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राम राज्य
 
राम राज्य
(तुलसीदास रचित रामचरित मानस - उत्तरकाण्ड में राम राज्य का वर्णन पृष्ठ २३,२४,२५) (गीता प्रेस गोरखपुर - टीकाकार हनुमानप्रसाद पोद्दार) श्रीरामचन्द्रजीके राज्यपर प्रतिष्ठित होनेपर तीनों लोक हर्षित हो गये, उनके सारे शोक जाते रहे। कोई किसी से बैर नहीं करता। श्रीरामचन्द्रजीके प्रतापसे सबकी विषमता (आतंरिक भेदभाव) मिट गयी। सब लोग अपने अपने वर्ण और आश्रमके अनुकूल; धर्म में तत्पर हुए सदा वेदमार्गपर चलते हैं और सुख पाते हैं। उन्हें न किसी बात का भय होता है और न कोई रोग ही सताता है। रामराज्य में दैहिक, दैविक और भौतिक ताप किसी को नहीं व्यापते। सब मनुष्य परस्पर प्रेम करते हैं और वेदों में बतायी हुई नीति (मर्यादा) में तत्पर रहकर अपने-अपने धर्म का पालन करते हैं। धर्म अपने चारों चरणों (सत्य, शौच, दया और दान) से जगतमें परिपूर्ण हो रहा है; स्वप्नमें भी कहीं पाप नहीं है। पुरुष और स्त्री सभी रामभक्ति के परायण हैं और सभी परमगति (मोक्ष) के अधिकारी हैं। छोटी अवस्था में मृत्यु नहीं होती, न किसी को कोई पीड़ा होती है। सभीके शरीर सुन्दर और निरोग हैं। न कोई दरिद्र है, न कोई दु:खी है और न कोई दीन ही है। न कोई मुर्ख है न शुभ लक्षणों से हीन ही है। सभी दम्भरहित हैं, धर्मंपरायण हैं और पुण्यात्मा हैं। पुरुष और स्त्री सभी चतुर और गुणवान हैं। सभी गुणों का आदर करनेवाले और पंडित हैं तथा सभी ज्ञानी हैं। सभी कृतज्ञ (दुसरे के उपकारों को माननेवाले) हैं, कपट चतुराई (धूर्तता) किसीमें नहीं है। (काकभुशुंडीजी कहते हैं- हे पक्षिराज गरुड़जी! सुनिए!) श्रीराम के राज्यमें जड़, चेतन सारे जगतमें काल, कर्म, स्वभाव और गुणोंसे उत्पन्न हुए दुःख: किसीको भी नहीं होते (अर्थात् इनके बंधनमें कोई नहीं है)। अयोध्यामें हरी रघुनाथजी सात समुद्रों की मेखला (करधनी) वाली पृथ्वीके एकमात्र राजा हैं। जिनके एक-एक रोममें अनेकों ब्रह्माण्ड हैं, उनके लिये सात द्वीपों की यह प्रभुता कुछ अधिक नहीं है। रामराज्य की सुखासम्पत्ति का वर्णन शेषजी और सरस्वतीजी भी नहीं कर सकते। सभी नर नारी उदार हैं, सभी परोपकारी हैं और ब्राह्मण के चरणों के सेवक हैं। सभी पुरुष एकपत्निव्रती हैं। इसी प्रकार स्त्रियाँ भी मन, वचन और कर्मसे पतिका हित करनेवाली हैं। श्रीरामचन्द्रजीके राज्यमें कोई शत्रु है ही नहीं इसलिये ‘जीतो’ शब्द केवल मन को जितने के लिये ही कहा जाता है। कोई अपराध करता ही नहीं है। इसलिये किसी को दण्ड नहीं दिया जाता। दण्ड शब्द का उपयोग तो केवल संन्यासियों के हाथ में रहनेवाले दण्डों के लिये ही रह गया है। सभी अनुकुल होने के कारण भेदभाव का विषय ही नहीं है। इसलिए ‘भेद’ शब्द केवल ताल-सुरों के भेदके सन्दर्भ में ही काम में आता है। वनोंमें वृक्ष सदा फुलते और फलते हैं। हाथी और सिंह बैर भुलाकर एक साथ रहते हैं। पक्षी और पशु सभीने स्वाभाविक बैर भुलाकर आपसमें प्रेम बढा लिया है। पक्षी कुजते हैं, भांति-भांति के पशुओंके समूह वनमें निर्भय विचरते और आनंद करते हैं। शीतल, मंद, सुगन्धित पवन चलता रहता है। भौंरे पुष्पों का रस लेकर चलते हुए गुंजार करते जाते हैं। बेलें और वृक्ष माँगने से ही मधु टपका देते हैं। गौएँ मनचाहा दूध देतीं हैं। धरती सदा खेती से भरी रहती है। त्रेता में सत्ययुग की स्थिति हो जाती है। समस्त जगतके आत्मा भगवानको जगतका राजा जानकर पर्वतोंने अनेक प्रकारकी मणियोंकी खान प्रकट करे दी। सब नदियाँ श्रेष्ठ, शीतल, निर्मल और सुखप्रद स्वादिष्ट जल बहाने लगीं हैं। समुद्र अपनी मर्यादा में रहते हैं। वे लहरोंके द्वारा किनारोंपर रत्न डाल देते हैं, जिन्हें मनुष्य प्राप्त कर लेते हैं। सब तालाब कमलोंसे परिपूर्ण हैं। दसों दिशाओं के प्रदेश अत्यंत प्रसन्न हैं। चन्द्रमा अपनी अमृतमयी किरणोंसे पृथ्वी को पूर्ण कर देते हैं। सूर्य उतना ही तपते हैं जितनी आवश्यकता होती है और मेघ माँगनेसे जहाँ जितना चाहिये उतना ही जल देते हैं।
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(तुलसीदास रचित रामचरित मानस - उत्तरकाण्ड में राम राज्य का वर्णन पृष्ठ २३,२४,२५) (गीता प्रेस गोरखपुर - टीकाकार हनुमानप्रसाद पोद्दार)
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श्रीरामचन्द्रजीके राज्यपर प्रतिष्ठित होनेपर तीनों लोक हर्षित हो गये, उनके सारे शोक जाते रहे। कोई किसी से बैर नहीं करता। श्रीरामचन्द्रजीके प्रतापसे सबकी विषमता (आतंरिक भेदभाव) मिट गयी। सब लोग अपने अपने वर्ण और आश्रमके अनुकूल; धर्म में तत्पर हुए सदा वेदमार्गपर चलते हैं और सुख पाते हैं। उन्हें न किसी बात का भय होता है और न कोई रोग ही सताता है। रामराज्य में दैहिक, दैविक और भौतिक ताप किसी को नहीं व्यापते। सब मनुष्य परस्पर प्रेम करते हैं और वेदों में बतायी हुई नीति (मर्यादा) में तत्पर रहकर अपने-अपने धर्म का पालन करते हैं। धर्म अपने चारों चरणों (सत्य, शौच, दया और दान) से जगतमें परिपूर्ण हो रहा है; स्वप्नमें भी कहीं पाप नहीं है। पुरुष और स्त्री सभी रामभक्ति के परायण हैं और सभी परमगति (मोक्ष) के अधिकारी हैं। छोटी अवस्था में मृत्यु नहीं होती, न किसी को कोई पीड़ा होती है। सभीके शरीर सुन्दर और निरोग हैं। न कोई दरिद्र है, न कोई दु:खी है और न कोई दीन ही है। न कोई मुर्ख है न शुभ लक्षणों से हीन ही है। सभी दम्भरहित हैं, धर्मंपरायण हैं और पुण्यात्मा हैं। पुरुष और स्त्री सभी चतुर और गुणवान हैं। सभी गुणों का आदर करनेवाले और पंडित हैं तथा सभी ज्ञानी हैं। सभी कृतज्ञ (दुसरे के उपकारों को माननेवाले) हैं, कपट चतुराई (धूर्तता) किसीमें नहीं है। (काकभुशुंडीजी कहते हैं- हे पक्षिराज गरुड़जी! सुनिए!) श्रीराम के राज्यमें जड़, चेतन सारे जगतमें काल, कर्म, स्वभाव और गुणोंसे उत्पन्न हुए दुःख: किसीको भी नहीं होते (अर्थात् इनके बंधनमें कोई नहीं है)। अयोध्यामें हरी रघुनाथजी सात समुद्रों की मेखला (करधनी) वाली पृथ्वीके एकमात्र राजा हैं। जिनके एक-एक रोममें अनेकों ब्रह्माण्ड हैं, उनके लिये सात द्वीपों की यह प्रभुता कुछ अधिक नहीं है। रामराज्य की सुखासम्पत्ति का वर्णन शेषजी और सरस्वतीजी भी नहीं कर सकते। सभी नर नारी उदार हैं, सभी परोपकारी हैं और ब्राह्मण के चरणों के सेवक हैं। सभी पुरुष एकपत्निव्रती हैं। इसी प्रकार स्त्रियाँ भी मन, वचन और कर्मसे पतिका हित करनेवाली हैं। श्रीरामचन्द्रजीके राज्यमें कोई शत्रु है ही नहीं इसलिये ‘जीतो’ शब्द केवल मन को जितने के लिये ही कहा जाता है। कोई अपराध करता ही नहीं है। इसलिये किसी को दण्ड नहीं दिया जाता। दण्ड शब्द का उपयोग तो केवल संन्यासियों के हाथ में रहनेवाले दण्डों के लिये ही रह गया है। सभी अनुकुल होने के कारण भेदभाव का विषय ही नहीं है। इसलिए ‘भेद’ शब्द केवल ताल-सुरों के भेदके सन्दर्भ में ही काम में आता है। वनोंमें वृक्ष सदा फुलते और फलते हैं। हाथी और सिंह बैर भुलाकर एक साथ रहते हैं। पक्षी और पशु सभीने स्वाभाविक बैर भुलाकर आपसमें प्रेम बढा लिया है। पक्षी कुजते हैं, भांति-भांति के पशुओंके समूह वनमें निर्भय विचरते और आनंद करते हैं। शीतल, मंद, सुगन्धित पवन चलता रहता है। भौंरे पुष्पों का रस लेकर चलते हुए गुंजार करते जाते हैं। बेलें और वृक्ष माँगने से ही मधु टपका देते हैं। गौएँ मनचाहा दूध देतीं हैं। धरती सदा खेती से भरी रहती है। त्रेता में सत्ययुग की स्थिति हो जाती है। समस्त जगतके आत्मा भगवानको जगतका राजा जानकर पर्वतोंने अनेक प्रकारकी मणियोंकी खान प्रकट करे दी। सब नदियाँ श्रेष्ठ, शीतल, निर्मल और सुखप्रद स्वादिष्ट जल बहाने लगीं हैं। समुद्र अपनी मर्यादा में रहते हैं। वे लहरोंके द्वारा किनारोंपर रत्न डाल देते हैं, जिन्हें मनुष्य प्राप्त कर लेते हैं। सब तालाब कमलोंसे परिपूर्ण हैं। दसों दिशाओं के प्रदेश अत्यंत प्रसन्न हैं। चन्द्रमा अपनी अमृतमयी किरणोंसे पृथ्वी को पूर्ण कर देते हैं। सूर्य उतना ही तपते हैं जितनी आवश्यकता होती है और मेघ माँगनेसे जहाँ जितना चाहिये उतना ही जल देते हैं।
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==References==
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अन्य स्रोत:
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[[Category:Bhartiya Jeevan Pratiman (भारतीय जीवन (प्रतिमान)]]
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