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Created page with "पर्व ४ विद्यालय की भौतिक एवं आर्थिक व्यवस्थाएँ शिक्षा का भौतिकीक..."
पर्व ४

विद्यालय की भौतिक एवं

आर्थिक व्यवस्थाएँ

शिक्षा का भौतिकीकरण यह आज की समस्या है । भौतिक पक्ष
सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण बन जाते हैं और प्राणवान प्रक्रियाओं और तत्त्वों को भी
अपने ही जैसा जड बनाने का प्रयास करते हैं । इस तथ्य को लेकर आज सब
aed हो गये हैं । भारतीय मानस शिक्षा को जिस रूप में समझता है, जिस रूप
की अपेक्षा करता है इससे यह वर्तमान स्थिति सर्वथा विपरीत है । आवश्यकता
है शिक्षा का प्राणतत्त्व कैसे बलवान बने इसका विचार करने की । इसके लिये
हमें भौतिक व्यवस्थाओं को भी शैक्षिक दृष्टि से देखना होगा । भौतिक
व्यवस्थाओं को शैक्षिक प्रक्रियाओं से अलग कर उनका स्वतन्त्र विचार करने
से बात नहीं बनेगी । भौतिक व्यवस्थाओं का शैक्षिक दृष्टि से निरूपण करने
का प्रयास इस पर्व में किया गया है ।

शिक्षा जिसका नियमन करती है ऐसे अर्थ ने स्वयं शिक्षा को ही
कैसे जकड लिया है इसका विचार करने पर स्थिति अत्यन्त विषम है यह बात
ध्यान में आती है । अतः शिक्षा को प्रथम तो अर्थ के नियमन से मुक्त करना
होगा, बाद में वह मुक्ति का मार्ग दिखायेगी । अर्थ के चंगुल से शिक्षा को कैसे
मुक्त किया जा सकता है इसका विचार यहाँ किया गया है । इस विचार को

a

अधिक मुखर, अधिक व्यापक बनाने की आवश्यकता है इसका भी संकेत

किया गया है ।







283

LASS



LE
LLYBOEBES
LABS




............. page-230 .............



भारतीय शिक्षा के व्यावहारिक आयाम

अनुक्रमणिका
93. विद्यालय की भौतिक व्यवस्थाएँ २१५
१४. ... विद्यालय की आर्थिक व्यवस्थाएँ २३५
१५... सम्पूर्ण शिक्षा क्षेत्र का विचार २७९

र्श्ढ


............. page-231 .............

पर्व ४ : विद्यालय की भौतिक एवं आर्थिक व्यवस्थाएँ



अध्याय १३

विद्यालय की भौतिक व्यवस्थाएँ

विद्यालय की भौतिक व्यवस्थाएँ एवं वातावरण

(१) विद्यालय सरस्वती का पावन मंदिर है

विद्यालय ईंट और गारे का बना हुआ भवन नहीं
है, विद्यालय आध्यात्मिक संगठन है । विद्यालय पतित्र
मन्दिर है, जहाँ विद्या की देवी सरस्वती की निरन्तर
आराधना होती है । विद्यालय साधनास्थली है, जहाँ चरित्र
का विकास होता है । विद्यालय ज्ञान-विज्ञान, कला और
संस्कृति का गतिशील केन्द्र है, जो समाज में जीवनीशक्ति
का संचार करता है ।

(२) विद्यालय परिसर प्रकृति की गोद में हो

सरस्वती के पावन मंदिर की अवधारणा गुरुकुलों,
आश्रमों एवं प्राचीन विश्व विद्यालयों में पुष्पित एवं
पट्लवित होती थी । ये विद्याकेन्द्र नगरों से दूर वन में नदी
या जलाशय के समीप स्थापित किये जाते थे, जिससे
नगरों का कोलाहल और कुप्रभाव छात्रों को प्रभावित न
कर सके ।

आकाश, अग्नि, वायु, जल तथा मिट्टी इन
पंचमहाभूतों से बने जगत को ध्यान पूर्वक देखना तथा
उसके महत्त्व को समझना ही वास्तविक शिक्षा है । ऐसी
शिक्षा नगरों के अप्राकृतिक वातावरण में स्थित विद्यालयों
में नहीं दी जा सकती । अतः हम आदर्श विद्यालय
स्थापित करना चाहते हैं तो हमें प्रकृति माता की गोद में
खुले आकाश के नीचे, विशाल मैदान में, वृक्षों के मध्य
उसका प्रबन्ध करना चाहिये ।

सांख्यदर्शन के अनुसार, “गुरु अथवा आचार्य को
भवन या मठ आदि बनाने के चक्कर में न पड़कर प्रकृति
एवं जंगल, नदीतट या समाज का कोई स्थान चुनकर
शिक्षण कार्य करना चाहिए । इसी प्रकार योगदर्शन कहता

२१५

है कि विद्यालय गुरुगृह ही होता था । योग दर्शन के
आचार्य शान्त, एकान्त, प्राकृतिक स्थानों पर रहते थे ।
उनके आश्रम ही विद्यालय कहे जा सकते हैं ।

(३) चार दीवारी के विद्यालय कल कारखाने हैं

प्रकृति माता की गोद से वंचित और अंग्रेजी दासता
के प्रतीक चार दीवारों के भीतर स्थापित विद्यालयों को
शान्तिनिकेतन के जन्मदाता रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने कारखाना
कहा है । वे इनका सजीव चित्रण कहते हुए कहते हैं,
“हम विद्यालयों को शिक्षा देने का कल या कारखाना
समझते हैं । अध्यापक इस कारखाने के पुर्ज हैं । दस बजे
घंटा बजाकर कारखाने खुलते हैं । अध्यापकों की जबान
रूपी पुर्ज चलने लगते हैं । चार बजे कारखाने बन्द हो
जाते हैं । अध्यापक भी पुर्ज रूपी अपनी जबान बन्द कर
लेते हैं । उस समय छात्र भी इन पुर्जों की कटी-छटी दो
चार पृष्ठों की शिक्षा लेकर अपने-अपने घरों को वापस
चले जाते हैं ।'

विदेशों में विद्यालयों और महाविद्यालयों के साथ
चलने वाले छात्रावासों की नकल हमारे देश में करने
वालों के लिए वे कहते हैं कि इस प्रकार के विद्यालयों
को एक प्रकार के पागलखाने, अस्पताल या बन्दीगृह ही
समझना चाहिए ।

रवीन्ट्रनाथजी तो कहते हैं कि “शिक्षा के लिए अब
भी हमें जंगलों और वनों की आवश्यकता है । समय के
हेर फेर से स्थितियाँ चाहे कितनी ही क्यों न बदल जायें,
परन्तु इस गुरुकुल शिक्षा प्रणाली के लाभदायक सिद्ध
होने में कदापि तनिक भी अन्तर नहीं पड़ सकता । कारण
यह है कि यम नियम मनुष्य के चरित्र के अमर सत्य पर
निर्भर हैं ।'


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(४) विद्यालयीन व्यवस्था शास्त्रानुसार हो

हमारे शास्त्रों ने किसी भी व्यवस्था के प्रमुख
मार्गदर्शक सिद्धान्त बताएँ हैं । व्यवस्था निर्माण करते समय
उन सिद्धान्तों का पालन अपेक्षित है :

(अ) व्यवस्था व्यक्ति के स्वास्थ्य का पोषण करने
वाली हो ।

(आ) व्यवस्था पर्यावरण का संरक्षण करने वाली
हो।

(इ) व्यवस्था कम से कम खर्चीली हो ।

(ई) व्यवस्था संस्कारक्षम हो ।

(उ) व्यवस्था सुविधापूर्ण हो ।

आजकल विद्यालयों की स्थापना के समय यूरोप व
अमरीका के धनी देशों के कान्वेंट स्कूल हमारे सम्मुख
आदर्श होते हैं । उनके मार्गदर्शक सिद्धान्त भिन्न होते हैं,
वहाँ सुविधापूर्ण व्यवस्था पर सर्वाधिक बल रहता है ।
पैसा भले ही अधिकाधिक लगे। किन्तु व्यवस्था
आधुनिक उपकरणों से युक्त उच्च स्तर की हो । ऐसे
विद्यालयों में भवन, उपस्कर व आधुनिक उपकरणों में ७५
प्रतिशत अनावश्यक वस्तुएँ होती हैं । हम जितनी अधिक
अनावश्यक वस्तुओं को आवश्यक और अनिवार्य बनाते
जायेंगे उतनी ही अधिक हमारी शक्तियाँ व्यर्थ नष्ट होती
रहेंगी । यही कारण है कि आज हमारी अधिकांश शक्ति
विद्यालय भवन और फर्निचर की व्यवस्था में ही समाप्त हो
जाती है । व्यक्ति का स्वास्थ्य और पर्यावरण संरक्षण के
सिद्धान्त तो उनके पाठ्यक्रम से बाहर की बातें होती हैं ।

(५) विद्यालयीन व्यवस्था का केन्द्र बिन्दु बालक

हमारे यहाँ विद्यालय बालक को शिक्षित करने का
केन्द्र है, इसलिए विद्यालय का केन्द्र बिन्दु बालक है ।
उस बालक के लिए जैसी व्यवस्थाएँ होंगी, वैसा ही
उसका निर्माण होगा । अत्यधिक सुविधापूर्ण व्यवस्थाएँ
बालक को सुविधाभोगी ही बनायेंगी । अगर हम चाहते हैं
कि हमारा बालक परिश्रमी हो, तपस्वी हो, साधक हो

रश्द

भारतीय शिक्षा के व्यावहारिक आयाम

तथा उसमें तितिक्षा हो अर्थात्‌ सर्दी, गर्मी, वर्षा, भूख-
प्यास आदि को सहन करने की क्षमता हो, तो ऐसी
व्यवस्था जिसमें उसको अपने हाथ से पानी की गिलास
भी नहीं भरता हो तो वह योगी कैसे बनेगा, भोगी अवश्य
बन जायेगा । अतः आवश्यक है कि व्यवस्थाएँ विद्यार्थी
को केन्द्र में रखकर की जाय ।

(६) विद्यालय भवन निर्माण वास्तुशास्त्र के अनुसार हो

वास्तुशास्त्र कहता है कि भवन पूर्व तथा उत्तर में
नीचा तथा पश्चिम व दक्षिण में ऊँचा होना चाहिए।
मत्स्यपुराण के अनुसार दक्षिण दिशा में ऊँचा भवन मनुष्य
की सब कामनाओं को पूर्ण करता है ।
ये बातें भी ध्यान में रखने योग्य हैं :
(क) भवन निर्माण में वास्तु के साथ साथ हवा एवं सूर्य
प्रकाश की उपलब्धता का ध्यान रखा जाना
चाहिए । जिस भवन में सूर्य किरण एवं वायु प्रवेश

नहीं करतीं वह शुभ नहीं होता ।
(ख) हमारे जैसे गरम प्रदेशों में सिमेन्ट और लोहे का
अत्यधिक प्रयोग. करके. बनाये. गये. भवन

TART होते हैं ।

(ग) विद्यालय भवन में तड़कभड़क नहीं, स्वच्छता,
सुन्दरता एवं पवित्रता होनी चाहिए ।

(घ) विद्यालय में पर्याप्त खुला मैदान हो, ताकि अवकाश
के समय बालक खेलकूद सके ।

(3) कक्षा कक्षों में हवादान (वेन्टीलेटर) होने चाहिए ।
खिड़कियाँ अधिक ऊँची नहीं होनी चाहिए ।

(च) भवन रचना का मन पर संस्कार एवं प्रभाव होता
a |

(छ) हमारी सरकार केवल पक्के मकानों को ही मान्यता
देती है, कच्चे को नहीं । लोहा व सिमेन्ट से बना
मकान पक्का, इंट-गारे से बना कच्चा माना जाता
है। पक्के की औसत आयु ३५-४० वर्ष जबकि
कच्चे की औसत आयु ६५-७० वर्ष फिर भी बैंक
कच्चे को मोर्टगेज नहीं करेगा । यह व्यवस्था का


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पर्व ४ : विद्यालय की भौतिक एवं आर्थिक व्यवस्थाएँ



दोष है । स्वदेशी तकनीक की उपेक्षा और विदेशी. झुकी हो, प्रकाश बायीं ओर से पीछे
तकनीक को प्रात्सहन देने के कारण हमारे कारीगर . से आता हो । श्यामपट्ट पूर्व दिशा की दीवार में हो
बेकार होते हैं और धीरे-धीरे स्वदेशी तकनीक लुप्त. जिससे विद्यार्थी पूर्वाभिमुख बैठ सके । गुरु का स्थान

होती जाती है । ऊपर व शिष्य का स्थान नीचे होना चाहिए ।
(७) कक्षा कक्ष में बैठक व्यवस्था योग के अनुसार हो... (८१ विद्यालय में जल व्यवस्था स्वास्थ्य के
वर्तमान में कक्षा कक्ष में बिना उपस्कर नीचे बैठना अनुकूल हो
गरीबी का सूचक बना दिया गया है । इसलिए दो तीन आजकल विद्यालयों में जल व्यवस्था का आधार

वर्ष के बालकों के लिए भी टेबल-कुर्सी अथवा डेस्क... वाटर कूलर बन गये हैं । वाटर कूलर का कोल्ड अथवा
और बेंच की व्यवस्था है । भले ही वह उनके ज्ञानार्जन .... चिल्ड पानी बालकों के स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है ।
के प्रतिकूल है किन्तु विद्यालय को उच्च स्तर का बताने पानी पर हुए सभी शोध एवं हमारा अपना अनुभव
के लिए फर्नीचर आवश्यक हो गया है । यही सिद्ध करता है कि मिट्टी के घड़े का पानी सर्वाधिक

जबकि वास्तविकता यह है कि पढ़ते समय बालक... शुद्ध एवं शीतल होता हैं । इसी जल से तृप्ति होती है।
के मस्तिष्क को उर्जा की अधिक आवश्यकता रहती है ।.. कोल्ड या चिल्ड पानी से प्यास नहीं बुझती ।
टेबल-कुर्सी पर पैर लटका कर बैठने से वह ऊर्जा इसी प्रकार आजकल प्लास्टिक बोतलों में पानी
अधोगामी होकर पैरों के माध्यम से पृथ्वी में समा जाती... सर्वत्र सुलभ बना दिया गया है । हर कोई व्यक्ति यात्रा में
है । इसलिए बालक अधिक समय तक नहीं पढ़ पाते, इन बोतलों का पानी बिना विचार के पीता रहता है।
उनका सिर दुखने लगता है । ग्रहण शीलता कम हो जाती .. जबकि शोध तो यह सिद्ध करते हैं कि मिट्टी के घड़े में
है। इसके स्थान पर बैठने की व्यवस्था नीचे करने पर... रखा पानी ६ घंटों में किटाणु रहित होकर शुद्ध हो जाता
बालक सिद्धासन या सुखासन में बैठता है तो दोनों पैरों में है। तांबे के कलश में रखा पानी १२ घंटों मे किटाणु
बंध लगने से उर्जा अधोगामी न होकर उर्ध्वगामी हो जाती. रहित होता है। काँच के बर्तन में रखा पानी जैसा
है, जिससे बालक अधिक समय तक अध्ययन में लगा... है, वैसा ही रहता है परन्तु प्लास्टिक के बर्तन में रखे
रहता है। मन एकाग्र रहता है और पग्रहणशीलता बनी... पानी में १२ घंटे बाद किटाणु नष्ट होने के स्थान पर वृद्धि
रहती है। अर्थात्‌ फर्नीचर पर पैर लटकाकर बैठना. कर लेते हैं।
VARA के प्रतिकूल है और सुखासन में नीचे बैठना इसलिए जल व्यवस्था आधुनिक उपकरणों एवं
VARA के अनुकूल है । हमें चाहिए कि हम फर्नीचर के... प्लास्टिक के बर्तनों के स्थान पर मिट्टी के घड़ो में ही
स्थान पर कक्षा कक्ष में कोमल सूती व मोटे आसन की... करनी चाहिए । विद्यालयों में बहुत अच्छी प्याऊ बनानी
व्यवस्था बालकों के लिए करें । चाहिए और वाटर कूलर हटा देने चाहिए ।

बड़ी कक्षाओं में जहाँ फर्नीचर आवश्यक हो वहाँ
भी हल्का फर्नीचर हो ताकि उसे आवश्यकता पड़ने पर
समेट कर एक और रखा जा सके और कक्षा कक्ष में
अन्य गतिविधियाँ या प्रयोग करवाये जा सके । अन्यथा विद्यालय भवनों में सबसे बड़ी समस्या तापमान
भारी लोहे का फर्नीचर कक्षा में अन्य गतिविधियाँ करवाने... नियन्त्रण की रहती है । आजकल तापमान नियन्त्रित करने
में बाधक अधिक बनता है, साधक तो बिल्कुल नहीं ।.... के लिए अप्राकृतिक उपकरणों का सहारा लिया जाता है,
मेज की ऊपरी सतह सपाट न हो, तिरछी आगे की ओर... जैसे पंखें, कूलर, ए.सी. आदि ।

(९) विद्यालय में तापमान नियन्त्रण की
प्राकृतिक व्यवस्था हो

२१७


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भारतीय शिक्षा के व्यावहारिक आयाम





विज्ञान कहता है कि ठंडी हवा... विचार नहीं किया जाता । निर्माण पूर्ण होने के पश्चात्‌ उसे
नीचे रहती है और गर्म हवा हल्की होकर ऊपर उठती है ।.. ध्वनि रोधी (डीपव झीष) बनाया जाता है । ऐसा करने से
आज के कमरों में हवादान बनाये ही नहीं जाते, इसलिए... समय, शक्ति व आर्थिक व्यय अतिरिक्त लगता है ।

गर्म हवा बाहर नहीं निकल पाती । कमरों में पंखे चलते हैं, हमारे शिल्पशाख्र के ऐसे उदाहरण आज भी हैं,
वे पंखे गर्म हवा को ऊपर आने ही नहीं देते और गर्म हवा. जहाँ न तो उसे साउन्ड प्रुफ बनाने की आवश्यकता है,
को ही फेंकते रहते हैं जो स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है।.. और ना ही माइक लगाने की आवश्यकता पड़ती है।
इसलिए तापमान का नियंत्रण प्राकृतिक उपायों से ही करना. जोलकोंडा का किला ध्वनिशाख्र का अद्भुत उदाहरण है ।

चाहिए । हमारे देश में यह तकनीक थी | किले के मुख्य ट्वार का रक्षक ताली बजाता है तो किले
कुछ प्राकृतिक उपाय इस प्रकार हैं की सातवीं मंजिल में बैठे व्यक्ति को वह ताली स्पष्ट
सुनाई देती है ।

१... कमरों की दीवारें अधिक मोटाई की हों । निर्माण में हमारे यहाँ निर्मित प्राचीन रंगशालाएँ जहाँ नाटक

प्रयुक्त सामग्री लोहे-सीमेन्ट के स्थान पर चूना व मंचित होते थे, उस विशाल सभागार में ध्वनि व्यवस्था
लकड़ी आदि हो । ऐसी उत्तम रहती थी कि मंच से बोलने वाले नट की
२... कमरों में हवादान (वेन्टीलेटर) अवश्य बनायें जायें । आवाज बिना माइक के ७० फिट तक बैठे हुए दर्शकों को
हवादान आमने-सामने होने से क्रॉस वेन्टीलेशन समान रूप से एक जैसी सुनाई देती थी, चाहे वह आगे

हा । न बैठा है या पीछे ।
३... दीवारें सूर्य की रोशनी से तपती हों तो दो तीन फीट आज के विद्यालय भवनों में इसका अभाव होने के
की दूरी पर मेंहदी की दीवार बनाई जाय । कारण कक्षा-कक्षों में आचार्य को माइक का सहारा लेना

४... स्थान-स्थान पर नीम के पेड़ लगाने चाहिए, ताकि... पड़ता है अथवा चिछ्ठाना पड़ता है। कुछ भवन तो ऐसे

उनकी छाया छत को गरम न होने दे । बन जाते हैं जहाँ सदैव बच्चों का हो हा ही गूंजता
५. कमरों की छतें सीधी-सपाट होने से छत पर सूर्य. रहता है मानो वह विद्यालय न होकर मछली बाजार हो ।

किरणें सीधी और अधिक पड़ती हैं, जिससे छतें.. अतः व्यवस्था करते समय ताप नियंत्रण की भाँति ध्वनि

बहुत तपती हैं । इसलिए सपाट छतों के स्थान पर. नियंत्रण की ओर भी ध्यान देना नितान्त आवश्यक है |

पिरेंमिड आकार की छतें बनाने से वे कम गर्म होती

हैं। हमारे गाँवों में झोंपडियों का आकार यही होता... (११) विद्यालय वेश मौसम के अनुसार हो

है, इसलिए वे ठंडी रहती हैं । वेश का सीधा सम्बन्ध व्यक्ति के स्वास्थ्य से है ।

शोध कहते हैं कि सीधी सपाट छत वाले कमरे में... शरीर रक्षा हेतु वेश होना चाहिए। किन्तु आज प्रमुख
रखी खाद्य वस्तु बहुत जल्दी खराब हो जाती है, जबकि... बिन्दु हो गया है सुन्दर दिखना अर्थात्‌ फैशन । आज
पिरामिड आकार वाले कमरे में रखी खाद्य वस्तु अधिक. विद्यालयों में वेश का निर्धारण दुकानदार करता है जिसमें
समय तक खराब नहीं होती | उसका व संचालकों का आर्थिक हित जुड़ा रहता है ।

गर्म जलवायु वाले प्रदेश में छोटे-छोटे बच्चों को
बूट-मोजों से लेकर टाई से बाँधने की व्यवस्था उनके
साथ अन्याय है । इसलिए वेश सदैव सादा व शरीर रक्षा
आज के भवनों में निर्माण के समय ध्वनि शास्त्र का... करने वाला होना चाहिए, अंग्रेज बाबू बनाने वाला नहीं,

(१०) विद्यालय में ध्वनि व्यवस्था भारतीय
शिल्पशासख्रानुसार हो

BI


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पर्व ४ : विद्यालय की भौतिक एवं आर्थिक व्यवस्थाएँ

स्वदेशी भाव जगाने वाला होना चाहिए ।

(१२) विद्यालय वातावरण संस्कारक्षम हो

स्वामी विवेकानन्द कहते हैं - “समस्त ज्ञान मनुष्य
के अन्तर में स्थित है । आवश्यकता है उसके जागरण के
लिए उपयुक्त वातावरण निर्माण करने की ।' यह वातावरण
निर्माण करने के लिए आवश्यक है कि विद्यालय घर जैसा
होना चाहिए, जिसमें प्रेम, आत्मीयता एवं सद्भाव का
वातावरण हो । प्रेम, आत्मीयता और सदूभावना की तसगों
से वायुमंडल पवित्र एवं आध्यात्मिक बनता है जो ज्ञान
की साधना के लिए आवश्यक है ।

इसी प्रकार विद्यालय के वातावरण को संस्कारक्षम
बनाने के लिए स्वच्छता एवं साज-सज्ञा आवश्यक है ।
जहाँ स्वच्छता होती है, वहीं पवित्रता का निर्माण होता है ।

प्राचीन विद्यालयों को “गुरुकुल' कहा जाता था |
गुरुकुल अर्थात्‌ गुरु का घर, घर के सभी सदस्यों (शिष्यों )
का घर । इसी गृह में निवास करना इसलिए इस घर पर
अधिकार भी था तो घर के प्रति स्वाभाविक कर्तव्य भी
थे। कुल का एक विशेष अर्थ भी था । जैसे गोकुल
अर्थात्‌ १० हजार गायों वाला घर, कुलपति अर्थात्‌ १०
हजार छात्रों का आचार्य आदि । गुरुकुल की इस महत्ता
को हमें समझना चाहिए ।

विद्यालय वातावरण को संस्कारक्षम एवं पवित्र बनाने
के लिए अधोलिखित बिन्दु भी ध्यान रखने योग्य हैं :
g. विद्यालय में प्रवेश करते ही माँ सरस्वती एवं भारत

माता का मंदिर होना चाहिए । प्रतिदिन की वन्दना





२... विद्यालय प्रारम्भ होने से पूर्व, मध्यावकाश में एवं
अन्त में मधुर संगीत बजने की व्यवस्था हो । मधुर
संगीत के eal से वातावरण में पतरित्रता एवं
दिव्यता घुल जाती है |

३... विद्यालयों में दैनिक यज्ञ सम्भव हो तो बहुत अच्छा
अन्यथा उत्सव विशेष पर यज्ञ अवश्य हो । इससे
वेद मंत्रों की ध्वनि विद्यालय के वातावरण में गूंजेगी
तो सारा वायु मंडल gift wt wean a
परिपूर्ण हो जायेगा ।

४. . विद्यालय भवन की दीवारें कोरी-रोती हुई न हों,
वरन्‌ चित्रों से, सुभाषितों से, जानकारियों से भरी हुईं
अर्थात्‌ हँसती हुई होनी चाहिए ।
निष्कर्ष : विद्यालय की सम्पूर्ण व्यवस्थाएँ एवं

वातावरण में भारतीय संस्कृति एवं आध्यात्मिकता झलकनी
चाहिए । विद्यालय भवन की वास्तुकला, साज-सज्जा,
शिष्टाचार, भाषा, रीति-नीति, पर्म्पराएँ, छात्रों एवं शिक्षकों
की वेशभूषा व्यवहार आदि भारतीय संस्कृति से ओत-प्रोत
चाहिए । वातावरण में छात्र यह अनुभूति करें कि वे महान
ऋषियों की सन्तान हैं, उनकी संस्कृति एवं परम्परा महान
हैं तथा वे भारतमाता के अमृत पुत्र हैं। वर्तमान में
भारतीय जीवन पर पाश्चात्य भौतिकवादी सभ्यता का प्रभाव
बढ़ रहा है। ऐसे में विद्यालय की व्यवस्थाओं और
वातावरण से भारतीय संस्कृति के सहज संस्कार छात्रों को
मिलना परम आवश्यक है ।

विद्यालय का भवन

9. विद्यालय का भवन बनाते समय सुविधा की दृष्टि
से किन किन बातों का ध्यान रकना चाहिये ?

2. विद्यालय के भवन में विद्यालय की शैक्षिक दृष्टि
किस प्रकार से प्रतिबिम्बित होती है ?

3. विद्यालय का भवन एवं पर्यावरण
विद्यालय का भवन एवं शरीरस्वास्थ्य इन सब

बातों का क्या सम्बन्ध हैं ?

५... विद्यालय का भवन एवं मनोस्वास्थ्य
६... विद्यालय का भवन एवं संस्कृति
9. विद्यालय का भवन कम खर्च में एवं अधिक

टिकाऊ बने इस दृष्टि से कौन कौन सी बातों का
ध्यान रखना चाहिये ?


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भारतीय शिक्षा के व्यावहारिक आयाम





८... विद्यालय के भवन F आचार्य का संबंध नित्य विद्यालय भवन से होता है
बास्तुविज्ञान, भूमिचयन, स्थानचयन आदि का. उसमें सुविधा असुविधा कौनसी है इससे वे परिचित होते
क्या महत्त्व है ? हैं। परंतु पढाना शिक्षक का काम और भवन बनाना

Q. विद्यालय के भवन की आन्तरिक रचना कैसी. संस्थाचालकों का काम यह निश्चित है अतः दोनों एक दूसरे
होनी चाहिये ? के काम में दखल नही देते । भवन संबंधी योग्य बातें

१०, भवन निर्माण में प्रयुक्त सामग्री के विषय में किन... संस्थाचालको से करना मेरा कर्तव्य है, ऐसा शिक्षक मानता
बातों का ध्यान रखना चाहिये ? नहीं और संस्थाचालक भी अधिकारी के रूप में शिक्षकों से
भवनसंदर्भ में कुछ सुझाव अपेक्षित नहीं करते । अतः भवन

प्रश्नावली से पाप्त उत्तर तो निर्माण होते हैं परंतु उसके पीछे विचारैक्य नहीं होता ।

इस प्रश्नावली मे कुल १० प्रश्न थे । राजस्थान एवं... दोनों मिलकर अच्छा भवन निर्माण होना आवश्यक है ।
गुजरात के आचार्यों ने इनके उत्तर लिखे थे । .
१, सुविधा की दृष्टि से भवन दो मांजिल से अधिक बड़ा विद्यालय भवन : शिक्षा संकल्पना का मूर्त रूप

नहीं होना चाहिये । कक्षा में बाजू की कक्षा का कोलाहल न आजकल हम भौतिक दृष्टि से जगत को और जीवन
सुनाई दे इस प्रकार की रचना हो । पेयजल की व्यवस्था भवन. को देखने लगे हैं इसलिए घटनाओं, व्यक्तियों और वस्तुओं
के अंतर्गत तथा शैचालय आदि भवन के दूर हो । का मूल्यांकन भौतिक दृष्टि से करते हैं । शिक्षा अत्यन्त

२. विषयानुसार कक्ष रचना से लेकर सूचना फलक अभौतिक प्रक्रिया है तो भी उसका मूल्यांकन भौतिक दृष्टि से
पर लिखी हुई लिखावट इत्यादि सब बातें विद्यालय की. करने का प्रचलन बढ़ गया है ।
शैक्षिक दृष्टि प्रकट करती है । हम यहाँ भौतिक और अभौतिक दोनों दृष्टि से विद्यालय
३. विद्यालय बनाते समय नीम, पीपल, बरगद जैसे भवन की चर्चा करेंगे ।
वृक्ष भी पर्याप्त मात्रा में उचित स्थानो पर लगाने का
प्रावधान हो । इससे पर्यावरण की सुरक्षा होगी, छाँव
मिलेगी, पेड के नीचे अध्ययन, अध्यापन भी हो सकेगा । सबसे प्रथम बात विद्यालय के भवन एवं प्रयुक्त सामग्री
खुली हवा प्रकाश का शरीर स्वास्थ्य पर असर होगा । .... के विषय में ही करनी चाहिए । आजकल सामान्य रूप से हम
शरीरस्वास्थ्य अच्छा हो तो मन भी एकाग्र शांत होगा ।... सिमेन्ट और लोहे का प्रयोग करते हैं । सनमाइका,
विद्यालय में गौशाला रहेगी तो गोसेवा का अनुभव छात्रों. एल्‍्यूमिनियम, फेविकोल, प्लास्टर ऑफ पेरिस आदि का

विद्यालय भवन का भौतिक पक्ष

को प्राप्त होगा । प्रयोग धीरे धीरे बहुत बढ़ने लगा है । कभी तो इसमें सुन्दरता
विद्यालय के भवन मे कवेलू बाँस की जाली, पत्थर... लगती है, कभी वह सस्ता लगता है तो कभी मजबूत लगता
की दीवारे कम खर्चे मे टिकाऊ बनेगी । है । इन तीनों पक्षों के संबंध में सही पद्धति से विचार करें तो

तीनों हमें अनुचित ही लगेंगी । सिमेन्ट इँटों को जोड़ने वाला

अभिमत पदार्थ है परन्तु वह अविघटनीय है । उसका स्वभाव प्लासिक
विद्यालय का भवन छात्रों के लिए ज्ञानसाधना स्थली. जैसा ही होता है । तीस या पैंतीस वर्षों में उसका जोड़ने

है । अतः वास्तुविज्ञान का ध्यान अवश्य रहे । भूमि एवं... वाला गुण नष्ट होने लगता है और वह बिखर जाता है ।
स्थानचयन के बाबत वह निसर्ग के सान्निध्य मे रहे तो... बिखरने पर उसका पूनरूपयोग नहीं हो सकता है। वह
अच्छा । सिन्थेटिक रंग, प्लास्टिक फायबर आदि चीजों का... पर्यावरण का भी नाश करता है क्योंकि उसके कचरे का
उपयोग न हो इसका ध्यान रखें । निकाल नहीं हो सकता । उसी प्रकार से सनमाइका,

२२०


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पर्व ४ : विद्यालय की भौतिक एवं आर्थिक व्यवस्थाएँ

फेविकोल आदि सामाग्री भी पर्यावरण का नाश करने वाली
ही है । पर्यावरण के नाश के साथ साथ वे मनुष्यों के स्वास्थ्य
के लिए भी हानिकारक हैं । रोज रोज उसमें ही रहते रहते हम
उस अस्वास्थ्यकर वातावरण के आदि हो जाते हैं परन्तु कुल
मिलाकर आज जो शरीर और मन की दुर्बलता अनुभव में
आती है उसका कारण यह भी है ।

इन पदार्थों के कारण तापमान बढ़ता है। वह
अप्राकृतिक रूप में बढ़ता है । प्राकृतिक गर्मी शरीर को इस
प्रकार का नुकसान नहीं करती, यह कृत्रिम गर्मी नुकसान
करती है । बढ़े हुए तापमान से बचने हेतु हम पंखे चलाते हैं,
कहीं वातानुकूलन का प्रयोग करते हैं । इससे फिर तापमान
बढ़ता है । वातानुकूलन में बिजली का उपयोग अधिक होता
है,जिससे खर्च तो बढ़ता ही जाता है । इस प्रकार आर्थिक
विषचक्र चलता रहता है और हम उसकी चपेट में आ जाते
हैं । स्वास्थ्य का नाश तो होता ही है ।

हम कहते हैं की इसमें बहुत सुविधा है और यह
दिखाता भी सुंदर है । परन्तु सुविधा और सुन्दरता बहुत
आभासी है । वास्तविक सुविधा और सुंदरता विनाशक नहीं
होती । यदि वह विनाशक है तो सुंदर नहीं है, और सुविधा
तो वह हो ही कैसे सकती है ?

तो फिर भवनों में कौनसी सामग्री प्रयुक्त होनी चाहिए ?
पहला नियम यह है की जिंदा लोगों को रहने के लिए, सुख
से रहने के लिए प्राकृतिक सामग्री का प्रयोग होना चाहिए ।
मिट्टी, चूना, लकड़ी, पत्थर आदि सामग्री प्राकृतिक है । यह
सामग्री पर्यावरण और स्वास्थ्य के अविरोधी होती है । आज
अनेक लोगों की धारणा हो गई है की ऐसा घर कच्चा होता है
परन्तु यह धारणा सही नहीं है । वैज्ञानिक परीक्षण करें या
पारम्परिक नमूने देखें तो इस सामग्री से बने भवन अधिक पक्के
होते हैं । इस सामग्री का उपयोग कर विविध प्रकार के भवन
बनाने का स्थापत्यशास्त्र भारत में बहुत प्रगत है । स्थपतियोंने
विस्मयकारक भवन निर्माण किए हैं । आज भी यह कारीगरी
जीवित है परन्तु वर्तमान शिक्षा के परिणामस्वरूप हमारी
पद्धतियाँ और नीतियाँ विपरीत ही बनी हैं इसलिए शिक्षित
लोगों को इसकी जानकारी नहीं है, अज्ञान, विपरीतज्ञान और
हीनताबोध के कारण हमें उसके प्रति आस्था नहीं है, हमारी

BWW







सौंदर्यदृष्टि भी बदल गई है इसलिए हम
बहुत अविचारी ढंग से अप्राकृतिक सामग्री से अप्राकृतिक
TH वाले भवन बनाते हैं और संकटों को अपने ऊपर आने
देते हैं । संकटों को निमंत्रण देने की यह आधुनिक पद्धति है ।

यह सामग्री ठंड के दिनों में अधिक ठंड और गर्मी के
दिनों में अधिक गर्मी का अनुभव करवाती है । दीवारों में हवा
की आवनजावन नहीं होती है इसलिए भी कक्षों का तापमान
और वातावरण स्वास्थ्यकर नहीं रहता ।

भवन के कक्षाकक्षों में हवा की आवनजावन की
स्थिति अनेक प्रकार से विचित्र रहती है । भौतिक विज्ञान का
नियम कहता है कि ठंडी हवा नीचे रहती है और गरम हवा
ऊपर की ओर जाती है । इस दृष्टि से पुराने स्थापत्य में कमरे
में आमनेसामने खिड़कियाँ होती थीं तथा दीवार में ऊपर की
ओर गरम हवा जाने की व्यवस्था होती थी । अब ऐसी
व्यवस्था नहीं होती । छत से लटकने वाले पंखे हवा नीचे
की ओर फेंकते हैं और गरम हवा ऊपर की ओर जाती है ।
हवा की स्थिति कैसी होगी ? इन सादी परन्तु अत्यन्त
महत्त्वपूर्ण बातों की ओर हमारा ध्यान नहीं रहता है ।

भवन की रचना में वास्तुशाख्र के नियमों का ध्यान
रखना चाहिए ऐसा अब सब कहने लगे हैं तो भी अधिकांश
भवन इसकी ओर ध्यान दिये बिना ही बनाए जाते हैं । ऐसा
a sik गैरजिम्मेदारी के कारण ही होता है ।

भवन का भावात्मक पक्ष

विद्यालय का भवन भावात्मक दृष्टि से शिक्षा के
अनुकूल होना चाहिए । इसका अर्थ है वह प्रथम तो पवित्र
होना चाहिए । पवित्रता स्वच्छता की तो अपेक्षा रखती ही है
साथ ही सात्तिकता की भी अपेक्षा रखती है। आज
सात्त्विकता नामक संज्ञा भी अनेक लोगों को परिचित नहीं है
यह बात सही है परन्तु वह मायने तो बहुत रखती है । भवन
बनाने वालों का और बनवाने वालों का भाव अच्छा होना
महत्त्वपूर्ण है । इसके लिए पैसा खर्च करने वाले, भवन बनते
समय ध्यान रखने वाले, प्रत्यक्ष भवन बनाने वाले और
सामग्री जहाँ से आती है वे लोग विद्यालय के प्रति यदि
अच्छी भावना रखते हैं तो विद्यालय भवन के वातावरण में


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भारतीय शिक्षा के व्यावहारिक आयाम



पवित्रता आती है । पवित्रता हम चाहते भवन की बनावट पक्की होनी चाहिए । व्यवस्थित और
तो हैं । इसलिए तो हम भूमिपूजन, शिलान्यास, वास्तुशांति, ... सुन्दर होनी चाहिए । पानी, प्रकाश, हवा आदि की अच्छी
यज्ञ, भवनप्रवेश जैसे विधिविधानों का अनुसरण करते हैं । ये. सुविधा उसमें होनी चाहिए । हम इन बिंदुओं की चर्चा
केवल कर्मकाण्ड नहीं हैं । इनका भी अर्थ समझकर पूर्ण... स्वतन्त्र रूप से करने वाले हैं इसलिए यहाँ केवल उल्लेख ही
मनोयोग से किया तो बहुत लाभ होता है । परन्तु समझने का... किया है । कभी कभी भवन की बनावट ऐसी होती है कि
अर्थ क्रियात्मक भी होता है । उदाहरण के लिए ग्रामदेवता, .. उसकी स्वच्छता रखना कठिन हो जाता है । यह भी बनावट
वास्तुदेवता आदि की प्रार्थथा और उन्हें सन्तुष्ट करने की बात... का ही दोष होता है ।
मंत्रों में कही जाती है । तब सन्तुष्ट करने का क्रियात्मक अर्थ विद्यालय का भवन वैभव और विलास के दर्शन कराने
वह होता है कि हम सामग्री का या वास्तु का दुरुपयोग नहीं... वाला नहीं होना चाहिए। विद्यालय न महालय है न
करेंगे, उसका उचित सम्मान करेंगे, उसका रक्षण करेंगे... कार्यालय । वह न कारखाना है न चिकित्सालय । इन सभी
आदि । यह तो हमेशा के व्यवहार की बातें हैं । भारत की... स्थानों की रचना भिन्न भिन्न होती है और वह बाहर और
पवित्रता की संकल्पना भी क्रियात्मक ही होती है । अंदर भी दिखाई देती है । विद्यालय के भवन में सुंदरता तो
पवित्रता के साथ साथ भवन में शान्ति होनी चाहिए ।.... होती है परन्तु सादगी अनिवार्य रूप से होती है । सादगीपूर्ण
उसकी ध्वनिव्यवस्था ठीक होना यह पहली बात है । कभी... और सात्तविक रचना भी कैसे सुन्दर होती है इसका यह नमूना
कभी कक्ष की रचना ऐसी बनती है कि पचीस लोगों में कही... होना चाहिए । सादा होते हुए भी वह हल्की सामग्री का बना
हुई बात भी सुनाई नहीं देती, तो अच्छी रचना में सौ लोगों. सस्ता नहीं होना चाहिए । उत्कृष्टता तो सर्वत्र होनी ही
को सुनने के लिए भी ध्वनिवर्धक यन्त्र की आवश्यकता नहीं... चाहिए ।
पड़ती । ऐसी उत्तम ध्वनिव्यवस्था होना अपेक्षित है । यह विद्यालय भवन का वातावरण और बनावट सरस्वती
शान्ति का प्रथम चरण है । साथ ही आसपास के कोलाहल के मन्दिर का ही होना चाहिए । इस भाव को व्यक्त करते हुए
के प्रभाव से मुक्त रह सकें ऐसी रचना होनी चाहिए। भवन में मन्दिर भी होना चाहिए ।
कोलाहल के कारण अध्ययन के समय एकाग्रता नहीं हो भारतीय शिक्षा की संकल्पना का मूर्त रूप विद्यालय है
सकती । कभी कभी पूरे भवन की रचना कुछ ऐसी बनती है... और उसका एक अंग भवन है । विद्यालय में विविध विषयों
कि लोग एकदूसरे से क्या बात कर रहे हैं यह समझ में नहीं... के माध्यम से जो सिद्धांत, व्यवहार, परंपरा आदि की बातें
आता या तो धीमी आवाज भी बहुत बड़ी लगती है । यह... होती हैं वे सब विद्यालय के भवन में दिखाई देनी चाहिए ।

भवन की रचना का ही दोष होता है । भवन स्वयं शिक्षा का माध्यम बनाना चाहिए ।
विद्यालय का कक्षाकक्ष

9. विद्यालय का कक्षाकक्ष कैसा होना चाहिये ? ७. कक्षाकक्ष की खिडकियाँ, दरवाजे, श्यामपट्ट,
2. कितना बड़ा होना चाहिये ? अलमारी आदि के विषय में किस प्रकार से
3. उसका आकार कैसा होना चाहिये ? 'विचार होना चाहिये ?
४. कितने प्रकार के कक्षाकक्ष हो सकते हैं ? ८. कक्षाकक्ष की बैठक व्यवस्था कैसी होनी
५. कक्षाकक्ष में किस प्रकार की सुविधायें होनी चाहिये ?

चाहिये ? ९. हवा, प्रकाश, ध्वनि, तापमान, दिशायें आदि
६. कक्षाकक्ष का फर्नीचर कैसा होना चाहिये ? व्यवस्थायें कैसी होनी चाहिये ?

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पर्व ४ : विद्यालय की भौतिक एवं आर्थिक व्यवस्थाएँ

१०, कक्षाकक्ष का वातावरण शैक्षिक एवं संस्कार क्षम
कैसे बन सकता है ?

११. स्वच्छता, पर्यावरण एवं स्वास्थ्य की दृष्टि से
कक्षाकक्ष कैसा होना चाहिये ?

१२. साजसजा, सुविधा एवं आर्थिक दृष्टि से
कक्षाकक्ष के सम्बन्ध में हम क्‍या विचार कर
सकेत है ?

प्रश्नावली से पाप्त उत्तर

विद्यालय के कक्षा-कक्ष के सम्बन्ध में अपना Hates
इस प्रश्नावली में प्रकट हुआ है। १२ प्रश्नों की इस
प्रश्नावली के उत्तर नागपुर के १३ शिक्षकों, २ प्रधानाचार्यों
व एक संस्था चालक अर्थात्‌ कुल १७ लोगों ने दिये हैं ।
इस कार्य में सौ. वैशालीताई नायगावकरने सहयोग दिया |

प्रश्न १, २, ३ व ५ - ५० से ६० विद्यार्थी आराम
से बैठ सके इतना बड़ा कक्ष होना आवश्यक है । कक्षा
कक्ष चौरस, आयातकार या अर्धवर्तुलाकार हो सकते हैं ।
कमरों में भरपूर प्रकाश एवं वायु आती हो, तथा पास के
कक्षों की आवाज इस कक्ष में चल रहे कार्य में बाधक न
हो, इस प्रकार की कक्षा की रचना विद्यालय में करनी
चाहिए |

प्रश्न ४ - विद्यालय में विषय अनुसार कक्ष रचना
अत्यन्त लाभकारी रहती है । गणित कक्ष, भाषा कक्ष,
उद्योग कक्ष, भूगोल कक्ष, विज्ञान कक्ष होने से अध्ययन
और वातावरण अच्छा रहता है, ऐसा सबका कहना था ।

प्रश्न ६ - उपस्कर (फर्निचर) के सम्बन्ध में,
प्राथमिक कक्षाओं में नीचे बैठना और माध्यमिक कक्षाओं
के लिए डेस्क व बेंच होनी चाहिए, सबका मत यही था ।

प्रश्न ७ - कमरों के दरवाजे लोहे के हों, खिडकियाँ
जमीन से साढ़े तीन फीट की ऊँचाई पर हो ऐसा मत कुछ
लोगों का था । बाहर खड़े निरीक्षक को पता चल सके
उतनी ऊँचाई पर खिड़कियाँ हों, यह मत भी कुछ लोगों का
था । कक्षा में फलक काँच के अथवा व्हाइट बोर्ड के होने
चाहिए । शैक्षिक सामग्री व अन्य वस्तुएँ रखने के लिए
अलमारी होनी चाहिए ।

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प्रश्न १० - कक्षा का वातावरण
शैक्षिक एवं संस्कारक्षम बने इसलिए कक्षाओं की दीवारों
पर चार्टस, नक्शा, अच्छे चित्र आदि लगे हों ऐसा सबका
मत था । प्रश्नावली के अन्तिम दोनों प्रश्नों के उत्तर नहीं
मिले ।

अभिमत - लगभग सभी उत्तर देने वाले नित्य कक्षा
कक्षों में पढ़ाने वाले ही थे । फिर भी प्रश्नों के उत्तर केवल
शब्दार्थ को ध्यान में रखकर ही दिये गये हैं । कक्षा कक्ष
यह स्थान केवल भौतिक वस्तुओं का संच है, परन्तु
विद्यार्थी और शिक्षक यह जीवमान ईकाई है तथा इनके
बीच चलने वाली अध्ययन अध्यापन प्रक्रिया भी जीवन्त
ही होती है। अतः इस जीवन्तता को बनाये रखना
चाहिए । भौतिक व्यवस्थाओं को हावी नहीं होने देना
चाहिए |

भवन निर्माण के समय शिक्षकों की कोई भूमिका नहीं
रहती, वे तो मात्र इतना चाहते हैं कि सभी व्यवस्थाओं से
युक्त बना बनाया कक्ष उन्हें मिल जाय । संस्थाचालक ही
सभी निर्णय करते हैं । कक्षा का उपस्कर (फर्निचर) भी
संस्था चालकों की आर्थिक स्थिति व उनकी पसन्द का ही
होता है । बड़े छात्रों के लिए डेस्क व बेंच अथवा टेबल व
कुर्सी और छोटे छात्रों के लिए नीचे जमीन पर बैठने की
व्यवस्था में शैक्षिक चिन्तन का अभाव ही दिखाई देता है ।
कम आयु या छोटी कक्षाओं के लिए अलग व्यवस्था तथा
बड़ी आयु या बड़ी कक्षाओं के छात्रों के लिए अलग
व्यवस्था करने के पीछे कोई तार्किक दृष्टि नहीं है।
माध्यमिक कक्षाओं के छात्र भी भारतीय बैठक व्यवस्था में
अच्छा ज्ञानार्जन कर सकते हैं इसका आज्ञान है ।

पर्यावरण सुरक्षा हेतु प्लास्टिक का उपयोग वर्जित करने
की बात किसी को भी ध्यान में नहीं आई । स्वच्छता हेतु
प्रत्येक कक्षा के लिए स्वतन्त्र पायदान, कचरा पात्र तथा
स्वच्छता सम्बन्धी आदतें यथा-चप्पल-जूते कक्षा के बाहर
व्यवस्थित रखने की व्यवस्था आदि छोटी छोटी बातों को
अब लोग भूलने लगे हैं । और संस्थाएँ विद्यालय की
स्वच्छता बड़ी बड़ी सफाई कम्पनियों को ठेके पर दे रही हैं ।
ठेके पर देने के कारण छात्रों में स्वच्छता व पवित्रता के


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संस्कार नहीं बन पाते । पहले छात्रों को
यह संस्कार दिया जाता था कि यह मेरी कक्षा है, मेरी कक्षा
मुझे ज्ञानवान बनाने वाला पवित्र स्थान है, इसे स्वच्छ एवं
पवित्र बनाये रखना यह मेरा दायित्व है । स्वच्छता का
दायित्व बोध जाग्रत करना ही सच्ची शिक्षा है ।

विमर्श

विद्यालयों और महाविद्यालयों का अध्ययन वर्षों में
विभाजित की जाने वाली यान्त्रिक प्रक्रिया बन गई है।
विद्यार्थी बारह वर्ष तक विद्यालय में पढ़ता है तो वह पहली
से बारहवीं कक्षा तक पढता है । महाविद्यालय में पढता है
तो वह प्रथम से तृतीय कक्षा तक पढ़ता है । परास्नातक में
पढता है तो वह प्रथम और द्वितीय कक्षा में पढ़ता है । एक
एक वर्ष को एक एक कक्षा कहा जाता है । एक वर्ष तक
विद्यार्थी उसी कक्षा में पढ़ता है । पढने के लिये इसे एक
स्थान चाहिये, एक कमरा चाहिये । कमरा ही कक्ष है । उस
कक्ष को कक्षाकक्ष कहते हैं। यह अंग्रेजी के शब्द
क्लासरूप का हिन्दी अनुवाद है । भारत की लगभग सभी
भाषाओं में क्लासरूम का ही अनुवाद चलता है ।

कक्षाकक्ष के लिये शासन द्वारा नाप निश्चित कर के
दिया जाता है । एक कक्षा में विद्यार्थियों की संख्या भी
निश्चित की जाती है और उसके अनुपात में कक्षाकक्ष की
लम्बाई चौडाई या क्षेत्रफल निश्चित किया जाता है । यह
नियम महाविद्यालयों के लिये भी है । इसी प्रकार से
प्रयोगशाला आदि का भी आकार प्रकार निश्चित किया
जाता है ।

इन कक्षा कक्षों की रचना और व्यवस्था के विषय में
कैसे विचार करना चाहिये इसकी बात करेंगे ।

१. कक्षाकक्ष कक्षा के विद्यार्थियों की संख्या के
अनुपात में होना चाहिये । खाली बैठे हों तब भी भीड़ लगें
ऐसे तो नहीं होने चाहिये ।

कुछ और क्रियाकलाप न करते हों और केवल
अध्यापक द्वारा बोला जा रहा सुनते हों तब भी, भूमि पर,
कुर्सी पर या बेन्च पर बैठे हों तब भी, सीधी पंक्तियों में या
बिना पंक्तियों के बैठे हों तब भी एक दूसरे का स्पर्श न हो

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भारतीय शिक्षा के व्यावहारिक आयाम

इतनी दूरी बनाकर तो बैठना ही चाहिये । बिना स्पर्श किये
कुछ हलचल कर सर्के इतना अन्तर भी अपेक्षित है । बीच में
से उठकर जाना हो तब भी बिना स्पर्श किये जा सकें इतनी
दूरी चाहिये । कक्ष में बैठे विद्यार्थियों से उचित अन्तर रखकर
शिक्षक बैठ सके इतना स्थान होना चाहिये । उचित अन्तर
किसे कहते हैं ? विद्यार्थियों के सामने, मध्य में, कुछ ऊँचाई
पर बैठकर शिक्षक एक दृष्टिक्षेप में कक्षा के सभी विद्यार्थियों
को देख सके इतने अन्तर को समुचित अन्तर कहते हैं ।

कक्षा में विद्यार्थियों को केवल एक स्थान पर बैठना
ही नहीं होता है। घूमना चलना भी होता है । लिखना
पढना होता है, सामग्री लेकर काम करना होता है, एक दूसरे
के साथ वार्तालाप करना होता है, गटों में बैठकर चर्चा
करनी होती है । तब विभिन्न रचनाओं में बैठ सकें, सामने
डेस्क रखकर बैठ सकें, बगल में बस्ता या अन्य सामग्री रख
सकें इतना स्थान होना चाहिये । कक्षा में कक्षा पुस्तकालय
की पुस्तकें, कक्षा के लिये दैनन्दिन उपयोग की सामग्री,
विद्यार्थियों के भोजन के डिब्बे आदि रखने का स्थान होना
चाहिये । उसी प्रकार कक्ष के बाहर पादत्राण रखने की
व्यवस्था, पानी की व्यवस्था, कचरे का डिब्बा भी होना
चाहिये । कचरे का डिब्बा, झाड़ू, फर्निचर पॉंछने का कपडा
आदि रखने के लिये स्थान और व्यवस्था चाहिये ।

खिड़कियों की ऊँचाई

कक्षाकक्ष में बैठने की व्यवस्था कैसी है उसके आधार
पर अन्य बातों की भी व्यवस्था की जायेंगी । अधिकांश
कक्षाकक्षों में बैठने की व्यवस्था टेबल कुर्सी और बेन्च डेस्क
पर की जाती है । इस हिसाब से खिडकियों की ऊंचाई ढाई
या तीन फीट की रखी जाती है । नीचे भूमि पर बैठकर
अध्ययन, भोजन आदि करना है तो खिड़कियों की भूतल से
ऊंचाई १० से १२ इंच होनी चाहिये । नियम यह है कि कक्ष
में बैठे हुए लोगों को खिड़की से बाहर का दृश्य दिख सके ।
कई बार तो बाहर का दिखाई न दे इसी उद्देश्य से खिड़कियाँ
और भी ऊँचाई पर बनाई जाती हैं । बाहर की दखल न हो
और विद्यार्थी भी बाहर न झाँक सर्के ऐसा दुहरा उद्देश्य होता
है परन्तु यह उचित नहीं है, शास्त्रीय नहीं है ।


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पर्व ४ : विद्यालय की भौतिक एवं आर्थिक व्यवस्थाएँ

बैठने की दिशा

कक्षाकक्ष में सब विद्यार्थी पूर्व की ओर मुँह करके
बैठ सकें ऐसी रचना बनानी चाहिये । शिक्षक विद्यार्थियों से
कुछ ऊँचाई पर बैठ सके ऐसा मंच बनाना चाहिये । बैठने
वालों की ऊँचाई के अनुपात में दीवार पर श्याम फलक
होना चाहिये । नकशा, आलेख, चित्र आदि टाँगने की
व्यवस्था चाहिये । पृथ्वी का गोला या अन्य सामग्री
दिखानी हो तो उसे रखने के लिये उचित स्थान होना
चाहिये । घर में हम जिस प्रकार बैठक कक्ष, भोजन कक्ष,
रसोई आदि में आवश्यकता और सुविधा के अनुसार रचना
और व्यवस्था करते हैं उसी प्रकार विद्यालय के कक्षा कक्षों
में तथा अन्य कक्षों में भी करनी चाहिये । छात्र आदि अपने
बस्ते विद्यालय में ही रखकर जाने वाले हैं तो उन्हें रखने
की भी व्यवस्था चाहिये ।

हवा, प्रकाश, ध्वनि व तापमान

कक्षाकक्ष में हवा की आवनजावन, तापमान
नियन्त्रण, प्रकाश आदि की समुचित व्यवस्था होना
अपेक्षित है। कक्षाकक्ष की दीवारों और छतों की चूने से
पुताई होना ही अपेक्षित है, सिन्‍्थेटिक रंगों से रंगाई नहीं ।
दीवारों पर ध्येय वाक्य, चित्र, उपयोगी जानकारी के
आलेख लगाने की व्यवस्था चाहिये ।

सबसे महत्त्वपूर्ण है ध्वनिव्यवस्था । कक्षा में एक ने
बोला सबको सुनाई दे ऐसा तो होना ही चाहिये परन्तु
आसपास के कक्षों में उससे व्यवधान न हो यह भी देखना
चाहिये । फिर भी कम कमाने वाले का घर छोटा होता है
और उस छोटे घर में भी कुशल, बुद्धिमान और गृहप्रेमी
लोग आवश्यक व्यवस्थायें बना लेते हैं और आनन्द से सारे
व्यवहार करते हैं उसी प्रकार विद्यालय यदि सम्पन्न नहीं है
तब भी बुद्धिमान शिक्षक जितने भी संसाधन प्राप्त होते हैं
उतने में अच्छी से अच्छी व्यवस्था बना लेते हैं ।

कठिनाई केवल एक है, और वह बड़ी है । घर में घर
के मालिक, कमाई करनेवाले और घर में रहनेवाले लोग
अलग अलग नहीं होते, एक ही होते हैं, घरवाले होते हैं ।
विद्यालय में पैसा खर्च करनेवाले, नौकरी में रखनेवाले और

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पढाने वाले एक ही नहीं होते, पराये
होते हैं । मालिकी भाव से विद्यालय संचालकों का होता है,
नौकरी भाव से शिक्षकों का होता है । इसलिये बुद्धिमानी,
कुशलता और आत्मीयता का आलम्बन ही नष्ट हो जाता
है। सत्य तो यह है कि इस एक व्यवस्था ने अनेक उत्तम
स्चनाओं को तहसनहस कर दिया है ।

क्‍या महाविद्यालय में विद्यार्थी भूमि पर बैठ सकते
हैं ? सामने डेस्क रखकर बैठ सकते हैं ? क्या महाविद्यालय
में विद्यार्थी जूते उतारकर बैठ सकते हैं ? हमें लगता है कि
नहीं, इतने बडे विद्यार्थी नीचे कैसे बैठेंगे ? लाख रुपये
कमाने वाले अध्यापक आसन पर बैठ कर व्याख्यान कैसे दे
सकते हैं ?

परन्तु हमारे तर्क का दोष हम नहीं देख सकते हैं
क्‍या ? नीचे या ऊपर बैठने का आयु या दर्ज के साथ क्या
सम्बन्ध है ? सम्बन्ध तो भारतीय और अभारतीय होने का
है ? क्‍या महाविद्यालय के विद्यार्थी और प्राध्यापक
अभारतीय हैं ? या सबके सब घुटने के दर्द से परेशान हैं ?
या कभी ऐसा विचार ही नहीं किया हैं ?

कक्षाकक्ष की ये तो तान्त्रिक बातें हुईं । कक्षाकक्ष
का शैक्षिक अर्थ कया है ?

जहाँ शिक्षक और विद्यार्थी बैठकर अध्यापन और
अध्ययन करते हों वह कक्षाकक्ष है । यह अध्यापक का घर
हो सकता है, मन्दिर का बरामदा हो सकता है या वृक्ष की
छाया भी हो सकती है । अध्ययन अध्यापन के तरीके के
अनुसार कक्षाकक्ष का स्थान बदल सकता है । कहानी
सुनना है, इतिहास पढ़ना है, मिट्टी से काम करना है तो वृक्ष
के नीचे, बरामदे में या मैदान में कक्षा लग सकती है।
गुरुदेव रवीन्द्रनाथ ठाकुर के कक्षाकक्ष वृक्षों के नीचे ही होते
थे । प्राचीन ऋषिमुनि वृक्षों के नीचे बैठकर ही पढ़ाते थे ।

विषयानुसार कक्ष रचना

यह तथ्य इस बात की ओर संकेत करता है कि
अध्ययन काल का विभाजन वर्ष और कक्षाओं के अनुसार
नहीं अपितु विषयों और गतिविधियों के अनुसार होना
चाहिये और कक्षों की रचना विषयों की आवश्यकताओं का


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भारतीय शिक्षा के व्यावहारिक आयाम



ध्यान रखकर होनी चाहिये । मानवीय अर्थात्‌ जीवमानता के अनुकूल रचनायें करनी
अर्थात्‌ विद्यालय में कक्षाकक्ष नहीं अपितु विषय. चाहिये ।
कक्ष होने चाहिये । समय सारिणी विषयों के अनुसार होनी अध्ययन अध्यापन जिन्दा व्यक्तियों के द्वारा किया
चाहिये । विद्यार्थियों का विभाजन भी विषयों के अनुसार... जाने वाला जीवमान कार्य है । इसी प्रकार से सारी रचनायें
होना चाहिये । होना अपेक्षित है ।
विषयकक्ष की अधिक चर्चा स्वतन्त्र रूप से करेंगे भारतीय शिक्षा की पुर्नरचना में यह भी एक महत्त्वपूर्ण

परन्तु यहाँ इतना कहना आवश्यक है कि सर्व प्रकार की... आयाम है ।
रचनाओं के लिये यान्त्रिकि आग्रह छोड देना चाहिये,

विद्यालयों में स्वच्छता

2. स्वच्छता का अर्थ क्या है ? विचार एक अभिभावक ने रखा । कुछ लोगों ने आसपास का
2. स्वच्छता एवं पर्यावरण का सम्बन्ध क्या है ? परिसर साफ रखना यह विचार भी रखा ।

३... स्वच्छता एवं स्वास्थ्य का सम्बन्ध कया है ? प्रश्न रे-३े : स्वच्छता एवं पर्यावरण ये सब एक ही
४. विद्यालय की स्वच्छता में किस किस का सिक्के के दो पहलू हैं । इसी प्रकार के संक्षिप्त उत्तर स्वच्छता

और स्वास्थ्य के विषय में प्राप्त हुए । इनमें विद्यार्थी,
अभिभावक, सफाई कर्मचारी इन सबकी सहभागिता अपेक्षित
सामग्री वर्जित होनी चाहिये ? है । पानी as बाजारी चीन के सर फूड पेकेट्स के
दर कवर आदि जो गन्दगी फैलाते हैं उन्हें वर्जित करना चाहिए

६... स्वच्छता एवं पवित्रता का क्या सम्बन्ध है ? ऐसा सभी चाहते हैं । प्रश्न ६ के उत्तर में स्वच्छता एवं पवित्रता
स्वच्छता बनाये रखने के लिये कौन कौन से. के परस्पर सम्बन्धों का योग्य उत्तर नहीं मिला । प्रश्न ७ में
उपाय कर सकते हैं ? स्वच्छता बनाये रखने के लिए स्थान-स्थान पर “कचरापात्र'

८... स्वच्छता बनाये रखने के लिये सम्बन्धित सभी. रखें जायें, यह सुझाव मिला । प्र. ८ स्वच्छता का आग्रह
लोगों की मानसिकता, आदतें एवं व्यवहार कैसा. शतप्रतिशत होना ही चाहिए ऐसा सर्वानुमत था । गन्दगी

सहभाग होना चाहिये ?
५.. विद्यालय की स्वच्छता में किस प्रकार की

होना चाहिये ? फैलाने वाले पर आर्थिक दण्ड और कानूनी कार्यवाही करने

९... आन्तरिक स्वच्छता एवं बाहा स्वच्छता में क्या... की बात भी एक के उत्तर में आई ।
अन्तर है ? अभिमत : प्रश्नावली के दस प्रश्नों में से दो-तीन प्रश्न
१०. स्वच्छता का आग्रह कितनी मात्रा में रखना... छोडकर शेष सारे प्रश्न सरल एवं अनुभवजन्य थे । परन्तु उनके
चाहिये? उत्तर उतने गहरे व समाधानकारक नहीं थे । सदैव ध्यान में
रहना चाहिए । कक्षा में बेचों के नीचे पड़े हुए कागज के
प्रश्नावली से पाप्त उत्तर टुकडें, फर्निचर पर जमी हुई धूल, दीवारों पर चिपकी हुई टेप,
यह प्रश्नावली संस्थाचालक, शिक्षक, अभिभावक ऐसे ee फर्निचर का ढेर, उद्योग के कालांश में फेला हुआ कचरा,
तीनों गटों के सहयोग से भरकर प्राप्त हुई है । प्रश्नपत्र एवं उत्तर पुस्तिकाओं के बंडल, जमा हुआ पानी,

प्रश्न १ : स्वच्छता का अर्थ लिखते समय तन की... शौचालयों की दुर्गनध तथा जगह-जगह पड़ा हुआ कचरा
स्वच्छता, मन की स्वच्छता, पर्यावरण की स्वच्छता का... आदि सबको प्रतिदिन दिखाई तो देता है परन्तु यह मेरा घर

BRE


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पर्व ४ : विद्यालय की भौतिक एवं आर्थिक व्यवस्थाएँ

वातावरण में छात्रों का मन पढ़ने में नहीं लगता । एक बार
एक मुख्याध्यापक ने अतिथि को विद्यालय देखने के लिए
बुलाया । विद्यालय दिखाने ले जाते समय सीढ़ियों पर कागज
के टुकडे पडे हुए थे । टकडों को देखते ही मुख्याध्यापक ने
निकट की चलती कक्षा में से दो छात्रों को बाहर बुलाया ।
छात्र बाहर आये उससे पहले ही अतिथि ने वे टुकड़े उठा
लिये । स्वच्छता आदेश से या निर्देश से नहीं होती, स्वयं
करने से होती है । यह सन्देश अतिथि महोदय ने बिना बोले
दे दिया ।

स्वच्छता और पवित्रता में भी भिन्नता है । जो-जो पवित्र
है वह स्वच्छ है । परन्तु जो जो स्वच्छ है, वह पवित्र होगा
ही ऐसा आवश्यक नहीं है । विद्यालय में स्वच्छता बनाये रखने
हेतु स्थान स्थान पर कूडादान रखने होंगे । सफाई करने के
पर्याप्त साधन झाड़ू, बाल्टियाँ, पुराने कपड़े आदि विद्यालय में
कक्षाश: अलग उपलब्ध होने चाहिए । जिस किसी छात्र या
आचार्य को एक छोटा सा तिनका भी दिखाई दे वह तुरन्त उस
तिनके को उठाकर कूड़ादान में डाले, ऐसी आदत सबकी
बनानी चाहिए । कोई भी खिड़की से कचरा बाहर न फेंके,
गन्दगी करने वाले छात्रों के नाम बताने के स्थान पर स्वच्छता
रखने वाले छात्रों के नाम बताना उनको गौरवान्वित करना
अधिक प्रेरणादायी होता है ।

अनेक बार बड़े लोग विदेशों में स्वच्छता व भारत में
गन्दगी का तुलनात्मक वर्णन बच्चों के सामने ऐसे शब्दों में
बताते हैं कि जैसे भारतीयों को गन्दगी ही पसन्द है, ये स्वच्छता
के बारे में कुछ नहीं जानते । जैसे भारत में स्वच्छता को कोई
महत्त्व ही नहीं है । ऐसा बोलने से अपने देश के प्रति हीनता
बोध ही पनपता है, जो उचित नहीं है । भारत में तो सदैव से
ही स्वच्छता का आचरण व व्यवहार रहा है । एक गृहिणी
उठते ही सबसे पहले पूरे घर की सफाई करती है । घर के द्वार
पर रंगोली बनाती है, पहले पानी छिड़कती है । ऐसी आदतें
जिस देश के घर घर में हो भला वह भारत कभी स्वच्छता की
अनदेखी कर सकता है ? केवल घर व शरीर की शुद्धि ही नहीं
तो चित्त शुद्धि पर परम पद प्राप्त करने की इच्छा जन जन में
थी, आज फिर से उसे जगाने की आवश्यकता है ।

नहीं है ऐसा विचार सब करते हैं । ऐसे गन्दगी से भरे... स्वच्छता के सम्बन्ध में इस प्रकार

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विचार करना चाहिये...

०... सार्वजनिक स्थानों को स्वच्छ नहीं रखना यह आज के
समय का सामान्य प्रचलन हो गया है । इसका कारण
जरा व्यापक और दूरवर्ती है । अंग्रेजों के भारत की
सत्ता के अधिग्रहण से पूर्व भारतीय समाज स्वायत्त
था। स्वायत्तता का एक लक्षण wan से
सामाजिक दायित्वों का निर्वाहण करने का भी था ।
परन्तु अंग्रेजों ने सत्ता ग्रहण कर लेने के बाद समाज
धीरे धीरे शासन के अधीन होता गया । इस नई
व्यवस्था में ज़िम्मेदारी सरकार की और काम समाज का
ऐसा विभाजन हो गया । सरकार जिम्मेदार थी परन्तु
स्वयं काम करने के स्थान पर काम करवाती थी । जो
काम करता था उसका अधिकार नहीं था, जिसका
अधिकार था वह काम नहीं करता था । धीरे धीरे काम
करना हेय और करवाना श्रेष्ठ माना जाने लगा । आज
ऐसी व्यवस्था में हम जी रहे हैं । यह व्यवस्था हमारी
सभी रचनाओं में दिखाई देती है ।

विद्यालय की स्वच्छता विद्यालय के आचार्यों और
छात्रों के नित्यकार्य का अंग बनाना चाहिए क्योंकि
यह शिक्षा का ही क्रियात्मक अंग है । आज ऐसा
माना नहीं जाता है । आज यह सफाई कर्मचारियों का
काम माना जाता है और पैसे देकर करवाया जाता
है। छात्र या आचार्य इसे अपने लायक नहीं मानते
हैं। इससे ऐसी मानसिकता पनपती है कि अच्छे
पढेलिखे और अच्छी कमाई करने. वाले
स्वच्छताकार्य करेंगे नहीं । समय न हो और अन्य
लोग करने वाले हो और किसीको स्वच्छताकार्य न
करना पड़े यह अलग विषय है परन्तु पढेलिखे हैं
और प्रतिष्ठित लोग ऐसा काम नहीं करते यह
मानसिकता अलग विषय है । प्रायोगिक शिक्षा का
यह अंग बनने की आवश्यकता है ।

स्वच्छता स्वभाव बने यह भी शिक्षा का आवश्यक
अंग है। आजकल इस विषय में भी विपरीत
अवस्था है। सार्वजनिक स्थानों पर, मार्गों पर,


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भारतीय शिक्षा के व्यावहारिक आयाम



कार्यालयों में कचरा जमा होना और चिन्ता का विषय है। साबुन, डीटेजेंट, एसिड,

दिनों तक उसे उठाया नहीं जाना सहज बन गया है । फ़िनाइल आदि सफाई की जो सामग्री होती है वह
आने जाने वाले लोगों को, वहीं पर काम करने वाले कृत्रिम और पर्यावरण का प्रदूषण करने वाली ही होती
लोगों को इससे परेशानी भी नहीं होती है। इस है । इससे होने वाली सफाई सुन्दर दिखाई देने वाली
स्वभाव को बदलना शिक्षा का विषय बनाना ही होती है परन्तु इसके पीछे व्यापक अस्वच्छता जन्म
चाहिये । इसे बदले बिना यदि स्वच्छता का काम लेती है जो प्रदूषण पैदा करती है । ऐसी सुन्दर
किया भी तो वह केवल विवशता से अथवा अंकों के अस्वच्छता की संकल्पना छात्रों को समझ में आए
लिए होगा, करना चाहिये इसलिए नहीं होगा । ऐसा करने की आवश्यकता है। विद्यालय की

०... विद्यालय की स्वच्छता में केवल भवन की स्वच्छता स्वच्छता छात्रों का सरोकार बने यही शिक्षा है।
ही नहीं होती । पुस्तकें, शैक्षिक सामग्री,बगीचा, स्वच्छता अपने आपमें साध्य भी है और छात्रों के
मैदान, उपस्कर आदि सभी बातों की स्वच्छता भी विकास का माध्यम भी है । यह व्यावहारिक शिक्षा है,
होनी चाहिये । छात्रों का वेश, पदवेश, बस्ता आदि कारीगरी की शिक्षा है, विज्ञान की शिक्षा है, सामाजिक
भी स्वच्छ होना अपेक्षित है । शिक्षा भी है ।

०... स्वच्छता के लिए प्रयोग में ली जाने वाली सामग्री

विद्यालय का बगीचा

9. विद्यालय में बगीचा अनिवार्य है क्या ? प्रश्नावली से पाप्त उत्तर

a. विद्यालय में बगीचा क्यों होना चाहिये ? हिमाचल के पहाड़ी प्रदेश के शिक्षकों ने इस

३... विद्यालय में कितना बड़ा बगीचा होना चाहिये ? ... प्रश्नावली के उत्तर भेजे हैं । दस प्रश्नोवाली यह प्रश्नावली

¥. विद्यालय में खुला अथवा सुरक्षित स्थान ही न हो सदैव हरी भरी वृक्ष-संपदा और फलोफूलों से समृद्ध प्रदेशों
तो बगीचा कैसे बनायें ? के शिक्षकों की सहभागिता के कारण उत्तर अधिक

५... विद्यालय में बगीचा कैसा होना चाहिये ? सकारात्पक पिले हैं ।

६... बगीचा और पर्यावरण, बगीचा और सुन्दरता, १. विद्यालय मे बगीचा अनिवार्य ही है ऐसा दृढ़ मत

बगीचा एवं स्वास्थ्य, बगीचा एवं संस्कारक्षमता सब का प्रथम प्रश्न का रहा । मुंबई जैसे महानगरों के

का क्या सम्बन्ध है ? शिक्षक भी विद्यालय मे बगीचा चाहिये यह मान्य तो करते
७... विद्यालय में घास, पौधे, वृक्ष एवं लता के विषय हैं परंतु असंभव है ऐसा भी लिखते हैं । स्थान स्थान की

में किन किन बातों का विचार करना चाहिये ? परिस्थिति अनुसार विचार बदलता है. यह हम सबका
८. . विद्यालय में फूल, फल आदि के विषय में क्या अनुभव है ।

क्या विचार करना चाहिये ? २. बगीचा क्यों चाहिये ? इस प्रश्न के उत्तर में
8. छात्रों एवं आचायों की वनस्पति सेवा में ब्वालकों में सौंदर्यदृष्टि बढे, विद्यालय का सौंदर्य बढे, उनको

सहभागिता कैसे बने ? वृक्षवनस्पती फूल पौधों की जानकारी मिले इस प्रकार के
१०. बगीचा तैयार करते समय खर्च, सुविधा, विविध उत्तर प्राप्त हुए .

उपयोगिता, सुन्दरता, प्रसन्नता, प्राकृतिकता एवं ३. बगीचा कितना बडा हो ? इस प्रश्न के लिए
व्यावहारिकता का ध्यान कैसे रखें ? उसका क्षेत्र (एरिया) कितना हो इस बाबत स्पष्ट उट्लेख नहीं

RRC


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पर्व ४ : विद्यालय की भौतिक एवं आर्थिक व्यवस्थाएँ

था । जितनी जगह उतना बगीचा आवश्यक है ऐसा आग्रह
रहा । विद्यालय में खुली जगह न हो तो गमले में ही पौधे
लगाकर बगीचा तो बनवाना ही चाहिये । बगीचा कैसा
होना चाहिये इस प्रश्न के उत्तर मे सुंदर, सुशोभित, बहुत
बडी हरियाली रंगबिरंगी फूलों के पौधे, बडे बडे वृक्ष इन
सबका समावेश बगीचा संकल्पना में दिखाई दिया । ६
पर्यावरण, सुंदरता, स्वास्थ्य, संस्कारक्षमता और बगीचा
परस्परपूरक बातें हैं यह तो लिखा परंतु किस प्रकार से यह
किसी ने भी स्पष्ट नहीं किया । प्र. ७ से १० तक के WA
वैचारिक थे उनके उत्तर वैसे नहीं थे । केवल मुलायम घास,
फूलों से भरे वृक्ष इस प्रकार के सीमित शब्दों में जवाब थे ।

अभिमत : वास्तव में जैसे आंगन बिना घर अधूरा
वैसे ही बगीचा बिना विद्यालय अधूरा यह विचार मन मे दृढ़
हो । विद्यालय का बगीचा यह जैसा रमणीय स्थान है वैसा
हि शैक्षिक स्थान भी है । निसर्ग की गोद में पढना माने शुद्ध
प्राकृतिक वातावरण में पढ़ना है । जैसे वातावरण में शुद्ध
सात्तिक भाव जागृत होते हैं जो विद्यार्थी को ज्ञानार्जन में
सहायता करते हैं ।

हरीभरी लताएँ फल और पुष्पों से भरे पौधे इनके
माध्यम से सृष्टि के विविध रूपों का अनुभव होता है । उनको
संरक्षण और संवर्धन के संस्कार मिलते हैं, उनकी सेवा करने
से आत्मीयता और आनंद प्राप्त होता हैं; ज्ञान मिलता है,
प्रसन्नता मिलती है इस कारण ही ऋषिमुनीयों के आश्रम शहरों
से दूरी पर निसर्ग की गोद में रहते थे । बडे वृक्षों पर रहनेवाले
प्राणी-पक्षिओं का जीवन परिचय होता है, वृक्ष के आधार से
बढती हुई लताएँ देखकर आधार देने का अर्थ समझ में आने
लगता । वृक्षों की पहचान और उनके उपकार समझते है ।

विद्यालय के बगीचे में देसी फूल, सुगंधित फूल
योजना से लगाएँ । फक्रोटन जैसे, जिनकी विशेष देखभाल
नहीं करनी पड़ती इसलिए उनको ही लगाना यह विचार
बहुत ही गलत संस्कार करता है। उल्टा किसी की
देखभाल करने से हमारा भी मन कोमल और प्रसन्न बनता
है। फलों के वृक्ष से उनकी सुरक्षा करना, उन्हें स्वयं क्षति
नहीं पहुँचाना इस वृत्ति का पोषण होता है । आज बडे बडे
शहहरो में विद्यालय की भव्य इमारत तो दिखती है परंतु वहाँ

BW





हरियाली नहीं, पौधे नहीं, फलों से भरे
वृक्ष नहीं दिखते हैं तो केवल चारों और सिमेंट की
निर्जीवता । ऐसे रुक्ष एवं यांत्रिक निर्जीव वातावरण में
शिक्षा भी निरस होती है । संवेदना, भावना जागृत नहीं
होती । विद्यालय का भवन बनाते समय यह बात ध्यान में
रखना आवश्यक है । ज्ञान जड नही चेतन है इसकी
अनुभूति बगीचे के माध्यम से निश्चित होगी ।

विमर्श

विद्यालय के प्रांगण में आँवला, जामुन, बेर, इमली,
इस प्रकार से वृक्ष लगाने से छाँव और फल दोनों मिलेंगे ।
विद्यालय में बगीचा होना ही चाहिये ।
विद्यालय छोटा हो और स्थान न हो तो छोटा सा ही
सही लेकिन बगीचा अवश्य होना चाहिये ।
बगीचा दृश्निन्द्रीय और घ्राणेंट्रिय के संतर्पण के लिये
आवश्यक होता है । संतर्पण का अर्थ है ज्ञानेन्द्रियों
को उनका आहार देकर तुष्ट और पुष्ठट करना । रंग
दर्शनिन्द्रियि का और सुगंध प्राणेंद्रिय का आहार है ।
अत: बगीचा रंगो और सुगन्ध की दृष्टि से सुन्दर होना
चाहिये ।
विभिन्न प्रकार के रंगों के फूल और पत्तों से रंगों की
सुंदरता निर्माण होती है । परन्तु फूलों के रंगों से भी
सुगन्ध की सुंदरता का अधिक महत्त्व है । रंग सुन्दर
है परन्तु सुगन्ध नहीं है तो ऐसे फूलों का कोई महत्त्व
नहीं । ये फूल नकली फूलों के बराबर होते हैं ।
इसलिए सुगन्ध वाले फूल ही बगीचे में होने चाहिये ।
आजकल बगीचे में रंगों की शोभा को अधिक महत्त्व
देकर नकली फूलों के पौधे ही लगाये जाते हैं। क्रोटन
और अन्य विदेशी फूल जो दिखने में तो बहुत सुन्दर
होते हैं परन्तु उनमें सुगन्ध नहीं होती ऐसे लगाये जाते
हैं । ऐसे फूल लगाना व्यर्थ है । वे इंद्रियों का संतर्पण
नहीं करते ।
आजकल घास भी विदेशी लगाई जाती है । वास्तव
में घास के रूप में दूर्वा ही उत्तम है । इसका सम्बन्ध
आरोग्य के साथ है | Gal में शरीर और मन का ताप


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g.

रे.

हरण करने की अद्भुत शक्ति होती है ।
इसलिए दूर्वा के ऊपर खुले पैर चलने का परामर्श
दिया जाता है । उसी प्रकार से देशी मेंहदी भी आरोग्य
की दृष्टि से ताप हरण करने वाली होती है ।

बगीचे में नीम, तुलसी, चंपा, औदुम्बर, अशोक,
अमलतास, हरसिंगार जैसे वृक्ष, गुलाब, बेला, जासूद
जैसे पौधे, जूही, चमेली जैसी लतायें होनी चाहिये |
ये सब सात्विक सुगंधी वाले और आरोग्य प्रदान
करने वाले होते हैं ।

बगीचा केवल मनोरंजन के लिए नहीं है, केवल
शोभा के लिए नहीं है । वह बहुत बड़ा शिक्षा का
केंद्र है। उसी प्रकार से उसका उपयोग होना
चाहिये । वह शिशुकक्षाओं से लेकर बड़ी कक्षाओं
तक वनस्पतिविज्ञान का केंद्र हो सकता है । उसी
प्रकार से उसकी योजना करनी चाहिये । इस अर्थ में
वह विज्ञान की प्रयोगशाला ही है ।

बगीचा जिस प्रकार विज्ञान की प्रयोगशाला है उसी
प्रकार कृषिशास्त्र की भी प्रयोगशाला है । इसलिए
विद्यालय का बगीचा आचार्यों और छात्रों ने मिलकर
बनाया हुआ होना चाहिये । बगीचा बनाने के इस
कार्य में बड़ी से छोटी कक्षाओं तक के सभी छात्रों के
लिये काम होना आवश्यक है । शिक्षकों कों इस
कार्य में रुचि और कौशल दोनों होने चाहिये ।

मिट्टी कुरेदना, मिट्टी को कूटना, छानना, उसे पानी में
भिगोना, गूँधना, गमले तैयार करना, बुवाई करना,
पौधे लगाना, क्यारियाँ साफ करना, पानी देना, पौधों
की कटाई करना,फूल चुनना, फल तोड़ना आदि सभी
काम विद्यालय की शिक्षा के महत्त्वपूर्ण अंग हैं । इन

भारतीय शिक्षा के व्यावहारिक आयाम



कामों के लिये बगीचे की आवश्यकता होती है ।
बगीचे के कारण ही पौधा कैसे बड़ा होता है, जीवन
का विकास कैसे होता है इसका अनुभूत ज्ञान प्राप्त
होता है ।

वनस्पति हमारे लिये कितनी उपकारक है, भूमि कैसे
हमारा पोषण करती है, पेड़पौधों के स्वभाव कैसे होते
है, उन्हें क्या अच्छा लगता है और किससे उन्हें
दुःख होता है आदि का मनोवैज्ञानिक पक्ष भी इसके
साथ जुड़ा हुआ है ।

बगीचा है तो उसके साथ आयुर्वेद का ज्ञान,
औषधिविज्ञान का ज्ञान, औषधि वनस्पति को
पहचानना आदि भी सिखाया जा सकता है ।

बगीचे में ही सागसब्जी उगाकर उसका नाश्ते में
उपयोग करना, उसके साथ आरोग्यशाख्र और
आहारशास्त्र को जोड़ना भी महत्त्वपूर्ण आयाम है ।
विद्यालयों में बगीचे के लिये स्थान ही नहीं होना,
समयसारिणी में बगीचे के लिये प्रावधान ही नहीं
होना, उसे सिखाने वाले शिक्षक ही नहीं मिलना, इसे
अभिभा
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