आन्तरजाल&lt;br /&gt;
७.४.७ कानून का डर &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== धर्म निर्णय व्यवस्था ==&lt;br /&gt;
 : सामान्यत: जब भी धर्म की समझसे सम्बन्धित समस्या हो तब धर्म निर्णय की व्यवस्था उपलब्ध होनी चाहिये। इस व्यवस्था के तीन स्तर होना आवश्यक है। पहला स्तर तो स्थानिक धर्म के जानकार, दूसरा जनपदीय या निकटके तीर्थक्षेत्र में धर्मज्ञ परिषद्, और तीसरा स्तर अखिल भारतीय या राष्ट्रीय धर्मज्ञ परिषद्। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== माध्यम ==&lt;br /&gt;
 : धर्म अनुपालन करवाने के मुख्यत: दो प्रकारके माध्यम होते हैं। &lt;br /&gt;
९.१ कुटुम्ब के दायरे में : धर्म शिक्षा का अर्थ है सदाचार की शिक्षा। धर्म की शिक्षा के लिए कुटुम्ब यह सबसे श्रेष्ठ पाठशाला है। विद्याकेन्द्र की शिक्षा तो कुटुम्ब में मिली धर्म शिक्षा की पुष्टि या आवश्यक सुधार के लिए ही होती है। कुटुम्ब में धर्म शिक्षा तीन तरह से होती है। गर्भपूर्व संस्कार, गर्भ संस्कार और शिशु संस्कार और आदतें। मनुष्य की आदतें भी बचपन में ही पक्की हो जातीं हैं। &lt;br /&gt;
९.२ कुटुम्ब से बाहर के माध्यम : मनुष्य तो हर पल सीखता ही रहता है। इसलिए कुटुम्ब से बाहर भी वह कई बातें सीखता है। माध्यमों में मित्र मंडली, विद्यालय, समाज का सांस्कृतिक स्तर और क़ानून व्यवस्था आदि।&lt;br /&gt;
जीवन के भारतीय प्रतिमान की प्रतिष्ठापना की प्रक्रिया से अपेक्षित परिणामों की चर्चा हम [[Form of an Ideal Society (आदर्श समाज का स्वरूप)|अगले]] अध्याय में करेंगे।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[Category:Bhartiya Jeevan Pratiman (भारतीय जीवन प्रतिमान)]]&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Dilipkelkar</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://dharmawiki.org/index.php?title=Responsibilities_at_Societal_Level_(%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%AE%E0%A4%BE%E0%A4%9C%E0%A4%BF%E0%A4%95_%E0%A4%A7%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%AE_%E0%A4%85%E0%A4%A8%E0%A5%81%E0%A4%AA%E0%A4%BE%E0%A4%B2%E0%A4%A8)&amp;diff=119962</id>
		<title>Responsibilities at Societal Level (सामाजिक धर्म अनुपालन)</title>
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		<updated>2019-07-21T06:48:41Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Dilipkelkar: /* प्रक्रियाएं */&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{One source|date=January 2019}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जीवन के भारतीय प्रतिमान की पुनर्प्रतिष्ठा के लिए राष्ट्र के संगठन की विभिन्न प्रणालियों के स्तर पर उन कर्तव्यों का याने ईकाई धर्म का विचार और प्रत्यक्ष धर्म अनुपालन की प्रक्रिया कैसे चलेगी, ऐसा दो पहलुओं में हम परिवर्तन की प्रक्रिया का विचार करेंगे। वैसे तो धर्म अनुपालन की प्रक्रिया का विचार हमने समाज धारणा शास्त्र के विषय में किया है। फिर भी परिवर्तन प्रक्रिया को यहाँ फिर से दोहराना उपयुक्त होगा।   &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== विभिन्न सामाजिक प्रणालियों के धर्म ==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== कुटुम्ब ===&lt;br /&gt;
कुटुम्ब परिवर्तन का सबसे जड़मूल का माध्यम है। समाज जीवन की वह नींव होता है। वह जितना सशक्त और व्यापक भूमिका का निर्वहन करेगा समाज उतना ही श्रेष्ठ बनेगा। कुटुम्ब में दो प्रकार के काम होते हैं। पहले हैं कुटुम्ब के लिए और दूसरे हैं कुटुम्ब में याने समाज, सृष्टि के लिए। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== कुटुम्ब की – कुटुम्ब के लिए ===&lt;br /&gt;
# क्षमता और योग्यता आधारित कर्तव्य  &lt;br /&gt;
# क्षमता और योग्यता के अनुसार सार्थक योगदान  &lt;br /&gt;
# शुद्ध सस्नेहयुक्त सदाचारयुक्त परस्पर व्यवहार  &lt;br /&gt;
# बड़ों का आदर, सेवा। छोटों के लिए आदर्श और प्यार।  &lt;br /&gt;
# कुटुंबहित अपने हित से ऊपर। कर्त्तव्य परायणता। अपने कर्तव्यों के प्रति आग्रही।  &lt;br /&gt;
# स्वावलंबन / परस्परावलंबन।  &lt;br /&gt;
# कुटुम्ब के सभी काम करना आना और करना।  &lt;br /&gt;
# एकात्मता का विस्तार – कुटुंब&amp;lt; समाज&amp;lt; सृष्टि&amp;lt; विश्व। लेकिन इसकी नींव कुटुंब जीवन में ही पड़ेगी और पक्की होगी।  &lt;br /&gt;
# कौशल, ज्ञान, बल और पुण्य अर्जन की दृष्टी से अध्ययन और संस्कार  &lt;br /&gt;
# कौटुम्बिक कुशलताएँ, आदतें, रीति-रिवाज, परम्पराएँ आदि  &lt;br /&gt;
# कुटुम्ब प्रमुख सर्वोपरि : कुटुम्ब के सब ही सदस्यों को कुटुम्ब प्रमुख बनने की प्रेरणा और इस हेतु से उनके द्वारा अपना विवेक, कौशल, सयानापन, निर्णय क्षमता, अपार स्नेह आदि का विकास। कुटुम्ब प्रमुख की आज्ञाओं का पालन - आज्ञाकारिता।  &lt;br /&gt;
# काया, वाचा, मनसा सभी से मधुर व्यवहार।  &lt;br /&gt;
# अच्छा – बेटा/बेटी, भाई/बहन, पति/पत्नि, पिता/माता, गृहस्थ/गृहिणी, रिश्तेदार आदि बनना/बनाना।  &lt;br /&gt;
# वर्णाश्रम धर्म का पालन – स्वभावज कर्म करते जाना।  &lt;br /&gt;
## सवर्ण/सजातीय विवाह  &lt;br /&gt;
## कौटुम्बिक व्यवसाय में सहभाग  &lt;br /&gt;
## ज्ञान, कौशल, श्रेष्ठ परम्पराओं का निर्वहन, परिष्कार, निर्माण और अगली पीढी को अंतरण  &lt;br /&gt;
## आयु की अवस्था के अनुसार ब्रह्मचर्य, गृहस्थ और वानप्रस्थ आदि आश्रमों के धर्म की जिम्मेदारियों का निर्वहन।  &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== कुटुम्ब में – समाज के लिए ===&lt;br /&gt;
# सामाजिक कर्तव्यों का निर्वहन &lt;br /&gt;
## समाज संगठन की प्रणालियों (कुटुंब, जाति, ग्राम, राष्ट्र) में &lt;br /&gt;
## सामाजिक व्यवस्थाओं (रक्षण, पोषण और शिक्षण) में &lt;br /&gt;
# ज्ञानार्जन, कौशलार्जन, बलार्जन और पुण्यार्जन की मानसिकता और केवल इन के लिए अटन। &lt;br /&gt;
# स्वावलंबन और परस्परावलंबन। &lt;br /&gt;
# शत्रुत्व भाववाले समाज के घटकों के साथ भी शान्ततापूर्ण और सुखी सहजीवन। &lt;br /&gt;
# एकात्मता (समाज और सृष्टि के साथ) का व्यवहार / सुख और दु:ख में सहानुभूति और सहभागिता। &lt;br /&gt;
# विभिन्न क्षेत्रों में - जैसे शासन, न्याय, समृद्धि आदि क्षेत्रों के नेता &amp;gt; आचार्य &amp;gt; धर्म । धर्म सर्वोपरि। &lt;br /&gt;
# सद्गुण, सदाचार, स्वावलंबन, सत्यनिष्ठा, सादगी, सहजता, सौन्दर्यबोध, स्वतंत्रता, संयम, स्वदेशी आदि का व्यवहार साथ ही में त्याग, तपस्या, समाधान, शान्ति, अभय, विजिगीषा आदि गुणों का विकास। &lt;br /&gt;
# मनसा, वाचा कर्मणा ‘सर्वे भवन्तु सुखिन:’ के प्रयास। &lt;br /&gt;
# वर्ण-धर्म की और जाति-धर्म की शिक्षा देना। जब लोग अपने वर्ण के अनुसार आचरण करते हैं, तब राष्ट्र की संस्कृति का विकास और रक्षण होता है। और जब लोग अपने जातिधर्म के अनुसार व्यवसाय करते हैं तब देश समृद्ध बनता है, ओर बना रहता है। &lt;br /&gt;
# धर्माचरणी और समाजभक्त / देशभक्त / राष्ट्रभक्त / परमात्मा में श्रद्धा रखने वालों का निर्माण। &lt;br /&gt;
# धर्मशिक्षा और कर्मशिक्षा। &lt;br /&gt;
# संयमित उपभोग। न्यूनतम (इष्टतम) उपभोग। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== ग्रामकुल ==&lt;br /&gt;
# ग्राम को स्वावलंबी ग्राम बनाना&lt;br /&gt;
# ग्राम की अर्थव्यवस्था को ठीक से बिठाना और चलाना&lt;br /&gt;
# संयुक्त कुटुंबों की प्रतिष्ठापना का वातावरण&lt;br /&gt;
# कौटुम्बिक उद्योगों की प्रतिष्ठापना का वातावरण&lt;br /&gt;
# कुटुम्ब भावना से प्रत्येक व्यक्ति की सम्मानपूर्ण आजीविका की व्यवस्था करना&lt;br /&gt;
# कौटुम्बिक उद्योग और जातियों में समन्वय रखना&lt;br /&gt;
# शासकीय व्यवस्थाओं के प्रति जिम्मेदारियां : कर देना, शिक्षण, पोषण और रक्षण की व्यवस्थाओं में श्रेष्ठ व्यक्तियों का और संसाधनों का योगदान देना&lt;br /&gt;
# ग्राम, एक कुल बने ऐसा वातावरण बनाए रखना।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== गुरुकुल / विद्यालय ==&lt;br /&gt;
# वर्णशिक्षा की व्यवस्था &lt;br /&gt;
# ज्ञानार्जन, कौशलार्जन, बलार्जन के लिए मार्गदर्शन &lt;br /&gt;
# शास्त्रीय शिक्षा का प्रावधान &lt;br /&gt;
# श्रेष्ठ परम्पराओं के निर्माण की शिक्षा &lt;br /&gt;
# जीवन के तत्त्वज्ञान और व्यवहार की शिक्षा &lt;br /&gt;
# जीवन के लिए महत्वपूर्ण सामाजिक संगठन प्रणालियाँ और व्यवस्थाओं की समझ और यथाशक्ति योगदान की प्रेरणा। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== कौशल विधा पंचायत ==&lt;br /&gt;
# समाज की किसी एक आवश्यकता की पूर्ति करना। कभी कोई कमी न हो यह सुनिश्चित करना। &lt;br /&gt;
# धर्म के मार्गदर्शन में अपने कौशल विधा-धर्म का निर्धारण और कौशल विधा प्रणाली में प्रचार प्रसार &lt;br /&gt;
# अन्य कौशल विधाओं के साथ समन्वय &lt;br /&gt;
# राष्ट्र सर्वोपरि यह भावना सदा जाग्रत रखना &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== व्यवस्थाओं के धर्म ==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== धर्म व्यवस्था ===&lt;br /&gt;
यह कोई नियमित व्यवस्था नहीं होती। यह जाग्रत, नि:स्वार्थी, सर्वभूतहित में सदैव प्रयासरत रहनेवाले पंडितों का समूह होता है। यह समूह सक्रिय होने से समाज ठीक चलता है। आवश्यकतानुसार इस समूह की जिम्मेदारियां बढ़ जातीं है। ऐसे आपद्धर्म के निर्वहन के लिए भी यह समूह पर्याप्त सामर्थ्यवान हो। &lt;br /&gt;
# कालानुरूप धर्म को व्याख्यायित करना। &lt;br /&gt;
# वर्णों के ‘स्व’धर्मों का पालन करने की व्यवस्था की पस्तुति कर शिक्षा और शासन की मदद से समाज में उन्हें स्थापित करना। व्यक्तिगत और सामाजिक धर्म/संस्कृति के अनुसार व्यवहार का वातावरण बनाना। जब वर्ण-धर्म का पालन लोग करते हैं तब देश में संस्कृति का विकास और रक्षण होता है। जिनकी ओर देखकर लोग वर्ण धर्म का पालन कर सकें ऐसे ‘श्रेष्ठ’ लोगों का निर्माण करना। &lt;br /&gt;
# स्वाभाविक, शासनिक और आर्थिक ऐसी सभी प्रकार की स्वतन्त्रता की रक्षा करना। &lt;br /&gt;
# शासन पर अपने ज्ञान, त्याग, तपस्या, लोकसंग्रह तथा सदैव लोकहित के चिंतन के माध्यम से नैतिक दबाव निर्माण करना। शासन को सदाचारी, कुशल और सामर्थ्य संपन्न बनाए रखने के लिए मार्गदर्शन करना। अधर्माचरणी शासन को हटाकर धर्माचरणी शासन को प्रतिष्ठित करना। &lt;br /&gt;
# लोकशिक्षा (कुटुम्ब शिक्षा इसी का हिस्सा है) और विद्यालयीन शिक्षा की प्रभावी व्यवस्था करना। जैसे लिखा पढी न्यूनतम करने की दिशा में बढ़ना। वाणी / शब्द की प्रतिष्ठा बढ़ाना। जीवन को साधन सापेक्षता से साधना सापेक्षता की ओर ले जाने के लिए अपनी कथनी और करनी से मार्गदर्शन करना। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== शासन व्यवस्था ===&lt;br /&gt;
# अंतर्बाह्य शत्रुओं से लोगों की शासनिक स्वतन्त्रता की रक्षा करना।  &lt;br /&gt;
# धर्म के दायरे में रहकर दुष्टों और मूर्खों को नियंत्रण में रखना।  &lt;br /&gt;
# दंड व्यवस्था के अंतर्गत न्याय व्यवस्था का निर्माण करना। किसी पर अन्याय हो ही नहीं, ऐसी दंड व्यवस्था के निर्माण का प्रयास करना।  &lt;br /&gt;
# श्रेष्ठ शासक परम्परा निर्माण करना।  &lt;br /&gt;
# प्रभावी, समाजहित की शिक्षा देनेवाले शिक्षा केन्द्रों को संरक्षण, समर्थन और सहायता देकर और प्रभावी बनाने के लिए यथाशक्ति प्रयास करना। ऐसा करने से शासन का काम काफी सरल हो जाता है।  &lt;br /&gt;
# धर्म व्यवस्था से समय समय पर मार्गदर्शन प्राप्त करते रहना।  &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== समृद्धि व्यवस्था ===&lt;br /&gt;
# योग्य शिक्षा के द्वारा समाज में धर्म के अविरोधी इच्छाओं का ही विकास हो यह सुनिश्चित करना।&lt;br /&gt;
# समाज के प्रत्येक घटक की सभी आवश्यकताओं की पूर्ति करना, धर्म विरोधी इच्छाओं की नहीं। समाज की आर्थिक स्वतन्त्रता को अबाधित रखना।&lt;br /&gt;
# प्राकृतिक संसाधनों का न्यूनतम उपयोग हो ऐसा वातावरण बनाना। संयमित उपभोग को प्रतिष्ठित करना।&lt;br /&gt;
# प्रकृति का प्रदूषण नहीं होने देना। प्रकृति का सन्तुलन बनाए रखना।&lt;br /&gt;
# कौटुम्बिक उद्योग, जातियाँ और ग्राम मिलकर समृद्धि निर्माण होती है। ये तीनों ईकाईयाँ फलेफूले और इनका स्वस्थ ऐसा तानाबाना बना रहे ऐसा वातावरण रहे।&lt;br /&gt;
# पैसे का विनिमय न्यूनतम रहे ऐसी व्यवस्था निर्माण करना।&lt;br /&gt;
अब हम धर्म के अनुपालन की प्रक्रिया का विचार आगे करेंगे।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== धर्म अनुपालन की प्रक्रिया ==&lt;br /&gt;
हमने जाना है कि समाज के सुख, शांति, स्वतंत्रता, सुसंस्कृतता के लिए समाज का धर्मनिष्ठ होना आवश्यक होता है। यहाँ मोटे तौर पर धर्म का मतलब कर्तव्य से है। समाज धारणा के लिए कर्तव्यों पर आधारित जीवन अनिवार्य होता है। समाज धारणा के लिए धर्म-युक्त व्यवहार में आनेवाली जटिलताओं को और उसके अनुपालन की प्रक्रिया को समझने का प्रयास करेंगे। इन में व्यक्तिगत स्तर की बातों का हमने [[Personal Responsibilities (व्यक्तिगत धर्म अनुपालन)|पूर्व के अध्याय]] में विचार किया है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== विभिन्न ईकाईयों के स्तर पर ===&lt;br /&gt;
# कुटुम्ब : समाज की सभी इकाइयों के विभिन्न स्तरोंपर उचित भूमिका निभानेवाले श्रेष्ठ मानव का निर्माण करना। कौटुम्बिक व्यवसाय के माध्यम से समाज की किसी आवश्यकता की पूर्ति करना।&lt;br /&gt;
# ग्राम : ग्राम की भूमिका छोटे विश्व और बड़े कुटुम्ब की तरह ही होती है। जिस तरह कुटुम्ब के सदस्यों में आपस में पैसे का लेनदेन नहीं होता उसी तरह अच्छे ग्राम में कुटुम्बों में आपस में पैसे का लेनदेन नहीं होता। प्रत्येक की सम्मान और स्वतन्त्रता के साथ अन्न, वस्त्र, भवन, शिक्षा, आजीविका, सुरक्षा आदि सभी आवश्यकताओं की पूर्ति होती है।&lt;br /&gt;
# कौशल विधा : समाज जीवन की आवश्यकताओं की हर विधा के अनुसार व्यवसाय विधा समूह बनते हैं। इन समूहों के भी सामान्य व्यक्ति से लेकर विश्व के स्तर तक के लिए करणीय और अकरणीय कार्य होते हैं। कर्तव्य होते हैं। इन्हें व्यवसाय विधा धर्म कहेंगे। इनमें पदार्थ के उत्पादन के रूप में आर्थिक स्वतन्त्रता के किसी एक पहलू की रक्षा में योगदान करना होता है। शिक्षा / संस्कार, वस्तुएं, भावनाएं, विचार, कला आदि में से समाज जीवन की आवश्यकता में से किसी एक विधा के पदार्थ की निरंतर आपूर्ति करना। पदार्थ का अर्थ केवल वस्तु नहीं है। जिस पद याने शब्द का अर्थ होता है वह पदार्थ कहलाता है। व्यावसायिक समूह का काम कौशल का विकास करना, कौशल का पीढ़ी दर पीढ़ी अंतरण करना और अन्य व्यवसायिक समूहों से समन्वय रखना आदि है।&lt;br /&gt;
# भाषिक समूह : भाषा का मुख्य उपयोग परस्पर संवाद है। संवाद विचारों की सटीक अभिव्यक्ति करने वाला हो इस हेतु से भाषाएँ बनतीं हैं। संवाद में सहजता, सरलता, सुगमता से आत्मीयता बढ़ती है। इसी हेतु से भाषिक समूह बनते हैं।&lt;br /&gt;
# प्रादेशिक समूह : शासनिक और व्यवस्थात्मक सुविधा की दृष्टि से प्रादेशिक स्तर का मह्त्व होता है।&lt;br /&gt;
# राष्ट्र : राष्ट्र अपने समाज के लिये विविध प्रकार के संगठनों का और व्यवस्थाओं का निर्माण करता है।&lt;br /&gt;
# विश्व : पूर्व में बताई हुई 1 से लेकर 6 तक की सभी इकाइयां वैश्विक हित की अविरोधी रहें।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== प्रकृति सुसंगतता ===&lt;br /&gt;
समाज जीवन में केन्द्रिकरण और विकेंद्रीकरण का समन्वय हो यह आवश्यक है। विशाल उद्योग, बाजार की मंडियां, शासकीय कार्यालय, व्यावसायिक, भाषिक, प्रादेशिक समूहों के समन्वय की व्यवस्थाएं आदि के लिये शहरों की आवश्यकता होती है। लेकिन इनमें अनावश्यक केन्द्रीकरण न हो पाए। वनवासी या गिरिजन भी ग्राम व्यवस्था से ही जुड़े हुए होने चाहिए। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== प्रक्रियाएं ===&lt;br /&gt;
धर्म के अनुपालन में बुद्धि के स्तर पर धर्म के प्रति पर्याप्त संज्ञान, मन के स्तर पर कौटुम्बिक भावना, अनुशासन और श्रद्धा (आज्ञाकारिता) का विकास तथा शारीरिक स्तर पर सहकारिता और परोपकार की आदतें अत्यंत आवश्यक हैं।&lt;br /&gt;
# धर्म संज्ञान : ‘समझना’ यह बुद्धि का काम होता है। इसलिए जब बच्चे का बुद्धि का अंग विकसित हो रहा होता है उसे धर्म की बौद्धिक याने तर्क तथा कर्मसिद्धांत के आधार पर शिक्षा देना उचित होता है। इस दृष्टि से तर्कशास्त्र की समझ या सरल शब्दों में ‘किसी भी बात के करने से पहले चराचर के हित में उस बात को कैसे करना चाहिए’ इसे समझने की क्षमता का विकास आवश्यक होता है।&lt;br /&gt;
# कौटुम्बिक भावना का विकास : समाज के सभी परस्पर संबंधों में कौटुम्बिक भावना से व्यवहार का आधार धर्मसंज्ञान ही तो होता है। मन को बुद्धि के नियंत्रण में रखना ही मन की शिक्षा होती है। दुर्योधन के निम्न कथन से सब परिचित हैं{{Citation needed}}:&lt;br /&gt;
&amp;lt;blockquote&amp;gt;जानामी धर्मं न च में प्रवृत्ति: । जानाम्यधर्मं न च में निवृत्ति: ।।&amp;lt;/blockquote&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;ol start=&amp;quot;3&amp;quot;&amp;gt; &lt;br /&gt;
&amp;lt;li&amp;gt;धर्माचरण की आदतें: दुर्योधन के उपर्युक्त कथन को ध्यान में रखकर ही गर्भधारणा से ही बच्चे को धर्माचरण की आदतों की शिक्षा देना मह्त्वपूर्ण बन जाता है। आदत का अर्थ है जिस बात के करने में कठिनाई का अनुभव नहीं होता। जब किसी बात के बारबार करने से आचरण में यह सहजता आती है तब वह आदत बन जाती है। और जब उसे बुद्धिका अधिष्ठान मिल जाता है तब वह आदतें मनुष्य का स्वभाव ही बन जातीं हैं।&lt;br /&gt;
&amp;lt;/ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== धर्म के अनुपालन के स्तर और साधन ===&lt;br /&gt;
 : &lt;br /&gt;
४.१ धर्म के अनुपालन करनेवालों के राष्ट्रभक्त, अराष्ट्रीय और राष्ट्रद्रोही ऐसे मोटे-मोटे तीन स्तर होते हैं। &lt;br /&gt;
४.२ धर्म के अनुपालन के साधन : धर्म का अनुपालन पूर्व में बताए अनुसार शिक्षा, आदेश, प्रायश्चित्त/	पश्चात्ताप 	तथा दंड ऐसा चार प्रकार से होता है। शासन दुर्बल होने से समाज में प्रमाद करनेवालों की संख्या में वृद्धि 	होती है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== धर्म के अनुपालन के अवरोध ===&lt;br /&gt;
 : धर्म के अनुपालन में निम्न बातें अवरोध-रूप होतीं हैं।&lt;br /&gt;
५.१ भिन्न जीवनदृष्टि के लोग : शीघ्रातिशीघ्र भिन्न जीवनदृष्टि के लोगों को आत्मसात करना आवश्यक होता 	है। अन्यथा समाज जीवन अस्थिर और संघर्षमय बन जाता है।&lt;br /&gt;
५.२ स्वार्थ/संकुचित अस्मिताएँ :आवश्यकताओं की पुर्ति तक तो स्वार्थ भावना समर्थनीय है। अस्मिता या 	अहंकार यह प्रत्येक जिवंत ईकाई का एक स्वाभाविक पहलू होता है। किन्तु जब किसी ईकाई के विशिष्ट स्तर की यह अस्मिता अपने से ऊपर की ईकाई जिसका वह हिस्सा है, उसकी अस्मिता से बड़ी लगने लगती है तब समाज जीवन की शांति नष्ट हो जाती है। इसलिए यह आवश्यक है की मजहब, रिलिजन,प्रादेशिक अलगता, भाषिक भिन्नता, धनका अहंकार, बौद्धिक श्रेष्ठता आदि जैसी संकुचित अस्मिताएँ अपने से ऊपर की जीवंत ईकाई की अस्मिता के विरोध में नहीं हो। &lt;br /&gt;
५.३ विपरीत शिक्षा : विपरीत या दोषपूर्ण शिक्षा यह तो सभी समस्याओं की जड़ होती है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== कारक तत्त्व ===&lt;br /&gt;
 : कारक तत्वों से मतलब है धर्मपालन में सहायता देनेवाले घटक। ये निम्न होते हैं।&lt;br /&gt;
६.१ धर्म व्यवस्था : शासन धर्मनिष्ठ रहे यह सुनिश्चित करना धर्म व्यवस्था की जिम्मेदारी है। अपने त्याग, तपस्या, ज्ञान, लोकसंग्रह, चराचर के हित का चिन्तन, समर्पण भाव और कार्यकुशलता के आधारपर 	समाज से प्राप्त समर्थन प्राप्त कर वह देखे की कोई अयोग्य व्यक्ति शासक नहीं बनें।&lt;br /&gt;
६.२ शिक्षा : ६.२.१ कुटुम्ब शिक्षा 	६.२.२ विद्याकेन्द्र की शिक्षा 	६.२.३ लोकशिक्षा &lt;br /&gt;
६.३ धर्मनिष्ठ शासन : शासक का धर्मशास्त्र का जानकार होना और स्वयं धर्माचरणी होना भी आवश्यक होता है। जब शासन धर्म के अनुसार चलता है, धर्म व्यवस्थाद्वारा नियमित निर्देशित होता है तब धर्म भी 	स्थापित होता है और राज्य व्यवस्था भी श्रेष्ठ बनती है।&lt;br /&gt;
६.४ धर्मनिष्ठों का सामाजिक नेतृत्व : समाज जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में धर्मनिष्ठ लोग जब अच्छी संख्या में दिखाई देते हैं तब समाज मानस धर्मनिष्ठ बनता है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== चरण ==&lt;br /&gt;
धर्म का अनुपालन जब लोग स्वेच्छा से करनेवाले समाज के निर्माण के लिए दो बातें अत्यंत महत्वपूर्ण होतीं हैं। एक गर्भ में श्रेष्ठ जीवात्मा की स्थापना और दूसरे शिक्षा और संस्कार।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शिक्षा और संस्कार में -&lt;br /&gt;
७.१ जन्मपूर्व और शैशव कालमें अधिजनन शास्त्र के आधारपर मार्गदर्शन। &lt;br /&gt;
७.२ बाल्य काल : कुटुम्ब की शिक्षा के साथ विद्याकेन्द्र शिक्षा का समायोजन 			           &lt;br /&gt;
७.३ यौवन काल: अहंकार, बुद्धि के सही मोड़ हेतु सत्संग, प्रेरणा, वातावरण, ज्ञानार्जन/बलार्जन/कौशलार्जन आदि &lt;br /&gt;
७.४ प्रौढ़ावस्था : पूर्व ज्ञान/आदतों को व्यवस्थित करने के लिए सामाजिक वातावरण और मार्गदर्शन&lt;br /&gt;
७.४.१ पुरोहित&lt;br /&gt;
७.४.२ मेले/यात्राएं&lt;br /&gt;
७.४.३ कीर्तनकार/प्रवचनकार&lt;br /&gt;
७.४.४ धर्माचार्य&lt;br /&gt;
७.४.५ दृक्श्राव्य माध्यम –चित्रपट, दूरदर्शन आदि&lt;br /&gt;
७.४.६ आन्तरजाल&lt;br /&gt;
७.४.७ कानून का डर &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== धर्म निर्णय व्यवस्था ==&lt;br /&gt;
 : सामान्यत: जब भी धर्म की समझसे सम्बन्धित समस्या हो तब धर्म निर्णय की व्यवस्था उपलब्ध होनी चाहिये। इस व्यवस्था के तीन स्तर होना आवश्यक है। पहला स्तर तो स्थानिक धर्म के जानकार, दूसरा जनपदीय या निकटके तीर्थक्षेत्र में धर्मज्ञ परिषद्, और तीसरा स्तर अखिल भारतीय या राष्ट्रीय धर्मज्ञ परिषद्। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== माध्यम ==&lt;br /&gt;
 : धर्म अनुपालन करवाने के मुख्यत: दो प्रकारके माध्यम होते हैं। &lt;br /&gt;
९.१ कुटुम्ब के दायरे में : धर्म शिक्षा का अर्थ है सदाचार की शिक्षा। धर्म की शिक्षा के लिए कुटुम्ब यह सबसे श्रेष्ठ पाठशाला है। विद्याकेन्द्र की शिक्षा तो कुटुम्ब में मिली धर्म शिक्षा की पुष्टि या आवश्यक सुधार के लिए ही होती है। कुटुम्ब में धर्म शिक्षा तीन तरह से होती है। गर्भपूर्व संस्कार, गर्भ संस्कार और शिशु संस्कार और आदतें। मनुष्य की आदतें भी बचपन में ही पक्की हो जातीं हैं। &lt;br /&gt;
९.२ कुटुम्ब से बाहर के माध्यम : मनुष्य तो हर पल सीखता ही रहता है। इसलिए कुटुम्ब से बाहर भी वह कई बातें सीखता है। माध्यमों में मित्र मंडली, विद्यालय, समाज का सांस्कृतिक स्तर और क़ानून व्यवस्था आदि।&lt;br /&gt;
जीवन के भारतीय प्रतिमान की प्रतिष्ठापना की प्रक्रिया से अपेक्षित परिणामों की चर्चा हम [[Form of an Ideal Society (आदर्श समाज का स्वरूप)|अगले]] अध्याय में करेंगे।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[Category:Bhartiya Jeevan Pratiman (भारतीय जीवन प्रतिमान)]]&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Dilipkelkar</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://dharmawiki.org/index.php?title=Responsibilities_at_Societal_Level_(%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%AE%E0%A4%BE%E0%A4%9C%E0%A4%BF%E0%A4%95_%E0%A4%A7%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%AE_%E0%A4%85%E0%A4%A8%E0%A5%81%E0%A4%AA%E0%A4%BE%E0%A4%B2%E0%A4%A8)&amp;diff=119960</id>
		<title>Responsibilities at Societal Level (सामाजिक धर्म अनुपालन)</title>
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		<updated>2019-07-21T06:47:04Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Dilipkelkar: /* प्रक्रियाएं */ लेख सम्पादित किया&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{One source|date=January 2019}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जीवन के भारतीय प्रतिमान की पुनर्प्रतिष्ठा के लिए राष्ट्र के संगठन की विभिन्न प्रणालियों के स्तर पर उन कर्तव्यों का याने ईकाई धर्म का विचार और प्रत्यक्ष धर्म अनुपालन की प्रक्रिया कैसे चलेगी, ऐसा दो पहलुओं में हम परिवर्तन की प्रक्रिया का विचार करेंगे। वैसे तो धर्म अनुपालन की प्रक्रिया का विचार हमने समाज धारणा शास्त्र के विषय में किया है। फिर भी परिवर्तन प्रक्रिया को यहाँ फिर से दोहराना उपयुक्त होगा।   &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== विभिन्न सामाजिक प्रणालियों के धर्म ==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== कुटुम्ब ===&lt;br /&gt;
कुटुम्ब परिवर्तन का सबसे जड़मूल का माध्यम है। समाज जीवन की वह नींव होता है। वह जितना सशक्त और व्यापक भूमिका का निर्वहन करेगा समाज उतना ही श्रेष्ठ बनेगा। कुटुम्ब में दो प्रकार के काम होते हैं। पहले हैं कुटुम्ब के लिए और दूसरे हैं कुटुम्ब में याने समाज, सृष्टि के लिए। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== कुटुम्ब की – कुटुम्ब के लिए ===&lt;br /&gt;
# क्षमता और योग्यता आधारित कर्तव्य  &lt;br /&gt;
# क्षमता और योग्यता के अनुसार सार्थक योगदान  &lt;br /&gt;
# शुद्ध सस्नेहयुक्त सदाचारयुक्त परस्पर व्यवहार  &lt;br /&gt;
# बड़ों का आदर, सेवा। छोटों के लिए आदर्श और प्यार।  &lt;br /&gt;
# कुटुंबहित अपने हित से ऊपर। कर्त्तव्य परायणता। अपने कर्तव्यों के प्रति आग्रही।  &lt;br /&gt;
# स्वावलंबन / परस्परावलंबन।  &lt;br /&gt;
# कुटुम्ब के सभी काम करना आना और करना।  &lt;br /&gt;
# एकात्मता का विस्तार – कुटुंब&amp;lt; समाज&amp;lt; सृष्टि&amp;lt; विश्व। लेकिन इसकी नींव कुटुंब जीवन में ही पड़ेगी और पक्की होगी।  &lt;br /&gt;
# कौशल, ज्ञान, बल और पुण्य अर्जन की दृष्टी से अध्ययन और संस्कार  &lt;br /&gt;
# कौटुम्बिक कुशलताएँ, आदतें, रीति-रिवाज, परम्पराएँ आदि  &lt;br /&gt;
# कुटुम्ब प्रमुख सर्वोपरि : कुटुम्ब के सब ही सदस्यों को कुटुम्ब प्रमुख बनने की प्रेरणा और इस हेतु से उनके द्वारा अपना विवेक, कौशल, सयानापन, निर्णय क्षमता, अपार स्नेह आदि का विकास। कुटुम्ब प्रमुख की आज्ञाओं का पालन - आज्ञाकारिता।  &lt;br /&gt;
# काया, वाचा, मनसा सभी से मधुर व्यवहार।  &lt;br /&gt;
# अच्छा – बेटा/बेटी, भाई/बहन, पति/पत्नि, पिता/माता, गृहस्थ/गृहिणी, रिश्तेदार आदि बनना/बनाना।  &lt;br /&gt;
# वर्णाश्रम धर्म का पालन – स्वभावज कर्म करते जाना।  &lt;br /&gt;
## सवर्ण/सजातीय विवाह  &lt;br /&gt;
## कौटुम्बिक व्यवसाय में सहभाग  &lt;br /&gt;
## ज्ञान, कौशल, श्रेष्ठ परम्पराओं का निर्वहन, परिष्कार, निर्माण और अगली पीढी को अंतरण  &lt;br /&gt;
## आयु की अवस्था के अनुसार ब्रह्मचर्य, गृहस्थ और वानप्रस्थ आदि आश्रमों के धर्म की जिम्मेदारियों का निर्वहन।  &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== कुटुम्ब में – समाज के लिए ===&lt;br /&gt;
# सामाजिक कर्तव्यों का निर्वहन &lt;br /&gt;
## समाज संगठन की प्रणालियों (कुटुंब, जाति, ग्राम, राष्ट्र) में &lt;br /&gt;
## सामाजिक व्यवस्थाओं (रक्षण, पोषण और शिक्षण) में &lt;br /&gt;
# ज्ञानार्जन, कौशलार्जन, बलार्जन और पुण्यार्जन की मानसिकता और केवल इन के लिए अटन। &lt;br /&gt;
# स्वावलंबन और परस्परावलंबन। &lt;br /&gt;
# शत्रुत्व भाववाले समाज के घटकों के साथ भी शान्ततापूर्ण और सुखी सहजीवन। &lt;br /&gt;
# एकात्मता (समाज और सृष्टि के साथ) का व्यवहार / सुख और दु:ख में सहानुभूति और सहभागिता। &lt;br /&gt;
# विभिन्न क्षेत्रों में - जैसे शासन, न्याय, समृद्धि आदि क्षेत्रों के नेता &amp;gt; आचार्य &amp;gt; धर्म । धर्म सर्वोपरि। &lt;br /&gt;
# सद्गुण, सदाचार, स्वावलंबन, सत्यनिष्ठा, सादगी, सहजता, सौन्दर्यबोध, स्वतंत्रता, संयम, स्वदेशी आदि का व्यवहार साथ ही में त्याग, तपस्या, समाधान, शान्ति, अभय, विजिगीषा आदि गुणों का विकास। &lt;br /&gt;
# मनसा, वाचा कर्मणा ‘सर्वे भवन्तु सुखिन:’ के प्रयास। &lt;br /&gt;
# वर्ण-धर्म की और जाति-धर्म की शिक्षा देना। जब लोग अपने वर्ण के अनुसार आचरण करते हैं, तब राष्ट्र की संस्कृति का विकास और रक्षण होता है। और जब लोग अपने जातिधर्म के अनुसार व्यवसाय करते हैं तब देश समृद्ध बनता है, ओर बना रहता है। &lt;br /&gt;
# धर्माचरणी और समाजभक्त / देशभक्त / राष्ट्रभक्त / परमात्मा में श्रद्धा रखने वालों का निर्माण। &lt;br /&gt;
# धर्मशिक्षा और कर्मशिक्षा। &lt;br /&gt;
# संयमित उपभोग। न्यूनतम (इष्टतम) उपभोग। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== ग्रामकुल ==&lt;br /&gt;
# ग्राम को स्वावलंबी ग्राम बनाना&lt;br /&gt;
# ग्राम की अर्थव्यवस्था को ठीक से बिठाना और चलाना&lt;br /&gt;
# संयुक्त कुटुंबों की प्रतिष्ठापना का वातावरण&lt;br /&gt;
# कौटुम्बिक उद्योगों की प्रतिष्ठापना का वातावरण&lt;br /&gt;
# कुटुम्ब भावना से प्रत्येक व्यक्ति की सम्मानपूर्ण आजीविका की व्यवस्था करना&lt;br /&gt;
# कौटुम्बिक उद्योग और जातियों में समन्वय रखना&lt;br /&gt;
# शासकीय व्यवस्थाओं के प्रति जिम्मेदारियां : कर देना, शिक्षण, पोषण और रक्षण की व्यवस्थाओं में श्रेष्ठ व्यक्तियों का और संसाधनों का योगदान देना&lt;br /&gt;
# ग्राम, एक कुल बने ऐसा वातावरण बनाए रखना।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== गुरुकुल / विद्यालय ==&lt;br /&gt;
# वर्णशिक्षा की व्यवस्था &lt;br /&gt;
# ज्ञानार्जन, कौशलार्जन, बलार्जन के लिए मार्गदर्शन &lt;br /&gt;
# शास्त्रीय शिक्षा का प्रावधान &lt;br /&gt;
# श्रेष्ठ परम्पराओं के निर्माण की शिक्षा &lt;br /&gt;
# जीवन के तत्त्वज्ञान और व्यवहार की शिक्षा &lt;br /&gt;
# जीवन के लिए महत्वपूर्ण सामाजिक संगठन प्रणालियाँ और व्यवस्थाओं की समझ और यथाशक्ति योगदान की प्रेरणा। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== कौशल विधा पंचायत ==&lt;br /&gt;
# समाज की किसी एक आवश्यकता की पूर्ति करना। कभी कोई कमी न हो यह सुनिश्चित करना। &lt;br /&gt;
# धर्म के मार्गदर्शन में अपने कौशल विधा-धर्म का निर्धारण और कौशल विधा प्रणाली में प्रचार प्रसार &lt;br /&gt;
# अन्य कौशल विधाओं के साथ समन्वय &lt;br /&gt;
# राष्ट्र सर्वोपरि यह भावना सदा जाग्रत रखना &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== व्यवस्थाओं के धर्म ==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== धर्म व्यवस्था ===&lt;br /&gt;
यह कोई नियमित व्यवस्था नहीं होती। यह जाग्रत, नि:स्वार्थी, सर्वभूतहित में सदैव प्रयासरत रहनेवाले पंडितों का समूह होता है। यह समूह सक्रिय होने से समाज ठीक चलता है। आवश्यकतानुसार इस समूह की जिम्मेदारियां बढ़ जातीं है। ऐसे आपद्धर्म के निर्वहन के लिए भी यह समूह पर्याप्त सामर्थ्यवान हो। &lt;br /&gt;
# कालानुरूप धर्म को व्याख्यायित करना। &lt;br /&gt;
# वर्णों के ‘स्व’धर्मों का पालन करने की व्यवस्था की पस्तुति कर शिक्षा और शासन की मदद से समाज में उन्हें स्थापित करना। व्यक्तिगत और सामाजिक धर्म/संस्कृति के अनुसार व्यवहार का वातावरण बनाना। जब वर्ण-धर्म का पालन लोग करते हैं तब देश में संस्कृति का विकास और रक्षण होता है। जिनकी ओर देखकर लोग वर्ण धर्म का पालन कर सकें ऐसे ‘श्रेष्ठ’ लोगों का निर्माण करना। &lt;br /&gt;
# स्वाभाविक, शासनिक और आर्थिक ऐसी सभी प्रकार की स्वतन्त्रता की रक्षा करना। &lt;br /&gt;
# शासन पर अपने ज्ञान, त्याग, तपस्या, लोकसंग्रह तथा सदैव लोकहित के चिंतन के माध्यम से नैतिक दबाव निर्माण करना। शासन को सदाचारी, कुशल और सामर्थ्य संपन्न बनाए रखने के लिए मार्गदर्शन करना। अधर्माचरणी शासन को हटाकर धर्माचरणी शासन को प्रतिष्ठित करना। &lt;br /&gt;
# लोकशिक्षा (कुटुम्ब शिक्षा इसी का हिस्सा है) और विद्यालयीन शिक्षा की प्रभावी व्यवस्था करना। जैसे लिखा पढी न्यूनतम करने की दिशा में बढ़ना। वाणी / शब्द की प्रतिष्ठा बढ़ाना। जीवन को साधन सापेक्षता से साधना सापेक्षता की ओर ले जाने के लिए अपनी कथनी और करनी से मार्गदर्शन करना। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== शासन व्यवस्था ===&lt;br /&gt;
# अंतर्बाह्य शत्रुओं से लोगों की शासनिक स्वतन्त्रता की रक्षा करना।  &lt;br /&gt;
# धर्म के दायरे में रहकर दुष्टों और मूर्खों को नियंत्रण में रखना।  &lt;br /&gt;
# दंड व्यवस्था के अंतर्गत न्याय व्यवस्था का निर्माण करना। किसी पर अन्याय हो ही नहीं, ऐसी दंड व्यवस्था के निर्माण का प्रयास करना।  &lt;br /&gt;
# श्रेष्ठ शासक परम्परा निर्माण करना।  &lt;br /&gt;
# प्रभावी, समाजहित की शिक्षा देनेवाले शिक्षा केन्द्रों को संरक्षण, समर्थन और सहायता देकर और प्रभावी बनाने के लिए यथाशक्ति प्रयास करना। ऐसा करने से शासन का काम काफी सरल हो जाता है।  &lt;br /&gt;
# धर्म व्यवस्था से समय समय पर मार्गदर्शन प्राप्त करते रहना।  &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== समृद्धि व्यवस्था ===&lt;br /&gt;
# योग्य शिक्षा के द्वारा समाज में धर्म के अविरोधी इच्छाओं का ही विकास हो यह सुनिश्चित करना।&lt;br /&gt;
# समाज के प्रत्येक घटक की सभी आवश्यकताओं की पूर्ति करना, धर्म विरोधी इच्छाओं की नहीं। समाज की आर्थिक स्वतन्त्रता को अबाधित रखना।&lt;br /&gt;
# प्राकृतिक संसाधनों का न्यूनतम उपयोग हो ऐसा वातावरण बनाना। संयमित उपभोग को प्रतिष्ठित करना।&lt;br /&gt;
# प्रकृति का प्रदूषण नहीं होने देना। प्रकृति का सन्तुलन बनाए रखना।&lt;br /&gt;
# कौटुम्बिक उद्योग, जातियाँ और ग्राम मिलकर समृद्धि निर्माण होती है। ये तीनों ईकाईयाँ फलेफूले और इनका स्वस्थ ऐसा तानाबाना बना रहे ऐसा वातावरण रहे।&lt;br /&gt;
# पैसे का विनिमय न्यूनतम रहे ऐसी व्यवस्था निर्माण करना।&lt;br /&gt;
अब हम धर्म के अनुपालन की प्रक्रिया का विचार आगे करेंगे।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== धर्म अनुपालन की प्रक्रिया ==&lt;br /&gt;
हमने जाना है कि समाज के सुख, शांति, स्वतंत्रता, सुसंस्कृतता के लिए समाज का धर्मनिष्ठ होना आवश्यक होता है। यहाँ मोटे तौर पर धर्म का मतलब कर्तव्य से है। समाज धारणा के लिए कर्तव्यों पर आधारित जीवन अनिवार्य होता है। समाज धारणा के लिए धर्म-युक्त व्यवहार में आनेवाली जटिलताओं को और उसके अनुपालन की प्रक्रिया को समझने का प्रयास करेंगे। इन में व्यक्तिगत स्तर की बातों का हमने [[Personal Responsibilities (व्यक्तिगत धर्म अनुपालन)|पूर्व के अध्याय]] में विचार किया है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== विभिन्न ईकाईयों के स्तर पर ===&lt;br /&gt;
# कुटुम्ब : समाज की सभी इकाइयों के विभिन्न स्तरोंपर उचित भूमिका निभानेवाले श्रेष्ठ मानव का निर्माण करना। कौटुम्बिक व्यवसाय के माध्यम से समाज की किसी आवश्यकता की पूर्ति करना।&lt;br /&gt;
# ग्राम : ग्राम की भूमिका छोटे विश्व और बड़े कुटुम्ब की तरह ही होती है। जिस तरह कुटुम्ब के सदस्यों में आपस में पैसे का लेनदेन नहीं होता उसी तरह अच्छे ग्राम में कुटुम्बों में आपस में पैसे का लेनदेन नहीं होता। प्रत्येक की सम्मान और स्वतन्त्रता के साथ अन्न, वस्त्र, भवन, शिक्षा, आजीविका, सुरक्षा आदि सभी आवश्यकताओं की पूर्ति होती है।&lt;br /&gt;
# कौशल विधा : समाज जीवन की आवश्यकताओं की हर विधा के अनुसार व्यवसाय विधा समूह बनते हैं। इन समूहों के भी सामान्य व्यक्ति से लेकर विश्व के स्तर तक के लिए करणीय और अकरणीय कार्य होते हैं। कर्तव्य होते हैं। इन्हें व्यवसाय विधा धर्म कहेंगे। इनमें पदार्थ के उत्पादन के रूप में आर्थिक स्वतन्त्रता के किसी एक पहलू की रक्षा में योगदान करना होता है। शिक्षा / संस्कार, वस्तुएं, भावनाएं, विचार, कला आदि में से समाज जीवन की आवश्यकता में से किसी एक विधा के पदार्थ की निरंतर आपूर्ति करना। पदार्थ का अर्थ केवल वस्तु नहीं है। जिस पद याने शब्द का अर्थ होता है वह पदार्थ कहलाता है। व्यावसायिक समूह का काम कौशल का विकास करना, कौशल का पीढ़ी दर पीढ़ी अंतरण करना और अन्य व्यवसायिक समूहों से समन्वय रखना आदि है।&lt;br /&gt;
# भाषिक समूह : भाषा का मुख्य उपयोग परस्पर संवाद है। संवाद विचारों की सटीक अभिव्यक्ति करने वाला हो इस हेतु से भाषाएँ बनतीं हैं। संवाद में सहजता, सरलता, सुगमता से आत्मीयता बढ़ती है। इसी हेतु से भाषिक समूह बनते हैं।&lt;br /&gt;
# प्रादेशिक समूह : शासनिक और व्यवस्थात्मक सुविधा की दृष्टि से प्रादेशिक स्तर का मह्त्व होता है।&lt;br /&gt;
# राष्ट्र : राष्ट्र अपने समाज के लिये विविध प्रकार के संगठनों का और व्यवस्थाओं का निर्माण करता है।&lt;br /&gt;
# विश्व : पूर्व में बताई हुई 1 से लेकर 6 तक की सभी इकाइयां वैश्विक हित की अविरोधी रहें।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== प्रकृति सुसंगतता ===&lt;br /&gt;
समाज जीवन में केन्द्रिकरण और विकेंद्रीकरण का समन्वय हो यह आवश्यक है। विशाल उद्योग, बाजार की मंडियां, शासकीय कार्यालय, व्यावसायिक, भाषिक, प्रादेशिक समूहों के समन्वय की व्यवस्थाएं आदि के लिये शहरों की आवश्यकता होती है। लेकिन इनमें अनावश्यक केन्द्रीकरण न हो पाए। वनवासी या गिरिजन भी ग्राम व्यवस्था से ही जुड़े हुए होने चाहिए। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== प्रक्रियाएं ===&lt;br /&gt;
धर्म के अनुपालन में बुद्धि के स्तर पर धर्म के प्रति पर्याप्त संज्ञान, मन के स्तर पर कौटुम्बिक भावना, अनुशासन और श्रद्धा (आज्ञाकारिता) का विकास तथा शारीरिक स्तर पर सहकारिता और परोपकार की आदतें अत्यंत आवश्यक हैं।&lt;br /&gt;
# धर्म संज्ञान : ‘समझना’ यह बुद्धि का काम होता है। इसलिए जब बच्चे का बुद्धि का अंग विकसित हो रहा होता है उसे धर्म की बौद्धिक याने तर्क तथा कर्मसिद्धांत के आधार पर शिक्षा देना उचित होता है। इस दृष्टि से तर्कशास्त्र की समझ या सरल शब्दों में ‘किसी भी बात के करने से पहले चराचर के हित में उस बात को कैसे करना चाहिए’ इसे समझने की क्षमता का विकास आवश्यक होता है।&lt;br /&gt;
# कौटुम्बिक भावना का विकास : समाज के सभी परस्पर संबंधों में कौटुम्बिक भावना से व्यवहार का आधार धर्मसंज्ञान ही तो होता है। मन को बुद्धि के नियंत्रण में रखना ही मन की शिक्षा होती है। दुर्योधन के निम्न कथन से सब परिचित हैं:&lt;br /&gt;
&amp;lt;blockquote&amp;gt;जानामी धर्मं न च में प्रवृत्ति: । जानाम्यधर्मं न च में निवृत्ति: ।।&amp;lt;/blockquote&amp;gt;धर्माचरण की आदतें: दुर्योधन के उपर्युक्त कथन को ध्यान में रखकर ही गर्भधारणा से ही बच्चे को धर्माचरण की आदतों की शिक्षा देना मह्त्वपूर्ण बन जाता है। आदत का अर्थ है जिस बात के करने में कठिनाई का अनुभव नहीं होता। जब किसी बात के बारबार करने से आचरण में यह सहजता आती है तब वह आदत बन जाती है। और जब उसे बुद्धिका अधिष्ठान मिल जाता है तब वह आदतें मनुष्य का स्वभाव ही बन जातीं हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== धर्म के अनुपालन के स्तर और साधन ===&lt;br /&gt;
 : &lt;br /&gt;
४.१ धर्म के अनुपालन करनेवालों के राष्ट्रभक्त, अराष्ट्रीय और राष्ट्रद्रोही ऐसे मोटे-मोटे तीन स्तर होते हैं। &lt;br /&gt;
४.२ धर्म के अनुपालन के साधन : धर्म का अनुपालन पूर्व में बताए अनुसार शिक्षा, आदेश, प्रायश्चित्त/	पश्चात्ताप 	तथा दंड ऐसा चार प्रकार से होता है। शासन दुर्बल होने से समाज में प्रमाद करनेवालों की संख्या में वृद्धि 	होती है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== धर्म के अनुपालन के अवरोध ===&lt;br /&gt;
 : धर्म के अनुपालन में निम्न बातें अवरोध-रूप होतीं हैं।&lt;br /&gt;
५.१ भिन्न जीवनदृष्टि के लोग : शीघ्रातिशीघ्र भिन्न जीवनदृष्टि के लोगों को आत्मसात करना आवश्यक होता 	है। अन्यथा समाज जीवन अस्थिर और संघर्षमय बन जाता है।&lt;br /&gt;
५.२ स्वार्थ/संकुचित अस्मिताएँ :आवश्यकताओं की पुर्ति तक तो स्वार्थ भावना समर्थनीय है। अस्मिता या 	अहंकार यह प्रत्येक जिवंत ईकाई का एक स्वाभाविक पहलू होता है। किन्तु जब किसी ईकाई के विशिष्ट स्तर की यह अस्मिता अपने से ऊपर की ईकाई जिसका वह हिस्सा है, उसकी अस्मिता से बड़ी लगने लगती है तब समाज जीवन की शांति नष्ट हो जाती है। इसलिए यह आवश्यक है की मजहब, रिलिजन,प्रादेशिक अलगता, भाषिक भिन्नता, धनका अहंकार, बौद्धिक श्रेष्ठता आदि जैसी संकुचित अस्मिताएँ अपने से ऊपर की जीवंत ईकाई की अस्मिता के विरोध में नहीं हो। &lt;br /&gt;
५.३ विपरीत शिक्षा : विपरीत या दोषपूर्ण शिक्षा यह तो सभी समस्याओं की जड़ होती है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== कारक तत्त्व ===&lt;br /&gt;
 : कारक तत्वों से मतलब है धर्मपालन में सहायता देनेवाले घटक। ये निम्न होते हैं।&lt;br /&gt;
६.१ धर्म व्यवस्था : शासन धर्मनिष्ठ रहे यह सुनिश्चित करना धर्म व्यवस्था की जिम्मेदारी है। अपने त्याग, तपस्या, ज्ञान, लोकसंग्रह, चराचर के हित का चिन्तन, समर्पण भाव और कार्यकुशलता के आधारपर 	समाज से प्राप्त समर्थन प्राप्त कर वह देखे की कोई अयोग्य व्यक्ति शासक नहीं बनें।&lt;br /&gt;
६.२ शिक्षा : ६.२.१ कुटुम्ब शिक्षा 	६.२.२ विद्याकेन्द्र की शिक्षा 	६.२.३ लोकशिक्षा &lt;br /&gt;
६.३ धर्मनिष्ठ शासन : शासक का धर्मशास्त्र का जानकार होना और स्वयं धर्माचरणी होना भी आवश्यक होता है। जब शासन धर्म के अनुसार चलता है, धर्म व्यवस्थाद्वारा नियमित निर्देशित होता है तब धर्म भी 	स्थापित होता है और राज्य व्यवस्था भी श्रेष्ठ बनती है।&lt;br /&gt;
६.४ धर्मनिष्ठों का सामाजिक नेतृत्व : समाज जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में धर्मनिष्ठ लोग जब अच्छी संख्या में दिखाई देते हैं तब समाज मानस धर्मनिष्ठ बनता है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== चरण ==&lt;br /&gt;
धर्म का अनुपालन जब लोग स्वेच्छा से करनेवाले समाज के निर्माण के लिए दो बातें अत्यंत महत्वपूर्ण होतीं हैं। एक गर्भ में श्रेष्ठ जीवात्मा की स्थापना और दूसरे शिक्षा और संस्कार।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शिक्षा और संस्कार में -&lt;br /&gt;
७.१ जन्मपूर्व और शैशव कालमें अधिजनन शास्त्र के आधारपर मार्गदर्शन। &lt;br /&gt;
७.२ बाल्य काल : कुटुम्ब की शिक्षा के साथ विद्याकेन्द्र शिक्षा का समायोजन 			           &lt;br /&gt;
७.३ यौवन काल: अहंकार, बुद्धि के सही मोड़ हेतु सत्संग, प्रेरणा, वातावरण, ज्ञानार्जन/बलार्जन/कौशलार्जन आदि &lt;br /&gt;
७.४ प्रौढ़ावस्था : पूर्व ज्ञान/आदतों को व्यवस्थित करने के लिए सामाजिक वातावरण और मार्गदर्शन&lt;br /&gt;
७.४.१ पुरोहित&lt;br /&gt;
७.४.२ मेले/यात्राएं&lt;br /&gt;
७.४.३ कीर्तनकार/प्रवचनकार&lt;br /&gt;
७.४.४ धर्माचार्य&lt;br /&gt;
७.४.५ दृक्श्राव्य माध्यम –चित्रपट, दूरदर्शन आदि&lt;br /&gt;
७.४.६ आन्तरजाल&lt;br /&gt;
७.४.७ कानून का डर &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== धर्म निर्णय व्यवस्था ==&lt;br /&gt;
 : सामान्यत: जब भी धर्म की समझसे सम्बन्धित समस्या हो तब धर्म निर्णय की व्यवस्था उपलब्ध होनी चाहिये। इस व्यवस्था के तीन स्तर होना आवश्यक है। पहला स्तर तो स्थानिक धर्म के जानकार, दूसरा जनपदीय या निकटके तीर्थक्षेत्र में धर्मज्ञ परिषद्, और तीसरा स्तर अखिल भारतीय या राष्ट्रीय धर्मज्ञ परिषद्। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== माध्यम ==&lt;br /&gt;
 : धर्म अनुपालन करवाने के मुख्यत: दो प्रकारके माध्यम होते हैं। &lt;br /&gt;
९.१ कुटुम्ब के दायरे में : धर्म शिक्षा का अर्थ है सदाचार की शिक्षा। धर्म की शिक्षा के लिए कुटुम्ब यह सबसे श्रेष्ठ पाठशाला है। विद्याकेन्द्र की शिक्षा तो कुटुम्ब में मिली धर्म शिक्षा की पुष्टि या आवश्यक सुधार के लिए ही होती है। कुटुम्ब में धर्म शिक्षा तीन तरह से होती है। गर्भपूर्व संस्कार, गर्भ संस्कार और शिशु संस्कार और आदतें। मनुष्य की आदतें भी बचपन में ही पक्की हो जातीं हैं। &lt;br /&gt;
९.२ कुटुम्ब से बाहर के माध्यम : मनुष्य तो हर पल सीखता ही रहता है। इसलिए कुटुम्ब से बाहर भी वह कई बातें सीखता है। माध्यमों में मित्र मंडली, विद्यालय, समाज का सांस्कृतिक स्तर और क़ानून व्यवस्था आदि।&lt;br /&gt;
जीवन के भारतीय प्रतिमान की प्रतिष्ठापना की प्रक्रिया से अपेक्षित परिणामों की चर्चा हम [[Form of an Ideal Society (आदर्श समाज का स्वरूप)|अगले]] अध्याय में करेंगे।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[Category:Bhartiya Jeevan Pratiman (भारतीय जीवन प्रतिमान)]]&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Dilipkelkar</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://dharmawiki.org/index.php?title=Responsibilities_at_Societal_Level_(%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%AE%E0%A4%BE%E0%A4%9C%E0%A4%BF%E0%A4%95_%E0%A4%A7%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%AE_%E0%A4%85%E0%A4%A8%E0%A5%81%E0%A4%AA%E0%A4%BE%E0%A4%B2%E0%A4%A8)&amp;diff=119958</id>
		<title>Responsibilities at Societal Level (सामाजिक धर्म अनुपालन)</title>
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		<updated>2019-07-21T06:44:17Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Dilipkelkar: /* प्रक्रियाएं */&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{One source|date=January 2019}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जीवन के भारतीय प्रतिमान की पुनर्प्रतिष्ठा के लिए राष्ट्र के संगठन की विभिन्न प्रणालियों के स्तर पर उन कर्तव्यों का याने ईकाई धर्म का विचार और प्रत्यक्ष धर्म अनुपालन की प्रक्रिया कैसे चलेगी, ऐसा दो पहलुओं में हम परिवर्तन की प्रक्रिया का विचार करेंगे। वैसे तो धर्म अनुपालन की प्रक्रिया का विचार हमने समाज धारणा शास्त्र के विषय में किया है। फिर भी परिवर्तन प्रक्रिया को यहाँ फिर से दोहराना उपयुक्त होगा।   &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== विभिन्न सामाजिक प्रणालियों के धर्म ==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== कुटुम्ब ===&lt;br /&gt;
कुटुम्ब परिवर्तन का सबसे जड़मूल का माध्यम है। समाज जीवन की वह नींव होता है। वह जितना सशक्त और व्यापक भूमिका का निर्वहन करेगा समाज उतना ही श्रेष्ठ बनेगा। कुटुम्ब में दो प्रकार के काम होते हैं। पहले हैं कुटुम्ब के लिए और दूसरे हैं कुटुम्ब में याने समाज, सृष्टि के लिए। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== कुटुम्ब की – कुटुम्ब के लिए ===&lt;br /&gt;
# क्षमता और योग्यता आधारित कर्तव्य  &lt;br /&gt;
# क्षमता और योग्यता के अनुसार सार्थक योगदान  &lt;br /&gt;
# शुद्ध सस्नेहयुक्त सदाचारयुक्त परस्पर व्यवहार  &lt;br /&gt;
# बड़ों का आदर, सेवा। छोटों के लिए आदर्श और प्यार।  &lt;br /&gt;
# कुटुंबहित अपने हित से ऊपर। कर्त्तव्य परायणता। अपने कर्तव्यों के प्रति आग्रही।  &lt;br /&gt;
# स्वावलंबन / परस्परावलंबन।  &lt;br /&gt;
# कुटुम्ब के सभी काम करना आना और करना।  &lt;br /&gt;
# एकात्मता का विस्तार – कुटुंब&amp;lt; समाज&amp;lt; सृष्टि&amp;lt; विश्व। लेकिन इसकी नींव कुटुंब जीवन में ही पड़ेगी और पक्की होगी।  &lt;br /&gt;
# कौशल, ज्ञान, बल और पुण्य अर्जन की दृष्टी से अध्ययन और संस्कार  &lt;br /&gt;
# कौटुम्बिक कुशलताएँ, आदतें, रीति-रिवाज, परम्पराएँ आदि  &lt;br /&gt;
# कुटुम्ब प्रमुख सर्वोपरि : कुटुम्ब के सब ही सदस्यों को कुटुम्ब प्रमुख बनने की प्रेरणा और इस हेतु से उनके द्वारा अपना विवेक, कौशल, सयानापन, निर्णय क्षमता, अपार स्नेह आदि का विकास। कुटुम्ब प्रमुख की आज्ञाओं का पालन - आज्ञाकारिता।  &lt;br /&gt;
# काया, वाचा, मनसा सभी से मधुर व्यवहार।  &lt;br /&gt;
# अच्छा – बेटा/बेटी, भाई/बहन, पति/पत्नि, पिता/माता, गृहस्थ/गृहिणी, रिश्तेदार आदि बनना/बनाना।  &lt;br /&gt;
# वर्णाश्रम धर्म का पालन – स्वभावज कर्म करते जाना।  &lt;br /&gt;
## सवर्ण/सजातीय विवाह  &lt;br /&gt;
## कौटुम्बिक व्यवसाय में सहभाग  &lt;br /&gt;
## ज्ञान, कौशल, श्रेष्ठ परम्पराओं का निर्वहन, परिष्कार, निर्माण और अगली पीढी को अंतरण  &lt;br /&gt;
## आयु की अवस्था के अनुसार ब्रह्मचर्य, गृहस्थ और वानप्रस्थ आदि आश्रमों के धर्म की जिम्मेदारियों का निर्वहन।  &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== कुटुम्ब में – समाज के लिए ===&lt;br /&gt;
# सामाजिक कर्तव्यों का निर्वहन &lt;br /&gt;
## समाज संगठन की प्रणालियों (कुटुंब, जाति, ग्राम, राष्ट्र) में &lt;br /&gt;
## सामाजिक व्यवस्थाओं (रक्षण, पोषण और शिक्षण) में &lt;br /&gt;
# ज्ञानार्जन, कौशलार्जन, बलार्जन और पुण्यार्जन की मानसिकता और केवल इन के लिए अटन। &lt;br /&gt;
# स्वावलंबन और परस्परावलंबन। &lt;br /&gt;
# शत्रुत्व भाववाले समाज के घटकों के साथ भी शान्ततापूर्ण और सुखी सहजीवन। &lt;br /&gt;
# एकात्मता (समाज और सृष्टि के साथ) का व्यवहार / सुख और दु:ख में सहानुभूति और सहभागिता। &lt;br /&gt;
# विभिन्न क्षेत्रों में - जैसे शासन, न्याय, समृद्धि आदि क्षेत्रों के नेता &amp;gt; आचार्य &amp;gt; धर्म । धर्म सर्वोपरि। &lt;br /&gt;
# सद्गुण, सदाचार, स्वावलंबन, सत्यनिष्ठा, सादगी, सहजता, सौन्दर्यबोध, स्वतंत्रता, संयम, स्वदेशी आदि का व्यवहार साथ ही में त्याग, तपस्या, समाधान, शान्ति, अभय, विजिगीषा आदि गुणों का विकास। &lt;br /&gt;
# मनसा, वाचा कर्मणा ‘सर्वे भवन्तु सुखिन:’ के प्रयास। &lt;br /&gt;
# वर्ण-धर्म की और जाति-धर्म की शिक्षा देना। जब लोग अपने वर्ण के अनुसार आचरण करते हैं, तब राष्ट्र की संस्कृति का विकास और रक्षण होता है। और जब लोग अपने जातिधर्म के अनुसार व्यवसाय करते हैं तब देश समृद्ध बनता है, ओर बना रहता है। &lt;br /&gt;
# धर्माचरणी और समाजभक्त / देशभक्त / राष्ट्रभक्त / परमात्मा में श्रद्धा रखने वालों का निर्माण। &lt;br /&gt;
# धर्मशिक्षा और कर्मशिक्षा। &lt;br /&gt;
# संयमित उपभोग। न्यूनतम (इष्टतम) उपभोग। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== ग्रामकुल ==&lt;br /&gt;
# ग्राम को स्वावलंबी ग्राम बनाना&lt;br /&gt;
# ग्राम की अर्थव्यवस्था को ठीक से बिठाना और चलाना&lt;br /&gt;
# संयुक्त कुटुंबों की प्रतिष्ठापना का वातावरण&lt;br /&gt;
# कौटुम्बिक उद्योगों की प्रतिष्ठापना का वातावरण&lt;br /&gt;
# कुटुम्ब भावना से प्रत्येक व्यक्ति की सम्मानपूर्ण आजीविका की व्यवस्था करना&lt;br /&gt;
# कौटुम्बिक उद्योग और जातियों में समन्वय रखना&lt;br /&gt;
# शासकीय व्यवस्थाओं के प्रति जिम्मेदारियां : कर देना, शिक्षण, पोषण और रक्षण की व्यवस्थाओं में श्रेष्ठ व्यक्तियों का और संसाधनों का योगदान देना&lt;br /&gt;
# ग्राम, एक कुल बने ऐसा वातावरण बनाए रखना।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== गुरुकुल / विद्यालय ==&lt;br /&gt;
# वर्णशिक्षा की व्यवस्था &lt;br /&gt;
# ज्ञानार्जन, कौशलार्जन, बलार्जन के लिए मार्गदर्शन &lt;br /&gt;
# शास्त्रीय शिक्षा का प्रावधान &lt;br /&gt;
# श्रेष्ठ परम्पराओं के निर्माण की शिक्षा &lt;br /&gt;
# जीवन के तत्त्वज्ञान और व्यवहार की शिक्षा &lt;br /&gt;
# जीवन के लिए महत्वपूर्ण सामाजिक संगठन प्रणालियाँ और व्यवस्थाओं की समझ और यथाशक्ति योगदान की प्रेरणा। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== कौशल विधा पंचायत ==&lt;br /&gt;
# समाज की किसी एक आवश्यकता की पूर्ति करना। कभी कोई कमी न हो यह सुनिश्चित करना। &lt;br /&gt;
# धर्म के मार्गदर्शन में अपने कौशल विधा-धर्म का निर्धारण और कौशल विधा प्रणाली में प्रचार प्रसार &lt;br /&gt;
# अन्य कौशल विधाओं के साथ समन्वय &lt;br /&gt;
# राष्ट्र सर्वोपरि यह भावना सदा जाग्रत रखना &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== व्यवस्थाओं के धर्म ==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== धर्म व्यवस्था ===&lt;br /&gt;
यह कोई नियमित व्यवस्था नहीं होती। यह जाग्रत, नि:स्वार्थी, सर्वभूतहित में सदैव प्रयासरत रहनेवाले पंडितों का समूह होता है। यह समूह सक्रिय होने से समाज ठीक चलता है। आवश्यकतानुसार इस समूह की जिम्मेदारियां बढ़ जातीं है। ऐसे आपद्धर्म के निर्वहन के लिए भी यह समूह पर्याप्त सामर्थ्यवान हो। &lt;br /&gt;
# कालानुरूप धर्म को व्याख्यायित करना। &lt;br /&gt;
# वर्णों के ‘स्व’धर्मों का पालन करने की व्यवस्था की पस्तुति कर शिक्षा और शासन की मदद से समाज में उन्हें स्थापित करना। व्यक्तिगत और सामाजिक धर्म/संस्कृति के अनुसार व्यवहार का वातावरण बनाना। जब वर्ण-धर्म का पालन लोग करते हैं तब देश में संस्कृति का विकास और रक्षण होता है। जिनकी ओर देखकर लोग वर्ण धर्म का पालन कर सकें ऐसे ‘श्रेष्ठ’ लोगों का निर्माण करना। &lt;br /&gt;
# स्वाभाविक, शासनिक और आर्थिक ऐसी सभी प्रकार की स्वतन्त्रता की रक्षा करना। &lt;br /&gt;
# शासन पर अपने ज्ञान, त्याग, तपस्या, लोकसंग्रह तथा सदैव लोकहित के चिंतन के माध्यम से नैतिक दबाव निर्माण करना। शासन को सदाचारी, कुशल और सामर्थ्य संपन्न बनाए रखने के लिए मार्गदर्शन करना। अधर्माचरणी शासन को हटाकर धर्माचरणी शासन को प्रतिष्ठित करना। &lt;br /&gt;
# लोकशिक्षा (कुटुम्ब शिक्षा इसी का हिस्सा है) और विद्यालयीन शिक्षा की प्रभावी व्यवस्था करना। जैसे लिखा पढी न्यूनतम करने की दिशा में बढ़ना। वाणी / शब्द की प्रतिष्ठा बढ़ाना। जीवन को साधन सापेक्षता से साधना सापेक्षता की ओर ले जाने के लिए अपनी कथनी और करनी से मार्गदर्शन करना। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== शासन व्यवस्था ===&lt;br /&gt;
# अंतर्बाह्य शत्रुओं से लोगों की शासनिक स्वतन्त्रता की रक्षा करना।  &lt;br /&gt;
# धर्म के दायरे में रहकर दुष्टों और मूर्खों को नियंत्रण में रखना।  &lt;br /&gt;
# दंड व्यवस्था के अंतर्गत न्याय व्यवस्था का निर्माण करना। किसी पर अन्याय हो ही नहीं, ऐसी दंड व्यवस्था के निर्माण का प्रयास करना।  &lt;br /&gt;
# श्रेष्ठ शासक परम्परा निर्माण करना।  &lt;br /&gt;
# प्रभावी, समाजहित की शिक्षा देनेवाले शिक्षा केन्द्रों को संरक्षण, समर्थन और सहायता देकर और प्रभावी बनाने के लिए यथाशक्ति प्रयास करना। ऐसा करने से शासन का काम काफी सरल हो जाता है।  &lt;br /&gt;
# धर्म व्यवस्था से समय समय पर मार्गदर्शन प्राप्त करते रहना।  &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== समृद्धि व्यवस्था ===&lt;br /&gt;
# योग्य शिक्षा के द्वारा समाज में धर्म के अविरोधी इच्छाओं का ही विकास हो यह सुनिश्चित करना।&lt;br /&gt;
# समाज के प्रत्येक घटक की सभी आवश्यकताओं की पूर्ति करना, धर्म विरोधी इच्छाओं की नहीं। समाज की आर्थिक स्वतन्त्रता को अबाधित रखना।&lt;br /&gt;
# प्राकृतिक संसाधनों का न्यूनतम उपयोग हो ऐसा वातावरण बनाना। संयमित उपभोग को प्रतिष्ठित करना।&lt;br /&gt;
# प्रकृति का प्रदूषण नहीं होने देना। प्रकृति का सन्तुलन बनाए रखना।&lt;br /&gt;
# कौटुम्बिक उद्योग, जातियाँ और ग्राम मिलकर समृद्धि निर्माण होती है। ये तीनों ईकाईयाँ फलेफूले और इनका स्वस्थ ऐसा तानाबाना बना रहे ऐसा वातावरण रहे।&lt;br /&gt;
# पैसे का विनिमय न्यूनतम रहे ऐसी व्यवस्था निर्माण करना।&lt;br /&gt;
अब हम धर्म के अनुपालन की प्रक्रिया का विचार आगे करेंगे।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== धर्म अनुपालन की प्रक्रिया ==&lt;br /&gt;
हमने जाना है कि समाज के सुख, शांति, स्वतंत्रता, सुसंस्कृतता के लिए समाज का धर्मनिष्ठ होना आवश्यक होता है। यहाँ मोटे तौर पर धर्म का मतलब कर्तव्य से है। समाज धारणा के लिए कर्तव्यों पर आधारित जीवन अनिवार्य होता है। समाज धारणा के लिए धर्म-युक्त व्यवहार में आनेवाली जटिलताओं को और उसके अनुपालन की प्रक्रिया को समझने का प्रयास करेंगे। इन में व्यक्तिगत स्तर की बातों का हमने [[Personal Responsibilities (व्यक्तिगत धर्म अनुपालन)|पूर्व के अध्याय]] में विचार किया है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== विभिन्न ईकाईयों के स्तर पर ===&lt;br /&gt;
# कुटुम्ब : समाज की सभी इकाइयों के विभिन्न स्तरोंपर उचित भूमिका निभानेवाले श्रेष्ठ मानव का निर्माण करना। कौटुम्बिक व्यवसाय के माध्यम से समाज की किसी आवश्यकता की पूर्ति करना।&lt;br /&gt;
# ग्राम : ग्राम की भूमिका छोटे विश्व और बड़े कुटुम्ब की तरह ही होती है। जिस तरह कुटुम्ब के सदस्यों में आपस में पैसे का लेनदेन नहीं होता उसी तरह अच्छे ग्राम में कुटुम्बों में आपस में पैसे का लेनदेन नहीं होता। प्रत्येक की सम्मान और स्वतन्त्रता के साथ अन्न, वस्त्र, भवन, शिक्षा, आजीविका, सुरक्षा आदि सभी आवश्यकताओं की पूर्ति होती है।&lt;br /&gt;
# कौशल विधा : समाज जीवन की आवश्यकताओं की हर विधा के अनुसार व्यवसाय विधा समूह बनते हैं। इन समूहों के भी सामान्य व्यक्ति से लेकर विश्व के स्तर तक के लिए करणीय और अकरणीय कार्य होते हैं। कर्तव्य होते हैं। इन्हें व्यवसाय विधा धर्म कहेंगे। इनमें पदार्थ के उत्पादन के रूप में आर्थिक स्वतन्त्रता के किसी एक पहलू की रक्षा में योगदान करना होता है। शिक्षा / संस्कार, वस्तुएं, भावनाएं, विचार, कला आदि में से समाज जीवन की आवश्यकता में से किसी एक विधा के पदार्थ की निरंतर आपूर्ति करना। पदार्थ का अर्थ केवल वस्तु नहीं है। जिस पद याने शब्द का अर्थ होता है वह पदार्थ कहलाता है। व्यावसायिक समूह का काम कौशल का विकास करना, कौशल का पीढ़ी दर पीढ़ी अंतरण करना और अन्य व्यवसायिक समूहों से समन्वय रखना आदि है।&lt;br /&gt;
# भाषिक समूह : भाषा का मुख्य उपयोग परस्पर संवाद है। संवाद विचारों की सटीक अभिव्यक्ति करने वाला हो इस हेतु से भाषाएँ बनतीं हैं। संवाद में सहजता, सरलता, सुगमता से आत्मीयता बढ़ती है। इसी हेतु से भाषिक समूह बनते हैं।&lt;br /&gt;
# प्रादेशिक समूह : शासनिक और व्यवस्थात्मक सुविधा की दृष्टि से प्रादेशिक स्तर का मह्त्व होता है।&lt;br /&gt;
# राष्ट्र : राष्ट्र अपने समाज के लिये विविध प्रकार के संगठनों का और व्यवस्थाओं का निर्माण करता है।&lt;br /&gt;
# विश्व : पूर्व में बताई हुई 1 से लेकर 6 तक की सभी इकाइयां वैश्विक हित की अविरोधी रहें।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== प्रकृति सुसंगतता ===&lt;br /&gt;
समाज जीवन में केन्द्रिकरण और विकेंद्रीकरण का समन्वय हो यह आवश्यक है। विशाल उद्योग, बाजार की मंडियां, शासकीय कार्यालय, व्यावसायिक, भाषिक, प्रादेशिक समूहों के समन्वय की व्यवस्थाएं आदि के लिये शहरों की आवश्यकता होती है। लेकिन इनमें अनावश्यक केन्द्रीकरण न हो पाए। वनवासी या गिरिजन भी ग्राम व्यवस्था से ही जुड़े हुए होने चाहिए। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== प्रक्रियाएं ===&lt;br /&gt;
धर्म के अनुपालन में बुद्धि के स्तरपर धर्म के प्रति पर्याप्त संज्ञान, मन के स्तरपर कौटुम्बिक भावना, अनुशासन और श्रद्धा (आज्ञाकारिता) का विकास तथा शारीरिक स्तरपर सहकारिता और परोपकार की आदतें अत्यंत आवश्यक हैं। &lt;br /&gt;
३.१ धर्म संज्ञान : ‘समझना’ यह बुद्धि का काम होता है। इसलिए जब बच्चे का बुद्धि का अंग विकसित हो रहा होता है उसे धर्म की बौद्धिक याने तर्क तथा कर्मसिद्धांत के आधारपर शिक्षा देना उचित होता है। इस दृष्टि से तर्कशास्त्र की समझ या सरल शब्दों में ‘किसी भी बात के करने से पहले चराचर के हित में उस बात को कैसे करना चाहिए’ इसे समझने की क्षमता का विकास आवश्यक होता है।&lt;br /&gt;
३.२ कौटुम्बिक भावना का विकास : समाज के सभी परस्पर संबंधों में कौटुम्बिक भावना से व्यवहार का आधार धर्मसंज्ञान ही तो होता है। मन को बुद्धि के नियंत्रण में रखना ही मन की शिक्षा होती है। दुर्योधन के निम्न कथन से सब परिचित हैं। 		&lt;br /&gt;
जानामी धर्मं न च में प्रवृत्ति: ।   जानाम्यधर्मं न च में निवृत्ति: ।।&lt;br /&gt;
३.३ धर्माचरण की आदतें: दुर्योधन के उपर्युक्त कथन को ध्यान में रखकर ही गर्भधारणा से ही बच्चे को धर्माचरण की आदतों की शिक्षा देना मह्त्वपूर्ण बन जाता है। आदत का अर्थ है जिस बात के करने में कठिनाई का अनुभव नहीं होता। जब किसी बात के बारबार करने से आचरण में यह सहजता आती है तब वह आदत बन जाती है। और जब उसे बुद्धिका अधिष्ठान मिल जाता है तब वह आदतें मनुष्य का स्वभाव ही बन जातीं हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== धर्म के अनुपालन के स्तर और साधन ===&lt;br /&gt;
 : &lt;br /&gt;
४.१ धर्म के अनुपालन करनेवालों के राष्ट्रभक्त, अराष्ट्रीय और राष्ट्रद्रोही ऐसे मोटे-मोटे तीन स्तर होते हैं। &lt;br /&gt;
४.२ धर्म के अनुपालन के साधन : धर्म का अनुपालन पूर्व में बताए अनुसार शिक्षा, आदेश, प्रायश्चित्त/	पश्चात्ताप 	तथा दंड ऐसा चार प्रकार से होता है। शासन दुर्बल होने से समाज में प्रमाद करनेवालों की संख्या में वृद्धि 	होती है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== धर्म के अनुपालन के अवरोध ===&lt;br /&gt;
 : धर्म के अनुपालन में निम्न बातें अवरोध-रूप होतीं हैं।&lt;br /&gt;
५.१ भिन्न जीवनदृष्टि के लोग : शीघ्रातिशीघ्र भिन्न जीवनदृष्टि के लोगों को आत्मसात करना आवश्यक होता 	है। अन्यथा समाज जीवन अस्थिर और संघर्षमय बन जाता है।&lt;br /&gt;
५.२ स्वार्थ/संकुचित अस्मिताएँ :आवश्यकताओं की पुर्ति तक तो स्वार्थ भावना समर्थनीय है। अस्मिता या 	अहंकार यह प्रत्येक जिवंत ईकाई का एक स्वाभाविक पहलू होता है। किन्तु जब किसी ईकाई के विशिष्ट स्तर की यह अस्मिता अपने से ऊपर की ईकाई जिसका वह हिस्सा है, उसकी अस्मिता से बड़ी लगने लगती है तब समाज जीवन की शांति नष्ट हो जाती है। इसलिए यह आवश्यक है की मजहब, रिलिजन,प्रादेशिक अलगता, भाषिक भिन्नता, धनका अहंकार, बौद्धिक श्रेष्ठता आदि जैसी संकुचित अस्मिताएँ अपने से ऊपर की जीवंत ईकाई की अस्मिता के विरोध में नहीं हो। &lt;br /&gt;
५.३ विपरीत शिक्षा : विपरीत या दोषपूर्ण शिक्षा यह तो सभी समस्याओं की जड़ होती है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== कारक तत्त्व ===&lt;br /&gt;
 : कारक तत्वों से मतलब है धर्मपालन में सहायता देनेवाले घटक। ये निम्न होते हैं।&lt;br /&gt;
६.१ धर्म व्यवस्था : शासन धर्मनिष्ठ रहे यह सुनिश्चित करना धर्म व्यवस्था की जिम्मेदारी है। अपने त्याग, तपस्या, ज्ञान, लोकसंग्रह, चराचर के हित का चिन्तन, समर्पण भाव और कार्यकुशलता के आधारपर 	समाज से प्राप्त समर्थन प्राप्त कर वह देखे की कोई अयोग्य व्यक्ति शासक नहीं बनें।&lt;br /&gt;
६.२ शिक्षा : ६.२.१ कुटुम्ब शिक्षा 	६.२.२ विद्याकेन्द्र की शिक्षा 	६.२.३ लोकशिक्षा &lt;br /&gt;
६.३ धर्मनिष्ठ शासन : शासक का धर्मशास्त्र का जानकार होना और स्वयं धर्माचरणी होना भी आवश्यक होता है। जब शासन धर्म के अनुसार चलता है, धर्म व्यवस्थाद्वारा नियमित निर्देशित होता है तब धर्म भी 	स्थापित होता है और राज्य व्यवस्था भी श्रेष्ठ बनती है।&lt;br /&gt;
६.४ धर्मनिष्ठों का सामाजिक नेतृत्व : समाज जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में धर्मनिष्ठ लोग जब अच्छी संख्या में दिखाई देते हैं तब समाज मानस धर्मनिष्ठ बनता है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== चरण ==&lt;br /&gt;
धर्म का अनुपालन जब लोग स्वेच्छा से करनेवाले समाज के निर्माण के लिए दो बातें अत्यंत महत्वपूर्ण होतीं हैं। एक गर्भ में श्रेष्ठ जीवात्मा की स्थापना और दूसरे शिक्षा और संस्कार।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शिक्षा और संस्कार में -&lt;br /&gt;
७.१ जन्मपूर्व और शैशव कालमें अधिजनन शास्त्र के आधारपर मार्गदर्शन। &lt;br /&gt;
७.२ बाल्य काल : कुटुम्ब की शिक्षा के साथ विद्याकेन्द्र शिक्षा का समायोजन 			           &lt;br /&gt;
७.३ यौवन काल: अहंकार, बुद्धि के सही मोड़ हेतु सत्संग, प्रेरणा, वातावरण, ज्ञानार्जन/बलार्जन/कौशलार्जन आदि &lt;br /&gt;
७.४ प्रौढ़ावस्था : पूर्व ज्ञान/आदतों को व्यवस्थित करने के लिए सामाजिक वातावरण और मार्गदर्शन&lt;br /&gt;
७.४.१ पुरोहित&lt;br /&gt;
७.४.२ मेले/यात्राएं&lt;br /&gt;
७.४.३ कीर्तनकार/प्रवचनकार&lt;br /&gt;
७.४.४ धर्माचार्य&lt;br /&gt;
७.४.५ दृक्श्राव्य माध्यम –चित्रपट, दूरदर्शन आदि&lt;br /&gt;
७.४.६ आन्तरजाल&lt;br /&gt;
७.४.७ कानून का डर &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== धर्म निर्णय व्यवस्था ==&lt;br /&gt;
 : सामान्यत: जब भी धर्म की समझसे सम्बन्धित समस्या हो तब धर्म निर्णय की व्यवस्था उपलब्ध होनी चाहिये। इस व्यवस्था के तीन स्तर होना आवश्यक है। पहला स्तर तो स्थानिक धर्म के जानकार, दूसरा जनपदीय या निकटके तीर्थक्षेत्र में धर्मज्ञ परिषद्, और तीसरा स्तर अखिल भारतीय या राष्ट्रीय धर्मज्ञ परिषद्। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== माध्यम ==&lt;br /&gt;
 : धर्म अनुपालन करवाने के मुख्यत: दो प्रकारके माध्यम होते हैं। &lt;br /&gt;
९.१ कुटुम्ब के दायरे में : धर्म शिक्षा का अर्थ है सदाचार की शिक्षा। धर्म की शिक्षा के लिए कुटुम्ब यह सबसे श्रेष्ठ पाठशाला है। विद्याकेन्द्र की शिक्षा तो कुटुम्ब में मिली धर्म शिक्षा की पुष्टि या आवश्यक सुधार के लिए ही होती है। कुटुम्ब में धर्म शिक्षा तीन तरह से होती है। गर्भपूर्व संस्कार, गर्भ संस्कार और शिशु संस्कार और आदतें। मनुष्य की आदतें भी बचपन में ही पक्की हो जातीं हैं। &lt;br /&gt;
९.२ कुटुम्ब से बाहर के माध्यम : मनुष्य तो हर पल सीखता ही रहता है। इसलिए कुटुम्ब से बाहर भी वह कई बातें सीखता है। माध्यमों में मित्र मंडली, विद्यालय, समाज का सांस्कृतिक स्तर और क़ानून व्यवस्था आदि।&lt;br /&gt;
जीवन के भारतीय प्रतिमान की प्रतिष्ठापना की प्रक्रिया से अपेक्षित परिणामों की चर्चा हम [[Form of an Ideal Society (आदर्श समाज का स्वरूप)|अगले]] अध्याय में करेंगे।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[Category:Bhartiya Jeevan Pratiman (भारतीय जीवन प्रतिमान)]]&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Dilipkelkar</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://dharmawiki.org/index.php?title=Responsibilities_at_Societal_Level_(%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%AE%E0%A4%BE%E0%A4%9C%E0%A4%BF%E0%A4%95_%E0%A4%A7%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%AE_%E0%A4%85%E0%A4%A8%E0%A5%81%E0%A4%AA%E0%A4%BE%E0%A4%B2%E0%A4%A8)&amp;diff=119957</id>
		<title>Responsibilities at Societal Level (सामाजिक धर्म अनुपालन)</title>
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		<updated>2019-07-21T06:43:52Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Dilipkelkar: /* विभिन्न ईकाईयों के स्तर पर */ लेख सम्पादित किया&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{One source|date=January 2019}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जीवन के भारतीय प्रतिमान की पुनर्प्रतिष्ठा के लिए राष्ट्र के संगठन की विभिन्न प्रणालियों के स्तर पर उन कर्तव्यों का याने ईकाई धर्म का विचार और प्रत्यक्ष धर्म अनुपालन की प्रक्रिया कैसे चलेगी, ऐसा दो पहलुओं में हम परिवर्तन की प्रक्रिया का विचार करेंगे। वैसे तो धर्म अनुपालन की प्रक्रिया का विचार हमने समाज धारणा शास्त्र के विषय में किया है। फिर भी परिवर्तन प्रक्रिया को यहाँ फिर से दोहराना उपयुक्त होगा।   &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== विभिन्न सामाजिक प्रणालियों के धर्म ==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== कुटुम्ब ===&lt;br /&gt;
कुटुम्ब परिवर्तन का सबसे जड़मूल का माध्यम है। समाज जीवन की वह नींव होता है। वह जितना सशक्त और व्यापक भूमिका का निर्वहन करेगा समाज उतना ही श्रेष्ठ बनेगा। कुटुम्ब में दो प्रकार के काम होते हैं। पहले हैं कुटुम्ब के लिए और दूसरे हैं कुटुम्ब में याने समाज, सृष्टि के लिए। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== कुटुम्ब की – कुटुम्ब के लिए ===&lt;br /&gt;
# क्षमता और योग्यता आधारित कर्तव्य  &lt;br /&gt;
# क्षमता और योग्यता के अनुसार सार्थक योगदान  &lt;br /&gt;
# शुद्ध सस्नेहयुक्त सदाचारयुक्त परस्पर व्यवहार  &lt;br /&gt;
# बड़ों का आदर, सेवा। छोटों के लिए आदर्श और प्यार।  &lt;br /&gt;
# कुटुंबहित अपने हित से ऊपर। कर्त्तव्य परायणता। अपने कर्तव्यों के प्रति आग्रही।  &lt;br /&gt;
# स्वावलंबन / परस्परावलंबन।  &lt;br /&gt;
# कुटुम्ब के सभी काम करना आना और करना।  &lt;br /&gt;
# एकात्मता का विस्तार – कुटुंब&amp;lt; समाज&amp;lt; सृष्टि&amp;lt; विश्व। लेकिन इसकी नींव कुटुंब जीवन में ही पड़ेगी और पक्की होगी।  &lt;br /&gt;
# कौशल, ज्ञान, बल और पुण्य अर्जन की दृष्टी से अध्ययन और संस्कार  &lt;br /&gt;
# कौटुम्बिक कुशलताएँ, आदतें, रीति-रिवाज, परम्पराएँ आदि  &lt;br /&gt;
# कुटुम्ब प्रमुख सर्वोपरि : कुटुम्ब के सब ही सदस्यों को कुटुम्ब प्रमुख बनने की प्रेरणा और इस हेतु से उनके द्वारा अपना विवेक, कौशल, सयानापन, निर्णय क्षमता, अपार स्नेह आदि का विकास। कुटुम्ब प्रमुख की आज्ञाओं का पालन - आज्ञाकारिता।  &lt;br /&gt;
# काया, वाचा, मनसा सभी से मधुर व्यवहार।  &lt;br /&gt;
# अच्छा – बेटा/बेटी, भाई/बहन, पति/पत्नि, पिता/माता, गृहस्थ/गृहिणी, रिश्तेदार आदि बनना/बनाना।  &lt;br /&gt;
# वर्णाश्रम धर्म का पालन – स्वभावज कर्म करते जाना।  &lt;br /&gt;
## सवर्ण/सजातीय विवाह  &lt;br /&gt;
## कौटुम्बिक व्यवसाय में सहभाग  &lt;br /&gt;
## ज्ञान, कौशल, श्रेष्ठ परम्पराओं का निर्वहन, परिष्कार, निर्माण और अगली पीढी को अंतरण  &lt;br /&gt;
## आयु की अवस्था के अनुसार ब्रह्मचर्य, गृहस्थ और वानप्रस्थ आदि आश्रमों के धर्म की जिम्मेदारियों का निर्वहन।  &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== कुटुम्ब में – समाज के लिए ===&lt;br /&gt;
# सामाजिक कर्तव्यों का निर्वहन &lt;br /&gt;
## समाज संगठन की प्रणालियों (कुटुंब, जाति, ग्राम, राष्ट्र) में &lt;br /&gt;
## सामाजिक व्यवस्थाओं (रक्षण, पोषण और शिक्षण) में &lt;br /&gt;
# ज्ञानार्जन, कौशलार्जन, बलार्जन और पुण्यार्जन की मानसिकता और केवल इन के लिए अटन। &lt;br /&gt;
# स्वावलंबन और परस्परावलंबन। &lt;br /&gt;
# शत्रुत्व भाववाले समाज के घटकों के साथ भी शान्ततापूर्ण और सुखी सहजीवन। &lt;br /&gt;
# एकात्मता (समाज और सृष्टि के साथ) का व्यवहार / सुख और दु:ख में सहानुभूति और सहभागिता। &lt;br /&gt;
# विभिन्न क्षेत्रों में - जैसे शासन, न्याय, समृद्धि आदि क्षेत्रों के नेता &amp;gt; आचार्य &amp;gt; धर्म । धर्म सर्वोपरि। &lt;br /&gt;
# सद्गुण, सदाचार, स्वावलंबन, सत्यनिष्ठा, सादगी, सहजता, सौन्दर्यबोध, स्वतंत्रता, संयम, स्वदेशी आदि का व्यवहार साथ ही में त्याग, तपस्या, समाधान, शान्ति, अभय, विजिगीषा आदि गुणों का विकास। &lt;br /&gt;
# मनसा, वाचा कर्मणा ‘सर्वे भवन्तु सुखिन:’ के प्रयास। &lt;br /&gt;
# वर्ण-धर्म की और जाति-धर्म की शिक्षा देना। जब लोग अपने वर्ण के अनुसार आचरण करते हैं, तब राष्ट्र की संस्कृति का विकास और रक्षण होता है। और जब लोग अपने जातिधर्म के अनुसार व्यवसाय करते हैं तब देश समृद्ध बनता है, ओर बना रहता है। &lt;br /&gt;
# धर्माचरणी और समाजभक्त / देशभक्त / राष्ट्रभक्त / परमात्मा में श्रद्धा रखने वालों का निर्माण। &lt;br /&gt;
# धर्मशिक्षा और कर्मशिक्षा। &lt;br /&gt;
# संयमित उपभोग। न्यूनतम (इष्टतम) उपभोग। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== ग्रामकुल ==&lt;br /&gt;
# ग्राम को स्वावलंबी ग्राम बनाना&lt;br /&gt;
# ग्राम की अर्थव्यवस्था को ठीक से बिठाना और चलाना&lt;br /&gt;
# संयुक्त कुटुंबों की प्रतिष्ठापना का वातावरण&lt;br /&gt;
# कौटुम्बिक उद्योगों की प्रतिष्ठापना का वातावरण&lt;br /&gt;
# कुटुम्ब भावना से प्रत्येक व्यक्ति की सम्मानपूर्ण आजीविका की व्यवस्था करना&lt;br /&gt;
# कौटुम्बिक उद्योग और जातियों में समन्वय रखना&lt;br /&gt;
# शासकीय व्यवस्थाओं के प्रति जिम्मेदारियां : कर देना, शिक्षण, पोषण और रक्षण की व्यवस्थाओं में श्रेष्ठ व्यक्तियों का और संसाधनों का योगदान देना&lt;br /&gt;
# ग्राम, एक कुल बने ऐसा वातावरण बनाए रखना।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== गुरुकुल / विद्यालय ==&lt;br /&gt;
# वर्णशिक्षा की व्यवस्था &lt;br /&gt;
# ज्ञानार्जन, कौशलार्जन, बलार्जन के लिए मार्गदर्शन &lt;br /&gt;
# शास्त्रीय शिक्षा का प्रावधान &lt;br /&gt;
# श्रेष्ठ परम्पराओं के निर्माण की शिक्षा &lt;br /&gt;
# जीवन के तत्त्वज्ञान और व्यवहार की शिक्षा &lt;br /&gt;
# जीवन के लिए महत्वपूर्ण सामाजिक संगठन प्रणालियाँ और व्यवस्थाओं की समझ और यथाशक्ति योगदान की प्रेरणा। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== कौशल विधा पंचायत ==&lt;br /&gt;
# समाज की किसी एक आवश्यकता की पूर्ति करना। कभी कोई कमी न हो यह सुनिश्चित करना। &lt;br /&gt;
# धर्म के मार्गदर्शन में अपने कौशल विधा-धर्म का निर्धारण और कौशल विधा प्रणाली में प्रचार प्रसार &lt;br /&gt;
# अन्य कौशल विधाओं के साथ समन्वय &lt;br /&gt;
# राष्ट्र सर्वोपरि यह भावना सदा जाग्रत रखना &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== व्यवस्थाओं के धर्म ==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== धर्म व्यवस्था ===&lt;br /&gt;
यह कोई नियमित व्यवस्था नहीं होती। यह जाग्रत, नि:स्वार्थी, सर्वभूतहित में सदैव प्रयासरत रहनेवाले पंडितों का समूह होता है। यह समूह सक्रिय होने से समाज ठीक चलता है। आवश्यकतानुसार इस समूह की जिम्मेदारियां बढ़ जातीं है। ऐसे आपद्धर्म के निर्वहन के लिए भी यह समूह पर्याप्त सामर्थ्यवान हो। &lt;br /&gt;
# कालानुरूप धर्म को व्याख्यायित करना। &lt;br /&gt;
# वर्णों के ‘स्व’धर्मों का पालन करने की व्यवस्था की पस्तुति कर शिक्षा और शासन की मदद से समाज में उन्हें स्थापित करना। व्यक्तिगत और सामाजिक धर्म/संस्कृति के अनुसार व्यवहार का वातावरण बनाना। जब वर्ण-धर्म का पालन लोग करते हैं तब देश में संस्कृति का विकास और रक्षण होता है। जिनकी ओर देखकर लोग वर्ण धर्म का पालन कर सकें ऐसे ‘श्रेष्ठ’ लोगों का निर्माण करना। &lt;br /&gt;
# स्वाभाविक, शासनिक और आर्थिक ऐसी सभी प्रकार की स्वतन्त्रता की रक्षा करना। &lt;br /&gt;
# शासन पर अपने ज्ञान, त्याग, तपस्या, लोकसंग्रह तथा सदैव लोकहित के चिंतन के माध्यम से नैतिक दबाव निर्माण करना। शासन को सदाचारी, कुशल और सामर्थ्य संपन्न बनाए रखने के लिए मार्गदर्शन करना। अधर्माचरणी शासन को हटाकर धर्माचरणी शासन को प्रतिष्ठित करना। &lt;br /&gt;
# लोकशिक्षा (कुटुम्ब शिक्षा इसी का हिस्सा है) और विद्यालयीन शिक्षा की प्रभावी व्यवस्था करना। जैसे लिखा पढी न्यूनतम करने की दिशा में बढ़ना। वाणी / शब्द की प्रतिष्ठा बढ़ाना। जीवन को साधन सापेक्षता से साधना सापेक्षता की ओर ले जाने के लिए अपनी कथनी और करनी से मार्गदर्शन करना। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== शासन व्यवस्था ===&lt;br /&gt;
# अंतर्बाह्य शत्रुओं से लोगों की शासनिक स्वतन्त्रता की रक्षा करना।  &lt;br /&gt;
# धर्म के दायरे में रहकर दुष्टों और मूर्खों को नियंत्रण में रखना।  &lt;br /&gt;
# दंड व्यवस्था के अंतर्गत न्याय व्यवस्था का निर्माण करना। किसी पर अन्याय हो ही नहीं, ऐसी दंड व्यवस्था के निर्माण का प्रयास करना।  &lt;br /&gt;
# श्रेष्ठ शासक परम्परा निर्माण करना।  &lt;br /&gt;
# प्रभावी, समाजहित की शिक्षा देनेवाले शिक्षा केन्द्रों को संरक्षण, समर्थन और सहायता देकर और प्रभावी बनाने के लिए यथाशक्ति प्रयास करना। ऐसा करने से शासन का काम काफी सरल हो जाता है।  &lt;br /&gt;
# धर्म व्यवस्था से समय समय पर मार्गदर्शन प्राप्त करते रहना।  &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== समृद्धि व्यवस्था ===&lt;br /&gt;
# योग्य शिक्षा के द्वारा समाज में धर्म के अविरोधी इच्छाओं का ही विकास हो यह सुनिश्चित करना।&lt;br /&gt;
# समाज के प्रत्येक घटक की सभी आवश्यकताओं की पूर्ति करना, धर्म विरोधी इच्छाओं की नहीं। समाज की आर्थिक स्वतन्त्रता को अबाधित रखना।&lt;br /&gt;
# प्राकृतिक संसाधनों का न्यूनतम उपयोग हो ऐसा वातावरण बनाना। संयमित उपभोग को प्रतिष्ठित करना।&lt;br /&gt;
# प्रकृति का प्रदूषण नहीं होने देना। प्रकृति का सन्तुलन बनाए रखना।&lt;br /&gt;
# कौटुम्बिक उद्योग, जातियाँ और ग्राम मिलकर समृद्धि निर्माण होती है। ये तीनों ईकाईयाँ फलेफूले और इनका स्वस्थ ऐसा तानाबाना बना रहे ऐसा वातावरण रहे।&lt;br /&gt;
# पैसे का विनिमय न्यूनतम रहे ऐसी व्यवस्था निर्माण करना।&lt;br /&gt;
अब हम धर्म के अनुपालन की प्रक्रिया का विचार आगे करेंगे।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== धर्म अनुपालन की प्रक्रिया ==&lt;br /&gt;
हमने जाना है कि समाज के सुख, शांति, स्वतंत्रता, सुसंस्कृतता के लिए समाज का धर्मनिष्ठ होना आवश्यक होता है। यहाँ मोटे तौर पर धर्म का मतलब कर्तव्य से है। समाज धारणा के लिए कर्तव्यों पर आधारित जीवन अनिवार्य होता है। समाज धारणा के लिए धर्म-युक्त व्यवहार में आनेवाली जटिलताओं को और उसके अनुपालन की प्रक्रिया को समझने का प्रयास करेंगे। इन में व्यक्तिगत स्तर की बातों का हमने [[Personal Responsibilities (व्यक्तिगत धर्म अनुपालन)|पूर्व के अध्याय]] में विचार किया है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== विभिन्न ईकाईयों के स्तर पर ===&lt;br /&gt;
# कुटुम्ब : समाज की सभी इकाइयों के विभिन्न स्तरोंपर उचित भूमिका निभानेवाले श्रेष्ठ मानव का निर्माण करना। कौटुम्बिक व्यवसाय के माध्यम से समाज की किसी आवश्यकता की पूर्ति करना।&lt;br /&gt;
# ग्राम : ग्राम की भूमिका छोटे विश्व और बड़े कुटुम्ब की तरह ही होती है। जिस तरह कुटुम्ब के सदस्यों में आपस में पैसे का लेनदेन नहीं होता उसी तरह अच्छे ग्राम में कुटुम्बों में आपस में पैसे का लेनदेन नहीं होता। प्रत्येक की सम्मान और स्वतन्त्रता के साथ अन्न, वस्त्र, भवन, शिक्षा, आजीविका, सुरक्षा आदि सभी आवश्यकताओं की पूर्ति होती है।&lt;br /&gt;
# कौशल विधा : समाज जीवन की आवश्यकताओं की हर विधा के अनुसार व्यवसाय विधा समूह बनते हैं। इन समूहों के भी सामान्य व्यक्ति से लेकर विश्व के स्तर तक के लिए करणीय और अकरणीय कार्य होते हैं। कर्तव्य होते हैं। इन्हें व्यवसाय विधा धर्म कहेंगे। इनमें पदार्थ के उत्पादन के रूप में आर्थिक स्वतन्त्रता के किसी एक पहलू की रक्षा में योगदान करना होता है। शिक्षा / संस्कार, वस्तुएं, भावनाएं, विचार, कला आदि में से समाज जीवन की आवश्यकता में से किसी एक विधा के पदार्थ की निरंतर आपूर्ति करना। पदार्थ का अर्थ केवल वस्तु नहीं है। जिस पद याने शब्द का अर्थ होता है वह पदार्थ कहलाता है। व्यावसायिक समूह का काम कौशल का विकास करना, कौशल का पीढ़ी दर पीढ़ी अंतरण करना और अन्य व्यवसायिक समूहों से समन्वय रखना आदि है।&lt;br /&gt;
# भाषिक समूह : भाषा का मुख्य उपयोग परस्पर संवाद है। संवाद विचारों की सटीक अभिव्यक्ति करने वाला हो इस हेतु से भाषाएँ बनतीं हैं। संवाद में सहजता, सरलता, सुगमता से आत्मीयता बढ़ती है। इसी हेतु से भाषिक समूह बनते हैं।&lt;br /&gt;
# प्रादेशिक समूह : शासनिक और व्यवस्थात्मक सुविधा की दृष्टि से प्रादेशिक स्तर का मह्त्व होता है।&lt;br /&gt;
# राष्ट्र : राष्ट्र अपने समाज के लिये विविध प्रकार के संगठनों का और व्यवस्थाओं का निर्माण करता है।&lt;br /&gt;
# विश्व : पूर्व में बताई हुई 1 से लेकर 6 तक की सभी इकाइयां वैश्विक हित की अविरोधी रहें।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== प्रकृति सुसंगतता ===&lt;br /&gt;
समाज जीवन में केन्द्रिकरण और विकेंद्रीकरण का समन्वय हो यह आवश्यक है। विशाल उद्योग, बाजार की मंडियां, शासकीय कार्यालय, व्यावसायिक, भाषिक, प्रादेशिक समूहों के समन्वय की व्यवस्थाएं आदि के लिये शहरों की आवश्यकता होती है। लेकिन इनमें अनावश्यक केन्द्रीकरण न हो पाए। वनवासी या गिरिजन भी ग्राम व्यवस्था से ही जुड़े हुए होने चाहिए। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== प्रक्रियाएं ===&lt;br /&gt;
 : धर्म के अनुपालन में बुद्धि के स्तरपर धर्म के प्रति पर्याप्त संज्ञान, मन के स्तरपर कौटुम्बिक भावना, अनुशासन और श्रद्धा (आज्ञाकारिता) का विकास तथा शारीरिक स्तरपर सहकारिता और परोपकार की आदतें अत्यंत आवश्यक हैं। &lt;br /&gt;
३.१ धर्म संज्ञान : ‘समझना’ यह बुद्धि का काम होता है। इसलिए जब बच्चे का बुद्धि का अंग विकसित हो रहा होता है उसे धर्म की बौद्धिक याने तर्क तथा कर्मसिद्धांत के आधारपर शिक्षा देना उचित होता है। इस दृष्टि से तर्कशास्त्र की समझ या सरल शब्दों में ‘किसी भी बात के करने से पहले चराचर के हित में उस बात को कैसे करना चाहिए’ इसे समझने की क्षमता का विकास आवश्यक होता है।&lt;br /&gt;
३.२ कौटुम्बिक भावना का विकास : समाज के सभी परस्पर संबंधों में कौटुम्बिक भावना से व्यवहार का आधार धर्मसंज्ञान ही तो होता है। मन को बुद्धि के नियंत्रण में रखना ही मन की शिक्षा होती है। दुर्योधन के निम्न कथन से सब परिचित हैं। 		&lt;br /&gt;
जानामी धर्मं न च में प्रवृत्ति: ।   जानाम्यधर्मं न च में निवृत्ति: ।।&lt;br /&gt;
३.३ धर्माचरण की आदतें: दुर्योधन के उपर्युक्त कथन को ध्यान में रखकर ही गर्भधारणा से ही बच्चे को धर्माचरण की आदतों की शिक्षा देना मह्त्वपूर्ण बन जाता है। आदत का अर्थ है जिस बात के करने में कठिनाई का अनुभव नहीं होता। जब किसी बात के बारबार करने से आचरण में यह सहजता आती है तब वह आदत बन जाती है। और जब उसे बुद्धिका अधिष्ठान मिल जाता है तब वह आदतें मनुष्य का स्वभाव ही बन जातीं हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== धर्म के अनुपालन के स्तर और साधन ===&lt;br /&gt;
 : &lt;br /&gt;
४.१ धर्म के अनुपालन करनेवालों के राष्ट्रभक्त, अराष्ट्रीय और राष्ट्रद्रोही ऐसे मोटे-मोटे तीन स्तर होते हैं। &lt;br /&gt;
४.२ धर्म के अनुपालन के साधन : धर्म का अनुपालन पूर्व में बताए अनुसार शिक्षा, आदेश, प्रायश्चित्त/	पश्चात्ताप 	तथा दंड ऐसा चार प्रकार से होता है। शासन दुर्बल होने से समाज में प्रमाद करनेवालों की संख्या में वृद्धि 	होती है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== धर्म के अनुपालन के अवरोध ===&lt;br /&gt;
 : धर्म के अनुपालन में निम्न बातें अवरोध-रूप होतीं हैं।&lt;br /&gt;
५.१ भिन्न जीवनदृष्टि के लोग : शीघ्रातिशीघ्र भिन्न जीवनदृष्टि के लोगों को आत्मसात करना आवश्यक होता 	है। अन्यथा समाज जीवन अस्थिर और संघर्षमय बन जाता है।&lt;br /&gt;
५.२ स्वार्थ/संकुचित अस्मिताएँ :आवश्यकताओं की पुर्ति तक तो स्वार्थ भावना समर्थनीय है। अस्मिता या 	अहंकार यह प्रत्येक जिवंत ईकाई का एक स्वाभाविक पहलू होता है। किन्तु जब किसी ईकाई के विशिष्ट स्तर की यह अस्मिता अपने से ऊपर की ईकाई जिसका वह हिस्सा है, उसकी अस्मिता से बड़ी लगने लगती है तब समाज जीवन की शांति नष्ट हो जाती है। इसलिए यह आवश्यक है की मजहब, रिलिजन,प्रादेशिक अलगता, भाषिक भिन्नता, धनका अहंकार, बौद्धिक श्रेष्ठता आदि जैसी संकुचित अस्मिताएँ अपने से ऊपर की जीवंत ईकाई की अस्मिता के विरोध में नहीं हो। &lt;br /&gt;
५.३ विपरीत शिक्षा : विपरीत या दोषपूर्ण शिक्षा यह तो सभी समस्याओं की जड़ होती है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== कारक तत्त्व ===&lt;br /&gt;
 : कारक तत्वों से मतलब है धर्मपालन में सहायता देनेवाले घटक। ये निम्न होते हैं।&lt;br /&gt;
६.१ धर्म व्यवस्था : शासन धर्मनिष्ठ रहे यह सुनिश्चित करना धर्म व्यवस्था की जिम्मेदारी है। अपने त्याग, तपस्या, ज्ञान, लोकसंग्रह, चराचर के हित का चिन्तन, समर्पण भाव और कार्यकुशलता के आधारपर 	समाज से प्राप्त समर्थन प्राप्त कर वह देखे की कोई अयोग्य व्यक्ति शासक नहीं बनें।&lt;br /&gt;
६.२ शिक्षा : ६.२.१ कुटुम्ब शिक्षा 	६.२.२ विद्याकेन्द्र की शिक्षा 	६.२.३ लोकशिक्षा &lt;br /&gt;
६.३ धर्मनिष्ठ शासन : शासक का धर्मशास्त्र का जानकार होना और स्वयं धर्माचरणी होना भी आवश्यक होता है। जब शासन धर्म के अनुसार चलता है, धर्म व्यवस्थाद्वारा नियमित निर्देशित होता है तब धर्म भी 	स्थापित होता है और राज्य व्यवस्था भी श्रेष्ठ बनती है।&lt;br /&gt;
६.४ धर्मनिष्ठों का सामाजिक नेतृत्व : समाज जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में धर्मनिष्ठ लोग जब अच्छी संख्या में दिखाई देते हैं तब समाज मानस धर्मनिष्ठ बनता है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== चरण ==&lt;br /&gt;
धर्म का अनुपालन जब लोग स्वेच्छा से करनेवाले समाज के निर्माण के लिए दो बातें अत्यंत महत्वपूर्ण होतीं हैं। एक गर्भ में श्रेष्ठ जीवात्मा की स्थापना और दूसरे शिक्षा और संस्कार।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शिक्षा और संस्कार में -&lt;br /&gt;
७.१ जन्मपूर्व और शैशव कालमें अधिजनन शास्त्र के आधारपर मार्गदर्शन। &lt;br /&gt;
७.२ बाल्य काल : कुटुम्ब की शिक्षा के साथ विद्याकेन्द्र शिक्षा का समायोजन 			           &lt;br /&gt;
७.३ यौवन काल: अहंकार, बुद्धि के सही मोड़ हेतु सत्संग, प्रेरणा, वातावरण, ज्ञानार्जन/बलार्जन/कौशलार्जन आदि &lt;br /&gt;
७.४ प्रौढ़ावस्था : पूर्व ज्ञान/आदतों को व्यवस्थित करने के लिए सामाजिक वातावरण और मार्गदर्शन&lt;br /&gt;
७.४.१ पुरोहित&lt;br /&gt;
७.४.२ मेले/यात्राएं&lt;br /&gt;
७.४.३ कीर्तनकार/प्रवचनकार&lt;br /&gt;
७.४.४ धर्माचार्य&lt;br /&gt;
७.४.५ दृक्श्राव्य माध्यम –चित्रपट, दूरदर्शन आदि&lt;br /&gt;
७.४.६ आन्तरजाल&lt;br /&gt;
७.४.७ कानून का डर &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== धर्म निर्णय व्यवस्था ==&lt;br /&gt;
 : सामान्यत: जब भी धर्म की समझसे सम्बन्धित समस्या हो तब धर्म निर्णय की व्यवस्था उपलब्ध होनी चाहिये। इस व्यवस्था के तीन स्तर होना आवश्यक है। पहला स्तर तो स्थानिक धर्म के जानकार, दूसरा जनपदीय या निकटके तीर्थक्षेत्र में धर्मज्ञ परिषद्, और तीसरा स्तर अखिल भारतीय या राष्ट्रीय धर्मज्ञ परिषद्। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== माध्यम ==&lt;br /&gt;
 : धर्म अनुपालन करवाने के मुख्यत: दो प्रकारके माध्यम होते हैं। &lt;br /&gt;
९.१ कुटुम्ब के दायरे में : धर्म शिक्षा का अर्थ है सदाचार की शिक्षा। धर्म की शिक्षा के लिए कुटुम्ब यह सबसे श्रेष्ठ पाठशाला है। विद्याकेन्द्र की शिक्षा तो कुटुम्ब में मिली धर्म शिक्षा की पुष्टि या आवश्यक सुधार के लिए ही होती है। कुटुम्ब में धर्म शिक्षा तीन तरह से होती है। गर्भपूर्व संस्कार, गर्भ संस्कार और शिशु संस्कार और आदतें। मनुष्य की आदतें भी बचपन में ही पक्की हो जातीं हैं। &lt;br /&gt;
९.२ कुटुम्ब से बाहर के माध्यम : मनुष्य तो हर पल सीखता ही रहता है। इसलिए कुटुम्ब से बाहर भी वह कई बातें सीखता है। माध्यमों में मित्र मंडली, विद्यालय, समाज का सांस्कृतिक स्तर और क़ानून व्यवस्था आदि।&lt;br /&gt;
जीवन के भारतीय प्रतिमान की प्रतिष्ठापना की प्रक्रिया से अपेक्षित परिणामों की चर्चा हम [[Form of an Ideal Society (आदर्श समाज का स्वरूप)|अगले]] अध्याय में करेंगे।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[Category:Bhartiya Jeevan Pratiman (भारतीय जीवन प्रतिमान)]]&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Dilipkelkar</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://dharmawiki.org/index.php?title=Responsibilities_at_Societal_Level_(%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%AE%E0%A4%BE%E0%A4%9C%E0%A4%BF%E0%A4%95_%E0%A4%A7%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%AE_%E0%A4%85%E0%A4%A8%E0%A5%81%E0%A4%AA%E0%A4%BE%E0%A4%B2%E0%A4%A8)&amp;diff=119956</id>
		<title>Responsibilities at Societal Level (सामाजिक धर्म अनुपालन)</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://dharmawiki.org/index.php?title=Responsibilities_at_Societal_Level_(%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%AE%E0%A4%BE%E0%A4%9C%E0%A4%BF%E0%A4%95_%E0%A4%A7%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%AE_%E0%A4%85%E0%A4%A8%E0%A5%81%E0%A4%AA%E0%A4%BE%E0%A4%B2%E0%A4%A8)&amp;diff=119956"/>
		<updated>2019-07-21T06:40:51Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Dilipkelkar: /* व्यवस्थाओं के धर्म */ लेख सम्पादित किया&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{One source|date=January 2019}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जीवन के भारतीय प्रतिमान की पुनर्प्रतिष्ठा के लिए राष्ट्र के संगठन की विभिन्न प्रणालियों के स्तर पर उन कर्तव्यों का याने ईकाई धर्म का विचार और प्रत्यक्ष धर्म अनुपालन की प्रक्रिया कैसे चलेगी, ऐसा दो पहलुओं में हम परिवर्तन की प्रक्रिया का विचार करेंगे। वैसे तो धर्म अनुपालन की प्रक्रिया का विचार हमने समाज धारणा शास्त्र के विषय में किया है। फिर भी परिवर्तन प्रक्रिया को यहाँ फिर से दोहराना उपयुक्त होगा।   &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== विभिन्न सामाजिक प्रणालियों के धर्म ==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== कुटुम्ब ===&lt;br /&gt;
कुटुम्ब परिवर्तन का सबसे जड़मूल का माध्यम है। समाज जीवन की वह नींव होता है। वह जितना सशक्त और व्यापक भूमिका का निर्वहन करेगा समाज उतना ही श्रेष्ठ बनेगा। कुटुम्ब में दो प्रकार के काम होते हैं। पहले हैं कुटुम्ब के लिए और दूसरे हैं कुटुम्ब में याने समाज, सृष्टि के लिए। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== कुटुम्ब की – कुटुम्ब के लिए ===&lt;br /&gt;
# क्षमता और योग्यता आधारित कर्तव्य  &lt;br /&gt;
# क्षमता और योग्यता के अनुसार सार्थक योगदान  &lt;br /&gt;
# शुद्ध सस्नेहयुक्त सदाचारयुक्त परस्पर व्यवहार  &lt;br /&gt;
# बड़ों का आदर, सेवा। छोटों के लिए आदर्श और प्यार।  &lt;br /&gt;
# कुटुंबहित अपने हित से ऊपर। कर्त्तव्य परायणता। अपने कर्तव्यों के प्रति आग्रही।  &lt;br /&gt;
# स्वावलंबन / परस्परावलंबन।  &lt;br /&gt;
# कुटुम्ब के सभी काम करना आना और करना।  &lt;br /&gt;
# एकात्मता का विस्तार – कुटुंब&amp;lt; समाज&amp;lt; सृष्टि&amp;lt; विश्व। लेकिन इसकी नींव कुटुंब जीवन में ही पड़ेगी और पक्की होगी।  &lt;br /&gt;
# कौशल, ज्ञान, बल और पुण्य अर्जन की दृष्टी से अध्ययन और संस्कार  &lt;br /&gt;
# कौटुम्बिक कुशलताएँ, आदतें, रीति-रिवाज, परम्पराएँ आदि  &lt;br /&gt;
# कुटुम्ब प्रमुख सर्वोपरि : कुटुम्ब के सब ही सदस्यों को कुटुम्ब प्रमुख बनने की प्रेरणा और इस हेतु से उनके द्वारा अपना विवेक, कौशल, सयानापन, निर्णय क्षमता, अपार स्नेह आदि का विकास। कुटुम्ब प्रमुख की आज्ञाओं का पालन - आज्ञाकारिता।  &lt;br /&gt;
# काया, वाचा, मनसा सभी से मधुर व्यवहार।  &lt;br /&gt;
# अच्छा – बेटा/बेटी, भाई/बहन, पति/पत्नि, पिता/माता, गृहस्थ/गृहिणी, रिश्तेदार आदि बनना/बनाना।  &lt;br /&gt;
# वर्णाश्रम धर्म का पालन – स्वभावज कर्म करते जाना।  &lt;br /&gt;
## सवर्ण/सजातीय विवाह  &lt;br /&gt;
## कौटुम्बिक व्यवसाय में सहभाग  &lt;br /&gt;
## ज्ञान, कौशल, श्रेष्ठ परम्पराओं का निर्वहन, परिष्कार, निर्माण और अगली पीढी को अंतरण  &lt;br /&gt;
## आयु की अवस्था के अनुसार ब्रह्मचर्य, गृहस्थ और वानप्रस्थ आदि आश्रमों के धर्म की जिम्मेदारियों का निर्वहन।  &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== कुटुम्ब में – समाज के लिए ===&lt;br /&gt;
# सामाजिक कर्तव्यों का निर्वहन &lt;br /&gt;
## समाज संगठन की प्रणालियों (कुटुंब, जाति, ग्राम, राष्ट्र) में &lt;br /&gt;
## सामाजिक व्यवस्थाओं (रक्षण, पोषण और शिक्षण) में &lt;br /&gt;
# ज्ञानार्जन, कौशलार्जन, बलार्जन और पुण्यार्जन की मानसिकता और केवल इन के लिए अटन। &lt;br /&gt;
# स्वावलंबन और परस्परावलंबन। &lt;br /&gt;
# शत्रुत्व भाववाले समाज के घटकों के साथ भी शान्ततापूर्ण और सुखी सहजीवन। &lt;br /&gt;
# एकात्मता (समाज और सृष्टि के साथ) का व्यवहार / सुख और दु:ख में सहानुभूति और सहभागिता। &lt;br /&gt;
# विभिन्न क्षेत्रों में - जैसे शासन, न्याय, समृद्धि आदि क्षेत्रों के नेता &amp;gt; आचार्य &amp;gt; धर्म । धर्म सर्वोपरि। &lt;br /&gt;
# सद्गुण, सदाचार, स्वावलंबन, सत्यनिष्ठा, सादगी, सहजता, सौन्दर्यबोध, स्वतंत्रता, संयम, स्वदेशी आदि का व्यवहार साथ ही में त्याग, तपस्या, समाधान, शान्ति, अभय, विजिगीषा आदि गुणों का विकास। &lt;br /&gt;
# मनसा, वाचा कर्मणा ‘सर्वे भवन्तु सुखिन:’ के प्रयास। &lt;br /&gt;
# वर्ण-धर्म की और जाति-धर्म की शिक्षा देना। जब लोग अपने वर्ण के अनुसार आचरण करते हैं, तब राष्ट्र की संस्कृति का विकास और रक्षण होता है। और जब लोग अपने जातिधर्म के अनुसार व्यवसाय करते हैं तब देश समृद्ध बनता है, ओर बना रहता है। &lt;br /&gt;
# धर्माचरणी और समाजभक्त / देशभक्त / राष्ट्रभक्त / परमात्मा में श्रद्धा रखने वालों का निर्माण। &lt;br /&gt;
# धर्मशिक्षा और कर्मशिक्षा। &lt;br /&gt;
# संयमित उपभोग। न्यूनतम (इष्टतम) उपभोग। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== ग्रामकुल ==&lt;br /&gt;
# ग्राम को स्वावलंबी ग्राम बनाना&lt;br /&gt;
# ग्राम की अर्थव्यवस्था को ठीक से बिठाना और चलाना&lt;br /&gt;
# संयुक्त कुटुंबों की प्रतिष्ठापना का वातावरण&lt;br /&gt;
# कौटुम्बिक उद्योगों की प्रतिष्ठापना का वातावरण&lt;br /&gt;
# कुटुम्ब भावना से प्रत्येक व्यक्ति की सम्मानपूर्ण आजीविका की व्यवस्था करना&lt;br /&gt;
# कौटुम्बिक उद्योग और जातियों में समन्वय रखना&lt;br /&gt;
# शासकीय व्यवस्थाओं के प्रति जिम्मेदारियां : कर देना, शिक्षण, पोषण और रक्षण की व्यवस्थाओं में श्रेष्ठ व्यक्तियों का और संसाधनों का योगदान देना&lt;br /&gt;
# ग्राम, एक कुल बने ऐसा वातावरण बनाए रखना।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== गुरुकुल / विद्यालय ==&lt;br /&gt;
# वर्णशिक्षा की व्यवस्था &lt;br /&gt;
# ज्ञानार्जन, कौशलार्जन, बलार्जन के लिए मार्गदर्शन &lt;br /&gt;
# शास्त्रीय शिक्षा का प्रावधान &lt;br /&gt;
# श्रेष्ठ परम्पराओं के निर्माण की शिक्षा &lt;br /&gt;
# जीवन के तत्त्वज्ञान और व्यवहार की शिक्षा &lt;br /&gt;
# जीवन के लिए महत्वपूर्ण सामाजिक संगठन प्रणालियाँ और व्यवस्थाओं की समझ और यथाशक्ति योगदान की प्रेरणा। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== कौशल विधा पंचायत ==&lt;br /&gt;
# समाज की किसी एक आवश्यकता की पूर्ति करना। कभी कोई कमी न हो यह सुनिश्चित करना। &lt;br /&gt;
# धर्म के मार्गदर्शन में अपने कौशल विधा-धर्म का निर्धारण और कौशल विधा प्रणाली में प्रचार प्रसार &lt;br /&gt;
# अन्य कौशल विधाओं के साथ समन्वय &lt;br /&gt;
# राष्ट्र सर्वोपरि यह भावना सदा जाग्रत रखना &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== व्यवस्थाओं के धर्म ==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== धर्म व्यवस्था ===&lt;br /&gt;
यह कोई नियमित व्यवस्था नहीं होती। यह जाग्रत, नि:स्वार्थी, सर्वभूतहित में सदैव प्रयासरत रहनेवाले पंडितों का समूह होता है। यह समूह सक्रिय होने से समाज ठीक चलता है। आवश्यकतानुसार इस समूह की जिम्मेदारियां बढ़ जातीं है। ऐसे आपद्धर्म के निर्वहन के लिए भी यह समूह पर्याप्त सामर्थ्यवान हो। &lt;br /&gt;
# कालानुरूप धर्म को व्याख्यायित करना। &lt;br /&gt;
# वर्णों के ‘स्व’धर्मों का पालन करने की व्यवस्था की पस्तुति कर शिक्षा और शासन की मदद से समाज में उन्हें स्थापित करना। व्यक्तिगत और सामाजिक धर्म/संस्कृति के अनुसार व्यवहार का वातावरण बनाना। जब वर्ण-धर्म का पालन लोग करते हैं तब देश में संस्कृति का विकास और रक्षण होता है। जिनकी ओर देखकर लोग वर्ण धर्म का पालन कर सकें ऐसे ‘श्रेष्ठ’ लोगों का निर्माण करना। &lt;br /&gt;
# स्वाभाविक, शासनिक और आर्थिक ऐसी सभी प्रकार की स्वतन्त्रता की रक्षा करना। &lt;br /&gt;
# शासन पर अपने ज्ञान, त्याग, तपस्या, लोकसंग्रह तथा सदैव लोकहित के चिंतन के माध्यम से नैतिक दबाव निर्माण करना। शासन को सदाचारी, कुशल और सामर्थ्य संपन्न बनाए रखने के लिए मार्गदर्शन करना। अधर्माचरणी शासन को हटाकर धर्माचरणी शासन को प्रतिष्ठित करना। &lt;br /&gt;
# लोकशिक्षा (कुटुम्ब शिक्षा इसी का हिस्सा है) और विद्यालयीन शिक्षा की प्रभावी व्यवस्था करना। जैसे लिखा पढी न्यूनतम करने की दिशा में बढ़ना। वाणी / शब्द की प्रतिष्ठा बढ़ाना। जीवन को साधन सापेक्षता से साधना सापेक्षता की ओर ले जाने के लिए अपनी कथनी और करनी से मार्गदर्शन करना। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== शासन व्यवस्था ===&lt;br /&gt;
# अंतर्बाह्य शत्रुओं से लोगों की शासनिक स्वतन्त्रता की रक्षा करना।  &lt;br /&gt;
# धर्म के दायरे में रहकर दुष्टों और मूर्खों को नियंत्रण में रखना।  &lt;br /&gt;
# दंड व्यवस्था के अंतर्गत न्याय व्यवस्था का निर्माण करना। किसी पर अन्याय हो ही नहीं, ऐसी दंड व्यवस्था के निर्माण का प्रयास करना।  &lt;br /&gt;
# श्रेष्ठ शासक परम्परा निर्माण करना।  &lt;br /&gt;
# प्रभावी, समाजहित की शिक्षा देनेवाले शिक्षा केन्द्रों को संरक्षण, समर्थन और सहायता देकर और प्रभावी बनाने के लिए यथाशक्ति प्रयास करना। ऐसा करने से शासन का काम काफी सरल हो जाता है।  &lt;br /&gt;
# धर्म व्यवस्था से समय समय पर मार्गदर्शन प्राप्त करते रहना।  &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== समृद्धि व्यवस्था ===&lt;br /&gt;
# योग्य शिक्षा के द्वारा समाज में धर्म के अविरोधी इच्छाओं का ही विकास हो यह सुनिश्चित करना।&lt;br /&gt;
# समाज के प्रत्येक घटक की सभी आवश्यकताओं की पूर्ति करना, धर्म विरोधी इच्छाओं की नहीं। समाज की आर्थिक स्वतन्त्रता को अबाधित रखना।&lt;br /&gt;
# प्राकृतिक संसाधनों का न्यूनतम उपयोग हो ऐसा वातावरण बनाना। संयमित उपभोग को प्रतिष्ठित करना।&lt;br /&gt;
# प्रकृति का प्रदूषण नहीं होने देना। प्रकृति का सन्तुलन बनाए रखना।&lt;br /&gt;
# कौटुम्बिक उद्योग, जातियाँ और ग्राम मिलकर समृद्धि निर्माण होती है। ये तीनों ईकाईयाँ फलेफूले और इनका स्वस्थ ऐसा तानाबाना बना रहे ऐसा वातावरण रहे।&lt;br /&gt;
# पैसे का विनिमय न्यूनतम रहे ऐसी व्यवस्था निर्माण करना।&lt;br /&gt;
अब हम धर्म के अनुपालन की प्रक्रिया का विचार आगे करेंगे।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== धर्म अनुपालन की प्रक्रिया ==&lt;br /&gt;
हमने जाना है कि समाज के सुख, शांति, स्वतंत्रता, सुसंस्कृतता के लिए समाज का धर्मनिष्ठ होना आवश्यक होता है। यहाँ मोटे तौर पर धर्म का मतलब कर्तव्य से है। समाज धारणा के लिए कर्तव्यों पर आधारित जीवन अनिवार्य होता है। समाज धारणा के लिए धर्म-युक्त व्यवहार में आनेवाली जटिलताओं को और उसके अनुपालन की प्रक्रिया को समझने का प्रयास करेंगे। इन में व्यक्तिगत स्तर की बातों का हमने [[Personal Responsibilities (व्यक्तिगत धर्म अनुपालन)|पूर्व के अध्याय]] में विचार किया है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== विभिन्न ईकाईयों के स्तर पर ===&lt;br /&gt;
१.१ कुटुम्ब : समाज की सभी इकाइयों के विभिन्न स्तरोंपर उचित भूमिका निभानेवाले श्रेष्ठ मानव का निर्माण करना। कौटुम्बिक व्यवसाय के माध्यम से समाज की किसी आवश्यकता की पूर्ति करना। &lt;br /&gt;
१.२ ग्राम : ग्राम की भूमिका छोटे विश्व और बड़े कुटुम्ब की तरह ही होती है। जिस तरह कुटुम्ब के सदस्यों में आपस में पैसे का लेनदेन नहीं होता उसी तरह अच्छे ग्राम में कुटुम्बों में आपस में पैसे का लेनदेन नहीं होता। प्रत्येक की सम्मान और स्वतन्त्रता के साथ अन्न, वस्त्र, भवन, शिक्षा, आजीविका, सुरक्षा आदि सभी आवश्यकताओं की पूर्ति होती है।&lt;br /&gt;
१.३ कौशल विधा : समाज जीवन की आवश्यकताओं की हर विधा के अनुसार व्यवसाय विधा समूह बनते हैं। इन समूहों के भी सामान्य व्यक्ति से लेकर विश्व के स्तरतक के लिए करणीय और अकरणीय कार्य होते हैं। कर्तव्य होते हैं। इन्हें व्यवसाय विधा धर्म कहेंगे। इनमें पदार्थ के उत्पादन के रूप में आर्थिक स्वतन्त्रता के किसी एक पहलू की रक्षा में योगदान करना होता है।  शिक्षा/संस्कार, वस्तुएं, भावनाएं, विचार, कला आदि में से समाज जीवन की आवश्यकता में से किसी एक विधा के पदार्थ की निरंतर आपूर्ति करना। पदार्थ का अर्थ केवल वस्तु नहीं है। जिस पद याने शब्द का अर्थ होता है वह पदार्थ कहलाता है। व्यावसायिक समूह का काम कौशल का विकास करना, कौशल का पीढ़ी दर पीढ़ी अंतरण करना और अन्य व्यवसायिक समूहों से समन्वय रखना आदि है।&lt;br /&gt;
१.४ भाषिक समूह : भाषा का मुख्य उपयोग परस्पर संवाद है। संवाद विचारों की सटीक अभिव्यक्ति   करनेवाला हो इस हेतु से भाषाएँ बनतीं हैं। संवाद में सहजता, सरलता, सुगमता से आत्मीयता बढ़ती है। इसी हेतु से भाषिक समूह बनते हैं। &lt;br /&gt;
१.५ प्रादेशिक समूह:शासनिक और व्यवस्थात्मक सुविधा की दृष्टि से प्रादेशिक स्तरका महत्त्व होता है।  &lt;br /&gt;
१.६ राष्ट्र:राष्ट्र अपने समाज के लिये विविध प्रकारके संगठनों का और व्यवस्थाओं का निर्माण करता है। &lt;br /&gt;
१.७ विश्व:पूर्व में बताई हुई १.१ से लेकर १.६ तक की सभी इकाइयां वैश्विक हित की अविरोधी रहें।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== प्रकृति सुसंगतता ===&lt;br /&gt;
समाज जीवन में केन्द्रिकरण और विकेंद्रीकरण का समन्वय हो यह आवश्यक है। विशाल उद्योग, बाजार की मंडियां, शासकीय कार्यालय, व्यावसायिक, भाषिक, प्रादेशिक समूहों के समन्वय की व्यवस्थाएं आदि के लिये शहरों की आवश्यकता होती है। लेकिन इनमें अनावश्यक केन्द्रीकरण न हो पाए। वनवासी या गिरिजन भी ग्राम व्यवस्था से ही जुड़े हुए होने चाहिए। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== प्रक्रियाएं ===&lt;br /&gt;
 : धर्म के अनुपालन में बुद्धि के स्तरपर धर्म के प्रति पर्याप्त संज्ञान, मन के स्तरपर कौटुम्बिक भावना, अनुशासन और श्रद्धा (आज्ञाकारिता) का विकास तथा शारीरिक स्तरपर सहकारिता और परोपकार की आदतें अत्यंत आवश्यक हैं। &lt;br /&gt;
३.१ धर्म संज्ञान : ‘समझना’ यह बुद्धि का काम होता है। इसलिए जब बच्चे का बुद्धि का अंग विकसित हो रहा होता है उसे धर्म की बौद्धिक याने तर्क तथा कर्मसिद्धांत के आधारपर शिक्षा देना उचित होता है। इस दृष्टि से तर्कशास्त्र की समझ या सरल शब्दों में ‘किसी भी बात के करने से पहले चराचर के हित में उस बात को कैसे करना चाहिए’ इसे समझने की क्षमता का विकास आवश्यक होता है।&lt;br /&gt;
३.२ कौटुम्बिक भावना का विकास : समाज के सभी परस्पर संबंधों में कौटुम्बिक भावना से व्यवहार का आधार धर्मसंज्ञान ही तो होता है। मन को बुद्धि के नियंत्रण में रखना ही मन की शिक्षा होती है। दुर्योधन के निम्न कथन से सब परिचित हैं। 		&lt;br /&gt;
जानामी धर्मं न च में प्रवृत्ति: ।   जानाम्यधर्मं न च में निवृत्ति: ।।&lt;br /&gt;
३.३ धर्माचरण की आदतें: दुर्योधन के उपर्युक्त कथन को ध्यान में रखकर ही गर्भधारणा से ही बच्चे को धर्माचरण की आदतों की शिक्षा देना महत्त्वपूर्ण बन जाता है। आदत का अर्थ है जिस बात के करने में कठिनाई का अनुभव नहीं होता। जब किसी बात के बारबार करने से आचरण में यह सहजता आती है तब वह आदत बन जाती है। और जब उसे बुद्धिका अधिष्ठान मिल जाता है तब वह आदतें मनुष्य का स्वभाव ही बन जातीं हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== धर्म के अनुपालन के स्तर और साधन ===&lt;br /&gt;
 : &lt;br /&gt;
४.१ धर्म के अनुपालन करनेवालों के राष्ट्रभक्त, अराष्ट्रीय और राष्ट्रद्रोही ऐसे मोटे-मोटे तीन स्तर होते हैं। &lt;br /&gt;
४.२ धर्म के अनुपालन के साधन : धर्म का अनुपालन पूर्व में बताए अनुसार शिक्षा, आदेश, प्रायश्चित्त/	पश्चात्ताप 	तथा दंड ऐसा चार प्रकार से होता है। शासन दुर्बल होने से समाज में प्रमाद करनेवालों की संख्या में वृद्धि 	होती है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== धर्म के अनुपालन के अवरोध ===&lt;br /&gt;
 : धर्म के अनुपालन में निम्न बातें अवरोध-रूप होतीं हैं।&lt;br /&gt;
५.१ भिन्न जीवनदृष्टि के लोग : शीघ्रातिशीघ्र भिन्न जीवनदृष्टि के लोगों को आत्मसात करना आवश्यक होता 	है। अन्यथा समाज जीवन अस्थिर और संघर्षमय बन जाता है।&lt;br /&gt;
५.२ स्वार्थ/संकुचित अस्मिताएँ :आवश्यकताओं की पुर्ति तक तो स्वार्थ भावना समर्थनीय है। अस्मिता या 	अहंकार यह प्रत्येक जिवंत ईकाई का एक स्वाभाविक पहलू होता है। किन्तु जब किसी ईकाई के विशिष्ट स्तर की यह अस्मिता अपने से ऊपर की ईकाई जिसका वह हिस्सा है, उसकी अस्मिता से बड़ी लगने लगती है तब समाज जीवन की शांति नष्ट हो जाती है। इसलिए यह आवश्यक है की मजहब, रिलिजन,प्रादेशिक अलगता, भाषिक भिन्नता, धनका अहंकार, बौद्धिक श्रेष्ठता आदि जैसी संकुचित अस्मिताएँ अपने से ऊपर की जीवंत ईकाई की अस्मिता के विरोध में नहीं हो। &lt;br /&gt;
५.३ विपरीत शिक्षा : विपरीत या दोषपूर्ण शिक्षा यह तो सभी समस्याओं की जड़ होती है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== कारक तत्त्व ===&lt;br /&gt;
 : कारक तत्वों से मतलब है धर्मपालन में सहायता देनेवाले घटक। ये निम्न होते हैं।&lt;br /&gt;
६.१ धर्म व्यवस्था : शासन धर्मनिष्ठ रहे यह सुनिश्चित करना धर्म व्यवस्था की जिम्मेदारी है। अपने त्याग, तपस्या, ज्ञान, लोकसंग्रह, चराचर के हित का चिन्तन, समर्पण भाव और कार्यकुशलता के आधारपर 	समाज से प्राप्त समर्थन प्राप्त कर वह देखे की कोई अयोग्य व्यक्ति शासक नहीं बनें।&lt;br /&gt;
६.२ शिक्षा : ६.२.१ कुटुम्ब शिक्षा 	६.२.२ विद्याकेन्द्र की शिक्षा 	६.२.३ लोकशिक्षा &lt;br /&gt;
६.३ धर्मनिष्ठ शासन : शासक का धर्मशास्त्र का जानकार होना और स्वयं धर्माचरणी होना भी आवश्यक होता है। जब शासन धर्म के अनुसार चलता है, धर्म व्यवस्थाद्वारा नियमित निर्देशित होता है तब धर्म भी 	स्थापित होता है और राज्य व्यवस्था भी श्रेष्ठ बनती है।&lt;br /&gt;
६.४ धर्मनिष्ठों का सामाजिक नेतृत्व : समाज जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में धर्मनिष्ठ लोग जब अच्छी संख्या में दिखाई देते हैं तब समाज मानस धर्मनिष्ठ बनता है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== चरण ==&lt;br /&gt;
धर्म का अनुपालन जब लोग स्वेच्छा से करनेवाले समाज के निर्माण के लिए दो बातें अत्यंत महत्वपूर्ण होतीं हैं। एक गर्भ में श्रेष्ठ जीवात्मा की स्थापना और दूसरे शिक्षा और संस्कार।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शिक्षा और संस्कार में -&lt;br /&gt;
७.१ जन्मपूर्व और शैशव कालमें अधिजनन शास्त्र के आधारपर मार्गदर्शन। &lt;br /&gt;
७.२ बाल्य काल : कुटुम्ब की शिक्षा के साथ विद्याकेन्द्र शिक्षा का समायोजन 			           &lt;br /&gt;
७.३ यौवन काल: अहंकार, बुद्धि के सही मोड़ हेतु सत्संग, प्रेरणा, वातावरण, ज्ञानार्जन/बलार्जन/कौशलार्जन आदि &lt;br /&gt;
७.४ प्रौढ़ावस्था : पूर्व ज्ञान/आदतों को व्यवस्थित करने के लिए सामाजिक वातावरण और मार्गदर्शन&lt;br /&gt;
७.४.१ पुरोहित&lt;br /&gt;
७.४.२ मेले/यात्राएं&lt;br /&gt;
७.४.३ कीर्तनकार/प्रवचनकार&lt;br /&gt;
७.४.४ धर्माचार्य&lt;br /&gt;
७.४.५ दृक्श्राव्य माध्यम –चित्रपट, दूरदर्शन आदि&lt;br /&gt;
७.४.६ आन्तरजाल&lt;br /&gt;
७.४.७ कानून का डर &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== धर्म निर्णय व्यवस्था ==&lt;br /&gt;
 : सामान्यत: जब भी धर्म की समझसे सम्बन्धित समस्या हो तब धर्म निर्णय की व्यवस्था उपलब्ध होनी चाहिये। इस व्यवस्था के तीन स्तर होना आवश्यक है। पहला स्तर तो स्थानिक धर्म के जानकार, दूसरा जनपदीय या निकटके तीर्थक्षेत्र में धर्मज्ञ परिषद्, और तीसरा स्तर अखिल भारतीय या राष्ट्रीय धर्मज्ञ परिषद्। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== माध्यम ==&lt;br /&gt;
 : धर्म अनुपालन करवाने के मुख्यत: दो प्रकारके माध्यम होते हैं। &lt;br /&gt;
९.१ कुटुम्ब के दायरे में : धर्म शिक्षा का अर्थ है सदाचार की शिक्षा। धर्म की शिक्षा के लिए कुटुम्ब यह सबसे श्रेष्ठ पाठशाला है। विद्याकेन्द्र की शिक्षा तो कुटुम्ब में मिली धर्म शिक्षा की पुष्टि या आवश्यक सुधार के लिए ही होती है। कुटुम्ब में धर्म शिक्षा तीन तरह से होती है। गर्भपूर्व संस्कार, गर्भ संस्कार और शिशु संस्कार और आदतें। मनुष्य की आदतें भी बचपन में ही पक्की हो जातीं हैं। &lt;br /&gt;
९.२ कुटुम्ब से बाहर के माध्यम : मनुष्य तो हर पल सीखता ही रहता है। इसलिए कुटुम्ब से बाहर भी वह कई बातें सीखता है। माध्यमों में मित्र मंडली, विद्यालय, समाज का सांस्कृतिक स्तर और क़ानून व्यवस्था आदि।&lt;br /&gt;
जीवन के भारतीय प्रतिमान की प्रतिष्ठापना की प्रक्रिया से अपेक्षित परिणामों की चर्चा हम [[Form of an Ideal Society (आदर्श समाज का स्वरूप)|अगले]] अध्याय में करेंगे।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[Category:Bhartiya Jeevan Pratiman (भारतीय जीवन प्रतिमान)]]&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Dilipkelkar</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://dharmawiki.org/index.php?title=Responsibilities_at_Societal_Level_(%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%AE%E0%A4%BE%E0%A4%9C%E0%A4%BF%E0%A4%95_%E0%A4%A7%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%AE_%E0%A4%85%E0%A4%A8%E0%A5%81%E0%A4%AA%E0%A4%BE%E0%A4%B2%E0%A4%A8)&amp;diff=119955</id>
		<title>Responsibilities at Societal Level (सामाजिक धर्म अनुपालन)</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://dharmawiki.org/index.php?title=Responsibilities_at_Societal_Level_(%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%AE%E0%A4%BE%E0%A4%9C%E0%A4%BF%E0%A4%95_%E0%A4%A7%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%AE_%E0%A4%85%E0%A4%A8%E0%A5%81%E0%A4%AA%E0%A4%BE%E0%A4%B2%E0%A4%A8)&amp;diff=119955"/>
		<updated>2019-07-21T06:35:31Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Dilipkelkar: /* विभिन्न सामाजिक प्रणालियों के धर्म */ लेख सम्पादित किया&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{One source|date=January 2019}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जीवन के भारतीय प्रतिमान की पुनर्प्रतिष्ठा के लिए राष्ट्र के संगठन की विभिन्न प्रणालियों के स्तर पर उन कर्तव्यों का याने ईकाई धर्म का विचार और प्रत्यक्ष धर्म अनुपालन की प्रक्रिया कैसे चलेगी, ऐसा दो पहलुओं में हम परिवर्तन की प्रक्रिया का विचार करेंगे। वैसे तो धर्म अनुपालन की प्रक्रिया का विचार हमने समाज धारणा शास्त्र के विषय में किया है। फिर भी परिवर्तन प्रक्रिया को यहाँ फिर से दोहराना उपयुक्त होगा।   &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== विभिन्न सामाजिक प्रणालियों के धर्म ==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== कुटुम्ब ===&lt;br /&gt;
कुटुम्ब परिवर्तन का सबसे जड़मूल का माध्यम है। समाज जीवन की वह नींव होता है। वह जितना सशक्त और व्यापक भूमिका का निर्वहन करेगा समाज उतना ही श्रेष्ठ बनेगा। कुटुम्ब में दो प्रकार के काम होते हैं। पहले हैं कुटुम्ब के लिए और दूसरे हैं कुटुम्ब में याने समाज, सृष्टि के लिए। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== कुटुम्ब की – कुटुम्ब के लिए ===&lt;br /&gt;
# क्षमता और योग्यता आधारित कर्तव्य  &lt;br /&gt;
# क्षमता और योग्यता के अनुसार सार्थक योगदान  &lt;br /&gt;
# शुद्ध सस्नेहयुक्त सदाचारयुक्त परस्पर व्यवहार  &lt;br /&gt;
# बड़ों का आदर, सेवा। छोटों के लिए आदर्श और प्यार।  &lt;br /&gt;
# कुटुंबहित अपने हित से ऊपर। कर्त्तव्य परायणता। अपने कर्तव्यों के प्रति आग्रही।  &lt;br /&gt;
# स्वावलंबन / परस्परावलंबन।  &lt;br /&gt;
# कुटुम्ब के सभी काम करना आना और करना।  &lt;br /&gt;
# एकात्मता का विस्तार – कुटुंब&amp;lt; समाज&amp;lt; सृष्टि&amp;lt; विश्व। लेकिन इसकी नींव कुटुंब जीवन में ही पड़ेगी और पक्की होगी।  &lt;br /&gt;
# कौशल, ज्ञान, बल और पुण्य अर्जन की दृष्टी से अध्ययन और संस्कार  &lt;br /&gt;
# कौटुम्बिक कुशलताएँ, आदतें, रीति-रिवाज, परम्पराएँ आदि  &lt;br /&gt;
# कुटुम्ब प्रमुख सर्वोपरि : कुटुम्ब के सब ही सदस्यों को कुटुम्ब प्रमुख बनने की प्रेरणा और इस हेतु से उनके द्वारा अपना विवेक, कौशल, सयानापन, निर्णय क्षमता, अपार स्नेह आदि का विकास। कुटुम्ब प्रमुख की आज्ञाओं का पालन - आज्ञाकारिता।  &lt;br /&gt;
# काया, वाचा, मनसा सभी से मधुर व्यवहार।  &lt;br /&gt;
# अच्छा – बेटा/बेटी, भाई/बहन, पति/पत्नि, पिता/माता, गृहस्थ/गृहिणी, रिश्तेदार आदि बनना/बनाना।  &lt;br /&gt;
# वर्णाश्रम धर्म का पालन – स्वभावज कर्म करते जाना।  &lt;br /&gt;
## सवर्ण/सजातीय विवाह  &lt;br /&gt;
## कौटुम्बिक व्यवसाय में सहभाग  &lt;br /&gt;
## ज्ञान, कौशल, श्रेष्ठ परम्पराओं का निर्वहन, परिष्कार, निर्माण और अगली पीढी को अंतरण  &lt;br /&gt;
## आयु की अवस्था के अनुसार ब्रह्मचर्य, गृहस्थ और वानप्रस्थ आदि आश्रमों के धर्म की जिम्मेदारियों का निर्वहन।  &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== कुटुम्ब में – समाज के लिए ===&lt;br /&gt;
# सामाजिक कर्तव्यों का निर्वहन &lt;br /&gt;
## समाज संगठन की प्रणालियों (कुटुंब, जाति, ग्राम, राष्ट्र) में &lt;br /&gt;
## सामाजिक व्यवस्थाओं (रक्षण, पोषण और शिक्षण) में &lt;br /&gt;
# ज्ञानार्जन, कौशलार्जन, बलार्जन और पुण्यार्जन की मानसिकता और केवल इन के लिए अटन। &lt;br /&gt;
# स्वावलंबन और परस्परावलंबन। &lt;br /&gt;
# शत्रुत्व भाववाले समाज के घटकों के साथ भी शान्ततापूर्ण और सुखी सहजीवन। &lt;br /&gt;
# एकात्मता (समाज और सृष्टि के साथ) का व्यवहार / सुख और दु:ख में सहानुभूति और सहभागिता। &lt;br /&gt;
# विभिन्न क्षेत्रों में - जैसे शासन, न्याय, समृद्धि आदि क्षेत्रों के नेता &amp;gt; आचार्य &amp;gt; धर्म । धर्म सर्वोपरि। &lt;br /&gt;
# सद्गुण, सदाचार, स्वावलंबन, सत्यनिष्ठा, सादगी, सहजता, सौन्दर्यबोध, स्वतंत्रता, संयम, स्वदेशी आदि का व्यवहार साथ ही में त्याग, तपस्या, समाधान, शान्ति, अभय, विजिगीषा आदि गुणों का विकास। &lt;br /&gt;
# मनसा, वाचा कर्मणा ‘सर्वे भवन्तु सुखिन:’ के प्रयास। &lt;br /&gt;
# वर्ण-धर्म की और जाति-धर्म की शिक्षा देना। जब लोग अपने वर्ण के अनुसार आचरण करते हैं, तब राष्ट्र की संस्कृति का विकास और रक्षण होता है। और जब लोग अपने जातिधर्म के अनुसार व्यवसाय करते हैं तब देश समृद्ध बनता है, ओर बना रहता है। &lt;br /&gt;
# धर्माचरणी और समाजभक्त / देशभक्त / राष्ट्रभक्त / परमात्मा में श्रद्धा रखने वालों का निर्माण। &lt;br /&gt;
# धर्मशिक्षा और कर्मशिक्षा। &lt;br /&gt;
# संयमित उपभोग। न्यूनतम (इष्टतम) उपभोग। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== ग्रामकुल ==&lt;br /&gt;
# ग्राम को स्वावलंबी ग्राम बनाना&lt;br /&gt;
# ग्राम की अर्थव्यवस्था को ठीक से बिठाना और चलाना&lt;br /&gt;
# संयुक्त कुटुंबों की प्रतिष्ठापना का वातावरण&lt;br /&gt;
# कौटुम्बिक उद्योगों की प्रतिष्ठापना का वातावरण&lt;br /&gt;
# कुटुम्ब भावना से प्रत्येक व्यक्ति की सम्मानपूर्ण आजीविका की व्यवस्था करना&lt;br /&gt;
# कौटुम्बिक उद्योग और जातियों में समन्वय रखना&lt;br /&gt;
# शासकीय व्यवस्थाओं के प्रति जिम्मेदारियां : कर देना, शिक्षण, पोषण और रक्षण की व्यवस्थाओं में श्रेष्ठ व्यक्तियों का और संसाधनों का योगदान देना&lt;br /&gt;
# ग्राम, एक कुल बने ऐसा वातावरण बनाए रखना।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== गुरुकुल / विद्यालय ==&lt;br /&gt;
# वर्णशिक्षा की व्यवस्था &lt;br /&gt;
# ज्ञानार्जन, कौशलार्जन, बलार्जन के लिए मार्गदर्शन &lt;br /&gt;
# शास्त्रीय शिक्षा का प्रावधान &lt;br /&gt;
# श्रेष्ठ परम्पराओं के निर्माण की शिक्षा &lt;br /&gt;
# जीवन के तत्त्वज्ञान और व्यवहार की शिक्षा &lt;br /&gt;
# जीवन के लिए महत्वपूर्ण सामाजिक संगठन प्रणालियाँ और व्यवस्थाओं की समझ और यथाशक्ति योगदान की प्रेरणा। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== कौशल विधा पंचायत ==&lt;br /&gt;
# समाज की किसी एक आवश्यकता की पूर्ति करना। कभी कोई कमी न हो यह सुनिश्चित करना। &lt;br /&gt;
# धर्म के मार्गदर्शन में अपने कौशल विधा-धर्म का निर्धारण और कौशल विधा प्रणाली में प्रचार प्रसार &lt;br /&gt;
# अन्य कौशल विधाओं के साथ समन्वय &lt;br /&gt;
# राष्ट्र सर्वोपरि यह भावना सदा जाग्रत रखना &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== व्यवस्थाओं के धर्म ==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== धर्म व्यवस्था ===&lt;br /&gt;
यह कोई नियमित व्यवस्था नहीं होती। यह जाग्रत, नि:स्वार्थी, सर्वभूतहित में सदैव प्रयासरत रहनेवाले पंडितों का समूह होता है। यह समूह सक्रीय होने से समाज ठीक चलता है। आवश्यकतानुसार इस समूह की जिम्मेदारियां बढ़ जातीं है। ऐसे आपद्धर्म के निर्वहन के लिए भी यह समूह पर्याप्त सामर्थ्यवान हो।  &lt;br /&gt;
१. कालानुरूप धर्म को व्याख्यायित करना। &lt;br /&gt;
२. वर्णों के ‘स्व’धर्मों का पालन करने की व्यवस्था की पस्तुति कर शिक्षा और शासन की मददसे समाज में उन्हें स्थापित करना। व्यक्तिगत और सामाजिक धर्म/संस्कृति के अनुसार व्यवहार का वातावरण बनाना। जब वर्ण-धर्मं का पालन लोग करते हैं तब देश में संस्कृति का विकास और रक्षण होता है। जिनकी ओर देखकर लोग वर्ण धर्म का पालन कर सकें ऐसे ‘श्रेष्ठ’ लोगों का निर्माण करना। &lt;br /&gt;
३. स्वाभाविक, शासनिक और आर्थिक ऐसी सभी प्रकार की स्वतन्त्रता की रक्षा करना। &lt;br /&gt;
४. शासनपर अपने ज्ञान, त्याग, तपस्या, लोकसंग्रह तथा सदैव लोकहित के चिंतन के माध्यम से नैतिक दबाव निर्माण करना। शासन को सदाचारी, कुशल और सामर्थ्य संपन्न बनाए रखने के लिए मार्गदर्शन करना। अधर्माचरणी शासन को हटाकर धर्माचरणी शासन को प्रतिष्ठित करना।&lt;br /&gt;
५. लोकशिक्षा (कुटुम्ब शिक्षा इसी का हिस्सा है) और विद्यालयीन शिक्षा की प्रभावी व्यवस्था करना। जैसे लिखा पढी न्यूनतम करने की दिशा में बढ़ना। वाणी/शब्द की प्रतिष्ठा बढ़ाना। जीवन को साधन सापेक्षता से साधना  सापेक्षता की ओर ले जाने के लिए अपनी कथनी और करनी से मार्गदर्शन करना। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== शासन व्यवस्था ===&lt;br /&gt;
१. अंतर्बाह्य शत्रुओं से लोगों की शासनिक स्वतन्त्रता की रक्षा करना। &lt;br /&gt;
२. धर्मं के दायरे में रहकर दुष्टों और मूर्खों को नियंत्रण में रखना। &lt;br /&gt;
३. दंड व्यवस्था के अंतर्गत न्याय व्यवस्था का निर्माण करना। किसी पर अन्याय हो ही नहीं ऐसी दंड व्यवस्था के निर्माण का प्रयास करना। &lt;br /&gt;
४. श्रेष्ठ शासक परम्परा निर्माण करना।&lt;br /&gt;
५. प्रभावी, समाजहित की शिक्षा देनेवाले शिक्षा केन्द्रों को संरक्षण, समर्थन और सहायता देकर और प्रभावी बनाने के लिए यथाशक्ति प्रयास करना। ऐसा करने से शासन का काम काफी सरल हो जाता है। &lt;br /&gt;
६. धर्मं व्यवस्था से समय समयपर मार्गदर्शन प्राप्त करते रहना।  &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== समृद्धि व्यवस्था ===&lt;br /&gt;
१. योग्य शिक्षा के द्वारा समाज में धर्म के अविरोधी इच्छाओं का ही विकास हो यह सुनिश्चित करना। &lt;br /&gt;
२. समाज के प्रत्येक घटक की सभी आवश्यकताओं की पूर्ति करना, धर्म विरोधी इच्छाओं की नहीं। समाज की आर्थिक स्वतन्त्रता को अबाधित रखना। &lt;br /&gt;
३. प्राकृतिक संसाधनों का न्यूनतम उपयोग हो ऐसा वातावरण बनाना। संयमित उपभोग को प्रतिष्ठित करना। &lt;br /&gt;
४. प्रकृति का प्रदूषण नहीं होने देना। प्रकृति का सन्तुलन बनाए रखना। &lt;br /&gt;
५. कौटुम्बिक उद्योग, जातियाँ और ग्राम मिलकर समृद्धि निर्माण होती है। ये तीनों ईकाईयाँ फलेफूले और इनका स्वस्थ ऐसा तानाबाना बना रहे ऐसा वातावरण रहे।&lt;br /&gt;
६. पैसे का विनिमय न्यूनतम रहे ऐसी व्यवस्था निर्माण करना।&lt;br /&gt;
अब हम धर्म के अनुपालन की प्रक्रिया का विचार आगे करेंगे।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== धर्म अनुपालन की प्रक्रिया ==&lt;br /&gt;
हमने जाना है कि समाज के सुख, शांति, स्वतंत्रता, सुसंस्कृतता के लिए समाज का धर्मनिष्ठ होना आवश्यक होता है। यहाँ मोटे तौरपर धर्म से मतलब कर्तव्य से है। समाज धारणा के लिए कर्तव्योंपर आधारित जीवन अनिवार्य होता है। समाज धारणा के लिए धर्म-युक्त व्यवहार में आनेवाली जटिलताओं को और उसके अनुपालन की प्रक्रिया को समझने का प्रयास करेंगे। इन में व्यक्तिगत स्तर की बातों का हमने पूर्व के अध्याय में विचार किया है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== विभिन्न ईकाईयों के स्तरपर ===&lt;br /&gt;
१.१ कुटुम्ब : समाज की सभी इकाइयों के विभिन्न स्तरोंपर उचित भूमिका निभानेवाले श्रेष्ठ मानव का निर्माण करना। कौटुम्बिक व्यवसाय के माध्यम से समाज की किसी आवश्यकता की पूर्ति करना। &lt;br /&gt;
१.२ ग्राम : ग्राम की भूमिका छोटे विश्व और बड़े कुटुम्ब की तरह ही होती है। जिस तरह कुटुम्ब के सदस्यों में आपस में पैसे का लेनदेन नहीं होता उसी तरह अच्छे ग्राम में कुटुम्बों में आपस में पैसे का लेनदेन नहीं होता। प्रत्येक की सम्मान और स्वतन्त्रता के साथ अन्न, वस्त्र, भवन, शिक्षा, आजीविका, सुरक्षा आदि सभी आवश्यकताओं की पूर्ति होती है।&lt;br /&gt;
१.३ कौशल विधा : समाज जीवन की आवश्यकताओं की हर विधा के अनुसार व्यवसाय विधा समूह बनते हैं। इन समूहों के भी सामान्य व्यक्ति से लेकर विश्व के स्तरतक के लिए करणीय और अकरणीय कार्य होते हैं। कर्तव्य होते हैं। इन्हें व्यवसाय विधा धर्म कहेंगे। इनमें पदार्थ के उत्पादन के रूप में आर्थिक स्वतन्त्रता के किसी एक पहलू की रक्षा में योगदान करना होता है।  शिक्षा/संस्कार, वस्तुएं, भावनाएं, विचार, कला आदि में से समाज जीवन की आवश्यकता में से किसी एक विधा के पदार्थ की निरंतर आपूर्ति करना। पदार्थ का अर्थ केवल वस्तु नहीं है। जिस पद याने शब्द का अर्थ होता है वह पदार्थ कहलाता है। व्यावसायिक समूह का काम कौशल का विकास करना, कौशल का पीढ़ी दर पीढ़ी अंतरण करना और अन्य व्यवसायिक समूहों से समन्वय रखना आदि है।&lt;br /&gt;
१.४ भाषिक समूह : भाषा का मुख्य उपयोग परस्पर संवाद है। संवाद विचारों की सटीक अभिव्यक्ति   करनेवाला हो इस हेतु से भाषाएँ बनतीं हैं। संवाद में सहजता, सरलता, सुगमता से आत्मीयता बढ़ती है। इसी हेतु से भाषिक समूह बनते हैं। &lt;br /&gt;
१.५ प्रादेशिक समूह:शासनिक और व्यवस्थात्मक सुविधा की दृष्टि से प्रादेशिक स्तरका महत्त्व होता है।  &lt;br /&gt;
१.६ राष्ट्र:राष्ट्र अपने समाज के लिये विविध प्रकारके संगठनों का और व्यवस्थाओं का निर्माण करता है। &lt;br /&gt;
१.७ विश्व:पूर्व में बताई हुई १.१ से लेकर १.६ तक की सभी इकाइयां वैश्विक हित की अविरोधी रहें।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== प्रकृति सुसंगतता ===&lt;br /&gt;
समाज जीवन में केन्द्रिकरण और विकेंद्रीकरण का समन्वय हो यह आवश्यक है। विशाल उद्योग, बाजार की मंडियां, शासकीय कार्यालय, व्यावसायिक, भाषिक, प्रादेशिक समूहों के समन्वय की व्यवस्थाएं आदि के लिये शहरों की आवश्यकता होती है। लेकिन इनमें अनावश्यक केन्द्रीकरण न हो पाए। वनवासी या गिरिजन भी ग्राम व्यवस्था से ही जुड़े हुए होने चाहिए। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== प्रक्रियाएं ===&lt;br /&gt;
 : धर्म के अनुपालन में बुद्धि के स्तरपर धर्म के प्रति पर्याप्त संज्ञान, मन के स्तरपर कौटुम्बिक भावना, अनुशासन और श्रद्धा (आज्ञाकारिता) का विकास तथा शारीरिक स्तरपर सहकारिता और परोपकार की आदतें अत्यंत आवश्यक हैं। &lt;br /&gt;
३.१ धर्म संज्ञान : ‘समझना’ यह बुद्धि का काम होता है। इसलिए जब बच्चे का बुद्धि का अंग विकसित हो रहा होता है उसे धर्म की बौद्धिक याने तर्क तथा कर्मसिद्धांत के आधारपर शिक्षा देना उचित होता है। इस दृष्टि से तर्कशास्त्र की समझ या सरल शब्दों में ‘किसी भी बात के करने से पहले चराचर के हित में उस बात को कैसे करना चाहिए’ इसे समझने की क्षमता का विकास आवश्यक होता है।&lt;br /&gt;
३.२ कौटुम्बिक भावना का विकास : समाज के सभी परस्पर संबंधों में कौटुम्बिक भावना से व्यवहार का आधार धर्मसंज्ञान ही तो होता है। मन को बुद्धि के नियंत्रण में रखना ही मन की शिक्षा होती है। दुर्योधन के निम्न कथन से सब परिचित हैं। 		&lt;br /&gt;
जानामी धर्मं न च में प्रवृत्ति: ।   जानाम्यधर्मं न च में निवृत्ति: ।।&lt;br /&gt;
३.३ धर्माचरण की आदतें: दुर्योधन के उपर्युक्त कथन को ध्यान में रखकर ही गर्भधारणा से ही बच्चे को धर्माचरण की आदतों की शिक्षा देना महत्त्वपूर्ण बन जाता है। आदत का अर्थ है जिस बात के करने में कठिनाई का अनुभव नहीं होता। जब किसी बात के बारबार करने से आचरण में यह सहजता आती है तब वह आदत बन जाती है। और जब उसे बुद्धिका अधिष्ठान मिल जाता है तब वह आदतें मनुष्य का स्वभाव ही बन जातीं हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== धर्म के अनुपालन के स्तर और साधन ===&lt;br /&gt;
 : &lt;br /&gt;
४.१ धर्म के अनुपालन करनेवालों के राष्ट्रभक्त, अराष्ट्रीय और राष्ट्रद्रोही ऐसे मोटे-मोटे तीन स्तर होते हैं। &lt;br /&gt;
४.२ धर्म के अनुपालन के साधन : धर्म का अनुपालन पूर्व में बताए अनुसार शिक्षा, आदेश, प्रायश्चित्त/	पश्चात्ताप 	तथा दंड ऐसा चार प्रकार से होता है। शासन दुर्बल होने से समाज में प्रमाद करनेवालों की संख्या में वृद्धि 	होती है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== धर्म के अनुपालन के अवरोध ===&lt;br /&gt;
 : धर्म के अनुपालन में निम्न बातें अवरोध-रूप होतीं हैं।&lt;br /&gt;
५.१ भिन्न जीवनदृष्टि के लोग : शीघ्रातिशीघ्र भिन्न जीवनदृष्टि के लोगों को आत्मसात करना आवश्यक होता 	है। अन्यथा समाज जीवन अस्थिर और संघर्षमय बन जाता है।&lt;br /&gt;
५.२ स्वार्थ/संकुचित अस्मिताएँ :आवश्यकताओं की पुर्ति तक तो स्वार्थ भावना समर्थनीय है। अस्मिता या 	अहंकार यह प्रत्येक जिवंत ईकाई का एक स्वाभाविक पहलू होता है। किन्तु जब किसी ईकाई के विशिष्ट स्तर की यह अस्मिता अपने से ऊपर की ईकाई जिसका वह हिस्सा है, उसकी अस्मिता से बड़ी लगने लगती है तब समाज जीवन की शांति नष्ट हो जाती है। इसलिए यह आवश्यक है की मजहब, रिलिजन,प्रादेशिक अलगता, भाषिक भिन्नता, धनका अहंकार, बौद्धिक श्रेष्ठता आदि जैसी संकुचित अस्मिताएँ अपने से ऊपर की जीवंत ईकाई की अस्मिता के विरोध में नहीं हो। &lt;br /&gt;
५.३ विपरीत शिक्षा : विपरीत या दोषपूर्ण शिक्षा यह तो सभी समस्याओं की जड़ होती है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== कारक तत्त्व ===&lt;br /&gt;
 : कारक तत्वों से मतलब है धर्मपालन में सहायता देनेवाले घटक। ये निम्न होते हैं।&lt;br /&gt;
६.१ धर्म व्यवस्था : शासन धर्मनिष्ठ रहे यह सुनिश्चित करना धर्म व्यवस्था की जिम्मेदारी है। अपने त्याग, तपस्या, ज्ञान, लोकसंग्रह, चराचर के हित का चिन्तन, समर्पण भाव और कार्यकुशलता के आधारपर 	समाज से प्राप्त समर्थन प्राप्त कर वह देखे की कोई अयोग्य व्यक्ति शासक नहीं बनें।&lt;br /&gt;
६.२ शिक्षा : ६.२.१ कुटुम्ब शिक्षा 	६.२.२ विद्याकेन्द्र की शिक्षा 	६.२.३ लोकशिक्षा &lt;br /&gt;
६.३ धर्मनिष्ठ शासन : शासक का धर्मशास्त्र का जानकार होना और स्वयं धर्माचरणी होना भी आवश्यक होता है। जब शासन धर्म के अनुसार चलता है, धर्म व्यवस्थाद्वारा नियमित निर्देशित होता है तब धर्म भी 	स्थापित होता है और राज्य व्यवस्था भी श्रेष्ठ बनती है।&lt;br /&gt;
६.४ धर्मनिष्ठों का सामाजिक नेतृत्व : समाज जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में धर्मनिष्ठ लोग जब अच्छी संख्या में दिखाई देते हैं तब समाज मानस धर्मनिष्ठ बनता है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== चरण ==&lt;br /&gt;
धर्म का अनुपालन जब लोग स्वेच्छा से करनेवाले समाज के निर्माण के लिए दो बातें अत्यंत महत्वपूर्ण होतीं हैं। एक गर्भ में श्रेष्ठ जीवात्मा की स्थापना और दूसरे शिक्षा और संस्कार।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शिक्षा और संस्कार में -&lt;br /&gt;
७.१ जन्मपूर्व और शैशव कालमें अधिजनन शास्त्र के आधारपर मार्गदर्शन। &lt;br /&gt;
७.२ बाल्य काल : कुटुम्ब की शिक्षा के साथ विद्याकेन्द्र शिक्षा का समायोजन 			           &lt;br /&gt;
७.३ यौवन काल: अहंकार, बुद्धि के सही मोड़ हेतु सत्संग, प्रेरणा, वातावरण, ज्ञानार्जन/बलार्जन/कौशलार्जन आदि &lt;br /&gt;
७.४ प्रौढ़ावस्था : पूर्व ज्ञान/आदतों को व्यवस्थित करने के लिए सामाजिक वातावरण और मार्गदर्शन&lt;br /&gt;
७.४.१ पुरोहित&lt;br /&gt;
७.४.२ मेले/यात्राएं&lt;br /&gt;
७.४.३ कीर्तनकार/प्रवचनकार&lt;br /&gt;
७.४.४ धर्माचार्य&lt;br /&gt;
७.४.५ दृक्श्राव्य माध्यम –चित्रपट, दूरदर्शन आदि&lt;br /&gt;
७.४.६ आन्तरजाल&lt;br /&gt;
७.४.७ कानून का डर &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== धर्म निर्णय व्यवस्था ==&lt;br /&gt;
 : सामान्यत: जब भी धर्म की समझसे सम्बन्धित समस्या हो तब धर्म निर्णय की व्यवस्था उपलब्ध होनी चाहिये। इस व्यवस्था के तीन स्तर होना आवश्यक है। पहला स्तर तो स्थानिक धर्म के जानकार, दूसरा जनपदीय या निकटके तीर्थक्षेत्र में धर्मज्ञ परिषद्, और तीसरा स्तर अखिल भारतीय या राष्ट्रीय धर्मज्ञ परिषद्। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== माध्यम ==&lt;br /&gt;
 : धर्म अनुपालन करवाने के मुख्यत: दो प्रकारके माध्यम होते हैं। &lt;br /&gt;
९.१ कुटुम्ब के दायरे में : धर्म शिक्षा का अर्थ है सदाचार की शिक्षा। धर्म की शिक्षा के लिए कुटुम्ब यह सबसे श्रेष्ठ पाठशाला है। विद्याकेन्द्र की शिक्षा तो कुटुम्ब में मिली धर्म शिक्षा की पुष्टि या आवश्यक सुधार के लिए ही होती है। कुटुम्ब में धर्म शिक्षा तीन तरह से होती है। गर्भपूर्व संस्कार, गर्भ संस्कार और शिशु संस्कार और आदतें। मनुष्य की आदतें भी बचपन में ही पक्की हो जातीं हैं। &lt;br /&gt;
९.२ कुटुम्ब से बाहर के माध्यम : मनुष्य तो हर पल सीखता ही रहता है। इसलिए कुटुम्ब से बाहर भी वह कई बातें सीखता है। माध्यमों में मित्र मंडली, विद्यालय, समाज का सांस्कृतिक स्तर और क़ानून व्यवस्था आदि।&lt;br /&gt;
जीवन के भारतीय प्रतिमान की प्रतिष्ठापना की प्रक्रिया से अपेक्षित परिणामों की चर्चा हम [[Form of an Ideal Society (आदर्श समाज का स्वरूप)|अगले]] अध्याय में करेंगे।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[Category:Bhartiya Jeevan Pratiman (भारतीय जीवन प्रतिमान)]]&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Dilipkelkar</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://dharmawiki.org/index.php?title=Responsibilities_at_Societal_Level_(%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%AE%E0%A4%BE%E0%A4%9C%E0%A4%BF%E0%A4%95_%E0%A4%A7%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%AE_%E0%A4%85%E0%A4%A8%E0%A5%81%E0%A4%AA%E0%A4%BE%E0%A4%B2%E0%A4%A8)&amp;diff=119954</id>
		<title>Responsibilities at Societal Level (सामाजिक धर्म अनुपालन)</title>
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		<updated>2019-07-21T06:26:31Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Dilipkelkar: /* चरण */&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{One source|date=January 2019}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जीवन के भारतीय प्रतिमान की पुनर्प्रतिष्ठा के लिए राष्ट्र के संगठन की विभिन्न प्रणालियों के स्तर पर उन कर्तव्यों का याने ईकाई धर्म का विचार और प्रत्यक्ष धर्म अनुपालन की प्रक्रिया कैसे चलेगी, ऐसा दो पहलुओं में हम परिवर्तन की प्रक्रिया का विचार करेंगे। वैसे तो धर्म अनुपालन की प्रक्रिया का विचार हमने समाज धारणा शास्त्र के विषय में किया है। फिर भी परिवर्तन प्रक्रिया को यहाँ फिर से दोहराना उपयुक्त होगा।   &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== विभिन्न सामाजिक प्रणालियों के धर्म ==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== कुटुम्ब ===&lt;br /&gt;
कुटुम्ब यह परिवर्तन का सबसे जड़मूल का माध्यम है। समाज जीवन की वह नींव होता है। वह जितना सशक्त और व्यापक भूमिका का निर्वहन करेगा समाज उतना ही श्रेष्ठ बनेगा। कुटुम्ब में दो प्रकार के काम होते हैं। पहले हैं कुटुम्ब के लिए और दूसरे हैं कुटुम्ब में याने समाज, सृष्टी के लिए। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== कुटुम्ब की – कुटुम्ब के लिए ===&lt;br /&gt;
१. क्षमता और योग्यता आधारित कर्तव्य &lt;br /&gt;
२. क्षमता और योग्यता के अनुसार सार्थक योगदान &lt;br /&gt;
३. शुद्ध सस्नेहयुक्त सदाचारयुक्त परस्पर व्यवहार &lt;br /&gt;
४. बड़ों का आदर, सेवा। छोटों के लिए आदर्श और प्यार। &lt;br /&gt;
५. कुटुंबहित अपने हित से ऊपर। कर्त्तव्य परायणता। अपने कर्तव्यों के प्रति आग्रही।&lt;br /&gt;
६. स्वावलंबन / परस्परावलंबन।&lt;br /&gt;
७. कुटुम्ब के सभी काम करना आना और करना।&lt;br /&gt;
८. एकात्मता का विस्तार – कुटुंब&amp;lt; समाज&amp;lt; सृष्टी&amp;lt; विश्व। लेकिन इसकी नींव कुटुंब जीवन में ही पड़ेगी और पक्की होगी। &lt;br /&gt;
९. कौशल, ज्ञान, बल और पुण्य अर्जन की दृष्टी से अध्ययन और संस्कार &lt;br /&gt;
१०. कौटुम्बिक कुशलताएँ, आदतें, रीति-रिवाज, परम्पराएँ आदि &lt;br /&gt;
११. कुटुम्ब प्रमुख सर्वोपरि : कुटुम्ब के सब ही सदस्यों को कुटुम्ब प्रमुख बनने की प्रेरणा और इस हेतु से उनके द्वारा अपना विवेक, कौशल, सयानापन, निर्णय क्षमता, अपार स्नेह आदि का विकास। कुटुम्ब प्रमुख की आज्ञाओं का पालन - आज्ञाकारिता। &lt;br /&gt;
१२. काया, वाचा, मनसा सभी से मधुर व्यवहार। &lt;br /&gt;
१३. अच्छा – बेटा/बेटी, भाई/बहन, पति/पत्नि, पिता/माता, गृहस्थ/गृहिणी, रिश्तेदार आदि बनना/बनाना।&lt;br /&gt;
१४. वर्णाश्रम धर्म का पालन – 	स्वभावज कर्म करते जाना।&lt;br /&gt;
१४.१ सवर्ण/सजातीय विवाह 	&lt;br /&gt;
१४.२ कौटुम्बिक व्यवसाय में सहभाग &lt;br /&gt;
१४.३ ज्ञान, कौशल, श्रेष्ठ परम्पराओं का निर्वहन, परिष्कार, निर्माण और अगली पीढी को अंतरण &lt;br /&gt;
१४.४ आयु की अवस्था के अनुसार ब्रह्मचर्य, गृहस्थ और वानप्रस्थ आदि आश्रमों के धर्म की जिम्मेदारियों का		 निर्वहन।  &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== कुटुम्ब में – समाज के लिए ===&lt;br /&gt;
१. सामाजिक कर्तव्यों का निर्वहन 	१.१ समाज संगठन की प्रणालियों (कुटुंब, जाति, ग्राम, राष्ट्र) में 							१.२ सामाजिक व्यवस्थाओं (रक्षण, पोषण और शिक्षण) में &lt;br /&gt;
२. ज्ञानार्जन, कौशलार्जन, बलार्जन और पुण्यार्जन की मानसिकता और केवल इन के लिए अटन ।&lt;br /&gt;
३. स्वावलंबन और परस्परावलंबन ।&lt;br /&gt;
४. शत्रुत्व भाववाले समाज के घटकों के साथ भी शान्ततापूर्ण और सुखी सहजीवन ।&lt;br /&gt;
५. एकात्मता (समाज और सृष्टी के साथ) का व्यवहार/सुख और दु:ख में सहानुभूति और सहभागिता । &lt;br /&gt;
६. विभिन्न क्षेत्रों में - जैसे शासन, न्याय, समृद्धि आदि क्षेत्रों के नेता &amp;gt; आचार्य &amp;gt; धर्म । धर्म सर्वोपरि । &lt;br /&gt;
७. सद्गुण, सदाचार, स्वावलंबन, सत्यनिष्ठा, सादगी, सहजता, सौन्दर्यबोध, स्वतंत्रता, संयम, स्वदेशी आदि का व्यवहार साथ ही में त्याग, तपस्या, समाधान, शान्ति, अभय, विजिगीषा आदि गुणों का विकास।  &lt;br /&gt;
८. मनसा, वाचा कर्मणा ‘सर्वे भवन्तु सुखिन:’ के प्रयास।&lt;br /&gt;
९. वर्ण-धर्म की और जाति-धर्म की शिक्षा देना। जब लोग अपने वर्ण के अनुसार आचरण करते हैं तब राष्ट्र की संस्कृति का विकास और रक्षण होता है। और जब लोग अपने जातिधर्म के अनुसार व्यवसाय करते हैं तब देश समृद्ध बनता है, ओर बना रहता है। &lt;br /&gt;
१०. धर्माचरणी और समाजभक्त/देशभक्त/राष्ट्रभक्त/परमात्मा में श्रद्धा रखनेवालों का निर्माण । &lt;br /&gt;
११. धर्मशिक्षा और कर्मशिक्षा ।&lt;br /&gt;
१२. संयमित उपभोग । न्यूनतम (इष्टतम) उपभोग । &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== ग्रामकुल ==&lt;br /&gt;
१. ग्राम को स्वावलंबी ग्राम बनाना  &lt;br /&gt;
२. ग्राम की अर्थव्यवस्था को ठीक से बिठाना और चलाना &lt;br /&gt;
३. संयुक्त कुटुंबों की प्रतिष्ठापना का वातावरण &lt;br /&gt;
४. कौटुम्बिक उद्योगों की प्रतिष्ठापना का वातावरण &lt;br /&gt;
५. कुटुम्ब भावना से प्रत्येक व्यक्ति की सम्मानपूर्ण आजीविका की व्यवस्था करना &lt;br /&gt;
६. कौटुम्बिक उद्योग और जातियों में समन्वय रखना&lt;br /&gt;
७. शासकीय व्यवस्थाओं के प्रति जिम्मेदारियां : कर देना, शिक्षण, पोषण और रक्षण की व्यवस्थाओं में श्रेष्ठ व्यक्तियों का और संसाधनों का योगदान देना &lt;br /&gt;
८. ग्राम, एक कुल बने ऐसा वातावरण बनाए रखना।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== गुरुकुल / विद्यालय ==&lt;br /&gt;
१. वर्णशिक्षा की व्यवस्था &lt;br /&gt;
२. ज्ञानार्जन, कौशलार्जन, बलार्जन के लिए मार्गदर्शन &lt;br /&gt;
३. शास्त्रीय शिक्षा का प्रावधान &lt;br /&gt;
४. श्रेष्ठ परम्पराओं के निर्माण की शिक्षा &lt;br /&gt;
५. जीवन के तत्त्वज्ञान और व्यवहार की शिक्षा&lt;br /&gt;
६. जीवन के लिए महत्वपूर्ण सामाजिक संगठन प्रणालियाँ और व्यवस्थाओं की समझ और यथाशक्ति योगदान की प्रेरणा। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== कौशल विधा पंचायत ==&lt;br /&gt;
१. समाज की किसी एक आवश्यकता की पूर्ति करना । कभी कोई कमी न हो यह सुनिश्चित करना।&lt;br /&gt;
२. धर्म के मार्गदर्शन में अपने कौशल विधा-धर्म का निर्धारण और कौशल विधा प्रणाली में प्रचार प्रसार &lt;br /&gt;
३. अन्य कौशल विधाओं के साथ समन्वय &lt;br /&gt;
४. राष्ट्र सर्वोपरि यह भावना सदा जाग्रत रखना &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== व्यवस्थाओं के धर्म ==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== धर्म व्यवस्था ===&lt;br /&gt;
यह कोई नियमित व्यवस्था नहीं होती। यह जाग्रत, नि:स्वार्थी, सर्वभूतहित में सदैव प्रयासरत रहनेवाले पंडितों का समूह होता है। यह समूह सक्रीय होने से समाज ठीक चलता है। आवश्यकतानुसार इस समूह की जिम्मेदारियां बढ़ जातीं है। ऐसे आपद्धर्म के निर्वहन के लिए भी यह समूह पर्याप्त सामर्थ्यवान हो।  &lt;br /&gt;
१. कालानुरूप धर्म को व्याख्यायित करना। &lt;br /&gt;
२. वर्णों के ‘स्व’धर्मों का पालन करने की व्यवस्था की पस्तुति कर शिक्षा और शासन की मददसे समाज में उन्हें स्थापित करना। व्यक्तिगत और सामाजिक धर्म/संस्कृति के अनुसार व्यवहार का वातावरण बनाना। जब वर्ण-धर्मं का पालन लोग करते हैं तब देश में संस्कृति का विकास और रक्षण होता है। जिनकी ओर देखकर लोग वर्ण धर्म का पालन कर सकें ऐसे ‘श्रेष्ठ’ लोगों का निर्माण करना। &lt;br /&gt;
३. स्वाभाविक, शासनिक और आर्थिक ऐसी सभी प्रकार की स्वतन्त्रता की रक्षा करना। &lt;br /&gt;
४. शासनपर अपने ज्ञान, त्याग, तपस्या, लोकसंग्रह तथा सदैव लोकहित के चिंतन के माध्यम से नैतिक दबाव निर्माण करना। शासन को सदाचारी, कुशल और सामर्थ्य संपन्न बनाए रखने के लिए मार्गदर्शन करना। अधर्माचरणी शासन को हटाकर धर्माचरणी शासन को प्रतिष्ठित करना।&lt;br /&gt;
५. लोकशिक्षा (कुटुम्ब शिक्षा इसी का हिस्सा है) और विद्यालयीन शिक्षा की प्रभावी व्यवस्था करना। जैसे लिखा पढी न्यूनतम करने की दिशा में बढ़ना। वाणी/शब्द की प्रतिष्ठा बढ़ाना। जीवन को साधन सापेक्षता से साधना  सापेक्षता की ओर ले जाने के लिए अपनी कथनी और करनी से मार्गदर्शन करना। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== शासन व्यवस्था ===&lt;br /&gt;
१. अंतर्बाह्य शत्रुओं से लोगों की शासनिक स्वतन्त्रता की रक्षा करना। &lt;br /&gt;
२. धर्मं के दायरे में रहकर दुष्टों और मूर्खों को नियंत्रण में रखना। &lt;br /&gt;
३. दंड व्यवस्था के अंतर्गत न्याय व्यवस्था का निर्माण करना। किसी पर अन्याय हो ही नहीं ऐसी दंड व्यवस्था के निर्माण का प्रयास करना। &lt;br /&gt;
४. श्रेष्ठ शासक परम्परा निर्माण करना।&lt;br /&gt;
५. प्रभावी, समाजहित की शिक्षा देनेवाले शिक्षा केन्द्रों को संरक्षण, समर्थन और सहायता देकर और प्रभावी बनाने के लिए यथाशक्ति प्रयास करना। ऐसा करने से शासन का काम काफी सरल हो जाता है। &lt;br /&gt;
६. धर्मं व्यवस्था से समय समयपर मार्गदर्शन प्राप्त करते रहना।  &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== समृद्धि व्यवस्था ===&lt;br /&gt;
१. योग्य शिक्षा के द्वारा समाज में धर्म के अविरोधी इच्छाओं का ही विकास हो यह सुनिश्चित करना। &lt;br /&gt;
२. समाज के प्रत्येक घटक की सभी आवश्यकताओं की पूर्ति करना, धर्म विरोधी इच्छाओं की नहीं। समाज की आर्थिक स्वतन्त्रता को अबाधित रखना। &lt;br /&gt;
३. प्राकृतिक संसाधनों का न्यूनतम उपयोग हो ऐसा वातावरण बनाना। संयमित उपभोग को प्रतिष्ठित करना। &lt;br /&gt;
४. प्रकृति का प्रदूषण नहीं होने देना। प्रकृति का सन्तुलन बनाए रखना। &lt;br /&gt;
५. कौटुम्बिक उद्योग, जातियाँ और ग्राम मिलकर समृद्धि निर्माण होती है। ये तीनों ईकाईयाँ फलेफूले और इनका स्वस्थ ऐसा तानाबाना बना रहे ऐसा वातावरण रहे।&lt;br /&gt;
६. पैसे का विनिमय न्यूनतम रहे ऐसी व्यवस्था निर्माण करना।&lt;br /&gt;
अब हम धर्म के अनुपालन की प्रक्रिया का विचार आगे करेंगे।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== धर्म अनुपालन की प्रक्रिया ==&lt;br /&gt;
हमने जाना है कि समाज के सुख, शांति, स्वतंत्रता, सुसंस्कृतता के लिए समाज का धर्मनिष्ठ होना आवश्यक होता है। यहाँ मोटे तौरपर धर्म से मतलब कर्तव्य से है। समाज धारणा के लिए कर्तव्योंपर आधारित जीवन अनिवार्य होता है। समाज धारणा के लिए धर्म-युक्त व्यवहार में आनेवाली जटिलताओं को और उसके अनुपालन की प्रक्रिया को समझने का प्रयास करेंगे। इन में व्यक्तिगत स्तर की बातों का हमने पूर्व के अध्याय में विचार किया है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== विभिन्न ईकाईयों के स्तरपर ===&lt;br /&gt;
१.१ कुटुम्ब : समाज की सभी इकाइयों के विभिन्न स्तरोंपर उचित भूमिका निभानेवाले श्रेष्ठ मानव का निर्माण करना। कौटुम्बिक व्यवसाय के माध्यम से समाज की किसी आवश्यकता की पूर्ति करना। &lt;br /&gt;
१.२ ग्राम : ग्राम की भूमिका छोटे विश्व और बड़े कुटुम्ब की तरह ही होती है। जिस तरह कुटुम्ब के सदस्यों में आपस में पैसे का लेनदेन नहीं होता उसी तरह अच्छे ग्राम में कुटुम्बों में आपस में पैसे का लेनदेन नहीं होता। प्रत्येक की सम्मान और स्वतन्त्रता के साथ अन्न, वस्त्र, भवन, शिक्षा, आजीविका, सुरक्षा आदि सभी आवश्यकताओं की पूर्ति होती है।&lt;br /&gt;
१.३ कौशल विधा : समाज जीवन की आवश्यकताओं की हर विधा के अनुसार व्यवसाय विधा समूह बनते हैं। इन समूहों के भी सामान्य व्यक्ति से लेकर विश्व के स्तरतक के लिए करणीय और अकरणीय कार्य होते हैं। कर्तव्य होते हैं। इन्हें व्यवसाय विधा धर्म कहेंगे। इनमें पदार्थ के उत्पादन के रूप में आर्थिक स्वतन्त्रता के किसी एक पहलू की रक्षा में योगदान करना होता है।  शिक्षा/संस्कार, वस्तुएं, भावनाएं, विचार, कला आदि में से समाज जीवन की आवश्यकता में से किसी एक विधा के पदार्थ की निरंतर आपूर्ति करना। पदार्थ का अर्थ केवल वस्तु नहीं है। जिस पद याने शब्द का अर्थ होता है वह पदार्थ कहलाता है। व्यावसायिक समूह का काम कौशल का विकास करना, कौशल का पीढ़ी दर पीढ़ी अंतरण करना और अन्य व्यवसायिक समूहों से समन्वय रखना आदि है।&lt;br /&gt;
१.४ भाषिक समूह : भाषा का मुख्य उपयोग परस्पर संवाद है। संवाद विचारों की सटीक अभिव्यक्ति   करनेवाला हो इस हेतु से भाषाएँ बनतीं हैं। संवाद में सहजता, सरलता, सुगमता से आत्मीयता बढ़ती है। इसी हेतु से भाषिक समूह बनते हैं। &lt;br /&gt;
१.५ प्रादेशिक समूह:शासनिक और व्यवस्थात्मक सुविधा की दृष्टि से प्रादेशिक स्तरका महत्त्व होता है।  &lt;br /&gt;
१.६ राष्ट्र:राष्ट्र अपने समाज के लिये विविध प्रकारके संगठनों का और व्यवस्थाओं का निर्माण करता है। &lt;br /&gt;
१.७ विश्व:पूर्व में बताई हुई १.१ से लेकर १.६ तक की सभी इकाइयां वैश्विक हित की अविरोधी रहें।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== प्रकृति सुसंगतता ===&lt;br /&gt;
समाज जीवन में केन्द्रिकरण और विकेंद्रीकरण का समन्वय हो यह आवश्यक है। विशाल उद्योग, बाजार की मंडियां, शासकीय कार्यालय, व्यावसायिक, भाषिक, प्रादेशिक समूहों के समन्वय की व्यवस्थाएं आदि के लिये शहरों की आवश्यकता होती है। लेकिन इनमें अनावश्यक केन्द्रीकरण न हो पाए। वनवासी या गिरिजन भी ग्राम व्यवस्था से ही जुड़े हुए होने चाहिए। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== प्रक्रियाएं ===&lt;br /&gt;
 : धर्म के अनुपालन में बुद्धि के स्तरपर धर्म के प्रति पर्याप्त संज्ञान, मन के स्तरपर कौटुम्बिक भावना, अनुशासन और श्रद्धा (आज्ञाकारिता) का विकास तथा शारीरिक स्तरपर सहकारिता और परोपकार की आदतें अत्यंत आवश्यक हैं। &lt;br /&gt;
३.१ धर्म संज्ञान : ‘समझना’ यह बुद्धि का काम होता है। इसलिए जब बच्चे का बुद्धि का अंग विकसित हो रहा होता है उसे धर्म की बौद्धिक याने तर्क तथा कर्मसिद्धांत के आधारपर शिक्षा देना उचित होता है। इस दृष्टि से तर्कशास्त्र की समझ या सरल शब्दों में ‘किसी भी बात के करने से पहले चराचर के हित में उस बात को कैसे करना चाहिए’ इसे समझने की क्षमता का विकास आवश्यक होता है।&lt;br /&gt;
३.२ कौटुम्बिक भावना का विकास : समाज के सभी परस्पर संबंधों में कौटुम्बिक भावना से व्यवहार का आधार धर्मसंज्ञान ही तो होता है। मन को बुद्धि के नियंत्रण में रखना ही मन की शिक्षा होती है। दुर्योधन के निम्न कथन से सब परिचित हैं। 		&lt;br /&gt;
जानामी धर्मं न च में प्रवृत्ति: ।   जानाम्यधर्मं न च में निवृत्ति: ।।&lt;br /&gt;
३.३ धर्माचरण की आदतें: दुर्योधन के उपर्युक्त कथन को ध्यान में रखकर ही गर्भधारणा से ही बच्चे को धर्माचरण की आदतों की शिक्षा देना महत्त्वपूर्ण बन जाता है। आदत का अर्थ है जिस बात के करने में कठिनाई का अनुभव नहीं होता। जब किसी बात के बारबार करने से आचरण में यह सहजता आती है तब वह आदत बन जाती है। और जब उसे बुद्धिका अधिष्ठान मिल जाता है तब वह आदतें मनुष्य का स्वभाव ही बन जातीं हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== धर्म के अनुपालन के स्तर और साधन ===&lt;br /&gt;
 : &lt;br /&gt;
४.१ धर्म के अनुपालन करनेवालों के राष्ट्रभक्त, अराष्ट्रीय और राष्ट्रद्रोही ऐसे मोटे-मोटे तीन स्तर होते हैं। &lt;br /&gt;
४.२ धर्म के अनुपालन के साधन : धर्म का अनुपालन पूर्व में बताए अनुसार शिक्षा, आदेश, प्रायश्चित्त/	पश्चात्ताप 	तथा दंड ऐसा चार प्रकार से होता है। शासन दुर्बल होने से समाज में प्रमाद करनेवालों की संख्या में वृद्धि 	होती है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== धर्म के अनुपालन के अवरोध ===&lt;br /&gt;
 : धर्म के अनुपालन में निम्न बातें अवरोध-रूप होतीं हैं।&lt;br /&gt;
५.१ भिन्न जीवनदृष्टि के लोग : शीघ्रातिशीघ्र भिन्न जीवनदृष्टि के लोगों को आत्मसात करना आवश्यक होता 	है। अन्यथा समाज जीवन अस्थिर और संघर्षमय बन जाता है।&lt;br /&gt;
५.२ स्वार्थ/संकुचित अस्मिताएँ :आवश्यकताओं की पुर्ति तक तो स्वार्थ भावना समर्थनीय है। अस्मिता या 	अहंकार यह प्रत्येक जिवंत ईकाई का एक स्वाभाविक पहलू होता है। किन्तु जब किसी ईकाई के विशिष्ट स्तर की यह अस्मिता अपने से ऊपर की ईकाई जिसका वह हिस्सा है, उसकी अस्मिता से बड़ी लगने लगती है तब समाज जीवन की शांति नष्ट हो जाती है। इसलिए यह आवश्यक है की मजहब, रिलिजन,प्रादेशिक अलगता, भाषिक भिन्नता, धनका अहंकार, बौद्धिक श्रेष्ठता आदि जैसी संकुचित अस्मिताएँ अपने से ऊपर की जीवंत ईकाई की अस्मिता के विरोध में नहीं हो। &lt;br /&gt;
५.३ विपरीत शिक्षा : विपरीत या दोषपूर्ण शिक्षा यह तो सभी समस्याओं की जड़ होती है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== कारक तत्त्व ===&lt;br /&gt;
 : कारक तत्वों से मतलब है धर्मपालन में सहायता देनेवाले घटक। ये निम्न होते हैं।&lt;br /&gt;
६.१ धर्म व्यवस्था : शासन धर्मनिष्ठ रहे यह सुनिश्चित करना धर्म व्यवस्था की जिम्मेदारी है। अपने त्याग, तपस्या, ज्ञान, लोकसंग्रह, चराचर के हित का चिन्तन, समर्पण भाव और कार्यकुशलता के आधारपर 	समाज से प्राप्त समर्थन प्राप्त कर वह देखे की कोई अयोग्य व्यक्ति शासक नहीं बनें।&lt;br /&gt;
६.२ शिक्षा : ६.२.१ कुटुम्ब शिक्षा 	६.२.२ विद्याकेन्द्र की शिक्षा 	६.२.३ लोकशिक्षा &lt;br /&gt;
६.३ धर्मनिष्ठ शासन : शासक का धर्मशास्त्र का जानकार होना और स्वयं धर्माचरणी होना भी आवश्यक होता है। जब शासन धर्म के अनुसार चलता है, धर्म व्यवस्थाद्वारा नियमित निर्देशित होता है तब धर्म भी 	स्थापित होता है और राज्य व्यवस्था भी श्रेष्ठ बनती है।&lt;br /&gt;
६.४ धर्मनिष्ठों का सामाजिक नेतृत्व : समाज जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में धर्मनिष्ठ लोग जब अच्छी संख्या में दिखाई देते हैं तब समाज मानस धर्मनिष्ठ बनता है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== चरण ==&lt;br /&gt;
धर्म का अनुपालन जब लोग स्वेच्छा से करनेवाले समाज के निर्माण के लिए दो बातें अत्यंत महत्वपूर्ण होतीं हैं। एक गर्भ में श्रेष्ठ जीवात्मा की स्थापना और दूसरे शिक्षा और संस्कार।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शिक्षा और संस्कार में -&lt;br /&gt;
७.१ जन्मपूर्व और शैशव कालमें अधिजनन शास्त्र के आधारपर मार्गदर्शन। &lt;br /&gt;
७.२ बाल्य काल : कुटुम्ब की शिक्षा के साथ विद्याकेन्द्र शिक्षा का समायोजन 			           &lt;br /&gt;
७.३ यौवन काल: अहंकार, बुद्धि के सही मोड़ हेतु सत्संग, प्रेरणा, वातावरण, ज्ञानार्जन/बलार्जन/कौशलार्जन आदि &lt;br /&gt;
७.४ प्रौढ़ावस्था : पूर्व ज्ञान/आदतों को व्यवस्थित करने के लिए सामाजिक वातावरण और मार्गदर्शन&lt;br /&gt;
७.४.१ पुरोहित&lt;br /&gt;
७.४.२ मेले/यात्राएं&lt;br /&gt;
७.४.३ कीर्तनकार/प्रवचनकार&lt;br /&gt;
७.४.४ धर्माचार्य&lt;br /&gt;
७.४.५ दृक्श्राव्य माध्यम –चित्रपट, दूरदर्शन आदि&lt;br /&gt;
७.४.६ आन्तरजाल&lt;br /&gt;
७.४.७ कानून का डर &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== धर्म निर्णय व्यवस्था ==&lt;br /&gt;
 : सामान्यत: जब भी धर्म की समझसे सम्बन्धित समस्या हो तब धर्म निर्णय की व्यवस्था उपलब्ध होनी चाहिये। इस व्यवस्था के तीन स्तर होना आवश्यक है। पहला स्तर तो स्थानिक धर्म के जानकार, दूसरा जनपदीय या निकटके तीर्थक्षेत्र में धर्मज्ञ परिषद्, और तीसरा स्तर अखिल भारतीय या राष्ट्रीय धर्मज्ञ परिषद्। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== माध्यम ==&lt;br /&gt;
 : धर्म अनुपालन करवाने के मुख्यत: दो प्रकारके माध्यम होते हैं। &lt;br /&gt;
९.१ कुटुम्ब के दायरे में : धर्म शिक्षा का अर्थ है सदाचार की शिक्षा। धर्म की शिक्षा के लिए कुटुम्ब यह सबसे श्रेष्ठ पाठशाला है। विद्याकेन्द्र की शिक्षा तो कुटुम्ब में मिली धर्म शिक्षा की पुष्टि या आवश्यक सुधार के लिए ही होती है। कुटुम्ब में धर्म शिक्षा तीन तरह से होती है। गर्भपूर्व संस्कार, गर्भ संस्कार और शिशु संस्कार और आदतें। मनुष्य की आदतें भी बचपन में ही पक्की हो जातीं हैं। &lt;br /&gt;
९.२ कुटुम्ब से बाहर के माध्यम : मनुष्य तो हर पल सीखता ही रहता है। इसलिए कुटुम्ब से बाहर भी वह कई बातें सीखता है। माध्यमों में मित्र मंडली, विद्यालय, समाज का सांस्कृतिक स्तर और क़ानून व्यवस्था आदि।&lt;br /&gt;
जीवन के भारतीय प्रतिमान की प्रतिष्ठापना की प्रक्रिया से अपेक्षित परिणामों की चर्चा हम [[Form of an Ideal Society (आदर्श समाज का स्वरूप)|अगले]] अध्याय में करेंगे।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[Category:Bhartiya Jeevan Pratiman (भारतीय जीवन प्रतिमान)]]&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Dilipkelkar</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://dharmawiki.org/index.php?title=Responsibilities_at_Societal_Level_(%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%AE%E0%A4%BE%E0%A4%9C%E0%A4%BF%E0%A4%95_%E0%A4%A7%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%AE_%E0%A4%85%E0%A4%A8%E0%A5%81%E0%A4%AA%E0%A4%BE%E0%A4%B2%E0%A4%A8)&amp;diff=119953</id>
		<title>Responsibilities at Societal Level (सामाजिक धर्म अनुपालन)</title>
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		<updated>2019-07-21T06:25:57Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Dilipkelkar: /* चरण */&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{One source|date=January 2019}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जीवन के भारतीय प्रतिमान की पुनर्प्रतिष्ठा के लिए राष्ट्र के संगठन की विभिन्न प्रणालियों के स्तर पर उन कर्तव्यों का याने ईकाई धर्म का विचार और प्रत्यक्ष धर्म अनुपालन की प्रक्रिया कैसे चलेगी, ऐसा दो पहलुओं में हम परिवर्तन की प्रक्रिया का विचार करेंगे। वैसे तो धर्म अनुपालन की प्रक्रिया का विचार हमने समाज धारणा शास्त्र के विषय में किया है। फिर भी परिवर्तन प्रक्रिया को यहाँ फिर से दोहराना उपयुक्त होगा।   &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== विभिन्न सामाजिक प्रणालियों के धर्म ==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== कुटुम्ब ===&lt;br /&gt;
कुटुम्ब यह परिवर्तन का सबसे जड़मूल का माध्यम है। समाज जीवन की वह नींव होता है। वह जितना सशक्त और व्यापक भूमिका का निर्वहन करेगा समाज उतना ही श्रेष्ठ बनेगा। कुटुम्ब में दो प्रकार के काम होते हैं। पहले हैं कुटुम्ब के लिए और दूसरे हैं कुटुम्ब में याने समाज, सृष्टी के लिए। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== कुटुम्ब की – कुटुम्ब के लिए ===&lt;br /&gt;
१. क्षमता और योग्यता आधारित कर्तव्य &lt;br /&gt;
२. क्षमता और योग्यता के अनुसार सार्थक योगदान &lt;br /&gt;
३. शुद्ध सस्नेहयुक्त सदाचारयुक्त परस्पर व्यवहार &lt;br /&gt;
४. बड़ों का आदर, सेवा। छोटों के लिए आदर्श और प्यार। &lt;br /&gt;
५. कुटुंबहित अपने हित से ऊपर। कर्त्तव्य परायणता। अपने कर्तव्यों के प्रति आग्रही।&lt;br /&gt;
६. स्वावलंबन / परस्परावलंबन।&lt;br /&gt;
७. कुटुम्ब के सभी काम करना आना और करना।&lt;br /&gt;
८. एकात्मता का विस्तार – कुटुंब&amp;lt; समाज&amp;lt; सृष्टी&amp;lt; विश्व। लेकिन इसकी नींव कुटुंब जीवन में ही पड़ेगी और पक्की होगी। &lt;br /&gt;
९. कौशल, ज्ञान, बल और पुण्य अर्जन की दृष्टी से अध्ययन और संस्कार &lt;br /&gt;
१०. कौटुम्बिक कुशलताएँ, आदतें, रीति-रिवाज, परम्पराएँ आदि &lt;br /&gt;
११. कुटुम्ब प्रमुख सर्वोपरि : कुटुम्ब के सब ही सदस्यों को कुटुम्ब प्रमुख बनने की प्रेरणा और इस हेतु से उनके द्वारा अपना विवेक, कौशल, सयानापन, निर्णय क्षमता, अपार स्नेह आदि का विकास। कुटुम्ब प्रमुख की आज्ञाओं का पालन - आज्ञाकारिता। &lt;br /&gt;
१२. काया, वाचा, मनसा सभी से मधुर व्यवहार। &lt;br /&gt;
१३. अच्छा – बेटा/बेटी, भाई/बहन, पति/पत्नि, पिता/माता, गृहस्थ/गृहिणी, रिश्तेदार आदि बनना/बनाना।&lt;br /&gt;
१४. वर्णाश्रम धर्म का पालन – 	स्वभावज कर्म करते जाना।&lt;br /&gt;
१४.१ सवर्ण/सजातीय विवाह 	&lt;br /&gt;
१४.२ कौटुम्बिक व्यवसाय में सहभाग &lt;br /&gt;
१४.३ ज्ञान, कौशल, श्रेष्ठ परम्पराओं का निर्वहन, परिष्कार, निर्माण और अगली पीढी को अंतरण &lt;br /&gt;
१४.४ आयु की अवस्था के अनुसार ब्रह्मचर्य, गृहस्थ और वानप्रस्थ आदि आश्रमों के धर्म की जिम्मेदारियों का		 निर्वहन।  &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== कुटुम्ब में – समाज के लिए ===&lt;br /&gt;
१. सामाजिक कर्तव्यों का निर्वहन 	१.१ समाज संगठन की प्रणालियों (कुटुंब, जाति, ग्राम, राष्ट्र) में 							१.२ सामाजिक व्यवस्थाओं (रक्षण, पोषण और शिक्षण) में &lt;br /&gt;
२. ज्ञानार्जन, कौशलार्जन, बलार्जन और पुण्यार्जन की मानसिकता और केवल इन के लिए अटन ।&lt;br /&gt;
३. स्वावलंबन और परस्परावलंबन ।&lt;br /&gt;
४. शत्रुत्व भाववाले समाज के घटकों के साथ भी शान्ततापूर्ण और सुखी सहजीवन ।&lt;br /&gt;
५. एकात्मता (समाज और सृष्टी के साथ) का व्यवहार/सुख और दु:ख में सहानुभूति और सहभागिता । &lt;br /&gt;
६. विभिन्न क्षेत्रों में - जैसे शासन, न्याय, समृद्धि आदि क्षेत्रों के नेता &amp;gt; आचार्य &amp;gt; धर्म । धर्म सर्वोपरि । &lt;br /&gt;
७. सद्गुण, सदाचार, स्वावलंबन, सत्यनिष्ठा, सादगी, सहजता, सौन्दर्यबोध, स्वतंत्रता, संयम, स्वदेशी आदि का व्यवहार साथ ही में त्याग, तपस्या, समाधान, शान्ति, अभय, विजिगीषा आदि गुणों का विकास।  &lt;br /&gt;
८. मनसा, वाचा कर्मणा ‘सर्वे भवन्तु सुखिन:’ के प्रयास।&lt;br /&gt;
९. वर्ण-धर्म की और जाति-धर्म की शिक्षा देना। जब लोग अपने वर्ण के अनुसार आचरण करते हैं तब राष्ट्र की संस्कृति का विकास और रक्षण होता है। और जब लोग अपने जातिधर्म के अनुसार व्यवसाय करते हैं तब देश समृद्ध बनता है, ओर बना रहता है। &lt;br /&gt;
१०. धर्माचरणी और समाजभक्त/देशभक्त/राष्ट्रभक्त/परमात्मा में श्रद्धा रखनेवालों का निर्माण । &lt;br /&gt;
११. धर्मशिक्षा और कर्मशिक्षा ।&lt;br /&gt;
१२. संयमित उपभोग । न्यूनतम (इष्टतम) उपभोग । &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== ग्रामकुल ==&lt;br /&gt;
१. ग्राम को स्वावलंबी ग्राम बनाना  &lt;br /&gt;
२. ग्राम की अर्थव्यवस्था को ठीक से बिठाना और चलाना &lt;br /&gt;
३. संयुक्त कुटुंबों की प्रतिष्ठापना का वातावरण &lt;br /&gt;
४. कौटुम्बिक उद्योगों की प्रतिष्ठापना का वातावरण &lt;br /&gt;
५. कुटुम्ब भावना से प्रत्येक व्यक्ति की सम्मानपूर्ण आजीविका की व्यवस्था करना &lt;br /&gt;
६. कौटुम्बिक उद्योग और जातियों में समन्वय रखना&lt;br /&gt;
७. शासकीय व्यवस्थाओं के प्रति जिम्मेदारियां : कर देना, शिक्षण, पोषण और रक्षण की व्यवस्थाओं में श्रेष्ठ व्यक्तियों का और संसाधनों का योगदान देना &lt;br /&gt;
८. ग्राम, एक कुल बने ऐसा वातावरण बनाए रखना।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== गुरुकुल / विद्यालय ==&lt;br /&gt;
१. वर्णशिक्षा की व्यवस्था &lt;br /&gt;
२. ज्ञानार्जन, कौशलार्जन, बलार्जन के लिए मार्गदर्शन &lt;br /&gt;
३. शास्त्रीय शिक्षा का प्रावधान &lt;br /&gt;
४. श्रेष्ठ परम्पराओं के निर्माण की शिक्षा &lt;br /&gt;
५. जीवन के तत्त्वज्ञान और व्यवहार की शिक्षा&lt;br /&gt;
६. जीवन के लिए महत्वपूर्ण सामाजिक संगठन प्रणालियाँ और व्यवस्थाओं की समझ और यथाशक्ति योगदान की प्रेरणा। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== कौशल विधा पंचायत ==&lt;br /&gt;
१. समाज की किसी एक आवश्यकता की पूर्ति करना । कभी कोई कमी न हो यह सुनिश्चित करना।&lt;br /&gt;
२. धर्म के मार्गदर्शन में अपने कौशल विधा-धर्म का निर्धारण और कौशल विधा प्रणाली में प्रचार प्रसार &lt;br /&gt;
३. अन्य कौशल विधाओं के साथ समन्वय &lt;br /&gt;
४. राष्ट्र सर्वोपरि यह भावना सदा जाग्रत रखना &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== व्यवस्थाओं के धर्म ==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== धर्म व्यवस्था ===&lt;br /&gt;
यह कोई नियमित व्यवस्था नहीं होती। यह जाग्रत, नि:स्वार्थी, सर्वभूतहित में सदैव प्रयासरत रहनेवाले पंडितों का समूह होता है। यह समूह सक्रीय होने से समाज ठीक चलता है। आवश्यकतानुसार इस समूह की जिम्मेदारियां बढ़ जातीं है। ऐसे आपद्धर्म के निर्वहन के लिए भी यह समूह पर्याप्त सामर्थ्यवान हो।  &lt;br /&gt;
१. कालानुरूप धर्म को व्याख्यायित करना। &lt;br /&gt;
२. वर्णों के ‘स्व’धर्मों का पालन करने की व्यवस्था की पस्तुति कर शिक्षा और शासन की मददसे समाज में उन्हें स्थापित करना। व्यक्तिगत और सामाजिक धर्म/संस्कृति के अनुसार व्यवहार का वातावरण बनाना। जब वर्ण-धर्मं का पालन लोग करते हैं तब देश में संस्कृति का विकास और रक्षण होता है। जिनकी ओर देखकर लोग वर्ण धर्म का पालन कर सकें ऐसे ‘श्रेष्ठ’ लोगों का निर्माण करना। &lt;br /&gt;
३. स्वाभाविक, शासनिक और आर्थिक ऐसी सभी प्रकार की स्वतन्त्रता की रक्षा करना। &lt;br /&gt;
४. शासनपर अपने ज्ञान, त्याग, तपस्या, लोकसंग्रह तथा सदैव लोकहित के चिंतन के माध्यम से नैतिक दबाव निर्माण करना। शासन को सदाचारी, कुशल और सामर्थ्य संपन्न बनाए रखने के लिए मार्गदर्शन करना। अधर्माचरणी शासन को हटाकर धर्माचरणी शासन को प्रतिष्ठित करना।&lt;br /&gt;
५. लोकशिक्षा (कुटुम्ब शिक्षा इसी का हिस्सा है) और विद्यालयीन शिक्षा की प्रभावी व्यवस्था करना। जैसे लिखा पढी न्यूनतम करने की दिशा में बढ़ना। वाणी/शब्द की प्रतिष्ठा बढ़ाना। जीवन को साधन सापेक्षता से साधना  सापेक्षता की ओर ले जाने के लिए अपनी कथनी और करनी से मार्गदर्शन करना। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== शासन व्यवस्था ===&lt;br /&gt;
१. अंतर्बाह्य शत्रुओं से लोगों की शासनिक स्वतन्त्रता की रक्षा करना। &lt;br /&gt;
२. धर्मं के दायरे में रहकर दुष्टों और मूर्खों को नियंत्रण में रखना। &lt;br /&gt;
३. दंड व्यवस्था के अंतर्गत न्याय व्यवस्था का निर्माण करना। किसी पर अन्याय हो ही नहीं ऐसी दंड व्यवस्था के निर्माण का प्रयास करना। &lt;br /&gt;
४. श्रेष्ठ शासक परम्परा निर्माण करना।&lt;br /&gt;
५. प्रभावी, समाजहित की शिक्षा देनेवाले शिक्षा केन्द्रों को संरक्षण, समर्थन और सहायता देकर और प्रभावी बनाने के लिए यथाशक्ति प्रयास करना। ऐसा करने से शासन का काम काफी सरल हो जाता है। &lt;br /&gt;
६. धर्मं व्यवस्था से समय समयपर मार्गदर्शन प्राप्त करते रहना।  &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== समृद्धि व्यवस्था ===&lt;br /&gt;
१. योग्य शिक्षा के द्वारा समाज में धर्म के अविरोधी इच्छाओं का ही विकास हो यह सुनिश्चित करना। &lt;br /&gt;
२. समाज के प्रत्येक घटक की सभी आवश्यकताओं की पूर्ति करना, धर्म विरोधी इच्छाओं की नहीं। समाज की आर्थिक स्वतन्त्रता को अबाधित रखना। &lt;br /&gt;
३. प्राकृतिक संसाधनों का न्यूनतम उपयोग हो ऐसा वातावरण बनाना। संयमित उपभोग को प्रतिष्ठित करना। &lt;br /&gt;
४. प्रकृति का प्रदूषण नहीं होने देना। प्रकृति का सन्तुलन बनाए रखना। &lt;br /&gt;
५. कौटुम्बिक उद्योग, जातियाँ और ग्राम मिलकर समृद्धि निर्माण होती है। ये तीनों ईकाईयाँ फलेफूले और इनका स्वस्थ ऐसा तानाबाना बना रहे ऐसा वातावरण रहे।&lt;br /&gt;
६. पैसे का विनिमय न्यूनतम रहे ऐसी व्यवस्था निर्माण करना।&lt;br /&gt;
अब हम धर्म के अनुपालन की प्रक्रिया का विचार आगे करेंगे।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== धर्म अनुपालन की प्रक्रिया ==&lt;br /&gt;
हमने जाना है कि समाज के सुख, शांति, स्वतंत्रता, सुसंस्कृतता के लिए समाज का धर्मनिष्ठ होना आवश्यक होता है। यहाँ मोटे तौरपर धर्म से मतलब कर्तव्य से है। समाज धारणा के लिए कर्तव्योंपर आधारित जीवन अनिवार्य होता है। समाज धारणा के लिए धर्म-युक्त व्यवहार में आनेवाली जटिलताओं को और उसके अनुपालन की प्रक्रिया को समझने का प्रयास करेंगे। इन में व्यक्तिगत स्तर की बातों का हमने पूर्व के अध्याय में विचार किया है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== विभिन्न ईकाईयों के स्तरपर ===&lt;br /&gt;
१.१ कुटुम्ब : समाज की सभी इकाइयों के विभिन्न स्तरोंपर उचित भूमिका निभानेवाले श्रेष्ठ मानव का निर्माण करना। कौटुम्बिक व्यवसाय के माध्यम से समाज की किसी आवश्यकता की पूर्ति करना। &lt;br /&gt;
१.२ ग्राम : ग्राम की भूमिका छोटे विश्व और बड़े कुटुम्ब की तरह ही होती है। जिस तरह कुटुम्ब के सदस्यों में आपस में पैसे का लेनदेन नहीं होता उसी तरह अच्छे ग्राम में कुटुम्बों में आपस में पैसे का लेनदेन नहीं होता। प्रत्येक की सम्मान और स्वतन्त्रता के साथ अन्न, वस्त्र, भवन, शिक्षा, आजीविका, सुरक्षा आदि सभी आवश्यकताओं की पूर्ति होती है।&lt;br /&gt;
१.३ कौशल विधा : समाज जीवन की आवश्यकताओं की हर विधा के अनुसार व्यवसाय विधा समूह बनते हैं। इन समूहों के भी सामान्य व्यक्ति से लेकर विश्व के स्तरतक के लिए करणीय और अकरणीय कार्य होते हैं। कर्तव्य होते हैं। इन्हें व्यवसाय विधा धर्म कहेंगे। इनमें पदार्थ के उत्पादन के रूप में आर्थिक स्वतन्त्रता के किसी एक पहलू की रक्षा में योगदान करना होता है।  शिक्षा/संस्कार, वस्तुएं, भावनाएं, विचार, कला आदि में से समाज जीवन की आवश्यकता में से किसी एक विधा के पदार्थ की निरंतर आपूर्ति करना। पदार्थ का अर्थ केवल वस्तु नहीं है। जिस पद याने शब्द का अर्थ होता है वह पदार्थ कहलाता है। व्यावसायिक समूह का काम कौशल का विकास करना, कौशल का पीढ़ी दर पीढ़ी अंतरण करना और अन्य व्यवसायिक समूहों से समन्वय रखना आदि है।&lt;br /&gt;
१.४ भाषिक समूह : भाषा का मुख्य उपयोग परस्पर संवाद है। संवाद विचारों की सटीक अभिव्यक्ति   करनेवाला हो इस हेतु से भाषाएँ बनतीं हैं। संवाद में सहजता, सरलता, सुगमता से आत्मीयता बढ़ती है। इसी हेतु से भाषिक समूह बनते हैं। &lt;br /&gt;
१.५ प्रादेशिक समूह:शासनिक और व्यवस्थात्मक सुविधा की दृष्टि से प्रादेशिक स्तरका महत्त्व होता है।  &lt;br /&gt;
१.६ राष्ट्र:राष्ट्र अपने समाज के लिये विविध प्रकारके संगठनों का और व्यवस्थाओं का निर्माण करता है। &lt;br /&gt;
१.७ विश्व:पूर्व में बताई हुई १.१ से लेकर १.६ तक की सभी इकाइयां वैश्विक हित की अविरोधी रहें।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== प्रकृति सुसंगतता ===&lt;br /&gt;
समाज जीवन में केन्द्रिकरण और विकेंद्रीकरण का समन्वय हो यह आवश्यक है। विशाल उद्योग, बाजार की मंडियां, शासकीय कार्यालय, व्यावसायिक, भाषिक, प्रादेशिक समूहों के समन्वय की व्यवस्थाएं आदि के लिये शहरों की आवश्यकता होती है। लेकिन इनमें अनावश्यक केन्द्रीकरण न हो पाए। वनवासी या गिरिजन भी ग्राम व्यवस्था से ही जुड़े हुए होने चाहिए। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== प्रक्रियाएं ===&lt;br /&gt;
 : धर्म के अनुपालन में बुद्धि के स्तरपर धर्म के प्रति पर्याप्त संज्ञान, मन के स्तरपर कौटुम्बिक भावना, अनुशासन और श्रद्धा (आज्ञाकारिता) का विकास तथा शारीरिक स्तरपर सहकारिता और परोपकार की आदतें अत्यंत आवश्यक हैं। &lt;br /&gt;
३.१ धर्म संज्ञान : ‘समझना’ यह बुद्धि का काम होता है। इसलिए जब बच्चे का बुद्धि का अंग विकसित हो रहा होता है उसे धर्म की बौद्धिक याने तर्क तथा कर्मसिद्धांत के आधारपर शिक्षा देना उचित होता है। इस दृष्टि से तर्कशास्त्र की समझ या सरल शब्दों में ‘किसी भी बात के करने से पहले चराचर के हित में उस बात को कैसे करना चाहिए’ इसे समझने की क्षमता का विकास आवश्यक होता है।&lt;br /&gt;
३.२ कौटुम्बिक भावना का विकास : समाज के सभी परस्पर संबंधों में कौटुम्बिक भावना से व्यवहार का आधार धर्मसंज्ञान ही तो होता है। मन को बुद्धि के नियंत्रण में रखना ही मन की शिक्षा होती है। दुर्योधन के निम्न कथन से सब परिचित हैं। 		&lt;br /&gt;
जानामी धर्मं न च में प्रवृत्ति: ।   जानाम्यधर्मं न च में निवृत्ति: ।।&lt;br /&gt;
३.३ धर्माचरण की आदतें: दुर्योधन के उपर्युक्त कथन को ध्यान में रखकर ही गर्भधारणा से ही बच्चे को धर्माचरण की आदतों की शिक्षा देना महत्त्वपूर्ण बन जाता है। आदत का अर्थ है जिस बात के करने में कठिनाई का अनुभव नहीं होता। जब किसी बात के बारबार करने से आचरण में यह सहजता आती है तब वह आदत बन जाती है। और जब उसे बुद्धिका अधिष्ठान मिल जाता है तब वह आदतें मनुष्य का स्वभाव ही बन जातीं हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== धर्म के अनुपालन के स्तर और साधन ===&lt;br /&gt;
 : &lt;br /&gt;
४.१ धर्म के अनुपालन करनेवालों के राष्ट्रभक्त, अराष्ट्रीय और राष्ट्रद्रोही ऐसे मोटे-मोटे तीन स्तर होते हैं। &lt;br /&gt;
४.२ धर्म के अनुपालन के साधन : धर्म का अनुपालन पूर्व में बताए अनुसार शिक्षा, आदेश, प्रायश्चित्त/	पश्चात्ताप 	तथा दंड ऐसा चार प्रकार से होता है। शासन दुर्बल होने से समाज में प्रमाद करनेवालों की संख्या में वृद्धि 	होती है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== धर्म के अनुपालन के अवरोध ===&lt;br /&gt;
 : धर्म के अनुपालन में निम्न बातें अवरोध-रूप होतीं हैं।&lt;br /&gt;
५.१ भिन्न जीवनदृष्टि के लोग : शीघ्रातिशीघ्र भिन्न जीवनदृष्टि के लोगों को आत्मसात करना आवश्यक होता 	है। अन्यथा समाज जीवन अस्थिर और संघर्षमय बन जाता है।&lt;br /&gt;
५.२ स्वार्थ/संकुचित अस्मिताएँ :आवश्यकताओं की पुर्ति तक तो स्वार्थ भावना समर्थनीय है। अस्मिता या 	अहंकार यह प्रत्येक जिवंत ईकाई का एक स्वाभाविक पहलू होता है। किन्तु जब किसी ईकाई के विशिष्ट स्तर की यह अस्मिता अपने से ऊपर की ईकाई जिसका वह हिस्सा है, उसकी अस्मिता से बड़ी लगने लगती है तब समाज जीवन की शांति नष्ट हो जाती है। इसलिए यह आवश्यक है की मजहब, रिलिजन,प्रादेशिक अलगता, भाषिक भिन्नता, धनका अहंकार, बौद्धिक श्रेष्ठता आदि जैसी संकुचित अस्मिताएँ अपने से ऊपर की जीवंत ईकाई की अस्मिता के विरोध में नहीं हो। &lt;br /&gt;
५.३ विपरीत शिक्षा : विपरीत या दोषपूर्ण शिक्षा यह तो सभी समस्याओं की जड़ होती है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== कारक तत्त्व ===&lt;br /&gt;
 : कारक तत्वों से मतलब है धर्मपालन में सहायता देनेवाले घटक। ये निम्न होते हैं।&lt;br /&gt;
६.१ धर्म व्यवस्था : शासन धर्मनिष्ठ रहे यह सुनिश्चित करना धर्म व्यवस्था की जिम्मेदारी है। अपने त्याग, तपस्या, ज्ञान, लोकसंग्रह, चराचर के हित का चिन्तन, समर्पण भाव और कार्यकुशलता के आधारपर 	समाज से प्राप्त समर्थन प्राप्त कर वह देखे की कोई अयोग्य व्यक्ति शासक नहीं बनें।&lt;br /&gt;
६.२ शिक्षा : ६.२.१ कुटुम्ब शिक्षा 	६.२.२ विद्याकेन्द्र की शिक्षा 	६.२.३ लोकशिक्षा &lt;br /&gt;
६.३ धर्मनिष्ठ शासन : शासक का धर्मशास्त्र का जानकार होना और स्वयं धर्माचरणी होना भी आवश्यक होता है। जब शासन धर्म के अनुसार चलता है, धर्म व्यवस्थाद्वारा नियमित निर्देशित होता है तब धर्म भी 	स्थापित होता है और राज्य व्यवस्था भी श्रेष्ठ बनती है।&lt;br /&gt;
६.४ धर्मनिष्ठों का सामाजिक नेतृत्व : समाज जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में धर्मनिष्ठ लोग जब अच्छी संख्या में दिखाई देते हैं तब समाज मानस धर्मनिष्ठ बनता है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== चरण ==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== : धर्म का अनुपालन जब लोग स्वेच्छा से करनेवाले समाज के निर्माण के लिए दो बातें अत्यंत महत्वपूर्ण होतीं हैं। एक गर्भ में श्रेष्ठ जीवात्मा की स्थापना और दूसरे शिक्षा और संस्कार। ==&lt;br /&gt;
शिक्षा और संस्कार में -&lt;br /&gt;
७.१ जन्मपूर्व और शैशव कालमें अधिजनन शास्त्र के आधारपर मार्गदर्शन। &lt;br /&gt;
७.२ बाल्य काल : कुटुम्ब की शिक्षा के साथ विद्याकेन्द्र शिक्षा का समायोजन 			           &lt;br /&gt;
७.३ यौवन काल: अहंकार, बुद्धि के सही मोड़ हेतु सत्संग, प्रेरणा, वातावरण, ज्ञानार्जन/बलार्जन/कौशलार्जन आदि &lt;br /&gt;
७.४ प्रौढ़ावस्था : पूर्व ज्ञान/आदतों को व्यवस्थित करने के लिए सामाजिक वातावरण और मार्गदर्शन&lt;br /&gt;
७.४.१ पुरोहित&lt;br /&gt;
७.४.२ मेले/यात्राएं&lt;br /&gt;
७.४.३ कीर्तनकार/प्रवचनकार&lt;br /&gt;
७.४.४ धर्माचार्य&lt;br /&gt;
७.४.५ दृक्श्राव्य माध्यम –चित्रपट, दूरदर्शन आदि&lt;br /&gt;
७.४.६ आन्तरजाल&lt;br /&gt;
७.४.७ कानून का डर &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== धर्म निर्णय व्यवस्था ==&lt;br /&gt;
 : सामान्यत: जब भी धर्म की समझसे सम्बन्धित समस्या हो तब धर्म निर्णय की व्यवस्था उपलब्ध होनी चाहिये। इस व्यवस्था के तीन स्तर होना आवश्यक है। पहला स्तर तो स्थानिक धर्म के जानकार, दूसरा जनपदीय या निकटके तीर्थक्षेत्र में धर्मज्ञ परिषद्, और तीसरा स्तर अखिल भारतीय या राष्ट्रीय धर्मज्ञ परिषद्। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== माध्यम ==&lt;br /&gt;
 : धर्म अनुपालन करवाने के मुख्यत: दो प्रकारके माध्यम होते हैं। &lt;br /&gt;
९.१ कुटुम्ब के दायरे में : धर्म शिक्षा का अर्थ है सदाचार की शिक्षा। धर्म की शिक्षा के लिए कुटुम्ब यह सबसे श्रेष्ठ पाठशाला है। विद्याकेन्द्र की शिक्षा तो कुटुम्ब में मिली धर्म शिक्षा की पुष्टि या आवश्यक सुधार के लिए ही होती है। कुटुम्ब में धर्म शिक्षा तीन तरह से होती है। गर्भपूर्व संस्कार, गर्भ संस्कार और शिशु संस्कार और आदतें। मनुष्य की आदतें भी बचपन में ही पक्की हो जातीं हैं। &lt;br /&gt;
९.२ कुटुम्ब से बाहर के माध्यम : मनुष्य तो हर पल सीखता ही रहता है। इसलिए कुटुम्ब से बाहर भी वह कई बातें सीखता है। माध्यमों में मित्र मंडली, विद्यालय, समाज का सांस्कृतिक स्तर और क़ानून व्यवस्था आदि।&lt;br /&gt;
जीवन के भारतीय प्रतिमान की प्रतिष्ठापना की प्रक्रिया से अपेक्षित परिणामों की चर्चा हम [[Form of an Ideal Society (आदर्श समाज का स्वरूप)|अगले]] अध्याय में करेंगे।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[Category:Bhartiya Jeevan Pratiman (भारतीय जीवन प्रतिमान)]]&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Dilipkelkar</name></author>
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		<id>https://dharmawiki.org/index.php?title=Responsibilities_at_Societal_Level_(%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%AE%E0%A4%BE%E0%A4%9C%E0%A4%BF%E0%A4%95_%E0%A4%A7%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%AE_%E0%A4%85%E0%A4%A8%E0%A5%81%E0%A4%AA%E0%A4%BE%E0%A4%B2%E0%A4%A8)&amp;diff=119952</id>
		<title>Responsibilities at Societal Level (सामाजिक धर्म अनुपालन)</title>
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		<updated>2019-07-21T06:24:34Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Dilipkelkar: लेख सम्पादित किया&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{One source|date=January 2019}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जीवन के भारतीय प्रतिमान की पुनर्प्रतिष्ठा के लिए राष्ट्र के संगठन की विभिन्न प्रणालियों के स्तर पर उन कर्तव्यों का याने ईकाई धर्म का विचार और प्रत्यक्ष धर्म अनुपालन की प्रक्रिया कैसे चलेगी, ऐसा दो पहलुओं में हम परिवर्तन की प्रक्रिया का विचार करेंगे। वैसे तो धर्म अनुपालन की प्रक्रिया का विचार हमने समाज धारणा शास्त्र के विषय में किया है। फिर भी परिवर्तन प्रक्रिया को यहाँ फिर से दोहराना उपयुक्त होगा।   &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== विभिन्न सामाजिक प्रणालियों के धर्म ==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== कुटुम्ब ===&lt;br /&gt;
कुटुम्ब यह परिवर्तन का सबसे जड़मूल का माध्यम है। समाज जीवन की वह नींव होता है। वह जितना सशक्त और व्यापक भूमिका का निर्वहन करेगा समाज उतना ही श्रेष्ठ बनेगा। कुटुम्ब में दो प्रकार के काम होते हैं। पहले हैं कुटुम्ब के लिए और दूसरे हैं कुटुम्ब में याने समाज, सृष्टी के लिए। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== कुटुम्ब की – कुटुम्ब के लिए ===&lt;br /&gt;
१. क्षमता और योग्यता आधारित कर्तव्य &lt;br /&gt;
२. क्षमता और योग्यता के अनुसार सार्थक योगदान &lt;br /&gt;
३. शुद्ध सस्नेहयुक्त सदाचारयुक्त परस्पर व्यवहार &lt;br /&gt;
४. बड़ों का आदर, सेवा। छोटों के लिए आदर्श और प्यार। &lt;br /&gt;
५. कुटुंबहित अपने हित से ऊपर। कर्त्तव्य परायणता। अपने कर्तव्यों के प्रति आग्रही।&lt;br /&gt;
६. स्वावलंबन / परस्परावलंबन।&lt;br /&gt;
७. कुटुम्ब के सभी काम करना आना और करना।&lt;br /&gt;
८. एकात्मता का विस्तार – कुटुंब&amp;lt; समाज&amp;lt; सृष्टी&amp;lt; विश्व। लेकिन इसकी नींव कुटुंब जीवन में ही पड़ेगी और पक्की होगी। &lt;br /&gt;
९. कौशल, ज्ञान, बल और पुण्य अर्जन की दृष्टी से अध्ययन और संस्कार &lt;br /&gt;
१०. कौटुम्बिक कुशलताएँ, आदतें, रीति-रिवाज, परम्पराएँ आदि &lt;br /&gt;
११. कुटुम्ब प्रमुख सर्वोपरि : कुटुम्ब के सब ही सदस्यों को कुटुम्ब प्रमुख बनने की प्रेरणा और इस हेतु से उनके द्वारा अपना विवेक, कौशल, सयानापन, निर्णय क्षमता, अपार स्नेह आदि का विकास। कुटुम्ब प्रमुख की आज्ञाओं का पालन - आज्ञाकारिता। &lt;br /&gt;
१२. काया, वाचा, मनसा सभी से मधुर व्यवहार। &lt;br /&gt;
१३. अच्छा – बेटा/बेटी, भाई/बहन, पति/पत्नि, पिता/माता, गृहस्थ/गृहिणी, रिश्तेदार आदि बनना/बनाना।&lt;br /&gt;
१४. वर्णाश्रम धर्म का पालन – 	स्वभावज कर्म करते जाना।&lt;br /&gt;
१४.१ सवर्ण/सजातीय विवाह 	&lt;br /&gt;
१४.२ कौटुम्बिक व्यवसाय में सहभाग &lt;br /&gt;
१४.३ ज्ञान, कौशल, श्रेष्ठ परम्पराओं का निर्वहन, परिष्कार, निर्माण और अगली पीढी को अंतरण &lt;br /&gt;
१४.४ आयु की अवस्था के अनुसार ब्रह्मचर्य, गृहस्थ और वानप्रस्थ आदि आश्रमों के धर्म की जिम्मेदारियों का		 निर्वहन।  &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== कुटुम्ब में – समाज के लिए ===&lt;br /&gt;
१. सामाजिक कर्तव्यों का निर्वहन 	१.१ समाज संगठन की प्रणालियों (कुटुंब, जाति, ग्राम, राष्ट्र) में 							१.२ सामाजिक व्यवस्थाओं (रक्षण, पोषण और शिक्षण) में &lt;br /&gt;
२. ज्ञानार्जन, कौशलार्जन, बलार्जन और पुण्यार्जन की मानसिकता और केवल इन के लिए अटन ।&lt;br /&gt;
३. स्वावलंबन और परस्परावलंबन ।&lt;br /&gt;
४. शत्रुत्व भाववाले समाज के घटकों के साथ भी शान्ततापूर्ण और सुखी सहजीवन ।&lt;br /&gt;
५. एकात्मता (समाज और सृष्टी के साथ) का व्यवहार/सुख और दु:ख में सहानुभूति और सहभागिता । &lt;br /&gt;
६. विभिन्न क्षेत्रों में - जैसे शासन, न्याय, समृद्धि आदि क्षेत्रों के नेता &amp;gt; आचार्य &amp;gt; धर्म । धर्म सर्वोपरि । &lt;br /&gt;
७. सद्गुण, सदाचार, स्वावलंबन, सत्यनिष्ठा, सादगी, सहजता, सौन्दर्यबोध, स्वतंत्रता, संयम, स्वदेशी आदि का व्यवहार साथ ही में त्याग, तपस्या, समाधान, शान्ति, अभय, विजिगीषा आदि गुणों का विकास।  &lt;br /&gt;
८. मनसा, वाचा कर्मणा ‘सर्वे भवन्तु सुखिन:’ के प्रयास।&lt;br /&gt;
९. वर्ण-धर्म की और जाति-धर्म की शिक्षा देना। जब लोग अपने वर्ण के अनुसार आचरण करते हैं तब राष्ट्र की संस्कृति का विकास और रक्षण होता है। और जब लोग अपने जातिधर्म के अनुसार व्यवसाय करते हैं तब देश समृद्ध बनता है, ओर बना रहता है। &lt;br /&gt;
१०. धर्माचरणी और समाजभक्त/देशभक्त/राष्ट्रभक्त/परमात्मा में श्रद्धा रखनेवालों का निर्माण । &lt;br /&gt;
११. धर्मशिक्षा और कर्मशिक्षा ।&lt;br /&gt;
१२. संयमित उपभोग । न्यूनतम (इष्टतम) उपभोग । &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== ग्रामकुल ==&lt;br /&gt;
१. ग्राम को स्वावलंबी ग्राम बनाना  &lt;br /&gt;
२. ग्राम की अर्थव्यवस्था को ठीक से बिठाना और चलाना &lt;br /&gt;
३. संयुक्त कुटुंबों की प्रतिष्ठापना का वातावरण &lt;br /&gt;
४. कौटुम्बिक उद्योगों की प्रतिष्ठापना का वातावरण &lt;br /&gt;
५. कुटुम्ब भावना से प्रत्येक व्यक्ति की सम्मानपूर्ण आजीविका की व्यवस्था करना &lt;br /&gt;
६. कौटुम्बिक उद्योग और जातियों में समन्वय रखना&lt;br /&gt;
७. शासकीय व्यवस्थाओं के प्रति जिम्मेदारियां : कर देना, शिक्षण, पोषण और रक्षण की व्यवस्थाओं में श्रेष्ठ व्यक्तियों का और संसाधनों का योगदान देना &lt;br /&gt;
८. ग्राम, एक कुल बने ऐसा वातावरण बनाए रखना।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== गुरुकुल / विद्यालय ==&lt;br /&gt;
१. वर्णशिक्षा की व्यवस्था &lt;br /&gt;
२. ज्ञानार्जन, कौशलार्जन, बलार्जन के लिए मार्गदर्शन &lt;br /&gt;
३. शास्त्रीय शिक्षा का प्रावधान &lt;br /&gt;
४. श्रेष्ठ परम्पराओं के निर्माण की शिक्षा &lt;br /&gt;
५. जीवन के तत्त्वज्ञान और व्यवहार की शिक्षा&lt;br /&gt;
६. जीवन के लिए महत्वपूर्ण सामाजिक संगठन प्रणालियाँ और व्यवस्थाओं की समझ और यथाशक्ति योगदान की प्रेरणा। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== कौशल विधा पंचायत ==&lt;br /&gt;
१. समाज की किसी एक आवश्यकता की पूर्ति करना । कभी कोई कमी न हो यह सुनिश्चित करना।&lt;br /&gt;
२. धर्म के मार्गदर्शन में अपने कौशल विधा-धर्म का निर्धारण और कौशल विधा प्रणाली में प्रचार प्रसार &lt;br /&gt;
३. अन्य कौशल विधाओं के साथ समन्वय &lt;br /&gt;
४. राष्ट्र सर्वोपरि यह भावना सदा जाग्रत रखना &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== व्यवस्थाओं के धर्म ==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== धर्म व्यवस्था ===&lt;br /&gt;
यह कोई नियमित व्यवस्था नहीं होती। यह जाग्रत, नि:स्वार्थी, सर्वभूतहित में सदैव प्रयासरत रहनेवाले पंडितों का समूह होता है। यह समूह सक्रीय होने से समाज ठीक चलता है। आवश्यकतानुसार इस समूह की जिम्मेदारियां बढ़ जातीं है। ऐसे आपद्धर्म के निर्वहन के लिए भी यह समूह पर्याप्त सामर्थ्यवान हो।  &lt;br /&gt;
१. कालानुरूप धर्म को व्याख्यायित करना। &lt;br /&gt;
२. वर्णों के ‘स्व’धर्मों का पालन करने की व्यवस्था की पस्तुति कर शिक्षा और शासन की मददसे समाज में उन्हें स्थापित करना। व्यक्तिगत और सामाजिक धर्म/संस्कृति के अनुसार व्यवहार का वातावरण बनाना। जब वर्ण-धर्मं का पालन लोग करते हैं तब देश में संस्कृति का विकास और रक्षण होता है। जिनकी ओर देखकर लोग वर्ण धर्म का पालन कर सकें ऐसे ‘श्रेष्ठ’ लोगों का निर्माण करना। &lt;br /&gt;
३. स्वाभाविक, शासनिक और आर्थिक ऐसी सभी प्रकार की स्वतन्त्रता की रक्षा करना। &lt;br /&gt;
४. शासनपर अपने ज्ञान, त्याग, तपस्या, लोकसंग्रह तथा सदैव लोकहित के चिंतन के माध्यम से नैतिक दबाव निर्माण करना। शासन को सदाचारी, कुशल और सामर्थ्य संपन्न बनाए रखने के लिए मार्गदर्शन करना। अधर्माचरणी शासन को हटाकर धर्माचरणी शासन को प्रतिष्ठित करना।&lt;br /&gt;
५. लोकशिक्षा (कुटुम्ब शिक्षा इसी का हिस्सा है) और विद्यालयीन शिक्षा की प्रभावी व्यवस्था करना। जैसे लिखा पढी न्यूनतम करने की दिशा में बढ़ना। वाणी/शब्द की प्रतिष्ठा बढ़ाना। जीवन को साधन सापेक्षता से साधना  सापेक्षता की ओर ले जाने के लिए अपनी कथनी और करनी से मार्गदर्शन करना। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== शासन व्यवस्था ===&lt;br /&gt;
१. अंतर्बाह्य शत्रुओं से लोगों की शासनिक स्वतन्त्रता की रक्षा करना। &lt;br /&gt;
२. धर्मं के दायरे में रहकर दुष्टों और मूर्खों को नियंत्रण में रखना। &lt;br /&gt;
३. दंड व्यवस्था के अंतर्गत न्याय व्यवस्था का निर्माण करना। किसी पर अन्याय हो ही नहीं ऐसी दंड व्यवस्था के निर्माण का प्रयास करना। &lt;br /&gt;
४. श्रेष्ठ शासक परम्परा निर्माण करना।&lt;br /&gt;
५. प्रभावी, समाजहित की शिक्षा देनेवाले शिक्षा केन्द्रों को संरक्षण, समर्थन और सहायता देकर और प्रभावी बनाने के लिए यथाशक्ति प्रयास करना। ऐसा करने से शासन का काम काफी सरल हो जाता है। &lt;br /&gt;
६. धर्मं व्यवस्था से समय समयपर मार्गदर्शन प्राप्त करते रहना।  &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== समृद्धि व्यवस्था ===&lt;br /&gt;
१. योग्य शिक्षा के द्वारा समाज में धर्म के अविरोधी इच्छाओं का ही विकास हो यह सुनिश्चित करना। &lt;br /&gt;
२. समाज के प्रत्येक घटक की सभी आवश्यकताओं की पूर्ति करना, धर्म विरोधी इच्छाओं की नहीं। समाज की आर्थिक स्वतन्त्रता को अबाधित रखना। &lt;br /&gt;
३. प्राकृतिक संसाधनों का न्यूनतम उपयोग हो ऐसा वातावरण बनाना। संयमित उपभोग को प्रतिष्ठित करना। &lt;br /&gt;
४. प्रकृति का प्रदूषण नहीं होने देना। प्रकृति का सन्तुलन बनाए रखना। &lt;br /&gt;
५. कौटुम्बिक उद्योग, जातियाँ और ग्राम मिलकर समृद्धि निर्माण होती है। ये तीनों ईकाईयाँ फलेफूले और इनका स्वस्थ ऐसा तानाबाना बना रहे ऐसा वातावरण रहे।&lt;br /&gt;
६. पैसे का विनिमय न्यूनतम रहे ऐसी व्यवस्था निर्माण करना।&lt;br /&gt;
अब हम धर्म के अनुपालन की प्रक्रिया का विचार आगे करेंगे।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== धर्म अनुपालन की प्रक्रिया ==&lt;br /&gt;
हमने जाना है कि समाज के सुख, शांति, स्वतंत्रता, सुसंस्कृतता के लिए समाज का धर्मनिष्ठ होना आवश्यक होता है। यहाँ मोटे तौरपर धर्म से मतलब कर्तव्य से है। समाज धारणा के लिए कर्तव्योंपर आधारित जीवन अनिवार्य होता है। समाज धारणा के लिए धर्म-युक्त व्यवहार में आनेवाली जटिलताओं को और उसके अनुपालन की प्रक्रिया को समझने का प्रयास करेंगे। इन में व्यक्तिगत स्तर की बातों का हमने पूर्व के अध्याय में विचार किया है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== विभिन्न ईकाईयों के स्तरपर ===&lt;br /&gt;
१.१ कुटुम्ब : समाज की सभी इकाइयों के विभिन्न स्तरोंपर उचित भूमिका निभानेवाले श्रेष्ठ मानव का निर्माण करना। कौटुम्बिक व्यवसाय के माध्यम से समाज की किसी आवश्यकता की पूर्ति करना। &lt;br /&gt;
१.२ ग्राम : ग्राम की भूमिका छोटे विश्व और बड़े कुटुम्ब की तरह ही होती है। जिस तरह कुटुम्ब के सदस्यों में आपस में पैसे का लेनदेन नहीं होता उसी तरह अच्छे ग्राम में कुटुम्बों में आपस में पैसे का लेनदेन नहीं होता। प्रत्येक की सम्मान और स्वतन्त्रता के साथ अन्न, वस्त्र, भवन, शिक्षा, आजीविका, सुरक्षा आदि सभी आवश्यकताओं की पूर्ति होती है।&lt;br /&gt;
१.३ कौशल विधा : समाज जीवन की आवश्यकताओं की हर विधा के अनुसार व्यवसाय विधा समूह बनते हैं। इन समूहों के भी सामान्य व्यक्ति से लेकर विश्व के स्तरतक के लिए करणीय और अकरणीय कार्य होते हैं। कर्तव्य होते हैं। इन्हें व्यवसाय विधा धर्म कहेंगे। इनमें पदार्थ के उत्पादन के रूप में आर्थिक स्वतन्त्रता के किसी एक पहलू की रक्षा में योगदान करना होता है।  शिक्षा/संस्कार, वस्तुएं, भावनाएं, विचार, कला आदि में से समाज जीवन की आवश्यकता में से किसी एक विधा के पदार्थ की निरंतर आपूर्ति करना। पदार्थ का अर्थ केवल वस्तु नहीं है। जिस पद याने शब्द का अर्थ होता है वह पदार्थ कहलाता है। व्यावसायिक समूह का काम कौशल का विकास करना, कौशल का पीढ़ी दर पीढ़ी अंतरण करना और अन्य व्यवसायिक समूहों से समन्वय रखना आदि है।&lt;br /&gt;
१.४ भाषिक समूह : भाषा का मुख्य उपयोग परस्पर संवाद है। संवाद विचारों की सटीक अभिव्यक्ति   करनेवाला हो इस हेतु से भाषाएँ बनतीं हैं। संवाद में सहजता, सरलता, सुगमता से आत्मीयता बढ़ती है। इसी हेतु से भाषिक समूह बनते हैं। &lt;br /&gt;
१.५ प्रादेशिक समूह:शासनिक और व्यवस्थात्मक सुविधा की दृष्टि से प्रादेशिक स्तरका महत्त्व होता है।  &lt;br /&gt;
१.६ राष्ट्र:राष्ट्र अपने समाज के लिये विविध प्रकारके संगठनों का और व्यवस्थाओं का निर्माण करता है। &lt;br /&gt;
१.७ विश्व:पूर्व में बताई हुई १.१ से लेकर १.६ तक की सभी इकाइयां वैश्विक हित की अविरोधी रहें।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== प्रकृति सुसंगतता ===&lt;br /&gt;
समाज जीवन में केन्द्रिकरण और विकेंद्रीकरण का समन्वय हो यह आवश्यक है। विशाल उद्योग, बाजार की मंडियां, शासकीय कार्यालय, व्यावसायिक, भाषिक, प्रादेशिक समूहों के समन्वय की व्यवस्थाएं आदि के लिये शहरों की आवश्यकता होती है। लेकिन इनमें अनावश्यक केन्द्रीकरण न हो पाए। वनवासी या गिरिजन भी ग्राम व्यवस्था से ही जुड़े हुए होने चाहिए। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== प्रक्रियाएं ===&lt;br /&gt;
 : धर्म के अनुपालन में बुद्धि के स्तरपर धर्म के प्रति पर्याप्त संज्ञान, मन के स्तरपर कौटुम्बिक भावना, अनुशासन और श्रद्धा (आज्ञाकारिता) का विकास तथा शारीरिक स्तरपर सहकारिता और परोपकार की आदतें अत्यंत आवश्यक हैं। &lt;br /&gt;
३.१ धर्म संज्ञान : ‘समझना’ यह बुद्धि का काम होता है। इसलिए जब बच्चे का बुद्धि का अंग विकसित हो रहा होता है उसे धर्म की बौद्धिक याने तर्क तथा कर्मसिद्धांत के आधारपर शिक्षा देना उचित होता है। इस दृष्टि से तर्कशास्त्र की समझ या सरल शब्दों में ‘किसी भी बात के करने से पहले चराचर के हित में उस बात को कैसे करना चाहिए’ इसे समझने की क्षमता का विकास आवश्यक होता है।&lt;br /&gt;
३.२ कौटुम्बिक भावना का विकास : समाज के सभी परस्पर संबंधों में कौटुम्बिक भावना से व्यवहार का आधार धर्मसंज्ञान ही तो होता है। मन को बुद्धि के नियंत्रण में रखना ही मन की शिक्षा होती है। दुर्योधन के निम्न कथन से सब परिचित हैं। 		&lt;br /&gt;
जानामी धर्मं न च में प्रवृत्ति: ।   जानाम्यधर्मं न च में निवृत्ति: ।।&lt;br /&gt;
३.३ धर्माचरण की आदतें: दुर्योधन के उपर्युक्त कथन को ध्यान में रखकर ही गर्भधारणा से ही बच्चे को धर्माचरण की आदतों की शिक्षा देना महत्त्वपूर्ण बन जाता है। आदत का अर्थ है जिस बात के करने में कठिनाई का अनुभव नहीं होता। जब किसी बात के बारबार करने से आचरण में यह सहजता आती है तब वह आदत बन जाती है। और जब उसे बुद्धिका अधिष्ठान मिल जाता है तब वह आदतें मनुष्य का स्वभाव ही बन जातीं हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== धर्म के अनुपालन के स्तर और साधन ===&lt;br /&gt;
 : &lt;br /&gt;
४.१ धर्म के अनुपालन करनेवालों के राष्ट्रभक्त, अराष्ट्रीय और राष्ट्रद्रोही ऐसे मोटे-मोटे तीन स्तर होते हैं। &lt;br /&gt;
४.२ धर्म के अनुपालन के साधन : धर्म का अनुपालन पूर्व में बताए अनुसार शिक्षा, आदेश, प्रायश्चित्त/	पश्चात्ताप 	तथा दंड ऐसा चार प्रकार से होता है। शासन दुर्बल होने से समाज में प्रमाद करनेवालों की संख्या में वृद्धि 	होती है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== धर्म के अनुपालन के अवरोध ===&lt;br /&gt;
 : धर्म के अनुपालन में निम्न बातें अवरोध-रूप होतीं हैं।&lt;br /&gt;
५.१ भिन्न जीवनदृष्टि के लोग : शीघ्रातिशीघ्र भिन्न जीवनदृष्टि के लोगों को आत्मसात करना आवश्यक होता 	है। अन्यथा समाज जीवन अस्थिर और संघर्षमय बन जाता है।&lt;br /&gt;
५.२ स्वार्थ/संकुचित अस्मिताएँ :आवश्यकताओं की पुर्ति तक तो स्वार्थ भावना समर्थनीय है। अस्मिता या 	अहंकार यह प्रत्येक जिवंत ईकाई का एक स्वाभाविक पहलू होता है। किन्तु जब किसी ईकाई के विशिष्ट स्तर की यह अस्मिता अपने से ऊपर की ईकाई जिसका वह हिस्सा है, उसकी अस्मिता से बड़ी लगने लगती है तब समाज जीवन की शांति नष्ट हो जाती है। इसलिए यह आवश्यक है की मजहब, रिलिजन,प्रादेशिक अलगता, भाषिक भिन्नता, धनका अहंकार, बौद्धिक श्रेष्ठता आदि जैसी संकुचित अस्मिताएँ अपने से ऊपर की जीवंत ईकाई की अस्मिता के विरोध में नहीं हो। &lt;br /&gt;
५.३ विपरीत शिक्षा : विपरीत या दोषपूर्ण शिक्षा यह तो सभी समस्याओं की जड़ होती है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== कारक तत्त्व ===&lt;br /&gt;
 : कारक तत्वों से मतलब है धर्मपालन में सहायता देनेवाले घटक। ये निम्न होते हैं।&lt;br /&gt;
६.१ धर्म व्यवस्था : शासन धर्मनिष्ठ रहे यह सुनिश्चित करना धर्म व्यवस्था की जिम्मेदारी है। अपने त्याग, तपस्या, ज्ञान, लोकसंग्रह, चराचर के हित का चिन्तन, समर्पण भाव और कार्यकुशलता के आधारपर 	समाज से प्राप्त समर्थन प्राप्त कर वह देखे की कोई अयोग्य व्यक्ति शासक नहीं बनें।&lt;br /&gt;
६.२ शिक्षा : ६.२.१ कुटुम्ब शिक्षा 	६.२.२ विद्याकेन्द्र की शिक्षा 	६.२.३ लोकशिक्षा &lt;br /&gt;
६.३ धर्मनिष्ठ शासन : शासक का धर्मशास्त्र का जानकार होना और स्वयं धर्माचरणी होना भी आवश्यक होता है। जब शासन धर्म के अनुसार चलता है, धर्म व्यवस्थाद्वारा नियमित निर्देशित होता है तब धर्म भी 	स्थापित होता है और राज्य व्यवस्था भी श्रेष्ठ बनती है।&lt;br /&gt;
६.४ धर्मनिष्ठों का सामाजिक नेतृत्व : समाज जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में धर्मनिष्ठ लोग जब अच्छी संख्या में दिखाई देते हैं तब समाज मानस धर्मनिष्ठ बनता है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== चरण ===&lt;br /&gt;
 : धर्म का अनुपालन जब लोग स्वेच्छा से करनेवाले समाज के निर्माण के लिए दो बातें अत्यंत महत्वपूर्ण होतीं हैं। एक गर्भ में श्रेष्ठ जीवात्मा की स्थापना और दूसरे शिक्षा और संस्कार। &lt;br /&gt;
शिक्षा और संस्कार में -&lt;br /&gt;
७.१ जन्मपूर्व और शैशव कालमें अधिजनन शास्त्र के आधारपर मार्गदर्शन। &lt;br /&gt;
७.२ बाल्य काल : कुटुम्ब की शिक्षा के साथ विद्याकेन्द्र शिक्षा का समायोजन 			           &lt;br /&gt;
७.३ यौवन काल: अहंकार, बुद्धि के सही मोड़ हेतु सत्संग, प्रेरणा, वातावरण, ज्ञानार्जन/बलार्जन/कौशलार्जन आदि &lt;br /&gt;
७.४ प्रौढ़ावस्था : पूर्व ज्ञान/आदतों को व्यवस्थित करने के लिए सामाजिक वातावरण और मार्गदर्शन&lt;br /&gt;
७.४.१ पुरोहित&lt;br /&gt;
७.४.२ मेले/यात्राएं&lt;br /&gt;
७.४.३ कीर्तनकार/प्रवचनकार&lt;br /&gt;
७.४.४ धर्माचार्य&lt;br /&gt;
७.४.५ दृक्श्राव्य माध्यम –चित्रपट, दूरदर्शन आदि&lt;br /&gt;
७.४.६ आन्तरजाल&lt;br /&gt;
७.४.७ कानून का डर &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== धर्म निर्णय व्यवस्था ===&lt;br /&gt;
 : सामान्यत: जब भी धर्म की समझसे सम्बन्धित समस्या हो तब धर्म निर्णय की व्यवस्था उपलब्ध होनी चाहिये। इस व्यवस्था के तीन स्तर होना आवश्यक है। पहला स्तर तो स्थानिक धर्म के जानकार, दूसरा जनपदीय या निकटके तीर्थक्षेत्र में धर्मज्ञ परिषद्, और तीसरा स्तर अखिल भारतीय या राष्ट्रीय धर्मज्ञ परिषद्। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== माध्यम ===&lt;br /&gt;
 : धर्म अनुपालन करवाने के मुख्यत: दो प्रकारके माध्यम होते हैं। &lt;br /&gt;
९.१ कुटुम्ब के दायरे में : धर्म शिक्षा का अर्थ है सदाचार की शिक्षा। धर्म की शिक्षा के लिए कुटुम्ब यह सबसे श्रेष्ठ पाठशाला है। विद्याकेन्द्र की शिक्षा तो कुटुम्ब में मिली धर्म शिक्षा की पुष्टि या आवश्यक सुधार के लिए ही होती है। कुटुम्ब में धर्म शिक्षा तीन तरह से होती है। गर्भपूर्व संस्कार, गर्भ संस्कार और शिशु संस्कार और आदतें। मनुष्य की आदतें भी बचपन में ही पक्की हो जातीं हैं। &lt;br /&gt;
९.२ कुटुम्ब से बाहर के माध्यम : मनुष्य तो हर पल सीखता ही रहता है। इसलिए कुटुम्ब से बाहर भी वह कई बातें सीखता है। माध्यमों में मित्र मंडली, विद्यालय, समाज का सांस्कृतिक स्तर और क़ानून व्यवस्था आदि।&lt;br /&gt;
जीवन के भारतीय प्रतिमान की प्रतिष्ठापना की प्रक्रिया से अपेक्षित परिणामों की चर्चा हम [[Form of an Ideal Society (आदर्श समाज का स्वरूप)|अगले]] अध्याय में करेंगे।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[Category:Bhartiya Jeevan Pratiman (भारतीय जीवन प्रतिमान)]]&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Dilipkelkar</name></author>
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		<id>https://dharmawiki.org/index.php?title=Responsibilities_at_Societal_Level_(%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%AE%E0%A4%BE%E0%A4%9C%E0%A4%BF%E0%A4%95_%E0%A4%A7%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%AE_%E0%A4%85%E0%A4%A8%E0%A5%81%E0%A4%AA%E0%A4%BE%E0%A4%B2%E0%A4%A8)&amp;diff=119951</id>
		<title>Responsibilities at Societal Level (सामाजिक धर्म अनुपालन)</title>
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		<updated>2019-07-21T06:14:35Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Dilipkelkar: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{One source|date=January 2019}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जीवन के भारतीय प्रतिमान की पुनर्प्रतिष्ठा के लिए राष्ट्र के संगठन की विभिन्न प्रणालियों के स्तरपर उन कर्तव्यों का याने ईकाई धर्म का विचार और प्रत्यक्ष धर्म अनुपालन की प्रक्रिया कैसे चलेगी ऐसा दो पहलुओं में हम परिवर्तन की प्रक्रिया का विचार करेंगे। वैसे तो धर्म अनुपालन की प्रक्रिया का विचार हमने समाज धारणा शास्त्र के विषय में किया है। फिर भी परिवर्तन प्रक्रिया को यहाँ फिर से दोहराना उपयुक्त होगा। &lt;br /&gt;
विभिन्न सामाजिक प्रणालियों के धर्म   &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कुटुम्ब &lt;br /&gt;
कुटुम्ब यह परिवर्तन का सबसे जड़मूल का माध्यम है। समाज जीवन की वह नींव होता है। वह जितना सशक्त और व्यापक भूमिका का निर्वहन करेगा समाज उतना ही श्रेष्ठ बनेगा। कुटुम्ब में दो प्रकार के काम होते हैं। पहले हैं कुटुम्ब के लिए और दूसरे हैं कुटुम्ब में याने समाज, सृष्टी के लिए। &lt;br /&gt;
कुटुम्ब की – कुटुम्ब के लिए  &lt;br /&gt;
१. क्षमता और योग्यता आधारित कर्तव्य &lt;br /&gt;
२. क्षमता और योग्यता के अनुसार सार्थक योगदान &lt;br /&gt;
३. शुद्ध सस्नेहयुक्त सदाचारयुक्त परस्पर व्यवहार &lt;br /&gt;
४. बड़ों का आदर, सेवा। छोटों के लिए आदर्श और प्यार। &lt;br /&gt;
५. कुटुंबहित अपने हित से ऊपर। कर्त्तव्य परायणता। अपने कर्तव्यों के प्रति आग्रही।&lt;br /&gt;
६. स्वावलंबन / परस्परावलंबन।&lt;br /&gt;
७. कुटुम्ब के सभी काम करना आना और करना।&lt;br /&gt;
८. एकात्मता का विस्तार – कुटुंब&amp;lt; समाज&amp;lt; सृष्टी&amp;lt; विश्व। लेकिन इसकी नींव कुटुंब जीवन में ही पड़ेगी और पक्की होगी। &lt;br /&gt;
९. कौशल, ज्ञान, बल और पुण्य अर्जन की दृष्टी से अध्ययन और संस्कार &lt;br /&gt;
१०. कौटुम्बिक कुशलताएँ, आदतें, रीति-रिवाज, परम्पराएँ आदि &lt;br /&gt;
११. कुटुम्ब प्रमुख सर्वोपरि : कुटुम्ब के सब ही सदस्यों को कुटुम्ब प्रमुख बनने की प्रेरणा और इस हेतु से उनके द्वारा अपना विवेक, कौशल, सयानापन, निर्णय क्षमता, अपार स्नेह आदि का विकास। कुटुम्ब प्रमुख की आज्ञाओं का पालन - आज्ञाकारिता। &lt;br /&gt;
१२. काया, वाचा, मनसा सभी से मधुर व्यवहार। &lt;br /&gt;
१३. अच्छा – बेटा/बेटी, भाई/बहन, पति/पत्नि, पिता/माता, गृहस्थ/गृहिणी, रिश्तेदार आदि बनना/बनाना।&lt;br /&gt;
१४. वर्णाश्रम धर्म का पालन – 	स्वभावज कर्म करते जाना।&lt;br /&gt;
१४.१ सवर्ण/सजातीय विवाह 	&lt;br /&gt;
१४.२ कौटुम्बिक व्यवसाय में सहभाग &lt;br /&gt;
१४.३ ज्ञान, कौशल, श्रेष्ठ परम्पराओं का निर्वहन, परिष्कार, निर्माण और अगली पीढी को अंतरण &lt;br /&gt;
१४.४ आयु की अवस्था के अनुसार ब्रह्मचर्य, गृहस्थ और वानप्रस्थ आदि आश्रमों के धर्म की जिम्मेदारियों का		 निर्वहन।  	   &lt;br /&gt;
कुटुम्ब में – समाज के लिए &lt;br /&gt;
१. सामाजिक कर्तव्यों का निर्वहन 	१.१ समाज संगठन की प्रणालियों (कुटुंब, जाति, ग्राम, राष्ट्र) में 							१.२ सामाजिक व्यवस्थाओं (रक्षण, पोषण और शिक्षण) में &lt;br /&gt;
२. ज्ञानार्जन, कौशलार्जन, बलार्जन और पुण्यार्जन की मानसिकता और केवल इन के लिए अटन ।&lt;br /&gt;
३. स्वावलंबन और परस्परावलंबन ।&lt;br /&gt;
४. शत्रुत्व भाववाले समाज के घटकों के साथ भी शान्ततापूर्ण और सुखी सहजीवन ।&lt;br /&gt;
५. एकात्मता (समाज और सृष्टी के साथ) का व्यवहार/सुख और दु:ख में सहानुभूति और सहभागिता । &lt;br /&gt;
६. विभिन्न क्षेत्रों में - जैसे शासन, न्याय, समृद्धि आदि क्षेत्रों के नेता &amp;gt; आचार्य &amp;gt; धर्म । धर्म सर्वोपरि । &lt;br /&gt;
७. सद्गुण, सदाचार, स्वावलंबन, सत्यनिष्ठा, सादगी, सहजता, सौन्दर्यबोध, स्वतंत्रता, संयम, स्वदेशी आदि का व्यवहार साथ ही में त्याग, तपस्या, समाधान, शान्ति, अभय, विजिगीषा आदि गुणों का विकास।  &lt;br /&gt;
८. मनसा, वाचा कर्मणा ‘सर्वे भवन्तु सुखिन:’ के प्रयास।&lt;br /&gt;
९. वर्ण-धर्म की और जाति-धर्म की शिक्षा देना। जब लोग अपने वर्ण के अनुसार आचरण करते हैं तब राष्ट्र की संस्कृति का विकास और रक्षण होता है। और जब लोग अपने जातिधर्म के अनुसार व्यवसाय करते हैं तब देश समृद्ध बनता है, ओर बना रहता है। &lt;br /&gt;
१०. धर्माचरणी और समाजभक्त/देशभक्त/राष्ट्रभक्त/परमात्मा में श्रद्धा रखनेवालों का निर्माण । &lt;br /&gt;
११. धर्मशिक्षा और कर्मशिक्षा ।&lt;br /&gt;
१२. संयमित उपभोग । न्यूनतम (इष्टतम) उपभोग । &lt;br /&gt;
ग्रामकुल &lt;br /&gt;
१. ग्राम को स्वावलंबी ग्राम बनाना  &lt;br /&gt;
२. ग्राम की अर्थव्यवस्था को ठीक से बिठाना और चलाना &lt;br /&gt;
३. संयुक्त कुटुंबों की प्रतिष्ठापना का वातावरण &lt;br /&gt;
४. कौटुम्बिक उद्योगों की प्रतिष्ठापना का वातावरण &lt;br /&gt;
५. कुटुम्ब भावना से प्रत्येक व्यक्ति की सम्मानपूर्ण आजीविका की व्यवस्था करना &lt;br /&gt;
६. कौटुम्बिक उद्योग और जातियों में समन्वय रखना&lt;br /&gt;
७. शासकीय व्यवस्थाओं के प्रति जिम्मेदारियां : कर देना, शिक्षण, पोषण और रक्षण की व्यवस्थाओं में श्रेष्ठ व्यक्तियों का और संसाधनों का योगदान देना &lt;br /&gt;
८. ग्राम, एक कुल बने ऐसा वातावरण बनाए रखना।&lt;br /&gt;
गुरुकुल / विद्यालय &lt;br /&gt;
१. वर्णशिक्षा की व्यवस्था &lt;br /&gt;
२. ज्ञानार्जन, कौशलार्जन, बलार्जन के लिए मार्गदर्शन &lt;br /&gt;
३. शास्त्रीय शिक्षा का प्रावधान &lt;br /&gt;
४. श्रेष्ठ परम्पराओं के निर्माण की शिक्षा &lt;br /&gt;
५. जीवन के तत्त्वज्ञान और व्यवहार की शिक्षा&lt;br /&gt;
६. जीवन के लिए महत्वपूर्ण सामाजिक संगठन प्रणालियाँ और व्यवस्थाओं की समझ और यथाशक्ति योगदान की प्रेरणा। &lt;br /&gt;
कौशल विधा पंचायत &lt;br /&gt;
१. समाज की किसी एक आवश्यकता की पूर्ति करना । कभी कोई कमी न हो यह सुनिश्चित करना।&lt;br /&gt;
२. धर्म के मार्गदर्शन में अपने कौशल विधा-धर्म का निर्धारण और कौशल विधा प्रणाली में प्रचार प्रसार &lt;br /&gt;
३. अन्य कौशल विधाओं के साथ समन्वय &lt;br /&gt;
४. राष्ट्र सर्वोपरि यह भावना सदा जाग्रत रखना &lt;br /&gt;
व्यवस्थाओं के धर्म &lt;br /&gt;
धर्म व्यवस्था &lt;br /&gt;
यह कोई नियमित व्यवस्था नहीं होती। यह जाग्रत, नि:स्वार्थी, सर्वभूतहित में सदैव प्रयासरत रहनेवाले पंडितों का समूह होता है। यह समूह सक्रीय होने से समाज ठीक चलता है। आवश्यकतानुसार इस समूह की जिम्मेदारियां बढ़ जातीं है। ऐसे आपद्धर्म के निर्वहन के लिए भी यह समूह पर्याप्त सामर्थ्यवान हो।  &lt;br /&gt;
१. कालानुरूप धर्म को व्याख्यायित करना। &lt;br /&gt;
२. वर्णों के ‘स्व’धर्मों का पालन करने की व्यवस्था की पस्तुति कर शिक्षा और शासन की मददसे समाज में उन्हें स्थापित करना। व्यक्तिगत और सामाजिक धर्म/संस्कृति के अनुसार व्यवहार का वातावरण बनाना। जब वर्ण-धर्मं का पालन लोग करते हैं तब देश में संस्कृति का विकास और रक्षण होता है। जिनकी ओर देखकर लोग वर्ण धर्म का पालन कर सकें ऐसे ‘श्रेष्ठ’ लोगों का निर्माण करना। &lt;br /&gt;
३. स्वाभाविक, शासनिक और आर्थिक ऐसी सभी प्रकार की स्वतन्त्रता की रक्षा करना। &lt;br /&gt;
४. शासनपर अपने ज्ञान, त्याग, तपस्या, लोकसंग्रह तथा सदैव लोकहित के चिंतन के माध्यम से नैतिक दबाव निर्माण करना। शासन को सदाचारी, कुशल और सामर्थ्य संपन्न बनाए रखने के लिए मार्गदर्शन करना। अधर्माचरणी शासन को हटाकर धर्माचरणी शासन को प्रतिष्ठित करना।&lt;br /&gt;
५. लोकशिक्षा (कुटुम्ब शिक्षा इसी का हिस्सा है) और विद्यालयीन शिक्षा की प्रभावी व्यवस्था करना। जैसे लिखा पढी न्यूनतम करने की दिशा में बढ़ना। वाणी/शब्द की प्रतिष्ठा बढ़ाना। जीवन को साधन सापेक्षता से साधना  सापेक्षता की ओर ले जाने के लिए अपनी कथनी और करनी से मार्गदर्शन करना। &lt;br /&gt;
शासन व्यवस्था &lt;br /&gt;
१. अंतर्बाह्य शत्रुओं से लोगों की शासनिक स्वतन्त्रता की रक्षा करना। &lt;br /&gt;
२. धर्मं के दायरे में रहकर दुष्टों और मूर्खों को नियंत्रण में रखना। &lt;br /&gt;
३. दंड व्यवस्था के अंतर्गत न्याय व्यवस्था का निर्माण करना। किसी पर अन्याय हो ही नहीं ऐसी दंड व्यवस्था के निर्माण का प्रयास करना। &lt;br /&gt;
४. श्रेष्ठ शासक परम्परा निर्माण करना।&lt;br /&gt;
५. प्रभावी, समाजहित की शिक्षा देनेवाले शिक्षा केन्द्रों को संरक्षण, समर्थन और सहायता देकर और प्रभावी बनाने के लिए यथाशक्ति प्रयास करना। ऐसा करने से शासन का काम काफी सरल हो जाता है। &lt;br /&gt;
६. धर्मं व्यवस्था से समय समयपर मार्गदर्शन प्राप्त करते रहना।  &lt;br /&gt;
समृद्धि व्यवस्था &lt;br /&gt;
१. योग्य शिक्षा के द्वारा समाज में धर्म के अविरोधी इच्छाओं का ही विकास हो यह सुनिश्चित करना। &lt;br /&gt;
२. समाज के प्रत्येक घटक की सभी आवश्यकताओं की पूर्ति करना, धर्म विरोधी इच्छाओं की नहीं। समाज की आर्थिक स्वतन्त्रता को अबाधित रखना। &lt;br /&gt;
३. प्राकृतिक संसाधनों का न्यूनतम उपयोग हो ऐसा वातावरण बनाना। संयमित उपभोग को प्रतिष्ठित करना। &lt;br /&gt;
४. प्रकृति का प्रदूषण नहीं होने देना। प्रकृति का सन्तुलन बनाए रखना। &lt;br /&gt;
५. कौटुम्बिक उद्योग, जातियाँ और ग्राम मिलकर समृद्धि निर्माण होती है। ये तीनों ईकाईयाँ फलेफूले और इनका स्वस्थ ऐसा तानाबाना बना रहे ऐसा वातावरण रहे।&lt;br /&gt;
६. पैसे का विनिमय न्यूनतम रहे ऐसी व्यवस्था निर्माण करना।&lt;br /&gt;
अब हम धर्म के अनुपालन की प्रक्रिया का विचार आगे करेंगे।&lt;br /&gt;
धर्म अनुपालन की प्रक्रिया  &lt;br /&gt;
हमने जाना है कि समाज के सुख, शांति, स्वतंत्रता, सुसंस्कृतता के लिए समाज का धर्मनिष्ठ होना आवश्यक होता है। यहाँ मोटे तौरपर धर्म से मतलब कर्तव्य से है। समाज धारणा के लिए कर्तव्योंपर आधारित जीवन अनिवार्य होता है। समाज धारणा के लिए धर्म-युक्त व्यवहार में आनेवाली जटिलताओं को और उसके अनुपालन की प्रक्रिया को समझने का प्रयास करेंगे। इन में व्यक्तिगत स्तर की बातों का हमने पूर्व के अध्याय में विचार किया है।&lt;br /&gt;
१. विभिन्न ईकाईयों के स्तरपर &lt;br /&gt;
१.१ कुटुम्ब : समाज की सभी इकाइयों के विभिन्न स्तरोंपर उचित भूमिका निभानेवाले श्रेष्ठ मानव का निर्माण करना। कौटुम्बिक व्यवसाय के माध्यम से समाज की किसी आवश्यकता की पूर्ति करना। &lt;br /&gt;
१.२ ग्राम : ग्राम की भूमिका छोटे विश्व और बड़े कुटुम्ब की तरह ही होती है। जिस तरह कुटुम्ब के सदस्यों में आपस में पैसे का लेनदेन नहीं होता उसी तरह अच्छे ग्राम में कुटुम्बों में आपस में पैसे का लेनदेन नहीं होता। प्रत्येक की सम्मान और स्वतन्त्रता के साथ अन्न, वस्त्र, भवन, शिक्षा, आजीविका, सुरक्षा आदि सभी आवश्यकताओं की पूर्ति होती है।&lt;br /&gt;
१.३ कौशल विधा : समाज जीवन की आवश्यकताओं की हर विधा के अनुसार व्यवसाय विधा समूह बनते हैं। इन समूहों के भी सामान्य व्यक्ति से लेकर विश्व के स्तरतक के लिए करणीय और अकरणीय कार्य होते हैं। कर्तव्य होते हैं। इन्हें व्यवसाय विधा धर्म कहेंगे। इनमें पदार्थ के उत्पादन के रूप में आर्थिक स्वतन्त्रता के किसी एक पहलू की रक्षा में योगदान करना होता है।  शिक्षा/संस्कार, वस्तुएं, भावनाएं, विचार, कला आदि में से समाज जीवन की आवश्यकता में से किसी एक विधा के पदार्थ की निरंतर आपूर्ति करना। पदार्थ का अर्थ केवल वस्तु नहीं है। जिस पद याने शब्द का अर्थ होता है वह पदार्थ कहलाता है। व्यावसायिक समूह का काम कौशल का विकास करना, कौशल का पीढ़ी दर पीढ़ी अंतरण करना और अन्य व्यवसायिक समूहों से समन्वय रखना आदि है।&lt;br /&gt;
१.४ भाषिक समूह : भाषा का मुख्य उपयोग परस्पर संवाद है। संवाद विचारों की सटीक अभिव्यक्ति   करनेवाला हो इस हेतु से भाषाएँ बनतीं हैं। संवाद में सहजता, सरलता, सुगमता से आत्मीयता बढ़ती है। इसी हेतु से भाषिक समूह बनते हैं। &lt;br /&gt;
१.५ प्रादेशिक समूह:शासनिक और व्यवस्थात्मक सुविधा की दृष्टि से प्रादेशिक स्तरका महत्त्व होता है।  &lt;br /&gt;
१.६ राष्ट्र:राष्ट्र अपने समाज के लिये विविध प्रकारके संगठनों का और व्यवस्थाओं का निर्माण करता है। &lt;br /&gt;
१.७ विश्व:पूर्व में बताई हुई १.१ से लेकर १.६ तक की सभी इकाइयां वैश्विक हित की अविरोधी रहें।&lt;br /&gt;
२. प्रकृति सुसंगतता : समाज जीवन में केन्द्रिकरण और विकेंद्रीकरण का समन्वय हो यह आवश्यक है। विशाल उद्योग, बाजार की मंडियां, शासकीय कार्यालय, व्यावसायिक, भाषिक, प्रादेशिक समूहों के समन्वय की व्यवस्थाएं आदि के लिये शहरों की आवश्यकता होती है। लेकिन इनमें अनावश्यक केन्द्रीकरण न हो पाए। वनवासी या गिरिजन भी ग्राम व्यवस्था से ही जुड़े हुए होने चाहिए। &lt;br /&gt;
३ प्रक्रियाएं : धर्म के अनुपालन में बुद्धि के स्तरपर धर्म के प्रति पर्याप्त संज्ञान, मन के स्तरपर कौटुम्बिक भावना, अनुशासन और श्रद्धा (आज्ञाकारिता) का विकास तथा शारीरिक स्तरपर सहकारिता और परोपकार की आदतें अत्यंत आवश्यक हैं। &lt;br /&gt;
३.१ धर्म संज्ञान : ‘समझना’ यह बुद्धि का काम होता है। इसलिए जब बच्चे का बुद्धि का अंग विकसित हो रहा होता है उसे धर्म की बौद्धिक याने तर्क तथा कर्मसिद्धांत के आधारपर शिक्षा देना उचित होता है। इस दृष्टि से तर्कशास्त्र की समझ या सरल शब्दों में ‘किसी भी बात के करने से पहले चराचर के हित में उस बात को कैसे करना चाहिए’ इसे समझने की क्षमता का विकास आवश्यक होता है।&lt;br /&gt;
३.२ कौटुम्बिक भावना का विकास : समाज के सभी परस्पर संबंधों में कौटुम्बिक भावना से व्यवहार का आधार धर्मसंज्ञान ही तो होता है। मन को बुद्धि के नियंत्रण में रखना ही मन की शिक्षा होती है। दुर्योधन के निम्न कथन से सब परिचित हैं। 		&lt;br /&gt;
जानामी धर्मं न च में प्रवृत्ति: ।   जानाम्यधर्मं न च में निवृत्ति: ।।&lt;br /&gt;
३.३ धर्माचरण की आदतें: दुर्योधन के उपर्युक्त कथन को ध्यान में रखकर ही गर्भधारणा से ही बच्चे को धर्माचरण की आदतों की शिक्षा देना महत्त्वपूर्ण बन जाता है। आदत का अर्थ है जिस बात के करने में कठिनाई का अनुभव नहीं होता। जब किसी बात के बारबार करने से आचरण में यह सहजता आती है तब वह आदत बन जाती है। और जब उसे बुद्धिका अधिष्ठान मिल जाता है तब वह आदतें मनुष्य का स्वभाव ही बन जातीं हैं। &lt;br /&gt;
४ धर्म के अनुपालन के स्तर और साधन : &lt;br /&gt;
४.१ धर्म के अनुपालन करनेवालों के राष्ट्रभक्त, अराष्ट्रीय और राष्ट्रद्रोही ऐसे मोटे-मोटे तीन स्तर होते हैं। &lt;br /&gt;
४.२ धर्म के अनुपालन के साधन : धर्म का अनुपालन पूर्व में बताए अनुसार शिक्षा, आदेश, प्रायश्चित्त/	पश्चात्ताप 	तथा दंड ऐसा चार प्रकार से होता है। शासन दुर्बल होने से समाज में प्रमाद करनेवालों की संख्या में वृद्धि 	होती है।&lt;br /&gt;
५. धर्म के अनुपालन के अवरोध : धर्म के अनुपालन में निम्न बातें अवरोध-रूप होतीं हैं।&lt;br /&gt;
५.१ भिन्न जीवनदृष्टि के लोग : शीघ्रातिशीघ्र भिन्न जीवनदृष्टि के लोगों को आत्मसात करना आवश्यक होता 	है। अन्यथा समाज जीवन अस्थिर और संघर्षमय बन जाता है।&lt;br /&gt;
५.२ स्वार्थ/संकुचित अस्मिताएँ :आवश्यकताओं की पुर्ति तक तो स्वार्थ भावना समर्थनीय है। अस्मिता या 	अहंकार यह प्रत्येक जिवंत ईकाई का एक स्वाभाविक पहलू होता है। किन्तु जब किसी ईकाई के विशिष्ट स्तर की यह अस्मिता अपने से ऊपर की ईकाई जिसका वह हिस्सा है, उसकी अस्मिता से बड़ी लगने लगती है तब समाज जीवन की शांति नष्ट हो जाती है। इसलिए यह आवश्यक है की मजहब, रिलिजन,प्रादेशिक अलगता, भाषिक भिन्नता, धनका अहंकार, बौद्धिक श्रेष्ठता आदि जैसी संकुचित अस्मिताएँ अपने से ऊपर की जीवंत ईकाई की अस्मिता के विरोध में नहीं हो। &lt;br /&gt;
५.३ विपरीत शिक्षा : विपरीत या दोषपूर्ण शिक्षा यह तो सभी समस्याओं की जड़ होती है। &lt;br /&gt;
६  कारक तत्त्व : कारक तत्वों से मतलब है धर्मपालन में सहायता देनेवाले घटक। ये निम्न होते हैं।&lt;br /&gt;
६.१ धर्म व्यवस्था : शासन धर्मनिष्ठ रहे यह सुनिश्चित करना धर्म व्यवस्था की जिम्मेदारी है। अपने त्याग, तपस्या, ज्ञान, लोकसंग्रह, चराचर के हित का चिन्तन, समर्पण भाव और कार्यकुशलता के आधारपर 	समाज से प्राप्त समर्थन प्राप्त कर वह देखे की कोई अयोग्य व्यक्ति शासक नहीं बनें।&lt;br /&gt;
६.२ शिक्षा : ६.२.१ कुटुम्ब शिक्षा 	६.२.२ विद्याकेन्द्र की शिक्षा 	६.२.३ लोकशिक्षा &lt;br /&gt;
६.३ धर्मनिष्ठ शासन : शासक का धर्मशास्त्र का जानकार होना और स्वयं धर्माचरणी होना भी आवश्यक होता है। जब शासन धर्म के अनुसार चलता है, धर्म व्यवस्थाद्वारा नियमित निर्देशित होता है तब धर्म भी 	स्थापित होता है और राज्य व्यवस्था भी श्रेष्ठ बनती है।&lt;br /&gt;
६.४ धर्मनिष्ठों का सामाजिक नेतृत्व : समाज जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में धर्मनिष्ठ लोग जब अच्छी संख्या में दिखाई देते हैं तब समाज मानस धर्मनिष्ठ बनता है। &lt;br /&gt;
७ चरण : धर्म का अनुपालन जब लोग स्वेच्छा से करनेवाले समाज के निर्माण के लिए दो बातें अत्यंत महत्वपूर्ण होतीं हैं। एक गर्भ में श्रेष्ठ जीवात्मा की स्थापना और दूसरे शिक्षा और संस्कार। &lt;br /&gt;
शिक्षा और संस्कार में -&lt;br /&gt;
७.१ जन्मपूर्व और शैशव कालमें अधिजनन शास्त्र के आधारपर मार्गदर्शन। &lt;br /&gt;
७.२ बाल्य काल : कुटुम्ब की शिक्षा के साथ विद्याकेन्द्र शिक्षा का समायोजन 			           &lt;br /&gt;
७.३ यौवन काल: अहंकार, बुद्धि के सही मोड़ हेतु सत्संग, प्रेरणा, वातावरण, ज्ञानार्जन/बलार्जन/कौशलार्जन आदि &lt;br /&gt;
७.४ प्रौढ़ावस्था : पूर्व ज्ञान/आदतों को व्यवस्थित करने के लिए सामाजिक वातावरण और मार्गदर्शन&lt;br /&gt;
७.४.१ पुरोहित&lt;br /&gt;
७.४.२ मेले/यात्राएं&lt;br /&gt;
७.४.३ कीर्तनकार/प्रवचनकार&lt;br /&gt;
७.४.४ धर्माचार्य&lt;br /&gt;
७.४.५ दृक्श्राव्य माध्यम –चित्रपट, दूरदर्शन आदि&lt;br /&gt;
७.४.६ आन्तरजाल&lt;br /&gt;
७.४.७ कानून का डर &lt;br /&gt;
८ धर्म निर्णय व्यवस्था : सामान्यत: जब भी धर्म की समझसे सम्बन्धित समस्या हो तब धर्म निर्णय की व्यवस्था उपलब्ध होनी चाहिये। इस व्यवस्था के तीन स्तर होना आवश्यक है। पहला स्तर तो स्थानिक धर्म के जानकार, दूसरा जनपदीय या निकटके तीर्थक्षेत्र में धर्मज्ञ परिषद्, और तीसरा स्तर अखिल भारतीय या राष्ट्रीय धर्मज्ञ परिषद्। &lt;br /&gt;
९ माध्यम : धर्म अनुपालन करवाने के मुख्यत: दो प्रकारके माध्यम होते हैं। &lt;br /&gt;
९.१ कुटुम्ब के दायरे में : धर्म शिक्षा का अर्थ है सदाचार की शिक्षा। धर्म की शिक्षा के लिए कुटुम्ब यह सबसे श्रेष्ठ पाठशाला है। विद्याकेन्द्र की शिक्षा तो कुटुम्ब में मिली धर्म शिक्षा की पुष्टि या आवश्यक सुधार के लिए ही होती है। कुटुम्ब में धर्म शिक्षा तीन तरह से होती है। गर्भपूर्व संस्कार, गर्भ संस्कार और शिशु संस्कार और आदतें। मनुष्य की आदतें भी बचपन में ही पक्की हो जातीं हैं। &lt;br /&gt;
९.२ कुटुम्ब से बाहर के माध्यम : मनुष्य तो हर पल सीखता ही रहता है। इसलिए कुटुम्ब से बाहर भी वह कई बातें सीखता है। माध्यमों में मित्र मंडली, विद्यालय, समाज का सांस्कृतिक स्तर और क़ानून व्यवस्था आदि।&lt;br /&gt;
जीवन के भारतीय प्रतिमान की प्रतिष्ठापना की प्रक्रिया से अपेक्षित परिणामों की चर्चा हम अगले 	अध्याय में करेंगे।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[Category:Bhartiya Jeevan Pratiman (भारतीय जीवन प्रतिमान)]]&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Dilipkelkar</name></author>
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		<title>Responsibilities at Societal Level (सामाजिक धर्म अनुपालन)</title>
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		<updated>2019-07-21T06:14:12Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Dilipkelkar: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{One source|date=January 2019}}&lt;br /&gt;
[[Template:Cleanup reorganize Dharmawiki Page]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जीवन के भारतीय प्रतिमान की पुनर्प्रतिष्ठा के लिए राष्ट्र के संगठन की विभिन्न प्रणालियों के स्तरपर उन कर्तव्यों का याने ईकाई धर्म का विचार और प्रत्यक्ष धर्म अनुपालन की प्रक्रिया कैसे चलेगी ऐसा दो पहलुओं में हम परिवर्तन की प्रक्रिया का विचार करेंगे। वैसे तो धर्म अनुपालन की प्रक्रिया का विचार हमने समाज धारणा शास्त्र के विषय में किया है। फिर भी परिवर्तन प्रक्रिया को यहाँ फिर से दोहराना उपयुक्त होगा। &lt;br /&gt;
विभिन्न सामाजिक प्रणालियों के धर्म   &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कुटुम्ब &lt;br /&gt;
कुटुम्ब यह परिवर्तन का सबसे जड़मूल का माध्यम है। समाज जीवन की वह नींव होता है। वह जितना सशक्त और व्यापक भूमिका का निर्वहन करेगा समाज उतना ही श्रेष्ठ बनेगा। कुटुम्ब में दो प्रकार के काम होते हैं। पहले हैं कुटुम्ब के लिए और दूसरे हैं कुटुम्ब में याने समाज, सृष्टी के लिए। &lt;br /&gt;
कुटुम्ब की – कुटुम्ब के लिए  &lt;br /&gt;
१. क्षमता और योग्यता आधारित कर्तव्य &lt;br /&gt;
२. क्षमता और योग्यता के अनुसार सार्थक योगदान &lt;br /&gt;
३. शुद्ध सस्नेहयुक्त सदाचारयुक्त परस्पर व्यवहार &lt;br /&gt;
४. बड़ों का आदर, सेवा। छोटों के लिए आदर्श और प्यार। &lt;br /&gt;
५. कुटुंबहित अपने हित से ऊपर। कर्त्तव्य परायणता। अपने कर्तव्यों के प्रति आग्रही।&lt;br /&gt;
६. स्वावलंबन / परस्परावलंबन।&lt;br /&gt;
७. कुटुम्ब के सभी काम करना आना और करना।&lt;br /&gt;
८. एकात्मता का विस्तार – कुटुंब&amp;lt; समाज&amp;lt; सृष्टी&amp;lt; विश्व। लेकिन इसकी नींव कुटुंब जीवन में ही पड़ेगी और पक्की होगी। &lt;br /&gt;
९. कौशल, ज्ञान, बल और पुण्य अर्जन की दृष्टी से अध्ययन और संस्कार &lt;br /&gt;
१०. कौटुम्बिक कुशलताएँ, आदतें, रीति-रिवाज, परम्पराएँ आदि &lt;br /&gt;
११. कुटुम्ब प्रमुख सर्वोपरि : कुटुम्ब के सब ही सदस्यों को कुटुम्ब प्रमुख बनने की प्रेरणा और इस हेतु से उनके द्वारा अपना विवेक, कौशल, सयानापन, निर्णय क्षमता, अपार स्नेह आदि का विकास। कुटुम्ब प्रमुख की आज्ञाओं का पालन - आज्ञाकारिता। &lt;br /&gt;
१२. काया, वाचा, मनसा सभी से मधुर व्यवहार। &lt;br /&gt;
१३. अच्छा – बेटा/बेटी, भाई/बहन, पति/पत्नि, पिता/माता, गृहस्थ/गृहिणी, रिश्तेदार आदि बनना/बनाना।&lt;br /&gt;
१४. वर्णाश्रम धर्म का पालन – 	स्वभावज कर्म करते जाना।&lt;br /&gt;
१४.१ सवर्ण/सजातीय विवाह 	&lt;br /&gt;
१४.२ कौटुम्बिक व्यवसाय में सहभाग &lt;br /&gt;
१४.३ ज्ञान, कौशल, श्रेष्ठ परम्पराओं का निर्वहन, परिष्कार, निर्माण और अगली पीढी को अंतरण &lt;br /&gt;
१४.४ आयु की अवस्था के अनुसार ब्रह्मचर्य, गृहस्थ और वानप्रस्थ आदि आश्रमों के धर्म की जिम्मेदारियों का		 निर्वहन।  	   &lt;br /&gt;
कुटुम्ब में – समाज के लिए &lt;br /&gt;
१. सामाजिक कर्तव्यों का निर्वहन 	१.१ समाज संगठन की प्रणालियों (कुटुंब, जाति, ग्राम, राष्ट्र) में 							१.२ सामाजिक व्यवस्थाओं (रक्षण, पोषण और शिक्षण) में &lt;br /&gt;
२. ज्ञानार्जन, कौशलार्जन, बलार्जन और पुण्यार्जन की मानसिकता और केवल इन के लिए अटन ।&lt;br /&gt;
३. स्वावलंबन और परस्परावलंबन ।&lt;br /&gt;
४. शत्रुत्व भाववाले समाज के घटकों के साथ भी शान्ततापूर्ण और सुखी सहजीवन ।&lt;br /&gt;
५. एकात्मता (समाज और सृष्टी के साथ) का व्यवहार/सुख और दु:ख में सहानुभूति और सहभागिता । &lt;br /&gt;
६. विभिन्न क्षेत्रों में - जैसे शासन, न्याय, समृद्धि आदि क्षेत्रों के नेता &amp;gt; आचार्य &amp;gt; धर्म । धर्म सर्वोपरि । &lt;br /&gt;
७. सद्गुण, सदाचार, स्वावलंबन, सत्यनिष्ठा, सादगी, सहजता, सौन्दर्यबोध, स्वतंत्रता, संयम, स्वदेशी आदि का व्यवहार साथ ही में त्याग, तपस्या, समाधान, शान्ति, अभय, विजिगीषा आदि गुणों का विकास।  &lt;br /&gt;
८. मनसा, वाचा कर्मणा ‘सर्वे भवन्तु सुखिन:’ के प्रयास।&lt;br /&gt;
९. वर्ण-धर्म की और जाति-धर्म की शिक्षा देना। जब लोग अपने वर्ण के अनुसार आचरण करते हैं तब राष्ट्र की संस्कृति का विकास और रक्षण होता है। और जब लोग अपने जातिधर्म के अनुसार व्यवसाय करते हैं तब देश समृद्ध बनता है, ओर बना रहता है। &lt;br /&gt;
१०. धर्माचरणी और समाजभक्त/देशभक्त/राष्ट्रभक्त/परमात्मा में श्रद्धा रखनेवालों का निर्माण । &lt;br /&gt;
११. धर्मशिक्षा और कर्मशिक्षा ।&lt;br /&gt;
१२. संयमित उपभोग । न्यूनतम (इष्टतम) उपभोग । &lt;br /&gt;
ग्रामकुल &lt;br /&gt;
१. ग्राम को स्वावलंबी ग्राम बनाना  &lt;br /&gt;
२. ग्राम की अर्थव्यवस्था को ठीक से बिठाना और चलाना &lt;br /&gt;
३. संयुक्त कुटुंबों की प्रतिष्ठापना का वातावरण &lt;br /&gt;
४. कौटुम्बिक उद्योगों की प्रतिष्ठापना का वातावरण &lt;br /&gt;
५. कुटुम्ब भावना से प्रत्येक व्यक्ति की सम्मानपूर्ण आजीविका की व्यवस्था करना &lt;br /&gt;
६. कौटुम्बिक उद्योग और जातियों में समन्वय रखना&lt;br /&gt;
७. शासकीय व्यवस्थाओं के प्रति जिम्मेदारियां : कर देना, शिक्षण, पोषण और रक्षण की व्यवस्थाओं में श्रेष्ठ व्यक्तियों का और संसाधनों का योगदान देना &lt;br /&gt;
८. ग्राम, एक कुल बने ऐसा वातावरण बनाए रखना।&lt;br /&gt;
गुरुकुल / विद्यालय &lt;br /&gt;
१. वर्णशिक्षा की व्यवस्था &lt;br /&gt;
२. ज्ञानार्जन, कौशलार्जन, बलार्जन के लिए मार्गदर्शन &lt;br /&gt;
३. शास्त्रीय शिक्षा का प्रावधान &lt;br /&gt;
४. श्रेष्ठ परम्पराओं के निर्माण की शिक्षा &lt;br /&gt;
५. जीवन के तत्त्वज्ञान और व्यवहार की शिक्षा&lt;br /&gt;
६. जीवन के लिए महत्वपूर्ण सामाजिक संगठन प्रणालियाँ और व्यवस्थाओं की समझ और यथाशक्ति योगदान की प्रेरणा। &lt;br /&gt;
कौशल विधा पंचायत &lt;br /&gt;
१. समाज की किसी एक आवश्यकता की पूर्ति करना । कभी कोई कमी न हो यह सुनिश्चित करना।&lt;br /&gt;
२. धर्म के मार्गदर्शन में अपने कौशल विधा-धर्म का निर्धारण और कौशल विधा प्रणाली में प्रचार प्रसार &lt;br /&gt;
३. अन्य कौशल विधाओं के साथ समन्वय &lt;br /&gt;
४. राष्ट्र सर्वोपरि यह भावना सदा जाग्रत रखना &lt;br /&gt;
व्यवस्थाओं के धर्म &lt;br /&gt;
धर्म व्यवस्था &lt;br /&gt;
यह कोई नियमित व्यवस्था नहीं होती। यह जाग्रत, नि:स्वार्थी, सर्वभूतहित में सदैव प्रयासरत रहनेवाले पंडितों का समूह होता है। यह समूह सक्रीय होने से समाज ठीक चलता है। आवश्यकतानुसार इस समूह की जिम्मेदारियां बढ़ जातीं है। ऐसे आपद्धर्म के निर्वहन के लिए भी यह समूह पर्याप्त सामर्थ्यवान हो।  &lt;br /&gt;
१. कालानुरूप धर्म को व्याख्यायित करना। &lt;br /&gt;
२. वर्णों के ‘स्व’धर्मों का पालन करने की व्यवस्था की पस्तुति कर शिक्षा और शासन की मददसे समाज में उन्हें स्थापित करना। व्यक्तिगत और सामाजिक धर्म/संस्कृति के अनुसार व्यवहार का वातावरण बनाना। जब वर्ण-धर्मं का पालन लोग करते हैं तब देश में संस्कृति का विकास और रक्षण होता है। जिनकी ओर देखकर लोग वर्ण धर्म का पालन कर सकें ऐसे ‘श्रेष्ठ’ लोगों का निर्माण करना। &lt;br /&gt;
३. स्वाभाविक, शासनिक और आर्थिक ऐसी सभी प्रकार की स्वतन्त्रता की रक्षा करना। &lt;br /&gt;
४. शासनपर अपने ज्ञान, त्याग, तपस्या, लोकसंग्रह तथा सदैव लोकहित के चिंतन के माध्यम से नैतिक दबाव निर्माण करना। शासन को सदाचारी, कुशल और सामर्थ्य संपन्न बनाए रखने के लिए मार्गदर्शन करना। अधर्माचरणी शासन को हटाकर धर्माचरणी शासन को प्रतिष्ठित करना।&lt;br /&gt;
५. लोकशिक्षा (कुटुम्ब शिक्षा इसी का हिस्सा है) और विद्यालयीन शिक्षा की प्रभावी व्यवस्था करना। जैसे लिखा पढी न्यूनतम करने की दिशा में बढ़ना। वाणी/शब्द की प्रतिष्ठा बढ़ाना। जीवन को साधन सापेक्षता से साधना  सापेक्षता की ओर ले जाने के लिए अपनी कथनी और करनी से मार्गदर्शन करना। &lt;br /&gt;
शासन व्यवस्था &lt;br /&gt;
१. अंतर्बाह्य शत्रुओं से लोगों की शासनिक स्वतन्त्रता की रक्षा करना। &lt;br /&gt;
२. धर्मं के दायरे में रहकर दुष्टों और मूर्खों को नियंत्रण में रखना। &lt;br /&gt;
३. दंड व्यवस्था के अंतर्गत न्याय व्यवस्था का निर्माण करना। किसी पर अन्याय हो ही नहीं ऐसी दंड व्यवस्था के निर्माण का प्रयास करना। &lt;br /&gt;
४. श्रेष्ठ शासक परम्परा निर्माण करना।&lt;br /&gt;
५. प्रभावी, समाजहित की शिक्षा देनेवाले शिक्षा केन्द्रों को संरक्षण, समर्थन और सहायता देकर और प्रभावी बनाने के लिए यथाशक्ति प्रयास करना। ऐसा करने से शासन का काम काफी सरल हो जाता है। &lt;br /&gt;
६. धर्मं व्यवस्था से समय समयपर मार्गदर्शन प्राप्त करते रहना।  &lt;br /&gt;
समृद्धि व्यवस्था &lt;br /&gt;
१. योग्य शिक्षा के द्वारा समाज में धर्म के अविरोधी इच्छाओं का ही विकास हो यह सुनिश्चित करना। &lt;br /&gt;
२. समाज के प्रत्येक घटक की सभी आवश्यकताओं की पूर्ति करना, धर्म विरोधी इच्छाओं की नहीं। समाज की आर्थिक स्वतन्त्रता को अबाधित रखना। &lt;br /&gt;
३. प्राकृतिक संसाधनों का न्यूनतम उपयोग हो ऐसा वातावरण बनाना। संयमित उपभोग को प्रतिष्ठित करना। &lt;br /&gt;
४. प्रकृति का प्रदूषण नहीं होने देना। प्रकृति का सन्तुलन बनाए रखना। &lt;br /&gt;
५. कौटुम्बिक उद्योग, जातियाँ और ग्राम मिलकर समृद्धि निर्माण होती है। ये तीनों ईकाईयाँ फलेफूले और इनका स्वस्थ ऐसा तानाबाना बना रहे ऐसा वातावरण रहे।&lt;br /&gt;
६. पैसे का विनिमय न्यूनतम रहे ऐसी व्यवस्था निर्माण करना।&lt;br /&gt;
अब हम धर्म के अनुपालन की प्रक्रिया का विचार आगे करेंगे।&lt;br /&gt;
धर्म अनुपालन की प्रक्रिया  &lt;br /&gt;
हमने जाना है कि समाज के सुख, शांति, स्वतंत्रता, सुसंस्कृतता के लिए समाज का धर्मनिष्ठ होना आवश्यक होता है। यहाँ मोटे तौरपर धर्म से मतलब कर्तव्य से है। समाज धारणा के लिए कर्तव्योंपर आधारित जीवन अनिवार्य होता है। समाज धारणा के लिए धर्म-युक्त व्यवहार में आनेवाली जटिलताओं को और उसके अनुपालन की प्रक्रिया को समझने का प्रयास करेंगे। इन में व्यक्तिगत स्तर की बातों का हमने पूर्व के अध्याय में विचार किया है।&lt;br /&gt;
१. विभिन्न ईकाईयों के स्तरपर &lt;br /&gt;
१.१ कुटुम्ब : समाज की सभी इकाइयों के विभिन्न स्तरोंपर उचित भूमिका निभानेवाले श्रेष्ठ मानव का निर्माण करना। कौटुम्बिक व्यवसाय के माध्यम से समाज की किसी आवश्यकता की पूर्ति करना। &lt;br /&gt;
१.२ ग्राम : ग्राम की भूमिका छोटे विश्व और बड़े कुटुम्ब की तरह ही होती है। जिस तरह कुटुम्ब के सदस्यों में आपस में पैसे का लेनदेन नहीं होता उसी तरह अच्छे ग्राम में कुटुम्बों में आपस में पैसे का लेनदेन नहीं होता। प्रत्येक की सम्मान और स्वतन्त्रता के साथ अन्न, वस्त्र, भवन, शिक्षा, आजीविका, सुरक्षा आदि सभी आवश्यकताओं की पूर्ति होती है।&lt;br /&gt;
१.३ कौशल विधा : समाज जीवन की आवश्यकताओं की हर विधा के अनुसार व्यवसाय विधा समूह बनते हैं। इन समूहों के भी सामान्य व्यक्ति से लेकर विश्व के स्तरतक के लिए करणीय और अकरणीय कार्य होते हैं। कर्तव्य होते हैं। इन्हें व्यवसाय विधा धर्म कहेंगे। इनमें पदार्थ के उत्पादन के रूप में आर्थिक स्वतन्त्रता के किसी एक पहलू की रक्षा में योगदान करना होता है।  शिक्षा/संस्कार, वस्तुएं, भावनाएं, विचार, कला आदि में से समाज जीवन की आवश्यकता में से किसी एक विधा के पदार्थ की निरंतर आपूर्ति करना। पदार्थ का अर्थ केवल वस्तु नहीं है। जिस पद याने शब्द का अर्थ होता है वह पदार्थ कहलाता है। व्यावसायिक समूह का काम कौशल का विकास करना, कौशल का पीढ़ी दर पीढ़ी अंतरण करना और अन्य व्यवसायिक समूहों से समन्वय रखना आदि है।&lt;br /&gt;
१.४ भाषिक समूह : भाषा का मुख्य उपयोग परस्पर संवाद है। संवाद विचारों की सटीक अभिव्यक्ति   करनेवाला हो इस हेतु से भाषाएँ बनतीं हैं। संवाद में सहजता, सरलता, सुगमता से आत्मीयता बढ़ती है। इसी हेतु से भाषिक समूह बनते हैं। &lt;br /&gt;
१.५ प्रादेशिक समूह:शासनिक और व्यवस्थात्मक सुविधा की दृष्टि से प्रादेशिक स्तरका महत्त्व होता है।  &lt;br /&gt;
१.६ राष्ट्र:राष्ट्र अपने समाज के लिये विविध प्रकारके संगठनों का और व्यवस्थाओं का निर्माण करता है। &lt;br /&gt;
१.७ विश्व:पूर्व में बताई हुई १.१ से लेकर १.६ तक की सभी इकाइयां वैश्विक हित की अविरोधी रहें।&lt;br /&gt;
२. प्रकृति सुसंगतता : समाज जीवन में केन्द्रिकरण और विकेंद्रीकरण का समन्वय हो यह आवश्यक है। विशाल उद्योग, बाजार की मंडियां, शासकीय कार्यालय, व्यावसायिक, भाषिक, प्रादेशिक समूहों के समन्वय की व्यवस्थाएं आदि के लिये शहरों की आवश्यकता होती है। लेकिन इनमें अनावश्यक केन्द्रीकरण न हो पाए। वनवासी या गिरिजन भी ग्राम व्यवस्था से ही जुड़े हुए होने चाहिए। &lt;br /&gt;
३ प्रक्रियाएं : धर्म के अनुपालन में बुद्धि के स्तरपर धर्म के प्रति पर्याप्त संज्ञान, मन के स्तरपर कौटुम्बिक भावना, अनुशासन और श्रद्धा (आज्ञाकारिता) का विकास तथा शारीरिक स्तरपर सहकारिता और परोपकार की आदतें अत्यंत आवश्यक हैं। &lt;br /&gt;
३.१ धर्म संज्ञान : ‘समझना’ यह बुद्धि का काम होता है। इसलिए जब बच्चे का बुद्धि का अंग विकसित हो रहा होता है उसे धर्म की बौद्धिक याने तर्क तथा कर्मसिद्धांत के आधारपर शिक्षा देना उचित होता है। इस दृष्टि से तर्कशास्त्र की समझ या सरल शब्दों में ‘किसी भी बात के करने से पहले चराचर के हित में उस बात को कैसे करना चाहिए’ इसे समझने की क्षमता का विकास आवश्यक होता है।&lt;br /&gt;
३.२ कौटुम्बिक भावना का विकास : समाज के सभी परस्पर संबंधों में कौटुम्बिक भावना से व्यवहार का आधार धर्मसंज्ञान ही तो होता है। मन को बुद्धि के नियंत्रण में रखना ही मन की शिक्षा होती है। दुर्योधन के निम्न कथन से सब परिचित हैं। 		&lt;br /&gt;
जानामी धर्मं न च में प्रवृत्ति: ।   जानाम्यधर्मं न च में निवृत्ति: ।।&lt;br /&gt;
३.३ धर्माचरण की आदतें: दुर्योधन के उपर्युक्त कथन को ध्यान में रखकर ही गर्भधारणा से ही बच्चे को धर्माचरण की आदतों की शिक्षा देना महत्त्वपूर्ण बन जाता है। आदत का अर्थ है जिस बात के करने में कठिनाई का अनुभव नहीं होता। जब किसी बात के बारबार करने से आचरण में यह सहजता आती है तब वह आदत बन जाती है। और जब उसे बुद्धिका अधिष्ठान मिल जाता है तब वह आदतें मनुष्य का स्वभाव ही बन जातीं हैं। &lt;br /&gt;
४ धर्म के अनुपालन के स्तर और साधन : &lt;br /&gt;
४.१ धर्म के अनुपालन करनेवालों के राष्ट्रभक्त, अराष्ट्रीय और राष्ट्रद्रोही ऐसे मोटे-मोटे तीन स्तर होते हैं। &lt;br /&gt;
४.२ धर्म के अनुपालन के साधन : धर्म का अनुपालन पूर्व में बताए अनुसार शिक्षा, आदेश, प्रायश्चित्त/	पश्चात्ताप 	तथा दंड ऐसा चार प्रकार से होता है। शासन दुर्बल होने से समाज में प्रमाद करनेवालों की संख्या में वृद्धि 	होती है।&lt;br /&gt;
५. धर्म के अनुपालन के अवरोध : धर्म के अनुपालन में निम्न बातें अवरोध-रूप होतीं हैं।&lt;br /&gt;
५.१ भिन्न जीवनदृष्टि के लोग : शीघ्रातिशीघ्र भिन्न जीवनदृष्टि के लोगों को आत्मसात करना आवश्यक होता 	है। अन्यथा समाज जीवन अस्थिर और संघर्षमय बन जाता है।&lt;br /&gt;
५.२ स्वार्थ/संकुचित अस्मिताएँ :आवश्यकताओं की पुर्ति तक तो स्वार्थ भावना समर्थनीय है। अस्मिता या 	अहंकार यह प्रत्येक जिवंत ईकाई का एक स्वाभाविक पहलू होता है। किन्तु जब किसी ईकाई के विशिष्ट स्तर की यह अस्मिता अपने से ऊपर की ईकाई जिसका वह हिस्सा है, उसकी अस्मिता से बड़ी लगने लगती है तब समाज जीवन की शांति नष्ट हो जाती है। इसलिए यह आवश्यक है की मजहब, रिलिजन,प्रादेशिक अलगता, भाषिक भिन्नता, धनका अहंकार, बौद्धिक श्रेष्ठता आदि जैसी संकुचित अस्मिताएँ अपने से ऊपर की जीवंत ईकाई की अस्मिता के विरोध में नहीं हो। &lt;br /&gt;
५.३ विपरीत शिक्षा : विपरीत या दोषपूर्ण शिक्षा यह तो सभी समस्याओं की जड़ होती है। &lt;br /&gt;
६  कारक तत्त्व : कारक तत्वों से मतलब है धर्मपालन में सहायता देनेवाले घटक। ये निम्न होते हैं।&lt;br /&gt;
६.१ धर्म व्यवस्था : शासन धर्मनिष्ठ रहे यह सुनिश्चित करना धर्म व्यवस्था की जिम्मेदारी है। अपने त्याग, तपस्या, ज्ञान, लोकसंग्रह, चराचर के हित का चिन्तन, समर्पण भाव और कार्यकुशलता के आधारपर 	समाज से प्राप्त समर्थन प्राप्त कर वह देखे की कोई अयोग्य व्यक्ति शासक नहीं बनें।&lt;br /&gt;
६.२ शिक्षा : ६.२.१ कुटुम्ब शिक्षा 	६.२.२ विद्याकेन्द्र की शिक्षा 	६.२.३ लोकशिक्षा &lt;br /&gt;
६.३ धर्मनिष्ठ शासन : शासक का धर्मशास्त्र का जानकार होना और स्वयं धर्माचरणी होना भी आवश्यक होता है। जब शासन धर्म के अनुसार चलता है, धर्म व्यवस्थाद्वारा नियमित निर्देशित होता है तब धर्म भी 	स्थापित होता है और राज्य व्यवस्था भी श्रेष्ठ बनती है।&lt;br /&gt;
६.४ धर्मनिष्ठों का सामाजिक नेतृत्व : समाज जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में धर्मनिष्ठ लोग जब अच्छी संख्या में दिखाई देते हैं तब समाज मानस धर्मनिष्ठ बनता है। &lt;br /&gt;
७ चरण : धर्म का अनुपालन जब लोग स्वेच्छा से करनेवाले समाज के निर्माण के लिए दो बातें अत्यंत महत्वपूर्ण होतीं हैं। एक गर्भ में श्रेष्ठ जीवात्मा की स्थापना और दूसरे शिक्षा और संस्कार। &lt;br /&gt;
शिक्षा और संस्कार में -&lt;br /&gt;
७.१ जन्मपूर्व और शैशव कालमें अधिजनन शास्त्र के आधारपर मार्गदर्शन। &lt;br /&gt;
७.२ बाल्य काल : कुटुम्ब की शिक्षा के साथ विद्याकेन्द्र शिक्षा का समायोजन 			           &lt;br /&gt;
७.३ यौवन काल: अहंकार, बुद्धि के सही मोड़ हेतु सत्संग, प्रेरणा, वातावरण, ज्ञानार्जन/बलार्जन/कौशलार्जन आदि &lt;br /&gt;
७.४ प्रौढ़ावस्था : पूर्व ज्ञान/आदतों को व्यवस्थित करने के लिए सामाजिक वातावरण और मार्गदर्शन&lt;br /&gt;
७.४.१ पुरोहित&lt;br /&gt;
७.४.२ मेले/यात्राएं&lt;br /&gt;
७.४.३ कीर्तनकार/प्रवचनकार&lt;br /&gt;
७.४.४ धर्माचार्य&lt;br /&gt;
७.४.५ दृक्श्राव्य माध्यम –चित्रपट, दूरदर्शन आदि&lt;br /&gt;
७.४.६ आन्तरजाल&lt;br /&gt;
७.४.७ कानून का डर &lt;br /&gt;
८ धर्म निर्णय व्यवस्था : सामान्यत: जब भी धर्म की समझसे सम्बन्धित समस्या हो तब धर्म निर्णय की व्यवस्था उपलब्ध होनी चाहिये। इस व्यवस्था के तीन स्तर होना आवश्यक है। पहला स्तर तो स्थानिक धर्म के जानकार, दूसरा जनपदीय या निकटके तीर्थक्षेत्र में धर्मज्ञ परिषद्, और तीसरा स्तर अखिल भारतीय या राष्ट्रीय धर्मज्ञ परिषद्। &lt;br /&gt;
९ माध्यम : धर्म अनुपालन करवाने के मुख्यत: दो प्रकारके माध्यम होते हैं। &lt;br /&gt;
९.१ कुटुम्ब के दायरे में : धर्म शिक्षा का अर्थ है सदाचार की शिक्षा। धर्म की शिक्षा के लिए कुटुम्ब यह सबसे श्रेष्ठ पाठशाला है। विद्याकेन्द्र की शिक्षा तो कुटुम्ब में मिली धर्म शिक्षा की पुष्टि या आवश्यक सुधार के लिए ही होती है। कुटुम्ब में धर्म शिक्षा तीन तरह से होती है। गर्भपूर्व संस्कार, गर्भ संस्कार और शिशु संस्कार और आदतें। मनुष्य की आदतें भी बचपन में ही पक्की हो जातीं हैं। &lt;br /&gt;
९.२ कुटुम्ब से बाहर के माध्यम : मनुष्य तो हर पल सीखता ही रहता है। इसलिए कुटुम्ब से बाहर भी वह कई बातें सीखता है। माध्यमों में मित्र मंडली, विद्यालय, समाज का सांस्कृतिक स्तर और क़ानून व्यवस्था आदि।&lt;br /&gt;
जीवन के भारतीय प्रतिमान की प्रतिष्ठापना की प्रक्रिया से अपेक्षित परिणामों की चर्चा हम अगले 	अध्याय में करेंगे।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[Category:Bhartiya Jeevan Pratiman (भारतीय जीवन प्रतिमान)]]&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Dilipkelkar</name></author>
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		<id>https://dharmawiki.org/index.php?title=Responsibilities_at_Societal_Level_(%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%AE%E0%A4%BE%E0%A4%9C%E0%A4%BF%E0%A4%95_%E0%A4%A7%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%AE_%E0%A4%85%E0%A4%A8%E0%A5%81%E0%A4%AA%E0%A4%BE%E0%A4%B2%E0%A4%A8)&amp;diff=119949</id>
		<title>Responsibilities at Societal Level (सामाजिक धर्म अनुपालन)</title>
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		<updated>2019-07-21T06:13:01Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Dilipkelkar: लेख सम्पादित किया&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{One source|date=January 2019}}&lt;br /&gt;
[[Template:Cleanup reorganize Dharmawiki Page]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जीवन के भारतीय प्रतिमान की पुनर्प्रतिष्ठा के लिए राष्ट्र के संगठन की विभिन्न प्रणालियों के स्तरपर उन कर्तव्यों का याने ईकाई धर्म का विचार और प्रत्यक्ष धर्म अनुपालन की प्रक्रिया कैसे चलेगी ऐसा दो पहलुओं में हम परिवर्तन की प्रक्रिया का विचार करेंगे| वैसे तो धर्म अनुपालन की प्रक्रिया का विचार हमने समाज धारणा शास्त्र के विषय में किया है| फिर भी परिवर्तन प्रक्रिया को यहाँ फिर से दोहराना उपयुक्त होगा| &lt;br /&gt;
विभिन्न सामाजिक प्रणालियों के धर्म   &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कुटुम्ब &lt;br /&gt;
कुटुम्ब यह परिवर्तन का सबसे जड़मूल का माध्यम है| समाज जीवन की वह नींव होता है| वह जितना सशक्त और व्यापक भूमिका का निर्वहन करेगा समाज उतना ही श्रेष्ठ बनेगा| कुटुम्ब में दो प्रकार के काम होते हैं| पहले हैं कुटुम्ब के लिए और दूसरे हैं कुटुम्ब में याने समाज, सृष्टी के लिए| &lt;br /&gt;
कुटुम्ब की – कुटुम्ब के लिए  &lt;br /&gt;
१. क्षमता और योग्यता आधारित कर्तव्य &lt;br /&gt;
२. क्षमता और योग्यता के अनुसार सार्थक योगदान &lt;br /&gt;
३. शुद्ध सस्नेहयुक्त सदाचारयुक्त परस्पर व्यवहार &lt;br /&gt;
४. बड़ों का आदर, सेवा| छोटों के लिए आदर्श और प्यार| &lt;br /&gt;
५. कुटुंबहित अपने हित से ऊपर| कर्त्तव्य परायणता| अपने कर्तव्यों के प्रति आग्रही|&lt;br /&gt;
६. स्वावलंबन / परस्परावलंबन|&lt;br /&gt;
७. कुटुम्ब के सभी काम करना आना और करना|&lt;br /&gt;
८. एकात्मता का विस्तार – कुटुंब&amp;lt; समाज&amp;lt; सृष्टी&amp;lt; विश्व| लेकिन इसकी नींव कुटुंब जीवन में ही पड़ेगी और पक्की होगी| &lt;br /&gt;
९. कौशल, ज्ञान, बल और पुण्य अर्जन की दृष्टी से अध्ययन और संस्कार &lt;br /&gt;
१०. कौटुम्बिक कुशलताएँ, आदतें, रीति-रिवाज, परम्पराएँ आदि &lt;br /&gt;
११. कुटुम्ब प्रमुख सर्वोपरि : कुटुम्ब के सब ही सदस्यों को कुटुम्ब प्रमुख बनने की प्रेरणा और इस हेतु से उनके द्वारा अपना विवेक, कौशल, सयानापन, निर्णय क्षमता, अपार स्नेह आदि का विकास| कुटुम्ब प्रमुख की आज्ञाओं का पालन - आज्ञाकारिता| &lt;br /&gt;
१२. काया, वाचा, मनसा सभी से मधुर व्यवहार| &lt;br /&gt;
१३. अच्छा – बेटा/बेटी, भाई/बहन, पति/पत्नि, पिता/माता, गृहस्थ/गृहिणी, रिश्तेदार आदि बनना/बनाना|&lt;br /&gt;
१४. वर्णाश्रम धर्म का पालन – 	स्वभावज कर्म करते जाना|&lt;br /&gt;
१४.१ सवर्ण/सजातीय विवाह 	&lt;br /&gt;
१४.२ कौटुम्बिक व्यवसाय में सहभाग &lt;br /&gt;
१४.३ ज्ञान, कौशल, श्रेष्ठ परम्पराओं का निर्वहन, परिष्कार, निर्माण और अगली पीढी को अंतरण &lt;br /&gt;
१४.४ आयु की अवस्था के अनुसार ब्रह्मचर्य, गृहस्थ और वानप्रस्थ आदि आश्रमों के धर्म की जिम्मेदारियों का		 निर्वहन|  	   &lt;br /&gt;
कुटुम्ब में – समाज के लिए &lt;br /&gt;
१. सामाजिक कर्तव्यों का निर्वहन 	१.१ समाज संगठन की प्रणालियों (कुटुंब, जाति, ग्राम, राष्ट्र) में 							१.२ सामाजिक व्यवस्थाओं (रक्षण, पोषण और शिक्षण) में &lt;br /&gt;
२. ज्ञानार्जन, कौशलार्जन, बलार्जन और पुण्यार्जन की मानसिकता और केवल इन के लिए अटन |&lt;br /&gt;
३. स्वावलंबन और परस्परावलंबन |&lt;br /&gt;
४. शत्रुत्व भाववाले समाज के घटकों के साथ भी शान्ततापूर्ण और सुखी सहजीवन |&lt;br /&gt;
५. एकात्मता (समाज और सृष्टी के साथ) का व्यवहार/सुख और दु:ख में सहानुभूति और सहभागिता | &lt;br /&gt;
६. विभिन्न क्षेत्रों में - जैसे शासन, न्याय, समृद्धि आदि क्षेत्रों के नेता &amp;gt; आचार्य &amp;gt; धर्म | धर्म सर्वोपरि | &lt;br /&gt;
७. सद्गुण, सदाचार, स्वावलंबन, सत्यनिष्ठा, सादगी, सहजता, सौन्दर्यबोध, स्वतंत्रता, संयम, स्वदेशी आदि का व्यवहार साथ ही में त्याग, तपस्या, समाधान, शान्ति, अभय, विजिगीषा आदि गुणों का विकास|  &lt;br /&gt;
८. मनसा, वाचा कर्मणा ‘सर्वे भवन्तु सुखिन:’ के प्रयास|&lt;br /&gt;
९. वर्ण-धर्म की और जाति-धर्म की शिक्षा देना| जब लोग अपने वर्ण के अनुसार आचरण करते हैं तब राष्ट्र की संस्कृति का विकास और रक्षण होता है| और जब लोग अपने जातिधर्म के अनुसार व्यवसाय करते हैं तब देश समृद्ध बनता है, ओर बना रहता है| &lt;br /&gt;
१०. धर्माचरणी और समाजभक्त/देशभक्त/राष्ट्रभक्त/परमात्मा में श्रद्धा रखनेवालों का निर्माण | &lt;br /&gt;
११. धर्मशिक्षा और कर्मशिक्षा |&lt;br /&gt;
१२. संयमित उपभोग | न्यूनतम (इष्टतम) उपभोग | &lt;br /&gt;
ग्रामकुल &lt;br /&gt;
१. ग्राम को स्वावलंबी ग्राम बनाना  &lt;br /&gt;
२. ग्राम की अर्थव्यवस्था को ठीक से बिठाना और चलाना &lt;br /&gt;
३. संयुक्त कुटुंबों की प्रतिष्ठापना का वातावरण &lt;br /&gt;
४. कौटुम्बिक उद्योगों की प्रतिष्ठापना का वातावरण &lt;br /&gt;
५. कुटुम्ब भावना से प्रत्येक व्यक्ति की सम्मानपूर्ण आजीविका की व्यवस्था करना &lt;br /&gt;
६. कौटुम्बिक उद्योग और जातियों में समन्वय रखना&lt;br /&gt;
७. शासकीय व्यवस्थाओं के प्रति जिम्मेदारियां : कर देना, शिक्षण, पोषण और रक्षण की व्यवस्थाओं में श्रेष्ठ व्यक्तियों का और संसाधनों का योगदान देना &lt;br /&gt;
८. ग्राम, एक कुल बने ऐसा वातावरण बनाए रखना|&lt;br /&gt;
गुरुकुल / विद्यालय &lt;br /&gt;
१. वर्णशिक्षा की व्यवस्था &lt;br /&gt;
२. ज्ञानार्जन, कौशलार्जन, बलार्जन के लिए मार्गदर्शन &lt;br /&gt;
३. शास्त्रीय शिक्षा का प्रावधान &lt;br /&gt;
४. श्रेष्ठ परम्पराओं के निर्माण की शिक्षा &lt;br /&gt;
५. जीवन के तत्त्वज्ञान और व्यवहार की शिक्षा&lt;br /&gt;
६. जीवन के लिए महत्वपूर्ण सामाजिक संगठन प्रणालियाँ और व्यवस्थाओं की समझ और यथाशक्ति योगदान की प्रेरणा| &lt;br /&gt;
कौशल विधा पंचायत &lt;br /&gt;
१. समाज की किसी एक आवश्यकता की पूर्ति करना | कभी कोई कमी न हो यह सुनिश्चित करना|&lt;br /&gt;
२. धर्म के मार्गदर्शन में अपने कौशल विधा-धर्म का निर्धारण और कौशल विधा प्रणाली में प्रचार प्रसार &lt;br /&gt;
३. अन्य कौशल विधाओं के साथ समन्वय &lt;br /&gt;
४. राष्ट्र सर्वोपरि यह भावना सदा जाग्रत रखना &lt;br /&gt;
व्यवस्थाओं के धर्म &lt;br /&gt;
धर्म व्यवस्था &lt;br /&gt;
यह कोई नियमित व्यवस्था नहीं होती| यह जाग्रत, नि:स्वार्थी, सर्वभूतहित में सदैव प्रयासरत रहनेवाले पंडितों का समूह होता है| यह समूह सक्रीय होने से समाज ठीक चलता है| आवश्यकतानुसार इस समूह की जिम्मेदारियां बढ़ जातीं है| ऐसे आपद्धर्म के निर्वहन के लिए भी यह समूह पर्याप्त सामर्थ्यवान हो|  &lt;br /&gt;
१. कालानुरूप धर्म को व्याख्यायित करना| &lt;br /&gt;
२. वर्णों के ‘स्व’धर्मों का पालन करने की व्यवस्था की पस्तुति कर शिक्षा और शासन की मददसे समाज में उन्हें स्थापित करना| व्यक्तिगत और सामाजिक धर्म/संस्कृति के अनुसार व्यवहार का वातावरण बनाना| जब वर्ण-धर्मं का पालन लोग करते हैं तब देश में संस्कृति का विकास और रक्षण होता है| जिनकी ओर देखकर लोग वर्ण धर्म का पालन कर सकें ऐसे ‘श्रेष्ठ’ लोगों का निर्माण करना| &lt;br /&gt;
३. स्वाभाविक, शासनिक और आर्थिक ऐसी सभी प्रकार की स्वतन्त्रता की रक्षा करना| &lt;br /&gt;
४. शासनपर अपने ज्ञान, त्याग, तपस्या, लोकसंग्रह तथा सदैव लोकहित के चिंतन के माध्यम से नैतिक दबाव निर्माण करना| शासन को सदाचारी, कुशल और सामर्थ्य संपन्न बनाए रखने के लिए मार्गदर्शन करना| अधर्माचरणी शासन को हटाकर धर्माचरणी शासन को प्रतिष्ठित करना|&lt;br /&gt;
५. लोकशिक्षा (कुटुम्ब शिक्षा इसी का हिस्सा है) और विद्यालयीन शिक्षा की प्रभावी व्यवस्था करना| जैसे लिखा पढी न्यूनतम करने की दिशा में बढ़ना| वाणी/शब्द की प्रतिष्ठा बढ़ाना| जीवन को साधन सापेक्षता से साधना  सापेक्षता की ओर ले जाने के लिए अपनी कथनी और करनी से मार्गदर्शन करना| &lt;br /&gt;
शासन व्यवस्था &lt;br /&gt;
१. अंतर्बाह्य शत्रुओं से लोगों की शासनिक स्वतन्त्रता की रक्षा करना| &lt;br /&gt;
२. धर्मं के दायरे में रहकर दुष्टों और मूर्खों को नियंत्रण में रखना| &lt;br /&gt;
३. दंड व्यवस्था के अंतर्गत न्याय व्यवस्था का निर्माण करना| किसी पर अन्याय हो ही नहीं ऐसी दंड व्यवस्था के निर्माण का प्रयास करना| &lt;br /&gt;
४. श्रेष्ठ शासक परम्परा निर्माण करना|&lt;br /&gt;
५. प्रभावी, समाजहित की शिक्षा देनेवाले शिक्षा केन्द्रों को संरक्षण, समर्थन और सहायता देकर और प्रभावी बनाने के लिए यथाशक्ति प्रयास करना| ऐसा करने से शासन का काम काफी सरल हो जाता है| &lt;br /&gt;
६. धर्मं व्यवस्था से समय समयपर मार्गदर्शन प्राप्त करते रहना|  &lt;br /&gt;
समृद्धि व्यवस्था &lt;br /&gt;
१. योग्य शिक्षा के द्वारा समाज में धर्म के अविरोधी इच्छाओं का ही विकास हो यह सुनिश्चित करना| &lt;br /&gt;
२. समाज के प्रत्येक घटक की सभी आवश्यकताओं की पूर्ति करना, धर्म विरोधी इच्छाओं की नहीं| समाज की आर्थिक स्वतन्त्रता को अबाधित रखना| &lt;br /&gt;
३. प्राकृतिक संसाधनों का न्यूनतम उपयोग हो ऐसा वातावरण बनाना| संयमित उपभोग को प्रतिष्ठित करना| &lt;br /&gt;
४. प्रकृति का प्रदूषण नहीं होने देना| प्रकृति का सन्तुलन बनाए रखना| &lt;br /&gt;
५. कौटुम्बिक उद्योग, जातियाँ और ग्राम मिलकर समृद्धि निर्माण होती है| ये तीनों ईकाईयाँ फलेफूले और इनका स्वस्थ ऐसा तानाबाना बना रहे ऐसा वातावरण रहे|&lt;br /&gt;
६. पैसे का विनिमय न्यूनतम रहे ऐसी व्यवस्था निर्माण करना|&lt;br /&gt;
अब हम धर्म के अनुपालन की प्रक्रिया का विचार आगे करेंगे|&lt;br /&gt;
धर्म अनुपालन की प्रक्रिया  &lt;br /&gt;
हमने जाना है कि समाज के सुख, शांति, स्वतंत्रता, सुसंस्कृतता के लिए समाज का धर्मनिष्ठ होना आवश्यक होता है| यहाँ मोटे तौरपर धर्म से मतलब कर्तव्य से है| समाज धारणा के लिए कर्तव्योंपर आधारित जीवन अनिवार्य होता है| समाज धारणा के लिए धर्म-युक्त व्यवहार में आनेवाली जटिलताओं को और उसके अनुपालन की प्रक्रिया को समझने का प्रयास करेंगे| इन में व्यक्तिगत स्तर की बातों का हमने पूर्व के अध्याय में विचार किया है|&lt;br /&gt;
१. विभिन्न ईकाईयों के स्तरपर &lt;br /&gt;
१.१ कुटुम्ब : समाज की सभी इकाइयों के विभिन्न स्तरोंपर उचित भूमिका निभानेवाले श्रेष्ठ मानव का निर्माण करना| कौटुम्बिक व्यवसाय के माध्यम से समाज की किसी आवश्यकता की पूर्ति करना| &lt;br /&gt;
१.२ ग्राम : ग्राम की भूमिका छोटे विश्व और बड़े कुटुम्ब की तरह ही होती है| जिस तरह कुटुम्ब के सदस्यों में आपस में पैसे का लेनदेन नहीं होता उसी तरह अच्छे ग्राम में कुटुम्बों में आपस में पैसे का लेनदेन नहीं होता| प्रत्येक की सम्मान और स्वतन्त्रता के साथ अन्न, वस्त्र, भवन, शिक्षा, आजीविका, सुरक्षा आदि सभी आवश्यकताओं की पूर्ति होती है|&lt;br /&gt;
१.३ कौशल विधा : समाज जीवन की आवश्यकताओं की हर विधा के अनुसार व्यवसाय विधा समूह बनते हैं| इन समूहों के भी सामान्य व्यक्ति से लेकर विश्व के स्तरतक के लिए करणीय और अकरणीय कार्य होते हैं| कर्तव्य होते हैं| इन्हें व्यवसाय विधा धर्म कहेंगे| इनमें पदार्थ के उत्पादन के रूप में आर्थिक स्वतन्त्रता के किसी एक पहलू की रक्षा में योगदान करना होता है|  शिक्षा/संस्कार, वस्तुएं, भावनाएं, विचार, कला आदि में से समाज जीवन की आवश्यकता में से किसी एक विधा के पदार्थ की निरंतर आपूर्ति करना| पदार्थ का अर्थ केवल वस्तु नहीं है| जिस पद याने शब्द का अर्थ होता है वह पदार्थ कहलाता है| व्यावसायिक समूह का काम कौशल का विकास करना, कौशल का पीढ़ी दर पीढ़ी अंतरण करना और अन्य व्यवसायिक समूहों से समन्वय रखना आदि है|&lt;br /&gt;
१.४ भाषिक समूह : भाषा का मुख्य उपयोग परस्पर संवाद है| संवाद विचारों की सटीक अभिव्यक्ति   करनेवाला हो इस हेतु से भाषाएँ बनतीं हैं| संवाद में सहजता, सरलता, सुगमता से आत्मीयता बढ़ती है| इसी हेतु से भाषिक समूह बनते हैं| &lt;br /&gt;
१.५ प्रादेशिक समूह:शासनिक और व्यवस्थात्मक सुविधा की दृष्टि से प्रादेशिक स्तरका महत्त्व होता है|  &lt;br /&gt;
१.६ राष्ट्र:राष्ट्र अपने समाज के लिये विविध प्रकारके संगठनों का और व्यवस्थाओं का निर्माण करता है| &lt;br /&gt;
१.७ विश्व:पूर्व में बताई हुई १.१ से लेकर १.६ तक की सभी इकाइयां वैश्विक हित की अविरोधी रहें|&lt;br /&gt;
२. प्रकृति सुसंगतता : समाज जीवन में केन्द्रिकरण और विकेंद्रीकरण का समन्वय हो यह आवश्यक है| विशाल उद्योग, बाजार की मंडियां, शासकीय कार्यालय, व्यावसायिक, भाषिक, प्रादेशिक समूहों के समन्वय की व्यवस्थाएं आदि के लिये शहरों की आवश्यकता होती है| लेकिन इनमें अनावश्यक केन्द्रीकरण न हो पाए| वनवासी या गिरिजन भी ग्राम व्यवस्था से ही जुड़े हुए होने चाहिए| &lt;br /&gt;
३ प्रक्रियाएं : धर्म के अनुपालन में बुद्धि के स्तरपर धर्म के प्रति पर्याप्त संज्ञान, मन के स्तरपर कौटुम्बिक भावना, अनुशासन और श्रद्धा (आज्ञाकारिता) का विकास तथा शारीरिक स्तरपर सहकारिता और परोपकार की आदतें अत्यंत आवश्यक हैं| &lt;br /&gt;
३.१ धर्म संज्ञान : ‘समझना’ यह बुद्धि का काम होता है| इसलिए जब बच्चे का बुद्धि का अंग विकसित हो रहा होता है उसे धर्म की बौद्धिक याने तर्क तथा कर्मसिद्धांत के आधारपर शिक्षा देना उचित होता है| इस दृष्टि से तर्कशास्त्र की समझ या सरल शब्दों में ‘किसी भी बात के करने से पहले चराचर के हित में उस बात को कैसे करना चाहिए’ इसे समझने की क्षमता का विकास आवश्यक होता है|&lt;br /&gt;
३.२ कौटुम्बिक भावना का विकास : समाज के सभी परस्पर संबंधों में कौटुम्बिक भावना से व्यवहार का आधार धर्मसंज्ञान ही तो होता है| मन को बुद्धि के नियंत्रण में रखना ही मन की शिक्षा होती है| दुर्योधन के निम्न कथन से सब परिचित हैं| 		&lt;br /&gt;
जानामी धर्मं न च में प्रवृत्ति: |   जानाम्यधर्मं न च में निवृत्ति: ||&lt;br /&gt;
३.३ धर्माचरण की आदतें: दुर्योधन के उपर्युक्त कथन को ध्यान में रखकर ही गर्भधारणा से ही बच्चे को धर्माचरण की आदतों की शिक्षा देना महत्त्वपूर्ण बन जाता है| आदत का अर्थ है जिस बात के करने में कठिनाई का अनुभव नहीं होता| जब किसी बात के बारबार करने से आचरण में यह सहजता आती है तब वह आदत बन जाती है| और जब उसे बुद्धिका अधिष्ठान मिल जाता है तब वह आदतें मनुष्य का स्वभाव ही बन जातीं हैं| &lt;br /&gt;
४ धर्म के अनुपालन के स्तर और साधन : &lt;br /&gt;
४.१ धर्म के अनुपालन करनेवालों के राष्ट्रभक्त, अराष्ट्रीय और राष्ट्रद्रोही ऐसे मोटे-मोटे तीन स्तर होते हैं| &lt;br /&gt;
४.२ धर्म के अनुपालन के साधन : धर्म का अनुपालन पूर्व में बताए अनुसार शिक्षा, आदेश, प्रायश्चित्त/	पश्चात्ताप 	तथा दंड ऐसा चार प्रकार से होता है| शासन दुर्बल होने से समाज में प्रमाद करनेवालों की संख्या में वृद्धि 	होती है|&lt;br /&gt;
५. धर्म के अनुपालन के अवरोध : धर्म के अनुपालन में निम्न बातें अवरोध-रूप होतीं हैं|&lt;br /&gt;
५.१ भिन्न जीवनदृष्टि के लोग : शीघ्रातिशीघ्र भिन्न जीवनदृष्टि के लोगों को आत्मसात करना आवश्यक होता 	है| अन्यथा समाज जीवन अस्थिर और संघर्षमय बन जाता है|&lt;br /&gt;
५.२ स्वार्थ/संकुचित अस्मिताएँ :आवश्यकताओं की पुर्ति तक तो स्वार्थ भावना समर्थनीय है| अस्मिता या 	अहंकार यह प्रत्येक जिवंत ईकाई का एक स्वाभाविक पहलू होता है| किन्तु जब किसी ईकाई के विशिष्ट स्तर की यह अस्मिता अपने से ऊपर की ईकाई जिसका वह हिस्सा है, उसकी अस्मिता से बड़ी लगने लगती है तब समाज जीवन की शांति नष्ट हो जाती है| इसलिए यह आवश्यक है की मजहब, रिलिजन,प्रादेशिक अलगता, भाषिक भिन्नता, धनका अहंकार, बौद्धिक श्रेष्ठता आदि जैसी संकुचित अस्मिताएँ अपने से ऊपर की जीवंत ईकाई की अस्मिता के विरोध में नहीं हो| &lt;br /&gt;
५.३ विपरीत शिक्षा : विपरीत या दोषपूर्ण शिक्षा यह तो सभी समस्याओं की जड़ होती है| &lt;br /&gt;
६  कारक तत्त्व : कारक तत्वों से मतलब है धर्मपालन में सहायता देनेवाले घटक| ये निम्न होते हैं|&lt;br /&gt;
६.१ धर्म व्यवस्था : शासन धर्मनिष्ठ रहे यह सुनिश्चित करना धर्म व्यवस्था की जिम्मेदारी है| अपने त्याग, तपस्या, ज्ञान, लोकसंग्रह, चराचर के हित का चिन्तन, समर्पण भाव और कार्यकुशलता के आधारपर 	समाज से प्राप्त समर्थन प्राप्त कर वह देखे की कोई अयोग्य व्यक्ति शासक नहीं बनें|&lt;br /&gt;
६.२ शिक्षा : ६.२.१ कुटुम्ब शिक्षा 	६.२.२ विद्याकेन्द्र की शिक्षा 	६.२.३ लोकशिक्षा &lt;br /&gt;
६.३ धर्मनिष्ठ शासन : शासक का धर्मशास्त्र का जानकार होना और स्वयं धर्माचरणी होना भी आवश्यक होता है| जब शासन धर्म के अनुसार चलता है, धर्म व्यवस्थाद्वारा नियमित निर्देशित होता है तब धर्म भी 	स्थापित होता है और राज्य व्यवस्था भी श्रेष्ठ बनती है|&lt;br /&gt;
६.४ धर्मनिष्ठों का सामाजिक नेतृत्व : समाज जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में धर्मनिष्ठ लोग जब अच्छी संख्या में दिखाई देते हैं तब समाज मानस धर्मनिष्ठ बनता है| &lt;br /&gt;
७ चरण : धर्म का अनुपालन जब लोग स्वेच्छा से करनेवाले समाज के निर्माण के लिए दो बातें अत्यंत महत्वपूर्ण होतीं हैं| एक गर्भ में श्रेष्ठ जीवात्मा की स्थापना और दूसरे शिक्षा और संस्कार| &lt;br /&gt;
शिक्षा और संस्कार में -&lt;br /&gt;
७.१ जन्मपूर्व और शैशव कालमें अधिजनन शास्त्र के आधारपर मार्गदर्शन| &lt;br /&gt;
७.२ बाल्य काल : कुटुम्ब की शिक्षा के साथ विद्याकेन्द्र शिक्षा का समायोजन 			           &lt;br /&gt;
७.३ यौवन काल: अहंकार, बुद्धि के सही मोड़ हेतु सत्संग, प्रेरणा, वातावरण, ज्ञानार्जन/बलार्जन/कौशलार्जन आदि &lt;br /&gt;
७.४ प्रौढ़ावस्था : पूर्व ज्ञान/आदतों को व्यवस्थित करने के लिए सामाजिक वातावरण और मार्गदर्शन&lt;br /&gt;
७.४.१ पुरोहित&lt;br /&gt;
७.४.२ मेले/यात्राएं&lt;br /&gt;
७.४.३ कीर्तनकार/प्रवचनकार&lt;br /&gt;
७.४.४ धर्माचार्य&lt;br /&gt;
७.४.५ दृक्श्राव्य माध्यम –चित्रपट, दूरदर्शन आदि&lt;br /&gt;
७.४.६ आन्तरजाल&lt;br /&gt;
७.४.७ कानून का डर &lt;br /&gt;
८ धर्म निर्णय व्यवस्था : सामान्यत: जब भी धर्म की समझसे सम्बन्धित समस्या हो तब धर्म निर्णय की व्यवस्था उपलब्ध होनी चाहिये| इस व्यवस्था के तीन स्तर होना आवश्यक है| पहला स्तर तो स्थानिक धर्म के जानकार, दूसरा जनपदीय या निकटके तीर्थक्षेत्र में धर्मज्ञ परिषद्, और तीसरा स्तर अखिल भारतीय या राष्ट्रीय धर्मज्ञ परिषद्| &lt;br /&gt;
९ माध्यम : धर्म अनुपालन करवाने के मुख्यत: दो प्रकारके माध्यम होते हैं| &lt;br /&gt;
९.१ कुटुम्ब के दायरे में : धर्म शिक्षा का अर्थ है सदाचार की शिक्षा| धर्म की शिक्षा के लिए कुटुम्ब यह सबसे श्रेष्ठ पाठशाला है| विद्याकेन्द्र की शिक्षा तो कुटुम्ब में मिली धर्म शिक्षा की पुष्टि या आवश्यक सुधार के लिए ही होती है| कुटुम्ब में धर्म शिक्षा तीन तरह से होती है| गर्भपूर्व संस्कार, गर्भ संस्कार और शिशु संस्कार और आदतें| मनुष्य की आदतें भी बचपन में ही पक्की हो जातीं हैं| &lt;br /&gt;
९.२ कुटुम्ब से बाहर के माध्यम : मनुष्य तो हर पल सीखता ही रहता है| इसलिए कुटुम्ब से बाहर भी वह कई बातें सीखता है| माध्यमों में मित्र मंडली, विद्यालय, समाज का सांस्कृतिक स्तर और क़ानून व्यवस्था आदि|&lt;br /&gt;
जीवन के भारतीय प्रतिमान की प्रतिष्ठापना की प्रक्रिया से अपेक्षित परिणामों की चर्चा हम अगले 	अध्याय में करेंगे|&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[Category:Bhartiya Jeevan Pratiman (भारतीय जीवन प्रतिमान)]]&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Dilipkelkar</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://dharmawiki.org/index.php?title=Responsibilities_at_Personal_Level_(%E0%A4%B5%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%95%E0%A5%8D%E0%A4%A4%E0%A4%BF%E0%A4%97%E0%A4%A4_%E0%A4%A7%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%AE_%E0%A4%85%E0%A4%A8%E0%A5%81%E0%A4%AA%E0%A4%BE%E0%A4%B2%E0%A4%A8)&amp;diff=119948</id>
		<title>Responsibilities at Personal Level (व्यक्तिगत धर्म अनुपालन)</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://dharmawiki.org/index.php?title=Responsibilities_at_Personal_Level_(%E0%A4%B5%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%95%E0%A5%8D%E0%A4%A4%E0%A4%BF%E0%A4%97%E0%A4%A4_%E0%A4%A7%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%AE_%E0%A4%85%E0%A4%A8%E0%A5%81%E0%A4%AA%E0%A4%BE%E0%A4%B2%E0%A4%A8)&amp;diff=119948"/>
		<updated>2019-07-21T05:24:07Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Dilipkelkar: /* सामाजिक घटकों के स्तर और धर्माचरण का अनुपालन */ लेख सम्पादित किया&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{One source|date=January 2019}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हमने जाना है कि समाज के सुख, शांति, स्वतंत्रता, सुसंस्कृतता के लिए समाज का धर्मनिष्ठ होना आवश्यक होता है। यहाँ मोटे तौर पर धर्म का मतलब कर्तव्य है। समाज धारणा के लिए कर्तव्यों पर आधारित जीवन अनिवार्य होता है। समाज धारणा के लिए धर्म-युक्त व्यवहार में आने वाली जटिलताओं को और फिर भी उसका अनुपालन कैसे किया जाता है, इसकी प्रक्रिया को समझने का प्रयास करेंगे। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== विविध स्तर ==&lt;br /&gt;
मानव समाज में जीवन्त इकाईयों के कई स्तर हैं। ये स्तर निम्न हैं:&lt;br /&gt;
# व्यक्ति&lt;br /&gt;
# कुटुम्ब&lt;br /&gt;
# ग्राम&lt;br /&gt;
# व्यवसाय समूह&lt;br /&gt;
# भाषिक समूह&lt;br /&gt;
# प्रादेशिक समूह&lt;br /&gt;
# राष्ट्र&lt;br /&gt;
# विश्व&lt;br /&gt;
ये सब मानव से या व्यक्तियों से बनीं जीवन्त इकाईयाँ हैं। इन सब के अपने ‘स्वधर्म’ हैं। इन सभी स्तरों के करणीय और अकरणीय बातों को ही उस ईकाई का धर्म कहा जाता है। निम्न स्तर की ईकाई उससे बड़े स्तर की ईकाई का हिस्सा होने के कारण हर ईकाई का धर्म आगे की या उससे बड़ी जीवंत ईकाई के धर्म का केवल अविरोधी ही नहीं, अपितु पूरक और पोषक होना आवश्यक होता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
प्राकृतिक दृष्टि से तो यह होता ही है। लेकिन व्यक्ति का स्वार्थ उसे भिन्न व्यवहार के लिए प्रेरित करता है। ऐसा भिन्न व्यवहार कोई व्यक्ति न करे इसके लिए ही शिक्षा होती है। और जो शिक्षा मिलने पर भी अपनी दुष्टता या मूर्खता के कारण उचित व्यवहार नहीं करता उसके लिए शासन या दंड व्यवस्था होती है। व्यक्ति के धर्म का कोई भी पहलू, कुटुम्ब से लेकर वैश्विक धर्म का विरोधी नहीं होना चाहिए। इतना ही नहीं, वह इन धर्मों के लिए पूरक और पोषक भी होना चाहिए।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
प्रत्येक मनुष्य जीवन में कई भूमिकाएं निभाता है। इन भूमिकाओं के मोटे मोटे दो हिस्से कर सकते हैं। अंजान वातावरण में व्यक्ति की भूमिका व्यक्ति के स्तर की होती है। जबकि परिचित वातावरण में वह परिचितों को अपेक्षित, भूमिका निभाए ऐसी उस से अपेक्षा होती है। उस समय वह किसी समूह का याने कुटुंब, ग्राम, व्यावसायिक समूह या जाति, प्रादेशिक समूह, भाषिक समूह, राष्ट्र आदि के सदस्य की भूमिका में होता है। मनुष्य को समूह के विभिन्न स्तरों पर काम तो व्यक्ति के रूप में ही करना है। फिर भी सुविधा के लिए व्यक्ति के स्तर से ऊपर की इकाई का विचार हम अगले अध्याय, “जिम्मेदारी समूह” में करेंगे। यहाँ केवल व्यक्ति के स्तर पर क्या करना है इसका विचार करेंगे।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इसी का विभाजन यम और नियमों के रूप में अष्टांग योग में किया गया है। सामान्यत: शौच, संतोष, तप, स्वाध्याय और ईश्वर प्रणिधान इन पाँच नियमों का संबंध व्यक्तिगत स्तर के लिए अधिक होता है। अहिंसा, सत्य, अस्तेय, अपरिग्रह और ब्रह्मचर्य इन पाँच प्रकार के ‘यम’ का संबंध मुख्यत: समाज से होता है। इसलिए यहाँ व्यक्तिगत स्तर पर शौच, संतोष, तप, स्वाध्याय और ईश्वर प्रणिधान आदि के विषय में विचार करना उचित होगा।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
व्यक्ति के स्तर पर जिन अन्य धर्मों का समावेश भी होता है ऐसे इन नियमों से भिन्न, लेकिन साथ ही विचार करने योग्य पहलू निम्न होंगे:&lt;br /&gt;
# जन्मजात / स्वभावज : याने जन्म से जो सत्त्व-रज-तम युक्त स्वभाव मिला है उसमें शुद्धि और विकास करना। इसे ही वर्णधर्म कहते हैं। इसे ही श्रीमद्भगवद्गीता में ‘स्वधर्म’ कहा है। इसी तरह से जन्म से ही जो त्रिदोषात्मक शरीर मिला है उसे धर्म साधना के लिए स्वस्थ रखना भी महत्वपूर्ण है। शरीर स्वस्थ रहे, निरोग रहे, बलवान रहे, लचीला रहे, कौशल्यवान रहे, तितिक्षावान रहे इस के लिए जो करणीय और अकरणीय बातें हैं उन्हें ही शरीरधर्म कहते हैं।&lt;br /&gt;
# स्त्री-पुरुष : स्त्री या पुरुष होने के कारण स्त्री होने का या पुरुष होने का जो प्रयोजन है उसे पूर्ण करना। स्त्री को एक अच्छी बेटी, अच्छी बहन, अच्छी पत्नि, अच्छी गृहिणी, अच्छी माता, अच्छी समाज सदस्य, अच्छी राष्ट्रभक्त बनना। इसी तरह से पुरुष ने अच्छा बेटा, अच्छा भाई, अच्छा पति, अच्छा गृहस्थ, अच्छा पिता, अच्छा समाज सदस्य, अच्छा राष्ट्रभक्त बनना। इस दृष्टि से अपने गुणों का विकास करना।&lt;br /&gt;
इन सब को मिलाकर करणीय और अकरणीय के तानेबाने का याने धर्मों का विचार कुछ निम्न जैसा होगा:&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== व्यक्तिगत धर्मों का तानाबाना ==&lt;br /&gt;
{| class=&amp;quot;wikitable&amp;quot;&lt;br /&gt;
|+&lt;br /&gt;
!&lt;br /&gt;
!&lt;br /&gt;
!&lt;br /&gt;
!&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| rowspan=&amp;quot;3&amp;quot; |ब्राह्मण वर्ण&lt;br /&gt;
|ब्रह्मचर्य&lt;br /&gt;
|अपने लिए&lt;br /&gt;
|(स्त्री और पुरुष)  : नियमों का अनुपालन&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|गृहस्थ&lt;br /&gt;
|अपने लिए&lt;br /&gt;
|(स्त्री और पुरुष)  : नियमों का अनुपालन&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|उत्तरगृहस्थ&lt;br /&gt;
|अपने लिए&lt;br /&gt;
|(स्त्री और पुरुष)  : नियमों का अनुपालन&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| rowspan=&amp;quot;3&amp;quot; |क्षत्रिय वर्ण&lt;br /&gt;
|ब्रह्मचर्य&lt;br /&gt;
|अपने लिए&lt;br /&gt;
|(स्त्री और पुरुष)  : नियमों का अनुपालन&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|गृहस्थ&lt;br /&gt;
|अपने लिए&lt;br /&gt;
|(स्त्री और पुरुष)  : नियमों का अनुपालन&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|उत्तरगृहस्थ&lt;br /&gt;
|अपने लिए&lt;br /&gt;
|(स्त्री और पुरुष)  : नियमों का अनुपालन&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| rowspan=&amp;quot;3&amp;quot; |वैश्य वर्ण&lt;br /&gt;
|ब्रह्मचर्य&lt;br /&gt;
|अपने लिए&lt;br /&gt;
|(स्त्री और पुरुष)  : नियमों का अनुपालन&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|गृहस्थ&lt;br /&gt;
|अपने लिए&lt;br /&gt;
|(स्त्री और पुरुष)  : नियमों का अनुपालन&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|उत्तरगृहस्थ&lt;br /&gt;
|अपने लिए&lt;br /&gt;
|(स्त्री और पुरुष)  : नियमों का अनुपालन&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| rowspan=&amp;quot;2&amp;quot; |शूद्र वर्ण&lt;br /&gt;
|गृहस्थ&lt;br /&gt;
|अपने लिए&lt;br /&gt;
|(स्त्री और पुरुष)  : नियमों का अनुपालन&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|उत्तरगृहस्थ&lt;br /&gt;
|अपने लिए&lt;br /&gt;
|(स्त्री और पुरुष)  : नियमों का अनुपालन&lt;br /&gt;
|}&lt;br /&gt;
कुछ सभी को लागू हैं ऐसे बिंदु निम्न होंगे:&lt;br /&gt;
# कोई भी बालक जन्म से शूद्र नहीं होता। ब्रह्मचर्य काल में और ब्रह्मचर्य काल तक कोई बालक शूद्र नहीं होता। इस काल में कोई शूद्र ही नहीं होता इसलिए शूद्र का धर्म भी बताने की आवश्यकता नहीं है। ब्रह्मचर्य का काल तो उसे भी त्रिवर्ण में से अपने योग्य वर्ण के गुण लक्षण प्रकट करने का समय होता है। जब वह त्रिवर्ण में से अपना वर्ण सिद्ध नहीं कर पाता है तब वह शूद्रत्व को प्राप्त होता है।&lt;br /&gt;
# ब्रह्मचर्य यह अपने अपने जन्मजात वर्ण या स्वभाव के गुण लक्षणों की शुद्धि और वृद्धि का काल होता है। इसी तरह से अपने शरीर को श्रेष्ठ बनाने का काल होता है। ज्ञानार्जन, बलार्जन, कौशलार्जन आदि का काल होता है। योगशास्त्र के पाँच नियमों का पालन भी अनिवार्य रूप से होता रहना चाहिए।&lt;br /&gt;
# गृहस्थ काल यह बल को बनाए रखने के लिए और ज्ञान और कुशलता में वृद्धि करने का काल होता है। इस दृष्टि से चिंतन, निदिध्यासन, प्रयोग, अनुसंधान आदि का काल होता है। ब्रह्मचर्य काल में जो सीखा है उसे प्रयोग करने का, उसे परिष्कृत करने का, उसे अधिक उन्नत करने का काल होता है। इसी के लिए तप होता है, स्वाध्याय होता है। स्वाध्याय की दिशा ही ईश्वर प्रणिधान की होती है। अपने अध्ययन के या व्यवसाय के विषय का ही अध्ययन और विकास इस तरह से करना जिससे मोक्षगामी बन सकें, परमात्मपद को प्राप्त कर सकें।&lt;br /&gt;
# वानप्रस्थ या उत्तर गृहस्थाश्रम में जो उन्नत ज्ञान और कुशलता का विकास किया है उसे अगली पीढी को हस्तांतरित करने का काल होता है। इस दृष्टि से जो मिले उसमें संतोष रखना होता है। ज्ञान और कौशल के हस्तांतरण के लिए तप करने की आवश्यकता होती है। मृत्यू से पूर्व अपने से भी श्रेष्ठ ज्ञान और/या कुशलता के क्षेत्र में उत्तराधिकारी निर्माण करना होता है। अपने कुटुम्ब में यदि ऐसा उत्तराधिकारी नहीं मिलता तो उसे बाहर समाज में से ढूँढना होता है।&lt;br /&gt;
इन में यहाँ हम उपर्युक्त में से हर वर्ण के और हर आश्रम के व्यक्ति के लिए केवल ‘अपने लिए’ जो करणीय और अकरणीय है उसी का याने शौच, संतोष, तप, स्वाध्याय और ईश्वर प्रणिधान का विचार करेंगे। व्यक्ति से ऊपर की इकाइयों का विचार हम [[Responsibilities at Societal Level (सामाजिक धर्म अनुपालन)|इस]] अध्याय में करेंगे।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== सामाजिक घटकों के स्तर और धर्माचरण का अनुपालन ==&lt;br /&gt;
# धर्म की समझ रखने वाला और धर्माचरण करने वाला वर्ग : इसे शिक्षा के माध्यम से बनाया जाता है।&lt;br /&gt;
# धर्म को केवल समझने वाला लेकिन प्रत्यक्ष धर्माचरण में त्रुटियाँ होतीं हैं ऐसा वर्ग : ऐसे लोगों को ज्येष्ठ / श्रेष्ठ लोग या शासन के माध्यम से ठीक किया जा सकता है।&lt;br /&gt;
# धर्म को न समझने वाला लेकिन धर्म की अच्छी समझ किसे है यह समझने वाला और उसका अनुसरण करनेवाला : सामान्यत: लोग ऐसे होते हैं। यह शिक्षा की श्रेष्ठता है कि ऐसे लोगों के मन बुद्धि के नियंत्रण में और और बुद्धि धर्माचरणी श्रेष्ठ लोगों के अनुसरण की रहे। आदेश से भी इनसे धर्माचरण करवाया जा सकता है। इस दृष्टि से आज्ञाकारिता का गुण बहुत महत्वपूर्ण है। कहा गया है{{Citation needed}}:&lt;br /&gt;
&amp;lt;blockquote&amp;gt;तर्कोंऽप्रतिष्ठित: श्रुतयोर्विभिन्न: नैको ऋषिर्यस्य मतं प्रमाणं ।&amp;lt;/blockquote&amp;gt;&amp;lt;blockquote&amp;gt;धर्मस्य तत्वं निहितं गुहाय महाजनों येन गत: स पंथ: ।।&amp;lt;/blockquote&amp;gt;&amp;lt;blockquote&amp;gt;अर्थ : जहाँ मेरा तर्क काम नहीं करता, श्रुतियों के अर्थघटन में भी मुझे भिन्न मार्गदर्शन मिलता है, ऋषियों द्वारा भी जो कहा गया है उसमें मुझे भिन्नता दिखाई देती है तब मैंने जो महाजन हैं, जो धर्म को जानकर और धर्म के अनुसार व्यवहार करने वाले हैं, ऐसा प्रसिद्ध है, उनका अनुसरण करना चाहिए।&amp;lt;/blockquote&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;ol start=&amp;quot;4&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;li&amp;gt; धर्म को न समझनेवाला ओर फिर भी यह माननेवाला की उसे धर्म की समझ है – इसे मूर्ख कहते हैं।&lt;br /&gt;
&amp;lt;li&amp;gt; दुष्ट, अन्यों के साथ अधर्माचरण करने को उचित मानने वाला।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;/ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
इस उपर्युक्त क्रम में मैं यथासंभव ऊपर के स्तर पर रहूँ ऐसा प्रयास प्रत्येक ने करते रहना चाहिए।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==References==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;references /&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अन्य स्रोत:&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[Category:Bhartiya Jeevan Pratiman (भारतीय जीवन प्रतिमान)]]&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Dilipkelkar</name></author>
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		<title>Responsibilities at Personal Level (व्यक्तिगत धर्म अनुपालन)</title>
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		<updated>2019-07-21T05:23:13Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Dilipkelkar: /* सामाजिक घटकों के स्तर और धर्माचरण का अनुपालन */&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{One source|date=January 2019}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हमने जाना है कि समाज के सुख, शांति, स्वतंत्रता, सुसंस्कृतता के लिए समाज का धर्मनिष्ठ होना आवश्यक होता है। यहाँ मोटे तौर पर धर्म का मतलब कर्तव्य है। समाज धारणा के लिए कर्तव्यों पर आधारित जीवन अनिवार्य होता है। समाज धारणा के लिए धर्म-युक्त व्यवहार में आने वाली जटिलताओं को और फिर भी उसका अनुपालन कैसे किया जाता है, इसकी प्रक्रिया को समझने का प्रयास करेंगे। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== विविध स्तर ==&lt;br /&gt;
मानव समाज में जीवन्त इकाईयों के कई स्तर हैं। ये स्तर निम्न हैं:&lt;br /&gt;
# व्यक्ति&lt;br /&gt;
# कुटुम्ब&lt;br /&gt;
# ग्राम&lt;br /&gt;
# व्यवसाय समूह&lt;br /&gt;
# भाषिक समूह&lt;br /&gt;
# प्रादेशिक समूह&lt;br /&gt;
# राष्ट्र&lt;br /&gt;
# विश्व&lt;br /&gt;
ये सब मानव से या व्यक्तियों से बनीं जीवन्त इकाईयाँ हैं। इन सब के अपने ‘स्वधर्म’ हैं। इन सभी स्तरों के करणीय और अकरणीय बातों को ही उस ईकाई का धर्म कहा जाता है। निम्न स्तर की ईकाई उससे बड़े स्तर की ईकाई का हिस्सा होने के कारण हर ईकाई का धर्म आगे की या उससे बड़ी जीवंत ईकाई के धर्म का केवल अविरोधी ही नहीं, अपितु पूरक और पोषक होना आवश्यक होता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
प्राकृतिक दृष्टि से तो यह होता ही है। लेकिन व्यक्ति का स्वार्थ उसे भिन्न व्यवहार के लिए प्रेरित करता है। ऐसा भिन्न व्यवहार कोई व्यक्ति न करे इसके लिए ही शिक्षा होती है। और जो शिक्षा मिलने पर भी अपनी दुष्टता या मूर्खता के कारण उचित व्यवहार नहीं करता उसके लिए शासन या दंड व्यवस्था होती है। व्यक्ति के धर्म का कोई भी पहलू, कुटुम्ब से लेकर वैश्विक धर्म का विरोधी नहीं होना चाहिए। इतना ही नहीं, वह इन धर्मों के लिए पूरक और पोषक भी होना चाहिए।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
प्रत्येक मनुष्य जीवन में कई भूमिकाएं निभाता है। इन भूमिकाओं के मोटे मोटे दो हिस्से कर सकते हैं। अंजान वातावरण में व्यक्ति की भूमिका व्यक्ति के स्तर की होती है। जबकि परिचित वातावरण में वह परिचितों को अपेक्षित, भूमिका निभाए ऐसी उस से अपेक्षा होती है। उस समय वह किसी समूह का याने कुटुंब, ग्राम, व्यावसायिक समूह या जाति, प्रादेशिक समूह, भाषिक समूह, राष्ट्र आदि के सदस्य की भूमिका में होता है। मनुष्य को समूह के विभिन्न स्तरों पर काम तो व्यक्ति के रूप में ही करना है। फिर भी सुविधा के लिए व्यक्ति के स्तर से ऊपर की इकाई का विचार हम अगले अध्याय, “जिम्मेदारी समूह” में करेंगे। यहाँ केवल व्यक्ति के स्तर पर क्या करना है इसका विचार करेंगे।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इसी का विभाजन यम और नियमों के रूप में अष्टांग योग में किया गया है। सामान्यत: शौच, संतोष, तप, स्वाध्याय और ईश्वर प्रणिधान इन पाँच नियमों का संबंध व्यक्तिगत स्तर के लिए अधिक होता है। अहिंसा, सत्य, अस्तेय, अपरिग्रह और ब्रह्मचर्य इन पाँच प्रकार के ‘यम’ का संबंध मुख्यत: समाज से होता है। इसलिए यहाँ व्यक्तिगत स्तर पर शौच, संतोष, तप, स्वाध्याय और ईश्वर प्रणिधान आदि के विषय में विचार करना उचित होगा।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
व्यक्ति के स्तर पर जिन अन्य धर्मों का समावेश भी होता है ऐसे इन नियमों से भिन्न, लेकिन साथ ही विचार करने योग्य पहलू निम्न होंगे:&lt;br /&gt;
# जन्मजात / स्वभावज : याने जन्म से जो सत्त्व-रज-तम युक्त स्वभाव मिला है उसमें शुद्धि और विकास करना। इसे ही वर्णधर्म कहते हैं। इसे ही श्रीमद्भगवद्गीता में ‘स्वधर्म’ कहा है। इसी तरह से जन्म से ही जो त्रिदोषात्मक शरीर मिला है उसे धर्म साधना के लिए स्वस्थ रखना भी महत्वपूर्ण है। शरीर स्वस्थ रहे, निरोग रहे, बलवान रहे, लचीला रहे, कौशल्यवान रहे, तितिक्षावान रहे इस के लिए जो करणीय और अकरणीय बातें हैं उन्हें ही शरीरधर्म कहते हैं।&lt;br /&gt;
# स्त्री-पुरुष : स्त्री या पुरुष होने के कारण स्त्री होने का या पुरुष होने का जो प्रयोजन है उसे पूर्ण करना। स्त्री को एक अच्छी बेटी, अच्छी बहन, अच्छी पत्नि, अच्छी गृहिणी, अच्छी माता, अच्छी समाज सदस्य, अच्छी राष्ट्रभक्त बनना। इसी तरह से पुरुष ने अच्छा बेटा, अच्छा भाई, अच्छा पति, अच्छा गृहस्थ, अच्छा पिता, अच्छा समाज सदस्य, अच्छा राष्ट्रभक्त बनना। इस दृष्टि से अपने गुणों का विकास करना।&lt;br /&gt;
इन सब को मिलाकर करणीय और अकरणीय के तानेबाने का याने धर्मों का विचार कुछ निम्न जैसा होगा:&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== व्यक्तिगत धर्मों का तानाबाना ==&lt;br /&gt;
{| class=&amp;quot;wikitable&amp;quot;&lt;br /&gt;
|+&lt;br /&gt;
!&lt;br /&gt;
!&lt;br /&gt;
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| rowspan=&amp;quot;3&amp;quot; |ब्राह्मण वर्ण&lt;br /&gt;
|ब्रह्मचर्य&lt;br /&gt;
|अपने लिए&lt;br /&gt;
|(स्त्री और पुरुष)  : नियमों का अनुपालन&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|गृहस्थ&lt;br /&gt;
|अपने लिए&lt;br /&gt;
|(स्त्री और पुरुष)  : नियमों का अनुपालन&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|उत्तरगृहस्थ&lt;br /&gt;
|अपने लिए&lt;br /&gt;
|(स्त्री और पुरुष)  : नियमों का अनुपालन&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| rowspan=&amp;quot;3&amp;quot; |क्षत्रिय वर्ण&lt;br /&gt;
|ब्रह्मचर्य&lt;br /&gt;
|अपने लिए&lt;br /&gt;
|(स्त्री और पुरुष)  : नियमों का अनुपालन&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|गृहस्थ&lt;br /&gt;
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|(स्त्री और पुरुष)  : नियमों का अनुपालन&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|उत्तरगृहस्थ&lt;br /&gt;
|अपने लिए&lt;br /&gt;
|(स्त्री और पुरुष)  : नियमों का अनुपालन&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| rowspan=&amp;quot;3&amp;quot; |वैश्य वर्ण&lt;br /&gt;
|ब्रह्मचर्य&lt;br /&gt;
|अपने लिए&lt;br /&gt;
|(स्त्री और पुरुष)  : नियमों का अनुपालन&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|गृहस्थ&lt;br /&gt;
|अपने लिए&lt;br /&gt;
|(स्त्री और पुरुष)  : नियमों का अनुपालन&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|उत्तरगृहस्थ&lt;br /&gt;
|अपने लिए&lt;br /&gt;
|(स्त्री और पुरुष)  : नियमों का अनुपालन&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| rowspan=&amp;quot;2&amp;quot; |शूद्र वर्ण&lt;br /&gt;
|गृहस्थ&lt;br /&gt;
|अपने लिए&lt;br /&gt;
|(स्त्री और पुरुष)  : नियमों का अनुपालन&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|उत्तरगृहस्थ&lt;br /&gt;
|अपने लिए&lt;br /&gt;
|(स्त्री और पुरुष)  : नियमों का अनुपालन&lt;br /&gt;
|}&lt;br /&gt;
कुछ सभी को लागू हैं ऐसे बिंदु निम्न होंगे:&lt;br /&gt;
# कोई भी बालक जन्म से शूद्र नहीं होता। ब्रह्मचर्य काल में और ब्रह्मचर्य काल तक कोई बालक शूद्र नहीं होता। इस काल में कोई शूद्र ही नहीं होता इसलिए शूद्र का धर्म भी बताने की आवश्यकता नहीं है। ब्रह्मचर्य का काल तो उसे भी त्रिवर्ण में से अपने योग्य वर्ण के गुण लक्षण प्रकट करने का समय होता है। जब वह त्रिवर्ण में से अपना वर्ण सिद्ध नहीं कर पाता है तब वह शूद्रत्व को प्राप्त होता है।&lt;br /&gt;
# ब्रह्मचर्य यह अपने अपने जन्मजात वर्ण या स्वभाव के गुण लक्षणों की शुद्धि और वृद्धि का काल होता है। इसी तरह से अपने शरीर को श्रेष्ठ बनाने का काल होता है। ज्ञानार्जन, बलार्जन, कौशलार्जन आदि का काल होता है। योगशास्त्र के पाँच नियमों का पालन भी अनिवार्य रूप से होता रहना चाहिए।&lt;br /&gt;
# गृहस्थ काल यह बल को बनाए रखने के लिए और ज्ञान और कुशलता में वृद्धि करने का काल होता है। इस दृष्टि से चिंतन, निदिध्यासन, प्रयोग, अनुसंधान आदि का काल होता है। ब्रह्मचर्य काल में जो सीखा है उसे प्रयोग करने का, उसे परिष्कृत करने का, उसे अधिक उन्नत करने का काल होता है। इसी के लिए तप होता है, स्वाध्याय होता है। स्वाध्याय की दिशा ही ईश्वर प्रणिधान की होती है। अपने अध्ययन के या व्यवसाय के विषय का ही अध्ययन और विकास इस तरह से करना जिससे मोक्षगामी बन सकें, परमात्मपद को प्राप्त कर सकें।&lt;br /&gt;
# वानप्रस्थ या उत्तर गृहस्थाश्रम में जो उन्नत ज्ञान और कुशलता का विकास किया है उसे अगली पीढी को हस्तांतरित करने का काल होता है। इस दृष्टि से जो मिले उसमें संतोष रखना होता है। ज्ञान और कौशल के हस्तांतरण के लिए तप करने की आवश्यकता होती है। मृत्यू से पूर्व अपने से भी श्रेष्ठ ज्ञान और/या कुशलता के क्षेत्र में उत्तराधिकारी निर्माण करना होता है। अपने कुटुम्ब में यदि ऐसा उत्तराधिकारी नहीं मिलता तो उसे बाहर समाज में से ढूँढना होता है।&lt;br /&gt;
इन में यहाँ हम उपर्युक्त में से हर वर्ण के और हर आश्रम के व्यक्ति के लिए केवल ‘अपने लिए’ जो करणीय और अकरणीय है उसी का याने शौच, संतोष, तप, स्वाध्याय और ईश्वर प्रणिधान का विचार करेंगे। व्यक्ति से ऊपर की इकाइयों का विचार हम [[Responsibilities at Societal Level (सामाजिक धर्म अनुपालन)|इस]] अध्याय में करेंगे।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== सामाजिक घटकों के स्तर और धर्माचरण का अनुपालन ==&lt;br /&gt;
# धर्म की समझ रखने वाला और धर्माचरण करने वाला वर्ग : इसे शिक्षा के माध्यम से बनाया जाता है।&lt;br /&gt;
# धर्म को केवल समझने वाला लेकिन प्रत्यक्ष धर्माचरण में त्रुटियाँ होतीं हैं ऐसा वर्ग : ऐसे लोगों को ज्येष्ठ / श्रेष्ठ लोग या शासन के माध्यम से ठीक किया जा सकता है।&lt;br /&gt;
# धर्म को न समझने वाला लेकिन धर्म की अच्छी समझ किसे है यह समझने वाला और उसका अनुसरण करनेवाला : सामान्यत: लोग ऐसे होते हैं। यह शिक्षा की श्रेष्ठता है कि ऐसे लोगों के मन बुद्धि के नियंत्रण में और और बुद्धि धर्माचरणी श्रेष्ठ लोगों के अनुसरण की रहे। आदेश से भी इनसे धर्माचरण करवाया जा सकता है। इस दृष्टि से आज्ञाकारिता का गुण बहुत महत्वपूर्ण है। कहा गया है{{Citation needed}}:&lt;br /&gt;
&amp;lt;blockquote&amp;gt;तर्कोंऽप्रतिष्ठित: श्रुतयोर्विभिन्न: नैको ऋषिर्यस्य मतं प्रमाणं ।&amp;lt;/blockquote&amp;gt;&amp;lt;blockquote&amp;gt;धर्मस्य तत्वं निहितं गुहाय महाजनों येन गत: स पंथ: ।।&amp;lt;/blockquote&amp;gt;&amp;lt;blockquote&amp;gt;अर्थ : जहाँ मेरा तर्क काम नहीं करता, श्रुतियों के अर्थघटन में भी मुझे भिन्न मार्गदर्शन मिलता है, ऋषियों द्वारा भी जो कहा गया है उसमें मुझे भिन्नता दिखाई देती है तब मैंने जो महाजन हैं, जो धर्म को जानकर और धर्म के अनुसार व्यवहार करने वाले हैं, ऐसा प्रसिद्ध है, उनका अनुसरण करना चाहिए।&amp;lt;/blockquote&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;ol start=&amp;quot;4&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;li&amp;gt; धर्म को न समझनेवाला ओर फिर भी यह माननेवाला की उसे धर्म की समझ है – इसे मूर्ख कहते हैं।&lt;br /&gt;
&amp;lt;li&amp;gt; दुष्ट, अन्यों के साथ अधर्माचरण करने को उचित मानने वाला। &lt;br /&gt;
&amp;lt;/ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
इस उपर्युक्त क्रम में मैं यथासंभव ऊपर के स्तर पर रहूँ ऐसा प्रयास प्रत्येकने करते रहना चाहिए।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==References==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;references /&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अन्य स्रोत:&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[Category:Bhartiya Jeevan Pratiman (भारतीय जीवन प्रतिमान)]]&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Dilipkelkar</name></author>
	</entry>
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		<id>https://dharmawiki.org/index.php?title=Responsibilities_at_Personal_Level_(%E0%A4%B5%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%95%E0%A5%8D%E0%A4%A4%E0%A4%BF%E0%A4%97%E0%A4%A4_%E0%A4%A7%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%AE_%E0%A4%85%E0%A4%A8%E0%A5%81%E0%A4%AA%E0%A4%BE%E0%A4%B2%E0%A4%A8)&amp;diff=119946</id>
		<title>Responsibilities at Personal Level (व्यक्तिगत धर्म अनुपालन)</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://dharmawiki.org/index.php?title=Responsibilities_at_Personal_Level_(%E0%A4%B5%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%95%E0%A5%8D%E0%A4%A4%E0%A4%BF%E0%A4%97%E0%A4%A4_%E0%A4%A7%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%AE_%E0%A4%85%E0%A4%A8%E0%A5%81%E0%A4%AA%E0%A4%BE%E0%A4%B2%E0%A4%A8)&amp;diff=119946"/>
		<updated>2019-07-21T05:16:01Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Dilipkelkar: /* सामाजिक घटकों के स्तर और धर्माचरण का अनुपालन */&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{One source|date=January 2019}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हमने जाना है कि समाज के सुख, शांति, स्वतंत्रता, सुसंस्कृतता के लिए समाज का धर्मनिष्ठ होना आवश्यक होता है। यहाँ मोटे तौर पर धर्म का मतलब कर्तव्य है। समाज धारणा के लिए कर्तव्यों पर आधारित जीवन अनिवार्य होता है। समाज धारणा के लिए धर्म-युक्त व्यवहार में आने वाली जटिलताओं को और फिर भी उसका अनुपालन कैसे किया जाता है, इसकी प्रक्रिया को समझने का प्रयास करेंगे। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== विविध स्तर ==&lt;br /&gt;
मानव समाज में जीवन्त इकाईयों के कई स्तर हैं। ये स्तर निम्न हैं:&lt;br /&gt;
# व्यक्ति&lt;br /&gt;
# कुटुम्ब&lt;br /&gt;
# ग्राम&lt;br /&gt;
# व्यवसाय समूह&lt;br /&gt;
# भाषिक समूह&lt;br /&gt;
# प्रादेशिक समूह&lt;br /&gt;
# राष्ट्र&lt;br /&gt;
# विश्व&lt;br /&gt;
ये सब मानव से या व्यक्तियों से बनीं जीवन्त इकाईयाँ हैं। इन सब के अपने ‘स्वधर्म’ हैं। इन सभी स्तरों के करणीय और अकरणीय बातों को ही उस ईकाई का धर्म कहा जाता है। निम्न स्तर की ईकाई उससे बड़े स्तर की ईकाई का हिस्सा होने के कारण हर ईकाई का धर्म आगे की या उससे बड़ी जीवंत ईकाई के धर्म का केवल अविरोधी ही नहीं, अपितु पूरक और पोषक होना आवश्यक होता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
प्राकृतिक दृष्टि से तो यह होता ही है। लेकिन व्यक्ति का स्वार्थ उसे भिन्न व्यवहार के लिए प्रेरित करता है। ऐसा भिन्न व्यवहार कोई व्यक्ति न करे इसके लिए ही शिक्षा होती है। और जो शिक्षा मिलने पर भी अपनी दुष्टता या मूर्खता के कारण उचित व्यवहार नहीं करता उसके लिए शासन या दंड व्यवस्था होती है। व्यक्ति के धर्म का कोई भी पहलू, कुटुम्ब से लेकर वैश्विक धर्म का विरोधी नहीं होना चाहिए। इतना ही नहीं, वह इन धर्मों के लिए पूरक और पोषक भी होना चाहिए।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
प्रत्येक मनुष्य जीवन में कई भूमिकाएं निभाता है। इन भूमिकाओं के मोटे मोटे दो हिस्से कर सकते हैं। अंजान वातावरण में व्यक्ति की भूमिका व्यक्ति के स्तर की होती है। जबकि परिचित वातावरण में वह परिचितों को अपेक्षित, भूमिका निभाए ऐसी उस से अपेक्षा होती है। उस समय वह किसी समूह का याने कुटुंब, ग्राम, व्यावसायिक समूह या जाति, प्रादेशिक समूह, भाषिक समूह, राष्ट्र आदि के सदस्य की भूमिका में होता है। मनुष्य को समूह के विभिन्न स्तरों पर काम तो व्यक्ति के रूप में ही करना है। फिर भी सुविधा के लिए व्यक्ति के स्तर से ऊपर की इकाई का विचार हम अगले अध्याय, “जिम्मेदारी समूह” में करेंगे। यहाँ केवल व्यक्ति के स्तर पर क्या करना है इसका विचार करेंगे।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इसी का विभाजन यम और नियमों के रूप में अष्टांग योग में किया गया है। सामान्यत: शौच, संतोष, तप, स्वाध्याय और ईश्वर प्रणिधान इन पाँच नियमों का संबंध व्यक्तिगत स्तर के लिए अधिक होता है। अहिंसा, सत्य, अस्तेय, अपरिग्रह और ब्रह्मचर्य इन पाँच प्रकार के ‘यम’ का संबंध मुख्यत: समाज से होता है। इसलिए यहाँ व्यक्तिगत स्तर पर शौच, संतोष, तप, स्वाध्याय और ईश्वर प्रणिधान आदि के विषय में विचार करना उचित होगा।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
व्यक्ति के स्तर पर जिन अन्य धर्मों का समावेश भी होता है ऐसे इन नियमों से भिन्न, लेकिन साथ ही विचार करने योग्य पहलू निम्न होंगे:&lt;br /&gt;
# जन्मजात / स्वभावज : याने जन्म से जो सत्त्व-रज-तम युक्त स्वभाव मिला है उसमें शुद्धि और विकास करना। इसे ही वर्णधर्म कहते हैं। इसे ही श्रीमद्भगवद्गीता में ‘स्वधर्म’ कहा है। इसी तरह से जन्म से ही जो त्रिदोषात्मक शरीर मिला है उसे धर्म साधना के लिए स्वस्थ रखना भी महत्वपूर्ण है। शरीर स्वस्थ रहे, निरोग रहे, बलवान रहे, लचीला रहे, कौशल्यवान रहे, तितिक्षावान रहे इस के लिए जो करणीय और अकरणीय बातें हैं उन्हें ही शरीरधर्म कहते हैं।&lt;br /&gt;
# स्त्री-पुरुष : स्त्री या पुरुष होने के कारण स्त्री होने का या पुरुष होने का जो प्रयोजन है उसे पूर्ण करना। स्त्री को एक अच्छी बेटी, अच्छी बहन, अच्छी पत्नि, अच्छी गृहिणी, अच्छी माता, अच्छी समाज सदस्य, अच्छी राष्ट्रभक्त बनना। इसी तरह से पुरुष ने अच्छा बेटा, अच्छा भाई, अच्छा पति, अच्छा गृहस्थ, अच्छा पिता, अच्छा समाज सदस्य, अच्छा राष्ट्रभक्त बनना। इस दृष्टि से अपने गुणों का विकास करना।&lt;br /&gt;
इन सब को मिलाकर करणीय और अकरणीय के तानेबाने का याने धर्मों का विचार कुछ निम्न जैसा होगा:&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== व्यक्तिगत धर्मों का तानाबाना ==&lt;br /&gt;
{| class=&amp;quot;wikitable&amp;quot;&lt;br /&gt;
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|(स्त्री और पुरुष)  : नियमों का अनुपालन&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
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|}&lt;br /&gt;
कुछ सभी को लागू हैं ऐसे बिंदु निम्न होंगे:&lt;br /&gt;
# कोई भी बालक जन्म से शूद्र नहीं होता। ब्रह्मचर्य काल में और ब्रह्मचर्य काल तक कोई बालक शूद्र नहीं होता। इस काल में कोई शूद्र ही नहीं होता इसलिए शूद्र का धर्म भी बताने की आवश्यकता नहीं है। ब्रह्मचर्य का काल तो उसे भी त्रिवर्ण में से अपने योग्य वर्ण के गुण लक्षण प्रकट करने का समय होता है। जब वह त्रिवर्ण में से अपना वर्ण सिद्ध नहीं कर पाता है तब वह शूद्रत्व को प्राप्त होता है।&lt;br /&gt;
# ब्रह्मचर्य यह अपने अपने जन्मजात वर्ण या स्वभाव के गुण लक्षणों की शुद्धि और वृद्धि का काल होता है। इसी तरह से अपने शरीर को श्रेष्ठ बनाने का काल होता है। ज्ञानार्जन, बलार्जन, कौशलार्जन आदि का काल होता है। योगशास्त्र के पाँच नियमों का पालन भी अनिवार्य रूप से होता रहना चाहिए।&lt;br /&gt;
# गृहस्थ काल यह बल को बनाए रखने के लिए और ज्ञान और कुशलता में वृद्धि करने का काल होता है। इस दृष्टि से चिंतन, निदिध्यासन, प्रयोग, अनुसंधान आदि का काल होता है। ब्रह्मचर्य काल में जो सीखा है उसे प्रयोग करने का, उसे परिष्कृत करने का, उसे अधिक उन्नत करने का काल होता है। इसी के लिए तप होता है, स्वाध्याय होता है। स्वाध्याय की दिशा ही ईश्वर प्रणिधान की होती है। अपने अध्ययन के या व्यवसाय के विषय का ही अध्ययन और विकास इस तरह से करना जिससे मोक्षगामी बन सकें, परमात्मपद को प्राप्त कर सकें।&lt;br /&gt;
# वानप्रस्थ या उत्तर गृहस्थाश्रम में जो उन्नत ज्ञान और कुशलता का विकास किया है उसे अगली पीढी को हस्तांतरित करने का काल होता है। इस दृष्टि से जो मिले उसमें संतोष रखना होता है। ज्ञान और कौशल के हस्तांतरण के लिए तप करने की आवश्यकता होती है। मृत्यू से पूर्व अपने से भी श्रेष्ठ ज्ञान और/या कुशलता के क्षेत्र में उत्तराधिकारी निर्माण करना होता है। अपने कुटुम्ब में यदि ऐसा उत्तराधिकारी नहीं मिलता तो उसे बाहर समाज में से ढूँढना होता है।&lt;br /&gt;
इन में यहाँ हम उपर्युक्त में से हर वर्ण के और हर आश्रम के व्यक्ति के लिए केवल ‘अपने लिए’ जो करणीय और अकरणीय है उसी का याने शौच, संतोष, तप, स्वाध्याय और ईश्वर प्रणिधान का विचार करेंगे। व्यक्ति से ऊपर की इकाइयों का विचार हम [[Responsibilities at Societal Level (सामाजिक धर्म अनुपालन)|इस]] अध्याय में करेंगे।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== सामाजिक घटकों के स्तर और धर्माचरण का अनुपालन ==&lt;br /&gt;
# धर्म की समझ रखने वाला और धर्माचरण करने वाला वर्ग : इसे शिक्षा के माध्यम से बनाया जाता है।&lt;br /&gt;
# धर्म को केवल समझने वाला लेकिन प्रत्यक्ष धर्माचरण में त्रुटियाँ होतीं हैं ऐसा वर्ग : ऐसे लोगों को ज्येष्ठ / श्रेष्ठ लोग या शासन के माध्यम से ठीक किया जा सकता है।&lt;br /&gt;
# धर्म को न समझने वाला लेकिन धर्म की अच्छी समझ किसे है यह समझने वाला और उसका अनुसरण करनेवाला : सामान्यत: लोग ऐसे होते हैं। यह शिक्षा की श्रेष्ठता है कि ऐसे लोगों के मन बुद्धि के नियंत्रण में और और बुद्धि धर्माचरणी श्रेष्ठ लोगों के अनुसरण की रहे। आदेश से भी इनसे धर्माचरण करवाया जा सकता है। इस दृष्टि से आज्ञाकारिता का गुण बहुत महत्वपूर्ण है। कहा गया है{{Citation needed}}:&lt;br /&gt;
&amp;lt;blockquote&amp;gt;तर्कोंऽप्रतिष्ठित: श्रुतयोर्विभिन्न: नैको ऋषिर्यस्य मतं प्रमाणं ।&amp;lt;/blockquote&amp;gt;&amp;lt;blockquote&amp;gt;धर्मस्य तत्वं निहितं गुहाय महाजनों येन गत: स पंथ: ।।&amp;lt;/blockquote&amp;gt;&amp;lt;blockquote&amp;gt;अर्थ : जहाँ मेरा तर्क काम नहीं करता, श्रुतियों के अर्थघटन में भी मुझे भिन्न मार्गदर्शन मिलता है, ऋषियों द्वारा भी जो कहा गया है उसमें मुझे भिन्नता दिखाई देती है तब मैंने जो महाजन हैं, जो धर्म को जानकर और धर्म के अनुसार व्यवहार करने वाले हैं, ऐसा प्रसिद्ध है, उनका अनुसरण करना चाहिए।&amp;lt;/blockquote&amp;gt;&amp;lt;blockquote&amp;gt;४. धर्म को न समझनेवाला ओर फिर भी यह माननेवाला की उसे धर्म की समझ है – इसे मूर्ख कहते हैं।&lt;br /&gt;
५. दुष्ट, अन्यों के साथ अधर्माचरण करने को उचित माननेवाला। &lt;br /&gt;
इस उपर्युक्त क्रम में मैं यथासंभव ऊपर के स्तरपर रहूँ ऐसा प्रयास प्रत्येकने करते रहना चाहिए।&amp;lt;/blockquote&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==References==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;references /&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अन्य स्रोत:&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[Category:Bhartiya Jeevan Pratiman (भारतीय जीवन प्रतिमान)]]&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Dilipkelkar</name></author>
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		<title>Responsibilities at Personal Level (व्यक्तिगत धर्म अनुपालन)</title>
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		<updated>2019-07-21T05:15:29Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Dilipkelkar: लेख सम्पादित किया&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{One source|date=January 2019}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हमने जाना है कि समाज के सुख, शांति, स्वतंत्रता, सुसंस्कृतता के लिए समाज का धर्मनिष्ठ होना आवश्यक होता है। यहाँ मोटे तौर पर धर्म का मतलब कर्तव्य है। समाज धारणा के लिए कर्तव्यों पर आधारित जीवन अनिवार्य होता है। समाज धारणा के लिए धर्म-युक्त व्यवहार में आने वाली जटिलताओं को और फिर भी उसका अनुपालन कैसे किया जाता है, इसकी प्रक्रिया को समझने का प्रयास करेंगे। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== विविध स्तर ==&lt;br /&gt;
मानव समाज में जीवन्त इकाईयों के कई स्तर हैं। ये स्तर निम्न हैं:&lt;br /&gt;
# व्यक्ति&lt;br /&gt;
# कुटुम्ब&lt;br /&gt;
# ग्राम&lt;br /&gt;
# व्यवसाय समूह&lt;br /&gt;
# भाषिक समूह&lt;br /&gt;
# प्रादेशिक समूह&lt;br /&gt;
# राष्ट्र&lt;br /&gt;
# विश्व&lt;br /&gt;
ये सब मानव से या व्यक्तियों से बनीं जीवन्त इकाईयाँ हैं। इन सब के अपने ‘स्वधर्म’ हैं। इन सभी स्तरों के करणीय और अकरणीय बातों को ही उस ईकाई का धर्म कहा जाता है। निम्न स्तर की ईकाई उससे बड़े स्तर की ईकाई का हिस्सा होने के कारण हर ईकाई का धर्म आगे की या उससे बड़ी जीवंत ईकाई के धर्म का केवल अविरोधी ही नहीं, अपितु पूरक और पोषक होना आवश्यक होता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
प्राकृतिक दृष्टि से तो यह होता ही है। लेकिन व्यक्ति का स्वार्थ उसे भिन्न व्यवहार के लिए प्रेरित करता है। ऐसा भिन्न व्यवहार कोई व्यक्ति न करे इसके लिए ही शिक्षा होती है। और जो शिक्षा मिलने पर भी अपनी दुष्टता या मूर्खता के कारण उचित व्यवहार नहीं करता उसके लिए शासन या दंड व्यवस्था होती है। व्यक्ति के धर्म का कोई भी पहलू, कुटुम्ब से लेकर वैश्विक धर्म का विरोधी नहीं होना चाहिए। इतना ही नहीं, वह इन धर्मों के लिए पूरक और पोषक भी होना चाहिए।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
प्रत्येक मनुष्य जीवन में कई भूमिकाएं निभाता है। इन भूमिकाओं के मोटे मोटे दो हिस्से कर सकते हैं। अंजान वातावरण में व्यक्ति की भूमिका व्यक्ति के स्तर की होती है। जबकि परिचित वातावरण में वह परिचितों को अपेक्षित, भूमिका निभाए ऐसी उस से अपेक्षा होती है। उस समय वह किसी समूह का याने कुटुंब, ग्राम, व्यावसायिक समूह या जाति, प्रादेशिक समूह, भाषिक समूह, राष्ट्र आदि के सदस्य की भूमिका में होता है। मनुष्य को समूह के विभिन्न स्तरों पर काम तो व्यक्ति के रूप में ही करना है। फिर भी सुविधा के लिए व्यक्ति के स्तर से ऊपर की इकाई का विचार हम अगले अध्याय, “जिम्मेदारी समूह” में करेंगे। यहाँ केवल व्यक्ति के स्तर पर क्या करना है इसका विचार करेंगे।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इसी का विभाजन यम और नियमों के रूप में अष्टांग योग में किया गया है। सामान्यत: शौच, संतोष, तप, स्वाध्याय और ईश्वर प्रणिधान इन पाँच नियमों का संबंध व्यक्तिगत स्तर के लिए अधिक होता है। अहिंसा, सत्य, अस्तेय, अपरिग्रह और ब्रह्मचर्य इन पाँच प्रकार के ‘यम’ का संबंध मुख्यत: समाज से होता है। इसलिए यहाँ व्यक्तिगत स्तर पर शौच, संतोष, तप, स्वाध्याय और ईश्वर प्रणिधान आदि के विषय में विचार करना उचित होगा।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
व्यक्ति के स्तर पर जिन अन्य धर्मों का समावेश भी होता है ऐसे इन नियमों से भिन्न, लेकिन साथ ही विचार करने योग्य पहलू निम्न होंगे:&lt;br /&gt;
# जन्मजात / स्वभावज : याने जन्म से जो सत्त्व-रज-तम युक्त स्वभाव मिला है उसमें शुद्धि और विकास करना। इसे ही वर्णधर्म कहते हैं। इसे ही श्रीमद्भगवद्गीता में ‘स्वधर्म’ कहा है। इसी तरह से जन्म से ही जो त्रिदोषात्मक शरीर मिला है उसे धर्म साधना के लिए स्वस्थ रखना भी महत्वपूर्ण है। शरीर स्वस्थ रहे, निरोग रहे, बलवान रहे, लचीला रहे, कौशल्यवान रहे, तितिक्षावान रहे इस के लिए जो करणीय और अकरणीय बातें हैं उन्हें ही शरीरधर्म कहते हैं।&lt;br /&gt;
# स्त्री-पुरुष : स्त्री या पुरुष होने के कारण स्त्री होने का या पुरुष होने का जो प्रयोजन है उसे पूर्ण करना। स्त्री को एक अच्छी बेटी, अच्छी बहन, अच्छी पत्नि, अच्छी गृहिणी, अच्छी माता, अच्छी समाज सदस्य, अच्छी राष्ट्रभक्त बनना। इसी तरह से पुरुष ने अच्छा बेटा, अच्छा भाई, अच्छा पति, अच्छा गृहस्थ, अच्छा पिता, अच्छा समाज सदस्य, अच्छा राष्ट्रभक्त बनना। इस दृष्टि से अपने गुणों का विकास करना।&lt;br /&gt;
इन सब को मिलाकर करणीय और अकरणीय के तानेबाने का याने धर्मों का विचार कुछ निम्न जैसा होगा:&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== व्यक्तिगत धर्मों का तानाबाना ==&lt;br /&gt;
{| class=&amp;quot;wikitable&amp;quot;&lt;br /&gt;
|+&lt;br /&gt;
!&lt;br /&gt;
!&lt;br /&gt;
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|-&lt;br /&gt;
| rowspan=&amp;quot;3&amp;quot; |ब्राह्मण वर्ण&lt;br /&gt;
|ब्रह्मचर्य&lt;br /&gt;
|अपने लिए&lt;br /&gt;
|(स्त्री और पुरुष)  : नियमों का अनुपालन&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|गृहस्थ&lt;br /&gt;
|अपने लिए&lt;br /&gt;
|(स्त्री और पुरुष)  : नियमों का अनुपालन&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|उत्तरगृहस्थ&lt;br /&gt;
|अपने लिए&lt;br /&gt;
|(स्त्री और पुरुष)  : नियमों का अनुपालन&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| rowspan=&amp;quot;3&amp;quot; |क्षत्रिय वर्ण&lt;br /&gt;
|ब्रह्मचर्य&lt;br /&gt;
|अपने लिए&lt;br /&gt;
|(स्त्री और पुरुष)  : नियमों का अनुपालन&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
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|अपने लिए&lt;br /&gt;
|(स्त्री और पुरुष)  : नियमों का अनुपालन&lt;br /&gt;
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|उत्तरगृहस्थ&lt;br /&gt;
|अपने लिए&lt;br /&gt;
|(स्त्री और पुरुष)  : नियमों का अनुपालन&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| rowspan=&amp;quot;3&amp;quot; |वैश्य वर्ण&lt;br /&gt;
|ब्रह्मचर्य&lt;br /&gt;
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|(स्त्री और पुरुष)  : नियमों का अनुपालन&lt;br /&gt;
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|(स्त्री और पुरुष)  : नियमों का अनुपालन&lt;br /&gt;
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|गृहस्थ&lt;br /&gt;
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|(स्त्री और पुरुष)  : नियमों का अनुपालन&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|उत्तरगृहस्थ&lt;br /&gt;
|अपने लिए&lt;br /&gt;
|(स्त्री और पुरुष)  : नियमों का अनुपालन&lt;br /&gt;
|}&lt;br /&gt;
कुछ सभी को लागू हैं ऐसे बिंदु निम्न होंगे:&lt;br /&gt;
# कोई भी बालक जन्म से शूद्र नहीं होता। ब्रह्मचर्य काल में और ब्रह्मचर्य काल तक कोई बालक शूद्र नहीं होता। इस काल में कोई शूद्र ही नहीं होता इसलिए शूद्र का धर्म भी बताने की आवश्यकता नहीं है। ब्रह्मचर्य का काल तो उसे भी त्रिवर्ण में से अपने योग्य वर्ण के गुण लक्षण प्रकट करने का समय होता है। जब वह त्रिवर्ण में से अपना वर्ण सिद्ध नहीं कर पाता है तब वह शूद्रत्व को प्राप्त होता है।&lt;br /&gt;
# ब्रह्मचर्य यह अपने अपने जन्मजात वर्ण या स्वभाव के गुण लक्षणों की शुद्धि और वृद्धि का काल होता है। इसी तरह से अपने शरीर को श्रेष्ठ बनाने का काल होता है। ज्ञानार्जन, बलार्जन, कौशलार्जन आदि का काल होता है। योगशास्त्र के पाँच नियमों का पालन भी अनिवार्य रूप से होता रहना चाहिए।&lt;br /&gt;
# गृहस्थ काल यह बल को बनाए रखने के लिए और ज्ञान और कुशलता में वृद्धि करने का काल होता है। इस दृष्टि से चिंतन, निदिध्यासन, प्रयोग, अनुसंधान आदि का काल होता है। ब्रह्मचर्य काल में जो सीखा है उसे प्रयोग करने का, उसे परिष्कृत करने का, उसे अधिक उन्नत करने का काल होता है। इसी के लिए तप होता है, स्वाध्याय होता है। स्वाध्याय की दिशा ही ईश्वर प्रणिधान की होती है। अपने अध्ययन के या व्यवसाय के विषय का ही अध्ययन और विकास इस तरह से करना जिससे मोक्षगामी बन सकें, परमात्मपद को प्राप्त कर सकें।&lt;br /&gt;
# वानप्रस्थ या उत्तर गृहस्थाश्रम में जो उन्नत ज्ञान और कुशलता का विकास किया है उसे अगली पीढी को हस्तांतरित करने का काल होता है। इस दृष्टि से जो मिले उसमें संतोष रखना होता है। ज्ञान और कौशल के हस्तांतरण के लिए तप करने की आवश्यकता होती है। मृत्यू से पूर्व अपने से भी श्रेष्ठ ज्ञान और/या कुशलता के क्षेत्र में उत्तराधिकारी निर्माण करना होता है। अपने कुटुम्ब में यदि ऐसा उत्तराधिकारी नहीं मिलता तो उसे बाहर समाज में से ढूँढना होता है।&lt;br /&gt;
इन में यहाँ हम उपर्युक्त में से हर वर्ण के और हर आश्रम के व्यक्ति के लिए केवल ‘अपने लिए’ जो करणीय और अकरणीय है उसी का याने शौच, संतोष, तप, स्वाध्याय और ईश्वर प्रणिधान का विचार करेंगे। व्यक्ति से ऊपर की इकाइयों का विचार हम [[Responsibilities at Societal Level (सामाजिक धर्म अनुपालन)|इस]] अध्याय में करेंगे।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== सामाजिक घटकों के स्तर और धर्माचरण का अनुपालन ==&lt;br /&gt;
# धर्म की समझ रखने वाला और धर्माचरण करने वाला वर्ग : इसे शिक्षा के माध्यम से बनाया जाता है।&lt;br /&gt;
# धर्म को केवल समझने वाला लेकिन प्रत्यक्ष धर्माचरण में त्रुटियाँ होतीं हैं ऐसा वर्ग : ऐसे लोगों को ज्येष्ठ / श्रेष्ठ लोग या शासन के माध्यम से ठीक किया जा सकता है।&lt;br /&gt;
# धर्म को न समझने वाला लेकिन धर्म की अच्छी समझ किसे है यह समझने वाला और उसका अनुसरण करनेवाला : सामान्यत: लोग ऐसे होते हैं। यह शिक्षा की श्रेष्ठता है कि ऐसे लोगों के मन बुद्धि के नियंत्रण में और और बुद्धि धर्माचरणी श्रेष्ठ लोगों के अनुसरण की रहे। आदेश से भी इनसे धर्माचरण करवाया जा सकता है। इस दृष्टि से आज्ञाकारिता का गुण बहुत महत्वपूर्ण है। कहा गया है:&lt;br /&gt;
&amp;lt;blockquote&amp;gt;तर्कोंऽप्रतिष्ठित: श्रुतयोर्विभिन्न: नैको ऋषिर्यस्य मतं प्रमाणं ।&amp;lt;/blockquote&amp;gt;&amp;lt;blockquote&amp;gt;धर्मस्य तत्वं निहितं गुहाय महाजनों येन गत: स पंथ: ।।&amp;lt;/blockquote&amp;gt;&amp;lt;blockquote&amp;gt;अर्थ : जहाँ मेरा तर्क काम नहीं करता, श्रुतियों के अर्थघटन में भी मुझे भिन्न मार्गदर्शन मिलता है, ऋषियों द्वारा भी जो कहा गया है उसमें मुझे भिन्नता दिखाई देती है तब मैंने जो महाजन हैं, जो धर्म को जानकर और धर्म के अनुसार व्यवहार करने वाले हैं, ऐसा प्रसिद्ध है, उनका अनुसरण करना चाहिए।&amp;lt;/blockquote&amp;gt;&amp;lt;blockquote&amp;gt;४. धर्म को न समझनेवाला ओर फिर भी यह माननेवाला की उसे धर्म की समझ है – इसे मूर्ख कहते हैं।&lt;br /&gt;
५. दुष्ट, अन्यों के साथ अधर्माचरण करने को उचित माननेवाला। &lt;br /&gt;
इस उपर्युक्त क्रम में मैं यथासंभव ऊपर के स्तरपर रहूँ ऐसा प्रयास प्रत्येकने करते रहना चाहिए।&amp;lt;/blockquote&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==References==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;references /&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अन्य स्रोत:&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[Category:Bhartiya Jeevan Pratiman (भारतीय जीवन प्रतिमान)]]&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Dilipkelkar</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://dharmawiki.org/index.php?title=Responsibilities_at_Personal_Level_(%E0%A4%B5%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%95%E0%A5%8D%E0%A4%A4%E0%A4%BF%E0%A4%97%E0%A4%A4_%E0%A4%A7%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%AE_%E0%A4%85%E0%A4%A8%E0%A5%81%E0%A4%AA%E0%A4%BE%E0%A4%B2%E0%A4%A8)&amp;diff=119944</id>
		<title>Responsibilities at Personal Level (व्यक्तिगत धर्म अनुपालन)</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://dharmawiki.org/index.php?title=Responsibilities_at_Personal_Level_(%E0%A4%B5%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%95%E0%A5%8D%E0%A4%A4%E0%A4%BF%E0%A4%97%E0%A4%A4_%E0%A4%A7%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%AE_%E0%A4%85%E0%A4%A8%E0%A5%81%E0%A4%AA%E0%A4%BE%E0%A4%B2%E0%A4%A8)&amp;diff=119944"/>
		<updated>2019-07-21T04:55:02Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Dilipkelkar: /* विविध स्तर */&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{One source|date=January 2019}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हमने जाना है कि समाज के सुख, शांति, स्वतंत्रता, सुसंस्कृतता के लिए समाज का धर्मनिष्ठ होना आवश्यक होता है। यहाँ मोटे तौरपर धर्म से मतलब कर्तव्य से है। समाज धारणा के लिए कर्तव्योंपर आधारित जीवन अनिवार्य होता है। समाज धारणा के लिए धर्म-युक्त व्यवहार में आनेवाली जटिलताओं को और फिर भी उसका अनुपालन कैसे किया जाता है इसकी प्रक्रिया को समझने का प्रयास करेंगे। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== विविध स्तर ==&lt;br /&gt;
मानव समाज में जीवन्त इकाईयों के कई स्तर हैं। ये स्तर निम्न हैं।&lt;br /&gt;
१ व्यक्ति&lt;br /&gt;
२ कुटुम्ब&lt;br /&gt;
३ ग्राम&lt;br /&gt;
४ व्यवसाय समूह&lt;br /&gt;
५ भाषिक समूह&lt;br /&gt;
६ प्रादेशिक समूह&lt;br /&gt;
७ राष्ट्र&lt;br /&gt;
८ विश्व &lt;br /&gt;
ये सब मानव से या व्यक्तियों से बनीं जीवन्त इकाईयाँ हैं। इन सब के अपने ‘स्वधर्म’ हैं। इन सभी स्तरों के करणीय और अकरणीय बातों को ही उस ईकाई का धर्म कहा जाता है। निम्न स्तरकी ईकाई उससे बड़े स्तरकी ईकाई का हिस्सा होने के कारण हर ईकाईका धर्म आगे की या उससे बड़ी जीवंत ईकाई के धर्म का केवल अविरोधी ही नहीं तो पूरक और पोषक होना आवश्यक होता है। प्राकृतिक दृष्टी से तो यह होता ही है। लेकिन व्यक्ति का स्वार्थ उसे भिन्न व्यवहार के लिए प्रेरित करता है। ऐसा भिन्न व्यवहार कोई व्यक्ति न करे इसके लिए ही शिक्षा होती है। और जो शिक्षा मिलनेपर भी अपनी दुष्टता या मूर्खता के कारण उचित व्यवहार नहीं करता उसके लिए शासन या दंड व्यवस्था होती है। व्यक्ति के धर्म का कोई भी पहलू कुटुम्ब से लेकर वैश्विक धर्म का विरोधी नहीं होना चाहिए। इतना ही नहीं वह इन धर्मों के लिए पूरक और पोषक भी होना चाहिए।&lt;br /&gt;
प्रत्येक मनुष्य जीवन में कई भूमिकाएं निभाता है। इन भूमिकाओं के मोटे मोटे दो हिस्से कर सकते हैं। अंजान वातावरण में व्यक्ति की भूमिका व्यक्ति के स्तर की होती है। जब की परिचित वातावरण में वह परिचितों को अपेक्षित भूमिका निभाए ऐसी उस से अपेक्षा होती है। उस समय वह किसी समूह का याने कुटुंब, ग्राम, व्यावसायिक समूह या जाति, प्रादेशिक समूह, भाषिक समूह, राष्ट्र आदि के सदस्य की भूमिका में होता है। मनुष्य को समूह के विभिन्न स्तरोंपर काम तो व्यक्ति के रूप में ही करना है। फिर भी सुविधा के लिए व्यक्ति के स्तर से ऊपर की इकाई का विचार हम अगले अध्याय, “जिम्मेदारी समूह” में करेंगे। यहाँ केवल व्यक्ति के स्तरपर क्या करना है इसका विचार करेंगे। &lt;br /&gt;
इसी का विभाजन यम और नियमों के रूप में अष्टांग योग में किया गया है। सामान्यत: शौच, संतोष, तप, स्वाध्याय और ईश्वर प्रणिधान इन पाँच नियमों का संबंध यक्तिगत स्तर के लिए अधिक होता है। अहिंसा, सत्य, अस्तेय, अपरिग्रह और ब्रह्मचर्य इन पाँच प्रकार के ‘यम’ का संबंध मुख्यत: समाज से होता है। इसलिए यहाँ व्यक्तिगत स्तरपर शौच, संतोष, तप, स्वाध्याय और ईश्वर प्रणिधान आदि के विषय में विचार करना उचित होगा। &lt;br /&gt;
व्यक्ति के स्तरपर जिन अन्य धर्मों का समावेश भी होता है ऐसे इन नियमों से भिन्न, लेकिन साथ ही विचार करने योग्य पहलू निम्न होंगे। &lt;br /&gt;
अ) जन्मजात / स्वभावज : याने जन्म से जो सत्त्व-रज-तम युक्त स्वभाव मिला है उसमें शुद्धि और विकास करना। इसे ही वर्णधर्म कहते हैं। इसे ही श्रीमद्भगवद्गीता में ‘स्वधर्म’ कहा है।  इसी तरह से जन्म से ही जो त्रिदोषात्मक शरीर मिला है उसे धर्मं साधना के लिए स्वस्थ रखना भी महत्वपूर्ण है। शरीर स्वस्थ रहे, निरोग रहे, बलवान रहे, लचीला रहे, कौशल्यवान रहे, तितिक्षावान रहे इस के लिए जो करणीय और अकरणीय बातें हैं उन्हें ही शरीरधर्म कहते हैं।&lt;br /&gt;
आ) स्त्री-पुरुष : स्त्री या पुरुष होने के कारण स्त्री होने का या पुरुष होने का जो प्रयोजन है उसे पूर्ण करना। स्त्री ने एक अच्छी बेटी, अच्छी बहन, अच्छी पत्नि, अच्छी गृहिणी, अच्छी माता, अच्छी समाज सदस्य, अच्छी राष्ट्रभक्त बनना। इसी तरह से पुरुष ने अच्छा बेटा, अच्छा भाई, अच्छा पति, अच्छा गृहस्थ, अच्छा पिता, अच्छा समाज सदस्य, अच्छा राष्ट्रभक्त बनना। iइस दृष्टी से अपने गुणों का विकास करना।  i&lt;br /&gt;
इन सब को मिलाकर करणीय और अकरणीय के तानेबाने का याने धर्मों का विचार कुछ निम्न जैसा होगा।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== व्यक्तिगत धर्मों का तानाबाना ==&lt;br /&gt;
1.  ब्राह्मण वर्ण 		- ब्रह्मचर्य 	- अपने लिए      (स्त्री और पुरुष)  : नियमों का अनुपालन &lt;br /&gt;
			- गृहस्थ 	- अपने लिए      (स्त्री और पुरुष)  : नियमों का अनुपालन&lt;br /&gt;
			- उत्तरगृहस्थ	- अपने लिए      (स्त्री और पुरुष)  : नियमों का अनुपालन&lt;br /&gt;
२. क्षत्रिय वर्ण 		- ब्रह्मचर्य 	- अपने लिए      (स्त्री और पुरुष)  : नियमों का अनुपालन&lt;br /&gt;
			- गृहस्थ 	- अपने लिए      (स्त्री और पुरुष)  : नियमों का अनुपालन&lt;br /&gt;
			- उत्तरगृहस्थ	- अपने लिए      (स्त्री और पुरुष)  : नियमों का अनुपालन&lt;br /&gt;
३. वैश्य वर्ण 		- ब्रह्मचर्य 	- अपने लिए      (स्त्री और पुरुष)  : नियमों का अनुपालन&lt;br /&gt;
			- गृहस्थ 	- अपने लिए      (स्त्री और पुरुष)  : नियमों का अनुपालन&lt;br /&gt;
			- उत्तरगृहस्थ	- अपने लिए      (स्त्री और पुरुष)  : नियमों का अनुपालन&lt;br /&gt;
४. शूद्र वर्ण 		- गृहस्थ 	- अपने लिए      (स्त्री और पुरुष)  : नियमों का अनुपालन&lt;br /&gt;
			- उत्तरगृहस्थ	- अपने लिए      (स्त्री और पुरुष)  : नियमों का अनुपालन&lt;br /&gt;
कुछ सभी को लागू हैं ऐसे बिंदु निम्न होंगे। &lt;br /&gt;
१. कोई भी बालक जन्म से शूद्र नहीं होता। ब्रह्मचर्य काल में और ब्रह्मचर्य कालतक कोई बालक शूद्र नहीं होता। इस काल में कोई शूद्र ही नहीं होता इसलिए शूद्र का धर्म भी बताने की आवश्यकता नहीं है। ब्रह्मचर्य का काल तो उसे भी त्रिवर्ण में से अपने योग्य वर्ण के गुण लक्षण प्रकट करने का समय होता है। जब वह त्रिवर्ण में से अपना वर्ण सिद्ध नहीं कर पाता है तब वह शूद्रत्व को प्राप्त होता है।  &lt;br /&gt;
२. ब्रह्मचर्य यह अपने अपने जन्मजात वर्ण या स्वभाव के गुण लक्षणों की शुद्धि और वृद्धि का काल होता है। इसी तरह से अपने शरीर को श्रेष्ठ बनाने का काल होता है। ज्ञानार्जन, बलार्जन, कौशलार्जन आदि का काल होता है। योगशास्त्र के पाँच नियमों का पालन भी अनिवार्य रूप से होता रहना चाहिए। &lt;br /&gt;
३. गृहस्थ काल यह बल को बनाए रखने के लिए और ज्ञान और कुशलता में वृद्धि करने का काल होता है। इस दृष्टी से चिंतन, निदिध्यासन, प्रयोग, अनुसंधान आदि का काल होता है। ब्रह्मचर्य काल में जो सीखा है उसे प्रयोग करने का, उसे परिष्कृत करने का, उसे अधिक उन्नत करने का काल होता है। इसी के लिए तप होता है, स्वाध्याय होता है। स्वाध्याय की दिशा ही ईश्वर प्रणिधान की होती है। अपने अध्ययन के या व्यवसाय के विषय का ही अध्ययन और विकास इस तरह से करना जिससे मोक्षगामी बन सकें, परमात्मपद को प्राप्त कर सकें।  &lt;br /&gt;
४. वानप्रस्थ या उत्तर गृहस्थाश्रम में जो उन्नत ज्ञान और कुशलता का विकास किया है उसे अगली पीढी को हस्तांतरित करने का काल होता है। इस दृष्टी से जो मिले उसमें संतोष रखना होता है। ज्ञान और कौशल के हस्तांतरण के लिए तप करने की आवश्यकता होती है। मृत्यू से पूर्व अपने से भी श्रेष्ठ ज्ञान और/या कुशलता के क्षेत्र में उत्तराधिकारी निर्माण करना होता है। अपने कुटुम्ब में यदि ऐसा उत्तराधिकारी नहीं मिलता तो उसे बाहर समाज में से ढूँढना होता है। &lt;br /&gt;
इन में यहाँ हम उपर्युक्त में से हर वर्ण के और हर आश्रम के व्यक्ति के लिए केवल ‘अपने लिए’ जो करणीय और अकरणीय है उसी का याने शौच, संतोष, तप, स्वाध्याय और ईश्वर प्रणिधान का विचार करेंगे। व्यक्ति से ऊपर की इकाइयों का विचार हम अगले अध्याय में करेंगे।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== सामाजिक घटकों के स्तर और धर्माचरण का अनुपालन ==&lt;br /&gt;
१. धर्म की समझ रखनेवाला और धर्माचरण करनेवाला वर्ग : इसे शिक्षा के माध्यम से बनाया जाता है। &lt;br /&gt;
२. धर्म को केवल समझनेवाला लेकिन प्रत्यक्ष धर्माचरण में त्रुटियाँ होतीं हैं ऐसा वर्ग : ऐसे लोगों को ज्येष्ठ/श्रेष्ठ लोग या शासन के माध्यम से ठीक किया जा सकता है। &lt;br /&gt;
३. धर्म को न समझनेवाला लेकिन धर्म की अच्छी समझ किसे है यह समझनेवाला और उसका अनुसरण करनेवाला : सामान्यत: लोग ऐसे होते हैं। यह शिक्षा की श्रेष्ठता है कि ऐसे लोगों के मन बुद्धि के नियंत्रण में और और बुद्धि धर्माचरणी श्रेष्ठ लोगों के अनुसरण की रहे। आदेश से भी इनसे धर्माचरण करवाया जा सकता है। इस दृष्टी से आज्ञाकारिता का गुण बहुत महत्वपूर्ण है। कहा गया है –&lt;br /&gt;
तर्कोंऽप्रतिष्ठित: श्रुतयोर्विभिन्न: नैको ऋषिर्यस्य मतं प्रमाणं ।&lt;br /&gt;
धर्मस्य तत्वं निहितं गुहाय महाजनों येन गत: स पंथ: ।।&lt;br /&gt;
अर्थ : जहाँ मेरा तर्क काम नहीं करता, श्रुतियों के अर्थघटन में भी मुझे भिन्न मार्गदर्शन मिलता है,  ऋषियोंद्वारा भी जो कहा गया है उसमें मुझे भिन्नता दिखाई देती है तब मैंने जो महाजन हैं, जो धर्म को जानकर और धर्म के अनुसार व्यवहार करनेवाले हैं, ऐसा प्रसिद्ध है, उनका अनुसरण करना चाहिए। &lt;br /&gt;
४. धर्म को न समझनेवाला ओर फिर भी यह माननेवाला की उसे धर्म की समझ है – इसे मूर्ख कहते हैं।&lt;br /&gt;
५. दुष्ट, अन्यों के साथ अधर्माचरण करने को उचित माननेवाला। &lt;br /&gt;
इस उपर्युक्त क्रम में मैं यथासंभव ऊपर के स्तरपर रहूँ ऐसा प्रयास प्रत्येकने करते रहना चाहिए।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==References==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;references /&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अन्य स्रोत:&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[Category:Bhartiya Jeevan Pratiman (भारतीय जीवन प्रतिमान)]]&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Dilipkelkar</name></author>
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		<title>Responsibilities at Personal Level (व्यक्तिगत धर्म अनुपालन)</title>
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		<updated>2019-07-21T04:54:37Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Dilipkelkar: लेख सम्पादित किया&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{One source|date=January 2019}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हमने जाना है कि समाज के सुख, शांति, स्वतंत्रता, सुसंस्कृतता के लिए समाज का धर्मनिष्ठ होना आवश्यक होता है। यहाँ मोटे तौरपर धर्म से मतलब कर्तव्य से है। समाज धारणा के लिए कर्तव्योंपर आधारित जीवन अनिवार्य होता है। समाज धारणा के लिए धर्म-युक्त व्यवहार में आनेवाली जटिलताओं को और फिर भी उसका अनुपालन कैसे किया जाता है इसकी प्रक्रिया को समझने का प्रयास करेंगे। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== विविध स्तर ==&lt;br /&gt;
 : मानव समाज में जीवन्त इकाईयों के कई स्तर हैं। ये स्तर निम्न हैं।&lt;br /&gt;
१ व्यक्ति&lt;br /&gt;
२ कुटुम्ब&lt;br /&gt;
३ ग्राम&lt;br /&gt;
४ व्यवसाय समूह&lt;br /&gt;
५ भाषिक समूह&lt;br /&gt;
६ प्रादेशिक समूह&lt;br /&gt;
७ राष्ट्र&lt;br /&gt;
८ विश्व &lt;br /&gt;
ये सब मानव से या व्यक्तियों से बनीं जीवन्त इकाईयाँ हैं। इन सब के अपने ‘स्वधर्म’ हैं। इन सभी स्तरों के करणीय और अकरणीय बातों को ही उस ईकाई का धर्म कहा जाता है। निम्न स्तरकी ईकाई उससे बड़े स्तरकी ईकाई का हिस्सा होने के कारण हर ईकाईका धर्म आगे की या उससे बड़ी जीवंत ईकाई के धर्म का केवल अविरोधी ही नहीं तो पूरक और पोषक होना आवश्यक होता है। प्राकृतिक दृष्टी से तो यह होता ही है। लेकिन व्यक्ति का स्वार्थ उसे भिन्न व्यवहार के लिए प्रेरित करता है। ऐसा भिन्न व्यवहार कोई व्यक्ति न करे इसके लिए ही शिक्षा होती है। और जो शिक्षा मिलनेपर भी अपनी दुष्टता या मूर्खता के कारण उचित व्यवहार नहीं करता उसके लिए शासन या दंड व्यवस्था होती है। व्यक्ति के धर्म का कोई भी पहलू कुटुम्ब से लेकर वैश्विक धर्म का विरोधी नहीं होना चाहिए। इतना ही नहीं वह इन धर्मों के लिए पूरक और पोषक भी होना चाहिए।&lt;br /&gt;
प्रत्येक मनुष्य जीवन में कई भूमिकाएं निभाता है। इन भूमिकाओं के मोटे मोटे दो हिस्से कर सकते हैं। अंजान वातावरण में व्यक्ति की भूमिका व्यक्ति के स्तर की होती है। जब की परिचित वातावरण में वह परिचितों को अपेक्षित भूमिका निभाए ऐसी उस से अपेक्षा होती है। उस समय वह किसी समूह का याने कुटुंब, ग्राम, व्यावसायिक समूह या जाति, प्रादेशिक समूह, भाषिक समूह, राष्ट्र आदि के सदस्य की भूमिका में होता है। मनुष्य को समूह के विभिन्न स्तरोंपर काम तो व्यक्ति के रूप में ही करना है। फिर भी सुविधा के लिए व्यक्ति के स्तर से ऊपर की इकाई का विचार हम अगले अध्याय, “जिम्मेदारी समूह” में करेंगे। यहाँ केवल व्यक्ति के स्तरपर क्या करना है इसका विचार करेंगे। &lt;br /&gt;
इसी का विभाजन यम और नियमों के रूप में अष्टांग योग में किया गया है। सामान्यत: शौच, संतोष, तप, स्वाध्याय और ईश्वर प्रणिधान इन पाँच नियमों का संबंध यक्तिगत स्तर के लिए अधिक होता है। अहिंसा, सत्य, अस्तेय, अपरिग्रह और ब्रह्मचर्य इन पाँच प्रकार के ‘यम’ का संबंध मुख्यत: समाज से होता है। इसलिए यहाँ व्यक्तिगत स्तरपर शौच, संतोष, तप, स्वाध्याय और ईश्वर प्रणिधान आदि के विषय में विचार करना उचित होगा। &lt;br /&gt;
व्यक्ति के स्तरपर जिन अन्य धर्मों का समावेश भी होता है ऐसे इन नियमों से भिन्न, लेकिन साथ ही विचार करने योग्य पहलू निम्न होंगे। &lt;br /&gt;
अ) जन्मजात / स्वभावज : याने जन्म से जो सत्त्व-रज-तम युक्त स्वभाव मिला है उसमें शुद्धि और विकास करना। इसे ही वर्णधर्म कहते हैं। इसे ही श्रीमद्भगवद्गीता में ‘स्वधर्म’ कहा है।  इसी तरह से जन्म से ही जो त्रिदोषात्मक शरीर मिला है उसे धर्मं साधना के लिए स्वस्थ रखना भी महत्वपूर्ण है। शरीर स्वस्थ रहे, निरोग रहे, बलवान रहे, लचीला रहे, कौशल्यवान रहे, तितिक्षावान रहे इस के लिए जो करणीय और अकरणीय बातें हैं उन्हें ही शरीरधर्म कहते हैं।&lt;br /&gt;
आ) स्त्री-पुरुष : स्त्री या पुरुष होने के कारण स्त्री होने का या पुरुष होने का जो प्रयोजन है उसे पूर्ण करना। स्त्री ने एक अच्छी बेटी, अच्छी बहन, अच्छी पत्नि, अच्छी गृहिणी, अच्छी माता, अच्छी समाज सदस्य, अच्छी राष्ट्रभक्त बनना। इसी तरह से पुरुष ने अच्छा बेटा, अच्छा भाई, अच्छा पति, अच्छा गृहस्थ, अच्छा पिता, अच्छा समाज सदस्य, अच्छा राष्ट्रभक्त बनना। iइस दृष्टी से अपने गुणों का विकास करना।  i&lt;br /&gt;
इन सब को मिलाकर करणीय और अकरणीय के तानेबाने का याने धर्मों का विचार कुछ निम्न जैसा होगा।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== व्यक्तिगत धर्मों का तानाबाना ==&lt;br /&gt;
1.  ब्राह्मण वर्ण 		- ब्रह्मचर्य 	- अपने लिए      (स्त्री और पुरुष)  : नियमों का अनुपालन &lt;br /&gt;
			- गृहस्थ 	- अपने लिए      (स्त्री और पुरुष)  : नियमों का अनुपालन&lt;br /&gt;
			- उत्तरगृहस्थ	- अपने लिए      (स्त्री और पुरुष)  : नियमों का अनुपालन&lt;br /&gt;
२. क्षत्रिय वर्ण 		- ब्रह्मचर्य 	- अपने लिए      (स्त्री और पुरुष)  : नियमों का अनुपालन&lt;br /&gt;
			- गृहस्थ 	- अपने लिए      (स्त्री और पुरुष)  : नियमों का अनुपालन&lt;br /&gt;
			- उत्तरगृहस्थ	- अपने लिए      (स्त्री और पुरुष)  : नियमों का अनुपालन&lt;br /&gt;
३. वैश्य वर्ण 		- ब्रह्मचर्य 	- अपने लिए      (स्त्री और पुरुष)  : नियमों का अनुपालन&lt;br /&gt;
			- गृहस्थ 	- अपने लिए      (स्त्री और पुरुष)  : नियमों का अनुपालन&lt;br /&gt;
			- उत्तरगृहस्थ	- अपने लिए      (स्त्री और पुरुष)  : नियमों का अनुपालन&lt;br /&gt;
४. शूद्र वर्ण 		- गृहस्थ 	- अपने लिए      (स्त्री और पुरुष)  : नियमों का अनुपालन&lt;br /&gt;
			- उत्तरगृहस्थ	- अपने लिए      (स्त्री और पुरुष)  : नियमों का अनुपालन&lt;br /&gt;
कुछ सभी को लागू हैं ऐसे बिंदु निम्न होंगे। &lt;br /&gt;
१. कोई भी बालक जन्म से शूद्र नहीं होता। ब्रह्मचर्य काल में और ब्रह्मचर्य कालतक कोई बालक शूद्र नहीं होता। इस काल में कोई शूद्र ही नहीं होता इसलिए शूद्र का धर्म भी बताने की आवश्यकता नहीं है। ब्रह्मचर्य का काल तो उसे भी त्रिवर्ण में से अपने योग्य वर्ण के गुण लक्षण प्रकट करने का समय होता है। जब वह त्रिवर्ण में से अपना वर्ण सिद्ध नहीं कर पाता है तब वह शूद्रत्व को प्राप्त होता है।  &lt;br /&gt;
२. ब्रह्मचर्य यह अपने अपने जन्मजात वर्ण या स्वभाव के गुण लक्षणों की शुद्धि और वृद्धि का काल होता है। इसी तरह से अपने शरीर को श्रेष्ठ बनाने का काल होता है। ज्ञानार्जन, बलार्जन, कौशलार्जन आदि का काल होता है। योगशास्त्र के पाँच नियमों का पालन भी अनिवार्य रूप से होता रहना चाहिए। &lt;br /&gt;
३. गृहस्थ काल यह बल को बनाए रखने के लिए और ज्ञान और कुशलता में वृद्धि करने का काल होता है। इस दृष्टी से चिंतन, निदिध्यासन, प्रयोग, अनुसंधान आदि का काल होता है। ब्रह्मचर्य काल में जो सीखा है उसे प्रयोग करने का, उसे परिष्कृत करने का, उसे अधिक उन्नत करने का काल होता है। इसी के लिए तप होता है, स्वाध्याय होता है। स्वाध्याय की दिशा ही ईश्वर प्रणिधान की होती है। अपने अध्ययन के या व्यवसाय के विषय का ही अध्ययन और विकास इस तरह से करना जिससे मोक्षगामी बन सकें, परमात्मपद को प्राप्त कर सकें।  &lt;br /&gt;
४. वानप्रस्थ या उत्तर गृहस्थाश्रम में जो उन्नत ज्ञान और कुशलता का विकास किया है उसे अगली पीढी को हस्तांतरित करने का काल होता है। इस दृष्टी से जो मिले उसमें संतोष रखना होता है। ज्ञान और कौशल के हस्तांतरण के लिए तप करने की आवश्यकता होती है। मृत्यू से पूर्व अपने से भी श्रेष्ठ ज्ञान और/या कुशलता के क्षेत्र में उत्तराधिकारी निर्माण करना होता है। अपने कुटुम्ब में यदि ऐसा उत्तराधिकारी नहीं मिलता तो उसे बाहर समाज में से ढूँढना होता है। &lt;br /&gt;
इन में यहाँ हम उपर्युक्त में से हर वर्ण के और हर आश्रम के व्यक्ति के लिए केवल ‘अपने लिए’ जो करणीय और अकरणीय है उसी का याने शौच, संतोष, तप, स्वाध्याय और ईश्वर प्रणिधान का विचार करेंगे। व्यक्ति से ऊपर की इकाइयों का विचार हम अगले अध्याय में करेंगे।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== सामाजिक घटकों के स्तर और धर्माचरण का अनुपालन ==&lt;br /&gt;
१. धर्म की समझ रखनेवाला और धर्माचरण करनेवाला वर्ग : इसे शिक्षा के माध्यम से बनाया जाता है। &lt;br /&gt;
२. धर्म को केवल समझनेवाला लेकिन प्रत्यक्ष धर्माचरण में त्रुटियाँ होतीं हैं ऐसा वर्ग : ऐसे लोगों को ज्येष्ठ/श्रेष्ठ लोग या शासन के माध्यम से ठीक किया जा सकता है। &lt;br /&gt;
३. धर्म को न समझनेवाला लेकिन धर्म की अच्छी समझ किसे है यह समझनेवाला और उसका अनुसरण करनेवाला : सामान्यत: लोग ऐसे होते हैं। यह शिक्षा की श्रेष्ठता है कि ऐसे लोगों के मन बुद्धि के नियंत्रण में और और बुद्धि धर्माचरणी श्रेष्ठ लोगों के अनुसरण की रहे। आदेश से भी इनसे धर्माचरण करवाया जा सकता है। इस दृष्टी से आज्ञाकारिता का गुण बहुत महत्वपूर्ण है। कहा गया है –&lt;br /&gt;
तर्कोंऽप्रतिष्ठित: श्रुतयोर्विभिन्न: नैको ऋषिर्यस्य मतं प्रमाणं ।&lt;br /&gt;
धर्मस्य तत्वं निहितं गुहाय महाजनों येन गत: स पंथ: ।।&lt;br /&gt;
अर्थ : जहाँ मेरा तर्क काम नहीं करता, श्रुतियों के अर्थघटन में भी मुझे भिन्न मार्गदर्शन मिलता है,  ऋषियोंद्वारा भी जो कहा गया है उसमें मुझे भिन्नता दिखाई देती है तब मैंने जो महाजन हैं, जो धर्म को जानकर और धर्म के अनुसार व्यवहार करनेवाले हैं, ऐसा प्रसिद्ध है, उनका अनुसरण करना चाहिए। &lt;br /&gt;
४. धर्म को न समझनेवाला ओर फिर भी यह माननेवाला की उसे धर्म की समझ है – इसे मूर्ख कहते हैं।&lt;br /&gt;
५. दुष्ट, अन्यों के साथ अधर्माचरण करने को उचित माननेवाला। &lt;br /&gt;
इस उपर्युक्त क्रम में मैं यथासंभव ऊपर के स्तरपर रहूँ ऐसा प्रयास प्रत्येकने करते रहना चाहिए।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==References==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;references /&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अन्य स्रोत:&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[Category:Bhartiya Jeevan Pratiman (भारतीय जीवन प्रतिमान)]]&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Dilipkelkar</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://dharmawiki.org/index.php?title=Form_of_an_Ideal_Society_(%E0%A4%86%E0%A4%A6%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%B6_%E0%A4%B8%E0%A4%AE%E0%A4%BE%E0%A4%9C_%E0%A4%95%E0%A4%BE_%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%B5%E0%A4%B0%E0%A5%82%E0%A4%AA)&amp;diff=119942</id>
		<title>Form of an Ideal Society (आदर्श समाज का स्वरूप)</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://dharmawiki.org/index.php?title=Form_of_an_Ideal_Society_(%E0%A4%86%E0%A4%A6%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%B6_%E0%A4%B8%E0%A4%AE%E0%A4%BE%E0%A4%9C_%E0%A4%95%E0%A4%BE_%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%B5%E0%A4%B0%E0%A5%82%E0%A4%AA)&amp;diff=119942"/>
		<updated>2019-07-20T20:13:39Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Dilipkelkar: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{One source|date=January 2019}}&lt;br /&gt;
[[Template:Cleanup reorganize Dharmawiki Page]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
क)समाज में धर्म के जानकार और मार्गदर्शकों का प्रमाण भिन्न स्वभाव विशिष्टताओं के लोगों में लगभग २ % से अधिक का होगा| % कम होनेपर भी इनकी समाज में प्रतिष्ठा होगी| इनकी संख्या बढ़ने का वातावरण होगा|&lt;br /&gt;
ख) स्वभाव के अनुसार काम का समीकरण २० % लोगों में दिखाई देगा| इनकी संख्या बढ़ने का वातावरण होगा|&lt;br /&gt;
ग) २० % जनसंख्या संयुक्त परिवारों के सदस्यों की होगी| यह संख्या बढ़ने का वातावरण होगा|&lt;br /&gt;
घ) ६०-६५ % उद्योग कौटुम्बिक उद्योग होंगे| यह संख्या बढ़ने का वातावरण होगा| &lt;br /&gt;
च) देश के हर विद्यालय में भारतीय शिक्षा ही प्रतिष्ठित होगी| नि:शुल्क होगी| शिक्षकाधिष्ठित होगी| शासन की भूमिका सहायक, समर्थक और संरक्षक की होगी| शिक्षा का माध्यम भारतीय भाषाएँ होंगी| १०-१२ % लोग संस्कृत में धाराप्रवाह संभाषण करने की सामर्थ्य रखनेवाले होंगे| ५-७ % शास्त्रों के अच्छे जानकर होंगे| यह प्रमाण बढ़ने का वातावरण होगा|&lt;br /&gt;
छ) २० % माताएँ ‘माता प्रथमो गुरू:’ के अनुसार व्यवहार कर रही होंगी| यह संख्या बढ़ने का वातावरण रहेगा| २०% पिता भी पिता द्वितियो गुरु: की भूमिका का निर्वहन करा रहे होंगे| ऐसे पिताओं की भी संख्या बढ़ने का वातावरण होगा|&lt;br /&gt;
ज) भारतीय दृष्टि से स्वाध्याय करनेवाले लोगों की संख्या कुल आबादी के २० % होगी| यह प्रमाण बढ़ने का वातावरण होगा|&lt;br /&gt;
झ) ग्रामाधारित, गोआधारित और कौटुम्बिक उद्योग आधारित अर्थव्यवस्था का प्रमाण ३०-४० % होगा| &lt;br /&gt;
प) सामाजिक संबंधों में कौटुम्बिक भावना का प्रमाण ४० % होगा| यह प्रमाण बढ़ने का वातावरण होगा|&lt;br /&gt;
फ) मालिकों का समाज होगा| ८०-८५ % लोग मालिक होंगे| नौकर बनना हीनता का लक्षण माना जाएगा|&lt;br /&gt;
ब) २० % लोगों में दान की, अर्पण/समर्पण की मानसिकता होगी| यह प्रमाण बढ़ने का वातावरण होगा|&lt;br /&gt;
भ) परिवारों के साथ ही सुधारित आश्रम व्यवस्था को समाज का समर्थन, स्वीकृति और सहायता मिलेगी| &lt;br /&gt;
म) व्यापारी वर्ग के प्रामाणिक और दानी व्यवहार से लोगों की व्यापारियों के बारे में सोच बदलेगी| व्यापारियों के व्यवहार में लाभ और शुभ का सन्तुलन  बनेगा| इसमें शुभ को प्रधानता होगी|&lt;br /&gt;
त) सामान्य मनुष्य जो धर्म का जानकार नहीं होता उस में इस की समझ होना और उसने धर्म के अनुसार चलनेवालों का अनुसरण करना| ऐसा करनेवालों की संख्या लक्षणीय होगी| &lt;br /&gt;
थ) जीवन की गति इष्ट गति होने की दिशा प्राप्त करेगी| &lt;br /&gt;
द) तन्त्रज्ञान  के क्षेत्र में भारतीय तन्त्रज्ञान  विकास और उपयोग नीति का स्वीकार विश्व के सभी देश करेंगे| सुख और साधन में अन्तर समझनेवाला समाज विश्वभर में वृद्धि पाएगा| भारत की पहल से विश्व के सभी देश संहारक शस्त्रास्त्रों को नष्ट करेंगे|&lt;br /&gt;
ध) भारत माता विश्वगुरु के स्थानपर विराजमान होगी| भारत परम वैभव को प्राप्त होगा|&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[Category:Bhartiya Jeevan Pratiman (भारतीय जीवन (प्रतिमान)]]&lt;br /&gt;
[[Category:Bhartiya Jeevan Pratiman (भारतीय जीवन प्रतिमान)]]&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Dilipkelkar</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://dharmawiki.org/index.php?title=Responsibilities_at_Societal_Level_(%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%AE%E0%A4%BE%E0%A4%9C%E0%A4%BF%E0%A4%95_%E0%A4%A7%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%AE_%E0%A4%85%E0%A4%A8%E0%A5%81%E0%A4%AA%E0%A4%BE%E0%A4%B2%E0%A4%A8)&amp;diff=119941</id>
		<title>Responsibilities at Societal Level (सामाजिक धर्म अनुपालन)</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://dharmawiki.org/index.php?title=Responsibilities_at_Societal_Level_(%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%AE%E0%A4%BE%E0%A4%9C%E0%A4%BF%E0%A4%95_%E0%A4%A7%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%AE_%E0%A4%85%E0%A4%A8%E0%A5%81%E0%A4%AA%E0%A4%BE%E0%A4%B2%E0%A4%A8)&amp;diff=119941"/>
		<updated>2019-07-20T20:12:55Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Dilipkelkar: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{One source|date=January 2019}}&lt;br /&gt;
[[Template:Cleanup reorganize Dharmawiki Page]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जीवन के भारतीय प्रतिमान की पुनर्प्रतिष्ठा के लिए राष्ट्र के संगठन की विभिन्न प्रणालियों के स्तरपर उन कर्तव्यों का याने ईकाई धर्म का विचार और प्रत्यक्ष धर्म अनुपालन की प्रक्रिया कैसे चलेगी ऐसा दो पहलुओं में हम परिवर्तन की प्रक्रिया का विचार करेंगे| वैसे तो धर्म अनुपालन की प्रक्रिया का विचार हमने समाज धारणा शास्त्र के विषय में किया है| फिर भी परिवर्तन प्रक्रिया को यहाँ फिर से दोहराना उपयुक्त होगा| &lt;br /&gt;
विभिन्न सामाजिक प्रणालियों के धर्म   &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कुटुम्ब &lt;br /&gt;
कुटुम्ब यह परिवर्तन का सबसे जड़मूल का माध्यम है| समाज जीवन की वह नींव होता है| वह जितना सशक्त और व्यापक भूमिका का निर्वहन करेगा समाज उतना ही श्रेष्ठ बनेगा| कुटुम्ब में दो प्रकार के काम होते हैं| पहले हैं कुटुम्ब के लिए और दूसरे हैं कुटुम्ब में याने समाज, सृष्टी के लिए| &lt;br /&gt;
कुटुम्ब की – कुटुम्ब के लिए  &lt;br /&gt;
१. क्षमता और योग्यता आधारित कर्तव्य &lt;br /&gt;
२. क्षमता और योग्यता के अनुसार सार्थक योगदान &lt;br /&gt;
३. शुद्ध सस्नेहयुक्त सदाचारयुक्त परस्पर व्यवहार &lt;br /&gt;
४. बड़ों का आदर, सेवा| छोटों के लिए आदर्श और प्यार| &lt;br /&gt;
५. कुटुंबहित अपने हित से ऊपर| कर्त्तव्य परायणता| अपने कर्तव्यों के प्रति आग्रही|&lt;br /&gt;
६. स्वावलंबन / परस्परावलंबन|&lt;br /&gt;
७. कुटुम्ब के सभी काम करना आना और करना|&lt;br /&gt;
८. एकात्मता का विस्तार – कुटुंब&amp;lt; समाज&amp;lt; सृष्टी&amp;lt; विश्व| लेकिन इसकी नींव कुटुंब जीवन में ही पड़ेगी और पक्की होगी| &lt;br /&gt;
९. कौशल, ज्ञान, बल और पुण्य अर्जन की दृष्टी से अध्ययन और संस्कार &lt;br /&gt;
१०. कौटुम्बिक कुशलताएँ, आदतें, रीति-रिवाज, परम्पराएँ आदि &lt;br /&gt;
११. कुटुम्ब प्रमुख सर्वोपरि : कुटुम्ब के सब ही सदस्यों को कुटुम्ब प्रमुख बनने की प्रेरणा और इस हेतु से उनके द्वारा अपना विवेक, कौशल, सयानापन, निर्णय क्षमता, अपार स्नेह आदि का विकास| कुटुम्ब प्रमुख की आज्ञाओं का पालन - आज्ञाकारिता| &lt;br /&gt;
१२. काया, वाचा, मनसा सभी से मधुर व्यवहार| &lt;br /&gt;
१३. अच्छा – बेटा/बेटी, भाई/बहन, पति/पत्नि, पिता/माता, गृहस्थ/गृहिणी, रिश्तेदार आदि बनना/बनाना|&lt;br /&gt;
१४. वर्णाश्रम धर्म का पालन – 	स्वभावज कर्म करते जाना|&lt;br /&gt;
१४.१ सवर्ण/सजातीय विवाह 	&lt;br /&gt;
१४.२ कौटुम्बिक व्यवसाय में सहभाग &lt;br /&gt;
१४.३ ज्ञान, कौशल, श्रेष्ठ परम्पराओं का निर्वहन, परिष्कार, निर्माण और अगली पीढी को अंतरण &lt;br /&gt;
१४.४ आयु की अवस्था के अनुसार ब्रह्मचर्य, गृहस्थ और वानप्रस्थ आदि आश्रमों के धर्म की जिम्मेदारियों का		 निर्वहन|  	   &lt;br /&gt;
कुटुम्ब में – समाज के लिए &lt;br /&gt;
१. सामाजिक कर्तव्यों का निर्वहन 	१.१ समाज संगठन की प्रणालियों (कुटुंब, जाति, ग्राम, राष्ट्र) में 							१.२ सामाजिक व्यवस्थाओं (रक्षण, पोषण और शिक्षण) में &lt;br /&gt;
२. ज्ञानार्जन, कौशलार्जन, बलार्जन और पुण्यार्जन की मानसिकता और केवल इन के लिए अटन |&lt;br /&gt;
३. स्वावलंबन और परस्परावलंबन |&lt;br /&gt;
४. शत्रुत्व भाववाले समाज के घटकों के साथ भी शान्ततापूर्ण और सुखी सहजीवन |&lt;br /&gt;
५. एकात्मता (समाज और सृष्टी के साथ) का व्यवहार/सुख और दु:ख में सहानुभूति और सहभागिता | &lt;br /&gt;
६. विभिन्न क्षेत्रों में - जैसे शासन, न्याय, समृद्धि आदि क्षेत्रों के नेता &amp;gt; आचार्य &amp;gt; धर्म | धर्म सर्वोपरि | &lt;br /&gt;
७. सद्गुण, सदाचार, स्वावलंबन, सत्यनिष्ठा, सादगी, सहजता, सौन्दर्यबोध, स्वतंत्रता, संयम, स्वदेशी आदि का व्यवहार साथ ही में त्याग, तपस्या, समाधान, शान्ति, अभय, विजिगीषा आदि गुणों का विकास|  &lt;br /&gt;
८. मनसा, वाचा कर्मणा ‘सर्वे भवन्तु सुखिन:’ के प्रयास|&lt;br /&gt;
९. वर्ण-धर्म की और जाति-धर्म की शिक्षा देना| जब लोग अपने वर्ण के अनुसार आचरण करते हैं तब राष्ट्र की संस्कृति का विकास और रक्षण होता है| और जब लोग अपने जातिधर्म के अनुसार व्यवसाय करते हैं तब देश समृद्ध बनता है, ओर बना रहता है| &lt;br /&gt;
१०. धर्माचरणी और समाजभक्त/देशभक्त/राष्ट्रभक्त/परमात्मा में श्रद्धा रखनेवालों का निर्माण | &lt;br /&gt;
११. धर्मशिक्षा और कर्मशिक्षा |&lt;br /&gt;
१२. संयमित उपभोग | न्यूनतम (इष्टतम) उपभोग | &lt;br /&gt;
ग्रामकुल &lt;br /&gt;
१. ग्राम को स्वावलंबी ग्राम बनाना  &lt;br /&gt;
२. ग्राम की अर्थव्यवस्था को ठीक से बिठाना और चलाना &lt;br /&gt;
३. संयुक्त कुटुंबों की प्रतिष्ठापना का वातावरण &lt;br /&gt;
४. कौटुम्बिक उद्योगों की प्रतिष्ठापना का वातावरण &lt;br /&gt;
५. कुटुम्ब भावना से प्रत्येक व्यक्ति की सम्मानपूर्ण आजीविका की व्यवस्था करना &lt;br /&gt;
६. कौटुम्बिक उद्योग और जातियों में समन्वय रखना&lt;br /&gt;
७. शासकीय व्यवस्थाओं के प्रति जिम्मेदारियां : कर देना, शिक्षण, पोषण और रक्षण की व्यवस्थाओं में श्रेष्ठ व्यक्तियों का और संसाधनों का योगदान देना &lt;br /&gt;
८. ग्राम, एक कुल बने ऐसा वातावरण बनाए रखना|&lt;br /&gt;
गुरुकुल / विद्यालय &lt;br /&gt;
१. वर्णशिक्षा की व्यवस्था &lt;br /&gt;
२. ज्ञानार्जन, कौशलार्जन, बलार्जन के लिए मार्गदर्शन &lt;br /&gt;
३. शास्त्रीय शिक्षा का प्रावधान &lt;br /&gt;
४. श्रेष्ठ परम्पराओं के निर्माण की शिक्षा &lt;br /&gt;
५. जीवन के तत्त्वज्ञान और व्यवहार की शिक्षा&lt;br /&gt;
६. जीवन के लिए महत्वपूर्ण सामाजिक संगठन प्रणालियाँ और व्यवस्थाओं की समझ और यथाशक्ति योगदान की प्रेरणा| &lt;br /&gt;
कौशल विधा पंचायत &lt;br /&gt;
१. समाज की किसी एक आवश्यकता की पूर्ति करना | कभी कोई कमी न हो यह सुनिश्चित करना|&lt;br /&gt;
२. धर्म के मार्गदर्शन में अपने कौशल विधा-धर्म का निर्धारण और कौशल विधा प्रणाली में प्रचार प्रसार &lt;br /&gt;
३. अन्य कौशल विधाओं के साथ समन्वय &lt;br /&gt;
४. राष्ट्र सर्वोपरि यह भावना सदा जाग्रत रखना &lt;br /&gt;
व्यवस्थाओं के धर्म &lt;br /&gt;
धर्म व्यवस्था &lt;br /&gt;
यह कोई नियमित व्यवस्था नहीं होती| यह जाग्रत, नि:स्वार्थी, सर्वभूतहित में सदैव प्रयासरत रहनेवाले पंडितों का समूह होता है| यह समूह सक्रीय होने से समाज ठीक चलता है| आवश्यकतानुसार इस समूह की जिम्मेदारियां बढ़ जातीं है| ऐसे आपद्धर्म के निर्वहन के लिए भी यह समूह पर्याप्त सामर्थ्यवान हो|  &lt;br /&gt;
१. कालानुरूप धर्म को व्याख्यायित करना| &lt;br /&gt;
२. वर्णों के ‘स्व’धर्मों का पालन करने की व्यवस्था की पस्तुति कर शिक्षा और शासन की मददसे समाज में उन्हें स्थापित करना| व्यक्तिगत और सामाजिक धर्म/संस्कृति के अनुसार व्यवहार का वातावरण बनाना| जब वर्ण-धर्मं का पालन लोग करते हैं तब देश में संस्कृति का विकास और रक्षण होता है| जिनकी ओर देखकर लोग वर्ण धर्म का पालन कर सकें ऐसे ‘श्रेष्ठ’ लोगों का निर्माण करना| &lt;br /&gt;
३. स्वाभाविक, शासनिक और आर्थिक ऐसी सभी प्रकार की स्वतन्त्रता की रक्षा करना| &lt;br /&gt;
४. शासनपर अपने ज्ञान, त्याग, तपस्या, लोकसंग्रह तथा सदैव लोकहित के चिंतन के माध्यम से नैतिक दबाव निर्माण करना| शासन को सदाचारी, कुशल और सामर्थ्य संपन्न बनाए रखने के लिए मार्गदर्शन करना| अधर्माचरणी शासन को हटाकर धर्माचरणी शासन को प्रतिष्ठित करना|&lt;br /&gt;
५. लोकशिक्षा (कुटुम्ब शिक्षा इसी का हिस्सा है) और विद्यालयीन शिक्षा की प्रभावी व्यवस्था करना| जैसे लिखा पढी न्यूनतम करने की दिशा में बढ़ना| वाणी/शब्द की प्रतिष्ठा बढ़ाना| जीवन को साधन सापेक्षता से साधना  सापेक्षता की ओर ले जाने के लिए अपनी कथनी और करनी से मार्गदर्शन करना| &lt;br /&gt;
शासन व्यवस्था &lt;br /&gt;
१. अंतर्बाह्य शत्रुओं से लोगों की शासनिक स्वतन्त्रता की रक्षा करना| &lt;br /&gt;
२. धर्मं के दायरे में रहकर दुष्टों और मूर्खों को नियंत्रण में रखना| &lt;br /&gt;
३. दंड व्यवस्था के अंतर्गत न्याय व्यवस्था का निर्माण करना| किसी पर अन्याय हो ही नहीं ऐसी दंड व्यवस्था के निर्माण का प्रयास करना| &lt;br /&gt;
४. श्रेष्ठ शासक परम्परा निर्माण करना|&lt;br /&gt;
५. प्रभावी, समाजहित की शिक्षा देनेवाले शिक्षा केन्द्रों को संरक्षण, समर्थन और सहायता देकर और प्रभावी बनाने के लिए यथाशक्ति प्रयास करना| ऐसा करने से शासन का काम काफी सरल हो जाता है| &lt;br /&gt;
६. धर्मं व्यवस्था से समय समयपर मार्गदर्शन प्राप्त करते रहना|  &lt;br /&gt;
समृद्धि व्यवस्था &lt;br /&gt;
१. योग्य शिक्षा के द्वारा समाज में धर्म के अविरोधी इच्छाओं का ही विकास हो यह सुनिश्चित करना| &lt;br /&gt;
२. समाज के प्रत्येक घटक की सभी आवश्यकताओं की पूर्ति करना, धर्म विरोधी इच्छाओं की नहीं| समाज की आर्थिक स्वतन्त्रता को अबाधित रखना| &lt;br /&gt;
३. प्राकृतिक संसाधनों का न्यूनतम उपयोग हो ऐसा वातावरण बनाना| संयमित उपभोग को प्रतिष्ठित करना| &lt;br /&gt;
४. प्रकृति का प्रदूषण नहीं होने देना| प्रकृति का सन्तुलन बनाए रखना| &lt;br /&gt;
५. कौटुम्बिक उद्योग, जातियाँ और ग्राम मिलकर समृद्धि निर्माण होती है| ये तीनों ईकाईयाँ फलेफूले और इनका स्वस्थ ऐसा तानाबाना बना रहे ऐसा वातावरण रहे|&lt;br /&gt;
६. पैसे का विनिमय न्यूनतम रहे ऐसी व्यवस्था निर्माण करना|&lt;br /&gt;
अब हम धर्म के अनुपालन की प्रक्रिया का विचार आगे करेंगे|&lt;br /&gt;
धर्म अनुपालन की प्रक्रिया  &lt;br /&gt;
	हमने जाना है कि समाज के सुख, शांति, स्वतंत्रता, सुसंस्कृतता के लिए समाज का धर्मनिष्ठ होना आवश्यक होता है| यहाँ मोटे तौरपर धर्म से मतलब कर्तव्य से है| समाज धारणा के लिए कर्तव्योंपर आधारित जीवन अनिवार्य होता है| समाज धारणा के लिए धर्म-युक्त व्यवहार में आनेवाली जटिलताओं को और उसके अनुपालन की प्रक्रिया को समझने का प्रयास करेंगे| इन में व्यक्तिगत स्तर की बातों का हमने पूर्व के अध्याय में विचार किया है|&lt;br /&gt;
१. विभिन्न ईकाईयों के स्तरपर &lt;br /&gt;
  १.१ कुटुम्ब : समाज की सभी इकाइयों के विभिन्न स्तरोंपर उचित भूमिका निभानेवाले श्रेष्ठ मानव का  		निर्माण करना| कौटुम्बिक व्यवसाय के माध्यम से समाज की किसी आवश्यकता की पूर्ति करना| &lt;br /&gt;
  १.२ ग्राम : ग्राम की भूमिका छोटे विश्व और बड़े कुटुम्ब की तरह ही होती है| जिस तरह कुटुम्ब के सदस्यों में आपस में पैसे का लेनदेन नहीं होता उसी तरह अच्छे ग्राम में कुटुम्बों में आपस में पैसे का लेनदेन नहीं होता| प्रत्येक की सम्मान और स्वतन्त्रता के साथ अन्न, वस्त्र, भवन, शिक्षा, आजीविका, सुरक्षा आदि सभी आवश्यकताओं की पूर्ति होती है|&lt;br /&gt;
१.३ कौशल विधा : समाज जीवन की आवश्यकताओं की हर विधा के अनुसार व्यवसाय विधा समूह बनते हैं| इन समूहों के भी सामान्य व्यक्ति से लेकर विश्व के स्तरतक के लिए करणीय और अकरणीय कार्य होते हैं| कर्तव्य होते हैं| इन्हें व्यवसाय विधा धर्म कहेंगे| इनमें पदार्थ के उत्पादन के रूप में आर्थिक स्वतन्त्रता के किसी एक पहलू की रक्षा में योगदान करना होता है|  शिक्षा/संस्कार, वस्तुएं, भावनाएं, विचार, कला आदि में से समाज जीवन की आवश्यकता में से किसी एक विधा के पदार्थ की निरंतर आपूर्ति करना| पदार्थ का अर्थ केवल वस्तु नहीं है| जिस पद याने शब्द का अर्थ होता है वह पदार्थ कहलाता है| व्यावसायिक समूह का काम कौशल का विकास करना, कौशल का पीढ़ी दर पीढ़ी अंतरण करना और अन्य व्यवसायिक समूहों से समन्वय रखना आदि है|&lt;br /&gt;
  १.४ भाषिक समूह : भाषा का मुख्य उपयोग परस्पर संवाद है| संवाद विचारों की सटीक अभिव्यक्ति   करनेवाला हो इस हेतु से भाषाएँ बनतीं हैं| संवाद में सहजता, सरलता, सुगमता से आत्मीयता बढ़ती है| इसी हेतु से भाषिक समूह बनते हैं| &lt;br /&gt;
  १.५ प्रादेशिक समूह:शासनिक और व्यवस्थात्मक सुविधा की दृष्टि से प्रादेशिक स्तरका महत्त्व होता है|  &lt;br /&gt;
  १.६ राष्ट्र:राष्ट्र अपने समाज के लिये विविध प्रकारके संगठनों का और व्यवस्थाओं का निर्माण करता है| &lt;br /&gt;
  १.७ विश्व:पूर्व में बताई हुई १.१ से लेकर १.६ तक की सभी इकाइयां वैश्विक हित की अविरोधी रहें|&lt;br /&gt;
२. प्रकृति सुसंगतता : समाज जीवन में केन्द्रिकरण और विकेंद्रीकरण का समन्वय हो यह आवश्यक है| विशाल उद्योग, बाजार की मंडियां, शासकीय कार्यालय, व्यावसायिक, भाषिक, प्रादेशिक समूहों के समन्वय की व्यवस्थाएं आदि के लिये शहरों की आवश्यकता होती है| लेकिन इनमें अनावश्यक केन्द्रीकरण न हो पाए| वनवासी या गिरिजन भी ग्राम व्यवस्था से ही जुड़े हुए होने चाहिए| &lt;br /&gt;
३ प्रक्रियाएं : धर्म के अनुपालन में बुद्धि के स्तरपर धर्म के प्रति पर्याप्त संज्ञान, मन के स्तरपर कौटुम्बिक भावना, अनुशासन और श्रद्धा (आज्ञाकारिता) का विकास तथा शारीरिक स्तरपर सहकारिता और परोपकार की आदतें अत्यंत आवश्यक हैं| &lt;br /&gt;
  ३.१ धर्म संज्ञान : ‘समझना’ यह बुद्धि का काम होता है| इसलिए जब बच्चे का बुद्धि का अंग विकसित हो रहा होता है उसे धर्म की बौद्धिक याने तर्क तथा कर्मसिद्धांत के आधारपर शिक्षा देना उचित होता है| इस दृष्टि से तर्कशास्त्र की समझ या सरल शब्दों में ‘किसी भी बात के करने से पहले चराचर के हित में उस बात को कैसे करना चाहिए’ इसे समझने की क्षमता का विकास आवश्यक होता है|&lt;br /&gt;
  ३.२ कौटुम्बिक भावना का विकास : समाज के सभी परस्पर संबंधों में कौटुम्बिक भावना से व्यवहार का आधार धर्मसंज्ञान ही तो होता है| मन को बुद्धि के नियंत्रण में रखना ही मन की शिक्षा होती है| दुर्योधन के निम्न कथन से सब परिचित हैं| 		&lt;br /&gt;
जानामी धर्मं न च में प्रवृत्ति: |   जानाम्यधर्मं न च में निवृत्ति: ||&lt;br /&gt;
   ३.३ धर्माचरण की आदतें: दुर्योधन के उपर्युक्त कथन को ध्यान में रखकर ही गर्भधारणा से ही बच्चे को धर्माचरण की आदतों की शिक्षा देना महत्त्वपूर्ण बन जाता है| आदत का अर्थ है जिस बात के करने में कठिनाई का अनुभव नहीं होता| जब किसी बात के बारबार करने से आचरण में यह सहजता आती है तब वह आदत बन जाती है| और जब उसे बुद्धिका अधिष्ठान मिल जाता है तब वह आदतें मनुष्य का स्वभाव ही बन जातीं हैं| &lt;br /&gt;
४ धर्म के अनुपालन के स्तर और साधन : &lt;br /&gt;
   ४.१ धर्म के अनुपालन करनेवालों के राष्ट्रभक्त, अराष्ट्रीय और राष्ट्रद्रोही ऐसे मोटे-मोटे तीन स्तर होते हैं| &lt;br /&gt;
   ४.२ धर्म के अनुपालन के साधन : धर्म का अनुपालन पूर्व में बताए अनुसार शिक्षा, आदेश, प्रायश्चित्त/	पश्चात्ताप 	तथा दंड ऐसा चार प्रकार से होता है| शासन दुर्बल होने से समाज में प्रमाद करनेवालों की संख्या में वृद्धि 	होती है|&lt;br /&gt;
५. धर्म के अनुपालन के अवरोध : धर्म के अनुपालन में निम्न बातें अवरोध-रूप होतीं हैं|&lt;br /&gt;
   ५.१ भिन्न जीवनदृष्टि के लोग : शीघ्रातिशीघ्र भिन्न जीवनदृष्टि के लोगों को आत्मसात करना आवश्यक होता 	है| अन्यथा समाज जीवन अस्थिर और संघर्षमय बन जाता है|&lt;br /&gt;
५.२ स्वार्थ/संकुचित अस्मिताएँ :आवश्यकताओं की पुर्ति तक तो स्वार्थ भावना समर्थनीय है| अस्मिता या 	अहंकार यह प्रत्येक जिवंत ईकाई का एक स्वाभाविक पहलू होता है| किन्तु जब किसी ईकाई के विशिष्ट 	स्तरकी यह अस्मिता अपने से ऊपर की ईकाई जिसका वह हिस्सा है, उसकी अस्मिता से बड़ी लगने 	लगती है तब समाज जीवन की शांति नष्ट हो जाती है| इसलिए यह आवश्यक है की मजहब, रिलिजन, 	प्रादेशिक अलगता, भाषिक भिन्नता, धनका अहंकार, बौद्धिक श्रेष्ठता आदि जैसी संकुचित अस्मिताएँ 		अपने से ऊपर की जीवंत ईकाई की अस्मिता के विरोध में नहीं हो| &lt;br /&gt;
   ५.३ विपरीत शिक्षा : विपरीत या दोषपूर्ण शिक्षा यह तो सभी समस्याओं की जड़ होती है| &lt;br /&gt;
६  कारक तत्त्व : कारक तत्वों से मतलब है धर्मपालन में सहायता देनेवाले घटक| ये निम्न होते हैं|&lt;br /&gt;
   ६.१ धर्म व्यवस्था : शासन धर्मनिष्ठ रहे यह सुनिश्चित करना धर्म व्यवस्था की जिम्मेदारी है| अपने 	त्याग, 	तपस्या, ज्ञान, लोकसंग्रह, चराचर के हित का चिन्तन, समर्पण भाव और कार्यकुशलता के आधारपर 	समाज से प्राप्त समर्थन प्राप्त कर वह देखे की कोई अयोग्य व्यक्ति शासक नहीं बनें|&lt;br /&gt;
   ६.२ शिक्षा : ६.२.१ कुटुम्ब शिक्षा 	६.२.२ विद्याकेन्द्र की शिक्षा 	६.२.३ लोकशिक्षा &lt;br /&gt;
   ६.३ धर्मनिष्ठ शासन : शासक का धर्मशास्त्र का जानकार होना और स्वयं धर्माचरणी होना भी	आवश्यक होता 	है| जब शासन धर्म के अनुसार चलता है, धर्म व्यवस्थाद्वारा नियमित निर्देशित होता है तब धर्म भी 	स्थापित होता है और राज्य व्यवस्था भी श्रेष्ठ बनती है|&lt;br /&gt;
   ६.४ धर्मनिष्ठों का सामाजिक नेतृत्व : समाज जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में धर्मनिष्ठ लोग जब अच्छी 	  	संख्या में दिखाई देते हैं तब समाज मानस धर्मनिष्ठ बनता है| &lt;br /&gt;
७ चरण : धर्म का अनुपालन जब लोग स्वेच्छा से करनेवाले समाज के निर्माण के लिए दो बातें अत्यंत महत्वपूर्ण होतीं हैं| एक गर्भ में श्रेष्ठ जीवात्मा की स्थापना और दूसरे शिक्षा और संस्कार| &lt;br /&gt;
शिक्षा और संस्कार में -&lt;br /&gt;
   ७.१ जन्मपूर्व और शैशव कालमें अधिजनन शास्त्र के आधारपर मार्गदर्शन| &lt;br /&gt;
७.२ बाल्य काल : कुटुम्ब की शिक्षा के साथ विद्याकेन्द्र शिक्षा का समायोजन 			           ७.३ यौवन काल: अहंकार, बुद्धि के सही मोड़ हेतु सत्संग, प्रेरणा, वातावरण, ज्ञानार्जन/बलार्जन/ 	 	 कौशलार्जन आदि &lt;br /&gt;
७.४ प्रौढ़ावस्था : पूर्व ज्ञान/आदतों को व्यवस्थित करने के लिए सामाजिक वातावरण और मार्गदर्शन 		 ७.४.१ पुरोहित    ७.४.२ मेले/यात्राएं   ७.४.३ कीर्तनकार/प्रवचनकार   ७.४.४ धर्माचार्य 		 ७.४.५ दृक्श्राव्य माध्यम –चित्रपट, दूरदर्शन आदि  ७.४.६ आन्तरजाल  ७.४.७ कानून का डर &lt;br /&gt;
८ धर्म निर्णय व्यवस्था : सामान्यत: जब भी धर्म की समझसे सम्बन्धित समस्या हो तब धर्म निर्णय की व्यवस्था उपलब्ध होनी चाहिये| इस व्यवस्था के तीन स्तर होना आवश्यक है| पहला स्तर तो स्थानिक धर्म के जानकार, दूसरा जनपदीय या निकटके तीर्थक्षेत्र में धर्मज्ञ परिषद्, और तीसरा स्तर अखिल भारतीय या राष्ट्रीय धर्मज्ञ परिषद्| &lt;br /&gt;
९ माध्यम : धर्म अनुपालन करवाने के मुख्यत: दो प्रकारके माध्यम होते हैं| &lt;br /&gt;
   ९.१ कुटुम्ब के दायरे में : धर्म शिक्षा का अर्थ है सदाचार की शिक्षा| धर्म की शिक्षा के लिए कुटुम्ब यह सबसे श्रेष्ठ पाठशाला है| विद्याकेन्द्र की शिक्षा तो कुटुम्ब में मिली धर्म शिक्षा की पुष्टि या आवश्यक सुधार के लिए ही होती है| कुटुम्ब में धर्म शिक्षा तीन तरह से होती है| गर्भपूर्व संस्कार, गर्भ संस्कार और शिशु संस्कार और आदतें| मनुष्य की आदतें भी बचपन में ही पक्की हो जातीं हैं| &lt;br /&gt;
   ९.२ कुटुम्ब से बाहर के माध्यम : मनुष्य तो हर पल सीखता ही रहता है| इसलिए कुटुम्ब से बाहर भी वह कई बातें सीखता है| माध्यमों में मित्र मंडली, विद्यालय, समाज का सांस्कृतिक स्तर और क़ानून व्यवस्था आदि|&lt;br /&gt;
जीवन के भारतीय प्रतिमान की प्रतिष्ठापना की प्रक्रिया से अपेक्षित परिणामों की चर्चा हम अगले 	अध्याय में करेंगे|&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[Category:Bhartiya Jeevan Pratiman (भारतीय जीवन (प्रतिमान)]]&lt;br /&gt;
[[Category:Bhartiya Jeevan Pratiman (भारतीय जीवन प्रतिमान)]]&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Dilipkelkar</name></author>
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		<title>Responsibilities at Personal Level (व्यक्तिगत धर्म अनुपालन)</title>
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		<updated>2019-07-10T08:12:15Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Dilipkelkar: editing done&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{One source|date=January 2019}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हमने जाना है कि समाज के सुख, शांति, स्वतंत्रता, सुसंस्कृतता के लिए समाज का धर्मनिष्ठ होना आवश्यक होता है| यहाँ मोटे तौरपर धर्म से मतलब कर्तव्य से है| समाज धारणा के लिए कर्तव्योंपर आधारित जीवन अनिवार्य होता है| समाज धारणा के लिए धर्म-युक्त व्यवहार में आनेवाली जटिलताओं को और फिर भी उसका अनुपालन कैसे किया जाता है इसकी प्रक्रिया को समझने का प्रयास करेंगे| &lt;br /&gt;
विविध स्तर : मानव समाज में जीवन्त इकाईयों के कई स्तर हैं| ये स्तर निम्न हैं|&lt;br /&gt;
१ व्यक्ति&lt;br /&gt;
२ कुटुम्ब&lt;br /&gt;
३ ग्राम&lt;br /&gt;
४ व्यवसाय समूह&lt;br /&gt;
५ भाषिक समूह&lt;br /&gt;
६ प्रादेशिक समूह&lt;br /&gt;
७ राष्ट्र&lt;br /&gt;
८ विश्व &lt;br /&gt;
ये सब मानव से या व्यक्तियों से बनीं जीवन्त इकाईयाँ हैं| इन सब के अपने ‘स्वधर्म’ हैं| इन सभी स्तरों के करणीय और अकरणीय बातों को ही उस ईकाई का धर्म कहा जाता है| निम्न स्तरकी ईकाई उससे बड़े स्तरकी ईकाई का हिस्सा होने के कारण हर ईकाईका धर्म आगे की या उससे बड़ी जीवंत ईकाई के धर्म का केवल अविरोधी ही नहीं तो पूरक और पोषक होना आवश्यक होता है| प्राकृतिक दृष्टी से तो यह होता ही है| लेकिन व्यक्ति का स्वार्थ उसे भिन्न व्यवहार के लिए प्रेरित करता है| ऐसा भिन्न व्यवहार कोई व्यक्ति न करे इसके लिए ही शिक्षा होती है| और जो शिक्षा मिलनेपर भी अपनी दुष्टता या मूर्खता के कारण उचित व्यवहार नहीं करता उसके लिए शासन या दंड व्यवस्था होती है| व्यक्ति के धर्म का कोई भी पहलू कुटुम्ब से लेकर वैश्विक धर्म का विरोधी नहीं होना चाहिए| इतना ही नहीं वह इन धर्मों के लिए पूरक और पोषक भी होना चाहिए|&lt;br /&gt;
प्रत्येक मनुष्य जीवन में कई भूमिकाएं निभाता है| इन भूमिकाओं के मोटे मोटे दो हिस्से कर सकते हैं| अंजान वातावरण में व्यक्ति की भूमिका व्यक्ति के स्तर की होती है| जब की परिचित वातावरण में वह परिचितों को अपेक्षित भूमिका निभाए ऐसी उस से अपेक्षा होती है| उस समय वह किसी समूह का याने कुटुंब, ग्राम, व्यावसायिक समूह या जाति, प्रादेशिक समूह, भाषिक समूह, राष्ट्र आदि के सदस्य की भूमिका में होता है| मनुष्य को समूह के विभिन्न स्तरोंपर काम तो व्यक्ति के रूप में ही करना है| फिर भी सुविधा के लिए व्यक्ति के स्तर से ऊपर की इकाई का विचार हम अगले अध्याय, “जिम्मेदारी समूह” में करेंगे| यहाँ केवल व्यक्ति के स्तरपर क्या करना है इसका विचार करेंगे| &lt;br /&gt;
इसी का विभाजन यम और नियमों के रूप में अष्टांग योग में किया गया है| सामान्यत: शौच, संतोष, तप, स्वाध्याय और ईश्वर प्रणिधान इन पाँच नियमों का संबंध यक्तिगत स्तर के लिए अधिक होता है| अहिंसा, सत्य, अस्तेय, अपरिग्रह और ब्रह्मचर्य इन पाँच प्रकार के ‘यम’ का संबंध मुख्यत: समाज से होता है| इसलिए यहाँ व्यक्तिगत स्तरपर शौच, संतोष, तप, स्वाध्याय और ईश्वर प्रणिधान आदि के विषय में विचार करना उचित होगा| &lt;br /&gt;
व्यक्ति के स्तरपर जिन अन्य धर्मों का समावेश भी होता है ऐसे इन नियमों से भिन्न, लेकिन साथ ही विचार करने योग्य पहलू निम्न होंगे| &lt;br /&gt;
अ) जन्मजात / स्वभावज : याने जन्म से जो सत्त्व-रज-तम युक्त स्वभाव मिला है उसमें शुद्धि और विकास करना| इसे ही वर्णधर्म कहते हैं| इसे ही श्रीमद्भगवद्गीता में ‘स्वधर्म’ कहा है|  इसी तरह से जन्म से ही जो त्रिदोषात्मक शरीर मिला है उसे धर्मं साधना के लिए स्वस्थ रखना भी महत्वपूर्ण है| शरीर स्वस्थ रहे, निरोग रहे, बलवान रहे, लचीला रहे, कौशल्यवान रहे, तितिक्षावान रहे इस के लिए जो करणीय और अकरणीय बातें हैं उन्हें ही शरीरधर्म कहते हैं|&lt;br /&gt;
आ) स्त्री-पुरुष : स्त्री या पुरुष होने के कारण स्त्री होने का या पुरुष होने का जो प्रयोजन है उसे पूर्ण करना| स्त्री ने एक अच्छी बेटी, अच्छी बहन, अच्छी पत्नि, अच्छी गृहिणी, अच्छी माता, अच्छी समाज सदस्य, अच्छी राष्ट्रभक्त बनना| इसी तरह से पुरुष ने अच्छा बेटा, अच्छा भाई, अच्छा पति, अच्छा गृहस्थ, अच्छा पिता, अच्छा समाज सदस्य, अच्छा राष्ट्रभक्त बनना| iइस दृष्टी से अपने गुणों का विकास करना|  i&lt;br /&gt;
इन सब को मिलाकर करणीय और अकरणीय के तानेबाने का याने धर्मों का विचार कुछ निम्न जैसा होगा|&lt;br /&gt;
व्यक्तिगत धर्मों का तानाबाना &lt;br /&gt;
1.  ब्राह्मण वर्ण 		- ब्रह्मचर्य 	- अपने लिए      (स्त्री और पुरुष)  : नियमों का अनुपालन &lt;br /&gt;
			- गृहस्थ 	- अपने लिए      (स्त्री और पुरुष)  : नियमों का अनुपालन&lt;br /&gt;
			- उत्तरगृहस्थ	- अपने लिए      (स्त्री और पुरुष)  : नियमों का अनुपालन&lt;br /&gt;
२. क्षत्रिय वर्ण 		- ब्रह्मचर्य 	- अपने लिए      (स्त्री और पुरुष)  : नियमों का अनुपालन&lt;br /&gt;
			- गृहस्थ 	- अपने लिए      (स्त्री और पुरुष)  : नियमों का अनुपालन&lt;br /&gt;
			- उत्तरगृहस्थ	- अपने लिए      (स्त्री और पुरुष)  : नियमों का अनुपालन&lt;br /&gt;
३. वैश्य वर्ण 		- ब्रह्मचर्य 	- अपने लिए      (स्त्री और पुरुष)  : नियमों का अनुपालन&lt;br /&gt;
			- गृहस्थ 	- अपने लिए      (स्त्री और पुरुष)  : नियमों का अनुपालन&lt;br /&gt;
			- उत्तरगृहस्थ	- अपने लिए      (स्त्री और पुरुष)  : नियमों का अनुपालन&lt;br /&gt;
४. शूद्र वर्ण 		- गृहस्थ 	- अपने लिए      (स्त्री और पुरुष)  : नियमों का अनुपालन&lt;br /&gt;
			- उत्तरगृहस्थ	- अपने लिए      (स्त्री और पुरुष)  : नियमों का अनुपालन&lt;br /&gt;
कुछ सभी को लागू हैं ऐसे बिंदु निम्न होंगे| &lt;br /&gt;
१. कोई भी बालक जन्म से शूद्र नहीं होता| ब्रह्मचर्य काल में और ब्रह्मचर्य कालतक कोई बालक शूद्र नहीं होता| इस काल में कोई शूद्र ही नहीं होता इसलिए शूद्र का धर्म भी बताने की आवश्यकता नहीं है| ब्रह्मचर्य का काल तो उसे भी त्रिवर्ण में से अपने योग्य वर्ण के गुण लक्षण प्रकट करने का समय होता है| जब वह त्रिवर्ण में से अपना वर्ण सिद्ध नहीं कर पाता है तब वह शूद्रत्व को प्राप्त होता है|  &lt;br /&gt;
२. ब्रह्मचर्य यह अपने अपने जन्मजात वर्ण या स्वभाव के गुण लक्षणों की शुद्धि और वृद्धि का काल होता है| इसी तरह से अपने शरीर को श्रेष्ठ बनाने का काल होता है| ज्ञानार्जन, बलार्जन, कौशलार्जन आदि का काल होता है| योगशास्त्र के पाँच नियमों का पालन भी अनिवार्य रूप से होता रहना चाहिए| &lt;br /&gt;
३. गृहस्थ काल यह बल को बनाए रखने के लिए और ज्ञान और कुशलता में वृद्धि करने का काल होता है| इस दृष्टी से चिंतन, निदिध्यासन, प्रयोग, अनुसंधान आदि का काल होता है| ब्रह्मचर्य काल में जो सीखा है उसे प्रयोग करने का, उसे परिष्कृत करने का, उसे अधिक उन्नत करने का काल होता है| इसी के लिए तप होता है, स्वाध्याय होता है| स्वाध्याय की दिशा ही ईश्वर प्रणिधान की होती है| अपने अध्ययन के या व्यवसाय के विषय का ही अध्ययन और विकास इस तरह से करना जिससे मोक्षगामी बन सकें, परमात्मपद को प्राप्त कर सकें|  &lt;br /&gt;
४. वानप्रस्थ या उत्तर गृहस्थाश्रम में जो उन्नत ज्ञान और कुशलता का विकास किया है उसे अगली पीढी को हस्तांतरित करने का काल होता है| इस दृष्टी से जो मिले उसमें संतोष रखना होता है| ज्ञान और कौशल के हस्तांतरण के लिए तप करने की आवश्यकता होती है| मृत्यू से पूर्व अपने से भी श्रेष्ठ ज्ञान और/या कुशलता के क्षेत्र में उत्तराधिकारी निर्माण करना होता है| अपने कुटुम्ब में यदि ऐसा उत्तराधिकारी नहीं मिलता तो उसे बाहर समाज में से ढूँढना होता है| &lt;br /&gt;
इन में यहाँ हम उपर्युक्त में से हर वर्ण के और हर आश्रम के व्यक्ति के लिए केवल ‘अपने लिए’ जो करणीय और अकरणीय है उसी का याने शौच, संतोष, तप, स्वाध्याय और ईश्वर प्रणिधान का विचार करेंगे| व्यक्ति से ऊपर की इकाइयों का विचार हम अगले अध्याय में करेंगे| &lt;br /&gt;
सामाजिक घटकों के स्तर और धर्माचरण का अनुपालन  &lt;br /&gt;
१. धर्म की समझ रखनेवाला और धर्माचरण करनेवाला वर्ग : इसे शिक्षा के माध्यम से बनाया जाता है| &lt;br /&gt;
२. धर्म को केवल समझनेवाला लेकिन प्रत्यक्ष धर्माचरण में त्रुटियाँ होतीं हैं ऐसा वर्ग : ऐसे लोगों को ज्येष्ठ/श्रेष्ठ लोग या शासन के माध्यम से ठीक किया जा सकता है| &lt;br /&gt;
३. धर्म को न समझनेवाला लेकिन धर्म की अच्छी समझ किसे है यह समझनेवाला और उसका अनुसरण करनेवाला : सामान्यत: लोग ऐसे होते हैं| यह शिक्षा की श्रेष्ठता है कि ऐसे लोगों के मन बुद्धि के नियंत्रण में और और बुद्धि धर्माचरणी श्रेष्ठ लोगों के अनुसरण की रहे| आदेश से भी इनसे धर्माचरण करवाया जा सकता है| इस दृष्टी से आज्ञाकारिता का गुण बहुत महत्वपूर्ण है| कहा गया है –&lt;br /&gt;
तर्कोंऽप्रतिष्ठित: श्रुतयोर्विभिन्न: नैको ऋषिर्यस्य मतं प्रमाणं |&lt;br /&gt;
धर्मस्य तत्वं निहितं गुहाय महाजनों येन गत: स पंथ: ||&lt;br /&gt;
अर्थ : जहाँ मेरा तर्क काम नहीं करता, श्रुतियों के अर्थघटन में भी मुझे भिन्न मार्गदर्शन मिलता है,  ऋषियोंद्वारा भी जो कहा गया है उसमें मुझे भिन्नता दिखाई देती है तब मैंने जो महाजन हैं, जो धर्म को जानकर और धर्म के अनुसार व्यवहार करनेवाले हैं, ऐसा प्रसिद्ध है, उनका अनुसरण करना चाहिए| &lt;br /&gt;
४. धर्म को न समझनेवाला ओर फिर भी यह माननेवाला की उसे धर्म की समझ है – इसे मूर्ख कहते हैं|&lt;br /&gt;
५. दुष्ट, अन्यों के साथ अधर्माचरण करने को उचित माननेवाला| &lt;br /&gt;
इस उपर्युक्त क्रम में मैं यथासंभव ऊपर के स्तरपर रहूँ ऐसा प्रयास प्रत्येकने करते रहना चाहिए|&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==References==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;references /&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अन्य स्रोत:&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[Category:Bhartiya Jeevan Pratiman (भारतीय जीवन प्रतिमान)]]&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Dilipkelkar</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://dharmawiki.org/index.php?title=Planning_For_Change_(%E0%A4%AA%E0%A4%B0%E0%A4%BF%E0%A4%B5%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%A4%E0%A4%A8_%E0%A4%95%E0%A5%80_%E0%A4%AF%E0%A5%8B%E0%A4%9C%E0%A4%A8%E0%A4%BE)&amp;diff=119360</id>
		<title>Planning For Change (परिवर्तन की योजना)</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://dharmawiki.org/index.php?title=Planning_For_Change_(%E0%A4%AA%E0%A4%B0%E0%A4%BF%E0%A4%B5%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%A4%E0%A4%A8_%E0%A4%95%E0%A5%80_%E0%A4%AF%E0%A5%8B%E0%A4%9C%E0%A4%A8%E0%A4%BE)&amp;diff=119360"/>
		<updated>2019-06-02T15:14:14Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Dilipkelkar: /* परिवर्तन के पुरोधा */ लेख सम्पादित किया&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{One source|date=January 2019}}&lt;br /&gt;
[[Template:Cleanup reorganize Dharmawiki Page]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
परिवर्तन की योजना को समझने के लिए हमें पहले निम्न बातें फिर से स्मरण करनी होंगी ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जीवन के भारतीय प्रतिमान की जानकारी के लिए - &lt;br /&gt;
# जीवनदृष्टि/व्यवहार : भारतीय जीवनदृष्टि और जीवनशैली के विषय में जानकारी के लिये कृपया [[Elements of Hindu Jeevan Drishti and Life Style (भारतीय/हिन्दू जीवनदृष्टि और जीवन शैली के सूत्र)|यह]] लेख देखें।&lt;br /&gt;
# व्यवस्था समूह का ढाँचा जीवनदृष्टि से सुसंगत होना चाहिए। कृपया व्यवस्था समूह के ढाँचे के लिये [[Jeevan Ka Pratiman (जीवन का प्रतिमान)|यह]] लेख और जानकारी के लिए [[Interrelationship in Srishti (सृष्टि में परस्पर सम्बद्धता)|यह]] लेख देखें।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== समस्या मूलों के निराकरण की नीति ==&lt;br /&gt;
समस्या मूल नष्ट करने से तात्पर्य समस्या मूलों पर आघात से नहीं है। समस्याएँ निर्माण ही नहीं हों ऐसी परिस्थितियों, ऐसे समाज संगठनों और ऐसी व्यवस्थाओं के निर्माण से है। निराकरण की प्रक्रिया के ३ चरण होंगे। समस्याओं को और परिवर्तन के स्वरूप को समझना, निराकरण की नीति तय करना और निराकरण का क्रियान्वयन करना। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== परिवर्तन के स्वरूप को समझना ==&lt;br /&gt;
समस्या का मूल जीवन के प्रतिमान के परिवर्तन में है। प्रतिमान का आधार समाज की जीवनदृष्टि होती है। व्यवहार, संगठन और व्यवस्थाएँ तो जीवनदृष्टि के आधार पर ही तय होते हैं। इसलिये परिवर्तन की प्रक्रिया में जीवनदृष्टि के परिवर्तन की प्रक्रिया को प्राथमिकता देनी होगी। व्यवहार में सुसंगतता आए इसलिये करणीय अकरणीय विवेक को सार्वत्रिक करना होगा। दूसरे क्रमांक पर संगठन और व्यवस्थाओं में परिवर्तन की प्रक्रिया चलेगी। व्यवस्था परिवर्तन की इस प्रक्रिया में समग्रता और एकात्मता के संदर्भ में व्यवस्था विशेष का आधार बनाने के लिये विषय की सैध्दांतिक प्रस्तुति करनी होगी। जैसे शासन व्यवस्था में यदि उचित परिवर्तन करना है तो पहले राजशास्त्र की सैध्दांतिक प्रस्तुति करना आवश्यक है। समृद्धि व्यवस्था में परिवर्तन करने के लिये समृद्धिशास्त्र की सैध्दांतिक प्रस्तुति करनी होगी। इन सैध्दांतिक प्रस्तुतियों को प्रयोग सिध्द करना होगा। प्रयोगों के आधार पर इन प्रस्तुतियों में उचित परिवर्तन करते हुए आगे बढना होगा। यह काम प्राथमिकता से धर्म के जानकारों का है। दूसरे क्रमांक की जिम्मेदारी शिक्षकों की है। शिक्षक वर्ग ही धर्म को सार्वत्रिक करता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== निराकरण की नीति ==&lt;br /&gt;
समस्याएँ इतनी अधिक और पेचिदा हैं कि इनका निराकरण अब संभव नहीं है, ऐसा कई विद्वान मानते हैं। हमने जो करणीय और अकरणीय विवेक को समझा है उसके अनुसार कोई भी बात असंभव नहीं होती। ऊपरी तौर पर असंभव लगने पर भी उसे संभव चरणों में बाँटकर संपन्न किया जा सकता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इस के लिये नीति के तौर पर हमारा व्यवहार निम्न प्रकार का होना चाहिए:&lt;br /&gt;
* सबसे पहले तो यह हमेशा ध्यान में रखना कि यह पूरे समाज जीवन के प्रतिमान के परिवर्तन का विषय है। इसे परिवर्तन के लिये कई पीढियों का समय लग सकता है। भारत वर्ष के दीर्घ इतिहास में समाज ने कई बार उत्थान और पतन के दौर अनुभव किये हैं। बार बार भारतीय समाज ने उत्थान किया है।&lt;br /&gt;
* परिवर्तन की प्रक्रिया को संभाव्य चरणों में बाँटना।&lt;br /&gt;
* उसमें आज जो हो सकता है उसे कर डालना।&lt;br /&gt;
* आज जिसे करना कठिन लगता है उसके लिये परिस्थितियाँ बनाते जाना। परिस्थितियाँ बनते ही उसे करना।&lt;br /&gt;
* प्रारंभ में जबतक परिवर्तन की प्रक्रिया ने गति नहीं पकडी है, यथासंभव कोई विरोध मोल नहीं लेना।&lt;br /&gt;
* इसी प्रकार से एक एक चरण को संभव बनाते हुए आगे बढ़ाते जाना।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== समस्या मूलों का निराकरण ==&lt;br /&gt;
वास्तव में समस्या मूलों को नष्ट करना यह शब्दप्रयोग ठीक नहीं है। उचित प्रतिमान की प्रतिष्ठापना के साथ ही गलत प्रतिमान का अंत अपने आप होता है। जो सर्वहितकारी है, उचित है, श्रेष्ठ है, उसकी प्रतिष्ठापना ही परिवर्तन की प्रक्रिया का स्वरूप होगा। स्वाभाविक जडता के कारण कुछ कठिनाईयाँ तो आएँगी। लेकिन गलत प्रतिमान को नष्ट करने के लिये अलग से शक्ति लगाने की आवश्यकता नहीं है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== समस्या मूल नष्ट करने हेतु धर्म के जानकारों के मार्गदर्शन में शिक्षा की व्याप्ति ==&lt;br /&gt;
# जीवनदृष्टि की शिक्षा : जीवनदृष्टि की शिक्षा मुख्यत: कामनाओं और कामनाओं की पूर्ति के प्रयास, धन, साधन और संसाधनों को धर्म के दायरे में रखने की शिक्षा ही है। पुरूषार्थ चतुष्टय की या त्रिवर्ग की शिक्षा ही है।&lt;br /&gt;
# व्यवस्थाएँ : जीवनदृष्टि के अनुसार व्यवहार हो सके इस हेतु से ही व्यवस्थाओं का निर्माण किया जाता है। व्यवस्थाओं के निर्माण में और उनके क्रियान्वयन में भी जीवनदृष्टि ओतप्रोत रहे इसका ध्यान रखना होगा।&lt;br /&gt;
## धर्म व्यवस्था&lt;br /&gt;
## शिक्षा व्यवस्था&lt;br /&gt;
## शासन व्यवस्था&lt;br /&gt;
## समृद्धि व्यवस्था&lt;br /&gt;
# संगठन : समाज संगठन और समाज की व्यवस्थाएँ एक दूसरे को पूरक पोषक होती हैं। लेकिन धर्म व्यवस्था, शिक्षा व्यवस्था और शासन व्यवस्था के अभाव में संगठन निर्माण करना अत्यंत कठिन हो जाता है। वास्तव में ये दोनों अन्योन्याश्रित होते हैं। समाज संगठन की जानकारी के लिये कृपया [[Society (समाज)|यह]] लेख देखें।&lt;br /&gt;
## कुटुम्ब&lt;br /&gt;
## स्वभाव समायोजन&lt;br /&gt;
## आश्रम&lt;br /&gt;
## कौशल विधा&lt;br /&gt;
## ग्राम&lt;br /&gt;
## राष्ट्र&lt;br /&gt;
# विज्ञान और तन्त्रज्ञान: कृपया [[Bharat's Science and Technology (भारतीय विज्ञान तन्त्रज्ञान दृष्टि)|यह]] लेख देखें। &lt;br /&gt;
## विकास और उपयोग नीति&lt;br /&gt;
## सार्वत्रिकीकरण&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== परिवर्तन की योजना ==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== परिवर्तन का स्वरूप ===&lt;br /&gt;
वर्तमान स्वार्थ पर आधारित जीवन के प्रतिमान के स्थान पर आत्मीयता याने कौटुम्बिक भावना पर आधारित जीवन के प्रतिमान की प्रतिष्ठापना:&lt;br /&gt;
# सर्वे भवन्तु सुखिन:, देशानुकूल और कालानुकूल आदि के संदर्भ में दोनों प्रतिमानों को समझना&lt;br /&gt;
# प्रतिमान का परिवर्तन&lt;br /&gt;
## सामाजिक व्यवस्थाओं का पुनर्निर्माण&lt;br /&gt;
### समाज के संगठनों का परिष्कार/पुनरूत्थान या नवनिर्माण&lt;br /&gt;
### तन्त्रज्ञान  का समायोजन / तन्त्रज्ञान  नीति / जीवन की इष्ट गति : वर्तमान में तन्त्रज्ञान  की विकास की गति से जीवन को जो गति प्राप्त हुई है उस के कारण सामान्य मनुष्य घसीटा जा रहा है। पर्यावरण सन्तुलन  और सामाजिकता दाँवपर लग गए हैं। ज्ञान, विज्ञान और तन्त्रज्ञान ये तीनों बातें पात्र व्यक्ति को ही मिलनी चाहिये। बंदर के हाथ में पलिता नहीं दिया जाता। इस लिये किसी भी तन्त्रज्ञान के सार्वत्रिकीकरण से पहले उसके पर्यावरण, समाजजीवन और व्यक्ति जीवनपर होनेवाले परिणाम जानना आवश्यक है। हानिकारक तंत्रज्ञान का तो विकास भी नहीं करना चाहिये। किया तो वह केवल सुपात्र को ही अंतरित हो यह सुनिश्चित करना चाहिये। ऐसी स्थिति में जीवन की इष्ट गति की ओर बढानेवाली तन्त्रज्ञान नीति का स्वीकार करना होगा। इष्ट गति के निकषों के लिये [[Bharat's Science and Technology (भारतीय विज्ञान एवं तन्त्रज्ञान दृष्टि)|इस]] लेख में बताई कसौटी लगानी होगी। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== परिवर्तन की प्रक्रिया ===&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सामाजिक परिवर्तन भौतिक वस्तुओं के परिवर्तन जैसे सरल नहीं होते। भौतिक पदार्थों का एक निश्चित स्वभाव होता है। धर्म होता है। इसे ध्यान में रखकर भौतिक पदार्थों को ढाला जाता है। हर मानव का स्वभाव भिन्न होता है। भिन्न समय पर भी उसमें बदलाव आ सकता है। इसलिये सामाजिक परिवर्तन क्रांति से नहीं उत्क्रांति से ही किये जा सकते हैं। उत्क्रांति की गति धीमी होती है। होने वाले परिवर्तनों से किसी की हानि नहीं हो या होने वाली हानि न्यूनतम हो, परिवर्तन स्थाई हों, परिवर्तन से सबको लाभ मिले यह सब देखकर ही प्रक्रिया चलाई जाती है। सामाजिक परिवर्तनों के लिये नई पीढी से प्रारंभ करना यह सबसे अच्छा रास्ता है। लेकिन नई पीढी में व्यापक रूप से परिवर्तन के पहलुओं को स्थापित करने के लिये आवश्यक इतनी पुरानी पीढी के श्रेष्ठ जनों की संख्या आवश्यक है। ऐसे श्रेष्ठ जनों का वर्णन श्रीमद्भगवद्गीता में किया गया है:&amp;lt;blockquote&amp;gt;यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जन:।&amp;lt;/blockquote&amp;gt;&amp;lt;blockquote&amp;gt;स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते॥ (अध्याय ३ श्लोक २१)&amp;lt;/blockquote&amp;gt;इसलिये एक दृष्टि से देखा जाए तो यह प्रक्रिया समाज के प्रत्येक व्यक्तितक ले जाने की आवश्यकता नहीं होती। केवल समाज जीवन की सभी विधाओं के श्रेष्ठ लोगों के निर्माण की प्रक्रिया ही परिवर्तन की प्रक्रिया है। एक बार ये लोग निर्माण हो गये तो फिर परिवर्तन तेज याने ज्यामितीय गति से होने लगता है।&lt;br /&gt;
* धीमी लेकिन अविश्रांत : हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि हमें सामाजिक परिवर्तन करना है। समाज एक जीवंत ईकाई होता है। जीवंत ईकाई में परिवर्तन हमेशा धीमी गति से, समग्रता से और अविरत करते रहने से होते हैं। कोई भी शीघ्रता या टुकडों में होनेवाले परिवर्तन हानिकारक होते हैं।&lt;br /&gt;
* सभी क्षेत्रों में एकसाथ : समाज एक जीवंत ईकाई होने के कारण इसके सभी अंग किसी भी बात से एक साथ प्रभावित होते हैं। प्रभाव का परिमाण कम अधिक होगा लेकिन प्रभाव सभी पर होता ही है। इसलिये परिवर्तन की प्रक्रिया टुकडों में अलग अलग या एक के बाद एक ऐसी नहीं होगी। परिवर्तन की प्रक्रिया धर्म, शिक्षा, शासन, अर्थ, न्याय, समाज संगठन आदि सभी क्षेत्रों में एक साथ चलेगी। ऐसी प्रक्रिया का प्रारंभ होना बहुत कठिन होता है। लेकिन एक बार सभी क्षेत्रों में प्रारंभ हो जाता है तो फिर यह तेजी से गति प्राप्त कर लेती है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== परिवर्तन के कारक तत्व ===&lt;br /&gt;
# शिक्षा : शिक्षा का दायरा बहुत व्यापक है। शिक्षा जन्म जन्मांतर चलनेवाली प्रक्रिया होती है। इस जन्म में शिक्षा गर्भधारणा से मृत्यूपर्यंत चलती है। आयु की अवस्था के अनुसार शिक्षा का स्वरूप बदलता है। &lt;br /&gt;
## कुटुम्ब में शिक्षा : कुटुम्ब में शिक्षा का प्रारंभ गर्भधारणा से होता है। मनुष्य की ६०-७० प्रतिशत घडन तो कुटुम्ब में ही होती है। कुटुम्ब में रहकर वह कई बातें सीखता है। कौटुम्बिक भावना, कर्तव्य, सदाचार आदि की शिक्षा कुटुम्ब की ही जिम्मेदारी होती है। व्यवस्थाओं के साथ समायोजन, व्यवस्थाओं के स्वरूप आदि भी वह कुटुम्ब में ही अपने ज्येष्ठों से सीखता है। इंद्रियों के विकास की शिक्षा, व्यावसायिक कौशल भी वह कुटुम्ब में ही सीखता है। कुटुम्ब सामाजिकता की पाठशाला ही होता है। बडों का आदर, स्त्री का आदर आदि भी कुटुम्ब ही सिखाता है। &lt;br /&gt;
## कुटुम्ब की शिक्षा : उसी प्रकार से कुटुम्ब के बारे में भी वह कई बातें सीखता है। उसकी व्यक्तिगत, कौटुम्बिक और सामाजिक आदतें बचपन में ही आकार लेतीं हैं। कुटुम्ब का महत्व, समाज में कौटुम्बिक भावना का महत्व, कौटुम्बिक व्यवस्थाओं का महत्व वह कुटुम्ब में सीखता है। भिन्न भिन्न स्वभावों के लोग एक छत के नीचे आत्मीयता से कैसे रहते हैं यह वह कुटुम्ब से ही सीखता है। लगभग सभी प्रकार से कुटुंब यह समाज का लघुरूप ही होता है। कुटुंब यह सामाजिकता की पाठशाला होती है। &lt;br /&gt;
## विद्याकेन्द्र शिक्षा: विद्याकेन्द्र की शिक्षा शास्त्रीय शिक्षा होती है। कुटुम्ब में सीखे हुए सदाचार के शास्त्रीय पक्ष को समझाने के लिये होती है। कुटुंब में सीखे हुए व्यावसायिक कौशलों को पैना बनाने के लिये होती है। कुटुंब में आत्मसात की हुई श्रेष्ठ परम्पराओं को अधिक उज्वल बनाने के तरीके सीखने के लिए होती है। अध्ययन का और कौशल का शास्त्रीय तरीका सिखने के लिये, अध्ययन को तेजस्वी बनाने के लिये होती है। &lt;br /&gt;
## लोकशिक्षा : लोकशिक्षा भी समाज जीवन का एक आवश्यक पहलू है। विद्याकेन्द्र की शिक्षा के उपरान्त भी मनुष्य का मन कई बार भ्रमित हो जाता हाय, बुद्धि कुण्ठित हो जाती है। ऐसी स्थिति में लोकशिक्षा की व्यवस्था इस संभ्रम को, इस कुण्ठा को दूर करती है। &lt;br /&gt;
## परंपरा निर्माण : अपने से अधिक श्रेष्ठ विरासत निर्माण करने की निरंतरता को श्रेष्ठ परंपरा कहते हैं। श्रेष्ठ परंपराओं के निर्माण की तीव्र इच्छा और पैने प्रयास समाज को श्रेष्ठ और चिरंजीवी बनाते हैं। &lt;br /&gt;
# शासन &lt;br /&gt;
## धर्मनिष्ठता : शासक धर्मशास्त्र के जानकार हों। धर्मशास्त्र के पालनकर्ता हों। धर्मशास्त्र के नियमों का प्रजा से अनुपालन करवाने में कुशल हों। &lt;br /&gt;
## धर्म व्यवस्था के साथ समायोजन : सदैव धर्म के जानकारों से अपना मूल्यांकन करवाएँ। धर्म के जानकारों की सूचनाओं का अनुपालन करें। अधर्म होने से प्रायश्चित्त और पश्चात्ताप के लिये उद्यत रहें। &lt;br /&gt;
# धर्म नेतृत्व &lt;br /&gt;
## धर्म के मार्गदर्शक : किसी का केवल धर्मशास्त्र का विशेषज्ञ होना पर्याप्त नहीं है। नि:स्वार्थ भाव, निर्भयता भी श्रेष्ठ धर्म के मार्गदर्शकों के लक्षण हैं। &lt;br /&gt;
## धर्माचरणी : धर्म का मार्गदर्शन करनेवाले लोग अपने व्यवहार में भी धर्मयुक्त होना चाहिये। &lt;br /&gt;
## विजीगिषु स्वभाववाले : धर्म का मार्गदर्शन करनेवाले लोगों के लिये विजीगिषु स्वभाव का होना आवश्यक है। कोई भी संकट आनेपर डगमगाएँ नहीं यह धर्म के मार्गदर्शकों के लिये आवश्यक है। धर्म के जानकारों का सबसे पहला कर्तव्य है कि वे वर्तमान काल के लिए धर्मशास्त्र या स्मृति की प्रस्तुति करें। यह स्मृति जीवन के सभी पहलुओं को व्यापने वाली हो। इसकी व्यापकता को समझने की दृष्टि से एक रूपरेखा नीचे दे रहे हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== धर्मशास्त्र प्रस्तुति के लिये बिन्दु ==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== धर्म की व्याख्याएँ ===&lt;br /&gt;
धर्म की व्याप्ति / त्रिवर्ग की व्याप्ति : सर्वे भवन्तु सुखिन: लक्ष्य हेतु धर्म : संस्कृति&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== व्यापक धर्मशास्त्र के प्रस्तुति की आवश्यकता ===&lt;br /&gt;
* पूर्व धर्मशास्त्रों की व्यापकता&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
* व्यापकता की आवश्यकता&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== व्यक्तिगत धर्म / पञ्चविध (कोष) पुरुष धर्म / चतुर्विध पुरूषार्थ /स्वधर्म (वर्णधर्म) ===&lt;br /&gt;
* शरीरधर्म &lt;br /&gt;
* मन-धर्म&lt;br /&gt;
* बुद्धि-धर्म&lt;br /&gt;
* चित्त-धर्म&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== सामाजिक संबंधों में धर्म ===&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== व्यक्ति-व्यक्ति : पुरूष-पुरूष या स्त्री-स्त्री ====&lt;br /&gt;
{{div col|colwidth=20em}}	 &lt;br /&gt;
# पारिवारिक रिश्ते&lt;br /&gt;
# पड़ोसी&lt;br /&gt;
# अतिथि&lt;br /&gt;
# शत्रु/विरोधक&lt;br /&gt;
# मित्र/सहायक&lt;br /&gt;
# सहकारी&lt;br /&gt;
# अपरिचित&lt;br /&gt;
# मालिक/नौकर&lt;br /&gt;
# चरित्रहीन स्त्री/पुरूष&lt;br /&gt;
# व्यसनी&lt;br /&gt;
# जरूरतमंद&lt;br /&gt;
# समव्यवसायी&lt;br /&gt;
# भिन्न व्यवसायी&lt;br /&gt;
# याचक&lt;br /&gt;
# भिन्न भाषी&lt;br /&gt;
# विक्रेता \ क्रेता&lt;br /&gt;
# भिन्न राष्ट्रीय&lt;br /&gt;
{{div col end}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== व्यक्ति-व्यक्ति : पुरूष-स्त्री ====&lt;br /&gt;
{{div col|colwidth=20em}}	 &lt;br /&gt;
# पारिवारिक रिश्ते&lt;br /&gt;
# पड़ोसी&lt;br /&gt;
# अतिथि&lt;br /&gt;
# शत्रु/विरोधक&lt;br /&gt;
# मित्र/सहायक&lt;br /&gt;
# सहकारी&lt;br /&gt;
# अपरिचित&lt;br /&gt;
# मालिक/नौकर&lt;br /&gt;
# चरित्रहीन स्त्री/पुरूष&lt;br /&gt;
# व्यसनी&lt;br /&gt;
# जरूरतमंद&lt;br /&gt;
# समव्यवसायी&lt;br /&gt;
# भिन्न व्यवसायी&lt;br /&gt;
# याचक&lt;br /&gt;
# भिन्न भाषी&lt;br /&gt;
# विक्रेता\क्रेता&lt;br /&gt;
# भिन्न राष्ट्रीय&lt;br /&gt;
{{div col end}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== व्यक्ति-समाज ====&lt;br /&gt;
{{div col|colwidth=20em}}	 &lt;br /&gt;
# व्यक्ति-परिवार&lt;br /&gt;
# व्यति-जाति&lt;br /&gt;
# पड़ोसी&lt;br /&gt;
# सामाजिक संगठन&lt;br /&gt;
# व्यक्ति-व्यवस्था&lt;br /&gt;
# व्यक्ति-राष्ट्र&lt;br /&gt;
# व्यक्ति-विश्व समाज&lt;br /&gt;
# व्यक्ति भिन्न भाषी&lt;br /&gt;
# परप्रांतीय&lt;br /&gt;
# परदेसी&lt;br /&gt;
{{div col end}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== समाज-समाज ====&lt;br /&gt;
# अंतर्राष्ट्रीय:&lt;br /&gt;
## शत्रु&lt;br /&gt;
## मित्र&lt;br /&gt;
## तटस्थ&lt;br /&gt;
# अंतर्देशीय{{div col|colwidth=20em}}	 &lt;br /&gt;
## प्रांत-प्रांत&lt;br /&gt;
## जनपद-जनपद&lt;br /&gt;
## भाषिक समूह&lt;br /&gt;
## पंथ समूह&lt;br /&gt;
## राष्ट्रीय समूह&lt;br /&gt;
## अराष्ट्रीय समूह&lt;br /&gt;
## राष्ट्रद्रोही समूह&lt;br /&gt;
## विदेशी&lt;br /&gt;
## समव्यवासायी&lt;br /&gt;
## जाति-जाति&lt;br /&gt;
## परिवार परिवार&lt;br /&gt;
{{div col end}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== सृष्टिगत सम्बन्धों में धर्म ===&lt;br /&gt;
# मनुष्य-अन्य जीव:&lt;br /&gt;
## मनुष्य-पालतू प्राणी:&lt;br /&gt;
### शाकाहारी&lt;br /&gt;
### मांसाहारी&lt;br /&gt;
## मनुष्य अन्य प्राणी:&lt;br /&gt;
### थलचर:&lt;br /&gt;
#### शाकाहारी&lt;br /&gt;
#### मांसाहारी&lt;br /&gt;
### जलचर&lt;br /&gt;
### नभचर&lt;br /&gt;
## मनुष्य-वनस्पति:&lt;br /&gt;
### जमीन के नीचे&lt;br /&gt;
### जमीन के ऊपर&lt;br /&gt;
### वनस्पति/औषधी&lt;br /&gt;
### खानेयोग्य / अन्न&lt;br /&gt;
### अखाद्य / जहरीली&lt;br /&gt;
### नशीली&lt;br /&gt;
## मनुष्य-कृमि / कीटक / सूक्ष्म जीव&lt;br /&gt;
### सहायक&lt;br /&gt;
### हानिकारक&lt;br /&gt;
## मनुष्य-जड़ प्रकृति / पंचमहाभूत&lt;br /&gt;
### अनवीकरणीय/खनिज&lt;br /&gt;
#### ठोस&lt;br /&gt;
#### द्रव&lt;br /&gt;
#### वायु (इंधन)&lt;br /&gt;
### नवीकरणीय&lt;br /&gt;
#### वायु/हवा&lt;br /&gt;
#### जल&lt;br /&gt;
#### सूर्यप्रकाश&lt;br /&gt;
#### लकड़ी&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== आपद्धर्म ===&lt;br /&gt;
# प्राकृतिक आपदा&lt;br /&gt;
# मानव निर्मित आपदा (लगभग उपर्युक्त सभी विषयों में)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== परिवर्तन के पुरोधा ==&lt;br /&gt;
श्रेष्ठ जन ही परिवर्तन के पुरोधा होंगे। इनका प्रमाण समाज में मुश्किल से ५-७ प्रतिशत ही पर्याप्त होता है। ऐसे श्रेष्ठ जनों में निम्न वर्ग के लोग आते हैं:&lt;br /&gt;
# शिक्षक : शिक्षक ज्ञानी, त्यागी, कुशल, समाज हित के लिए समर्पित, धर्म का जानकार, समाज को घडने की सामर्थ्य रखनेवाला होता है। नई पीढी जो परिवर्तन का अधिक सहजता से स्वीकार कर सकती है उसको गढ़ना शिक्षक का काम होता है। इसलिये परिवर्तन की प्रक्रिया का मुख्य पुरोधा शिक्षक ही होता है।&lt;br /&gt;
# श्रेष्ठ जन :यहाँ श्रेष्ठ जनों से मतलब भिन्न भिन्न सामाजिक गतिविधियों में जो अग्रणी लोग हैं उनसे है।&lt;br /&gt;
# सांप्रदायिक संगठनों के प्रमुख : आजकल समाज का एक बहुत बडा वर्ग जिसमें शिक्षित वर्ग भी है, भिन्न भिन्न संप्रदायों से जुडा है। उन संप्रदायों के प्रमुख भी इस परिवर्तन की प्रक्रिया का एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण हिस्सा बनने की शक्ति रखते हैं।&lt;br /&gt;
# लोकशिक्षा के माध्यम : कीर्तनकार, कथाकार, प्रवचनकार, नाटक मंडलि, पुरोहित या उपाध्याय, साधू, बैरागी, सिंहस्थ या कुंभ जैसे मेले, यात्राएँ आदि लोकशिक्षा के माध्यम हुआ करते थे। वर्तमान में ये सब कमजोर और दिशाहीन हो गए हैं। एक ओर इनमें से जिनको पुनर्जीवित कर सकते हैं उन्हें करना। नए आयाम भी जोडे जा सकते हैं। जैसे अभी लगभग देढ दशक पूर्व महाराष्ट्र में प्रारंभ हुई नव-वर्ष स्वागत यात्राएँ आदि।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== अंतर्निहित सुधार व्यवस्था ==&lt;br /&gt;
काल के प्रवाह में समाज में हो रहे परिवर्तन और मनुष्य की स्खलनशीलता के कारण बढनेवाला अधर्माचरण ये दो बातें ऐसीं हैं जो किसी भी श्रेष्ठतम समाज को भी नष्ट कर देतीं हैं। इस दृष्टि से जागरूक शिक्षक और धर्म के मार्गदर्शक साथ में मिलकर समाज की अंतर्निहित सुधार व्यवस्था बनाते हैं। अपनी संवेदनशीलता और समाज के निरंतर बारीकी से हो रहे अध्ययन के कारण इन्हें संकटों का पूर्वानुमान हो जाता है। अपने निरीक्षणों के आधार पर अपने लोकसंग्रही स्वभाव से ये लोगों को भी संकटों से ऊपर उठने के लिये तैयार करते हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== परिवर्तन की नीति ==&lt;br /&gt;
प्रारंभ में विरोध को आमंत्रण नहीं देना। संघर्ष में शक्ति का अपव्यय नहीं करना। जो आज कर सकते हैं उसे करते जाना। जो कल करने की आवश्यकता है उस के लिये परिस्थिति निर्माण करना। परिस्थिति के निर्माण होते ही आगे बढना।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== परिवर्तन में अवरोध और उनका निराकरण ==&lt;br /&gt;
शासनाधिष्ठित समाज में स्वार्थ के आधार पर परिवर्तन सरल और तेज गति से होता है। हिटलर ने १५-२० वर्षों में ही जर्मनी को एक समर्थ राष्ट्र के रूप में खड़ा कर दिया था। लेकिन धर्म पर आधारित जीवन के प्रतिमान में परिवर्तन की गति धीमी और मार्ग कठिन होता है। स्थाई परिवर्तन और वह भी कौटुम्बिक भावना के आधार पर, तो धीरे धीरे ही होता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== अंतर्देशीय ===&lt;br /&gt;
# मानवीय जड़ता : परिवर्तन का आनंद से स्वागत करनेवाले लोग समाज में अल्पसंख्य ही होते हैं। सामान्यत: युवा वर्ग ही परिवर्तन के लिए तैयार होता है। इसलिए युवा वर्ग को इस परिवर्तन की प्रक्रिया में सहभागी बनाना होगा। परिवर्तन की प्रक्रिया में युवाओं को सम्मिलित करते जाने से दो तीन पीढ़ियों में परिवर्तन का चक्र गतिमान हो जाएगा।&lt;br /&gt;
# विपरीत शिक्षा : जैसे जैसे भारतीय शिक्षा का विस्तार समाज में होगा वर्तमान की विपरीत शिक्षा का अपने आप ही क्रमश: लोप होगा।&lt;br /&gt;
# मजहबी मानसिकता : भारतीय याने धर्म की शिक्षा के उदय और विस्तार के साथ ही मजहबी शिक्षा और उसका प्रभाव भी शनै: शनै: घटता जाएगा। मजहबों की वास्तविकता को भी उजागर करना आवश्यक है।&lt;br /&gt;
# धर्म के ठेकेदार : जैसे जैसे धर्म के जानकार और धर्म के अनुसार आचरण करनेवाले लोग समाज में दिखने लगेंगे, धर्म के तथाकथित ठेकेदारों का प्रभाव कम होता जाएगा।&lt;br /&gt;
# शासन तंत्र : इस परिवर्तन की प्रक्रिया में धर्म के जानकारों के बाद शासन की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण होगी। धर्माचरणी लोगों को समर्थन, सहायता और संरक्षण देने का काम शासन को करना होगा। इस के लिए शासक भी धर्म का जानकार और धर्मनिष्ठ हो, यह भी आवश्यक है। धर्म के जानकारों को यह सुनिश्चित करना होगा की शासक धर्माचरण करनेवाले और धर्म के जानकर हों।&lt;br /&gt;
# जीवन का अभारतीय प्रतिमान : जीवन के सभी क्षेत्रों में एकसाथ जीवन के प्रतिमान के परिवर्तन की प्रक्रिया को चलाना यह धर्म के जानकारों की जिम्मेदारी होगी। शिक्षा की भूमिका इसमें सबसे महत्वपूर्ण होगी। शिक्षा के माध्यम से समूचे जीवन के भारतीय प्रतिमान की रुपरेखा और प्रक्रिया को समाजव्यापी बनाना होगा। धर्म-शरण शासन इसमें सहायता करेगा।&lt;br /&gt;
# तन्त्रज्ञान  समायोजन : तन्त्रज्ञान के क्षेत्र में भारत के सामने दोहरी चुनौती होगी। एक ओर तो विश्व में जो तन्त्रज्ञान के विकास की होड़ लगी है उसमें अपनी विशेषताओं के साथ अग्रणी रहना। इस दृष्टि से विकास हेतु कुछ तन्त्रज्ञान निम्न हो सकते हैं:&lt;br /&gt;
## शून्य प्रदुषण रासायनिक उद्योग।&lt;br /&gt;
## सस्ती सौर उर्जा।&lt;br /&gt;
## प्रकृति में सहजता से घुलनशील प्लैस्टिक का निर्माण।&lt;br /&gt;
## औरों द्वारा प्रक्षेपित शस्त्रों/अणु-शस्त्रों का शमन करने का तंत्रज्ञान।&lt;br /&gt;
## दूसरी ओर वैकल्पिक विकेंद्रीकरणपर आधारित तन्त्रज्ञान का विकास कर उसे विश्व में प्रतिष्ठित करना। इस प्रकार के तन्त्रज्ञान में निम्न प्रकार के तन्त्रज्ञान होंगे।&lt;br /&gt;
## कौटुम्बिक उद्योगों के लिये, स्थानिक संसाधनों के उपयोग के लिए तन्त्रज्ञान&lt;br /&gt;
## भिन्न भिन्न कार्यों के लिये पशु-उर्जा के अधिकाधिक उपयोग के लिये तंत्रज्ञान&lt;br /&gt;
## नविकरणीय प्राकृतिक संसाधनों से विविध पदार्थों के निर्माण से आवश्यकताओं की पूर्ति तथा संसाधनों के पुनर्भरण के लिये सरल तन्त्रज्ञान का विकास  &lt;br /&gt;
## मानव की प्राकृतिक क्षमताओं का विकास करनेवाली प्रक्रियाओं का अनुसंधान। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== अंतर्राष्ट्रीय ===&lt;br /&gt;
# मजहबी विस्तारवादी मानसिकता : वर्तमान में यह मुख्यत: ३ प्रकार की है। ईसाई, मुस्लिम और वामपंथी। यह तीनों ही विचारधाराएँ अधूरी हैं, एकांगी हैं। यह तो इन के सम्मुख ‘सर्वे भवन्तु सुखिन:’ को लेकर कोई चुनौती खड़ी नहीं होने से इन्हें विश्व में विस्तार का अवसर मिला है। जैसे ही ‘सर्वे भवन्तु सुखिन:’ का विचार लेकर भारत एक वैश्विक शक्ति के रूप में खड़ा होगा इनके पैरों तले की जमीन खिसकने लगेगी।&lt;br /&gt;
# आसुरी महत्वाकांक्षा : ऊपर जो बताया गया है वह, आसुरी महत्वाकांक्षा रखनेवाली वैश्विक शक्तियों के लिये भी लागू है। आसुरी महत्वाकांक्षाओं को परास्त करने की परंपरा भारत में युगों से रही है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== परिवर्तन के लिये समयबध्द करणीय कार्य ==&lt;br /&gt;
समूचे जीवन के प्रतिमान का परिवर्तन यह एक बहुत बृहद् और जटिल कार्य है। इस के लिये इसे सामाजिक अभियान का रूप देना होगा। समविचारी लोगों को संगठित होकर सहमति से और चरणबध्द पद्दति से प्रक्रिया को आगे बढाना होगा। बड़े पैमाने पर जीवन के हर क्षेत्र में जीवन के भारतीय प्रतिमान की समझ रखने वाले और कृतिशील लोग याने आचार्य निर्माण करने होंगे। परिवर्तन के चरण एक के बाद एक और एक के साथ सभी इस पद्दति से चलेंगे। जैसे दूसरे चरण के काल में ५० प्रतिशत शक्ति और संसाधन दूसरे चरण के निर्धारित विषय पर लगेंगे। और १२.५-१२.५ प्रतिशत शक्ति और संसाधन चरण १, ३, ४ और ५ में प्रत्येकपर लगेंगे। &lt;br /&gt;
# समविचारी लोगों का ध्रुवीकरण : जिन्हें प्रतिमान के परिवर्तन की आस है और समझ भी है ऐसे समविचारी, सहचित्त लोगों का ध्रुवीकरण करना होगा। उनमें एक व्यापक सहमति निर्माण करनी होगी। अपने अपने कार्यक्षेत्र में क्या करना है इसका स्पष्टीकरण करना होगा।&lt;br /&gt;
# अभियान के चरण : अभियान को चरणबध्द पद्दति से चलाना होगा। १२ वर्षों के ये पाँच चरण होंगे। ऐसी यह ६० वर्ष की योजना होगी। यह प्रक्रिया तीन पीढी तक चलेगी। तीसरी पीढी में परिवर्तन के फल देखने को मिलेंगे। लेकिन तब तक निष्ठा से और धैर्य से अभियान को चलाना होगा। निरंतर मूल्यांकन करना होगा। राह भटक नहीं जाए इसके लिये चौकन्ना रहना होगा।&lt;br /&gt;
## अध्ययन और अनुसंधान : जीवन का दायरा बहुत व्यापक होता है। अनगिनत विषय इसमें आते हैं। इसलिये प्रतिमान के बदलाव से पहले हमें दोनों प्रतिमानों के विषय में और विशेषत: जीवन के भारतीय प्रतिमान के विषय में बहुत गहराई से अध्ययन करना होगा। मनुष्य की इच्छाओं का दायरा, उनकी पूर्ति के लिये वह क्या क्या कर सकता है आदि का दायरा अति विशाल है। इन दोनों को धर्म के नियंत्रण में ऐसे रखा जाता है इसका भी अध्ययन अनिवार्य है। मनुष्य के व्यक्तित्व को ठीक से समझना, उसके शरीर, मन, बुध्दि, चित्त, अहंकार आदि बातों को समझना, कर्मसिध्दांत को समझना, जन्म जन्मांतर चलने वाली शिक्षा की प्रक्रिया को समझना विविध विषयों के अंगांगी संबंधों को समझना, प्रकृति के रहस्यों को समझना आदि अनेकों ऐसी बातें हैं जिनका अध्ययन हमें करना होगा। इनमें से कई विषयों के संबंध में हमारे पूर्वजों ने विपुल साहित्य निर्माण किया था। उसमें से कितने ही साहित्य को जाने अंजाने में प्रक्षेपित किया गया है। इस प्रक्षिप्त हिस्से को समझ कर अलग निकालना होगा। शुद्ध भारतीय तत्वों पर आधारित ज्ञान को प्राप्त करना होगा। अंग्रेजों ने भारतीय साहित्य, इतिहास के साथ किये खिलवाड, भारतीय समाज में झगडे पैदा करने के लिये निर्मित साहित्य को अलग हटाकर शुद्ध भारतीय याने एकात्म भाव की या कौटुम्बिक भाव की जितनी भी प्रस्तुतियाँ हैं उनका अध्ययन करना होगा। मान्यताओं, व्यवहार सूत्रों, संगठन निर्माण और व्यवस्था निर्माण की प्रक्रिया को समझना होगा।&lt;br /&gt;
## लोकमत परिष्कार : अध्ययन से जो ज्ञान उभरकर सामने आएगा उसे लोगों तक ले जाना होगा। लोगों का प्रबोधन करना होगा। उन्हें फिर से समग्रता से और एकात्मता से सोचने और व्यवहार करने का तरीका बताना होगा। उन्हें उनकी सामाजिक जिम्मेदारी का समाजधर्म का अहसास करवाना होगा। वर्तमान की परिस्थितियों से सामान्यत: कोई भी खुश नहीं है। लेकिन जीवन का भारतीय प्रतिमान ही  उनकी कल्पना के अच्छे दिनों का वास्तव है यह सब के मन में स्थापित करना होगा।&lt;br /&gt;
## संयुक्त कुटुम्ब : कुटुम्ब ही समाजधर्म सीखने की पाठशाला होता है। संयुक्त कुटुम्ब तो वास्तव में समाज का लघुरूप ही होता है। सामाजिक समस्याओं में से लगभग ७० प्रतिशत समस्याओं को तो केवल अच्छा संयुक्त कुटुम्ब ही निर्मूल कर देता है। समाज जीवन के लिये श्रेष्ठ लोगों को जन्म देने का काम, श्रेष्ठ संस्कार देने का काम, अच्छी आदतें डालने काम आजकल की फॅमिली पद्दति नहीं कर सकती। जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में जो तेजस्वी नेतृत्व का अभाव निर्माण हो गया है उसे दूर करना यह भारतीय मान्यताओं के अनुसार चलाए जाने वाले संयुक्त परिवारों में ही हो सकता है। इसलिये समाज का नेतृत्व करने वाले श्रेष्ठ बालकों को जन्म देने के प्रयास तीसरे चरण में होंगे।&lt;br /&gt;
## शिक्षक / धर्मज्ञ और शासक निर्माण : समाज परिवर्तन में शिक्षक की और शासक की ऐसे दोनों की भुमिका अत्यंत महत्वपूर्ण होती है। संयुक्त परिवारों में जन्म लिये बच्चों में से अब श्रेष्ठ धर्म के मार्गदर्शक, शिक्षक और शासक निर्माण करने की स्थिति होगी। ऐसे लोगों को समर्थन और सहायता देनेवाले कुटुम्ब और दूसरे चरण में निर्माण किये समाज के परिष्कृत विचारोंवाले सदस्य अब कुछ मात्रा में उपलब्ध होंगे।&lt;br /&gt;
## संगठन और व्यवस्थाओं की प्रतिष्ठापना : श्रेष्ठ धर्म के अधिष्ठाता / मार्गदर्शक, सामर्थ्यवान शिक्षक और कुशल शासक अब प्रत्यक्ष संगठन का सशक्तिकरण और व्यवस्थाओं का निर्माण करेंगे।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==References==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;references /&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अन्य स्रोत:&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[Category:Bhartiya Jeevan Pratiman (भारतीय जीवन प्रतिमान)]]&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Dilipkelkar</name></author>
	</entry>
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		<id>https://dharmawiki.org/index.php?title=Planning_For_Change_(%E0%A4%AA%E0%A4%B0%E0%A4%BF%E0%A4%B5%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%A4%E0%A4%A8_%E0%A4%95%E0%A5%80_%E0%A4%AF%E0%A5%8B%E0%A4%9C%E0%A4%A8%E0%A4%BE)&amp;diff=119359</id>
		<title>Planning For Change (परिवर्तन की योजना)</title>
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		<updated>2019-06-02T14:35:28Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Dilipkelkar: /* समाज-समाज */&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{One source|date=January 2019}}&lt;br /&gt;
[[Template:Cleanup reorganize Dharmawiki Page]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
परिवर्तन की योजना को समझने के लिए हमें पहले निम्न बातें फिर से स्मरण करनी होंगी ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जीवन के भारतीय प्रतिमान की जानकारी के लिए - &lt;br /&gt;
# जीवनदृष्टि/व्यवहार : भारतीय जीवनदृष्टि और जीवनशैली के विषय में जानकारी के लिये कृपया [[Elements of Hindu Jeevan Drishti and Life Style (भारतीय/हिन्दू जीवनदृष्टि और जीवन शैली के सूत्र)|यह]] लेख देखें।&lt;br /&gt;
# व्यवस्था समूह का ढाँचा जीवनदृष्टि से सुसंगत होना चाहिए। कृपया व्यवस्था समूह के ढाँचे के लिये [[Jeevan Ka Pratiman (जीवन का प्रतिमान)|यह]] लेख और जानकारी के लिए [[Interrelationship in Srishti (सृष्टि में परस्पर सम्बद्धता)|यह]] लेख देखें।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== समस्या मूलों के निराकरण की नीति ==&lt;br /&gt;
समस्या मूल नष्ट करने से तात्पर्य समस्या मूलों पर आघात से नहीं है। समस्याएँ निर्माण ही नहीं हों ऐसी परिस्थितियों, ऐसे समाज संगठनों और ऐसी व्यवस्थाओं के निर्माण से है। निराकरण की प्रक्रिया के ३ चरण होंगे। समस्याओं को और परिवर्तन के स्वरूप को समझना, निराकरण की नीति तय करना और निराकरण का क्रियान्वयन करना। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== परिवर्तन के स्वरूप को समझना ==&lt;br /&gt;
समस्या का मूल जीवन के प्रतिमान के परिवर्तन में है। प्रतिमान का आधार समाज की जीवनदृष्टि होती है। व्यवहार, संगठन और व्यवस्थाएँ तो जीवनदृष्टि के आधार पर ही तय होते हैं। इसलिये परिवर्तन की प्रक्रिया में जीवनदृष्टि के परिवर्तन की प्रक्रिया को प्राथमिकता देनी होगी। व्यवहार में सुसंगतता आए इसलिये करणीय अकरणीय विवेक को सार्वत्रिक करना होगा। दूसरे क्रमांक पर संगठन और व्यवस्थाओं में परिवर्तन की प्रक्रिया चलेगी। व्यवस्था परिवर्तन की इस प्रक्रिया में समग्रता और एकात्मता के संदर्भ में व्यवस्था विशेष का आधार बनाने के लिये विषय की सैध्दांतिक प्रस्तुति करनी होगी। जैसे शासन व्यवस्था में यदि उचित परिवर्तन करना है तो पहले राजशास्त्र की सैध्दांतिक प्रस्तुति करना आवश्यक है। समृद्धि व्यवस्था में परिवर्तन करने के लिये समृद्धिशास्त्र की सैध्दांतिक प्रस्तुति करनी होगी। इन सैध्दांतिक प्रस्तुतियों को प्रयोग सिध्द करना होगा। प्रयोगों के आधार पर इन प्रस्तुतियों में उचित परिवर्तन करते हुए आगे बढना होगा। यह काम प्राथमिकता से धर्म के जानकारों का है। दूसरे क्रमांक की जिम्मेदारी शिक्षकों की है। शिक्षक वर्ग ही धर्म को सार्वत्रिक करता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== निराकरण की नीति ==&lt;br /&gt;
समस्याएँ इतनी अधिक और पेचिदा हैं कि इनका निराकरण अब संभव नहीं है, ऐसा कई विद्वान मानते हैं। हमने जो करणीय और अकरणीय विवेक को समझा है उसके अनुसार कोई भी बात असंभव नहीं होती। ऊपरी तौर पर असंभव लगने पर भी उसे संभव चरणों में बाँटकर संपन्न किया जा सकता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इस के लिये नीति के तौर पर हमारा व्यवहार निम्न प्रकार का होना चाहिए:&lt;br /&gt;
* सबसे पहले तो यह हमेशा ध्यान में रखना कि यह पूरे समाज जीवन के प्रतिमान के परिवर्तन का विषय है। इसे परिवर्तन के लिये कई पीढियों का समय लग सकता है। भारत वर्ष के दीर्घ इतिहास में समाज ने कई बार उत्थान और पतन के दौर अनुभव किये हैं। बार बार भारतीय समाज ने उत्थान किया है।&lt;br /&gt;
* परिवर्तन की प्रक्रिया को संभाव्य चरणों में बाँटना।&lt;br /&gt;
* उसमें आज जो हो सकता है उसे कर डालना।&lt;br /&gt;
* आज जिसे करना कठिन लगता है उसके लिये परिस्थितियाँ बनाते जाना। परिस्थितियाँ बनते ही उसे करना।&lt;br /&gt;
* प्रारंभ में जबतक परिवर्तन की प्रक्रिया ने गति नहीं पकडी है, यथासंभव कोई विरोध मोल नहीं लेना।&lt;br /&gt;
* इसी प्रकार से एक एक चरण को संभव बनाते हुए आगे बढ़ाते जाना।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== समस्या मूलों का निराकरण ==&lt;br /&gt;
वास्तव में समस्या मूलों को नष्ट करना यह शब्दप्रयोग ठीक नहीं है। उचित प्रतिमान की प्रतिष्ठापना के साथ ही गलत प्रतिमान का अंत अपने आप होता है। जो सर्वहितकारी है, उचित है, श्रेष्ठ है, उसकी प्रतिष्ठापना ही परिवर्तन की प्रक्रिया का स्वरूप होगा। स्वाभाविक जडता के कारण कुछ कठिनाईयाँ तो आएँगी। लेकिन गलत प्रतिमान को नष्ट करने के लिये अलग से शक्ति लगाने की आवश्यकता नहीं है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== समस्या मूल नष्ट करने हेतु धर्म के जानकारों के मार्गदर्शन में शिक्षा की व्याप्ति ==&lt;br /&gt;
# जीवनदृष्टि की शिक्षा : जीवनदृष्टि की शिक्षा मुख्यत: कामनाओं और कामनाओं की पूर्ति के प्रयास, धन, साधन और संसाधनों को धर्म के दायरे में रखने की शिक्षा ही है। पुरूषार्थ चतुष्टय की या त्रिवर्ग की शिक्षा ही है।&lt;br /&gt;
# व्यवस्थाएँ : जीवनदृष्टि के अनुसार व्यवहार हो सके इस हेतु से ही व्यवस्थाओं का निर्माण किया जाता है। व्यवस्थाओं के निर्माण में और उनके क्रियान्वयन में भी जीवनदृष्टि ओतप्रोत रहे इसका ध्यान रखना होगा।&lt;br /&gt;
## धर्म व्यवस्था&lt;br /&gt;
## शिक्षा व्यवस्था&lt;br /&gt;
## शासन व्यवस्था&lt;br /&gt;
## समृद्धि व्यवस्था&lt;br /&gt;
# संगठन : समाज संगठन और समाज की व्यवस्थाएँ एक दूसरे को पूरक पोषक होती हैं। लेकिन धर्म व्यवस्था, शिक्षा व्यवस्था और शासन व्यवस्था के अभाव में संगठन निर्माण करना अत्यंत कठिन हो जाता है। वास्तव में ये दोनों अन्योन्याश्रित होते हैं। समाज संगठन की जानकारी के लिये कृपया [[Society (समाज)|यह]] लेख देखें।&lt;br /&gt;
## कुटुम्ब&lt;br /&gt;
## स्वभाव समायोजन&lt;br /&gt;
## आश्रम&lt;br /&gt;
## कौशल विधा&lt;br /&gt;
## ग्राम&lt;br /&gt;
## राष्ट्र&lt;br /&gt;
# विज्ञान और तन्त्रज्ञान: कृपया [[Bharat's Science and Technology (भारतीय विज्ञान तन्त्रज्ञान दृष्टि)|यह]] लेख देखें। &lt;br /&gt;
## विकास और उपयोग नीति&lt;br /&gt;
## सार्वत्रिकीकरण&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== परिवर्तन की योजना ==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== परिवर्तन का स्वरूप ===&lt;br /&gt;
वर्तमान स्वार्थ पर आधारित जीवन के प्रतिमान के स्थान पर आत्मीयता याने कौटुम्बिक भावना पर आधारित जीवन के प्रतिमान की प्रतिष्ठापना:&lt;br /&gt;
# सर्वे भवन्तु सुखिन:, देशानुकूल और कालानुकूल आदि के संदर्भ में दोनों प्रतिमानों को समझना&lt;br /&gt;
# प्रतिमान का परिवर्तन&lt;br /&gt;
## सामाजिक व्यवस्थाओं का पुनर्निर्माण&lt;br /&gt;
### समाज के संगठनों का परिष्कार/पुनरूत्थान या नवनिर्माण&lt;br /&gt;
### तन्त्रज्ञान  का समायोजन / तन्त्रज्ञान  नीति / जीवन की इष्ट गति : वर्तमान में तन्त्रज्ञान  की विकास की गति से जीवन को जो गति प्राप्त हुई है उस के कारण सामान्य मनुष्य घसीटा जा रहा है। पर्यावरण सन्तुलन  और सामाजिकता दाँवपर लग गए हैं। ज्ञान, विज्ञान और तन्त्रज्ञान ये तीनों बातें पात्र व्यक्ति को ही मिलनी चाहिये। बंदर के हाथ में पलिता नहीं दिया जाता। इस लिये किसी भी तन्त्रज्ञान के सार्वत्रिकीकरण से पहले उसके पर्यावरण, समाजजीवन और व्यक्ति जीवनपर होनेवाले परिणाम जानना आवश्यक है। हानिकारक तंत्रज्ञान का तो विकास भी नहीं करना चाहिये। किया तो वह केवल सुपात्र को ही अंतरित हो यह सुनिश्चित करना चाहिये। ऐसी स्थिति में जीवन की इष्ट गति की ओर बढानेवाली तन्त्रज्ञान नीति का स्वीकार करना होगा। इष्ट गति के निकषों के लिये [[Bharat's Science and Technology (भारतीय विज्ञान एवं तन्त्रज्ञान दृष्टि)|इस]] लेख में बताई कसौटी लगानी होगी। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== परिवर्तन की प्रक्रिया ===&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सामाजिक परिवर्तन भौतिक वस्तुओं के परिवर्तन जैसे सरल नहीं होते। भौतिक पदार्थों का एक निश्चित स्वभाव होता है। धर्म होता है। इसे ध्यान में रखकर भौतिक पदार्थों को ढाला जाता है। हर मानव का स्वभाव भिन्न होता है। भिन्न समय पर भी उसमें बदलाव आ सकता है। इसलिये सामाजिक परिवर्तन क्रांति से नहीं उत्क्रांति से ही किये जा सकते हैं। उत्क्रांति की गति धीमी होती है। होने वाले परिवर्तनों से किसी की हानि नहीं हो या होने वाली हानि न्यूनतम हो, परिवर्तन स्थाई हों, परिवर्तन से सबको लाभ मिले यह सब देखकर ही प्रक्रिया चलाई जाती है। सामाजिक परिवर्तनों के लिये नई पीढी से प्रारंभ करना यह सबसे अच्छा रास्ता है। लेकिन नई पीढी में व्यापक रूप से परिवर्तन के पहलुओं को स्थापित करने के लिये आवश्यक इतनी पुरानी पीढी के श्रेष्ठ जनों की संख्या आवश्यक है। ऐसे श्रेष्ठ जनों का वर्णन श्रीमद्भगवद्गीता में किया गया है:&amp;lt;blockquote&amp;gt;यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जन:।&amp;lt;/blockquote&amp;gt;&amp;lt;blockquote&amp;gt;स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते॥ (अध्याय ३ श्लोक २१)&amp;lt;/blockquote&amp;gt;इसलिये एक दृष्टि से देखा जाए तो यह प्रक्रिया समाज के प्रत्येक व्यक्तितक ले जाने की आवश्यकता नहीं होती। केवल समाज जीवन की सभी विधाओं के श्रेष्ठ लोगों के निर्माण की प्रक्रिया ही परिवर्तन की प्रक्रिया है। एक बार ये लोग निर्माण हो गये तो फिर परिवर्तन तेज याने ज्यामितीय गति से होने लगता है।&lt;br /&gt;
* धीमी लेकिन अविश्रांत : हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि हमें सामाजिक परिवर्तन करना है। समाज एक जीवंत ईकाई होता है। जीवंत ईकाई में परिवर्तन हमेशा धीमी गति से, समग्रता से और अविरत करते रहने से होते हैं। कोई भी शीघ्रता या टुकडों में होनेवाले परिवर्तन हानिकारक होते हैं।&lt;br /&gt;
* सभी क्षेत्रों में एकसाथ : समाज एक जीवंत ईकाई होने के कारण इसके सभी अंग किसी भी बात से एक साथ प्रभावित होते हैं। प्रभाव का परिमाण कम अधिक होगा लेकिन प्रभाव सभी पर होता ही है। इसलिये परिवर्तन की प्रक्रिया टुकडों में अलग अलग या एक के बाद एक ऐसी नहीं होगी। परिवर्तन की प्रक्रिया धर्म, शिक्षा, शासन, अर्थ, न्याय, समाज संगठन आदि सभी क्षेत्रों में एक साथ चलेगी। ऐसी प्रक्रिया का प्रारंभ होना बहुत कठिन होता है। लेकिन एक बार सभी क्षेत्रों में प्रारंभ हो जाता है तो फिर यह तेजी से गति प्राप्त कर लेती है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== परिवर्तन के कारक तत्व ===&lt;br /&gt;
# शिक्षा : शिक्षा का दायरा बहुत व्यापक है। शिक्षा जन्म जन्मांतर चलनेवाली प्रक्रिया होती है। इस जन्म में शिक्षा गर्भधारणा से मृत्यूपर्यंत चलती है। आयु की अवस्था के अनुसार शिक्षा का स्वरूप बदलता है। &lt;br /&gt;
## कुटुम्ब में शिक्षा : कुटुम्ब में शिक्षा का प्रारंभ गर्भधारणा से होता है। मनुष्य की ६०-७० प्रतिशत घडन तो कुटुम्ब में ही होती है। कुटुम्ब में रहकर वह कई बातें सीखता है। कौटुम्बिक भावना, कर्तव्य, सदाचार आदि की शिक्षा कुटुम्ब की ही जिम्मेदारी होती है। व्यवस्थाओं के साथ समायोजन, व्यवस्थाओं के स्वरूप आदि भी वह कुटुम्ब में ही अपने ज्येष्ठों से सीखता है। इंद्रियों के विकास की शिक्षा, व्यावसायिक कौशल भी वह कुटुम्ब में ही सीखता है। कुटुम्ब सामाजिकता की पाठशाला ही होता है। बडों का आदर, स्त्री का आदर आदि भी कुटुम्ब ही सिखाता है। &lt;br /&gt;
## कुटुम्ब की शिक्षा : उसी प्रकार से कुटुम्ब के बारे में भी वह कई बातें सीखता है। उसकी व्यक्तिगत, कौटुम्बिक और सामाजिक आदतें बचपन में ही आकार लेतीं हैं। कुटुम्ब का महत्व, समाज में कौटुम्बिक भावना का महत्व, कौटुम्बिक व्यवस्थाओं का महत्व वह कुटुम्ब में सीखता है। भिन्न भिन्न स्वभावों के लोग एक छत के नीचे आत्मीयता से कैसे रहते हैं यह वह कुटुम्ब से ही सीखता है। लगभग सभी प्रकार से कुटुंब यह समाज का लघुरूप ही होता है। कुटुंब यह सामाजिकता की पाठशाला होती है। &lt;br /&gt;
## विद्याकेन्द्र शिक्षा: विद्याकेन्द्र की शिक्षा शास्त्रीय शिक्षा होती है। कुटुम्ब में सीखे हुए सदाचार के शास्त्रीय पक्ष को समझाने के लिये होती है। कुटुंब में सीखे हुए व्यावसायिक कौशलों को पैना बनाने के लिये होती है। कुटुंब में आत्मसात की हुई श्रेष्ठ परम्पराओं को अधिक उज्वल बनाने के तरीके सीखने के लिए होती है। अध्ययन का और कौशल का शास्त्रीय तरीका सिखने के लिये, अध्ययन को तेजस्वी बनाने के लिये होती है। &lt;br /&gt;
## लोकशिक्षा : लोकशिक्षा भी समाज जीवन का एक आवश्यक पहलू है। विद्याकेन्द्र की शिक्षा के उपरान्त भी मनुष्य का मन कई बार भ्रमित हो जाता हाय, बुद्धि कुण्ठित हो जाती है। ऐसी स्थिति में लोकशिक्षा की व्यवस्था इस संभ्रम को, इस कुण्ठा को दूर करती है। &lt;br /&gt;
## परंपरा निर्माण : अपने से अधिक श्रेष्ठ विरासत निर्माण करने की निरंतरता को श्रेष्ठ परंपरा कहते हैं। श्रेष्ठ परंपराओं के निर्माण की तीव्र इच्छा और पैने प्रयास समाज को श्रेष्ठ और चिरंजीवी बनाते हैं। &lt;br /&gt;
# शासन &lt;br /&gt;
## धर्मनिष्ठता : शासक धर्मशास्त्र के जानकार हों। धर्मशास्त्र के पालनकर्ता हों। धर्मशास्त्र के नियमों का प्रजा से अनुपालन करवाने में कुशल हों। &lt;br /&gt;
## धर्म व्यवस्था के साथ समायोजन : सदैव धर्म के जानकारों से अपना मूल्यांकन करवाएँ। धर्म के जानकारों की सूचनाओं का अनुपालन करें। अधर्म होने से प्रायश्चित्त और पश्चात्ताप के लिये उद्यत रहें। &lt;br /&gt;
# धर्म नेतृत्व &lt;br /&gt;
## धर्म के मार्गदर्शक : किसी का केवल धर्मशास्त्र का विशेषज्ञ होना पर्याप्त नहीं है। नि:स्वार्थ भाव, निर्भयता भी श्रेष्ठ धर्म के मार्गदर्शकों के लक्षण हैं। &lt;br /&gt;
## धर्माचरणी : धर्म का मार्गदर्शन करनेवाले लोग अपने व्यवहार में भी धर्मयुक्त होना चाहिये। &lt;br /&gt;
## विजीगिषु स्वभाववाले : धर्म का मार्गदर्शन करनेवाले लोगों के लिये विजीगिषु स्वभाव का होना आवश्यक है। कोई भी संकट आनेपर डगमगाएँ नहीं यह धर्म के मार्गदर्शकों के लिये आवश्यक है। धर्म के जानकारों का सबसे पहला कर्तव्य है कि वे वर्तमान काल के लिए धर्मशास्त्र या स्मृति की प्रस्तुति करें। यह स्मृति जीवन के सभी पहलुओं को व्यापने वाली हो। इसकी व्यापकता को समझने की दृष्टि से एक रूपरेखा नीचे दे रहे हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== धर्मशास्त्र प्रस्तुति के लिये बिन्दु ==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== धर्म की व्याख्याएँ ===&lt;br /&gt;
धर्म की व्याप्ति / त्रिवर्ग की व्याप्ति : सर्वे भवन्तु सुखिन: लक्ष्य हेतु धर्म : संस्कृति&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== व्यापक धर्मशास्त्र के प्रस्तुति की आवश्यकता ===&lt;br /&gt;
* पूर्व धर्मशास्त्रों की व्यापकता&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
* व्यापकता की आवश्यकता&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== व्यक्तिगत धर्म / पञ्चविध (कोष) पुरुष धर्म / चतुर्विध पुरूषार्थ /स्वधर्म (वर्णधर्म) ===&lt;br /&gt;
* शरीरधर्म &lt;br /&gt;
* मन-धर्म&lt;br /&gt;
* बुद्धि-धर्म&lt;br /&gt;
* चित्त-धर्म&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== सामाजिक संबंधों में धर्म ===&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== व्यक्ति-व्यक्ति : पुरूष-पुरूष या स्त्री-स्त्री ====&lt;br /&gt;
{{div col|colwidth=20em}}	 &lt;br /&gt;
# पारिवारिक रिश्ते&lt;br /&gt;
# पड़ोसी&lt;br /&gt;
# अतिथि&lt;br /&gt;
# शत्रु/विरोधक&lt;br /&gt;
# मित्र/सहायक&lt;br /&gt;
# सहकारी&lt;br /&gt;
# अपरिचित&lt;br /&gt;
# मालिक/नौकर&lt;br /&gt;
# चरित्रहीन स्त्री/पुरूष&lt;br /&gt;
# व्यसनी&lt;br /&gt;
# जरूरतमंद&lt;br /&gt;
# समव्यवसायी&lt;br /&gt;
# भिन्न व्यवसायी&lt;br /&gt;
# याचक&lt;br /&gt;
# भिन्न भाषी&lt;br /&gt;
# विक्रेता \ क्रेता&lt;br /&gt;
# भिन्न राष्ट्रीय&lt;br /&gt;
{{div col end}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== व्यक्ति-व्यक्ति : पुरूष-स्त्री ====&lt;br /&gt;
{{div col|colwidth=20em}}	 &lt;br /&gt;
# पारिवारिक रिश्ते&lt;br /&gt;
# पड़ोसी&lt;br /&gt;
# अतिथि&lt;br /&gt;
# शत्रु/विरोधक&lt;br /&gt;
# मित्र/सहायक&lt;br /&gt;
# सहकारी&lt;br /&gt;
# अपरिचित&lt;br /&gt;
# मालिक/नौकर&lt;br /&gt;
# चरित्रहीन स्त्री/पुरूष&lt;br /&gt;
# व्यसनी&lt;br /&gt;
# जरूरतमंद&lt;br /&gt;
# समव्यवसायी&lt;br /&gt;
# भिन्न व्यवसायी&lt;br /&gt;
# याचक&lt;br /&gt;
# भिन्न भाषी&lt;br /&gt;
# विक्रेता\क्रेता&lt;br /&gt;
# भिन्न राष्ट्रीय&lt;br /&gt;
{{div col end}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== व्यक्ति-समाज ====&lt;br /&gt;
{{div col|colwidth=20em}}	 &lt;br /&gt;
# व्यक्ति-परिवार&lt;br /&gt;
# व्यति-जाति&lt;br /&gt;
# पड़ोसी&lt;br /&gt;
# सामाजिक संगठन&lt;br /&gt;
# व्यक्ति-व्यवस्था&lt;br /&gt;
# व्यक्ति-राष्ट्र&lt;br /&gt;
# व्यक्ति-विश्व समाज&lt;br /&gt;
# व्यक्ति भिन्न भाषी&lt;br /&gt;
# परप्रांतीय&lt;br /&gt;
# परदेसी&lt;br /&gt;
{{div col end}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== समाज-समाज ====&lt;br /&gt;
# अंतर्राष्ट्रीय:&lt;br /&gt;
## शत्रु&lt;br /&gt;
## मित्र&lt;br /&gt;
## तटस्थ&lt;br /&gt;
# अंतर्देशीय{{div col|colwidth=20em}}	 &lt;br /&gt;
## प्रांत-प्रांत&lt;br /&gt;
## जनपद-जनपद&lt;br /&gt;
## भाषिक समूह&lt;br /&gt;
## पंथ समूह&lt;br /&gt;
## राष्ट्रीय समूह&lt;br /&gt;
## अराष्ट्रीय समूह&lt;br /&gt;
## राष्ट्रद्रोही समूह&lt;br /&gt;
## विदेशी&lt;br /&gt;
## समव्यवासायी&lt;br /&gt;
## जाति-जाति&lt;br /&gt;
## परिवार परिवार&lt;br /&gt;
{{div col end}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== सृष्टिगत सम्बन्धों में धर्म ===&lt;br /&gt;
# मनुष्य-अन्य जीव:&lt;br /&gt;
## मनुष्य-पालतू प्राणी:&lt;br /&gt;
### शाकाहारी&lt;br /&gt;
### मांसाहारी&lt;br /&gt;
## मनुष्य अन्य प्राणी:&lt;br /&gt;
### थलचर:&lt;br /&gt;
#### शाकाहारी&lt;br /&gt;
#### मांसाहारी&lt;br /&gt;
### जलचर&lt;br /&gt;
### नभचर&lt;br /&gt;
## मनुष्य-वनस्पति:&lt;br /&gt;
### जमीन के नीचे&lt;br /&gt;
### जमीन के ऊपर&lt;br /&gt;
### वनस्पति/औषधी&lt;br /&gt;
### खानेयोग्य / अन्न&lt;br /&gt;
### अखाद्य / जहरीली&lt;br /&gt;
### नशीली&lt;br /&gt;
## मनुष्य-कृमि / कीटक / सूक्ष्म जीव&lt;br /&gt;
### सहायक&lt;br /&gt;
### हानिकारक&lt;br /&gt;
## मनुष्य-जड़ प्रकृति / पंचमहाभूत&lt;br /&gt;
### अनवीकरणीय/खनिज&lt;br /&gt;
#### ठोस&lt;br /&gt;
#### द्रव&lt;br /&gt;
#### वायु (इंधन)&lt;br /&gt;
### नवीकरणीय&lt;br /&gt;
#### वायु/हवा&lt;br /&gt;
#### जल&lt;br /&gt;
#### सूर्यप्रकाश&lt;br /&gt;
#### लकड़ी&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== आपद्धर्म ===&lt;br /&gt;
# प्राकृतिक आपदा&lt;br /&gt;
# मानव निर्मित आपदा (लगभग उपर्युक्त सभी विषयों में)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== परिवर्तन के पुरोधा ==&lt;br /&gt;
उपर्युक्त बिन्दु २ में बताए गए श्रेष्ठ जन ही परिवर्तन के पुरोधा होंगे। इनका प्रमाण समाज में मुष्किल से ५-७ प्रतिशत ही पर्याप्त होता है। ऐसे श्रेष्ठ जनों में निम्न वर्ग के लोग आते हैं।	&lt;br /&gt;
४.१ शिक्षक : शिक्षक ज्ञानी, त्यागी, कुशल, समाज हित के लिए समर्पित, धर्म का जानकार, समाज को घडने की सामर्थ्य रखनेवाला होता है। नई पीढी जो परिवर्तन का अधिक सहजता से स्वीकार कर सकती है उसको घडना शिक्षक का काम होता है। इसलिये परिवर्तन की प्रक्रिया का मुख्य पुरोधा शिक्षक ही होता है।	&lt;br /&gt;
४.२ श्रेष्ठ जन :यहाँ श्रेष्ठ जनों से मतलब भिन्न भिन्न सामाजिक गतिविधियों में जो अग्रणी लोग हैं उनसे है।	&lt;br /&gt;
४.३ सांप्रदायिक संगठनों के प्रमुख : आजकल समाज का एक बहुत बडा वर्ग जिसमें शिक्षित वर्ग भी है, भिन्न भिन्न संप्रदायों से जुडा है। उन संप्रदायों के प्रमुख भी इस परिवर्तन की प्रक्रिया का एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण हिस्सा बनने की शक्ति रखते हैं।	&lt;br /&gt;
४.४ लोकशिक्षा के माध्यम : कीर्तनकार, कथाकार, प्रवचनकार, नाटक मंडलि, पुरोहित या उपाध्याय, साधू, बैरागी, सिंहस्थ या कुंभ जैसे मेले, यात्राएँ आदि लोकशिक्षा के माध्यम हुआ करते थे। वर्तमान में ये सब कमजोर और दिशाहीन हो गए हैं। एक ओर इनमें से जिनको पुनर्जीवित कर सकते हैं उन्हें करना। नए आयाम भी जोडे जा सकते हैं। जैसे अभी लगभग देढ दशक पूर्व महाराष्ट्र में प्रारंभ हुई नव-वर्ष स्वागत यात्राएँ आदि।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== अंतर्निहित सुधार व्यवस्था ==&lt;br /&gt;
काल के प्रवाह में समाज में हो रहे परिवर्तन और मनुष्य की स्खलनशीलता के कारण बढनेवाला अधर्माचरण ये दो बातें ऐसीं हैं जो किसी भी श्रेष्ठतम समाज को भी नष्ट कर देतीं हैं। इस दृष्टि से जागरूक ऐसे शिक्षक और धर्म के मार्गदर्शक साथ में मिलकर समाज की अंतर्निहित सुधार व्यवस्था बनाते हैं। अपनी संवेदनशीलता और समाज के निरंतर बारीकी से हो रहे अध्ययन के कारण इन्हें संकटों का पूर्वानुमान हो जाता है। अपने निरीक्षणों के आधारपर अपने लोकसंग्रही स्वभाव से ये लोगों को भी संकटों से ऊपर उठने के लिये तैयार करते हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== परिवर्तन की नीति ==&lt;br /&gt;
प्रारंभ में विरोध को आमंत्रण नहीं देना। संघर्ष में शक्ति का अपव्यय नहीं करना। जो आज कर सकते हैं उसे करते जाना। जो कल करने की आवश्यकता है उस के लिये परिस्थिति निर्माण करना। परिस्थिति के निर्माण होते ही आगे बढना।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== परिवर्तन में अवरोध और उनका निराकरण ==&lt;br /&gt;
शासनाधिष्ठित समाज में स्वार्थ के आधारपर परिवर्तन सरल और तेज गति से होता है। हिटलरने १५-२० वर्षों में ही जर्मनी को एक समर्थ राष्ट्र के रूप में खड़ा कर दिया था। लेकिन धर्म पर आधारित जीवन के प्रतिमान में परिवर्तन की गति धीमी और मार्ग कठिन होता है। स्थाई परिवर्तन और वह भी कौटुम्बिक भावना के आधारपर, तो धीरे धीरे ही होता है। &lt;br /&gt;
७.१ अंतर्देशीय 	&lt;br /&gt;
७.१.१ मानवीय जड़ता : परिवर्तन का आनंद से स्वागत करनेवाले लोग समाज में अल्पसंख्य ही होते हैं। सामान्यत: युवा वर्ग ही परिवर्तन के लिए तैयार होता है। इसलिए युवा वर्ग को इस परिवर्तन की प्रक्रिया में सहभागी बनाना होगा। परिवर्तन की प्रक्रिया में युवाओं को सम्मिलित करते जाने से दो तीन पीढ़ियों में परिवर्तन का चक्र गतिमान हो जाएगा।&lt;br /&gt;
७.१.२ विपरीत शिक्षा : जैसे जैसे भारतीय शिक्षा का विस्तार समाज में होगा वर्तमान की विपरीत शिक्षा का अपने आप ही क्रमश: लोप होगा।	   &lt;br /&gt;
७.१.३ मजहबी मानसिकता : भारतीय याने धर्म की शिक्षा के उदय और विस्तार के साथ ही मजहबी शिक्षा और उसका प्रभाव भी शनै: शनै: घटता जाएगा। मजहबों की वास्तविकता को भी उजागर करना आवश्यक है। &lt;br /&gt;
७.१.४ धर्म के ठेकेदार : जैसे जैसे धर्म के जानकार और धर्म के अनुसार आचरण करनेवाले लोग समाज में दिखने लगेंगे, धर्म के तथाकथित ठेकेदारों का प्रभाव कम होता जाएगा। &lt;br /&gt;
७.१.५ शासन तंत्र : इस परिवर्तन की प्रक्रिया में धर्म के जानकारों के बाद शासन की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण होगी। धर्माचरणी लोगों को समर्थन, सहायता और संरक्षण देने का काम शासन को करना होगा। इस के लिए शासक भी धर्म का जानकार और धर्मनिष्ठ हो, यह भी आवश्यक है। धर्म के जानकारों को यह सुनिश्चित करना होगा की शासक धर्माचरण करनेवाले और धर्म के जानकर हों।&lt;br /&gt;
७.१.६ जीवन का अभारतीय प्रतिमान : जीवन के सभी क्षेत्रों में एकसाथ जीवन के प्रतिमान के परिवर्तन की प्रक्रिया को चलाना यह धर्म के जानकारों की जिम्मेदारी होगी। शिक्षा की भूमिका इसमें सबसे महत्वपूर्ण होगी। शिक्षा के माध्यम से समूचे जीवन के भारतीय प्रतिमान की रुपरेखा और प्रक्रिया को समाजव्यापी बनाना होगा। धर्मं-शरण शासन इसमें सहायता करेगा।&lt;br /&gt;
७.१.७ तन्त्रज्ञान  समायोजन : तन्त्रज्ञान के क्षेत्र में भारत के सामने दोहरी चुनौती होगी। एक ओर तो विश्व में जो तन्त्रज्ञान के विकास की होड़ लगी है उसमें अपनी विशेषताओं के साथ अग्रणी रहना। इस दृष्टि से विकास हेतु कुछ तन्त्रज्ञान निम्न हो सकते हैं।&lt;br /&gt;
- शून्य प्रदुषण रासायनिक उद्योग।&lt;br /&gt;
- सस्ती सौर उर्जा।&lt;br /&gt;
- प्रकृति में सहजता से घुलनशील प्लैस्टिक का निर्माण। &lt;br /&gt;
- औरों द्वारा प्रक्षेपित शस्त्रों/अणु-शस्त्रों का शमन करने का तंत्रज्ञान। ...............आदि &lt;br /&gt;
और दूसरी ओर वैकल्पिक विकेंद्रीकरणपर आधारित तन्त्रज्ञान का विकास कर उसे विश्व में प्रतिष्ठित करना। इस प्रकार के तन्त्रज्ञान में निम्न प्रकार के तन्त्रज्ञान होंगे।&lt;br /&gt;
- कौटुम्बिक उद्योगों के लिये, स्थानिक संसाधनों के उपयोग के लिए तन्त्रज्ञान  &lt;br /&gt;
- भिन्न भिन्न कार्यों के लिये पशु-उर्जा के अधिकाधिक उपयोग के लिये तंत्रज्ञान&lt;br /&gt;
- नविकरणीय प्राकृतिक संसाधनों से विविध पदार्थों के निर्माण से आवश्यकताओं की पूर्ति तथा संसाधनों के पुनर्भरण के लिये सरल तन्त्रज्ञान का विकास   &lt;br /&gt;
- मानव की प्राकृतिक क्षमताओं का विकास करनेवाली प्रक्रियाओं का अनुसंधान। ......... आदि &lt;br /&gt;
७.२ अंतर्राष्ट्रीय 	&lt;br /&gt;
७.२.१ मजहबी विस्तारवादी मानसिकता : वर्तमान में यह मुख्यत: ३ प्रकार की है। ईसाई, मुस्लिम और वामपंथी। यह तीनों ही विचारधाराएँ अधूरी हैं, एकांगी हैं। यह तो इन के सम्मुख ‘सर्वे भवन्तु सुखिन:’ को लेकर कोई चुनौती खड़ी नहीं होने से इन्हें विश्व में विस्तार का अवसर मिला है। जैसे ही ‘सर्वे भवन्तु सुखिन:’ का विचार लेकर भारत एक वैश्विक शक्ति के रूप में खड़ा होगा इनके पैरोंतले की जमीन खिसकने लगेगी। &lt;br /&gt;
७.२.२ आसुरी महत्वाकांक्षा : ऊपर जो बताया गया है वह, आसुरी महत्वाकांक्षा रखनेवाली वैश्विक शक्तियों के लिये भी लागू है। आसुरी महत्वाकांक्षाओं को परास्त करने की परंपरा भारत में युगों से रही है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== परिवर्तन के लिये समयबध्द करणीय कार्य ==&lt;br /&gt;
समूचे जीवन के प्रतिमान का परिवर्तन यह एक बहुत बृहद् और जटिल कार्य है। इस के लिये इसे सामाजिक अभियान का रूप देना होगा। समविचारी लोगों को संगठित होकर सहमति से और चरणबध्द पध्दति से प्रक्रिया को आगे बढाना होगा। बड़े पैमानेपर जीवन के हर क्षेत्र में जीवन के भारतीय प्रतिमान की समझ रखनेवाले और कृतीशील ऐसे लोग याने आचार्य निर्माण करने होंगे। परिवर्तन के चरण एक के बाद एक और एक के साथ सभी इस पध्दति से चलेंगे। जैसे दूसरे चरण के काल में ५० प्रतिशत शक्ति और संसाधन दूसरे चरणके निर्धारित विषयपर लगेंगे। और १२.५-१२.५ प्रतिशत शक्ति और संसाधन चरण १, ३, ४ और ५ में प्रत्येकपर लगेंगे।&lt;br /&gt;
१. समविचारी लोगों का ध्रुवीकरण : जिन्हें प्रतिमान के परिवर्तन की आस है और समझ भी है ऐसे समविचारी, सहचित्त लोगों का ध्रुवीकरण करना होगा। उनमें एक व्यापक सहमति निर्माण करनी होगी। अपने अपने कार्यक्षेत्र में क्या करना है इसका स्पष्टीकरण करना होगा।&lt;br /&gt;
२. अभियान के चरण : अभियान को चरणबध्द पध्दति से चलाना होगा। १२ वर्षों के ये पाँच चरण होंगे। ऐसी यह ६० वर्ष की योजना होगी। यह प्रक्रिया तीन पीढीतक चलेगी। तीसरी पीढी में परिवर्तन के फल देखने को मिलेंगे। लेकिन तबतक निष्ठा से और धैर्य से अभियान को चलाना होगा। निरंतर मूल्यांकन करना होगा। राह भटक नहीं जाए इसके लिये चौकन्ना रहना होगा।&lt;br /&gt;
२.१ अध्ययन और अनुसंधान : जीवन का दायरा बहुत व्यापक होता है। अनगिनत विषय इसमें आते हैं। इसलिये प्रतिमान के बदलाव से पहले हमें दोनों प्रतिमानों के विषय में और विशेषत: जीवन के भारतीय प्रतिमान के विषय में बहुत गहराई से अध्ययन करना होगा। मनुष्य की इच्छाओं का दायरा, उनकी पूर्ति के लिये वह क्या क्या कर सकता है आदि का दायरा अति विशाल है। इन दोनों को धर्म के नियंत्रण में ऐसे रखा जाता है इसका भी अध्ययन अनिवार्य है। मनुष्य के व्यक्तित्व को ठीक से समझना, उसके शरीर, मन, बुध्दि, चित्त, अहंकार आदि बातों को समझना, कर्मसिध्दांत को समझना, जन्म जन्मांतर चलने वाली शिक्षा की प्रक्रिया को समझना विविध विषयों के अंगांगी संबंधों को समझना, प्रकृति के रहस्यों को समझना आदि अनेकों ऐसी बातें हैं जिनका अध्ययन हमें करना होगा। इनमें से कई विषयों के संबंध में हमारे पूर्वजों ने विपुल साहित्य निर्माण किया था। उसमें से कितने ही साहित्य को जाने अंजाने में प्रक्षेपित किया गया है। इस प्रक्षिप्त हिस्से को समझ कर अलग निकालना होगा। शुध्द भारतीय तत्वोंपर आधारित ज्ञान को प्राप्त करना होगा। अंग्रेजों ने भारतीय साहित्य, इतिहास के साथ किये खिलवाड, भारतीय समाज में झगडे पैदा करने के लिये निर्मित साहित्य को अलग हटाकर शुध्द भारतीय याने एकात्म भाव की या कौटुम्बिक भाव की जितनी भी प्रस्तुतियाँ हैं उनका अध्ययन करना होगा। मान्यताओं, व्यवहार सूत्रों, संगठन निर्माण और व्यवस्था निर्माण की प्रक्रिया को समझना होगा।     &lt;br /&gt;
२.२ लोकमत परिष्कार : अध्ययन से जो ज्ञान उभरकर सामने आएगा उसे लोगोंतक ले जाना होगा। लोगों का प्रबोधन करना होगा। उन्हें फिर से समग्रता से और एकात्मता से सोचने और व्यवहार करने का तरीका बताना होगा। उन्हें उनकी सामाजिक जिम्मेदारी का समाजधर्म का अहसास करवाना होगा। वर्तमान की परिस्थितियों से सामान्यत: कोई भी खुश नहीं है। लेकिन जीवन का भारतीय प्रतिमान ही  उनकी कल्पना के अच्छे दिनों का वास्तव है यह सब के मन में स्थापित करना होगा।	         &lt;br /&gt;
२.३ संयुक्त कुटुम्ब : कुटुम्ब ही समाजधर्म सीखने की पाठशाला होता है। संयुक्त कुटुम्ब तो वास्तव में समाज का लघुरूप ही होता है। सामाजिक समस्याओं में से लगभग ७० प्रतिशत समस्याओं को तो केवल अच्छा संयुक्त कुटुम्ब ही निर्मूल कर देता है। समाज जीवन के लिये श्रेष्ठ लोगों को जन्म देने का काम, श्रेष्ठ संस्कार देने का काम, अच्छी आदतें डालने काम आजकल की फॅमिली पध्दति नहीं कर सकती। जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में जो तेजस्वी नेतृत्व का अभाव निर्माण हो गया है उसे दूर करना यह भारतीय मान्यताओं के अनुसार चलाए जानेवाले संयुक्त परिवारों में ही हो सकता है। इसलिये समाज का नेतृत्व करेंगे ऐसे श्रेष्ठ बालकों को जन्म देने के प्रयास तीसरे चरण में होंगे।&lt;br /&gt;
२.४ शिक्षक/धर्मज्ञ और शासक निर्माण : समाज परिवर्तन में शिक्षक की और शासक की ऐसे दोनों की भुमिका अत्यंत महत्वपूर्ण होती है। संयुक्त परिवारों में जन्म लिये बच्चों में से अब श्रेष्ठ धर्म के मार्गदर्शक, शिक्षक और शासक निर्माण करने की स्थिति होगी। ऐसे लोगों को समर्थन और सहायता देनेवाले कुटुम्ब और दूसरे चरण में निर्माण किये समाज के परिष्कृत विचारोंवाले सदस्य अब कुछ मात्रा में उपलब्ध होंगे।	   &lt;br /&gt;
२.५ संगठन और व्यवस्थाओं की प्रतिष्ठापना : श्रेष्ठ धर्म के अधिष्ठाता/मार्गदर्शक, सामर्थ्यवान शिक्षक और कुशल शासक अब प्रत्यक्ष संगठन का सशक्तिकरण और व्यवस्थाओं का निर्माण करेंगे।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==References==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;references /&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अन्य स्रोत:&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[Category:Bhartiya Jeevan Pratiman (भारतीय जीवन प्रतिमान)]]&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Dilipkelkar</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://dharmawiki.org/index.php?title=Planning_For_Change_(%E0%A4%AA%E0%A4%B0%E0%A4%BF%E0%A4%B5%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%A4%E0%A4%A8_%E0%A4%95%E0%A5%80_%E0%A4%AF%E0%A5%8B%E0%A4%9C%E0%A4%A8%E0%A4%BE)&amp;diff=119358</id>
		<title>Planning For Change (परिवर्तन की योजना)</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://dharmawiki.org/index.php?title=Planning_For_Change_(%E0%A4%AA%E0%A4%B0%E0%A4%BF%E0%A4%B5%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%A4%E0%A4%A8_%E0%A4%95%E0%A5%80_%E0%A4%AF%E0%A5%8B%E0%A4%9C%E0%A4%A8%E0%A4%BE)&amp;diff=119358"/>
		<updated>2019-06-02T14:35:05Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Dilipkelkar: /* समाज-समाज */ लेख सम्पादित किया&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{One source|date=January 2019}}&lt;br /&gt;
[[Template:Cleanup reorganize Dharmawiki Page]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
परिवर्तन की योजना को समझने के लिए हमें पहले निम्न बातें फिर से स्मरण करनी होंगी ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जीवन के भारतीय प्रतिमान की जानकारी के लिए - &lt;br /&gt;
# जीवनदृष्टि/व्यवहार : भारतीय जीवनदृष्टि और जीवनशैली के विषय में जानकारी के लिये कृपया [[Elements of Hindu Jeevan Drishti and Life Style (भारतीय/हिन्दू जीवनदृष्टि और जीवन शैली के सूत्र)|यह]] लेख देखें।&lt;br /&gt;
# व्यवस्था समूह का ढाँचा जीवनदृष्टि से सुसंगत होना चाहिए। कृपया व्यवस्था समूह के ढाँचे के लिये [[Jeevan Ka Pratiman (जीवन का प्रतिमान)|यह]] लेख और जानकारी के लिए [[Interrelationship in Srishti (सृष्टि में परस्पर सम्बद्धता)|यह]] लेख देखें।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== समस्या मूलों के निराकरण की नीति ==&lt;br /&gt;
समस्या मूल नष्ट करने से तात्पर्य समस्या मूलों पर आघात से नहीं है। समस्याएँ निर्माण ही नहीं हों ऐसी परिस्थितियों, ऐसे समाज संगठनों और ऐसी व्यवस्थाओं के निर्माण से है। निराकरण की प्रक्रिया के ३ चरण होंगे। समस्याओं को और परिवर्तन के स्वरूप को समझना, निराकरण की नीति तय करना और निराकरण का क्रियान्वयन करना। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== परिवर्तन के स्वरूप को समझना ==&lt;br /&gt;
समस्या का मूल जीवन के प्रतिमान के परिवर्तन में है। प्रतिमान का आधार समाज की जीवनदृष्टि होती है। व्यवहार, संगठन और व्यवस्थाएँ तो जीवनदृष्टि के आधार पर ही तय होते हैं। इसलिये परिवर्तन की प्रक्रिया में जीवनदृष्टि के परिवर्तन की प्रक्रिया को प्राथमिकता देनी होगी। व्यवहार में सुसंगतता आए इसलिये करणीय अकरणीय विवेक को सार्वत्रिक करना होगा। दूसरे क्रमांक पर संगठन और व्यवस्थाओं में परिवर्तन की प्रक्रिया चलेगी। व्यवस्था परिवर्तन की इस प्रक्रिया में समग्रता और एकात्मता के संदर्भ में व्यवस्था विशेष का आधार बनाने के लिये विषय की सैध्दांतिक प्रस्तुति करनी होगी। जैसे शासन व्यवस्था में यदि उचित परिवर्तन करना है तो पहले राजशास्त्र की सैध्दांतिक प्रस्तुति करना आवश्यक है। समृद्धि व्यवस्था में परिवर्तन करने के लिये समृद्धिशास्त्र की सैध्दांतिक प्रस्तुति करनी होगी। इन सैध्दांतिक प्रस्तुतियों को प्रयोग सिध्द करना होगा। प्रयोगों के आधार पर इन प्रस्तुतियों में उचित परिवर्तन करते हुए आगे बढना होगा। यह काम प्राथमिकता से धर्म के जानकारों का है। दूसरे क्रमांक की जिम्मेदारी शिक्षकों की है। शिक्षक वर्ग ही धर्म को सार्वत्रिक करता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== निराकरण की नीति ==&lt;br /&gt;
समस्याएँ इतनी अधिक और पेचिदा हैं कि इनका निराकरण अब संभव नहीं है, ऐसा कई विद्वान मानते हैं। हमने जो करणीय और अकरणीय विवेक को समझा है उसके अनुसार कोई भी बात असंभव नहीं होती। ऊपरी तौर पर असंभव लगने पर भी उसे संभव चरणों में बाँटकर संपन्न किया जा सकता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इस के लिये नीति के तौर पर हमारा व्यवहार निम्न प्रकार का होना चाहिए:&lt;br /&gt;
* सबसे पहले तो यह हमेशा ध्यान में रखना कि यह पूरे समाज जीवन के प्रतिमान के परिवर्तन का विषय है। इसे परिवर्तन के लिये कई पीढियों का समय लग सकता है। भारत वर्ष के दीर्घ इतिहास में समाज ने कई बार उत्थान और पतन के दौर अनुभव किये हैं। बार बार भारतीय समाज ने उत्थान किया है।&lt;br /&gt;
* परिवर्तन की प्रक्रिया को संभाव्य चरणों में बाँटना।&lt;br /&gt;
* उसमें आज जो हो सकता है उसे कर डालना।&lt;br /&gt;
* आज जिसे करना कठिन लगता है उसके लिये परिस्थितियाँ बनाते जाना। परिस्थितियाँ बनते ही उसे करना।&lt;br /&gt;
* प्रारंभ में जबतक परिवर्तन की प्रक्रिया ने गति नहीं पकडी है, यथासंभव कोई विरोध मोल नहीं लेना।&lt;br /&gt;
* इसी प्रकार से एक एक चरण को संभव बनाते हुए आगे बढ़ाते जाना।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== समस्या मूलों का निराकरण ==&lt;br /&gt;
वास्तव में समस्या मूलों को नष्ट करना यह शब्दप्रयोग ठीक नहीं है। उचित प्रतिमान की प्रतिष्ठापना के साथ ही गलत प्रतिमान का अंत अपने आप होता है। जो सर्वहितकारी है, उचित है, श्रेष्ठ है, उसकी प्रतिष्ठापना ही परिवर्तन की प्रक्रिया का स्वरूप होगा। स्वाभाविक जडता के कारण कुछ कठिनाईयाँ तो आएँगी। लेकिन गलत प्रतिमान को नष्ट करने के लिये अलग से शक्ति लगाने की आवश्यकता नहीं है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== समस्या मूल नष्ट करने हेतु धर्म के जानकारों के मार्गदर्शन में शिक्षा की व्याप्ति ==&lt;br /&gt;
# जीवनदृष्टि की शिक्षा : जीवनदृष्टि की शिक्षा मुख्यत: कामनाओं और कामनाओं की पूर्ति के प्रयास, धन, साधन और संसाधनों को धर्म के दायरे में रखने की शिक्षा ही है। पुरूषार्थ चतुष्टय की या त्रिवर्ग की शिक्षा ही है।&lt;br /&gt;
# व्यवस्थाएँ : जीवनदृष्टि के अनुसार व्यवहार हो सके इस हेतु से ही व्यवस्थाओं का निर्माण किया जाता है। व्यवस्थाओं के निर्माण में और उनके क्रियान्वयन में भी जीवनदृष्टि ओतप्रोत रहे इसका ध्यान रखना होगा।&lt;br /&gt;
## धर्म व्यवस्था&lt;br /&gt;
## शिक्षा व्यवस्था&lt;br /&gt;
## शासन व्यवस्था&lt;br /&gt;
## समृद्धि व्यवस्था&lt;br /&gt;
# संगठन : समाज संगठन और समाज की व्यवस्थाएँ एक दूसरे को पूरक पोषक होती हैं। लेकिन धर्म व्यवस्था, शिक्षा व्यवस्था और शासन व्यवस्था के अभाव में संगठन निर्माण करना अत्यंत कठिन हो जाता है। वास्तव में ये दोनों अन्योन्याश्रित होते हैं। समाज संगठन की जानकारी के लिये कृपया [[Society (समाज)|यह]] लेख देखें।&lt;br /&gt;
## कुटुम्ब&lt;br /&gt;
## स्वभाव समायोजन&lt;br /&gt;
## आश्रम&lt;br /&gt;
## कौशल विधा&lt;br /&gt;
## ग्राम&lt;br /&gt;
## राष्ट्र&lt;br /&gt;
# विज्ञान और तन्त्रज्ञान: कृपया [[Bharat's Science and Technology (भारतीय विज्ञान तन्त्रज्ञान दृष्टि)|यह]] लेख देखें। &lt;br /&gt;
## विकास और उपयोग नीति&lt;br /&gt;
## सार्वत्रिकीकरण&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== परिवर्तन की योजना ==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== परिवर्तन का स्वरूप ===&lt;br /&gt;
वर्तमान स्वार्थ पर आधारित जीवन के प्रतिमान के स्थान पर आत्मीयता याने कौटुम्बिक भावना पर आधारित जीवन के प्रतिमान की प्रतिष्ठापना:&lt;br /&gt;
# सर्वे भवन्तु सुखिन:, देशानुकूल और कालानुकूल आदि के संदर्भ में दोनों प्रतिमानों को समझना&lt;br /&gt;
# प्रतिमान का परिवर्तन&lt;br /&gt;
## सामाजिक व्यवस्थाओं का पुनर्निर्माण&lt;br /&gt;
### समाज के संगठनों का परिष्कार/पुनरूत्थान या नवनिर्माण&lt;br /&gt;
### तन्त्रज्ञान  का समायोजन / तन्त्रज्ञान  नीति / जीवन की इष्ट गति : वर्तमान में तन्त्रज्ञान  की विकास की गति से जीवन को जो गति प्राप्त हुई है उस के कारण सामान्य मनुष्य घसीटा जा रहा है। पर्यावरण सन्तुलन  और सामाजिकता दाँवपर लग गए हैं। ज्ञान, विज्ञान और तन्त्रज्ञान ये तीनों बातें पात्र व्यक्ति को ही मिलनी चाहिये। बंदर के हाथ में पलिता नहीं दिया जाता। इस लिये किसी भी तन्त्रज्ञान के सार्वत्रिकीकरण से पहले उसके पर्यावरण, समाजजीवन और व्यक्ति जीवनपर होनेवाले परिणाम जानना आवश्यक है। हानिकारक तंत्रज्ञान का तो विकास भी नहीं करना चाहिये। किया तो वह केवल सुपात्र को ही अंतरित हो यह सुनिश्चित करना चाहिये। ऐसी स्थिति में जीवन की इष्ट गति की ओर बढानेवाली तन्त्रज्ञान नीति का स्वीकार करना होगा। इष्ट गति के निकषों के लिये [[Bharat's Science and Technology (भारतीय विज्ञान एवं तन्त्रज्ञान दृष्टि)|इस]] लेख में बताई कसौटी लगानी होगी। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== परिवर्तन की प्रक्रिया ===&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सामाजिक परिवर्तन भौतिक वस्तुओं के परिवर्तन जैसे सरल नहीं होते। भौतिक पदार्थों का एक निश्चित स्वभाव होता है। धर्म होता है। इसे ध्यान में रखकर भौतिक पदार्थों को ढाला जाता है। हर मानव का स्वभाव भिन्न होता है। भिन्न समय पर भी उसमें बदलाव आ सकता है। इसलिये सामाजिक परिवर्तन क्रांति से नहीं उत्क्रांति से ही किये जा सकते हैं। उत्क्रांति की गति धीमी होती है। होने वाले परिवर्तनों से किसी की हानि नहीं हो या होने वाली हानि न्यूनतम हो, परिवर्तन स्थाई हों, परिवर्तन से सबको लाभ मिले यह सब देखकर ही प्रक्रिया चलाई जाती है। सामाजिक परिवर्तनों के लिये नई पीढी से प्रारंभ करना यह सबसे अच्छा रास्ता है। लेकिन नई पीढी में व्यापक रूप से परिवर्तन के पहलुओं को स्थापित करने के लिये आवश्यक इतनी पुरानी पीढी के श्रेष्ठ जनों की संख्या आवश्यक है। ऐसे श्रेष्ठ जनों का वर्णन श्रीमद्भगवद्गीता में किया गया है:&amp;lt;blockquote&amp;gt;यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जन:।&amp;lt;/blockquote&amp;gt;&amp;lt;blockquote&amp;gt;स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते॥ (अध्याय ३ श्लोक २१)&amp;lt;/blockquote&amp;gt;इसलिये एक दृष्टि से देखा जाए तो यह प्रक्रिया समाज के प्रत्येक व्यक्तितक ले जाने की आवश्यकता नहीं होती। केवल समाज जीवन की सभी विधाओं के श्रेष्ठ लोगों के निर्माण की प्रक्रिया ही परिवर्तन की प्रक्रिया है। एक बार ये लोग निर्माण हो गये तो फिर परिवर्तन तेज याने ज्यामितीय गति से होने लगता है।&lt;br /&gt;
* धीमी लेकिन अविश्रांत : हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि हमें सामाजिक परिवर्तन करना है। समाज एक जीवंत ईकाई होता है। जीवंत ईकाई में परिवर्तन हमेशा धीमी गति से, समग्रता से और अविरत करते रहने से होते हैं। कोई भी शीघ्रता या टुकडों में होनेवाले परिवर्तन हानिकारक होते हैं।&lt;br /&gt;
* सभी क्षेत्रों में एकसाथ : समाज एक जीवंत ईकाई होने के कारण इसके सभी अंग किसी भी बात से एक साथ प्रभावित होते हैं। प्रभाव का परिमाण कम अधिक होगा लेकिन प्रभाव सभी पर होता ही है। इसलिये परिवर्तन की प्रक्रिया टुकडों में अलग अलग या एक के बाद एक ऐसी नहीं होगी। परिवर्तन की प्रक्रिया धर्म, शिक्षा, शासन, अर्थ, न्याय, समाज संगठन आदि सभी क्षेत्रों में एक साथ चलेगी। ऐसी प्रक्रिया का प्रारंभ होना बहुत कठिन होता है। लेकिन एक बार सभी क्षेत्रों में प्रारंभ हो जाता है तो फिर यह तेजी से गति प्राप्त कर लेती है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== परिवर्तन के कारक तत्व ===&lt;br /&gt;
# शिक्षा : शिक्षा का दायरा बहुत व्यापक है। शिक्षा जन्म जन्मांतर चलनेवाली प्रक्रिया होती है। इस जन्म में शिक्षा गर्भधारणा से मृत्यूपर्यंत चलती है। आयु की अवस्था के अनुसार शिक्षा का स्वरूप बदलता है। &lt;br /&gt;
## कुटुम्ब में शिक्षा : कुटुम्ब में शिक्षा का प्रारंभ गर्भधारणा से होता है। मनुष्य की ६०-७० प्रतिशत घडन तो कुटुम्ब में ही होती है। कुटुम्ब में रहकर वह कई बातें सीखता है। कौटुम्बिक भावना, कर्तव्य, सदाचार आदि की शिक्षा कुटुम्ब की ही जिम्मेदारी होती है। व्यवस्थाओं के साथ समायोजन, व्यवस्थाओं के स्वरूप आदि भी वह कुटुम्ब में ही अपने ज्येष्ठों से सीखता है। इंद्रियों के विकास की शिक्षा, व्यावसायिक कौशल भी वह कुटुम्ब में ही सीखता है। कुटुम्ब सामाजिकता की पाठशाला ही होता है। बडों का आदर, स्त्री का आदर आदि भी कुटुम्ब ही सिखाता है। &lt;br /&gt;
## कुटुम्ब की शिक्षा : उसी प्रकार से कुटुम्ब के बारे में भी वह कई बातें सीखता है। उसकी व्यक्तिगत, कौटुम्बिक और सामाजिक आदतें बचपन में ही आकार लेतीं हैं। कुटुम्ब का महत्व, समाज में कौटुम्बिक भावना का महत्व, कौटुम्बिक व्यवस्थाओं का महत्व वह कुटुम्ब में सीखता है। भिन्न भिन्न स्वभावों के लोग एक छत के नीचे आत्मीयता से कैसे रहते हैं यह वह कुटुम्ब से ही सीखता है। लगभग सभी प्रकार से कुटुंब यह समाज का लघुरूप ही होता है। कुटुंब यह सामाजिकता की पाठशाला होती है। &lt;br /&gt;
## विद्याकेन्द्र शिक्षा: विद्याकेन्द्र की शिक्षा शास्त्रीय शिक्षा होती है। कुटुम्ब में सीखे हुए सदाचार के शास्त्रीय पक्ष को समझाने के लिये होती है। कुटुंब में सीखे हुए व्यावसायिक कौशलों को पैना बनाने के लिये होती है। कुटुंब में आत्मसात की हुई श्रेष्ठ परम्पराओं को अधिक उज्वल बनाने के तरीके सीखने के लिए होती है। अध्ययन का और कौशल का शास्त्रीय तरीका सिखने के लिये, अध्ययन को तेजस्वी बनाने के लिये होती है। &lt;br /&gt;
## लोकशिक्षा : लोकशिक्षा भी समाज जीवन का एक आवश्यक पहलू है। विद्याकेन्द्र की शिक्षा के उपरान्त भी मनुष्य का मन कई बार भ्रमित हो जाता हाय, बुद्धि कुण्ठित हो जाती है। ऐसी स्थिति में लोकशिक्षा की व्यवस्था इस संभ्रम को, इस कुण्ठा को दूर करती है। &lt;br /&gt;
## परंपरा निर्माण : अपने से अधिक श्रेष्ठ विरासत निर्माण करने की निरंतरता को श्रेष्ठ परंपरा कहते हैं। श्रेष्ठ परंपराओं के निर्माण की तीव्र इच्छा और पैने प्रयास समाज को श्रेष्ठ और चिरंजीवी बनाते हैं। &lt;br /&gt;
# शासन &lt;br /&gt;
## धर्मनिष्ठता : शासक धर्मशास्त्र के जानकार हों। धर्मशास्त्र के पालनकर्ता हों। धर्मशास्त्र के नियमों का प्रजा से अनुपालन करवाने में कुशल हों। &lt;br /&gt;
## धर्म व्यवस्था के साथ समायोजन : सदैव धर्म के जानकारों से अपना मूल्यांकन करवाएँ। धर्म के जानकारों की सूचनाओं का अनुपालन करें। अधर्म होने से प्रायश्चित्त और पश्चात्ताप के लिये उद्यत रहें। &lt;br /&gt;
# धर्म नेतृत्व &lt;br /&gt;
## धर्म के मार्गदर्शक : किसी का केवल धर्मशास्त्र का विशेषज्ञ होना पर्याप्त नहीं है। नि:स्वार्थ भाव, निर्भयता भी श्रेष्ठ धर्म के मार्गदर्शकों के लक्षण हैं। &lt;br /&gt;
## धर्माचरणी : धर्म का मार्गदर्शन करनेवाले लोग अपने व्यवहार में भी धर्मयुक्त होना चाहिये। &lt;br /&gt;
## विजीगिषु स्वभाववाले : धर्म का मार्गदर्शन करनेवाले लोगों के लिये विजीगिषु स्वभाव का होना आवश्यक है। कोई भी संकट आनेपर डगमगाएँ नहीं यह धर्म के मार्गदर्शकों के लिये आवश्यक है। धर्म के जानकारों का सबसे पहला कर्तव्य है कि वे वर्तमान काल के लिए धर्मशास्त्र या स्मृति की प्रस्तुति करें। यह स्मृति जीवन के सभी पहलुओं को व्यापने वाली हो। इसकी व्यापकता को समझने की दृष्टि से एक रूपरेखा नीचे दे रहे हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== धर्मशास्त्र प्रस्तुति के लिये बिन्दु ==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== धर्म की व्याख्याएँ ===&lt;br /&gt;
धर्म की व्याप्ति / त्रिवर्ग की व्याप्ति : सर्वे भवन्तु सुखिन: लक्ष्य हेतु धर्म : संस्कृति&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== व्यापक धर्मशास्त्र के प्रस्तुति की आवश्यकता ===&lt;br /&gt;
* पूर्व धर्मशास्त्रों की व्यापकता&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
* व्यापकता की आवश्यकता&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== व्यक्तिगत धर्म / पञ्चविध (कोष) पुरुष धर्म / चतुर्विध पुरूषार्थ /स्वधर्म (वर्णधर्म) ===&lt;br /&gt;
* शरीरधर्म &lt;br /&gt;
* मन-धर्म&lt;br /&gt;
* बुद्धि-धर्म&lt;br /&gt;
* चित्त-धर्म&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== सामाजिक संबंधों में धर्म ===&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== व्यक्ति-व्यक्ति : पुरूष-पुरूष या स्त्री-स्त्री ====&lt;br /&gt;
{{div col|colwidth=20em}}	 &lt;br /&gt;
# पारिवारिक रिश्ते&lt;br /&gt;
# पड़ोसी&lt;br /&gt;
# अतिथि&lt;br /&gt;
# शत्रु/विरोधक&lt;br /&gt;
# मित्र/सहायक&lt;br /&gt;
# सहकारी&lt;br /&gt;
# अपरिचित&lt;br /&gt;
# मालिक/नौकर&lt;br /&gt;
# चरित्रहीन स्त्री/पुरूष&lt;br /&gt;
# व्यसनी&lt;br /&gt;
# जरूरतमंद&lt;br /&gt;
# समव्यवसायी&lt;br /&gt;
# भिन्न व्यवसायी&lt;br /&gt;
# याचक&lt;br /&gt;
# भिन्न भाषी&lt;br /&gt;
# विक्रेता \ क्रेता&lt;br /&gt;
# भिन्न राष्ट्रीय&lt;br /&gt;
{{div col end}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== व्यक्ति-व्यक्ति : पुरूष-स्त्री ====&lt;br /&gt;
{{div col|colwidth=20em}}	 &lt;br /&gt;
# पारिवारिक रिश्ते&lt;br /&gt;
# पड़ोसी&lt;br /&gt;
# अतिथि&lt;br /&gt;
# शत्रु/विरोधक&lt;br /&gt;
# मित्र/सहायक&lt;br /&gt;
# सहकारी&lt;br /&gt;
# अपरिचित&lt;br /&gt;
# मालिक/नौकर&lt;br /&gt;
# चरित्रहीन स्त्री/पुरूष&lt;br /&gt;
# व्यसनी&lt;br /&gt;
# जरूरतमंद&lt;br /&gt;
# समव्यवसायी&lt;br /&gt;
# भिन्न व्यवसायी&lt;br /&gt;
# याचक&lt;br /&gt;
# भिन्न भाषी&lt;br /&gt;
# विक्रेता\क्रेता&lt;br /&gt;
# भिन्न राष्ट्रीय&lt;br /&gt;
{{div col end}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== व्यक्ति-समाज ====&lt;br /&gt;
{{div col|colwidth=20em}}	 &lt;br /&gt;
# व्यक्ति-परिवार&lt;br /&gt;
# व्यति-जाति&lt;br /&gt;
# पड़ोसी&lt;br /&gt;
# सामाजिक संगठन&lt;br /&gt;
# व्यक्ति-व्यवस्था&lt;br /&gt;
# व्यक्ति-राष्ट्र&lt;br /&gt;
# व्यक्ति-विश्व समाज&lt;br /&gt;
# व्यक्ति भिन्न भाषी&lt;br /&gt;
# परप्रांतीय&lt;br /&gt;
# परदेसी&lt;br /&gt;
{{div col end}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== समाज-समाज ====&lt;br /&gt;
# अंतर्राष्ट्रीय:&lt;br /&gt;
## शत्रु&lt;br /&gt;
## मित्र&lt;br /&gt;
## तटस्थ&lt;br /&gt;
# अंतर्देशीय&lt;br /&gt;
{{div col|colwidth=20em}}	 &lt;br /&gt;
## प्रांत-प्रांत&lt;br /&gt;
## जनपद-जनपद&lt;br /&gt;
## भाषिक समूह&lt;br /&gt;
## पंथ समूह&lt;br /&gt;
## राष्ट्रीय समूह&lt;br /&gt;
## अराष्ट्रीय समूह&lt;br /&gt;
## राष्ट्रद्रोही समूह&lt;br /&gt;
## विदेशी&lt;br /&gt;
## समव्यवासायी&lt;br /&gt;
## जाति-जाति&lt;br /&gt;
## परिवार परिवार&lt;br /&gt;
{{div col end}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== सृष्टिगत सम्बन्धों में धर्म ===&lt;br /&gt;
# मनुष्य-अन्य जीव:&lt;br /&gt;
## मनुष्य-पालतू प्राणी:&lt;br /&gt;
### शाकाहारी&lt;br /&gt;
### मांसाहारी&lt;br /&gt;
## मनुष्य अन्य प्राणी:&lt;br /&gt;
### थलचर:&lt;br /&gt;
#### शाकाहारी&lt;br /&gt;
#### मांसाहारी&lt;br /&gt;
### जलचर&lt;br /&gt;
### नभचर&lt;br /&gt;
## मनुष्य-वनस्पति:&lt;br /&gt;
### जमीन के नीचे&lt;br /&gt;
### जमीन के ऊपर&lt;br /&gt;
### वनस्पति/औषधी&lt;br /&gt;
### खानेयोग्य / अन्न&lt;br /&gt;
### अखाद्य / जहरीली&lt;br /&gt;
### नशीली&lt;br /&gt;
## मनुष्य-कृमि / कीटक / सूक्ष्म जीव&lt;br /&gt;
### सहायक&lt;br /&gt;
### हानिकारक&lt;br /&gt;
## मनुष्य-जड़ प्रकृति / पंचमहाभूत&lt;br /&gt;
### अनवीकरणीय/खनिज&lt;br /&gt;
#### ठोस&lt;br /&gt;
#### द्रव&lt;br /&gt;
#### वायु (इंधन)&lt;br /&gt;
### नवीकरणीय&lt;br /&gt;
#### वायु/हवा&lt;br /&gt;
#### जल&lt;br /&gt;
#### सूर्यप्रकाश&lt;br /&gt;
#### लकड़ी&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== आपद्धर्म ===&lt;br /&gt;
# प्राकृतिक आपदा&lt;br /&gt;
# मानव निर्मित आपदा (लगभग उपर्युक्त सभी विषयों में)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== परिवर्तन के पुरोधा ==&lt;br /&gt;
उपर्युक्त बिन्दु २ में बताए गए श्रेष्ठ जन ही परिवर्तन के पुरोधा होंगे। इनका प्रमाण समाज में मुष्किल से ५-७ प्रतिशत ही पर्याप्त होता है। ऐसे श्रेष्ठ जनों में निम्न वर्ग के लोग आते हैं।	&lt;br /&gt;
४.१ शिक्षक : शिक्षक ज्ञानी, त्यागी, कुशल, समाज हित के लिए समर्पित, धर्म का जानकार, समाज को घडने की सामर्थ्य रखनेवाला होता है। नई पीढी जो परिवर्तन का अधिक सहजता से स्वीकार कर सकती है उसको घडना शिक्षक का काम होता है। इसलिये परिवर्तन की प्रक्रिया का मुख्य पुरोधा शिक्षक ही होता है।	&lt;br /&gt;
४.२ श्रेष्ठ जन :यहाँ श्रेष्ठ जनों से मतलब भिन्न भिन्न सामाजिक गतिविधियों में जो अग्रणी लोग हैं उनसे है।	&lt;br /&gt;
४.३ सांप्रदायिक संगठनों के प्रमुख : आजकल समाज का एक बहुत बडा वर्ग जिसमें शिक्षित वर्ग भी है, भिन्न भिन्न संप्रदायों से जुडा है। उन संप्रदायों के प्रमुख भी इस परिवर्तन की प्रक्रिया का एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण हिस्सा बनने की शक्ति रखते हैं।	&lt;br /&gt;
४.४ लोकशिक्षा के माध्यम : कीर्तनकार, कथाकार, प्रवचनकार, नाटक मंडलि, पुरोहित या उपाध्याय, साधू, बैरागी, सिंहस्थ या कुंभ जैसे मेले, यात्राएँ आदि लोकशिक्षा के माध्यम हुआ करते थे। वर्तमान में ये सब कमजोर और दिशाहीन हो गए हैं। एक ओर इनमें से जिनको पुनर्जीवित कर सकते हैं उन्हें करना। नए आयाम भी जोडे जा सकते हैं। जैसे अभी लगभग देढ दशक पूर्व महाराष्ट्र में प्रारंभ हुई नव-वर्ष स्वागत यात्राएँ आदि।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== अंतर्निहित सुधार व्यवस्था ==&lt;br /&gt;
काल के प्रवाह में समाज में हो रहे परिवर्तन और मनुष्य की स्खलनशीलता के कारण बढनेवाला अधर्माचरण ये दो बातें ऐसीं हैं जो किसी भी श्रेष्ठतम समाज को भी नष्ट कर देतीं हैं। इस दृष्टि से जागरूक ऐसे शिक्षक और धर्म के मार्गदर्शक साथ में मिलकर समाज की अंतर्निहित सुधार व्यवस्था बनाते हैं। अपनी संवेदनशीलता और समाज के निरंतर बारीकी से हो रहे अध्ययन के कारण इन्हें संकटों का पूर्वानुमान हो जाता है। अपने निरीक्षणों के आधारपर अपने लोकसंग्रही स्वभाव से ये लोगों को भी संकटों से ऊपर उठने के लिये तैयार करते हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== परिवर्तन की नीति ==&lt;br /&gt;
प्रारंभ में विरोध को आमंत्रण नहीं देना। संघर्ष में शक्ति का अपव्यय नहीं करना। जो आज कर सकते हैं उसे करते जाना। जो कल करने की आवश्यकता है उस के लिये परिस्थिति निर्माण करना। परिस्थिति के निर्माण होते ही आगे बढना।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== परिवर्तन में अवरोध और उनका निराकरण ==&lt;br /&gt;
शासनाधिष्ठित समाज में स्वार्थ के आधारपर परिवर्तन सरल और तेज गति से होता है। हिटलरने १५-२० वर्षों में ही जर्मनी को एक समर्थ राष्ट्र के रूप में खड़ा कर दिया था। लेकिन धर्म पर आधारित जीवन के प्रतिमान में परिवर्तन की गति धीमी और मार्ग कठिन होता है। स्थाई परिवर्तन और वह भी कौटुम्बिक भावना के आधारपर, तो धीरे धीरे ही होता है। &lt;br /&gt;
७.१ अंतर्देशीय 	&lt;br /&gt;
७.१.१ मानवीय जड़ता : परिवर्तन का आनंद से स्वागत करनेवाले लोग समाज में अल्पसंख्य ही होते हैं। सामान्यत: युवा वर्ग ही परिवर्तन के लिए तैयार होता है। इसलिए युवा वर्ग को इस परिवर्तन की प्रक्रिया में सहभागी बनाना होगा। परिवर्तन की प्रक्रिया में युवाओं को सम्मिलित करते जाने से दो तीन पीढ़ियों में परिवर्तन का चक्र गतिमान हो जाएगा।&lt;br /&gt;
७.१.२ विपरीत शिक्षा : जैसे जैसे भारतीय शिक्षा का विस्तार समाज में होगा वर्तमान की विपरीत शिक्षा का अपने आप ही क्रमश: लोप होगा।	   &lt;br /&gt;
७.१.३ मजहबी मानसिकता : भारतीय याने धर्म की शिक्षा के उदय और विस्तार के साथ ही मजहबी शिक्षा और उसका प्रभाव भी शनै: शनै: घटता जाएगा। मजहबों की वास्तविकता को भी उजागर करना आवश्यक है। &lt;br /&gt;
७.१.४ धर्म के ठेकेदार : जैसे जैसे धर्म के जानकार और धर्म के अनुसार आचरण करनेवाले लोग समाज में दिखने लगेंगे, धर्म के तथाकथित ठेकेदारों का प्रभाव कम होता जाएगा। &lt;br /&gt;
७.१.५ शासन तंत्र : इस परिवर्तन की प्रक्रिया में धर्म के जानकारों के बाद शासन की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण होगी। धर्माचरणी लोगों को समर्थन, सहायता और संरक्षण देने का काम शासन को करना होगा। इस के लिए शासक भी धर्म का जानकार और धर्मनिष्ठ हो, यह भी आवश्यक है। धर्म के जानकारों को यह सुनिश्चित करना होगा की शासक धर्माचरण करनेवाले और धर्म के जानकर हों।&lt;br /&gt;
७.१.६ जीवन का अभारतीय प्रतिमान : जीवन के सभी क्षेत्रों में एकसाथ जीवन के प्रतिमान के परिवर्तन की प्रक्रिया को चलाना यह धर्म के जानकारों की जिम्मेदारी होगी। शिक्षा की भूमिका इसमें सबसे महत्वपूर्ण होगी। शिक्षा के माध्यम से समूचे जीवन के भारतीय प्रतिमान की रुपरेखा और प्रक्रिया को समाजव्यापी बनाना होगा। धर्मं-शरण शासन इसमें सहायता करेगा।&lt;br /&gt;
७.१.७ तन्त्रज्ञान  समायोजन : तन्त्रज्ञान के क्षेत्र में भारत के सामने दोहरी चुनौती होगी। एक ओर तो विश्व में जो तन्त्रज्ञान के विकास की होड़ लगी है उसमें अपनी विशेषताओं के साथ अग्रणी रहना। इस दृष्टि से विकास हेतु कुछ तन्त्रज्ञान निम्न हो सकते हैं।&lt;br /&gt;
- शून्य प्रदुषण रासायनिक उद्योग।&lt;br /&gt;
- सस्ती सौर उर्जा।&lt;br /&gt;
- प्रकृति में सहजता से घुलनशील प्लैस्टिक का निर्माण। &lt;br /&gt;
- औरों द्वारा प्रक्षेपित शस्त्रों/अणु-शस्त्रों का शमन करने का तंत्रज्ञान। ...............आदि &lt;br /&gt;
और दूसरी ओर वैकल्पिक विकेंद्रीकरणपर आधारित तन्त्रज्ञान का विकास कर उसे विश्व में प्रतिष्ठित करना। इस प्रकार के तन्त्रज्ञान में निम्न प्रकार के तन्त्रज्ञान होंगे।&lt;br /&gt;
- कौटुम्बिक उद्योगों के लिये, स्थानिक संसाधनों के उपयोग के लिए तन्त्रज्ञान  &lt;br /&gt;
- भिन्न भिन्न कार्यों के लिये पशु-उर्जा के अधिकाधिक उपयोग के लिये तंत्रज्ञान&lt;br /&gt;
- नविकरणीय प्राकृतिक संसाधनों से विविध पदार्थों के निर्माण से आवश्यकताओं की पूर्ति तथा संसाधनों के पुनर्भरण के लिये सरल तन्त्रज्ञान का विकास   &lt;br /&gt;
- मानव की प्राकृतिक क्षमताओं का विकास करनेवाली प्रक्रियाओं का अनुसंधान। ......... आदि &lt;br /&gt;
७.२ अंतर्राष्ट्रीय 	&lt;br /&gt;
७.२.१ मजहबी विस्तारवादी मानसिकता : वर्तमान में यह मुख्यत: ३ प्रकार की है। ईसाई, मुस्लिम और वामपंथी। यह तीनों ही विचारधाराएँ अधूरी हैं, एकांगी हैं। यह तो इन के सम्मुख ‘सर्वे भवन्तु सुखिन:’ को लेकर कोई चुनौती खड़ी नहीं होने से इन्हें विश्व में विस्तार का अवसर मिला है। जैसे ही ‘सर्वे भवन्तु सुखिन:’ का विचार लेकर भारत एक वैश्विक शक्ति के रूप में खड़ा होगा इनके पैरोंतले की जमीन खिसकने लगेगी। &lt;br /&gt;
७.२.२ आसुरी महत्वाकांक्षा : ऊपर जो बताया गया है वह, आसुरी महत्वाकांक्षा रखनेवाली वैश्विक शक्तियों के लिये भी लागू है। आसुरी महत्वाकांक्षाओं को परास्त करने की परंपरा भारत में युगों से रही है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== परिवर्तन के लिये समयबध्द करणीय कार्य ==&lt;br /&gt;
समूचे जीवन के प्रतिमान का परिवर्तन यह एक बहुत बृहद् और जटिल कार्य है। इस के लिये इसे सामाजिक अभियान का रूप देना होगा। समविचारी लोगों को संगठित होकर सहमति से और चरणबध्द पध्दति से प्रक्रिया को आगे बढाना होगा। बड़े पैमानेपर जीवन के हर क्षेत्र में जीवन के भारतीय प्रतिमान की समझ रखनेवाले और कृतीशील ऐसे लोग याने आचार्य निर्माण करने होंगे। परिवर्तन के चरण एक के बाद एक और एक के साथ सभी इस पध्दति से चलेंगे। जैसे दूसरे चरण के काल में ५० प्रतिशत शक्ति और संसाधन दूसरे चरणके निर्धारित विषयपर लगेंगे। और १२.५-१२.५ प्रतिशत शक्ति और संसाधन चरण १, ३, ४ और ५ में प्रत्येकपर लगेंगे।&lt;br /&gt;
१. समविचारी लोगों का ध्रुवीकरण : जिन्हें प्रतिमान के परिवर्तन की आस है और समझ भी है ऐसे समविचारी, सहचित्त लोगों का ध्रुवीकरण करना होगा। उनमें एक व्यापक सहमति निर्माण करनी होगी। अपने अपने कार्यक्षेत्र में क्या करना है इसका स्पष्टीकरण करना होगा।&lt;br /&gt;
२. अभियान के चरण : अभियान को चरणबध्द पध्दति से चलाना होगा। १२ वर्षों के ये पाँच चरण होंगे। ऐसी यह ६० वर्ष की योजना होगी। यह प्रक्रिया तीन पीढीतक चलेगी। तीसरी पीढी में परिवर्तन के फल देखने को मिलेंगे। लेकिन तबतक निष्ठा से और धैर्य से अभियान को चलाना होगा। निरंतर मूल्यांकन करना होगा। राह भटक नहीं जाए इसके लिये चौकन्ना रहना होगा।&lt;br /&gt;
२.१ अध्ययन और अनुसंधान : जीवन का दायरा बहुत व्यापक होता है। अनगिनत विषय इसमें आते हैं। इसलिये प्रतिमान के बदलाव से पहले हमें दोनों प्रतिमानों के विषय में और विशेषत: जीवन के भारतीय प्रतिमान के विषय में बहुत गहराई से अध्ययन करना होगा। मनुष्य की इच्छाओं का दायरा, उनकी पूर्ति के लिये वह क्या क्या कर सकता है आदि का दायरा अति विशाल है। इन दोनों को धर्म के नियंत्रण में ऐसे रखा जाता है इसका भी अध्ययन अनिवार्य है। मनुष्य के व्यक्तित्व को ठीक से समझना, उसके शरीर, मन, बुध्दि, चित्त, अहंकार आदि बातों को समझना, कर्मसिध्दांत को समझना, जन्म जन्मांतर चलने वाली शिक्षा की प्रक्रिया को समझना विविध विषयों के अंगांगी संबंधों को समझना, प्रकृति के रहस्यों को समझना आदि अनेकों ऐसी बातें हैं जिनका अध्ययन हमें करना होगा। इनमें से कई विषयों के संबंध में हमारे पूर्वजों ने विपुल साहित्य निर्माण किया था। उसमें से कितने ही साहित्य को जाने अंजाने में प्रक्षेपित किया गया है। इस प्रक्षिप्त हिस्से को समझ कर अलग निकालना होगा। शुध्द भारतीय तत्वोंपर आधारित ज्ञान को प्राप्त करना होगा। अंग्रेजों ने भारतीय साहित्य, इतिहास के साथ किये खिलवाड, भारतीय समाज में झगडे पैदा करने के लिये निर्मित साहित्य को अलग हटाकर शुध्द भारतीय याने एकात्म भाव की या कौटुम्बिक भाव की जितनी भी प्रस्तुतियाँ हैं उनका अध्ययन करना होगा। मान्यताओं, व्यवहार सूत्रों, संगठन निर्माण और व्यवस्था निर्माण की प्रक्रिया को समझना होगा।     &lt;br /&gt;
२.२ लोकमत परिष्कार : अध्ययन से जो ज्ञान उभरकर सामने आएगा उसे लोगोंतक ले जाना होगा। लोगों का प्रबोधन करना होगा। उन्हें फिर से समग्रता से और एकात्मता से सोचने और व्यवहार करने का तरीका बताना होगा। उन्हें उनकी सामाजिक जिम्मेदारी का समाजधर्म का अहसास करवाना होगा। वर्तमान की परिस्थितियों से सामान्यत: कोई भी खुश नहीं है। लेकिन जीवन का भारतीय प्रतिमान ही  उनकी कल्पना के अच्छे दिनों का वास्तव है यह सब के मन में स्थापित करना होगा।	         &lt;br /&gt;
२.३ संयुक्त कुटुम्ब : कुटुम्ब ही समाजधर्म सीखने की पाठशाला होता है। संयुक्त कुटुम्ब तो वास्तव में समाज का लघुरूप ही होता है। सामाजिक समस्याओं में से लगभग ७० प्रतिशत समस्याओं को तो केवल अच्छा संयुक्त कुटुम्ब ही निर्मूल कर देता है। समाज जीवन के लिये श्रेष्ठ लोगों को जन्म देने का काम, श्रेष्ठ संस्कार देने का काम, अच्छी आदतें डालने काम आजकल की फॅमिली पध्दति नहीं कर सकती। जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में जो तेजस्वी नेतृत्व का अभाव निर्माण हो गया है उसे दूर करना यह भारतीय मान्यताओं के अनुसार चलाए जानेवाले संयुक्त परिवारों में ही हो सकता है। इसलिये समाज का नेतृत्व करेंगे ऐसे श्रेष्ठ बालकों को जन्म देने के प्रयास तीसरे चरण में होंगे।&lt;br /&gt;
२.४ शिक्षक/धर्मज्ञ और शासक निर्माण : समाज परिवर्तन में शिक्षक की और शासक की ऐसे दोनों की भुमिका अत्यंत महत्वपूर्ण होती है। संयुक्त परिवारों में जन्म लिये बच्चों में से अब श्रेष्ठ धर्म के मार्गदर्शक, शिक्षक और शासक निर्माण करने की स्थिति होगी। ऐसे लोगों को समर्थन और सहायता देनेवाले कुटुम्ब और दूसरे चरण में निर्माण किये समाज के परिष्कृत विचारोंवाले सदस्य अब कुछ मात्रा में उपलब्ध होंगे।	   &lt;br /&gt;
२.५ संगठन और व्यवस्थाओं की प्रतिष्ठापना : श्रेष्ठ धर्म के अधिष्ठाता/मार्गदर्शक, सामर्थ्यवान शिक्षक और कुशल शासक अब प्रत्यक्ष संगठन का सशक्तिकरण और व्यवस्थाओं का निर्माण करेंगे।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==References==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;references /&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अन्य स्रोत:&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[Category:Bhartiya Jeevan Pratiman (भारतीय जीवन प्रतिमान)]]&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Dilipkelkar</name></author>
	</entry>
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		<id>https://dharmawiki.org/index.php?title=Planning_For_Change_(%E0%A4%AA%E0%A4%B0%E0%A4%BF%E0%A4%B5%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%A4%E0%A4%A8_%E0%A4%95%E0%A5%80_%E0%A4%AF%E0%A5%8B%E0%A4%9C%E0%A4%A8%E0%A4%BE)&amp;diff=119357</id>
		<title>Planning For Change (परिवर्तन की योजना)</title>
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		<updated>2019-06-02T14:34:17Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Dilipkelkar: /* व्यक्ति-समाज */ लेख सम्पादित किया&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{One source|date=January 2019}}&lt;br /&gt;
[[Template:Cleanup reorganize Dharmawiki Page]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
परिवर्तन की योजना को समझने के लिए हमें पहले निम्न बातें फिर से स्मरण करनी होंगी ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जीवन के भारतीय प्रतिमान की जानकारी के लिए - &lt;br /&gt;
# जीवनदृष्टि/व्यवहार : भारतीय जीवनदृष्टि और जीवनशैली के विषय में जानकारी के लिये कृपया [[Elements of Hindu Jeevan Drishti and Life Style (भारतीय/हिन्दू जीवनदृष्टि और जीवन शैली के सूत्र)|यह]] लेख देखें।&lt;br /&gt;
# व्यवस्था समूह का ढाँचा जीवनदृष्टि से सुसंगत होना चाहिए। कृपया व्यवस्था समूह के ढाँचे के लिये [[Jeevan Ka Pratiman (जीवन का प्रतिमान)|यह]] लेख और जानकारी के लिए [[Interrelationship in Srishti (सृष्टि में परस्पर सम्बद्धता)|यह]] लेख देखें।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== समस्या मूलों के निराकरण की नीति ==&lt;br /&gt;
समस्या मूल नष्ट करने से तात्पर्य समस्या मूलों पर आघात से नहीं है। समस्याएँ निर्माण ही नहीं हों ऐसी परिस्थितियों, ऐसे समाज संगठनों और ऐसी व्यवस्थाओं के निर्माण से है। निराकरण की प्रक्रिया के ३ चरण होंगे। समस्याओं को और परिवर्तन के स्वरूप को समझना, निराकरण की नीति तय करना और निराकरण का क्रियान्वयन करना। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== परिवर्तन के स्वरूप को समझना ==&lt;br /&gt;
समस्या का मूल जीवन के प्रतिमान के परिवर्तन में है। प्रतिमान का आधार समाज की जीवनदृष्टि होती है। व्यवहार, संगठन और व्यवस्थाएँ तो जीवनदृष्टि के आधार पर ही तय होते हैं। इसलिये परिवर्तन की प्रक्रिया में जीवनदृष्टि के परिवर्तन की प्रक्रिया को प्राथमिकता देनी होगी। व्यवहार में सुसंगतता आए इसलिये करणीय अकरणीय विवेक को सार्वत्रिक करना होगा। दूसरे क्रमांक पर संगठन और व्यवस्थाओं में परिवर्तन की प्रक्रिया चलेगी। व्यवस्था परिवर्तन की इस प्रक्रिया में समग्रता और एकात्मता के संदर्भ में व्यवस्था विशेष का आधार बनाने के लिये विषय की सैध्दांतिक प्रस्तुति करनी होगी। जैसे शासन व्यवस्था में यदि उचित परिवर्तन करना है तो पहले राजशास्त्र की सैध्दांतिक प्रस्तुति करना आवश्यक है। समृद्धि व्यवस्था में परिवर्तन करने के लिये समृद्धिशास्त्र की सैध्दांतिक प्रस्तुति करनी होगी। इन सैध्दांतिक प्रस्तुतियों को प्रयोग सिध्द करना होगा। प्रयोगों के आधार पर इन प्रस्तुतियों में उचित परिवर्तन करते हुए आगे बढना होगा। यह काम प्राथमिकता से धर्म के जानकारों का है। दूसरे क्रमांक की जिम्मेदारी शिक्षकों की है। शिक्षक वर्ग ही धर्म को सार्वत्रिक करता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== निराकरण की नीति ==&lt;br /&gt;
समस्याएँ इतनी अधिक और पेचिदा हैं कि इनका निराकरण अब संभव नहीं है, ऐसा कई विद्वान मानते हैं। हमने जो करणीय और अकरणीय विवेक को समझा है उसके अनुसार कोई भी बात असंभव नहीं होती। ऊपरी तौर पर असंभव लगने पर भी उसे संभव चरणों में बाँटकर संपन्न किया जा सकता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इस के लिये नीति के तौर पर हमारा व्यवहार निम्न प्रकार का होना चाहिए:&lt;br /&gt;
* सबसे पहले तो यह हमेशा ध्यान में रखना कि यह पूरे समाज जीवन के प्रतिमान के परिवर्तन का विषय है। इसे परिवर्तन के लिये कई पीढियों का समय लग सकता है। भारत वर्ष के दीर्घ इतिहास में समाज ने कई बार उत्थान और पतन के दौर अनुभव किये हैं। बार बार भारतीय समाज ने उत्थान किया है।&lt;br /&gt;
* परिवर्तन की प्रक्रिया को संभाव्य चरणों में बाँटना।&lt;br /&gt;
* उसमें आज जो हो सकता है उसे कर डालना।&lt;br /&gt;
* आज जिसे करना कठिन लगता है उसके लिये परिस्थितियाँ बनाते जाना। परिस्थितियाँ बनते ही उसे करना।&lt;br /&gt;
* प्रारंभ में जबतक परिवर्तन की प्रक्रिया ने गति नहीं पकडी है, यथासंभव कोई विरोध मोल नहीं लेना।&lt;br /&gt;
* इसी प्रकार से एक एक चरण को संभव बनाते हुए आगे बढ़ाते जाना।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== समस्या मूलों का निराकरण ==&lt;br /&gt;
वास्तव में समस्या मूलों को नष्ट करना यह शब्दप्रयोग ठीक नहीं है। उचित प्रतिमान की प्रतिष्ठापना के साथ ही गलत प्रतिमान का अंत अपने आप होता है। जो सर्वहितकारी है, उचित है, श्रेष्ठ है, उसकी प्रतिष्ठापना ही परिवर्तन की प्रक्रिया का स्वरूप होगा। स्वाभाविक जडता के कारण कुछ कठिनाईयाँ तो आएँगी। लेकिन गलत प्रतिमान को नष्ट करने के लिये अलग से शक्ति लगाने की आवश्यकता नहीं है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== समस्या मूल नष्ट करने हेतु धर्म के जानकारों के मार्गदर्शन में शिक्षा की व्याप्ति ==&lt;br /&gt;
# जीवनदृष्टि की शिक्षा : जीवनदृष्टि की शिक्षा मुख्यत: कामनाओं और कामनाओं की पूर्ति के प्रयास, धन, साधन और संसाधनों को धर्म के दायरे में रखने की शिक्षा ही है। पुरूषार्थ चतुष्टय की या त्रिवर्ग की शिक्षा ही है।&lt;br /&gt;
# व्यवस्थाएँ : जीवनदृष्टि के अनुसार व्यवहार हो सके इस हेतु से ही व्यवस्थाओं का निर्माण किया जाता है। व्यवस्थाओं के निर्माण में और उनके क्रियान्वयन में भी जीवनदृष्टि ओतप्रोत रहे इसका ध्यान रखना होगा।&lt;br /&gt;
## धर्म व्यवस्था&lt;br /&gt;
## शिक्षा व्यवस्था&lt;br /&gt;
## शासन व्यवस्था&lt;br /&gt;
## समृद्धि व्यवस्था&lt;br /&gt;
# संगठन : समाज संगठन और समाज की व्यवस्थाएँ एक दूसरे को पूरक पोषक होती हैं। लेकिन धर्म व्यवस्था, शिक्षा व्यवस्था और शासन व्यवस्था के अभाव में संगठन निर्माण करना अत्यंत कठिन हो जाता है। वास्तव में ये दोनों अन्योन्याश्रित होते हैं। समाज संगठन की जानकारी के लिये कृपया [[Society (समाज)|यह]] लेख देखें।&lt;br /&gt;
## कुटुम्ब&lt;br /&gt;
## स्वभाव समायोजन&lt;br /&gt;
## आश्रम&lt;br /&gt;
## कौशल विधा&lt;br /&gt;
## ग्राम&lt;br /&gt;
## राष्ट्र&lt;br /&gt;
# विज्ञान और तन्त्रज्ञान: कृपया [[Bharat's Science and Technology (भारतीय विज्ञान तन्त्रज्ञान दृष्टि)|यह]] लेख देखें। &lt;br /&gt;
## विकास और उपयोग नीति&lt;br /&gt;
## सार्वत्रिकीकरण&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== परिवर्तन की योजना ==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== परिवर्तन का स्वरूप ===&lt;br /&gt;
वर्तमान स्वार्थ पर आधारित जीवन के प्रतिमान के स्थान पर आत्मीयता याने कौटुम्बिक भावना पर आधारित जीवन के प्रतिमान की प्रतिष्ठापना:&lt;br /&gt;
# सर्वे भवन्तु सुखिन:, देशानुकूल और कालानुकूल आदि के संदर्भ में दोनों प्रतिमानों को समझना&lt;br /&gt;
# प्रतिमान का परिवर्तन&lt;br /&gt;
## सामाजिक व्यवस्थाओं का पुनर्निर्माण&lt;br /&gt;
### समाज के संगठनों का परिष्कार/पुनरूत्थान या नवनिर्माण&lt;br /&gt;
### तन्त्रज्ञान  का समायोजन / तन्त्रज्ञान  नीति / जीवन की इष्ट गति : वर्तमान में तन्त्रज्ञान  की विकास की गति से जीवन को जो गति प्राप्त हुई है उस के कारण सामान्य मनुष्य घसीटा जा रहा है। पर्यावरण सन्तुलन  और सामाजिकता दाँवपर लग गए हैं। ज्ञान, विज्ञान और तन्त्रज्ञान ये तीनों बातें पात्र व्यक्ति को ही मिलनी चाहिये। बंदर के हाथ में पलिता नहीं दिया जाता। इस लिये किसी भी तन्त्रज्ञान के सार्वत्रिकीकरण से पहले उसके पर्यावरण, समाजजीवन और व्यक्ति जीवनपर होनेवाले परिणाम जानना आवश्यक है। हानिकारक तंत्रज्ञान का तो विकास भी नहीं करना चाहिये। किया तो वह केवल सुपात्र को ही अंतरित हो यह सुनिश्चित करना चाहिये। ऐसी स्थिति में जीवन की इष्ट गति की ओर बढानेवाली तन्त्रज्ञान नीति का स्वीकार करना होगा। इष्ट गति के निकषों के लिये [[Bharat's Science and Technology (भारतीय विज्ञान एवं तन्त्रज्ञान दृष्टि)|इस]] लेख में बताई कसौटी लगानी होगी। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== परिवर्तन की प्रक्रिया ===&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सामाजिक परिवर्तन भौतिक वस्तुओं के परिवर्तन जैसे सरल नहीं होते। भौतिक पदार्थों का एक निश्चित स्वभाव होता है। धर्म होता है। इसे ध्यान में रखकर भौतिक पदार्थों को ढाला जाता है। हर मानव का स्वभाव भिन्न होता है। भिन्न समय पर भी उसमें बदलाव आ सकता है। इसलिये सामाजिक परिवर्तन क्रांति से नहीं उत्क्रांति से ही किये जा सकते हैं। उत्क्रांति की गति धीमी होती है। होने वाले परिवर्तनों से किसी की हानि नहीं हो या होने वाली हानि न्यूनतम हो, परिवर्तन स्थाई हों, परिवर्तन से सबको लाभ मिले यह सब देखकर ही प्रक्रिया चलाई जाती है। सामाजिक परिवर्तनों के लिये नई पीढी से प्रारंभ करना यह सबसे अच्छा रास्ता है। लेकिन नई पीढी में व्यापक रूप से परिवर्तन के पहलुओं को स्थापित करने के लिये आवश्यक इतनी पुरानी पीढी के श्रेष्ठ जनों की संख्या आवश्यक है। ऐसे श्रेष्ठ जनों का वर्णन श्रीमद्भगवद्गीता में किया गया है:&amp;lt;blockquote&amp;gt;यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जन:।&amp;lt;/blockquote&amp;gt;&amp;lt;blockquote&amp;gt;स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते॥ (अध्याय ३ श्लोक २१)&amp;lt;/blockquote&amp;gt;इसलिये एक दृष्टि से देखा जाए तो यह प्रक्रिया समाज के प्रत्येक व्यक्तितक ले जाने की आवश्यकता नहीं होती। केवल समाज जीवन की सभी विधाओं के श्रेष्ठ लोगों के निर्माण की प्रक्रिया ही परिवर्तन की प्रक्रिया है। एक बार ये लोग निर्माण हो गये तो फिर परिवर्तन तेज याने ज्यामितीय गति से होने लगता है।&lt;br /&gt;
* धीमी लेकिन अविश्रांत : हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि हमें सामाजिक परिवर्तन करना है। समाज एक जीवंत ईकाई होता है। जीवंत ईकाई में परिवर्तन हमेशा धीमी गति से, समग्रता से और अविरत करते रहने से होते हैं। कोई भी शीघ्रता या टुकडों में होनेवाले परिवर्तन हानिकारक होते हैं।&lt;br /&gt;
* सभी क्षेत्रों में एकसाथ : समाज एक जीवंत ईकाई होने के कारण इसके सभी अंग किसी भी बात से एक साथ प्रभावित होते हैं। प्रभाव का परिमाण कम अधिक होगा लेकिन प्रभाव सभी पर होता ही है। इसलिये परिवर्तन की प्रक्रिया टुकडों में अलग अलग या एक के बाद एक ऐसी नहीं होगी। परिवर्तन की प्रक्रिया धर्म, शिक्षा, शासन, अर्थ, न्याय, समाज संगठन आदि सभी क्षेत्रों में एक साथ चलेगी। ऐसी प्रक्रिया का प्रारंभ होना बहुत कठिन होता है। लेकिन एक बार सभी क्षेत्रों में प्रारंभ हो जाता है तो फिर यह तेजी से गति प्राप्त कर लेती है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== परिवर्तन के कारक तत्व ===&lt;br /&gt;
# शिक्षा : शिक्षा का दायरा बहुत व्यापक है। शिक्षा जन्म जन्मांतर चलनेवाली प्रक्रिया होती है। इस जन्म में शिक्षा गर्भधारणा से मृत्यूपर्यंत चलती है। आयु की अवस्था के अनुसार शिक्षा का स्वरूप बदलता है। &lt;br /&gt;
## कुटुम्ब में शिक्षा : कुटुम्ब में शिक्षा का प्रारंभ गर्भधारणा से होता है। मनुष्य की ६०-७० प्रतिशत घडन तो कुटुम्ब में ही होती है। कुटुम्ब में रहकर वह कई बातें सीखता है। कौटुम्बिक भावना, कर्तव्य, सदाचार आदि की शिक्षा कुटुम्ब की ही जिम्मेदारी होती है। व्यवस्थाओं के साथ समायोजन, व्यवस्थाओं के स्वरूप आदि भी वह कुटुम्ब में ही अपने ज्येष्ठों से सीखता है। इंद्रियों के विकास की शिक्षा, व्यावसायिक कौशल भी वह कुटुम्ब में ही सीखता है। कुटुम्ब सामाजिकता की पाठशाला ही होता है। बडों का आदर, स्त्री का आदर आदि भी कुटुम्ब ही सिखाता है। &lt;br /&gt;
## कुटुम्ब की शिक्षा : उसी प्रकार से कुटुम्ब के बारे में भी वह कई बातें सीखता है। उसकी व्यक्तिगत, कौटुम्बिक और सामाजिक आदतें बचपन में ही आकार लेतीं हैं। कुटुम्ब का महत्व, समाज में कौटुम्बिक भावना का महत्व, कौटुम्बिक व्यवस्थाओं का महत्व वह कुटुम्ब में सीखता है। भिन्न भिन्न स्वभावों के लोग एक छत के नीचे आत्मीयता से कैसे रहते हैं यह वह कुटुम्ब से ही सीखता है। लगभग सभी प्रकार से कुटुंब यह समाज का लघुरूप ही होता है। कुटुंब यह सामाजिकता की पाठशाला होती है। &lt;br /&gt;
## विद्याकेन्द्र शिक्षा: विद्याकेन्द्र की शिक्षा शास्त्रीय शिक्षा होती है। कुटुम्ब में सीखे हुए सदाचार के शास्त्रीय पक्ष को समझाने के लिये होती है। कुटुंब में सीखे हुए व्यावसायिक कौशलों को पैना बनाने के लिये होती है। कुटुंब में आत्मसात की हुई श्रेष्ठ परम्पराओं को अधिक उज्वल बनाने के तरीके सीखने के लिए होती है। अध्ययन का और कौशल का शास्त्रीय तरीका सिखने के लिये, अध्ययन को तेजस्वी बनाने के लिये होती है। &lt;br /&gt;
## लोकशिक्षा : लोकशिक्षा भी समाज जीवन का एक आवश्यक पहलू है। विद्याकेन्द्र की शिक्षा के उपरान्त भी मनुष्य का मन कई बार भ्रमित हो जाता हाय, बुद्धि कुण्ठित हो जाती है। ऐसी स्थिति में लोकशिक्षा की व्यवस्था इस संभ्रम को, इस कुण्ठा को दूर करती है। &lt;br /&gt;
## परंपरा निर्माण : अपने से अधिक श्रेष्ठ विरासत निर्माण करने की निरंतरता को श्रेष्ठ परंपरा कहते हैं। श्रेष्ठ परंपराओं के निर्माण की तीव्र इच्छा और पैने प्रयास समाज को श्रेष्ठ और चिरंजीवी बनाते हैं। &lt;br /&gt;
# शासन &lt;br /&gt;
## धर्मनिष्ठता : शासक धर्मशास्त्र के जानकार हों। धर्मशास्त्र के पालनकर्ता हों। धर्मशास्त्र के नियमों का प्रजा से अनुपालन करवाने में कुशल हों। &lt;br /&gt;
## धर्म व्यवस्था के साथ समायोजन : सदैव धर्म के जानकारों से अपना मूल्यांकन करवाएँ। धर्म के जानकारों की सूचनाओं का अनुपालन करें। अधर्म होने से प्रायश्चित्त और पश्चात्ताप के लिये उद्यत रहें। &lt;br /&gt;
# धर्म नेतृत्व &lt;br /&gt;
## धर्म के मार्गदर्शक : किसी का केवल धर्मशास्त्र का विशेषज्ञ होना पर्याप्त नहीं है। नि:स्वार्थ भाव, निर्भयता भी श्रेष्ठ धर्म के मार्गदर्शकों के लक्षण हैं। &lt;br /&gt;
## धर्माचरणी : धर्म का मार्गदर्शन करनेवाले लोग अपने व्यवहार में भी धर्मयुक्त होना चाहिये। &lt;br /&gt;
## विजीगिषु स्वभाववाले : धर्म का मार्गदर्शन करनेवाले लोगों के लिये विजीगिषु स्वभाव का होना आवश्यक है। कोई भी संकट आनेपर डगमगाएँ नहीं यह धर्म के मार्गदर्शकों के लिये आवश्यक है। धर्म के जानकारों का सबसे पहला कर्तव्य है कि वे वर्तमान काल के लिए धर्मशास्त्र या स्मृति की प्रस्तुति करें। यह स्मृति जीवन के सभी पहलुओं को व्यापने वाली हो। इसकी व्यापकता को समझने की दृष्टि से एक रूपरेखा नीचे दे रहे हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== धर्मशास्त्र प्रस्तुति के लिये बिन्दु ==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== धर्म की व्याख्याएँ ===&lt;br /&gt;
धर्म की व्याप्ति / त्रिवर्ग की व्याप्ति : सर्वे भवन्तु सुखिन: लक्ष्य हेतु धर्म : संस्कृति&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== व्यापक धर्मशास्त्र के प्रस्तुति की आवश्यकता ===&lt;br /&gt;
* पूर्व धर्मशास्त्रों की व्यापकता&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
* व्यापकता की आवश्यकता&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== व्यक्तिगत धर्म / पञ्चविध (कोष) पुरुष धर्म / चतुर्विध पुरूषार्थ /स्वधर्म (वर्णधर्म) ===&lt;br /&gt;
* शरीरधर्म &lt;br /&gt;
* मन-धर्म&lt;br /&gt;
* बुद्धि-धर्म&lt;br /&gt;
* चित्त-धर्म&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== सामाजिक संबंधों में धर्म ===&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== व्यक्ति-व्यक्ति : पुरूष-पुरूष या स्त्री-स्त्री ====&lt;br /&gt;
{{div col|colwidth=20em}}	 &lt;br /&gt;
# पारिवारिक रिश्ते&lt;br /&gt;
# पड़ोसी&lt;br /&gt;
# अतिथि&lt;br /&gt;
# शत्रु/विरोधक&lt;br /&gt;
# मित्र/सहायक&lt;br /&gt;
# सहकारी&lt;br /&gt;
# अपरिचित&lt;br /&gt;
# मालिक/नौकर&lt;br /&gt;
# चरित्रहीन स्त्री/पुरूष&lt;br /&gt;
# व्यसनी&lt;br /&gt;
# जरूरतमंद&lt;br /&gt;
# समव्यवसायी&lt;br /&gt;
# भिन्न व्यवसायी&lt;br /&gt;
# याचक&lt;br /&gt;
# भिन्न भाषी&lt;br /&gt;
# विक्रेता \ क्रेता&lt;br /&gt;
# भिन्न राष्ट्रीय&lt;br /&gt;
{{div col end}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== व्यक्ति-व्यक्ति : पुरूष-स्त्री ====&lt;br /&gt;
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# पारिवारिक रिश्ते&lt;br /&gt;
# पड़ोसी&lt;br /&gt;
# अतिथि&lt;br /&gt;
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# मित्र/सहायक&lt;br /&gt;
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&lt;br /&gt;
==== व्यक्ति-समाज ====&lt;br /&gt;
{{div col|colwidth=20em}}	 &lt;br /&gt;
# व्यक्ति-परिवार&lt;br /&gt;
# व्यति-जाति&lt;br /&gt;
# पड़ोसी&lt;br /&gt;
# सामाजिक संगठन&lt;br /&gt;
# व्यक्ति-व्यवस्था&lt;br /&gt;
# व्यक्ति-राष्ट्र&lt;br /&gt;
# व्यक्ति-विश्व समाज&lt;br /&gt;
# व्यक्ति भिन्न भाषी&lt;br /&gt;
# परप्रांतीय&lt;br /&gt;
# परदेसी&lt;br /&gt;
{{div col end}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== समाज-समाज ====&lt;br /&gt;
# अंतर्राष्ट्रीय:&lt;br /&gt;
## शत्रु&lt;br /&gt;
## मित्र&lt;br /&gt;
## तटस्थ&lt;br /&gt;
# अंतर्देशीय&lt;br /&gt;
## प्रांत-प्रांत&lt;br /&gt;
## जनपद-जनपद&lt;br /&gt;
## भाषिक समूह&lt;br /&gt;
## पंथ समूह&lt;br /&gt;
## राष्ट्रीय समूह&lt;br /&gt;
## अराष्ट्रीय समूह&lt;br /&gt;
## राष्ट्रद्रोही समूह&lt;br /&gt;
## विदेशी&lt;br /&gt;
## समव्यवासायी&lt;br /&gt;
## जाति-जाति&lt;br /&gt;
## परिवार परिवार&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== सृष्टिगत सम्बन्धों में धर्म ===&lt;br /&gt;
# मनुष्य-अन्य जीव:&lt;br /&gt;
## मनुष्य-पालतू प्राणी:&lt;br /&gt;
### शाकाहारी&lt;br /&gt;
### मांसाहारी&lt;br /&gt;
## मनुष्य अन्य प्राणी:&lt;br /&gt;
### थलचर:&lt;br /&gt;
#### शाकाहारी&lt;br /&gt;
#### मांसाहारी&lt;br /&gt;
### जलचर&lt;br /&gt;
### नभचर&lt;br /&gt;
## मनुष्य-वनस्पति:&lt;br /&gt;
### जमीन के नीचे&lt;br /&gt;
### जमीन के ऊपर&lt;br /&gt;
### वनस्पति/औषधी&lt;br /&gt;
### खानेयोग्य / अन्न&lt;br /&gt;
### अखाद्य / जहरीली&lt;br /&gt;
### नशीली&lt;br /&gt;
## मनुष्य-कृमि / कीटक / सूक्ष्म जीव&lt;br /&gt;
### सहायक&lt;br /&gt;
### हानिकारक&lt;br /&gt;
## मनुष्य-जड़ प्रकृति / पंचमहाभूत&lt;br /&gt;
### अनवीकरणीय/खनिज&lt;br /&gt;
#### ठोस&lt;br /&gt;
#### द्रव&lt;br /&gt;
#### वायु (इंधन)&lt;br /&gt;
### नवीकरणीय&lt;br /&gt;
#### वायु/हवा&lt;br /&gt;
#### जल&lt;br /&gt;
#### सूर्यप्रकाश&lt;br /&gt;
#### लकड़ी&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== आपद्धर्म ===&lt;br /&gt;
# प्राकृतिक आपदा&lt;br /&gt;
# मानव निर्मित आपदा (लगभग उपर्युक्त सभी विषयों में)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== परिवर्तन के पुरोधा ==&lt;br /&gt;
उपर्युक्त बिन्दु २ में बताए गए श्रेष्ठ जन ही परिवर्तन के पुरोधा होंगे। इनका प्रमाण समाज में मुष्किल से ५-७ प्रतिशत ही पर्याप्त होता है। ऐसे श्रेष्ठ जनों में निम्न वर्ग के लोग आते हैं।	&lt;br /&gt;
४.१ शिक्षक : शिक्षक ज्ञानी, त्यागी, कुशल, समाज हित के लिए समर्पित, धर्म का जानकार, समाज को घडने की सामर्थ्य रखनेवाला होता है। नई पीढी जो परिवर्तन का अधिक सहजता से स्वीकार कर सकती है उसको घडना शिक्षक का काम होता है। इसलिये परिवर्तन की प्रक्रिया का मुख्य पुरोधा शिक्षक ही होता है।	&lt;br /&gt;
४.२ श्रेष्ठ जन :यहाँ श्रेष्ठ जनों से मतलब भिन्न भिन्न सामाजिक गतिविधियों में जो अग्रणी लोग हैं उनसे है।	&lt;br /&gt;
४.३ सांप्रदायिक संगठनों के प्रमुख : आजकल समाज का एक बहुत बडा वर्ग जिसमें शिक्षित वर्ग भी है, भिन्न भिन्न संप्रदायों से जुडा है। उन संप्रदायों के प्रमुख भी इस परिवर्तन की प्रक्रिया का एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण हिस्सा बनने की शक्ति रखते हैं।	&lt;br /&gt;
४.४ लोकशिक्षा के माध्यम : कीर्तनकार, कथाकार, प्रवचनकार, नाटक मंडलि, पुरोहित या उपाध्याय, साधू, बैरागी, सिंहस्थ या कुंभ जैसे मेले, यात्राएँ आदि लोकशिक्षा के माध्यम हुआ करते थे। वर्तमान में ये सब कमजोर और दिशाहीन हो गए हैं। एक ओर इनमें से जिनको पुनर्जीवित कर सकते हैं उन्हें करना। नए आयाम भी जोडे जा सकते हैं। जैसे अभी लगभग देढ दशक पूर्व महाराष्ट्र में प्रारंभ हुई नव-वर्ष स्वागत यात्राएँ आदि।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== अंतर्निहित सुधार व्यवस्था ==&lt;br /&gt;
काल के प्रवाह में समाज में हो रहे परिवर्तन और मनुष्य की स्खलनशीलता के कारण बढनेवाला अधर्माचरण ये दो बातें ऐसीं हैं जो किसी भी श्रेष्ठतम समाज को भी नष्ट कर देतीं हैं। इस दृष्टि से जागरूक ऐसे शिक्षक और धर्म के मार्गदर्शक साथ में मिलकर समाज की अंतर्निहित सुधार व्यवस्था बनाते हैं। अपनी संवेदनशीलता और समाज के निरंतर बारीकी से हो रहे अध्ययन के कारण इन्हें संकटों का पूर्वानुमान हो जाता है। अपने निरीक्षणों के आधारपर अपने लोकसंग्रही स्वभाव से ये लोगों को भी संकटों से ऊपर उठने के लिये तैयार करते हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== परिवर्तन की नीति ==&lt;br /&gt;
प्रारंभ में विरोध को आमंत्रण नहीं देना। संघर्ष में शक्ति का अपव्यय नहीं करना। जो आज कर सकते हैं उसे करते जाना। जो कल करने की आवश्यकता है उस के लिये परिस्थिति निर्माण करना। परिस्थिति के निर्माण होते ही आगे बढना।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== परिवर्तन में अवरोध और उनका निराकरण ==&lt;br /&gt;
शासनाधिष्ठित समाज में स्वार्थ के आधारपर परिवर्तन सरल और तेज गति से होता है। हिटलरने १५-२० वर्षों में ही जर्मनी को एक समर्थ राष्ट्र के रूप में खड़ा कर दिया था। लेकिन धर्म पर आधारित जीवन के प्रतिमान में परिवर्तन की गति धीमी और मार्ग कठिन होता है। स्थाई परिवर्तन और वह भी कौटुम्बिक भावना के आधारपर, तो धीरे धीरे ही होता है। &lt;br /&gt;
७.१ अंतर्देशीय 	&lt;br /&gt;
७.१.१ मानवीय जड़ता : परिवर्तन का आनंद से स्वागत करनेवाले लोग समाज में अल्पसंख्य ही होते हैं। सामान्यत: युवा वर्ग ही परिवर्तन के लिए तैयार होता है। इसलिए युवा वर्ग को इस परिवर्तन की प्रक्रिया में सहभागी बनाना होगा। परिवर्तन की प्रक्रिया में युवाओं को सम्मिलित करते जाने से दो तीन पीढ़ियों में परिवर्तन का चक्र गतिमान हो जाएगा।&lt;br /&gt;
७.१.२ विपरीत शिक्षा : जैसे जैसे भारतीय शिक्षा का विस्तार समाज में होगा वर्तमान की विपरीत शिक्षा का अपने आप ही क्रमश: लोप होगा।	   &lt;br /&gt;
७.१.३ मजहबी मानसिकता : भारतीय याने धर्म की शिक्षा के उदय और विस्तार के साथ ही मजहबी शिक्षा और उसका प्रभाव भी शनै: शनै: घटता जाएगा। मजहबों की वास्तविकता को भी उजागर करना आवश्यक है। &lt;br /&gt;
७.१.४ धर्म के ठेकेदार : जैसे जैसे धर्म के जानकार और धर्म के अनुसार आचरण करनेवाले लोग समाज में दिखने लगेंगे, धर्म के तथाकथित ठेकेदारों का प्रभाव कम होता जाएगा। &lt;br /&gt;
७.१.५ शासन तंत्र : इस परिवर्तन की प्रक्रिया में धर्म के जानकारों के बाद शासन की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण होगी। धर्माचरणी लोगों को समर्थन, सहायता और संरक्षण देने का काम शासन को करना होगा। इस के लिए शासक भी धर्म का जानकार और धर्मनिष्ठ हो, यह भी आवश्यक है। धर्म के जानकारों को यह सुनिश्चित करना होगा की शासक धर्माचरण करनेवाले और धर्म के जानकर हों।&lt;br /&gt;
७.१.६ जीवन का अभारतीय प्रतिमान : जीवन के सभी क्षेत्रों में एकसाथ जीवन के प्रतिमान के परिवर्तन की प्रक्रिया को चलाना यह धर्म के जानकारों की जिम्मेदारी होगी। शिक्षा की भूमिका इसमें सबसे महत्वपूर्ण होगी। शिक्षा के माध्यम से समूचे जीवन के भारतीय प्रतिमान की रुपरेखा और प्रक्रिया को समाजव्यापी बनाना होगा। धर्मं-शरण शासन इसमें सहायता करेगा।&lt;br /&gt;
७.१.७ तन्त्रज्ञान  समायोजन : तन्त्रज्ञान के क्षेत्र में भारत के सामने दोहरी चुनौती होगी। एक ओर तो विश्व में जो तन्त्रज्ञान के विकास की होड़ लगी है उसमें अपनी विशेषताओं के साथ अग्रणी रहना। इस दृष्टि से विकास हेतु कुछ तन्त्रज्ञान निम्न हो सकते हैं।&lt;br /&gt;
- शून्य प्रदुषण रासायनिक उद्योग।&lt;br /&gt;
- सस्ती सौर उर्जा।&lt;br /&gt;
- प्रकृति में सहजता से घुलनशील प्लैस्टिक का निर्माण। &lt;br /&gt;
- औरों द्वारा प्रक्षेपित शस्त्रों/अणु-शस्त्रों का शमन करने का तंत्रज्ञान। ...............आदि &lt;br /&gt;
और दूसरी ओर वैकल्पिक विकेंद्रीकरणपर आधारित तन्त्रज्ञान का विकास कर उसे विश्व में प्रतिष्ठित करना। इस प्रकार के तन्त्रज्ञान में निम्न प्रकार के तन्त्रज्ञान होंगे।&lt;br /&gt;
- कौटुम्बिक उद्योगों के लिये, स्थानिक संसाधनों के उपयोग के लिए तन्त्रज्ञान  &lt;br /&gt;
- भिन्न भिन्न कार्यों के लिये पशु-उर्जा के अधिकाधिक उपयोग के लिये तंत्रज्ञान&lt;br /&gt;
- नविकरणीय प्राकृतिक संसाधनों से विविध पदार्थों के निर्माण से आवश्यकताओं की पूर्ति तथा संसाधनों के पुनर्भरण के लिये सरल तन्त्रज्ञान का विकास   &lt;br /&gt;
- मानव की प्राकृतिक क्षमताओं का विकास करनेवाली प्रक्रियाओं का अनुसंधान। ......... आदि &lt;br /&gt;
७.२ अंतर्राष्ट्रीय 	&lt;br /&gt;
७.२.१ मजहबी विस्तारवादी मानसिकता : वर्तमान में यह मुख्यत: ३ प्रकार की है। ईसाई, मुस्लिम और वामपंथी। यह तीनों ही विचारधाराएँ अधूरी हैं, एकांगी हैं। यह तो इन के सम्मुख ‘सर्वे भवन्तु सुखिन:’ को लेकर कोई चुनौती खड़ी नहीं होने से इन्हें विश्व में विस्तार का अवसर मिला है। जैसे ही ‘सर्वे भवन्तु सुखिन:’ का विचार लेकर भारत एक वैश्विक शक्ति के रूप में खड़ा होगा इनके पैरोंतले की जमीन खिसकने लगेगी। &lt;br /&gt;
७.२.२ आसुरी महत्वाकांक्षा : ऊपर जो बताया गया है वह, आसुरी महत्वाकांक्षा रखनेवाली वैश्विक शक्तियों के लिये भी लागू है। आसुरी महत्वाकांक्षाओं को परास्त करने की परंपरा भारत में युगों से रही है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== परिवर्तन के लिये समयबध्द करणीय कार्य ==&lt;br /&gt;
समूचे जीवन के प्रतिमान का परिवर्तन यह एक बहुत बृहद् और जटिल कार्य है। इस के लिये इसे सामाजिक अभियान का रूप देना होगा। समविचारी लोगों को संगठित होकर सहमति से और चरणबध्द पध्दति से प्रक्रिया को आगे बढाना होगा। बड़े पैमानेपर जीवन के हर क्षेत्र में जीवन के भारतीय प्रतिमान की समझ रखनेवाले और कृतीशील ऐसे लोग याने आचार्य निर्माण करने होंगे। परिवर्तन के चरण एक के बाद एक और एक के साथ सभी इस पध्दति से चलेंगे। जैसे दूसरे चरण के काल में ५० प्रतिशत शक्ति और संसाधन दूसरे चरणके निर्धारित विषयपर लगेंगे। और १२.५-१२.५ प्रतिशत शक्ति और संसाधन चरण १, ३, ४ और ५ में प्रत्येकपर लगेंगे।&lt;br /&gt;
१. समविचारी लोगों का ध्रुवीकरण : जिन्हें प्रतिमान के परिवर्तन की आस है और समझ भी है ऐसे समविचारी, सहचित्त लोगों का ध्रुवीकरण करना होगा। उनमें एक व्यापक सहमति निर्माण करनी होगी। अपने अपने कार्यक्षेत्र में क्या करना है इसका स्पष्टीकरण करना होगा।&lt;br /&gt;
२. अभियान के चरण : अभियान को चरणबध्द पध्दति से चलाना होगा। १२ वर्षों के ये पाँच चरण होंगे। ऐसी यह ६० वर्ष की योजना होगी। यह प्रक्रिया तीन पीढीतक चलेगी। तीसरी पीढी में परिवर्तन के फल देखने को मिलेंगे। लेकिन तबतक निष्ठा से और धैर्य से अभियान को चलाना होगा। निरंतर मूल्यांकन करना होगा। राह भटक नहीं जाए इसके लिये चौकन्ना रहना होगा।&lt;br /&gt;
२.१ अध्ययन और अनुसंधान : जीवन का दायरा बहुत व्यापक होता है। अनगिनत विषय इसमें आते हैं। इसलिये प्रतिमान के बदलाव से पहले हमें दोनों प्रतिमानों के विषय में और विशेषत: जीवन के भारतीय प्रतिमान के विषय में बहुत गहराई से अध्ययन करना होगा। मनुष्य की इच्छाओं का दायरा, उनकी पूर्ति के लिये वह क्या क्या कर सकता है आदि का दायरा अति विशाल है। इन दोनों को धर्म के नियंत्रण में ऐसे रखा जाता है इसका भी अध्ययन अनिवार्य है। मनुष्य के व्यक्तित्व को ठीक से समझना, उसके शरीर, मन, बुध्दि, चित्त, अहंकार आदि बातों को समझना, कर्मसिध्दांत को समझना, जन्म जन्मांतर चलने वाली शिक्षा की प्रक्रिया को समझना विविध विषयों के अंगांगी संबंधों को समझना, प्रकृति के रहस्यों को समझना आदि अनेकों ऐसी बातें हैं जिनका अध्ययन हमें करना होगा। इनमें से कई विषयों के संबंध में हमारे पूर्वजों ने विपुल साहित्य निर्माण किया था। उसमें से कितने ही साहित्य को जाने अंजाने में प्रक्षेपित किया गया है। इस प्रक्षिप्त हिस्से को समझ कर अलग निकालना होगा। शुध्द भारतीय तत्वोंपर आधारित ज्ञान को प्राप्त करना होगा। अंग्रेजों ने भारतीय साहित्य, इतिहास के साथ किये खिलवाड, भारतीय समाज में झगडे पैदा करने के लिये निर्मित साहित्य को अलग हटाकर शुध्द भारतीय याने एकात्म भाव की या कौटुम्बिक भाव की जितनी भी प्रस्तुतियाँ हैं उनका अध्ययन करना होगा। मान्यताओं, व्यवहार सूत्रों, संगठन निर्माण और व्यवस्था निर्माण की प्रक्रिया को समझना होगा।     &lt;br /&gt;
२.२ लोकमत परिष्कार : अध्ययन से जो ज्ञान उभरकर सामने आएगा उसे लोगोंतक ले जाना होगा। लोगों का प्रबोधन करना होगा। उन्हें फिर से समग्रता से और एकात्मता से सोचने और व्यवहार करने का तरीका बताना होगा। उन्हें उनकी सामाजिक जिम्मेदारी का समाजधर्म का अहसास करवाना होगा। वर्तमान की परिस्थितियों से सामान्यत: कोई भी खुश नहीं है। लेकिन जीवन का भारतीय प्रतिमान ही  उनकी कल्पना के अच्छे दिनों का वास्तव है यह सब के मन में स्थापित करना होगा।	         &lt;br /&gt;
२.३ संयुक्त कुटुम्ब : कुटुम्ब ही समाजधर्म सीखने की पाठशाला होता है। संयुक्त कुटुम्ब तो वास्तव में समाज का लघुरूप ही होता है। सामाजिक समस्याओं में से लगभग ७० प्रतिशत समस्याओं को तो केवल अच्छा संयुक्त कुटुम्ब ही निर्मूल कर देता है। समाज जीवन के लिये श्रेष्ठ लोगों को जन्म देने का काम, श्रेष्ठ संस्कार देने का काम, अच्छी आदतें डालने काम आजकल की फॅमिली पध्दति नहीं कर सकती। जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में जो तेजस्वी नेतृत्व का अभाव निर्माण हो गया है उसे दूर करना यह भारतीय मान्यताओं के अनुसार चलाए जानेवाले संयुक्त परिवारों में ही हो सकता है। इसलिये समाज का नेतृत्व करेंगे ऐसे श्रेष्ठ बालकों को जन्म देने के प्रयास तीसरे चरण में होंगे।&lt;br /&gt;
२.४ शिक्षक/धर्मज्ञ और शासक निर्माण : समाज परिवर्तन में शिक्षक की और शासक की ऐसे दोनों की भुमिका अत्यंत महत्वपूर्ण होती है। संयुक्त परिवारों में जन्म लिये बच्चों में से अब श्रेष्ठ धर्म के मार्गदर्शक, शिक्षक और शासक निर्माण करने की स्थिति होगी। ऐसे लोगों को समर्थन और सहायता देनेवाले कुटुम्ब और दूसरे चरण में निर्माण किये समाज के परिष्कृत विचारोंवाले सदस्य अब कुछ मात्रा में उपलब्ध होंगे।	   &lt;br /&gt;
२.५ संगठन और व्यवस्थाओं की प्रतिष्ठापना : श्रेष्ठ धर्म के अधिष्ठाता/मार्गदर्शक, सामर्थ्यवान शिक्षक और कुशल शासक अब प्रत्यक्ष संगठन का सशक्तिकरण और व्यवस्थाओं का निर्माण करेंगे।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==References==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;references /&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अन्य स्रोत:&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[Category:Bhartiya Jeevan Pratiman (भारतीय जीवन प्रतिमान)]]&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Dilipkelkar</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://dharmawiki.org/index.php?title=Planning_For_Change_(%E0%A4%AA%E0%A4%B0%E0%A4%BF%E0%A4%B5%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%A4%E0%A4%A8_%E0%A4%95%E0%A5%80_%E0%A4%AF%E0%A5%8B%E0%A4%9C%E0%A4%A8%E0%A4%BE)&amp;diff=119356</id>
		<title>Planning For Change (परिवर्तन की योजना)</title>
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		<updated>2019-06-02T14:33:40Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Dilipkelkar: /* व्यक्ति-व्यक्ति : पुरूष-स्त्री */ लेख सम्पादित किया&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{One source|date=January 2019}}&lt;br /&gt;
[[Template:Cleanup reorganize Dharmawiki Page]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
परिवर्तन की योजना को समझने के लिए हमें पहले निम्न बातें फिर से स्मरण करनी होंगी ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जीवन के भारतीय प्रतिमान की जानकारी के लिए - &lt;br /&gt;
# जीवनदृष्टि/व्यवहार : भारतीय जीवनदृष्टि और जीवनशैली के विषय में जानकारी के लिये कृपया [[Elements of Hindu Jeevan Drishti and Life Style (भारतीय/हिन्दू जीवनदृष्टि और जीवन शैली के सूत्र)|यह]] लेख देखें।&lt;br /&gt;
# व्यवस्था समूह का ढाँचा जीवनदृष्टि से सुसंगत होना चाहिए। कृपया व्यवस्था समूह के ढाँचे के लिये [[Jeevan Ka Pratiman (जीवन का प्रतिमान)|यह]] लेख और जानकारी के लिए [[Interrelationship in Srishti (सृष्टि में परस्पर सम्बद्धता)|यह]] लेख देखें।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== समस्या मूलों के निराकरण की नीति ==&lt;br /&gt;
समस्या मूल नष्ट करने से तात्पर्य समस्या मूलों पर आघात से नहीं है। समस्याएँ निर्माण ही नहीं हों ऐसी परिस्थितियों, ऐसे समाज संगठनों और ऐसी व्यवस्थाओं के निर्माण से है। निराकरण की प्रक्रिया के ३ चरण होंगे। समस्याओं को और परिवर्तन के स्वरूप को समझना, निराकरण की नीति तय करना और निराकरण का क्रियान्वयन करना। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== परिवर्तन के स्वरूप को समझना ==&lt;br /&gt;
समस्या का मूल जीवन के प्रतिमान के परिवर्तन में है। प्रतिमान का आधार समाज की जीवनदृष्टि होती है। व्यवहार, संगठन और व्यवस्थाएँ तो जीवनदृष्टि के आधार पर ही तय होते हैं। इसलिये परिवर्तन की प्रक्रिया में जीवनदृष्टि के परिवर्तन की प्रक्रिया को प्राथमिकता देनी होगी। व्यवहार में सुसंगतता आए इसलिये करणीय अकरणीय विवेक को सार्वत्रिक करना होगा। दूसरे क्रमांक पर संगठन और व्यवस्थाओं में परिवर्तन की प्रक्रिया चलेगी। व्यवस्था परिवर्तन की इस प्रक्रिया में समग्रता और एकात्मता के संदर्भ में व्यवस्था विशेष का आधार बनाने के लिये विषय की सैध्दांतिक प्रस्तुति करनी होगी। जैसे शासन व्यवस्था में यदि उचित परिवर्तन करना है तो पहले राजशास्त्र की सैध्दांतिक प्रस्तुति करना आवश्यक है। समृद्धि व्यवस्था में परिवर्तन करने के लिये समृद्धिशास्त्र की सैध्दांतिक प्रस्तुति करनी होगी। इन सैध्दांतिक प्रस्तुतियों को प्रयोग सिध्द करना होगा। प्रयोगों के आधार पर इन प्रस्तुतियों में उचित परिवर्तन करते हुए आगे बढना होगा। यह काम प्राथमिकता से धर्म के जानकारों का है। दूसरे क्रमांक की जिम्मेदारी शिक्षकों की है। शिक्षक वर्ग ही धर्म को सार्वत्रिक करता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== निराकरण की नीति ==&lt;br /&gt;
समस्याएँ इतनी अधिक और पेचिदा हैं कि इनका निराकरण अब संभव नहीं है, ऐसा कई विद्वान मानते हैं। हमने जो करणीय और अकरणीय विवेक को समझा है उसके अनुसार कोई भी बात असंभव नहीं होती। ऊपरी तौर पर असंभव लगने पर भी उसे संभव चरणों में बाँटकर संपन्न किया जा सकता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इस के लिये नीति के तौर पर हमारा व्यवहार निम्न प्रकार का होना चाहिए:&lt;br /&gt;
* सबसे पहले तो यह हमेशा ध्यान में रखना कि यह पूरे समाज जीवन के प्रतिमान के परिवर्तन का विषय है। इसे परिवर्तन के लिये कई पीढियों का समय लग सकता है। भारत वर्ष के दीर्घ इतिहास में समाज ने कई बार उत्थान और पतन के दौर अनुभव किये हैं। बार बार भारतीय समाज ने उत्थान किया है।&lt;br /&gt;
* परिवर्तन की प्रक्रिया को संभाव्य चरणों में बाँटना।&lt;br /&gt;
* उसमें आज जो हो सकता है उसे कर डालना।&lt;br /&gt;
* आज जिसे करना कठिन लगता है उसके लिये परिस्थितियाँ बनाते जाना। परिस्थितियाँ बनते ही उसे करना।&lt;br /&gt;
* प्रारंभ में जबतक परिवर्तन की प्रक्रिया ने गति नहीं पकडी है, यथासंभव कोई विरोध मोल नहीं लेना।&lt;br /&gt;
* इसी प्रकार से एक एक चरण को संभव बनाते हुए आगे बढ़ाते जाना।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== समस्या मूलों का निराकरण ==&lt;br /&gt;
वास्तव में समस्या मूलों को नष्ट करना यह शब्दप्रयोग ठीक नहीं है। उचित प्रतिमान की प्रतिष्ठापना के साथ ही गलत प्रतिमान का अंत अपने आप होता है। जो सर्वहितकारी है, उचित है, श्रेष्ठ है, उसकी प्रतिष्ठापना ही परिवर्तन की प्रक्रिया का स्वरूप होगा। स्वाभाविक जडता के कारण कुछ कठिनाईयाँ तो आएँगी। लेकिन गलत प्रतिमान को नष्ट करने के लिये अलग से शक्ति लगाने की आवश्यकता नहीं है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== समस्या मूल नष्ट करने हेतु धर्म के जानकारों के मार्गदर्शन में शिक्षा की व्याप्ति ==&lt;br /&gt;
# जीवनदृष्टि की शिक्षा : जीवनदृष्टि की शिक्षा मुख्यत: कामनाओं और कामनाओं की पूर्ति के प्रयास, धन, साधन और संसाधनों को धर्म के दायरे में रखने की शिक्षा ही है। पुरूषार्थ चतुष्टय की या त्रिवर्ग की शिक्षा ही है।&lt;br /&gt;
# व्यवस्थाएँ : जीवनदृष्टि के अनुसार व्यवहार हो सके इस हेतु से ही व्यवस्थाओं का निर्माण किया जाता है। व्यवस्थाओं के निर्माण में और उनके क्रियान्वयन में भी जीवनदृष्टि ओतप्रोत रहे इसका ध्यान रखना होगा।&lt;br /&gt;
## धर्म व्यवस्था&lt;br /&gt;
## शिक्षा व्यवस्था&lt;br /&gt;
## शासन व्यवस्था&lt;br /&gt;
## समृद्धि व्यवस्था&lt;br /&gt;
# संगठन : समाज संगठन और समाज की व्यवस्थाएँ एक दूसरे को पूरक पोषक होती हैं। लेकिन धर्म व्यवस्था, शिक्षा व्यवस्था और शासन व्यवस्था के अभाव में संगठन निर्माण करना अत्यंत कठिन हो जाता है। वास्तव में ये दोनों अन्योन्याश्रित होते हैं। समाज संगठन की जानकारी के लिये कृपया [[Society (समाज)|यह]] लेख देखें।&lt;br /&gt;
## कुटुम्ब&lt;br /&gt;
## स्वभाव समायोजन&lt;br /&gt;
## आश्रम&lt;br /&gt;
## कौशल विधा&lt;br /&gt;
## ग्राम&lt;br /&gt;
## राष्ट्र&lt;br /&gt;
# विज्ञान और तन्त्रज्ञान: कृपया [[Bharat's Science and Technology (भारतीय विज्ञान तन्त्रज्ञान दृष्टि)|यह]] लेख देखें। &lt;br /&gt;
## विकास और उपयोग नीति&lt;br /&gt;
## सार्वत्रिकीकरण&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== परिवर्तन की योजना ==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== परिवर्तन का स्वरूप ===&lt;br /&gt;
वर्तमान स्वार्थ पर आधारित जीवन के प्रतिमान के स्थान पर आत्मीयता याने कौटुम्बिक भावना पर आधारित जीवन के प्रतिमान की प्रतिष्ठापना:&lt;br /&gt;
# सर्वे भवन्तु सुखिन:, देशानुकूल और कालानुकूल आदि के संदर्भ में दोनों प्रतिमानों को समझना&lt;br /&gt;
# प्रतिमान का परिवर्तन&lt;br /&gt;
## सामाजिक व्यवस्थाओं का पुनर्निर्माण&lt;br /&gt;
### समाज के संगठनों का परिष्कार/पुनरूत्थान या नवनिर्माण&lt;br /&gt;
### तन्त्रज्ञान  का समायोजन / तन्त्रज्ञान  नीति / जीवन की इष्ट गति : वर्तमान में तन्त्रज्ञान  की विकास की गति से जीवन को जो गति प्राप्त हुई है उस के कारण सामान्य मनुष्य घसीटा जा रहा है। पर्यावरण सन्तुलन  और सामाजिकता दाँवपर लग गए हैं। ज्ञान, विज्ञान और तन्त्रज्ञान ये तीनों बातें पात्र व्यक्ति को ही मिलनी चाहिये। बंदर के हाथ में पलिता नहीं दिया जाता। इस लिये किसी भी तन्त्रज्ञान के सार्वत्रिकीकरण से पहले उसके पर्यावरण, समाजजीवन और व्यक्ति जीवनपर होनेवाले परिणाम जानना आवश्यक है। हानिकारक तंत्रज्ञान का तो विकास भी नहीं करना चाहिये। किया तो वह केवल सुपात्र को ही अंतरित हो यह सुनिश्चित करना चाहिये। ऐसी स्थिति में जीवन की इष्ट गति की ओर बढानेवाली तन्त्रज्ञान नीति का स्वीकार करना होगा। इष्ट गति के निकषों के लिये [[Bharat's Science and Technology (भारतीय विज्ञान एवं तन्त्रज्ञान दृष्टि)|इस]] लेख में बताई कसौटी लगानी होगी। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== परिवर्तन की प्रक्रिया ===&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सामाजिक परिवर्तन भौतिक वस्तुओं के परिवर्तन जैसे सरल नहीं होते। भौतिक पदार्थों का एक निश्चित स्वभाव होता है। धर्म होता है। इसे ध्यान में रखकर भौतिक पदार्थों को ढाला जाता है। हर मानव का स्वभाव भिन्न होता है। भिन्न समय पर भी उसमें बदलाव आ सकता है। इसलिये सामाजिक परिवर्तन क्रांति से नहीं उत्क्रांति से ही किये जा सकते हैं। उत्क्रांति की गति धीमी होती है। होने वाले परिवर्तनों से किसी की हानि नहीं हो या होने वाली हानि न्यूनतम हो, परिवर्तन स्थाई हों, परिवर्तन से सबको लाभ मिले यह सब देखकर ही प्रक्रिया चलाई जाती है। सामाजिक परिवर्तनों के लिये नई पीढी से प्रारंभ करना यह सबसे अच्छा रास्ता है। लेकिन नई पीढी में व्यापक रूप से परिवर्तन के पहलुओं को स्थापित करने के लिये आवश्यक इतनी पुरानी पीढी के श्रेष्ठ जनों की संख्या आवश्यक है। ऐसे श्रेष्ठ जनों का वर्णन श्रीमद्भगवद्गीता में किया गया है:&amp;lt;blockquote&amp;gt;यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जन:।&amp;lt;/blockquote&amp;gt;&amp;lt;blockquote&amp;gt;स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते॥ (अध्याय ३ श्लोक २१)&amp;lt;/blockquote&amp;gt;इसलिये एक दृष्टि से देखा जाए तो यह प्रक्रिया समाज के प्रत्येक व्यक्तितक ले जाने की आवश्यकता नहीं होती। केवल समाज जीवन की सभी विधाओं के श्रेष्ठ लोगों के निर्माण की प्रक्रिया ही परिवर्तन की प्रक्रिया है। एक बार ये लोग निर्माण हो गये तो फिर परिवर्तन तेज याने ज्यामितीय गति से होने लगता है।&lt;br /&gt;
* धीमी लेकिन अविश्रांत : हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि हमें सामाजिक परिवर्तन करना है। समाज एक जीवंत ईकाई होता है। जीवंत ईकाई में परिवर्तन हमेशा धीमी गति से, समग्रता से और अविरत करते रहने से होते हैं। कोई भी शीघ्रता या टुकडों में होनेवाले परिवर्तन हानिकारक होते हैं।&lt;br /&gt;
* सभी क्षेत्रों में एकसाथ : समाज एक जीवंत ईकाई होने के कारण इसके सभी अंग किसी भी बात से एक साथ प्रभावित होते हैं। प्रभाव का परिमाण कम अधिक होगा लेकिन प्रभाव सभी पर होता ही है। इसलिये परिवर्तन की प्रक्रिया टुकडों में अलग अलग या एक के बाद एक ऐसी नहीं होगी। परिवर्तन की प्रक्रिया धर्म, शिक्षा, शासन, अर्थ, न्याय, समाज संगठन आदि सभी क्षेत्रों में एक साथ चलेगी। ऐसी प्रक्रिया का प्रारंभ होना बहुत कठिन होता है। लेकिन एक बार सभी क्षेत्रों में प्रारंभ हो जाता है तो फिर यह तेजी से गति प्राप्त कर लेती है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== परिवर्तन के कारक तत्व ===&lt;br /&gt;
# शिक्षा : शिक्षा का दायरा बहुत व्यापक है। शिक्षा जन्म जन्मांतर चलनेवाली प्रक्रिया होती है। इस जन्म में शिक्षा गर्भधारणा से मृत्यूपर्यंत चलती है। आयु की अवस्था के अनुसार शिक्षा का स्वरूप बदलता है। &lt;br /&gt;
## कुटुम्ब में शिक्षा : कुटुम्ब में शिक्षा का प्रारंभ गर्भधारणा से होता है। मनुष्य की ६०-७० प्रतिशत घडन तो कुटुम्ब में ही होती है। कुटुम्ब में रहकर वह कई बातें सीखता है। कौटुम्बिक भावना, कर्तव्य, सदाचार आदि की शिक्षा कुटुम्ब की ही जिम्मेदारी होती है। व्यवस्थाओं के साथ समायोजन, व्यवस्थाओं के स्वरूप आदि भी वह कुटुम्ब में ही अपने ज्येष्ठों से सीखता है। इंद्रियों के विकास की शिक्षा, व्यावसायिक कौशल भी वह कुटुम्ब में ही सीखता है। कुटुम्ब सामाजिकता की पाठशाला ही होता है। बडों का आदर, स्त्री का आदर आदि भी कुटुम्ब ही सिखाता है। &lt;br /&gt;
## कुटुम्ब की शिक्षा : उसी प्रकार से कुटुम्ब के बारे में भी वह कई बातें सीखता है। उसकी व्यक्तिगत, कौटुम्बिक और सामाजिक आदतें बचपन में ही आकार लेतीं हैं। कुटुम्ब का महत्व, समाज में कौटुम्बिक भावना का महत्व, कौटुम्बिक व्यवस्थाओं का महत्व वह कुटुम्ब में सीखता है। भिन्न भिन्न स्वभावों के लोग एक छत के नीचे आत्मीयता से कैसे रहते हैं यह वह कुटुम्ब से ही सीखता है। लगभग सभी प्रकार से कुटुंब यह समाज का लघुरूप ही होता है। कुटुंब यह सामाजिकता की पाठशाला होती है। &lt;br /&gt;
## विद्याकेन्द्र शिक्षा: विद्याकेन्द्र की शिक्षा शास्त्रीय शिक्षा होती है। कुटुम्ब में सीखे हुए सदाचार के शास्त्रीय पक्ष को समझाने के लिये होती है। कुटुंब में सीखे हुए व्यावसायिक कौशलों को पैना बनाने के लिये होती है। कुटुंब में आत्मसात की हुई श्रेष्ठ परम्पराओं को अधिक उज्वल बनाने के तरीके सीखने के लिए होती है। अध्ययन का और कौशल का शास्त्रीय तरीका सिखने के लिये, अध्ययन को तेजस्वी बनाने के लिये होती है। &lt;br /&gt;
## लोकशिक्षा : लोकशिक्षा भी समाज जीवन का एक आवश्यक पहलू है। विद्याकेन्द्र की शिक्षा के उपरान्त भी मनुष्य का मन कई बार भ्रमित हो जाता हाय, बुद्धि कुण्ठित हो जाती है। ऐसी स्थिति में लोकशिक्षा की व्यवस्था इस संभ्रम को, इस कुण्ठा को दूर करती है। &lt;br /&gt;
## परंपरा निर्माण : अपने से अधिक श्रेष्ठ विरासत निर्माण करने की निरंतरता को श्रेष्ठ परंपरा कहते हैं। श्रेष्ठ परंपराओं के निर्माण की तीव्र इच्छा और पैने प्रयास समाज को श्रेष्ठ और चिरंजीवी बनाते हैं। &lt;br /&gt;
# शासन &lt;br /&gt;
## धर्मनिष्ठता : शासक धर्मशास्त्र के जानकार हों। धर्मशास्त्र के पालनकर्ता हों। धर्मशास्त्र के नियमों का प्रजा से अनुपालन करवाने में कुशल हों। &lt;br /&gt;
## धर्म व्यवस्था के साथ समायोजन : सदैव धर्म के जानकारों से अपना मूल्यांकन करवाएँ। धर्म के जानकारों की सूचनाओं का अनुपालन करें। अधर्म होने से प्रायश्चित्त और पश्चात्ताप के लिये उद्यत रहें। &lt;br /&gt;
# धर्म नेतृत्व &lt;br /&gt;
## धर्म के मार्गदर्शक : किसी का केवल धर्मशास्त्र का विशेषज्ञ होना पर्याप्त नहीं है। नि:स्वार्थ भाव, निर्भयता भी श्रेष्ठ धर्म के मार्गदर्शकों के लक्षण हैं। &lt;br /&gt;
## धर्माचरणी : धर्म का मार्गदर्शन करनेवाले लोग अपने व्यवहार में भी धर्मयुक्त होना चाहिये। &lt;br /&gt;
## विजीगिषु स्वभाववाले : धर्म का मार्गदर्शन करनेवाले लोगों के लिये विजीगिषु स्वभाव का होना आवश्यक है। कोई भी संकट आनेपर डगमगाएँ नहीं यह धर्म के मार्गदर्शकों के लिये आवश्यक है। धर्म के जानकारों का सबसे पहला कर्तव्य है कि वे वर्तमान काल के लिए धर्मशास्त्र या स्मृति की प्रस्तुति करें। यह स्मृति जीवन के सभी पहलुओं को व्यापने वाली हो। इसकी व्यापकता को समझने की दृष्टि से एक रूपरेखा नीचे दे रहे हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== धर्मशास्त्र प्रस्तुति के लिये बिन्दु ==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== धर्म की व्याख्याएँ ===&lt;br /&gt;
धर्म की व्याप्ति / त्रिवर्ग की व्याप्ति : सर्वे भवन्तु सुखिन: लक्ष्य हेतु धर्म : संस्कृति&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== व्यापक धर्मशास्त्र के प्रस्तुति की आवश्यकता ===&lt;br /&gt;
* पूर्व धर्मशास्त्रों की व्यापकता&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
* व्यापकता की आवश्यकता&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== व्यक्तिगत धर्म / पञ्चविध (कोष) पुरुष धर्म / चतुर्विध पुरूषार्थ /स्वधर्म (वर्णधर्म) ===&lt;br /&gt;
* शरीरधर्म &lt;br /&gt;
* मन-धर्म&lt;br /&gt;
* बुद्धि-धर्म&lt;br /&gt;
* चित्त-धर्म&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== सामाजिक संबंधों में धर्म ===&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== व्यक्ति-व्यक्ति : पुरूष-पुरूष या स्त्री-स्त्री ====&lt;br /&gt;
{{div col|colwidth=20em}}	 &lt;br /&gt;
# पारिवारिक रिश्ते&lt;br /&gt;
# पड़ोसी&lt;br /&gt;
# अतिथि&lt;br /&gt;
# शत्रु/विरोधक&lt;br /&gt;
# मित्र/सहायक&lt;br /&gt;
# सहकारी&lt;br /&gt;
# अपरिचित&lt;br /&gt;
# मालिक/नौकर&lt;br /&gt;
# चरित्रहीन स्त्री/पुरूष&lt;br /&gt;
# व्यसनी&lt;br /&gt;
# जरूरतमंद&lt;br /&gt;
# समव्यवसायी&lt;br /&gt;
# भिन्न व्यवसायी&lt;br /&gt;
# याचक&lt;br /&gt;
# भिन्न भाषी&lt;br /&gt;
# विक्रेता \ क्रेता&lt;br /&gt;
# भिन्न राष्ट्रीय&lt;br /&gt;
{{div col end}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== व्यक्ति-व्यक्ति : पुरूष-स्त्री ====&lt;br /&gt;
{{div col|colwidth=20em}}	 &lt;br /&gt;
# पारिवारिक रिश्ते&lt;br /&gt;
# पड़ोसी&lt;br /&gt;
# अतिथि&lt;br /&gt;
# शत्रु/विरोधक&lt;br /&gt;
# मित्र/सहायक&lt;br /&gt;
# सहकारी&lt;br /&gt;
# अपरिचित&lt;br /&gt;
# मालिक/नौकर&lt;br /&gt;
# चरित्रहीन स्त्री/पुरूष&lt;br /&gt;
# व्यसनी&lt;br /&gt;
# जरूरतमंद&lt;br /&gt;
# समव्यवसायी&lt;br /&gt;
# भिन्न व्यवसायी&lt;br /&gt;
# याचक&lt;br /&gt;
# भिन्न भाषी&lt;br /&gt;
# विक्रेता\क्रेता&lt;br /&gt;
# भिन्न राष्ट्रीय&lt;br /&gt;
{{div col end}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== व्यक्ति-समाज ====&lt;br /&gt;
# व्यक्ति-परिवार&lt;br /&gt;
# व्यति-जाति&lt;br /&gt;
# पड़ोसी&lt;br /&gt;
# सामाजिक संगठन&lt;br /&gt;
# व्यक्ति-व्यवस्था&lt;br /&gt;
# व्यक्ति-राष्ट्र&lt;br /&gt;
# व्यक्ति-विश्व समाज&lt;br /&gt;
# व्यक्ति भिन्न भाषी&lt;br /&gt;
# परप्रांतीय&lt;br /&gt;
# परदेसी&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== समाज-समाज ====&lt;br /&gt;
# अंतर्राष्ट्रीय:&lt;br /&gt;
## शत्रु&lt;br /&gt;
## मित्र&lt;br /&gt;
## तटस्थ&lt;br /&gt;
# अंतर्देशीय&lt;br /&gt;
## प्रांत-प्रांत&lt;br /&gt;
## जनपद-जनपद&lt;br /&gt;
## भाषिक समूह&lt;br /&gt;
## पंथ समूह&lt;br /&gt;
## राष्ट्रीय समूह&lt;br /&gt;
## अराष्ट्रीय समूह&lt;br /&gt;
## राष्ट्रद्रोही समूह&lt;br /&gt;
## विदेशी&lt;br /&gt;
## समव्यवासायी&lt;br /&gt;
## जाति-जाति&lt;br /&gt;
## परिवार परिवार&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== सृष्टिगत सम्बन्धों में धर्म ===&lt;br /&gt;
# मनुष्य-अन्य जीव:&lt;br /&gt;
## मनुष्य-पालतू प्राणी:&lt;br /&gt;
### शाकाहारी&lt;br /&gt;
### मांसाहारी&lt;br /&gt;
## मनुष्य अन्य प्राणी:&lt;br /&gt;
### थलचर:&lt;br /&gt;
#### शाकाहारी&lt;br /&gt;
#### मांसाहारी&lt;br /&gt;
### जलचर&lt;br /&gt;
### नभचर&lt;br /&gt;
## मनुष्य-वनस्पति:&lt;br /&gt;
### जमीन के नीचे&lt;br /&gt;
### जमीन के ऊपर&lt;br /&gt;
### वनस्पति/औषधी&lt;br /&gt;
### खानेयोग्य / अन्न&lt;br /&gt;
### अखाद्य / जहरीली&lt;br /&gt;
### नशीली&lt;br /&gt;
## मनुष्य-कृमि / कीटक / सूक्ष्म जीव&lt;br /&gt;
### सहायक&lt;br /&gt;
### हानिकारक&lt;br /&gt;
## मनुष्य-जड़ प्रकृति / पंचमहाभूत&lt;br /&gt;
### अनवीकरणीय/खनिज&lt;br /&gt;
#### ठोस&lt;br /&gt;
#### द्रव&lt;br /&gt;
#### वायु (इंधन)&lt;br /&gt;
### नवीकरणीय&lt;br /&gt;
#### वायु/हवा&lt;br /&gt;
#### जल&lt;br /&gt;
#### सूर्यप्रकाश&lt;br /&gt;
#### लकड़ी&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== आपद्धर्म ===&lt;br /&gt;
# प्राकृतिक आपदा&lt;br /&gt;
# मानव निर्मित आपदा (लगभग उपर्युक्त सभी विषयों में)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== परिवर्तन के पुरोधा ==&lt;br /&gt;
उपर्युक्त बिन्दु २ में बताए गए श्रेष्ठ जन ही परिवर्तन के पुरोधा होंगे। इनका प्रमाण समाज में मुष्किल से ५-७ प्रतिशत ही पर्याप्त होता है। ऐसे श्रेष्ठ जनों में निम्न वर्ग के लोग आते हैं।	&lt;br /&gt;
४.१ शिक्षक : शिक्षक ज्ञानी, त्यागी, कुशल, समाज हित के लिए समर्पित, धर्म का जानकार, समाज को घडने की सामर्थ्य रखनेवाला होता है। नई पीढी जो परिवर्तन का अधिक सहजता से स्वीकार कर सकती है उसको घडना शिक्षक का काम होता है। इसलिये परिवर्तन की प्रक्रिया का मुख्य पुरोधा शिक्षक ही होता है।	&lt;br /&gt;
४.२ श्रेष्ठ जन :यहाँ श्रेष्ठ जनों से मतलब भिन्न भिन्न सामाजिक गतिविधियों में जो अग्रणी लोग हैं उनसे है।	&lt;br /&gt;
४.३ सांप्रदायिक संगठनों के प्रमुख : आजकल समाज का एक बहुत बडा वर्ग जिसमें शिक्षित वर्ग भी है, भिन्न भिन्न संप्रदायों से जुडा है। उन संप्रदायों के प्रमुख भी इस परिवर्तन की प्रक्रिया का एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण हिस्सा बनने की शक्ति रखते हैं।	&lt;br /&gt;
४.४ लोकशिक्षा के माध्यम : कीर्तनकार, कथाकार, प्रवचनकार, नाटक मंडलि, पुरोहित या उपाध्याय, साधू, बैरागी, सिंहस्थ या कुंभ जैसे मेले, यात्राएँ आदि लोकशिक्षा के माध्यम हुआ करते थे। वर्तमान में ये सब कमजोर और दिशाहीन हो गए हैं। एक ओर इनमें से जिनको पुनर्जीवित कर सकते हैं उन्हें करना। नए आयाम भी जोडे जा सकते हैं। जैसे अभी लगभग देढ दशक पूर्व महाराष्ट्र में प्रारंभ हुई नव-वर्ष स्वागत यात्राएँ आदि।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== अंतर्निहित सुधार व्यवस्था ==&lt;br /&gt;
काल के प्रवाह में समाज में हो रहे परिवर्तन और मनुष्य की स्खलनशीलता के कारण बढनेवाला अधर्माचरण ये दो बातें ऐसीं हैं जो किसी भी श्रेष्ठतम समाज को भी नष्ट कर देतीं हैं। इस दृष्टि से जागरूक ऐसे शिक्षक और धर्म के मार्गदर्शक साथ में मिलकर समाज की अंतर्निहित सुधार व्यवस्था बनाते हैं। अपनी संवेदनशीलता और समाज के निरंतर बारीकी से हो रहे अध्ययन के कारण इन्हें संकटों का पूर्वानुमान हो जाता है। अपने निरीक्षणों के आधारपर अपने लोकसंग्रही स्वभाव से ये लोगों को भी संकटों से ऊपर उठने के लिये तैयार करते हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== परिवर्तन की नीति ==&lt;br /&gt;
प्रारंभ में विरोध को आमंत्रण नहीं देना। संघर्ष में शक्ति का अपव्यय नहीं करना। जो आज कर सकते हैं उसे करते जाना। जो कल करने की आवश्यकता है उस के लिये परिस्थिति निर्माण करना। परिस्थिति के निर्माण होते ही आगे बढना।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== परिवर्तन में अवरोध और उनका निराकरण ==&lt;br /&gt;
शासनाधिष्ठित समाज में स्वार्थ के आधारपर परिवर्तन सरल और तेज गति से होता है। हिटलरने १५-२० वर्षों में ही जर्मनी को एक समर्थ राष्ट्र के रूप में खड़ा कर दिया था। लेकिन धर्म पर आधारित जीवन के प्रतिमान में परिवर्तन की गति धीमी और मार्ग कठिन होता है। स्थाई परिवर्तन और वह भी कौटुम्बिक भावना के आधारपर, तो धीरे धीरे ही होता है। &lt;br /&gt;
७.१ अंतर्देशीय 	&lt;br /&gt;
७.१.१ मानवीय जड़ता : परिवर्तन का आनंद से स्वागत करनेवाले लोग समाज में अल्पसंख्य ही होते हैं। सामान्यत: युवा वर्ग ही परिवर्तन के लिए तैयार होता है। इसलिए युवा वर्ग को इस परिवर्तन की प्रक्रिया में सहभागी बनाना होगा। परिवर्तन की प्रक्रिया में युवाओं को सम्मिलित करते जाने से दो तीन पीढ़ियों में परिवर्तन का चक्र गतिमान हो जाएगा।&lt;br /&gt;
७.१.२ विपरीत शिक्षा : जैसे जैसे भारतीय शिक्षा का विस्तार समाज में होगा वर्तमान की विपरीत शिक्षा का अपने आप ही क्रमश: लोप होगा।	   &lt;br /&gt;
७.१.३ मजहबी मानसिकता : भारतीय याने धर्म की शिक्षा के उदय और विस्तार के साथ ही मजहबी शिक्षा और उसका प्रभाव भी शनै: शनै: घटता जाएगा। मजहबों की वास्तविकता को भी उजागर करना आवश्यक है। &lt;br /&gt;
७.१.४ धर्म के ठेकेदार : जैसे जैसे धर्म के जानकार और धर्म के अनुसार आचरण करनेवाले लोग समाज में दिखने लगेंगे, धर्म के तथाकथित ठेकेदारों का प्रभाव कम होता जाएगा। &lt;br /&gt;
७.१.५ शासन तंत्र : इस परिवर्तन की प्रक्रिया में धर्म के जानकारों के बाद शासन की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण होगी। धर्माचरणी लोगों को समर्थन, सहायता और संरक्षण देने का काम शासन को करना होगा। इस के लिए शासक भी धर्म का जानकार और धर्मनिष्ठ हो, यह भी आवश्यक है। धर्म के जानकारों को यह सुनिश्चित करना होगा की शासक धर्माचरण करनेवाले और धर्म के जानकर हों।&lt;br /&gt;
७.१.६ जीवन का अभारतीय प्रतिमान : जीवन के सभी क्षेत्रों में एकसाथ जीवन के प्रतिमान के परिवर्तन की प्रक्रिया को चलाना यह धर्म के जानकारों की जिम्मेदारी होगी। शिक्षा की भूमिका इसमें सबसे महत्वपूर्ण होगी। शिक्षा के माध्यम से समूचे जीवन के भारतीय प्रतिमान की रुपरेखा और प्रक्रिया को समाजव्यापी बनाना होगा। धर्मं-शरण शासन इसमें सहायता करेगा।&lt;br /&gt;
७.१.७ तन्त्रज्ञान  समायोजन : तन्त्रज्ञान के क्षेत्र में भारत के सामने दोहरी चुनौती होगी। एक ओर तो विश्व में जो तन्त्रज्ञान के विकास की होड़ लगी है उसमें अपनी विशेषताओं के साथ अग्रणी रहना। इस दृष्टि से विकास हेतु कुछ तन्त्रज्ञान निम्न हो सकते हैं।&lt;br /&gt;
- शून्य प्रदुषण रासायनिक उद्योग।&lt;br /&gt;
- सस्ती सौर उर्जा।&lt;br /&gt;
- प्रकृति में सहजता से घुलनशील प्लैस्टिक का निर्माण। &lt;br /&gt;
- औरों द्वारा प्रक्षेपित शस्त्रों/अणु-शस्त्रों का शमन करने का तंत्रज्ञान। ...............आदि &lt;br /&gt;
और दूसरी ओर वैकल्पिक विकेंद्रीकरणपर आधारित तन्त्रज्ञान का विकास कर उसे विश्व में प्रतिष्ठित करना। इस प्रकार के तन्त्रज्ञान में निम्न प्रकार के तन्त्रज्ञान होंगे।&lt;br /&gt;
- कौटुम्बिक उद्योगों के लिये, स्थानिक संसाधनों के उपयोग के लिए तन्त्रज्ञान  &lt;br /&gt;
- भिन्न भिन्न कार्यों के लिये पशु-उर्जा के अधिकाधिक उपयोग के लिये तंत्रज्ञान&lt;br /&gt;
- नविकरणीय प्राकृतिक संसाधनों से विविध पदार्थों के निर्माण से आवश्यकताओं की पूर्ति तथा संसाधनों के पुनर्भरण के लिये सरल तन्त्रज्ञान का विकास   &lt;br /&gt;
- मानव की प्राकृतिक क्षमताओं का विकास करनेवाली प्रक्रियाओं का अनुसंधान। ......... आदि &lt;br /&gt;
७.२ अंतर्राष्ट्रीय 	&lt;br /&gt;
७.२.१ मजहबी विस्तारवादी मानसिकता : वर्तमान में यह मुख्यत: ३ प्रकार की है। ईसाई, मुस्लिम और वामपंथी। यह तीनों ही विचारधाराएँ अधूरी हैं, एकांगी हैं। यह तो इन के सम्मुख ‘सर्वे भवन्तु सुखिन:’ को लेकर कोई चुनौती खड़ी नहीं होने से इन्हें विश्व में विस्तार का अवसर मिला है। जैसे ही ‘सर्वे भवन्तु सुखिन:’ का विचार लेकर भारत एक वैश्विक शक्ति के रूप में खड़ा होगा इनके पैरोंतले की जमीन खिसकने लगेगी। &lt;br /&gt;
७.२.२ आसुरी महत्वाकांक्षा : ऊपर जो बताया गया है वह, आसुरी महत्वाकांक्षा रखनेवाली वैश्विक शक्तियों के लिये भी लागू है। आसुरी महत्वाकांक्षाओं को परास्त करने की परंपरा भारत में युगों से रही है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== परिवर्तन के लिये समयबध्द करणीय कार्य ==&lt;br /&gt;
समूचे जीवन के प्रतिमान का परिवर्तन यह एक बहुत बृहद् और जटिल कार्य है। इस के लिये इसे सामाजिक अभियान का रूप देना होगा। समविचारी लोगों को संगठित होकर सहमति से और चरणबध्द पध्दति से प्रक्रिया को आगे बढाना होगा। बड़े पैमानेपर जीवन के हर क्षेत्र में जीवन के भारतीय प्रतिमान की समझ रखनेवाले और कृतीशील ऐसे लोग याने आचार्य निर्माण करने होंगे। परिवर्तन के चरण एक के बाद एक और एक के साथ सभी इस पध्दति से चलेंगे। जैसे दूसरे चरण के काल में ५० प्रतिशत शक्ति और संसाधन दूसरे चरणके निर्धारित विषयपर लगेंगे। और १२.५-१२.५ प्रतिशत शक्ति और संसाधन चरण १, ३, ४ और ५ में प्रत्येकपर लगेंगे।&lt;br /&gt;
१. समविचारी लोगों का ध्रुवीकरण : जिन्हें प्रतिमान के परिवर्तन की आस है और समझ भी है ऐसे समविचारी, सहचित्त लोगों का ध्रुवीकरण करना होगा। उनमें एक व्यापक सहमति निर्माण करनी होगी। अपने अपने कार्यक्षेत्र में क्या करना है इसका स्पष्टीकरण करना होगा।&lt;br /&gt;
२. अभियान के चरण : अभियान को चरणबध्द पध्दति से चलाना होगा। १२ वर्षों के ये पाँच चरण होंगे। ऐसी यह ६० वर्ष की योजना होगी। यह प्रक्रिया तीन पीढीतक चलेगी। तीसरी पीढी में परिवर्तन के फल देखने को मिलेंगे। लेकिन तबतक निष्ठा से और धैर्य से अभियान को चलाना होगा। निरंतर मूल्यांकन करना होगा। राह भटक नहीं जाए इसके लिये चौकन्ना रहना होगा।&lt;br /&gt;
२.१ अध्ययन और अनुसंधान : जीवन का दायरा बहुत व्यापक होता है। अनगिनत विषय इसमें आते हैं। इसलिये प्रतिमान के बदलाव से पहले हमें दोनों प्रतिमानों के विषय में और विशेषत: जीवन के भारतीय प्रतिमान के विषय में बहुत गहराई से अध्ययन करना होगा। मनुष्य की इच्छाओं का दायरा, उनकी पूर्ति के लिये वह क्या क्या कर सकता है आदि का दायरा अति विशाल है। इन दोनों को धर्म के नियंत्रण में ऐसे रखा जाता है इसका भी अध्ययन अनिवार्य है। मनुष्य के व्यक्तित्व को ठीक से समझना, उसके शरीर, मन, बुध्दि, चित्त, अहंकार आदि बातों को समझना, कर्मसिध्दांत को समझना, जन्म जन्मांतर चलने वाली शिक्षा की प्रक्रिया को समझना विविध विषयों के अंगांगी संबंधों को समझना, प्रकृति के रहस्यों को समझना आदि अनेकों ऐसी बातें हैं जिनका अध्ययन हमें करना होगा। इनमें से कई विषयों के संबंध में हमारे पूर्वजों ने विपुल साहित्य निर्माण किया था। उसमें से कितने ही साहित्य को जाने अंजाने में प्रक्षेपित किया गया है। इस प्रक्षिप्त हिस्से को समझ कर अलग निकालना होगा। शुध्द भारतीय तत्वोंपर आधारित ज्ञान को प्राप्त करना होगा। अंग्रेजों ने भारतीय साहित्य, इतिहास के साथ किये खिलवाड, भारतीय समाज में झगडे पैदा करने के लिये निर्मित साहित्य को अलग हटाकर शुध्द भारतीय याने एकात्म भाव की या कौटुम्बिक भाव की जितनी भी प्रस्तुतियाँ हैं उनका अध्ययन करना होगा। मान्यताओं, व्यवहार सूत्रों, संगठन निर्माण और व्यवस्था निर्माण की प्रक्रिया को समझना होगा।     &lt;br /&gt;
२.२ लोकमत परिष्कार : अध्ययन से जो ज्ञान उभरकर सामने आएगा उसे लोगोंतक ले जाना होगा। लोगों का प्रबोधन करना होगा। उन्हें फिर से समग्रता से और एकात्मता से सोचने और व्यवहार करने का तरीका बताना होगा। उन्हें उनकी सामाजिक जिम्मेदारी का समाजधर्म का अहसास करवाना होगा। वर्तमान की परिस्थितियों से सामान्यत: कोई भी खुश नहीं है। लेकिन जीवन का भारतीय प्रतिमान ही  उनकी कल्पना के अच्छे दिनों का वास्तव है यह सब के मन में स्थापित करना होगा।	         &lt;br /&gt;
२.३ संयुक्त कुटुम्ब : कुटुम्ब ही समाजधर्म सीखने की पाठशाला होता है। संयुक्त कुटुम्ब तो वास्तव में समाज का लघुरूप ही होता है। सामाजिक समस्याओं में से लगभग ७० प्रतिशत समस्याओं को तो केवल अच्छा संयुक्त कुटुम्ब ही निर्मूल कर देता है। समाज जीवन के लिये श्रेष्ठ लोगों को जन्म देने का काम, श्रेष्ठ संस्कार देने का काम, अच्छी आदतें डालने काम आजकल की फॅमिली पध्दति नहीं कर सकती। जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में जो तेजस्वी नेतृत्व का अभाव निर्माण हो गया है उसे दूर करना यह भारतीय मान्यताओं के अनुसार चलाए जानेवाले संयुक्त परिवारों में ही हो सकता है। इसलिये समाज का नेतृत्व करेंगे ऐसे श्रेष्ठ बालकों को जन्म देने के प्रयास तीसरे चरण में होंगे।&lt;br /&gt;
२.४ शिक्षक/धर्मज्ञ और शासक निर्माण : समाज परिवर्तन में शिक्षक की और शासक की ऐसे दोनों की भुमिका अत्यंत महत्वपूर्ण होती है। संयुक्त परिवारों में जन्म लिये बच्चों में से अब श्रेष्ठ धर्म के मार्गदर्शक, शिक्षक और शासक निर्माण करने की स्थिति होगी। ऐसे लोगों को समर्थन और सहायता देनेवाले कुटुम्ब और दूसरे चरण में निर्माण किये समाज के परिष्कृत विचारोंवाले सदस्य अब कुछ मात्रा में उपलब्ध होंगे।	   &lt;br /&gt;
२.५ संगठन और व्यवस्थाओं की प्रतिष्ठापना : श्रेष्ठ धर्म के अधिष्ठाता/मार्गदर्शक, सामर्थ्यवान शिक्षक और कुशल शासक अब प्रत्यक्ष संगठन का सशक्तिकरण और व्यवस्थाओं का निर्माण करेंगे।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==References==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;references /&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अन्य स्रोत:&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[Category:Bhartiya Jeevan Pratiman (भारतीय जीवन प्रतिमान)]]&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Dilipkelkar</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://dharmawiki.org/index.php?title=Planning_For_Change_(%E0%A4%AA%E0%A4%B0%E0%A4%BF%E0%A4%B5%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%A4%E0%A4%A8_%E0%A4%95%E0%A5%80_%E0%A4%AF%E0%A5%8B%E0%A4%9C%E0%A4%A8%E0%A4%BE)&amp;diff=119355</id>
		<title>Planning For Change (परिवर्तन की योजना)</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://dharmawiki.org/index.php?title=Planning_For_Change_(%E0%A4%AA%E0%A4%B0%E0%A4%BF%E0%A4%B5%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%A4%E0%A4%A8_%E0%A4%95%E0%A5%80_%E0%A4%AF%E0%A5%8B%E0%A4%9C%E0%A4%A8%E0%A4%BE)&amp;diff=119355"/>
		<updated>2019-06-02T14:33:08Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Dilipkelkar: /* व्यक्ति-व्यक्ति : पुरूष-पुरूष या स्त्री-स्त्री */ लेख सम्पादित किया&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{One source|date=January 2019}}&lt;br /&gt;
[[Template:Cleanup reorganize Dharmawiki Page]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
परिवर्तन की योजना को समझने के लिए हमें पहले निम्न बातें फिर से स्मरण करनी होंगी ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जीवन के भारतीय प्रतिमान की जानकारी के लिए - &lt;br /&gt;
# जीवनदृष्टि/व्यवहार : भारतीय जीवनदृष्टि और जीवनशैली के विषय में जानकारी के लिये कृपया [[Elements of Hindu Jeevan Drishti and Life Style (भारतीय/हिन्दू जीवनदृष्टि और जीवन शैली के सूत्र)|यह]] लेख देखें।&lt;br /&gt;
# व्यवस्था समूह का ढाँचा जीवनदृष्टि से सुसंगत होना चाहिए। कृपया व्यवस्था समूह के ढाँचे के लिये [[Jeevan Ka Pratiman (जीवन का प्रतिमान)|यह]] लेख और जानकारी के लिए [[Interrelationship in Srishti (सृष्टि में परस्पर सम्बद्धता)|यह]] लेख देखें।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== समस्या मूलों के निराकरण की नीति ==&lt;br /&gt;
समस्या मूल नष्ट करने से तात्पर्य समस्या मूलों पर आघात से नहीं है। समस्याएँ निर्माण ही नहीं हों ऐसी परिस्थितियों, ऐसे समाज संगठनों और ऐसी व्यवस्थाओं के निर्माण से है। निराकरण की प्रक्रिया के ३ चरण होंगे। समस्याओं को और परिवर्तन के स्वरूप को समझना, निराकरण की नीति तय करना और निराकरण का क्रियान्वयन करना। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== परिवर्तन के स्वरूप को समझना ==&lt;br /&gt;
समस्या का मूल जीवन के प्रतिमान के परिवर्तन में है। प्रतिमान का आधार समाज की जीवनदृष्टि होती है। व्यवहार, संगठन और व्यवस्थाएँ तो जीवनदृष्टि के आधार पर ही तय होते हैं। इसलिये परिवर्तन की प्रक्रिया में जीवनदृष्टि के परिवर्तन की प्रक्रिया को प्राथमिकता देनी होगी। व्यवहार में सुसंगतता आए इसलिये करणीय अकरणीय विवेक को सार्वत्रिक करना होगा। दूसरे क्रमांक पर संगठन और व्यवस्थाओं में परिवर्तन की प्रक्रिया चलेगी। व्यवस्था परिवर्तन की इस प्रक्रिया में समग्रता और एकात्मता के संदर्भ में व्यवस्था विशेष का आधार बनाने के लिये विषय की सैध्दांतिक प्रस्तुति करनी होगी। जैसे शासन व्यवस्था में यदि उचित परिवर्तन करना है तो पहले राजशास्त्र की सैध्दांतिक प्रस्तुति करना आवश्यक है। समृद्धि व्यवस्था में परिवर्तन करने के लिये समृद्धिशास्त्र की सैध्दांतिक प्रस्तुति करनी होगी। इन सैध्दांतिक प्रस्तुतियों को प्रयोग सिध्द करना होगा। प्रयोगों के आधार पर इन प्रस्तुतियों में उचित परिवर्तन करते हुए आगे बढना होगा। यह काम प्राथमिकता से धर्म के जानकारों का है। दूसरे क्रमांक की जिम्मेदारी शिक्षकों की है। शिक्षक वर्ग ही धर्म को सार्वत्रिक करता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== निराकरण की नीति ==&lt;br /&gt;
समस्याएँ इतनी अधिक और पेचिदा हैं कि इनका निराकरण अब संभव नहीं है, ऐसा कई विद्वान मानते हैं। हमने जो करणीय और अकरणीय विवेक को समझा है उसके अनुसार कोई भी बात असंभव नहीं होती। ऊपरी तौर पर असंभव लगने पर भी उसे संभव चरणों में बाँटकर संपन्न किया जा सकता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इस के लिये नीति के तौर पर हमारा व्यवहार निम्न प्रकार का होना चाहिए:&lt;br /&gt;
* सबसे पहले तो यह हमेशा ध्यान में रखना कि यह पूरे समाज जीवन के प्रतिमान के परिवर्तन का विषय है। इसे परिवर्तन के लिये कई पीढियों का समय लग सकता है। भारत वर्ष के दीर्घ इतिहास में समाज ने कई बार उत्थान और पतन के दौर अनुभव किये हैं। बार बार भारतीय समाज ने उत्थान किया है।&lt;br /&gt;
* परिवर्तन की प्रक्रिया को संभाव्य चरणों में बाँटना।&lt;br /&gt;
* उसमें आज जो हो सकता है उसे कर डालना।&lt;br /&gt;
* आज जिसे करना कठिन लगता है उसके लिये परिस्थितियाँ बनाते जाना। परिस्थितियाँ बनते ही उसे करना।&lt;br /&gt;
* प्रारंभ में जबतक परिवर्तन की प्रक्रिया ने गति नहीं पकडी है, यथासंभव कोई विरोध मोल नहीं लेना।&lt;br /&gt;
* इसी प्रकार से एक एक चरण को संभव बनाते हुए आगे बढ़ाते जाना।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== समस्या मूलों का निराकरण ==&lt;br /&gt;
वास्तव में समस्या मूलों को नष्ट करना यह शब्दप्रयोग ठीक नहीं है। उचित प्रतिमान की प्रतिष्ठापना के साथ ही गलत प्रतिमान का अंत अपने आप होता है। जो सर्वहितकारी है, उचित है, श्रेष्ठ है, उसकी प्रतिष्ठापना ही परिवर्तन की प्रक्रिया का स्वरूप होगा। स्वाभाविक जडता के कारण कुछ कठिनाईयाँ तो आएँगी। लेकिन गलत प्रतिमान को नष्ट करने के लिये अलग से शक्ति लगाने की आवश्यकता नहीं है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== समस्या मूल नष्ट करने हेतु धर्म के जानकारों के मार्गदर्शन में शिक्षा की व्याप्ति ==&lt;br /&gt;
# जीवनदृष्टि की शिक्षा : जीवनदृष्टि की शिक्षा मुख्यत: कामनाओं और कामनाओं की पूर्ति के प्रयास, धन, साधन और संसाधनों को धर्म के दायरे में रखने की शिक्षा ही है। पुरूषार्थ चतुष्टय की या त्रिवर्ग की शिक्षा ही है।&lt;br /&gt;
# व्यवस्थाएँ : जीवनदृष्टि के अनुसार व्यवहार हो सके इस हेतु से ही व्यवस्थाओं का निर्माण किया जाता है। व्यवस्थाओं के निर्माण में और उनके क्रियान्वयन में भी जीवनदृष्टि ओतप्रोत रहे इसका ध्यान रखना होगा।&lt;br /&gt;
## धर्म व्यवस्था&lt;br /&gt;
## शिक्षा व्यवस्था&lt;br /&gt;
## शासन व्यवस्था&lt;br /&gt;
## समृद्धि व्यवस्था&lt;br /&gt;
# संगठन : समाज संगठन और समाज की व्यवस्थाएँ एक दूसरे को पूरक पोषक होती हैं। लेकिन धर्म व्यवस्था, शिक्षा व्यवस्था और शासन व्यवस्था के अभाव में संगठन निर्माण करना अत्यंत कठिन हो जाता है। वास्तव में ये दोनों अन्योन्याश्रित होते हैं। समाज संगठन की जानकारी के लिये कृपया [[Society (समाज)|यह]] लेख देखें।&lt;br /&gt;
## कुटुम्ब&lt;br /&gt;
## स्वभाव समायोजन&lt;br /&gt;
## आश्रम&lt;br /&gt;
## कौशल विधा&lt;br /&gt;
## ग्राम&lt;br /&gt;
## राष्ट्र&lt;br /&gt;
# विज्ञान और तन्त्रज्ञान: कृपया [[Bharat's Science and Technology (भारतीय विज्ञान तन्त्रज्ञान दृष्टि)|यह]] लेख देखें। &lt;br /&gt;
## विकास और उपयोग नीति&lt;br /&gt;
## सार्वत्रिकीकरण&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== परिवर्तन की योजना ==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== परिवर्तन का स्वरूप ===&lt;br /&gt;
वर्तमान स्वार्थ पर आधारित जीवन के प्रतिमान के स्थान पर आत्मीयता याने कौटुम्बिक भावना पर आधारित जीवन के प्रतिमान की प्रतिष्ठापना:&lt;br /&gt;
# सर्वे भवन्तु सुखिन:, देशानुकूल और कालानुकूल आदि के संदर्भ में दोनों प्रतिमानों को समझना&lt;br /&gt;
# प्रतिमान का परिवर्तन&lt;br /&gt;
## सामाजिक व्यवस्थाओं का पुनर्निर्माण&lt;br /&gt;
### समाज के संगठनों का परिष्कार/पुनरूत्थान या नवनिर्माण&lt;br /&gt;
### तन्त्रज्ञान  का समायोजन / तन्त्रज्ञान  नीति / जीवन की इष्ट गति : वर्तमान में तन्त्रज्ञान  की विकास की गति से जीवन को जो गति प्राप्त हुई है उस के कारण सामान्य मनुष्य घसीटा जा रहा है। पर्यावरण सन्तुलन  और सामाजिकता दाँवपर लग गए हैं। ज्ञान, विज्ञान और तन्त्रज्ञान ये तीनों बातें पात्र व्यक्ति को ही मिलनी चाहिये। बंदर के हाथ में पलिता नहीं दिया जाता। इस लिये किसी भी तन्त्रज्ञान के सार्वत्रिकीकरण से पहले उसके पर्यावरण, समाजजीवन और व्यक्ति जीवनपर होनेवाले परिणाम जानना आवश्यक है। हानिकारक तंत्रज्ञान का तो विकास भी नहीं करना चाहिये। किया तो वह केवल सुपात्र को ही अंतरित हो यह सुनिश्चित करना चाहिये। ऐसी स्थिति में जीवन की इष्ट गति की ओर बढानेवाली तन्त्रज्ञान नीति का स्वीकार करना होगा। इष्ट गति के निकषों के लिये [[Bharat's Science and Technology (भारतीय विज्ञान एवं तन्त्रज्ञान दृष्टि)|इस]] लेख में बताई कसौटी लगानी होगी। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== परिवर्तन की प्रक्रिया ===&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सामाजिक परिवर्तन भौतिक वस्तुओं के परिवर्तन जैसे सरल नहीं होते। भौतिक पदार्थों का एक निश्चित स्वभाव होता है। धर्म होता है। इसे ध्यान में रखकर भौतिक पदार्थों को ढाला जाता है। हर मानव का स्वभाव भिन्न होता है। भिन्न समय पर भी उसमें बदलाव आ सकता है। इसलिये सामाजिक परिवर्तन क्रांति से नहीं उत्क्रांति से ही किये जा सकते हैं। उत्क्रांति की गति धीमी होती है। होने वाले परिवर्तनों से किसी की हानि नहीं हो या होने वाली हानि न्यूनतम हो, परिवर्तन स्थाई हों, परिवर्तन से सबको लाभ मिले यह सब देखकर ही प्रक्रिया चलाई जाती है। सामाजिक परिवर्तनों के लिये नई पीढी से प्रारंभ करना यह सबसे अच्छा रास्ता है। लेकिन नई पीढी में व्यापक रूप से परिवर्तन के पहलुओं को स्थापित करने के लिये आवश्यक इतनी पुरानी पीढी के श्रेष्ठ जनों की संख्या आवश्यक है। ऐसे श्रेष्ठ जनों का वर्णन श्रीमद्भगवद्गीता में किया गया है:&amp;lt;blockquote&amp;gt;यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जन:।&amp;lt;/blockquote&amp;gt;&amp;lt;blockquote&amp;gt;स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते॥ (अध्याय ३ श्लोक २१)&amp;lt;/blockquote&amp;gt;इसलिये एक दृष्टि से देखा जाए तो यह प्रक्रिया समाज के प्रत्येक व्यक्तितक ले जाने की आवश्यकता नहीं होती। केवल समाज जीवन की सभी विधाओं के श्रेष्ठ लोगों के निर्माण की प्रक्रिया ही परिवर्तन की प्रक्रिया है। एक बार ये लोग निर्माण हो गये तो फिर परिवर्तन तेज याने ज्यामितीय गति से होने लगता है।&lt;br /&gt;
* धीमी लेकिन अविश्रांत : हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि हमें सामाजिक परिवर्तन करना है। समाज एक जीवंत ईकाई होता है। जीवंत ईकाई में परिवर्तन हमेशा धीमी गति से, समग्रता से और अविरत करते रहने से होते हैं। कोई भी शीघ्रता या टुकडों में होनेवाले परिवर्तन हानिकारक होते हैं।&lt;br /&gt;
* सभी क्षेत्रों में एकसाथ : समाज एक जीवंत ईकाई होने के कारण इसके सभी अंग किसी भी बात से एक साथ प्रभावित होते हैं। प्रभाव का परिमाण कम अधिक होगा लेकिन प्रभाव सभी पर होता ही है। इसलिये परिवर्तन की प्रक्रिया टुकडों में अलग अलग या एक के बाद एक ऐसी नहीं होगी। परिवर्तन की प्रक्रिया धर्म, शिक्षा, शासन, अर्थ, न्याय, समाज संगठन आदि सभी क्षेत्रों में एक साथ चलेगी। ऐसी प्रक्रिया का प्रारंभ होना बहुत कठिन होता है। लेकिन एक बार सभी क्षेत्रों में प्रारंभ हो जाता है तो फिर यह तेजी से गति प्राप्त कर लेती है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== परिवर्तन के कारक तत्व ===&lt;br /&gt;
# शिक्षा : शिक्षा का दायरा बहुत व्यापक है। शिक्षा जन्म जन्मांतर चलनेवाली प्रक्रिया होती है। इस जन्म में शिक्षा गर्भधारणा से मृत्यूपर्यंत चलती है। आयु की अवस्था के अनुसार शिक्षा का स्वरूप बदलता है। &lt;br /&gt;
## कुटुम्ब में शिक्षा : कुटुम्ब में शिक्षा का प्रारंभ गर्भधारणा से होता है। मनुष्य की ६०-७० प्रतिशत घडन तो कुटुम्ब में ही होती है। कुटुम्ब में रहकर वह कई बातें सीखता है। कौटुम्बिक भावना, कर्तव्य, सदाचार आदि की शिक्षा कुटुम्ब की ही जिम्मेदारी होती है। व्यवस्थाओं के साथ समायोजन, व्यवस्थाओं के स्वरूप आदि भी वह कुटुम्ब में ही अपने ज्येष्ठों से सीखता है। इंद्रियों के विकास की शिक्षा, व्यावसायिक कौशल भी वह कुटुम्ब में ही सीखता है। कुटुम्ब सामाजिकता की पाठशाला ही होता है। बडों का आदर, स्त्री का आदर आदि भी कुटुम्ब ही सिखाता है। &lt;br /&gt;
## कुटुम्ब की शिक्षा : उसी प्रकार से कुटुम्ब के बारे में भी वह कई बातें सीखता है। उसकी व्यक्तिगत, कौटुम्बिक और सामाजिक आदतें बचपन में ही आकार लेतीं हैं। कुटुम्ब का महत्व, समाज में कौटुम्बिक भावना का महत्व, कौटुम्बिक व्यवस्थाओं का महत्व वह कुटुम्ब में सीखता है। भिन्न भिन्न स्वभावों के लोग एक छत के नीचे आत्मीयता से कैसे रहते हैं यह वह कुटुम्ब से ही सीखता है। लगभग सभी प्रकार से कुटुंब यह समाज का लघुरूप ही होता है। कुटुंब यह सामाजिकता की पाठशाला होती है। &lt;br /&gt;
## विद्याकेन्द्र शिक्षा: विद्याकेन्द्र की शिक्षा शास्त्रीय शिक्षा होती है। कुटुम्ब में सीखे हुए सदाचार के शास्त्रीय पक्ष को समझाने के लिये होती है। कुटुंब में सीखे हुए व्यावसायिक कौशलों को पैना बनाने के लिये होती है। कुटुंब में आत्मसात की हुई श्रेष्ठ परम्पराओं को अधिक उज्वल बनाने के तरीके सीखने के लिए होती है। अध्ययन का और कौशल का शास्त्रीय तरीका सिखने के लिये, अध्ययन को तेजस्वी बनाने के लिये होती है। &lt;br /&gt;
## लोकशिक्षा : लोकशिक्षा भी समाज जीवन का एक आवश्यक पहलू है। विद्याकेन्द्र की शिक्षा के उपरान्त भी मनुष्य का मन कई बार भ्रमित हो जाता हाय, बुद्धि कुण्ठित हो जाती है। ऐसी स्थिति में लोकशिक्षा की व्यवस्था इस संभ्रम को, इस कुण्ठा को दूर करती है। &lt;br /&gt;
## परंपरा निर्माण : अपने से अधिक श्रेष्ठ विरासत निर्माण करने की निरंतरता को श्रेष्ठ परंपरा कहते हैं। श्रेष्ठ परंपराओं के निर्माण की तीव्र इच्छा और पैने प्रयास समाज को श्रेष्ठ और चिरंजीवी बनाते हैं। &lt;br /&gt;
# शासन &lt;br /&gt;
## धर्मनिष्ठता : शासक धर्मशास्त्र के जानकार हों। धर्मशास्त्र के पालनकर्ता हों। धर्मशास्त्र के नियमों का प्रजा से अनुपालन करवाने में कुशल हों। &lt;br /&gt;
## धर्म व्यवस्था के साथ समायोजन : सदैव धर्म के जानकारों से अपना मूल्यांकन करवाएँ। धर्म के जानकारों की सूचनाओं का अनुपालन करें। अधर्म होने से प्रायश्चित्त और पश्चात्ताप के लिये उद्यत रहें। &lt;br /&gt;
# धर्म नेतृत्व &lt;br /&gt;
## धर्म के मार्गदर्शक : किसी का केवल धर्मशास्त्र का विशेषज्ञ होना पर्याप्त नहीं है। नि:स्वार्थ भाव, निर्भयता भी श्रेष्ठ धर्म के मार्गदर्शकों के लक्षण हैं। &lt;br /&gt;
## धर्माचरणी : धर्म का मार्गदर्शन करनेवाले लोग अपने व्यवहार में भी धर्मयुक्त होना चाहिये। &lt;br /&gt;
## विजीगिषु स्वभाववाले : धर्म का मार्गदर्शन करनेवाले लोगों के लिये विजीगिषु स्वभाव का होना आवश्यक है। कोई भी संकट आनेपर डगमगाएँ नहीं यह धर्म के मार्गदर्शकों के लिये आवश्यक है। धर्म के जानकारों का सबसे पहला कर्तव्य है कि वे वर्तमान काल के लिए धर्मशास्त्र या स्मृति की प्रस्तुति करें। यह स्मृति जीवन के सभी पहलुओं को व्यापने वाली हो। इसकी व्यापकता को समझने की दृष्टि से एक रूपरेखा नीचे दे रहे हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== धर्मशास्त्र प्रस्तुति के लिये बिन्दु ==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== धर्म की व्याख्याएँ ===&lt;br /&gt;
धर्म की व्याप्ति / त्रिवर्ग की व्याप्ति : सर्वे भवन्तु सुखिन: लक्ष्य हेतु धर्म : संस्कृति&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== व्यापक धर्मशास्त्र के प्रस्तुति की आवश्यकता ===&lt;br /&gt;
* पूर्व धर्मशास्त्रों की व्यापकता&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
* व्यापकता की आवश्यकता&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== व्यक्तिगत धर्म / पञ्चविध (कोष) पुरुष धर्म / चतुर्विध पुरूषार्थ /स्वधर्म (वर्णधर्म) ===&lt;br /&gt;
* शरीरधर्म &lt;br /&gt;
* मन-धर्म&lt;br /&gt;
* बुद्धि-धर्म&lt;br /&gt;
* चित्त-धर्म&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== सामाजिक संबंधों में धर्म ===&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== व्यक्ति-व्यक्ति : पुरूष-पुरूष या स्त्री-स्त्री ====&lt;br /&gt;
{{div col|colwidth=20em}}	 &lt;br /&gt;
# पारिवारिक रिश्ते&lt;br /&gt;
# पड़ोसी&lt;br /&gt;
# अतिथि&lt;br /&gt;
# शत्रु/विरोधक&lt;br /&gt;
# मित्र/सहायक&lt;br /&gt;
# सहकारी&lt;br /&gt;
# अपरिचित&lt;br /&gt;
# मालिक/नौकर&lt;br /&gt;
# चरित्रहीन स्त्री/पुरूष&lt;br /&gt;
# व्यसनी&lt;br /&gt;
# जरूरतमंद&lt;br /&gt;
# समव्यवसायी&lt;br /&gt;
# भिन्न व्यवसायी&lt;br /&gt;
# याचक&lt;br /&gt;
# भिन्न भाषी&lt;br /&gt;
# विक्रेता \ क्रेता&lt;br /&gt;
# भिन्न राष्ट्रीय&lt;br /&gt;
{{div col end}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== व्यक्ति-व्यक्ति : पुरूष-स्त्री ====&lt;br /&gt;
# पारिवारिक रिश्ते&lt;br /&gt;
# पड़ोसी&lt;br /&gt;
# अतिथि&lt;br /&gt;
# शत्रु/विरोधक&lt;br /&gt;
# मित्र/सहायक&lt;br /&gt;
# सहकारी&lt;br /&gt;
# अपरिचित&lt;br /&gt;
# मालिक/नौकर&lt;br /&gt;
# चरित्रहीन स्त्री/पुरूष&lt;br /&gt;
# व्यसनी&lt;br /&gt;
# जरूरतमंद&lt;br /&gt;
# समव्यवसायी&lt;br /&gt;
# भिन्न व्यवसायी&lt;br /&gt;
# याचक&lt;br /&gt;
# भिन्न भाषी&lt;br /&gt;
# विक्रेता\क्रेता&lt;br /&gt;
# भिन्न राष्ट्रीय&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== व्यक्ति-समाज ====&lt;br /&gt;
# व्यक्ति-परिवार&lt;br /&gt;
# व्यति-जाति&lt;br /&gt;
# पड़ोसी&lt;br /&gt;
# सामाजिक संगठन&lt;br /&gt;
# व्यक्ति-व्यवस्था&lt;br /&gt;
# व्यक्ति-राष्ट्र&lt;br /&gt;
# व्यक्ति-विश्व समाज&lt;br /&gt;
# व्यक्ति भिन्न भाषी&lt;br /&gt;
# परप्रांतीय&lt;br /&gt;
# परदेसी&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== समाज-समाज ====&lt;br /&gt;
# अंतर्राष्ट्रीय:&lt;br /&gt;
## शत्रु&lt;br /&gt;
## मित्र&lt;br /&gt;
## तटस्थ&lt;br /&gt;
# अंतर्देशीय&lt;br /&gt;
## प्रांत-प्रांत&lt;br /&gt;
## जनपद-जनपद&lt;br /&gt;
## भाषिक समूह&lt;br /&gt;
## पंथ समूह&lt;br /&gt;
## राष्ट्रीय समूह&lt;br /&gt;
## अराष्ट्रीय समूह&lt;br /&gt;
## राष्ट्रद्रोही समूह&lt;br /&gt;
## विदेशी&lt;br /&gt;
## समव्यवासायी&lt;br /&gt;
## जाति-जाति&lt;br /&gt;
## परिवार परिवार&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== सृष्टिगत सम्बन्धों में धर्म ===&lt;br /&gt;
# मनुष्य-अन्य जीव:&lt;br /&gt;
## मनुष्य-पालतू प्राणी:&lt;br /&gt;
### शाकाहारी&lt;br /&gt;
### मांसाहारी&lt;br /&gt;
## मनुष्य अन्य प्राणी:&lt;br /&gt;
### थलचर:&lt;br /&gt;
#### शाकाहारी&lt;br /&gt;
#### मांसाहारी&lt;br /&gt;
### जलचर&lt;br /&gt;
### नभचर&lt;br /&gt;
## मनुष्य-वनस्पति:&lt;br /&gt;
### जमीन के नीचे&lt;br /&gt;
### जमीन के ऊपर&lt;br /&gt;
### वनस्पति/औषधी&lt;br /&gt;
### खानेयोग्य / अन्न&lt;br /&gt;
### अखाद्य / जहरीली&lt;br /&gt;
### नशीली&lt;br /&gt;
## मनुष्य-कृमि / कीटक / सूक्ष्म जीव&lt;br /&gt;
### सहायक&lt;br /&gt;
### हानिकारक&lt;br /&gt;
## मनुष्य-जड़ प्रकृति / पंचमहाभूत&lt;br /&gt;
### अनवीकरणीय/खनिज&lt;br /&gt;
#### ठोस&lt;br /&gt;
#### द्रव&lt;br /&gt;
#### वायु (इंधन)&lt;br /&gt;
### नवीकरणीय&lt;br /&gt;
#### वायु/हवा&lt;br /&gt;
#### जल&lt;br /&gt;
#### सूर्यप्रकाश&lt;br /&gt;
#### लकड़ी&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== आपद्धर्म ===&lt;br /&gt;
# प्राकृतिक आपदा&lt;br /&gt;
# मानव निर्मित आपदा (लगभग उपर्युक्त सभी विषयों में)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== परिवर्तन के पुरोधा ==&lt;br /&gt;
उपर्युक्त बिन्दु २ में बताए गए श्रेष्ठ जन ही परिवर्तन के पुरोधा होंगे। इनका प्रमाण समाज में मुष्किल से ५-७ प्रतिशत ही पर्याप्त होता है। ऐसे श्रेष्ठ जनों में निम्न वर्ग के लोग आते हैं।	&lt;br /&gt;
४.१ शिक्षक : शिक्षक ज्ञानी, त्यागी, कुशल, समाज हित के लिए समर्पित, धर्म का जानकार, समाज को घडने की सामर्थ्य रखनेवाला होता है। नई पीढी जो परिवर्तन का अधिक सहजता से स्वीकार कर सकती है उसको घडना शिक्षक का काम होता है। इसलिये परिवर्तन की प्रक्रिया का मुख्य पुरोधा शिक्षक ही होता है।	&lt;br /&gt;
४.२ श्रेष्ठ जन :यहाँ श्रेष्ठ जनों से मतलब भिन्न भिन्न सामाजिक गतिविधियों में जो अग्रणी लोग हैं उनसे है।	&lt;br /&gt;
४.३ सांप्रदायिक संगठनों के प्रमुख : आजकल समाज का एक बहुत बडा वर्ग जिसमें शिक्षित वर्ग भी है, भिन्न भिन्न संप्रदायों से जुडा है। उन संप्रदायों के प्रमुख भी इस परिवर्तन की प्रक्रिया का एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण हिस्सा बनने की शक्ति रखते हैं।	&lt;br /&gt;
४.४ लोकशिक्षा के माध्यम : कीर्तनकार, कथाकार, प्रवचनकार, नाटक मंडलि, पुरोहित या उपाध्याय, साधू, बैरागी, सिंहस्थ या कुंभ जैसे मेले, यात्राएँ आदि लोकशिक्षा के माध्यम हुआ करते थे। वर्तमान में ये सब कमजोर और दिशाहीन हो गए हैं। एक ओर इनमें से जिनको पुनर्जीवित कर सकते हैं उन्हें करना। नए आयाम भी जोडे जा सकते हैं। जैसे अभी लगभग देढ दशक पूर्व महाराष्ट्र में प्रारंभ हुई नव-वर्ष स्वागत यात्राएँ आदि।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== अंतर्निहित सुधार व्यवस्था ==&lt;br /&gt;
काल के प्रवाह में समाज में हो रहे परिवर्तन और मनुष्य की स्खलनशीलता के कारण बढनेवाला अधर्माचरण ये दो बातें ऐसीं हैं जो किसी भी श्रेष्ठतम समाज को भी नष्ट कर देतीं हैं। इस दृष्टि से जागरूक ऐसे शिक्षक और धर्म के मार्गदर्शक साथ में मिलकर समाज की अंतर्निहित सुधार व्यवस्था बनाते हैं। अपनी संवेदनशीलता और समाज के निरंतर बारीकी से हो रहे अध्ययन के कारण इन्हें संकटों का पूर्वानुमान हो जाता है। अपने निरीक्षणों के आधारपर अपने लोकसंग्रही स्वभाव से ये लोगों को भी संकटों से ऊपर उठने के लिये तैयार करते हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== परिवर्तन की नीति ==&lt;br /&gt;
प्रारंभ में विरोध को आमंत्रण नहीं देना। संघर्ष में शक्ति का अपव्यय नहीं करना। जो आज कर सकते हैं उसे करते जाना। जो कल करने की आवश्यकता है उस के लिये परिस्थिति निर्माण करना। परिस्थिति के निर्माण होते ही आगे बढना।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== परिवर्तन में अवरोध और उनका निराकरण ==&lt;br /&gt;
शासनाधिष्ठित समाज में स्वार्थ के आधारपर परिवर्तन सरल और तेज गति से होता है। हिटलरने १५-२० वर्षों में ही जर्मनी को एक समर्थ राष्ट्र के रूप में खड़ा कर दिया था। लेकिन धर्म पर आधारित जीवन के प्रतिमान में परिवर्तन की गति धीमी और मार्ग कठिन होता है। स्थाई परिवर्तन और वह भी कौटुम्बिक भावना के आधारपर, तो धीरे धीरे ही होता है। &lt;br /&gt;
७.१ अंतर्देशीय 	&lt;br /&gt;
७.१.१ मानवीय जड़ता : परिवर्तन का आनंद से स्वागत करनेवाले लोग समाज में अल्पसंख्य ही होते हैं। सामान्यत: युवा वर्ग ही परिवर्तन के लिए तैयार होता है। इसलिए युवा वर्ग को इस परिवर्तन की प्रक्रिया में सहभागी बनाना होगा। परिवर्तन की प्रक्रिया में युवाओं को सम्मिलित करते जाने से दो तीन पीढ़ियों में परिवर्तन का चक्र गतिमान हो जाएगा।&lt;br /&gt;
७.१.२ विपरीत शिक्षा : जैसे जैसे भारतीय शिक्षा का विस्तार समाज में होगा वर्तमान की विपरीत शिक्षा का अपने आप ही क्रमश: लोप होगा।	   &lt;br /&gt;
७.१.३ मजहबी मानसिकता : भारतीय याने धर्म की शिक्षा के उदय और विस्तार के साथ ही मजहबी शिक्षा और उसका प्रभाव भी शनै: शनै: घटता जाएगा। मजहबों की वास्तविकता को भी उजागर करना आवश्यक है। &lt;br /&gt;
७.१.४ धर्म के ठेकेदार : जैसे जैसे धर्म के जानकार और धर्म के अनुसार आचरण करनेवाले लोग समाज में दिखने लगेंगे, धर्म के तथाकथित ठेकेदारों का प्रभाव कम होता जाएगा। &lt;br /&gt;
७.१.५ शासन तंत्र : इस परिवर्तन की प्रक्रिया में धर्म के जानकारों के बाद शासन की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण होगी। धर्माचरणी लोगों को समर्थन, सहायता और संरक्षण देने का काम शासन को करना होगा। इस के लिए शासक भी धर्म का जानकार और धर्मनिष्ठ हो, यह भी आवश्यक है। धर्म के जानकारों को यह सुनिश्चित करना होगा की शासक धर्माचरण करनेवाले और धर्म के जानकर हों।&lt;br /&gt;
७.१.६ जीवन का अभारतीय प्रतिमान : जीवन के सभी क्षेत्रों में एकसाथ जीवन के प्रतिमान के परिवर्तन की प्रक्रिया को चलाना यह धर्म के जानकारों की जिम्मेदारी होगी। शिक्षा की भूमिका इसमें सबसे महत्वपूर्ण होगी। शिक्षा के माध्यम से समूचे जीवन के भारतीय प्रतिमान की रुपरेखा और प्रक्रिया को समाजव्यापी बनाना होगा। धर्मं-शरण शासन इसमें सहायता करेगा।&lt;br /&gt;
७.१.७ तन्त्रज्ञान  समायोजन : तन्त्रज्ञान के क्षेत्र में भारत के सामने दोहरी चुनौती होगी। एक ओर तो विश्व में जो तन्त्रज्ञान के विकास की होड़ लगी है उसमें अपनी विशेषताओं के साथ अग्रणी रहना। इस दृष्टि से विकास हेतु कुछ तन्त्रज्ञान निम्न हो सकते हैं।&lt;br /&gt;
- शून्य प्रदुषण रासायनिक उद्योग।&lt;br /&gt;
- सस्ती सौर उर्जा।&lt;br /&gt;
- प्रकृति में सहजता से घुलनशील प्लैस्टिक का निर्माण। &lt;br /&gt;
- औरों द्वारा प्रक्षेपित शस्त्रों/अणु-शस्त्रों का शमन करने का तंत्रज्ञान। ...............आदि &lt;br /&gt;
और दूसरी ओर वैकल्पिक विकेंद्रीकरणपर आधारित तन्त्रज्ञान का विकास कर उसे विश्व में प्रतिष्ठित करना। इस प्रकार के तन्त्रज्ञान में निम्न प्रकार के तन्त्रज्ञान होंगे।&lt;br /&gt;
- कौटुम्बिक उद्योगों के लिये, स्थानिक संसाधनों के उपयोग के लिए तन्त्रज्ञान  &lt;br /&gt;
- भिन्न भिन्न कार्यों के लिये पशु-उर्जा के अधिकाधिक उपयोग के लिये तंत्रज्ञान&lt;br /&gt;
- नविकरणीय प्राकृतिक संसाधनों से विविध पदार्थों के निर्माण से आवश्यकताओं की पूर्ति तथा संसाधनों के पुनर्भरण के लिये सरल तन्त्रज्ञान का विकास   &lt;br /&gt;
- मानव की प्राकृतिक क्षमताओं का विकास करनेवाली प्रक्रियाओं का अनुसंधान। ......... आदि &lt;br /&gt;
७.२ अंतर्राष्ट्रीय 	&lt;br /&gt;
७.२.१ मजहबी विस्तारवादी मानसिकता : वर्तमान में यह मुख्यत: ३ प्रकार की है। ईसाई, मुस्लिम और वामपंथी। यह तीनों ही विचारधाराएँ अधूरी हैं, एकांगी हैं। यह तो इन के सम्मुख ‘सर्वे भवन्तु सुखिन:’ को लेकर कोई चुनौती खड़ी नहीं होने से इन्हें विश्व में विस्तार का अवसर मिला है। जैसे ही ‘सर्वे भवन्तु सुखिन:’ का विचार लेकर भारत एक वैश्विक शक्ति के रूप में खड़ा होगा इनके पैरोंतले की जमीन खिसकने लगेगी। &lt;br /&gt;
७.२.२ आसुरी महत्वाकांक्षा : ऊपर जो बताया गया है वह, आसुरी महत्वाकांक्षा रखनेवाली वैश्विक शक्तियों के लिये भी लागू है। आसुरी महत्वाकांक्षाओं को परास्त करने की परंपरा भारत में युगों से रही है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== परिवर्तन के लिये समयबध्द करणीय कार्य ==&lt;br /&gt;
समूचे जीवन के प्रतिमान का परिवर्तन यह एक बहुत बृहद् और जटिल कार्य है। इस के लिये इसे सामाजिक अभियान का रूप देना होगा। समविचारी लोगों को संगठित होकर सहमति से और चरणबध्द पध्दति से प्रक्रिया को आगे बढाना होगा। बड़े पैमानेपर जीवन के हर क्षेत्र में जीवन के भारतीय प्रतिमान की समझ रखनेवाले और कृतीशील ऐसे लोग याने आचार्य निर्माण करने होंगे। परिवर्तन के चरण एक के बाद एक और एक के साथ सभी इस पध्दति से चलेंगे। जैसे दूसरे चरण के काल में ५० प्रतिशत शक्ति और संसाधन दूसरे चरणके निर्धारित विषयपर लगेंगे। और १२.५-१२.५ प्रतिशत शक्ति और संसाधन चरण १, ३, ४ और ५ में प्रत्येकपर लगेंगे।&lt;br /&gt;
१. समविचारी लोगों का ध्रुवीकरण : जिन्हें प्रतिमान के परिवर्तन की आस है और समझ भी है ऐसे समविचारी, सहचित्त लोगों का ध्रुवीकरण करना होगा। उनमें एक व्यापक सहमति निर्माण करनी होगी। अपने अपने कार्यक्षेत्र में क्या करना है इसका स्पष्टीकरण करना होगा।&lt;br /&gt;
२. अभियान के चरण : अभियान को चरणबध्द पध्दति से चलाना होगा। १२ वर्षों के ये पाँच चरण होंगे। ऐसी यह ६० वर्ष की योजना होगी। यह प्रक्रिया तीन पीढीतक चलेगी। तीसरी पीढी में परिवर्तन के फल देखने को मिलेंगे। लेकिन तबतक निष्ठा से और धैर्य से अभियान को चलाना होगा। निरंतर मूल्यांकन करना होगा। राह भटक नहीं जाए इसके लिये चौकन्ना रहना होगा।&lt;br /&gt;
२.१ अध्ययन और अनुसंधान : जीवन का दायरा बहुत व्यापक होता है। अनगिनत विषय इसमें आते हैं। इसलिये प्रतिमान के बदलाव से पहले हमें दोनों प्रतिमानों के विषय में और विशेषत: जीवन के भारतीय प्रतिमान के विषय में बहुत गहराई से अध्ययन करना होगा। मनुष्य की इच्छाओं का दायरा, उनकी पूर्ति के लिये वह क्या क्या कर सकता है आदि का दायरा अति विशाल है। इन दोनों को धर्म के नियंत्रण में ऐसे रखा जाता है इसका भी अध्ययन अनिवार्य है। मनुष्य के व्यक्तित्व को ठीक से समझना, उसके शरीर, मन, बुध्दि, चित्त, अहंकार आदि बातों को समझना, कर्मसिध्दांत को समझना, जन्म जन्मांतर चलने वाली शिक्षा की प्रक्रिया को समझना विविध विषयों के अंगांगी संबंधों को समझना, प्रकृति के रहस्यों को समझना आदि अनेकों ऐसी बातें हैं जिनका अध्ययन हमें करना होगा। इनमें से कई विषयों के संबंध में हमारे पूर्वजों ने विपुल साहित्य निर्माण किया था। उसमें से कितने ही साहित्य को जाने अंजाने में प्रक्षेपित किया गया है। इस प्रक्षिप्त हिस्से को समझ कर अलग निकालना होगा। शुध्द भारतीय तत्वोंपर आधारित ज्ञान को प्राप्त करना होगा। अंग्रेजों ने भारतीय साहित्य, इतिहास के साथ किये खिलवाड, भारतीय समाज में झगडे पैदा करने के लिये निर्मित साहित्य को अलग हटाकर शुध्द भारतीय याने एकात्म भाव की या कौटुम्बिक भाव की जितनी भी प्रस्तुतियाँ हैं उनका अध्ययन करना होगा। मान्यताओं, व्यवहार सूत्रों, संगठन निर्माण और व्यवस्था निर्माण की प्रक्रिया को समझना होगा।     &lt;br /&gt;
२.२ लोकमत परिष्कार : अध्ययन से जो ज्ञान उभरकर सामने आएगा उसे लोगोंतक ले जाना होगा। लोगों का प्रबोधन करना होगा। उन्हें फिर से समग्रता से और एकात्मता से सोचने और व्यवहार करने का तरीका बताना होगा। उन्हें उनकी सामाजिक जिम्मेदारी का समाजधर्म का अहसास करवाना होगा। वर्तमान की परिस्थितियों से सामान्यत: कोई भी खुश नहीं है। लेकिन जीवन का भारतीय प्रतिमान ही  उनकी कल्पना के अच्छे दिनों का वास्तव है यह सब के मन में स्थापित करना होगा।	         &lt;br /&gt;
२.३ संयुक्त कुटुम्ब : कुटुम्ब ही समाजधर्म सीखने की पाठशाला होता है। संयुक्त कुटुम्ब तो वास्तव में समाज का लघुरूप ही होता है। सामाजिक समस्याओं में से लगभग ७० प्रतिशत समस्याओं को तो केवल अच्छा संयुक्त कुटुम्ब ही निर्मूल कर देता है। समाज जीवन के लिये श्रेष्ठ लोगों को जन्म देने का काम, श्रेष्ठ संस्कार देने का काम, अच्छी आदतें डालने काम आजकल की फॅमिली पध्दति नहीं कर सकती। जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में जो तेजस्वी नेतृत्व का अभाव निर्माण हो गया है उसे दूर करना यह भारतीय मान्यताओं के अनुसार चलाए जानेवाले संयुक्त परिवारों में ही हो सकता है। इसलिये समाज का नेतृत्व करेंगे ऐसे श्रेष्ठ बालकों को जन्म देने के प्रयास तीसरे चरण में होंगे।&lt;br /&gt;
२.४ शिक्षक/धर्मज्ञ और शासक निर्माण : समाज परिवर्तन में शिक्षक की और शासक की ऐसे दोनों की भुमिका अत्यंत महत्वपूर्ण होती है। संयुक्त परिवारों में जन्म लिये बच्चों में से अब श्रेष्ठ धर्म के मार्गदर्शक, शिक्षक और शासक निर्माण करने की स्थिति होगी। ऐसे लोगों को समर्थन और सहायता देनेवाले कुटुम्ब और दूसरे चरण में निर्माण किये समाज के परिष्कृत विचारोंवाले सदस्य अब कुछ मात्रा में उपलब्ध होंगे।	   &lt;br /&gt;
२.५ संगठन और व्यवस्थाओं की प्रतिष्ठापना : श्रेष्ठ धर्म के अधिष्ठाता/मार्गदर्शक, सामर्थ्यवान शिक्षक और कुशल शासक अब प्रत्यक्ष संगठन का सशक्तिकरण और व्यवस्थाओं का निर्माण करेंगे।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==References==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;references /&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अन्य स्रोत:&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[Category:Bhartiya Jeevan Pratiman (भारतीय जीवन प्रतिमान)]]&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Dilipkelkar</name></author>
	</entry>
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		<id>https://dharmawiki.org/index.php?title=Planning_For_Change_(%E0%A4%AA%E0%A4%B0%E0%A4%BF%E0%A4%B5%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%A4%E0%A4%A8_%E0%A4%95%E0%A5%80_%E0%A4%AF%E0%A5%8B%E0%A4%9C%E0%A4%A8%E0%A4%BE)&amp;diff=119354</id>
		<title>Planning For Change (परिवर्तन की योजना)</title>
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		<updated>2019-06-02T14:31:31Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Dilipkelkar: /* धर्मशास्त्र प्रस्तुति के लिये बिन्दु */ लेख सम्पादित किया&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{One source|date=January 2019}}&lt;br /&gt;
[[Template:Cleanup reorganize Dharmawiki Page]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
परिवर्तन की योजना को समझने के लिए हमें पहले निम्न बातें फिर से स्मरण करनी होंगी ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जीवन के भारतीय प्रतिमान की जानकारी के लिए - &lt;br /&gt;
# जीवनदृष्टि/व्यवहार : भारतीय जीवनदृष्टि और जीवनशैली के विषय में जानकारी के लिये कृपया [[Elements of Hindu Jeevan Drishti and Life Style (भारतीय/हिन्दू जीवनदृष्टि और जीवन शैली के सूत्र)|यह]] लेख देखें।&lt;br /&gt;
# व्यवस्था समूह का ढाँचा जीवनदृष्टि से सुसंगत होना चाहिए। कृपया व्यवस्था समूह के ढाँचे के लिये [[Jeevan Ka Pratiman (जीवन का प्रतिमान)|यह]] लेख और जानकारी के लिए [[Interrelationship in Srishti (सृष्टि में परस्पर सम्बद्धता)|यह]] लेख देखें।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== समस्या मूलों के निराकरण की नीति ==&lt;br /&gt;
समस्या मूल नष्ट करने से तात्पर्य समस्या मूलों पर आघात से नहीं है। समस्याएँ निर्माण ही नहीं हों ऐसी परिस्थितियों, ऐसे समाज संगठनों और ऐसी व्यवस्थाओं के निर्माण से है। निराकरण की प्रक्रिया के ३ चरण होंगे। समस्याओं को और परिवर्तन के स्वरूप को समझना, निराकरण की नीति तय करना और निराकरण का क्रियान्वयन करना। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== परिवर्तन के स्वरूप को समझना ==&lt;br /&gt;
समस्या का मूल जीवन के प्रतिमान के परिवर्तन में है। प्रतिमान का आधार समाज की जीवनदृष्टि होती है। व्यवहार, संगठन और व्यवस्थाएँ तो जीवनदृष्टि के आधार पर ही तय होते हैं। इसलिये परिवर्तन की प्रक्रिया में जीवनदृष्टि के परिवर्तन की प्रक्रिया को प्राथमिकता देनी होगी। व्यवहार में सुसंगतता आए इसलिये करणीय अकरणीय विवेक को सार्वत्रिक करना होगा। दूसरे क्रमांक पर संगठन और व्यवस्थाओं में परिवर्तन की प्रक्रिया चलेगी। व्यवस्था परिवर्तन की इस प्रक्रिया में समग्रता और एकात्मता के संदर्भ में व्यवस्था विशेष का आधार बनाने के लिये विषय की सैध्दांतिक प्रस्तुति करनी होगी। जैसे शासन व्यवस्था में यदि उचित परिवर्तन करना है तो पहले राजशास्त्र की सैध्दांतिक प्रस्तुति करना आवश्यक है। समृद्धि व्यवस्था में परिवर्तन करने के लिये समृद्धिशास्त्र की सैध्दांतिक प्रस्तुति करनी होगी। इन सैध्दांतिक प्रस्तुतियों को प्रयोग सिध्द करना होगा। प्रयोगों के आधार पर इन प्रस्तुतियों में उचित परिवर्तन करते हुए आगे बढना होगा। यह काम प्राथमिकता से धर्म के जानकारों का है। दूसरे क्रमांक की जिम्मेदारी शिक्षकों की है। शिक्षक वर्ग ही धर्म को सार्वत्रिक करता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== निराकरण की नीति ==&lt;br /&gt;
समस्याएँ इतनी अधिक और पेचिदा हैं कि इनका निराकरण अब संभव नहीं है, ऐसा कई विद्वान मानते हैं। हमने जो करणीय और अकरणीय विवेक को समझा है उसके अनुसार कोई भी बात असंभव नहीं होती। ऊपरी तौर पर असंभव लगने पर भी उसे संभव चरणों में बाँटकर संपन्न किया जा सकता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इस के लिये नीति के तौर पर हमारा व्यवहार निम्न प्रकार का होना चाहिए:&lt;br /&gt;
* सबसे पहले तो यह हमेशा ध्यान में रखना कि यह पूरे समाज जीवन के प्रतिमान के परिवर्तन का विषय है। इसे परिवर्तन के लिये कई पीढियों का समय लग सकता है। भारत वर्ष के दीर्घ इतिहास में समाज ने कई बार उत्थान और पतन के दौर अनुभव किये हैं। बार बार भारतीय समाज ने उत्थान किया है।&lt;br /&gt;
* परिवर्तन की प्रक्रिया को संभाव्य चरणों में बाँटना।&lt;br /&gt;
* उसमें आज जो हो सकता है उसे कर डालना।&lt;br /&gt;
* आज जिसे करना कठिन लगता है उसके लिये परिस्थितियाँ बनाते जाना। परिस्थितियाँ बनते ही उसे करना।&lt;br /&gt;
* प्रारंभ में जबतक परिवर्तन की प्रक्रिया ने गति नहीं पकडी है, यथासंभव कोई विरोध मोल नहीं लेना।&lt;br /&gt;
* इसी प्रकार से एक एक चरण को संभव बनाते हुए आगे बढ़ाते जाना।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== समस्या मूलों का निराकरण ==&lt;br /&gt;
वास्तव में समस्या मूलों को नष्ट करना यह शब्दप्रयोग ठीक नहीं है। उचित प्रतिमान की प्रतिष्ठापना के साथ ही गलत प्रतिमान का अंत अपने आप होता है। जो सर्वहितकारी है, उचित है, श्रेष्ठ है, उसकी प्रतिष्ठापना ही परिवर्तन की प्रक्रिया का स्वरूप होगा। स्वाभाविक जडता के कारण कुछ कठिनाईयाँ तो आएँगी। लेकिन गलत प्रतिमान को नष्ट करने के लिये अलग से शक्ति लगाने की आवश्यकता नहीं है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== समस्या मूल नष्ट करने हेतु धर्म के जानकारों के मार्गदर्शन में शिक्षा की व्याप्ति ==&lt;br /&gt;
# जीवनदृष्टि की शिक्षा : जीवनदृष्टि की शिक्षा मुख्यत: कामनाओं और कामनाओं की पूर्ति के प्रयास, धन, साधन और संसाधनों को धर्म के दायरे में रखने की शिक्षा ही है। पुरूषार्थ चतुष्टय की या त्रिवर्ग की शिक्षा ही है।&lt;br /&gt;
# व्यवस्थाएँ : जीवनदृष्टि के अनुसार व्यवहार हो सके इस हेतु से ही व्यवस्थाओं का निर्माण किया जाता है। व्यवस्थाओं के निर्माण में और उनके क्रियान्वयन में भी जीवनदृष्टि ओतप्रोत रहे इसका ध्यान रखना होगा।&lt;br /&gt;
## धर्म व्यवस्था&lt;br /&gt;
## शिक्षा व्यवस्था&lt;br /&gt;
## शासन व्यवस्था&lt;br /&gt;
## समृद्धि व्यवस्था&lt;br /&gt;
# संगठन : समाज संगठन और समाज की व्यवस्थाएँ एक दूसरे को पूरक पोषक होती हैं। लेकिन धर्म व्यवस्था, शिक्षा व्यवस्था और शासन व्यवस्था के अभाव में संगठन निर्माण करना अत्यंत कठिन हो जाता है। वास्तव में ये दोनों अन्योन्याश्रित होते हैं। समाज संगठन की जानकारी के लिये कृपया [[Society (समाज)|यह]] लेख देखें।&lt;br /&gt;
## कुटुम्ब&lt;br /&gt;
## स्वभाव समायोजन&lt;br /&gt;
## आश्रम&lt;br /&gt;
## कौशल विधा&lt;br /&gt;
## ग्राम&lt;br /&gt;
## राष्ट्र&lt;br /&gt;
# विज्ञान और तन्त्रज्ञान: कृपया [[Bharat's Science and Technology (भारतीय विज्ञान तन्त्रज्ञान दृष्टि)|यह]] लेख देखें। &lt;br /&gt;
## विकास और उपयोग नीति&lt;br /&gt;
## सार्वत्रिकीकरण&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== परिवर्तन की योजना ==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== परिवर्तन का स्वरूप ===&lt;br /&gt;
वर्तमान स्वार्थ पर आधारित जीवन के प्रतिमान के स्थान पर आत्मीयता याने कौटुम्बिक भावना पर आधारित जीवन के प्रतिमान की प्रतिष्ठापना:&lt;br /&gt;
# सर्वे भवन्तु सुखिन:, देशानुकूल और कालानुकूल आदि के संदर्भ में दोनों प्रतिमानों को समझना&lt;br /&gt;
# प्रतिमान का परिवर्तन&lt;br /&gt;
## सामाजिक व्यवस्थाओं का पुनर्निर्माण&lt;br /&gt;
### समाज के संगठनों का परिष्कार/पुनरूत्थान या नवनिर्माण&lt;br /&gt;
### तन्त्रज्ञान  का समायोजन / तन्त्रज्ञान  नीति / जीवन की इष्ट गति : वर्तमान में तन्त्रज्ञान  की विकास की गति से जीवन को जो गति प्राप्त हुई है उस के कारण सामान्य मनुष्य घसीटा जा रहा है। पर्यावरण सन्तुलन  और सामाजिकता दाँवपर लग गए हैं। ज्ञान, विज्ञान और तन्त्रज्ञान ये तीनों बातें पात्र व्यक्ति को ही मिलनी चाहिये। बंदर के हाथ में पलिता नहीं दिया जाता। इस लिये किसी भी तन्त्रज्ञान के सार्वत्रिकीकरण से पहले उसके पर्यावरण, समाजजीवन और व्यक्ति जीवनपर होनेवाले परिणाम जानना आवश्यक है। हानिकारक तंत्रज्ञान का तो विकास भी नहीं करना चाहिये। किया तो वह केवल सुपात्र को ही अंतरित हो यह सुनिश्चित करना चाहिये। ऐसी स्थिति में जीवन की इष्ट गति की ओर बढानेवाली तन्त्रज्ञान नीति का स्वीकार करना होगा। इष्ट गति के निकषों के लिये [[Bharat's Science and Technology (भारतीय विज्ञान एवं तन्त्रज्ञान दृष्टि)|इस]] लेख में बताई कसौटी लगानी होगी। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== परिवर्तन की प्रक्रिया ===&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सामाजिक परिवर्तन भौतिक वस्तुओं के परिवर्तन जैसे सरल नहीं होते। भौतिक पदार्थों का एक निश्चित स्वभाव होता है। धर्म होता है। इसे ध्यान में रखकर भौतिक पदार्थों को ढाला जाता है। हर मानव का स्वभाव भिन्न होता है। भिन्न समय पर भी उसमें बदलाव आ सकता है। इसलिये सामाजिक परिवर्तन क्रांति से नहीं उत्क्रांति से ही किये जा सकते हैं। उत्क्रांति की गति धीमी होती है। होने वाले परिवर्तनों से किसी की हानि नहीं हो या होने वाली हानि न्यूनतम हो, परिवर्तन स्थाई हों, परिवर्तन से सबको लाभ मिले यह सब देखकर ही प्रक्रिया चलाई जाती है। सामाजिक परिवर्तनों के लिये नई पीढी से प्रारंभ करना यह सबसे अच्छा रास्ता है। लेकिन नई पीढी में व्यापक रूप से परिवर्तन के पहलुओं को स्थापित करने के लिये आवश्यक इतनी पुरानी पीढी के श्रेष्ठ जनों की संख्या आवश्यक है। ऐसे श्रेष्ठ जनों का वर्णन श्रीमद्भगवद्गीता में किया गया है:&amp;lt;blockquote&amp;gt;यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जन:।&amp;lt;/blockquote&amp;gt;&amp;lt;blockquote&amp;gt;स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते॥ (अध्याय ३ श्लोक २१)&amp;lt;/blockquote&amp;gt;इसलिये एक दृष्टि से देखा जाए तो यह प्रक्रिया समाज के प्रत्येक व्यक्तितक ले जाने की आवश्यकता नहीं होती। केवल समाज जीवन की सभी विधाओं के श्रेष्ठ लोगों के निर्माण की प्रक्रिया ही परिवर्तन की प्रक्रिया है। एक बार ये लोग निर्माण हो गये तो फिर परिवर्तन तेज याने ज्यामितीय गति से होने लगता है।&lt;br /&gt;
* धीमी लेकिन अविश्रांत : हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि हमें सामाजिक परिवर्तन करना है। समाज एक जीवंत ईकाई होता है। जीवंत ईकाई में परिवर्तन हमेशा धीमी गति से, समग्रता से और अविरत करते रहने से होते हैं। कोई भी शीघ्रता या टुकडों में होनेवाले परिवर्तन हानिकारक होते हैं।&lt;br /&gt;
* सभी क्षेत्रों में एकसाथ : समाज एक जीवंत ईकाई होने के कारण इसके सभी अंग किसी भी बात से एक साथ प्रभावित होते हैं। प्रभाव का परिमाण कम अधिक होगा लेकिन प्रभाव सभी पर होता ही है। इसलिये परिवर्तन की प्रक्रिया टुकडों में अलग अलग या एक के बाद एक ऐसी नहीं होगी। परिवर्तन की प्रक्रिया धर्म, शिक्षा, शासन, अर्थ, न्याय, समाज संगठन आदि सभी क्षेत्रों में एक साथ चलेगी। ऐसी प्रक्रिया का प्रारंभ होना बहुत कठिन होता है। लेकिन एक बार सभी क्षेत्रों में प्रारंभ हो जाता है तो फिर यह तेजी से गति प्राप्त कर लेती है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== परिवर्तन के कारक तत्व ===&lt;br /&gt;
# शिक्षा : शिक्षा का दायरा बहुत व्यापक है। शिक्षा जन्म जन्मांतर चलनेवाली प्रक्रिया होती है। इस जन्म में शिक्षा गर्भधारणा से मृत्यूपर्यंत चलती है। आयु की अवस्था के अनुसार शिक्षा का स्वरूप बदलता है। &lt;br /&gt;
## कुटुम्ब में शिक्षा : कुटुम्ब में शिक्षा का प्रारंभ गर्भधारणा से होता है। मनुष्य की ६०-७० प्रतिशत घडन तो कुटुम्ब में ही होती है। कुटुम्ब में रहकर वह कई बातें सीखता है। कौटुम्बिक भावना, कर्तव्य, सदाचार आदि की शिक्षा कुटुम्ब की ही जिम्मेदारी होती है। व्यवस्थाओं के साथ समायोजन, व्यवस्थाओं के स्वरूप आदि भी वह कुटुम्ब में ही अपने ज्येष्ठों से सीखता है। इंद्रियों के विकास की शिक्षा, व्यावसायिक कौशल भी वह कुटुम्ब में ही सीखता है। कुटुम्ब सामाजिकता की पाठशाला ही होता है। बडों का आदर, स्त्री का आदर आदि भी कुटुम्ब ही सिखाता है। &lt;br /&gt;
## कुटुम्ब की शिक्षा : उसी प्रकार से कुटुम्ब के बारे में भी वह कई बातें सीखता है। उसकी व्यक्तिगत, कौटुम्बिक और सामाजिक आदतें बचपन में ही आकार लेतीं हैं। कुटुम्ब का महत्व, समाज में कौटुम्बिक भावना का महत्व, कौटुम्बिक व्यवस्थाओं का महत्व वह कुटुम्ब में सीखता है। भिन्न भिन्न स्वभावों के लोग एक छत के नीचे आत्मीयता से कैसे रहते हैं यह वह कुटुम्ब से ही सीखता है। लगभग सभी प्रकार से कुटुंब यह समाज का लघुरूप ही होता है। कुटुंब यह सामाजिकता की पाठशाला होती है। &lt;br /&gt;
## विद्याकेन्द्र शिक्षा: विद्याकेन्द्र की शिक्षा शास्त्रीय शिक्षा होती है। कुटुम्ब में सीखे हुए सदाचार के शास्त्रीय पक्ष को समझाने के लिये होती है। कुटुंब में सीखे हुए व्यावसायिक कौशलों को पैना बनाने के लिये होती है। कुटुंब में आत्मसात की हुई श्रेष्ठ परम्पराओं को अधिक उज्वल बनाने के तरीके सीखने के लिए होती है। अध्ययन का और कौशल का शास्त्रीय तरीका सिखने के लिये, अध्ययन को तेजस्वी बनाने के लिये होती है। &lt;br /&gt;
## लोकशिक्षा : लोकशिक्षा भी समाज जीवन का एक आवश्यक पहलू है। विद्याकेन्द्र की शिक्षा के उपरान्त भी मनुष्य का मन कई बार भ्रमित हो जाता हाय, बुद्धि कुण्ठित हो जाती है। ऐसी स्थिति में लोकशिक्षा की व्यवस्था इस संभ्रम को, इस कुण्ठा को दूर करती है। &lt;br /&gt;
## परंपरा निर्माण : अपने से अधिक श्रेष्ठ विरासत निर्माण करने की निरंतरता को श्रेष्ठ परंपरा कहते हैं। श्रेष्ठ परंपराओं के निर्माण की तीव्र इच्छा और पैने प्रयास समाज को श्रेष्ठ और चिरंजीवी बनाते हैं। &lt;br /&gt;
# शासन &lt;br /&gt;
## धर्मनिष्ठता : शासक धर्मशास्त्र के जानकार हों। धर्मशास्त्र के पालनकर्ता हों। धर्मशास्त्र के नियमों का प्रजा से अनुपालन करवाने में कुशल हों। &lt;br /&gt;
## धर्म व्यवस्था के साथ समायोजन : सदैव धर्म के जानकारों से अपना मूल्यांकन करवाएँ। धर्म के जानकारों की सूचनाओं का अनुपालन करें। अधर्म होने से प्रायश्चित्त और पश्चात्ताप के लिये उद्यत रहें। &lt;br /&gt;
# धर्म नेतृत्व &lt;br /&gt;
## धर्म के मार्गदर्शक : किसी का केवल धर्मशास्त्र का विशेषज्ञ होना पर्याप्त नहीं है। नि:स्वार्थ भाव, निर्भयता भी श्रेष्ठ धर्म के मार्गदर्शकों के लक्षण हैं। &lt;br /&gt;
## धर्माचरणी : धर्म का मार्गदर्शन करनेवाले लोग अपने व्यवहार में भी धर्मयुक्त होना चाहिये। &lt;br /&gt;
## विजीगिषु स्वभाववाले : धर्म का मार्गदर्शन करनेवाले लोगों के लिये विजीगिषु स्वभाव का होना आवश्यक है। कोई भी संकट आनेपर डगमगाएँ नहीं यह धर्म के मार्गदर्शकों के लिये आवश्यक है। धर्म के जानकारों का सबसे पहला कर्तव्य है कि वे वर्तमान काल के लिए धर्मशास्त्र या स्मृति की प्रस्तुति करें। यह स्मृति जीवन के सभी पहलुओं को व्यापने वाली हो। इसकी व्यापकता को समझने की दृष्टि से एक रूपरेखा नीचे दे रहे हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== धर्मशास्त्र प्रस्तुति के लिये बिन्दु ==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== धर्म की व्याख्याएँ ===&lt;br /&gt;
धर्म की व्याप्ति / त्रिवर्ग की व्याप्ति : सर्वे भवन्तु सुखिन: लक्ष्य हेतु धर्म : संस्कृति&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== व्यापक धर्मशास्त्र के प्रस्तुति की आवश्यकता ===&lt;br /&gt;
* पूर्व धर्मशास्त्रों की व्यापकता&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
* व्यापकता की आवश्यकता&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== व्यक्तिगत धर्म / पञ्चविध (कोष) पुरुष धर्म / चतुर्विध पुरूषार्थ /स्वधर्म (वर्णधर्म) ===&lt;br /&gt;
* शरीरधर्म &lt;br /&gt;
* मन-धर्म&lt;br /&gt;
* बुद्धि-धर्म&lt;br /&gt;
* चित्त-धर्म&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== सामाजिक संबंधों में धर्म ===&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== व्यक्ति-व्यक्ति : पुरूष-पुरूष या स्त्री-स्त्री ====&lt;br /&gt;
# पारिवारिक रिश्ते&lt;br /&gt;
# पड़ोसी&lt;br /&gt;
# अतिथि&lt;br /&gt;
# शत्रु/विरोधक&lt;br /&gt;
# मित्र/सहायक&lt;br /&gt;
# सहकारी&lt;br /&gt;
# अपरिचित&lt;br /&gt;
# मालिक/नौकर&lt;br /&gt;
# चरित्रहीन स्त्री/पुरूष&lt;br /&gt;
# व्यसनी&lt;br /&gt;
# जरूरतमंद&lt;br /&gt;
# समव्यवसायी&lt;br /&gt;
# भिन्न व्यवसायी&lt;br /&gt;
# याचक&lt;br /&gt;
# भिन्न भाषी&lt;br /&gt;
# विक्रेता \ क्रेता&lt;br /&gt;
# भिन्न राष्ट्रीय&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== व्यक्ति-व्यक्ति : पुरूष-स्त्री ====&lt;br /&gt;
# पारिवारिक रिश्ते&lt;br /&gt;
# पड़ोसी&lt;br /&gt;
# अतिथि&lt;br /&gt;
# शत्रु/विरोधक&lt;br /&gt;
# मित्र/सहायक&lt;br /&gt;
# सहकारी&lt;br /&gt;
# अपरिचित&lt;br /&gt;
# मालिक/नौकर&lt;br /&gt;
# चरित्रहीन स्त्री/पुरूष&lt;br /&gt;
# व्यसनी&lt;br /&gt;
# जरूरतमंद&lt;br /&gt;
# समव्यवसायी&lt;br /&gt;
# भिन्न व्यवसायी&lt;br /&gt;
# याचक&lt;br /&gt;
# भिन्न भाषी&lt;br /&gt;
# विक्रेता\क्रेता&lt;br /&gt;
# भिन्न राष्ट्रीय&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== व्यक्ति-समाज ====&lt;br /&gt;
# व्यक्ति-परिवार&lt;br /&gt;
# व्यति-जाति&lt;br /&gt;
# पड़ोसी&lt;br /&gt;
# सामाजिक संगठन&lt;br /&gt;
# व्यक्ति-व्यवस्था&lt;br /&gt;
# व्यक्ति-राष्ट्र&lt;br /&gt;
# व्यक्ति-विश्व समाज&lt;br /&gt;
# व्यक्ति भिन्न भाषी&lt;br /&gt;
# परप्रांतीय&lt;br /&gt;
# परदेसी&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== समाज-समाज ====&lt;br /&gt;
# अंतर्राष्ट्रीय:&lt;br /&gt;
## शत्रु&lt;br /&gt;
## मित्र&lt;br /&gt;
## तटस्थ&lt;br /&gt;
# अंतर्देशीय&lt;br /&gt;
## प्रांत-प्रांत&lt;br /&gt;
## जनपद-जनपद&lt;br /&gt;
## भाषिक समूह&lt;br /&gt;
## पंथ समूह&lt;br /&gt;
## राष्ट्रीय समूह&lt;br /&gt;
## अराष्ट्रीय समूह&lt;br /&gt;
## राष्ट्रद्रोही समूह&lt;br /&gt;
## विदेशी&lt;br /&gt;
## समव्यवासायी&lt;br /&gt;
## जाति-जाति&lt;br /&gt;
## परिवार परिवार&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== सृष्टिगत सम्बन्धों में धर्म ===&lt;br /&gt;
# मनुष्य-अन्य जीव:&lt;br /&gt;
## मनुष्य-पालतू प्राणी:&lt;br /&gt;
### शाकाहारी&lt;br /&gt;
### मांसाहारी&lt;br /&gt;
## मनुष्य अन्य प्राणी:&lt;br /&gt;
### थलचर:&lt;br /&gt;
#### शाकाहारी&lt;br /&gt;
#### मांसाहारी&lt;br /&gt;
### जलचर&lt;br /&gt;
### नभचर&lt;br /&gt;
## मनुष्य-वनस्पति:&lt;br /&gt;
### जमीन के नीचे&lt;br /&gt;
### जमीन के ऊपर&lt;br /&gt;
### वनस्पति/औषधी&lt;br /&gt;
### खानेयोग्य / अन्न&lt;br /&gt;
### अखाद्य / जहरीली&lt;br /&gt;
### नशीली&lt;br /&gt;
## मनुष्य-कृमि / कीटक / सूक्ष्म जीव&lt;br /&gt;
### सहायक&lt;br /&gt;
### हानिकारक&lt;br /&gt;
## मनुष्य-जड़ प्रकृति / पंचमहाभूत&lt;br /&gt;
### अनवीकरणीय/खनिज&lt;br /&gt;
#### ठोस&lt;br /&gt;
#### द्रव&lt;br /&gt;
#### वायु (इंधन)&lt;br /&gt;
### नवीकरणीय&lt;br /&gt;
#### वायु/हवा&lt;br /&gt;
#### जल&lt;br /&gt;
#### सूर्यप्रकाश&lt;br /&gt;
#### लकड़ी&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== आपद्धर्म ===&lt;br /&gt;
# प्राकृतिक आपदा&lt;br /&gt;
# मानव निर्मित आपदा (लगभग उपर्युक्त सभी विषयों में)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== परिवर्तन के पुरोधा ==&lt;br /&gt;
उपर्युक्त बिन्दु २ में बताए गए श्रेष्ठ जन ही परिवर्तन के पुरोधा होंगे। इनका प्रमाण समाज में मुष्किल से ५-७ प्रतिशत ही पर्याप्त होता है। ऐसे श्रेष्ठ जनों में निम्न वर्ग के लोग आते हैं।	&lt;br /&gt;
४.१ शिक्षक : शिक्षक ज्ञानी, त्यागी, कुशल, समाज हित के लिए समर्पित, धर्म का जानकार, समाज को घडने की सामर्थ्य रखनेवाला होता है। नई पीढी जो परिवर्तन का अधिक सहजता से स्वीकार कर सकती है उसको घडना शिक्षक का काम होता है। इसलिये परिवर्तन की प्रक्रिया का मुख्य पुरोधा शिक्षक ही होता है।	&lt;br /&gt;
४.२ श्रेष्ठ जन :यहाँ श्रेष्ठ जनों से मतलब भिन्न भिन्न सामाजिक गतिविधियों में जो अग्रणी लोग हैं उनसे है।	&lt;br /&gt;
४.३ सांप्रदायिक संगठनों के प्रमुख : आजकल समाज का एक बहुत बडा वर्ग जिसमें शिक्षित वर्ग भी है, भिन्न भिन्न संप्रदायों से जुडा है। उन संप्रदायों के प्रमुख भी इस परिवर्तन की प्रक्रिया का एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण हिस्सा बनने की शक्ति रखते हैं।	&lt;br /&gt;
४.४ लोकशिक्षा के माध्यम : कीर्तनकार, कथाकार, प्रवचनकार, नाटक मंडलि, पुरोहित या उपाध्याय, साधू, बैरागी, सिंहस्थ या कुंभ जैसे मेले, यात्राएँ आदि लोकशिक्षा के माध्यम हुआ करते थे। वर्तमान में ये सब कमजोर और दिशाहीन हो गए हैं। एक ओर इनमें से जिनको पुनर्जीवित कर सकते हैं उन्हें करना। नए आयाम भी जोडे जा सकते हैं। जैसे अभी लगभग देढ दशक पूर्व महाराष्ट्र में प्रारंभ हुई नव-वर्ष स्वागत यात्राएँ आदि।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== अंतर्निहित सुधार व्यवस्था ==&lt;br /&gt;
काल के प्रवाह में समाज में हो रहे परिवर्तन और मनुष्य की स्खलनशीलता के कारण बढनेवाला अधर्माचरण ये दो बातें ऐसीं हैं जो किसी भी श्रेष्ठतम समाज को भी नष्ट कर देतीं हैं। इस दृष्टि से जागरूक ऐसे शिक्षक और धर्म के मार्गदर्शक साथ में मिलकर समाज की अंतर्निहित सुधार व्यवस्था बनाते हैं। अपनी संवेदनशीलता और समाज के निरंतर बारीकी से हो रहे अध्ययन के कारण इन्हें संकटों का पूर्वानुमान हो जाता है। अपने निरीक्षणों के आधारपर अपने लोकसंग्रही स्वभाव से ये लोगों को भी संकटों से ऊपर उठने के लिये तैयार करते हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== परिवर्तन की नीति ==&lt;br /&gt;
प्रारंभ में विरोध को आमंत्रण नहीं देना। संघर्ष में शक्ति का अपव्यय नहीं करना। जो आज कर सकते हैं उसे करते जाना। जो कल करने की आवश्यकता है उस के लिये परिस्थिति निर्माण करना। परिस्थिति के निर्माण होते ही आगे बढना।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== परिवर्तन में अवरोध और उनका निराकरण ==&lt;br /&gt;
शासनाधिष्ठित समाज में स्वार्थ के आधारपर परिवर्तन सरल और तेज गति से होता है। हिटलरने १५-२० वर्षों में ही जर्मनी को एक समर्थ राष्ट्र के रूप में खड़ा कर दिया था। लेकिन धर्म पर आधारित जीवन के प्रतिमान में परिवर्तन की गति धीमी और मार्ग कठिन होता है। स्थाई परिवर्तन और वह भी कौटुम्बिक भावना के आधारपर, तो धीरे धीरे ही होता है। &lt;br /&gt;
७.१ अंतर्देशीय 	&lt;br /&gt;
७.१.१ मानवीय जड़ता : परिवर्तन का आनंद से स्वागत करनेवाले लोग समाज में अल्पसंख्य ही होते हैं। सामान्यत: युवा वर्ग ही परिवर्तन के लिए तैयार होता है। इसलिए युवा वर्ग को इस परिवर्तन की प्रक्रिया में सहभागी बनाना होगा। परिवर्तन की प्रक्रिया में युवाओं को सम्मिलित करते जाने से दो तीन पीढ़ियों में परिवर्तन का चक्र गतिमान हो जाएगा।&lt;br /&gt;
७.१.२ विपरीत शिक्षा : जैसे जैसे भारतीय शिक्षा का विस्तार समाज में होगा वर्तमान की विपरीत शिक्षा का अपने आप ही क्रमश: लोप होगा।	   &lt;br /&gt;
७.१.३ मजहबी मानसिकता : भारतीय याने धर्म की शिक्षा के उदय और विस्तार के साथ ही मजहबी शिक्षा और उसका प्रभाव भी शनै: शनै: घटता जाएगा। मजहबों की वास्तविकता को भी उजागर करना आवश्यक है। &lt;br /&gt;
७.१.४ धर्म के ठेकेदार : जैसे जैसे धर्म के जानकार और धर्म के अनुसार आचरण करनेवाले लोग समाज में दिखने लगेंगे, धर्म के तथाकथित ठेकेदारों का प्रभाव कम होता जाएगा। &lt;br /&gt;
७.१.५ शासन तंत्र : इस परिवर्तन की प्रक्रिया में धर्म के जानकारों के बाद शासन की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण होगी। धर्माचरणी लोगों को समर्थन, सहायता और संरक्षण देने का काम शासन को करना होगा। इस के लिए शासक भी धर्म का जानकार और धर्मनिष्ठ हो, यह भी आवश्यक है। धर्म के जानकारों को यह सुनिश्चित करना होगा की शासक धर्माचरण करनेवाले और धर्म के जानकर हों।&lt;br /&gt;
७.१.६ जीवन का अभारतीय प्रतिमान : जीवन के सभी क्षेत्रों में एकसाथ जीवन के प्रतिमान के परिवर्तन की प्रक्रिया को चलाना यह धर्म के जानकारों की जिम्मेदारी होगी। शिक्षा की भूमिका इसमें सबसे महत्वपूर्ण होगी। शिक्षा के माध्यम से समूचे जीवन के भारतीय प्रतिमान की रुपरेखा और प्रक्रिया को समाजव्यापी बनाना होगा। धर्मं-शरण शासन इसमें सहायता करेगा।&lt;br /&gt;
७.१.७ तन्त्रज्ञान  समायोजन : तन्त्रज्ञान के क्षेत्र में भारत के सामने दोहरी चुनौती होगी। एक ओर तो विश्व में जो तन्त्रज्ञान के विकास की होड़ लगी है उसमें अपनी विशेषताओं के साथ अग्रणी रहना। इस दृष्टि से विकास हेतु कुछ तन्त्रज्ञान निम्न हो सकते हैं।&lt;br /&gt;
- शून्य प्रदुषण रासायनिक उद्योग।&lt;br /&gt;
- सस्ती सौर उर्जा।&lt;br /&gt;
- प्रकृति में सहजता से घुलनशील प्लैस्टिक का निर्माण। &lt;br /&gt;
- औरों द्वारा प्रक्षेपित शस्त्रों/अणु-शस्त्रों का शमन करने का तंत्रज्ञान। ...............आदि &lt;br /&gt;
और दूसरी ओर वैकल्पिक विकेंद्रीकरणपर आधारित तन्त्रज्ञान का विकास कर उसे विश्व में प्रतिष्ठित करना। इस प्रकार के तन्त्रज्ञान में निम्न प्रकार के तन्त्रज्ञान होंगे।&lt;br /&gt;
- कौटुम्बिक उद्योगों के लिये, स्थानिक संसाधनों के उपयोग के लिए तन्त्रज्ञान  &lt;br /&gt;
- भिन्न भिन्न कार्यों के लिये पशु-उर्जा के अधिकाधिक उपयोग के लिये तंत्रज्ञान&lt;br /&gt;
- नविकरणीय प्राकृतिक संसाधनों से विविध पदार्थों के निर्माण से आवश्यकताओं की पूर्ति तथा संसाधनों के पुनर्भरण के लिये सरल तन्त्रज्ञान का विकास   &lt;br /&gt;
- मानव की प्राकृतिक क्षमताओं का विकास करनेवाली प्रक्रियाओं का अनुसंधान। ......... आदि &lt;br /&gt;
७.२ अंतर्राष्ट्रीय 	&lt;br /&gt;
७.२.१ मजहबी विस्तारवादी मानसिकता : वर्तमान में यह मुख्यत: ३ प्रकार की है। ईसाई, मुस्लिम और वामपंथी। यह तीनों ही विचारधाराएँ अधूरी हैं, एकांगी हैं। यह तो इन के सम्मुख ‘सर्वे भवन्तु सुखिन:’ को लेकर कोई चुनौती खड़ी नहीं होने से इन्हें विश्व में विस्तार का अवसर मिला है। जैसे ही ‘सर्वे भवन्तु सुखिन:’ का विचार लेकर भारत एक वैश्विक शक्ति के रूप में खड़ा होगा इनके पैरोंतले की जमीन खिसकने लगेगी। &lt;br /&gt;
७.२.२ आसुरी महत्वाकांक्षा : ऊपर जो बताया गया है वह, आसुरी महत्वाकांक्षा रखनेवाली वैश्विक शक्तियों के लिये भी लागू है। आसुरी महत्वाकांक्षाओं को परास्त करने की परंपरा भारत में युगों से रही है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== परिवर्तन के लिये समयबध्द करणीय कार्य ==&lt;br /&gt;
समूचे जीवन के प्रतिमान का परिवर्तन यह एक बहुत बृहद् और जटिल कार्य है। इस के लिये इसे सामाजिक अभियान का रूप देना होगा। समविचारी लोगों को संगठित होकर सहमति से और चरणबध्द पध्दति से प्रक्रिया को आगे बढाना होगा। बड़े पैमानेपर जीवन के हर क्षेत्र में जीवन के भारतीय प्रतिमान की समझ रखनेवाले और कृतीशील ऐसे लोग याने आचार्य निर्माण करने होंगे। परिवर्तन के चरण एक के बाद एक और एक के साथ सभी इस पध्दति से चलेंगे। जैसे दूसरे चरण के काल में ५० प्रतिशत शक्ति और संसाधन दूसरे चरणके निर्धारित विषयपर लगेंगे। और १२.५-१२.५ प्रतिशत शक्ति और संसाधन चरण १, ३, ४ और ५ में प्रत्येकपर लगेंगे।&lt;br /&gt;
१. समविचारी लोगों का ध्रुवीकरण : जिन्हें प्रतिमान के परिवर्तन की आस है और समझ भी है ऐसे समविचारी, सहचित्त लोगों का ध्रुवीकरण करना होगा। उनमें एक व्यापक सहमति निर्माण करनी होगी। अपने अपने कार्यक्षेत्र में क्या करना है इसका स्पष्टीकरण करना होगा।&lt;br /&gt;
२. अभियान के चरण : अभियान को चरणबध्द पध्दति से चलाना होगा। १२ वर्षों के ये पाँच चरण होंगे। ऐसी यह ६० वर्ष की योजना होगी। यह प्रक्रिया तीन पीढीतक चलेगी। तीसरी पीढी में परिवर्तन के फल देखने को मिलेंगे। लेकिन तबतक निष्ठा से और धैर्य से अभियान को चलाना होगा। निरंतर मूल्यांकन करना होगा। राह भटक नहीं जाए इसके लिये चौकन्ना रहना होगा।&lt;br /&gt;
२.१ अध्ययन और अनुसंधान : जीवन का दायरा बहुत व्यापक होता है। अनगिनत विषय इसमें आते हैं। इसलिये प्रतिमान के बदलाव से पहले हमें दोनों प्रतिमानों के विषय में और विशेषत: जीवन के भारतीय प्रतिमान के विषय में बहुत गहराई से अध्ययन करना होगा। मनुष्य की इच्छाओं का दायरा, उनकी पूर्ति के लिये वह क्या क्या कर सकता है आदि का दायरा अति विशाल है। इन दोनों को धर्म के नियंत्रण में ऐसे रखा जाता है इसका भी अध्ययन अनिवार्य है। मनुष्य के व्यक्तित्व को ठीक से समझना, उसके शरीर, मन, बुध्दि, चित्त, अहंकार आदि बातों को समझना, कर्मसिध्दांत को समझना, जन्म जन्मांतर चलने वाली शिक्षा की प्रक्रिया को समझना विविध विषयों के अंगांगी संबंधों को समझना, प्रकृति के रहस्यों को समझना आदि अनेकों ऐसी बातें हैं जिनका अध्ययन हमें करना होगा। इनमें से कई विषयों के संबंध में हमारे पूर्वजों ने विपुल साहित्य निर्माण किया था। उसमें से कितने ही साहित्य को जाने अंजाने में प्रक्षेपित किया गया है। इस प्रक्षिप्त हिस्से को समझ कर अलग निकालना होगा। शुध्द भारतीय तत्वोंपर आधारित ज्ञान को प्राप्त करना होगा। अंग्रेजों ने भारतीय साहित्य, इतिहास के साथ किये खिलवाड, भारतीय समाज में झगडे पैदा करने के लिये निर्मित साहित्य को अलग हटाकर शुध्द भारतीय याने एकात्म भाव की या कौटुम्बिक भाव की जितनी भी प्रस्तुतियाँ हैं उनका अध्ययन करना होगा। मान्यताओं, व्यवहार सूत्रों, संगठन निर्माण और व्यवस्था निर्माण की प्रक्रिया को समझना होगा।     &lt;br /&gt;
२.२ लोकमत परिष्कार : अध्ययन से जो ज्ञान उभरकर सामने आएगा उसे लोगोंतक ले जाना होगा। लोगों का प्रबोधन करना होगा। उन्हें फिर से समग्रता से और एकात्मता से सोचने और व्यवहार करने का तरीका बताना होगा। उन्हें उनकी सामाजिक जिम्मेदारी का समाजधर्म का अहसास करवाना होगा। वर्तमान की परिस्थितियों से सामान्यत: कोई भी खुश नहीं है। लेकिन जीवन का भारतीय प्रतिमान ही  उनकी कल्पना के अच्छे दिनों का वास्तव है यह सब के मन में स्थापित करना होगा।	         &lt;br /&gt;
२.३ संयुक्त कुटुम्ब : कुटुम्ब ही समाजधर्म सीखने की पाठशाला होता है। संयुक्त कुटुम्ब तो वास्तव में समाज का लघुरूप ही होता है। सामाजिक समस्याओं में से लगभग ७० प्रतिशत समस्याओं को तो केवल अच्छा संयुक्त कुटुम्ब ही निर्मूल कर देता है। समाज जीवन के लिये श्रेष्ठ लोगों को जन्म देने का काम, श्रेष्ठ संस्कार देने का काम, अच्छी आदतें डालने काम आजकल की फॅमिली पध्दति नहीं कर सकती। जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में जो तेजस्वी नेतृत्व का अभाव निर्माण हो गया है उसे दूर करना यह भारतीय मान्यताओं के अनुसार चलाए जानेवाले संयुक्त परिवारों में ही हो सकता है। इसलिये समाज का नेतृत्व करेंगे ऐसे श्रेष्ठ बालकों को जन्म देने के प्रयास तीसरे चरण में होंगे।&lt;br /&gt;
२.४ शिक्षक/धर्मज्ञ और शासक निर्माण : समाज परिवर्तन में शिक्षक की और शासक की ऐसे दोनों की भुमिका अत्यंत महत्वपूर्ण होती है। संयुक्त परिवारों में जन्म लिये बच्चों में से अब श्रेष्ठ धर्म के मार्गदर्शक, शिक्षक और शासक निर्माण करने की स्थिति होगी। ऐसे लोगों को समर्थन और सहायता देनेवाले कुटुम्ब और दूसरे चरण में निर्माण किये समाज के परिष्कृत विचारोंवाले सदस्य अब कुछ मात्रा में उपलब्ध होंगे।	   &lt;br /&gt;
२.५ संगठन और व्यवस्थाओं की प्रतिष्ठापना : श्रेष्ठ धर्म के अधिष्ठाता/मार्गदर्शक, सामर्थ्यवान शिक्षक और कुशल शासक अब प्रत्यक्ष संगठन का सशक्तिकरण और व्यवस्थाओं का निर्माण करेंगे।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==References==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;references /&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अन्य स्रोत:&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[Category:Bhartiya Jeevan Pratiman (भारतीय जीवन प्रतिमान)]]&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Dilipkelkar</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://dharmawiki.org/index.php?title=Planning_For_Change_(%E0%A4%AA%E0%A4%B0%E0%A4%BF%E0%A4%B5%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%A4%E0%A4%A8_%E0%A4%95%E0%A5%80_%E0%A4%AF%E0%A5%8B%E0%A4%9C%E0%A4%A8%E0%A4%BE)&amp;diff=119353</id>
		<title>Planning For Change (परिवर्तन की योजना)</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://dharmawiki.org/index.php?title=Planning_For_Change_(%E0%A4%AA%E0%A4%B0%E0%A4%BF%E0%A4%B5%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%A4%E0%A4%A8_%E0%A4%95%E0%A5%80_%E0%A4%AF%E0%A5%8B%E0%A4%9C%E0%A4%A8%E0%A4%BE)&amp;diff=119353"/>
		<updated>2019-06-02T04:08:34Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Dilipkelkar: /* परिवर्तन का स्वरूप */ Editing done&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{One source|date=January 2019}}&lt;br /&gt;
[[Template:Cleanup reorganize Dharmawiki Page]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
परिवर्तन की योजना को समझने के लिए हमें पहले निम्न बातें फिर से स्मरण करनी होंगी ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जीवन के भारतीय प्रतिमान की जानकारी के लिए - &lt;br /&gt;
# जीवनदृष्टि/व्यवहार : भारतीय जीवनदृष्टि और जीवनशैली के विषय में जानकारी के लिये कृपया [[Elements of Hindu Jeevan Drishti and Life Style (भारतीय/हिन्दू जीवनदृष्टि और जीवन शैली के सूत्र)|यह]] लेख देखें।&lt;br /&gt;
# व्यवस्था समूह का ढाँचा जीवनदृष्टि से सुसंगत होना चाहिए। कृपया व्यवस्था समूह के ढाँचे के लिये [[Jeevan Ka Pratiman (जीवन का प्रतिमान)|यह]] लेख और जानकारी के लिए [[Interrelationship in Srishti (सृष्टि में परस्पर सम्बद्धता)|यह]] लेख देखें।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== समस्या मूलों के निराकरण की नीति ==&lt;br /&gt;
समस्या मूल नष्ट करने से तात्पर्य समस्या मूलों पर आघात से नहीं है। समस्याएँ निर्माण ही नहीं हों ऐसी परिस्थितियों, ऐसे समाज संगठनों और ऐसी व्यवस्थाओं के निर्माण से है। निराकरण की प्रक्रिया के ३ चरण होंगे। समस्याओं को और परिवर्तन के स्वरूप को समझना, निराकरण की नीति तय करना और निराकरण का क्रियान्वयन करना। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== परिवर्तन के स्वरूप को समझना ==&lt;br /&gt;
समस्या का मूल जीवन के प्रतिमान के परिवर्तन में है। प्रतिमान का आधार समाज की जीवनदृष्टि होती है। व्यवहार, संगठन और व्यवस्थाएँ तो जीवनदृष्टि के आधार पर ही तय होते हैं। इसलिये परिवर्तन की प्रक्रिया में जीवनदृष्टि के परिवर्तन की प्रक्रिया को प्राथमिकता देनी होगी। व्यवहार में सुसंगतता आए इसलिये करणीय अकरणीय विवेक को सार्वत्रिक करना होगा। दूसरे क्रमांक पर संगठन और व्यवस्थाओं में परिवर्तन की प्रक्रिया चलेगी। व्यवस्था परिवर्तन की इस प्रक्रिया में समग्रता और एकात्मता के संदर्भ में व्यवस्था विशेष का आधार बनाने के लिये विषय की सैध्दांतिक प्रस्तुति करनी होगी। जैसे शासन व्यवस्था में यदि उचित परिवर्तन करना है तो पहले राजशास्त्र की सैध्दांतिक प्रस्तुति करना आवश्यक है। समृद्धि व्यवस्था में परिवर्तन करने के लिये समृद्धिशास्त्र की सैध्दांतिक प्रस्तुति करनी होगी। इन सैध्दांतिक प्रस्तुतियों को प्रयोग सिध्द करना होगा। प्रयोगों के आधार पर इन प्रस्तुतियों में उचित परिवर्तन करते हुए आगे बढना होगा। यह काम प्राथमिकता से धर्म के जानकारों का है। दूसरे क्रमांक की जिम्मेदारी शिक्षकों की है। शिक्षक वर्ग ही धर्म को सार्वत्रिक करता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== निराकरण की नीति ==&lt;br /&gt;
समस्याएँ इतनी अधिक और पेचिदा हैं कि इनका निराकरण अब संभव नहीं है, ऐसा कई विद्वान मानते हैं। हमने जो करणीय और अकरणीय विवेक को समझा है उसके अनुसार कोई भी बात असंभव नहीं होती। ऊपरी तौर पर असंभव लगने पर भी उसे संभव चरणों में बाँटकर संपन्न किया जा सकता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इस के लिये नीति के तौर पर हमारा व्यवहार निम्न प्रकार का होना चाहिए:&lt;br /&gt;
* सबसे पहले तो यह हमेशा ध्यान में रखना कि यह पूरे समाज जीवन के प्रतिमान के परिवर्तन का विषय है। इसे परिवर्तन के लिये कई पीढियों का समय लग सकता है। भारत वर्ष के दीर्घ इतिहास में समाज ने कई बार उत्थान और पतन के दौर अनुभव किये हैं। बार बार भारतीय समाज ने उत्थान किया है।&lt;br /&gt;
* परिवर्तन की प्रक्रिया को संभाव्य चरणों में बाँटना।&lt;br /&gt;
* उसमें आज जो हो सकता है उसे कर डालना।&lt;br /&gt;
* आज जिसे करना कठिन लगता है उसके लिये परिस्थितियाँ बनाते जाना। परिस्थितियाँ बनते ही उसे करना।&lt;br /&gt;
* प्रारंभ में जबतक परिवर्तन की प्रक्रिया ने गति नहीं पकडी है, यथासंभव कोई विरोध मोल नहीं लेना।&lt;br /&gt;
* इसी प्रकार से एक एक चरण को संभव बनाते हुए आगे बढ़ाते जाना।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== समस्या मूलों का निराकरण ==&lt;br /&gt;
वास्तव में समस्या मूलों को नष्ट करना यह शब्दप्रयोग ठीक नहीं है। उचित प्रतिमान की प्रतिष्ठापना के साथ ही गलत प्रतिमान का अंत अपने आप होता है। जो सर्वहितकारी है, उचित है, श्रेष्ठ है, उसकी प्रतिष्ठापना ही परिवर्तन की प्रक्रिया का स्वरूप होगा। स्वाभाविक जडता के कारण कुछ कठिनाईयाँ तो आएँगी। लेकिन गलत प्रतिमान को नष्ट करने के लिये अलग से शक्ति लगाने की आवश्यकता नहीं है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== समस्या मूल नष्ट करने हेतु धर्म के जानकारों के मार्गदर्शन में शिक्षा की व्याप्ति ==&lt;br /&gt;
# जीवनदृष्टि की शिक्षा : जीवनदृष्टि की शिक्षा मुख्यत: कामनाओं और कामनाओं की पूर्ति के प्रयास, धन, साधन और संसाधनों को धर्म के दायरे में रखने की शिक्षा ही है। पुरूषार्थ चतुष्टय की या त्रिवर्ग की शिक्षा ही है।&lt;br /&gt;
# व्यवस्थाएँ : जीवनदृष्टि के अनुसार व्यवहार हो सके इस हेतु से ही व्यवस्थाओं का निर्माण किया जाता है। व्यवस्थाओं के निर्माण में और उनके क्रियान्वयन में भी जीवनदृष्टि ओतप्रोत रहे इसका ध्यान रखना होगा।&lt;br /&gt;
## धर्म व्यवस्था&lt;br /&gt;
## शिक्षा व्यवस्था&lt;br /&gt;
## शासन व्यवस्था&lt;br /&gt;
## समृद्धि व्यवस्था&lt;br /&gt;
# संगठन : समाज संगठन और समाज की व्यवस्थाएँ एक दूसरे को पूरक पोषक होती हैं। लेकिन धर्म व्यवस्था, शिक्षा व्यवस्था और शासन व्यवस्था के अभाव में संगठन निर्माण करना अत्यंत कठिन हो जाता है। वास्तव में ये दोनों अन्योन्याश्रित होते हैं। समाज संगठन की जानकारी के लिये कृपया [[Society (समाज)|यह]] लेख देखें।&lt;br /&gt;
## कुटुम्ब&lt;br /&gt;
## स्वभाव समायोजन&lt;br /&gt;
## आश्रम&lt;br /&gt;
## कौशल विधा&lt;br /&gt;
## ग्राम&lt;br /&gt;
## राष्ट्र&lt;br /&gt;
# विज्ञान और तन्त्रज्ञान: कृपया [[Bharat's Science and Technology (भारतीय विज्ञान तन्त्रज्ञान दृष्टि)|यह]] लेख देखें। &lt;br /&gt;
## विकास और उपयोग नीति&lt;br /&gt;
## सार्वत्रिकीकरण&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== परिवर्तन की योजना ==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== परिवर्तन का स्वरूप ===&lt;br /&gt;
वर्तमान स्वार्थ पर आधारित जीवन के प्रतिमान के स्थान पर आत्मीयता याने कौटुम्बिक भावना पर आधारित जीवन के प्रतिमान की प्रतिष्ठापना:&lt;br /&gt;
# सर्वे भवन्तु सुखिन:, देशानुकूल और कालानुकूल आदि के संदर्भ में दोनों प्रतिमानों को समझना&lt;br /&gt;
# प्रतिमान का परिवर्तन&lt;br /&gt;
## सामाजिक व्यवस्थाओं का पुनर्निर्माण&lt;br /&gt;
### समाज के संगठनों का परिष्कार/पुनरूत्थान या नवनिर्माण&lt;br /&gt;
### तन्त्रज्ञान  का समायोजन / तन्त्रज्ञान  नीति / जीवन की इष्ट गति : वर्तमान में तन्त्रज्ञान  की विकास की गति से जीवन को जो गति प्राप्त हुई है उस के कारण सामान्य मनुष्य घसीटा जा रहा है। पर्यावरण सन्तुलन  और सामाजिकता दाँवपर लग गए हैं। ज्ञान, विज्ञान और तन्त्रज्ञान ये तीनों बातें पात्र व्यक्ति को ही मिलनी चाहिये। बंदर के हाथ में पलिता नहीं दिया जाता। इस लिये किसी भी तन्त्रज्ञान के सार्वत्रिकीकरण से पहले उसके पर्यावरण, समाजजीवन और व्यक्ति जीवनपर होनेवाले परिणाम जानना आवश्यक है। हानिकारक तंत्रज्ञान का तो विकास भी नहीं करना चाहिये। किया तो वह केवल सुपात्र को ही अंतरित हो यह सुनिश्चित करना चाहिये। ऐसी स्थिति में जीवन की इष्ट गति की ओर बढानेवाली तन्त्रज्ञान नीति का स्वीकार करना होगा। इष्ट गति के निकषों के लिये [[Bharat's Science and Technology (भारतीय विज्ञान एवं तन्त्रज्ञान दृष्टि)|इस]] लेख में बताई कसौटी लगानी होगी। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== परिवर्तन की प्रक्रिया ===&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सामाजिक परिवर्तन भौतिक वस्तुओं के परिवर्तन जैसे सरल नहीं होते। भौतिक पदार्थों का एक निश्चित स्वभाव होता है। धर्म होता है। इसे ध्यान में रखकर भौतिक पदार्थों को ढाला जाता है। हर मानव का स्वभाव भिन्न होता है। भिन्न समय पर भी उसमें बदलाव आ सकता है। इसलिये सामाजिक परिवर्तन क्रांति से नहीं उत्क्रांति से ही किये जा सकते हैं। उत्क्रांति की गति धीमी होती है। होने वाले परिवर्तनों से किसी की हानि नहीं हो या होने वाली हानि न्यूनतम हो, परिवर्तन स्थाई हों, परिवर्तन से सबको लाभ मिले यह सब देखकर ही प्रक्रिया चलाई जाती है। सामाजिक परिवर्तनों के लिये नई पीढी से प्रारंभ करना यह सबसे अच्छा रास्ता है। लेकिन नई पीढी में व्यापक रूप से परिवर्तन के पहलुओं को स्थापित करने के लिये आवश्यक इतनी पुरानी पीढी के श्रेष्ठ जनों की संख्या आवश्यक है। ऐसे श्रेष्ठ जनों का वर्णन श्रीमद्भगवद्गीता में किया गया है:&amp;lt;blockquote&amp;gt;यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जन:।&amp;lt;/blockquote&amp;gt;&amp;lt;blockquote&amp;gt;स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते॥ (अध्याय ३ श्लोक २१)&amp;lt;/blockquote&amp;gt;इसलिये एक दृष्टि से देखा जाए तो यह प्रक्रिया समाज के प्रत्येक व्यक्तितक ले जाने की आवश्यकता नहीं होती। केवल समाज जीवन की सभी विधाओं के श्रेष्ठ लोगों के निर्माण की प्रक्रिया ही परिवर्तन की प्रक्रिया है। एक बार ये लोग निर्माण हो गये तो फिर परिवर्तन तेज याने ज्यामितीय गति से होने लगता है।&lt;br /&gt;
* धीमी लेकिन अविश्रांत : हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि हमें सामाजिक परिवर्तन करना है। समाज एक जीवंत ईकाई होता है। जीवंत ईकाई में परिवर्तन हमेशा धीमी गति से, समग्रता से और अविरत करते रहने से होते हैं। कोई भी शीघ्रता या टुकडों में होनेवाले परिवर्तन हानिकारक होते हैं।&lt;br /&gt;
* सभी क्षेत्रों में एकसाथ : समाज एक जीवंत ईकाई होने के कारण इसके सभी अंग किसी भी बात से एक साथ प्रभावित होते हैं। प्रभाव का परिमाण कम अधिक होगा लेकिन प्रभाव सभी पर होता ही है। इसलिये परिवर्तन की प्रक्रिया टुकडों में अलग अलग या एक के बाद एक ऐसी नहीं होगी। परिवर्तन की प्रक्रिया धर्म, शिक्षा, शासन, अर्थ, न्याय, समाज संगठन आदि सभी क्षेत्रों में एक साथ चलेगी। ऐसी प्रक्रिया का प्रारंभ होना बहुत कठिन होता है। लेकिन एक बार सभी क्षेत्रों में प्रारंभ हो जाता है तो फिर यह तेजी से गति प्राप्त कर लेती है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== परिवर्तन के कारक तत्व ===&lt;br /&gt;
# शिक्षा : शिक्षा का दायरा बहुत व्यापक है। शिक्षा जन्म जन्मांतर चलनेवाली प्रक्रिया होती है। इस जन्म में शिक्षा गर्भधारणा से मृत्यूपर्यंत चलती है। आयु की अवस्था के अनुसार शिक्षा का स्वरूप बदलता है। &lt;br /&gt;
## कुटुम्ब में शिक्षा : कुटुम्ब में शिक्षा का प्रारंभ गर्भधारणा से होता है। मनुष्य की ६०-७० प्रतिशत घडन तो कुटुम्ब में ही होती है। कुटुम्ब में रहकर वह कई बातें सीखता है। कौटुम्बिक भावना, कर्तव्य, सदाचार आदि की शिक्षा कुटुम्ब की ही जिम्मेदारी होती है। व्यवस्थाओं के साथ समायोजन, व्यवस्थाओं के स्वरूप आदि भी वह कुटुम्ब में ही अपने ज्येष्ठों से सीखता है। इंद्रियों के विकास की शिक्षा, व्यावसायिक कौशल भी वह कुटुम्ब में ही सीखता है। कुटुम्ब सामाजिकता की पाठशाला ही होता है। बडों का आदर, स्त्री का आदर आदि भी कुटुम्ब ही सिखाता है। &lt;br /&gt;
## कुटुम्ब की शिक्षा : उसी प्रकार से कुटुम्ब के बारे में भी वह कई बातें सीखता है। उसकी व्यक्तिगत, कौटुम्बिक और सामाजिक आदतें बचपन में ही आकार लेतीं हैं। कुटुम्ब का महत्व, समाज में कौटुम्बिक भावना का महत्व, कौटुम्बिक व्यवस्थाओं का महत्व वह कुटुम्ब में सीखता है। भिन्न भिन्न स्वभावों के लोग एक छत के नीचे आत्मीयता से कैसे रहते हैं यह वह कुटुम्ब से ही सीखता है। लगभग सभी प्रकार से कुटुंब यह समाज का लघुरूप ही होता है। कुटुंब यह सामाजिकता की पाठशाला होती है। &lt;br /&gt;
## विद्याकेन्द्र शिक्षा: विद्याकेन्द्र की शिक्षा शास्त्रीय शिक्षा होती है। कुटुम्ब में सीखे हुए सदाचार के शास्त्रीय पक्ष को समझाने के लिये होती है। कुटुंब में सीखे हुए व्यावसायिक कौशलों को पैना बनाने के लिये होती है। कुटुंब में आत्मसात की हुई श्रेष्ठ परम्पराओं को अधिक उज्वल बनाने के तरीके सीखने के लिए होती है। अध्ययन का और कौशल का शास्त्रीय तरीका सिखने के लिये, अध्ययन को तेजस्वी बनाने के लिये होती है। &lt;br /&gt;
## लोकशिक्षा : लोकशिक्षा भी समाज जीवन का एक आवश्यक पहलू है। विद्याकेन्द्र की शिक्षा के उपरान्त भी मनुष्य का मन कई बार भ्रमित हो जाता हाय, बुद्धि कुण्ठित हो जाती है। ऐसी स्थिति में लोकशिक्षा की व्यवस्था इस संभ्रम को, इस कुण्ठा को दूर करती है। &lt;br /&gt;
## परंपरा निर्माण : अपने से अधिक श्रेष्ठ विरासत निर्माण करने की निरंतरता को श्रेष्ठ परंपरा कहते हैं। श्रेष्ठ परंपराओं के निर्माण की तीव्र इच्छा और पैने प्रयास समाज को श्रेष्ठ और चिरंजीवी बनाते हैं। &lt;br /&gt;
# शासन &lt;br /&gt;
## धर्मनिष्ठता : शासक धर्मशास्त्र के जानकार हों। धर्मशास्त्र के पालनकर्ता हों। धर्मशास्त्र के नियमों का प्रजा से अनुपालन करवाने में कुशल हों। &lt;br /&gt;
## धर्म व्यवस्था के साथ समायोजन : सदैव धर्म के जानकारों से अपना मूल्यांकन करवाएँ। धर्म के जानकारों की सूचनाओं का अनुपालन करें। अधर्म होने से प्रायश्चित्त और पश्चात्ताप के लिये उद्यत रहें। &lt;br /&gt;
# धर्म नेतृत्व &lt;br /&gt;
## धर्म के मार्गदर्शक : किसी का केवल धर्मशास्त्र का विशेषज्ञ होना पर्याप्त नहीं है। नि:स्वार्थ भाव, निर्भयता भी श्रेष्ठ धर्म के मार्गदर्शकों के लक्षण हैं। &lt;br /&gt;
## धर्माचरणी : धर्म का मार्गदर्शन करनेवाले लोग अपने व्यवहार में भी धर्मयुक्त होना चाहिये। &lt;br /&gt;
## विजीगिषु स्वभाववाले : धर्म का मार्गदर्शन करनेवाले लोगों के लिये विजीगिषु स्वभाव का होना आवश्यक है। कोई भी संकट आनेपर डगमगाएँ नहीं यह धर्म के मार्गदर्शकों के लिये आवश्यक है। धर्म के जानकारों का सबसे पहला कर्तव्य है कि वे वर्तमान काल के लिए धर्मशास्त्र या स्मृति की प्रस्तुति करें। यह स्मृति जीवन के सभी पहलुओं को व्यापने वाली हो। इसकी व्यापकता को समझने की दृष्टि से एक रूपरेखा नीचे दे रहे हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== धर्मशास्त्र प्रस्तुति के लिये बिन्दु ==&lt;br /&gt;
() धर्म की व्याख्याएँ / धर्म की व्याप्ति / त्रिवर्ग की व्याप्ति : सर्वे भवन्तु सुखिन: लक्ष्य हेतु धर्म : संस्कृति &lt;br /&gt;
() व्यापक धर्मशास्त्र के प्रस्तुति की आवश्यकता: * पूर्व धर्मशास्त्रों की व्यापकता(?)  	* व्यापकता की आवश्यकता &lt;br /&gt;
() व्यक्तिगत धर्म / पञ्चविध (कोष) पुरुष धर्म / चतुर्विध पुरूषार्थ /स्वधर्म (वर्णधर्म)&lt;br /&gt;
शरीरधर्म 	२. मन-धर्म 	३. बुद्धि-धर्म 	४. चित्त-धर्म &lt;br /&gt;
() सामाजिक संबंधों में धर्म &lt;br /&gt;
व्यक्ति-व्यक्ति  : पुरूष-पुरूष या स्त्री-स्त्री 			१.१ पारिवारिक रिश्ते 	१.२ पड़ोसी 		१.३ अतिथि  	१.४ शत्रु/विरोधक 		१.५ मित्र/सहायक 	१.६ सहकारी 		१.७ अपरिचित 	१.८ मालिक/नौकर 		१.९ चरित्रहीन स्त्री/पुरूष 	१.१० व्यसनी 		१,११ जरूरतमंद 	१.१२ समव्यवसायी 		१.१३ भिन्न व्यवसायी 	१.१४ याचक 		१.१५ भिन्न भाषी १.१६ विक्रेता\क्रेता    		१.१७ भिन्न राष्ट्रीय &lt;br /&gt;
व्यक्ति-व्यक्ति : पुरूष-स्त्री 				१.१ पारिवारिक रिश्ते 	१.२ पड़ोसी 		१.३ अतिथि  	१.४ शत्रु/विरोधक 		१.५ मित्र/सहायक 	१.६ सहकारी 		१.७ अपरिचित 	१.८ मालिक/नौकर 		१.९ चरित्रहीन स्त्री/पुरूष 	१.१० व्यसनी 		१,११ जरूरतमंद 	१.१२ समव्यवसायी 		१.१३ भिन्न व्यवसायी 	१.१४ याचक 		१.१५ भिन्न भाषी १.१६ विक्रेता\क्रेता    		१.१७ भिन्न राष्ट्रीय &lt;br /&gt;
व्यक्ति-समाज :		३.१ व्यक्ति-परिवार 	३.२ व्यति-जाति 		३.३ पड़ोसी 			३.४ सामाजिक संगठन  	३.५ व्यक्ति-व्यवस्था 	३.६ व्यक्ति-राष्ट्र 		३.७ व्यक्ति-विश्व समाज 		३.८ व्यक्ति भिन्न भाषी 	३.९ परप्रांतीय 		३.१० परदेसी &lt;br /&gt;
समाज-समाज : 	४.१ अंतर्राष्ट्रीय : ४.१.१ शत्रु 	४.१.२ मित्र 	४.१.३ तटस्थ 		&lt;br /&gt;
४.२ अंतर्देशीय	४.१.१ प्रांत-प्रांत 	४.१.२ जनपद-जनपद 	४.१.३ भाषिक समूह  	४.१.४ पंथ समूह  	४.१.५ राष्ट्रीय समूह 	४.१.६ अराष्ट्रीय समूह 		४.१.७ राष्ट्रद्रोही समूह 	४.१.८ विदेशी 		४.१.९ समव्यवासायी  	४.१.१० जाति-जाति 		४.१.११ परिवार परिवार &lt;br /&gt;
()  सृष्टिगत सम्बन्धों में धर्म  &lt;br /&gt;
	१. मनुष्य-अन्य जीव :													१.१ मनुष्य-पालतू प्राणी :  १.१.१ शाकाहारी 	१.१.२ मांसाहारी 								१.२ मनुष्य अन्य प्राणी : 	१.२.१ थलचर : 	१.२.१.१ शाकाहारी 	१.२.१.२ मांसाहारी 							१.२.२ जलचर 		और 		१.२.३ नभचर 	&lt;br /&gt;
१.३ मनुष्य-वनस्पति : 	१.३.१ जमीन के नीचे 	१.३.२ जमीन के ऊपर 	१.३.३ वनस्पति/औषधी 					१.३.४ खानेयोग्य/अन्न 	१.३.५ अखाद्य/जहरीली 	१.३.६ नशीली		१.४ मनुष्य-कृमि/कीटक/सूक्ष्म जीव 		१.४.१ सहायक 		१.४.२ हानिकारक	      २. मनुष्य-जड़ प्रकृति / पंचमहाभूत 									२.१ अनवीकरणीय/खनिज 	२.१.१ ठोस 	२.१.२ द्रव 	२.१.३ वायु (इंधन)  		२.२ नवीकरणीय 	: २.२.१ वायु/हवा 	२.२.२ जल 	२.२.३ सूर्यप्रकाश 		२.२.४ लकड़ी&lt;br /&gt;
() आपद्धर्म :	१. प्राकृतिक आपदा 		२. मानव निर्मित आपदा (लगभग उपर्युक्त सभी विषयों में)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== परिवर्तन के पुरोधा ==&lt;br /&gt;
उपर्युक्त बिन्दु २ में बताए गए श्रेष्ठ जन ही परिवर्तन के पुरोधा होंगे। इनका प्रमाण समाज में मुष्किल से ५-७ प्रतिशत ही पर्याप्त होता है। ऐसे श्रेष्ठ जनों में निम्न वर्ग के लोग आते हैं।	&lt;br /&gt;
४.१ शिक्षक : शिक्षक ज्ञानी, त्यागी, कुशल, समाज हित के लिए समर्पित, धर्म का जानकार, समाज को घडने की सामर्थ्य रखनेवाला होता है। नई पीढी जो परिवर्तन का अधिक सहजता से स्वीकार कर सकती है उसको घडना शिक्षक का काम होता है। इसलिये परिवर्तन की प्रक्रिया का मुख्य पुरोधा शिक्षक ही होता है।	&lt;br /&gt;
४.२ श्रेष्ठ जन :यहाँ श्रेष्ठ जनों से मतलब भिन्न भिन्न सामाजिक गतिविधियों में जो अग्रणी लोग हैं उनसे है।	&lt;br /&gt;
४.३ सांप्रदायिक संगठनों के प्रमुख : आजकल समाज का एक बहुत बडा वर्ग जिसमें शिक्षित वर्ग भी है, भिन्न भिन्न संप्रदायों से जुडा है। उन संप्रदायों के प्रमुख भी इस परिवर्तन की प्रक्रिया का एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण हिस्सा बनने की शक्ति रखते हैं।	&lt;br /&gt;
४.४ लोकशिक्षा के माध्यम : कीर्तनकार, कथाकार, प्रवचनकार, नाटक मंडलि, पुरोहित या उपाध्याय, साधू, बैरागी, सिंहस्थ या कुंभ जैसे मेले, यात्राएँ आदि लोकशिक्षा के माध्यम हुआ करते थे। वर्तमान में ये सब कमजोर और दिशाहीन हो गए हैं। एक ओर इनमें से जिनको पुनर्जीवित कर सकते हैं उन्हें करना। नए आयाम भी जोडे जा सकते हैं। जैसे अभी लगभग देढ दशक पूर्व महाराष्ट्र में प्रारंभ हुई नव-वर्ष स्वागत यात्राएँ आदि।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== अंतर्निहित सुधार व्यवस्था ==&lt;br /&gt;
काल के प्रवाह में समाज में हो रहे परिवर्तन और मनुष्य की स्खलनशीलता के कारण बढनेवाला अधर्माचरण ये दो बातें ऐसीं हैं जो किसी भी श्रेष्ठतम समाज को भी नष्ट कर देतीं हैं। इस दृष्टि से जागरूक ऐसे शिक्षक और धर्म के मार्गदर्शक साथ में मिलकर समाज की अंतर्निहित सुधार व्यवस्था बनाते हैं। अपनी संवेदनशीलता और समाज के निरंतर बारीकी से हो रहे अध्ययन के कारण इन्हें संकटों का पूर्वानुमान हो जाता है। अपने निरीक्षणों के आधारपर अपने लोकसंग्रही स्वभाव से ये लोगों को भी संकटों से ऊपर उठने के लिये तैयार करते हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== परिवर्तन की नीति ==&lt;br /&gt;
प्रारंभ में विरोध को आमंत्रण नहीं देना। संघर्ष में शक्ति का अपव्यय नहीं करना। जो आज कर सकते हैं उसे करते जाना। जो कल करने की आवश्यकता है उस के लिये परिस्थिति निर्माण करना। परिस्थिति के निर्माण होते ही आगे बढना।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== परिवर्तन में अवरोध और उनका निराकरण ==&lt;br /&gt;
शासनाधिष्ठित समाज में स्वार्थ के आधारपर परिवर्तन सरल और तेज गति से होता है। हिटलरने १५-२० वर्षों में ही जर्मनी को एक समर्थ राष्ट्र के रूप में खड़ा कर दिया था। लेकिन धर्म पर आधारित जीवन के प्रतिमान में परिवर्तन की गति धीमी और मार्ग कठिन होता है। स्थाई परिवर्तन और वह भी कौटुम्बिक भावना के आधारपर, तो धीरे धीरे ही होता है। &lt;br /&gt;
७.१ अंतर्देशीय 	&lt;br /&gt;
७.१.१ मानवीय जड़ता : परिवर्तन का आनंद से स्वागत करनेवाले लोग समाज में अल्पसंख्य ही होते हैं। सामान्यत: युवा वर्ग ही परिवर्तन के लिए तैयार होता है। इसलिए युवा वर्ग को इस परिवर्तन की प्रक्रिया में सहभागी बनाना होगा। परिवर्तन की प्रक्रिया में युवाओं को सम्मिलित करते जाने से दो तीन पीढ़ियों में परिवर्तन का चक्र गतिमान हो जाएगा।&lt;br /&gt;
७.१.२ विपरीत शिक्षा : जैसे जैसे भारतीय शिक्षा का विस्तार समाज में होगा वर्तमान की विपरीत शिक्षा का अपने आप ही क्रमश: लोप होगा।	   &lt;br /&gt;
७.१.३ मजहबी मानसिकता : भारतीय याने धर्म की शिक्षा के उदय और विस्तार के साथ ही मजहबी शिक्षा और उसका प्रभाव भी शनै: शनै: घटता जाएगा। मजहबों की वास्तविकता को भी उजागर करना आवश्यक है। &lt;br /&gt;
७.१.४ धर्म के ठेकेदार : जैसे जैसे धर्म के जानकार और धर्म के अनुसार आचरण करनेवाले लोग समाज में दिखने लगेंगे, धर्म के तथाकथित ठेकेदारों का प्रभाव कम होता जाएगा। &lt;br /&gt;
७.१.५ शासन तंत्र : इस परिवर्तन की प्रक्रिया में धर्म के जानकारों के बाद शासन की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण होगी। धर्माचरणी लोगों को समर्थन, सहायता और संरक्षण देने का काम शासन को करना होगा। इस के लिए शासक भी धर्म का जानकार और धर्मनिष्ठ हो, यह भी आवश्यक है। धर्म के जानकारों को यह सुनिश्चित करना होगा की शासक धर्माचरण करनेवाले और धर्म के जानकर हों।&lt;br /&gt;
७.१.६ जीवन का अभारतीय प्रतिमान : जीवन के सभी क्षेत्रों में एकसाथ जीवन के प्रतिमान के परिवर्तन की प्रक्रिया को चलाना यह धर्म के जानकारों की जिम्मेदारी होगी। शिक्षा की भूमिका इसमें सबसे महत्वपूर्ण होगी। शिक्षा के माध्यम से समूचे जीवन के भारतीय प्रतिमान की रुपरेखा और प्रक्रिया को समाजव्यापी बनाना होगा। धर्मं-शरण शासन इसमें सहायता करेगा।&lt;br /&gt;
७.१.७ तन्त्रज्ञान  समायोजन : तन्त्रज्ञान के क्षेत्र में भारत के सामने दोहरी चुनौती होगी। एक ओर तो विश्व में जो तन्त्रज्ञान के विकास की होड़ लगी है उसमें अपनी विशेषताओं के साथ अग्रणी रहना। इस दृष्टि से विकास हेतु कुछ तन्त्रज्ञान निम्न हो सकते हैं।&lt;br /&gt;
- शून्य प्रदुषण रासायनिक उद्योग।&lt;br /&gt;
- सस्ती सौर उर्जा।&lt;br /&gt;
- प्रकृति में सहजता से घुलनशील प्लैस्टिक का निर्माण। &lt;br /&gt;
- औरों द्वारा प्रक्षेपित शस्त्रों/अणु-शस्त्रों का शमन करने का तंत्रज्ञान। ...............आदि &lt;br /&gt;
और दूसरी ओर वैकल्पिक विकेंद्रीकरणपर आधारित तन्त्रज्ञान का विकास कर उसे विश्व में प्रतिष्ठित करना। इस प्रकार के तन्त्रज्ञान में निम्न प्रकार के तन्त्रज्ञान होंगे।&lt;br /&gt;
- कौटुम्बिक उद्योगों के लिये, स्थानिक संसाधनों के उपयोग के लिए तन्त्रज्ञान  &lt;br /&gt;
- भिन्न भिन्न कार्यों के लिये पशु-उर्जा के अधिकाधिक उपयोग के लिये तंत्रज्ञान&lt;br /&gt;
- नविकरणीय प्राकृतिक संसाधनों से विविध पदार्थों के निर्माण से आवश्यकताओं की पूर्ति तथा संसाधनों के पुनर्भरण के लिये सरल तन्त्रज्ञान का विकास   &lt;br /&gt;
- मानव की प्राकृतिक क्षमताओं का विकास करनेवाली प्रक्रियाओं का अनुसंधान। ......... आदि &lt;br /&gt;
७.२ अंतर्राष्ट्रीय 	&lt;br /&gt;
७.२.१ मजहबी विस्तारवादी मानसिकता : वर्तमान में यह मुख्यत: ३ प्रकार की है। ईसाई, मुस्लिम और वामपंथी। यह तीनों ही विचारधाराएँ अधूरी हैं, एकांगी हैं। यह तो इन के सम्मुख ‘सर्वे भवन्तु सुखिन:’ को लेकर कोई चुनौती खड़ी नहीं होने से इन्हें विश्व में विस्तार का अवसर मिला है। जैसे ही ‘सर्वे भवन्तु सुखिन:’ का विचार लेकर भारत एक वैश्विक शक्ति के रूप में खड़ा होगा इनके पैरोंतले की जमीन खिसकने लगेगी। &lt;br /&gt;
७.२.२ आसुरी महत्वाकांक्षा : ऊपर जो बताया गया है वह, आसुरी महत्वाकांक्षा रखनेवाली वैश्विक शक्तियों के लिये भी लागू है। आसुरी महत्वाकांक्षाओं को परास्त करने की परंपरा भारत में युगों से रही है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== परिवर्तन के लिये समयबध्द करणीय कार्य ==&lt;br /&gt;
समूचे जीवन के प्रतिमान का परिवर्तन यह एक बहुत बृहद् और जटिल कार्य है। इस के लिये इसे सामाजिक अभियान का रूप देना होगा। समविचारी लोगों को संगठित होकर सहमति से और चरणबध्द पध्दति से प्रक्रिया को आगे बढाना होगा। बड़े पैमानेपर जीवन के हर क्षेत्र में जीवन के भारतीय प्रतिमान की समझ रखनेवाले और कृतीशील ऐसे लोग याने आचार्य निर्माण करने होंगे। परिवर्तन के चरण एक के बाद एक और एक के साथ सभी इस पध्दति से चलेंगे। जैसे दूसरे चरण के काल में ५० प्रतिशत शक्ति और संसाधन दूसरे चरणके निर्धारित विषयपर लगेंगे। और १२.५-१२.५ प्रतिशत शक्ति और संसाधन चरण १, ३, ४ और ५ में प्रत्येकपर लगेंगे।&lt;br /&gt;
१. समविचारी लोगों का ध्रुवीकरण : जिन्हें प्रतिमान के परिवर्तन की आस है और समझ भी है ऐसे समविचारी, सहचित्त लोगों का ध्रुवीकरण करना होगा। उनमें एक व्यापक सहमति निर्माण करनी होगी। अपने अपने कार्यक्षेत्र में क्या करना है इसका स्पष्टीकरण करना होगा।&lt;br /&gt;
२. अभियान के चरण : अभियान को चरणबध्द पध्दति से चलाना होगा। १२ वर्षों के ये पाँच चरण होंगे। ऐसी यह ६० वर्ष की योजना होगी। यह प्रक्रिया तीन पीढीतक चलेगी। तीसरी पीढी में परिवर्तन के फल देखने को मिलेंगे। लेकिन तबतक निष्ठा से और धैर्य से अभियान को चलाना होगा। निरंतर मूल्यांकन करना होगा। राह भटक नहीं जाए इसके लिये चौकन्ना रहना होगा।&lt;br /&gt;
२.१ अध्ययन और अनुसंधान : जीवन का दायरा बहुत व्यापक होता है। अनगिनत विषय इसमें आते हैं। इसलिये प्रतिमान के बदलाव से पहले हमें दोनों प्रतिमानों के विषय में और विशेषत: जीवन के भारतीय प्रतिमान के विषय में बहुत गहराई से अध्ययन करना होगा। मनुष्य की इच्छाओं का दायरा, उनकी पूर्ति के लिये वह क्या क्या कर सकता है आदि का दायरा अति विशाल है। इन दोनों को धर्म के नियंत्रण में ऐसे रखा जाता है इसका भी अध्ययन अनिवार्य है। मनुष्य के व्यक्तित्व को ठीक से समझना, उसके शरीर, मन, बुध्दि, चित्त, अहंकार आदि बातों को समझना, कर्मसिध्दांत को समझना, जन्म जन्मांतर चलने वाली शिक्षा की प्रक्रिया को समझना विविध विषयों के अंगांगी संबंधों को समझना, प्रकृति के रहस्यों को समझना आदि अनेकों ऐसी बातें हैं जिनका अध्ययन हमें करना होगा। इनमें से कई विषयों के संबंध में हमारे पूर्वजों ने विपुल साहित्य निर्माण किया था। उसमें से कितने ही साहित्य को जाने अंजाने में प्रक्षेपित किया गया है। इस प्रक्षिप्त हिस्से को समझ कर अलग निकालना होगा। शुध्द भारतीय तत्वोंपर आधारित ज्ञान को प्राप्त करना होगा। अंग्रेजों ने भारतीय साहित्य, इतिहास के साथ किये खिलवाड, भारतीय समाज में झगडे पैदा करने के लिये निर्मित साहित्य को अलग हटाकर शुध्द भारतीय याने एकात्म भाव की या कौटुम्बिक भाव की जितनी भी प्रस्तुतियाँ हैं उनका अध्ययन करना होगा। मान्यताओं, व्यवहार सूत्रों, संगठन निर्माण और व्यवस्था निर्माण की प्रक्रिया को समझना होगा।     &lt;br /&gt;
२.२ लोकमत परिष्कार : अध्ययन से जो ज्ञान उभरकर सामने आएगा उसे लोगोंतक ले जाना होगा। लोगों का प्रबोधन करना होगा। उन्हें फिर से समग्रता से और एकात्मता से सोचने और व्यवहार करने का तरीका बताना होगा। उन्हें उनकी सामाजिक जिम्मेदारी का समाजधर्म का अहसास करवाना होगा। वर्तमान की परिस्थितियों से सामान्यत: कोई भी खुश नहीं है। लेकिन जीवन का भारतीय प्रतिमान ही  उनकी कल्पना के अच्छे दिनों का वास्तव है यह सब के मन में स्थापित करना होगा।	         &lt;br /&gt;
२.३ संयुक्त कुटुम्ब : कुटुम्ब ही समाजधर्म सीखने की पाठशाला होता है। संयुक्त कुटुम्ब तो वास्तव में समाज का लघुरूप ही होता है। सामाजिक समस्याओं में से लगभग ७० प्रतिशत समस्याओं को तो केवल अच्छा संयुक्त कुटुम्ब ही निर्मूल कर देता है। समाज जीवन के लिये श्रेष्ठ लोगों को जन्म देने का काम, श्रेष्ठ संस्कार देने का काम, अच्छी आदतें डालने काम आजकल की फॅमिली पध्दति नहीं कर सकती। जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में जो तेजस्वी नेतृत्व का अभाव निर्माण हो गया है उसे दूर करना यह भारतीय मान्यताओं के अनुसार चलाए जानेवाले संयुक्त परिवारों में ही हो सकता है। इसलिये समाज का नेतृत्व करेंगे ऐसे श्रेष्ठ बालकों को जन्म देने के प्रयास तीसरे चरण में होंगे।&lt;br /&gt;
२.४ शिक्षक/धर्मज्ञ और शासक निर्माण : समाज परिवर्तन में शिक्षक की और शासक की ऐसे दोनों की भुमिका अत्यंत महत्वपूर्ण होती है। संयुक्त परिवारों में जन्म लिये बच्चों में से अब श्रेष्ठ धर्म के मार्गदर्शक, शिक्षक और शासक निर्माण करने की स्थिति होगी। ऐसे लोगों को समर्थन और सहायता देनेवाले कुटुम्ब और दूसरे चरण में निर्माण किये समाज के परिष्कृत विचारोंवाले सदस्य अब कुछ मात्रा में उपलब्ध होंगे।	   &lt;br /&gt;
२.५ संगठन और व्यवस्थाओं की प्रतिष्ठापना : श्रेष्ठ धर्म के अधिष्ठाता/मार्गदर्शक, सामर्थ्यवान शिक्षक और कुशल शासक अब प्रत्यक्ष संगठन का सशक्तिकरण और व्यवस्थाओं का निर्माण करेंगे।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==References==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;references /&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अन्य स्रोत:&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[Category:Bhartiya Jeevan Pratiman (भारतीय जीवन प्रतिमान)]]&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Dilipkelkar</name></author>
	</entry>
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		<title>Planning For Change (परिवर्तन की योजना)</title>
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		<updated>2019-05-30T10:51:51Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Dilipkelkar: /* निराकरण की नीति */ लेख सम्पादित किया&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{One source|date=January 2019}}&lt;br /&gt;
[[Template:Cleanup reorganize Dharmawiki Page]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
परिवर्तन की योजना को समझने के लिए हमें पहले निम्न बातें फिर से स्मरण करनी होंगी ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जीवन के भारतीय प्रतिमान की जानकारी के लिए - &lt;br /&gt;
# जीवनदृष्टि/व्यवहार : भारतीय जीवनदृष्टि और जीवनशैली के विषय में जानकारी के लिये कृपया [[Elements of Hindu Jeevan Drishti and Life Style (भारतीय/हिन्दू जीवनदृष्टि और जीवन शैली के सूत्र)|यह]] लेख देखें।&lt;br /&gt;
# व्यवस्था समूह का ढाँचा जीवनदृष्टि से सुसंगत होना चाहिए। कृपया व्यवस्था समूह के ढाँचे के लिये [[Jeevan Ka Pratiman (जीवन का प्रतिमान)|यह]] लेख और जानकारी के लिए [[Interrelationship in Srishti (सृष्टि में परस्पर सम्बद्धता)|यह]] लेख देखें।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== समस्या मूलों के निराकरण की नीति ==&lt;br /&gt;
समस्या मूल नष्ट करने से तात्पर्य समस्या मूलों पर आघात से नहीं है। समस्याएँ निर्माण ही नहीं हों ऐसी परिस्थितियों, ऐसे समाज संगठनों और ऐसी व्यवस्थाओं के निर्माण से है। निराकरण की प्रक्रिया के ३ चरण होंगे। समस्याओं को और परिवर्तन के स्वरूप को समझना, निराकरण की नीति तय करना और निराकरण का क्रियान्वयन करना। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== परिवर्तन के स्वरूप को समझना ==&lt;br /&gt;
समस्या का मूल जीवन के प्रतिमान के परिवर्तन में है। प्रतिमान का आधार समाज की जीवनदृष्टि होती है। व्यवहार, संगठन और व्यवस्थाएँ तो जीवनदृष्टि के आधार पर ही तय होते हैं। इसलिये परिवर्तन की प्रक्रिया में जीवनदृष्टि के परिवर्तन की प्रक्रिया को प्राथमिकता देनी होगी। व्यवहार में सुसंगतता आए इसलिये करणीय अकरणीय विवेक को सार्वत्रिक करना होगा। दूसरे क्रमांक पर संगठन और व्यवस्थाओं में परिवर्तन की प्रक्रिया चलेगी। व्यवस्था परिवर्तन की इस प्रक्रिया में समग्रता और एकात्मता के संदर्भ में व्यवस्था विशेष का आधार बनाने के लिये विषय की सैध्दांतिक प्रस्तुति करनी होगी। जैसे शासन व्यवस्था में यदि उचित परिवर्तन करना है तो पहले राजशास्त्र की सैध्दांतिक प्रस्तुति करना आवश्यक है। समृद्धि व्यवस्था में परिवर्तन करने के लिये समृद्धिशास्त्र की सैध्दांतिक प्रस्तुति करनी होगी। इन सैध्दांतिक प्रस्तुतियों को प्रयोग सिध्द करना होगा। प्रयोगों के आधार पर इन प्रस्तुतियों में उचित परिवर्तन करते हुए आगे बढना होगा। यह काम प्राथमिकता से धर्म के जानकारों का है। दूसरे क्रमांक की जिम्मेदारी शिक्षकों की है। शिक्षक वर्ग ही धर्म को सार्वत्रिक करता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== निराकरण की नीति ==&lt;br /&gt;
समस्याएँ इतनी अधिक और पेचिदा हैं कि इनका निराकरण अब संभव नहीं है, ऐसा कई विद्वान मानते हैं। हमने जो करणीय और अकरणीय विवेक को समझा है उसके अनुसार कोई भी बात असंभव नहीं होती। ऊपरी तौर पर असंभव लगने पर भी उसे संभव चरणों में बाँटकर संपन्न किया जा सकता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इस के लिये नीति के तौर पर हमारा व्यवहार निम्न प्रकार का होना चाहिए:&lt;br /&gt;
* सबसे पहले तो यह हमेशा ध्यान में रखना कि यह पूरे समाज जीवन के प्रतिमान के परिवर्तन का विषय है। इसे परिवर्तन के लिये कई पीढियों का समय लग सकता है। भारत वर्ष के दीर्घ इतिहास में समाज ने कई बार उत्थान और पतन के दौर अनुभव किये हैं। बार बार भारतीय समाज ने उत्थान किया है।&lt;br /&gt;
* परिवर्तन की प्रक्रिया को संभाव्य चरणों में बाँटना।&lt;br /&gt;
* उसमें आज जो हो सकता है उसे कर डालना।&lt;br /&gt;
* आज जिसे करना कठिन लगता है उसके लिये परिस्थितियाँ बनाते जाना। परिस्थितियाँ बनते ही उसे करना।&lt;br /&gt;
* प्रारंभ में जबतक परिवर्तन की प्रक्रिया ने गति नहीं पकडी है, यथासंभव कोई विरोध मोल नहीं लेना।&lt;br /&gt;
* इसी प्रकार से एक एक चरण को संभव बनाते हुए आगे बढ़ाते जाना।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== समस्या मूलों का निराकरण ==&lt;br /&gt;
वास्तव में समस्या मूलों को नष्ट करना यह शब्दप्रयोग ठीक नहीं है। उचित प्रतिमान की प्रतिष्ठापना के साथ ही गलत प्रतिमान का अंत अपने आप होता है। जो सर्वहितकारी है, उचित है, श्रेष्ठ है, उसकी प्रतिष्ठापना ही परिवर्तन की प्रक्रिया का स्वरूप होगा। स्वाभाविक जडता के कारण कुछ कठिनाईयाँ तो आएँगी। लेकिन गलत प्रतिमान को नष्ट करने के लिये अलग से शक्ति लगाने की आवश्यकता नहीं है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== समस्या मूल नष्ट करने हेतु धर्म के जानकारों के मार्गदर्शन में शिक्षा की व्याप्ति ==&lt;br /&gt;
# जीवनदृष्टि की शिक्षा : जीवनदृष्टि की शिक्षा मुख्यत: कामनाओं और कामनाओं की पूर्ति के प्रयास, धन, साधन और संसाधनों को धर्म के दायरे में रखने की शिक्षा ही है। पुरूषार्थ चतुष्टय की या त्रिवर्ग की शिक्षा ही है।&lt;br /&gt;
# व्यवस्थाएँ : जीवनदृष्टि के अनुसार व्यवहार हो सके इस हेतु से ही व्यवस्थाओं का निर्माण किया जाता है। व्यवस्थाओं के निर्माण में और उनके क्रियान्वयन में भी जीवनदृष्टि ओतप्रोत रहे इसका ध्यान रखना होगा।&lt;br /&gt;
## धर्म व्यवस्था&lt;br /&gt;
## शिक्षा व्यवस्था&lt;br /&gt;
## शासन व्यवस्था&lt;br /&gt;
## समृद्धि व्यवस्था&lt;br /&gt;
# संगठन : समाज संगठन और समाज की व्यवस्थाएँ एक दूसरे को पूरक पोषक होती हैं। लेकिन धर्म व्यवस्था, शिक्षा व्यवस्था और शासन व्यवस्था के अभाव में संगठन निर्माण करना अत्यंत कठिन हो जाता है। वास्तव में ये दोनों अन्योन्याश्रित होते हैं। समाज संगठन की जानकारी के लिये कृपया [[Society (समाज)|यह]] लेख देखें।&lt;br /&gt;
## कुटुम्ब&lt;br /&gt;
## स्वभाव समायोजन&lt;br /&gt;
## आश्रम&lt;br /&gt;
## कौशल विधा&lt;br /&gt;
## ग्राम&lt;br /&gt;
## राष्ट्र&lt;br /&gt;
# विज्ञान और तन्त्रज्ञान: कृपया [[Bharat's Science and Technology (भारतीय विज्ञान तन्त्रज्ञान दृष्टि)|यह]] लेख देखें। &lt;br /&gt;
## विकास और उपयोग नीति&lt;br /&gt;
## सार्वत्रिकीकरण&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== परिवर्तन की योजना ==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== परिवर्तन का स्वरूप ===&lt;br /&gt;
वर्तमान स्वार्थ पर आधारित जीवन के प्रतिमान के स्थान पर आत्मीयता याने कौटुम्बिक भावना पर आधारित जीवन के प्रतिमान की प्रतिष्ठापना:&lt;br /&gt;
# सर्वे भवन्तु सुखिन:, देशानुकूल और कालानुकूल आदि के संदर्भ में दोनों प्रतिमानों को समझना&lt;br /&gt;
# प्रतिमान का परिवर्तन&lt;br /&gt;
## सामाजिक व्यवस्थाओं का पुनर्निर्माण&lt;br /&gt;
### समाज के संगठनों का परिष्कार/पुनरूत्थान या नवनिर्माण&lt;br /&gt;
### तन्त्रज्ञान  का समायोजन / तन्त्रज्ञान  नीति / जीवन की इष्ट गति : वर्तमान में तन्त्रज्ञान  की विकास की गति से जीवन को जो गति प्राप्त हुई है उस के कारण सामान्य मनुष्य घसीटा जा रहा है। पर्यावरण सन्तुलन  और सामाजिकता दाँवपर लग गए हैं। ज्ञान, विज्ञान और तन्त्रज्ञान ये तीनों बातें पात्र व्यक्ति को ही मिलनी चाहिये। बंदर के हाथ में पलिता नहीं दिया जाता। इस लिये किसी भी तन्त्रज्ञान के सार्वत्रिकीकरण से पहले उसके पर्यावरण, समाजजीवन और व्यक्ति जीवनपर होनेवाले परिणाम जानना आवश्यक है। हानिकारक तंत्रज्ञान का तो विकास भी नहीं करना चाहिये। किया तो वह केवल सुपात्र को ही अंतरित हो यह सुनिश्चित करना चाहिये। ऐसी स्थिति में जीवन की इष्ट गति की ओर बढानेवाली तन्त्रज्ञान नीति का स्वीकार करना होगा। इष्ट गति के निकषों के लिये अध्याय ३९ में बताई &lt;br /&gt;
### लगानी होगी।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== परिवर्तन की प्रक्रिया ===&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सामाजिक परिवर्तन भौतिक वस्तुओं के परिवर्तन जैसे सरल नहीं होते। भौतिक पदार्थों का एक निश्चित स्वभाव होता है। धर्म होता है। इसे ध्यान में रखकर भौतिक पदार्थों को ढाला जाता है। हर मानव का स्वभाव भिन्न होता है। भिन्न समयपर भी उसमें बदलाव आ सकता है। इसलिये सामाजिक परिवर्तन क्रांति से नहीं उत्क्रांति से ही किये जा सकते हैं। उत्क्रांति की गति धीमी होती है। होनेवाले परिवर्तनों से किसी की हानी नहीं हो या होनेवाली हानी न्यूनतम हो, परिवर्तन स्थाई हों, परिवर्तन से सबको लाभ मिले यह सब देखकर ही प्रक्रिया चलाई जाती है। सामाजिक परिवर्तनों के लिये नई पीढी से प्रारंभ करना यह सबसे अच्छा रास्ता है। लेकिन नई पीढी में व्यापक रूप से परिवर्तन के पहलुओं को स्थापित करने के लिये आवश्यक इतनी पुरानी पीढी के श्रेष्ठ जनों की संख्या आवश्यक है। ऐसे श्रेष्ठ जनों का वर्णन श्रीमद्भगवद्गीता में किया गया है -&lt;br /&gt;
यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जन: ।&lt;br /&gt;
स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते॥ (अध्याय ३ श्लोक २१)&lt;br /&gt;
इसलिये एक दृष्टि से देखा जाए तो यह प्रक्रिया समाज के प्रत्येक व्यक्तितक ले जाने की आवश्यकता नहीं होती। केवल समाज जीवन की सभी विधाओं के श्रेष्ठ लोगों के निर्माण की प्रक्रिया ही परिवर्तन की प्रक्रिया है। एक बार ये लोग निर्माण हो गये तो फिर परिवर्तन तेज याने ज्यामितीय गति से होने लगता है।&lt;br /&gt;
२.१ धीमी लेकिन अविश्रांत : हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि हमें सामाजिक परिवर्तन करना है। समाज एक जीवंत ईकाई होता है। जीवंत ईकाई में परिवर्तन हमेशा धीमी गति से, समग्रता से और अविरत करते रहने से होते हैं। कोई भी शीघ्रता या टुकडों में होनेवाले परिवर्तन हानिकारक होते हैं।&lt;br /&gt;
२.२ सभी क्षेत्रों में एकसाथ : समाज एक जीवंत ईकाई होने के कारण इसके सभी अंग किसी भी बात से एकसाथ प्रभावित होते हैं। प्रभाव का परिमाण कम अधिक होगा लेकिन प्रभाव सभीपर होता ही है। इसलिये परिवर्तन की प्रक्रिया टुकडों में अलग अलग या एक के बाद एक ऐसी नहीं होगी। परिवर्तन की प्रक्रिया धर्म, शिक्षा, शासन, अर्थ, न्याय, समाज संगठन आदि सभी क्षेत्रों में एकसाथ चलेगी। ऐसी प्रक्रिया का प्रारंभ होना बहुत कठिन होता है। लेकिन एकबार सभी क्षेत्रों में प्रारंभ हो जाता है तो फिर यह तेजी से गति प्राप्त कर लेती है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== परिवर्तन के कारक तत्व ===&lt;br /&gt;
३.१ शिक्षा : शिक्षा का दायरा बहुत व्यापक है। शिक्षा जन्म जन्मांतर चलनेवाली प्रक्रिया होती है। इस जन्म में शिक्षा गर्भधारणा से मृत्यूपर्यंत चलती है। आयु की अवस्था के अनुसार शिक्षा का स्वरूप बदलता है। &lt;br /&gt;
३.१.२ कुटुम्ब में शिक्षा : कुटुम्ब में शिक्षा का प्रारंभ गर्भधारणा से होता है। मनुष्य की ६०-७० प्रतिशत घडन तो कुटुम्ब में ही होती है। कुटुम्ब में रहकर वह कई बातें सीखता है। कौटुम्बिक भावना, कर्तव्य, सदाचार आदि की शिक्षा कुटुम्ब की ही जिम्मेदारी होती है। व्यवस्थाओं के साथ समायोजन, व्यवस्थाओं के स्वरूप आदि भी वह कुटुम्ब में ही अपने ज्येष्ठों से सीखता है। इंद्रियों के विकास की शिक्षा, व्यावसायिक कौशल भी वह कुटुम्ब में ही सीखता है। कुटुम्ब सामाजिकता की पाठशाला ही होता है। बडों का आदर, स्त्री का आदर आदि भी कुटुम्ब ही सिखाता है। &lt;br /&gt;
३.१.२ कुटुम्ब की शिक्षा : उसी प्रकार से कुटुम्ब के बारे में भी वह कई बातें सीखता है। उसकी व्यक्तिगत, कौटुम्बिक और सामाजिक आदतें बचपन में ही आकार लेतीं हैं। कुटुम्ब का महत्व, समाज में कौटुम्बिक भावना का महत्व, कौटुम्बिक व्यवस्थाओं का महत्व वह कुटुम्ब में सीखता है। भिन्न भिन्न स्वभावों के लोग एक छत के नीचे आत्मीयता से कैसे रहते हैं यह वह कुटुम्ब से ही सीखता है। लगभग सभी प्रकार से कुटुंब यह समाज का लघुरूप ही होता है। कुटुंब यह सामाजिकता की पाठशाला होती है।&lt;br /&gt;
३.१.३ विद्याकेन्द्र शिक्षा	: विद्याकेन्द्र की शिक्षा शास्त्रीय शिक्षा होती है। कुटुम्ब में सीखे हुए सदाचार के शास्त्रीय पक्ष को समझाने के लिये होती है। कुटुंब में सीखे हुए व्यावसायिक कौशलों को पैना बनाने के लिये होती है। कुटुंब में आत्मसात की हुई श्रेष्ठ परम्पराओं को अधिक उज्वल बनाने के तरीके सीखने के लिए होती है। अध्ययन का और कौशल का शास्त्रीय तरीका सिखने के लिये, अध्ययन को तेजस्वी बनाने के लिये होती है।&lt;br /&gt;
३.१.४ लोकशिक्षा : लोकशिक्षा भी समाज जीवन का एक आवश्यक पहलू है। विद्याकेन्द्र की शिक्षा के उपरान्त भी मनुष्य का मन कई बार भ्रमित हो जाता हाय, बुद्धि कुण्ठित हो जाती है। ऐसी स्थिति में लोकशिक्षा की व्यवस्था इस संभ्रम को, इस कुण्ठा को दूर करती है।&lt;br /&gt;
३.१.५ परंपरा निर्माण : अपने से अधिक श्रेष्ठ विरासत निर्माण करने की निरंतरता को श्रेष्ठ परंपरा कहते हैं। श्रेष्ठ परंपराओं के निर्माण की तीव्र इच्छा और पैने प्रयास समाज को श्रेष्ठ और चिरंजीवी बनाते हैं।&lt;br /&gt;
३.२ शासन 	&lt;br /&gt;
३.२.१ धर्मनिष्ठता : शासक धर्मशास्त्र के जानकार हों। धर्मशास्त्र के पालनकर्ता हों। धर्मशास्त्र के नियमों का प्रजा से अनुपालन करवाने में कुशल हों।	&lt;br /&gt;
३.२.२ धर्म व्यवस्था के साथ समायोजन : सदैव धर्म के जानकारों से अपना मूल्यांकन करवाएँ। धर्म के जानकारों की सूचनाओं का अनुपालन करें। अधर्म होने से प्रायश्चित्त और पश्चात्ताप के लिये उद्यत रहें।&lt;br /&gt;
३.३ धर्म नेतृत्व&lt;br /&gt;
३.३.१ धर्म के मार्गदर्शक : किसी का केवल धर्मशास्त्र का विशेषज्ञ होना पर्याप्त नहीं है। नि:स्वार्थ भाव, निर्भयता भी श्रेष्ठ धर्म के मार्गदर्शकों के लक्षण हैं।&lt;br /&gt;
३.३.२ धर्माचरणी : धर्म का मार्गदर्शन करनेवाले लोग अपने व्यवहार में भी धर्मयुक्त होना चाहिये।&lt;br /&gt;
३.३.३ विजीगिषु स्वभाववाले : धर्म का मार्गदर्शन करनेवाले लोगों के लिये विजीगिषु स्वभाव का होना आवश्यक है। कोई भी संकट आनेपर डगमगाएँ नहीं यह धर्म के मार्गदर्शकों के लिये आवश्यक है।&lt;br /&gt;
धर्मं के जानकारों का सबसे पहला कर्तव्य है कि वे वर्तमान काल के लिए धर्मशास्त्र या स्मृति की प्रस्तुति करें। यह स्मृति जीवन के सभी पहलुओं को व्यापनेवाली हो। इसकी व्यापकता को समझने की दृष्टि से एक रूपरेखा नीचे दे रहे हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== धर्मशास्त्र प्रस्तुति के लिये बिन्दु ==&lt;br /&gt;
() धर्म की व्याख्याएँ / धर्म की व्याप्ति / त्रिवर्ग की व्याप्ति : सर्वे भवन्तु सुखिन: लक्ष्य हेतु धर्म : संस्कृति &lt;br /&gt;
() व्यापक धर्मशास्त्र के प्रस्तुति की आवश्यकता: * पूर्व धर्मशास्त्रों की व्यापकता(?)  	* व्यापकता की आवश्यकता &lt;br /&gt;
() व्यक्तिगत धर्म / पञ्चविध (कोष) पुरुष धर्म / चतुर्विध पुरूषार्थ /स्वधर्म (वर्णधर्म)&lt;br /&gt;
शरीरधर्म 	२. मन-धर्म 	३. बुद्धि-धर्म 	४. चित्त-धर्म &lt;br /&gt;
() सामाजिक संबंधों में धर्म &lt;br /&gt;
व्यक्ति-व्यक्ति  : पुरूष-पुरूष या स्त्री-स्त्री 			१.१ पारिवारिक रिश्ते 	१.२ पड़ोसी 		१.३ अतिथि  	१.४ शत्रु/विरोधक 		१.५ मित्र/सहायक 	१.६ सहकारी 		१.७ अपरिचित 	१.८ मालिक/नौकर 		१.९ चरित्रहीन स्त्री/पुरूष 	१.१० व्यसनी 		१,११ जरूरतमंद 	१.१२ समव्यवसायी 		१.१३ भिन्न व्यवसायी 	१.१४ याचक 		१.१५ भिन्न भाषी १.१६ विक्रेता\क्रेता    		१.१७ भिन्न राष्ट्रीय &lt;br /&gt;
व्यक्ति-व्यक्ति : पुरूष-स्त्री 				१.१ पारिवारिक रिश्ते 	१.२ पड़ोसी 		१.३ अतिथि  	१.४ शत्रु/विरोधक 		१.५ मित्र/सहायक 	१.६ सहकारी 		१.७ अपरिचित 	१.८ मालिक/नौकर 		१.९ चरित्रहीन स्त्री/पुरूष 	१.१० व्यसनी 		१,११ जरूरतमंद 	१.१२ समव्यवसायी 		१.१३ भिन्न व्यवसायी 	१.१४ याचक 		१.१५ भिन्न भाषी १.१६ विक्रेता\क्रेता    		१.१७ भिन्न राष्ट्रीय &lt;br /&gt;
व्यक्ति-समाज :		३.१ व्यक्ति-परिवार 	३.२ व्यति-जाति 		३.३ पड़ोसी 			३.४ सामाजिक संगठन  	३.५ व्यक्ति-व्यवस्था 	३.६ व्यक्ति-राष्ट्र 		३.७ व्यक्ति-विश्व समाज 		३.८ व्यक्ति भिन्न भाषी 	३.९ परप्रांतीय 		३.१० परदेसी &lt;br /&gt;
समाज-समाज : 	४.१ अंतर्राष्ट्रीय : ४.१.१ शत्रु 	४.१.२ मित्र 	४.१.३ तटस्थ 		&lt;br /&gt;
४.२ अंतर्देशीय	४.१.१ प्रांत-प्रांत 	४.१.२ जनपद-जनपद 	४.१.३ भाषिक समूह  	४.१.४ पंथ समूह  	४.१.५ राष्ट्रीय समूह 	४.१.६ अराष्ट्रीय समूह 		४.१.७ राष्ट्रद्रोही समूह 	४.१.८ विदेशी 		४.१.९ समव्यवासायी  	४.१.१० जाति-जाति 		४.१.११ परिवार परिवार &lt;br /&gt;
()  सृष्टिगत सम्बन्धों में धर्म  &lt;br /&gt;
	१. मनुष्य-अन्य जीव :													१.१ मनुष्य-पालतू प्राणी :  १.१.१ शाकाहारी 	१.१.२ मांसाहारी 								१.२ मनुष्य अन्य प्राणी : 	१.२.१ थलचर : 	१.२.१.१ शाकाहारी 	१.२.१.२ मांसाहारी 							१.२.२ जलचर 		और 		१.२.३ नभचर 	&lt;br /&gt;
१.३ मनुष्य-वनस्पति : 	१.३.१ जमीन के नीचे 	१.३.२ जमीन के ऊपर 	१.३.३ वनस्पति/औषधी 					१.३.४ खानेयोग्य/अन्न 	१.३.५ अखाद्य/जहरीली 	१.३.६ नशीली		१.४ मनुष्य-कृमि/कीटक/सूक्ष्म जीव 		१.४.१ सहायक 		१.४.२ हानिकारक	      २. मनुष्य-जड़ प्रकृति / पंचमहाभूत 									२.१ अनवीकरणीय/खनिज 	२.१.१ ठोस 	२.१.२ द्रव 	२.१.३ वायु (इंधन)  		२.२ नवीकरणीय 	: २.२.१ वायु/हवा 	२.२.२ जल 	२.२.३ सूर्यप्रकाश 		२.२.४ लकड़ी&lt;br /&gt;
() आपद्धर्म :	१. प्राकृतिक आपदा 		२. मानव निर्मित आपदा (लगभग उपर्युक्त सभी विषयों में)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== परिवर्तन के पुरोधा ==&lt;br /&gt;
उपर्युक्त बिन्दु २ में बताए गए श्रेष्ठ जन ही परिवर्तन के पुरोधा होंगे। इनका प्रमाण समाज में मुष्किल से ५-७ प्रतिशत ही पर्याप्त होता है। ऐसे श्रेष्ठ जनों में निम्न वर्ग के लोग आते हैं।	&lt;br /&gt;
४.१ शिक्षक : शिक्षक ज्ञानी, त्यागी, कुशल, समाज हित के लिए समर्पित, धर्म का जानकार, समाज को घडने की सामर्थ्य रखनेवाला होता है। नई पीढी जो परिवर्तन का अधिक सहजता से स्वीकार कर सकती है उसको घडना शिक्षक का काम होता है। इसलिये परिवर्तन की प्रक्रिया का मुख्य पुरोधा शिक्षक ही होता है।	&lt;br /&gt;
४.२ श्रेष्ठ जन :यहाँ श्रेष्ठ जनों से मतलब भिन्न भिन्न सामाजिक गतिविधियों में जो अग्रणी लोग हैं उनसे है।	&lt;br /&gt;
४.३ सांप्रदायिक संगठनों के प्रमुख : आजकल समाज का एक बहुत बडा वर्ग जिसमें शिक्षित वर्ग भी है, भिन्न भिन्न संप्रदायों से जुडा है। उन संप्रदायों के प्रमुख भी इस परिवर्तन की प्रक्रिया का एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण हिस्सा बनने की शक्ति रखते हैं।	&lt;br /&gt;
४.४ लोकशिक्षा के माध्यम : कीर्तनकार, कथाकार, प्रवचनकार, नाटक मंडलि, पुरोहित या उपाध्याय, साधू, बैरागी, सिंहस्थ या कुंभ जैसे मेले, यात्राएँ आदि लोकशिक्षा के माध्यम हुआ करते थे। वर्तमान में ये सब कमजोर और दिशाहीन हो गए हैं। एक ओर इनमें से जिनको पुनर्जीवित कर सकते हैं उन्हें करना। नए आयाम भी जोडे जा सकते हैं। जैसे अभी लगभग देढ दशक पूर्व महाराष्ट्र में प्रारंभ हुई नव-वर्ष स्वागत यात्राएँ आदि।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== अंतर्निहित सुधार व्यवस्था ==&lt;br /&gt;
काल के प्रवाह में समाज में हो रहे परिवर्तन और मनुष्य की स्खलनशीलता के कारण बढनेवाला अधर्माचरण ये दो बातें ऐसीं हैं जो किसी भी श्रेष्ठतम समाज को भी नष्ट कर देतीं हैं। इस दृष्टि से जागरूक ऐसे शिक्षक और धर्म के मार्गदर्शक साथ में मिलकर समाज की अंतर्निहित सुधार व्यवस्था बनाते हैं। अपनी संवेदनशीलता और समाज के निरंतर बारीकी से हो रहे अध्ययन के कारण इन्हें संकटों का पूर्वानुमान हो जाता है। अपने निरीक्षणों के आधारपर अपने लोकसंग्रही स्वभाव से ये लोगों को भी संकटों से ऊपर उठने के लिये तैयार करते हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== परिवर्तन की नीति ==&lt;br /&gt;
प्रारंभ में विरोध को आमंत्रण नहीं देना। संघर्ष में शक्ति का अपव्यय नहीं करना। जो आज कर सकते हैं उसे करते जाना। जो कल करने की आवश्यकता है उस के लिये परिस्थिति निर्माण करना। परिस्थिति के निर्माण होते ही आगे बढना।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== परिवर्तन में अवरोध और उनका निराकरण ==&lt;br /&gt;
शासनाधिष्ठित समाज में स्वार्थ के आधारपर परिवर्तन सरल और तेज गति से होता है। हिटलरने १५-२० वर्षों में ही जर्मनी को एक समर्थ राष्ट्र के रूप में खड़ा कर दिया था। लेकिन धर्म पर आधारित जीवन के प्रतिमान में परिवर्तन की गति धीमी और मार्ग कठिन होता है। स्थाई परिवर्तन और वह भी कौटुम्बिक भावना के आधारपर, तो धीरे धीरे ही होता है। &lt;br /&gt;
७.१ अंतर्देशीय 	&lt;br /&gt;
७.१.१ मानवीय जड़ता : परिवर्तन का आनंद से स्वागत करनेवाले लोग समाज में अल्पसंख्य ही होते हैं। सामान्यत: युवा वर्ग ही परिवर्तन के लिए तैयार होता है। इसलिए युवा वर्ग को इस परिवर्तन की प्रक्रिया में सहभागी बनाना होगा। परिवर्तन की प्रक्रिया में युवाओं को सम्मिलित करते जाने से दो तीन पीढ़ियों में परिवर्तन का चक्र गतिमान हो जाएगा।&lt;br /&gt;
७.१.२ विपरीत शिक्षा : जैसे जैसे भारतीय शिक्षा का विस्तार समाज में होगा वर्तमान की विपरीत शिक्षा का अपने आप ही क्रमश: लोप होगा।	   &lt;br /&gt;
७.१.३ मजहबी मानसिकता : भारतीय याने धर्म की शिक्षा के उदय और विस्तार के साथ ही मजहबी शिक्षा और उसका प्रभाव भी शनै: शनै: घटता जाएगा। मजहबों की वास्तविकता को भी उजागर करना आवश्यक है। &lt;br /&gt;
७.१.४ धर्म के ठेकेदार : जैसे जैसे धर्म के जानकार और धर्म के अनुसार आचरण करनेवाले लोग समाज में दिखने लगेंगे, धर्म के तथाकथित ठेकेदारों का प्रभाव कम होता जाएगा। &lt;br /&gt;
७.१.५ शासन तंत्र : इस परिवर्तन की प्रक्रिया में धर्म के जानकारों के बाद शासन की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण होगी। धर्माचरणी लोगों को समर्थन, सहायता और संरक्षण देने का काम शासन को करना होगा। इस के लिए शासक भी धर्म का जानकार और धर्मनिष्ठ हो, यह भी आवश्यक है। धर्म के जानकारों को यह सुनिश्चित करना होगा की शासक धर्माचरण करनेवाले और धर्म के जानकर हों।&lt;br /&gt;
७.१.६ जीवन का अभारतीय प्रतिमान : जीवन के सभी क्षेत्रों में एकसाथ जीवन के प्रतिमान के परिवर्तन की प्रक्रिया को चलाना यह धर्म के जानकारों की जिम्मेदारी होगी। शिक्षा की भूमिका इसमें सबसे महत्वपूर्ण होगी। शिक्षा के माध्यम से समूचे जीवन के भारतीय प्रतिमान की रुपरेखा और प्रक्रिया को समाजव्यापी बनाना होगा। धर्मं-शरण शासन इसमें सहायता करेगा।&lt;br /&gt;
७.१.७ तन्त्रज्ञान  समायोजन : तन्त्रज्ञान के क्षेत्र में भारत के सामने दोहरी चुनौती होगी। एक ओर तो विश्व में जो तन्त्रज्ञान के विकास की होड़ लगी है उसमें अपनी विशेषताओं के साथ अग्रणी रहना। इस दृष्टि से विकास हेतु कुछ तन्त्रज्ञान निम्न हो सकते हैं।&lt;br /&gt;
- शून्य प्रदुषण रासायनिक उद्योग।&lt;br /&gt;
- सस्ती सौर उर्जा।&lt;br /&gt;
- प्रकृति में सहजता से घुलनशील प्लैस्टिक का निर्माण। &lt;br /&gt;
- औरों द्वारा प्रक्षेपित शस्त्रों/अणु-शस्त्रों का शमन करने का तंत्रज्ञान। ...............आदि &lt;br /&gt;
और दूसरी ओर वैकल्पिक विकेंद्रीकरणपर आधारित तन्त्रज्ञान का विकास कर उसे विश्व में प्रतिष्ठित करना। इस प्रकार के तन्त्रज्ञान में निम्न प्रकार के तन्त्रज्ञान होंगे।&lt;br /&gt;
- कौटुम्बिक उद्योगों के लिये, स्थानिक संसाधनों के उपयोग के लिए तन्त्रज्ञान  &lt;br /&gt;
- भिन्न भिन्न कार्यों के लिये पशु-उर्जा के अधिकाधिक उपयोग के लिये तंत्रज्ञान&lt;br /&gt;
- नविकरणीय प्राकृतिक संसाधनों से विविध पदार्थों के निर्माण से आवश्यकताओं की पूर्ति तथा संसाधनों के पुनर्भरण के लिये सरल तन्त्रज्ञान का विकास   &lt;br /&gt;
- मानव की प्राकृतिक क्षमताओं का विकास करनेवाली प्रक्रियाओं का अनुसंधान। ......... आदि &lt;br /&gt;
७.२ अंतर्राष्ट्रीय 	&lt;br /&gt;
७.२.१ मजहबी विस्तारवादी मानसिकता : वर्तमान में यह मुख्यत: ३ प्रकार की है। ईसाई, मुस्लिम और वामपंथी। यह तीनों ही विचारधाराएँ अधूरी हैं, एकांगी हैं। यह तो इन के सम्मुख ‘सर्वे भवन्तु सुखिन:’ को लेकर कोई चुनौती खड़ी नहीं होने से इन्हें विश्व में विस्तार का अवसर मिला है। जैसे ही ‘सर्वे भवन्तु सुखिन:’ का विचार लेकर भारत एक वैश्विक शक्ति के रूप में खड़ा होगा इनके पैरोंतले की जमीन खिसकने लगेगी। &lt;br /&gt;
७.२.२ आसुरी महत्वाकांक्षा : ऊपर जो बताया गया है वह, आसुरी महत्वाकांक्षा रखनेवाली वैश्विक शक्तियों के लिये भी लागू है। आसुरी महत्वाकांक्षाओं को परास्त करने की परंपरा भारत में युगों से रही है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== परिवर्तन के लिये समयबध्द करणीय कार्य ==&lt;br /&gt;
समूचे जीवन के प्रतिमान का परिवर्तन यह एक बहुत बृहद् और जटिल कार्य है। इस के लिये इसे सामाजिक अभियान का रूप देना होगा। समविचारी लोगों को संगठित होकर सहमति से और चरणबध्द पध्दति से प्रक्रिया को आगे बढाना होगा। बड़े पैमानेपर जीवन के हर क्षेत्र में जीवन के भारतीय प्रतिमान की समझ रखनेवाले और कृतीशील ऐसे लोग याने आचार्य निर्माण करने होंगे। परिवर्तन के चरण एक के बाद एक और एक के साथ सभी इस पध्दति से चलेंगे। जैसे दूसरे चरण के काल में ५० प्रतिशत शक्ति और संसाधन दूसरे चरणके निर्धारित विषयपर लगेंगे। और १२.५-१२.५ प्रतिशत शक्ति और संसाधन चरण १, ३, ४ और ५ में प्रत्येकपर लगेंगे।&lt;br /&gt;
१. समविचारी लोगों का ध्रुवीकरण : जिन्हें प्रतिमान के परिवर्तन की आस है और समझ भी है ऐसे समविचारी, सहचित्त लोगों का ध्रुवीकरण करना होगा। उनमें एक व्यापक सहमति निर्माण करनी होगी। अपने अपने कार्यक्षेत्र में क्या करना है इसका स्पष्टीकरण करना होगा।&lt;br /&gt;
२. अभियान के चरण : अभियान को चरणबध्द पध्दति से चलाना होगा। १२ वर्षों के ये पाँच चरण होंगे। ऐसी यह ६० वर्ष की योजना होगी। यह प्रक्रिया तीन पीढीतक चलेगी। तीसरी पीढी में परिवर्तन के फल देखने को मिलेंगे। लेकिन तबतक निष्ठा से और धैर्य से अभियान को चलाना होगा। निरंतर मूल्यांकन करना होगा। राह भटक नहीं जाए इसके लिये चौकन्ना रहना होगा।&lt;br /&gt;
२.१ अध्ययन और अनुसंधान : जीवन का दायरा बहुत व्यापक होता है। अनगिनत विषय इसमें आते हैं। इसलिये प्रतिमान के बदलाव से पहले हमें दोनों प्रतिमानों के विषय में और विशेषत: जीवन के भारतीय प्रतिमान के विषय में बहुत गहराई से अध्ययन करना होगा। मनुष्य की इच्छाओं का दायरा, उनकी पूर्ति के लिये वह क्या क्या कर सकता है आदि का दायरा अति विशाल है। इन दोनों को धर्म के नियंत्रण में ऐसे रखा जाता है इसका भी अध्ययन अनिवार्य है। मनुष्य के व्यक्तित्व को ठीक से समझना, उसके शरीर, मन, बुध्दि, चित्त, अहंकार आदि बातों को समझना, कर्मसिध्दांत को समझना, जन्म जन्मांतर चलने वाली शिक्षा की प्रक्रिया को समझना विविध विषयों के अंगांगी संबंधों को समझना, प्रकृति के रहस्यों को समझना आदि अनेकों ऐसी बातें हैं जिनका अध्ययन हमें करना होगा। इनमें से कई विषयों के संबंध में हमारे पूर्वजों ने विपुल साहित्य निर्माण किया था। उसमें से कितने ही साहित्य को जाने अंजाने में प्रक्षेपित किया गया है। इस प्रक्षिप्त हिस्से को समझ कर अलग निकालना होगा। शुध्द भारतीय तत्वोंपर आधारित ज्ञान को प्राप्त करना होगा। अंग्रेजों ने भारतीय साहित्य, इतिहास के साथ किये खिलवाड, भारतीय समाज में झगडे पैदा करने के लिये निर्मित साहित्य को अलग हटाकर शुध्द भारतीय याने एकात्म भाव की या कौटुम्बिक भाव की जितनी भी प्रस्तुतियाँ हैं उनका अध्ययन करना होगा। मान्यताओं, व्यवहार सूत्रों, संगठन निर्माण और व्यवस्था निर्माण की प्रक्रिया को समझना होगा।     &lt;br /&gt;
२.२ लोकमत परिष्कार : अध्ययन से जो ज्ञान उभरकर सामने आएगा उसे लोगोंतक ले जाना होगा। लोगों का प्रबोधन करना होगा। उन्हें फिर से समग्रता से और एकात्मता से सोचने और व्यवहार करने का तरीका बताना होगा। उन्हें उनकी सामाजिक जिम्मेदारी का समाजधर्म का अहसास करवाना होगा। वर्तमान की परिस्थितियों से सामान्यत: कोई भी खुश नहीं है। लेकिन जीवन का भारतीय प्रतिमान ही  उनकी कल्पना के अच्छे दिनों का वास्तव है यह सब के मन में स्थापित करना होगा।	         &lt;br /&gt;
२.३ संयुक्त कुटुम्ब : कुटुम्ब ही समाजधर्म सीखने की पाठशाला होता है। संयुक्त कुटुम्ब तो वास्तव में समाज का लघुरूप ही होता है। सामाजिक समस्याओं में से लगभग ७० प्रतिशत समस्याओं को तो केवल अच्छा संयुक्त कुटुम्ब ही निर्मूल कर देता है। समाज जीवन के लिये श्रेष्ठ लोगों को जन्म देने का काम, श्रेष्ठ संस्कार देने का काम, अच्छी आदतें डालने काम आजकल की फॅमिली पध्दति नहीं कर सकती। जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में जो तेजस्वी नेतृत्व का अभाव निर्माण हो गया है उसे दूर करना यह भारतीय मान्यताओं के अनुसार चलाए जानेवाले संयुक्त परिवारों में ही हो सकता है। इसलिये समाज का नेतृत्व करेंगे ऐसे श्रेष्ठ बालकों को जन्म देने के प्रयास तीसरे चरण में होंगे।&lt;br /&gt;
२.४ शिक्षक/धर्मज्ञ और शासक निर्माण : समाज परिवर्तन में शिक्षक की और शासक की ऐसे दोनों की भुमिका अत्यंत महत्वपूर्ण होती है। संयुक्त परिवारों में जन्म लिये बच्चों में से अब श्रेष्ठ धर्म के मार्गदर्शक, शिक्षक और शासक निर्माण करने की स्थिति होगी। ऐसे लोगों को समर्थन और सहायता देनेवाले कुटुम्ब और दूसरे चरण में निर्माण किये समाज के परिष्कृत विचारोंवाले सदस्य अब कुछ मात्रा में उपलब्ध होंगे।	   &lt;br /&gt;
२.५ संगठन और व्यवस्थाओं की प्रतिष्ठापना : श्रेष्ठ धर्म के अधिष्ठाता/मार्गदर्शक, सामर्थ्यवान शिक्षक और कुशल शासक अब प्रत्यक्ष संगठन का सशक्तिकरण और व्यवस्थाओं का निर्माण करेंगे।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==References==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;references /&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अन्य स्रोत:&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[Category:Bhartiya Jeevan Pratiman (भारतीय जीवन प्रतिमान)]]&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Dilipkelkar</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://dharmawiki.org/index.php?title=Planning_For_Change_(%E0%A4%AA%E0%A4%B0%E0%A4%BF%E0%A4%B5%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%A4%E0%A4%A8_%E0%A4%95%E0%A5%80_%E0%A4%AF%E0%A5%8B%E0%A4%9C%E0%A4%A8%E0%A4%BE)&amp;diff=119333</id>
		<title>Planning For Change (परिवर्तन की योजना)</title>
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		<updated>2019-05-30T10:44:36Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Dilipkelkar: लेख सम्पादित किया&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{One source|date=January 2019}}&lt;br /&gt;
[[Template:Cleanup reorganize Dharmawiki Page]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
परिवर्तन की योजना को समझने के लिए हमें पहले निम्न बातें फिर से स्मरण करनी होंगी ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जीवन के भारतीय प्रतिमान की जानकारी के लिए - &lt;br /&gt;
# जीवनदृष्टि/व्यवहार : भारतीय जीवनदृष्टि और जीवनशैली के विषय में जानकारी के लिये कृपया [[Elements of Hindu Jeevan Drishti and Life Style (भारतीय/हिन्दू जीवनदृष्टि और जीवन शैली के सूत्र)|यह]] लेख देखें।&lt;br /&gt;
# व्यवस्था समूह का ढाँचा जीवनदृष्टि से सुसंगत होना चाहिए। कृपया व्यवस्था समूह के ढाँचे के लिये [[Jeevan Ka Pratiman (जीवन का प्रतिमान)|यह]] लेख और जानकारी के लिए [[Interrelationship in Srishti (सृष्टि में परस्पर सम्बद्धता)|यह]] लेख देखें।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== समस्या मूलों के निराकरण की नीति ==&lt;br /&gt;
समस्या मूल नष्ट करने से तात्पर्य समस्या मूलों पर आघात से नहीं है। समस्याएँ निर्माण ही नहीं हों ऐसी परिस्थितियों, ऐसे समाज संगठनों और ऐसी व्यवस्थाओं के निर्माण से है। निराकरण की प्रक्रिया के ३ चरण होंगे। समस्याओं को और परिवर्तन के स्वरूप को समझना, निराकरण की नीति तय करना और निराकरण का क्रियान्वयन करना। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== परिवर्तन के स्वरूप को समझना ==&lt;br /&gt;
समस्या का मूल जीवन के प्रतिमान के परिवर्तन में है। प्रतिमान का आधार समाज की जीवनदृष्टि होती है। व्यवहार, संगठन और व्यवस्थाएँ तो जीवनदृष्टि के आधार पर ही तय होते हैं। इसलिये परिवर्तन की प्रक्रिया में जीवनदृष्टि के परिवर्तन की प्रक्रिया को प्राथमिकता देनी होगी। व्यवहार में सुसंगतता आए इसलिये करणीय अकरणीय विवेक को सार्वत्रिक करना होगा। दूसरे क्रमांक पर संगठन और व्यवस्थाओं में परिवर्तन की प्रक्रिया चलेगी। व्यवस्था परिवर्तन की इस प्रक्रिया में समग्रता और एकात्मता के संदर्भ में व्यवस्था विशेष का आधार बनाने के लिये विषय की सैध्दांतिक प्रस्तुति करनी होगी। जैसे शासन व्यवस्था में यदि उचित परिवर्तन करना है तो पहले राजशास्त्र की सैध्दांतिक प्रस्तुति करना आवश्यक है। समृद्धि व्यवस्था में परिवर्तन करने के लिये समृद्धिशास्त्र की सैध्दांतिक प्रस्तुति करनी होगी। इन सैध्दांतिक प्रस्तुतियों को प्रयोग सिध्द करना होगा। प्रयोगों के आधार पर इन प्रस्तुतियों में उचित परिवर्तन करते हुए आगे बढना होगा। यह काम प्राथमिकता से धर्म के जानकारों का है। दूसरे क्रमांक की जिम्मेदारी शिक्षकों की है। शिक्षक वर्ग ही धर्म को सार्वत्रिक करता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== निराकरण की नीति ==&lt;br /&gt;
समस्याएँ इतनी अधिक और पेचिदा हैं कि इनका निराकरण अब संभव नहीं है, ऐसा कई विद्वान 	मानते हैं। हमने जो करणीय और अकरणीय विवेक को समझा है उसके अनुसार कोई भी बात असंभव नहीं होती। ऊपरी तौरपर असंभव लगनेपर भी उसे संभव चरणों में बाँटकर संपन्न किया जा सकता है।&lt;br /&gt;
इस के लिये नीति के तौरपर हमारा व्यवहार निम्न प्रकार का होना चागिये।&lt;br /&gt;
- सबसे पहले तो यह हमेशा ध्यान में रखना कि यह पूरे समाज जीवन के प्रतिमान के परिवर्तन का विषय है। इसे परिवर्तन के लिये कई पीढियों का समय लग सकता है। भारत वर्ष के दीर्घ इतिहास में समाज ने कई बार उत्थान और पतन के दौर अनुभव किये हैं। बारबार भारतीय समाज ने उत्थान किया है। &lt;br /&gt;
- परिवर्तन की प्रक्रिया को संभाव्य चरणों में बाँटना।&lt;br /&gt;
- उसमें आज जो हो सकता है उसे कर डालना।&lt;br /&gt;
- आज जिसे करना कठिन लगता है उसके लिये परिस्थितियाँ बनाते जाना। परिस्थितियाँ बनते ही उसे    करना। &lt;br /&gt;
- प्रारंभ में जबतक परिवर्तन की प्रक्रिया ने गति नहीं पकडी है, यथासंभव कोई विरोध मोल नहीं लेना। &lt;br /&gt;
- इसी प्रकार से एक एक चरण को संभव बनाते हुए आगे बढ़ाते जाना।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== समस्या मूलों का निराकरण ==&lt;br /&gt;
वास्तव में समस्या मूलों को नष्ट करना यह शब्दप्रयोग ठीक नहीं है। उचित प्रतिमान की प्रतिष्ठापना के साथ ही गलत प्रतिमान का अंत अपने आप होता है। जो सर्वहितकारी है, उचित है, श्रेष्ठ है, उसकी प्रतिष्ठापना ही परिवर्तन की प्रक्रिया का स्वरूप होगा। स्वाभाविक जडता के कारण कुछ कठिनाईयाँ तो आएँगी। लेकिन गलत प्रतिमान को नष्ट करने के लिये अलग से शक्ति लगाने की आवश्यकता नहीं है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== समस्या मूल नष्ट करने हेतु धर्म के जानकारों के मार्गदर्शन में शिक्षा की व्याप्ति ==&lt;br /&gt;
१. जीवनदृष्टि की शिक्षा : जीवनदृष्टि की शिक्षा मुख्यत: कामनाओं और कामनाओं की पूर्ति के प्रयास, धन, साधन और संसाधनों को धर्म के दायरे में रखने की शिक्षा ही है। पुरूषार्थ चतुष्टय की या त्रिवर्ग की शिक्षा ही है।&lt;br /&gt;
२. व्यवस्थाएँ : जीवनदृष्टि के अनुसार व्यवहार हो सके इस हेतु से ही व्यवस्थाओं का निर्माण किया जाता है।  व्यवस्थाओं के निर्माण में और उनके क्रियान्वयन में भी जीवनदृष्टि ओतप्रोत रहे इसका ध्यान रखना होगा।&lt;br /&gt;
	 २.१ धर्म व्यवस्था    २.२ शिक्षा व्यवस्था	२.३ शासन व्यवस्था   २.४ समृद्धि व्यवस्था&lt;br /&gt;
३. संगठन : समाज संगठन और समाज की व्यवस्थाएँ एक दूसरे को पूरक पोषक होती हैं। लेकिन धर्म व्यवस्था, शिक्षा व्यवस्था और शासन व्यवस्था के अभाव में संगठन निर्माण करना अत्यंत कठिन हो जाता है। वास्तव में ये दोनों अन्योन्याश्रित होते हैं। समाज संगठन की जानकारी के लिये कृपया अध्याय १२ देखें।&lt;br /&gt;
	३.१ कुटुम्ब 			३.२ स्वभाव समायोजन			३.३ आश्रम			३.४ कौशल विधा		३.५ ग्राम				३.६ राष्ट्र&lt;br /&gt;
४. विज्ञान और तन्त्रज्ञान  : कृपया अध्याय ३९ देखें। &lt;br /&gt;
४.१ विकास और उपयोग नीति		४.२ सार्वत्रिकीकरण&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== परिवर्तन की योजना ==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== परिवर्तन का स्वरूप ===&lt;br /&gt;
वर्तमान स्वार्थपर आधारित जीवन के प्रतिमान के स्थानपर आत्मीयता याने कौटुम्बिक  भावनापर आधारित जीवन के प्रतिमान की प्रतिष्ठापना&lt;br /&gt;
१.१  सर्वे भवन्तु सुखिन:, देशानुकूल और कालानुकूल आदि के संदर्भ में दोनों प्रतिमानों को समझना&lt;br /&gt;
१.२ प्रतिमान का परिवर्तन&lt;br /&gt;
.२.१ सामाजिक व्यवस्थाओं का पुनर्निर्माण&lt;br /&gt;
१.२.२ समाज के संगठनों का परिष्कार/पुनरूत्थान या नवनिर्माण&lt;br /&gt;
१.२.३ तन्त्रज्ञान  का समायोजन / तन्त्रज्ञान  नीति / जीवन की इष्ट गति : वर्तमान में तन्त्रज्ञान  की विकास की गति से जीवन को जो गति प्राप्त हुई है उस के कारण सामान्य मनुष्य घसीटा जा रहा है। पर्यावरण सन्तुलन  और सामाजिकता दाँवपर लग गए हैं। ज्ञान, विज्ञान और तन्त्रज्ञान  ये तीनों बातें पात्र व्यक्ति को ही मिलनी चाहिये। बंदर के हाथ में पलिता नहीं दिया जाता। इस लिये किसी भी तन्त्रज्ञान के सार्वत्रिकीकरण से पहले उसके पर्यावरण, समाजजीवन और व्यक्ति जीवनपर होनेवाले परिणाम जानना आवश्यक है। हानिकारक तंत्रज्ञान का तो विकास भी नहीं करना चाहिये। किया तो वह केवल सुपात्र को ही अंतरित हो यह सुनिश्चित करना चाहिये।&lt;br /&gt;
ऐसी स्थिति में जीवन की इष्ट गति की ओर बढानेवाली तन्त्रज्ञान नीति का स्वीकार करना होगा। इष्ट गति के निकषों के लिये अध्याय ३९ में बताई कसौटि लगानी होगी।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== परिवर्तन की प्रक्रिया ===&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सामाजिक परिवर्तन भौतिक वस्तुओं के परिवर्तन जैसे सरल नहीं होते। भौतिक पदार्थों का एक निश्चित स्वभाव होता है। धर्म होता है। इसे ध्यान में रखकर भौतिक पदार्थों को ढाला जाता है। हर मानव का स्वभाव भिन्न होता है। भिन्न समयपर भी उसमें बदलाव आ सकता है। इसलिये सामाजिक परिवर्तन क्रांति से नहीं उत्क्रांति से ही किये जा सकते हैं। उत्क्रांति की गति धीमी होती है। होनेवाले परिवर्तनों से किसी की हानी नहीं हो या होनेवाली हानी न्यूनतम हो, परिवर्तन स्थाई हों, परिवर्तन से सबको लाभ मिले यह सब देखकर ही प्रक्रिया चलाई जाती है। सामाजिक परिवर्तनों के लिये नई पीढी से प्रारंभ करना यह सबसे अच्छा रास्ता है। लेकिन नई पीढी में व्यापक रूप से परिवर्तन के पहलुओं को स्थापित करने के लिये आवश्यक इतनी पुरानी पीढी के श्रेष्ठ जनों की संख्या आवश्यक है। ऐसे श्रेष्ठ जनों का वर्णन श्रीमद्भगवद्गीता में किया गया है -&lt;br /&gt;
यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जन: ।&lt;br /&gt;
स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते॥ (अध्याय ३ श्लोक २१)&lt;br /&gt;
इसलिये एक दृष्टि से देखा जाए तो यह प्रक्रिया समाज के प्रत्येक व्यक्तितक ले जाने की आवश्यकता नहीं होती। केवल समाज जीवन की सभी विधाओं के श्रेष्ठ लोगों के निर्माण की प्रक्रिया ही परिवर्तन की प्रक्रिया है। एक बार ये लोग निर्माण हो गये तो फिर परिवर्तन तेज याने ज्यामितीय गति से होने लगता है।&lt;br /&gt;
२.१ धीमी लेकिन अविश्रांत : हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि हमें सामाजिक परिवर्तन करना है। समाज एक जीवंत ईकाई होता है। जीवंत ईकाई में परिवर्तन हमेशा धीमी गति से, समग्रता से और अविरत करते रहने से होते हैं। कोई भी शीघ्रता या टुकडों में होनेवाले परिवर्तन हानिकारक होते हैं।&lt;br /&gt;
२.२ सभी क्षेत्रों में एकसाथ : समाज एक जीवंत ईकाई होने के कारण इसके सभी अंग किसी भी बात से एकसाथ प्रभावित होते हैं। प्रभाव का परिमाण कम अधिक होगा लेकिन प्रभाव सभीपर होता ही है। इसलिये परिवर्तन की प्रक्रिया टुकडों में अलग अलग या एक के बाद एक ऐसी नहीं होगी। परिवर्तन की प्रक्रिया धर्म, शिक्षा, शासन, अर्थ, न्याय, समाज संगठन आदि सभी क्षेत्रों में एकसाथ चलेगी। ऐसी प्रक्रिया का प्रारंभ होना बहुत कठिन होता है। लेकिन एकबार सभी क्षेत्रों में प्रारंभ हो जाता है तो फिर यह तेजी से गति प्राप्त कर लेती है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== परिवर्तन के कारक तत्व ===&lt;br /&gt;
३.१ शिक्षा : शिक्षा का दायरा बहुत व्यापक है। शिक्षा जन्म जन्मांतर चलनेवाली प्रक्रिया होती है। इस जन्म में शिक्षा गर्भधारणा से मृत्यूपर्यंत चलती है। आयु की अवस्था के अनुसार शिक्षा का स्वरूप बदलता है। &lt;br /&gt;
३.१.२ कुटुम्ब में शिक्षा : कुटुम्ब में शिक्षा का प्रारंभ गर्भधारणा से होता है। मनुष्य की ६०-७० प्रतिशत घडन तो कुटुम्ब में ही होती है। कुटुम्ब में रहकर वह कई बातें सीखता है। कौटुम्बिक भावना, कर्तव्य, सदाचार आदि की शिक्षा कुटुम्ब की ही जिम्मेदारी होती है। व्यवस्थाओं के साथ समायोजन, व्यवस्थाओं के स्वरूप आदि भी वह कुटुम्ब में ही अपने ज्येष्ठों से सीखता है। इंद्रियों के विकास की शिक्षा, व्यावसायिक कौशल भी वह कुटुम्ब में ही सीखता है। कुटुम्ब सामाजिकता की पाठशाला ही होता है। बडों का आदर, स्त्री का आदर आदि भी कुटुम्ब ही सिखाता है। &lt;br /&gt;
३.१.२ कुटुम्ब की शिक्षा : उसी प्रकार से कुटुम्ब के बारे में भी वह कई बातें सीखता है। उसकी व्यक्तिगत, कौटुम्बिक और सामाजिक आदतें बचपन में ही आकार लेतीं हैं। कुटुम्ब का महत्व, समाज में कौटुम्बिक भावना का महत्व, कौटुम्बिक व्यवस्थाओं का महत्व वह कुटुम्ब में सीखता है। भिन्न भिन्न स्वभावों के लोग एक छत के नीचे आत्मीयता से कैसे रहते हैं यह वह कुटुम्ब से ही सीखता है। लगभग सभी प्रकार से कुटुंब यह समाज का लघुरूप ही होता है। कुटुंब यह सामाजिकता की पाठशाला होती है।&lt;br /&gt;
३.१.३ विद्याकेन्द्र शिक्षा	: विद्याकेन्द्र की शिक्षा शास्त्रीय शिक्षा होती है। कुटुम्ब में सीखे हुए सदाचार के शास्त्रीय पक्ष को समझाने के लिये होती है। कुटुंब में सीखे हुए व्यावसायिक कौशलों को पैना बनाने के लिये होती है। कुटुंब में आत्मसात की हुई श्रेष्ठ परम्पराओं को अधिक उज्वल बनाने के तरीके सीखने के लिए होती है। अध्ययन का और कौशल का शास्त्रीय तरीका सिखने के लिये, अध्ययन को तेजस्वी बनाने के लिये होती है।&lt;br /&gt;
३.१.४ लोकशिक्षा : लोकशिक्षा भी समाज जीवन का एक आवश्यक पहलू है। विद्याकेन्द्र की शिक्षा के उपरान्त भी मनुष्य का मन कई बार भ्रमित हो जाता हाय, बुद्धि कुण्ठित हो जाती है। ऐसी स्थिति में लोकशिक्षा की व्यवस्था इस संभ्रम को, इस कुण्ठा को दूर करती है।&lt;br /&gt;
३.१.५ परंपरा निर्माण : अपने से अधिक श्रेष्ठ विरासत निर्माण करने की निरंतरता को श्रेष्ठ परंपरा कहते हैं। श्रेष्ठ परंपराओं के निर्माण की तीव्र इच्छा और पैने प्रयास समाज को श्रेष्ठ और चिरंजीवी बनाते हैं।&lt;br /&gt;
३.२ शासन 	&lt;br /&gt;
३.२.१ धर्मनिष्ठता : शासक धर्मशास्त्र के जानकार हों। धर्मशास्त्र के पालनकर्ता हों। धर्मशास्त्र के नियमों का प्रजा से अनुपालन करवाने में कुशल हों।	&lt;br /&gt;
३.२.२ धर्म व्यवस्था के साथ समायोजन : सदैव धर्म के जानकारों से अपना मूल्यांकन करवाएँ। धर्म के जानकारों की सूचनाओं का अनुपालन करें। अधर्म होने से प्रायश्चित्त और पश्चात्ताप के लिये उद्यत रहें।&lt;br /&gt;
३.३ धर्म नेतृत्व&lt;br /&gt;
३.३.१ धर्म के मार्गदर्शक : किसी का केवल धर्मशास्त्र का विशेषज्ञ होना पर्याप्त नहीं है। नि:स्वार्थ भाव, निर्भयता भी श्रेष्ठ धर्म के मार्गदर्शकों के लक्षण हैं।&lt;br /&gt;
३.३.२ धर्माचरणी : धर्म का मार्गदर्शन करनेवाले लोग अपने व्यवहार में भी धर्मयुक्त होना चाहिये।&lt;br /&gt;
३.३.३ विजीगिषु स्वभाववाले : धर्म का मार्गदर्शन करनेवाले लोगों के लिये विजीगिषु स्वभाव का होना आवश्यक है। कोई भी संकट आनेपर डगमगाएँ नहीं यह धर्म के मार्गदर्शकों के लिये आवश्यक है।&lt;br /&gt;
धर्मं के जानकारों का सबसे पहला कर्तव्य है कि वे वर्तमान काल के लिए धर्मशास्त्र या स्मृति की प्रस्तुति करें। यह स्मृति जीवन के सभी पहलुओं को व्यापनेवाली हो। इसकी व्यापकता को समझने की दृष्टि से एक रूपरेखा नीचे दे रहे हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== धर्मशास्त्र प्रस्तुति के लिये बिन्दु ==&lt;br /&gt;
() धर्म की व्याख्याएँ / धर्म की व्याप्ति / त्रिवर्ग की व्याप्ति : सर्वे भवन्तु सुखिन: लक्ष्य हेतु धर्म : संस्कृति &lt;br /&gt;
() व्यापक धर्मशास्त्र के प्रस्तुति की आवश्यकता: * पूर्व धर्मशास्त्रों की व्यापकता(?)  	* व्यापकता की आवश्यकता &lt;br /&gt;
() व्यक्तिगत धर्म / पञ्चविध (कोष) पुरुष धर्म / चतुर्विध पुरूषार्थ /स्वधर्म (वर्णधर्म)&lt;br /&gt;
शरीरधर्म 	२. मन-धर्म 	३. बुद्धि-धर्म 	४. चित्त-धर्म &lt;br /&gt;
() सामाजिक संबंधों में धर्म &lt;br /&gt;
व्यक्ति-व्यक्ति  : पुरूष-पुरूष या स्त्री-स्त्री 			१.१ पारिवारिक रिश्ते 	१.२ पड़ोसी 		१.३ अतिथि  	१.४ शत्रु/विरोधक 		१.५ मित्र/सहायक 	१.६ सहकारी 		१.७ अपरिचित 	१.८ मालिक/नौकर 		१.९ चरित्रहीन स्त्री/पुरूष 	१.१० व्यसनी 		१,११ जरूरतमंद 	१.१२ समव्यवसायी 		१.१३ भिन्न व्यवसायी 	१.१४ याचक 		१.१५ भिन्न भाषी १.१६ विक्रेता\क्रेता    		१.१७ भिन्न राष्ट्रीय &lt;br /&gt;
व्यक्ति-व्यक्ति : पुरूष-स्त्री 				१.१ पारिवारिक रिश्ते 	१.२ पड़ोसी 		१.३ अतिथि  	१.४ शत्रु/विरोधक 		१.५ मित्र/सहायक 	१.६ सहकारी 		१.७ अपरिचित 	१.८ मालिक/नौकर 		१.९ चरित्रहीन स्त्री/पुरूष 	१.१० व्यसनी 		१,११ जरूरतमंद 	१.१२ समव्यवसायी 		१.१३ भिन्न व्यवसायी 	१.१४ याचक 		१.१५ भिन्न भाषी १.१६ विक्रेता\क्रेता    		१.१७ भिन्न राष्ट्रीय &lt;br /&gt;
व्यक्ति-समाज :		३.१ व्यक्ति-परिवार 	३.२ व्यति-जाति 		३.३ पड़ोसी 			३.४ सामाजिक संगठन  	३.५ व्यक्ति-व्यवस्था 	३.६ व्यक्ति-राष्ट्र 		३.७ व्यक्ति-विश्व समाज 		३.८ व्यक्ति भिन्न भाषी 	३.९ परप्रांतीय 		३.१० परदेसी &lt;br /&gt;
समाज-समाज : 	४.१ अंतर्राष्ट्रीय : ४.१.१ शत्रु 	४.१.२ मित्र 	४.१.३ तटस्थ 		&lt;br /&gt;
४.२ अंतर्देशीय	४.१.१ प्रांत-प्रांत 	४.१.२ जनपद-जनपद 	४.१.३ भाषिक समूह  	४.१.४ पंथ समूह  	४.१.५ राष्ट्रीय समूह 	४.१.६ अराष्ट्रीय समूह 		४.१.७ राष्ट्रद्रोही समूह 	४.१.८ विदेशी 		४.१.९ समव्यवासायी  	४.१.१० जाति-जाति 		४.१.११ परिवार परिवार &lt;br /&gt;
()  सृष्टिगत सम्बन्धों में धर्म  &lt;br /&gt;
	१. मनुष्य-अन्य जीव :													१.१ मनुष्य-पालतू प्राणी :  १.१.१ शाकाहारी 	१.१.२ मांसाहारी 								१.२ मनुष्य अन्य प्राणी : 	१.२.१ थलचर : 	१.२.१.१ शाकाहारी 	१.२.१.२ मांसाहारी 							१.२.२ जलचर 		और 		१.२.३ नभचर 	&lt;br /&gt;
१.३ मनुष्य-वनस्पति : 	१.३.१ जमीन के नीचे 	१.३.२ जमीन के ऊपर 	१.३.३ वनस्पति/औषधी 					१.३.४ खानेयोग्य/अन्न 	१.३.५ अखाद्य/जहरीली 	१.३.६ नशीली		१.४ मनुष्य-कृमि/कीटक/सूक्ष्म जीव 		१.४.१ सहायक 		१.४.२ हानिकारक	      २. मनुष्य-जड़ प्रकृति / पंचमहाभूत 									२.१ अनवीकरणीय/खनिज 	२.१.१ ठोस 	२.१.२ द्रव 	२.१.३ वायु (इंधन)  		२.२ नवीकरणीय 	: २.२.१ वायु/हवा 	२.२.२ जल 	२.२.३ सूर्यप्रकाश 		२.२.४ लकड़ी&lt;br /&gt;
() आपद्धर्म :	१. प्राकृतिक आपदा 		२. मानव निर्मित आपदा (लगभग उपर्युक्त सभी विषयों में)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== परिवर्तन के पुरोधा ==&lt;br /&gt;
उपर्युक्त बिन्दु २ में बताए गए श्रेष्ठ जन ही परिवर्तन के पुरोधा होंगे। इनका प्रमाण समाज में मुष्किल से ५-७ प्रतिशत ही पर्याप्त होता है। ऐसे श्रेष्ठ जनों में निम्न वर्ग के लोग आते हैं।	&lt;br /&gt;
४.१ शिक्षक : शिक्षक ज्ञानी, त्यागी, कुशल, समाज हित के लिए समर्पित, धर्म का जानकार, समाज को घडने की सामर्थ्य रखनेवाला होता है। नई पीढी जो परिवर्तन का अधिक सहजता से स्वीकार कर सकती है उसको घडना शिक्षक का काम होता है। इसलिये परिवर्तन की प्रक्रिया का मुख्य पुरोधा शिक्षक ही होता है।	&lt;br /&gt;
४.२ श्रेष्ठ जन :यहाँ श्रेष्ठ जनों से मतलब भिन्न भिन्न सामाजिक गतिविधियों में जो अग्रणी लोग हैं उनसे है।	&lt;br /&gt;
४.३ सांप्रदायिक संगठनों के प्रमुख : आजकल समाज का एक बहुत बडा वर्ग जिसमें शिक्षित वर्ग भी है, भिन्न भिन्न संप्रदायों से जुडा है। उन संप्रदायों के प्रमुख भी इस परिवर्तन की प्रक्रिया का एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण हिस्सा बनने की शक्ति रखते हैं।	&lt;br /&gt;
४.४ लोकशिक्षा के माध्यम : कीर्तनकार, कथाकार, प्रवचनकार, नाटक मंडलि, पुरोहित या उपाध्याय, साधू, बैरागी, सिंहस्थ या कुंभ जैसे मेले, यात्राएँ आदि लोकशिक्षा के माध्यम हुआ करते थे। वर्तमान में ये सब कमजोर और दिशाहीन हो गए हैं। एक ओर इनमें से जिनको पुनर्जीवित कर सकते हैं उन्हें करना। नए आयाम भी जोडे जा सकते हैं। जैसे अभी लगभग देढ दशक पूर्व महाराष्ट्र में प्रारंभ हुई नव-वर्ष स्वागत यात्राएँ आदि।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== अंतर्निहित सुधार व्यवस्था ==&lt;br /&gt;
काल के प्रवाह में समाज में हो रहे परिवर्तन और मनुष्य की स्खलनशीलता के कारण बढनेवाला अधर्माचरण ये दो बातें ऐसीं हैं जो किसी भी श्रेष्ठतम समाज को भी नष्ट कर देतीं हैं। इस दृष्टि से जागरूक ऐसे शिक्षक और धर्म के मार्गदर्शक साथ में मिलकर समाज की अंतर्निहित सुधार व्यवस्था बनाते हैं। अपनी संवेदनशीलता और समाज के निरंतर बारीकी से हो रहे अध्ययन के कारण इन्हें संकटों का पूर्वानुमान हो जाता है। अपने निरीक्षणों के आधारपर अपने लोकसंग्रही स्वभाव से ये लोगों को भी संकटों से ऊपर उठने के लिये तैयार करते हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== परिवर्तन की नीति ==&lt;br /&gt;
प्रारंभ में विरोध को आमंत्रण नहीं देना। संघर्ष में शक्ति का अपव्यय नहीं करना। जो आज कर सकते हैं उसे करते जाना। जो कल करने की आवश्यकता है उस के लिये परिस्थिति निर्माण करना। परिस्थिति के निर्माण होते ही आगे बढना।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== परिवर्तन में अवरोध और उनका निराकरण ==&lt;br /&gt;
शासनाधिष्ठित समाज में स्वार्थ के आधारपर परिवर्तन सरल और तेज गति से होता है। हिटलरने १५-२० वर्षों में ही जर्मनी को एक समर्थ राष्ट्र के रूप में खड़ा कर दिया था। लेकिन धर्म पर आधारित जीवन के प्रतिमान में परिवर्तन की गति धीमी और मार्ग कठिन होता है। स्थाई परिवर्तन और वह भी कौटुम्बिक भावना के आधारपर, तो धीरे धीरे ही होता है। &lt;br /&gt;
७.१ अंतर्देशीय 	&lt;br /&gt;
७.१.१ मानवीय जड़ता : परिवर्तन का आनंद से स्वागत करनेवाले लोग समाज में अल्पसंख्य ही होते हैं। सामान्यत: युवा वर्ग ही परिवर्तन के लिए तैयार होता है। इसलिए युवा वर्ग को इस परिवर्तन की प्रक्रिया में सहभागी बनाना होगा। परिवर्तन की प्रक्रिया में युवाओं को सम्मिलित करते जाने से दो तीन पीढ़ियों में परिवर्तन का चक्र गतिमान हो जाएगा।&lt;br /&gt;
७.१.२ विपरीत शिक्षा : जैसे जैसे भारतीय शिक्षा का विस्तार समाज में होगा वर्तमान की विपरीत शिक्षा का अपने आप ही क्रमश: लोप होगा।	   &lt;br /&gt;
७.१.३ मजहबी मानसिकता : भारतीय याने धर्म की शिक्षा के उदय और विस्तार के साथ ही मजहबी शिक्षा और उसका प्रभाव भी शनै: शनै: घटता जाएगा। मजहबों की वास्तविकता को भी उजागर करना आवश्यक है। &lt;br /&gt;
७.१.४ धर्म के ठेकेदार : जैसे जैसे धर्म के जानकार और धर्म के अनुसार आचरण करनेवाले लोग समाज में दिखने लगेंगे, धर्म के तथाकथित ठेकेदारों का प्रभाव कम होता जाएगा। &lt;br /&gt;
७.१.५ शासन तंत्र : इस परिवर्तन की प्रक्रिया में धर्म के जानकारों के बाद शासन की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण होगी। धर्माचरणी लोगों को समर्थन, सहायता और संरक्षण देने का काम शासन को करना होगा। इस के लिए शासक भी धर्म का जानकार और धर्मनिष्ठ हो, यह भी आवश्यक है। धर्म के जानकारों को यह सुनिश्चित करना होगा की शासक धर्माचरण करनेवाले और धर्म के जानकर हों।&lt;br /&gt;
७.१.६ जीवन का अभारतीय प्रतिमान : जीवन के सभी क्षेत्रों में एकसाथ जीवन के प्रतिमान के परिवर्तन की प्रक्रिया को चलाना यह धर्म के जानकारों की जिम्मेदारी होगी। शिक्षा की भूमिका इसमें सबसे महत्वपूर्ण होगी। शिक्षा के माध्यम से समूचे जीवन के भारतीय प्रतिमान की रुपरेखा और प्रक्रिया को समाजव्यापी बनाना होगा। धर्मं-शरण शासन इसमें सहायता करेगा।&lt;br /&gt;
७.१.७ तन्त्रज्ञान  समायोजन : तन्त्रज्ञान के क्षेत्र में भारत के सामने दोहरी चुनौती होगी। एक ओर तो विश्व में जो तन्त्रज्ञान के विकास की होड़ लगी है उसमें अपनी विशेषताओं के साथ अग्रणी रहना। इस दृष्टि से विकास हेतु कुछ तन्त्रज्ञान निम्न हो सकते हैं।&lt;br /&gt;
- शून्य प्रदुषण रासायनिक उद्योग।&lt;br /&gt;
- सस्ती सौर उर्जा।&lt;br /&gt;
- प्रकृति में सहजता से घुलनशील प्लैस्टिक का निर्माण। &lt;br /&gt;
- औरों द्वारा प्रक्षेपित शस्त्रों/अणु-शस्त्रों का शमन करने का तंत्रज्ञान। ...............आदि &lt;br /&gt;
और दूसरी ओर वैकल्पिक विकेंद्रीकरणपर आधारित तन्त्रज्ञान का विकास कर उसे विश्व में प्रतिष्ठित करना। इस प्रकार के तन्त्रज्ञान में निम्न प्रकार के तन्त्रज्ञान होंगे।&lt;br /&gt;
- कौटुम्बिक उद्योगों के लिये, स्थानिक संसाधनों के उपयोग के लिए तन्त्रज्ञान  &lt;br /&gt;
- भिन्न भिन्न कार्यों के लिये पशु-उर्जा के अधिकाधिक उपयोग के लिये तंत्रज्ञान&lt;br /&gt;
- नविकरणीय प्राकृतिक संसाधनों से विविध पदार्थों के निर्माण से आवश्यकताओं की पूर्ति तथा संसाधनों के पुनर्भरण के लिये सरल तन्त्रज्ञान का विकास   &lt;br /&gt;
- मानव की प्राकृतिक क्षमताओं का विकास करनेवाली प्रक्रियाओं का अनुसंधान। ......... आदि &lt;br /&gt;
७.२ अंतर्राष्ट्रीय 	&lt;br /&gt;
७.२.१ मजहबी विस्तारवादी मानसिकता : वर्तमान में यह मुख्यत: ३ प्रकार की है। ईसाई, मुस्लिम और वामपंथी। यह तीनों ही विचारधाराएँ अधूरी हैं, एकांगी हैं। यह तो इन के सम्मुख ‘सर्वे भवन्तु सुखिन:’ को लेकर कोई चुनौती खड़ी नहीं होने से इन्हें विश्व में विस्तार का अवसर मिला है। जैसे ही ‘सर्वे भवन्तु सुखिन:’ का विचार लेकर भारत एक वैश्विक शक्ति के रूप में खड़ा होगा इनके पैरोंतले की जमीन खिसकने लगेगी। &lt;br /&gt;
७.२.२ आसुरी महत्वाकांक्षा : ऊपर जो बताया गया है वह, आसुरी महत्वाकांक्षा रखनेवाली वैश्विक शक्तियों के लिये भी लागू है। आसुरी महत्वाकांक्षाओं को परास्त करने की परंपरा भारत में युगों से रही है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== परिवर्तन के लिये समयबध्द करणीय कार्य ==&lt;br /&gt;
समूचे जीवन के प्रतिमान का परिवर्तन यह एक बहुत बृहद् और जटिल कार्य है। इस के लिये इसे सामाजिक अभियान का रूप देना होगा। समविचारी लोगों को संगठित होकर सहमति से और चरणबध्द पध्दति से प्रक्रिया को आगे बढाना होगा। बड़े पैमानेपर जीवन के हर क्षेत्र में जीवन के भारतीय प्रतिमान की समझ रखनेवाले और कृतीशील ऐसे लोग याने आचार्य निर्माण करने होंगे। परिवर्तन के चरण एक के बाद एक और एक के साथ सभी इस पध्दति से चलेंगे। जैसे दूसरे चरण के काल में ५० प्रतिशत शक्ति और संसाधन दूसरे चरणके निर्धारित विषयपर लगेंगे। और १२.५-१२.५ प्रतिशत शक्ति और संसाधन चरण १, ३, ४ और ५ में प्रत्येकपर लगेंगे।&lt;br /&gt;
१. समविचारी लोगों का ध्रुवीकरण : जिन्हें प्रतिमान के परिवर्तन की आस है और समझ भी है ऐसे समविचारी, सहचित्त लोगों का ध्रुवीकरण करना होगा। उनमें एक व्यापक सहमति निर्माण करनी होगी। अपने अपने कार्यक्षेत्र में क्या करना है इसका स्पष्टीकरण करना होगा।&lt;br /&gt;
२. अभियान के चरण : अभियान को चरणबध्द पध्दति से चलाना होगा। १२ वर्षों के ये पाँच चरण होंगे। ऐसी यह ६० वर्ष की योजना होगी। यह प्रक्रिया तीन पीढीतक चलेगी। तीसरी पीढी में परिवर्तन के फल देखने को मिलेंगे। लेकिन तबतक निष्ठा से और धैर्य से अभियान को चलाना होगा। निरंतर मूल्यांकन करना होगा। राह भटक नहीं जाए इसके लिये चौकन्ना रहना होगा।&lt;br /&gt;
२.१ अध्ययन और अनुसंधान : जीवन का दायरा बहुत व्यापक होता है। अनगिनत विषय इसमें आते हैं। इसलिये प्रतिमान के बदलाव से पहले हमें दोनों प्रतिमानों के विषय में और विशेषत: जीवन के भारतीय प्रतिमान के विषय में बहुत गहराई से अध्ययन करना होगा। मनुष्य की इच्छाओं का दायरा, उनकी पूर्ति के लिये वह क्या क्या कर सकता है आदि का दायरा अति विशाल है। इन दोनों को धर्म के नियंत्रण में ऐसे रखा जाता है इसका भी अध्ययन अनिवार्य है। मनुष्य के व्यक्तित्व को ठीक से समझना, उसके शरीर, मन, बुध्दि, चित्त, अहंकार आदि बातों को समझना, कर्मसिध्दांत को समझना, जन्म जन्मांतर चलने वाली शिक्षा की प्रक्रिया को समझना विविध विषयों के अंगांगी संबंधों को समझना, प्रकृति के रहस्यों को समझना आदि अनेकों ऐसी बातें हैं जिनका अध्ययन हमें करना होगा। इनमें से कई विषयों के संबंध में हमारे पूर्वजों ने विपुल साहित्य निर्माण किया था। उसमें से कितने ही साहित्य को जाने अंजाने में प्रक्षेपित किया गया है। इस प्रक्षिप्त हिस्से को समझ कर अलग निकालना होगा। शुध्द भारतीय तत्वोंपर आधारित ज्ञान को प्राप्त करना होगा। अंग्रेजों ने भारतीय साहित्य, इतिहास के साथ किये खिलवाड, भारतीय समाज में झगडे पैदा करने के लिये निर्मित साहित्य को अलग हटाकर शुध्द भारतीय याने एकात्म भाव की या कौटुम्बिक भाव की जितनी भी प्रस्तुतियाँ हैं उनका अध्ययन करना होगा। मान्यताओं, व्यवहार सूत्रों, संगठन निर्माण और व्यवस्था निर्माण की प्रक्रिया को समझना होगा।     &lt;br /&gt;
२.२ लोकमत परिष्कार : अध्ययन से जो ज्ञान उभरकर सामने आएगा उसे लोगोंतक ले जाना होगा। लोगों का प्रबोधन करना होगा। उन्हें फिर से समग्रता से और एकात्मता से सोचने और व्यवहार करने का तरीका बताना होगा। उन्हें उनकी सामाजिक जिम्मेदारी का समाजधर्म का अहसास करवाना होगा। वर्तमान की परिस्थितियों से सामान्यत: कोई भी खुश नहीं है। लेकिन जीवन का भारतीय प्रतिमान ही  उनकी कल्पना के अच्छे दिनों का वास्तव है यह सब के मन में स्थापित करना होगा।	         &lt;br /&gt;
२.३ संयुक्त कुटुम्ब : कुटुम्ब ही समाजधर्म सीखने की पाठशाला होता है। संयुक्त कुटुम्ब तो वास्तव में समाज का लघुरूप ही होता है। सामाजिक समस्याओं में से लगभग ७० प्रतिशत समस्याओं को तो केवल अच्छा संयुक्त कुटुम्ब ही निर्मूल कर देता है। समाज जीवन के लिये श्रेष्ठ लोगों को जन्म देने का काम, श्रेष्ठ संस्कार देने का काम, अच्छी आदतें डालने काम आजकल की फॅमिली पध्दति नहीं कर सकती। जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में जो तेजस्वी नेतृत्व का अभाव निर्माण हो गया है उसे दूर करना यह भारतीय मान्यताओं के अनुसार चलाए जानेवाले संयुक्त परिवारों में ही हो सकता है। इसलिये समाज का नेतृत्व करेंगे ऐसे श्रेष्ठ बालकों को जन्म देने के प्रयास तीसरे चरण में होंगे।&lt;br /&gt;
२.४ शिक्षक/धर्मज्ञ और शासक निर्माण : समाज परिवर्तन में शिक्षक की और शासक की ऐसे दोनों की भुमिका अत्यंत महत्वपूर्ण होती है। संयुक्त परिवारों में जन्म लिये बच्चों में से अब श्रेष्ठ धर्म के मार्गदर्शक, शिक्षक और शासक निर्माण करने की स्थिति होगी। ऐसे लोगों को समर्थन और सहायता देनेवाले कुटुम्ब और दूसरे चरण में निर्माण किये समाज के परिष्कृत विचारोंवाले सदस्य अब कुछ मात्रा में उपलब्ध होंगे।	   &lt;br /&gt;
२.५ संगठन और व्यवस्थाओं की प्रतिष्ठापना : श्रेष्ठ धर्म के अधिष्ठाता/मार्गदर्शक, सामर्थ्यवान शिक्षक और कुशल शासक अब प्रत्यक्ष संगठन का सशक्तिकरण और व्यवस्थाओं का निर्माण करेंगे।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==References==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;references /&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अन्य स्रोत:&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[Category:Bhartiya Jeevan Pratiman (भारतीय जीवन प्रतिमान)]]&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Dilipkelkar</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://dharmawiki.org/index.php?title=Planning_For_Change_(%E0%A4%AA%E0%A4%B0%E0%A4%BF%E0%A4%B5%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%A4%E0%A4%A8_%E0%A4%95%E0%A5%80_%E0%A4%AF%E0%A5%8B%E0%A4%9C%E0%A4%A8%E0%A4%BE)&amp;diff=119332</id>
		<title>Planning For Change (परिवर्तन की योजना)</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://dharmawiki.org/index.php?title=Planning_For_Change_(%E0%A4%AA%E0%A4%B0%E0%A4%BF%E0%A4%B5%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%A4%E0%A4%A8_%E0%A4%95%E0%A5%80_%E0%A4%AF%E0%A5%8B%E0%A4%9C%E0%A4%A8%E0%A4%BE)&amp;diff=119332"/>
		<updated>2019-05-30T10:33:16Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Dilipkelkar: /* परिवर्तन के लिये समयबध्द करणीय कार्य */&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{One source|date=January 2019}}&lt;br /&gt;
[[Template:Cleanup reorganize Dharmawiki Page]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
परिवर्तन की योजना को समझने के लिए हमें पहले निम्न बातें फिर से स्मरण करनी होंगी ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जीवन के भारतीय प्रतिमान की जानकारी के लिए - &lt;br /&gt;
१. जीवनदृष्टि/व्यवहार : भारतीय जीवनदृष्टि और जीवनशैली के विषय में जानकारी के लिये कृपया अध्याय ७  में देखें। 		&lt;br /&gt;
२. भारतीय जीवन के प्रतिमान के समाज संगठनों की जानकारी हमने अध्याय १३ से २० में प्राप्त की है।&lt;br /&gt;
३. व्यवस्था समूह : व्यवस्था समूह का ढाँचा जीवनदृष्टि से सुसंगत होना चाहिए। कृपया व्यवस्था समूह के ढाँचे के लिये अध्याय २२ में और जानकारी के लिए अध्याय २५ में देखें।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== समस्या मूलों के निराकरण की नीति ==&lt;br /&gt;
समस्या मूल नष्ट करने से तात्पर्य समस्या मूलोंपर आघात से नहीं है। समस्याएँ निर्माण ही नहीं हों ऐसी परिस्थितियों, ऐसे समाज संगठनों और ऐसी व्यवस्थाओं के निर्माण से है। निराकरण की प्रक्रिया के ३ चरण होंगे। समस्याओं को और परिवर्तन के स्वरूप को समझना, निराकरण की नीति तय करना और निराकरण का क्रियान्वयन करना। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== परिवर्तन के स्वरूप को समझना ==&lt;br /&gt;
समस्या का मूल जीवन के प्रतिमान के परिवर्तन में है। प्रतिमान का आधार समाज की जीवनदृष्टि होती है। व्यवहार, संगठन और व्यवस्थाएँ तो जीवनदृष्टि के आधारपर ही तय होते हैं। इसलिये परिवर्तन की प्रक्रिया में जीवनदृष्टि के परिवर्तन की प्रक्रिया को प्राथमिकता देनी होगी। व्यवहार में सुसंगतता आए इसलिये करणीय अकरणीय विवेक को सार्वत्रिक करना होगा। दूसरे क्रमांकपर संगठन और व्यवस्थाओं में परिवर्तन की प्रक्रिया चलेगी। व्यवस्था परिवर्तन की इस प्रक्रिया में समग्रता और एकात्मता के संदर्भ में व्यवस्था विशेष का आधार बनाने के लिये विषय की सैध्दांतिक प्रस्तुति करनी होगी। जैसे शासन व्यवस्था में यदि उचित परिवर्तन करना है तो पहले राजशास्त्र की सैध्दांतिक प्रस्तुति करना आवश्यक है। समृद्धि व्यवस्था में परिवर्तन करने के लिये समृद्धिशास्त्र की सैध्दांतिक प्रस्तुति करनी होगी। इन सैध्दांतिक प्रस्तुतियों को प्रयोग सिध्द करना होगा। प्रयोगों के आधारपर इन प्रस्तुतियों में उचित परिवर्तन करते हुए आगे बढना होगा। यह काम प्राथमिकता से धर्म के जानकारों का है। दूसरे क्रमांक की जिम्मेदारी शिक्षकों की है। शिक्षक वर्ग ही धर्म को सार्वत्रिक करता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== निराकरण की नीति ==&lt;br /&gt;
समस्याएँ इतनी अधिक और पेचिदा हैं कि इनका निराकरण अब संभव नहीं है, ऐसा कई विद्वान 	मानते हैं। हमने जो करणीय और अकरणीय विवेक को समझा है उसके अनुसार कोई भी बात असंभव नहीं होती। ऊपरी तौरपर असंभव लगनेपर भी उसे संभव चरणों में बाँटकर संपन्न किया जा सकता है।&lt;br /&gt;
इस के लिये नीति के तौरपर हमारा व्यवहार निम्न प्रकार का होना चागिये।&lt;br /&gt;
- सबसे पहले तो यह हमेशा ध्यान में रखना कि यह पूरे समाज जीवन के प्रतिमान के परिवर्तन का विषय है। इसे परिवर्तन के लिये कई पीढियों का समय लग सकता है। भारत वर्ष के दीर्घ इतिहास में समाज ने कई बार उत्थान और पतन के दौर अनुभव किये हैं। बारबार भारतीय समाज ने उत्थान किया है। &lt;br /&gt;
- परिवर्तन की प्रक्रिया को संभाव्य चरणों में बाँटना।&lt;br /&gt;
- उसमें आज जो हो सकता है उसे कर डालना।&lt;br /&gt;
- आज जिसे करना कठिन लगता है उसके लिये परिस्थितियाँ बनाते जाना। परिस्थितियाँ बनते ही उसे    करना। &lt;br /&gt;
- प्रारंभ में जबतक परिवर्तन की प्रक्रिया ने गति नहीं पकडी है, यथासंभव कोई विरोध मोल नहीं लेना। &lt;br /&gt;
- इसी प्रकार से एक एक चरण को संभव बनाते हुए आगे बढ़ाते जाना।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== समस्या मूलों का निराकरण ==&lt;br /&gt;
वास्तव में समस्या मूलों को नष्ट करना यह शब्दप्रयोग ठीक नहीं है। उचित प्रतिमान की प्रतिष्ठापना के साथ ही गलत प्रतिमान का अंत अपने आप होता है। जो सर्वहितकारी है, उचित है, श्रेष्ठ है, उसकी प्रतिष्ठापना ही परिवर्तन की प्रक्रिया का स्वरूप होगा। स्वाभाविक जडता के कारण कुछ कठिनाईयाँ तो आएँगी। लेकिन गलत प्रतिमान को नष्ट करने के लिये अलग से शक्ति लगाने की आवश्यकता नहीं है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== समस्या मूल नष्ट करने हेतु धर्म के जानकारों के मार्गदर्शन में शिक्षा की व्याप्ति ==&lt;br /&gt;
१. जीवनदृष्टि की शिक्षा : जीवनदृष्टि की शिक्षा मुख्यत: कामनाओं और कामनाओं की पूर्ति के प्रयास, धन, साधन और संसाधनों को धर्म के दायरे में रखने की शिक्षा ही है। पुरूषार्थ चतुष्टय की या त्रिवर्ग की शिक्षा ही है।&lt;br /&gt;
२. व्यवस्थाएँ : जीवनदृष्टि के अनुसार व्यवहार हो सके इस हेतु से ही व्यवस्थाओं का निर्माण किया जाता है।  व्यवस्थाओं के निर्माण में और उनके क्रियान्वयन में भी जीवनदृष्टि ओतप्रोत रहे इसका ध्यान रखना होगा।&lt;br /&gt;
	 २.१ धर्म व्यवस्था    २.२ शिक्षा व्यवस्था	२.३ शासन व्यवस्था   २.४ समृद्धि व्यवस्था&lt;br /&gt;
३. संगठन : समाज संगठन और समाज की व्यवस्थाएँ एक दूसरे को पूरक पोषक होती हैं। लेकिन धर्म व्यवस्था, शिक्षा व्यवस्था और शासन व्यवस्था के अभाव में संगठन निर्माण करना अत्यंत कठिन हो जाता है। वास्तव में ये दोनों अन्योन्याश्रित होते हैं। समाज संगठन की जानकारी के लिये कृपया अध्याय १२ देखें।&lt;br /&gt;
	३.१ कुटुम्ब 			३.२ स्वभाव समायोजन			३.३ आश्रम			३.४ कौशल विधा		३.५ ग्राम				३.६ राष्ट्र&lt;br /&gt;
४. विज्ञान और तन्त्रज्ञान  : कृपया अध्याय ३९ देखें। &lt;br /&gt;
४.१ विकास और उपयोग नीति		४.२ सार्वत्रिकीकरण&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== परिवर्तन की योजना ==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== परिवर्तन का स्वरूप ===&lt;br /&gt;
वर्तमान स्वार्थपर आधारित जीवन के प्रतिमान के स्थानपर आत्मीयता याने कौटुम्बिक  भावनापर आधारित जीवन के प्रतिमान की प्रतिष्ठापना&lt;br /&gt;
१.१  सर्वे भवन्तु सुखिन:, देशानुकूल और कालानुकूल आदि के संदर्भ में दोनों प्रतिमानों को समझना&lt;br /&gt;
१.२ प्रतिमान का परिवर्तन&lt;br /&gt;
.२.१ सामाजिक व्यवस्थाओं का पुनर्निर्माण&lt;br /&gt;
१.२.२ समाज के संगठनों का परिष्कार/पुनरूत्थान या नवनिर्माण&lt;br /&gt;
१.२.३ तन्त्रज्ञान  का समायोजन / तन्त्रज्ञान  नीति / जीवन की इष्ट गति : वर्तमान में तन्त्रज्ञान  की विकास की गति से जीवन को जो गति प्राप्त हुई है उस के कारण सामान्य मनुष्य घसीटा जा रहा है। पर्यावरण सन्तुलन  और सामाजिकता दाँवपर लग गए हैं। ज्ञान, विज्ञान और तन्त्रज्ञान  ये तीनों बातें पात्र व्यक्ति को ही मिलनी चाहिये। बंदर के हाथ में पलिता नहीं दिया जाता। इस लिये किसी भी तन्त्रज्ञान के सार्वत्रिकीकरण से पहले उसके पर्यावरण, समाजजीवन और व्यक्ति जीवनपर होनेवाले परिणाम जानना आवश्यक है। हानिकारक तंत्रज्ञान का तो विकास भी नहीं करना चाहिये। किया तो वह केवल सुपात्र को ही अंतरित हो यह सुनिश्चित करना चाहिये।&lt;br /&gt;
ऐसी स्थिति में जीवन की इष्ट गति की ओर बढानेवाली तन्त्रज्ञान नीति का स्वीकार करना होगा। इष्ट गति के निकषों के लिये अध्याय ३९ में बताई कसौटि लगानी होगी।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== परिवर्तन की प्रक्रिया ===&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सामाजिक परिवर्तन भौतिक वस्तुओं के परिवर्तन जैसे सरल नहीं होते। भौतिक पदार्थों का एक निश्चित स्वभाव होता है। धर्म होता है। इसे ध्यान में रखकर भौतिक पदार्थों को ढाला जाता है। हर मानव का स्वभाव भिन्न होता है। भिन्न समयपर भी उसमें बदलाव आ सकता है। इसलिये सामाजिक परिवर्तन क्रांति से नहीं उत्क्रांति से ही किये जा सकते हैं। उत्क्रांति की गति धीमी होती है। होनेवाले परिवर्तनों से किसी की हानी नहीं हो या होनेवाली हानी न्यूनतम हो, परिवर्तन स्थाई हों, परिवर्तन से सबको लाभ मिले यह सब देखकर ही प्रक्रिया चलाई जाती है। सामाजिक परिवर्तनों के लिये नई पीढी से प्रारंभ करना यह सबसे अच्छा रास्ता है। लेकिन नई पीढी में व्यापक रूप से परिवर्तन के पहलुओं को स्थापित करने के लिये आवश्यक इतनी पुरानी पीढी के श्रेष्ठ जनों की संख्या आवश्यक है। ऐसे श्रेष्ठ जनों का वर्णन श्रीमद्भगवद्गीता में किया गया है -&lt;br /&gt;
यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जन: ।&lt;br /&gt;
स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते॥ (अध्याय ३ श्लोक २१)&lt;br /&gt;
इसलिये एक दृष्टि से देखा जाए तो यह प्रक्रिया समाज के प्रत्येक व्यक्तितक ले जाने की आवश्यकता नहीं होती। केवल समाज जीवन की सभी विधाओं के श्रेष्ठ लोगों के निर्माण की प्रक्रिया ही परिवर्तन की प्रक्रिया है। एक बार ये लोग निर्माण हो गये तो फिर परिवर्तन तेज याने ज्यामितीय गति से होने लगता है।&lt;br /&gt;
२.१ धीमी लेकिन अविश्रांत : हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि हमें सामाजिक परिवर्तन करना है। समाज एक जीवंत ईकाई होता है। जीवंत ईकाई में परिवर्तन हमेशा धीमी गति से, समग्रता से और अविरत करते रहने से होते हैं। कोई भी शीघ्रता या टुकडों में होनेवाले परिवर्तन हानिकारक होते हैं।&lt;br /&gt;
२.२ सभी क्षेत्रों में एकसाथ : समाज एक जीवंत ईकाई होने के कारण इसके सभी अंग किसी भी बात से एकसाथ प्रभावित होते हैं। प्रभाव का परिमाण कम अधिक होगा लेकिन प्रभाव सभीपर होता ही है। इसलिये परिवर्तन की प्रक्रिया टुकडों में अलग अलग या एक के बाद एक ऐसी नहीं होगी। परिवर्तन की प्रक्रिया धर्म, शिक्षा, शासन, अर्थ, न्याय, समाज संगठन आदि सभी क्षेत्रों में एकसाथ चलेगी। ऐसी प्रक्रिया का प्रारंभ होना बहुत कठिन होता है। लेकिन एकबार सभी क्षेत्रों में प्रारंभ हो जाता है तो फिर यह तेजी से गति प्राप्त कर लेती है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== परिवर्तन के कारक तत्व ===&lt;br /&gt;
३.१ शिक्षा : शिक्षा का दायरा बहुत व्यापक है। शिक्षा जन्म जन्मांतर चलनेवाली प्रक्रिया होती है। इस जन्म में शिक्षा गर्भधारणा से मृत्यूपर्यंत चलती है। आयु की अवस्था के अनुसार शिक्षा का स्वरूप बदलता है। &lt;br /&gt;
३.१.२ कुटुम्ब में शिक्षा : कुटुम्ब में शिक्षा का प्रारंभ गर्भधारणा से होता है। मनुष्य की ६०-७० प्रतिशत घडन तो कुटुम्ब में ही होती है। कुटुम्ब में रहकर वह कई बातें सीखता है। कौटुम्बिक भावना, कर्तव्य, सदाचार आदि की शिक्षा कुटुम्ब की ही जिम्मेदारी होती है। व्यवस्थाओं के साथ समायोजन, व्यवस्थाओं के स्वरूप आदि भी वह कुटुम्ब में ही अपने ज्येष्ठों से सीखता है। इंद्रियों के विकास की शिक्षा, व्यावसायिक कौशल भी वह कुटुम्ब में ही सीखता है। कुटुम्ब सामाजिकता की पाठशाला ही होता है। बडों का आदर, स्त्री का आदर आदि भी कुटुम्ब ही सिखाता है। &lt;br /&gt;
३.१.२ कुटुम्ब की शिक्षा : उसी प्रकार से कुटुम्ब के बारे में भी वह कई बातें सीखता है। उसकी व्यक्तिगत, कौटुम्बिक और सामाजिक आदतें बचपन में ही आकार लेतीं हैं। कुटुम्ब का महत्व, समाज में कौटुम्बिक भावना का महत्व, कौटुम्बिक व्यवस्थाओं का महत्व वह कुटुम्ब में सीखता है। भिन्न भिन्न स्वभावों के लोग एक छत के नीचे आत्मीयता से कैसे रहते हैं यह वह कुटुम्ब से ही सीखता है। लगभग सभी प्रकार से कुटुंब यह समाज का लघुरूप ही होता है। कुटुंब यह सामाजिकता की पाठशाला होती है।&lt;br /&gt;
३.१.३ विद्याकेन्द्र शिक्षा	: विद्याकेन्द्र की शिक्षा शास्त्रीय शिक्षा होती है। कुटुम्ब में सीखे हुए सदाचार के शास्त्रीय पक्ष को समझाने के लिये होती है। कुटुंब में सीखे हुए व्यावसायिक कौशलों को पैना बनाने के लिये होती है। कुटुंब में आत्मसात की हुई श्रेष्ठ परम्पराओं को अधिक उज्वल बनाने के तरीके सीखने के लिए होती है। अध्ययन का और कौशल का शास्त्रीय तरीका सिखने के लिये, अध्ययन को तेजस्वी बनाने के लिये होती है।&lt;br /&gt;
३.१.४ लोकशिक्षा : लोकशिक्षा भी समाज जीवन का एक आवश्यक पहलू है। विद्याकेन्द्र की शिक्षा के उपरान्त भी मनुष्य का मन कई बार भ्रमित हो जाता हाय, बुद्धि कुण्ठित हो जाती है। ऐसी स्थिति में लोकशिक्षा की व्यवस्था इस संभ्रम को, इस कुण्ठा को दूर करती है।&lt;br /&gt;
३.१.५ परंपरा निर्माण : अपने से अधिक श्रेष्ठ विरासत निर्माण करने की निरंतरता को श्रेष्ठ परंपरा कहते हैं। श्रेष्ठ परंपराओं के निर्माण की तीव्र इच्छा और पैने प्रयास समाज को श्रेष्ठ और चिरंजीवी बनाते हैं।&lt;br /&gt;
३.२ शासन 	&lt;br /&gt;
३.२.१ धर्मनिष्ठता : शासक धर्मशास्त्र के जानकार हों। धर्मशास्त्र के पालनकर्ता हों। धर्मशास्त्र के नियमों का प्रजा से अनुपालन करवाने में कुशल हों।	&lt;br /&gt;
३.२.२ धर्म व्यवस्था के साथ समायोजन : सदैव धर्म के जानकारों से अपना मूल्यांकन करवाएँ। धर्म के जानकारों की सूचनाओं का अनुपालन करें। अधर्म होने से प्रायश्चित्त और पश्चात्ताप के लिये उद्यत रहें।&lt;br /&gt;
३.३ धर्म नेतृत्व&lt;br /&gt;
३.३.१ धर्म के मार्गदर्शक : किसी का केवल धर्मशास्त्र का विशेषज्ञ होना पर्याप्त नहीं है। नि:स्वार्थ भाव, निर्भयता भी श्रेष्ठ धर्म के मार्गदर्शकों के लक्षण हैं।&lt;br /&gt;
३.३.२ धर्माचरणी : धर्म का मार्गदर्शन करनेवाले लोग अपने व्यवहार में भी धर्मयुक्त होना चाहिये।&lt;br /&gt;
३.३.३ विजीगिषु स्वभाववाले : धर्म का मार्गदर्शन करनेवाले लोगों के लिये विजीगिषु स्वभाव का होना आवश्यक है। कोई भी संकट आनेपर डगमगाएँ नहीं यह धर्म के मार्गदर्शकों के लिये आवश्यक है।&lt;br /&gt;
धर्मं के जानकारों का सबसे पहला कर्तव्य है कि वे वर्तमान काल के लिए धर्मशास्त्र या स्मृति की प्रस्तुति करें। यह स्मृति जीवन के सभी पहलुओं को व्यापनेवाली हो। इसकी व्यापकता को समझने की दृष्टि से एक रूपरेखा नीचे दे रहे हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== धर्मशास्त्र प्रस्तुति के लिये बिन्दु ==&lt;br /&gt;
() धर्म की व्याख्याएँ / धर्म की व्याप्ति / त्रिवर्ग की व्याप्ति : सर्वे भवन्तु सुखिन: लक्ष्य हेतु धर्म : संस्कृति &lt;br /&gt;
() व्यापक धर्मशास्त्र के प्रस्तुति की आवश्यकता: * पूर्व धर्मशास्त्रों की व्यापकता(?)  	* व्यापकता की आवश्यकता &lt;br /&gt;
() व्यक्तिगत धर्म / पञ्चविध (कोष) पुरुष धर्म / चतुर्विध पुरूषार्थ /स्वधर्म (वर्णधर्म)&lt;br /&gt;
शरीरधर्म 	२. मन-धर्म 	३. बुद्धि-धर्म 	४. चित्त-धर्म &lt;br /&gt;
() सामाजिक संबंधों में धर्म &lt;br /&gt;
व्यक्ति-व्यक्ति  : पुरूष-पुरूष या स्त्री-स्त्री 			१.१ पारिवारिक रिश्ते 	१.२ पड़ोसी 		१.३ अतिथि  	१.४ शत्रु/विरोधक 		१.५ मित्र/सहायक 	१.६ सहकारी 		१.७ अपरिचित 	१.८ मालिक/नौकर 		१.९ चरित्रहीन स्त्री/पुरूष 	१.१० व्यसनी 		१,११ जरूरतमंद 	१.१२ समव्यवसायी 		१.१३ भिन्न व्यवसायी 	१.१४ याचक 		१.१५ भिन्न भाषी १.१६ विक्रेता\क्रेता    		१.१७ भिन्न राष्ट्रीय &lt;br /&gt;
व्यक्ति-व्यक्ति : पुरूष-स्त्री 				१.१ पारिवारिक रिश्ते 	१.२ पड़ोसी 		१.३ अतिथि  	१.४ शत्रु/विरोधक 		१.५ मित्र/सहायक 	१.६ सहकारी 		१.७ अपरिचित 	१.८ मालिक/नौकर 		१.९ चरित्रहीन स्त्री/पुरूष 	१.१० व्यसनी 		१,११ जरूरतमंद 	१.१२ समव्यवसायी 		१.१३ भिन्न व्यवसायी 	१.१४ याचक 		१.१५ भिन्न भाषी १.१६ विक्रेता\क्रेता    		१.१७ भिन्न राष्ट्रीय &lt;br /&gt;
व्यक्ति-समाज :		३.१ व्यक्ति-परिवार 	३.२ व्यति-जाति 		३.३ पड़ोसी 			३.४ सामाजिक संगठन  	३.५ व्यक्ति-व्यवस्था 	३.६ व्यक्ति-राष्ट्र 		३.७ व्यक्ति-विश्व समाज 		३.८ व्यक्ति भिन्न भाषी 	३.९ परप्रांतीय 		३.१० परदेसी &lt;br /&gt;
समाज-समाज : 	४.१ अंतर्राष्ट्रीय : ४.१.१ शत्रु 	४.१.२ मित्र 	४.१.३ तटस्थ 		&lt;br /&gt;
४.२ अंतर्देशीय	४.१.१ प्रांत-प्रांत 	४.१.२ जनपद-जनपद 	४.१.३ भाषिक समूह  	४.१.४ पंथ समूह  	४.१.५ राष्ट्रीय समूह 	४.१.६ अराष्ट्रीय समूह 		४.१.७ राष्ट्रद्रोही समूह 	४.१.८ विदेशी 		४.१.९ समव्यवासायी  	४.१.१० जाति-जाति 		४.१.११ परिवार परिवार &lt;br /&gt;
()  सृष्टिगत सम्बन्धों में धर्म  &lt;br /&gt;
	१. मनुष्य-अन्य जीव :													१.१ मनुष्य-पालतू प्राणी :  १.१.१ शाकाहारी 	१.१.२ मांसाहारी 								१.२ मनुष्य अन्य प्राणी : 	१.२.१ थलचर : 	१.२.१.१ शाकाहारी 	१.२.१.२ मांसाहारी 							१.२.२ जलचर 		और 		१.२.३ नभचर 	&lt;br /&gt;
१.३ मनुष्य-वनस्पति : 	१.३.१ जमीन के नीचे 	१.३.२ जमीन के ऊपर 	१.३.३ वनस्पति/औषधी 					१.३.४ खानेयोग्य/अन्न 	१.३.५ अखाद्य/जहरीली 	१.३.६ नशीली		१.४ मनुष्य-कृमि/कीटक/सूक्ष्म जीव 		१.४.१ सहायक 		१.४.२ हानिकारक	      २. मनुष्य-जड़ प्रकृति / पंचमहाभूत 									२.१ अनवीकरणीय/खनिज 	२.१.१ ठोस 	२.१.२ द्रव 	२.१.३ वायु (इंधन)  		२.२ नवीकरणीय 	: २.२.१ वायु/हवा 	२.२.२ जल 	२.२.३ सूर्यप्रकाश 		२.२.४ लकड़ी&lt;br /&gt;
() आपद्धर्म :	१. प्राकृतिक आपदा 		२. मानव निर्मित आपदा (लगभग उपर्युक्त सभी विषयों में)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== परिवर्तन के पुरोधा ==&lt;br /&gt;
उपर्युक्त बिन्दु २ में बताए गए श्रेष्ठ जन ही परिवर्तन के पुरोधा होंगे। इनका प्रमाण समाज में मुष्किल से ५-७ प्रतिशत ही पर्याप्त होता है। ऐसे श्रेष्ठ जनों में निम्न वर्ग के लोग आते हैं।	&lt;br /&gt;
४.१ शिक्षक : शिक्षक ज्ञानी, त्यागी, कुशल, समाज हित के लिए समर्पित, धर्म का जानकार, समाज को घडने की सामर्थ्य रखनेवाला होता है। नई पीढी जो परिवर्तन का अधिक सहजता से स्वीकार कर सकती है उसको घडना शिक्षक का काम होता है। इसलिये परिवर्तन की प्रक्रिया का मुख्य पुरोधा शिक्षक ही होता है।	&lt;br /&gt;
४.२ श्रेष्ठ जन :यहाँ श्रेष्ठ जनों से मतलब भिन्न भिन्न सामाजिक गतिविधियों में जो अग्रणी लोग हैं उनसे है।	&lt;br /&gt;
४.३ सांप्रदायिक संगठनों के प्रमुख : आजकल समाज का एक बहुत बडा वर्ग जिसमें शिक्षित वर्ग भी है, भिन्न भिन्न संप्रदायों से जुडा है। उन संप्रदायों के प्रमुख भी इस परिवर्तन की प्रक्रिया का एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण हिस्सा बनने की शक्ति रखते हैं।	&lt;br /&gt;
४.४ लोकशिक्षा के माध्यम : कीर्तनकार, कथाकार, प्रवचनकार, नाटक मंडलि, पुरोहित या उपाध्याय, साधू, बैरागी, सिंहस्थ या कुंभ जैसे मेले, यात्राएँ आदि लोकशिक्षा के माध्यम हुआ करते थे। वर्तमान में ये सब कमजोर और दिशाहीन हो गए हैं। एक ओर इनमें से जिनको पुनर्जीवित कर सकते हैं उन्हें करना। नए आयाम भी जोडे जा सकते हैं। जैसे अभी लगभग देढ दशक पूर्व महाराष्ट्र में प्रारंभ हुई नव-वर्ष स्वागत यात्राएँ आदि।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== अंतर्निहित सुधार व्यवस्था ==&lt;br /&gt;
काल के प्रवाह में समाज में हो रहे परिवर्तन और मनुष्य की स्खलनशीलता के कारण बढनेवाला अधर्माचरण ये दो बातें ऐसीं हैं जो किसी भी श्रेष्ठतम समाज को भी नष्ट कर देतीं हैं। इस दृष्टि से जागरूक ऐसे शिक्षक और धर्म के मार्गदर्शक साथ में मिलकर समाज की अंतर्निहित सुधार व्यवस्था बनाते हैं। अपनी संवेदनशीलता और समाज के निरंतर बारीकी से हो रहे अध्ययन के कारण इन्हें संकटों का पूर्वानुमान हो जाता है। अपने निरीक्षणों के आधारपर अपने लोकसंग्रही स्वभाव से ये लोगों को भी संकटों से ऊपर उठने के लिये तैयार करते हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== परिवर्तन की नीति ==&lt;br /&gt;
प्रारंभ में विरोध को आमंत्रण नहीं देना। संघर्ष में शक्ति का अपव्यय नहीं करना। जो आज कर सकते हैं उसे करते जाना। जो कल करने की आवश्यकता है उस के लिये परिस्थिति निर्माण करना। परिस्थिति के निर्माण होते ही आगे बढना।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== परिवर्तन में अवरोध और उनका निराकरण ==&lt;br /&gt;
शासनाधिष्ठित समाज में स्वार्थ के आधारपर परिवर्तन सरल और तेज गति से होता है। हिटलरने १५-२० वर्षों में ही जर्मनी को एक समर्थ राष्ट्र के रूप में खड़ा कर दिया था। लेकिन धर्म पर आधारित जीवन के प्रतिमान में परिवर्तन की गति धीमी और मार्ग कठिन होता है। स्थाई परिवर्तन और वह भी कौटुम्बिक भावना के आधारपर, तो धीरे धीरे ही होता है। &lt;br /&gt;
७.१ अंतर्देशीय 	&lt;br /&gt;
७.१.१ मानवीय जड़ता : परिवर्तन का आनंद से स्वागत करनेवाले लोग समाज में अल्पसंख्य ही होते हैं। सामान्यत: युवा वर्ग ही परिवर्तन के लिए तैयार होता है। इसलिए युवा वर्ग को इस परिवर्तन की प्रक्रिया में सहभागी बनाना होगा। परिवर्तन की प्रक्रिया में युवाओं को सम्मिलित करते जाने से दो तीन पीढ़ियों में परिवर्तन का चक्र गतिमान हो जाएगा।&lt;br /&gt;
७.१.२ विपरीत शिक्षा : जैसे जैसे भारतीय शिक्षा का विस्तार समाज में होगा वर्तमान की विपरीत शिक्षा का अपने आप ही क्रमश: लोप होगा।	   &lt;br /&gt;
७.१.३ मजहबी मानसिकता : भारतीय याने धर्म की शिक्षा के उदय और विस्तार के साथ ही मजहबी शिक्षा और उसका प्रभाव भी शनै: शनै: घटता जाएगा। मजहबों की वास्तविकता को भी उजागर करना आवश्यक है। &lt;br /&gt;
७.१.४ धर्म के ठेकेदार : जैसे जैसे धर्म के जानकार और धर्म के अनुसार आचरण करनेवाले लोग समाज में दिखने लगेंगे, धर्म के तथाकथित ठेकेदारों का प्रभाव कम होता जाएगा। &lt;br /&gt;
७.१.५ शासन तंत्र : इस परिवर्तन की प्रक्रिया में धर्म के जानकारों के बाद शासन की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण होगी। धर्माचरणी लोगों को समर्थन, सहायता और संरक्षण देने का काम शासन को करना होगा। इस के लिए शासक भी धर्म का जानकार और धर्मनिष्ठ हो, यह भी आवश्यक है। धर्म के जानकारों को यह सुनिश्चित करना होगा की शासक धर्माचरण करनेवाले और धर्म के जानकर हों।&lt;br /&gt;
७.१.६ जीवन का अभारतीय प्रतिमान : जीवन के सभी क्षेत्रों में एकसाथ जीवन के प्रतिमान के परिवर्तन की प्रक्रिया को चलाना यह धर्म के जानकारों की जिम्मेदारी होगी। शिक्षा की भूमिका इसमें सबसे महत्वपूर्ण होगी। शिक्षा के माध्यम से समूचे जीवन के भारतीय प्रतिमान की रुपरेखा और प्रक्रिया को समाजव्यापी बनाना होगा। धर्मं-शरण शासन इसमें सहायता करेगा।&lt;br /&gt;
७.१.७ तन्त्रज्ञान  समायोजन : तन्त्रज्ञान के क्षेत्र में भारत के सामने दोहरी चुनौती होगी। एक ओर तो विश्व में जो तन्त्रज्ञान के विकास की होड़ लगी है उसमें अपनी विशेषताओं के साथ अग्रणी रहना। इस दृष्टि से विकास हेतु कुछ तन्त्रज्ञान निम्न हो सकते हैं।&lt;br /&gt;
- शून्य प्रदुषण रासायनिक उद्योग।&lt;br /&gt;
- सस्ती सौर उर्जा।&lt;br /&gt;
- प्रकृति में सहजता से घुलनशील प्लैस्टिक का निर्माण। &lt;br /&gt;
- औरों द्वारा प्रक्षेपित शस्त्रों/अणु-शस्त्रों का शमन करने का तंत्रज्ञान। ...............आदि &lt;br /&gt;
और दूसरी ओर वैकल्पिक विकेंद्रीकरणपर आधारित तन्त्रज्ञान का विकास कर उसे विश्व में प्रतिष्ठित करना। इस प्रकार के तन्त्रज्ञान में निम्न प्रकार के तन्त्रज्ञान होंगे।&lt;br /&gt;
- कौटुम्बिक उद्योगों के लिये, स्थानिक संसाधनों के उपयोग के लिए तन्त्रज्ञान  &lt;br /&gt;
- भिन्न भिन्न कार्यों के लिये पशु-उर्जा के अधिकाधिक उपयोग के लिये तंत्रज्ञान&lt;br /&gt;
- नविकरणीय प्राकृतिक संसाधनों से विविध पदार्थों के निर्माण से आवश्यकताओं की पूर्ति तथा संसाधनों के पुनर्भरण के लिये सरल तन्त्रज्ञान का विकास   &lt;br /&gt;
- मानव की प्राकृतिक क्षमताओं का विकास करनेवाली प्रक्रियाओं का अनुसंधान। ......... आदि &lt;br /&gt;
७.२ अंतर्राष्ट्रीय 	&lt;br /&gt;
७.२.१ मजहबी विस्तारवादी मानसिकता : वर्तमान में यह मुख्यत: ३ प्रकार की है। ईसाई, मुस्लिम और वामपंथी। यह तीनों ही विचारधाराएँ अधूरी हैं, एकांगी हैं। यह तो इन के सम्मुख ‘सर्वे भवन्तु सुखिन:’ को लेकर कोई चुनौती खड़ी नहीं होने से इन्हें विश्व में विस्तार का अवसर मिला है। जैसे ही ‘सर्वे भवन्तु सुखिन:’ का विचार लेकर भारत एक वैश्विक शक्ति के रूप में खड़ा होगा इनके पैरोंतले की जमीन खिसकने लगेगी। &lt;br /&gt;
७.२.२ आसुरी महत्वाकांक्षा : ऊपर जो बताया गया है वह, आसुरी महत्वाकांक्षा रखनेवाली वैश्विक शक्तियों के लिये भी लागू है। आसुरी महत्वाकांक्षाओं को परास्त करने की परंपरा भारत में युगों से रही है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== परिवर्तन के लिये समयबध्द करणीय कार्य ==&lt;br /&gt;
समूचे जीवन के प्रतिमान का परिवर्तन यह एक बहुत बृहद् और जटिल कार्य है। इस के लिये इसे सामाजिक अभियान का रूप देना होगा। समविचारी लोगों को संगठित होकर सहमति से और चरणबध्द पध्दति से प्रक्रिया को आगे बढाना होगा। बड़े पैमानेपर जीवन के हर क्षेत्र में जीवन के भारतीय प्रतिमान की समझ रखनेवाले और कृतीशील ऐसे लोग याने आचार्य निर्माण करने होंगे। परिवर्तन के चरण एक के बाद एक और एक के साथ सभी इस पध्दति से चलेंगे। जैसे दूसरे चरण के काल में ५० प्रतिशत शक्ति और संसाधन दूसरे चरणके निर्धारित विषयपर लगेंगे। और १२.५-१२.५ प्रतिशत शक्ति और संसाधन चरण १, ३, ४ और ५ में प्रत्येकपर लगेंगे।&lt;br /&gt;
१. समविचारी लोगों का ध्रुवीकरण : जिन्हें प्रतिमान के परिवर्तन की आस है और समझ भी है ऐसे समविचारी, सहचित्त लोगों का ध्रुवीकरण करना होगा। उनमें एक व्यापक सहमति निर्माण करनी होगी। अपने अपने कार्यक्षेत्र में क्या करना है इसका स्पष्टीकरण करना होगा।&lt;br /&gt;
२. अभियान के चरण : अभियान को चरणबध्द पध्दति से चलाना होगा। १२ वर्षों के ये पाँच चरण होंगे। ऐसी यह ६० वर्ष की योजना होगी। यह प्रक्रिया तीन पीढीतक चलेगी। तीसरी पीढी में परिवर्तन के फल देखने को मिलेंगे। लेकिन तबतक निष्ठा से और धैर्य से अभियान को चलाना होगा। निरंतर मूल्यांकन करना होगा। राह भटक नहीं जाए इसके लिये चौकन्ना रहना होगा।&lt;br /&gt;
२.१ अध्ययन और अनुसंधान : जीवन का दायरा बहुत व्यापक होता है। अनगिनत विषय इसमें आते हैं। इसलिये प्रतिमान के बदलाव से पहले हमें दोनों प्रतिमानों के विषय में और विशेषत: जीवन के भारतीय प्रतिमान के विषय में बहुत गहराई से अध्ययन करना होगा। मनुष्य की इच्छाओं का दायरा, उनकी पूर्ति के लिये वह क्या क्या कर सकता है आदि का दायरा अति विशाल है। इन दोनों को धर्म के नियंत्रण में ऐसे रखा जाता है इसका भी अध्ययन अनिवार्य है। मनुष्य के व्यक्तित्व को ठीक से समझना, उसके शरीर, मन, बुध्दि, चित्त, अहंकार आदि बातों को समझना, कर्मसिध्दांत को समझना, जन्म जन्मांतर चलने वाली शिक्षा की प्रक्रिया को समझना विविध विषयों के अंगांगी संबंधों को समझना, प्रकृति के रहस्यों को समझना आदि अनेकों ऐसी बातें हैं जिनका अध्ययन हमें करना होगा। इनमें से कई विषयों के संबंध में हमारे पूर्वजों ने विपुल साहित्य निर्माण किया था। उसमें से कितने ही साहित्य को जाने अंजाने में प्रक्षेपित किया गया है। इस प्रक्षिप्त हिस्से को समझ कर अलग निकालना होगा। शुध्द भारतीय तत्वोंपर आधारित ज्ञान को प्राप्त करना होगा। अंग्रेजों ने भारतीय साहित्य, इतिहास के साथ किये खिलवाड, भारतीय समाज में झगडे पैदा करने के लिये निर्मित साहित्य को अलग हटाकर शुध्द भारतीय याने एकात्म भाव की या कौटुम्बिक भाव की जितनी भी प्रस्तुतियाँ हैं उनका अध्ययन करना होगा। मान्यताओं, व्यवहार सूत्रों, संगठन निर्माण और व्यवस्था निर्माण की प्रक्रिया को समझना होगा।     &lt;br /&gt;
२.२ लोकमत परिष्कार : अध्ययन से जो ज्ञान उभरकर सामने आएगा उसे लोगोंतक ले जाना होगा। लोगों का प्रबोधन करना होगा। उन्हें फिर से समग्रता से और एकात्मता से सोचने और व्यवहार करने का तरीका बताना होगा। उन्हें उनकी सामाजिक जिम्मेदारी का समाजधर्म का अहसास करवाना होगा। वर्तमान की परिस्थितियों से सामान्यत: कोई भी खुश नहीं है। लेकिन जीवन का भारतीय प्रतिमान ही  उनकी कल्पना के अच्छे दिनों का वास्तव है यह सब के मन में स्थापित करना होगा।	         &lt;br /&gt;
२.३ संयुक्त कुटुम्ब : कुटुम्ब ही समाजधर्म सीखने की पाठशाला होता है। संयुक्त कुटुम्ब तो वास्तव में समाज का लघुरूप ही होता है। सामाजिक समस्याओं में से लगभग ७० प्रतिशत समस्याओं को तो केवल अच्छा संयुक्त कुटुम्ब ही निर्मूल कर देता है। समाज जीवन के लिये श्रेष्ठ लोगों को जन्म देने का काम, श्रेष्ठ संस्कार देने का काम, अच्छी आदतें डालने काम आजकल की फॅमिली पध्दति नहीं कर सकती। जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में जो तेजस्वी नेतृत्व का अभाव निर्माण हो गया है उसे दूर करना यह भारतीय मान्यताओं के अनुसार चलाए जानेवाले संयुक्त परिवारों में ही हो सकता है। इसलिये समाज का नेतृत्व करेंगे ऐसे श्रेष्ठ बालकों को जन्म देने के प्रयास तीसरे चरण में होंगे।&lt;br /&gt;
२.४ शिक्षक/धर्मज्ञ और शासक निर्माण : समाज परिवर्तन में शिक्षक की और शासक की ऐसे दोनों की भुमिका अत्यंत महत्वपूर्ण होती है। संयुक्त परिवारों में जन्म लिये बच्चों में से अब श्रेष्ठ धर्म के मार्गदर्शक, शिक्षक और शासक निर्माण करने की स्थिति होगी। ऐसे लोगों को समर्थन और सहायता देनेवाले कुटुम्ब और दूसरे चरण में निर्माण किये समाज के परिष्कृत विचारोंवाले सदस्य अब कुछ मात्रा में उपलब्ध होंगे।	   &lt;br /&gt;
२.५ संगठन और व्यवस्थाओं की प्रतिष्ठापना : श्रेष्ठ धर्म के अधिष्ठाता/मार्गदर्शक, सामर्थ्यवान शिक्षक और कुशल शासक अब प्रत्यक्ष संगठन का सशक्तिकरण और व्यवस्थाओं का निर्माण करेंगे।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==References==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;references /&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अन्य स्रोत:&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[Category:Bhartiya Jeevan Pratiman (भारतीय जीवन प्रतिमान)]]&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Dilipkelkar</name></author>
	</entry>
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		<title>Planning For Change (परिवर्तन की योजना)</title>
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		<updated>2019-05-30T10:33:01Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Dilipkelkar: /* परिवर्तन में अवरोध और उनका निराकरण */&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{One source|date=January 2019}}&lt;br /&gt;
[[Template:Cleanup reorganize Dharmawiki Page]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
परिवर्तन की योजना को समझने के लिए हमें पहले निम्न बातें फिर से स्मरण करनी होंगी ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जीवन के भारतीय प्रतिमान की जानकारी के लिए - &lt;br /&gt;
१. जीवनदृष्टि/व्यवहार : भारतीय जीवनदृष्टि और जीवनशैली के विषय में जानकारी के लिये कृपया अध्याय ७  में देखें। 		&lt;br /&gt;
२. भारतीय जीवन के प्रतिमान के समाज संगठनों की जानकारी हमने अध्याय १३ से २० में प्राप्त की है।&lt;br /&gt;
३. व्यवस्था समूह : व्यवस्था समूह का ढाँचा जीवनदृष्टि से सुसंगत होना चाहिए। कृपया व्यवस्था समूह के ढाँचे के लिये अध्याय २२ में और जानकारी के लिए अध्याय २५ में देखें।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== समस्या मूलों के निराकरण की नीति ==&lt;br /&gt;
समस्या मूल नष्ट करने से तात्पर्य समस्या मूलोंपर आघात से नहीं है। समस्याएँ निर्माण ही नहीं हों ऐसी परिस्थितियों, ऐसे समाज संगठनों और ऐसी व्यवस्थाओं के निर्माण से है। निराकरण की प्रक्रिया के ३ चरण होंगे। समस्याओं को और परिवर्तन के स्वरूप को समझना, निराकरण की नीति तय करना और निराकरण का क्रियान्वयन करना। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== परिवर्तन के स्वरूप को समझना ==&lt;br /&gt;
समस्या का मूल जीवन के प्रतिमान के परिवर्तन में है। प्रतिमान का आधार समाज की जीवनदृष्टि होती है। व्यवहार, संगठन और व्यवस्थाएँ तो जीवनदृष्टि के आधारपर ही तय होते हैं। इसलिये परिवर्तन की प्रक्रिया में जीवनदृष्टि के परिवर्तन की प्रक्रिया को प्राथमिकता देनी होगी। व्यवहार में सुसंगतता आए इसलिये करणीय अकरणीय विवेक को सार्वत्रिक करना होगा। दूसरे क्रमांकपर संगठन और व्यवस्थाओं में परिवर्तन की प्रक्रिया चलेगी। व्यवस्था परिवर्तन की इस प्रक्रिया में समग्रता और एकात्मता के संदर्भ में व्यवस्था विशेष का आधार बनाने के लिये विषय की सैध्दांतिक प्रस्तुति करनी होगी। जैसे शासन व्यवस्था में यदि उचित परिवर्तन करना है तो पहले राजशास्त्र की सैध्दांतिक प्रस्तुति करना आवश्यक है। समृद्धि व्यवस्था में परिवर्तन करने के लिये समृद्धिशास्त्र की सैध्दांतिक प्रस्तुति करनी होगी। इन सैध्दांतिक प्रस्तुतियों को प्रयोग सिध्द करना होगा। प्रयोगों के आधारपर इन प्रस्तुतियों में उचित परिवर्तन करते हुए आगे बढना होगा। यह काम प्राथमिकता से धर्म के जानकारों का है। दूसरे क्रमांक की जिम्मेदारी शिक्षकों की है। शिक्षक वर्ग ही धर्म को सार्वत्रिक करता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== निराकरण की नीति ==&lt;br /&gt;
समस्याएँ इतनी अधिक और पेचिदा हैं कि इनका निराकरण अब संभव नहीं है, ऐसा कई विद्वान 	मानते हैं। हमने जो करणीय और अकरणीय विवेक को समझा है उसके अनुसार कोई भी बात असंभव नहीं होती। ऊपरी तौरपर असंभव लगनेपर भी उसे संभव चरणों में बाँटकर संपन्न किया जा सकता है।&lt;br /&gt;
इस के लिये नीति के तौरपर हमारा व्यवहार निम्न प्रकार का होना चागिये।&lt;br /&gt;
- सबसे पहले तो यह हमेशा ध्यान में रखना कि यह पूरे समाज जीवन के प्रतिमान के परिवर्तन का विषय है। इसे परिवर्तन के लिये कई पीढियों का समय लग सकता है। भारत वर्ष के दीर्घ इतिहास में समाज ने कई बार उत्थान और पतन के दौर अनुभव किये हैं। बारबार भारतीय समाज ने उत्थान किया है। &lt;br /&gt;
- परिवर्तन की प्रक्रिया को संभाव्य चरणों में बाँटना।&lt;br /&gt;
- उसमें आज जो हो सकता है उसे कर डालना।&lt;br /&gt;
- आज जिसे करना कठिन लगता है उसके लिये परिस्थितियाँ बनाते जाना। परिस्थितियाँ बनते ही उसे    करना। &lt;br /&gt;
- प्रारंभ में जबतक परिवर्तन की प्रक्रिया ने गति नहीं पकडी है, यथासंभव कोई विरोध मोल नहीं लेना। &lt;br /&gt;
- इसी प्रकार से एक एक चरण को संभव बनाते हुए आगे बढ़ाते जाना।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== समस्या मूलों का निराकरण ==&lt;br /&gt;
वास्तव में समस्या मूलों को नष्ट करना यह शब्दप्रयोग ठीक नहीं है। उचित प्रतिमान की प्रतिष्ठापना के साथ ही गलत प्रतिमान का अंत अपने आप होता है। जो सर्वहितकारी है, उचित है, श्रेष्ठ है, उसकी प्रतिष्ठापना ही परिवर्तन की प्रक्रिया का स्वरूप होगा। स्वाभाविक जडता के कारण कुछ कठिनाईयाँ तो आएँगी। लेकिन गलत प्रतिमान को नष्ट करने के लिये अलग से शक्ति लगाने की आवश्यकता नहीं है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== समस्या मूल नष्ट करने हेतु धर्म के जानकारों के मार्गदर्शन में शिक्षा की व्याप्ति ==&lt;br /&gt;
१. जीवनदृष्टि की शिक्षा : जीवनदृष्टि की शिक्षा मुख्यत: कामनाओं और कामनाओं की पूर्ति के प्रयास, धन, साधन और संसाधनों को धर्म के दायरे में रखने की शिक्षा ही है। पुरूषार्थ चतुष्टय की या त्रिवर्ग की शिक्षा ही है।&lt;br /&gt;
२. व्यवस्थाएँ : जीवनदृष्टि के अनुसार व्यवहार हो सके इस हेतु से ही व्यवस्थाओं का निर्माण किया जाता है।  व्यवस्थाओं के निर्माण में और उनके क्रियान्वयन में भी जीवनदृष्टि ओतप्रोत रहे इसका ध्यान रखना होगा।&lt;br /&gt;
	 २.१ धर्म व्यवस्था    २.२ शिक्षा व्यवस्था	२.३ शासन व्यवस्था   २.४ समृद्धि व्यवस्था&lt;br /&gt;
३. संगठन : समाज संगठन और समाज की व्यवस्थाएँ एक दूसरे को पूरक पोषक होती हैं। लेकिन धर्म व्यवस्था, शिक्षा व्यवस्था और शासन व्यवस्था के अभाव में संगठन निर्माण करना अत्यंत कठिन हो जाता है। वास्तव में ये दोनों अन्योन्याश्रित होते हैं। समाज संगठन की जानकारी के लिये कृपया अध्याय १२ देखें।&lt;br /&gt;
	३.१ कुटुम्ब 			३.२ स्वभाव समायोजन			३.३ आश्रम			३.४ कौशल विधा		३.५ ग्राम				३.६ राष्ट्र&lt;br /&gt;
४. विज्ञान और तन्त्रज्ञान  : कृपया अध्याय ३९ देखें। &lt;br /&gt;
४.१ विकास और उपयोग नीति		४.२ सार्वत्रिकीकरण&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== परिवर्तन की योजना ==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== परिवर्तन का स्वरूप ===&lt;br /&gt;
वर्तमान स्वार्थपर आधारित जीवन के प्रतिमान के स्थानपर आत्मीयता याने कौटुम्बिक  भावनापर आधारित जीवन के प्रतिमान की प्रतिष्ठापना&lt;br /&gt;
१.१  सर्वे भवन्तु सुखिन:, देशानुकूल और कालानुकूल आदि के संदर्भ में दोनों प्रतिमानों को समझना&lt;br /&gt;
१.२ प्रतिमान का परिवर्तन&lt;br /&gt;
.२.१ सामाजिक व्यवस्थाओं का पुनर्निर्माण&lt;br /&gt;
१.२.२ समाज के संगठनों का परिष्कार/पुनरूत्थान या नवनिर्माण&lt;br /&gt;
१.२.३ तन्त्रज्ञान  का समायोजन / तन्त्रज्ञान  नीति / जीवन की इष्ट गति : वर्तमान में तन्त्रज्ञान  की विकास की गति से जीवन को जो गति प्राप्त हुई है उस के कारण सामान्य मनुष्य घसीटा जा रहा है। पर्यावरण सन्तुलन  और सामाजिकता दाँवपर लग गए हैं। ज्ञान, विज्ञान और तन्त्रज्ञान  ये तीनों बातें पात्र व्यक्ति को ही मिलनी चाहिये। बंदर के हाथ में पलिता नहीं दिया जाता। इस लिये किसी भी तन्त्रज्ञान के सार्वत्रिकीकरण से पहले उसके पर्यावरण, समाजजीवन और व्यक्ति जीवनपर होनेवाले परिणाम जानना आवश्यक है। हानिकारक तंत्रज्ञान का तो विकास भी नहीं करना चाहिये। किया तो वह केवल सुपात्र को ही अंतरित हो यह सुनिश्चित करना चाहिये।&lt;br /&gt;
ऐसी स्थिति में जीवन की इष्ट गति की ओर बढानेवाली तन्त्रज्ञान नीति का स्वीकार करना होगा। इष्ट गति के निकषों के लिये अध्याय ३९ में बताई कसौटि लगानी होगी।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== परिवर्तन की प्रक्रिया ===&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सामाजिक परिवर्तन भौतिक वस्तुओं के परिवर्तन जैसे सरल नहीं होते। भौतिक पदार्थों का एक निश्चित स्वभाव होता है। धर्म होता है। इसे ध्यान में रखकर भौतिक पदार्थों को ढाला जाता है। हर मानव का स्वभाव भिन्न होता है। भिन्न समयपर भी उसमें बदलाव आ सकता है। इसलिये सामाजिक परिवर्तन क्रांति से नहीं उत्क्रांति से ही किये जा सकते हैं। उत्क्रांति की गति धीमी होती है। होनेवाले परिवर्तनों से किसी की हानी नहीं हो या होनेवाली हानी न्यूनतम हो, परिवर्तन स्थाई हों, परिवर्तन से सबको लाभ मिले यह सब देखकर ही प्रक्रिया चलाई जाती है। सामाजिक परिवर्तनों के लिये नई पीढी से प्रारंभ करना यह सबसे अच्छा रास्ता है। लेकिन नई पीढी में व्यापक रूप से परिवर्तन के पहलुओं को स्थापित करने के लिये आवश्यक इतनी पुरानी पीढी के श्रेष्ठ जनों की संख्या आवश्यक है। ऐसे श्रेष्ठ जनों का वर्णन श्रीमद्भगवद्गीता में किया गया है -&lt;br /&gt;
यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जन: ।&lt;br /&gt;
स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते॥ (अध्याय ३ श्लोक २१)&lt;br /&gt;
इसलिये एक दृष्टि से देखा जाए तो यह प्रक्रिया समाज के प्रत्येक व्यक्तितक ले जाने की आवश्यकता नहीं होती। केवल समाज जीवन की सभी विधाओं के श्रेष्ठ लोगों के निर्माण की प्रक्रिया ही परिवर्तन की प्रक्रिया है। एक बार ये लोग निर्माण हो गये तो फिर परिवर्तन तेज याने ज्यामितीय गति से होने लगता है।&lt;br /&gt;
२.१ धीमी लेकिन अविश्रांत : हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि हमें सामाजिक परिवर्तन करना है। समाज एक जीवंत ईकाई होता है। जीवंत ईकाई में परिवर्तन हमेशा धीमी गति से, समग्रता से और अविरत करते रहने से होते हैं। कोई भी शीघ्रता या टुकडों में होनेवाले परिवर्तन हानिकारक होते हैं।&lt;br /&gt;
२.२ सभी क्षेत्रों में एकसाथ : समाज एक जीवंत ईकाई होने के कारण इसके सभी अंग किसी भी बात से एकसाथ प्रभावित होते हैं। प्रभाव का परिमाण कम अधिक होगा लेकिन प्रभाव सभीपर होता ही है। इसलिये परिवर्तन की प्रक्रिया टुकडों में अलग अलग या एक के बाद एक ऐसी नहीं होगी। परिवर्तन की प्रक्रिया धर्म, शिक्षा, शासन, अर्थ, न्याय, समाज संगठन आदि सभी क्षेत्रों में एकसाथ चलेगी। ऐसी प्रक्रिया का प्रारंभ होना बहुत कठिन होता है। लेकिन एकबार सभी क्षेत्रों में प्रारंभ हो जाता है तो फिर यह तेजी से गति प्राप्त कर लेती है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== परिवर्तन के कारक तत्व ===&lt;br /&gt;
३.१ शिक्षा : शिक्षा का दायरा बहुत व्यापक है। शिक्षा जन्म जन्मांतर चलनेवाली प्रक्रिया होती है। इस जन्म में शिक्षा गर्भधारणा से मृत्यूपर्यंत चलती है। आयु की अवस्था के अनुसार शिक्षा का स्वरूप बदलता है। &lt;br /&gt;
३.१.२ कुटुम्ब में शिक्षा : कुटुम्ब में शिक्षा का प्रारंभ गर्भधारणा से होता है। मनुष्य की ६०-७० प्रतिशत घडन तो कुटुम्ब में ही होती है। कुटुम्ब में रहकर वह कई बातें सीखता है। कौटुम्बिक भावना, कर्तव्य, सदाचार आदि की शिक्षा कुटुम्ब की ही जिम्मेदारी होती है। व्यवस्थाओं के साथ समायोजन, व्यवस्थाओं के स्वरूप आदि भी वह कुटुम्ब में ही अपने ज्येष्ठों से सीखता है। इंद्रियों के विकास की शिक्षा, व्यावसायिक कौशल भी वह कुटुम्ब में ही सीखता है। कुटुम्ब सामाजिकता की पाठशाला ही होता है। बडों का आदर, स्त्री का आदर आदि भी कुटुम्ब ही सिखाता है। &lt;br /&gt;
३.१.२ कुटुम्ब की शिक्षा : उसी प्रकार से कुटुम्ब के बारे में भी वह कई बातें सीखता है। उसकी व्यक्तिगत, कौटुम्बिक और सामाजिक आदतें बचपन में ही आकार लेतीं हैं। कुटुम्ब का महत्व, समाज में कौटुम्बिक भावना का महत्व, कौटुम्बिक व्यवस्थाओं का महत्व वह कुटुम्ब में सीखता है। भिन्न भिन्न स्वभावों के लोग एक छत के नीचे आत्मीयता से कैसे रहते हैं यह वह कुटुम्ब से ही सीखता है। लगभग सभी प्रकार से कुटुंब यह समाज का लघुरूप ही होता है। कुटुंब यह सामाजिकता की पाठशाला होती है।&lt;br /&gt;
३.१.३ विद्याकेन्द्र शिक्षा	: विद्याकेन्द्र की शिक्षा शास्त्रीय शिक्षा होती है। कुटुम्ब में सीखे हुए सदाचार के शास्त्रीय पक्ष को समझाने के लिये होती है। कुटुंब में सीखे हुए व्यावसायिक कौशलों को पैना बनाने के लिये होती है। कुटुंब में आत्मसात की हुई श्रेष्ठ परम्पराओं को अधिक उज्वल बनाने के तरीके सीखने के लिए होती है। अध्ययन का और कौशल का शास्त्रीय तरीका सिखने के लिये, अध्ययन को तेजस्वी बनाने के लिये होती है।&lt;br /&gt;
३.१.४ लोकशिक्षा : लोकशिक्षा भी समाज जीवन का एक आवश्यक पहलू है। विद्याकेन्द्र की शिक्षा के उपरान्त भी मनुष्य का मन कई बार भ्रमित हो जाता हाय, बुद्धि कुण्ठित हो जाती है। ऐसी स्थिति में लोकशिक्षा की व्यवस्था इस संभ्रम को, इस कुण्ठा को दूर करती है।&lt;br /&gt;
३.१.५ परंपरा निर्माण : अपने से अधिक श्रेष्ठ विरासत निर्माण करने की निरंतरता को श्रेष्ठ परंपरा कहते हैं। श्रेष्ठ परंपराओं के निर्माण की तीव्र इच्छा और पैने प्रयास समाज को श्रेष्ठ और चिरंजीवी बनाते हैं।&lt;br /&gt;
३.२ शासन 	&lt;br /&gt;
३.२.१ धर्मनिष्ठता : शासक धर्मशास्त्र के जानकार हों। धर्मशास्त्र के पालनकर्ता हों। धर्मशास्त्र के नियमों का प्रजा से अनुपालन करवाने में कुशल हों।	&lt;br /&gt;
३.२.२ धर्म व्यवस्था के साथ समायोजन : सदैव धर्म के जानकारों से अपना मूल्यांकन करवाएँ। धर्म के जानकारों की सूचनाओं का अनुपालन करें। अधर्म होने से प्रायश्चित्त और पश्चात्ताप के लिये उद्यत रहें।&lt;br /&gt;
३.३ धर्म नेतृत्व&lt;br /&gt;
३.३.१ धर्म के मार्गदर्शक : किसी का केवल धर्मशास्त्र का विशेषज्ञ होना पर्याप्त नहीं है। नि:स्वार्थ भाव, निर्भयता भी श्रेष्ठ धर्म के मार्गदर्शकों के लक्षण हैं।&lt;br /&gt;
३.३.२ धर्माचरणी : धर्म का मार्गदर्शन करनेवाले लोग अपने व्यवहार में भी धर्मयुक्त होना चाहिये।&lt;br /&gt;
३.३.३ विजीगिषु स्वभाववाले : धर्म का मार्गदर्शन करनेवाले लोगों के लिये विजीगिषु स्वभाव का होना आवश्यक है। कोई भी संकट आनेपर डगमगाएँ नहीं यह धर्म के मार्गदर्शकों के लिये आवश्यक है।&lt;br /&gt;
धर्मं के जानकारों का सबसे पहला कर्तव्य है कि वे वर्तमान काल के लिए धर्मशास्त्र या स्मृति की प्रस्तुति करें। यह स्मृति जीवन के सभी पहलुओं को व्यापनेवाली हो। इसकी व्यापकता को समझने की दृष्टि से एक रूपरेखा नीचे दे रहे हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== धर्मशास्त्र प्रस्तुति के लिये बिन्दु ==&lt;br /&gt;
() धर्म की व्याख्याएँ / धर्म की व्याप्ति / त्रिवर्ग की व्याप्ति : सर्वे भवन्तु सुखिन: लक्ष्य हेतु धर्म : संस्कृति &lt;br /&gt;
() व्यापक धर्मशास्त्र के प्रस्तुति की आवश्यकता: * पूर्व धर्मशास्त्रों की व्यापकता(?)  	* व्यापकता की आवश्यकता &lt;br /&gt;
() व्यक्तिगत धर्म / पञ्चविध (कोष) पुरुष धर्म / चतुर्विध पुरूषार्थ /स्वधर्म (वर्णधर्म)&lt;br /&gt;
शरीरधर्म 	२. मन-धर्म 	३. बुद्धि-धर्म 	४. चित्त-धर्म &lt;br /&gt;
() सामाजिक संबंधों में धर्म &lt;br /&gt;
व्यक्ति-व्यक्ति  : पुरूष-पुरूष या स्त्री-स्त्री 			१.१ पारिवारिक रिश्ते 	१.२ पड़ोसी 		१.३ अतिथि  	१.४ शत्रु/विरोधक 		१.५ मित्र/सहायक 	१.६ सहकारी 		१.७ अपरिचित 	१.८ मालिक/नौकर 		१.९ चरित्रहीन स्त्री/पुरूष 	१.१० व्यसनी 		१,११ जरूरतमंद 	१.१२ समव्यवसायी 		१.१३ भिन्न व्यवसायी 	१.१४ याचक 		१.१५ भिन्न भाषी १.१६ विक्रेता\क्रेता    		१.१७ भिन्न राष्ट्रीय &lt;br /&gt;
व्यक्ति-व्यक्ति : पुरूष-स्त्री 				१.१ पारिवारिक रिश्ते 	१.२ पड़ोसी 		१.३ अतिथि  	१.४ शत्रु/विरोधक 		१.५ मित्र/सहायक 	१.६ सहकारी 		१.७ अपरिचित 	१.८ मालिक/नौकर 		१.९ चरित्रहीन स्त्री/पुरूष 	१.१० व्यसनी 		१,११ जरूरतमंद 	१.१२ समव्यवसायी 		१.१३ भिन्न व्यवसायी 	१.१४ याचक 		१.१५ भिन्न भाषी १.१६ विक्रेता\क्रेता    		१.१७ भिन्न राष्ट्रीय &lt;br /&gt;
व्यक्ति-समाज :		३.१ व्यक्ति-परिवार 	३.२ व्यति-जाति 		३.३ पड़ोसी 			३.४ सामाजिक संगठन  	३.५ व्यक्ति-व्यवस्था 	३.६ व्यक्ति-राष्ट्र 		३.७ व्यक्ति-विश्व समाज 		३.८ व्यक्ति भिन्न भाषी 	३.९ परप्रांतीय 		३.१० परदेसी &lt;br /&gt;
समाज-समाज : 	४.१ अंतर्राष्ट्रीय : ४.१.१ शत्रु 	४.१.२ मित्र 	४.१.३ तटस्थ 		&lt;br /&gt;
४.२ अंतर्देशीय	४.१.१ प्रांत-प्रांत 	४.१.२ जनपद-जनपद 	४.१.३ भाषिक समूह  	४.१.४ पंथ समूह  	४.१.५ राष्ट्रीय समूह 	४.१.६ अराष्ट्रीय समूह 		४.१.७ राष्ट्रद्रोही समूह 	४.१.८ विदेशी 		४.१.९ समव्यवासायी  	४.१.१० जाति-जाति 		४.१.११ परिवार परिवार &lt;br /&gt;
()  सृष्टिगत सम्बन्धों में धर्म  &lt;br /&gt;
	१. मनुष्य-अन्य जीव :													१.१ मनुष्य-पालतू प्राणी :  १.१.१ शाकाहारी 	१.१.२ मांसाहारी 								१.२ मनुष्य अन्य प्राणी : 	१.२.१ थलचर : 	१.२.१.१ शाकाहारी 	१.२.१.२ मांसाहारी 							१.२.२ जलचर 		और 		१.२.३ नभचर 	&lt;br /&gt;
१.३ मनुष्य-वनस्पति : 	१.३.१ जमीन के नीचे 	१.३.२ जमीन के ऊपर 	१.३.३ वनस्पति/औषधी 					१.३.४ खानेयोग्य/अन्न 	१.३.५ अखाद्य/जहरीली 	१.३.६ नशीली		१.४ मनुष्य-कृमि/कीटक/सूक्ष्म जीव 		१.४.१ सहायक 		१.४.२ हानिकारक	      २. मनुष्य-जड़ प्रकृति / पंचमहाभूत 									२.१ अनवीकरणीय/खनिज 	२.१.१ ठोस 	२.१.२ द्रव 	२.१.३ वायु (इंधन)  		२.२ नवीकरणीय 	: २.२.१ वायु/हवा 	२.२.२ जल 	२.२.३ सूर्यप्रकाश 		२.२.४ लकड़ी&lt;br /&gt;
() आपद्धर्म :	१. प्राकृतिक आपदा 		२. मानव निर्मित आपदा (लगभग उपर्युक्त सभी विषयों में)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== परिवर्तन के पुरोधा ==&lt;br /&gt;
उपर्युक्त बिन्दु २ में बताए गए श्रेष्ठ जन ही परिवर्तन के पुरोधा होंगे। इनका प्रमाण समाज में मुष्किल से ५-७ प्रतिशत ही पर्याप्त होता है। ऐसे श्रेष्ठ जनों में निम्न वर्ग के लोग आते हैं।	&lt;br /&gt;
४.१ शिक्षक : शिक्षक ज्ञानी, त्यागी, कुशल, समाज हित के लिए समर्पित, धर्म का जानकार, समाज को घडने की सामर्थ्य रखनेवाला होता है। नई पीढी जो परिवर्तन का अधिक सहजता से स्वीकार कर सकती है उसको घडना शिक्षक का काम होता है। इसलिये परिवर्तन की प्रक्रिया का मुख्य पुरोधा शिक्षक ही होता है।	&lt;br /&gt;
४.२ श्रेष्ठ जन :यहाँ श्रेष्ठ जनों से मतलब भिन्न भिन्न सामाजिक गतिविधियों में जो अग्रणी लोग हैं उनसे है।	&lt;br /&gt;
४.३ सांप्रदायिक संगठनों के प्रमुख : आजकल समाज का एक बहुत बडा वर्ग जिसमें शिक्षित वर्ग भी है, भिन्न भिन्न संप्रदायों से जुडा है। उन संप्रदायों के प्रमुख भी इस परिवर्तन की प्रक्रिया का एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण हिस्सा बनने की शक्ति रखते हैं।	&lt;br /&gt;
४.४ लोकशिक्षा के माध्यम : कीर्तनकार, कथाकार, प्रवचनकार, नाटक मंडलि, पुरोहित या उपाध्याय, साधू, बैरागी, सिंहस्थ या कुंभ जैसे मेले, यात्राएँ आदि लोकशिक्षा के माध्यम हुआ करते थे। वर्तमान में ये सब कमजोर और दिशाहीन हो गए हैं। एक ओर इनमें से जिनको पुनर्जीवित कर सकते हैं उन्हें करना। नए आयाम भी जोडे जा सकते हैं। जैसे अभी लगभग देढ दशक पूर्व महाराष्ट्र में प्रारंभ हुई नव-वर्ष स्वागत यात्राएँ आदि।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== अंतर्निहित सुधार व्यवस्था ==&lt;br /&gt;
काल के प्रवाह में समाज में हो रहे परिवर्तन और मनुष्य की स्खलनशीलता के कारण बढनेवाला अधर्माचरण ये दो बातें ऐसीं हैं जो किसी भी श्रेष्ठतम समाज को भी नष्ट कर देतीं हैं। इस दृष्टि से जागरूक ऐसे शिक्षक और धर्म के मार्गदर्शक साथ में मिलकर समाज की अंतर्निहित सुधार व्यवस्था बनाते हैं। अपनी संवेदनशीलता और समाज के निरंतर बारीकी से हो रहे अध्ययन के कारण इन्हें संकटों का पूर्वानुमान हो जाता है। अपने निरीक्षणों के आधारपर अपने लोकसंग्रही स्वभाव से ये लोगों को भी संकटों से ऊपर उठने के लिये तैयार करते हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== परिवर्तन की नीति ==&lt;br /&gt;
प्रारंभ में विरोध को आमंत्रण नहीं देना। संघर्ष में शक्ति का अपव्यय नहीं करना। जो आज कर सकते हैं उसे करते जाना। जो कल करने की आवश्यकता है उस के लिये परिस्थिति निर्माण करना। परिस्थिति के निर्माण होते ही आगे बढना।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== परिवर्तन में अवरोध और उनका निराकरण ==&lt;br /&gt;
शासनाधिष्ठित समाज में स्वार्थ के आधारपर परिवर्तन सरल और तेज गति से होता है। हिटलरने १५-२० वर्षों में ही जर्मनी को एक समर्थ राष्ट्र के रूप में खड़ा कर दिया था। लेकिन धर्म पर आधारित जीवन के प्रतिमान में परिवर्तन की गति धीमी और मार्ग कठिन होता है। स्थाई परिवर्तन और वह भी कौटुम्बिक भावना के आधारपर, तो धीरे धीरे ही होता है। &lt;br /&gt;
७.१ अंतर्देशीय 	&lt;br /&gt;
७.१.१ मानवीय जड़ता : परिवर्तन का आनंद से स्वागत करनेवाले लोग समाज में अल्पसंख्य ही होते हैं। सामान्यत: युवा वर्ग ही परिवर्तन के लिए तैयार होता है। इसलिए युवा वर्ग को इस परिवर्तन की प्रक्रिया में सहभागी बनाना होगा। परिवर्तन की प्रक्रिया में युवाओं को सम्मिलित करते जाने से दो तीन पीढ़ियों में परिवर्तन का चक्र गतिमान हो जाएगा।&lt;br /&gt;
७.१.२ विपरीत शिक्षा : जैसे जैसे भारतीय शिक्षा का विस्तार समाज में होगा वर्तमान की विपरीत शिक्षा का अपने आप ही क्रमश: लोप होगा।	   &lt;br /&gt;
७.१.३ मजहबी मानसिकता : भारतीय याने धर्म की शिक्षा के उदय और विस्तार के साथ ही मजहबी शिक्षा और उसका प्रभाव भी शनै: शनै: घटता जाएगा। मजहबों की वास्तविकता को भी उजागर करना आवश्यक है। &lt;br /&gt;
७.१.४ धर्म के ठेकेदार : जैसे जैसे धर्म के जानकार और धर्म के अनुसार आचरण करनेवाले लोग समाज में दिखने लगेंगे, धर्म के तथाकथित ठेकेदारों का प्रभाव कम होता जाएगा। &lt;br /&gt;
७.१.५ शासन तंत्र : इस परिवर्तन की प्रक्रिया में धर्म के जानकारों के बाद शासन की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण होगी। धर्माचरणी लोगों को समर्थन, सहायता और संरक्षण देने का काम शासन को करना होगा। इस के लिए शासक भी धर्म का जानकार और धर्मनिष्ठ हो, यह भी आवश्यक है। धर्म के जानकारों को यह सुनिश्चित करना होगा की शासक धर्माचरण करनेवाले और धर्म के जानकर हों।&lt;br /&gt;
७.१.६ जीवन का अभारतीय प्रतिमान : जीवन के सभी क्षेत्रों में एकसाथ जीवन के प्रतिमान के परिवर्तन की प्रक्रिया को चलाना यह धर्म के जानकारों की जिम्मेदारी होगी। शिक्षा की भूमिका इसमें सबसे महत्वपूर्ण होगी। शिक्षा के माध्यम से समूचे जीवन के भारतीय प्रतिमान की रुपरेखा और प्रक्रिया को समाजव्यापी बनाना होगा। धर्मं-शरण शासन इसमें सहायता करेगा।&lt;br /&gt;
७.१.७ तन्त्रज्ञान  समायोजन : तन्त्रज्ञान के क्षेत्र में भारत के सामने दोहरी चुनौती होगी। एक ओर तो विश्व में जो तन्त्रज्ञान के विकास की होड़ लगी है उसमें अपनी विशेषताओं के साथ अग्रणी रहना। इस दृष्टि से विकास हेतु कुछ तन्त्रज्ञान निम्न हो सकते हैं।&lt;br /&gt;
- शून्य प्रदुषण रासायनिक उद्योग।&lt;br /&gt;
- सस्ती सौर उर्जा।&lt;br /&gt;
- प्रकृति में सहजता से घुलनशील प्लैस्टिक का निर्माण। &lt;br /&gt;
- औरों द्वारा प्रक्षेपित शस्त्रों/अणु-शस्त्रों का शमन करने का तंत्रज्ञान। ...............आदि &lt;br /&gt;
और दूसरी ओर वैकल्पिक विकेंद्रीकरणपर आधारित तन्त्रज्ञान का विकास कर उसे विश्व में प्रतिष्ठित करना। इस प्रकार के तन्त्रज्ञान में निम्न प्रकार के तन्त्रज्ञान होंगे।&lt;br /&gt;
- कौटुम्बिक उद्योगों के लिये, स्थानिक संसाधनों के उपयोग के लिए तन्त्रज्ञान  &lt;br /&gt;
- भिन्न भिन्न कार्यों के लिये पशु-उर्जा के अधिकाधिक उपयोग के लिये तंत्रज्ञान&lt;br /&gt;
- नविकरणीय प्राकृतिक संसाधनों से विविध पदार्थों के निर्माण से आवश्यकताओं की पूर्ति तथा संसाधनों के पुनर्भरण के लिये सरल तन्त्रज्ञान का विकास   &lt;br /&gt;
- मानव की प्राकृतिक क्षमताओं का विकास करनेवाली प्रक्रियाओं का अनुसंधान। ......... आदि &lt;br /&gt;
७.२ अंतर्राष्ट्रीय 	&lt;br /&gt;
७.२.१ मजहबी विस्तारवादी मानसिकता : वर्तमान में यह मुख्यत: ३ प्रकार की है। ईसाई, मुस्लिम और वामपंथी। यह तीनों ही विचारधाराएँ अधूरी हैं, एकांगी हैं। यह तो इन के सम्मुख ‘सर्वे भवन्तु सुखिन:’ को लेकर कोई चुनौती खड़ी नहीं होने से इन्हें विश्व में विस्तार का अवसर मिला है। जैसे ही ‘सर्वे भवन्तु सुखिन:’ का विचार लेकर भारत एक वैश्विक शक्ति के रूप में खड़ा होगा इनके पैरोंतले की जमीन खिसकने लगेगी। &lt;br /&gt;
७.२.२ आसुरी महत्वाकांक्षा : ऊपर जो बताया गया है वह, आसुरी महत्वाकांक्षा रखनेवाली वैश्विक शक्तियों के लिये भी लागू है। आसुरी महत्वाकांक्षाओं को परास्त करने की परंपरा भारत में युगों से रही है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== परिवर्तन के लिये समयबध्द करणीय कार्य ==&lt;br /&gt;
 :  &lt;br /&gt;
समूचे जीवन के प्रतिमान का परिवर्तन यह एक बहुत बृहद् और जटिल कार्य है। इस के लिये इसे सामाजिक अभियान का रूप देना होगा। समविचारी लोगों को संगठित होकर सहमति से और चरणबध्द पध्दति से प्रक्रिया को आगे बढाना होगा। बड़े पैमानेपर जीवन के हर क्षेत्र में जीवन के भारतीय प्रतिमान की समझ रखनेवाले और कृतीशील ऐसे लोग याने आचार्य निर्माण करने होंगे। परिवर्तन के चरण एक के बाद एक और एक के साथ सभी इस पध्दति से चलेंगे। जैसे दूसरे चरण के काल में ५० प्रतिशत शक्ति और संसाधन दूसरे चरणके निर्धारित विषयपर लगेंगे। और १२.५-१२.५ प्रतिशत शक्ति और संसाधन चरण १, ३, ४ और ५ में प्रत्येकपर लगेंगे।&lt;br /&gt;
१. समविचारी लोगों का ध्रुवीकरण : जिन्हें प्रतिमान के परिवर्तन की आस है और समझ भी है ऐसे समविचारी, सहचित्त लोगों का ध्रुवीकरण करना होगा। उनमें एक व्यापक सहमति निर्माण करनी होगी। अपने अपने कार्यक्षेत्र में क्या करना है इसका स्पष्टीकरण करना होगा।&lt;br /&gt;
२. अभियान के चरण : अभियान को चरणबध्द पध्दति से चलाना होगा। १२ वर्षों के ये पाँच चरण होंगे। ऐसी यह ६० वर्ष की योजना होगी। यह प्रक्रिया तीन पीढीतक चलेगी। तीसरी पीढी में परिवर्तन के फल देखने को मिलेंगे। लेकिन तबतक निष्ठा से और धैर्य से अभियान को चलाना होगा। निरंतर मूल्यांकन करना होगा। राह भटक नहीं जाए इसके लिये चौकन्ना रहना होगा।&lt;br /&gt;
२.१ अध्ययन और अनुसंधान : जीवन का दायरा बहुत व्यापक होता है। अनगिनत विषय इसमें आते हैं। इसलिये प्रतिमान के बदलाव से पहले हमें दोनों प्रतिमानों के विषय में और विशेषत: जीवन के भारतीय प्रतिमान के विषय में बहुत गहराई से अध्ययन करना होगा। मनुष्य की इच्छाओं का दायरा, उनकी पूर्ति के लिये वह क्या क्या कर सकता है आदि का दायरा अति विशाल है। इन दोनों को धर्म के नियंत्रण में ऐसे रखा जाता है इसका भी अध्ययन अनिवार्य है। मनुष्य के व्यक्तित्व को ठीक से समझना, उसके शरीर, मन, बुध्दि, चित्त, अहंकार आदि बातों को समझना, कर्मसिध्दांत को समझना, जन्म जन्मांतर चलने वाली शिक्षा की प्रक्रिया को समझना विविध विषयों के अंगांगी संबंधों को समझना, प्रकृति के रहस्यों को समझना आदि अनेकों ऐसी बातें हैं जिनका अध्ययन हमें करना होगा। इनमें से कई विषयों के संबंध में हमारे पूर्वजों ने विपुल साहित्य निर्माण किया था। उसमें से कितने ही साहित्य को जाने अंजाने में प्रक्षेपित किया गया है। इस प्रक्षिप्त हिस्से को समझ कर अलग निकालना होगा। शुध्द भारतीय तत्वोंपर आधारित ज्ञान को प्राप्त करना होगा। अंग्रेजों ने भारतीय साहित्य, इतिहास के साथ किये खिलवाड, भारतीय समाज में झगडे पैदा करने के लिये निर्मित साहित्य को अलग हटाकर शुध्द भारतीय याने एकात्म भाव की या कौटुम्बिक भाव की जितनी भी प्रस्तुतियाँ हैं उनका अध्ययन करना होगा। मान्यताओं, व्यवहार सूत्रों, संगठन निर्माण और व्यवस्था निर्माण की प्रक्रिया को समझना होगा।     &lt;br /&gt;
२.२ लोकमत परिष्कार : अध्ययन से जो ज्ञान उभरकर सामने आएगा उसे लोगोंतक ले जाना होगा। लोगों का प्रबोधन करना होगा। उन्हें फिर से समग्रता से और एकात्मता से सोचने और व्यवहार करने का तरीका बताना होगा। उन्हें उनकी सामाजिक जिम्मेदारी का समाजधर्म का अहसास करवाना होगा। वर्तमान की परिस्थितियों से सामान्यत: कोई भी खुश नहीं है। लेकिन जीवन का भारतीय प्रतिमान ही  उनकी कल्पना के अच्छे दिनों का वास्तव है यह सब के मन में स्थापित करना होगा।	         &lt;br /&gt;
२.३ संयुक्त कुटुम्ब : कुटुम्ब ही समाजधर्म सीखने की पाठशाला होता है। संयुक्त कुटुम्ब तो वास्तव में समाज का लघुरूप ही होता है। सामाजिक समस्याओं में से लगभग ७० प्रतिशत समस्याओं को तो केवल अच्छा संयुक्त कुटुम्ब ही निर्मूल कर देता है। समाज जीवन के लिये श्रेष्ठ लोगों को जन्म देने का काम, श्रेष्ठ संस्कार देने का काम, अच्छी आदतें डालने काम आजकल की फॅमिली पध्दति नहीं कर सकती। जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में जो तेजस्वी नेतृत्व का अभाव निर्माण हो गया है उसे दूर करना यह भारतीय मान्यताओं के अनुसार चलाए जानेवाले संयुक्त परिवारों में ही हो सकता है। इसलिये समाज का नेतृत्व करेंगे ऐसे श्रेष्ठ बालकों को जन्म देने के प्रयास तीसरे चरण में होंगे।&lt;br /&gt;
२.४ शिक्षक/धर्मज्ञ और शासक निर्माण : समाज परिवर्तन में शिक्षक की और शासक की ऐसे दोनों की भुमिका अत्यंत महत्वपूर्ण होती है। संयुक्त परिवारों में जन्म लिये बच्चों में से अब श्रेष्ठ धर्म के मार्गदर्शक, शिक्षक और शासक निर्माण करने की स्थिति होगी। ऐसे लोगों को समर्थन और सहायता देनेवाले कुटुम्ब और दूसरे चरण में निर्माण किये समाज के परिष्कृत विचारोंवाले सदस्य अब कुछ मात्रा में उपलब्ध होंगे।	   &lt;br /&gt;
२.५ संगठन और व्यवस्थाओं की प्रतिष्ठापना : श्रेष्ठ धर्म के अधिष्ठाता/मार्गदर्शक, सामर्थ्यवान शिक्षक और कुशल शासक अब प्रत्यक्ष संगठन का सशक्तिकरण और व्यवस्थाओं का निर्माण करेंगे।&lt;br /&gt;
==References==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;references /&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अन्य स्रोत:&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[Category:Bhartiya Jeevan Pratiman (भारतीय जीवन प्रतिमान)]]&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Dilipkelkar</name></author>
	</entry>
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		<id>https://dharmawiki.org/index.php?title=Planning_For_Change_(%E0%A4%AA%E0%A4%B0%E0%A4%BF%E0%A4%B5%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%A4%E0%A4%A8_%E0%A4%95%E0%A5%80_%E0%A4%AF%E0%A5%8B%E0%A4%9C%E0%A4%A8%E0%A4%BE)&amp;diff=119330</id>
		<title>Planning For Change (परिवर्तन की योजना)</title>
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		<updated>2019-05-30T10:32:49Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Dilipkelkar: /* परिवर्तन की नीति */&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{One source|date=January 2019}}&lt;br /&gt;
[[Template:Cleanup reorganize Dharmawiki Page]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
परिवर्तन की योजना को समझने के लिए हमें पहले निम्न बातें फिर से स्मरण करनी होंगी ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जीवन के भारतीय प्रतिमान की जानकारी के लिए - &lt;br /&gt;
१. जीवनदृष्टि/व्यवहार : भारतीय जीवनदृष्टि और जीवनशैली के विषय में जानकारी के लिये कृपया अध्याय ७  में देखें। 		&lt;br /&gt;
२. भारतीय जीवन के प्रतिमान के समाज संगठनों की जानकारी हमने अध्याय १३ से २० में प्राप्त की है।&lt;br /&gt;
३. व्यवस्था समूह : व्यवस्था समूह का ढाँचा जीवनदृष्टि से सुसंगत होना चाहिए। कृपया व्यवस्था समूह के ढाँचे के लिये अध्याय २२ में और जानकारी के लिए अध्याय २५ में देखें।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== समस्या मूलों के निराकरण की नीति ==&lt;br /&gt;
समस्या मूल नष्ट करने से तात्पर्य समस्या मूलोंपर आघात से नहीं है। समस्याएँ निर्माण ही नहीं हों ऐसी परिस्थितियों, ऐसे समाज संगठनों और ऐसी व्यवस्थाओं के निर्माण से है। निराकरण की प्रक्रिया के ३ चरण होंगे। समस्याओं को और परिवर्तन के स्वरूप को समझना, निराकरण की नीति तय करना और निराकरण का क्रियान्वयन करना। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== परिवर्तन के स्वरूप को समझना ==&lt;br /&gt;
समस्या का मूल जीवन के प्रतिमान के परिवर्तन में है। प्रतिमान का आधार समाज की जीवनदृष्टि होती है। व्यवहार, संगठन और व्यवस्थाएँ तो जीवनदृष्टि के आधारपर ही तय होते हैं। इसलिये परिवर्तन की प्रक्रिया में जीवनदृष्टि के परिवर्तन की प्रक्रिया को प्राथमिकता देनी होगी। व्यवहार में सुसंगतता आए इसलिये करणीय अकरणीय विवेक को सार्वत्रिक करना होगा। दूसरे क्रमांकपर संगठन और व्यवस्थाओं में परिवर्तन की प्रक्रिया चलेगी। व्यवस्था परिवर्तन की इस प्रक्रिया में समग्रता और एकात्मता के संदर्भ में व्यवस्था विशेष का आधार बनाने के लिये विषय की सैध्दांतिक प्रस्तुति करनी होगी। जैसे शासन व्यवस्था में यदि उचित परिवर्तन करना है तो पहले राजशास्त्र की सैध्दांतिक प्रस्तुति करना आवश्यक है। समृद्धि व्यवस्था में परिवर्तन करने के लिये समृद्धिशास्त्र की सैध्दांतिक प्रस्तुति करनी होगी। इन सैध्दांतिक प्रस्तुतियों को प्रयोग सिध्द करना होगा। प्रयोगों के आधारपर इन प्रस्तुतियों में उचित परिवर्तन करते हुए आगे बढना होगा। यह काम प्राथमिकता से धर्म के जानकारों का है। दूसरे क्रमांक की जिम्मेदारी शिक्षकों की है। शिक्षक वर्ग ही धर्म को सार्वत्रिक करता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== निराकरण की नीति ==&lt;br /&gt;
समस्याएँ इतनी अधिक और पेचिदा हैं कि इनका निराकरण अब संभव नहीं है, ऐसा कई विद्वान 	मानते हैं। हमने जो करणीय और अकरणीय विवेक को समझा है उसके अनुसार कोई भी बात असंभव नहीं होती। ऊपरी तौरपर असंभव लगनेपर भी उसे संभव चरणों में बाँटकर संपन्न किया जा सकता है।&lt;br /&gt;
इस के लिये नीति के तौरपर हमारा व्यवहार निम्न प्रकार का होना चागिये।&lt;br /&gt;
- सबसे पहले तो यह हमेशा ध्यान में रखना कि यह पूरे समाज जीवन के प्रतिमान के परिवर्तन का विषय है। इसे परिवर्तन के लिये कई पीढियों का समय लग सकता है। भारत वर्ष के दीर्घ इतिहास में समाज ने कई बार उत्थान और पतन के दौर अनुभव किये हैं। बारबार भारतीय समाज ने उत्थान किया है। &lt;br /&gt;
- परिवर्तन की प्रक्रिया को संभाव्य चरणों में बाँटना।&lt;br /&gt;
- उसमें आज जो हो सकता है उसे कर डालना।&lt;br /&gt;
- आज जिसे करना कठिन लगता है उसके लिये परिस्थितियाँ बनाते जाना। परिस्थितियाँ बनते ही उसे    करना। &lt;br /&gt;
- प्रारंभ में जबतक परिवर्तन की प्रक्रिया ने गति नहीं पकडी है, यथासंभव कोई विरोध मोल नहीं लेना। &lt;br /&gt;
- इसी प्रकार से एक एक चरण को संभव बनाते हुए आगे बढ़ाते जाना।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== समस्या मूलों का निराकरण ==&lt;br /&gt;
वास्तव में समस्या मूलों को नष्ट करना यह शब्दप्रयोग ठीक नहीं है। उचित प्रतिमान की प्रतिष्ठापना के साथ ही गलत प्रतिमान का अंत अपने आप होता है। जो सर्वहितकारी है, उचित है, श्रेष्ठ है, उसकी प्रतिष्ठापना ही परिवर्तन की प्रक्रिया का स्वरूप होगा। स्वाभाविक जडता के कारण कुछ कठिनाईयाँ तो आएँगी। लेकिन गलत प्रतिमान को नष्ट करने के लिये अलग से शक्ति लगाने की आवश्यकता नहीं है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== समस्या मूल नष्ट करने हेतु धर्म के जानकारों के मार्गदर्शन में शिक्षा की व्याप्ति ==&lt;br /&gt;
१. जीवनदृष्टि की शिक्षा : जीवनदृष्टि की शिक्षा मुख्यत: कामनाओं और कामनाओं की पूर्ति के प्रयास, धन, साधन और संसाधनों को धर्म के दायरे में रखने की शिक्षा ही है। पुरूषार्थ चतुष्टय की या त्रिवर्ग की शिक्षा ही है।&lt;br /&gt;
२. व्यवस्थाएँ : जीवनदृष्टि के अनुसार व्यवहार हो सके इस हेतु से ही व्यवस्थाओं का निर्माण किया जाता है।  व्यवस्थाओं के निर्माण में और उनके क्रियान्वयन में भी जीवनदृष्टि ओतप्रोत रहे इसका ध्यान रखना होगा।&lt;br /&gt;
	 २.१ धर्म व्यवस्था    २.२ शिक्षा व्यवस्था	२.३ शासन व्यवस्था   २.४ समृद्धि व्यवस्था&lt;br /&gt;
३. संगठन : समाज संगठन और समाज की व्यवस्थाएँ एक दूसरे को पूरक पोषक होती हैं। लेकिन धर्म व्यवस्था, शिक्षा व्यवस्था और शासन व्यवस्था के अभाव में संगठन निर्माण करना अत्यंत कठिन हो जाता है। वास्तव में ये दोनों अन्योन्याश्रित होते हैं। समाज संगठन की जानकारी के लिये कृपया अध्याय १२ देखें।&lt;br /&gt;
	३.१ कुटुम्ब 			३.२ स्वभाव समायोजन			३.३ आश्रम			३.४ कौशल विधा		३.५ ग्राम				३.६ राष्ट्र&lt;br /&gt;
४. विज्ञान और तन्त्रज्ञान  : कृपया अध्याय ३९ देखें। &lt;br /&gt;
४.१ विकास और उपयोग नीति		४.२ सार्वत्रिकीकरण&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== परिवर्तन की योजना ==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== परिवर्तन का स्वरूप ===&lt;br /&gt;
वर्तमान स्वार्थपर आधारित जीवन के प्रतिमान के स्थानपर आत्मीयता याने कौटुम्बिक  भावनापर आधारित जीवन के प्रतिमान की प्रतिष्ठापना&lt;br /&gt;
१.१  सर्वे भवन्तु सुखिन:, देशानुकूल और कालानुकूल आदि के संदर्भ में दोनों प्रतिमानों को समझना&lt;br /&gt;
१.२ प्रतिमान का परिवर्तन&lt;br /&gt;
.२.१ सामाजिक व्यवस्थाओं का पुनर्निर्माण&lt;br /&gt;
१.२.२ समाज के संगठनों का परिष्कार/पुनरूत्थान या नवनिर्माण&lt;br /&gt;
१.२.३ तन्त्रज्ञान  का समायोजन / तन्त्रज्ञान  नीति / जीवन की इष्ट गति : वर्तमान में तन्त्रज्ञान  की विकास की गति से जीवन को जो गति प्राप्त हुई है उस के कारण सामान्य मनुष्य घसीटा जा रहा है। पर्यावरण सन्तुलन  और सामाजिकता दाँवपर लग गए हैं। ज्ञान, विज्ञान और तन्त्रज्ञान  ये तीनों बातें पात्र व्यक्ति को ही मिलनी चाहिये। बंदर के हाथ में पलिता नहीं दिया जाता। इस लिये किसी भी तन्त्रज्ञान के सार्वत्रिकीकरण से पहले उसके पर्यावरण, समाजजीवन और व्यक्ति जीवनपर होनेवाले परिणाम जानना आवश्यक है। हानिकारक तंत्रज्ञान का तो विकास भी नहीं करना चाहिये। किया तो वह केवल सुपात्र को ही अंतरित हो यह सुनिश्चित करना चाहिये।&lt;br /&gt;
ऐसी स्थिति में जीवन की इष्ट गति की ओर बढानेवाली तन्त्रज्ञान नीति का स्वीकार करना होगा। इष्ट गति के निकषों के लिये अध्याय ३९ में बताई कसौटि लगानी होगी।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== परिवर्तन की प्रक्रिया ===&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सामाजिक परिवर्तन भौतिक वस्तुओं के परिवर्तन जैसे सरल नहीं होते। भौतिक पदार्थों का एक निश्चित स्वभाव होता है। धर्म होता है। इसे ध्यान में रखकर भौतिक पदार्थों को ढाला जाता है। हर मानव का स्वभाव भिन्न होता है। भिन्न समयपर भी उसमें बदलाव आ सकता है। इसलिये सामाजिक परिवर्तन क्रांति से नहीं उत्क्रांति से ही किये जा सकते हैं। उत्क्रांति की गति धीमी होती है। होनेवाले परिवर्तनों से किसी की हानी नहीं हो या होनेवाली हानी न्यूनतम हो, परिवर्तन स्थाई हों, परिवर्तन से सबको लाभ मिले यह सब देखकर ही प्रक्रिया चलाई जाती है। सामाजिक परिवर्तनों के लिये नई पीढी से प्रारंभ करना यह सबसे अच्छा रास्ता है। लेकिन नई पीढी में व्यापक रूप से परिवर्तन के पहलुओं को स्थापित करने के लिये आवश्यक इतनी पुरानी पीढी के श्रेष्ठ जनों की संख्या आवश्यक है। ऐसे श्रेष्ठ जनों का वर्णन श्रीमद्भगवद्गीता में किया गया है -&lt;br /&gt;
यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जन: ।&lt;br /&gt;
स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते॥ (अध्याय ३ श्लोक २१)&lt;br /&gt;
इसलिये एक दृष्टि से देखा जाए तो यह प्रक्रिया समाज के प्रत्येक व्यक्तितक ले जाने की आवश्यकता नहीं होती। केवल समाज जीवन की सभी विधाओं के श्रेष्ठ लोगों के निर्माण की प्रक्रिया ही परिवर्तन की प्रक्रिया है। एक बार ये लोग निर्माण हो गये तो फिर परिवर्तन तेज याने ज्यामितीय गति से होने लगता है।&lt;br /&gt;
२.१ धीमी लेकिन अविश्रांत : हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि हमें सामाजिक परिवर्तन करना है। समाज एक जीवंत ईकाई होता है। जीवंत ईकाई में परिवर्तन हमेशा धीमी गति से, समग्रता से और अविरत करते रहने से होते हैं। कोई भी शीघ्रता या टुकडों में होनेवाले परिवर्तन हानिकारक होते हैं।&lt;br /&gt;
२.२ सभी क्षेत्रों में एकसाथ : समाज एक जीवंत ईकाई होने के कारण इसके सभी अंग किसी भी बात से एकसाथ प्रभावित होते हैं। प्रभाव का परिमाण कम अधिक होगा लेकिन प्रभाव सभीपर होता ही है। इसलिये परिवर्तन की प्रक्रिया टुकडों में अलग अलग या एक के बाद एक ऐसी नहीं होगी। परिवर्तन की प्रक्रिया धर्म, शिक्षा, शासन, अर्थ, न्याय, समाज संगठन आदि सभी क्षेत्रों में एकसाथ चलेगी। ऐसी प्रक्रिया का प्रारंभ होना बहुत कठिन होता है। लेकिन एकबार सभी क्षेत्रों में प्रारंभ हो जाता है तो फिर यह तेजी से गति प्राप्त कर लेती है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== परिवर्तन के कारक तत्व ===&lt;br /&gt;
३.१ शिक्षा : शिक्षा का दायरा बहुत व्यापक है। शिक्षा जन्म जन्मांतर चलनेवाली प्रक्रिया होती है। इस जन्म में शिक्षा गर्भधारणा से मृत्यूपर्यंत चलती है। आयु की अवस्था के अनुसार शिक्षा का स्वरूप बदलता है। &lt;br /&gt;
३.१.२ कुटुम्ब में शिक्षा : कुटुम्ब में शिक्षा का प्रारंभ गर्भधारणा से होता है। मनुष्य की ६०-७० प्रतिशत घडन तो कुटुम्ब में ही होती है। कुटुम्ब में रहकर वह कई बातें सीखता है। कौटुम्बिक भावना, कर्तव्य, सदाचार आदि की शिक्षा कुटुम्ब की ही जिम्मेदारी होती है। व्यवस्थाओं के साथ समायोजन, व्यवस्थाओं के स्वरूप आदि भी वह कुटुम्ब में ही अपने ज्येष्ठों से सीखता है। इंद्रियों के विकास की शिक्षा, व्यावसायिक कौशल भी वह कुटुम्ब में ही सीखता है। कुटुम्ब सामाजिकता की पाठशाला ही होता है। बडों का आदर, स्त्री का आदर आदि भी कुटुम्ब ही सिखाता है। &lt;br /&gt;
३.१.२ कुटुम्ब की शिक्षा : उसी प्रकार से कुटुम्ब के बारे में भी वह कई बातें सीखता है। उसकी व्यक्तिगत, कौटुम्बिक और सामाजिक आदतें बचपन में ही आकार लेतीं हैं। कुटुम्ब का महत्व, समाज में कौटुम्बिक भावना का महत्व, कौटुम्बिक व्यवस्थाओं का महत्व वह कुटुम्ब में सीखता है। भिन्न भिन्न स्वभावों के लोग एक छत के नीचे आत्मीयता से कैसे रहते हैं यह वह कुटुम्ब से ही सीखता है। लगभग सभी प्रकार से कुटुंब यह समाज का लघुरूप ही होता है। कुटुंब यह सामाजिकता की पाठशाला होती है।&lt;br /&gt;
३.१.३ विद्याकेन्द्र शिक्षा	: विद्याकेन्द्र की शिक्षा शास्त्रीय शिक्षा होती है। कुटुम्ब में सीखे हुए सदाचार के शास्त्रीय पक्ष को समझाने के लिये होती है। कुटुंब में सीखे हुए व्यावसायिक कौशलों को पैना बनाने के लिये होती है। कुटुंब में आत्मसात की हुई श्रेष्ठ परम्पराओं को अधिक उज्वल बनाने के तरीके सीखने के लिए होती है। अध्ययन का और कौशल का शास्त्रीय तरीका सिखने के लिये, अध्ययन को तेजस्वी बनाने के लिये होती है।&lt;br /&gt;
३.१.४ लोकशिक्षा : लोकशिक्षा भी समाज जीवन का एक आवश्यक पहलू है। विद्याकेन्द्र की शिक्षा के उपरान्त भी मनुष्य का मन कई बार भ्रमित हो जाता हाय, बुद्धि कुण्ठित हो जाती है। ऐसी स्थिति में लोकशिक्षा की व्यवस्था इस संभ्रम को, इस कुण्ठा को दूर करती है।&lt;br /&gt;
३.१.५ परंपरा निर्माण : अपने से अधिक श्रेष्ठ विरासत निर्माण करने की निरंतरता को श्रेष्ठ परंपरा कहते हैं। श्रेष्ठ परंपराओं के निर्माण की तीव्र इच्छा और पैने प्रयास समाज को श्रेष्ठ और चिरंजीवी बनाते हैं।&lt;br /&gt;
३.२ शासन 	&lt;br /&gt;
३.२.१ धर्मनिष्ठता : शासक धर्मशास्त्र के जानकार हों। धर्मशास्त्र के पालनकर्ता हों। धर्मशास्त्र के नियमों का प्रजा से अनुपालन करवाने में कुशल हों।	&lt;br /&gt;
३.२.२ धर्म व्यवस्था के साथ समायोजन : सदैव धर्म के जानकारों से अपना मूल्यांकन करवाएँ। धर्म के जानकारों की सूचनाओं का अनुपालन करें। अधर्म होने से प्रायश्चित्त और पश्चात्ताप के लिये उद्यत रहें।&lt;br /&gt;
३.३ धर्म नेतृत्व&lt;br /&gt;
३.३.१ धर्म के मार्गदर्शक : किसी का केवल धर्मशास्त्र का विशेषज्ञ होना पर्याप्त नहीं है। नि:स्वार्थ भाव, निर्भयता भी श्रेष्ठ धर्म के मार्गदर्शकों के लक्षण हैं।&lt;br /&gt;
३.३.२ धर्माचरणी : धर्म का मार्गदर्शन करनेवाले लोग अपने व्यवहार में भी धर्मयुक्त होना चाहिये।&lt;br /&gt;
३.३.३ विजीगिषु स्वभाववाले : धर्म का मार्गदर्शन करनेवाले लोगों के लिये विजीगिषु स्वभाव का होना आवश्यक है। कोई भी संकट आनेपर डगमगाएँ नहीं यह धर्म के मार्गदर्शकों के लिये आवश्यक है।&lt;br /&gt;
धर्मं के जानकारों का सबसे पहला कर्तव्य है कि वे वर्तमान काल के लिए धर्मशास्त्र या स्मृति की प्रस्तुति करें। यह स्मृति जीवन के सभी पहलुओं को व्यापनेवाली हो। इसकी व्यापकता को समझने की दृष्टि से एक रूपरेखा नीचे दे रहे हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== धर्मशास्त्र प्रस्तुति के लिये बिन्दु ==&lt;br /&gt;
() धर्म की व्याख्याएँ / धर्म की व्याप्ति / त्रिवर्ग की व्याप्ति : सर्वे भवन्तु सुखिन: लक्ष्य हेतु धर्म : संस्कृति &lt;br /&gt;
() व्यापक धर्मशास्त्र के प्रस्तुति की आवश्यकता: * पूर्व धर्मशास्त्रों की व्यापकता(?)  	* व्यापकता की आवश्यकता &lt;br /&gt;
() व्यक्तिगत धर्म / पञ्चविध (कोष) पुरुष धर्म / चतुर्विध पुरूषार्थ /स्वधर्म (वर्णधर्म)&lt;br /&gt;
शरीरधर्म 	२. मन-धर्म 	३. बुद्धि-धर्म 	४. चित्त-धर्म &lt;br /&gt;
() सामाजिक संबंधों में धर्म &lt;br /&gt;
व्यक्ति-व्यक्ति  : पुरूष-पुरूष या स्त्री-स्त्री 			१.१ पारिवारिक रिश्ते 	१.२ पड़ोसी 		१.३ अतिथि  	१.४ शत्रु/विरोधक 		१.५ मित्र/सहायक 	१.६ सहकारी 		१.७ अपरिचित 	१.८ मालिक/नौकर 		१.९ चरित्रहीन स्त्री/पुरूष 	१.१० व्यसनी 		१,११ जरूरतमंद 	१.१२ समव्यवसायी 		१.१३ भिन्न व्यवसायी 	१.१४ याचक 		१.१५ भिन्न भाषी १.१६ विक्रेता\क्रेता    		१.१७ भिन्न राष्ट्रीय &lt;br /&gt;
व्यक्ति-व्यक्ति : पुरूष-स्त्री 				१.१ पारिवारिक रिश्ते 	१.२ पड़ोसी 		१.३ अतिथि  	१.४ शत्रु/विरोधक 		१.५ मित्र/सहायक 	१.६ सहकारी 		१.७ अपरिचित 	१.८ मालिक/नौकर 		१.९ चरित्रहीन स्त्री/पुरूष 	१.१० व्यसनी 		१,११ जरूरतमंद 	१.१२ समव्यवसायी 		१.१३ भिन्न व्यवसायी 	१.१४ याचक 		१.१५ भिन्न भाषी १.१६ विक्रेता\क्रेता    		१.१७ भिन्न राष्ट्रीय &lt;br /&gt;
व्यक्ति-समाज :		३.१ व्यक्ति-परिवार 	३.२ व्यति-जाति 		३.३ पड़ोसी 			३.४ सामाजिक संगठन  	३.५ व्यक्ति-व्यवस्था 	३.६ व्यक्ति-राष्ट्र 		३.७ व्यक्ति-विश्व समाज 		३.८ व्यक्ति भिन्न भाषी 	३.९ परप्रांतीय 		३.१० परदेसी &lt;br /&gt;
समाज-समाज : 	४.१ अंतर्राष्ट्रीय : ४.१.१ शत्रु 	४.१.२ मित्र 	४.१.३ तटस्थ 		&lt;br /&gt;
४.२ अंतर्देशीय	४.१.१ प्रांत-प्रांत 	४.१.२ जनपद-जनपद 	४.१.३ भाषिक समूह  	४.१.४ पंथ समूह  	४.१.५ राष्ट्रीय समूह 	४.१.६ अराष्ट्रीय समूह 		४.१.७ राष्ट्रद्रोही समूह 	४.१.८ विदेशी 		४.१.९ समव्यवासायी  	४.१.१० जाति-जाति 		४.१.११ परिवार परिवार &lt;br /&gt;
()  सृष्टिगत सम्बन्धों में धर्म  &lt;br /&gt;
	१. मनुष्य-अन्य जीव :													१.१ मनुष्य-पालतू प्राणी :  १.१.१ शाकाहारी 	१.१.२ मांसाहारी 								१.२ मनुष्य अन्य प्राणी : 	१.२.१ थलचर : 	१.२.१.१ शाकाहारी 	१.२.१.२ मांसाहारी 							१.२.२ जलचर 		और 		१.२.३ नभचर 	&lt;br /&gt;
१.३ मनुष्य-वनस्पति : 	१.३.१ जमीन के नीचे 	१.३.२ जमीन के ऊपर 	१.३.३ वनस्पति/औषधी 					१.३.४ खानेयोग्य/अन्न 	१.३.५ अखाद्य/जहरीली 	१.३.६ नशीली		१.४ मनुष्य-कृमि/कीटक/सूक्ष्म जीव 		१.४.१ सहायक 		१.४.२ हानिकारक	      २. मनुष्य-जड़ प्रकृति / पंचमहाभूत 									२.१ अनवीकरणीय/खनिज 	२.१.१ ठोस 	२.१.२ द्रव 	२.१.३ वायु (इंधन)  		२.२ नवीकरणीय 	: २.२.१ वायु/हवा 	२.२.२ जल 	२.२.३ सूर्यप्रकाश 		२.२.४ लकड़ी&lt;br /&gt;
() आपद्धर्म :	१. प्राकृतिक आपदा 		२. मानव निर्मित आपदा (लगभग उपर्युक्त सभी विषयों में)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== परिवर्तन के पुरोधा ==&lt;br /&gt;
उपर्युक्त बिन्दु २ में बताए गए श्रेष्ठ जन ही परिवर्तन के पुरोधा होंगे। इनका प्रमाण समाज में मुष्किल से ५-७ प्रतिशत ही पर्याप्त होता है। ऐसे श्रेष्ठ जनों में निम्न वर्ग के लोग आते हैं।	&lt;br /&gt;
४.१ शिक्षक : शिक्षक ज्ञानी, त्यागी, कुशल, समाज हित के लिए समर्पित, धर्म का जानकार, समाज को घडने की सामर्थ्य रखनेवाला होता है। नई पीढी जो परिवर्तन का अधिक सहजता से स्वीकार कर सकती है उसको घडना शिक्षक का काम होता है। इसलिये परिवर्तन की प्रक्रिया का मुख्य पुरोधा शिक्षक ही होता है।	&lt;br /&gt;
४.२ श्रेष्ठ जन :यहाँ श्रेष्ठ जनों से मतलब भिन्न भिन्न सामाजिक गतिविधियों में जो अग्रणी लोग हैं उनसे है।	&lt;br /&gt;
४.३ सांप्रदायिक संगठनों के प्रमुख : आजकल समाज का एक बहुत बडा वर्ग जिसमें शिक्षित वर्ग भी है, भिन्न भिन्न संप्रदायों से जुडा है। उन संप्रदायों के प्रमुख भी इस परिवर्तन की प्रक्रिया का एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण हिस्सा बनने की शक्ति रखते हैं।	&lt;br /&gt;
४.४ लोकशिक्षा के माध्यम : कीर्तनकार, कथाकार, प्रवचनकार, नाटक मंडलि, पुरोहित या उपाध्याय, साधू, बैरागी, सिंहस्थ या कुंभ जैसे मेले, यात्राएँ आदि लोकशिक्षा के माध्यम हुआ करते थे। वर्तमान में ये सब कमजोर और दिशाहीन हो गए हैं। एक ओर इनमें से जिनको पुनर्जीवित कर सकते हैं उन्हें करना। नए आयाम भी जोडे जा सकते हैं। जैसे अभी लगभग देढ दशक पूर्व महाराष्ट्र में प्रारंभ हुई नव-वर्ष स्वागत यात्राएँ आदि।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== अंतर्निहित सुधार व्यवस्था ==&lt;br /&gt;
काल के प्रवाह में समाज में हो रहे परिवर्तन और मनुष्य की स्खलनशीलता के कारण बढनेवाला अधर्माचरण ये दो बातें ऐसीं हैं जो किसी भी श्रेष्ठतम समाज को भी नष्ट कर देतीं हैं। इस दृष्टि से जागरूक ऐसे शिक्षक और धर्म के मार्गदर्शक साथ में मिलकर समाज की अंतर्निहित सुधार व्यवस्था बनाते हैं। अपनी संवेदनशीलता और समाज के निरंतर बारीकी से हो रहे अध्ययन के कारण इन्हें संकटों का पूर्वानुमान हो जाता है। अपने निरीक्षणों के आधारपर अपने लोकसंग्रही स्वभाव से ये लोगों को भी संकटों से ऊपर उठने के लिये तैयार करते हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== परिवर्तन की नीति ==&lt;br /&gt;
प्रारंभ में विरोध को आमंत्रण नहीं देना। संघर्ष में शक्ति का अपव्यय नहीं करना। जो आज कर सकते हैं उसे करते जाना। जो कल करने की आवश्यकता है उस के लिये परिस्थिति निर्माण करना। परिस्थिति के निर्माण होते ही आगे बढना।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== परिवर्तन में अवरोध और उनका निराकरण ==&lt;br /&gt;
 : शासनाधिष्ठित समाज में स्वार्थ के आधारपर परिवर्तन सरल और तेज गति से होता है। हिटलरने १५-२० वर्षों में ही जर्मनी को एक समर्थ राष्ट्र के रूप में खड़ा कर दिया था। लेकिन धर्म पर आधारित जीवन के प्रतिमान में परिवर्तन की गति धीमी और मार्ग कठिन होता है। स्थाई परिवर्तन और वह भी कौटुम्बिक भावना के आधारपर, तो धीरे धीरे ही होता है। &lt;br /&gt;
७.१ अंतर्देशीय 	&lt;br /&gt;
७.१.१ मानवीय जड़ता : परिवर्तन का आनंद से स्वागत करनेवाले लोग समाज में अल्पसंख्य ही होते हैं। सामान्यत: युवा वर्ग ही परिवर्तन के लिए तैयार होता है। इसलिए युवा वर्ग को इस परिवर्तन की प्रक्रिया में सहभागी बनाना होगा। परिवर्तन की प्रक्रिया में युवाओं को सम्मिलित करते जाने से दो तीन पीढ़ियों में परिवर्तन का चक्र गतिमान हो जाएगा।&lt;br /&gt;
७.१.२ विपरीत शिक्षा : जैसे जैसे भारतीय शिक्षा का विस्तार समाज में होगा वर्तमान की विपरीत शिक्षा का अपने आप ही क्रमश: लोप होगा।	   &lt;br /&gt;
७.१.३ मजहबी मानसिकता : भारतीय याने धर्म की शिक्षा के उदय और विस्तार के साथ ही मजहबी शिक्षा और उसका प्रभाव भी शनै: शनै: घटता जाएगा। मजहबों की वास्तविकता को भी उजागर करना आवश्यक है। &lt;br /&gt;
७.१.४ धर्म के ठेकेदार : जैसे जैसे धर्म के जानकार और धर्म के अनुसार आचरण करनेवाले लोग समाज में दिखने लगेंगे, धर्म के तथाकथित ठेकेदारों का प्रभाव कम होता जाएगा। &lt;br /&gt;
७.१.५ शासन तंत्र : इस परिवर्तन की प्रक्रिया में धर्म के जानकारों के बाद शासन की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण होगी। धर्माचरणी लोगों को समर्थन, सहायता और संरक्षण देने का काम शासन को करना होगा। इस के लिए शासक भी धर्म का जानकार और धर्मनिष्ठ हो, यह भी आवश्यक है। धर्म के जानकारों को यह सुनिश्चित करना होगा की शासक धर्माचरण करनेवाले और धर्म के जानकर हों।&lt;br /&gt;
७.१.६ जीवन का अभारतीय प्रतिमान : जीवन के सभी क्षेत्रों में एकसाथ जीवन के प्रतिमान के परिवर्तन की प्रक्रिया को चलाना यह धर्म के जानकारों की जिम्मेदारी होगी। शिक्षा की भूमिका इसमें सबसे महत्वपूर्ण होगी। शिक्षा के माध्यम से समूचे जीवन के भारतीय प्रतिमान की रुपरेखा और प्रक्रिया को समाजव्यापी बनाना होगा। धर्मं-शरण शासन इसमें सहायता करेगा।&lt;br /&gt;
७.१.७ तन्त्रज्ञान  समायोजन : तन्त्रज्ञान के क्षेत्र में भारत के सामने दोहरी चुनौती होगी। एक ओर तो विश्व में जो तन्त्रज्ञान के विकास की होड़ लगी है उसमें अपनी विशेषताओं के साथ अग्रणी रहना। इस दृष्टि से विकास हेतु कुछ तन्त्रज्ञान निम्न हो सकते हैं।&lt;br /&gt;
- शून्य प्रदुषण रासायनिक उद्योग।&lt;br /&gt;
- सस्ती सौर उर्जा।&lt;br /&gt;
- प्रकृति में सहजता से घुलनशील प्लैस्टिक का निर्माण। &lt;br /&gt;
- औरों द्वारा प्रक्षेपित शस्त्रों/अणु-शस्त्रों का शमन करने का तंत्रज्ञान। ...............आदि &lt;br /&gt;
और दूसरी ओर वैकल्पिक विकेंद्रीकरणपर आधारित तन्त्रज्ञान का विकास कर उसे विश्व में प्रतिष्ठित करना। इस प्रकार के तन्त्रज्ञान में निम्न प्रकार के तन्त्रज्ञान होंगे।&lt;br /&gt;
- कौटुम्बिक उद्योगों के लिये, स्थानिक संसाधनों के उपयोग के लिए तन्त्रज्ञान  &lt;br /&gt;
- भिन्न भिन्न कार्यों के लिये पशु-उर्जा के अधिकाधिक उपयोग के लिये तंत्रज्ञान&lt;br /&gt;
- नविकरणीय प्राकृतिक संसाधनों से विविध पदार्थों के निर्माण से आवश्यकताओं की पूर्ति तथा संसाधनों के पुनर्भरण के लिये सरल तन्त्रज्ञान का विकास   &lt;br /&gt;
- मानव की प्राकृतिक क्षमताओं का विकास करनेवाली प्रक्रियाओं का अनुसंधान। ......... आदि &lt;br /&gt;
७.२ अंतर्राष्ट्रीय 	&lt;br /&gt;
७.२.१ मजहबी विस्तारवादी मानसिकता : वर्तमान में यह मुख्यत: ३ प्रकार की है। ईसाई, मुस्लिम और वामपंथी। यह तीनों ही विचारधाराएँ अधूरी हैं, एकांगी हैं। यह तो इन के सम्मुख ‘सर्वे भवन्तु सुखिन:’ को लेकर कोई चुनौती खड़ी नहीं होने से इन्हें विश्व में विस्तार का अवसर मिला है। जैसे ही ‘सर्वे भवन्तु सुखिन:’ का विचार लेकर भारत एक वैश्विक शक्ति के रूप में खड़ा होगा इनके पैरोंतले की जमीन खिसकने लगेगी। &lt;br /&gt;
७.२.२ आसुरी महत्वाकांक्षा : ऊपर जो बताया गया है वह, आसुरी महत्वाकांक्षा रखनेवाली वैश्विक शक्तियों के लिये भी लागू है। आसुरी महत्वाकांक्षाओं को परास्त करने की परंपरा भारत में युगों से रही है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== परिवर्तन के लिये समयबध्द करणीय कार्य ==&lt;br /&gt;
 :  &lt;br /&gt;
समूचे जीवन के प्रतिमान का परिवर्तन यह एक बहुत बृहद् और जटिल कार्य है। इस के लिये इसे सामाजिक अभियान का रूप देना होगा। समविचारी लोगों को संगठित होकर सहमति से और चरणबध्द पध्दति से प्रक्रिया को आगे बढाना होगा। बड़े पैमानेपर जीवन के हर क्षेत्र में जीवन के भारतीय प्रतिमान की समझ रखनेवाले और कृतीशील ऐसे लोग याने आचार्य निर्माण करने होंगे। परिवर्तन के चरण एक के बाद एक और एक के साथ सभी इस पध्दति से चलेंगे। जैसे दूसरे चरण के काल में ५० प्रतिशत शक्ति और संसाधन दूसरे चरणके निर्धारित विषयपर लगेंगे। और १२.५-१२.५ प्रतिशत शक्ति और संसाधन चरण १, ३, ४ और ५ में प्रत्येकपर लगेंगे।&lt;br /&gt;
१. समविचारी लोगों का ध्रुवीकरण : जिन्हें प्रतिमान के परिवर्तन की आस है और समझ भी है ऐसे समविचारी, सहचित्त लोगों का ध्रुवीकरण करना होगा। उनमें एक व्यापक सहमति निर्माण करनी होगी। अपने अपने कार्यक्षेत्र में क्या करना है इसका स्पष्टीकरण करना होगा।&lt;br /&gt;
२. अभियान के चरण : अभियान को चरणबध्द पध्दति से चलाना होगा। १२ वर्षों के ये पाँच चरण होंगे। ऐसी यह ६० वर्ष की योजना होगी। यह प्रक्रिया तीन पीढीतक चलेगी। तीसरी पीढी में परिवर्तन के फल देखने को मिलेंगे। लेकिन तबतक निष्ठा से और धैर्य से अभियान को चलाना होगा। निरंतर मूल्यांकन करना होगा। राह भटक नहीं जाए इसके लिये चौकन्ना रहना होगा।&lt;br /&gt;
२.१ अध्ययन और अनुसंधान : जीवन का दायरा बहुत व्यापक होता है। अनगिनत विषय इसमें आते हैं। इसलिये प्रतिमान के बदलाव से पहले हमें दोनों प्रतिमानों के विषय में और विशेषत: जीवन के भारतीय प्रतिमान के विषय में बहुत गहराई से अध्ययन करना होगा। मनुष्य की इच्छाओं का दायरा, उनकी पूर्ति के लिये वह क्या क्या कर सकता है आदि का दायरा अति विशाल है। इन दोनों को धर्म के नियंत्रण में ऐसे रखा जाता है इसका भी अध्ययन अनिवार्य है। मनुष्य के व्यक्तित्व को ठीक से समझना, उसके शरीर, मन, बुध्दि, चित्त, अहंकार आदि बातों को समझना, कर्मसिध्दांत को समझना, जन्म जन्मांतर चलने वाली शिक्षा की प्रक्रिया को समझना विविध विषयों के अंगांगी संबंधों को समझना, प्रकृति के रहस्यों को समझना आदि अनेकों ऐसी बातें हैं जिनका अध्ययन हमें करना होगा। इनमें से कई विषयों के संबंध में हमारे पूर्वजों ने विपुल साहित्य निर्माण किया था। उसमें से कितने ही साहित्य को जाने अंजाने में प्रक्षेपित किया गया है। इस प्रक्षिप्त हिस्से को समझ कर अलग निकालना होगा। शुध्द भारतीय तत्वोंपर आधारित ज्ञान को प्राप्त करना होगा। अंग्रेजों ने भारतीय साहित्य, इतिहास के साथ किये खिलवाड, भारतीय समाज में झगडे पैदा करने के लिये निर्मित साहित्य को अलग हटाकर शुध्द भारतीय याने एकात्म भाव की या कौटुम्बिक भाव की जितनी भी प्रस्तुतियाँ हैं उनका अध्ययन करना होगा। मान्यताओं, व्यवहार सूत्रों, संगठन निर्माण और व्यवस्था निर्माण की प्रक्रिया को समझना होगा।     &lt;br /&gt;
२.२ लोकमत परिष्कार : अध्ययन से जो ज्ञान उभरकर सामने आएगा उसे लोगोंतक ले जाना होगा। लोगों का प्रबोधन करना होगा। उन्हें फिर से समग्रता से और एकात्मता से सोचने और व्यवहार करने का तरीका बताना होगा। उन्हें उनकी सामाजिक जिम्मेदारी का समाजधर्म का अहसास करवाना होगा। वर्तमान की परिस्थितियों से सामान्यत: कोई भी खुश नहीं है। लेकिन जीवन का भारतीय प्रतिमान ही  उनकी कल्पना के अच्छे दिनों का वास्तव है यह सब के मन में स्थापित करना होगा।	         &lt;br /&gt;
२.३ संयुक्त कुटुम्ब : कुटुम्ब ही समाजधर्म सीखने की पाठशाला होता है। संयुक्त कुटुम्ब तो वास्तव में समाज का लघुरूप ही होता है। सामाजिक समस्याओं में से लगभग ७० प्रतिशत समस्याओं को तो केवल अच्छा संयुक्त कुटुम्ब ही निर्मूल कर देता है। समाज जीवन के लिये श्रेष्ठ लोगों को जन्म देने का काम, श्रेष्ठ संस्कार देने का काम, अच्छी आदतें डालने काम आजकल की फॅमिली पध्दति नहीं कर सकती। जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में जो तेजस्वी नेतृत्व का अभाव निर्माण हो गया है उसे दूर करना यह भारतीय मान्यताओं के अनुसार चलाए जानेवाले संयुक्त परिवारों में ही हो सकता है। इसलिये समाज का नेतृत्व करेंगे ऐसे श्रेष्ठ बालकों को जन्म देने के प्रयास तीसरे चरण में होंगे।&lt;br /&gt;
२.४ शिक्षक/धर्मज्ञ और शासक निर्माण : समाज परिवर्तन में शिक्षक की और शासक की ऐसे दोनों की भुमिका अत्यंत महत्वपूर्ण होती है। संयुक्त परिवारों में जन्म लिये बच्चों में से अब श्रेष्ठ धर्म के मार्गदर्शक, शिक्षक और शासक निर्माण करने की स्थिति होगी। ऐसे लोगों को समर्थन और सहायता देनेवाले कुटुम्ब और दूसरे चरण में निर्माण किये समाज के परिष्कृत विचारोंवाले सदस्य अब कुछ मात्रा में उपलब्ध होंगे।	   &lt;br /&gt;
२.५ संगठन और व्यवस्थाओं की प्रतिष्ठापना : श्रेष्ठ धर्म के अधिष्ठाता/मार्गदर्शक, सामर्थ्यवान शिक्षक और कुशल शासक अब प्रत्यक्ष संगठन का सशक्तिकरण और व्यवस्थाओं का निर्माण करेंगे।&lt;br /&gt;
==References==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;references /&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अन्य स्रोत:&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[Category:Bhartiya Jeevan Pratiman (भारतीय जीवन प्रतिमान)]]&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Dilipkelkar</name></author>
	</entry>
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		<id>https://dharmawiki.org/index.php?title=Planning_For_Change_(%E0%A4%AA%E0%A4%B0%E0%A4%BF%E0%A4%B5%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%A4%E0%A4%A8_%E0%A4%95%E0%A5%80_%E0%A4%AF%E0%A5%8B%E0%A4%9C%E0%A4%A8%E0%A4%BE)&amp;diff=119329</id>
		<title>Planning For Change (परिवर्तन की योजना)</title>
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		<updated>2019-05-30T10:32:36Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Dilipkelkar: /* अंतर्निहित सुधार व्यवस्था */&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{One source|date=January 2019}}&lt;br /&gt;
[[Template:Cleanup reorganize Dharmawiki Page]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
परिवर्तन की योजना को समझने के लिए हमें पहले निम्न बातें फिर से स्मरण करनी होंगी ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जीवन के भारतीय प्रतिमान की जानकारी के लिए - &lt;br /&gt;
१. जीवनदृष्टि/व्यवहार : भारतीय जीवनदृष्टि और जीवनशैली के विषय में जानकारी के लिये कृपया अध्याय ७  में देखें। 		&lt;br /&gt;
२. भारतीय जीवन के प्रतिमान के समाज संगठनों की जानकारी हमने अध्याय १३ से २० में प्राप्त की है।&lt;br /&gt;
३. व्यवस्था समूह : व्यवस्था समूह का ढाँचा जीवनदृष्टि से सुसंगत होना चाहिए। कृपया व्यवस्था समूह के ढाँचे के लिये अध्याय २२ में और जानकारी के लिए अध्याय २५ में देखें।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== समस्या मूलों के निराकरण की नीति ==&lt;br /&gt;
समस्या मूल नष्ट करने से तात्पर्य समस्या मूलोंपर आघात से नहीं है। समस्याएँ निर्माण ही नहीं हों ऐसी परिस्थितियों, ऐसे समाज संगठनों और ऐसी व्यवस्थाओं के निर्माण से है। निराकरण की प्रक्रिया के ३ चरण होंगे। समस्याओं को और परिवर्तन के स्वरूप को समझना, निराकरण की नीति तय करना और निराकरण का क्रियान्वयन करना। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== परिवर्तन के स्वरूप को समझना ==&lt;br /&gt;
समस्या का मूल जीवन के प्रतिमान के परिवर्तन में है। प्रतिमान का आधार समाज की जीवनदृष्टि होती है। व्यवहार, संगठन और व्यवस्थाएँ तो जीवनदृष्टि के आधारपर ही तय होते हैं। इसलिये परिवर्तन की प्रक्रिया में जीवनदृष्टि के परिवर्तन की प्रक्रिया को प्राथमिकता देनी होगी। व्यवहार में सुसंगतता आए इसलिये करणीय अकरणीय विवेक को सार्वत्रिक करना होगा। दूसरे क्रमांकपर संगठन और व्यवस्थाओं में परिवर्तन की प्रक्रिया चलेगी। व्यवस्था परिवर्तन की इस प्रक्रिया में समग्रता और एकात्मता के संदर्भ में व्यवस्था विशेष का आधार बनाने के लिये विषय की सैध्दांतिक प्रस्तुति करनी होगी। जैसे शासन व्यवस्था में यदि उचित परिवर्तन करना है तो पहले राजशास्त्र की सैध्दांतिक प्रस्तुति करना आवश्यक है। समृद्धि व्यवस्था में परिवर्तन करने के लिये समृद्धिशास्त्र की सैध्दांतिक प्रस्तुति करनी होगी। इन सैध्दांतिक प्रस्तुतियों को प्रयोग सिध्द करना होगा। प्रयोगों के आधारपर इन प्रस्तुतियों में उचित परिवर्तन करते हुए आगे बढना होगा। यह काम प्राथमिकता से धर्म के जानकारों का है। दूसरे क्रमांक की जिम्मेदारी शिक्षकों की है। शिक्षक वर्ग ही धर्म को सार्वत्रिक करता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== निराकरण की नीति ==&lt;br /&gt;
समस्याएँ इतनी अधिक और पेचिदा हैं कि इनका निराकरण अब संभव नहीं है, ऐसा कई विद्वान 	मानते हैं। हमने जो करणीय और अकरणीय विवेक को समझा है उसके अनुसार कोई भी बात असंभव नहीं होती। ऊपरी तौरपर असंभव लगनेपर भी उसे संभव चरणों में बाँटकर संपन्न किया जा सकता है।&lt;br /&gt;
इस के लिये नीति के तौरपर हमारा व्यवहार निम्न प्रकार का होना चागिये।&lt;br /&gt;
- सबसे पहले तो यह हमेशा ध्यान में रखना कि यह पूरे समाज जीवन के प्रतिमान के परिवर्तन का विषय है। इसे परिवर्तन के लिये कई पीढियों का समय लग सकता है। भारत वर्ष के दीर्घ इतिहास में समाज ने कई बार उत्थान और पतन के दौर अनुभव किये हैं। बारबार भारतीय समाज ने उत्थान किया है। &lt;br /&gt;
- परिवर्तन की प्रक्रिया को संभाव्य चरणों में बाँटना।&lt;br /&gt;
- उसमें आज जो हो सकता है उसे कर डालना।&lt;br /&gt;
- आज जिसे करना कठिन लगता है उसके लिये परिस्थितियाँ बनाते जाना। परिस्थितियाँ बनते ही उसे    करना। &lt;br /&gt;
- प्रारंभ में जबतक परिवर्तन की प्रक्रिया ने गति नहीं पकडी है, यथासंभव कोई विरोध मोल नहीं लेना। &lt;br /&gt;
- इसी प्रकार से एक एक चरण को संभव बनाते हुए आगे बढ़ाते जाना।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== समस्या मूलों का निराकरण ==&lt;br /&gt;
वास्तव में समस्या मूलों को नष्ट करना यह शब्दप्रयोग ठीक नहीं है। उचित प्रतिमान की प्रतिष्ठापना के साथ ही गलत प्रतिमान का अंत अपने आप होता है। जो सर्वहितकारी है, उचित है, श्रेष्ठ है, उसकी प्रतिष्ठापना ही परिवर्तन की प्रक्रिया का स्वरूप होगा। स्वाभाविक जडता के कारण कुछ कठिनाईयाँ तो आएँगी। लेकिन गलत प्रतिमान को नष्ट करने के लिये अलग से शक्ति लगाने की आवश्यकता नहीं है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== समस्या मूल नष्ट करने हेतु धर्म के जानकारों के मार्गदर्शन में शिक्षा की व्याप्ति ==&lt;br /&gt;
१. जीवनदृष्टि की शिक्षा : जीवनदृष्टि की शिक्षा मुख्यत: कामनाओं और कामनाओं की पूर्ति के प्रयास, धन, साधन और संसाधनों को धर्म के दायरे में रखने की शिक्षा ही है। पुरूषार्थ चतुष्टय की या त्रिवर्ग की शिक्षा ही है।&lt;br /&gt;
२. व्यवस्थाएँ : जीवनदृष्टि के अनुसार व्यवहार हो सके इस हेतु से ही व्यवस्थाओं का निर्माण किया जाता है।  व्यवस्थाओं के निर्माण में और उनके क्रियान्वयन में भी जीवनदृष्टि ओतप्रोत रहे इसका ध्यान रखना होगा।&lt;br /&gt;
	 २.१ धर्म व्यवस्था    २.२ शिक्षा व्यवस्था	२.३ शासन व्यवस्था   २.४ समृद्धि व्यवस्था&lt;br /&gt;
३. संगठन : समाज संगठन और समाज की व्यवस्थाएँ एक दूसरे को पूरक पोषक होती हैं। लेकिन धर्म व्यवस्था, शिक्षा व्यवस्था और शासन व्यवस्था के अभाव में संगठन निर्माण करना अत्यंत कठिन हो जाता है। वास्तव में ये दोनों अन्योन्याश्रित होते हैं। समाज संगठन की जानकारी के लिये कृपया अध्याय १२ देखें।&lt;br /&gt;
	३.१ कुटुम्ब 			३.२ स्वभाव समायोजन			३.३ आश्रम			३.४ कौशल विधा		३.५ ग्राम				३.६ राष्ट्र&lt;br /&gt;
४. विज्ञान और तन्त्रज्ञान  : कृपया अध्याय ३९ देखें। &lt;br /&gt;
४.१ विकास और उपयोग नीति		४.२ सार्वत्रिकीकरण&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== परिवर्तन की योजना ==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== परिवर्तन का स्वरूप ===&lt;br /&gt;
वर्तमान स्वार्थपर आधारित जीवन के प्रतिमान के स्थानपर आत्मीयता याने कौटुम्बिक  भावनापर आधारित जीवन के प्रतिमान की प्रतिष्ठापना&lt;br /&gt;
१.१  सर्वे भवन्तु सुखिन:, देशानुकूल और कालानुकूल आदि के संदर्भ में दोनों प्रतिमानों को समझना&lt;br /&gt;
१.२ प्रतिमान का परिवर्तन&lt;br /&gt;
.२.१ सामाजिक व्यवस्थाओं का पुनर्निर्माण&lt;br /&gt;
१.२.२ समाज के संगठनों का परिष्कार/पुनरूत्थान या नवनिर्माण&lt;br /&gt;
१.२.३ तन्त्रज्ञान  का समायोजन / तन्त्रज्ञान  नीति / जीवन की इष्ट गति : वर्तमान में तन्त्रज्ञान  की विकास की गति से जीवन को जो गति प्राप्त हुई है उस के कारण सामान्य मनुष्य घसीटा जा रहा है। पर्यावरण सन्तुलन  और सामाजिकता दाँवपर लग गए हैं। ज्ञान, विज्ञान और तन्त्रज्ञान  ये तीनों बातें पात्र व्यक्ति को ही मिलनी चाहिये। बंदर के हाथ में पलिता नहीं दिया जाता। इस लिये किसी भी तन्त्रज्ञान के सार्वत्रिकीकरण से पहले उसके पर्यावरण, समाजजीवन और व्यक्ति जीवनपर होनेवाले परिणाम जानना आवश्यक है। हानिकारक तंत्रज्ञान का तो विकास भी नहीं करना चाहिये। किया तो वह केवल सुपात्र को ही अंतरित हो यह सुनिश्चित करना चाहिये।&lt;br /&gt;
ऐसी स्थिति में जीवन की इष्ट गति की ओर बढानेवाली तन्त्रज्ञान नीति का स्वीकार करना होगा। इष्ट गति के निकषों के लिये अध्याय ३९ में बताई कसौटि लगानी होगी।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== परिवर्तन की प्रक्रिया ===&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सामाजिक परिवर्तन भौतिक वस्तुओं के परिवर्तन जैसे सरल नहीं होते। भौतिक पदार्थों का एक निश्चित स्वभाव होता है। धर्म होता है। इसे ध्यान में रखकर भौतिक पदार्थों को ढाला जाता है। हर मानव का स्वभाव भिन्न होता है। भिन्न समयपर भी उसमें बदलाव आ सकता है। इसलिये सामाजिक परिवर्तन क्रांति से नहीं उत्क्रांति से ही किये जा सकते हैं। उत्क्रांति की गति धीमी होती है। होनेवाले परिवर्तनों से किसी की हानी नहीं हो या होनेवाली हानी न्यूनतम हो, परिवर्तन स्थाई हों, परिवर्तन से सबको लाभ मिले यह सब देखकर ही प्रक्रिया चलाई जाती है। सामाजिक परिवर्तनों के लिये नई पीढी से प्रारंभ करना यह सबसे अच्छा रास्ता है। लेकिन नई पीढी में व्यापक रूप से परिवर्तन के पहलुओं को स्थापित करने के लिये आवश्यक इतनी पुरानी पीढी के श्रेष्ठ जनों की संख्या आवश्यक है। ऐसे श्रेष्ठ जनों का वर्णन श्रीमद्भगवद्गीता में किया गया है -&lt;br /&gt;
यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जन: ।&lt;br /&gt;
स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते॥ (अध्याय ३ श्लोक २१)&lt;br /&gt;
इसलिये एक दृष्टि से देखा जाए तो यह प्रक्रिया समाज के प्रत्येक व्यक्तितक ले जाने की आवश्यकता नहीं होती। केवल समाज जीवन की सभी विधाओं के श्रेष्ठ लोगों के निर्माण की प्रक्रिया ही परिवर्तन की प्रक्रिया है। एक बार ये लोग निर्माण हो गये तो फिर परिवर्तन तेज याने ज्यामितीय गति से होने लगता है।&lt;br /&gt;
२.१ धीमी लेकिन अविश्रांत : हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि हमें सामाजिक परिवर्तन करना है। समाज एक जीवंत ईकाई होता है। जीवंत ईकाई में परिवर्तन हमेशा धीमी गति से, समग्रता से और अविरत करते रहने से होते हैं। कोई भी शीघ्रता या टुकडों में होनेवाले परिवर्तन हानिकारक होते हैं।&lt;br /&gt;
२.२ सभी क्षेत्रों में एकसाथ : समाज एक जीवंत ईकाई होने के कारण इसके सभी अंग किसी भी बात से एकसाथ प्रभावित होते हैं। प्रभाव का परिमाण कम अधिक होगा लेकिन प्रभाव सभीपर होता ही है। इसलिये परिवर्तन की प्रक्रिया टुकडों में अलग अलग या एक के बाद एक ऐसी नहीं होगी। परिवर्तन की प्रक्रिया धर्म, शिक्षा, शासन, अर्थ, न्याय, समाज संगठन आदि सभी क्षेत्रों में एकसाथ चलेगी। ऐसी प्रक्रिया का प्रारंभ होना बहुत कठिन होता है। लेकिन एकबार सभी क्षेत्रों में प्रारंभ हो जाता है तो फिर यह तेजी से गति प्राप्त कर लेती है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== परिवर्तन के कारक तत्व ===&lt;br /&gt;
३.१ शिक्षा : शिक्षा का दायरा बहुत व्यापक है। शिक्षा जन्म जन्मांतर चलनेवाली प्रक्रिया होती है। इस जन्म में शिक्षा गर्भधारणा से मृत्यूपर्यंत चलती है। आयु की अवस्था के अनुसार शिक्षा का स्वरूप बदलता है। &lt;br /&gt;
३.१.२ कुटुम्ब में शिक्षा : कुटुम्ब में शिक्षा का प्रारंभ गर्भधारणा से होता है। मनुष्य की ६०-७० प्रतिशत घडन तो कुटुम्ब में ही होती है। कुटुम्ब में रहकर वह कई बातें सीखता है। कौटुम्बिक भावना, कर्तव्य, सदाचार आदि की शिक्षा कुटुम्ब की ही जिम्मेदारी होती है। व्यवस्थाओं के साथ समायोजन, व्यवस्थाओं के स्वरूप आदि भी वह कुटुम्ब में ही अपने ज्येष्ठों से सीखता है। इंद्रियों के विकास की शिक्षा, व्यावसायिक कौशल भी वह कुटुम्ब में ही सीखता है। कुटुम्ब सामाजिकता की पाठशाला ही होता है। बडों का आदर, स्त्री का आदर आदि भी कुटुम्ब ही सिखाता है। &lt;br /&gt;
३.१.२ कुटुम्ब की शिक्षा : उसी प्रकार से कुटुम्ब के बारे में भी वह कई बातें सीखता है। उसकी व्यक्तिगत, कौटुम्बिक और सामाजिक आदतें बचपन में ही आकार लेतीं हैं। कुटुम्ब का महत्व, समाज में कौटुम्बिक भावना का महत्व, कौटुम्बिक व्यवस्थाओं का महत्व वह कुटुम्ब में सीखता है। भिन्न भिन्न स्वभावों के लोग एक छत के नीचे आत्मीयता से कैसे रहते हैं यह वह कुटुम्ब से ही सीखता है। लगभग सभी प्रकार से कुटुंब यह समाज का लघुरूप ही होता है। कुटुंब यह सामाजिकता की पाठशाला होती है।&lt;br /&gt;
३.१.३ विद्याकेन्द्र शिक्षा	: विद्याकेन्द्र की शिक्षा शास्त्रीय शिक्षा होती है। कुटुम्ब में सीखे हुए सदाचार के शास्त्रीय पक्ष को समझाने के लिये होती है। कुटुंब में सीखे हुए व्यावसायिक कौशलों को पैना बनाने के लिये होती है। कुटुंब में आत्मसात की हुई श्रेष्ठ परम्पराओं को अधिक उज्वल बनाने के तरीके सीखने के लिए होती है। अध्ययन का और कौशल का शास्त्रीय तरीका सिखने के लिये, अध्ययन को तेजस्वी बनाने के लिये होती है।&lt;br /&gt;
३.१.४ लोकशिक्षा : लोकशिक्षा भी समाज जीवन का एक आवश्यक पहलू है। विद्याकेन्द्र की शिक्षा के उपरान्त भी मनुष्य का मन कई बार भ्रमित हो जाता हाय, बुद्धि कुण्ठित हो जाती है। ऐसी स्थिति में लोकशिक्षा की व्यवस्था इस संभ्रम को, इस कुण्ठा को दूर करती है।&lt;br /&gt;
३.१.५ परंपरा निर्माण : अपने से अधिक श्रेष्ठ विरासत निर्माण करने की निरंतरता को श्रेष्ठ परंपरा कहते हैं। श्रेष्ठ परंपराओं के निर्माण की तीव्र इच्छा और पैने प्रयास समाज को श्रेष्ठ और चिरंजीवी बनाते हैं।&lt;br /&gt;
३.२ शासन 	&lt;br /&gt;
३.२.१ धर्मनिष्ठता : शासक धर्मशास्त्र के जानकार हों। धर्मशास्त्र के पालनकर्ता हों। धर्मशास्त्र के नियमों का प्रजा से अनुपालन करवाने में कुशल हों।	&lt;br /&gt;
३.२.२ धर्म व्यवस्था के साथ समायोजन : सदैव धर्म के जानकारों से अपना मूल्यांकन करवाएँ। धर्म के जानकारों की सूचनाओं का अनुपालन करें। अधर्म होने से प्रायश्चित्त और पश्चात्ताप के लिये उद्यत रहें।&lt;br /&gt;
३.३ धर्म नेतृत्व&lt;br /&gt;
३.३.१ धर्म के मार्गदर्शक : किसी का केवल धर्मशास्त्र का विशेषज्ञ होना पर्याप्त नहीं है। नि:स्वार्थ भाव, निर्भयता भी श्रेष्ठ धर्म के मार्गदर्शकों के लक्षण हैं।&lt;br /&gt;
३.३.२ धर्माचरणी : धर्म का मार्गदर्शन करनेवाले लोग अपने व्यवहार में भी धर्मयुक्त होना चाहिये।&lt;br /&gt;
३.३.३ विजीगिषु स्वभाववाले : धर्म का मार्गदर्शन करनेवाले लोगों के लिये विजीगिषु स्वभाव का होना आवश्यक है। कोई भी संकट आनेपर डगमगाएँ नहीं यह धर्म के मार्गदर्शकों के लिये आवश्यक है।&lt;br /&gt;
धर्मं के जानकारों का सबसे पहला कर्तव्य है कि वे वर्तमान काल के लिए धर्मशास्त्र या स्मृति की प्रस्तुति करें। यह स्मृति जीवन के सभी पहलुओं को व्यापनेवाली हो। इसकी व्यापकता को समझने की दृष्टि से एक रूपरेखा नीचे दे रहे हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== धर्मशास्त्र प्रस्तुति के लिये बिन्दु ==&lt;br /&gt;
() धर्म की व्याख्याएँ / धर्म की व्याप्ति / त्रिवर्ग की व्याप्ति : सर्वे भवन्तु सुखिन: लक्ष्य हेतु धर्म : संस्कृति &lt;br /&gt;
() व्यापक धर्मशास्त्र के प्रस्तुति की आवश्यकता: * पूर्व धर्मशास्त्रों की व्यापकता(?)  	* व्यापकता की आवश्यकता &lt;br /&gt;
() व्यक्तिगत धर्म / पञ्चविध (कोष) पुरुष धर्म / चतुर्विध पुरूषार्थ /स्वधर्म (वर्णधर्म)&lt;br /&gt;
शरीरधर्म 	२. मन-धर्म 	३. बुद्धि-धर्म 	४. चित्त-धर्म &lt;br /&gt;
() सामाजिक संबंधों में धर्म &lt;br /&gt;
व्यक्ति-व्यक्ति  : पुरूष-पुरूष या स्त्री-स्त्री 			१.१ पारिवारिक रिश्ते 	१.२ पड़ोसी 		१.३ अतिथि  	१.४ शत्रु/विरोधक 		१.५ मित्र/सहायक 	१.६ सहकारी 		१.७ अपरिचित 	१.८ मालिक/नौकर 		१.९ चरित्रहीन स्त्री/पुरूष 	१.१० व्यसनी 		१,११ जरूरतमंद 	१.१२ समव्यवसायी 		१.१३ भिन्न व्यवसायी 	१.१४ याचक 		१.१५ भिन्न भाषी १.१६ विक्रेता\क्रेता    		१.१७ भिन्न राष्ट्रीय &lt;br /&gt;
व्यक्ति-व्यक्ति : पुरूष-स्त्री 				१.१ पारिवारिक रिश्ते 	१.२ पड़ोसी 		१.३ अतिथि  	१.४ शत्रु/विरोधक 		१.५ मित्र/सहायक 	१.६ सहकारी 		१.७ अपरिचित 	१.८ मालिक/नौकर 		१.९ चरित्रहीन स्त्री/पुरूष 	१.१० व्यसनी 		१,११ जरूरतमंद 	१.१२ समव्यवसायी 		१.१३ भिन्न व्यवसायी 	१.१४ याचक 		१.१५ भिन्न भाषी १.१६ विक्रेता\क्रेता    		१.१७ भिन्न राष्ट्रीय &lt;br /&gt;
व्यक्ति-समाज :		३.१ व्यक्ति-परिवार 	३.२ व्यति-जाति 		३.३ पड़ोसी 			३.४ सामाजिक संगठन  	३.५ व्यक्ति-व्यवस्था 	३.६ व्यक्ति-राष्ट्र 		३.७ व्यक्ति-विश्व समाज 		३.८ व्यक्ति भिन्न भाषी 	३.९ परप्रांतीय 		३.१० परदेसी &lt;br /&gt;
समाज-समाज : 	४.१ अंतर्राष्ट्रीय : ४.१.१ शत्रु 	४.१.२ मित्र 	४.१.३ तटस्थ 		&lt;br /&gt;
४.२ अंतर्देशीय	४.१.१ प्रांत-प्रांत 	४.१.२ जनपद-जनपद 	४.१.३ भाषिक समूह  	४.१.४ पंथ समूह  	४.१.५ राष्ट्रीय समूह 	४.१.६ अराष्ट्रीय समूह 		४.१.७ राष्ट्रद्रोही समूह 	४.१.८ विदेशी 		४.१.९ समव्यवासायी  	४.१.१० जाति-जाति 		४.१.११ परिवार परिवार &lt;br /&gt;
()  सृष्टिगत सम्बन्धों में धर्म  &lt;br /&gt;
	१. मनुष्य-अन्य जीव :													१.१ मनुष्य-पालतू प्राणी :  १.१.१ शाकाहारी 	१.१.२ मांसाहारी 								१.२ मनुष्य अन्य प्राणी : 	१.२.१ थलचर : 	१.२.१.१ शाकाहारी 	१.२.१.२ मांसाहारी 							१.२.२ जलचर 		और 		१.२.३ नभचर 	&lt;br /&gt;
१.३ मनुष्य-वनस्पति : 	१.३.१ जमीन के नीचे 	१.३.२ जमीन के ऊपर 	१.३.३ वनस्पति/औषधी 					१.३.४ खानेयोग्य/अन्न 	१.३.५ अखाद्य/जहरीली 	१.३.६ नशीली		१.४ मनुष्य-कृमि/कीटक/सूक्ष्म जीव 		१.४.१ सहायक 		१.४.२ हानिकारक	      २. मनुष्य-जड़ प्रकृति / पंचमहाभूत 									२.१ अनवीकरणीय/खनिज 	२.१.१ ठोस 	२.१.२ द्रव 	२.१.३ वायु (इंधन)  		२.२ नवीकरणीय 	: २.२.१ वायु/हवा 	२.२.२ जल 	२.२.३ सूर्यप्रकाश 		२.२.४ लकड़ी&lt;br /&gt;
() आपद्धर्म :	१. प्राकृतिक आपदा 		२. मानव निर्मित आपदा (लगभग उपर्युक्त सभी विषयों में)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== परिवर्तन के पुरोधा ==&lt;br /&gt;
उपर्युक्त बिन्दु २ में बताए गए श्रेष्ठ जन ही परिवर्तन के पुरोधा होंगे। इनका प्रमाण समाज में मुष्किल से ५-७ प्रतिशत ही पर्याप्त होता है। ऐसे श्रेष्ठ जनों में निम्न वर्ग के लोग आते हैं।	&lt;br /&gt;
४.१ शिक्षक : शिक्षक ज्ञानी, त्यागी, कुशल, समाज हित के लिए समर्पित, धर्म का जानकार, समाज को घडने की सामर्थ्य रखनेवाला होता है। नई पीढी जो परिवर्तन का अधिक सहजता से स्वीकार कर सकती है उसको घडना शिक्षक का काम होता है। इसलिये परिवर्तन की प्रक्रिया का मुख्य पुरोधा शिक्षक ही होता है।	&lt;br /&gt;
४.२ श्रेष्ठ जन :यहाँ श्रेष्ठ जनों से मतलब भिन्न भिन्न सामाजिक गतिविधियों में जो अग्रणी लोग हैं उनसे है।	&lt;br /&gt;
४.३ सांप्रदायिक संगठनों के प्रमुख : आजकल समाज का एक बहुत बडा वर्ग जिसमें शिक्षित वर्ग भी है, भिन्न भिन्न संप्रदायों से जुडा है। उन संप्रदायों के प्रमुख भी इस परिवर्तन की प्रक्रिया का एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण हिस्सा बनने की शक्ति रखते हैं।	&lt;br /&gt;
४.४ लोकशिक्षा के माध्यम : कीर्तनकार, कथाकार, प्रवचनकार, नाटक मंडलि, पुरोहित या उपाध्याय, साधू, बैरागी, सिंहस्थ या कुंभ जैसे मेले, यात्राएँ आदि लोकशिक्षा के माध्यम हुआ करते थे। वर्तमान में ये सब कमजोर और दिशाहीन हो गए हैं। एक ओर इनमें से जिनको पुनर्जीवित कर सकते हैं उन्हें करना। नए आयाम भी जोडे जा सकते हैं। जैसे अभी लगभग देढ दशक पूर्व महाराष्ट्र में प्रारंभ हुई नव-वर्ष स्वागत यात्राएँ आदि।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== अंतर्निहित सुधार व्यवस्था ==&lt;br /&gt;
काल के प्रवाह में समाज में हो रहे परिवर्तन और मनुष्य की स्खलनशीलता के कारण बढनेवाला अधर्माचरण ये दो बातें ऐसीं हैं जो किसी भी श्रेष्ठतम समाज को भी नष्ट कर देतीं हैं। इस दृष्टि से जागरूक ऐसे शिक्षक और धर्म के मार्गदर्शक साथ में मिलकर समाज की अंतर्निहित सुधार व्यवस्था बनाते हैं। अपनी संवेदनशीलता और समाज के निरंतर बारीकी से हो रहे अध्ययन के कारण इन्हें संकटों का पूर्वानुमान हो जाता है। अपने निरीक्षणों के आधारपर अपने लोकसंग्रही स्वभाव से ये लोगों को भी संकटों से ऊपर उठने के लिये तैयार करते हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== परिवर्तन की नीति ==&lt;br /&gt;
 : प्रारंभ में विरोध को आमंत्रण नहीं देना। संघर्ष में शक्ति का अपव्यय नहीं करना। जो आज कर सकते हैं उसे करते जाना। जो कल करने की आवश्यकता है उस के लिये परिस्थिति निर्माण करना। परिस्थिति के निर्माण होते ही आगे बढना।  &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== परिवर्तन में अवरोध और उनका निराकरण ==&lt;br /&gt;
 : शासनाधिष्ठित समाज में स्वार्थ के आधारपर परिवर्तन सरल और तेज गति से होता है। हिटलरने १५-२० वर्षों में ही जर्मनी को एक समर्थ राष्ट्र के रूप में खड़ा कर दिया था। लेकिन धर्म पर आधारित जीवन के प्रतिमान में परिवर्तन की गति धीमी और मार्ग कठिन होता है। स्थाई परिवर्तन और वह भी कौटुम्बिक भावना के आधारपर, तो धीरे धीरे ही होता है। &lt;br /&gt;
७.१ अंतर्देशीय 	&lt;br /&gt;
७.१.१ मानवीय जड़ता : परिवर्तन का आनंद से स्वागत करनेवाले लोग समाज में अल्पसंख्य ही होते हैं। सामान्यत: युवा वर्ग ही परिवर्तन के लिए तैयार होता है। इसलिए युवा वर्ग को इस परिवर्तन की प्रक्रिया में सहभागी बनाना होगा। परिवर्तन की प्रक्रिया में युवाओं को सम्मिलित करते जाने से दो तीन पीढ़ियों में परिवर्तन का चक्र गतिमान हो जाएगा।&lt;br /&gt;
७.१.२ विपरीत शिक्षा : जैसे जैसे भारतीय शिक्षा का विस्तार समाज में होगा वर्तमान की विपरीत शिक्षा का अपने आप ही क्रमश: लोप होगा।	   &lt;br /&gt;
७.१.३ मजहबी मानसिकता : भारतीय याने धर्म की शिक्षा के उदय और विस्तार के साथ ही मजहबी शिक्षा और उसका प्रभाव भी शनै: शनै: घटता जाएगा। मजहबों की वास्तविकता को भी उजागर करना आवश्यक है। &lt;br /&gt;
७.१.४ धर्म के ठेकेदार : जैसे जैसे धर्म के जानकार और धर्म के अनुसार आचरण करनेवाले लोग समाज में दिखने लगेंगे, धर्म के तथाकथित ठेकेदारों का प्रभाव कम होता जाएगा। &lt;br /&gt;
७.१.५ शासन तंत्र : इस परिवर्तन की प्रक्रिया में धर्म के जानकारों के बाद शासन की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण होगी। धर्माचरणी लोगों को समर्थन, सहायता और संरक्षण देने का काम शासन को करना होगा। इस के लिए शासक भी धर्म का जानकार और धर्मनिष्ठ हो, यह भी आवश्यक है। धर्म के जानकारों को यह सुनिश्चित करना होगा की शासक धर्माचरण करनेवाले और धर्म के जानकर हों।&lt;br /&gt;
७.१.६ जीवन का अभारतीय प्रतिमान : जीवन के सभी क्षेत्रों में एकसाथ जीवन के प्रतिमान के परिवर्तन की प्रक्रिया को चलाना यह धर्म के जानकारों की जिम्मेदारी होगी। शिक्षा की भूमिका इसमें सबसे महत्वपूर्ण होगी। शिक्षा के माध्यम से समूचे जीवन के भारतीय प्रतिमान की रुपरेखा और प्रक्रिया को समाजव्यापी बनाना होगा। धर्मं-शरण शासन इसमें सहायता करेगा।&lt;br /&gt;
७.१.७ तन्त्रज्ञान  समायोजन : तन्त्रज्ञान के क्षेत्र में भारत के सामने दोहरी चुनौती होगी। एक ओर तो विश्व में जो तन्त्रज्ञान के विकास की होड़ लगी है उसमें अपनी विशेषताओं के साथ अग्रणी रहना। इस दृष्टि से विकास हेतु कुछ तन्त्रज्ञान निम्न हो सकते हैं।&lt;br /&gt;
- शून्य प्रदुषण रासायनिक उद्योग।&lt;br /&gt;
- सस्ती सौर उर्जा।&lt;br /&gt;
- प्रकृति में सहजता से घुलनशील प्लैस्टिक का निर्माण। &lt;br /&gt;
- औरों द्वारा प्रक्षेपित शस्त्रों/अणु-शस्त्रों का शमन करने का तंत्रज्ञान। ...............आदि &lt;br /&gt;
और दूसरी ओर वैकल्पिक विकेंद्रीकरणपर आधारित तन्त्रज्ञान का विकास कर उसे विश्व में प्रतिष्ठित करना। इस प्रकार के तन्त्रज्ञान में निम्न प्रकार के तन्त्रज्ञान होंगे।&lt;br /&gt;
- कौटुम्बिक उद्योगों के लिये, स्थानिक संसाधनों के उपयोग के लिए तन्त्रज्ञान  &lt;br /&gt;
- भिन्न भिन्न कार्यों के लिये पशु-उर्जा के अधिकाधिक उपयोग के लिये तंत्रज्ञान&lt;br /&gt;
- नविकरणीय प्राकृतिक संसाधनों से विविध पदार्थों के निर्माण से आवश्यकताओं की पूर्ति तथा संसाधनों के पुनर्भरण के लिये सरल तन्त्रज्ञान का विकास   &lt;br /&gt;
- मानव की प्राकृतिक क्षमताओं का विकास करनेवाली प्रक्रियाओं का अनुसंधान। ......... आदि &lt;br /&gt;
७.२ अंतर्राष्ट्रीय 	&lt;br /&gt;
७.२.१ मजहबी विस्तारवादी मानसिकता : वर्तमान में यह मुख्यत: ३ प्रकार की है। ईसाई, मुस्लिम और वामपंथी। यह तीनों ही विचारधाराएँ अधूरी हैं, एकांगी हैं। यह तो इन के सम्मुख ‘सर्वे भवन्तु सुखिन:’ को लेकर कोई चुनौती खड़ी नहीं होने से इन्हें विश्व में विस्तार का अवसर मिला है। जैसे ही ‘सर्वे भवन्तु सुखिन:’ का विचार लेकर भारत एक वैश्विक शक्ति के रूप में खड़ा होगा इनके पैरोंतले की जमीन खिसकने लगेगी। &lt;br /&gt;
७.२.२ आसुरी महत्वाकांक्षा : ऊपर जो बताया गया है वह, आसुरी महत्वाकांक्षा रखनेवाली वैश्विक शक्तियों के लिये भी लागू है। आसुरी महत्वाकांक्षाओं को परास्त करने की परंपरा भारत में युगों से रही है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== परिवर्तन के लिये समयबध्द करणीय कार्य ==&lt;br /&gt;
 :  &lt;br /&gt;
समूचे जीवन के प्रतिमान का परिवर्तन यह एक बहुत बृहद् और जटिल कार्य है। इस के लिये इसे सामाजिक अभियान का रूप देना होगा। समविचारी लोगों को संगठित होकर सहमति से और चरणबध्द पध्दति से प्रक्रिया को आगे बढाना होगा। बड़े पैमानेपर जीवन के हर क्षेत्र में जीवन के भारतीय प्रतिमान की समझ रखनेवाले और कृतीशील ऐसे लोग याने आचार्य निर्माण करने होंगे। परिवर्तन के चरण एक के बाद एक और एक के साथ सभी इस पध्दति से चलेंगे। जैसे दूसरे चरण के काल में ५० प्रतिशत शक्ति और संसाधन दूसरे चरणके निर्धारित विषयपर लगेंगे। और १२.५-१२.५ प्रतिशत शक्ति और संसाधन चरण १, ३, ४ और ५ में प्रत्येकपर लगेंगे।&lt;br /&gt;
१. समविचारी लोगों का ध्रुवीकरण : जिन्हें प्रतिमान के परिवर्तन की आस है और समझ भी है ऐसे समविचारी, सहचित्त लोगों का ध्रुवीकरण करना होगा। उनमें एक व्यापक सहमति निर्माण करनी होगी। अपने अपने कार्यक्षेत्र में क्या करना है इसका स्पष्टीकरण करना होगा।&lt;br /&gt;
२. अभियान के चरण : अभियान को चरणबध्द पध्दति से चलाना होगा। १२ वर्षों के ये पाँच चरण होंगे। ऐसी यह ६० वर्ष की योजना होगी। यह प्रक्रिया तीन पीढीतक चलेगी। तीसरी पीढी में परिवर्तन के फल देखने को मिलेंगे। लेकिन तबतक निष्ठा से और धैर्य से अभियान को चलाना होगा। निरंतर मूल्यांकन करना होगा। राह भटक नहीं जाए इसके लिये चौकन्ना रहना होगा।&lt;br /&gt;
२.१ अध्ययन और अनुसंधान : जीवन का दायरा बहुत व्यापक होता है। अनगिनत विषय इसमें आते हैं। इसलिये प्रतिमान के बदलाव से पहले हमें दोनों प्रतिमानों के विषय में और विशेषत: जीवन के भारतीय प्रतिमान के विषय में बहुत गहराई से अध्ययन करना होगा। मनुष्य की इच्छाओं का दायरा, उनकी पूर्ति के लिये वह क्या क्या कर सकता है आदि का दायरा अति विशाल है। इन दोनों को धर्म के नियंत्रण में ऐसे रखा जाता है इसका भी अध्ययन अनिवार्य है। मनुष्य के व्यक्तित्व को ठीक से समझना, उसके शरीर, मन, बुध्दि, चित्त, अहंकार आदि बातों को समझना, कर्मसिध्दांत को समझना, जन्म जन्मांतर चलने वाली शिक्षा की प्रक्रिया को समझना विविध विषयों के अंगांगी संबंधों को समझना, प्रकृति के रहस्यों को समझना आदि अनेकों ऐसी बातें हैं जिनका अध्ययन हमें करना होगा। इनमें से कई विषयों के संबंध में हमारे पूर्वजों ने विपुल साहित्य निर्माण किया था। उसमें से कितने ही साहित्य को जाने अंजाने में प्रक्षेपित किया गया है। इस प्रक्षिप्त हिस्से को समझ कर अलग निकालना होगा। शुध्द भारतीय तत्वोंपर आधारित ज्ञान को प्राप्त करना होगा। अंग्रेजों ने भारतीय साहित्य, इतिहास के साथ किये खिलवाड, भारतीय समाज में झगडे पैदा करने के लिये निर्मित साहित्य को अलग हटाकर शुध्द भारतीय याने एकात्म भाव की या कौटुम्बिक भाव की जितनी भी प्रस्तुतियाँ हैं उनका अध्ययन करना होगा। मान्यताओं, व्यवहार सूत्रों, संगठन निर्माण और व्यवस्था निर्माण की प्रक्रिया को समझना होगा।     &lt;br /&gt;
२.२ लोकमत परिष्कार : अध्ययन से जो ज्ञान उभरकर सामने आएगा उसे लोगोंतक ले जाना होगा। लोगों का प्रबोधन करना होगा। उन्हें फिर से समग्रता से और एकात्मता से सोचने और व्यवहार करने का तरीका बताना होगा। उन्हें उनकी सामाजिक जिम्मेदारी का समाजधर्म का अहसास करवाना होगा। वर्तमान की परिस्थितियों से सामान्यत: कोई भी खुश नहीं है। लेकिन जीवन का भारतीय प्रतिमान ही  उनकी कल्पना के अच्छे दिनों का वास्तव है यह सब के मन में स्थापित करना होगा।	         &lt;br /&gt;
२.३ संयुक्त कुटुम्ब : कुटुम्ब ही समाजधर्म सीखने की पाठशाला होता है। संयुक्त कुटुम्ब तो वास्तव में समाज का लघुरूप ही होता है। सामाजिक समस्याओं में से लगभग ७० प्रतिशत समस्याओं को तो केवल अच्छा संयुक्त कुटुम्ब ही निर्मूल कर देता है। समाज जीवन के लिये श्रेष्ठ लोगों को जन्म देने का काम, श्रेष्ठ संस्कार देने का काम, अच्छी आदतें डालने काम आजकल की फॅमिली पध्दति नहीं कर सकती। जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में जो तेजस्वी नेतृत्व का अभाव निर्माण हो गया है उसे दूर करना यह भारतीय मान्यताओं के अनुसार चलाए जानेवाले संयुक्त परिवारों में ही हो सकता है। इसलिये समाज का नेतृत्व करेंगे ऐसे श्रेष्ठ बालकों को जन्म देने के प्रयास तीसरे चरण में होंगे।&lt;br /&gt;
२.४ शिक्षक/धर्मज्ञ और शासक निर्माण : समाज परिवर्तन में शिक्षक की और शासक की ऐसे दोनों की भुमिका अत्यंत महत्वपूर्ण होती है। संयुक्त परिवारों में जन्म लिये बच्चों में से अब श्रेष्ठ धर्म के मार्गदर्शक, शिक्षक और शासक निर्माण करने की स्थिति होगी। ऐसे लोगों को समर्थन और सहायता देनेवाले कुटुम्ब और दूसरे चरण में निर्माण किये समाज के परिष्कृत विचारोंवाले सदस्य अब कुछ मात्रा में उपलब्ध होंगे।	   &lt;br /&gt;
२.५ संगठन और व्यवस्थाओं की प्रतिष्ठापना : श्रेष्ठ धर्म के अधिष्ठाता/मार्गदर्शक, सामर्थ्यवान शिक्षक और कुशल शासक अब प्रत्यक्ष संगठन का सशक्तिकरण और व्यवस्थाओं का निर्माण करेंगे।&lt;br /&gt;
==References==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;references /&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अन्य स्रोत:&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[Category:Bhartiya Jeevan Pratiman (भारतीय जीवन प्रतिमान)]]&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Dilipkelkar</name></author>
	</entry>
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		<title>Planning For Change (परिवर्तन की योजना)</title>
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		<updated>2019-05-30T10:32:24Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Dilipkelkar: /* परिवर्तन के पुरोधा */&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{One source|date=January 2019}}&lt;br /&gt;
[[Template:Cleanup reorganize Dharmawiki Page]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
परिवर्तन की योजना को समझने के लिए हमें पहले निम्न बातें फिर से स्मरण करनी होंगी ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जीवन के भारतीय प्रतिमान की जानकारी के लिए - &lt;br /&gt;
१. जीवनदृष्टि/व्यवहार : भारतीय जीवनदृष्टि और जीवनशैली के विषय में जानकारी के लिये कृपया अध्याय ७  में देखें। 		&lt;br /&gt;
२. भारतीय जीवन के प्रतिमान के समाज संगठनों की जानकारी हमने अध्याय १३ से २० में प्राप्त की है।&lt;br /&gt;
३. व्यवस्था समूह : व्यवस्था समूह का ढाँचा जीवनदृष्टि से सुसंगत होना चाहिए। कृपया व्यवस्था समूह के ढाँचे के लिये अध्याय २२ में और जानकारी के लिए अध्याय २५ में देखें।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== समस्या मूलों के निराकरण की नीति ==&lt;br /&gt;
समस्या मूल नष्ट करने से तात्पर्य समस्या मूलोंपर आघात से नहीं है। समस्याएँ निर्माण ही नहीं हों ऐसी परिस्थितियों, ऐसे समाज संगठनों और ऐसी व्यवस्थाओं के निर्माण से है। निराकरण की प्रक्रिया के ३ चरण होंगे। समस्याओं को और परिवर्तन के स्वरूप को समझना, निराकरण की नीति तय करना और निराकरण का क्रियान्वयन करना। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== परिवर्तन के स्वरूप को समझना ==&lt;br /&gt;
समस्या का मूल जीवन के प्रतिमान के परिवर्तन में है। प्रतिमान का आधार समाज की जीवनदृष्टि होती है। व्यवहार, संगठन और व्यवस्थाएँ तो जीवनदृष्टि के आधारपर ही तय होते हैं। इसलिये परिवर्तन की प्रक्रिया में जीवनदृष्टि के परिवर्तन की प्रक्रिया को प्राथमिकता देनी होगी। व्यवहार में सुसंगतता आए इसलिये करणीय अकरणीय विवेक को सार्वत्रिक करना होगा। दूसरे क्रमांकपर संगठन और व्यवस्थाओं में परिवर्तन की प्रक्रिया चलेगी। व्यवस्था परिवर्तन की इस प्रक्रिया में समग्रता और एकात्मता के संदर्भ में व्यवस्था विशेष का आधार बनाने के लिये विषय की सैध्दांतिक प्रस्तुति करनी होगी। जैसे शासन व्यवस्था में यदि उचित परिवर्तन करना है तो पहले राजशास्त्र की सैध्दांतिक प्रस्तुति करना आवश्यक है। समृद्धि व्यवस्था में परिवर्तन करने के लिये समृद्धिशास्त्र की सैध्दांतिक प्रस्तुति करनी होगी। इन सैध्दांतिक प्रस्तुतियों को प्रयोग सिध्द करना होगा। प्रयोगों के आधारपर इन प्रस्तुतियों में उचित परिवर्तन करते हुए आगे बढना होगा। यह काम प्राथमिकता से धर्म के जानकारों का है। दूसरे क्रमांक की जिम्मेदारी शिक्षकों की है। शिक्षक वर्ग ही धर्म को सार्वत्रिक करता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== निराकरण की नीति ==&lt;br /&gt;
समस्याएँ इतनी अधिक और पेचिदा हैं कि इनका निराकरण अब संभव नहीं है, ऐसा कई विद्वान 	मानते हैं। हमने जो करणीय और अकरणीय विवेक को समझा है उसके अनुसार कोई भी बात असंभव नहीं होती। ऊपरी तौरपर असंभव लगनेपर भी उसे संभव चरणों में बाँटकर संपन्न किया जा सकता है।&lt;br /&gt;
इस के लिये नीति के तौरपर हमारा व्यवहार निम्न प्रकार का होना चागिये।&lt;br /&gt;
- सबसे पहले तो यह हमेशा ध्यान में रखना कि यह पूरे समाज जीवन के प्रतिमान के परिवर्तन का विषय है। इसे परिवर्तन के लिये कई पीढियों का समय लग सकता है। भारत वर्ष के दीर्घ इतिहास में समाज ने कई बार उत्थान और पतन के दौर अनुभव किये हैं। बारबार भारतीय समाज ने उत्थान किया है। &lt;br /&gt;
- परिवर्तन की प्रक्रिया को संभाव्य चरणों में बाँटना।&lt;br /&gt;
- उसमें आज जो हो सकता है उसे कर डालना।&lt;br /&gt;
- आज जिसे करना कठिन लगता है उसके लिये परिस्थितियाँ बनाते जाना। परिस्थितियाँ बनते ही उसे    करना। &lt;br /&gt;
- प्रारंभ में जबतक परिवर्तन की प्रक्रिया ने गति नहीं पकडी है, यथासंभव कोई विरोध मोल नहीं लेना। &lt;br /&gt;
- इसी प्रकार से एक एक चरण को संभव बनाते हुए आगे बढ़ाते जाना।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== समस्या मूलों का निराकरण ==&lt;br /&gt;
वास्तव में समस्या मूलों को नष्ट करना यह शब्दप्रयोग ठीक नहीं है। उचित प्रतिमान की प्रतिष्ठापना के साथ ही गलत प्रतिमान का अंत अपने आप होता है। जो सर्वहितकारी है, उचित है, श्रेष्ठ है, उसकी प्रतिष्ठापना ही परिवर्तन की प्रक्रिया का स्वरूप होगा। स्वाभाविक जडता के कारण कुछ कठिनाईयाँ तो आएँगी। लेकिन गलत प्रतिमान को नष्ट करने के लिये अलग से शक्ति लगाने की आवश्यकता नहीं है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== समस्या मूल नष्ट करने हेतु धर्म के जानकारों के मार्गदर्शन में शिक्षा की व्याप्ति ==&lt;br /&gt;
१. जीवनदृष्टि की शिक्षा : जीवनदृष्टि की शिक्षा मुख्यत: कामनाओं और कामनाओं की पूर्ति के प्रयास, धन, साधन और संसाधनों को धर्म के दायरे में रखने की शिक्षा ही है। पुरूषार्थ चतुष्टय की या त्रिवर्ग की शिक्षा ही है।&lt;br /&gt;
२. व्यवस्थाएँ : जीवनदृष्टि के अनुसार व्यवहार हो सके इस हेतु से ही व्यवस्थाओं का निर्माण किया जाता है।  व्यवस्थाओं के निर्माण में और उनके क्रियान्वयन में भी जीवनदृष्टि ओतप्रोत रहे इसका ध्यान रखना होगा।&lt;br /&gt;
	 २.१ धर्म व्यवस्था    २.२ शिक्षा व्यवस्था	२.३ शासन व्यवस्था   २.४ समृद्धि व्यवस्था&lt;br /&gt;
३. संगठन : समाज संगठन और समाज की व्यवस्थाएँ एक दूसरे को पूरक पोषक होती हैं। लेकिन धर्म व्यवस्था, शिक्षा व्यवस्था और शासन व्यवस्था के अभाव में संगठन निर्माण करना अत्यंत कठिन हो जाता है। वास्तव में ये दोनों अन्योन्याश्रित होते हैं। समाज संगठन की जानकारी के लिये कृपया अध्याय १२ देखें।&lt;br /&gt;
	३.१ कुटुम्ब 			३.२ स्वभाव समायोजन			३.३ आश्रम			३.४ कौशल विधा		३.५ ग्राम				३.६ राष्ट्र&lt;br /&gt;
४. विज्ञान और तन्त्रज्ञान  : कृपया अध्याय ३९ देखें। &lt;br /&gt;
४.१ विकास और उपयोग नीति		४.२ सार्वत्रिकीकरण&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== परिवर्तन की योजना ==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== परिवर्तन का स्वरूप ===&lt;br /&gt;
वर्तमान स्वार्थपर आधारित जीवन के प्रतिमान के स्थानपर आत्मीयता याने कौटुम्बिक  भावनापर आधारित जीवन के प्रतिमान की प्रतिष्ठापना&lt;br /&gt;
१.१  सर्वे भवन्तु सुखिन:, देशानुकूल और कालानुकूल आदि के संदर्भ में दोनों प्रतिमानों को समझना&lt;br /&gt;
१.२ प्रतिमान का परिवर्तन&lt;br /&gt;
.२.१ सामाजिक व्यवस्थाओं का पुनर्निर्माण&lt;br /&gt;
१.२.२ समाज के संगठनों का परिष्कार/पुनरूत्थान या नवनिर्माण&lt;br /&gt;
१.२.३ तन्त्रज्ञान  का समायोजन / तन्त्रज्ञान  नीति / जीवन की इष्ट गति : वर्तमान में तन्त्रज्ञान  की विकास की गति से जीवन को जो गति प्राप्त हुई है उस के कारण सामान्य मनुष्य घसीटा जा रहा है। पर्यावरण सन्तुलन  और सामाजिकता दाँवपर लग गए हैं। ज्ञान, विज्ञान और तन्त्रज्ञान  ये तीनों बातें पात्र व्यक्ति को ही मिलनी चाहिये। बंदर के हाथ में पलिता नहीं दिया जाता। इस लिये किसी भी तन्त्रज्ञान के सार्वत्रिकीकरण से पहले उसके पर्यावरण, समाजजीवन और व्यक्ति जीवनपर होनेवाले परिणाम जानना आवश्यक है। हानिकारक तंत्रज्ञान का तो विकास भी नहीं करना चाहिये। किया तो वह केवल सुपात्र को ही अंतरित हो यह सुनिश्चित करना चाहिये।&lt;br /&gt;
ऐसी स्थिति में जीवन की इष्ट गति की ओर बढानेवाली तन्त्रज्ञान नीति का स्वीकार करना होगा। इष्ट गति के निकषों के लिये अध्याय ३९ में बताई कसौटि लगानी होगी।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== परिवर्तन की प्रक्रिया ===&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सामाजिक परिवर्तन भौतिक वस्तुओं के परिवर्तन जैसे सरल नहीं होते। भौतिक पदार्थों का एक निश्चित स्वभाव होता है। धर्म होता है। इसे ध्यान में रखकर भौतिक पदार्थों को ढाला जाता है। हर मानव का स्वभाव भिन्न होता है। भिन्न समयपर भी उसमें बदलाव आ सकता है। इसलिये सामाजिक परिवर्तन क्रांति से नहीं उत्क्रांति से ही किये जा सकते हैं। उत्क्रांति की गति धीमी होती है। होनेवाले परिवर्तनों से किसी की हानी नहीं हो या होनेवाली हानी न्यूनतम हो, परिवर्तन स्थाई हों, परिवर्तन से सबको लाभ मिले यह सब देखकर ही प्रक्रिया चलाई जाती है। सामाजिक परिवर्तनों के लिये नई पीढी से प्रारंभ करना यह सबसे अच्छा रास्ता है। लेकिन नई पीढी में व्यापक रूप से परिवर्तन के पहलुओं को स्थापित करने के लिये आवश्यक इतनी पुरानी पीढी के श्रेष्ठ जनों की संख्या आवश्यक है। ऐसे श्रेष्ठ जनों का वर्णन श्रीमद्भगवद्गीता में किया गया है -&lt;br /&gt;
यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जन: ।&lt;br /&gt;
स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते॥ (अध्याय ३ श्लोक २१)&lt;br /&gt;
इसलिये एक दृष्टि से देखा जाए तो यह प्रक्रिया समाज के प्रत्येक व्यक्तितक ले जाने की आवश्यकता नहीं होती। केवल समाज जीवन की सभी विधाओं के श्रेष्ठ लोगों के निर्माण की प्रक्रिया ही परिवर्तन की प्रक्रिया है। एक बार ये लोग निर्माण हो गये तो फिर परिवर्तन तेज याने ज्यामितीय गति से होने लगता है।&lt;br /&gt;
२.१ धीमी लेकिन अविश्रांत : हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि हमें सामाजिक परिवर्तन करना है। समाज एक जीवंत ईकाई होता है। जीवंत ईकाई में परिवर्तन हमेशा धीमी गति से, समग्रता से और अविरत करते रहने से होते हैं। कोई भी शीघ्रता या टुकडों में होनेवाले परिवर्तन हानिकारक होते हैं।&lt;br /&gt;
२.२ सभी क्षेत्रों में एकसाथ : समाज एक जीवंत ईकाई होने के कारण इसके सभी अंग किसी भी बात से एकसाथ प्रभावित होते हैं। प्रभाव का परिमाण कम अधिक होगा लेकिन प्रभाव सभीपर होता ही है। इसलिये परिवर्तन की प्रक्रिया टुकडों में अलग अलग या एक के बाद एक ऐसी नहीं होगी। परिवर्तन की प्रक्रिया धर्म, शिक्षा, शासन, अर्थ, न्याय, समाज संगठन आदि सभी क्षेत्रों में एकसाथ चलेगी। ऐसी प्रक्रिया का प्रारंभ होना बहुत कठिन होता है। लेकिन एकबार सभी क्षेत्रों में प्रारंभ हो जाता है तो फिर यह तेजी से गति प्राप्त कर लेती है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== परिवर्तन के कारक तत्व ===&lt;br /&gt;
३.१ शिक्षा : शिक्षा का दायरा बहुत व्यापक है। शिक्षा जन्म जन्मांतर चलनेवाली प्रक्रिया होती है। इस जन्म में शिक्षा गर्भधारणा से मृत्यूपर्यंत चलती है। आयु की अवस्था के अनुसार शिक्षा का स्वरूप बदलता है। &lt;br /&gt;
३.१.२ कुटुम्ब में शिक्षा : कुटुम्ब में शिक्षा का प्रारंभ गर्भधारणा से होता है। मनुष्य की ६०-७० प्रतिशत घडन तो कुटुम्ब में ही होती है। कुटुम्ब में रहकर वह कई बातें सीखता है। कौटुम्बिक भावना, कर्तव्य, सदाचार आदि की शिक्षा कुटुम्ब की ही जिम्मेदारी होती है। व्यवस्थाओं के साथ समायोजन, व्यवस्थाओं के स्वरूप आदि भी वह कुटुम्ब में ही अपने ज्येष्ठों से सीखता है। इंद्रियों के विकास की शिक्षा, व्यावसायिक कौशल भी वह कुटुम्ब में ही सीखता है। कुटुम्ब सामाजिकता की पाठशाला ही होता है। बडों का आदर, स्त्री का आदर आदि भी कुटुम्ब ही सिखाता है। &lt;br /&gt;
३.१.२ कुटुम्ब की शिक्षा : उसी प्रकार से कुटुम्ब के बारे में भी वह कई बातें सीखता है। उसकी व्यक्तिगत, कौटुम्बिक और सामाजिक आदतें बचपन में ही आकार लेतीं हैं। कुटुम्ब का महत्व, समाज में कौटुम्बिक भावना का महत्व, कौटुम्बिक व्यवस्थाओं का महत्व वह कुटुम्ब में सीखता है। भिन्न भिन्न स्वभावों के लोग एक छत के नीचे आत्मीयता से कैसे रहते हैं यह वह कुटुम्ब से ही सीखता है। लगभग सभी प्रकार से कुटुंब यह समाज का लघुरूप ही होता है। कुटुंब यह सामाजिकता की पाठशाला होती है।&lt;br /&gt;
३.१.३ विद्याकेन्द्र शिक्षा	: विद्याकेन्द्र की शिक्षा शास्त्रीय शिक्षा होती है। कुटुम्ब में सीखे हुए सदाचार के शास्त्रीय पक्ष को समझाने के लिये होती है। कुटुंब में सीखे हुए व्यावसायिक कौशलों को पैना बनाने के लिये होती है। कुटुंब में आत्मसात की हुई श्रेष्ठ परम्पराओं को अधिक उज्वल बनाने के तरीके सीखने के लिए होती है। अध्ययन का और कौशल का शास्त्रीय तरीका सिखने के लिये, अध्ययन को तेजस्वी बनाने के लिये होती है।&lt;br /&gt;
३.१.४ लोकशिक्षा : लोकशिक्षा भी समाज जीवन का एक आवश्यक पहलू है। विद्याकेन्द्र की शिक्षा के उपरान्त भी मनुष्य का मन कई बार भ्रमित हो जाता हाय, बुद्धि कुण्ठित हो जाती है। ऐसी स्थिति में लोकशिक्षा की व्यवस्था इस संभ्रम को, इस कुण्ठा को दूर करती है।&lt;br /&gt;
३.१.५ परंपरा निर्माण : अपने से अधिक श्रेष्ठ विरासत निर्माण करने की निरंतरता को श्रेष्ठ परंपरा कहते हैं। श्रेष्ठ परंपराओं के निर्माण की तीव्र इच्छा और पैने प्रयास समाज को श्रेष्ठ और चिरंजीवी बनाते हैं।&lt;br /&gt;
३.२ शासन 	&lt;br /&gt;
३.२.१ धर्मनिष्ठता : शासक धर्मशास्त्र के जानकार हों। धर्मशास्त्र के पालनकर्ता हों। धर्मशास्त्र के नियमों का प्रजा से अनुपालन करवाने में कुशल हों।	&lt;br /&gt;
३.२.२ धर्म व्यवस्था के साथ समायोजन : सदैव धर्म के जानकारों से अपना मूल्यांकन करवाएँ। धर्म के जानकारों की सूचनाओं का अनुपालन करें। अधर्म होने से प्रायश्चित्त और पश्चात्ताप के लिये उद्यत रहें।&lt;br /&gt;
३.३ धर्म नेतृत्व&lt;br /&gt;
३.३.१ धर्म के मार्गदर्शक : किसी का केवल धर्मशास्त्र का विशेषज्ञ होना पर्याप्त नहीं है। नि:स्वार्थ भाव, निर्भयता भी श्रेष्ठ धर्म के मार्गदर्शकों के लक्षण हैं।&lt;br /&gt;
३.३.२ धर्माचरणी : धर्म का मार्गदर्शन करनेवाले लोग अपने व्यवहार में भी धर्मयुक्त होना चाहिये।&lt;br /&gt;
३.३.३ विजीगिषु स्वभाववाले : धर्म का मार्गदर्शन करनेवाले लोगों के लिये विजीगिषु स्वभाव का होना आवश्यक है। कोई भी संकट आनेपर डगमगाएँ नहीं यह धर्म के मार्गदर्शकों के लिये आवश्यक है।&lt;br /&gt;
धर्मं के जानकारों का सबसे पहला कर्तव्य है कि वे वर्तमान काल के लिए धर्मशास्त्र या स्मृति की प्रस्तुति करें। यह स्मृति जीवन के सभी पहलुओं को व्यापनेवाली हो। इसकी व्यापकता को समझने की दृष्टि से एक रूपरेखा नीचे दे रहे हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== धर्मशास्त्र प्रस्तुति के लिये बिन्दु ==&lt;br /&gt;
() धर्म की व्याख्याएँ / धर्म की व्याप्ति / त्रिवर्ग की व्याप्ति : सर्वे भवन्तु सुखिन: लक्ष्य हेतु धर्म : संस्कृति &lt;br /&gt;
() व्यापक धर्मशास्त्र के प्रस्तुति की आवश्यकता: * पूर्व धर्मशास्त्रों की व्यापकता(?)  	* व्यापकता की आवश्यकता &lt;br /&gt;
() व्यक्तिगत धर्म / पञ्चविध (कोष) पुरुष धर्म / चतुर्विध पुरूषार्थ /स्वधर्म (वर्णधर्म)&lt;br /&gt;
शरीरधर्म 	२. मन-धर्म 	३. बुद्धि-धर्म 	४. चित्त-धर्म &lt;br /&gt;
() सामाजिक संबंधों में धर्म &lt;br /&gt;
व्यक्ति-व्यक्ति  : पुरूष-पुरूष या स्त्री-स्त्री 			१.१ पारिवारिक रिश्ते 	१.२ पड़ोसी 		१.३ अतिथि  	१.४ शत्रु/विरोधक 		१.५ मित्र/सहायक 	१.६ सहकारी 		१.७ अपरिचित 	१.८ मालिक/नौकर 		१.९ चरित्रहीन स्त्री/पुरूष 	१.१० व्यसनी 		१,११ जरूरतमंद 	१.१२ समव्यवसायी 		१.१३ भिन्न व्यवसायी 	१.१४ याचक 		१.१५ भिन्न भाषी १.१६ विक्रेता\क्रेता    		१.१७ भिन्न राष्ट्रीय &lt;br /&gt;
व्यक्ति-व्यक्ति : पुरूष-स्त्री 				१.१ पारिवारिक रिश्ते 	१.२ पड़ोसी 		१.३ अतिथि  	१.४ शत्रु/विरोधक 		१.५ मित्र/सहायक 	१.६ सहकारी 		१.७ अपरिचित 	१.८ मालिक/नौकर 		१.९ चरित्रहीन स्त्री/पुरूष 	१.१० व्यसनी 		१,११ जरूरतमंद 	१.१२ समव्यवसायी 		१.१३ भिन्न व्यवसायी 	१.१४ याचक 		१.१५ भिन्न भाषी १.१६ विक्रेता\क्रेता    		१.१७ भिन्न राष्ट्रीय &lt;br /&gt;
व्यक्ति-समाज :		३.१ व्यक्ति-परिवार 	३.२ व्यति-जाति 		३.३ पड़ोसी 			३.४ सामाजिक संगठन  	३.५ व्यक्ति-व्यवस्था 	३.६ व्यक्ति-राष्ट्र 		३.७ व्यक्ति-विश्व समाज 		३.८ व्यक्ति भिन्न भाषी 	३.९ परप्रांतीय 		३.१० परदेसी &lt;br /&gt;
समाज-समाज : 	४.१ अंतर्राष्ट्रीय : ४.१.१ शत्रु 	४.१.२ मित्र 	४.१.३ तटस्थ 		&lt;br /&gt;
४.२ अंतर्देशीय	४.१.१ प्रांत-प्रांत 	४.१.२ जनपद-जनपद 	४.१.३ भाषिक समूह  	४.१.४ पंथ समूह  	४.१.५ राष्ट्रीय समूह 	४.१.६ अराष्ट्रीय समूह 		४.१.७ राष्ट्रद्रोही समूह 	४.१.८ विदेशी 		४.१.९ समव्यवासायी  	४.१.१० जाति-जाति 		४.१.११ परिवार परिवार &lt;br /&gt;
()  सृष्टिगत सम्बन्धों में धर्म  &lt;br /&gt;
	१. मनुष्य-अन्य जीव :													१.१ मनुष्य-पालतू प्राणी :  १.१.१ शाकाहारी 	१.१.२ मांसाहारी 								१.२ मनुष्य अन्य प्राणी : 	१.२.१ थलचर : 	१.२.१.१ शाकाहारी 	१.२.१.२ मांसाहारी 							१.२.२ जलचर 		और 		१.२.३ नभचर 	&lt;br /&gt;
१.३ मनुष्य-वनस्पति : 	१.३.१ जमीन के नीचे 	१.३.२ जमीन के ऊपर 	१.३.३ वनस्पति/औषधी 					१.३.४ खानेयोग्य/अन्न 	१.३.५ अखाद्य/जहरीली 	१.३.६ नशीली		१.४ मनुष्य-कृमि/कीटक/सूक्ष्म जीव 		१.४.१ सहायक 		१.४.२ हानिकारक	      २. मनुष्य-जड़ प्रकृति / पंचमहाभूत 									२.१ अनवीकरणीय/खनिज 	२.१.१ ठोस 	२.१.२ द्रव 	२.१.३ वायु (इंधन)  		२.२ नवीकरणीय 	: २.२.१ वायु/हवा 	२.२.२ जल 	२.२.३ सूर्यप्रकाश 		२.२.४ लकड़ी&lt;br /&gt;
() आपद्धर्म :	१. प्राकृतिक आपदा 		२. मानव निर्मित आपदा (लगभग उपर्युक्त सभी विषयों में)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== परिवर्तन के पुरोधा ==&lt;br /&gt;
उपर्युक्त बिन्दु २ में बताए गए श्रेष्ठ जन ही परिवर्तन के पुरोधा होंगे। इनका प्रमाण समाज में मुष्किल से ५-७ प्रतिशत ही पर्याप्त होता है। ऐसे श्रेष्ठ जनों में निम्न वर्ग के लोग आते हैं।	&lt;br /&gt;
४.१ शिक्षक : शिक्षक ज्ञानी, त्यागी, कुशल, समाज हित के लिए समर्पित, धर्म का जानकार, समाज को घडने की सामर्थ्य रखनेवाला होता है। नई पीढी जो परिवर्तन का अधिक सहजता से स्वीकार कर सकती है उसको घडना शिक्षक का काम होता है। इसलिये परिवर्तन की प्रक्रिया का मुख्य पुरोधा शिक्षक ही होता है।	&lt;br /&gt;
४.२ श्रेष्ठ जन :यहाँ श्रेष्ठ जनों से मतलब भिन्न भिन्न सामाजिक गतिविधियों में जो अग्रणी लोग हैं उनसे है।	&lt;br /&gt;
४.३ सांप्रदायिक संगठनों के प्रमुख : आजकल समाज का एक बहुत बडा वर्ग जिसमें शिक्षित वर्ग भी है, भिन्न भिन्न संप्रदायों से जुडा है। उन संप्रदायों के प्रमुख भी इस परिवर्तन की प्रक्रिया का एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण हिस्सा बनने की शक्ति रखते हैं।	&lt;br /&gt;
४.४ लोकशिक्षा के माध्यम : कीर्तनकार, कथाकार, प्रवचनकार, नाटक मंडलि, पुरोहित या उपाध्याय, साधू, बैरागी, सिंहस्थ या कुंभ जैसे मेले, यात्राएँ आदि लोकशिक्षा के माध्यम हुआ करते थे। वर्तमान में ये सब कमजोर और दिशाहीन हो गए हैं। एक ओर इनमें से जिनको पुनर्जीवित कर सकते हैं उन्हें करना। नए आयाम भी जोडे जा सकते हैं। जैसे अभी लगभग देढ दशक पूर्व महाराष्ट्र में प्रारंभ हुई नव-वर्ष स्वागत यात्राएँ आदि।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== अंतर्निहित सुधार व्यवस्था ==&lt;br /&gt;
 : काल के प्रवाह में समाज में हो रहे परिवर्तन और मनुष्य की स्खलनशीलता के कारण बढनेवाला अधर्माचरण ये दो बातें ऐसीं हैं जो किसी भी श्रेष्ठतम समाज को भी नष्ट कर देतीं हैं। इस दृष्टि से जागरूक ऐसे शिक्षक और धर्म के मार्गदर्शक साथ में मिलकर समाज की अंतर्निहित सुधार व्यवस्था बनाते हैं। अपनी संवेदनशीलता और समाज के निरंतर बारीकी से हो रहे अध्ययन के कारण इन्हें संकटों का पूर्वानुमान हो जाता है। अपने निरीक्षणों के आधारपर अपने लोकसंग्रही स्वभाव से ये लोगों को भी संकटों से ऊपर उठने के लिये तैयार करते हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== परिवर्तन की नीति ==&lt;br /&gt;
 : प्रारंभ में विरोध को आमंत्रण नहीं देना। संघर्ष में शक्ति का अपव्यय नहीं करना। जो आज कर सकते हैं उसे करते जाना। जो कल करने की आवश्यकता है उस के लिये परिस्थिति निर्माण करना। परिस्थिति के निर्माण होते ही आगे बढना।  &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== परिवर्तन में अवरोध और उनका निराकरण ==&lt;br /&gt;
 : शासनाधिष्ठित समाज में स्वार्थ के आधारपर परिवर्तन सरल और तेज गति से होता है। हिटलरने १५-२० वर्षों में ही जर्मनी को एक समर्थ राष्ट्र के रूप में खड़ा कर दिया था। लेकिन धर्म पर आधारित जीवन के प्रतिमान में परिवर्तन की गति धीमी और मार्ग कठिन होता है। स्थाई परिवर्तन और वह भी कौटुम्बिक भावना के आधारपर, तो धीरे धीरे ही होता है। &lt;br /&gt;
७.१ अंतर्देशीय 	&lt;br /&gt;
७.१.१ मानवीय जड़ता : परिवर्तन का आनंद से स्वागत करनेवाले लोग समाज में अल्पसंख्य ही होते हैं। सामान्यत: युवा वर्ग ही परिवर्तन के लिए तैयार होता है। इसलिए युवा वर्ग को इस परिवर्तन की प्रक्रिया में सहभागी बनाना होगा। परिवर्तन की प्रक्रिया में युवाओं को सम्मिलित करते जाने से दो तीन पीढ़ियों में परिवर्तन का चक्र गतिमान हो जाएगा।&lt;br /&gt;
७.१.२ विपरीत शिक्षा : जैसे जैसे भारतीय शिक्षा का विस्तार समाज में होगा वर्तमान की विपरीत शिक्षा का अपने आप ही क्रमश: लोप होगा।	   &lt;br /&gt;
७.१.३ मजहबी मानसिकता : भारतीय याने धर्म की शिक्षा के उदय और विस्तार के साथ ही मजहबी शिक्षा और उसका प्रभाव भी शनै: शनै: घटता जाएगा। मजहबों की वास्तविकता को भी उजागर करना आवश्यक है। &lt;br /&gt;
७.१.४ धर्म के ठेकेदार : जैसे जैसे धर्म के जानकार और धर्म के अनुसार आचरण करनेवाले लोग समाज में दिखने लगेंगे, धर्म के तथाकथित ठेकेदारों का प्रभाव कम होता जाएगा। &lt;br /&gt;
७.१.५ शासन तंत्र : इस परिवर्तन की प्रक्रिया में धर्म के जानकारों के बाद शासन की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण होगी। धर्माचरणी लोगों को समर्थन, सहायता और संरक्षण देने का काम शासन को करना होगा। इस के लिए शासक भी धर्म का जानकार और धर्मनिष्ठ हो, यह भी आवश्यक है। धर्म के जानकारों को यह सुनिश्चित करना होगा की शासक धर्माचरण करनेवाले और धर्म के जानकर हों।&lt;br /&gt;
७.१.६ जीवन का अभारतीय प्रतिमान : जीवन के सभी क्षेत्रों में एकसाथ जीवन के प्रतिमान के परिवर्तन की प्रक्रिया को चलाना यह धर्म के जानकारों की जिम्मेदारी होगी। शिक्षा की भूमिका इसमें सबसे महत्वपूर्ण होगी। शिक्षा के माध्यम से समूचे जीवन के भारतीय प्रतिमान की रुपरेखा और प्रक्रिया को समाजव्यापी बनाना होगा। धर्मं-शरण शासन इसमें सहायता करेगा।&lt;br /&gt;
७.१.७ तन्त्रज्ञान  समायोजन : तन्त्रज्ञान के क्षेत्र में भारत के सामने दोहरी चुनौती होगी। एक ओर तो विश्व में जो तन्त्रज्ञान के विकास की होड़ लगी है उसमें अपनी विशेषताओं के साथ अग्रणी रहना। इस दृष्टि से विकास हेतु कुछ तन्त्रज्ञान निम्न हो सकते हैं।&lt;br /&gt;
- शून्य प्रदुषण रासायनिक उद्योग।&lt;br /&gt;
- सस्ती सौर उर्जा।&lt;br /&gt;
- प्रकृति में सहजता से घुलनशील प्लैस्टिक का निर्माण। &lt;br /&gt;
- औरों द्वारा प्रक्षेपित शस्त्रों/अणु-शस्त्रों का शमन करने का तंत्रज्ञान। ...............आदि &lt;br /&gt;
और दूसरी ओर वैकल्पिक विकेंद्रीकरणपर आधारित तन्त्रज्ञान का विकास कर उसे विश्व में प्रतिष्ठित करना। इस प्रकार के तन्त्रज्ञान में निम्न प्रकार के तन्त्रज्ञान होंगे।&lt;br /&gt;
- कौटुम्बिक उद्योगों के लिये, स्थानिक संसाधनों के उपयोग के लिए तन्त्रज्ञान  &lt;br /&gt;
- भिन्न भिन्न कार्यों के लिये पशु-उर्जा के अधिकाधिक उपयोग के लिये तंत्रज्ञान&lt;br /&gt;
- नविकरणीय प्राकृतिक संसाधनों से विविध पदार्थों के निर्माण से आवश्यकताओं की पूर्ति तथा संसाधनों के पुनर्भरण के लिये सरल तन्त्रज्ञान का विकास   &lt;br /&gt;
- मानव की प्राकृतिक क्षमताओं का विकास करनेवाली प्रक्रियाओं का अनुसंधान। ......... आदि &lt;br /&gt;
७.२ अंतर्राष्ट्रीय 	&lt;br /&gt;
७.२.१ मजहबी विस्तारवादी मानसिकता : वर्तमान में यह मुख्यत: ३ प्रकार की है। ईसाई, मुस्लिम और वामपंथी। यह तीनों ही विचारधाराएँ अधूरी हैं, एकांगी हैं। यह तो इन के सम्मुख ‘सर्वे भवन्तु सुखिन:’ को लेकर कोई चुनौती खड़ी नहीं होने से इन्हें विश्व में विस्तार का अवसर मिला है। जैसे ही ‘सर्वे भवन्तु सुखिन:’ का विचार लेकर भारत एक वैश्विक शक्ति के रूप में खड़ा होगा इनके पैरोंतले की जमीन खिसकने लगेगी। &lt;br /&gt;
७.२.२ आसुरी महत्वाकांक्षा : ऊपर जो बताया गया है वह, आसुरी महत्वाकांक्षा रखनेवाली वैश्विक शक्तियों के लिये भी लागू है। आसुरी महत्वाकांक्षाओं को परास्त करने की परंपरा भारत में युगों से रही है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== परिवर्तन के लिये समयबध्द करणीय कार्य ==&lt;br /&gt;
 :  &lt;br /&gt;
समूचे जीवन के प्रतिमान का परिवर्तन यह एक बहुत बृहद् और जटिल कार्य है। इस के लिये इसे सामाजिक अभियान का रूप देना होगा। समविचारी लोगों को संगठित होकर सहमति से और चरणबध्द पध्दति से प्रक्रिया को आगे बढाना होगा। बड़े पैमानेपर जीवन के हर क्षेत्र में जीवन के भारतीय प्रतिमान की समझ रखनेवाले और कृतीशील ऐसे लोग याने आचार्य निर्माण करने होंगे। परिवर्तन के चरण एक के बाद एक और एक के साथ सभी इस पध्दति से चलेंगे। जैसे दूसरे चरण के काल में ५० प्रतिशत शक्ति और संसाधन दूसरे चरणके निर्धारित विषयपर लगेंगे। और १२.५-१२.५ प्रतिशत शक्ति और संसाधन चरण १, ३, ४ और ५ में प्रत्येकपर लगेंगे।&lt;br /&gt;
१. समविचारी लोगों का ध्रुवीकरण : जिन्हें प्रतिमान के परिवर्तन की आस है और समझ भी है ऐसे समविचारी, सहचित्त लोगों का ध्रुवीकरण करना होगा। उनमें एक व्यापक सहमति निर्माण करनी होगी। अपने अपने कार्यक्षेत्र में क्या करना है इसका स्पष्टीकरण करना होगा।&lt;br /&gt;
२. अभियान के चरण : अभियान को चरणबध्द पध्दति से चलाना होगा। १२ वर्षों के ये पाँच चरण होंगे। ऐसी यह ६० वर्ष की योजना होगी। यह प्रक्रिया तीन पीढीतक चलेगी। तीसरी पीढी में परिवर्तन के फल देखने को मिलेंगे। लेकिन तबतक निष्ठा से और धैर्य से अभियान को चलाना होगा। निरंतर मूल्यांकन करना होगा। राह भटक नहीं जाए इसके लिये चौकन्ना रहना होगा।&lt;br /&gt;
२.१ अध्ययन और अनुसंधान : जीवन का दायरा बहुत व्यापक होता है। अनगिनत विषय इसमें आते हैं। इसलिये प्रतिमान के बदलाव से पहले हमें दोनों प्रतिमानों के विषय में और विशेषत: जीवन के भारतीय प्रतिमान के विषय में बहुत गहराई से अध्ययन करना होगा। मनुष्य की इच्छाओं का दायरा, उनकी पूर्ति के लिये वह क्या क्या कर सकता है आदि का दायरा अति विशाल है। इन दोनों को धर्म के नियंत्रण में ऐसे रखा जाता है इसका भी अध्ययन अनिवार्य है। मनुष्य के व्यक्तित्व को ठीक से समझना, उसके शरीर, मन, बुध्दि, चित्त, अहंकार आदि बातों को समझना, कर्मसिध्दांत को समझना, जन्म जन्मांतर चलने वाली शिक्षा की प्रक्रिया को समझना विविध विषयों के अंगांगी संबंधों को समझना, प्रकृति के रहस्यों को समझना आदि अनेकों ऐसी बातें हैं जिनका अध्ययन हमें करना होगा। इनमें से कई विषयों के संबंध में हमारे पूर्वजों ने विपुल साहित्य निर्माण किया था। उसमें से कितने ही साहित्य को जाने अंजाने में प्रक्षेपित किया गया है। इस प्रक्षिप्त हिस्से को समझ कर अलग निकालना होगा। शुध्द भारतीय तत्वोंपर आधारित ज्ञान को प्राप्त करना होगा। अंग्रेजों ने भारतीय साहित्य, इतिहास के साथ किये खिलवाड, भारतीय समाज में झगडे पैदा करने के लिये निर्मित साहित्य को अलग हटाकर शुध्द भारतीय याने एकात्म भाव की या कौटुम्बिक भाव की जितनी भी प्रस्तुतियाँ हैं उनका अध्ययन करना होगा। मान्यताओं, व्यवहार सूत्रों, संगठन निर्माण और व्यवस्था निर्माण की प्रक्रिया को समझना होगा।     &lt;br /&gt;
२.२ लोकमत परिष्कार : अध्ययन से जो ज्ञान उभरकर सामने आएगा उसे लोगोंतक ले जाना होगा। लोगों का प्रबोधन करना होगा। उन्हें फिर से समग्रता से और एकात्मता से सोचने और व्यवहार करने का तरीका बताना होगा। उन्हें उनकी सामाजिक जिम्मेदारी का समाजधर्म का अहसास करवाना होगा। वर्तमान की परिस्थितियों से सामान्यत: कोई भी खुश नहीं है। लेकिन जीवन का भारतीय प्रतिमान ही  उनकी कल्पना के अच्छे दिनों का वास्तव है यह सब के मन में स्थापित करना होगा।	         &lt;br /&gt;
२.३ संयुक्त कुटुम्ब : कुटुम्ब ही समाजधर्म सीखने की पाठशाला होता है। संयुक्त कुटुम्ब तो वास्तव में समाज का लघुरूप ही होता है। सामाजिक समस्याओं में से लगभग ७० प्रतिशत समस्याओं को तो केवल अच्छा संयुक्त कुटुम्ब ही निर्मूल कर देता है। समाज जीवन के लिये श्रेष्ठ लोगों को जन्म देने का काम, श्रेष्ठ संस्कार देने का काम, अच्छी आदतें डालने काम आजकल की फॅमिली पध्दति नहीं कर सकती। जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में जो तेजस्वी नेतृत्व का अभाव निर्माण हो गया है उसे दूर करना यह भारतीय मान्यताओं के अनुसार चलाए जानेवाले संयुक्त परिवारों में ही हो सकता है। इसलिये समाज का नेतृत्व करेंगे ऐसे श्रेष्ठ बालकों को जन्म देने के प्रयास तीसरे चरण में होंगे।&lt;br /&gt;
२.४ शिक्षक/धर्मज्ञ और शासक निर्माण : समाज परिवर्तन में शिक्षक की और शासक की ऐसे दोनों की भुमिका अत्यंत महत्वपूर्ण होती है। संयुक्त परिवारों में जन्म लिये बच्चों में से अब श्रेष्ठ धर्म के मार्गदर्शक, शिक्षक और शासक निर्माण करने की स्थिति होगी। ऐसे लोगों को समर्थन और सहायता देनेवाले कुटुम्ब और दूसरे चरण में निर्माण किये समाज के परिष्कृत विचारोंवाले सदस्य अब कुछ मात्रा में उपलब्ध होंगे।	   &lt;br /&gt;
२.५ संगठन और व्यवस्थाओं की प्रतिष्ठापना : श्रेष्ठ धर्म के अधिष्ठाता/मार्गदर्शक, सामर्थ्यवान शिक्षक और कुशल शासक अब प्रत्यक्ष संगठन का सशक्तिकरण और व्यवस्थाओं का निर्माण करेंगे।&lt;br /&gt;
==References==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;references /&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अन्य स्रोत:&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[Category:Bhartiya Jeevan Pratiman (भारतीय जीवन प्रतिमान)]]&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Dilipkelkar</name></author>
	</entry>
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		<id>https://dharmawiki.org/index.php?title=Planning_For_Change_(%E0%A4%AA%E0%A4%B0%E0%A4%BF%E0%A4%B5%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%A4%E0%A4%A8_%E0%A4%95%E0%A5%80_%E0%A4%AF%E0%A5%8B%E0%A4%9C%E0%A4%A8%E0%A4%BE)&amp;diff=119327</id>
		<title>Planning For Change (परिवर्तन की योजना)</title>
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		<updated>2019-05-30T10:32:07Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Dilipkelkar: /* परिवर्तन की प्रक्रिया */&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{One source|date=January 2019}}&lt;br /&gt;
[[Template:Cleanup reorganize Dharmawiki Page]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
परिवर्तन की योजना को समझने के लिए हमें पहले निम्न बातें फिर से स्मरण करनी होंगी ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जीवन के भारतीय प्रतिमान की जानकारी के लिए - &lt;br /&gt;
१. जीवनदृष्टि/व्यवहार : भारतीय जीवनदृष्टि और जीवनशैली के विषय में जानकारी के लिये कृपया अध्याय ७  में देखें। 		&lt;br /&gt;
२. भारतीय जीवन के प्रतिमान के समाज संगठनों की जानकारी हमने अध्याय १३ से २० में प्राप्त की है।&lt;br /&gt;
३. व्यवस्था समूह : व्यवस्था समूह का ढाँचा जीवनदृष्टि से सुसंगत होना चाहिए। कृपया व्यवस्था समूह के ढाँचे के लिये अध्याय २२ में और जानकारी के लिए अध्याय २५ में देखें।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== समस्या मूलों के निराकरण की नीति ==&lt;br /&gt;
समस्या मूल नष्ट करने से तात्पर्य समस्या मूलोंपर आघात से नहीं है। समस्याएँ निर्माण ही नहीं हों ऐसी परिस्थितियों, ऐसे समाज संगठनों और ऐसी व्यवस्थाओं के निर्माण से है। निराकरण की प्रक्रिया के ३ चरण होंगे। समस्याओं को और परिवर्तन के स्वरूप को समझना, निराकरण की नीति तय करना और निराकरण का क्रियान्वयन करना। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== परिवर्तन के स्वरूप को समझना ==&lt;br /&gt;
समस्या का मूल जीवन के प्रतिमान के परिवर्तन में है। प्रतिमान का आधार समाज की जीवनदृष्टि होती है। व्यवहार, संगठन और व्यवस्थाएँ तो जीवनदृष्टि के आधारपर ही तय होते हैं। इसलिये परिवर्तन की प्रक्रिया में जीवनदृष्टि के परिवर्तन की प्रक्रिया को प्राथमिकता देनी होगी। व्यवहार में सुसंगतता आए इसलिये करणीय अकरणीय विवेक को सार्वत्रिक करना होगा। दूसरे क्रमांकपर संगठन और व्यवस्थाओं में परिवर्तन की प्रक्रिया चलेगी। व्यवस्था परिवर्तन की इस प्रक्रिया में समग्रता और एकात्मता के संदर्भ में व्यवस्था विशेष का आधार बनाने के लिये विषय की सैध्दांतिक प्रस्तुति करनी होगी। जैसे शासन व्यवस्था में यदि उचित परिवर्तन करना है तो पहले राजशास्त्र की सैध्दांतिक प्रस्तुति करना आवश्यक है। समृद्धि व्यवस्था में परिवर्तन करने के लिये समृद्धिशास्त्र की सैध्दांतिक प्रस्तुति करनी होगी। इन सैध्दांतिक प्रस्तुतियों को प्रयोग सिध्द करना होगा। प्रयोगों के आधारपर इन प्रस्तुतियों में उचित परिवर्तन करते हुए आगे बढना होगा। यह काम प्राथमिकता से धर्म के जानकारों का है। दूसरे क्रमांक की जिम्मेदारी शिक्षकों की है। शिक्षक वर्ग ही धर्म को सार्वत्रिक करता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== निराकरण की नीति ==&lt;br /&gt;
समस्याएँ इतनी अधिक और पेचिदा हैं कि इनका निराकरण अब संभव नहीं है, ऐसा कई विद्वान 	मानते हैं। हमने जो करणीय और अकरणीय विवेक को समझा है उसके अनुसार कोई भी बात असंभव नहीं होती। ऊपरी तौरपर असंभव लगनेपर भी उसे संभव चरणों में बाँटकर संपन्न किया जा सकता है।&lt;br /&gt;
इस के लिये नीति के तौरपर हमारा व्यवहार निम्न प्रकार का होना चागिये।&lt;br /&gt;
- सबसे पहले तो यह हमेशा ध्यान में रखना कि यह पूरे समाज जीवन के प्रतिमान के परिवर्तन का विषय है। इसे परिवर्तन के लिये कई पीढियों का समय लग सकता है। भारत वर्ष के दीर्घ इतिहास में समाज ने कई बार उत्थान और पतन के दौर अनुभव किये हैं। बारबार भारतीय समाज ने उत्थान किया है। &lt;br /&gt;
- परिवर्तन की प्रक्रिया को संभाव्य चरणों में बाँटना।&lt;br /&gt;
- उसमें आज जो हो सकता है उसे कर डालना।&lt;br /&gt;
- आज जिसे करना कठिन लगता है उसके लिये परिस्थितियाँ बनाते जाना। परिस्थितियाँ बनते ही उसे    करना। &lt;br /&gt;
- प्रारंभ में जबतक परिवर्तन की प्रक्रिया ने गति नहीं पकडी है, यथासंभव कोई विरोध मोल नहीं लेना। &lt;br /&gt;
- इसी प्रकार से एक एक चरण को संभव बनाते हुए आगे बढ़ाते जाना।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== समस्या मूलों का निराकरण ==&lt;br /&gt;
वास्तव में समस्या मूलों को नष्ट करना यह शब्दप्रयोग ठीक नहीं है। उचित प्रतिमान की प्रतिष्ठापना के साथ ही गलत प्रतिमान का अंत अपने आप होता है। जो सर्वहितकारी है, उचित है, श्रेष्ठ है, उसकी प्रतिष्ठापना ही परिवर्तन की प्रक्रिया का स्वरूप होगा। स्वाभाविक जडता के कारण कुछ कठिनाईयाँ तो आएँगी। लेकिन गलत प्रतिमान को नष्ट करने के लिये अलग से शक्ति लगाने की आवश्यकता नहीं है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== समस्या मूल नष्ट करने हेतु धर्म के जानकारों के मार्गदर्शन में शिक्षा की व्याप्ति ==&lt;br /&gt;
१. जीवनदृष्टि की शिक्षा : जीवनदृष्टि की शिक्षा मुख्यत: कामनाओं और कामनाओं की पूर्ति के प्रयास, धन, साधन और संसाधनों को धर्म के दायरे में रखने की शिक्षा ही है। पुरूषार्थ चतुष्टय की या त्रिवर्ग की शिक्षा ही है।&lt;br /&gt;
२. व्यवस्थाएँ : जीवनदृष्टि के अनुसार व्यवहार हो सके इस हेतु से ही व्यवस्थाओं का निर्माण किया जाता है।  व्यवस्थाओं के निर्माण में और उनके क्रियान्वयन में भी जीवनदृष्टि ओतप्रोत रहे इसका ध्यान रखना होगा।&lt;br /&gt;
	 २.१ धर्म व्यवस्था    २.२ शिक्षा व्यवस्था	२.३ शासन व्यवस्था   २.४ समृद्धि व्यवस्था&lt;br /&gt;
३. संगठन : समाज संगठन और समाज की व्यवस्थाएँ एक दूसरे को पूरक पोषक होती हैं। लेकिन धर्म व्यवस्था, शिक्षा व्यवस्था और शासन व्यवस्था के अभाव में संगठन निर्माण करना अत्यंत कठिन हो जाता है। वास्तव में ये दोनों अन्योन्याश्रित होते हैं। समाज संगठन की जानकारी के लिये कृपया अध्याय १२ देखें।&lt;br /&gt;
	३.१ कुटुम्ब 			३.२ स्वभाव समायोजन			३.३ आश्रम			३.४ कौशल विधा		३.५ ग्राम				३.६ राष्ट्र&lt;br /&gt;
४. विज्ञान और तन्त्रज्ञान  : कृपया अध्याय ३९ देखें। &lt;br /&gt;
४.१ विकास और उपयोग नीति		४.२ सार्वत्रिकीकरण&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== परिवर्तन की योजना ==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== परिवर्तन का स्वरूप ===&lt;br /&gt;
वर्तमान स्वार्थपर आधारित जीवन के प्रतिमान के स्थानपर आत्मीयता याने कौटुम्बिक  भावनापर आधारित जीवन के प्रतिमान की प्रतिष्ठापना&lt;br /&gt;
१.१  सर्वे भवन्तु सुखिन:, देशानुकूल और कालानुकूल आदि के संदर्भ में दोनों प्रतिमानों को समझना&lt;br /&gt;
१.२ प्रतिमान का परिवर्तन&lt;br /&gt;
.२.१ सामाजिक व्यवस्थाओं का पुनर्निर्माण&lt;br /&gt;
१.२.२ समाज के संगठनों का परिष्कार/पुनरूत्थान या नवनिर्माण&lt;br /&gt;
१.२.३ तन्त्रज्ञान  का समायोजन / तन्त्रज्ञान  नीति / जीवन की इष्ट गति : वर्तमान में तन्त्रज्ञान  की विकास की गति से जीवन को जो गति प्राप्त हुई है उस के कारण सामान्य मनुष्य घसीटा जा रहा है। पर्यावरण सन्तुलन  और सामाजिकता दाँवपर लग गए हैं। ज्ञान, विज्ञान और तन्त्रज्ञान  ये तीनों बातें पात्र व्यक्ति को ही मिलनी चाहिये। बंदर के हाथ में पलिता नहीं दिया जाता। इस लिये किसी भी तन्त्रज्ञान के सार्वत्रिकीकरण से पहले उसके पर्यावरण, समाजजीवन और व्यक्ति जीवनपर होनेवाले परिणाम जानना आवश्यक है। हानिकारक तंत्रज्ञान का तो विकास भी नहीं करना चाहिये। किया तो वह केवल सुपात्र को ही अंतरित हो यह सुनिश्चित करना चाहिये।&lt;br /&gt;
ऐसी स्थिति में जीवन की इष्ट गति की ओर बढानेवाली तन्त्रज्ञान नीति का स्वीकार करना होगा। इष्ट गति के निकषों के लिये अध्याय ३९ में बताई कसौटि लगानी होगी।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== परिवर्तन की प्रक्रिया ===&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सामाजिक परिवर्तन भौतिक वस्तुओं के परिवर्तन जैसे सरल नहीं होते। भौतिक पदार्थों का एक निश्चित स्वभाव होता है। धर्म होता है। इसे ध्यान में रखकर भौतिक पदार्थों को ढाला जाता है। हर मानव का स्वभाव भिन्न होता है। भिन्न समयपर भी उसमें बदलाव आ सकता है। इसलिये सामाजिक परिवर्तन क्रांति से नहीं उत्क्रांति से ही किये जा सकते हैं। उत्क्रांति की गति धीमी होती है। होनेवाले परिवर्तनों से किसी की हानी नहीं हो या होनेवाली हानी न्यूनतम हो, परिवर्तन स्थाई हों, परिवर्तन से सबको लाभ मिले यह सब देखकर ही प्रक्रिया चलाई जाती है। सामाजिक परिवर्तनों के लिये नई पीढी से प्रारंभ करना यह सबसे अच्छा रास्ता है। लेकिन नई पीढी में व्यापक रूप से परिवर्तन के पहलुओं को स्थापित करने के लिये आवश्यक इतनी पुरानी पीढी के श्रेष्ठ जनों की संख्या आवश्यक है। ऐसे श्रेष्ठ जनों का वर्णन श्रीमद्भगवद्गीता में किया गया है -&lt;br /&gt;
यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जन: ।&lt;br /&gt;
स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते॥ (अध्याय ३ श्लोक २१)&lt;br /&gt;
इसलिये एक दृष्टि से देखा जाए तो यह प्रक्रिया समाज के प्रत्येक व्यक्तितक ले जाने की आवश्यकता नहीं होती। केवल समाज जीवन की सभी विधाओं के श्रेष्ठ लोगों के निर्माण की प्रक्रिया ही परिवर्तन की प्रक्रिया है। एक बार ये लोग निर्माण हो गये तो फिर परिवर्तन तेज याने ज्यामितीय गति से होने लगता है।&lt;br /&gt;
२.१ धीमी लेकिन अविश्रांत : हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि हमें सामाजिक परिवर्तन करना है। समाज एक जीवंत ईकाई होता है। जीवंत ईकाई में परिवर्तन हमेशा धीमी गति से, समग्रता से और अविरत करते रहने से होते हैं। कोई भी शीघ्रता या टुकडों में होनेवाले परिवर्तन हानिकारक होते हैं।&lt;br /&gt;
२.२ सभी क्षेत्रों में एकसाथ : समाज एक जीवंत ईकाई होने के कारण इसके सभी अंग किसी भी बात से एकसाथ प्रभावित होते हैं। प्रभाव का परिमाण कम अधिक होगा लेकिन प्रभाव सभीपर होता ही है। इसलिये परिवर्तन की प्रक्रिया टुकडों में अलग अलग या एक के बाद एक ऐसी नहीं होगी। परिवर्तन की प्रक्रिया धर्म, शिक्षा, शासन, अर्थ, न्याय, समाज संगठन आदि सभी क्षेत्रों में एकसाथ चलेगी। ऐसी प्रक्रिया का प्रारंभ होना बहुत कठिन होता है। लेकिन एकबार सभी क्षेत्रों में प्रारंभ हो जाता है तो फिर यह तेजी से गति प्राप्त कर लेती है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== परिवर्तन के कारक तत्व ===&lt;br /&gt;
३.१ शिक्षा : शिक्षा का दायरा बहुत व्यापक है। शिक्षा जन्म जन्मांतर चलनेवाली प्रक्रिया होती है। इस जन्म में शिक्षा गर्भधारणा से मृत्यूपर्यंत चलती है। आयु की अवस्था के अनुसार शिक्षा का स्वरूप बदलता है। &lt;br /&gt;
३.१.२ कुटुम्ब में शिक्षा : कुटुम्ब में शिक्षा का प्रारंभ गर्भधारणा से होता है। मनुष्य की ६०-७० प्रतिशत घडन तो कुटुम्ब में ही होती है। कुटुम्ब में रहकर वह कई बातें सीखता है। कौटुम्बिक भावना, कर्तव्य, सदाचार आदि की शिक्षा कुटुम्ब की ही जिम्मेदारी होती है। व्यवस्थाओं के साथ समायोजन, व्यवस्थाओं के स्वरूप आदि भी वह कुटुम्ब में ही अपने ज्येष्ठों से सीखता है। इंद्रियों के विकास की शिक्षा, व्यावसायिक कौशल भी वह कुटुम्ब में ही सीखता है। कुटुम्ब सामाजिकता की पाठशाला ही होता है। बडों का आदर, स्त्री का आदर आदि भी कुटुम्ब ही सिखाता है। &lt;br /&gt;
३.१.२ कुटुम्ब की शिक्षा : उसी प्रकार से कुटुम्ब के बारे में भी वह कई बातें सीखता है। उसकी व्यक्तिगत, कौटुम्बिक और सामाजिक आदतें बचपन में ही आकार लेतीं हैं। कुटुम्ब का महत्व, समाज में कौटुम्बिक भावना का महत्व, कौटुम्बिक व्यवस्थाओं का महत्व वह कुटुम्ब में सीखता है। भिन्न भिन्न स्वभावों के लोग एक छत के नीचे आत्मीयता से कैसे रहते हैं यह वह कुटुम्ब से ही सीखता है। लगभग सभी प्रकार से कुटुंब यह समाज का लघुरूप ही होता है। कुटुंब यह सामाजिकता की पाठशाला होती है।&lt;br /&gt;
३.१.३ विद्याकेन्द्र शिक्षा	: विद्याकेन्द्र की शिक्षा शास्त्रीय शिक्षा होती है। कुटुम्ब में सीखे हुए सदाचार के शास्त्रीय पक्ष को समझाने के लिये होती है। कुटुंब में सीखे हुए व्यावसायिक कौशलों को पैना बनाने के लिये होती है। कुटुंब में आत्मसात की हुई श्रेष्ठ परम्पराओं को अधिक उज्वल बनाने के तरीके सीखने के लिए होती है। अध्ययन का और कौशल का शास्त्रीय तरीका सिखने के लिये, अध्ययन को तेजस्वी बनाने के लिये होती है।&lt;br /&gt;
३.१.४ लोकशिक्षा : लोकशिक्षा भी समाज जीवन का एक आवश्यक पहलू है। विद्याकेन्द्र की शिक्षा के उपरान्त भी मनुष्य का मन कई बार भ्रमित हो जाता हाय, बुद्धि कुण्ठित हो जाती है। ऐसी स्थिति में लोकशिक्षा की व्यवस्था इस संभ्रम को, इस कुण्ठा को दूर करती है।&lt;br /&gt;
३.१.५ परंपरा निर्माण : अपने से अधिक श्रेष्ठ विरासत निर्माण करने की निरंतरता को श्रेष्ठ परंपरा कहते हैं। श्रेष्ठ परंपराओं के निर्माण की तीव्र इच्छा और पैने प्रयास समाज को श्रेष्ठ और चिरंजीवी बनाते हैं।&lt;br /&gt;
३.२ शासन 	&lt;br /&gt;
३.२.१ धर्मनिष्ठता : शासक धर्मशास्त्र के जानकार हों। धर्मशास्त्र के पालनकर्ता हों। धर्मशास्त्र के नियमों का प्रजा से अनुपालन करवाने में कुशल हों।	&lt;br /&gt;
३.२.२ धर्म व्यवस्था के साथ समायोजन : सदैव धर्म के जानकारों से अपना मूल्यांकन करवाएँ। धर्म के जानकारों की सूचनाओं का अनुपालन करें। अधर्म होने से प्रायश्चित्त और पश्चात्ताप के लिये उद्यत रहें।&lt;br /&gt;
३.३ धर्म नेतृत्व&lt;br /&gt;
३.३.१ धर्म के मार्गदर्शक : किसी का केवल धर्मशास्त्र का विशेषज्ञ होना पर्याप्त नहीं है। नि:स्वार्थ भाव, निर्भयता भी श्रेष्ठ धर्म के मार्गदर्शकों के लक्षण हैं।&lt;br /&gt;
३.३.२ धर्माचरणी : धर्म का मार्गदर्शन करनेवाले लोग अपने व्यवहार में भी धर्मयुक्त होना चाहिये।&lt;br /&gt;
३.३.३ विजीगिषु स्वभाववाले : धर्म का मार्गदर्शन करनेवाले लोगों के लिये विजीगिषु स्वभाव का होना आवश्यक है। कोई भी संकट आनेपर डगमगाएँ नहीं यह धर्म के मार्गदर्शकों के लिये आवश्यक है।&lt;br /&gt;
धर्मं के जानकारों का सबसे पहला कर्तव्य है कि वे वर्तमान काल के लिए धर्मशास्त्र या स्मृति की प्रस्तुति करें। यह स्मृति जीवन के सभी पहलुओं को व्यापनेवाली हो। इसकी व्यापकता को समझने की दृष्टि से एक रूपरेखा नीचे दे रहे हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== धर्मशास्त्र प्रस्तुति के लिये बिन्दु ==&lt;br /&gt;
() धर्म की व्याख्याएँ / धर्म की व्याप्ति / त्रिवर्ग की व्याप्ति : सर्वे भवन्तु सुखिन: लक्ष्य हेतु धर्म : संस्कृति &lt;br /&gt;
() व्यापक धर्मशास्त्र के प्रस्तुति की आवश्यकता: * पूर्व धर्मशास्त्रों की व्यापकता(?)  	* व्यापकता की आवश्यकता &lt;br /&gt;
() व्यक्तिगत धर्म / पञ्चविध (कोष) पुरुष धर्म / चतुर्विध पुरूषार्थ /स्वधर्म (वर्णधर्म)&lt;br /&gt;
शरीरधर्म 	२. मन-धर्म 	३. बुद्धि-धर्म 	४. चित्त-धर्म &lt;br /&gt;
() सामाजिक संबंधों में धर्म &lt;br /&gt;
व्यक्ति-व्यक्ति  : पुरूष-पुरूष या स्त्री-स्त्री 			१.१ पारिवारिक रिश्ते 	१.२ पड़ोसी 		१.३ अतिथि  	१.४ शत्रु/विरोधक 		१.५ मित्र/सहायक 	१.६ सहकारी 		१.७ अपरिचित 	१.८ मालिक/नौकर 		१.९ चरित्रहीन स्त्री/पुरूष 	१.१० व्यसनी 		१,११ जरूरतमंद 	१.१२ समव्यवसायी 		१.१३ भिन्न व्यवसायी 	१.१४ याचक 		१.१५ भिन्न भाषी १.१६ विक्रेता\क्रेता    		१.१७ भिन्न राष्ट्रीय &lt;br /&gt;
व्यक्ति-व्यक्ति : पुरूष-स्त्री 				१.१ पारिवारिक रिश्ते 	१.२ पड़ोसी 		१.३ अतिथि  	१.४ शत्रु/विरोधक 		१.५ मित्र/सहायक 	१.६ सहकारी 		१.७ अपरिचित 	१.८ मालिक/नौकर 		१.९ चरित्रहीन स्त्री/पुरूष 	१.१० व्यसनी 		१,११ जरूरतमंद 	१.१२ समव्यवसायी 		१.१३ भिन्न व्यवसायी 	१.१४ याचक 		१.१५ भिन्न भाषी १.१६ विक्रेता\क्रेता    		१.१७ भिन्न राष्ट्रीय &lt;br /&gt;
व्यक्ति-समाज :		३.१ व्यक्ति-परिवार 	३.२ व्यति-जाति 		३.३ पड़ोसी 			३.४ सामाजिक संगठन  	३.५ व्यक्ति-व्यवस्था 	३.६ व्यक्ति-राष्ट्र 		३.७ व्यक्ति-विश्व समाज 		३.८ व्यक्ति भिन्न भाषी 	३.९ परप्रांतीय 		३.१० परदेसी &lt;br /&gt;
समाज-समाज : 	४.१ अंतर्राष्ट्रीय : ४.१.१ शत्रु 	४.१.२ मित्र 	४.१.३ तटस्थ 		&lt;br /&gt;
४.२ अंतर्देशीय	४.१.१ प्रांत-प्रांत 	४.१.२ जनपद-जनपद 	४.१.३ भाषिक समूह  	४.१.४ पंथ समूह  	४.१.५ राष्ट्रीय समूह 	४.१.६ अराष्ट्रीय समूह 		४.१.७ राष्ट्रद्रोही समूह 	४.१.८ विदेशी 		४.१.९ समव्यवासायी  	४.१.१० जाति-जाति 		४.१.११ परिवार परिवार &lt;br /&gt;
()  सृष्टिगत सम्बन्धों में धर्म  &lt;br /&gt;
	१. मनुष्य-अन्य जीव :													१.१ मनुष्य-पालतू प्राणी :  १.१.१ शाकाहारी 	१.१.२ मांसाहारी 								१.२ मनुष्य अन्य प्राणी : 	१.२.१ थलचर : 	१.२.१.१ शाकाहारी 	१.२.१.२ मांसाहारी 							१.२.२ जलचर 		और 		१.२.३ नभचर 	&lt;br /&gt;
१.३ मनुष्य-वनस्पति : 	१.३.१ जमीन के नीचे 	१.३.२ जमीन के ऊपर 	१.३.३ वनस्पति/औषधी 					१.३.४ खानेयोग्य/अन्न 	१.३.५ अखाद्य/जहरीली 	१.३.६ नशीली		१.४ मनुष्य-कृमि/कीटक/सूक्ष्म जीव 		१.४.१ सहायक 		१.४.२ हानिकारक	      २. मनुष्य-जड़ प्रकृति / पंचमहाभूत 									२.१ अनवीकरणीय/खनिज 	२.१.१ ठोस 	२.१.२ द्रव 	२.१.३ वायु (इंधन)  		२.२ नवीकरणीय 	: २.२.१ वायु/हवा 	२.२.२ जल 	२.२.३ सूर्यप्रकाश 		२.२.४ लकड़ी&lt;br /&gt;
() आपद्धर्म :	१. प्राकृतिक आपदा 		२. मानव निर्मित आपदा (लगभग उपर्युक्त सभी विषयों में)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== परिवर्तन के पुरोधा ==&lt;br /&gt;
 : उपर्युक्त बिन्दु २ में बताए गए श्रेष्ठ जन ही परिवर्तन के पुरोधा होंगे। इनका प्रमाण समाज में मुष्किल से ५-७ प्रतिशत ही पर्याप्त होता है। ऐसे श्रेष्ठ जनों में निम्न वर्ग के लोग आते हैं।	&lt;br /&gt;
४.१ शिक्षक : शिक्षक ज्ञानी, त्यागी, कुशल, समाज हित के लिए समर्पित, धर्म का जानकार, समाज को घडने की सामर्थ्य रखनेवाला होता है। नई पीढी जो परिवर्तन का अधिक सहजता से स्वीकार कर सकती है उसको घडना शिक्षक का काम होता है। इसलिये परिवर्तन की प्रक्रिया का मुख्य पुरोधा शिक्षक ही होता है।	&lt;br /&gt;
४.२ श्रेष्ठ जन :यहाँ श्रेष्ठ जनों से मतलब भिन्न भिन्न सामाजिक गतिविधियों में जो अग्रणी लोग हैं उनसे है।	&lt;br /&gt;
४.३ सांप्रदायिक संगठनों के प्रमुख : आजकल समाज का एक बहुत बडा वर्ग जिसमें शिक्षित वर्ग भी है, भिन्न भिन्न संप्रदायों से जुडा है। उन संप्रदायों के प्रमुख भी इस परिवर्तन की प्रक्रिया का एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण हिस्सा बनने की शक्ति रखते हैं।	&lt;br /&gt;
४.४ लोकशिक्षा के माध्यम : कीर्तनकार, कथाकार, प्रवचनकार, नाटक मंडलि, पुरोहित या उपाध्याय, साधू, बैरागी, सिंहस्थ या कुंभ जैसे मेले, यात्राएँ आदि लोकशिक्षा के माध्यम हुआ करते थे। वर्तमान में ये सब कमजोर और दिशाहीन हो गए हैं। एक ओर इनमें से जिनको पुनर्जीवित कर सकते हैं उन्हें करना। नए आयाम भी जोडे जा सकते हैं। जैसे अभी लगभग देढ दशक पूर्व महाराष्ट्र में प्रारंभ हुई नव-वर्ष स्वागत यात्राएँ आदि।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== अंतर्निहित सुधार व्यवस्था ==&lt;br /&gt;
 : काल के प्रवाह में समाज में हो रहे परिवर्तन और मनुष्य की स्खलनशीलता के कारण बढनेवाला अधर्माचरण ये दो बातें ऐसीं हैं जो किसी भी श्रेष्ठतम समाज को भी नष्ट कर देतीं हैं। इस दृष्टि से जागरूक ऐसे शिक्षक और धर्म के मार्गदर्शक साथ में मिलकर समाज की अंतर्निहित सुधार व्यवस्था बनाते हैं। अपनी संवेदनशीलता और समाज के निरंतर बारीकी से हो रहे अध्ययन के कारण इन्हें संकटों का पूर्वानुमान हो जाता है। अपने निरीक्षणों के आधारपर अपने लोकसंग्रही स्वभाव से ये लोगों को भी संकटों से ऊपर उठने के लिये तैयार करते हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== परिवर्तन की नीति ==&lt;br /&gt;
 : प्रारंभ में विरोध को आमंत्रण नहीं देना। संघर्ष में शक्ति का अपव्यय नहीं करना। जो आज कर सकते हैं उसे करते जाना। जो कल करने की आवश्यकता है उस के लिये परिस्थिति निर्माण करना। परिस्थिति के निर्माण होते ही आगे बढना।  &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== परिवर्तन में अवरोध और उनका निराकरण ==&lt;br /&gt;
 : शासनाधिष्ठित समाज में स्वार्थ के आधारपर परिवर्तन सरल और तेज गति से होता है। हिटलरने १५-२० वर्षों में ही जर्मनी को एक समर्थ राष्ट्र के रूप में खड़ा कर दिया था। लेकिन धर्म पर आधारित जीवन के प्रतिमान में परिवर्तन की गति धीमी और मार्ग कठिन होता है। स्थाई परिवर्तन और वह भी कौटुम्बिक भावना के आधारपर, तो धीरे धीरे ही होता है। &lt;br /&gt;
७.१ अंतर्देशीय 	&lt;br /&gt;
७.१.१ मानवीय जड़ता : परिवर्तन का आनंद से स्वागत करनेवाले लोग समाज में अल्पसंख्य ही होते हैं। सामान्यत: युवा वर्ग ही परिवर्तन के लिए तैयार होता है। इसलिए युवा वर्ग को इस परिवर्तन की प्रक्रिया में सहभागी बनाना होगा। परिवर्तन की प्रक्रिया में युवाओं को सम्मिलित करते जाने से दो तीन पीढ़ियों में परिवर्तन का चक्र गतिमान हो जाएगा।&lt;br /&gt;
७.१.२ विपरीत शिक्षा : जैसे जैसे भारतीय शिक्षा का विस्तार समाज में होगा वर्तमान की विपरीत शिक्षा का अपने आप ही क्रमश: लोप होगा।	   &lt;br /&gt;
७.१.३ मजहबी मानसिकता : भारतीय याने धर्म की शिक्षा के उदय और विस्तार के साथ ही मजहबी शिक्षा और उसका प्रभाव भी शनै: शनै: घटता जाएगा। मजहबों की वास्तविकता को भी उजागर करना आवश्यक है। &lt;br /&gt;
७.१.४ धर्म के ठेकेदार : जैसे जैसे धर्म के जानकार और धर्म के अनुसार आचरण करनेवाले लोग समाज में दिखने लगेंगे, धर्म के तथाकथित ठेकेदारों का प्रभाव कम होता जाएगा। &lt;br /&gt;
७.१.५ शासन तंत्र : इस परिवर्तन की प्रक्रिया में धर्म के जानकारों के बाद शासन की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण होगी। धर्माचरणी लोगों को समर्थन, सहायता और संरक्षण देने का काम शासन को करना होगा। इस के लिए शासक भी धर्म का जानकार और धर्मनिष्ठ हो, यह भी आवश्यक है। धर्म के जानकारों को यह सुनिश्चित करना होगा की शासक धर्माचरण करनेवाले और धर्म के जानकर हों।&lt;br /&gt;
७.१.६ जीवन का अभारतीय प्रतिमान : जीवन के सभी क्षेत्रों में एकसाथ जीवन के प्रतिमान के परिवर्तन की प्रक्रिया को चलाना यह धर्म के जानकारों की जिम्मेदारी होगी। शिक्षा की भूमिका इसमें सबसे महत्वपूर्ण होगी। शिक्षा के माध्यम से समूचे जीवन के भारतीय प्रतिमान की रुपरेखा और प्रक्रिया को समाजव्यापी बनाना होगा। धर्मं-शरण शासन इसमें सहायता करेगा।&lt;br /&gt;
७.१.७ तन्त्रज्ञान  समायोजन : तन्त्रज्ञान के क्षेत्र में भारत के सामने दोहरी चुनौती होगी। एक ओर तो विश्व में जो तन्त्रज्ञान के विकास की होड़ लगी है उसमें अपनी विशेषताओं के साथ अग्रणी रहना। इस दृष्टि से विकास हेतु कुछ तन्त्रज्ञान निम्न हो सकते हैं।&lt;br /&gt;
- शून्य प्रदुषण रासायनिक उद्योग।&lt;br /&gt;
- सस्ती सौर उर्जा।&lt;br /&gt;
- प्रकृति में सहजता से घुलनशील प्लैस्टिक का निर्माण। &lt;br /&gt;
- औरों द्वारा प्रक्षेपित शस्त्रों/अणु-शस्त्रों का शमन करने का तंत्रज्ञान। ...............आदि &lt;br /&gt;
और दूसरी ओर वैकल्पिक विकेंद्रीकरणपर आधारित तन्त्रज्ञान का विकास कर उसे विश्व में प्रतिष्ठित करना। इस प्रकार के तन्त्रज्ञान में निम्न प्रकार के तन्त्रज्ञान होंगे।&lt;br /&gt;
- कौटुम्बिक उद्योगों के लिये, स्थानिक संसाधनों के उपयोग के लिए तन्त्रज्ञान  &lt;br /&gt;
- भिन्न भिन्न कार्यों के लिये पशु-उर्जा के अधिकाधिक उपयोग के लिये तंत्रज्ञान&lt;br /&gt;
- नविकरणीय प्राकृतिक संसाधनों से विविध पदार्थों के निर्माण से आवश्यकताओं की पूर्ति तथा संसाधनों के पुनर्भरण के लिये सरल तन्त्रज्ञान का विकास   &lt;br /&gt;
- मानव की प्राकृतिक क्षमताओं का विकास करनेवाली प्रक्रियाओं का अनुसंधान। ......... आदि &lt;br /&gt;
७.२ अंतर्राष्ट्रीय 	&lt;br /&gt;
७.२.१ मजहबी विस्तारवादी मानसिकता : वर्तमान में यह मुख्यत: ३ प्रकार की है। ईसाई, मुस्लिम और वामपंथी। यह तीनों ही विचारधाराएँ अधूरी हैं, एकांगी हैं। यह तो इन के सम्मुख ‘सर्वे भवन्तु सुखिन:’ को लेकर कोई चुनौती खड़ी नहीं होने से इन्हें विश्व में विस्तार का अवसर मिला है। जैसे ही ‘सर्वे भवन्तु सुखिन:’ का विचार लेकर भारत एक वैश्विक शक्ति के रूप में खड़ा होगा इनके पैरोंतले की जमीन खिसकने लगेगी। &lt;br /&gt;
७.२.२ आसुरी महत्वाकांक्षा : ऊपर जो बताया गया है वह, आसुरी महत्वाकांक्षा रखनेवाली वैश्विक शक्तियों के लिये भी लागू है। आसुरी महत्वाकांक्षाओं को परास्त करने की परंपरा भारत में युगों से रही है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== परिवर्तन के लिये समयबध्द करणीय कार्य ==&lt;br /&gt;
 :  &lt;br /&gt;
समूचे जीवन के प्रतिमान का परिवर्तन यह एक बहुत बृहद् और जटिल कार्य है। इस के लिये इसे सामाजिक अभियान का रूप देना होगा। समविचारी लोगों को संगठित होकर सहमति से और चरणबध्द पध्दति से प्रक्रिया को आगे बढाना होगा। बड़े पैमानेपर जीवन के हर क्षेत्र में जीवन के भारतीय प्रतिमान की समझ रखनेवाले और कृतीशील ऐसे लोग याने आचार्य निर्माण करने होंगे। परिवर्तन के चरण एक के बाद एक और एक के साथ सभी इस पध्दति से चलेंगे। जैसे दूसरे चरण के काल में ५० प्रतिशत शक्ति और संसाधन दूसरे चरणके निर्धारित विषयपर लगेंगे। और १२.५-१२.५ प्रतिशत शक्ति और संसाधन चरण १, ३, ४ और ५ में प्रत्येकपर लगेंगे।&lt;br /&gt;
१. समविचारी लोगों का ध्रुवीकरण : जिन्हें प्रतिमान के परिवर्तन की आस है और समझ भी है ऐसे समविचारी, सहचित्त लोगों का ध्रुवीकरण करना होगा। उनमें एक व्यापक सहमति निर्माण करनी होगी। अपने अपने कार्यक्षेत्र में क्या करना है इसका स्पष्टीकरण करना होगा।&lt;br /&gt;
२. अभियान के चरण : अभियान को चरणबध्द पध्दति से चलाना होगा। १२ वर्षों के ये पाँच चरण होंगे। ऐसी यह ६० वर्ष की योजना होगी। यह प्रक्रिया तीन पीढीतक चलेगी। तीसरी पीढी में परिवर्तन के फल देखने को मिलेंगे। लेकिन तबतक निष्ठा से और धैर्य से अभियान को चलाना होगा। निरंतर मूल्यांकन करना होगा। राह भटक नहीं जाए इसके लिये चौकन्ना रहना होगा।&lt;br /&gt;
२.१ अध्ययन और अनुसंधान : जीवन का दायरा बहुत व्यापक होता है। अनगिनत विषय इसमें आते हैं। इसलिये प्रतिमान के बदलाव से पहले हमें दोनों प्रतिमानों के विषय में और विशेषत: जीवन के भारतीय प्रतिमान के विषय में बहुत गहराई से अध्ययन करना होगा। मनुष्य की इच्छाओं का दायरा, उनकी पूर्ति के लिये वह क्या क्या कर सकता है आदि का दायरा अति विशाल है। इन दोनों को धर्म के नियंत्रण में ऐसे रखा जाता है इसका भी अध्ययन अनिवार्य है। मनुष्य के व्यक्तित्व को ठीक से समझना, उसके शरीर, मन, बुध्दि, चित्त, अहंकार आदि बातों को समझना, कर्मसिध्दांत को समझना, जन्म जन्मांतर चलने वाली शिक्षा की प्रक्रिया को समझना विविध विषयों के अंगांगी संबंधों को समझना, प्रकृति के रहस्यों को समझना आदि अनेकों ऐसी बातें हैं जिनका अध्ययन हमें करना होगा। इनमें से कई विषयों के संबंध में हमारे पूर्वजों ने विपुल साहित्य निर्माण किया था। उसमें से कितने ही साहित्य को जाने अंजाने में प्रक्षेपित किया गया है। इस प्रक्षिप्त हिस्से को समझ कर अलग निकालना होगा। शुध्द भारतीय तत्वोंपर आधारित ज्ञान को प्राप्त करना होगा। अंग्रेजों ने भारतीय साहित्य, इतिहास के साथ किये खिलवाड, भारतीय समाज में झगडे पैदा करने के लिये निर्मित साहित्य को अलग हटाकर शुध्द भारतीय याने एकात्म भाव की या कौटुम्बिक भाव की जितनी भी प्रस्तुतियाँ हैं उनका अध्ययन करना होगा। मान्यताओं, व्यवहार सूत्रों, संगठन निर्माण और व्यवस्था निर्माण की प्रक्रिया को समझना होगा।     &lt;br /&gt;
२.२ लोकमत परिष्कार : अध्ययन से जो ज्ञान उभरकर सामने आएगा उसे लोगोंतक ले जाना होगा। लोगों का प्रबोधन करना होगा। उन्हें फिर से समग्रता से और एकात्मता से सोचने और व्यवहार करने का तरीका बताना होगा। उन्हें उनकी सामाजिक जिम्मेदारी का समाजधर्म का अहसास करवाना होगा। वर्तमान की परिस्थितियों से सामान्यत: कोई भी खुश नहीं है। लेकिन जीवन का भारतीय प्रतिमान ही  उनकी कल्पना के अच्छे दिनों का वास्तव है यह सब के मन में स्थापित करना होगा।	         &lt;br /&gt;
२.३ संयुक्त कुटुम्ब : कुटुम्ब ही समाजधर्म सीखने की पाठशाला होता है। संयुक्त कुटुम्ब तो वास्तव में समाज का लघुरूप ही होता है। सामाजिक समस्याओं में से लगभग ७० प्रतिशत समस्याओं को तो केवल अच्छा संयुक्त कुटुम्ब ही निर्मूल कर देता है। समाज जीवन के लिये श्रेष्ठ लोगों को जन्म देने का काम, श्रेष्ठ संस्कार देने का काम, अच्छी आदतें डालने काम आजकल की फॅमिली पध्दति नहीं कर सकती। जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में जो तेजस्वी नेतृत्व का अभाव निर्माण हो गया है उसे दूर करना यह भारतीय मान्यताओं के अनुसार चलाए जानेवाले संयुक्त परिवारों में ही हो सकता है। इसलिये समाज का नेतृत्व करेंगे ऐसे श्रेष्ठ बालकों को जन्म देने के प्रयास तीसरे चरण में होंगे।&lt;br /&gt;
२.४ शिक्षक/धर्मज्ञ और शासक निर्माण : समाज परिवर्तन में शिक्षक की और शासक की ऐसे दोनों की भुमिका अत्यंत महत्वपूर्ण होती है। संयुक्त परिवारों में जन्म लिये बच्चों में से अब श्रेष्ठ धर्म के मार्गदर्शक, शिक्षक और शासक निर्माण करने की स्थिति होगी। ऐसे लोगों को समर्थन और सहायता देनेवाले कुटुम्ब और दूसरे चरण में निर्माण किये समाज के परिष्कृत विचारोंवाले सदस्य अब कुछ मात्रा में उपलब्ध होंगे।	   &lt;br /&gt;
२.५ संगठन और व्यवस्थाओं की प्रतिष्ठापना : श्रेष्ठ धर्म के अधिष्ठाता/मार्गदर्शक, सामर्थ्यवान शिक्षक और कुशल शासक अब प्रत्यक्ष संगठन का सशक्तिकरण और व्यवस्थाओं का निर्माण करेंगे।&lt;br /&gt;
==References==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;references /&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अन्य स्रोत:&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[Category:Bhartiya Jeevan Pratiman (भारतीय जीवन प्रतिमान)]]&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Dilipkelkar</name></author>
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